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नए पड़ोसी complete

"क्यों क्या अभी भी बहुत दर्द हो रहा है." मैने दीदी से पुछा.

"दर्द तो बिलकुल गायब हो गया है. कमाल की दवा दी ओम ने बस थकन है लेकिन तू सिकाई कर दे बहुत आराम मिल रहा है." दीदी ने कहा. थोड़ी देर मैंने दीदी की चूत की सिकाई की फिर दीदी पलट कर लेट गयी तो मैंने उनकी गांड की भी सिकाई कर दी. गांड का हाल चूत के मुकाबले थोडा बुरा था. सूजन कम तो हुई थी लेकिन ख़तम नहीं हुई थी और उस पर दीदी की गांड थोड़ी छिलने के कारण काफी लाल भी हो गयी थी. सिकाई करके मैंने दीदी की गांड में क्रीम भी लगा दी. क्रीम लगते लगाते मेरी ऊँगली दीदी की गांड में घुस गयी तो दीदी चिहुक उठी. "अरे क्या कर रहा है. अभी मन नहीं भरा तेरा."

"अरे वो गलती से हो गया. दवा लगाते लगाते पर दीदी मन तो तुमसे जिंदगी भर नहीं भरेगा." मैंने दीदी को पैंटी पहनाते हुए कहा. तभी घर की घंटी बजी. मैंने घडी में देखा तो १.३० बजे थे. दीदी ने पुछा तो मैंने कहा "शायद खाना आ गया होगा. मैंने 2 बजे मंगाया था शायद जल्दी भेज दिया हो."

मैंने दरवाजा खोला तो सामने लाला खड़ा था. उसने पुछा "अब रश्मि कैसी है."

"ठीक है, क्यों क्या हुआ." मैंने पुछा. तभी लाला ने किसी को इशारा किया तो मैंने देखा की एक ७ फुट का हट्टा कट्टा अफ्रीकन लड़का मेरे घर की तरफ आ गया. लाला उसे लेकर जल्दी से हमारे घर के अन्दर घुस गया मैंने दरवाजा बंद करते हुए लाला की तरफ सवालिया नजरो से देखा.

"अरे येही है रुबेन, मेरा दोस्त. कल बात हुई थी न तुमसे." लाला ने कहा.

"बात? क्या बात हुई थी यार. मजाक कर रहे थे हम दोनों और तुमने इसको बुला भी लिया. तुमको पता है न रश्मि दीदी की क्या हालत है." मैंने गुस्सा होते हुए कहा.

अब रुबेन मेरी बात सुन कर बोला "क्या लाला तुमने मुझको मजाक में इतनी दूर बुला लिया."

"तुमको हिंदी आती है." मैंने रुबेन से पुछा.

"मैं १० सालों से इंडिया में हूँ. पढाई भी यही की है." रुबेन ने जवाब दिया.

"लाला को कुछ ग़लतफहमी हो गयी इसीलिए तुमको बुला लिया. सॉरी." मैंने रुबेन से कहा.

"सॉरी? लाला तुमको पता है न की मैं कितना इम्पोर्टेन्ट काम छोड़ कर आया हूँ वो भी सिर्फ इसलिए की तुमने कहा था की माल बहुत जबरदस्त है. अब ये सब क्या हो रहा है." रुबेन लाला से बोला.

"यार नाराज़ न हो. अभी तुम अपनी आँखों से देख लेना की माल कितना कड़क है. यार मनीष अब तुम ये सब क्या बोल रहे हो. कल तुम्ही ने कहा था की दीदी को एक फुटिया लंड से चुदते देखना है." लाला बोला.

"भाई वो तो ऐसे ही बात हो रही थी. मुझे क्या पता था की तुम सच में इसको बुला लोगे." मैंने कहा.

"मतलब तुम्हे नहीं देखना की रश्मि कैसे इसका मोटा लौड़ा अपनी सकरी चूत में लेती है." लाला ने पुछा.

"देखना तो है पर आज नहीं. अभी भी दीदी की गांड और चूत में सूजन है. दवा की वजह से दर्द ख़तम हो गया है पर अभी वो सेक्स नहीं कर पायेगी. तुम रुबेन को बाद में कभी बुला लेना" मैंने कहा.

"बाद में कब? यार आज मौका बहुत अच्छा है. देख तेरा घर भी खाली है. कल रश्मि के सारे छेद हमने बड़े कर ही दिए हैं. अब वो आराम से ले लेगी रुबेन का और कुछ दिक्कत हुई तो ओम से एक गोली और लेकर खिला देंगे." लाला ने मुझे समझाते हुए कहा.

"यार लड़कियां लडको से ज्यादा गरम होती है. तुमको लगता है की तुम्हारी बहन का मन भर गया है लेकिन देखना मेरा लंड देखते ही फ़ौरन तैयार हो जाएगी." रुबेन ने मुझे समझाया.

"यार मुझे नहीं पता. रश्मि अपने कमरे में है, तुम खुद बात करके देख लो." मैंने लाला से कहा. तभी फिर से डोर बेल बजी तो मैं दरवाजा खोलने गया और ये दोनों दीदी के कमरे में घुस गए.
 
खाने वाला खाना लेकर आ गया था. मैंने उससे खाना लेकर किचेन में रखा और उसको पैसे दे दिए तब तक लाला बाहर आ गया. मैंने पुछा "रुबेन कहा है."

