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परदेसी complete

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बिट्टू को कुछ समझ नही आ रहा था कि यह हो क्या रहा है. शायद उसकी बॉडी के अंदर आग लगी हुई थी

"दिया दिया..." वो ज़ोर से चिल्लाया "जल्दी से यहाँ आओ"

"क्या हुआ.. क्यूँ चिल्ला रहे हो" दिया दौड़ी दौड़ी आई और पूछने लगी

"दिया मेरे शरीएर को हाथ लगा कर देखो तो.. क्या यह बहुत तप रहा है?"

"नहीं, नॉर्मल है" दिया ने उसके शरीर पर हाथ रखते हुए कहा "क्यूँ क्या हुआ"

"मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर आग लगी हुई है.. बहुत गरम लग रहा है.. पानी भी बहुत ठंडा लग रहा है"

"लगता है तुम्हें कोल्ड हो रहा है.. मैं तुम्हारे लिए गोली लाती हूँ"

"दिया मुझे पक्कड़ लो. मेरा सर बहुत दुख रहा है.. फट रहा है मेरा सर..." बिट्टू बोला और धम्म से नीचे गिर गया

"बिट्टू क्या हुआ.. उठो... मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ" दिया ने बिट्टू को उठाने की कोशिश करी.. लेकिन बिट्टू दर्द से चीखे जा रहा था. उसको ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके अंदर की अंतडियों को जला रहा है. तभी एकाएक जैसे दर्द आया था, वैसे ही गायब हो गया और बिट्टू बिल्कुल चुप हो गया.. "क्या हुआ बिट्टू.. बोलो.. क्या हुआ.. तुम ठीक तो हो" चिंता भरे स्वर में दिया ने पूछा

"हां.. अब ठीक हो गया..बिल्कुल ठीक लग रहा है अब" अभी तक दर्द में उसकी आँखें बंद थी. जैसे ही उसने आँखें खोली, नज़ारा देख कर वो हैरानी में पड़ गया. जहाँ उसे दिया दिखनी चाहिए थी, वहाँ उसे दिया नही, एक खाई दिख रही थी. अपने आस पास उसने देखा तो पाया कि वो किसी पहाड़ के कोने पे खड़ा है और नीचे एक गहरी खाई है... "दिया.." वो ज़ोर से चिल्लाया

"हां बिट्टू.. क्या हुआ.. यहीं हूँ मैं.. चिल्ला क्यूँ रहे हो" दिया की आवाज़ तो उसे सुन रही थी लेकिन वो उससे दिख नही रही थी. बस उस पहाड़ की छोटी पे वो अकेला ही खड़ा था

"दिया कहाँ हो तुम.. मुझे तुम दिख नही रही" बिट्टू घबरा के बोला और तभी उसका पैर फिसल गया. वो तेज़ी से पहाड़ से नीचे गिरने लगा. गिरते हुए उसने एक पेड़ का सहारा लिया और अपनी गति को रोका. तभी उसे ऐसा लगा जैसे उस पर बहुत पानी गिर गया हो.. हड़बड़ा कर उसकी आँख खुली तो उसने अपने आप को वापस अपने घर में ही पाया और सामने दिया दिखी...

"लगता है तुम कोई सपना देख रहे थे बिट्टू... आखें बंद कर के बोल रहे थे कि मैं तुम्हें दिख नही रही..." दिया ने उसका सर अपनी गोद में रखकर बोला

बिट्टू का ध्यान अपने हाथों पर गया. खाई से गिरने के ज़ख़्म अभी भी वहाँ पे थे और धीरे धीरे भर रहे थे. उसे कुछ समझ नही आ रहा था के क्या हो रहा है यह.

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"तो दिया.. यह है मेरा शहर. तुम्हारे शहर के सामने बहुत ही छोटा है... पर यहाँ पे लोगों के दिल बहुत बड़े हैं... सभी देखना कैसे तुम्हें अपना बना के रखेंगे." ट्रेन से समान प्लॅटफॉर्म पर रख कर बिट्टू ने दिया से कहा.

"वो तो ठीक है पर एक कूली कर लें... इतना सामान उठा कर बाहर जाना है क्या"

"हां कर लेते हैं" बिट्टू का इतना बोलना ही था कि उसकी कनपटी पर एक थप्पड़ पड़ा. वो भोचक्का हो कर पीछे घूमा तो किसी ने उसको ज़ोर से अपने गले से लगा लिया

"साले इतने टाइम बाद आया है और बताया भी नहीं. आदमी है कि कुत्ता. ना कोई खबर, ना कुछ.. आंटी से पता चला कि तू आज आ रहा है तो मैने कहा तुझे स्टेशन से ही उड़ा ले चलूं.. साले सच बता.. एक भी बार याद नही आई मेरी"

"कैसी बात करता है हॅपी.. ऐसा हो सकता है कि तेरी याद ना आए. लेकिन कमिटमेंट भी तो कोई चीज़ होती हा ना. अभी पढ़ाई करने गया था तो पूरी तरह से पढ़ाई ही करी"

"हां हां मेरे दबंग्ग के सलमान.. तू और तेरी कमिटमेंट.. यहाँ तो कोई पढ़ाई करी नही.. वहाँ जा कर बड़ा गोबर में तीर मारा होगा...चल जीप ले कर आया हूँ. मस्त बियर पीएँगे... यारों से मिलेंगे.. फिर घर ले चलता हूँ"

"यार पहले घर चलते हैं..." झिझकते हुए बिट्टू ने कहा और फिर बोला "अभी मेरे साथ कोई और भी है" उसने दिया कि तरफ इशारा करते हुए कहा..

"कौन है... तेरी गर्ल फ्रेंड?" हॅपी ने दिया की ओर देखते हुए पूछा

"नहीं..."

"तो फिर तो तुझे ऐतराज़ नहीं होना चाहिए आजा मैं थोड़ी लाइन मार लूँ इस पर तो" हॅपी बिट्टू को एक तरफ धकेल के दिया की ओर बढ़ गया. "हेलो. माइसेल्फ हॅपी सिंग. फ्रेंडशिप वित बिट्टू आंड यू ऑल्सो सो थॉट आइ वित यू हाउ आर"

"क्या मतलब..." दिया ने हैरानी से पूछा

"अर्रे पहले बताना था ना कि अँग्रेज़ी नही आती. मैने तो सोचा कि विदेश से हो तो अँग्रेज़ी आती होगी.. वैसे मेरा नाम हॅपी सिंग है. बिट्टू का बहुत अच्छा दोस्त हूँ. आपका नाम क्या है और आप कैसी है ?"

"हेलो हॅपी.. तुम्हारे किस्से सुन सुन कर ऐसा लगता है जैसे तुम्हें बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ.. बहुत बताता है बिट्टू तुम्हारे बारे में.."

"वाह.. इसे कहते हैं दोस्त.. पहले से ही मेरी सेट्टिंग करवा के रखी है.." हॅपी बोला तो दिया के चेहरे पर फिर से कन्फ्यूषन आ गयी.."वैसे आपका नाम क्या है.."

"दिया इनसे मिलो.. मेरे बचपन का दोस्त हॅपी. और हॅपी इनसे मिलो.. दिया.. मेरी बीवी"

"ओ तेरी.. तूने शादी कर ली... साले अभी कह रहा था कि पढ़ाई की तरफ कमिटेड था.. अभी यह नज़ारा दिखा रहा है.. तेरे को तो चप्पलो से मार मार कर साले ज़मीन में गाढ देना चाहिए" गुस्से में हॅपी बोला

"अर्रे नहीं यार.. तू नहीं समझेगा.. थोड़ा बड़ा किस्सा है... आराम से सम्झाउन्गा"

"क्या प्रेग्नेंट तो नही कर दिया था"

"अबे चुप कर यार... चल समान उठवा और गाड़ी तक ले कर चल... आते ही बक बक शुरू हो गयी तेरी..."

"वाह.. जाने से पहले जो शब्द तुझे हीरे से तराशे हुए लगते थे वो अब बक बक हो गयी... देख लो भाभी जी.. कितना दिया है आपने बिट्टू को..."

