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दूसरी ओर तान्या बिट्टू से बहुत खिजी हुई थी. उसको ज़्यादा बोलने वाले लड़के बिल्कुल पसंद नही थे और उपर से बिट्टू उसको बहुत इरिटेटिंग लगता था. वो इतना कूल बनता था जबकि था एक बड़ा फूल. जब भी वो उससे देखती, गुस्से से आग बाबूला हो जाती. उसका बस चलता तो ऐसे इंसानों को पैदा होने से पहले ही मार डालती. वो अपनी ही धुन में खोई हुई चल रही थी कि पीछे से उससे किसी ने आवाज़ मार. पीछे मूडी तो देखा के दिया है.
"हाई तान्या. क्या हाल.. वॉट आ प्लेज़ेंट सर्प्राइज़"
"मुझे देख कर सर्प्राइज़.. वेट टिल यू सी युवर आशिक़"
"डोंट टेल मी... बिट्टू भी इसी कॉलेज में है.."
"हां.. सुबह से 3 बार तुम्हारे बारे में पूछ चुका है... मैं तो हैरान हूँ कि अभी तक तुमसे मिला नही"
"ढूँढ तो मैं भी उसे रही थी.. फिर मुझे लगा शायद इस कॉलेज में नही होगा"
"डोंट टेल मी दिया... तुम कैसे उसे अपना दिमाग़ खाने देना चाहती हो.."
"बस ऐसा ही है... और बताओ.. तुम्हें कहीं ड्रॉप कर दूं..."
"हां प्ल्ज़, मुझे लॅडीस हॉस्टिल ड्रॉप कर दो" तान्या ने कहा और दिया के पीछे पीछे उसकी कार की तरफ चली गयी
वापस हॉस्टिल जाते हुए बिट्टू को फिर से रोहित दिखा. बिट्टू उसके पास गया और साथ साथ वो दोनो हॉस्टिल चलने लगे. उनके साथ एक और बंदा था जिस से रोहित नोन स्टॉप किसी सब्जेक्ट के बारे में बात कर रहा था. "कैसे लोग है यार यह.. कॉलेज में पढ़ कर मॅन नही भरा तो अब भी पढ़ाई की बात कर रहे हैं" उसने सोचा.. सारा रास्ता बिट्टू चुप रहा. जो रास्ता सुबह जल्दी से कट गया था, वो उसको जीटी रोड जैसा लग रहा था अब.. ऐसा लग रहा था कि घंटों से चल रहा है पर हॉस्टिल नही आ रहा था. उपर से रोहित और जॅक की बकवास. जैसे ही हॉस्टिल आया और जॅक अपने रूम की तरफ बढ़ा, बिट्टू ने रोहित का हाथ पकड़ लिया. "रोहित यार मेरे रूम में आ. तुझसे बहुत इंपॉर्टेंट बात करनी है" उससे कहा और उसको खीच के अपने रूम में ले गया.
रोहित हैरान था कि ऐसी कौन सी बात करनी है बिट्टू को. फिर उसको लगा कि शायद कल रात के बारे में बात करनी हो. उसने पहले ही सोच लिया था कि सारा ब्लेम गांजे पे डाल देगा. रूम के अंदर पहुँच कर बिट्टू ने अंदर से रूम लॉक कर दिया
"बिट्टू तुम मेरा रेप तो नही करने वाले ना"
"अबे तुझे मैं गे लगता हूँ? और वैसे भी रोहित नाम वाले लोग गे होते हैं. चल उधर बैठ जा" कहते हुए बिट्टू कुर्सी पर बैठ गया. "यार कल रात जो मैने देखा, मुझे नहीं लगता कि वो गांजे का असर था."
"अबे पागल हो गया है क्या तू. तुझे क्या लगता है कि मैं सच मुच उड़ सकता हूँ?"
"हां मुझे यही लगता है. और यह भी लगता है कि तुम उड़ने की ही प्रॅक्टीस कर रहे थे जब मैं उपर आया. यार मैं शकल से मूरख लगता होऊँगा, हूँ नहीं."
