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नए पड़ोसी complete

कभी कभी मैं और दीदी सोचते की रुची का क्या हुआ होगा क्योंकि ये तो हम जानते थे की लाला जैसा हरामी आदमी रुची से कभी शादी नहीं करने वाला था वो भी ये जानते हुए की वो कितने लंड ले चुकी है पर उसके बाद उनके घर वालों से न कभी हमारी मुलाकात नहीं हुई और न ही कोई खबर मिली. मयंक ने भी फिर कभी हमसे मिलने की कोशिश नहीं की पर ओम ने जरूर एक बार दीदी से मिलने की कोशिश की पर रश्मि दीदी ने उससे कह दिया की अब वो उससे नहीं मिलना चाहती और अगर उसने दीदी को दुबारा परेशान किया तो वो विजय अंकल से कह देंगी. कुछ दिन तक तो मैं और दीदी परेशान रहे की कहीं ओम वापस हमें परेशान न करे पर फिर ओम भी कभी हमारे पास नहीं आया. अब चूँकि बगल में दुकान बंद हो गयी थी तो हमारा उधर आना जाना भी बंद हो गया और नए पड़ोसियों से हमारी कोई ख़ास जान पहचान नहीं हुई केवल पापा की राजेश से हलकी फुलकी बातचीत हो जाती थी और वो भी राह चलते. घर आना जाना हमारा नहीं था.

ऐसे ही समय निकलता गया और मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो गया और पापा चाह रहे थे की मैं दिल्ली में mba में एडमिशन ले लूं पर दीदी का पोस्ट ग्रेजुएशन यहीं चल रहा था तो मेरा उन्हें छोड़ कर जाने का मन नहीं था. वैसे भी अभी मेरा और दीदी का हनीमून पीरियड ही चल रहा था. मेरी जिद के आगे आखिर पापा ने कह दिया की ठीक है तुम अच्छे से तैयारी करो ताकि तुम्हे लखनऊ में किसी अच्छे mba कॉलेज में दाखिला मिल जाए. पर तभी हमारे साथ एक बहुत बुरा हादसा हुआ. दरअसल पापा ने नयी कार खरीदी थी और वो और मम्मी मामा के घर जा रहे थे और हाईवे पर उनकी कार एक ट्रक से टकरा गयी. एक्सीडेंट इतना भयानक था की कार के परखच्चे उड़ गए. मम्मी और पापा की मौके पर ही मौत हो गयी. हमको रात में पुलिस वालों ने खबर दी. मेरे और दीदी के ऊपर तो पहाड़ ही टूट पड़ा. खैर जैसे तैसे हमने अपने आपको संभाला और अपने रिश्तेदारों की मदद से अंतिम संस्कार वगेरह किया गया.

करीब ३-४ दिन बाद मेरे मामा ने मुझसे कहा "देखो मनीष, अब घर की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है. तुम अब mba का चक्कर छोडो और नौकरी के बारे में सोचो. जीजा जी ये घर तो तुम लोगों के लिए छोड़ गए है पर अभी १-२ साल में रश्मि की शादी भी तो करनी है."

"जी मामा जी मैं भी अब यही सोच रहा था." मैंने मामा से कहा.

मेरी बात सुन कर मामा जी ने कुछ फॉर्म निकाले और बोले इनको भर कर मुझे दे देना. मैंने फॉर्म देखे तो वो मेरे पापा की जगह मुझे नौकरी देने के एप्लीकेशन फॉर्म थे. दरअसल मामा और पापा एक ही बैंक में काम करते थे तो मामा जानते थे की मुझे पापा की जगह नौकरी मिल सकती है. मैंने फॉर्म भर दिए और मामा को दे दिए. मामा ने बैंक की यूनियन से जोर लगवा कर मेरा केस जल्दी ही फाइनल करवा दिया और 4 महीने बाद मेरा अपॉइंटमेंट मेरे घर के पास की ही बैंक ब्रांच में हो गया.

समय निकलने से और मेरी नौकरी लगने के बाद पुराने जख्म भर गए और मेरे और दीदी के बीच फिर से सब कुछ पुराने ढंग से चलने लगा. सुबह मैं बैंक निकल जाता और दीदी कॉलेज. शाम को दोनों साथ साथ वापस आते, साथ साथ खाते और साथ साथ सोते. दीदी अब मेरी दीदी कम बीवी ज्यादा हो गयी थी. सैलरी मिलती तो मैं दीदी के लिए सेक्सी कपडे वगेरह के गिफ्ट खरीदता. कुल मिला कर मेरा और दीदी का मामला सेट हो गया था और हम लोग रोज चुदाई करते थे सिर्फ महीने के पांच दिन छोड़ के या फिर जब मामा हम लोगो से मिलने आ जाते तब. मम्मी पापा के बाद वो हर २-३ महीने में चक्कर मार ही लेते थे पर अचानक उनका ट्रान्सफर २ साल के लिए दिल्ली हो गया तो अब हम लोगो को कोई भी रोकने टोकने वाला नहीं था. मेरी जिंदगी बिलकुल किसी शादी शुदा आदमी जैसी बीतने लगी.

