"वहाँ टॅक्सी के पास झाड़ियों मे भी एक आदमी है. कुल पाँच आदमी ज़िंदा या मुर्दा आप के साथ जा सकेंगे. छटा(6थ) मुझे पसंद आ गया है."
इमरान टॅक्सी ड्राइवर की तरफ देखने लगा.
"तुम दोनों को भी मेरे साथ ही चलना पड़ेगा. और तुम फोर्मली अपना स्टेट्मेंट दोगे."
"मैं स्टेट्मेंट और बयानों को सिरे से नहीं मानता. चाहे वो फॉर्मल हो या नोन फॉर्मल."
"तुम जहाँ कहीं भी होगे....तुम्हें इस क्रम मे आना ही पड़ेगा."
इमरान कुच्छ ना बोला. अचानक रहमान साहब खावीर की तरफ मुड़े...."तुम अपना चेहरा दिखाओ..."
"बॉस की अनुमति के बिना ये असंभव है सर...." खावीर ने इमरान की तरफ इशारा कर के कहा.
"आप ऐसी बातों की फरमाइश ना करें जो मेरे वश से बाहर हो..." इमरान ने आदर पूर्वक कहा.
फिर इमरान और खावीर अलग जाकर धीरे धीरे बात करने लगे.
रहमान साहब उन्हें घूर रहे थे.
थोड़ी देर बाद खावीर एक बेहोश आदमी को अपनी कमर पर लाद रहा था.
इमरान ने दरवाज़ा खोला और खावीर बेहोश को कमर पर लादे बाहर चला गया.
"ये क्या कर रहे हो तुम?" रहमान साहब ने भर्राई हुई आवाज़ मे धीरे से कहा. स्वर मे अब पहले जैसी कठोरता नहीं थी.
"आप की वापसी की व्यवस्था." इमरान ने उत्तर दिया. "मुझे दुख है कि मैं देर से पहुचा.....वरना आप यहाँ ना आते."
"लेकिन अब तुम जो कुच्छ भी कर रहे हो मैं उसे पसंद नहीं करता. मैं तुम्हें क़ानून की सीमा से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दे सकता. अच्छा यही होगा कि मेरे साथ चलो और विधिवत अपना बयान पोलीस को दो."
"सॉरी....मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा. आख़िर मेरे भी कुच्छ ड्यूटीस हैं."
"मैं समझा नहीं...?"
"देखिए आप जानते ही हैं कि मैं अक्सर सर सुल्तान केलिए काम करता रहता हूँ. ये सब भी मैं उन्हीं केलिए कर रहा हूँ. आप ये भी जानते हैं कि वो एक ज़िम्मेदार इंसान हैं..."
"मैं सब कुच्छ जानता हूँ.....लेकिन इस मामले से सर सुल्तान को क्या रूचि हो सकती है?"
"सर सुल्तान ही ठहरे...." इमरान सर हिला कर बोला. "उन्हें तो इसकी चिंता भी पड़ी रहती है कि उनके पड़ोसी के घर प्रति दिन मूँग की दाल क्यों पकाई जाती है?"
"बको मत....तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा..." रहमान साहब को फिर गुस्सा आ गया..."वरना हो सकता है कल सुबह तुम हथकड़ियों मे मेरे सामने लाए जाओ..."
"भुगत लूँगा.....जो भी भाग्य मे है..." इमरान ठंडी साँस लेकर बोला.
खावीर वापस आ गया था.....और अब दूसरे बेहोश आदमी को कमर पर लाद रहा था. उसके बाहर जाते ही रहमान साहब फिर बोले..."अच्छा तो फिर ये सब मेरे साथ जाएँगे....और तुम से मैं बाद मे समझूंगा...."
"मैं आप से पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि ये मेरा शिकार है..." इमरान ने ड्राइवर की तरफ हाथ उठा कर कहा.
"लेकिन इसका परिणाम सोच लो." रहमान साहब ने कहा.
इमरान ने टॅक्सी ड्राइवर के पैरों को बँधे रहने दिया और शेष दो के पैरों से रस्सी निकाल दी थी ताकि वो चल कर टॅक्सी तक जा सकें. उनके हाथ पीठ पर बँधे ही थे.
"मैं फिर कहता हूँ कि तुम से मूर्खता हो रही है." रहमान साहब ने नर्म लहजे मे उसे समझाने की कोशिश की.
"पैदाइश से आज तक मुझ से कोई अकल्मंदी नहीं हुई.....आप जानते ही हैं."
इस पर रहमान साहब फिर उबल पड़े.....और थोड़ी देर तक बहस चलती रही फिर खावीर वापस आ गया.
"आप इन दोनों को ले जाइए" इमरान ने रहमान साहब से कहा. "और प्लीज़ मेरे मामले मे दखल मत दीजिए.....वरना जिस प्रकार आप क़ानून को सामने ला खड़ा कर देते है उसी प्रकार मजबूरी वश मुझे भी अपने अधिकारों का प्रदर्शन करना पड़ेगा. क्या आपको पता नहीं है कि मुझे होम मिनिस्ट्री से इस प्रकार के विशेष अधिकार प्राप्त हैं...."
"खामोश रहो....सब बकवास है....वो विशेष अधिकार पर्मनेंट नहीं थे जो जो तुम्हें कभी सर सुल्तान के कारण मिले थे."
"मैं खामोश हूँ.....लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि आप ने अभी तक शाम की चाइ नहीं पी होगी."
"बको मत नालयक.....मैं इसे अपने साथ ले जाउन्गा." रहमान साहब ने दाँत पीस कर कहा.
"तो आप नहीं मानेंगे?" अचानक इमरान का मूड भी खराब हो गया....उसने खावीर से कहा...."डीजी साहब को टॅक्सी तक छोड़ कर वापस आ जाओ."
रहमान साहब कुछ पल उसे घूरते रहे फिर दरवाज़े की तरफ मूड गये.
अंधेरा फैलते ही सिम्मी की बेचैनी बढ़ने लगी. आज उसने ठान लिया था कि सुनहरी लड़की को घर ज़रूर लाएगी. पापा आज भी लॅब मे ही रात बिताने वाले थे. उनका खाना पहुचा कर सिम्मी सोचने लगी कि किसी तरह उस बूढ़े नौकर को भी उसके क्वॉर्टर मे ही भेज दिया जाए.....जो रात को बंग्लो मे सोता था.
वो उसे भी बंग्लो से टाल देने मे सफल हो गयी......और अब उसे सुनहरी लड़की की प्रतीक्षा थी. इसलिए वो अंधेरा फैलते ही किचन की खिड़की मे जा खड़ी हुई थी.......और उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था.
वो खुद को पृथ्वी की पहली लड़की मान रही थी जिस की किसी दूसरे ग्रह की लड़की से दोस्ती हुई थी. कितनी अजीब बात थी.....कितनी अजीब.......वो सोचती और सोचती ही रह जाती. स्पारिया या शुक्र ग्रह वाले कितने विकसित थे. उन्होने ऐसी मशीन भी बना ली थी जो सोचों को प्रकट उसी भाषा मे कर दें जो सुनने वाले की हो. उस मशीन ने उसे सच मुच हैरत मे डाल दिया था.
