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नजर का खोट complete

पर कुछ साफ़ दिख नहीं रहा था मतलब दोनों ही शायद थोड़े दूर दूर खड़े थे पर उनकी आवाजो से लग रहा था की बहस हो रही है दोनों में पर भाभी में इतनी हिम्मत कहा से आयी की वो राणाजी के सामने मुह खोल दे वो भी इस तरह से पर अभी सुनना था की आखिर बात क्या हो रही है

राणाजी-पर तुम ऐसा कैसे कर सकती हो

भाभी-हमने कर दिया है

राणाजी- और जब वो जवाब मांगेगा तब

भाभी- वो हमारी बात कभी नहीं टालेगा और वैसे भी सबकुछ उसी का ही तो है ना

राणाजी- बेशक, पर ये मत भूलो की वो इस वक़्त आग से खेल रहा है उस आग में जो जला देगी उसको

भाभी- तो आप उसे बता क्यों नहीं देते

राणाजी-हमारे पास कुछ भी नहीं बताने को

भाभी-आप ज्यादा देर छुपा भी नहीं पाएंगे मैंने उसकी आँखों में एक जूनून देखा है एक दीवानगी देखि है चलो आप से पूछती हु आखिर ऐसी क्या वजह थी की कुंदन लाल मंदिर तक पहुच गया क्या कभी पता लगाने की कोशिश की आपने

राणाजी-आपको क्या लगता है हमने प्रयास नहीं किया होगा यहाँ तक की कुंदन के पीछे अपने आदमी भी लगाये पर कुछ हासिल नहीं हुआ आदमियो की जान गयी सो अलग जगन से बस इतना मालूम हुआ की किसी लड़की के पीछे उसका और अंगार का पंगा हुआ था पर ये नहीं मालूम हो रहा की वो लड़की आखिर है कौन

भाभी- जो भी है एक बात तो है की कुंदन बहुत गहरे से जुड़ा है उस से,कुछ तो बात होगी उस लड़की में जिसके लिए कुंदन ने जान की परवाह भी ना की.

राणाजी- इसी लिए तो हम चाहते है की तुम कुंदन से इस बारे में मालूमात करो वो तुम्हारे बहुत करीब है तुम्हे बता देगा और अगर फिर भी बात न बने तो अपने इस खूबसूरत जिस्म का इस्तेमाल करो कुंदन को अपने रूप जाल का जाम पिलाओ

भाभी- हर कोई आपकी तरह जिस्म फरोश नहीं होता,हां वो मेरे करीब है पर उसे मेरे जिस्म की चाहत नहीं इज्जत करता है वो मेरी अपना मानता है मुझे

राणाजी- हर मर्द की एक ही कमजोरी होती है और कुंदन भी मर्द है आगे हमे कुछ कहने की जरुरत नहीं

भाभी- पर उसकी कोई कमजोरी नहीं क्योंकि वो असली मर्द है जो औरत को अपने नीचे रौंदना नहीं बल्कि उसकी इज्जत उसका सम्मान करना जनता है वो आपसे हमसे सबसे बहुत अलग है और आपको क्या लगता है कि उसे इस जायदाद का लालच है नहीं ,देखना वो खुद आता ही होगा मेरे पास

राणाजी- सवाल ये है क्या की उसे अर्जुन सिंह की वसीयत के बारे में पता है या नहीं

भाभी- उसे पता होगा और वो उसके पीछे छुपे सच को भी तलाश कर ही लेगा वैसे मैं बता दू की कुंदन कभी उस खजाने को हाथ नहीं लगायेगा कभी नहीं मैं सोचती हूं जब परम पूज्य धर्माधिकारी राणा हुकुम सिंह के चेहरे से ये नकाब उतरेगा तब क्या होगा

अगले ही पल चटाक की तेज आवाज मैंने सुनी और भाभी की आह भी राणाजी ने थप्पड़ मारा था उनको और अगले ही पल दरवाजा खुला कुछ देर बाद मैंने राणाजी की गाड़ी को गांव की तरफ जाते देखा पर इससे पहले भाभी वहां से निकलती मैं कमरे में घुस गया

मुझे वहां देख कर भाभी बुरी तरह चौंक गयी मैंने कमरे का जायजा लिया और उस कहानी को समझने की कोशिश करने लगा जो कुछ समय पहले यहाँ दोहराई गयी थी

भाभी- तुम यहाँ कैसे

मैं- मिलना था आपसे घर गया पर आप थी नहीं वापिस जा रहा था तो यहाँ गाड़ी देखी

भाभी- अभी हमारा मन नहीं है बाद में बात करेंगे

भाभी बाहर जाने लगी तो मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला- ये क्या खेल है जो सब लोग मिल कर मेरे साथ खेल रहे हो और आपने ऐसा क्यों कहा की कुंदन खजाने को हाथ भी नहीं लगायेगा

भाभी- अब तुम चोरी छिपे बाते भी सुनने लगे

मैं- आप तो सरे आम ससुर का बिस्तर गर्म कर रही हो

भाभी का थप्पड़ अगले ही पल मेरे गाल पर पड़ा और गुस्से से बिलबिलाते हुए वो कमरे से बाहर चली गयी मैंने रोकने की कोशिश नहीं की भाभी के जाने के बाद अब रुकने का कोई फायदा नहीं था जो काम करने आया था वो हुआ नहीं

खैर, पूजा के घर हमेशा की तरह ताला लगा हुआ था तो मैं अपनी झोपडी की तरफ बढ़ गया पर जाके देखा की झोपड़ी धू धू करके जल रही है और मैं बस उसे जलते हुए देखता रहा धीरे धीरे आग शांत होने लगी मैं कुवे की मुंडेर पर बैठे गहरी सोच में डूबा हुआ था

 
ये कौन था दोस्त तो हो नहीं सकता क्योंकि झोपडी जलाना और पूजा के अनुसार गाड़ी में रखे बम का निशाना मैं था पर दुश्मन था तो वो बैग रुपयो से भरा और फिर भाभी और राणाजी के बीच हुई वो सब बातें आखिर ये चक्कर क्या था ये कौन सा खेल था जिसमे मैं एक मोहरा था

उस पूरी रात पूजा का कोई अता पता नहीं था वो रात बस ऐसे ही आँखों आँखों में कटी सुबह मैं फिर से जुम्मन से मिलने गया और उसको वापिस झोपडी बनाने को कहा पर उसने कहा कि इस बार पक्का कमरा ही बना देगा ताकि फिर कोई ऐसी हरकत न कर सके

मैंने कहा जैसा ठीक लगे कर दे उसके बाद मैं घर गया भैया की मौत के बाद माँ सा ने खाट पकड़ ली थी तबियत खराब रहने लगी थी कुछ देर उनके पास बैठा और फिर भाभी के पास गया

मैं- कुछ बात करनी थी

वो- हां बताओ

मैं- ये सबकुछ मेरे नाम करने का क्या पंगा है

वो- तुम्हे क्या लगता है

मैं- मुझे कुछ नहीं चाहिए सिवाय उन जवाबो के जिनकी मुझे तलाश है

वो- जवाब तो हर लम्हा तुम्हारे साथ है पर जरूरत है उस नजर की

मैं- पहेलिया नहीं भाभी

वो- जितना मैं जानती हूं बता चुकी हूं

मैं- कल आपकी और राणाजी की बाते सुनकर ऐसा नहीं लगता मुझे

भाभी- तो राणाजी से क्यों सवाल जवाब नहीं करते हो

मैं- उनसे भी करूँगा, पर आपसे इतना तो पूछ सकता हु न की अर्जुन सिंह की वसीयत झूठी है ना