"अर्रे डोंट कॉल मी भाभी... दिया ही बुलाओ.. और कुछ नहीं बदला है बिट्टू.. पूरे एक साल से लोगों का दिमाग़ खा रहा है तो अब इसको अजीब लग रहा है.."

"चलो जी बातें तो होती रहेंगी.. आओ आपको घर तक पहुँचा दे पहले" कहता हुआ हॅपी पीछे मुड़ा.. "ओ कुली.. हां यह समान है.. पार्किंग में जीप खड़ी है उसमें डालना है..."

"50 रुपये होगा साहब"

"अबे 50 रुपये किस बात के? तेरी फूफी की शादी का सगुन माँग रहा है क्या... 20 रुपये दूँगा..."

"नहीं साहब 20 रुपये में कैसे होगा.. पुल के उपर से जाना पड़ेगा"

"अर्रे पता हैं पुल के उपर से जाना पड़ेगा.. यहीं के हैं हम... हमारे से ही सारी कमाई करेगा क्या.. चल उठा इसको.. 20 रुपये मिलेंगे"

"नहीं साहब 20 रुपये में तो नही होगा..."

"चल फिर तू निकल.. मैं ही उठा लूँगा" हॅपी ने कहा

थोड़ा समान हॅपी ने उठाया और थोड़ा बिट्टू ने उठा लिया.. दिया के लाख कहने पर भी हॅपी ने उसको किसी समान को हाथ नही लगाने दिया. किसी तरह से खिचते पीट-ते वो लोग जीप तक पहुँचे और सामान उसमें रखा

"अबे इतनी मेहनत करने से तो अच्छा उसको 50 रुपये दे ही देते.."

"अबे बेईमानी की कमाई माँग रहा है वो... 20 रुपये भी ज़्यादा थे.. एक अन्ना हज़ारे हैं जो देश के लिए इतना कर रहे हैं और एक बिट्टू हज़ारे हैं जिनसे कुछ बॅग्स नही उठ रहे.. साले परदेस की हवा ने तुझे निकम्मा बना दिया है.. देख तुझे कैसे ठीक करता हूँ मैं अब.." फिर दिया की तरफ मूड कर बोला.. "भाभी जी.. आइ मीन दिया जी आप आगे बैठेंगी मेरे साथ, यहाँ पीछे बैठेंगी बिट्टू के साथ या अकेले पीछे बैठना पसंद करेंगी?"

"कुछ भी चलेगा हॅपी जी..."

"ऐसा तो कोई ऑप्षन नही है... ऐसा कर बिट्टू तुम दोनो पीछे बैठ जाओ.. मैं एक साल अकेला रह लिया हूँ.. अब 15 किमी और सही..."

"अर्रे नही नही.. आप दोनो आगे बैठ जाओ.. मुझे कोई परेशानी नही है पीछे बैठने में.." हॅपी के मन की बात समझते हुए दिया ने बोल दिया

"अच्छा अगर आप ज़ोर दे रहीं है तो ठीक है वरना मैं तो अकेला भी ठीक ही हूँ" मन ही मन खुश होते हुए हॅपी बोला. वो तीनो जीप में बैठे और बिट्टू के घर की तरफ निकल पड़े.
 
पूरे रास्ते बिट्टू से बात करने की बजाय हॅपी दिया को सारी जगहों के बारे में बताता रहा.. घर जाने की बजाए वो कभी गन्ने का जूस पीने जाते तो कभी खेतों में जा कर मूलियाँ निकाल के खाने लगते. कभी नहर पे जाते तो कभी किसी ढाबे पे जाते. फिर हॅपी ने गाड़ी कॉलेज की तरफ मोड़ ली. "दिया जी अब आपको दिखाता हूँ यहाँ का सबसे बढ़िया कॉलेज... यहाँ के टीचर अभी भी बिट्टू के नाम से काँपते हैं.."

"यार हॅपी बस कर.. कल देख लेंगे.. घर ले जा अभी.. बहुत टाइम हो गया.. मम्मी पापा परेशान हो रहे होंगे.."

"अबे घंटा परेशन हो रहे होंगे.. अजीब बातें मत कर... अभी फोन कर देते हैं और बोल देते हैं कि थोड़ा लेट हो जाएँगे" कहते हुए उसने अपना फोन उठाया और बिट्टू के घर का नंबर मिला दिया. काफ़ी रिंग्स जाने पर भी जब किसी ने फोन नही उठाया, तो उसने बिट्टू के पापा के मोबाइल पे लगाया लेकिन वहाँ भी किसी ने नही उठाया. "चल घर ही चलते हैं पहले" कहते हुए उसने जीप मोड़ ली.

"क्या हुआ कोई फोन नही उठाया क्या..." बिट्टू ने पूछा

"हां.. रिंग बजती रही.. शायद बिज़ी है किसी काम में"

"थोड़ा जल्दी कर यार..." बिट्टू को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी थी.

"अबे 80 से तेज़ क्या चलाऊ... हवाई जहाज़ में नही बैठा.. पहुँच जाएँगे 10 मिनट में" हॅपी ने इरिटेट हो कर कहा. थोड़ी दूर चलते ही उन्हे आसमान में धुए के बादल बनते हुए दिखे. यह देख हॅपी ने गाड़ी और तेज़ भगाने की कोशिश करी. आखरी मोड़ जब लिया तो सामने का नज़ारे देख कर वो लोग दंग रह गये. घर आग की लपटों से घिरा हुआ था. और जल रहा था. बिट्टू जल्दी से जीप से बाहर निकला और जलते हुए घर में घुस गया. अंदर केवल आग ही आग थी. बिट्टू को कुछ ढंग से दिखाई नही दे रहा था लेकिन वो फिर भी अंदर घुसे चला जा रहा था अपने माँ बाप को बचाने के लिए. तभी आग किसी तरह से गॅस के सिलिंडर तक पहुँच गयी और एक ज़ोरदार धमाका हुआ. बिट्टू उड़ता हुआ खिड़की से बाहर आ गिरा. उसका सारा शरीर जल रहा था और वो दर्द में चीखे मार रहा था.

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"तान्या.. तान्या क्या हुआ...इतना चीख क्यूँ रही हो..." रोहित तान्या के चीखने की आवाज़ सुनकर उसके रूम में गया और उसको जगाने की कोशिश करने लगा... तान्या की नींद खुली. उसकी आँखें बिल्कुल नम थी

"फिर वोही सपना रोहित... हो ना हो बिट्टू के साथ कोई अनहोनी होने वाली है... हमे कुछ करना पड़ेगा"

"तान्या कम ऑन.. वो सपना था.. सिर्फ़ एक सपना... कुछ नही हुआ है किसी को..."

"रोहित आज फिर मुझे वही सपना आया है... ज़रूर इसका कोई ना कोई मतलब है..."

"सपनो के मतलब नही होते तान्या... क्यूँ अपना दिमाग़ खराब कर रही हो..."

"रोहित तुम मानो या ना मानो... पिछला आक्सिडेंट भी मैने सपनों में देखा था लेकिन उसको रोक नही पाई.. इस बार में यह हादसा होने से पक्का रोकूंगी... हमे किसी भी तरह से बिट्टू को कॉंटॅक्ट करना पड़ेगा"

"नहीं कर सकते तान्या... इतनी आबादी वाली दुनिया में बिट्टू का कॉंटॅक्ट नंबर कैसे पूछेंगे..."

"रणवीर को मैल करो... रोहित प्लीज़ रणवीर को मैल करो... यह हादसा बिट्टू के घर में होने वाला है... हमे जल्द से जल्द वहाँ पहुँचना होगा... उससे बिट्टू का अड्रेस माँगो रोहित..."