"वो रश्मि के साथ है. उनको थोड़ी देर अकेला रहने देना. मैं अभी १ घंटे में आता हूँ." लाला ये कहकर बाहर निकलने लगा. मैंने उसको रोक के पुछा की "क्या हुआ? दीदी ने क्या कहा."

"अरे सब लड़कियां थोड़े नखरे करती ही है. रुबेन रश्मि को मना लेगा. अगर तुम्हे देखना हो तो छुप के देखना." लाला जाते जाते कह गया. मैंने मन ही मन लाला को हजार गालियाँ दी.

साला फालतू में उस हब्शी को बुला लिया है. एकदम सांड जैसा तो वो है. दीदी का कचूमर बना देगा और अगर मैंने कुछ बोला तो मेरा भी. मैं धीरे से दीदी के कमरे की तरफ बढ़ा. अन्दर दीदी और रुबेन चूमा चाटी कर रहे थे. रुबेन ने अपनी टीशर्ट उतार दी थी और सिर्फ जीन्स में था. उसने दीदी की ब्रा खोलने की कोशिश करने लगा तो दीदी ने मना कर दिया. रुबेन अपने बड़े बड़े होठो से दीदी के मम्मे ब्रा के ऊपर से ही चूसने लगा. दीदी का दूधिया बदन उसके काले बदन के आगोश में ऐसा लग रहा था जैसे कोयले की खान में हीरा. अचानक शायद उसने दीदी के निप्पल को काट लिया तो दीदी चीख पड़ी. "अआह लग रही है रुबेन, बस करो अब और नहीं. बाकी फिर कभी कर लेना."

"फिर कभी नहीं अभी." रुबेन ने कहा और दीदी के ब्रा पैंटी उतारने लगा. दीदी ने विरोध किया. वो बोली "क्या कर रहे हो लाला ने कहा तो मैंने तुम्हे सिर्फ किस करने के लिए अलोऊ किया था पर तुम तो हद पार कर रहे हो. हटो." दीदी ने उसे धकेलते हुए कहा.

रुबेन बेड से खड़ा हुआ और अपनी जीन्स और अंडरवियर उतार दी. उफ्फ्फ क्या लंड था उसका. लाला सही कह रहा था शर्तिया एक फुट से लम्बा ही होगा. चूत मारने के लिए नहीं चूत फाड़ने के लिए बना था यह.
 
दीदी ने जब रुबेन का लंड देखा तो उनकी भी चीख निकल गयी. दीदी उठ कर भागने लगी पर रुबेन ने दीदी को अपनी गोद में ऐसे उठा लिया जैसे वो कोई गुडिया हो. दीदी ने छुड़ाने की कोशिश की तो रुबेन ने दीदी को बेड पर पटक दिया.

दीदी फिर से भागी पर कहा जाती कमरे में ही इधर उधर भागती रही लेकिन रुबेन ने उन्हें फिर से पकड़ लिया दीदी का ब्रा फाड़ दिया. अब वो दीदी के बूब्स ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा और काटने लगा. दीदी बोली बस करो मुझे बहुत दर्द हो रहा है पर रुबेन ने एक न सुनी. अब दीदी सिर्फ़ पेंटी में थी और रुबेन पूरा नंगा था. रुबेन हा हलब्बी लंड दीदी की पैंटी पर ठोकर मार रहा था. अब उसने अपना लंड दीदी को लिटा कर उनके मुहं में दे दिया और दीदी की पैंटी भी फाड़ दी और उनकी चूत कुत्ते जैसे चाटने लगा. दीदी भी फिर से गरम हो रही थी. रुबेन की लम्बी जीभ का कमाल था की दीदी फट से झड गयी और रुबेन सारा पानी पी गया. अब उसने अपना लंड रश्मि दीदी की चूत के मुहं पर रखा. दीदी को पता था की अब क़यामत आने वाली है. रुबेन ने एक जोर का धक्का मारा ओर आठ इंच तक लंड एक ही झटके में अंदर घुसा दिया.

दीदी बहुत जोर से चिल्लाई और फिर उसने एक और जोरदार धक्का लगाया और बाकी का लंड दीदी की चूत के अंदर एक ही बार मे घुस गया और दीदी ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी और मुझे बुलाने लगी. अब मैं कमरे के अन्दर चला गया. रुबेन बेदर्दी से दीदी को चोदने में लगा था. दीदी मुझसे कह रही थी "बचा ले मनीष इस शैतान से. आःह्ह्ह मार डाला. वो कमीना लाला बोला आःह्ह्ह तुझे ब्रा पैंटी में देख कर गरम हो गया है. हूऊऊऊऊउ. एक किस दे दो.....ऊऊऊऊओ माआआआअ माआर गाऐईईईईई". मैं जानता था की मैं कुछ नहीं कर सकता था फिर भी मैंने रुबेन से कहा "आराम से करो भाई. दीदी को दर्द हो रहा है." लेकिन रुबेन ने मेरी एक न सुनी और उसी स्पीड से दीदी को चोदता गया. अब मैंने देखा की दीदी की चूत से खून निकलने लगा और वो दर्द से रोये जा रही थी. मुझे ये सब देखकर मज़ा आ रहा था. अब वो और ज़ोर ज़ोर से दीदी को चोदने लगा. कम से कम उसने दीदी को करीब बीस मिनट तक नॉनस्टॉप चोदा और दीदी की चूत को पूरा फाड़ दिया. उसने दीदी की चूत के अंदर ही अपना वीर्य डाल दिया और फिर शांत हो गया. अब दीदी ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को उससे छुड़ाया और मेरा सहारा लेकर बाथरूम मे गई और वहाँ पर जाकर पानी से अपनी चूत को साफ करने लगी और बद्बदाने लगी "फाड़ डाली कमीने ने. ये मजा नहीं सजा है. मर जाएगी वो औरत जिससे इसकी शादी होगी. अरे तू भी खड़ा खड़ा बस देख रहा था कुछ किया क्यों नही. हाय. डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा."