 
एक दिन मेरी ब्रांच में मेरे पडोसी राजेश अपनी बीवी के साथ आये. वो मुझे पहचानते तो थे ही तो मुझे देखते ही मेरे पास आ गए और बोले "मनीष जी क्या इसी बैंक में काम करते है."

मैंने कहा "जी हाँ, बताइए क्या बात है."

"दरसल अपना एक करंट अकाउंट और इनका सेविंग अकाउंट खुलवाना है" राजेश ने कहा.

"आप लोग फॉर्म भर दीजिये. एड्रेस प्रूफ, फोटो वगेरह दे दीजिये. मैं खुलवा देता हूँ." मैंने कहा.

"अभी तो हम पेपर्स लाये नहीं है. सिर्फ पूछने आये थे की बिना गारेंटी के अकाउंट खुल जायेगा क्या?" पहली बार दिव्या ने कुछ कहा तो मैंने पाया की उसकी आवाज बहुत मीठी थी. मैंने पहली बार उसकी तरफ गौर से देखा तो पाया की वो काफी सुन्दर है. शायद रंग गेहुआ होने के कारण मैंने कभी उन पर ध्यान नहीं दिया और वैसे भी वो सुबह जल्दी स्कूल चली जाती होगी और जब दोपहर को लौटती होगी तो मैं बैंक में रहता होऊंगा और उसके अलावा को ज्यादा घर से बाहर नहीं आती जाती तो कभी सामना ही नहीं होता जो इतना ध्यान देता. वैसे भी रश्मि दीदी को चोदने के बाद मैंने दूसरी लड़कियों पर ध्यान देना थोडा कम कर दिया था पर बड़ी उम्र की औरतें तो मेरी कमजोरी थी ही. अभी भी कभी कभी मौका मिलने पर नीलम आंटी को चोद ही लेता था. वैसे दिव्या उतनी बड़ी भी नहीं थी. मुझसे करीब १० साल बड़ी होगी. अचानक मुझे महसूस हुआ की मैं ये सब सोचता हुआ दिव्या को कुछ ज्यादा ही घूरे जा रहा था तो मैंने झेप मिटाने के लिए कहा "अरे आप लोगो की गारेंटी के लिए मैं हूँ न. आप लोग कल आ जाइये. मैं सब करवा दूंगा."

"कल मैं तो आ जाऊँगा पर इनका मुश्किल है. आज तो इनके स्कूल की छुट्टी है तो ये आ गयी. अब तो अगली बार जब इनकी छुट्टी होगी तब मैं इन्हें लेकर आ जाऊँगा." राजेश बोला.

मैंने कहा "चलिए उसकी भी कोई जरूरत नहीं. मैं शाम को आपके घर आ जाऊँगा. सब फॉर्मेलिटी पूरी करवा लूँगा और एक दो दिन में अकाउंट खुलवा कर कागज भी आपके घर पर ही दे जाऊँगा. ठीक है."

"सच. आपका बहुत शुक्रिया. दरअसल मेरे स्कूल वालों ने इसी महीने से मेरी सैलरी चेक से देनी शुरू कर दी है और मेरा कहीं भी कोई बैंक अकाउंट नहीं है. अगर आप ये करवा दे तो..." दिव्या ने मेरे कानों में शहद घोला.

"शुक्रिया की क्या बात. आखिर पडोसी पडोसी के काम नहीं आयेगा तो कौन आयेगा. शाम को ७ बजे मिलते है." मैंने राजेश से हाथ मिलाते हुए कहा और वो दोनों चले गए. मुझे दिव्या की खूबसूरती ने इतना इम्प्रेस किया की मैंने सोचा की इनसे तो जान पहचान बढ़ानी ही चाहिए. हो सकता है की कुछ वैसा फायदा हो जाए जो पहले हुआ था तो इसीलिए शाम दीदी से बोलकर मैं उनके घर फॉर्म वगेरह लेकर पहुच गया. दरवाजा दिव्या ने खोला और मुझे अन्दर बुलाया. बहुत साल बाद इस घर में आया था. इन लोगों ने घर में काफी बदलाव करवा लिए थे. दिव्या मुझे ड्राइंग रूम में ले गयी जहा राजेश टीवी देख रहा था. मुझे देखकर राजेश खड़ा हो गया और मुझसे हाथ मिलाया. मैंने उन दोनों से फॉर्म पे साइन करवाए. पेपर्स वगेरह लिए और कहा "तो ठीक है राजेश भाई. मैं चलता हूँ."

"अरे आज पहली बार आप मेरे घर आये हैं मनीष जी ऐसे सूखे सूखे थोड़े ही जाने दूंगा. मैं तो वेट कर रहा था की पहले काम वगेरह हो जाए फिर महफ़िल जमाई जाए. जाओ दिव्या इन्तेजाम करो." राजेश बोला और दिव्या अन्दर चली गयी.

"अरे आप लोग परेशान न हो. घर पर दीदी मेरा वेट कर रही होंगी." मैंने मना किया.