"तान्या अभी सो जाओ.. रात बहुत हो गयी है.. सुबह उठ कर देखेंगे.." रोहित ने सोचा कि बुरा सपना है.. सुबह तक तान्या शांत हो जाएगी.. इसलिए ऐसा कह दिया

"मुझे पता है तुम क्या सोच रहे हो रोहित.. ठीक है तुम जा कर सो जाओ.. मैं खुद ही ईमेल करती हूँ रणवीर को"

"जो करना है करो.. तुम्हें तो कुछ समझाना ही बेकार है.." रोहित ने कहा और अपने रूम में चला गया सोने को.. यहाँ तान्या ने अपना लॅपटॉप निकाला और रणवीर को मैल लिखने लगी

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बिट्टू रात में हड़बड़ा के उठा. उसने देखा तो उसका हाथ जला हुआ था जो देखते ही देखते ठीक हो गया. पसीने से उसका बुरा हाल था और वो हाँफ रहा था. दिया भी उसके इस अचानक हड़बड़ा के उठने के कारण उठ गयी.

"क्या हुआ बिट्टू"

"कुछ नही दिया.. तुम सो जाओ.. बुरा सपना था. मैं पानी पी कर आया" बिट्टू ने उससे दिलासा दिया. बिट्टू ने अभी तक उसको यह बताया नही था कि वो ख्वाबों में दूसरी जगहों पे जाता है. उसने सोचा कि ऐसे ही वो परेशन होगी. लेकिन सच तो यह था कि बिट्टू अब परेशान रहने लगा था. हालाँकि उससे पता था कि यह सब सपने हैं, फिर भी जागने के बाद उन सपनों के निशान अपने उपर पा कर वो बहुत ही विचलित होता था. पिछले 2-3 दिनों से वो इसी कारण से थोड़ा गुम्सुम रहने लगा था और दिया सोच रही थी कि वो शादी को ले कर चिंतित है. लेकिन बिट्टू के आश्वासन दिलाने पर कि यह शादी के कारण नही, ऐसे ही मूड स्विंग है, उसने कुछ नही कहा. लेकिन उससे पता था कि कोई चीज़ तो है जो बिट्टू को अंदर ही अंदर खाए जा रही है.

उधर बिट्टू पानी पीने गया और गहरी सोच में डूब गया. था तो यह एक सपना ही, पर उससे अपने घर वालों की चिंता होने लगी थी. पिछले एक साल से उसने उनकी कोई खबर नही ली थी. क्या पता उस जीव ने बिट्टू के घर पर भी धावा बोल दिया हो?? बिस्तर पर वापस आकर वो यह ही सोचने लगा कि उसको एक बार अपने घरवालों से मिलने ज़रूर जाना चाहिए. इस में रिस्क तो बड़ा था लेकिन अपने पेरेंट्स से मिलने की आग अब उसके अंदर लग गयी थी. सारी रात वो करवटें ही बदलता रहा कि कैसे दिया से यह बात चलाए... सच तो यह था कि दिया भी अपने पेरेंट्स से इतने टाइम से दूर रही है.. उसको अजीब तो नही लगेगा कि इसको मेरी फॅमिली की चिंता नही है... ऐसे कयि सवाल बिट्टू के दिल में खलबली मचाते रहे. पूरी रात वो एक सेकेंड भी सो नही सका. बस छत को घूरता रहा और सोचता रहा कि दिया से यह बात कैसे चलाई जाए.

अगली सुबह फिर बिट्टू को विचलित देख कर दिया का मन डूब गया. आज उसने ठान ही ली कि जो बात है वो पता कर के ही रहेगी. वो नाश्ता बनाते ही बिट्टू के पास पहुँच गयी और नाश्ते की प्लेट को टेबल पर धम्म से मारा. बिट्टू सोच में डूबा हुआ था और आवाज़ से अचानक चौक गया. दिया का बिगड़ा मूड होने के कारण उसने अपनी बात टालने की सोची.

"बिट्टू क्या तुम्हें लगता है कि हम ने शादी कर के कोई भूल करी?"

"अर्रे दिया तुम क्या वोही बात ले कर बैठ गयी.."

"सच सच बताओ बिट्टू.. अगर कोई और है तुम्हारी ज़िंदगी में तो बोल दो... मुझे अच्छा नही लगता जब तुम ऐसे चुप चाप बैठे रहते हो और सोचते रहते हो किसी और के बारे में"

"अर्रे मैं किसी और के बारे में क्यूँ सोचने लगा दिया... कितने लोगों से मिलता हूँ मैं यहाँ... कितनी लड़कियों से बात करते हुए देखा है तुमने मुझे?"

"हर किसी कस्टमर के साथ तो फ्लर्ट करते हो... क्या पता किसी ने कोई सिग्नल दे दिया हो"

"दिया... दिया.... कैसी बातें सोच रही हो सुबह सुबह... अर्रे मैने जिससे प्यार किया, उसके साथ हूँ.. यह तुम भी जानती हो और मैं भी... अब मुझे क्या किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो फिर किसी और मुसीबत को गले लगा लूँ" हँसते हुए बिट्टू ने कहा

"मज़ाक मत करो बिट्टू और सच सच बताओ कि तुम्हें क्या चीज़ अंदर ही अंदर खाए जा रही है"

"यह अच्छा मौका है बिट्टू, लगा दे चौका" बिट्टू ने सोचा और कहा "यार तुमसे कोई चीज़ छुपाना मुझे बिल्कुल भी गवारा नहीं है... आज तक ऐसा कुछ हुआ है के मैने तुमसे छुपाया हो... यहाँ तक कि जब कॉन्स्टिपेशन हुई थी तब भी तुम्हें बता दिया था.."

"बिट्टू फालतू की बात मत कर और बता जो मैने पूछा है" गुस्से में दिया ने फोर्क उसके उपर तानते हुए बोला

 
"अर्रे रुक जा मेरी बॅनडिट क्वीन. बताता हूँ बताता हूँ.. गुस्से में तुम बहुत क्यूट लगती हो" उसका इतना कहना ही था कि दिया ने वो फोर्क उठा कर उसकी हथेली में घुसा दिया.." आआहह.. अबे ठीक हो जाता है लेकिन दर्द होता है" उसने दर्द से चीखते हुए कहा

"इससे पहले में यह दूसरा फोर्क तुम्हारी आँख में घुसा दूं, बता दो मुझे" दिया ने दूसरा फोर्क उठाते हुए कहा

"मुझे मम्मी दादी से मिलने का दिल कर रहा था बहुत दिनों से... उनकी कोई खबर नही है ... तुम्हें ठीक लगता है तो उनसे मिलने चल सकते हैं, नहीं तो कोई प्राब्लम नही है.. मैं यहीं पड़ा रहूँगा.. चल पड़ते एक बार तो ठीक था लेकिन मुझे पता है कि इसमें सिर्फ़ हमारी जान को ही नहीं, दुनिया को भी ख़तरा है.. इसलिए अगर तुम ना कह दो तो भी कोई प्राब्लम नही है" किसी तरह से बिट्टू ने एक ही साँस में सब कुछ बोल दिया.

उसकी शकल देख कर दिया की हसी नही रुकी और वो खिलखिला कर हँसने लगी. "बस इतनी सी बात थी बिट्टू.. तुमने पहले क्यूँ नही बताया..."

"तो हम जा सकते हैं मतलब.. मैं टिकेट्स करता हूँ" वो खुशी में उठने को हुआ

"ऐसा तो नहीं कहा मैने बिट्टू" हताश हो कर वो वापस चेयर में धँस गया. "लेकिन प्लान बुरा नही है. इसी बहाने मैं भी उन से मिल लूँगी. हो सके तो मेरे घरवालों से मिलने का भी प्लान बनाते हैं" थोड़ी एग्ज़ाइट्मेंट में दिया ने बोला

"हां हां ज़रूर.. मुझे नही लगता कि अब कोई जीव-वीव आने वाला है.. शायद वो डर के भाग गया पहली मुलाक़ात से ही."

"चलो मैं रणवीर को मैल भेजती हूँ अपने प्लॅन्स के बारे में.. शायद वो मेरे पेरेंट्स का अड्रेस भी बता दे..."

"रूको..." बिट्टू ने तेज़ी से कंप्यूटर की तरफ जाती हुई दिया को टोकते हुए कहा "रणवीर को क्यूँ बताना है? वो बुढ्ढा हमे इंडिया भी नही जाने देगा..."