वो- नहीं झूठी नहीं है बस किरदार बदल गए बल्कि बात ऐसी है की उस वसीयत में एक बहुत ही खास बात है बस उस बात को पकड़ लो काम हो जायेगा

मैं- पहेलिया नहीं भाभी मुझे जवाब दो

भाभी- तुम्हे आखिर इतनी दिलचस्पी क्यों है तुम भी सीधे सीधे क्यो नहीं बता देते हो

मैं- क्योंकि मैं जुड़ा हु अर्जुनगढ़ से अब ये मत पूछना की क्यों कैसे

भाभी- और तुम्हे ऐसा क्यों लगता है देवर जी मेरी एक बात हमेशा ध्यान रखना की आँखों देखा भी सच नहीं होता है कई बार ऐसा होता है की हम चीज़ों को अपने हिसाब से समझ लेते है पर हकीकत में होता कुछ और ही है

मैं- आपका इशारा किस और है

भाभी- उसी और जिस तरफ तुम समझ रहे हो रही बात इन्दर और मेरी वसीयत की तो हमने जो तुम्हे दिया है वो तुम्हारा हिस्सा है हमारे कोई औलाद हुईं नहीं और तुम्हे कभी औलाद से कम माना नहीं तो क्या हम तुम्हारे लिए इतना भी नहीं कर सकते क्या

मैं- पर भाभी

वो- पर क्या , कुछ और चाहिए तुम्हे

मैं- राणाजी ने मेरे पीछे आदमी लगाये पर उनको मारा किसने

वो- पता नहीं

मैं- भाभी जल्दी ही एक दौर आएगा जब आप फिर से एक दोराहे पर खड़ी होंगी तब किसे चुनेंगी

भाभी- तुम्हे चाहे लिख के ले लो

मैं- जरूर

भाभी मेरे पास आयी और अपने दहकते हुए लबो को मेरे होंठो से जोड़ दिया कुछ देर वो चूमती रही और बोली- बताओ और कहा लिख के दे

मैं- भाभी कही आपने राणाजी की मुझ पर डोरे डालने वाली बात तो नहीं मान ली ना

भाभी- अभी हम तुम्हारी नजरो से इतना भी नहीं गिरे है कुंदन

इसी के साथ मैं कमरे से बाहर निकल गया निपट दोपहर में मैं पैदल ही चला जा रहा था धुप कुछ ज्यादा ही तेज लग रही थी मैं खारी बावड़ी के पास से गुजर रहा था की मुझे लगा कोई है उस तरफ पर दिन का समय था शायद कोई चरवाहा या कोई ओर हो तो मैंने ध्यान नहीं दिया

और आगे बढ़ गया और जा पहुंचा पूजा के घर दरवाजा खुला था मैं अंदर गया वो सब्ज़ी काट रही थी

मैं- कहा गयी थी तू बता के नहीं जा सकती थी क्या

वो- एक जरुरी काम था और तू इतनी फ़िक्र ना किया कर मेरी

मैं- क्यों फ़िक्र न कर तेरी पता नहीं कौन दुश्मन है कौन दोस्त अगर तुझे कुछ हो गया तो

वो- कुछ नहीं होगा मुझे

मैं- इतना यकीन कैसे है तुझे

वो- तू जो साथ है ,वैसे मुझे पता लगा कोई तेरी झोपडी जला गया।

मैं- अब क्या कर सकते है सरकार, सब खाली पड़ा है यहाँ कोई कभी भी कुछ कर जाये कौन देखता है.

पूजा- पर ये किसी आम गांव वाले की हरकत नहीं हो सकती वैसे भी कुंदन ठाकुर को अपना मानते है गांव वाले।

मैं-मुझे लगता है की मेरे इर्द गिर्द एक जाल बुना जा रहा है जैसे कोई चक्रव्यूह रचा जा रहा है

वो-कुंदन एक एक कड़ी को फिर से जोड़ो कुछ तो बात बनेगी सोचो जरा ये सब कैसे शुरू हुआ हर छोटी से छोटी बात पर विचार करो हो सकता है कुछ छूट रहा हो

मैं-तुम ही बताओ ये सब कहाँ से शुरू हुआ

वो- जब मैं पहली बार तुम्हे मिली

मैं-मान सकते है ऐसा ,तुमने मुझे अपनी कहानी सुनाई और मैं उससे जुड़ता चला गया

वो- तक़दीर कहते है इसे अगर मैं न होती तो कोई और जरिया होता जो तुम्हे ये सब बताता

मैं-सही है, परन्तु मुझे एक बात खटकती है की तुम बार बार उस हवेली तक जाती हो और वापिस आ जाती हो तो क्यों उसपे अपना हक नहीं जताती हो

वो- तुम्हे क्या लगता है की मैं ऐसा क्यों नहीं करती हूं

मैं- तुम ही बताओ

वो- क्योंकि मेरे पास आज कुछ भी ऐसा नहीं की मैं साबित कर सकु मैं ही वारिस हु ऊपर से वसीयत की शर्त तुमसे शादी किये बिना

मैं उसपे हक़ नहीं जता सकती

मैं- सवाल मुझसे शादी का नहीं है तेरे लिए मैं वो भी कर लूंगा पर मुद्दा है ये साबित करना की तू ही असली वारिस है और एक बात भाभी ने कहा था कि वसीयत की वो शर्त एक छलावा है

पूजा- तुम्हे वकील से मिलके वसीयत की ओरिजनल कॉपी लेनी पड़ेगी

मैं- हमे पूजा, इस बार तुम भी मेरे साथ चलोगी और मना मत करना जितना जल्दी हो सके हमे इस सब को सुलझा कर एक नयी जिंदगी की शुरुआत करनी होगी

जैसे ही मेरी बात पूरी हुई मुझे पूजा के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान दिखाई दी

वो- चल पहले खाना खा ले बाकि बाते बाद में करेंगे

उसके बाद हमने खाना खाया मैं कुछ देर के लिए लेट गया आँख सी लग गयी कुछ घंटों बाद उठा और एक बार फिर से हमारी बातें शुरू हो गयी

मैं- यार वो पैसो का सूटकेस भी राख हो गया होगा

वो- नहीं मैं उसे यहाँ ले आयी थी पलंग के नीचे पड़ा है वैसे इन रुपयो का तुम करोगे क्या

मैं- पता नहीं

वो- रात को मेरे पास रुकोगे ना

मैं- नहीं कुछ काम है मुझे

वो- रात को कौन सा काम है

मैं- एक छोटा सा काम है होते ही लौट आऊंगा

वो- साथ चलु मैं

मैं- अभी नहीं पर अगली बार पक्का ले चलूंगा

रात अभी शुरू ही हुई थी मैं पूजा के घर से निकल कर खारी बावड़ी की ओर चल दिया इन तमाम बातों में मैं पद्मिनी को भूल ही गया था और आज मैंने सोचा था की अगर कोई मेरी मदद कर सकेगा तो बस पद्मिनी ही मैं ये भी जानता था की ये सब खतरनाक होगा मेरे लिए हालाँकि मुझे की मदद लेनी चाहिए थी पर एक बार मैं खुद से कोशिश करना चाहता था

 
बावड़ी हमेशा की तरह शांत थी वो ही सूनापन वो ही ख़ामोशी मैं उस कमरे की तरफ गया आज दरवाजा खुला था जैसे किसी को पता हो की मैं आने वाला हु जैसे ही मैं कमरे में गया अचानक से एक दिया जल गया