वैसे उसे पिच्छली रात सुनहरी लड़की की आवाज़ एकदम सपाट और उस मे किसी प्रकार के भाव नहीं थे. लेकि शायद वो उसकी अपनी आवाज़ ही ना रही हो.
हां ठीक तो है. वो तो केवल सोच को प्रकट किया जा रहा था. वो आवाज़ भी उस मशीन की ही पैदा की हुई होगी.
वो सोचती रही और उसे ये याद आया कि वो आवाज़ उस लड़की की आवाज़ से भिन्न भी थी.
वो ना जाने कब तक खिड़की मे खड़ी रही फिर नरकुल की झाड़ियों के पास रौशनी देख कर चौंक पड़ी.
और दूसरे ही पल वो खुद नहीं दौड़ रही थी बल्कि उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई शक्ति उसे हवा मे उड़ाए ले जा रही हो.
झाड़ियों के पास सुनहरी लड़की मौजूद थी......और आज सिम्मी को वो इतनी अजीब लगी कि उसने बोखला कर अपनी आँखें बंद कर लीं. वो सर से पाओं तक सफेद थी. शरीर का रंग ही सफेद था. लेकिन वो किसी कपड़ों मे नहीं थी. अजीब बात ये थी कि उसे नंगी नहीं कह सकती थी. वैसे वो पहली नज़र मे नंगी ही लगती थी. उसने आगे बढ़ कर सिम्मी को दबोच लिया.......और उसे प्यार करने लगी......[ ]
"त्त....तुम्हें शर्म नहीं आती...." सिम्मी हक्लाई. लेकिन लड़की शायद समझी ही नहीं कि वो क्या कह रही है. फिर वो उसे नरकुल की झाड़ियों की तरफ खिचने लगी.
और थोड़ी देर बाद वो पिच्छली ही रात की तरह फेग्राज़ज़ मे बैठी हुई थी.
सिम्मी उसकी तरफ नहीं देख रही थी. चाहे वो किसी प्रकार का लिबास ही रहा हो लेकिन सिम्मी केलिए आँखें उठाना दूभर हो रहा था.
सुनहरी लड़की ने उसके सर पर चमड़े का खोल रख दिया और सिम्मी के कानों मे फिर वही पिच्छली रात की तरह हल्की सरसराहट गूंजने लगी.
अचानक उस से कहा गया...."क्या तुम आज मुझ से नाराज़ हो?"
"नहीं तो......मगर तुम......"
"हां बोलो चुप क्यों हो गयीं?"
"मुझे तुम्हारी तरफ देखते शर्म आती है. तुम सर से पैर तक नंगी लग रही हो."
"ओह्हो..." सुनहरी लड़की हंस पड़ी. फिर बोली...."अर्रे.....मैं कपड़ों मे हूँ...."
"इतने पतले और चुस्त कपड़े की नंगी लग रही हो....हम लोग इसे अच्छा नहीं समझते...."
"मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि तुम स्परसिया के निवासियों से 1000 साल पिछे हो. अर्रे ये तो स्परसिया की लड़कियों का मॉडर्न ड्रेस है. लेकिन केवल हाइ क्लास की लड़कियाँ ही इस फॅशन को अपना सकती हैं क्योंकि इस का कॉस्ट काफ़ी है. तुम इस कपड़े को छु कर देखो.....ये तुम्हें मेरी स्किन की तरह ही नर्म और गर्म लगेगी."
"नहीं.....तुम मत पहना करो ऐसा लिबास जो शरीर से चिपक कर रह जाए. मैं तुम से बहुत प्रेम करती हूँ. इसलिए कह रही हूँ.....वरना मुझे क्या...."
"ओके.....अब नहीं तुम्हारे सामने नहीं आउन्गि इस ड्रेस मे.....मैं अभी अपना गाउन पहन लेती हूँ..."
उसने फेग्राज़ज़ के एक बॉक्स से अपना गाउन निकाल कर पहन लिया....फिर बोली.
"ये लो अब देखो मेरी तरफ..."
"अब देखूँगी...." सिम्मी मुस्कुराइ. "हां ठीक हैं.....तुम मुझे इस गाउन मे अच्छी लगती हो."
"ये तो अब से 5000 साल पहले का ड्रेस है. मुझे चूँकि ओल्ड फॅशन भी रोमटिक लगता है इस लिए कभी कभी इन ओल्ड फॅशन वाले ड्रेस को भी एंजाय करती हूँ. अगर स्परसिया मे मुझे कोई इस ड्रेस मे देख ले तो शायद पागल समझे या भूत समझ कर चीखना शुरू कर दे. मैं अक्सर अपने फ्रेंड्स को इस लबादे (गाउन) से डरा चुकी हूँ."
सिम्मी हँसने लगी. उसकी समझ मे नहीं आ रहा था कि अब वो किस टॉपिक पर बात करे. वो तो ये भी भूल गयी थी कि उसने आज उसे अपने बंग्लो पर ले जाने की ठान रखी थी.
उसने चमड़े की उस टोपी की तरफ इशारा कर के कहा...."तुम्हारी ये मशीन बड़ी विचित्र है. आज मैं दिन भर इसी के बारे मे सोचती रही."
"ओह्ह....ये 'कपल टॅययेज' है. ये तो हमारी दो सौ साल पुरानी आविष्कार है......और इसका ये मॉडेल तो बहुत पुराना है. अब तो हम ने ऐसे कपल टॅययेजस बनाए हैं जिन मे तार जोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती. आज मैं वैसा ही एक सेट लाई हूँ. ये तो कल जल्दी मे उठा लाई थी.......और ये यहीं फेग्राज़ज़ मे पड़ा रह गया था. अच्छा आप उस टोपी को उतारो.....मैं तुम्हें लेटेस्ट कपल टॅययेज का एक्सपीरियेन्स कराउन्गी..."
सिम्मी ने सर से वो खोल उतार दिया. सुनहरी लड़की पहले ही उतार चुकी थी. अब उसने एक बॉक्स से एक छोटा सा बॅग निकाला. ये बॅग भी सोने का ही लगता था. उसने उसे खोल कर दो ट्रॅग्युलर प्लेट जैसी कोई वस्तु निकाली. ये भी किसी चमकदार मेटल का बना हुआ था. उन ट्रॅंगल्स के दो सिरों पर पतले पतले तार थे.......और तारों की समाप्ति पर छ्होटे छ्होटे हेड-फोन से लगे हुए थे.
उसने एक ट्रॅग्युलर प्लेट उठा कर सिम्मी की नाक की जड़ से ऐसे लगाया कि उसके होन्ट छुप गये. ट्रॅंगल का तीसरा सिरा जिस पर तार नहीं था नीचे की तरफ लटकता रहा. हेड फोन मे हुक लगे हुए थे जो कानों मे फसा दिए गये. इस प्रकार सिम्मी के दोनों कान और मूह बंद हो गये लेकिन वो आसानी से अपने होंठो को हिला सकती थी.