 
"अरे अभी कौन सा रात के १२ बज गए है. दो दो पेग हो जाए फिर चले जाइएगा आप." राजेश ने कहा तब तक दिव्या एक ट्रे में काजू, गिलास, सोडा और स्कॉच की बोतल लेकर आ गयी. वैसे तो मैंने पहले भी दोस्तों के साथ पी है. लाला ओम मयंक वगेरह के साथ भी पर कभी स्कॉच नहीं पी और इधर तो कई महीनो से शराब नहीं पी थी.स्कॉच देख कर मैंने सोचा की थोड़ी देर बैठ ही लेते है. मैंने कहा "एक शर्त पर बैठूंगा."

"कैसी शर्त मनीष जी?" राजेश ने पुछा.

"यही की आप लोग मुझे जी और आप नहीं बुलाएँगे. आप मुझसे उम्र में करीब १७ साल बड़े है." मैंने कहा.

"मंजूर है यार अब तो बैठो. पर तुम्हे कैसे पता की मैं तुमसे कितना बड़ा हूँ." राजेश ने हँसते हुए पुछा.

"अभी तो इस फार्म में आप दोनों ने अपनी उम्र भरी है. आप मुझसे १७ साल और भाभी से ७ साल बड़े है." मैंने कहा तो दिव्या ने हँसते हुए कहा "ये तो बड़ी गड़बड़ हो गयी जो तुमको मेरी उम्र पता चल गयी." और हम दोनों के लिए पेग बनाकर वो किचन में चली गयी.

मैं करीब २ घंटे उनके यहाँ रुका और खा पीकर घर आया. मैंने महसूस किया की मैं करीब ४ साल से दीदी को रोज चोद रहा था और अब थोडा थोडा बोर हो गया था पर आज पीकर जब मैंने दीदी को चोदा तो एक ताजगी का एहसास हुआ. दीदी भी बोली "आज बहुत दिनों बाद काफी जोश में थे? क्या हुआ? क्या बगल वाली भाभी समझ कर चोद रहे थे."

मैंने कहा "वैसे आज तो नहीं सोच रहा था पर कल हम लोग रोल प्ले करेंगे. तुम दिव्या बनना. बड़ा मजा आयेगा." और सच में अगले दिन दीदी दिव्या बनी और मैं राजेश और हम दोनों को बड़ा मजा आया. इस तरह मेरी और दीदी की सेक्स लाइफ जो सूख रही थी उसमे फिर से रस धार बह निकली. कुछ दिन बाद मैं फिर से राजेश के घर उनकी पासबुक वगेरह देने पंहुचा तो राजेश उस दिन भी पी रहे थे. उन्होंने फिर से मुझे साथ बिठा लिया. उस दिन मुझे पता चला की वो नियम से रोज ही पीते है. उस दिन भी मैंने ३ पेग लगाये और घर लौट कर दीदी को जबरदस्त चोदा. करीब ६ महीने में ही मैं भी राजेश की तरह रोज पीने वाला हो गया और राजेश मेरा रोज का साथी. कभी मैं उसके घर चला जाता तो कभी वो मेरे घर. राजेश खुले दिल का आदमी था. मेरे घर तो कोई ज्यादा आता जाता नहीं था पर राजेश के यहाँ काफी लोग आते रहते. मैंने देखा की हर २-३ हफ्ते में उसका कोई रिश्तेदार या दोस्त वीकेंड में उसके घर पर रहने आ ही जाता था तब हम लोग साथ बैठ कर नहीं पी पाते. मैंने कई बार कोशिश की कि दीदी मेरा साथ देने लगे पर दीदी कभी कभी चख जरूर लेती थी पर इससे ज्यादा नहीं.

 
अब मेरे रिश्तेदार हमारे ऊपर दबाव डालने लगे की अब मैं दीदी की शादी कर दूं. दीदी तो मना कर देती पर मैं क्या करता. आखिर मामा ने दिल्ली में ही एक लड़का फाइनल करके मुझसे कह दिया की अब मैं देर न करूं और दीदी की सगाई कर दूं. अब हम मामला ज्यादा टाल नहीं सकते थे. दीदी की पढाई भी पूरी हो गयी थी और लड़के वालों ने कोई डिमांड भी नहीं की. लड़का देखने में भी अच्छा था. बढ़िया नौकरी, अच्छा खानदान मतलब हमारे पास कोई बहाना नहीं बचा तो आखिरकार दीदी की सगाई हो ही गयी और 2 महीने बाद शादी भी. दीदी हनीमून के लिए गोवा गयी और जब वो वापस लौट कर आई तो उन्होंने मुझे फोन किया. थोड़ी देर तक हलचल लेने के बाद दीदी ने बताया "मनीष, जब मैं गोवा से वापस दिल्ली आ रही थी तो हम ३ दिन बोम्बे में रुके थे. जिस होटल में हम रुके थे न मुझे वही रुची मिली."

"रुची? वो वहां क्या कर रही थी" मैंने पुछा.