और रौशनी सी हो गयी पर कमरे में कुछ नहीं था कुछ भी नहीं सिवाय एक गहरी ख़ामोशी के पर मै अपने पास किसी की मौजूदगी को जरूर महसूस कर पा रहा था

मैं- जानता हूं आप यही कही है मेरे सामने आइये मुझे आपसे बात करनी है

मैंने कुछ देर इंतज़ार किया पर वही ख़ामोशी

मैं- आज मैं यहाँ से ऐसे नहीं जाऊंगा जो नजारा मैंने आपकी आँखों में देखा था उस से मेरी ज़िंदगी में तहलका मचा हुआ है आपने ऐसा क्यों दिखाया आपको बताना होगा ,बताना होगा

पर जैसे ही मेरी आवाज शांत हुई वही ख़ामोशी फिर से छा गयी। कमरे के रखा दिया कब से बुझ गया था पर आज मैं कुछ सोच कर आया था सिर्फ पद्मिनी की रूह ही मुझे बता सकती थी की आखिर ऐसा क्या हुआ था जिसकी वजह से उन्हें जान देनी पड़ी

पर जितना मैं उन्हें पुकारता उतना ही वो सूनापन मुझ पर अपने डोरे डालने लगता रात इसी कश्मकश में आधे से ज्यादा बीत गयी कोई हल नहीं निकले मैं बावड़ी की सीढ़ियों पर बैठा था और तभी मुझे पानी रिसने की आवाज सुनाई दी मैंने देखा बावड़ी में पानी भर रहा था

कुछ ही देर में पानी लबालब भर गया चाँद की रौशनी में मैंने पानी में एक परछाई देखी पर दूसरी तरफ कोई नहीं थी

मैं- आखिर क्यों आँख मिचौली खेल रही है आप

फिर से कोई जवाब नहीं आया पल पल मेरी हताशा बढ़ती जा रही थी पर हाल वही ढाक के तीन पात वाला मुझे वो छाया लगातार पानी में हिलती डुलती दिख रही थी जो प्रमाण था की वो यही पर है

मैं- ठीक है अगर आप सामने नहीं आना चाहती तो बेशक ना आइये पर इतना जरूर है की आपकी मदद के बिना वो हवेली फिर कभी रोशन न हो सकेगी, आपकी वारिस को उसका हक़ कभी नहीं मिलेगा ,आपको लगता होगा मैं भी अपने पुरखों की तरह उसी खजाने की तलाश में आया हु पर मेरा खुदा गवाह है हक़दार को उसका हक़ जरूर मिलेगा चाहे आप मदद करे या न करे

ये कहकर मैं बावड़ी की सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर आने लगा और जैसे ही मैं चबूतरे तक आया मैंने देखा वहाँ पर कुछ पड़ा है मैंने चाँद की रौशनी में देखा ये वही दुल्हन का जोड़ा था जो मैंने और पूजा ने देखा था

उसके साथ ही दो कंगन और एक हार भी था मैंने सारे सामान को समेटा और सोचने लगा अखिर ये किस तरह का इशारा है ये कौन सी कड़ी है जिसे मैं पकड़ नहीं पा रहा हु,ये दुल्हन का जोड़ा क्या पद्मिनी ये चाहती है की मैं पूजा से ब्याह कर लूं

या फिर ये कोई और ही कहानी है मेरे दिमाग में भाभी की कही बात अब भी गूंज रही थी की अक्सर जैसा दीखता है वैसा होता नहीं है तो क्या ये सब मेरा भरम है या कोई माया आखिर ये सब है क्या मैंने वो दुल्हन का जोड़ा उठाया और पास ही एक पेड़ पर छुपा दिया ताकि दिन में इसे ले जा सकु

उसके बाद मैंने अपने कदम गांव की तरफ कर लिए और घंटे भर बाद मैं अपने घर के सामने खड़ा था बड़ा दरवाजा खुला ही था हमेशा की तरह ,मैं सीधे भाभी के कमरे की ओर गया दरवाजे के पल्ले को धकेला तो वो बिना आवाज खुल गया मैं अंदर दाखिल हुआ और दरवाजे की कुण्डी लगा ली

भाभी की तरफ देखा वो गहरी नींद में सो रही थी मैं उनके पास लेट गया और उसे जगाया

भाभी- कौन है

मैं- और कौन होगा मेरे सिवाय

भाभी- कुंदन तुम इस समय ,यहाँ पर

मैं- अब क्या समय का मोहताज होना पड़ेगा आपसे मिलने के लिए

वो- पर इतनी रात को

मैं- क्या दिन क्या रात भाभी जब आपकी याद आयी देखो चला आया

भाभी- मेरी याद तुम्हे यहाँ लायी है या तुम्हारी बेचैनी

मैं- आज तो आपकी याद ही लायी है बहुत थक गया हूं भाभी जैसे किसी कांच की तरह टूट कर बिखरा हु आपके पास पनाह मांगने आया हु आज

भाभी- बात क्या है

मैं-कुछ नहीं

मैंने अपना हाथ भाभी के काँपते पेट पर रखा और उसकी नाभि को सहलाने लगा मेरे स्पर्श मात्र से ही भाभी के बदन में कंपन होने लगा पर उन्होंने मेरा हाथ नहीं हटाया

भाभी- हमे खबर हुई है की तुम्हे बिजली की जरुरत है कल तुम बिजली दफ्तर जाना तुम्हारा काम हो जायेगा

मैं- अभी मुझे बस आपकी जरूरत है

मैंने भाभी की एक टांग को अपने पैर तले दबा लिया और अपने हाथ को पेट से हटा कर उनके उभारो पर फेरने लगा

भाभी- जानती हूं तुम्हे मेरी जरूरत है पर इस जिस्म की नहीं कुंदन तो ये प्रयास मत करो हम जानते है तुम यहाँ इस जिस्म को पाने नहीं बल्कि अपनी उलझन सुलझाने आये हो

मैं भाभी की चूची को कस के भीचते हुए- और अगर मैं कहु की आज मुझे आपकी चाहत है तो

भाभी-"आह" हां तुम्हे मेरी चाहत है पर मेरे जिस्म की नहीं

मैं- अगर मैं इस जिस्म को पाना चाहू तो

भाभी- अपनी भाभी को परख रहे हो देवर जी नहीं तुम इस तरह मुझे नहीं झुठला सकते अगर तुम्हे इस जिस्म की चाहत होती तो मैं तो हर पल तुम्हारे ही तो साथ थी क्या उलझन है ये बताओ

मैं भाभी के ब्लाउज़ के हुक खोलते हुए- बस देखना चाहता हु की मेरी भाभी दहकती हुई कैसी लगती है

भाभी- तो यु कहो ना की तुम भी इस जिस्म की मंडी में हमारी नुमाइश करना चाहते हो

मैं- जिस्म इतना खूबसूरत है तो कद्रदानों में अगर एक नाम मेरा भी जुड़ जाये तो क्या हो

भाभी-तुम्हे क्या लगता है अपनी इन जली कटि बातो से मेरा जी जला सकोगे ,भाभी हु तुम्हारी तुम्हे पाला है मैंने तुमसे ज्यादा मैं समझती हूं तुम्हे, ये हथकंडे मेरे ऊपर नहीं चलेंगे

