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Guest
बिट्टू को कुछ समझ नही आ रहा था कि यह हो क्या रहा है. शायद उसकी बॉडी के अंदर आग लगी हुई थी
"दिया दिया..." वो ज़ोर से चिल्लाया "जल्दी से यहाँ आओ"
"क्या हुआ.. क्यूँ चिल्ला रहे हो" दिया दौड़ी दौड़ी आई और पूछने लगी
"दिया मेरे शरीएर को हाथ लगा कर देखो तो.. क्या यह बहुत तप रहा है?"
"नहीं, नॉर्मल है" दिया ने उसके शरीर पर हाथ रखते हुए कहा "क्यूँ क्या हुआ"
"मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर आग लगी हुई है.. बहुत गरम लग रहा है.. पानी भी बहुत ठंडा लग रहा है"
"लगता है तुम्हें कोल्ड हो रहा है.. मैं तुम्हारे लिए गोली लाती हूँ"
"दिया मुझे पक्कड़ लो. मेरा सर बहुत दुख रहा है.. फट रहा है मेरा सर..." बिट्टू बोला और धम्म से नीचे गिर गया
"बिट्टू क्या हुआ.. उठो... मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ" दिया ने बिट्टू को उठाने की कोशिश करी.. लेकिन बिट्टू दर्द से चीखे जा रहा था. उसको ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके अंदर की अंतडियों को जला रहा है. तभी एकाएक जैसे दर्द आया था, वैसे ही गायब हो गया और बिट्टू बिल्कुल चुप हो गया.. "क्या हुआ बिट्टू.. बोलो.. क्या हुआ.. तुम ठीक तो हो" चिंता भरे स्वर में दिया ने पूछा
"हां.. अब ठीक हो गया..बिल्कुल ठीक लग रहा है अब" अभी तक दर्द में उसकी आँखें बंद थी. जैसे ही उसने आँखें खोली, नज़ारा देख कर वो हैरानी में पड़ गया. जहाँ उसे दिया दिखनी चाहिए थी, वहाँ उसे दिया नही, एक खाई दिख रही थी. अपने आस पास उसने देखा तो पाया कि वो किसी पहाड़ के कोने पे खड़ा है और नीचे एक गहरी खाई है... "दिया.." वो ज़ोर से चिल्लाया
"हां बिट्टू.. क्या हुआ.. यहीं हूँ मैं.. चिल्ला क्यूँ रहे हो" दिया की आवाज़ तो उसे सुन रही थी लेकिन वो उससे दिख नही रही थी. बस उस पहाड़ की छोटी पे वो अकेला ही खड़ा था
"दिया कहाँ हो तुम.. मुझे तुम दिख नही रही" बिट्टू घबरा के बोला और तभी उसका पैर फिसल गया. वो तेज़ी से पहाड़ से नीचे गिरने लगा. गिरते हुए उसने एक पेड़ का सहारा लिया और अपनी गति को रोका. तभी उसे ऐसा लगा जैसे उस पर बहुत पानी गिर गया हो.. हड़बड़ा कर उसकी आँख खुली तो उसने अपने आप को वापस अपने घर में ही पाया और सामने दिया दिखी...
"लगता है तुम कोई सपना देख रहे थे बिट्टू... आखें बंद कर के बोल रहे थे कि मैं तुम्हें दिख नही रही..." दिया ने उसका सर अपनी गोद में रखकर बोला
बिट्टू का ध्यान अपने हाथों पर गया. खाई से गिरने के ज़ख़्म अभी भी वहाँ पे थे और धीरे धीरे भर रहे थे. उसे कुछ समझ नही आ रहा था के क्या हो रहा है यह.
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"तो दिया.. यह है मेरा शहर. तुम्हारे शहर के सामने बहुत ही छोटा है... पर यहाँ पे लोगों के दिल बहुत बड़े हैं... सभी देखना कैसे तुम्हें अपना बना के रखेंगे." ट्रेन से समान प्लॅटफॉर्म पर रख कर बिट्टू ने दिया से कहा.
"वो तो ठीक है पर एक कूली कर लें... इतना सामान उठा कर बाहर जाना है क्या"
"हां कर लेते हैं" बिट्टू का इतना बोलना ही था कि उसकी कनपटी पर एक थप्पड़ पड़ा. वो भोचक्का हो कर पीछे घूमा तो किसी ने उसको ज़ोर से अपने गले से लगा लिया
"साले इतने टाइम बाद आया है और बताया भी नहीं. आदमी है कि कुत्ता. ना कोई खबर, ना कुछ.. आंटी से पता चला कि तू आज आ रहा है तो मैने कहा तुझे स्टेशन से ही उड़ा ले चलूं.. साले सच बता.. एक भी बार याद नही आई मेरी"
"कैसी बात करता है हॅपी.. ऐसा हो सकता है कि तेरी याद ना आए. लेकिन कमिटमेंट भी तो कोई चीज़ होती हा ना. अभी पढ़ाई करने गया था तो पूरी तरह से पढ़ाई ही करी"
"हां हां मेरे दबंग्ग के सलमान.. तू और तेरी कमिटमेंट.. यहाँ तो कोई पढ़ाई करी नही.. वहाँ जा कर बड़ा गोबर में तीर मारा होगा...चल जीप ले कर आया हूँ. मस्त बियर पीएँगे... यारों से मिलेंगे.. फिर घर ले चलता हूँ"
"यार पहले घर चलते हैं..." झिझकते हुए बिट्टू ने कहा और फिर बोला "अभी मेरे साथ कोई और भी है" उसने दिया कि तरफ इशारा करते हुए कहा..