"यार कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा है यार. तुझे कैसे लग सकता है कि मैं कुछ ऐसा कर सकता हूँ जो और कोई इंसान नही कर सकता"
"क्यूंकी मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ"
"क्या बकवास कर रहा है" रोहित ने हैरानी से पूछा
जवाब में बिट्टू ने टेबल से चाकू उठाया और अपनी एक उंगली के आगे का छोटा सा हिस्सा काट दिया. देखते ही देखते उंगली में से खून निकलने लगा. 2-3 सेक बहने के बाद रोहित ने देखा कि बिट्टू की उंगली का घाव अपने आप ठीक हो गया और वो उंगली बिल्कुल पहले जैसी हो गयी. हैरानी में रोहित का मूह खुले का खुला रह गया. "यह देखकर तुझे लग गया होगा कि तू अकेला इंसान नही है जो स्पेशल है. प्लीज़ यार. एक दोस्त होने की हैसियत से बता दे. मैं सच हूँ या ग़लत"
"यह क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है मुझे कुछ नही पता बिट्टू.. तुम्हारा घाव ठीक कैसे हो गया?"
"बात को बदल मत रोहित"
"मुझे नहीं पता कि मैं उड़ सकता हूँ कि नहीं. पर हां.. मुझे यह लगता ज़रूर है कि मैं उड़ सकता हूँ"
"आज रात को 9 बजे छत पे मिलते हैं. लेट्स सी अगर हम तेरी पवर को डेवेलप कर पायें" बिट्टू ने एक लंबी सास छोड़ते हुए बोला
दिया को रात में नींद नही आई. वो बस करवटें बदलते बदलते बिट्टू के बारे में सोच रही थी. इतने बड़े टोरोंटो में, वो दोनो एक ही कॉलेज में है, ऐसा कोयिन्सिडेन्स तो नही हो सकता. शायद भगवान चाहता ही था कि वो और बिट्टू भी एक दूसरे से मिले. उसने सोचा कि कल जाते ही सबसे पहले बिट्टू को ढूँढेगी कॉलेज में.
"बेटा खाने के लिए आ जाओ"
"हां माँ आई" दिया ने बोला और झट से नीचे पहुँच गयी
"बेटे कैसा गया पहला दिन कॉलेज में" खाने की टेबल पर उसके पापा ने पूछा
"ठीक गया पापा."
"बेटा एक बात पूछूँ.. जब से तुम वापस आई हो, इतना गुम्सुम क्यूँ रहती हो.. आज भी कॉलेज से आ कर सीधा अपने रूम में चली गयी...सब ठीक तो है ना"
"पापा मैं आप लोगों को 10 बार कह चुकी हूँ कि सब ठीक है. क्यूँ दिन रात एक ही बात के पीछे पड़े रहते हो. क्या ज़रूरी है कि कुछ हुआ हो तभी मैं यहाँ आई हूँ?"
"बेटा इस तरह से सब छोड़ छाड़ के आ जाना तो सब ठीक होने की तरफ इशारा नही करता"
"क्यूँ एक बात के पीछे पड़े हुए हो... बोल दिया कि नहीं है तो नहीं है कोई प्राब्लम" दिया ज़ोर से चीखी और खाना छोड़ कर उपर चली गयी.
"अर्रे बेटा खाना तो खा ले. ऐसे क्यूँ नाराज़ होती है" उसके पापा ने पीछे से बोला. "अर्रे यह बत्ती को क्या हो गया... लगता है फ्यूज़ उड़ गया... अब खाने के बाद फ्यूज़ ठीक करना पड़ेगा"
दिया अपने रूम में गयी और अपने पलंग पर लेट गयी... उसके माँ बाप बार बार उसको वो रात याद दिलाते थे. वो ना चाहते हुए भी फिर उस डर और असहयता को एक्सपीरियेन्स करती थी. पहले तो उसको करेंट के झटके भी लगते थे, पर अब उसने उनको कंट्रोल करना सीख लिया था. लेकिन हर बार उसको अपनी पवर किसी चीज़ पे कॉन्सेंट्रेट करनी पड़ती थी. अभी कल प्लॅंट्स में आग लग गयी थी और आज फ्यूज़ पिघल गया. यह क्यूँ हो रहा है उसको नही पता था. पर जब भी उसके अंदर करेंट पैदा होता और वो उसे बाहर फेंकती तो उसको एक अच्छी सी पवर का एहसास होता. उसको लगता कि वो अब उतनी असहाय नही है जितनी उस रात थी. बस वो यही सोच रहही थी कि काश, उस दिन वो उस दरिंदे से बच पाती किसी तरह तो आज शायद उसकी ज़िंदगी इतनी उदास नही होती. उदासी में वो बाहर झाँक रही थी और झाँकते झाँकते कब सो गयी, उससे पता भी ना चला.