मैंने सफाई दी "मेरे कहने से वो क्या मान जाता. सब लाला का कमीनापन है. मैंने तो मना किया था की इसको बाद में कभी बुला लेना."

"बाद में? अरे साइज़ देखा है उसके लंड का. बाद में क्या कभी नहीं. चल थोड़ी मदद कर" दीदी बोली तो मैंने दीदी को चूत साफ करने में मदद की तो वो बोली "मुझे चूत मे बहुत ज़्यादा दर्द हो रहा है". हम बात कर ही रहे थे की रुबेन बाथरूम मे घुस गया और दीदी को गोद में उठा कर वापस कमरे में ले गया और अब दीदी की गांड चाटने लगा और कहने लगा कि तुम बस चुपचाप बेड पर पड़ी पड़ी चुदवाओ और मजे लो. अब वो दीदी की गांड के बीच मे अपनी जीभ डाल कर चाटने लगा. अब ये देख कर मुझे लगा की जब दीदी की चूत से खून निकल आया तो गांड का क्या हश्र होगा. मैंने रुबेन से कहा की "रुबेन दीदी की गांड पहले ही छिली हुई है तो अभी गांड मत मारो." रुबेन ने मेरी बात मानी लेकिन उसका लंड फिर से पूरा खड़ा हो गया था तो उसने दीदी की चूत मे अपना लंड डाल दिया और जोर जोर के धक्के देकर कम से कम आधा घंटा और चोदा और फिर अपना सारा वीर्य लंड चूत से बाहर निकाल कर दीदी के मुहं में डाल दिया.

दीदी की हालत पस्त हो गयी थी. रुबेन उठा और बाथरूम में चला गया. मैं दीदी का मुह पोछने लगा जो रुबेन के वीर्य से लतपथ था. तभी रुबेन वापस आया और बोला "लाला कह रहा था की तुम्हारे मम्मी पापा एक दो दिन नहीं आएंगे तो मैं आज तुम्हारे घर में रुक जाता हूँ. कल रश्मि की गांड मार कर चला जाऊँगा." और ये कह कर वो दीदी के बगल में लेट गया और दीदी को अपनी तरफ खीच कर दीदी की चुंचिया चूसने लगा.

 
"क्या मतलब है की कल गांड मारकर चला जाऊँगा?" दीदी गुस्से से चीखी और रुबेन को हटाते हुए मुझसे बोली "जा जरा उस कमीने लाला को बुला कर ला."

तब तक घर की घंटी फिर से बज उठी. मैंने देखा तो लाला ही था. वो मुझसे पूछने लगा "क्यों मजा आया न रश्मि को. वैसे रुबेन का लंड देखकर बड़ी बड़ी रंडिया डर जाती है फिर तुम्हारी बहन क्या चीज़ है पर जब एक बार चोद देता है तो बस बार बार चुद्वाती है..."

मैंने कहा "चलो अन्दर. दीदी तुम्हारा ही वेट कर रही है." और मैं उसे लेकर अन्दर आ गया. दीदी उसपर बहुत नाराज़ हुई. कहने लगी "मैं क्या रस्ते की कुतिया हूँ क्या जो तुम किसी को भी लाकर मेरे ऊपर चढ़ा दे रहे हो. समझा लो अपने दोस्त को की इसी वक़्त यहाँ से चला जाए वरना आगे से कभी तुम लोगो को घर में नहीं घुसने दूँगी. चलो निकलो यहाँ से."

दीदी का रौद्र रूप देखकर मैं समझ गया की अब वो किसी भी हाल में रुबेन को बर्दाश्त नहीं करेंगी. मैं लाला और रुबेन को बाहर ले आया और समझाया "देखो लाला भाई आज दीदी का मूड बहुत ख़राब है. तुम रुबेन से कहो की आज चला जाए."

रुबेन बोला "आज मूड ख़राब है तभी तो कह रहा हूँ न की कल गांड मारूंगा." मैंने रुबेन की फिर समझाया की वो जिद न करें. लाला ने पुछा "आखिर हुआ क्या?" तब मैंने बताया की कैसे रुबेन की चुदाई से दीदी की चूत से ख़ून निकल आया था. रुबेन बोला "तो क्या हुआ. वो तो बहुत लड़कियों के निकल आता है. लाला याद है न की रुची के भी निकला था."

लाला ने कहा "हाँ ओम ने बताया तो था पर यार तुमको थोडा ध्यान रखना चाहिए था. अब देखो लौंडिया बिदक गई न. एक काम करो तुम फार्म हाउस पर चले जाओ. वहाँ रुची रात तक रहेगी. अभी वही जाकर अपनी हसरतें निकालो. रही बात रश्मि की गांड की तो वो तुम्हे जल्दी ही दिलवा दी जाएगी."