"बिट्टू लेकिन वो ही तो है जो मुझे मम्मी पापा का पता बता सकते हैं."

"प्ल्ज़ दिया प्ल्ज़.. वैसे भी जहाँ हम जा रहे हैं, वहाँ पे इंटरनेट होगा. वहाँ से कर लेंगे रणवीर को ईमेल"

"ठीक है बिट्टू जैसा तुम समझो. लेकिन मुझे लगता है कि हमे यह बात रणवीर को बता देनी चाहिए.. कुछ प्राब्लम हो गयी तो..."

"अर्रे कोई प्रॉब्लम हो गयी तो देख लेंगे.. वो घंटा कुछ कर सकता है"

"अच्छा अच्छा ठीक है.. नही बता रही" बिट्टू को गुस्से में आते देख दिया ने फटाफट बोल दिया. पर उसने मन ही मन यह प्लान कर लिया था कि घर से निकलने से पहले वो रणवीर को मैल ज़रूर डाल देगी.

*-*

उसी समय तान्या के गुस्से की कोई सीमा नही थी. रणवीर ने उससे बिट्टू के घर का अड्रेस नही भेजा था. अड्रेस भेजना तो दूर, उसने उनकी एक भी मैल का रिप्लाइ भी नही किया था. तान्या के 2-3 मैल में समझाने के बावजूद के उसके सपने सच हो रहे हैं, रणवीर ने कोई रिप्लाइ नही दिया. उनके प्रति उसका ऐसा व्यवहार तान्या को अच्छा नही लग रहा था.

"क्या हुआ तान्या.. छोड़ो ना अब इस बात को.. नही तो नही.. शायद किस्मत में यही लिखा है"

"किस्मत में कुछ नही होता रोहित. मैं अपनी किस्मत खुद लिखने में विश्वास करती हूँ. और मैं इस बात की जड़ तक पहुँच के रहूंगी.. कोई ना कोई कारण तो है ना कि मुझे यह ही सपना आता है.. और भी तो दुनिया में लाखों लोग मरते हैं, उनका तो सपना नही आता... इसका ही क्यूँ.. क्यूंकी मैं इसको चेंज कर सकती हूँ.. और मैं चेंज कर के रहूंगी"

"जो करना है तुमने करो.. रणवीर ने मदद करी नही है.. कहाँ से लाओगी अब अड्रेस... सपने में ही आएगा क्या वो भी..."

"अर्रे सही आइडिया दिया... आज रात को मुझे वो स्टेशन और बिट्टू के कॉलेज के नाम की तरफ अच्छी तरह से ध्यान देना होगा... शायद कुछ बात बन जाए"

"तान्या तुम सच में थोड़ा सनकी जैसे बात कर रही हो..."

"कोई और यह कहे तो फिर भी ठीक लगता है रोहित.. लेकिन जब एक उड़ने वाला इंसान ऐसी बात कहे, तो हँसने का दिल करता है... अच्छा गुड नाइट.. कल सुबह मिलते हैं" कहते हुए तान्या अपने कमरे में चली गयी

"तान्या तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है कि दुनिया को बचाने का ठेका सिर्फ़ तुमने ही लिया हुआ है. क्यूँ हर किसी के काम में अपनी टाँग अड़ाती हो"

"रोहित तुम बात को समझते क्यूँ नही"

"क्या है समझने लायक इस बात में.. बस एक ख्वाब के ज़रिए तुम किसी के घर पहुँच के क्या बोलोगि उनको?? तुम समझने की कोशिश करो. वो सिर्फ़ एक सपना था. सिर्फ़ एक सपना"

"रोहित अगर वो सिर्फ़ सपना होता तो मुझे कैसे पता चलता कि उस नाम का कॉलेज उस शहर में है ..."

"तान्या हो सकता है तुमने वो कॉलेज का नाम कहीं पे पढ़ा हो. इसलिए वो तुम्हारे सपने में आया" रोहित ने सपने शब्द पर ज़्यादा स्ट्रेस देते हुए कहा. "और तुम साबित क्या करना चाहती हो?? तुम अब फ्यूचर देख सकती हो?? सिर्फ़ शराब के नशे में तुमने एक आदमी का आक्सिडेंट होते देख लिया और उस हालत में सोच लिया कि तुमने यह हादसा होते हुए सपने में पहले भी देखा है, तो यह शराब का असर है - किसी पवर का नही" आपा खोते हुए रोहित तान्या पर बरस पड़ा. उसका सच में तान्या की इन बातों से बहुत दिमाग़ खराब हो रहा था.

"रोहित एक बार सोच के देखो.. क्या जाएगा हमारा अगर एक बार चेक कर लिया हम ने तो.. कोई नुकसान तो नही होगा ना. मुझे यकीन है कि हम एक अनहोनी को टाल सकते हैं.. तुम्हारे पर्स्पेक्टिव से भी सोचा जाए तो अगर 1% भी चान्स है किसी को बचाने का तो क्यूँ ना लिया जाए वो?" तान्या ने ऐसा कहा तो रोहित सोच में पड़ गया. सच में नुकसान तो नही था कोई चेक करने में. "वैसे भी मैने 2 टिकेट बुक कर लिए हैं. 4 घंटे बाद की फ्लाइट है. जल्दी से थोड़ी पॅकिंग कर लो. थोड़ी देर में हमे निकलना है"

"ठीक है तान्या. चलते है हम. पर यह आख़िरी बार होगा जब तुम्हारे किसी सपने की वजह से मैं अपनी ज़िंदगी में खलल डाल रहा हूँ. ध्यान रखना इस बात का"

"ओह्ह थॅंक यू रोहित" कहते हुए तान्या उससे लिपट गयी " आइ प्रॉमिस आज के बाद कभी ऐसी किसी बात के लिए तंग नही करूँगी"

थोड़े समय बाद दोनो तय्यार थे. उनके हाथ में एक एक ओवरनाइट बॅग था. उनका प्लान वहाँ ज़्यादा दिन रुकने का नही था. प्लान बस इतना था कि एक बार बिट्टू के घर जाएँगे. वहाँ उसके पेरेंट्स से थोड़ा टाइम बात करेंगे और वापस निकल लेंगे. अगर रात ज़्यादा हो गयी होगी तो वहीं किसी होटेल में रुक के, नेक्स्ट डे की फ्लाइट पक्कड़ लेंगे.

"आइ रियली कॅंट बिलीव आइ म डूयिंग दिस तान्या"

"अब रोना बंद करो रोहित. दो दिन काम पे नही जाओगे तो कोई पहाड़ नही टूट पड़ेगा" टॅक्सी में बैठ ते हुए तान्या ने रोहित से कहा.

"बात काम की नही है तान्या. बात है पागलपन की. बिना किसी कारण के हमे ऐसे ही इतने पैसे बर्बाद कर के एक अंजान जगह पर जाना पड़ रहा है"

"तुम्हें पैसों की क्यूँ चिंता है रोहित.. टिकेट्स तो मैने अपने पैसों से लिए हैं... पैसों की चिंता मुझे करने दो"

"हां हां.. तुम ही करो पैसों की चिंता. ख़तम हो गये तो एक और डाका डाल लेना. मुझे क्या पड़ी है" रोहित ने दूसरी तरफ मूह घुमा कर कहा

"रोहित प्लीज़ डोंट स्टार्ट अगेन. इस टॉपिक को यहीं छोड़ दो" अभी तान्या के मूह से यह शब्द निकले ही थे कि एक ट्रक आ कर टॅक्सी से भिड़ गया.