मैंने भाभी की कमर में हाथ डाला और उसको खींच कर अपने सीने से लगाया और अपने गर्म होंटो से उसके गुलाबी गालो को छू भर लिया

भाभी- रुक क्यों गए इस जिस्म को पाने की हसरत लिए आये हो कौन रोकता है आओ कर लो अपनी हसरत पूरी

मैंने भाभी के जिस्म को अपने से थोड़ा दूर धकेल दिया और पास रखे जग से पानी पीने लगा भाभी भी उठ बैठी

भाभी- क्या हुआ जोश ठंडा पड़ गया देवर जी,तुम्हे तुमसे ज्यादा अगर इस दुनिया में कोई जानता है तो वो मैं हु बेशक तुमने सोचा होगा भाभी तो रंडी है पिघल जायेगी तुम्हारे आगोश में

मैं चुप रहा

भाभी- तुम्हारी जो भी उलझने है वो तुमने खुद पैदा की है कुंदन तो जवाब भी खुद तलाश करो जिन सवालो को तुम खेल समझ कर उनसे खिलवाड़ कर रहे हो वो सवाल नहीं बल्कि बर्बाद ज़िंदगियां है हम सब जिनमे तुम भी शामिल हो मुखोटे ओढ़े हुए है ,जिस्म सबके सड़े हुए है इन लिबासों के नीचे

 
जिंदगी जो हम जीते है बस हम असलियत जानते है बाकी कुछ कहने को बाकि नहीं है तुम्हे लगता है भाभी सब कुछ जानती है और जान बूझ के तुम्हे कुछ नहीं बताती है पर जितना मैं जानती हूं सब बता चुकी हूं

पर तुम्हे यकीन नहीं है बस इतना समझ लो सब नजरो का धोखा होता है पलक झपकी और काम तमाम माना हमाम में सब नंगे है पर अक्सर जैसा दीखता है होता नहीं जैसे की उस कमरे की परिस्तिथियों को देख कर तुमने समझ लिया हां हमारी बहस जरूर राणाजी से हो रही थी पर किसी दूसरे विषय में

और जिस अस्त व्यस्त हालात को देख कर जिस आसानी के साथ तुमने सोच लिया की मैं अपने ससुर का बिस्तर गर्म कर रही थी तो तुम्हे बता दू मेरे वहां जाने से पहले तुम्हारे पिता के साथ कोई और थी

राणाजी चाहते है की मै वसीयत को बदल दू वो मानते है कि इंद्र की तमाम प्रॉपर्टी मैं संभालू वो कहते है तुम्हारे लिए बहुत कुछ छोड़ के जायेंगे साथ ही वो ये भी चाहते है की तुम राणाजी के साथ उनका काम संभालो

मैं- मैं भी चाहता हु की आप प्रोपर्टी वापिस अपने नाम करवा ले

भाभी-क्या सच में हमे उन सब की जरूरत है नहीं बल्कि हमारी चिंता ये है कि तुम सुरक्षित रहो, आजकल तुम कहा रहते हो कहा नहीं तुम्हारी सुरक्षा में लगाये हमारे हर आदमी का कत्ल हो जाता है ये क्या छोटी बात है रात रात भर तुम गायब रहते हो भटकते हो जाने कहा आखिर ऐसा क्या हुआ है जो तुम इतना बदल गए हो

अब मैं भला क्या कहता मेरी जुबान पर तो पूजा की कसम ने ताला लगाया हुआ था कभी कभी लगता था की काश अगर पूजा ने कसम ना दी होती तो कभी का उसे उसकी हवेली ले जा पटका होता

भाभी- सुन रहे हो या मैं ऐसे ही चिल्ला रही हु

मैं- जी

भाभी- कुंदन खैर छोड़ो हमेशा की तरह तुम हमे बताने से तो रहे की आखिर वो कौन है जिसकी खातिर तुम हमसे बेगाने हो गए हो , पर अब जबकि इंद्र नहीं रहे तो क्या तुम राणाजी का साथ उनके कामो में दोगे

मैं- बिलकुल नहीं पर इस गांव की खुशहाली के लिए मुझसे जो होगा करूँगा

भाभी- मुझे भी ऐसा ही लगा था

मैं- कामिनी से मिलने अनपरा गया था मैं उसने कुछ बाते बतायी मुझको

भाभी- उसकी किसी भी बात पर विश्वास न करना बहुत मक्कार औरत है वो

मैं- मुझे आप पर विश्वास है भाभी पर एक बात जरूर पूछना चाहूंगा क्या राणाजी पद्मिनी को बहन समान मानते थे

भाभी- ये बहुत गूढ़ पहेलिया है रिश्तो की जिन्हें समझना हम जैसो के लिए आसान नहीं है वैसे भी उस समय मैं थी नहीं तो कुछ कह नहीं सकती माँ सा तुम्हे कुछ बता सकती है पर उनसे इस विषय में बात करना पुराने ज़ख्मो को कुरेदना है

मैं- तो कौन मेरी मंझधार में पड़ी नाव का खवैया बनेगा भाभी

वो- जब नाव तूफान में उतार ही दी है तो कर जाओ पर सुनो एक बात और कहनी थी अगर तुम चाहो तो चाची के साथ वक़्त गुज़ार सकते हो हमे कोई आपत्ति नहीं है

मैं- मैं आपके साथ वक़्त गुजारना ज्यादा पसंद करूँगा खैर सवाल तो बहुत लेके आया था पर कोई बात नहीं आज नहीं तो कल जवाब तलाश कर ही लूंगा खैर चलता हु अब ।

भाभी- अब इस समय कहा जा रहे हो रुको यही और फिर कुछ घंटों बाद सुबह हो ही जानी है

मैं- सब कुछ कैसे अचानक से कितना बदल गया ना भाभी

वो- सब नियति का खेल है

मैं- आप बार बार ऐसा क्यों कहते है की जो दीखता है वो होता नहीं

भाभी- जान जाओगे एक दिन, वैसे कल अगर तुम्हे कोई खास काम ना हो तो मेरे साथ चलना कही क्या पता तुम्हे तुम्हारे सवालो के जवाब मिल जाये पर अभी रात हुई सो जाओ

तो अगली सुबह करीब 10 बजे मैं भाभी के साथ गाड़ी में था पर जिस रास्ते पर गाडी चल रही थी मैं जल्दी ही समझ गया की मंजिल कहा है, हम लाल मंदिर जा रहे थे जब हम वहाँ पहुचे तो हमेशा की तरह वहाँ पर इक्का दुक्का लोग ही थे

हम उस मैदान के बीच से गुजरे जो मेरी कहानी भी आने जाने वालों को सुनाया करता था मैंने उस संगमरमर के पत्थर में वो ही दोनों तलवारे देखी पर भाभी बिना उनकी ओर देखे आगे बढ़ती रही और उस पानी की बावड़ी के पास जाकर रुक गयी

भाभी- जैसा की तुम यहाँ पहले भी आ चुके हो और काफी कुछ जानते भी होंगे यहाँ के बारे में पर फिर भी मैं तुम्हे यहाँ लेके आयी जानते हो क्यों

मैं- पता नहीं

भाभी- इस बावड़ी को दोनों ठाकुरो ने अपने हाथों से बनाया था लोग कहते है 11 दिन में इस को खोद दिया था पर जरुरी ये है की तुम इस बावड़ी को देख कर क्या सोचते हो