"कौन है... तेरी गर्ल फ्रेंड?" हॅपी ने दिया की ओर देखते हुए पूछा
"नहीं..."
"तो फिर तो तुझे ऐतराज़ नहीं होना चाहिए आजा मैं थोड़ी लाइन मार लूँ इस पर तो" हॅपी बिट्टू को एक तरफ धकेल के दिया की ओर बढ़ गया. "हेलो. माइसेल्फ हॅपी सिंग. फ्रेंडशिप वित बिट्टू आंड यू ऑल्सो सो थॉट आइ वित यू हाउ आर"
"क्या मतलब..." दिया ने हैरानी से पूछा
"अर्रे पहले बताना था ना कि अँग्रेज़ी नही आती. मैने तो सोचा कि विदेश से हो तो अँग्रेज़ी आती होगी.. वैसे मेरा नाम हॅपी सिंग है. बिट्टू का बहुत अच्छा दोस्त हूँ. आपका नाम क्या है और आप कैसी है ?"
"हेलो हॅपी.. तुम्हारे किस्से सुन सुन कर ऐसा लगता है जैसे तुम्हें बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ.. बहुत बताता है बिट्टू तुम्हारे बारे में.."
"वाह.. इसे कहते हैं दोस्त.. पहले से ही मेरी सेट्टिंग करवा के रखी है.." हॅपी बोला तो दिया के चेहरे पर फिर से कन्फ्यूषन आ गयी.."वैसे आपका नाम क्या है.."
"दिया इनसे मिलो.. मेरे बचपन का दोस्त हॅपी. और हॅपी इनसे मिलो.. दिया.. मेरी बीवी"
"ओ तेरी.. तूने शादी कर ली... साले अभी कह रहा था कि पढ़ाई की तरफ कमिटेड था.. अभी यह नज़ारा दिखा रहा है.. तेरे को तो चप्पलो से मार मार कर साले ज़मीन में गाढ देना चाहिए" गुस्से में हॅपी बोला
"अर्रे नहीं यार.. तू नहीं समझेगा.. थोड़ा बड़ा किस्सा है... आराम से सम्झाउन्गा"
"क्या प्रेग्नेंट तो नही कर दिया था"
"अबे चुप कर यार... चल समान उठवा और गाड़ी तक ले कर चल... आते ही बक बक शुरू हो गयी तेरी..."
"वाह.. जाने से पहले जो शब्द तुझे हीरे से तराशे हुए लगते थे वो अब बक बक हो गयी... देख लो भाभी जी.. कितना दिया है आपने बिट्टू को..."
"अर्रे डोंट कॉल मी भाभी... दिया ही बुलाओ.. और कुछ नहीं बदला है बिट्टू.. पूरे एक साल से लोगों का दिमाग़ खा रहा है तो अब इसको अजीब लग रहा है.."
"चलो जी बातें तो होती रहेंगी.. आओ आपको घर तक पहुँचा दे पहले" कहता हुआ हॅपी पीछे मुड़ा.. "ओ कुली.. हां यह समान है.. पार्किंग में जीप खड़ी है उसमें डालना है..."
"50 रुपये होगा साहब"
"अबे 50 रुपये किस बात के? तेरी फूफी की शादी का सगुन माँग रहा है क्या... 20 रुपये दूँगा..."
"नहीं साहब 20 रुपये में कैसे होगा.. पुल के उपर से जाना पड़ेगा"
"अर्रे पता हैं पुल के उपर से जाना पड़ेगा.. यहीं के हैं हम... हमारे से ही सारी कमाई करेगा क्या.. चल उठा इसको.. 20 रुपये मिलेंगे"
"नहीं साहब 20 रुपये में तो नही होगा..."
"चल फिर तू निकल.. मैं ही उठा लूँगा" हॅपी ने कहा
थोड़ा समान हॅपी ने उठाया और थोड़ा बिट्टू ने उठा लिया.. दिया के लाख कहने पर भी हॅपी ने उसको किसी समान को हाथ नही लगाने दिया. किसी तरह से खिचते पीट-ते वो लोग जीप तक पहुँचे और सामान उसमें रखा
"अबे इतनी मेहनत करने से तो अच्छा उसको 50 रुपये दे ही देते.."
"अबे बेईमानी की कमाई माँग रहा है वो... 20 रुपये भी ज़्यादा थे.. एक अन्ना हज़ारे हैं जो देश के लिए इतना कर रहे हैं और एक बिट्टू हज़ारे हैं जिनसे कुछ बॅग्स नही उठ रहे.. साले परदेस की हवा ने तुझे निकम्मा बना दिया है.. देख तुझे कैसे ठीक करता हूँ मैं अब.." फिर दिया की तरफ मूड कर बोला.. "भाभी जी.. आइ मीन दिया जी आप आगे बैठेंगी मेरे साथ, यहाँ पीछे बैठेंगी बिट्टू के साथ या अकेले पीछे बैठना पसंद करेंगी?"
"कुछ भी चलेगा हॅपी जी..."
"ऐसा तो कोई ऑप्षन नही है... ऐसा कर बिट्टू तुम दोनो पीछे बैठ जाओ.. मैं एक साल अकेला रह लिया हूँ.. अब 15 किमी और सही..."
"अर्रे नही नही.. आप दोनो आगे बैठ जाओ.. मुझे कोई परेशानी नही है पीछे बैठने में.." हॅपी के मन की बात समझते हुए दिया ने बोल दिया
"अच्छा अगर आप ज़ोर दे रहीं है तो ठीक है वरना मैं तो अकेला भी ठीक ही हूँ" मन ही मन खुश होते हुए हॅपी बोला. वो तीनो जीप में बैठे और बिट्टू के घर की तरफ निकल पड़े.