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नए पड़ोसी complete

मैं भी आंटी के पास जाकर नाचने लगा. ओम ने नीचे बैठ कर आंटी की पेंटी अपने दोनों अंगूठो में फंसा कर उतार दी. आंटी ने अपने पैर उठा कर ओम का साथ दिया. मैंने नीलम आंटी की बिना बालों वाली चूत की सिर्फ एक झलक ही देखी और ओम ने अपने होठ आंटी की चूत पर रख दिए. आंटी के मुह से एक सिसकारी निकली और उनका थिरकना बंद हो गया. आंटी की चुंचिया एक दम तन कर मुझे मुह चिड़ाने लगी तो मैंने भी आगे बढ़ कर नीलम आंटी की एक चुन्ची पर हाथ रखा और दूसरी के निप्पल को मुह में लेकर चूसने लगा. आंटी की सिस्कारियां बहुत बढ़ गयी. आंटी की चुंचिया साइज़ में तो बहुत बड़ी थी पर थी काफी कड़क. अचानक आंटी के मुह से आआह्ह्ह्ह निकली तो मैंने देखा की ओम ने अपनी दो उंगलिया आंटी की चूत में पेल दी है और अन्दर बाहर कर रहा है.

मैंने ओम से कहा "ओम भाई कब तक खड़े रहेंगे बेड पर चले."

ओम ने मुझे तो कोई जवाब नहीं दिया पर आंटी को पकड़ कर बेड पर गिरा दिया और वापस उनकी चूत में ऊँगलीयां अन्दर बाहर करने लगा. मैं भी नीलम आंटी की चुन्चियो को चूसने लगा और आंटी ने पहली बार मेरे लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ा. मेरी उत्तेजना और बढ़ गयी और मैंने आंटी के गुलाबी होठो पर पाने होठ रख दिए और चूमने लगा. जिसका असर आंटी पर ये हुआ की वो मेरे लंड को जोर जोर से हिलाने लगी और मैं उनकी चुचिया जोर जोर से दबाने लगा.

 
ओम ने मुझसे कहा "अरे यार कहा ऊपर वाले होठ चाट रहे हो इधर आओ असली अमृत तो यहाँ नीचे वाले होठों में है."

मैं अब नीचे आकर नीलम आंटी की चूत चाटने लगा और ओम ने अपना लौड़ा आंटी के मुह में पेल दिया. आंटी की चूत से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी. पता नही ये साबुन की खुशबू थी या उन्होंने कोई परफ्यूम अपनी चूत पर लगाया था पर मुझे उनकी चूत चूसने में बहुत मजा आ रहा था. साथ ही साथ मैं उनकी जांघो पर काट भी रहा था पर आंटी चिल्ला नही पा रही थी क्योंकि उनके मुह में ओम का लंड जो फंसा था. थोड़ी देर तक यही खेल चलता रहा और आंटी झटके खाने लगी और उनकी चूत से मलाई बाहर आ गयी. उधर ओम भी आंटी के मुह में झड गया. आंटी ओम का सारा माल गटक गयी और उसके लंड का सुपाडा चाट चाट के साफ़ करने लगी और मैंने चादर से आंटी की चूत साफ़ की और अपने लंड उनकी चूत पर टिका दिया.

ओम मुझे रोकते हुए बोला "क्यों मेरी रंडी लेगी न अपने बेटे के दोस्त का लंड अपनी चूत में. चुद्वायेगी न कुतिया. बोलती क्यों नहीं."

आंटी उत्तेजना से चिल्लाती हुई बोली "बस करो और डाल दो जल्दी. बर्दाश्त नहीं हो रहा."

ओम ने मुझे इशारा किया और मैंने एक ही शॉट में पूरा लंड नीलम आंटी की चूत में डाल दिया. "अआह नीलम, मेरी जान" मेरे मुह से आवाज निकली.