मैं- बस इतना की खारी बावड़ी जैसी ही है ये

भाभी- पहुचे हुए हो तुम भी, पर गौर तो करो जरा

मैं- देख लिया जो देखना था

भाभी- अगर मैं कह की अनमोल खजाने का रहस्य इस बावड़ी में ही है कही

मैं- मुझे क्या लेना देना है खजाने से

भाभी-किसी और को तो होगा

मैं- आपको चाहत है खजाने की

भाभी- उसके वारिस को तो होगी

मैं- पर खजाना तो खारी बावड़ी में है ना

भाभी- किसने कहा तुमसे

मैं- मैंने तो यही सोचा था

 
भाभी- छलावा समझते हो तुम्हे देख कर मुझे लगता है की अब तक तुम सच के करीब तो क्या उसके रास्ते पर भी चलने लायक नहीं हुए हो

मैं- कहना क्या चाहती है आप

भाभी- की खजाना इस बावड़ी में दफन है अगर तुम चाहो तो उसकी तलाश कर सकते हो

मैं- पर मुझे क्या मोह है खजाने का अगर यहाँ है तो रहने दीजिए मुझे इस चक्कर में नहीं पड़ना है मेरी और भी उलझने है

भाभी- मैं तुम्हे ये नहीं कह रही की तुम ले जाओ खजाने को मैं बस देखना चाहती हु की तुम उसके वारिस हो या नहीं

मैं- इतनी सी बात के लिए आप मुझे यहाँ ले आयी हो

भाभी- इतनी सी बात कहा है

मैं- क्यों इतनी पहेलिया बुझाती हो

भाभी- मोहब्बत जो होती है ना वो ही सबसे बड़ी बात होती है तुम्हे लाने का मकसद है तुम्हे अनदेखे सच से रूबरू करवाने का ,देखो और बताओ इस जगह में तुम्हे क्या दिखाई देता है

मैं- कुछ नहीं

भाभी- सही कहा कुछ भी तो नहीं पर फिर भी अपने अंदर इतिहास समेटे हुए है जिसका एक हिस्सा अब तुम भी हो

मैं- कुछ समझा नहीं

भाभी- समझ जाओगे, देखो बरसो पहले लाल मन्दिर की बहुत मान्यता थी हर साल यहाँ मेला लगता था खूब रौनक होती थी ना जाने कितने लोग अपनी अरदास लेकर आते पर यहाँ एक बात और थी की लोग इसे न्यायालय भी समझते थे यहाँ परख होती थी चुनोती क

खैर,ये सब तो तुम्हे पता होगा ही की ना जाने कितनी कहानिया इस जगह से जुडी है तो एक कहानी ऐसी ही है जिसके दो पात्र है मेनका और ।।।।

मैं- और

भाभी- ठाकुर हुकुम सिंह

मैंने भाभी की ओर देखा

भाभी- हां ठीक सुना तुमने मेनका और राणा हुकुम सिंह तो कुंदन ये उन दिनों की बात है जब राणाजी एक नोजवान थे और मेनका भी अल्हड मस्तानी थी ठाकुर साब अक्सर इस तरफ आते थे और मेनका का डेरा भी कुछ दूरी पर ही था

इतेफाक देखो जब राणाजी इस तरफ से गुजरते तभी मेनका भी पानी भरने आती तो पता नहीं कब दोनों की आँखे चार हो गयी अब इश्क़ कहो या जवानी कहा ज़माने की ऊंच नीच को देखते है दोनों कब एक दूसरे के कितने करीब आ गए की बात कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गए

साथ जीने मरने की कसमें खायी जाने लगी सब ठीक चल रहा था पर राणाजी ने मेनका को ये नहीं बताया था की उनका विवाह हो चूका है और उनका एक लड़का भी है इधर मेनका की आँखों में वो सपने सजने लगे थे जो शायद उसकी औकात से बाहर के थे

मेनका टूट कर चाहने लगी थी राणाजी को और राणाजी के मन की बात का उसे पता उस दिन चला जब मेनका गर्भवती हो गयी वो खुश थी की पेट में आयी सौगात उसके जीवन में ख़ुशी भर देगी पर उसे अंदाजा नहीं था की आगे क्या होगा उसके साथ

जब उसने राणाजी को ये खुशखबरी सुनाई तो राणाजी ने उस से पल्ला झाड़ लिया और बदले में उसे पैसे और तमाम चीज़े देने की कोशिश की मेनका तो सकते में आ गयी जिस इंसान को वो अपना सब कुछ मान चुकी थी उसने उसे बीच राह धोखा दे दिया था

राणाजी के लिए मेनका बस एक खिलौना थी जिस से उन्होंने खेला और फिर फेक दिया पर मेनका ने दिल से चाहा था राणाजी को ,पर समय का फेर अब वो अपना दुःख बताये तो किसे और कौन विश्वास करता उस पर तो जल्दी ही उसके गर्भवती होने की खबर डेरे में भी पता चल गयी

एक कुंवारी लड़की का इस हाल में होना हमेशा से ही मुसीबत भरा रहा है पर मेनका के लिए वो वक़्त बहुत मुश्किल था उसे डेरे से निकाल दिया गया जब उसे जबसे ज्यादा अपनों की जरुरत थी तब उसे उसके परिवार ने उसे दुत्कार दिया और राणाजी तो पहले ही उसके साथ दगा कर चुके थे

दुखो के पहाड़ को सर पर उठाये मेनका ने हार नहीं मानी और ज़िन्दगी के टूटे सिरो को फिर से जोड़ने की कोशिश की पर पेट में पल रही उसके प्यार की निशानी की चिंता उसे पल पल सताती थी और एक बेसहारा मजलूम औरत कर भी तो क्या सकती थी

पर उसने हार नहीं मानी पर ज़िन्दगी ने सोच लिया था उसे हराने का नियत समय पर उसने एक संतान को जन्म दिया और प्रसूति अवस्था में ही वो चल बसी ,तो कुंदन ये इसी जगह से जुडी एक कहानी है जो वक़्त की रेत में कही खो गयी

मैं- पर भाभी आपने ये कहानी मुझे क्यों बतायी

भाभी-मैंने सोचा तुम्हे पता होनी चाहिए क्योंकि बुराई को अगर कुछ हरा सकता है तो सिर्फ अच्छाई, ज़िन्दगी में कितने ही पल हम गुस्सा करते है हमे कुछ कमजोर लम्हो में लगता है की कुछ कर जाये पर अगर हम तसल्ली से सोचे तो कुछ हल निकल ही आता है

मैं-कभी कभी मैं सोचता हु आप किस मिटटी की बनी है भाभी

भाभी- उस मिटटी की जिसके तुम बने हो, खैर आओ तुम्हे कुछ ऐसा दिखाती हु जो शायद तुम्हारी कल्पना से परे है

मैं- क्या भाभी

भाभी में बिना मेरे

भाभी ने अपना हाथ बावड़ी के पानी की ओर किया और जैसे ही रक्त ने पानी को महसूस किया पानी सूखने लगा और धीरे धीरे गायब हो गया और नीचे की गीली मिट्टी फटने लगी और उसके बाद जो मैंने देखा आँखों ने होने से मना कर दिया

 
मेरे सामने अकूत दौलत थी इतना सोना चांदी आभूषण और पता नहीं क्या क्या था पर वो नजारा कुछ सेकंड ही रहा और फिर सब पहले जैसा हो गया मैं हैरत से कभी बावड़ी को देखु कभी भाभी को