 
आक्सिडेंट ज़ोर का था और टॅक्सी कलाबाज़ियाँ खाते हुए दूर जा गिरी और उल्टी हो गयी. थोड़ी देर बाद तान्या को होश आया तो उसने अपने आप को बंद टॅक्सी में पाया. रोहित भी उसके पास ही था पर बेहोश था. उसके शरीर से काफ़ी खून बह रहा था. तान्या ने अपनी साइड वाले दरवाज़े को अपनी पवर्स से उखाड़ लिया और रेंग कर बाहर हो गयी. उसने अपने हाथ पैर चेक किए तो कहीं कोई भी हड्डी टूटी हुई नही लगी उसको. उसने रोहित को भी खीच के बाहर निकाला और आंब्युलेन्स को फोन कर दिया. रोहित को बाहर निकालते ही वो एक अजीब सी दुविधा में पड़ गयी. उसको अपने सामने 2 ऑप्षन्स दिख रहे थे. अगर वो यहाँ रुकती है और रोहित के साथ रहती है, तो पक्का उसकी फ्लाइट मिस हो जाएगी. रोहित को बचाने के लिए वो वैसे भी कुछ नही कर सकती. जो करना था, वो डॉक्टर्स ने ही करना था. दूसरी ओर अगर वो अभी यहाँ से निकल कर एरपोर्ट चली जाती है, तो शायद बिट्टू और उसके खानदान को बचा पाए. वो यह सोच ही रही थी कि उसको एक गाड़ी आने की आवाज़ सुनाई दी. उसने लिफ्ट माँगने के लिए अपना हाथ आगे किया लेकिन गाड़ी नही रुकी. लेकिन तान्या ने अपना मन बना लिया था के वो सीधा एरपोर्ट ही जाएगी. वो अपनी पवर्स से गाड़ी को उठा कर वापिस पीछे लाई और उसमें बैठे आदमी को निकाल के बाहर किया. वो हैरत से तान्या की तरफ देख रहा था क्यूंकी उसको यकीन नही हो रहा था कि किसी के पास इतनी पवर्स हो सकती हैं. तान्या ने अपना बॅग उठाया और उसकी गाड़ी में बैठ गयी, उससे सॉरी बोला और धम्म से गाड़ी उसके उपर चढ़ा दी. हमेशा की तरह, आज भी तान्या का पीछे किसी को ज़िंदा छोड़ने का मूड नही था. फिर उसने गाड़ी उसने एरपोर्ट की तरफ भगा दी.

*-*

"तुमने आज से पहले कभी ट्रेन में सफ़र किया था दिया?" ट्रेन में बैठे बिट्टू ने दिया से पूछा

"ओफ़फकौर्स किया है.. मैं किसी दूसरे प्लॅनेट से थोड़ा आई हूँ.."

"कभी इंडियन ट्रेन में सफ़र किया है?"

"ना.. पहली बार है.."

"इसलिए मैने एसी का टिकेट नही लिया था. एसी में वो मज़ा कहाँ जो खुली खिड़की के कॉमपार्टमेंट में है. देखो देश की मिट्टी की कितनी अच्छी सुगंध आ रही है. कितना सुंदर नज़ारा दिख रहा है"

"खाख अच्छी सुगंध आ रही है. मुझे तो बहुत बदबू आ रही है. उपर से एंजिन के इतनी पास की बुगी मिली है कि उसका धुआँ भी सीधा अंदर जा रहा है शरीर के" चिड़ते हुए दिया बोली

"यही होता है मेडम महलों में रहने का नतीजा. तुम लोग छोटी छोटी खुशियों से महरूम रह जाते हो. अपने देश और अपनी मिट्टी की खुश्बू क्या होती मुझसे पूछो. एक साल ही यहाँ से दूर रहा हूँ लेकिन फिर भी ऐसा लगता है जैसे पता नही कब से यहाँ के लिए तरस रहा हूँ" अब देश और मिट्टी की बात सुनकर बगल की सीट पर बैठे 2 फ़ौजी भाइयों को भी थोड़ा जोश चढ़ा. वो भी कॉन्वर्सेशन के बीच में कूद पड़े और इधर उधर की बातें करने लगे. इसी टाइम पास में वक्त कैसे बीत गया, किसी को अंदाज़ा ही नही हुआ, और उनका वाला स्टेशन आ गया.

"तो दिया.. यह है मेरा शहर. तुम्हारे शहर के सामने बहुत ही छोटा है... पर यहाँ पे लोगों के दिल बहुत बड़े हैं... सभी देखना कैसे तुम्हें अपना बना के रखेंगे." ट्रेन से समान प्लॅटफॉर्म पर रख कर बिट्टू ने दिया से कहा.

"वो तो ठीक है पर एक कूली कर लें... इतना सामान उठा कर बाहर जाना है क्या"

"हां कर लेते हैं" बिट्टू का इतना बोलना ही था कि उसकी कनपटी पर एक थप्पड़ पड़ा. वो भोचक्का हो कर पीछे घूमा तो कोई उसको ज़ोर से अपने गले से लगा लिया

"साले इतने टाइम बाद आया है और बताया भी नहीं. आदमी है कि कुत्ता. ना कोई खबर, ना कुछ.. आंटी से पता चला कि तू आज आ रहा है तो मैने कहा तुझे स्टेशन से ही उड़ा ले चलूं.. साले सच बता.. एक भी बार याद नही आई मेरी" ..........

*-*

,,,,,,,

"क्या कर रहे हो रणवीर" रणवीर के गले में बाहे डालते हुए सोनिया ने पूछा

"अपनी तबाह हुई लॅब्रेटरी के लोग्स लगभग ठीक कर ही लिए हैं मैने. बस थोड़ी सी मेहनत और करूँगा तो पता चल जाएगा कि उस केज का दरवाज़ा किस ने खोला था." रणवीर ने आन्सर दिया

" क्या तुम अभी तक उसी बात पे अटके हुए हो रणवीर... गेट ओवर इट"

"इतना आसान नही है सोनिया. मुझे पता करना है कि वो जीव को किसने प्रोग्राम किया था और किसने उसकी केज खोली थी. इतने सालों से मैं उसपे काम कर रहा था. कभी भी उसने ऐसी कोई हरकत नही करी थी. और कैसे ही मैने उसमें वो चिप फिट किया, ताकि उसको कंट्रोल कर सकूँ, कुछ ही दिनों में यह हादसा हो गया. मुझे यह नॅचुरल नही लगता"

"ग्रो अप रणवीर. तुम्हारी एक ज़िद के पीछे कितनी कठिनाइयाँ उठानी पड़ी है हम को तुम्हें पता है ना. एक तो तुमने पहले सबके मना करने के बावजूद एक एक्सट्रा जीव बनाया. उपर से उसको नॉर्मल आदमियों की तरह रखने की बजाए तुम उस पर तरह तरह के एक्सपेरिमेंट करते रहे. पता नही क्या क्या इंजेक्ट करते रहे उसके अंदर. जब वो निकल के किसी तरह से भाग गया, तो तुम्हें यह भी गवारा नही हुआ. अब जब तुम्हें उसे नष्ट करे हुए एक साल से उपर हो चुका है, तब भी तुम उस की ही याद में डूबे हुए हो."

"तुम नही समझोगी सोनिया. मेरे बरसों की मेहनत को जब मैने अपने हाथों से नष्ट किया तो कितना दुख हुआ, यह मैं ही जानता हूँ. कितने अरमान मैने पाले थे कि इस दुनिया में किसी को बीमारी नही हो, ऐसा कोई क्यूर बनाउन्गा. मैने लगभग एक पर्फेक्ट सॅंपल तय्यार कर ही लिया था. उसके उपर थोड़े से एक्सपेरिमेंट हम और करते तो मुझे यकीन है कि हम बहुत सारी बीमारियों का इलाज ढूँढ सकते थे. यह दुनिया और अच्छी जगह हो सकती थी रहने के लिए. मुझे पूरा यकीन है कि वो जीव अपने आप वहाँ से नही निकला, उसे किसी ने वहाँ से भगाया था"

"जो हुआ वो हुआ रणवीर. तुम यह मत सोचो कि तुमने क्या खोया है. यह देखो कि तुमने क्या पाया है. उस ज़िंदगी से तुम्हें छुटकारा मिल गया. देखो कितनी खुशी से हम यहाँ रह रहे हैं. पर तुम हो कि अभी भी उन चार लोगों पर निगरानी रखे हुए हो अपने ट्रॅकर्स के ज़रिए. उन्हे सच क्यूँ नही बता देते.. क्यूँ उनकी ज़िंदगी भी तुमने खराब करी हुई है... क्यूँ उनको भी किसी के प्यार से वंचित किया हुआ है"

"क्यूंकी मुझे लगता है कि उनकी पवर्स पूरी तरह से डेवेलप नही हुई हैं. मैं देखना चाहता हूँ कि वो क्या क्या कर सकते हैं और उनकी पवर्स इवॉल्व होती हैं कि नहीं"

"रणवीर कभी तो हमारे बारे में भी सोचा करो. क्यूँ अपनी ज़िंदगी पर ठोकर मार रहे हो. क्या तुम्हें आराम से जीने का कोई हक नही है??" बोलते बोलते सोनिया ने नोट किया कि रणवीर बहुत ही हैरानी से स्क्रीन की तरफ देख रहा है.