रुबेन बड़ी मुश्किल से माना और लाला के साथ गया. मैंने दरवाजा बंद किया और वापस दीदी के पास आ गया. दीदी ने पुछा "क्या हुआ? चला गया." मैंने कहा "हां. फार्म हाउस गया है. पता नहीं आज रुची का क्या हाल होगा."

दीदी बोली "वैसे आज ये ख्याल आया की अगर मैंने पहले ही तेरी बात मान ली होती तो इन लोगो के चक्कर में नहीं फसती. सालों ने बुरी हालत कर दी मेरी." दीदी की ये बात सुनकर मुझे काफी ख़ुशी हुई क्योंकि ये साफ़ था की आज के बाद दीदी की चुदाई का रास्ता मेरे लिए बिलकुल साफ़ हो गया है. उधर फार्म हाउस पर रुची ओम और मयंक से बेतरह चुद रही थी और मयंक और ओम उसको चोद चोद कर काफी थक गए थे... आज काफी दिनों बाद उसे थ्रीसम का मौका मिला था पर उसे मालूम नहीं था की थोड़ी ही देर में उस पर क्या क़यामत आने वाली है. और थोड़ी ही देर में रुबेन ने सलमान के साथ बेडरूम में एंट्री मारी और देखा की मयंक घोड़ी बनाकर रुची चूत मार रहा है. सलमान और रुबेन ने अपने कपडे भी उतार दिए और लाइन में शामिल हो गए.

जैसे ही मयंक झडा वैसे ही रुबेन ने अपना हलब्बी लंड रुची की चूत में घुसेड दिया. हालाँकि रुची की चूत मयंक के माल से एक दम चिकनी थी फिर भी दर्द से उसकी जान निकल गयी. उसने घबरा कर आँखे खोली तो देखा की रुबेन ने उसकी चूत में अपना लंड पैवस्त किया हुआ था और सलमान अपना मोटा लंड हाथ में लेकर हिला रहा था. ओम और मयंक थक कर किनारे बैठ कर रुची की ताबड़तोड़ चुदाई को देखने को बेचैन हो रहे थे.

 
रुची जोर से चिल्लाई "आहा मर गई… ह्ह्ह्ह्ह् क्या मोटा लंड है तेरा कुत्ते! अरे सलमान तू भी तो अपना लंड पकड़वा, सबका चख लिया तेरा कैसा है तू भी चखा ना!"

सलमान ने अपना लंड रुची के मुह में ठूंस दिया तो रुची उसका लंड चूसने लगी तभी मयंक बोला "इसको ऐसे मजा नहीं आएगा. हमे सब लंड एक साथ डालने चाहिए अलग अलग नहीं" रुची ने जब अपने भाई की ये बात सुनी तो पूरे जोश से बोली "जिस लड़की के तेरे जैसे भाई हो उसे दुश्मनों की क्या जरूरत. सुन ले कुतिया बन रही हूँ, जिसको जहाँ जो छेद मिले वहीं अपना लंड घुसा दो जल्दी"

रुची कुतिया की तरह पोज़ लेकर उन चारों के बीच में आ गई। ओम उसके नीचे आ गया और रुची को अपने ऊपर ले लिया और उसकी चूत में अपना लंड घुसा दिया। रुबेन पहले ही उसकी गांड के पीछे था और अब जब ओम उसकी चूत चूसने लगा तो उसने अपना लंड रुची की गांड में धीरे से रख कर अन्दर फंसा दिया. सलमान ने भी अपना लंड उसके मुँह में डाल दिया।

अब मयंक बचा था, मयंक का लंड रुची ने अपने हाथ में ले लिया और कहा- कोई बात नहीं भैया आज तुम्हारी मुठ मैं ही मारूंगी, इन तीनों में से जो भी पहले झड़ेगा उसके बाद तूम आ जाना!

चारों जब एक साथ शुरू हो गए तो रुची के होश ही उड़ गए. रुबेन ने धीरे धीरे अपना हलब्बी लंड रुची की गांड में धीरे धीरे घुसा दिया. रुची भूल ही गयी की किस छेद में किसका लंड है. वो जोर जोर से चिल्लाने लगी "अआः अह्ह्ह्छा मर गई सालो! कमीनो! मार डाला आज तुमने रुची को उईईइ उईईई अहा आ या क्या बात है चार चार लण्डों के बीच में अकेली चूत अह्ह्ह! फाड़ दे ओम आज चूत को जी भर के फाड़ सलमान गांड को आज बिल्कुल मत छोड़ना गांड का कुआं बना दे आज! आ जाओ! आ जाओ! रुबेन मयंक! तुम्हारी लंड की खुजली को ख़तम करूँ बारी बारी से चूस कर!"