"वो उस होटल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी कर रही है. उसने बताया की लाला उसको लेकर बॉम्बे गया था और कुछ दिन मज़े करने के बाद छोड़ कर भाग गया तो उसका टाइम शुरू में काफी ख़राब निकला. तरह तरह के काम किया उसने और अब उस होटल में नौकरी करती अहि और मयंक के साथ रहती है. मयंक भी बॉम्बे में ही रहता है वही नौकरी करता है. अंकल आंटी को सब पता है और अब वो उसकी शादी करने वाले है. वो चाहती थी की मैं एक बार मयंक से मिलूँ पर एक तो ये २४ घंटे मेरे साथ थे और दुसरे मेरा खुद का भी कुछ मन नहीं हुआ की कहीं कुछ लफड़ा न हो जाए." दीदी ने कहा.

"चलो अच्छा ही हुआ." मैंने कहा.

दीदी के दिल्ली जाने के बाद मेरा राजेश के यहाँ जाना और बढ़ गया. अक्सर मैं ऑफिस के बाद सीधे राजेश के घर पहुच जाता और खा पीकर ही वापस आता था पर जब उसके दोस्त वगेरह आ जाते तो मुझे दिक्कत होती थी. दिव्या के लिए मेरे दिल में अभी भी आग थी पर वो कभी कोई सिग्नल ही नहीं देती और इतने दिनों में मुझे ये भी समझ में आ गया की दोनों पति पत्नी आपस में बहुत प्यार भी करते है. ६-८ महीने और निकल गए और एक दिन मामा जी मुझसे मिलने आ गए. घर की हालत देख कर उन्होंने कहा की अब तुम भी कुछ सोचो शादी के बारे में. वैसे भी दीदी ने मेरी बीवी बन के ऐसी आदत डाल दी थी की अब मुझे बहुत दिक्कत हो रही थी. पेट की भूख तो जैसे तैसे मिट जाती थी पर जिस्म की भूख का कोई इंतज़ाम नहीं हुआ था. दिव्या के यहाँ भी कुछ नहीं हो पाया और मेरी नौकरी के चक्कर में कभी कभी दोपहर को जो नीलम आंटी की मिल जाती थी वो काम भी बंद हो गया तो मैंने सीधे सीधे मामा से कहा "सोच तो रहा हूँ मामा."

"कोई लड़की देखी है क्या?" मामा ने पुछा.

"नहीं फिलहाल तो नहीं." मैंने जवाब दिया.

"तो इसको देखो." मामा ने पॉकेट से एक फ़ोटो निकाल कर मुझे दिखाई. उफ्फ क्या फोटो थी. बहुत ही सुन्दर. बस समझ लीजिये की टेनिस प्लेयर मारिया शारापोवा की कार्बन कॉपी. मैंने पुछा "ये किसकी फोटो है."

 
"अरे दिल्ली में मैं जिस घर में रहता हूँ ये उस मकान के मालिक की बेटी है रेणुका. शकल सूरत तुम देख लो. सीरत तो मैं इतने दिन से देख ही रहा हूँ. तुम्हारी और इसकी जोड़ी खूब रहेगी. आकर एक बार इससे मिल लो. अगर पसंद होगी तो बात पक्की कर लेंगे." मामा ने कहा. मैं तो फ़ोटो देखते ही फ्लैट हो गया था. अगले ही हफ्ते मैं दिल्ली पहुच गया और रश्मि दीदी की ससुराल में जाकर रुक गया. दीदी और जीजा जी अलखनंदा में रहते थे और मामा ग्रेटरकैलाश में. अगले दिन जीजा जी ऑफिस निकल गए और मैं और दीदी रेणुका से मिलने dlf माल चले गए. मुझे तो रेणुका फ़ोटो में ही पसंद आ गयी थी सामने से वो और भी सुन्दर थी. दीदी ने भी उसको अप्प्रूव कर दिया और हम लोग वापस लौट आये. घर लौट कर दीदी ने कहा "किस्मत खुल गयी तेरी. बहुत सही माल से शादी कर रहा है. मजा आ जायेगा जा रोज लेगा इसकी."

मैंने दीदी को किस करते हुए कहा "दीदी वो मजा कोई नहीं दे सकती जो तुमने दिया है. एक साल होने को है. अब और न तडपाओ जल्दी से बेडरूम में चलो. शाम को तो मामा रेणुका के घर वालो को लेकर आ जायेंगे. फिर जीजा जी भी वापस आ जायेंगे और कल मैं वापस चला जाऊँगा." दीदी मुस्कुराई और अपनी कमर मटकाते हुए बेडरूम की तरफ चल दी. मैंने गौर से देखा की शादी के बाद दीदी की गांड थोड़ी और बड़ी हो गयी थी.

बेडरूम में जाकर मैंने दीदी के साड़ी ब्लाउज और पेटीकोट उतार दिया. अब दीदी लाल रंग की ब्रा पैंटी में खड़ी थी. अब मैं रुक गया और गौर से उनकी तरफ देखने लगा. दीदी ने पुछा "क्या देख रहा है?"