"वाह आंटी से जान पे आ गए. इतनी जल्दी इतनी तरक्की. चोद साले जोर जोर से. तेरे दोस्त की माँ है. कोई कसर बाकी न रह जाए और तू रंडी तुझे तो यही लग रहा होगा की अपने सगे बेटे से ही चुदवा रही है तभी तो इतने मजे ले रही है. ले और मजे ले." ओम चिल्ला चिल्ला कर हमारा हौसला बढ़ा रहा था.

मैंने अपनी स्पीड और बढ़ा दी. काफी देर से मेरे लंड का बुरा हाल था. जब से रश्मि दीदी की चुदाई देखी थी तब से ही लावा फूटने की तैय्यारी थी तो वो भी कब तक सहता. आखिर मैं नीलम आंटी की चूत में ही झड गया. पर तब तक ओम का लंड फिर से तैयार हो चुका था तो उसने मुझे हटाया और नीलम आंटी की चूत में अपना लंड पेल दिया.

 
नीलम आंटी पहले से ही कामोत्तेजना से पागल हो रही थी और जब ओम ने बिना चेतावनी के अपना लंड आंटी की चूत में पेल दिया तो आंटी से बर्दाश्त नहीं हुआ और वो भी झड गयी पर ओम का लंड तो अपने पूरे शबाब पर था. उसने जोर जोर से आंटी की चूत में लंड पेलना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में आंटी फिर से गरम हो गयी और उन दोनों की जबदस्त चुदाई देख कर मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया. ओम तो एक बार झड चूका था तो इतनी जल्दी आंटी की चूत खाली नहीं होने वाली थी तो मैं अपने हाथो से ही लंड मुठीयाने लगा.

जब ओम की नजर मुझ पर पड़ी तो वो नाराज होकर बोला "अरे मनीष बाबू क्या तुमको यहाँ मुठ मारने लाये है. अरे डालो इस रांड की गांड में अपना हथियार." और ये कह कर ओम आंटी को लेकर पलट गया. अब ओम नीचे था और आंटी ऊपर पर ओम का लंड अभी भी आंटी की चूत में फंसा था. अब नीलम आंटी की चिकनी और बेदाग़ गांड मेरी आँखों के सामने थी. मैं जैसे ही उनकी गांड में लंड डालने के लिए आगे बढ़ा नीलम आंटी बोली "अरे बेहेन्चोद सूखी मारेगा क्या. उधर टेबल से क्रीम उठा कर लगा ले."

मैंने टेबल से क्रीम उठाई और अपने लंड पर अच्छे से लगा ली और लंड आंटी की गांड के छेद पर टिका दिया. ओम बोला अबे मार धक्का जोर से. ये रास्ता मैं पहले ही तेरे लिए खोल चूका हूँ. मुझे लगा की ओम ने आंटी की काफी गांड मारी है और मेरा लंड आराम से आंटी की गांड में घुस जायेगा तो मैंने एक जोरदार धक्का मार कर पूरा लंड आंटी की गांड में घुसाना चाहा लेकिन आंटी की गांड ओम से चुदी होने के बाद भी काफी टाईट थी. मेरा लंड आधा ही अन्दर गया और नीलम आंटी के मुह से आवाज निकली "आराम से बेहनचोद. मारेगा क्या."

बाकी का लंड मैंने आराम से आंटी की गांड में घुसाया और हलके हलके धक्के लगाने लगा. ओम ने भी अब आंटी की चूत में नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए. करीब २० मिनट तक नीलम अरोरा का सैंडविच बनाने के बाद हम दोनों आंटी के अलग अलग छेदों में झड गए. थोड़ी देर हम ऐसे ही पड़े रहे. फिर नीलम अरोरा बोली "सुनो अब तुम लोग जाओ. आज चेतन के पापा जल्दी लौट आएंगे."