"यह.. यह... यह नही हो सकता...." गुस्से में उसने सोनिया की तरफ घूरते हुए कहा "सोनिया.. उस जीव को तुमने आज़ाद किया था ?"

"तुम पागल हो गये हो क्या रणवीर.. ऐसा क्यूँ बोल रहे हो तुम" थोड़ा हिचकिचाते हुए सोनिया ने बोला.

"ऐसा बोल रहा हूँ क्यूंकी ऐसा लोग्स में दिख रहा है. सॉफ पता चल रहा है कि केज को खोलने के लिए तुमने अपने फोन से कमॅंड दिया था"

"ऐसा कुछ नही हुआ था रणवीर"

".. यहाँ यह भी दिखाया जा रहा है कि आर100685 का लास्ट आक्सेस भी तुमने किया था...... यह कैसे हुआ सोनिया.... मैने तो आने से पहले पासवर्ड चेंज किया था और तुम्हें नया पासवर्ड नही बताया था"

"ग़लत बता रहे हैं लोग्स तुम्हारे रणवीर" सोनिया चीखते हुए बोली. "क्या तुम सोच सकते हो कि मैं कुछ ऐसा करूँगी जिससे हमारे रिश्ते में कोई दरार पड़े..."

"तुमने कयि बार आर100685 को आक्सेस किया है कुछ ना कुछ करने के लिए.. तुमने कभी मुझे बताया क्यूँ नही यह सब... लगता है मुझे और गंभीरता से इसकी छानबीन करनी पड़ेगी" रणवीर ने सोनिया की बातों को बिल्कुल अनसुना करते हुए बोला. "पर तुम ऐसा कैसे कर सकती हो... तुम मुझसे प्यार करती हो... तुम मेरा बुरा कैसे सोच सकती हो..." रणवीर बड़बड़ाने लगा. यह इन्फर्मेशन उसके लिए सच में बहुत ही अनैपेक्टेड थी और उसका दिमाग़ काम करना बिल्कुल बंद कर चुका था.

"मैने ऐसा कुछ नही किया रणवीर. तुम मेरी बात मानते क्यूँ नही..." सोनिया गिडगिडाते हुए बोली

"हर बार का आक्सेस तुम्हारे फोन से हुआ है... वाय्स पासवर्ड दिया है तुमने ऑतेनटिकेशन के लिए... मतलब कोई और नही हो सकता... तुमने ऐसा क्यूँ किया सोनिया... क्या बिगाड़ा था मैने तुम्हारा..." सोनिया की एक ना सुनते हुए रणवीर ने यह सवाल सोनिया से पूछा. उसको कितना दर्द हो रहा था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उसकी आँखें नम थी. जिन आँखों ने अपना सपना टूट-ते हुए देखा था, अपनी सारी मेहनत को नाश होते हुए देखा था और फिर भी एक बूँद नही बहाई थी, आज वो इस विश्वासघात से नम हो गयी थी. आज रणवीर को सच में एहसास हो रहा था कि उसका सपना चूर हुआ है और लग रहा था जैसे उस चूर हुए सपने का हर एक ज़र्रा काँटे की तरह उसके दिल में घुस रहा है - धीरे धीरे, दर्द देते हुए. इतना ठगा रणवीर ने कभी अपने आप को महसूस नही किया था. "क्यूँ सोनिया क्यूँ.... क्यूँ किया तुमने ऐसा..."

सोनिया को पता चल चुका था कि अब बहाना बनाने से कुछ नही होगा. उस ने सच बोलने में ही ख़ैरियत समझी. रणवीर के पास बैठ कर और उसके हाथों को अपने हाथों में पकड़ कर वो उसे सारी बातें बताना शुरू कर दी, "रणवीर मेरी माँ मुझे जनम देते वक़्त चल बसी थी. मेरे बाप ने मुझे इसका ज़िम्मेदार माना और मुझे कभी उतना प्यार नही दिया जितना मैं चाहती थी. उसको हमेशा अपनी बीवी से एक बेटे की चाहत थी. अगर मैं लड़का होती तो भी शायद कुछ हो सकता था लेकिन अफ़सोस..." सोनिया की आवाज़ थोड़ी भारी हो रही थी. "खैर... जिस उमर में बच्चों को माँ-बाप के प्यार की ज़रूरत होती है, उस उमर में मैं बोरडिंग स्कूल में थी. मेरे हिस्से का प्यार मेरे बाप की दूसरी दुल्हन और उनके नये बेटे को मिल रहा था. मैं चाहे जो कुछ भी कर लूँ, अपने माँ-बाप की नज़रों में नही आ पाती थी. 90% मार्क्स, स्टेट रंक 1 - यह सब तो जैसे सिर्फ़ ट्रोफीस थे जो मेरे रूम में थे. इनको प्राप्त करने की खुशी कभी मुझे नही मिली. बाद में मुझे पता चला कि मेरे पापा अपने बेटे को साइंटिस्ट बनाना चाहते हैं, तो उनका प्यार पाने के लिए मैने भी साइंटिस्ट बन-ने की सोची. वो पहली बार था जब मैने अपने पापा की आँखों में अपने वजह से आई खुशी देखी थी. मुझे पता नही था कि वो ही आखरी बार भी होगी.

पढ़ाई के दौरान मुझे खबर मिली कि पापा का देहांत हो गया है और माँ ने मुझे बताना भी उचित नही समझा. जिस प्यार को पाने की उम्मीद मुझे उमर भर थी, आज वो उम्मीद भी टूट गयी थी. अपने सारे गुस्से को अपने अंदर दबा कर मैने अपनी पूरी कोशिश पढ़ाई में लगा दी. जब बहुत मेहनत के बाद मुझे तुम्हारे साथ काम करने का मौका मिला तो मुझे लगा जैसे मेरा जीवन सफल हो गया हो. मुझे पूरा यकीन था कि पापा उपर से जब मेरी तरफ देखते होंगे, तो ज़रूर एक खुशी का अनुभव करते होंगे और सबको कहते होंगे कि यह है मेरी बेटी जिसने सिर्फ़ अपने बाप को खुश करने की ठानी थी और आज कर दिखाया. धीरे धीरे हम दोनो में बोल चाल शुरू हो गयी और मैं मन ही मन तुम्हें चाहने लगी. वो दिल जो तब तक सिर्फ़ मेहनत करने के लिए धड़का था, उसकी धड़कनों में से सिर्फ़ तुम्हारी ही आवाज़ आने लग गयी.

समय के साथ मुझे पता चला कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए वोही प्यार है. तुम्हारे मूह से यह बात सुनकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नही रहा. तुम्हारे साथ मुझे जीवन की वो सब खुशियाँ मिलने लगी जो मैने कभी चाही थी. लेकिन यह डर हमेशा दिल में रहता था कि कहीं मैं तुम्हें भी खो ना दूं. अपने काम के प्रति तुम्हारे अंदर भी वोही जुनून था जो कभी मुझमें हुआ करता था. इस बात से मैं तुम्हारे और करीब आ गयी और तुम्हें और अच्छी तरह से समझने लगी. लेकिन यही कारण था कि मेरा डर और भी बढ़ता जा रहा था. जहाँ मेरी मेहनत किसी और के लिए थी, तुम्हारी मेहनत सिर्फ़ अपने लिए थी.