सुनहरी लड़की ने वैसा ही हेड फोन अपने कानों से लगाए......और उसका मूह भी चमकदार ट्रॅंगल से छुप गया.
"क्या तुम मेरी आवाज़ सुन रही हो?" तभी सुनहरी लड़की ने पुछा.
"हां....सुन रही हूँ." सिम्मी के स्वर मे हैरत थी. क्योंकि दोनों के बीच किसी प्रकार का कॉंटॅक्ट नहीं था. अर्थात दोनों प्लेट किसी प्रकार के तार से नहीं जुड़े हुए थे.
"ये उस से भी अधिक आश्चर्य-जनक है." सिम्मी ने कहा.
"निश्चित रूप से तुम्हारे लिए आश्चर्य-जनक होगा लेकिन हम लोग जो आए दिन देवलांडो की यात्रा करते रहते हैं.....इसे ऐसे ही साथ रखते हैं जैसे सब अपने साथ रुमाल रखते हैं."
"क्यों...? देवलांडो से इसका क्या संबंध?"
"आज से दो सौ साल पहले देवलांडो तक पहुचने की योजना बनाई गयी थी. लेकिन इसकी भी ज़रूरत थी कि हम देवलांडो के निवासियों की सोच से अवगत रह सकें.......और जो कुच्छ सोचें उसे उनके दिमाग़ मे पहुचा सकें. इसलिए एक तरफ तो ऐसे फेग्राज़ज़ बनाने की कोशिश होती रही जो देवलांडो तक पहुचा सकें......दूसरी तरफ सोचों के आदान प्रदान के लिए कपल टेरिगेल बनाने पर भी प्रयास होता रहा. साधारण सा फेपोफ्फ जो केवल स्परसिया के उपर उड़ सकते थे.....आज से पाँच सौ साल पहले ही बना लिए गये थे. बाद मे कपल टॅययेज भी बन गये जो और फेपोफ्फ को डेवेलप कर के फेग्राज़ज़ मे बदला जा सका."
"तो देवलांडो के निवासियों से तुम लोगों ने कम्यूनिकेशन बना लिया है?"
"हां....बिल्कुल....अब तो हम वहाँ की काई भाषा बोल भी सकते हैं.`100 साल पहले हमे अधिकतर कपल टॅययेज का ही सहारा लेना पड़ता था. किसी किसी भाग मे अब भी कपल टॅययेज की ही मदद लेनी पड़ती है."
"क्यों?"
"क्योंकि उन भागों के लोगों की भाषा हम आज तक नहीं सीख पाए. वो भाषाएँ विचित्र हैं."
"क्या देवलांडो भी तुम्हारी तरह ही विकसित हैं?"
"नहीं......बॅस ये समझो कि वो लोग कपड़े बुनना जानते हैं लेकिन सिल कर पहनना नहीं जानते....."
"ओह्हो.....तब तो सच मुझ तुम सब उन पर राज करते होगे...."
"शासन तो तुम लोगों पर भी हो सकती है......लेकिन केवल तुम्हारे कारण मैं उसे पसंद नहीं करूँगी."
"ओह्ह....याद आया...." सिम्मी अचानक चौंक कर बोली...."आज तो मैं तुम्हें अपने घर ले जाउन्गि..."
"नहीं प्यारी लड़की.....मुझे इसपर मजबूर मत करो..."
"क्यों?"
"अगर किसी ने मुझे देख लिए तो मैं ज़िंदा वापस ना जा सकूँगी...."
"तुम डरती क्यों हो? मेरे बंग्लो मे इस समय मेरे अलावा और कोई नहीं है....पापा अपनी लॅब मे हैं और मैने नौकरों को उनके घरों मे भेज दिया है."
"इसके लिए ज़िद मत करो....मैं नहीं चाहती कि तुम किसी मुसीबत मे पड़ जाओ..."
"नहीं.....मैं तो तुम्हें हर हाल मे लेकर जाउन्गि..."
"ज़िद मत करो.....पता नहीं वहाँ जाकर कैसी परिस्थिति बन जाए..."
"मुझ पर भरोसा करो....कोई तुम्हारा बाल भी बाका नहीं कर सकेगा."
"अच्छा...." सुनहरी लड़की ने एक लंबी साँस ली....."मगर आज नहीं.....मुझे जल्दी वापस जाना होगा. कल रखो....कल मैं आते ही तुम्हारे साथ चल दूँगी. मुझे भी इच्छा है कि मैं रयामी के निवासियों की रहण सहन देखूं......ओके अब मुझे अनुमति दो...."
सिम्मी निराश हो गयी. उसे खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने पहले ही ये बात क्यों नहीं कही.
कुच्छ पल वो चुप चाप बैठी रही फिर फेग्राज़ज़ से बाहर निकल आई.
कुच्छ ही देर मे फेग्राज़ज़ हवा मे उँचा उठ कर निगाहों से ओझल हो गया.
"क्यों दोस्त....?" इमरान ने टॅक्सी ड्राइवर से कहा....."इस खेल का क्या मकसद था?"
"तुम कॉन हो?" टॅक्सी ड्राइवर ने लापरवाही से कहा.
"मैं क्यों बताउ कि मैं......अर्रर...." इमरान अपना मुहह पीट'ता हुआ बोला...."शायद मैं बताने ही जा रहा था......यार इतनी अकल तो तुम्हें होनी ही चाहिए कि अगर यही बताना होता तो मैं अपने चेहरे पर नक़ाब क्यों लगाता?"
"ना बताओ...." टॅक्सी ड्राइवर ने अपने कंधे उचका कर अपनी लापरवाही का प्रदर्शन किया.
"मैं जानता हूँ कि तुम उड़ने की कोशिश अवश्य करोगे....और मुझे तुम पर वही हथियार इस्तेमाल करना होगा जो जो तुम मिस्टर रहमान केलिए इस्तेमाल कर रहे थे.....यहाँ कहीं ना कहीं और भी कोयला होगा.....जिन से अंगीठी का पेट भरा जा सके. और ये सलाख......क्या समझे...."
"टॅक्सी ड्राइवर कुच्छ ना बोला.....वो अंगीठी की तरफ देखने लगा था. इमरान को अब उसकी आँखों मे चिंता के लक्षण दिखाई दिए.
"बोलो....मेरी समझ से तुम देर कर रहे हो....." इमरान ने कहा.
"क्या पुच्छना चाहते हो?"
"उसी रेड पॅकेट के बारे मे जो तुम मिस्टर रहमान से वसूल करने के चक्कर मे हो...."
"तुम्हें धोका हुआ है.....ये एक पुराना झगड़ा था. रहमान साहब ने एक आदमी के कुच्छ पेपर्स दबा रखे हैं.....मैं नहीं जानता कि उन्होने ये काम किसके इशारे पर किया है...."
"वो आदमी कॉन है? और वो पेपर्स कैसे हैं?" इमरान ने पुछा.