बड़ी देर तक चारों बदल बदल कर रुची की चूत गांड को फाड़े जा रहे थे। चारों जब झड़ गए तब भी थोड़ी देर रुकने के बाद एक एक पैग लगा कर फिर से मैदान में आ जाते और क्यों न आते आज उन्हें रुची की चुदाई का सुख जो मिल रहा था फिर न जाने कब तक वो चुदाई करते रहे पर रुची का जी नहीं भरा पर टाइम की पाबन्दी थी तो उसने अगली बार के लिए सबसे वादा लिया कि वो अगली बार फिर से एक साथ उसे चोदेंगे।

 
उधर रुची तो चार लंडो को आराम से झेल रही थी और आगे के लिए वादे भी कर रहे थे पर इधर रश्मि दीदी रुबेन वाले मामले से थोडा घबरा गयी. लाला का सोचना गलत था की रुबेन का लंड लेकर दीदी रोज उसी का लंड मांगेंगी उल्टा वो तो उन दोनों के जाने के बाद मुझसे बोली "हद है यार. इन लोगो ने तो मुझको बिल्कुल रंडी बना दिया है. कहीं से भी किसी को भी लेकर आ जाते है मुझ पर चढ़वाने."

मैंने उनको समझाने की कोशिश की "दीदी उसको लगा की शायद तुमको मजा आयेगा. तुम थोडा ओवर रियेक्ट कर रही हो."

"उसने सोचा अरे मुझसे भी कोई कुछ पूछेगा या नहीं. कल को वो कहेगा की कुत्ते से चुदवा लो, घोड़े से चुदवा लो मजा आयेगा तो मैं क्या करूंगी. और तू कहता है ओवर रियेक्ट. लंड देखा था उस हब्शी का. अगर तेरे डालता न तो पता चलता. मैंने तय कर लिया है की आगे से मैं इन लोगो से कोई मतलब नहीं रखूंगी समझा." दीदी ने कहा.

"देखो दीदी मैंने पहले ही तुमसे कहा था की इन लोगो के चक्कर में मत पड़ो पर तब तुम नहीं मानी. अब ये लोग तुमको आसानी ने नहीं छोड़ेंगे." मैंने साफ़ साफ़ दीदी से कह दिया.

"वो मैं नहीं जानती अब आखिर तू भी तो भाई वाला कोई काम कर और मुझे इस मुसीबत से छुट्टी दिला." दीदी ने कहा और करवट बदल कर लेट गयी.

मैंने सोचा की अभी दीदी गुस्से में ऐसा बोल रही है बाद में जब गुस्सा उतरेगा तब वो अपना मूड बदल देगी. मैंने सोचा की जब उनका दिमाग ठंडा हो जायेगा तब उनसे बात करूंगा.

उधर फार्म हाउस समय का बहुत ध्यान रखने के बाद भी जब मयंक रुची को लेकर घर वापस आया तो लगभग १० बज गए थे. आंटी मयंक और रुची पर बहुत नाराज हुई. खैर दोनों ने आंटी से माफ़ी मांगी और अपने अपने कमरों में चले गए लेकिन रुची की बदली हुई चाल देख कर आंटी को थोडा शक हुआ. दरअसल जैसी चुदाई रुची की आज हुई थी वैसी कभी नहीं हुई थी. और वापसी के समय रुबेन ने कार में ही रुची की गांड एक बार फिर मार दी थी तो दर्द के कारण वो थोडा आराम से चल रही थी पर आंटी की पारखी नज़रों ने ताड़ लिया की कुछ तो गड़बड़ है. इसका नतीजा ये हुआ की मयंक जब छुट्टियों के बाद वापस जाने लगा तो आंटी ने उससे साफ़ कह दिया की बार बार आने की अब जरूरत नहीं है. थोडा पढाई पर ध्यान दो. बीच बीच में हम लोग तुमसे मिलने आते रहेंगे. साथ ही उन्होंने रुची के ऊपर कड़ी नज़र रखना शुरू कर दिया. कॉलेज के अलावा कही भी आने जाने में रुची को काफी दिक्कत होने लगी और अगर कभी मौका लगता भी था तो आंटी साथ में हो लेती थी. तो मेरा इसमें डबल नुकसान हो गया क्योंकि रुची तो हाथ से गयी ही और आंटी भी गयी क्योंकि अब वो ज्यादातर रुची के साथ ही रहती थी और कभी कभी रुची के कॉलेज में होने पर जो समय उन्हें मिलता वो लाला और ओम बाँट लेते थे.

 
इधर ओम और लाला को एक दो दिन तक तो मैं दीदी की तबियत ख़राब है बोलकर टालता रहा और फिर जब मम्मी पापा वापस आ गए तो उनका बेरोक टोक दीदी की चुदाई करने आना थोडा कम हो गया. दीदी ने सुबह की एक कोचिंग भी ज्वाइन कर ली थी तो वो मम्मी पापा के साथ ही निकल जाती और शाम को उनके वापस आने के बाद ही आती. लाला और ओम करीब ६ महीने तक दीदी को चोद नहीं पाए थे और न ही रुची को, केवल आंटी और नीलम भौजी से ही उनका काम चल रहा था. दीदी की जिस्मानी जरूरत तो अब रात को मम्मी पापा के सोने के बाद मैं पूरी कर देता था पर उधर रुची बिना चुदाई के जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी.

समय ऐसे ही निकला जा रहा था. मैंने अब ओम की दुकान से सामान लेना भी बंद कर दिया था ताकि मेरा और उन लोगो का सामना न हो. इस बीच मयंक भी कभी घर नहीं आया पर एक दिन ओम ने मुझे कॉलेज से लौटते हुए पकड़ ही लिया. ओम बोला "कहा हो मनीष भाई. आज कल दीखते ही नहीं हो."

"वो क्या है न ओम भाई की आज कल पढाई का लोड बहुत है इसीलिए." मैंने जवाब दिया.