मैंने बोला "दीदी शादी के बाद तो तुम एक हुस्न की परी बन गयी हो". मेरी बात सुनकर दीदी हंसने लगी. उन्होंने बोला "मनीष तू ज्यादा मक्खन मत लगा. अगर मैं तुम्हें इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी तो मेरी शादी ही क्यों की. मैं तेरी ही वाइफ बन जाती." मैंने कहा "मेरी वाइफ तो तुम कई सालो से हो ही दीदी." और मैंने उनकी लाल ब्रा को उतारा और दीदी की चुंचिया को सहलाने लगा. फिर मैंने दीदी की पैंटी को उतारा और उनकी सुनहरी चूत को चाटने लगा. बहुत दिनों बाद आज दीदी की चूत के दर्शन हुए थे. मैं उनकी चूत को किसी कुत्ते की तरह बड़ी तेजी से चाटने लगा. दीदी को भी मजा आने लगा था. दीदी बोली जल्दी जल्दी कर भैया. जयादा टाइम नहीं है. फिर मैं उनकी चूत में मुंह में डाल कर चाटने लगा और दीदी आह्ह ईई ओऊ ईई अह्ह्ह अय्य्य अह्ह्ह आवाज करने लगी. मैं और तेज करने लगा, मैं तब तक चाटता रखा जब तक उनका पूरा पानी मेरे मुंह में नहीं आ गया.

फिर मैंने दीदी को अपनी गोद में उठाकर बेड़ पर लेटा दिया और किसी भूखे शेर की तरह उन पर झपट पड़ा. बहुत तेजी से मुंह में जीभ डाल कर किस करता रहा. फिर दीदी ने कहा "अरे बहनचोद जल्दी कर न."

 
फिर मैंने उन्हें बेड से उठाकर सोफे पर बैठने को कहा फिर मैंने उनके दोनों पैरों को उठाया और फिर धीरे से अपना लंड चूत में डालने लगा. मैंने भी एक धक्का दिया. एक झटके में ही लंड दीदी की चूत में घुस गया. मैंने दीदी से पुछा "और दीदी जीजा जी ठीक से तो चोदते है न या फिर यहाँ भी और आशिक बना लिए है." दीदी सिसकारी लेते हुए बोली "जो कुछ करना था शादी से पहले कर लिया और अब तेरी दीदी की चुत पर सिर्फ तुम्हारा और तुम्हारे जीजा का हक है. वैसे ये भी चुदाई में ठीक है पर खुल कर नहीं करते समझा. अब जल्दी जल्दी घक्के मार न." दीदी ने कहा. मैं दीदी को तेजी से चोदने लगा, वह भी पूरा मजा लेने लगी. करीब २० मिनट ताबड़तोड़ धक्के मारने के बाद मैंने कहा "दीदी मैं झड़ने वाला हूँ कहाँ निकालू. मुह में या?"

"अन्दर ही निकाल दे मैं गोलिया लेती हूँ." दीदी ने कहा और मैंने अपना पूरा माल दीदी की चूत में ही निकाल दिया. थोड़ी देर हमने रेस्ट किया और फिर कपडे पहनने लगे. हमारी टाइमिंग बिलकुल सही थी. कपडे पहनते ही मामा रेणुका के मम्मी पापा को लेकर आ गये. उन लोगो ने मुझे पसंद किया और हमारा चट मंगनी पट ब्याह हो गया. मैं रेणुका को लेकर शिमला हनीमून के लिए गया. वापस आ कर भी मैं ज्यादातर रेणुका में ही लगा रहता तो मेरा राजेश और दिव्या से मिलना भी बेहद कम हो गया. बस एक बार उन दोनों ने शादी के बाद मुझे डिनर पर बुलाया और कभी कभी बैंक के काम से वो मेरे घर या बैंक आ जाते तो मुलाकात हो जाती. फिलहाल पीना वीना भी बंद हो गया. वैसे तो ज़िन्दगी सही ही चल रही थी पर रेणुका के साथ मैं वैसे सेक्स नहीं कर पाता था जैसा रश्मि दीदी, रुची या फिर दोनों आंटियों के साथ करता था क्योंकि रेणुका सेक्स के मामले में ज्यादा खुलती ही नहीं थी. हम लोगो की चुदाई सिर्फ मिशनरी पोजीशन तक ही सिमट कर रह गयी थी.

मुझे लगा था की धीरे धीरे रेणुका को मैं अपने जैसा बना लूँगा पर मेरी सारी कोशिशे बेकार हो गयी और शादी के 2 साल बाद भी रेणुका वैसे की वैसे ही रही. अँधेरा करके मिशनरी पोजीशन पर मैं क्या कर सकता था. इसका नतीजा ये हुआ की जहा मैं रश्मि दीदी को चोदते हुए मैं 4 साल तक बोर नहीं हुआ था रेणुका से 2 साल में ही हो गया. अब तो मैं उसे रोज चोदता भी नहीं था बस हफ्ते में एक दो बार.

ऐसे में ही एक दिन राजेश किसी काम से मेरे बैंक आया और हम लोगों की इधर उधर की बातें होने लगी. राजेश बोला "यार पहले तो हम लोग रोज ही मिलते थे. तुम्हारी शादी के बाद तो अब सिर्फ काम पड़ाने पर मुलाकात होती है." मैंने कहा "ऐसी तो कोई बात नहीं राजेश भाई."

"तो ठीक है आ आ जाओ घर पे सात बजे, मन हो तो रेणुका को भी लेते आना" राजेश ने कहा. और उस दिन से फिर से मेरा राजेश के साथ बैठ कर पीना शुरू हो गया.
 