 
मन तो मेरा एक बार और नीलम आंटी की बजने का था पर जब उन्होंने बोल दिया तो हम दोनों ने अपने कपडे पहने और उनके घर से निकलने लगे. पर चलते चलते नीलम आंटी ने एक अच्छी बात कही. मुझसे बोली "मनीष अब आते रहना. ओम तो ज्यादातर दुकान में लगा रहता है. तो तुम अकेले भी आ सकते हो..." मैंने कहा "जरूर."

ओम बोला "बहुत अच्छे भौजी. हमारा ही पत्ता काट रही हो."

"तुम्हे हमारा ध्यान ही कहाँ रहता है. जब बुलाओ तब कह देते हो दुकान में बिजी है." नीलम अरोरा ने ताना मारा.

"वो चिंता अब नहीं रही. दुकान में एक लड़का रख लिया है. अब जब याद करोगी तो हाजिर हो जायेंगे." ओम ने कहा और हम दोनों वहां से चल दिए.

"बहुत कमाई हो रही है ओम भैया. नौकर भी रख लिए दुकान में." मैंने मजे लेते हुए पुछा.

"घंटा कमाई हो रही है. नौकर वौकर नहीं रखा. असल में चूत के चक्कर में आधे टाइम तो दुकान बंद ही रहती थी तो गाँव से दोस्त के छोटे भाई को बुला लिया है. हमारे साथ ही रहेगा और दुकान में भी हाथ बटाएगा थोडा पैसा भी दे देंगे. वैसे उसको असली लालच तो चूत का है." ओम ने कहा.

"अच्छा? किसकी चूत का?" मैंने पुछा.

"अरे बड़ा चुदक्कड लौंडा है. गाँव में बहुत लौंडियों को चोदा है इसने. इसके घर पर रोज शिकायत पहुचती थी तो घरवाले भी चाहते थे की लौंडा घर से बाहर जाए. तो हमने इससे कहा की हमारे साथ चलो. चूत भी दिला देंगे और काम भी सिखा देंगे तो लौट कर गाँव में ही दुकान खोल लेना. वैसे नज़र तो उसकी तुम्हारे माल रुची पे थी पर फिलहाल उसकी अम्मा से काम चलवा देंगे..." ओम ने कहा.

"पर रुची की मम्मी तैयार होंगी." मैंने पुछा.

"पता है साले का लंड हमसे १ इंच बड़ा है जब भौजी को पता चलेगा तो दौड़ कर चुद्वायेगी. और तैयार तो हम करवा ही लेंगे. चलो दुकान पर मिलवाते है तुमसे." ओम ने कहा और हम दोनों दुकान पर आ गए.

 
"अरे लाला ये मनीष भैया है. हमारे ख़ास दोस्त और मनीष ये है लाला. वैसे इसका नाम तो राजेंद्र कुमार है पर घर में सबसे छोटा है तो सब प्यार से लल्ला लल्ला कहते थे तो नाम ही लाला हो गया." ओम ने मुझे लाला से मिलवाया. हम दोनों ने हाथ मिलाये. गठीला बदन था. उम्र में मुझसे बड़ा ही होगा लेकिन ओम से छोटा था.

"कोई आया तो नहीं था" ओम ने लाला से पुछा.

"आंटी जी आई थी. तुमको पूछ रही थी." लाला ने जवाब दिया.

"रुची घर में है क्या?" ओम ने फिर से पुछा.

"नहीं वो तो १ घंटे पहले ही कही निकल गयी." लाला ने जवाब दिया.

"अच्छा तुम शटर डाउन करो." ओम ने लाला से कहा और हमको लेकर कोने में आ गया और बोला "तो ठीक है मनीष भाई, अब तुम घर जाओ और रश्मि से झगडा मत करना. मैं कल फिर आऊंगा उसको चोदने फिलहाल जरा लाला से भौजी का उद्घाटन करवा दूं. रुची घर में नहीं है तो मौका अच्छा है."