"सीधे सीधे बोलो न यार की अब जब हमने तुम्हारा काम करवा दिया तो हमसे बात क्यों करोगे." ओम ने कहा.

"क्या काम करवा दिया और हमारी दोस्ती क्या केवल काम की है. क्या बात करते हो लाला भाई." मैंने बात बनाते हुए कहा.

"भाई तुम्हारी बहन को तुमसे चुदवा दिया ये क्या कुछ नहीं है वरना वो कहती थी की पूरी दुनिया को बांट दूँगी लेकिन मनीष को नहीं दूँगी. अब रोज रात में दीदी को बीवी बनाकर चोदते हो तो मेरी याद नहीं आती." ओम ने कहा.

"ऐसा कुछ नहीं है भाई टाइम ही नहीं मिलता अब मैं क्या करूं." मैंने थोडा नरम होते हुए कहा.

"समझ गए की तुम्हे टाइम नहीं मिलता अब तुम बस हमारा एक काम करो की रश्मि से कह देना की कल कॉलेज न जाये और १२ बजे हमको हमारे घर पर मिले." ओम ने मुझसे कहा.

"क्यों?" मेरे मुहं से निकल गया.

"राखी बंधवाने के लिए." ओम जोर जोर से हँसने लगा फिर बोला "यार देखो वो रुबेन और सलमान रुची की डिमांड कर रहे है अब तुम तो जानते हो न की उसको ले जाना अब मुमकिन नहीं है तो कल हम रश्मि को लेकर फार्म हाउस जायेंगे. उसको बोल देना."

मैंने साफ़ साफ़ ओम से कहा "ये बहुत मुश्किल है और ये लाला की गलती है. पिछली बार वो रुबेन को बिना पूछे दीदी के पास ले आया था तभी से वो तुम दोनों से नाराज है और इसीलिए उसके बाद तुम लोगो से नहीं मिली और तुम लोग चाहते हो की वो वापस से रुबेन के पास जाये."

"देखो भाई. कल तो रश्मि को आना ही पड़ेगा वरना मोहल्ले में जो उसने अपनी सती सावित्री की इमेज बनाई है न हम दो दिन में बदल देंगे और शुरुवात तुम्हारे मम्मी पापा को बताने से करेंगे समझे" ओम मुझे धमकी देकर चला गया.

 
मैं काफी परेशान घर वापस आया. सोचा की दीदी को क्या कहूँगा. शाम को दीदी मम्मी पापा के साथ ही वापस आई तब तो उनसे बात नहीं हो पाई तो मैंने सोचा की रात को सबके सोने के बाद जब मैं दीदी के कमरे में जाता हूँ तब ही उनसे बात करनी होगी. सोचा की कह दूंगा की कल एक बार चली जाओ तब तक मैं कुछ रास्ता निकाल लूँगा. मैं ऐसी ही बाते सोच रहा था की तभी मम्मी ने खाने के लिए आवाज दी. जैसे ही हम लोग टेबल पर बैठे वैसे ही बेल बजी.

"अब इस समय कौन आ गया." पापा बोले और दरवाजा खोलने चल दिए. उन्होंने दरवाजा खोला तो देखा की सामने मयंक के पापा और ओम खड़े है. "अरे भाई साब आप. इस वक़्त. आइये अन्दर आइये." पापा ने कहा.

"नहीं नहीं अन्दर नहीं आऊंगा. माफ़ी चाहता हूँ की आपको इस वक़्त परेशान कर रहा हूँ पर बात क्या है की रुची कॉलेज से अभी तक घर नहीं लौटी. हम दोनों लोग शाम से ही उसके दोस्तों के यहाँ चक्कर लगा रहे है पर कुछ पता नहीं चला. जवान लड़की है रात हो गयी है तो काफी परेशान हूँ. वर्मा जी बता रहे थे की आपकी यहाँ थाने में कुछ पहचान है. अगर आप मेरे साथ चले चलते तो." अंकल ने काफी परेशानी में कहा.

उनकी बात सुन कर मैं और दीदी भी परेशान हो गये.

"यहाँ का थानेदार विजय मेरे बचपन के दोस्त का साला है. आप परेशान न हों अन्दर आइये. सुन मनीष मेरा स्कूटर लेकर जा और भाग के अपने विजय अंकल को बुला ला." पापा ने कहा. थाना हमारे घर से करीब १ किलोमीटर दूर था और विजय अंकल का घर भी थाने के पीछे ही था. मैं फ़ौरन ही पापा के स्कूटर से निकला पर तभी मैंने देखा की आंटी घर के बाहर परेशान से खड़ी है. मैं दो मिनट के लिए उनके पास रुक गया और बोला "आप आराम से अन्दर जाकर बैठिये. मैं इंस्पेक्टर अंकल को लेने थाने जा रहा हूँ. रुची जल्दी ही आ जाएगी."

"जाओ मनीष. इंस्पेक्टर साब को ले आओ. मैं यही खड़ी हूँ. वो ओम की दुकान भी तो देखनी है. वो बेचारा भी तो दुकान ऐसे ही छोड़ कर इनके साथ शाम से भाग रहा है." आंटी ने कहा.

"क्यों? लाला दुकान पर नहीं है." मैंने पुछा तो आंटी बोली "ओम कह रहा था की वो दोपहर में खाना खाने गया था तो कह रहा था की कुछ बुखार जैसा लग रहा है तभी वापस नहीं आया."