शाम को मैं रेणुका से बोल कर राजेश के घर पहुच गया. दरवाजा दिव्या ने ही खोला. आम तौर पर जब भी मैं उनके घर जाता था दिव्या साड़ी या सलवार में ही रहती थी पर आज वो नीले रंग की एक नाईटी पहने हुए थी. शायद किचेन में कुछ काम कर रही थी. मैं उसे उस सेक्सी नाईटी में देख कर चौंक गया और दिव्या मुझे देख कर थोड़ी चौक गयी पर फिर बोली "अरे मनीष तुम, आओ आओ."

"क्या हुआ भाभी, क्या किसी और का इंतज़ार था क्या?" मैंने हंस कर पूंछा.

"नहीं किसी और का तो नहीं पर तुम्हारी उम्मीद भी नहीं थी. शादी के बाद तो तुमने हमारे घर आना जाना ही बंद कर दिया." दिव्या ने वापस रसोई में जाते हुए मुझे छेड़ा.

तब तक राजेश भी बाहर आ गया और मुझे देख कर बोला "आओ मनीष आओ. सॉरी दिव्या मैं तुम्हे बताना भूल गया की आज मैंने मनीष को इनवाईट किया है."

"अरे आपको तो आजकल कुछ याद नहीं रहता. ये भी भूल गए की मनीष के साथ साथ रेणुका को भी बुलाना चाहिए था." दिव्या ने कहा और किचन में चली गयी.

मैं और राजेश उनके ड्राइंग रूम में आ गए. राजेश शायद पहले से ही पी रहा था. उसने एक गिलास और निकाला और मेरे लिए पेग बनाने लगा. थोड़ी देर हम लोग इधर उधर की बातें करके पीते रहे फिर राजेश बोला "यार वैसे दिव्या ने एक बात ठीक ही कही की तुम्हे रेणुका को साथ लेकर आना चाहिए था."

"राजेश भाई, वो क्या है की रेणुका ज्यादा सोशल नहीं है और उसे मेरा पीना भी पसंद नहीं इसीलिए नहीं लाया वरना आप के साथ बैठ कर आराम से पी नहीं पाता. चियर्स" मैंने अगला जाम उठाते हुए कहा.

"यार सब बीवियाँ अपने आदमियों पर थोडा बहुत कण्ट्रोल रखती ही है. इसमें ज्यादा परेशान नहीं होना चाहिए." राजेश बोला.

"पर राजेश भाई दिव्या भाभी ने तो आपको बिलकुल खुली छूट दे रखी है." मैं पुछा.

"ये शुरू में ऐसी नहीं थी. बहुत मेहनत की है मैंने इनको अपने रंग में ढालने में." राजेश बोला. मुझे लगा राजेश आज थोडा अलग मूड में था. शायद वो थोडा ज्यादा पी गया था. वैसे भी उसकी स्पीड बहुत थी, जब तक मैं अपना पहला पेग ख़तम करता वो दूसरा ख़तम करके तीसरा बनाने लगता था और आज तो वो पहले से ही पी कर बैठा था.

मैं भी २-३ पेग मार चूका था. काफी दिनों बाद पीने से सुरूर मेरे ऊपर भी था. मजे लेते हुए मैंने कहा "मुझे भी बताइए वो तरीका जिससे मैं भी रेणुका को अपने रंग में ढाल लूं."

"सबके बस की बात नहीं है. बहुत कुछ करना पड़ता है." राजेश ने मेरा अगला ड्रिंक बनाते हुए कहा.

 
"ये तो सही कहा. आपकी शादी को कम से कम १५ साल तो हो गए होंगे फिर भी भाभी और आपकी केमिस्ट्री देख कर ऐसा लगता है जैसे कोई नया जोड़ा हो और हमको देखिये दो साल में ही दोनों एक दुसरे से बोर हो गए." मैंने भी सुरूर में बोल दिया.

"ये कहानी तो सबकी है. कोई २ साल, कोई ४ साल और ज्यादा से ज्यादा ५ साल. भाई अगर रिश्ते को मजबूत रखना है तो कुछ नए एक्सपेरिमेंट करने पड़ते है." राजेश ने गिलास खाली करते हुए कहा.

"आप कैसा एक्सपेरिमेंट करते है राजेश भाई." मैंने पुछा.

"अरे यार तुम देखते नहीं हो. हर १५-२० दिन में जो लोग हमारे घर आते है..." राजेश आगे कुछ कहता तब तक दिव्या वहाँ आ गयी और उसकी बात काटते हुए बोली "अरे क्या फालतू की बातों में लग गए हो तुम भी कुछ टाइम का अंदाजा है. १० बज गए है उधर रेणुका सोच रही होगी की अजीब लोग है मेरे हस्बैंड को बिठा ही लिया."

मैंने कहा "भाभी रेणुका का बहाना बना कर मुझको भगाना चाहती हैं लगता है आपको भैया की बहुत याद आ रही है."