"ये मैं कैसे जान सकता हूँ कि वो पेपर्स कैसे हैं. मैं तो एक आदमी केलिए काम कर रहा हूँ...."
"किस आदमी केलिए?"
"जिसके पेपर्स रहमान साहब ने दबा रखे हैं...."
"उस आदमी का पता बताओ..."
"पता.....पता तो मुझे नहीं है.....हां वो अक्सर इधर उधर मिलता रहता रहता है. मेरा अनुमान है कि वो खुद भी एक धनी आदमी है. हमेशा कीमती कारो मे दिखाई देता है. शायद उसके पास कयि कारें हैं. उस ने मुझे एक बड़ी राशि ऑफर किया था. इसी लिए मैं कोशिश कर रहा हूँ कि रहमान साहब वो पेपर्स मेरे हवाले कर दें. मैं तो केवल धमका रहा था उन्हें......" वो दहक्ति हुई अंगीठी की तरफ देख कर खामोश हो गया.
"मुझे तुम्हारे इस स्टेट्मेंट पर यकीन नहीं आया....." इमरान ने कहा.
"तो फिर मुझे मार डालो....इस से अच्छा और कोई तरीका नहीं."
"रहमान साहब की नकल मत करो...." इमरान ने शुस्क स्वर मे कहा...."तुम उस से घाटे मे रहोगे..."
"मैं किसी की नकल नहीं कर रहा.....सच कह रहा हूँ.....क्योंकि मेरे फरिश्ते भी नहीं बता सकेंगे कि उस रेड पॅकेट मे क्या है...और मुझे ये काम किन लोगों ने सौंपा था...."
"ओह्ह.....तुम उन्हें नहीं पहचानते...."
"जी नहीं....वो भी नकाबों मे थे......और उन्होने मुझे इसके लिए पचास हज़ार दिए थे......और काम हो जाने पर पचास हज़ार का वादा था."
"और तुम ने उसे स्वीकार कर लिया था..."
"आप खुद सोचिए कि एक लाख कम नहीं होते.....जबकि इस से भी कम पैसों केलिए लोग अपनी जान पर खेल जाते हैं..."
"तुम भी अपनी जान पर खेल गये...." इमरान हंस पड़ा. लेकिन फिर अचानक ख़ूँख़ार भेड़िए की तरह गुर्राया..."अगर मैं तुम्हारे चेहरे पर लिक्विफाइड अमोनिया के छिन्टे दूं तो कैसी रहेगी?"
"मतलब उसी समय समझ मे आएगा जब मैं ये कर दूँगा फ्लेगर....."
टॅक्सी ड्राइवर के कंठ से अजीब सी आवाज़ निकली जो भय का परिणाम ही समझा जा सकता था.
"हुन्ह....तुम जैसे कीड़े अगर मुझे धोका दे सकें तो मैं इसे अपना दुर्भाग्य ही समझूंगा मिस्टर जॅम्स फ़्लगगेर....तुम मेक अप ज़रूर अच्छा कर लेते हो लेकिन अपनी आँखें नहीं छुपा सकते......और मैं ये भी जानता हूँ कि अक्सर तुम विदेशी एजेंट्स के मोहरे बनते रहते हो. पोलीस इसके कारण तुम पर नज़र भी रखती है.....लेकिन अभी तक तुम्हारा मामला संदेह की सीमा से आगे नहीं बढ़ सका. क्या अब ये भी बता दूं कि तुम हाइवे-13 पर एक छोटा सा केफे चलाते हो....."
"म्म....मैं इस से इनकार नहीं करूँगा....." टॅक्सी ड्राइवर ने कहा..."मैं खुद ही आपको अपने बारे मे सब कुच्छ बता देता.....लेकिन आप ने इसका मौका ही नहीं दिया.....और विश्वास कीजिए कि मैं उन लोगों के बारे मे बिल्कुल नहीं जानता जिन्होने मुझे ये काम सौपा था...."
"ख़तम करो.....ना तुम मुझे विश्वास दिला सकते और ना मैं तुम्हें छोड़ सकता हूँ.....इसलिए मूह को थकाने से क्या लाभ...."
"मैं वो पचास हज़ार आप की सेवा मे प्रस्तुत कर के कहीं और चला जाउन्गा...."
"नहीं....तुम वो पचास हज़ार मेरी सेवा मे प्रस्तुत किए बिना ही कहीं और चले जाओगे...."
बाहर से कदमों की आवाज़ें आईं.....फिर खावीर अंदर प्रवेश किया. वो हंस रहा था.
"क्यों.....क्या हुआ?"
"रहमान साहब बहुत गुस्से मे थे." खावीर ने कहा.
"कोई नयी बात नहीं है....." इमरान ने लापरवाही से कहा.
"उनके पास रेवोल्वर नहीं था..." खावीर ने कहा...."मैने उन्हें अपना रेवोल्वर दिया.....जिसे उन्होने बड़ी सावधानी से हाथ मे रुमाल लपेट कर पकड़ा था. मगर मैने तुरंत उन्हें याद दिलाया कि मेरे हाथों मे ग्लव्स हैं.....उन्हें रेवोल्वर पर मेरे फिंगर प्रिंट नहीं मिल सकेंगे......इस पर वो और अधिक क्रोध मे आ गये....."
"ख़तम करो..." इमरान हाथ उठा कर बोला. "क्या तुम इस आदमी को पहचानते हो?"
"नहीं..."
"मिस्टर जेम्ज़ फ्लेगर से मिलो.....थर्टींत हाइवे पर फेमस जेम्ज़ पॉइंट आप ही की है...."
"नहिंन्न्न्...." खावीर के स्वर मे हैरत थी.
"हां....ये वही जेम्ज़ फ्लेगर है जिसके बारे मे तुम लोगों का 'गुरुघन्टाल' अक्सर उलझनों का शिकार रहा है."
"फिर अब इसके लिए क्या किया जाए?" खावीर ने चिंतित लहजे मे कहा.
"मैं जानता हूँ कि अभी ये अपना मूह नहीं खोलेगा....इसलिए तुम इसे बंद रखो.....मेरा मतलब शायद समझ ही गये होगे.....हेड क्वॉर्टर्स का साउंड प्रूफ कमरा इस काम केलिए सूटेबल रहेगा. लेकिन इस से पहले वहाँ का समान हटाना पड़ेगा......और तुम इसकी आँखों पर पट्टी बाँध कर इसे वहाँ ले जाओगे."
"वो तो ठीक है.....मगर...."
"हां.....मैं जानता हूँ कि तुम लोग गुरुघन्टाल की अनुमति के बिना उस इमारत मे कदम भी नहीं रख सकते. लेकिन इस समय तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए. तुम्हारा गुरुघंताल अगर इस बारे मे तुम से पुच्छे तो तुम बड़े आराम से मेरा नाम कह देना. मैं ये सब अपनी ज़िम्मेदारियों पर कर रहा हूँ."
"टॅक्सी ड्राइवर एकदम चुप हो गया था. ऐसा लग रहा था जैसे अब वो खुद को लापरवाह प्रकट करने की कोशिश कर रहा हो. वो तब भी नहीं बोला जब खावीर ने उसके कॉलर पकड़ कर उठाया था.