"मैं भी चलूँ." मैंने पुछा क्योंकि जब से ओम ने बोला की लाला का लंड ओम से भी बड़ा है तो मेरा मन उसको देखने का था.

"अभी तो नीलम भौजी को पेल के आये हो. ज्यादा लालच अच्छी बात नहीं." ओम बोला.

"वो बात नहीं है, मैं बस देखना चाहता था की आंटी को तुम कैसे तैयार करोगे." मैंने कहा.

"तो एक काम करो. छत से आ जाना थोड़ी देर बाद और छुप कर देख लेना और जैसे नीलम भौजी को तैयार किया वैसे ही इनको भी करेंगे." ओम ने कहा और लाला को लेकर आंटी के घर के अन्दर चला गया.

मैं भी जल्दी से घर आया ताकि छत से जाकर आंटी की चुदाई देख सकूं पर मुझे रश्मि दीदी ने पकड़ लिया.

"कहाँ भाग रहा है. मुझे ये बता की ओम घर के अन्दर कैसे आया." रश्मि दीदी ने पुछा.

"अरे मुझे क्या पता. मैं जरा ऊपर बाथरूम जा रहा हूँ यहाँ का तो लॉक ख़राब है." मैंने पीछा छुड़ाने के लिए कहा.

"लॉक कैसे ख़राब हो गया रातो रात और ओम को कैसे पता की मैं बाथरूम में हूँ और तुझे भी शर्म नहीं आई. जो जो वो बोल रहा था तू करता जा रहा था." दीदी ने चिल्लाते हुए कहा.

 
"मुझ पर फालतू में नाराज मत हो. मुझे सच में कुछ नहीं पता और वैसे भी मैंने कई बार तुम्हे मयंक के साथ देखा है और रुची ने मुझे बताया की तुम ओम के साथ भी करवा चुकी हो तो मैंने सोचा की जो वो कर रहा है तुम्हारी मर्जी से कर रहा है. अब जाने दो बाकी बातें बाद में करेंगे." मैंने बोला और जल्दी से ऊपर भागा पर रश्मि दीदी को तो चैन ही नही था. वो मेरे पीछे पीछे ऊपर आ गयी तो मुझे मजबूरन बाथरूम में घुसना पड़ा.

दीदी बाथरूम के डोर पर आकर बोली "सुन मनीष. मयंक चला गया तो मैंने सोचा की ओम से साथ ही सेफ रहेगा लेकिन वो तो बिना बताये घर में घुस आया. तुझे तो मेरी हेल्प करनी चाहिए थी और तू उसकी बातें मान रहा था."

मैंने अन्दर से कहा "देखो मैं पहले से ही जानता हूँ की ओम बहुत हरामी आदमी है और वो सिर्फ तुम्हे ही नहीं रुची, रुची की मम्मी, चेतन की मम्मी, कामिनी आंटी और उनकी भतीजी को भी चोदता है और जो उसकी बात नहीं मानता वो उसके साथ कुछ भी कर सकता है. तुम्हे तो ये उससे चुदवाने से पहले सोचना चाहिए था."

आज पहली बार मैंने रश्मि दीदी के सामने चोदने चुदवाने की बात की थी पर उन्होंने कोई रिएक्शन नहीं दिया बल्कि मुझसे पुछा "तुझे ये सब कैसे पता."

"क्या पता" मैंने दीदी से पुछा.

"यही की वो इन सबके साथ सेक्स करता है" दीदी ने पुछा.

"ओम को रुची की मम्मी को चोदते मैंने अपनी आखों से देखा है और रुची ने मुझे खुद बताया की वो ओम से चुदवाती है. बाकी लोगो का ओम ने मुझसे बताया और अभी वो मुझे लेकर नीलम आंटी के यहाँ गया था और उनको मेरी आँखों के सामने ही चोदा." मैंने ओम के बारे में दीदी को सब बता दिया. दीदी काफी परेशान हो गयी. फिर बोली "वो तुझे क्यों ले गया नीलम आंटी के घर और तू देखता क्यों रहा. वापस क्यों नहीं आ गया."