भाभी- आओ माता के दर्शन करले फिर घर चलते है

मैं- कैसे किया आपने

वो- मैं मालकिन हु इस खजाने की

मैं- कैसे

भाभी-जैसे तुम हो

कहाँ मैं पूजा को रहस्यमयी कहता था और भाभी ने जो आज किया था मेरा सर चकरा गया था खैर हमने माता के दर्शन किये पर मेरे चेहरे पर हवाइयां उडी हुई थी मैंने भाभी का हाथ पकड़ लिया

मैं- कही मुझसे ऐसा कुछ तो नहीं हुआ न की मुझे उसका अफ़सोस हो

भाभी- अभी तक तो नहीं आगे का पता नहीं

मैं- मुझे पार लगा दो भाभी

भाभी- ज़िन्दगी की जंग सबको खुद लड़नी पड़ती है कुंदन

मैं- सहारा बनो आप मेरी मदद नहीं करोगी तो कौन करेगा

भाभी- और मेरी मदद कौन करेगा क्या तुम करोगे

मैं- आपके एक इशारे पे प्राणों को त्याग दू आप कहिये तो सही

भाभी- तो वचन दो की जब जीवन में ऐसा समय आएगा की तुम्हारे मन में द्वन्द हो, जब आसमान में ढलते सूर्य की लाली होगी और चंद्र किरने बाहे फैलाये स्वागत करेंगी,जब आँखों में आंसू होंगे और दिल में दर्द जब तुम्हारे हाथ कांपेंगे और इरादे कमजोर तब तुम सत्य का चुनाव नहीं बल्कि अपनी अंतरात्मा का कहा मानोगे

जब जीवन में अपने पराये का भेद मिट जाएगा जब रक्त रक्त की प्यास बुझायेगा जब ना प्रेम होगा न अहंकार जब ना कोई आस होगी ना कोई विश्वास जब हर बंधन टूटेगा तो तुम अपने मन की आवाज सुनोगे वचन दो।

मैं- वचन दिया भाभी आपको माँ दुर्गा सामान साक्षी मान कर वचन दिया

भाभी- मैं जानती हूं तुम इस वचन के साथ ही साथ मेरा मान भी रखोगे

मैं- भाभी, पर आपने ये कैसे किया मेरा मतलब खजाना कैसे पहचानता है आपको

भाभी- कुंदन ये एक बहुत जटिल व्यवस्था है जो सिर्फ इसलिए की गयी थी ताकि खजाना खाली उसके असली हक़दार को ही मिले और ये जो तुमने अभी देखा ये। सुरक्षा का प्रथम चरण है खून की पहचान

मैं- पर आपका खून कैसे , आप अर्जुनगढ़ से कैसे जुडी है

भाभी- नहीं मैं अर्जुनगढ़ से बिलकुल नहीं जुडी हु

मैं- तो फिर कैसे

भाभी- जवाब तुम्हारे पास ही है झाँक कर देखो अपने मन में, खैर , मैं बस तुम्हे परख रही थी और उम्मीद करती हूं कि इस खजाने का लालच तुम न करो क्योंकि असल में इसका कोई वारिस है ही नहीं कमसे कम फ़िलहाल जो लोग इसके बारे में जानते है

" क्योंकि जहाँ तक मैं जानती हूं पद्मिनी ने नाहरवीरो को परास्त करके इसे अपने पति और राणाजी के लिए उठाया था , और फिर पद्मिनी ने ही उन दोनों से इसे बचाने के लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार की ,जिसमे दोनों ठाकुर ही चाह कर भी इसे कभी हासिल न कर सके"

" परन्तु तंत्र के कुछ अकाट्य नियम होते है जिनके अनुसार जो किसी विद्या या धन का संचरण करले तो वो उसका हो जाता है जैसे इस मामले में सब कुछ पद्मिनी का हो गया और उसके जरिये दोनों ठाकुरो का और यही बात अटक गयी है"

मैं- कैसे

भाभी- तंत्र की एक जटिल शाखा जिसके अनुसार खजाना स्वतन्त्र है अपना वारिस चुनने को मतलब पद्मिनी ने ऐसी व्यवस्था की है जिसके अनुसार जो भी असली वारिस है वो एक कीमत चूका कर ही इसको प्राप्त कर पायेगा

मैं- और ये कीमत क्या होगी

भाभी- ये राज़ बस राणाजी ही जानते है

मैं- परन्तु इन सब में आप कहाँ फिट होती है मतलब आपका अर्जुनगढ़ से कोई संबंध नहीं और देवगढ़ की बहू है आप तो आपको कैसे पहचानता है ये खजाना

भाभी- मैं खजाने की प्रथम प्रहरी हु राणाजी समझ गए थे इस बात को इसलिए ही मेरा विवाह इंद्र के साथ हुआ

मैं- पर आप कैसे ये बताइये

वो- मुझ पर कुछ अहसान थे पद्मिनी के शायद इसलिए

मैं- तो आप जानती है उन्हें

वो- हां ,पर वो कोई खास वजह नहीं थी

मैं- तो आप ये भी जानती होंगी की अब भी खारी बावड़ी में उनकी मौजूदगी है

भाभी- ऐसा नहीं हो सकता है

मैं- क्यों

वो- वो मुक्त हो गयी थी

मैं- तो फिर ।।।।।।

भाभी- जानते हो कुंदन दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति क्या होती है मैं तुम्हे बताती हु, वो शक्ति है प्रेम हर चीज़ का आदि से अंत तक बस प्रेम है हम लाख बुरे हो अच्छे वो पर प्रेम कही ना कही किसी न किसी रूप में मौजूद अवश्य रहता है अगर ये बात समझ लो तो बाकी जीवन बेहतर तरीके से कट जाता है

मैं- आप राणाजी का षोषण क्यों सहती है

भाभी- सही समय पर ये भी जान जाओगे तुम

मैं- अगर आप चाहे तो मेरे साथ आ सकती है कुंदन इस काबिल है कि अपनी भाभी को मान सम्मान से रख सके

भाभी- जानते है

मैं- तो फिर क्यों हो राणाजी के साथ

वो- जान जाओगे जल्दी ही जान जाओगे खैर शाम ढल रही है हमे घर के लिए निकलना चाहिए

मैं- नहीं मुझे कुछ और देर रुकना है

मैं उठा और चलते चलते उस संगमरमर के पत्थर के पास पहुच गया

मैं- भाभी किसी ने बताया था कि आपको तलवार बाजी बहुत बढ़िया आती है

भाभी- बरसो से मैंने तलवार को छुआ भी नहीं है

मैं- आओ जरा

भाभी- रहने दो

मैं- आओ न

भाभी- कुंदन मेरे हाथ में तलवार आते ही खून मांगती है रहने दो चोट लग जाएगी

मैं- कुंदन को इतना कम भी मत आंकिये सरकार

भाभी- चलो अगर तुम्हारी ये ही आरज़ू है तो ये ही सही

भाभी ने उन दोनो तलवारो में से एक खींच ली मैंने भी उठा ली

भाभी- चोट लग गयी तो मुझे दोष तो नहीं दोगे न

मैं- छू कर तो दिखाइये पहले

भाभी- जैसा तुम चाहो देवर जी

 
मेरी नजर भाभी की आँखों पर टिकी थी पर ना जाने कब भाभी की तलवार चली और मेरी शर्ट को आधी काट ते हुए उनकी तलवार की नोक मेरे सीने के दायीं तरफ ज़ख्म बनाती चली गयी