उसके हाथ भी पीठ पर बाँध दिए गये लेकिन पैर की रस्सी खोल दी गयी ताकि उसे कार तक ले जाने मे कठिनाई नहीं हो.
"चलिए..." खावीर ने इमरान से कहा.
"मैं कुच्छ देर यहाँ ठहरुन्गा....तुम इसे ले जाओ लेकिन देखो तुम्हें उस समय तक वहाँ रुकना होगा जब तक कि मुझे तुम्हारे गुरुघन्टाल की तरफ से इसके बारे मे कोई निर्देश ना मिल जाए...."
खावीर टॅक्सी ड्राइवर को धक्के देता हुआ कमरे से बाहर निकाल ले गया. इमरान ने उसे दानिश मंज़िल ले जाने को कहा था. दानिश मंज़िल सीक्रेट सर्विस का हेडक्वार्टर था. ये भी सच था कि सीक्रेट सर्विस का कोई भी मेंबर X2 के आदेश के बिना उसकी कॉंपाउंड मे भी पैर नहीं रख सकता था.
इमरान कुच्छ देर उस लकड़ी के घर की तलाशी लेता रहा फिर बाहर निकल आया. इस तलाशी के क्रम मे वहाँ से कोई ऐसी वस्तु नहीं मिली थी जो इस केस मे इमरान केलिए सहायक होती.
15 मिनट बाद वो अपनी कार के पास खड़ा अंधेरे मे आँखें फाड़ रहा था. अब उसे इसकी चिंता थी कि जल्दी से जल्दी शहर पहुच जाए. वो चाहता था कि रहमान साहब अपनी धमकी को सच कर देने मे सफल ना हो सकें. अगर उन्हें मौका मिल जाता तो इमरान के सामने कुच्छ नयी कठिनाइयाँ आ खड़ी होतीं. और वो निश्चिंत होकर काम नहीं कर पाता. वैसे वो अपनी पोज़िशन किसी पर भी प्रकट नहीं करना चाहता था. लेकिन अगर रहमान साहब अगर उसकी राह मे रोड़े अटकाना शुरू कर देते तो ये भी स्मभाव था कि X2 का राज़ खुल ही जाता.
इस मामले मे संयोग से उसे जेम्ज़ फ्लेगर मिल गया था......और उसका मिलना ये साबित करता था कि ये केस हर हाल मे सीक्रेट सर्विस का ही होगा.
उस आंग्लो इंडियन जेम्ज़ फ्लेगर की कहानी बहुत लंबी थी. एक नहीं दर्ज़नों कहानियाँ थीं. इमरान की जानकारी के अनुसार सेकेंड वर्ल्ड वॉर मे वो मित्र देशों के कंधे से कंधा मिला कर जापान से लड़ा था......और उसके कॅप्टन के पोस्ट तक पहुचते पहुचते युद्ध ही समाप्त हो गया था. युद्ध के बाद उसका यूनिट भी टूट गया और उसने 13थ हाइवे पर 'जेम्ज़ पॉइंट' के नाम से एक छोटा सा केफे खोल लिया. फिर कुच्छ ही दिनों बाद पोलीस उसके चक्कर मे पड़ गयी. पोलीस को संदेह था कि वो विदेशी जासूसों केलिए काम करने लगा है. लेकिन इसे साबित करना बहुत कठिन था क्योंकि फ्लेगर अत्यंत चालाक और रसूख वाला आदमी था.
इमरान उसके बारे मे सोचता रहा और कार तेज़ी से सुनसान सड़क पर दौड़ती रही.
दस बज चुके थे. आसमान मे बादल नहीं थे इसलिए ओस के कारण ठंडक बढ़ गयी थी.
शहर पहुच कर उसने सब से पहले एक टेलिफोन बूथ से सर सुल्तान को फोन किया. वो घर ही पर थे.
"क्या बात है इमरान....." उन्होने पूछा..."मेरे विचार से तुम मिस्टर रहमान के मामले मे उलझे हुए हो...."
"स्वाभाविक बात है सर...." इमरान ने उत्तर दिया...."लेकिन अब शायद मेरे डिपार्टमेंट का केस बन जाए.....आप जेम्ज़ फ्लेगर से तो परिचित ही होंगे...."
"क्यों नहीं.....वो तो हमारे लिए पार्मेनेंट हेडेक बन गया है..."
"बॅस.......इस मामले मे उसी का हाथ साबित हुआ है...."
"सॉफ सॉफ बताओ....."
"वो इस समय मेरी क़ैद मे है....."
"नहिन्न..." सर सुल्तान के स्वर मे हैरत थी.
इसपर इमरान ने पूरी कहानी दुहराते हुए कहा..."अब इस मामले को आप ही संभालिए......वरना डॅडी मेरा बेड़ा पार कर देंगे."
"नहीं..." सर सुल्तान ने हँसी के साथ कहा...."वो ऐसा नहीं कर सकेंगे. तुम निश्चिंत रहो. मैं सब कुच्छ ठीक कर लूँगा. लेकिन इमरान ये ज़रूरी नहीं कि मैं उस रेड पॅकेट के बारे मे कुच्छ पता कर ही सकूँ..."
"ये आप मुझ पर छोड़ दीजिए....मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि डॅडी मेरे खिलाफ कोई क़ानूनी कार्रवाई ना करने पाएँ."
"ओके.....मैं मैं ये कर दूँगा." सर सुल्तान ने कहा.
"बात ये है कि कॅप्ट. फ़ैयाज़ आदि पर तो अपनी धांदली भी चल जाती है....लेकिन डॅडी का मामला दूसरा है..."
"तुम चिंता मत करो.....और कुच्छ?"
"नहीं.....शुक्रिया....बॅस इतना ही..."
"ये तुमने अच्छा किया कि फ्लेगर को कोई मौका नहीं दिया."
"कैसे दे सकता था...." इमरान बोला.
"ओके....गुड नाइट..." दूसरी तरफ से आवाज़ आई और फोन कट गया.
इमरान बूथ से बाहर आया. वो सोच रहा था कि उसे डिन्नर जेम्ज़ पॉइंट ही मे करना चाहिए. उसकी कार 13थ हाइवे की तरफ मूड गयी.
जेम्ज़ पॉइंट एक छोटी सी लेकिन सॉफ सुथरी जगह थी......और यहाँ सब कुच्छ मिल जाता था. यहाँ किसी समय भी कोई टेबल खाली नहीं दिखाई देती थी. अक्सर तो ऐसा भी होता कि बहुत से कस्टमर काउंटर ही पर खड़े खड़े खा पी लिया करते थे. इसका कारण शायद ये था कि सुंदर और अच्छी फिगर वाली आंग्लो इंडियन लड़कियाँ सर्व किया करती थीं.
इमरान को भी कोई टेबल खाली नहीं मिली. इसलिए वो सीधा काउंटर की तरफ चला गया. एक गर्ल वेटर ने उसे वेलकम कहा था और इस तरह चिंतित होकर चारों तरफ नज़र दौड़ाई जैसे उस प्रतिष्ठित गेस्ट केलिए कोई टेबल खाली ना होने पर उसे दुख हुआ हो.