"अरे अब इस वक़्त तो बुला लेना चाहिए था वरना दुकान बंद कर देता." मैं बोला.

"वो इतनी हड़बड़ी में इनके साथ गया की दुकान बंद ही नहीं की. अब तुम देर न करो जल्दी थाने जाओ" आंटी बोली तो मैं थाने की तरफ चल दिया पर मेरे जेहन में ये बात बार बार घूमने लगी की कहीं साले लाला ने तो रुची के साथ कुछ उल्टा सीधा नहीं कर दिया. खैर मैं पहले थाने गया तो विजय अंकल वही मिल गए. उनको मैंने पूरी बात बताई तो वो मेरे साथ ही स्कूटर पर मेरे घर आ गए और सिपाहियों को जीप लेकर आने के लिए बोला. रास्ते में उन्होंने मुझसे रुची के बारे में पूछा तो मैंने उनसे बोल दिया "रश्मि दीदी की ही उससे ज्यादा बात चीत थी पर अभी कुछ महीनो से दीदी काफी बिजी थी तो वो भी रुची से काफी दिनों से नहीं मिली थी पर एक बात मुझे थोड़ी अजीब लग रही है पर फिर लगता है की लोग सुनेगे तो मुझे जासूस जासूस बोल कर मेरा मजाक न बनाये..."

 
"यहाँ तो कोई तुम्हारी बात नहीं सुन रहा जो मजाक बनाये. बोलो बेटा क्या बात है" विजय अंकल ने पुछा.

"दरअसल जब मैं आपको बुलाने आ रहा था तो मुझे पता चला की रुची के घर में जो दुकान है उसका नौकर भी दोपहर से गायब है." मैंने बोला.

"हम्म्म." अंकल ने सिर्फ इतना ही बोला. हम लोग ५ मिनट में ही घर पहुच गए. विजय अंकल से ध्यान से मयंक के पापा की पूरी बात सुनी फिर पुछा की घर में कौन कौन है. अंकल ने बताया की मैं मेरी बीवी और बेटी. बेटा अपने मामा के यहाँ रहकर पढता है.

"आप कौन साहब है?" विजय अंकल ने ओम की तरफ इशारा किया.

"जी ये मेरे किरायेदार है ओम. मेरे घर पर इन्होने दुकान किराये पर ले रखी है." अंकल ने बताया.

"आप अकेले ही दुकान सँभालते है?" विजय अंकल ने ओम से पुछा. ओम जो सबकी नज़र बचा कर रश्मि दीदी को ताड़ने में व्यस्त था अचानक इस प्रश्न से हडबडा गया.

"जी एक राजेंद्र नाम का लड़का रखा है ऊपर के काम देखने के लिए." ओम ने सभालते हुए जवाब दिया.

"जाओ उसको दुकान से बुला लाओ, हो सकता है उसको कुछ पता हो." विजय अंकल ने कहा.

"जी अभी तो वो नहीं है. दोपहर को उसकी तबियत कुछ ठीक नहीं थी तो आधे दिन की छुट्टी कर ली थी उसने." ओम ने कहा.

"कहाँ रहता है वो लड़का?" विजय अंकल ने पुछा.

"जी मेरे साथ ही रहता है. मेरे गाँव का ही लड़का है तो अपने घर में ही रख लिया था उसको.शरीफ लड़का है साब." ओम बोला.

"तो मैंने कब कहा बदमाश है. मनीष बेटा जरा देखो तो बाहर सिपाही आ गए की नहीं. आगे आ गए हो तो अन्दर बुला लो." विजय अंकल बोले.

बाहर मेरे घर के सामने ही जीप खड़ी थी. मैंने वहां जाकर बोला की आप लोगो को अंकल अन्दर बुला रहे है. एक सिपाही मेरे साथ अन्दर आया. विजय अंकल उससे बोले "देखो प्रकाश, ये ओम बाबु है इनके साथ इनके घर जाओ और इनके घर पर राजेंद्र नाम का लड़का होगा. उसको और इनको वापस लेकर आओ. जल्दी करो."

सिपाही ओम के साथ घर से बाहर चले गए. मयंक के पापा विजय अंकल से पूछने लगे की उन्होंने लाला को क्यों बुलाया है. क्या उनको लाला पर कुछ शक है. उनको बात करता छोड़ कर मैं छत पर चला आया और दीदी को भी ऊपर चलने का इशारा किया. दीदी भी धीरे से छत पर आ गयी.

"क्या हुआ ? सब नीचे है और तूने मुझे यहाँ बुला लिया." दीदी ने पुछा.

"बस ये बताने के लिए बुलाया है की बच गयी तुम." मैंने दीदी को गले लगाते हुए कहा.

"मतलब?" दीदी ने पुछा.

"अरे इस कमीने ओम ने मुझे धमकी दी थी की अगर कल तुम इसके साथ फार्म हाउस पर न गयी और उस हब्शी और सलमान ने न चुदवाया तो ये मोहल्ले में तुम्हे बदनाम कर देगा इसीलिए मैंने विजय अंकल के कान में ये बात डाल दी की लाला भी दोपहर से गायब है ताकि ये लोग रात भर थाने पुलिस में फंसे रहे और इनका कल का प्लान चौपट हो जाये." मैंने दीदी को चूमते हुए कहा.