मैंने आज से पहले हमेशा इन दोनों से लिमिट में ही बात की थी पर आज राजेश ने जो बातें की और मेरे नशे में मैं इस तरह की बात बोल गया पर दिव्या ने बुरा नहीं माना और हस्ते हुए बोली "मुझे तो हर रोज रात को इनकी ऐसी ही याद आती है उसमे कहने की क्या बात है. अब तुम भी घर जाकर अपनी बीवी को याद करो."

थोड़ी देर और हम लोग ऐसी ही चुहलबाजी करते रहे पर सच में रात वाकई काफी हो गयी थी. वैसे हम कभी भी बैठते तो महफ़िल ९ बजे तक उठ ही जाती थी क्योंकि मुझे घर जाकर रश्मि दीदी की चुदाई जो करनी होती थी पर आज मुझे घर जाने की जैसे कोई जल्दी ही नहीं थी पर फिर मैंने सोचा जैसे रश्मि दीदी को पीकर चोदने में बहुत मजा आता था वैसे ही शायद रेणुका के साथ भी आयेगा. आज रेणुका की घनघोर चुदाई करूंगा यही सोच कर मैं वापस घर आया और मैंने जैसे ही रेणुका को किस करना चाहा उसने मुह घुमा लिया और बोली "ओफ्फ आप शराब पीकर आये है. मुझे इसकी बदबू बिलकुल बर्दाश्त नहीं होती. आगे से अगर कभी पीकर आये तो मेरे पास मत आया कीजिये. छोडिये मुझे आपका खाना लगा देती हूँ."

ये कहकर रेणुका अपने को मुझसे छुड़ा कर चली गयी और मेरे अरमानो पर पानी फेर दिया.

उधर मेरे निकलने के बाद दिव्या राजेश को लेकर बेडरूम में आ गयी और कपडे उतारते हुए राजेश से बोली "अरे तुम कहीं पागल तो नहीं हो गए. मनीष से क्या अंट शंट कह रहे थे."

"यार उसकी और उसकी बीवी की भी वही हालत है जो एक टाइम में हमारी थी तो मैंने सोचा..." राजेश ने भी अपने कपडे उतारे और दिव्या की चुन्चिया चूसते हुए बोला.

"अह्ह्हह्ह्ह्ह. ख़ाक सोचा. सोचते तो ऐसी बात सपने में भी नहीं करते. उह्ह्ह्हह्ह कितनी बार कहा है की जब किसी जान पहचान वाले के साथ बैठा करो तो ३ पेग से ज्यादा मत पिया करो. मुझसे पता है की जब से तुमने रेणुका को देखा है तब से तुम्हारी लार टपक रही है आआईईइ अराआम्म्म्म से ओफफ्फ्फ्फ़ पर याद रखो मैंने पहले ही कहा था की जान पहचान में ये सब नहीं करना. अरे मान लो की ये बात मनीष मोहल्ले में किसी से कह देता तो हमें ये मोहल्ला भी छोड़ना पड़ता." दिव्या बड़ी मुश्किल से बोली.

 
"नाराज न हो डार्लिंग. किसी भी खूबसूरत लड़की को देख कर हर आदमी का दिल उसे चोदने का करता है. ये तो ह्यूमन नेचर है. बात ये है की मुझे लगा मनीष थोडा परेशान है और अपनी बीवी से बोर हो गया है तो शायद तैयार हो जाए." राजेश अपना लंड दिव्या की चूत में पैवस्त करता हुआ बोला.

" आअह्ह्ह्हीईई मार गयीईईई उफफ्फ्फ्फ़ अरे वो तो जैसे मुझे देखता है हान्न्न्नन्न एक सेकंड में तैयार हो जायेगा पर उसकी बीवीईईईईइ रेणुका उसका क्या? इसीलिए कहती हूँ की उसके चक्कर में मत पडो आह्ह्ह्हह्ह और जैसा हम लोगों का चल रहा है चलने दो." दिव्या भी नीचे से झटके मारते हुए बोली.

"मेरी जान मेरी बात समझो, इस छोटे शहर में मुझे कितने पापड़ बेलने पड़ते है कोई नया कपल ढूढने में. पहले ठीक शकल सूरत वाले लोग ढूढो फिर उनका बैकग्राउंड पता लगाओ. लोग ऐसे होने चाहिए की बाद में कोई परेशानी न हो. ५० में कोई एक हमारे काम का मिलता है. फिर कोई भी जोड़ा २-३ बार से ज्यादा के लिए तैयार नहीं होता. अब इधर देखो लगभग ३ महीने हो गए कोई नया मिला नहीं और पुराने वाले कोई आना नहीं चाहते. अगर मनीष तैयार हो गया तो हम लोगों का साल दो साल आराम से कट जायेगा. हो सकता है और ज्यादा भी चल जाये." राजेश हौले हौले दिव्या को चोदते हुए समझाने लगा.

"मैं तुम्हारी हर बात मानती हूँ आःह्ह ओफ्फ्फ्फ़ पर मैं जितना रेणुका को जानती हूँ मुझे लगता नहीं की वो मानेगी. हान्न्न्न ऐसे हीईई आह्ह्ह मुझे डर है कीईईइ यहाँ भी वैसा ही हो जायेगा जैसा अमृताताहईई वाले केस में हुआ था." दिव्या चुदाई के मजे लेते हुए बोली.