काउंटर पर पहुच कर इमरान ने एग सॅंडविच मँगवाए और उन्हें कॉफी की घूँट के साथ कंठ से नीचे उतारने लगा.
एक लड़की निकट ही खड़ी उस से कह रही थी "वेरी सॉरी सर आपके लिए कोई टेबल खाली नहीं है. अब हम जल्दी ही किसी बड़ी जगह पर चले जाएँगे. ये कष्ट कुच्छ ही दिनों का अब है सर...."
"ओहंम....ओहंम..." इमरान मूह चलाता हुआ बोला. "कोई बात नहीं.....हर हाल मे कदम इसी तरफ उठते हैं...."
काउंटर के पिछे तीन आदमी विभिन्न कामों मे व्यस्त थे. उन मे से एक आंग्लो इंडियन भी था.
इमरान के खाने की रफ़्तार बहुत धीमी थी. शायद वो कुच्छ समय यहाँ गुज़ारना चाहता था. लड़कियाँ शिष्टाचार की मूरत बनी हुई एक टेबल से दूसरे टेबल की तरफ उड़ती फिर रही थीं. कभिकभी उनकी सुरीली हँसी की आवाज़ छोटे से हॉल मे गूँजती.
तभी काउंटर पर रखे हुए फोन की घंटी बजी. आंग्लो इंडियन ने रिसीवर उठा लिया. दूसरे ही पल वो माउत पीस मे कह रहा था "नहीं.....अभी तक बॉस वापस नहीं आए. जी हां...वो 2 बजे से यहाँ नहीं हैं. ओके....हां क्या....एक सेकेंड ठहरिए....मैं नोट कर लूँ...."
उसने रिसीवर को बाएँ हाथ मे पकड़ा और दाहिने हाथ मे पेन लेकर एक पेपर पर 5 लिखा.
"जी हां....फाइव...." उसने माउत पीस मे कहा..."सिक्स थ्री एट सेवेन....थॅंक्स. जैसे ही वो आएँगे मैं उन्हें रिंग करने को कहूँगा."
उसने फोन रख दिया और वो पेपर वहीं पड़ा रहा. अब वो फिर काउंटर पर रखे हुए रिजिस्टर की तरफ झुक गया था. इमरान ने पेपर पर लिखे उन नंबर्स को अच्छी तरह दिमाग़ मे बिठा लिया था.
वो उन लोगों का परीक्षण भी कर रहा था जो काउंटर पर काम मे लगे हुए थे.
कुच्छ देर बाद फिर फोन की घंटी बजी. उसी आंग्लो इंडियन ने फिर फोन उठाया.
"यस सर..." वो फोन मे कह रहा था..."बॉस नहीं हैं यस यस सर.....लगभग 2 बजे से......5...6...3...8...7..." और रिसीवर क्रेडिल पे पटकता हुआ बडबडाने लगा...."ये सुअर मुझे चिढ़ा रहा है क्या...?" नंबर वही थे जो वो पहले नोट कर चुका था. इमरान ने एक लंबी साँस ली. सॅंडविच खा चूकने के बाद खाने केलिए कुच्छ और भी मँगवाए. वो इस समय अपना पेट खराब करने पर तुला हुआ था.
वो सोच रहा था कि या तो सच मुच उस काउंटर क्लर्क को कोई चिढ़ा रहा था या फिर दो अलग अलग आदमियों ने एक ही नंबर बताए थे. अर्थात उन दोनों का संबंध उसी नंबर के टेलिफोन से था. ये और बात है कि इस समय दोनों आदमियों ने दो अलग अलग जगहों से जेम्ज़ फ्लेगर केलिए फोन किया हो.....और नंबर वो बताए हों जो दोनों केलिए कॉमन हो.
इमरान विचारों मे खोया हुआ प्लेट के समान को कंठ से नीचे उतारता जा रहा था. ये सच था कि अब उसका पेट जवाब देता जा रहा था.....लेकिन काउंटर पर खड़े रहने का कोई कारण होना चाहिए था.
फोन की घंटी फिर बजी......और आंग्लो इंडियन ने उठाया....."जी नहीं" वो माउत पीस मे बोला. "बॉस नहीं हैं.....लगभग 2 बजे गये थे. उसके बाद से नहीं आए....जी...." उसकी आँखों मे क्रोध झाँकने लगा था. उसने गुर्रा कर कहा....."क्या आप मुझे चिढ़ा रहे हैं? शायद आप की हॉबी यही है कि बिना मतलब लोगों को तंग करते रहें.....मैं 2 बार पहले भी ये नंबर नोट कर चुका हूँ.....जी हां." उस ने रिसीवर पटक कर किसी अग्यात व्यक्ति को गालियाँ दी और फिर रिजिस्टर पर झुक गया.
इमरान धीरे धीरे अपना सर खुजा रहा था. प्लेट की चीज़ें समाप्त कर के उस ने बिल पे किया और वेटर को मीठी निगाहों से देख कर मुस्कुराता हुआ मैन गेट की तरफ मूड गया.
जुलीना फिट्ज़वॉटर ने X2 के नंबर डाइयल किए और बोली..."जुलीना सर...."
"एस.....क्या रहा?" दूसरी तरफ से आवाज़ आई.
"वो फोन नंबर एक जर्मन के हैं.....मिस्टर हफ ड्रॅक. ये ड्रॅक डाउनिंग कंपनी का मॅनेजिंग पार्ट्नर है. प्रतिष्ठित और प्रभावशाली विदेशियों मे इसकी गिनती होती है. इसका दूसरा पार्ट्नर केप्लर डाउनिंग यहीं का निवासी एक देशी क्रिश्चन है. दोनों ने एक लिमिटेड फर्म स्थापित कर रखी है."
"हुन्न.......और ये हफ ड्रॅक यहाँ का नागरिक नहीं है....?"
"नहीं सर....ये जनरल मॅनेजर का पोस्ट भी रखता है."
"ओके......उस पर तुम्हें निगाह रखनी है. पता करो कि इसके साथ कितने आदमी रहते हैं.....मगर तुम ने अभी तक उसका पता नहीं बताया...."
"18, क्वेन्स रोड......ये एक बड़ी और शानदार इमारत है..."
"बस अब ये पता करो कि इस बिल्डिंग मे कितने आदमी रहते हैं......और उनकी हैसियत क्या हैं...."
"मतलब मुझे सर्वेंट्स के बारे मे भी जानकारी लेनी होगी....?"
"बिल्कुल..."
"अगर ये कोई बहुत इंपॉर्टेंट केस है तो मैं मिस्टर हफ ड्रॅक से करीब होने का प्रयास करूँ?"
"वो किस प्रकार जूलीया?"
"आज ही मैने ड्रॅक डाउनिंग कंपनी. मे एक स्टेनो की वेकेन्सी देखी थी...."
"गुड......मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी अगर तुम ये पोस्ट प्राप्त कर सको..."