और मैं हैरान परेशान ये क्या किया भाभी ने पर जल्दी ही सम्भला और हमारी तलवारो की टंकार उस बियाबान में गूँज गयी इतनी फुर्ती इतनी चपलता इतनी शक्ति भाभी जैसे जस्सी न होकर कोई और ही थी जितना मैं उनके वार को बचाने की कोशिश करता उतना ही वो आक्रामक होने लगी थी

भाभी- क्या हुआ देवर जी हाथो को जंग लग गया क्या

मैं बस मुस्कुरा दिया असल में मैं हैरान था भाभी बस मुझसे किसी खिलौने की तरह खेल रही थी करीब दस पंद्रह मिनट में ही भाभी की तलवार में मेरे बदन पर हलके हलके चीरे लगा दिए थे फिर उन्होंने अपना हाथ रोक लिया

भाभी- लगी तो नहीं

मैं- नहीं ठीक हु

भाभी- ठकुराइन जसप्रीत के हाथ में फिर कभी गलती से भी तलवार न देना

मैं- नहीं दूंगा, पर जब आप इस कदर शक्तिशाली है तो राणाजी के आगे क्यों बेबस है

भाभी- वो मेरी मर्ज़ी है

मैं- पर क्यों मुझे जानना है

भाभी- तो जाओ अपने पिता से जान लो मैंने कब रोका है

मैं- जरूर पूछुंगा पर पहले मुझे एक काम और करना है

भाभी- क्या

मैं- मैं भी नहीं बताऊंगा

भाभी- बस अपना ख्याल रखना सुरक्षित रहना

मैं-हां

उसके बाद हम घर आये मैंने अपने ज़ख्मो पर हलकी फुलकी दवाई लगायी कपडे बदले और भाभी के कमरे में गया तो वो कपडे बदल रही थी मैं दरवाजे से ही मुड़ने लगा

भाभी- आ जाओ वैसे भी अब क्या है छुपाने को

मैं- जा रहा था सोचा आपको बता दू

भाभी- अभी रुको हमे अच्छा लगेगा

मैं- पर मुझे आपकी आदत हो जायेगी

भाभी अपने ब्लाउज़ को सही करते हुए आयी और अपनी छातियों को मेरे सीने से रगड़ते हुए बोली- तो आदत डाल लो देवर जी

मैं- देख लो फिर ना कहना

वो- क्या देखना क्या सुनना

पता नही कब मेरा हाथ भाभी ने नितम्ब पर आ गया मैंने उसे हल्का सा दबाया और धीरे धीरे भाभी की सुराही दार गर्दन को चूमने लगा मेरे लण्ड में सुरसुराहट होने लगी जिसे भाभी अपनी चूत पे महसूस करने लगी थी मैंने भाभी के गाल के निचले हिस्से को चूमा

और भाभी को खुद से अलग कर दिया और बोला- इतने करीब न आया करो कही मैं बेकाबू हो गया तो आफत हो जायेगी

भाभी- वो भी देखेंगे पर एक बात पूछना भूल गयी थी अभी याद आयी

मैं- क्या

भाभी- जाहरवीर जी का धागा उस दिन तुम्हारे हाथ में किसने बाँधा था हमारे अलावा

मैं- जाने दो न क्या फर्क पड़ता है

भाभी- फर्क पड़ता है क्योंकि सिर्फ एक सुहागन ही उस धागे का उपयोग कर सकती है

और जैसे ही भाभी की बात का मतलब मुझे समझ आया मैं हिल गया बुरी तरह से

मैंने भाभी को अपनी बाहों के घेरे से आजाद किया और तुरंत ही दरवाजे की तरफ चल दिया की भाभी पीछे से बोली- क्या हुआ देवर जी बड़ी जल्दी लग गयी

मैं- एक काम याद आ गया भाभी पर जल्दी ही मिलता हु

मैं भाभी के कमरे से निकला और नीचे आ रहा था कि सीढियो पर चाची मिल गयी

चाची- अरे कुंदन, कहा रहता है आजकल मिलता ही नहीं देख तेरे बिना कैसे सूख कर काँटा हो गयी हु कुछ तो देख मेरी तरफ

मैं- चाची अभी बहुत जल्दी में हु कल मिलता हु

पर चाची ने मेरा रस्ता रोक लिया

चाची- कोई और मिल गयी या मन भर गया मुझसे

मैं- ये बात नहीं है चाची पर अभी एक बेहद जरुरी काम है मुझे

चाची- मुझसे भी ज्यादा जरुरी देख तो सही कितनी गीली हुई पड़ी हु तेरे लिए

मैं- समझती क्यों नहीं तुम, अभी जाना बहुत जरुरी है थोड़ा टाइम मिलने दे तेरा काम भी कर दूंगा

चाची- चल ठीक है इंतज़ार करुँगी तेरा पर इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा

मैं- पक्का

जैसे ही चाची से पीछा छुड़ाया राणाजी सामने मिल गयी

राणाजी- कुंदन,मुझे और बहू को कुछ काम से दिल्ली जाना है कल सुबह की ट्रेन से मुनीम जी कही बाहर गए है तो तुम सुबह हमे स्टेशन छोड़ आना

मैं- किसलिए जाना है

राणाजी- इंद्र की पत्नी होने के नाते जसप्रीत को सरकार से कुछ सहूलियते और मुआवजा मिलना है तो कागज़ी कार्यवाही होनी है

मैं- तो ठीक है पर भाभी के साथ मैं जाऊंगा

 
राणाजी ने गौर से मुझे देखा और बोले- बढ़िया इसी बहाने कुछ तो जिम्मेदारी संभालोगे जाओ अपना सामान बाँध लो

मैं अपने कमरे में आया अलमारी से कुछ सामान निकाल रहा था कि भाभी कमरे में आयी और बोली- गए नहीं अभी तक

मैं- नहीं अब मैं आपके साथ दिल्ली चल रहा हु

भाभी- और राणाजी

मैं- अजी कुछ वक़्त हमे भी दीजिये

भाभी- तुम कहो तो जान दे दू देवर जी वक़्त क्या चीज़ है पर अब यही हो तो खाना ले आउ

मैं- हां

भाभी- वैसे तुम साथ क्यों आ रहे हो तुम्हे लगता है कि कही राणाजी भाभी के साथ

मैं- हां, मुझे जलन होती है इस बात से

भाभी- क्यों होती है

मैं- पता नहीं क्यों

भाभी- प्यार तो नहीं करने लगे हो मुझसे

मैं- दोस्त भी है हम है ना

भाभी- आओ खाना खाते है

उसके बाद हमने खाना खाया कुछ देर फिर भाभी माँ सा के कमरे में चली गई करीब घंटे भर बाद वो मेरे कमरे में आ गयी

मैं- सोयी नहीं अभी तक

वो- तुम भी तो जागे हो

मैं- बस ऐसे ही

वो- याद आ रही थी किसी की

मैं- क्या फर्क पड़ता है सो जाओ सुबह जल्दी निकलना है

भाभी- एक बात पुछु

मैं- जरूर

भाभी- क्या तुम्हे लगता है राणाजी ने किसी से बेइंतेहा इश्क़ किया होगा

मैं- नहीं

भाभी- तुमने इश्क़ किया है

मैं- पता नहीं पर आप भाई से प्यार करती थी ना

भाभी- हां भी और ना भी

मैं- चारो तरफ इतनी ज़िन्दगानिया बिखरी पड़ी है इन सब में मैं क्यों उलझ गया

भाभी- तक़दीर है तुम्हारी

मैं- हो सकता है अब देखो न आपका और मेरा रिश्ता ही बहुत ज्यादा बदल गया है

भाभी- कुछ भी तो नहीं बदला है

मैं- अब मैं आपको छू सकता हु भाभी

भाभी- और हमने भी कहा था न की हमारे घाघरे का नाड़ा इतनी आसानी से नहीं खुलेगा

मै- और अगर मैं चाहू तो

भाभी- हम तो तुम्हारे ही है पहले भी और अब भी

मैं- आप हमेशा दोनों तरफ की बाते करती हो भाभी ये ठीक नहीं है

भाभी- क्या गलत कहा हमने

मैं- पहले आप अलग थी मेरे लिए पर कुछ दिनों से मैं बस एक औरत के रूप में देखता हूं आपको