मुझे यकीन था के अपने एक्सपेरिमेंट्स के आगे तुम और किसी के बारे में नहीं सोचोगे. तुम्हारे इतने करीब आ कर और तुम्हें खो जाने का डर ही था जिसने मेरे दिमाग़ ने इस प्लान को एक्सेक्यूट करने की ताक़त दी. मैने ही उस जीव को अच्छी तरह से प्रोग्राम किया था. मैं चाहती थी कि ऐसा लगे कि वो जीव बेकाबू हो गया और उसने अपने जैसे चारों लोगों को मार दिया. जब रसल से यह बात पता चली कि स्पेस्षिप पे भेजे गये सिग्नल्स रेडीरेक्ट हो रहे हैं, तब मैने अपने प्लान को अंजाम देने की ठान ली थी. मुझे लगा कि सारा ब्लेम मैं एलीयेन्स पे डाल दूँगी और हम अपनी ज़िंदगी आराम से बिताएँगे. अपने दिल पे हाथ रख कर कसम खाओ रणवीर और मुझे बताओ कि तुम अपनी पिछले 1 साल की ज़िंदगी से खुश नही हो..."

 
रणवीर जो इतनी देर से चुप चाप सोनिया की बात सुन रहा था, अब बोला "सोनिया यहाँ बात मेरी खुशी की नही है.. बात यह है कि तुम अपने स्वार्थ में इतनी अंधी हो गयी थी कि तुमने मेरी या उन 4 मासूमों की ज़िंदगी के बारे में कुछ नही सोचा. एक निर्दयी प्राणी बन कर तुमने उन चारों को धरती से मिटाने का फ़ैसला कर लिया... क्यूँ ? सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए ना..."

"हां रणवीर.. मैं स्वार्थी हो गयी थी. प्यार में अक्सर आदमी अँधा हो जाता है. और उन चारों की ज़िंदगी हमारी ही मेहनत का फल है. अगर हम नही होते, तो वो चारों भी नही होते. जो ज़िंदगी हम ने दी, हमे उसे लेने का भी पूरा हक़ होना चाहिए..."

"क्या तुम वोही सोनिया हो.. जिसे मैने प्यार किया?? मुझे ऐसा नही लगता... मुझे लगता है जिससे मैं प्यार करता था वो सिर्फ़ एक छलावा था और यही तुम्हारा असली रूप है. तुम मुझसे एक बार कह कर तो देखती सोनिया...."

"कितनी बार रणवीर.. कितनी बार मैने तुम्हें एहसास दिलाने की कोशिश करी, पर तुमने मेरी एक ना सुनी. जुनून बन कर वो चारों तुम्हारे उपर हावी थे. और जिस सोनिया को तुम छलावा कह रहे हो, वोही है वो जिसने तुम्हारे प्यार में दुनिया के एक कोने में ज़िंदगी बिताने की सोची. वोही है जिसने तुम्हारे प्यार के कारण एक बार भी ना सोचा कि वो एक खूनी बनने जा रही है रणवीर... प्ल्ज़ प्ल्ज़ प्ल्ज़ मुझसे अब मूह ना फेरो रणवीर... मैने ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया है... अब जो चीज़ मुझे मिल गयी है, वो मेरे से दूर मत करो रणवीर" सोनिया की आँखों से आँसू झरने की तरह बह रहे थे.

"मुझे कुछ समझ नही आ रहा सोनिया कि मैं क्या करूँ... किस पर भरोसा करूँ मैं अब.." रणवीर ने अपना सर पकड़ लिया जो इतनी ज़्यादा इन्फर्मेशन पाने के बाद दुखने लगा था.

"उन चारों को अपने हाल पर छोड़ दो रणवीर. हम अभी खुश हैं और खुश ही रहेंगे. मेरे पास अभी वो दवाई पड़ी है तो हम आर100685 पर यूज़ करते थे उसकी पवर्स सप्रेस करने को. हम अभी भी उनको वो दवाई दे कर उनको एक नॉर्मल इंसान बना सकते हैं. मेरी बात मान लो रणवीर"

"ऐसा कुछ नही होगा सोनिया. वो लोग जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे... रही हमारे बीच की बात तो उसका फ़ैसला भी मैं चन्द दिनों में कर लूँगा" अभी रणवीर बोल ही रहा था कि उसके पास दिया का ईमेल आ गया कि वो लोग बिट्टू के घर जा रहे हैं. तान्या का भी वहाँ जाने की इच्छा रखना उस पर पहले ही ज़ाहिर हो गया था. "लगता है वो चारों बिट्टू के घर की तरफ जा रहे हैं सोनिया.. मैं भी उनसे मिलकर ही अपना फ़ैसला करूँगा. मैं भी इंडिया जा रहा हूँ."

"मुझे भी साथ ले चलो रणवीर" सोनिया ने बोला

"नहीं सोनिया. कुछ समय मुझे अकेले में चाहिए इस बात पे गौर करने को. प्लीज़ मुझे अकेला जाने दो"

"ठीक है रणवीर. पर वादा करो कि तुम वापस ज़रूर आओगे. जो भी तुम्हारा फ़ैसला होगा वो तुम मुझे यहाँ आ कर बताओगे"

"ज़रूर सोनिया. मैं वापस ज़रूर आउन्गा."

"मैं तुम्हारा समान पॅक कर देती हूँ. मैं वो दवाई भी रख रही हूँ जिससे उन सब की पवर्स दब जाएँगी. अगर तुम्हें उचित लगे तो उसका इस्तेमाल करना, नहीं तो रहने देना" रणवीर में अब सोनिया के व्यू अपोज़ करने की हिम्मत नही बची थी. हां में सर हिलाते हुए वो इंडिया जाने का प्लान बनाने लगा.

*-*

"जी बिट्टू यहीं रहता है.."

"बिल्कुल जी, यह बिट्टू का ही घर है.. आप कौन..."

"मैं तान्या हूँ.. बिट्टू की दोस्त..."

"अर्रे वाह.. अंदर आइए... अपना ही घर समझिए..." उसने तान्या को अंदर किया और फिर बोला "देखो आंटी बिट्टू की दोस्त भी आई है...लगता है मेरे सिवा उसने सब को खबर कर दी थी कि वो आज यहाँ आ रहा है... और फिर मुझे अपना दोस्त कहता है" थोड़ी नाराज़गी के साथ वो बोला

"अर्रे हॅपी बेटा क्यूँ अपना दिल छोटा करता है.. मुझे पूरा यकीन है कि बिट्टू ने तुझे इसलिए नही बताया ताकि वो यहाँ आ कर तुझे सर्प्राइज़ दे..." बिट्टू की मम्मी की किचन में से आवाज़ आई..

"खाख सर्प्राइज़... साले को स्टेशन पे ही पकड़ के रगड़ दूँगा देखना आप.. अच्छा वैसे गाड़ी का समय हो गया है.. मैं उसको ले कर आता हूँ.." फिर तान्या की तरफ मूड कर बोला.. "आप चलेंगी उसको लेने ?"

"न..न... नहीं... आप जाओ.. मैं यहीं उसका इंतेज़ार करती हूँ. " तान्या बोली. वो एन्षूर करना चाहती थी कि पीछे से घर में कोई अनहोनी ना हो...

"जैसी आप की मर्ज़ी" हॅपी बोला और गाड़ी की चाबी उठा कर चलता बना

"अर्रे हॅपी बेटा यह सिलिंडर ख़तम हो गया है.. इसको चेंज तो कर दे.... " आंटी ने किचन से बाहर आ कर बोला "अर्रे.. चला गया... यह भी पूरा वक़्त हवा पे सवार ही रहता है.. लगता है मुझे ही करना पड़ेगा..."