 
"इसके धमकी देने से क्या होता है. मैं जाती ही नहीं पर तूने अच्छा किया. वैसे मुझे रुची की चिंता भी हो रही है." दीदी बोली.

"मुझे भी हो रही है. कहीं रुची ने अपनी हवस आग में कोई बेवकूफी न कर ली हो. चलो नीचे चलते है देखो क्या पता चलता है." मैंने दीदी से कहा और हम नीचे आ गए. अब आंटी भी हमारे घर आ गयी थी और सारे लोग अंकल आंटी को सांत्वना दे रहे थे ही सब ठीक हो जायेगा. विजय अंकल ने थाने में बोलकर खबर कई जगह भिजवा दी थी. करीब १ घंटे बाद सिपाही लोग ओम को लेकर लौट आये.

"कहा है वो लड़का राजेंद्र?" विजय अंकल ने सिपाहियों से पुछा.

"जी जनाब, इसके घर पर तो कोई नहीं मिला. ताला बंद था. जब हम लोग ताला खोल कर अन्दर गए तो इसकी अलमारी का लाकर टूटा हुआ था. अब ये कह रहा है की उसमे ५० हजार रुपये थे जो वो लौंडा लेकर भाग गया." प्रकाश ने जवाब दिया.

"क्यों भाई अभी तो तू उस लौंडे की शराफत की कसमे खा रहा था और अब उसे चोर बता रहा है. क्यों बे. चलो प्रकाश इसको थाने ले चलो. आज इसकी वही खातिर की जाएगी तो ये बताएगा की वो रुची को लेकर कहाँ गया है." विजय अंकल गुस्साते हुए बोले.

ओम तो वैसे ही परेशान था. वो तो विजय अंकल की बात सुन कर रोने ही लगा. बोला "साब मुझे कुछ नहीं पता. वो तो मेरे गाँव का ही लड़का था तो घर पर रख लिया था. सोचिये वो मेरा पैसा लेकर भागा है मुझे क्यों कुछ बताएगा. साहब मैं तो यहीं दुकान चलाता हूँ. मोहल्ले में किसी को ऐसा काम नहीं करने दूंगा. इसमें मेरा क्या फायदा है बोलिए"

"क्यों बे हमे क्या पता की सेफ में कुछ माल था भी या नहीं. और वैसे भी वो लौंडा तेरे गाँव का था हो सकता है की तूने उसको यहाँ इसीलिए बुलाया हो ताकि वो रुची को लेकर भागे और आगे जाकर उसे बेच दे. मैंने ऐसे कई केस देखे है. खूबसूरत कम उम्र की लड़कियों का लाखों रुपये मिल जाता है बड़े शहरो में." विजय अंकल ने ओम को धमकाते हुए बोला पर उनकी बात सुन कर अंकल आंटी रोने लगे.

विजय अंकल ने उनसे कहा की "अब तो आप बिलकुल मत घबराइए. अब तो पता चल ही गया है की इस सबके पीछे कौन है. बस आपकी लड़की कुछ ही दिनों में घर आ जाएगी. सिपाहियों गिरफ्तार कर लो इस ओम को." विजय अंकल के इशारा करते ही सिपाहियों ने ओम को पकड़ लिया और विजय अंकल उन सबके साथ थाने चले गए. पापा ने अंकल आंटी को समझा कर उनके घर भेज दिया और वो दोनों भी सोने चले गए.

इधर मैं भी दीदी के कमरे में घुस गया. दीदी मुझसे बोली "आज रहने दे. मूड नहीं है."

"मूड तो मेरा भी नही है पर क्या करूं नींद भी तो नहीं आ रही. यही सोच रहा हूँ की रुची जैसी तेज़ लड़की लाला के झांसे में आ कैसे गयी." मैंने दीदी से कहा.

"वैसे उस लाला ने मुझसे भी एक बार कहा था की मेरे साथ बॉम्बे चलो वहा तुमको हेरोइन बनवा दूंगा. मेरी जान पहचान है. पर मैंने सोचा की अगर इसकी सच में जान पहचान होती तो ये यहाँ डाल चावल आटा बेचता तो मैंने मना कर दिया साले ने रुची को भी ऐसे ही कोई गोली दी होगी." दीदी बोली.

काफी देर हम दोनों रुची के बारे में बातें करते रहे और फिर मैं अपने कमरे में आकर सो गया. ओम ३ दिन तक हवालात में ही रहा. उसको तब छोड़ा गया जब मयंक के घर पर रुची का लैटर आ गया की वो अपनी मर्जी से लाला के साथ जा रही है और दोनों शादी करने वाले हैं.ओम छूट तो गया लेकिन अंकल आंटी ने उससे दुकान खाली करवा ली और अपनी बदनामी से बचने के लिए अंकल ने अपना ट्रान्सफर वही करवा लिया जहाँ मयंक पढता था. जाने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने अपना मकान भी बेच दिया और हमारे नए पडोसी हमारे घर के बगल में आकर रहने लगे. कुल मिला कर दो लोग थे. करीब ३६-३७ साल का हस्बैंड और २८-२९ साल की बीवी. हस्बैंड का नाम राजेश छाबड़ा था और वो छोटा मोटा बिज़नस करता था. बीवी दिव्या पास के ही एक स्कूल में टीचर थी.

 
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