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Guest
मैं- अरे देवरजी, इस तरह से आँखें फाड़-फाड़कर क्या देख रहे हो? खा जाने का इरादा है क्या?
देवर- इरादा तो कुछ ऐसा ही है भौजी।
मैं- तो फिर देर किस बात की देवरजी? मन की बात पूरी कर लो। वरना जब हमारी देवरानी आएगी तो हमें कहेगी- क्या जेठानी जी आपने अपने देवर को चूची दबाना और चूसना भी ठीक से नहीं सिखाया।
देवर- हाँ.. और मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकता हूँ, पर भाभी आपकी बदनामी सहन नहीं कर सकता। इसीलिए आपकी चूचियों को दबाकर, सहलकर, चूसकरके बता रहा हूँ, दिखा रहा हूँ, महसूस करा रहा हूँ।
और फिर जब देवर के हाथ मेरे दोनों कबूतरों के ऊपर पहुँच गये तो मेरा सारा शरीर मारे उत्तेजना के काँपने लगा। मैं देवर से लिपटती जा रही थी। उन्होंने एक चूची को सहलाते हुए अपने एक अंगूठे और एक उंगली की मदद से मेरी चूची के निपल को सहलाने लगे। हाय मैं तो पानी-पानी हो गई।
अब मेरे देवर ने एक अच्छे सिष्य की तरह मेरी एक चूची को अपने मुँह में ले लिया और निपल के चारों तरफ जीभ को घुमाने लगा। फिर चूची को चूसने भी लगा। पाँच मिनट तक वो ऐसा करता रहा। फिर उसने चूची बदल ली। याने जिस चूची को दबा रहा था उसे तो चूसने लगा और जिसे चूस रहा था उसे दबाने लगा। मैं छटपटाने लगी। मुझसे अब और बर्दास्त नहीं हो पा रहा था।
आज किसी भी तरह से देवर का लण्ड अपनी फुद्दी में घुसवाना ही था। वरना... फिर पता नहीं मेरी फुद्दी क्या कर बैठे।
मैं- देवरजी, अब आगे भी तो कुछ करोगे? या यहीं तक ही सीखे हो?
देवर- अरे नहीं भाभी, इससे आगे भी सीखा हूँ।
मैं- सीखे हो तो फिर दिखाओ करके।
देवर ने अबकी बार अपनी पैंट निकाली और मैंने अपनी साड़ी को अपने तन से अलग किया। फिर देवर ने अपनी चड्ढी उतार फेंकी और मैंने अपना साया।
देवर- अब क्या करें भाभीजी?
मैं- एक काम करो... तबला ले आओ और बजाओ।
देवर- “नहीं भाभी, अब देखो ना... मैं तो पूरा का पूरा नंगा हो गया, और आप अभी तक अपने असली खजाने को सट तले के अंदर छुपा के रखी हुई हैं...” देवर का इशारा मेरी पैंटी की तरफ था।
मैं- वो तो देवरजी... आपके हाथ से ही उतरेगी। चलो, आपको देखना है तो आप खुद ही निकालो।
जैसे ही देवर ने पैंटी को नीचे सरकाया... उसकी तो जैसे बोलती ही बंद हो गई।
मैं (चम्पारानी)- अरे देवरजी, क्या हुआ? बुत के जैसे कैसे हो गये? बस इतना ही सीखे हो क्या?
देवर- नहीं भाभीजी, जितना सोचा था उससे बढ़कर पाया। पर ये क्या? ये क्या भाभीजी?
मैं- क्या हुआ देवरजी?
देवर- आपकी बुर तो एकदम सफाचट है। इसपे तो एक भी झाँट नहीं है, कहाँ गई सारी की सारी हुँघराली झाँटें?
मैं झेंपते हुए- वो देवरजी, मैंने आज सुबह साफ कर दिए।
देवर- साफ किए नहीं हैं भाभीजी... साफ हो गया है। आपने कशम खाई थी की आप अगर आज से पहले कभी भी मेरे लण्ड को छुआ हो या चूसा हो तो एक भी झाँट ना रहे।
मैं- हाँ... देवरजी हाँ... मैं स्वीकार करती हूँ की हाँ... वो परीजात मैं ही थी। जो परीजात का नाम लेकर आपके कमरे में हर रात को आती थी, आपके लण्ड से खेलती थी, फिर चूसती थी और अपने कमरे में वापस आ जाती थी।
देवर- मैं जानता था भाभी की वो परीजात नहीं आप हो।
मैं- फिर आपने इतने दिन तक क्यों नाटक किया देवरजी? पकड़कर पलंग के ऊपर पटक के चोद क्यों नहीं दिया?
देवर- मैं आपको अपनी ही नजरों से गिराना नहीं चाहता था भाभी।
मैं- वो तो ठीक है... लेकिन आज तो मुझे चोद सकते हो ना की आज भी आपका नाटक जारी रहेगा?
देवर- नहीं भाभी, आप आज तक जितना तड़पी हैं। मैं और आपको तड़पता हुआ, जल बिन मछली की तरह तरसता हुआ नहीं देख सकता। आज आपको जी भर के प्यार करूँगा भाभी। पूरे रात भर प्यार करूँगा, कशम से।
मैं- अच्छा, क्या करोगे?
देवर- “सबसे पहले तो...”