"यार अगर कुछ वैसा हो भी गया न तो इस बार भी हम ये मकान बेच देंगे और शहर भी छोड़ देंगे. मेरा बिज़नस वैसे भी अब ऐसा हो गया है की मैं उसे कही से भी हैंडल कर सकता हूँ तो अब हम दिल्ली बॉम्बे चलेंगे. वहां हम लोगों को कोई प्रॉब्लम नहीं होगी. बस तुम एक बार हाँ तो कहों." राजेश ने धक्को की रफ़्तार बढ़ाते हुए कहा...

"आह्ह्ह्ह अब तुम रेणुका की चूत के पीछेईईए पागल हो तो मैं तुम्हे रोकूंगीईईईइ नहीं पर ओह्ह्ह्ह आआअ इस बार थोडा संभल कर. जल्दबाजी मत करनाआआआ ईईई. येस्सस्सस्स ऐस्स्सा ही करूऊऊ"

"तुम चिंता न करो मेरी जान बस तुम भी मनीष को थोड़ी ढील दो." राजेश ने कहा और ताबड़तोड़ दिव्या की चुदाई करने लगा.

इधर राजेश और दिव्या की बातों से अनजान मैं रेणुका को गालिया देता हुआ बाथरूम में आया और दिव्या का गदराया जिस्म उस सेक्सी ब्लू नाईटी के बिना कैसा लगेगा ये सोच कर मुठ मारने लगा. झड़ने के बाद मैंने सोचा की आज जैसी बात चीत मेरी दिव्या से हुई है वैसी कभी नहीं हुई. मुझे लगने लगा की दिव्या को चोदना इतना नामुमकिन भी नहीं है जितना मैं सोचता था.

 
जब मैं वापस आया तो रेणुका मुझे खाना देते हुए बोली " सुनो मम्मी पापा बहुत दिनों से बुला रहे है. तुम कल मेरा टिकेट करवा देना. एक दो हफ्ते मम्मी पापा के पास रह आऊंगी."

मैंने कहा "ठीक है." ये सुन कर रेणुका सोने के लिए चली गयी और मैं खाना खाने लगा.

दो दिन बाद रेणुका दिल्ली चली गयी और मैं फिर पुराने दिनों की तरह राजेश के घर पीने जाने लगा. अब अक्सर दिव्या भी हम लोगों के साथ बैठ जाती कभी कभी बियर भी पी लेती. इतने सालों में ऐसा पहले कभी नही हुआ था. करीब एक हफ्ते बाद सन्डे के दिन मेरा हाथ बहुत दर्द कर रहा था. राजेश ने दोपहर को ही मुझको अपने घर बुला लिया था. हम दोनों बैठे बैठे पी रहे थे और मैं बार बार अपना हाथ दबा रहा था.

राजेश ने मुझसे पुछा "क्या हुआ?"

"कुछ नहीं राजेश भाई. हाथ बहुत दर्द कर रहा है." मैंने जवाब दिया.

"अब रेणुका तो है नही तो मनीष को सब कुछ हाथ से ही करना पड़ता होगा इसीलिए दर्द हो रहा होगा." दिव्या मुस्कुराते हुए बोली.

"अब आपको क्या पता भाभी, रेणुका होती है तब भी मुझको कई बार अपने हाथ से ही काम चलाना पड़ता है." मैंने दिव्या की दोअर्थी बात का जवाब दिया.

"भाई जब रेणुका होती है तब का तो पता नहीं पर जब वो नहीं है तब ज्यादा तकलीफ हो तो मुझे बता देना. मैं कुछ हेल्प करवा दूँगी." दिव्या ने कहा तो मुझे लगा की ये ओपन इनविटेशन है. मैंने राजेश की तरफ देखा तो पाया की वो तो पहले की तरह की पी रहा था जैसे की उसने कुछ सुना ही न हो.

"सोच लो भाभी बाद में पीछे न हट जाना." मैंने बोला.

"मैं तो पीछे नहीं हटती पर हाँ आगे बढ़ने के लिए तुममे हिम्मत है." दिव्या ने हस्ते हुए पुछा.

"हिम्मत तो मुझमे बहुत है बस लोकलाज की फ़िक्र रोकती है." मैंने दिव्या का हाथ पकड़ कर कहा.

अब राजेश ने दिव्या को इशारा किया तो वो उठ कर अन्दर चली गयी. मुझे लगा की अब शायद वो बुरा मान गया है. "देखो भाई ये लोकलाज वोक्लाज की बाते सब फालतू है. अगर आगे बढ़ना है तो ये सब भूलना होगा." राजेश बोला. मुझे समझ नहीं आ रहा था की बात कहा जा रही है. मैं राजेश की बात सुनने लगा. "याद है उस दिन जब तुमने मुझसे पुछा था की कैसे मैं और दिव्या अभी भी नए कपल जैसे एन्जॉय करते है तो मैंने तुम्हे बताया था की हम हमेश नए नए प्रयोग करते रहते है." वो बोला.

"मैंने तो आपसे पुछा था की कैसे एक्सपेरिमेंट पर बात उस दिन अधूरी ही रह गयी थी." मैं कहा.

 
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