"अरे मैं कोई बच्चा हूँ क्या? तुम्हारे सामने रुची को चोद चूका हूँ. नीलम आंटी के घर मुझे वो क्यों ले गया ये उसी से पूछना पर मैं इसलिए देखता रहा क्योंकि मुझे अच्छा लग रहा था." मैंने चिड़ते हुए कहा.

"और जब वो मुझे चोद रहा था तब भी तुझे देख कर अच्छा लग रहा था न इसीलिए घूर घूर कर देख रहा था." दीदी फिर से नाराज हो गयी और नीचे चली गयी. आज दीदी ने मेरे सामने पहली बार गुस्से में ही सही लेकिन चुदाई शब्द बोला था. जब दीदी नीचे चली गयी तो मैं फटाफट बाथरूम से निकला और मयंक की छत से नीचे उतर गया.

 
नीचे जाकर देखा तो पता चला की आंटी को तैयार करने में ओम को कोई तकलीफ नहीं हुई होगी क्योंकि लाला आंटी की ताबड़तोड़ चुदाई कर रहा था और ओम का कहीं आता पता नहीं था शायद वो रश्मि दीदी और नीलम आंटी को चोद कर थक चूका था और वापस दुकान पर चला गया था. मैंने देखा की वाकई लाला का लंड ओम से बड़ा और मोटा था जो की आंटी की चूत में पूरा पूरा जा रहा था और आंटी मस्ती में "येस्स हाईईई औऊउर जूऊर्र्र्र सीईईईई हाआआआअ उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़" की आवाजे निकाल रही थी. ओम गलत कह रहा था ये लंड ओम के लंड से एक इंच से ज्यादा बड़ा था और ब्लू फिल्मों में जो हब्शी होते है उनके लंड जैसा लग रहा था.

मैं आंटी की तारीफ़ किये बिना नहीं रह सका की इतना मोटा लंड कैसे आराम से खा रही थी. अच्छा हुआ रिशू ने रुची को बचा लिया वरना उसकी तो चूत ही फट जाती. लाला आंटी को भीषण तरीके से चोद रहा था. कभी गोद में उठा लेता था तो कभी बेड पे लिटा देता था. कभी दीवार से लगा कर तो कभी पलटा कर आंटी की चुदाई कर रहा था. करीब आधे घंटे की भीषण चुदाई के बाद आंटी और लाला एक साथ झड गए और एक दुसरे से चिमट कर लेट गए. लाला बोला "मजा आ गया मेरी जान. बहुत दिनों की प्यास आज बुझी है. अब तो रोज यही मजा दूंगा."

"हाँ मजा तो बहुत आया. सही कह रहा था ओम बहुत जानदार हथियार है तुम्हारा. वैसे इस महीने तो कोई दिक्कत नहीं है जब मन करे आ जाना." आंटी ने लाला से कहा.

"अगले महीने कोई दिक्कत होने वाली है क्या?" लाला ने पुछा.

"कुछ दिनों की दिक्कत होगी क्योंकि अगले महीने मयंक रुची से राखी बंधवाने आयेगा तो कुछ दिन रुकेगा." आंटी ने जवाब दिया.

आंटी की बात सुन कर याद आया की अगले महीने राखी है. पिछली राखी और इस राखी के बीच मेरे और रश्मि दीदी के बीच कितना कुछ बदल गया. मैं ये सोचते सोचते छत पर वापस आ गया.

नीचे गया तो रश्मि दीदी अपने कमरे में थी और मैं अपने रूम में चला गया. मम्मी पापा आये तो दीदी ने उनसे कहा की बाथरूम का लॉक ख़राब हो गया है. पापा ने मुझसे कहा की किसी को बुला कर ठीक करा देना और मैंने भी बोला की जी ठीक है एक दो दिन में करवा दूंगा. अगले दिन मम्मी पापा के जाने के बाद दीदी मुझसे बिना कुछ बोले ऊपर वाले बाथरूम में नहाने चली गयी और थोड़ी देर में ही ओम भी आ गया.