"अर्रे आंटी मैं करवा देती हूँ. आप अकेले क्यूँ करती हैं" कहते हुए तान्या उनके साथ हो ली

*-*,,,,,,,,,,,,,

“यार हॅपी. मुझे पता है कि तेरे मन में बहुत अरमान होंगे अपनी भाभी को यह शहर दिखाने के.. पर प्ल्ज़ पहले घर चलते हैं और फिर घरवालों से मिल कर सीधा घूमने चलेंगे. प्लीज़ इस बात को मत काटना. आज इतने साल बाद तेरा दोस्त तुझसे कुछ गुज़ारिश कर रहा है. इस बात का मान रखना” जीप में चढ़ने से पहले बिट्टू ने हॅपी से बोला

“अबे तू तो बहुत सेनटी हो रहा है यार. ठीक है ठीक है.. सीधा तेरे घर ही चलते हैं, आराम से यह बात कह देता, इतना सेनटी होने की क्या ज़रूरत थी... तू तो सच में बिल्कुल बदल गया है रे.. चलो जी सब लदो जीप में, चलते हैं सीधा आपके ससुराल” हॅपी का मूड अपने यार को इतना बदला देख थोड़ा ऑफ हो गया था. पूरे रास्ते उस ने कोई बात नही करी और 15 मिनट में ही उनको घर पे ले आया. “तुम लोग चलो. मैं समान ले कर आता हूँ”

“अकेले कैसे उठाएँगे आप.. हम तीनो को स्टेशन पे उठाने में इतनी मेहनत लगी थी. सब थोड़ा थोड़ा ले जाते हैं. आराम से हो जाएगा.” दिया बोली

“अर्रे दिया जी. फॉरमॅलिटी मत ना करो. यह बिट्टू कम है फॉरमॅलिटी के लिए जो आप भी शुरू हो गयी.. आप चलो मैं लाता हूँ”

“अबे बंद कर यह नाटक. दिया तुम यह उठाओ. मैं वो उठाता हूँ और हॅपी तू वो उठा... साले एक झापड़ मारूँगा अब मूड खराब रखा तो. अब घर आ गये हैं. खुश हो जा” बिट्टू ने बोला. वो घर को देख कर बहुत ही खुश था. जो अनहोनी होने का डर उसे सता रहा था, उसका कोई नाम ओ निशान ना था. सब ने सारा समान उठाया और भाग के अंदर हो लिए. वो देख ना पाए कि एक और टॅक्सी वहाँ आ कर रुकी है जिसमें रणवीर बैठा था.

अंदर तान्या अपनी पवर्स से सिलिंडर को उठा कर उसकी जगह पहुँचा रही थी. आंटी से बातचीत के दौरान उसको पता चल गया था कि रणवीर ने उनके बारे में सब कुछ बता दिया है. अब फालतू में सिलिंडर उठा के वो अपनी शक्ति खर्च करना नही चाहती थी. जब हॅपी, दिया और बिट्टू घर में घुसे तो सिलिंडर हवा में था और किचिन की तरफ जा रहा था. “पेन्चो यह क्या हो रहा है” हॅपी ज़ोर से चीखा. तान्या की कॉन्सेंट्रेशन थोड़ी सी टूटी जिसके कारण सिलिंडर धडाम से नीचे गिरा. इससे पहले कि वो ज़मीन पर लगता, दिया ने अपनी पवर्स से उसे रोकना चाहा पर रुकने की बजाए एक बहुत ही ज़ोर का धमाका हुआ. धमाका इतनी ज़ोर का था कि घर के सारे शीशे टूट गये और सब लोग इधर उधर जा कर लगे. घर पूरा जलने लगा. बिट्टू इंपॅक्ट के कारण और दरवाज़े के सबसे पास होने के कारण, सीधा बाहर जा कर गिरा.

रणवीर घर की ओर बढ़ ही रहा था जब धमाका हुआ और अगले ही पल उसने बिट्टू को उड़ते हुए बाहर आ कर देखा. उसने फटाफट से अपने फोन से फाइयर ब्रिगेड को बुलाया और दौड़ के बिट्टू के पास हो गया. उसकी एक नज़र घर की तरफ गयी जो बुरी तरह से जल रहा था. अंदर किसी के भी बचने का कोई आसार नज़र नही आ रहा था. बिट्टू का चेहरा भी पहचान-ने लायक नही था. बहुत ही धीरे धीरे बिट्टू की बॉडी रिस्टोर हो रही थी. उसका सर अपनी गोद में रखकर रणवीर के ज़हन में सिर्फ़ फ्यूचर का ख़याल आ रहा था. अब यह बात पूरी सॉफ हो गयी थी कि उसके बनाए 3 अजूबे घर के अंदर ही मर गये थे. बिट्टू बच सकता था. लेकिन रणवीर का एपेरिमेंट पूरी तरह से बंद हो ही चुका था. आज अगर बिट्टू जी भी जाता तो शायद वो इस हादसे को अपने ज़हेन से कभी ना निकाल पाता.

उसका सारा परिवार आज ख़तम हो चुका था. ऐसे में जब उसको सच पता चलेगा कि यह सब सोनिया के कारण हुआ है तो क्या वो कभी रणवीर और सोनिया को माफ़ कर पाएगा? रणवीर सोनिया से पागलों की हद तक प्यार करता था. वो जानता था कि वो सोनिया के बिना नही रह सकता. और जब तक बिट्टू ज़िंदा था, रणवीर पूरी तरह से कभी सोनिया का नही हो सकता था. सच कह रही थी वो.. यह चारों एक जुनून की तरह सवार थे रणवीर के उपर और यह जुनून ख़तम करने का एकलौता मौका अब रणवीर के हाथ में आ गया था. अपनी पूरी ज़िंदगी की मेहनत पीछे छोड़ कर आज वो एक नयी ज़िंदगी शुरू करने जा रहा था. उसने अपने बॅग से निकाल कर वो दवाई बिट्टू में इंजेक्ट कर दी जिससे बिट्टू का ठीक होना बंद हो गया. उस की हालत इतनी खराब थी कि कुछ ही पलों में उसने भी दम तोड़ दिया. उसकी साँसों के रुकने के साथ ही रणवीर की आँखों से भी आँसू टपक पड़े. यह आँसू अपनी पुरानी ज़िंदगी भुला कर नयी ज़िंदगी शुरू कर रहे रणवीर की कोशिश की निशानी थी. थोड़ी ही देर में फाइयर ब्रिगेड वाले आ गये. जैसा कि रणवीर को पता था, घर में से बिट्टू के ‘3 दोस्तों’ और माँ-बाप की बॉडी निकाली गयी. किसी का चेहरा पहचान में नही आ रहा था. लेकिन रणवीर को पूरा यकीन था कि वो इन सब को पहचान गया है. थोड़ी सी एंक्वाइरी निपटाने के बाद, रणवीर वापस सोनिया के पास जाने के लिए प्लेन की टिकेट बुक करने के लिए चला गया.

*-*

“नर्स वो बेड नंबर 223 वाला पेशेंट कहाँ गया?”

“पता नही अभी तो यहीं था. 15 मिनट पहले चेक किया था मैने..”

“बेड खाली पड़ा है... ढुंढ़ो उसे... आइ वॉंट हिम हियर नाउ !!!”

“क्या हुआ डॉक्टर साहब.. किस टेन्षन में हो... वैसे भी उस मरीज़ का कोई जान पहचान वाला आया नही था... अच्छा ही हुआ चला गया ना... नहीं तो ऐसे ही पड़ा रहता पता नहीं कितने दिन...”

“बात वो नहीं है डॉक्टर. दरअसल कल जब वो आक्सिडेंट साइट से लाया गया और उसका ऑपरेशन हुआ तो मैने उसके स्पाइन में से यह चिप निकाला था जो कि मुझे अभी तक नही पता क्या है. आज जब उसके ब्लड सॅंपल की रिपोर्ट्स आई तो पता नही उसका डीयेने भी काफ़ी अजीब है. मुझे लगा कि कोई ग़लती हो गयी है इसलिए मैं उसका ब्लड लेने वापिस आया तो देखा कि वो नदारद है”

“अर्रे छोड़ो यार. सरकारी हॉस्पिटल है.. जो हुआ सो हुआ.. अपना क्या नुकसान है.. फेंक दो इस चिप को और चलो चल कर कॉफी पीते हैं”

बंधुओ ये कहानी समाप्त हुई आपको कैसी लगी ज़रूर बताना

समाप्त

 
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