भाभी- तो क्या मुझे पाने को जी चाहता है

मैं- क्या शारीरिक संबंध बनाना ही किसी को पा लेना होता है

भाभी- ज्यादातर मर्द तो ऐसा ही समझते है

मैं- आप क्या समझती हो

वो- कुछ नहीं

मैं- समझती तो हो और बता नहीं रही

भाभी- इश्क़ कर लो बरखुरदार खुद समझ जाओगे

मैं- चलो ऐसा ही सही वैसे आप कामिनी को जानती हो ना

भाभी- 36 का आंकड़ा है मेरा और उसका एक बार धर दिए थे मैंने दो चार उसके

मैं- पर बात तो बड़े सलीके से कर रही थी

भाभी- यही दुनिया दारी का हिसाब है अब सो भी जाओ मुझे नींद आ रही है

जैसे ही भाभी लेटी मैंने एक कम्बल लिया और उनके पास लेट गया

भाभी- आराम से सोना

मैं- कोशिश करूँगा वैसे आपने जब जोर देकर डोरे वाली बात की थी मैं आपका ताना समझ गया

भाभी- तो क्या गलत कहा मैंने

मैं- नहीं कुछ गलत नहीं

भाभी- तो ब्याह रचा लिया क्या तुमने या तुम्हारी वाली ने

मैं- ऐसा ही समझ लो

 
मैंने भाभी के आगे झूठ तो बोल दिया था पर दिल बहुत तेजी से धड़कने लगा था मेरा इस सवाल ने टेंशन दे दी थी पर जवाब अब दिल्ली से आने के बाद ही मिलना था तब तक एक उधेड़बुन सी लगी रहनी थी

भाभी- क्या सोचने लगे

मैं- कुछ नहीं

भाभी- तो जब ब्याह रचा ही लिया है तो मिलवाओ हमारी देवरानी से

मैं- दिल्ली से आते ही पक्का वादा करता हु

भाभी- ह्म्म्म

मैं- पर वो आप जितनी खूबसूरत नहीं है

भाभी- सीरत देखिये देवर जी सूरत का क्या

मैं- सीरत देख कर ही तो उसे चुना है पर भाभी एक पेंच है

भाभी-क्या

मैं- मेरा मन दो हिस्सों में बंटा हुआ है

भाभी- समझी नहीं

मैं- मैं भी नहीं समझा आजतक

मैं भाभी से चिपक गया और सोने की कोशिश करने लगा पर बार बार आँखों के सामने पूजा का मुस्कुराता हुआ चेहरा आ जाता और साथ ही भाभी के वो शब्द की जाहरवीर जी का धागा केवल सुहागन ही उठा सकती है

न जाने कौन से घडी में मैं इन सब बातों में उलझ गया था अच्छा खासा जी रहा था मैंने एक नजर भाभी पर डाली जो बेसुध सो रही थी दिल किया कि चोद दू इसको पर भाभी की नजरों में गिरना नहीं चाहता था

बहुत सोचने के बाद मैंने फैसला किया की भाभी के अतीत को भी खंगाला जाये पर उससे पहले मेरा पूजा से मिलना बहुत जरुरी था अब उसके और मेरे बीच दो तीन दिन का फासला जो था

रात कुछ बातो कुछ यादो कुछ अधूरी हसरतो और कुछ सवालों के साथ कटी जैसे तैसे इस उम्मीद में की आने वाला कल अपना होगा जहा सब कुछ ठीक होगा थोडा सुख होगा और जिंदगी अपनी बाह फैलाये थाम लेगी मुझे खैर, सुबह हम लोग निकल पड़े दिल्ली के लिए भाभी के साथ मैं आज इस हलकी सी सर्द सुबह में कुछ रवानी सा महसूस कर रहा था मेरी धड़कने बढ़ी हुई सी थी .

ये सुबह बहुत अलग सी थी ये हवा के झोंके ये बदलता मौसम ये रवानी और ये सुलगती जवानी हर चीज़ अपने आप में एक कहानी छुपाये हुई थी और मेरा दिल खुद को टुकडो में बंटा हुआ था इस समय एक तरफ भाभी थी मेरी सबसे प्यारी दोस्त और दूसरी तरफ खड़ी थी पूजा जो मेरी जिंदगी की वो बंद किताब थी जिसे अब खोलने का वक़्त आ गया था .

हलकी सी अंगड़ाई लेते हुए मैंने उनके तने हुये बोबो को निहारा तो भाभी बस हंस पड़ी, पकड़ जो लिया था मेरी नजरो को उन्होंने आखिर मेरे इस मुहाजिर मन को हो क्या रहा था आखिर ये क्यों भाभी की तरफ खींचा चला जा रहा था जबकि मेरी मंजिल कही और मेरा इंतजार कर रही थी अपने सर को खिड़की पर टिकाये मैं अपन विचारो में बहुत खो गया था .

न जाने कब भाभी ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया पर जब त्न्र्दा टूटी तो उनको बस अपने आप को ही देखते पाया

मैं- क्या हुआ भाभी

वो- कुछ नहीं

मैं- ऐसे क्या देखते हो

वो- आँखों की गुस्ताखिया है देवर जी

मैं- आप कब से गुस्ताख होने लगी

वो- हम नहीं बस आँखे

मैं-राणाजी ने ये ठीक किया जो पर्सनल केबिन की व्यवस्था करवादी

वो- शायद वो चाहते होंगे की आप हमारे और करीब आ सके इसी बहाने से

मैं- शायद वो अपने लिए सहूलियत चाहते होंगे आखिर पहले आपके साथ आने का उनका ही विचार जो था

भाभी- जो आप ठीक समझे

मैं- काश मैं इन सब में नहीं उलझता तो ठीक रहता सब कितना अच्छा था

वो- नियति फिर भी तुम्हे ले आती

मैं- सही कहा नियति से कौन भाग पाया है पर आखिर मेरी तकदीर में लिखा क्या है

भाभी- ये तो विधाता ही जाने

मैं- क्या आप मेरे साथ है

वो- अंतिम साँस तक

मैं- आप बहुत प्यारी है भाभी

वो- पता है

मैं- कभी कभी जब आप मेरे पास होती है तो खुद को रोक पाना बहुत मुश्किल होता है

वो- किस लिए रोकते हो खुद को फिर

मैं- डर लगता है किसी की नजरो में गिरने का डर है शर्मिंदा होने का

वो- अगर मन में मैल ना हो तो फिर कैसा डर

मैं- डर है भाभी, क्योंकि हक़ नहीं है

भाभी- हक बहुत ही विचित्र शब्द है जिसका होता है उसे मिलता नहीं और जिसका नहीं होता उसकी मिलकियत बन जाता है

मैं- पर फिर भी मेरा डर ही ठीक है

भाभी- कब तक डर के जियोगे

 
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