मैंने बोला "आज तो दीदी ऊपर वाले बाथरूम में चली गयी है. तुमको उनके निकलने का वेट करना पड़ेगा."

ओम मेरी बात सुन कर हंस दिया और बोला "देखते रहो कैसे तुम्हारी चुदासी बेहना मेरे लिए बाथरूम का दरवाजा खुद ही खोल देगी." और वो ऊपर चल दिया. मैं भी पीछे पीछे चल दिया. ओम ने ऊपर जाकर अपने सारे कपडे उतार कर बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो दीदी ने अन्दर से पुछा "क्या है मनीष. मैं नहा रही हूँ."

ओम ने जवाब दिया "मैं हूँ डार्लिंग. जल्दी से दरवाजा खोलो."

2 मिनट तक दीदी कुछ नहीं बोली फिर मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब दीदी ने दरवाजा खोल दिया और ओम बाथरूम के अन्दर चला गया.

 
ओम के बाथरूम के अन्दर जाते ही मैं भी बाथरूम के दरवाजे पर कान लगा कर खड़ा हो गया. अन्दर दीदी और ओम कुछ बातें कर रहे थे पर मुझे समझ में नहीं आ रही थी पर दीदी बीच बीच में हंस रही थी इसका मतलब उनका कल का गुस्सा ठंडा हो गया था. थोड़ी देर में शावर की आवाजे आने लगी और दीदी की उफ्फ आह अऔच की भी मतलब ओम रश्मि दीदी को शावर के नीचे चोद रहा था. मैंने थोड़ी ताक झाँक की कोशिश की लेकिन कोई सफलता नहीं मिली तो मैंने सोचा की कोई बात नहीं जब ओम निकलेगा तब पूछूंगा की आज दीदी ने इतने आराम से कैसे चुदवा लिया.

मैं ये भी सोच रहा था की 3-4 दिनों से रुची को नहीं चोदा और उसकी मम्मी को भी नहीं. एक दो दिन में इनमे से किसी एक को फिर से चोदना ही पड़ेगा. मैं ये सोच ही रहा था की अचानक बाथरूम का दरवाजा खुला और ओम दीदी को गोद में लेकर बाहर आ गया. दीदी और ओम पूरे नंगे थे और ओम का लंड दीदी की चूत में पैवस्त था. दीदी मुझे देख कर थोडा हडबडा गयी लेकिन ओम ने उनको कुछ कहने का मौका ही नही दिया और बेड में लिटा कर जोर जोर से चोदने लगा.

मैं फटी हुई आँखों से दीदी की मस्त चुदाई देखने लगा. दीदी की उफ्फ आह आउच फिर से शुरू हो गयी थी और ओम अचानक मेरी तरफ देख के बोला "अरे ऐसे क्या देख रहा है आँखे फाड़ फाड़ के?"

मैं अचानक इस सवाल से घबरा गया और अचानक ही बोल पड़ा "नहीं वो बिस्तर गीला हो रहा है."

"ये लो रश्मी, इसकी जवान कुवारी बहन इसकी आँखों के सामने चुद रही है और इसको बिस्तर गीला होने की पड़ी है. अरे घूर तो तू अपनी बहन को ऐसे रहा है जैसे खुद भी चोदना चाहता है." ओम ने मेरा मजाक सा उड़ाते हुए कहा. उसकी बात सुन कर दीदी के मादक चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी और ओम ने एक जोर का शॉट और लगाते हुए अपना लंड दीदी की चूत में डाल दिया.

 
मुझे ओम की बात कुछ अच्छी नहीं लगी और मैं वापस नीचे आ गया लेकिन मेरी आँखों के सामने अभी भी दीदी का नंगा जिस्म ही घूम रहा था. करीब आधे घंटे बाद ओम भी वापस नीचे आया.