"कल ही सर......मैं पूरी कोशिश करूँगी..."
"लेकिन उस इमारत के निवासियों की संख्या मुझे इसी समय मालूम होनी चाहिए...."
"ऑल राइट सर...." जूलीया ने फोन रख दिया.
इसके बाद उसने सफदार के नंबर मिलाए. उस तक X2 से मिले हुए निर्देश पहुचाने के बाद बोली...."तुम 2 घंटे के भीतर मुझे सूचित करो..."
"कोशिश करूँगा.....ये ज़रूरी नहीं है कि ये सारी जानकारी दो घंटे के भीतर मिल जाएँ. इस समय 12 बज रहे हैं. जानकारी के लिए आदमी की आवश्यकता होती है.......और हमारे अलावा शायद ही कोई अब तक जाग रहा होगा."
"X2 उजाला होने से पहले ही पता करना चाहता है......इसलिए मजबूरी है...." जूलीया ने कहा. फिर फोन काट दिया......और थके थके ढंग से एक हल्की सी कराह के साथ बेड पर गिर गयी.
X2...........वो आज भी उसी के बारे मे सोच रही थी.......सोचती ही रहती थी. X2 के बारे मे सोचना उसके लिए कोई नयी बात नहीं थी. मगर X2 के साथ ही साथ उसके मस्तिस्क मे इमरान की कल्पना भी उभरती थी. हलाकी अब उसे विश्वास हो चला था कि इमरान X2 नहीं हो सकता. और इस विश्वास के बनने केलिए खुद इमरान ही को बहुत पापड बेलने पड़े थे.
अचानक जूलीया उठ बैठी क्योंकि फोन की घंटी फिर बज उठी थी.
"हेलो...."
दूसरी तरफ से आवाज़ आई..."तनवीर स्पीकिंग..."
"क्या तुम ने रिंग करने से पहले घड़ी देखी थी?" जूलीया ने बुरा सा मूह बना कर क्रोध भरे स्वर मे कहा.
"बताओ.....फिर मैं क्या करूँ....नींद नहीं आ रही..." तनवीर की आवाज़ दर्दनाक थी.
"जूलीया दाँत पीसने लगी. लेकिन फिर शीघ्र ही हंस कर बोली...."ओह्हो....मैं खुद ही तुम्हें फोन करने वाली थी..."
"क्यों....क्यों...?" तनवीर ने लहक कर पुछा.
"X2 ने एक काम तुम्हारे हवाले किया है...."
"इस समय मैं कोई काम ना कर सकूँगा..." तनवीर चिढ़ कर बोला.
"तुम जानो..." जूलीया ने लापरवाही से कहा. "काम तो मैं तुम्हें ज़रूर बताउन्गि....करने या ना करने की तुम्हारी इच्छा....और तुम्ही X2 को जवाब दोगे. काम ये है कि 'आज रात को इमरान सोने ना पाए'. जैसे भी संभव हो.....ये काम होना ही चाहिए...."
"मैं समझा नहीं...."
"क्या तुम नहीं समझे कि किसी कारण से X2 इमरान को हल्की चोट पहुचाना चाहता है."
"मगर X2 को अचानक ये क्या सूझी?"
"पता नहीं......मुझे खुद भी हैरत है...."
"अच्छी बात है......मैं रात भर उसे सोने नहीं दूँगा.....मगर वो है कहाँ?"
"एक मिनट रूको.....फोन रख दो.....मैं अभी बताती हूँ."
जूलीया ने फोन काट कर इमरान के नंबर डाइयल किए.
"हेलो...." दूसरी तरफ से आवाज़ आई और जूलीया ने इमरान की आवाज़ पहचान कर कुच्छ कहे बिना फोन काट दिया.....फिर जल्दी से तनवीर के नंबर डाइयल कर के माउत पीस मे बोली.
"हेलो....तनवीर.....हां.....वो अपने फ्लॅट मे ही है..."
"ओके.....मैं उस से समझ लूँगा. और ये इसलिए नहीं कर रहा कि X2 का आदेश है बल्कि इसलिए कि तुम कह रही हो...."
"अगर X2 ने डाइरेक्ट तुम्हें कहा होता तो तुम सॉफ इनकार कर देते...." जूलीया ने व्यंग भरी हँसी के साथ कहा.
"नहीं.....बहाना कर देता.....कह देता कि मुझे फीवर है.....कॉलरा है चेचक है......एनीवे इस समय बेड से नहीं उठता...."
जूलीया ने शरारत भरी मुस्कुराहट के साथ अपने सर को हल्के से हिलाया और फोन रख दिया.
**********
क्लॉक ने रात के एक बजने की सूचना दी. इमरान अभी तक जाग रहा था. उसे जूलीया की कॉल की प्रतीक्षा थी. अचानक सामने वाली खिड़की का शीशा टूट कर फर्श पर आ गिरा......और कोई भारी वास्तु दीवार से टकराई. ये एक बड़ा सा पत्थर था जो दीवार से टकरा कर फर्श पर आ गिरा था. इमरान ने उल्लुओं की तरह अपनी आँखें नचाई......और खिड़की के सामने से अपनी चेअर गेट की तरफ खिसका लिया.
वो इतना भी मूर्ख नहीं था कि खिड़की के सामने जाकर बाहर देखता.
फिर एक और पत्थर उसी तरह अंदर आया. इमरान चुप चाप बैठा रहा. तीसरे पत्थर पर वो उठा.....और बड़ी तेज़ी से उस कमरे मे आया जहाँ प्राइवेट फोन रहता था. शायद उसका इरादा था कि X2 की हैसियत से अपने किसी साथी को फोन करे. उसने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया भी.....लेकिन फिर वो एडियों पर घूम कर कमरे से निकल आया.
उसने चौथे पत्थर के गिरने की आवाज़ सुनी. दूसरे ही पल वो ओवर कोट पहन रहा था. फिर फेल्ट हॅट सर पर जमा कर उसका अगला सिरा आगे को झुका कर कोट का कॉलर कानों तक उठा लिया.
इसके बाद वो पिच्छली सीढ़ियों से उतर कर इमारत के पिछे वाली गली मे आ गया. गली सुनसान पड़ी थी. गली से निकल कर वो उस सड़क पर आया जिस पर से पत्थर फेके जाने की संभावना थी. मगर वो ये भी सोच रहा था कि हो सकता है कि पत्थर फेकने वाला किसी इमारत मे छुपा बैठा हो. एनीवे.....वो चलता ही रहा. ये और बात है कि चाल मे लंगड़ाहट रही हो.....जिसका उद्देश्य इसके अलावा और कुच्छ नहीं था कि वो अपने चलने के अंदाज़ से पहचाना नही जा सके.
उसके फ्लॅट की खिड़की के सामने ही दूसरी तरफ एक पतली सी गली थी. इमरान लंगड़ाता हुआ उस मे प्रवेश किया.......और दूसरे ही पल उसने एक लंबी साँस ली.