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"डोंट टेल मी... बिट्टू भी इसी कॉलेज में है.."
"हां.. सुबह से 3 बार तुम्हारे बारे में पूछ चुका है... मैं तो हैरान हूँ कि अभी तक तुमसे मिला नही"
"ढूँढ तो मैं भी उसे रही थी.. फिर मुझे लगा शायद इस कॉलेज में नही होगा"
"डोंट टेल मी दिया... तुम कैसे उसे अपना दिमाग़ खाने देना चाहती हो.."
"बस ऐसा ही है... और बताओ.. तुम्हें कहीं ड्रॉप कर दूं..."
"हां प्ल्ज़, मुझे लॅडीस हॉस्टिल ड्रॉप कर दो" तान्या ने कहा और दिया के पीछे पीछे उसकी कार की तरफ चली गयी
वापस हॉस्टिल जाते हुए बिट्टू को फिर से रोहित दिखा. बिट्टू उसके पास गया और साथ साथ वो दोनो हॉस्टिल चलने लगे. उनके साथ एक और बंदा था जिस से रोहित नोन स्टॉप किसी सब्जेक्ट के बारे में बात कर रहा था. "कैसे लोग है यार यह.. कॉलेज में पढ़ कर मॅन नही भरा तो अब भी पढ़ाई की बात कर रहे हैं" उसने सोचा.. सारा रास्ता बिट्टू चुप रहा. जो रास्ता सुबह जल्दी से कट गया था, वो उसको जीटी रोड जैसा लग रहा था अब.. ऐसा लग रहा था कि घंटों से चल रहा है पर हॉस्टिल नही आ रहा था. उपर से रोहित और जॅक की बकवास. जैसे ही हॉस्टिल आया और जॅक अपने रूम की तरफ बढ़ा, बिट्टू ने रोहित का हाथ पकड़ लिया. "रोहित यार मेरे रूम में आ. तुझसे बहुत इंपॉर्टेंट बात करनी है" उससे कहा और उसको खीच के अपने रूम में ले गया.
रोहित हैरान था कि ऐसी कौन सी बात करनी है बिट्टू को. फिर उसको लगा कि शायद कल रात के बारे में बात करनी हो. उसने पहले ही सोच लिया था कि सारा ब्लेम गांजे पे डाल देगा. रूम के अंदर पहुँच कर बिट्टू ने अंदर से रूम लॉक कर दिया
"बिट्टू तुम मेरा रेप तो नही करने वाले ना"
"अबे तुझे मैं गे लगता हूँ? और वैसे भी रोहित नाम वाले लोग गे होते हैं. चल उधर बैठ जा" कहते हुए बिट्टू कुर्सी पर बैठ गया. "यार कल रात जो मैने देखा, मुझे नहीं लगता कि वो गांजे का असर था."
"अबे पागल हो गया है क्या तू. तुझे क्या लगता है कि मैं सच मुच उड़ सकता हूँ?"
"हां मुझे यही लगता है. और यह भी लगता है कि तुम उड़ने की ही प्रॅक्टीस कर रहे थे जब मैं उपर आया. यार मैं शकल से मूरख लगता होऊँगा, हूँ नहीं."
"यार कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा है यार. तुझे कैसे लग सकता है कि मैं कुछ ऐसा कर सकता हूँ जो और कोई इंसान नही कर सकता"
"क्यूंकी मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ"
"क्या बकवास कर रहा है" रोहित ने हैरानी से पूछा
जवाब में बिट्टू ने टेबल से चाकू उठाया और अपनी एक उंगली के आगे का छोटा सा हिस्सा काट दिया. देखते ही देखते उंगली में से खून निकलने लगा. 2-3 सेक बहने के बाद रोहित ने देखा कि बिट्टू की उंगली का घाव अपने आप ठीक हो गया और वो उंगली बिल्कुल पहले जैसी हो गयी. हैरानी में रोहित का मूह खुले का खुला रह गया. "यह देखकर तुझे लग गया होगा कि तू अकेला इंसान नही है जो स्पेशल है. प्लीज़ यार. एक दोस्त होने की हैसियत से बता दे. मैं सच हूँ या ग़लत"
"यह क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है मुझे कुछ नही पता बिट्टू.. तुम्हारा घाव ठीक कैसे हो गया?"