मैंने पुछा "रश्मि दीदी कहाँ है."

ओम ने जवाब दिया "अरे भाई नहाने गयी थी तो नहा कर ही आयेगी लेकिन तुम नीचे क्यों चले आये."

"तुम मेरा मजाक क्यों उड़ा रहे थे दीदी के सामने." मैंने नाराज़गी से बोला.

"अरे मेरे भोले मनीष बाबू मजाक की पॉवर तुम नहीं जानते. अब याद करो की जब मयंक ने रश्मि से कहा की तुमसे चुदवा ले वो कैसे भड़क गयी थी लेकिन आज जब मैंने वही बात बोली तो कैसे मुस्कुरा रही थी. तुम खामखाँ नीचे आ गए वरना मैं तुम्हारे और रश्मि के बारे में और गन्दी गन्दी बातें करता तो वो तुमसे थोडा और खुल जाती." ओम ने कहा.

"उससे क्या होगा यार? अब जैसे भी करो मुझे दीदी को जल्दी से चोदना है." मैंने रश्मि दीदी के नंगे चिकने बदन को याद करते हुए कहा.

"यार तुम समझते नहीं हो. हर औरत के अन्दर एक रंडी होती है अब हमको तुम्हारी बहन के अन्दर की रंडी को बाहर लाना है ताकि वो तुमसे चुदवा ले लेकिन अब तुम जल्दी मचा रहे हो तो गाडी टॉप गियर पर डालनी ही पड़ेगी." ओम ने कुछ सोचते हुए कहा. "अच्छा सुनो अभी तो मैं चलता हूँ पर कल तुम सुबह सुबह ही घर से गायब हो जाना."

 
"पर क्यों और नीलम आंटी के घर नहीं चलना." मैंने पुछा.

"अरे नीलम की लौंडिया आ गयी है आज सुबह सुबह दिल्ली से. कुछ दिन रहेगी जब तक तुम रुची से काम चलाओ और जब तुम कल घर में नहीं रहोगे तब रश्मि के अन्दर का रंडापा जल्दी बाहर आयेगा. समझे." ओम बोला.

"अच्छा चारू दीदी आई है. ओम भाई वो भी तो टंच माल है. शादी के 4 साल बाद भी वैसे ही दिखती है. उनके साथ कुछ नहीं हो सकता." मैंने ओम से कहा.

"यार तुम बहुत डिमांड करते हो. अब सोच लो की मेहनत कहा करे तुम्हारी रश्मि दीदी पे की चारू दीदी पे." ओम ने हँसते हुए पुछा.

मैंने कहा "इसमें तो कोई चॉइस ही नहीं है. सगी बहन से बढ़कर कोई नहीं."

"तो बस कल जैसे ही तुम्हारे मम्मी पापा जाये तुम भी गायब हो लेना 2 घंटे के लिए." ओम ने जाते जाते कहा.

मैंने दरवाजा बंद किया और सोचा की कल सुबह आंटी के पास जाना चाहिए. काफी दिन हो गए थे उन्हें चोदे और जब से लाला को उनकी चुदाई करते देखा था तो मेरा मन भी मचल रहा था. मैं येही सोच रहा था की तब तक दीदी नहा कर नीचे आ गयी और मुझसे बोली "जा तू भी नहा ले तो मैं नाश्ता लगा दूं." मैंने भी टॉवल उठाया और ऊपर वाले बाथरूम में नहाने चला गया. वहां दीदी की ब्रा पैंटी पड़ी थी. दीदी की चुदाई देख कर मैं गरम तो हो गया था तो मैंने सोचा नीलम आंटी न सही दीदी की ब्रा पैंटी ही सही और मैंने दीदी की पैंटी में मुठ मारी और नहा कर वापस आ गया.

 
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