मैं- “बातें ना करो देवरजी, काम करके बताओ..." और मैं (चम्पारानी) ठीक... बिल्कुल ठीक सोच रही थी। मेरा देवर ट्रेनिंग में कभी भी फेल नहीं हो सकता था। उसे हर हाल में पास ही होना था।
देवर- इरादा तो कुछ ऐसा ही है भौजी।
मैं- तो फिर देर किस बात की देवरजी? मन की बात पूरी कर लो। वरना जब हमारी देवरानी आएगी तो हमें कहेगी- क्या जेठानी जी आपने अपने देवर को चूची दबाना और चूसना भी ठीक से नहीं सिखाया।
देवर- हाँ.. और मैं सब कुछ बर्दाश्त कर सकता हूँ, पर भाभी आपकी बदनामी सहन नहीं कर सकता। इसीलिए आपकी चूचियों को दबाकर, सहलकर, चूसकरके बता रहा हूँ, दिखा रहा हूँ, महसूस करा रहा हूँ।
और फिर जब देवर के हाथ मेरे दोनों कबूतरों के ऊपर पहुँच गये तो मेरा सारा शरीर मारे उत्तेजना के काँपने लगा। मैं देवर से लिपटती जा रही थी। उन्होंने एक चूची को सहलाते हुए अपने एक अंगूठे और एक उंगली की मदद से मेरी चूची के निपल को सहलाने लगे। हाय मैं तो पानी-पानी हो गई।
अब मेरे देवर ने एक अच्छे सिष्य की तरह मेरी एक चूची को अपने मुँह में ले लिया और निपल के चारों तरफ जीभ को घुमाने लगा। फिर चूची को चूसने भी लगा। पाँच मिनट तक वो ऐसा करता रहा। फिर उसने चूची बदल ली। याने जिस चूची को दबा रहा था उसे तो चूसने लगा और जिसे चूस रहा था उसे दबाने लगा। मैं छटपटाने लगी। मुझसे अब और बर्दास्त नहीं हो पा रहा था।
आज किसी भी तरह से देवर का लण्ड अपनी फुद्दी में घुसवाना ही था। वरना... फिर पता नहीं मेरी फुद्दी क्या कर बैठे।
मैं- देवरजी, अब आगे भी तो कुछ करोगे? या यहीं तक ही सीखे हो?
देवर- अरे नहीं भाभी, इससे आगे भी सीखा हूँ।
मैं- सीखे हो तो फिर दिखाओ करके।
देवर ने अबकी बार अपनी पैंट निकाली और मैंने अपनी साड़ी को अपने तन से अलग किया। फिर देवर ने अपनी चड्ढी उतार फेंकी और मैंने अपना साया।
देवर- अब क्या करें भाभीजी?
मैं- एक काम करो... तबला ले आओ और बजाओ।
देवर- “नहीं भाभी, अब देखो ना... मैं तो पूरा का पूरा नंगा हो गया, और आप अभी तक अपने असली खजाने को सट तले के अंदर छुपा के रखी हुई हैं...” देवर का इशारा मेरी पैंटी की तरफ था।
मैं- वो तो देवरजी... आपके हाथ से ही उतरेगी। चलो, आपको देखना है तो आप खुद ही निकालो।
जैसे ही देवर ने पैंटी को नीचे सरकाया... उसकी तो जैसे बोलती ही बंद हो गई।
मैं (चम्पारानी)- अरे देवरजी, क्या हुआ? बुत के जैसे कैसे हो गये? बस इतना ही सीखे हो क्या?
देवर- नहीं भाभीजी, जितना सोचा था उससे बढ़कर पाया। पर ये क्या? ये क्या भाभीजी?
मैं- क्या हुआ देवरजी?
देवर- आपकी बुर तो एकदम सफाचट है। इसपे तो एक भी झाँट नहीं है, कहाँ गई सारी की सारी हुँघराली झाँटें?
मैं झेंपते हुए- वो देवरजी, मैंने आज सुबह साफ कर दिए।
देवर- साफ किए नहीं हैं भाभीजी... साफ हो गया है। आपने कशम खाई थी की आप अगर आज से पहले कभी भी मेरे लण्ड को छुआ हो या चूसा हो तो एक भी झाँट ना रहे।
मैं- हाँ... देवरजी हाँ... मैं स्वीकार करती हूँ की हाँ... वो परीजात मैं ही थी। जो परीजात का नाम लेकर आपके कमरे में हर रात को आती थी, आपके लण्ड से खेलती थी, फिर चूसती थी और अपने कमरे में वापस आ जाती थी।
देवर- मैं जानता था भाभी की वो परीजात नहीं आप हो।
मैं- फिर आपने इतने दिन तक क्यों नाटक किया देवरजी? पकड़कर पलंग के ऊपर पटक के चोद क्यों नहीं दिया?
देवर- मैं आपको अपनी ही नजरों से गिराना नहीं चाहता था भाभी।
मैं- वो तो ठीक है... लेकिन आज तो मुझे चोद सकते हो ना की आज भी आपका नाटक जारी रहेगा?
देवर- नहीं भाभी, आप आज तक जितना तड़पी हैं। मैं और आपको तड़पता हुआ, जल बिन मछली की तरह तरसता हुआ नहीं देख सकता। आज आपको जी भर के प्यार करूँगा भाभी। पूरे रात भर प्यार करूँगा, कशम से।
मैं- अच्छा, क्या करोगे?
देवर- “सबसे पहले तो...”
मैं- “बातें ना करो देवरजी, काम करके बताओ..." और मैं (चम्पारानी) ठीक... बिल्कुल ठीक सोच रही थी। मेरा देवर ट्रेनिंग में कभी भी फेल नहीं हो सकता था। उसे हर हाल में पास ही होना था।