"बात को बदल मत रोहित"
"मुझे नहीं पता कि मैं उड़ सकता हूँ कि नहीं. पर हां.. मुझे यह लगता ज़रूर है कि मैं उड़ सकता हूँ"
"आज रात को 9 बजे छत पे मिलते हैं. लेट्स सी अगर हम तेरी पवर को डेवेलप कर पायें" बिट्टू ने एक लंबी सास छोड़ते हुए बोला
दिया को रात में नींद नही आई. वो बस करवटें बदलते बदलते बिट्टू के बारे में सोच रही थी. इतने बड़े टोरोंटो में, वो दोनो एक ही कॉलेज में है, ऐसा कोयिन्सिडेन्स तो नही हो सकता. शायद भगवान चाहता ही था कि वो और बिट्टू भी एक दूसरे से मिले. उसने सोचा कि कल जाते ही सबसे पहले बिट्टू को ढूँढेगी कॉलेज में.
"बेटा खाने के लिए आ जाओ"
"हां माँ आई" दिया ने बोला और झट से नीचे पहुँच गयी
"बेटे कैसा गया पहला दिन कॉलेज में" खाने की टेबल पर उसके पापा ने पूछा
"ठीक गया पापा."
"बेटा एक बात पूछूँ.. जब से तुम वापस आई हो, इतना गुम्सुम क्यूँ रहती हो.. आज भी कॉलेज से आ कर सीधा अपने रूम में चली गयी...सब ठीक तो है ना"
"पापा मैं आप लोगों को 10 बार कह चुकी हूँ कि सब ठीक है. क्यूँ दिन रात एक ही बात के पीछे पड़े रहते हो. क्या ज़रूरी है कि कुछ हुआ हो तभी मैं यहाँ आई हूँ?"
"बेटा इस तरह से सब छोड़ छाड़ के आ जाना तो सब ठीक होने की तरफ इशारा नही करता"
"क्यूँ एक बात के पीछे पड़े हुए हो... बोल दिया कि नहीं है तो नहीं है कोई प्राब्लम" दिया ज़ोर से चीखी और खाना छोड़ कर उपर चली गयी.
"अर्रे बेटा खाना तो खा ले. ऐसे क्यूँ नाराज़ होती है" उसके पापा ने पीछे से बोला. "अर्रे यह बत्ती को क्या हो गया... लगता है फ्यूज़ उड़ गया... अब खाने के बाद फ्यूज़ ठीक करना पड़ेगा"
दिया अपने रूम में गयी और अपने पलंग पर लेट गयी... उसके माँ बाप बार बार उसको वो रात याद दिलाते थे. वो ना चाहते हुए भी फिर उस डर और असहयता को एक्सपीरियेन्स करती थी. पहले तो उसको करेंट के झटके भी लगते थे, पर अब उसने उनको कंट्रोल करना सीख लिया था. लेकिन हर बार उसको अपनी पवर किसी चीज़ पे कॉन्सेंट्रेट करनी पड़ती थी. अभी कल प्लॅंट्स में आग लग गयी थी और आज फ्यूज़ पिघल गया. यह क्यूँ हो रहा है उसको नही पता था. पर जब भी उसके अंदर करेंट पैदा होता और वो उसे बाहर फेंकती तो उसको एक अच्छी सी पवर का एहसास होता. उसको लगता कि वो अब उतनी असहाय नही है जितनी उस रात थी. बस वो यही सोच रहही थी कि काश, उस दिन वो उस दरिंदे से बच पाती किसी तरह तो आज शायद उसकी ज़िंदगी इतनी उदास नही होती. उदासी में वो बाहर झाँक रही थी और झाँकते झाँकते कब सो गयी, उससे पता भी ना चला.
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