उसके सामने तनवीर खड़ा था......और उसके सामने पत्थर देखते ही उसकी आँखें हैरत से फैल गयीं. तनवीर अचानक उसे देख कर ठिठक गया......लेकिन पत्थर तो उसके हाथ से तब गिरा जब इमरान ने फेल्ट हॅट का किनारा उपर उठाया.
"ये क्या हो रहा है दोस्त?" इमरान ने नर्म स्वर मे पुछा.
"तुम से मतलब?" तनवीर गुर्राया.
"तुम मेरे फ्लॅट मे पत्थर क्यों फेक रहे थे?"
"होश की दवा करो...."
"फिर यहाँ होने का मतलब? तुम्हारे हाथ मे पत्थर भी था." इमरान ने आँखें निकाल कर कहा.
"तुम यहाँ मेरे होने पर आपत्ति नहीं कर सकते और ना मेरे इस पर कि मेरे हाथ मे पत्थर था."
"आज सर्दी बढ़ गयी है...." इमरान ने जमहाई ले कर कहा. उसने इस ढंग से टॉपिक बदलने की कोशिश की थी कि तनवीर भी चकरा गया था.
तनवीर चुप चाप वहाँ से जाने केलिए मुड़ा. इमरान ने उसका बाज़ू पकड़ लिया.
"अर्रे.....क्या ऐसे ही चले जाओगे? मेरे साथ एक कप कॉफी भी नहीं पियोगे?"
तनवीर इतनी देर से गली मे खड़े खड़े काफ़ी ठंडा हो गया था. इसलिए कॉफी के नाम पर उसका दिमाग़ उसे धोका दे गया.
"वाह यार.....नेकी और पुच्छ पुच्छ...." तनवीर ने हंस कर कहा. "वास्तव मे मैं यहाँ से गुज़रते समय हाथ मे पत्थर ज़रूर ले लेता हूँ. क्योंकि एक बार यहीं एक ख़ूँख़ार कुत्ता मुझ पर हमला कर चुका है."
"मगर इतनी रात गये तुम कहाँ भटकते फिर रहे हो?"
"ये ना पुछो.....मैं तो इस नौकरी से तंग आ गया हूँ...."
"क्यों...?"
"मैं ठीक कह रहा हूँ. अगर हमारा चीफ ऑफीसर चेंज नहीं किया गया तो हम सब रेसिग्नेशन दे देंगे...."
"विचार तो बहुत बढ़िया है...अच्छा आओ..."
तनवीर उसके साथ चलने लगा. साथ ही वो बडबडा भी रहा था. "अब यही देख लो. शायद इस समय डेढ़ बज रहे होंगे मगर मैं सड़कें नापता फिर रहा हूँ. आदेश हुआ है कि शहर मे एक ऐसा बंदर तलाश करूँ जिसकी दुम नीले रंग से रंगी हुई हो."
"वाह....क्या कहने....मुझे पकड़ ले चलो...." इमरान ने खुश हो कर कहा...."
"क्या तुम्हें X2 कुच्छ पैसे भी देता है.....?" तनवीर ने पुछा.
"पैसे अड्वान्स मे वसूल किए बिना मैं किसी काम मे हाथ नहीं लगाता..."
"बहुत अच्छा करते हो..."
वो फ्लॅट मे पहुच गये. इमरान ने कहा "तुम बैठो.....मैं कॉफी लाता हूँ....इतनी रात गये मैं नौकर को जगाना अच्छा नहीं समझता..."
"ओह्हो....क्या देर लगेगी?"
"नहीं नहीं....कॉफी तो तैयार ही समझो....बस गया और लाया." इमरान उसे ड्रॉयिंग रूम मे बैठा कर किचन मे आया और पहले की बनी कॉफी को हीटर पर रख दिया.
कॉफी गर्म होने मे देर नहीं लगी. लेकिन इमरान पहले उस कमरे मे आया जहाँ प्राइवेट फोन रहता था. यहाँ उसने एक अलमारी से किसी प्रकार का पाउडर निकाला और उसकी अच्छी ख़ासी मात्रा कॉफी के कप मे डाल दी. फिर कॉफी का एक कप लेकर ड्रॉयिंग रूम मे आया.
"तुम नहीं पियोगे?" तनवीर ने उसके हाथ मे एक ही कप देख कर कहा.
"मैं तो बस पी कर ही बाहर निकला था."
"तनवीर ने बड़े प्यार से इमरान की तरफ देखा......और फिर हंस पड़ा. क्योंकि इमरान की शकल किसी असहाय विधवा के जैसी हो गयी थी. तनवीर ने कॉफी का एक घूँट लेकर सिगरेट जलाया और आराम से चेर पर टेक लगा कर उसका धुँआ नाक से निकालता हुआ बोला...
"यार इमरान अक्सर तुम से झगड़ा भी हुआ....लेकिन इसके बाद भी तुम से दुश्मनी रखने को दिल नहीं चाहता. पता नहीं क्यों.......ओह्हो.....मैं समझा था शायद तुमने मज़ाक से पत्थर फेकने वाली बात कही थी......लेकिन ये क्या.....?" वो खिड़की के टूटे हुए शीशों को देख कर हैरत प्रदर्शित कर रहा था.
इमरान ने एक ठंडी साँस ली फिर मूह चला कर रह गया.
"अब सोचता हूँ...." तनवीर ने कहा..."कहीं तुम्हें विश्वास तो नहीं हो गया कि पत्थर मैने ही फेके थे क्योंकि उस समय मेरे हाथ मे पत्थर भी था. लेकिन मैने तुम से सच कहा था......माइ गोड्ड़.....क्या संजोग है.....उफ्फ कमाल है मतलब उसी समय ये ज़रूरी था कि मैं तुम्हें उस गली मे मिलूं और मेरे हाथ मे पत्थर हो...."
"मुझे विश्वास है प्यारे कि तुमने ग़लत नहीं कहा होगा.....मैं भी तुम से उतना ही प्रेम करता हूँ.....कि मैने तुम्हारे गम मे जल मरना स्वीकार कर लिया लेकिन उस कानी लड़की से शादी ना की जिसने मेरे लिए रो रोकर अपनी दूसरी आँख को भी ख़तरे मे डाल लिया था....."
"हहा...." तनवीर शरबियों की तरह हंसा. उसकी पलकें बोझल सी लगने लगी थीं.......और कॉफी का कप अभी आधा ही खाली हुआ था.
"तुम हंस रहे हो प्यारे.....मैने एक दुख भरी बात कही थी." इमरान दुखी स्वर मे बोला.
"उस कानी लड़की का नाम जुलीना फिट्ज़वॉटर तो नहीं है....." तनवीर वैसे ही हंस रहा था.
"अगर वो कानी हो जाए तो मैं अपना फ़ैसला बदल भी सकता हूँ....."
"मतलब तुम उस से शादी कर लोगे...." अचानक तनवीर गुस्से से भर गया. पाउडर अब अपना प्रभाव दिखाने लगा था......तनवीर की ज़ुबान मे लरखड़ाहट भी पैदा हो गयी थी.
"हां अगर वो कानी हो जाए तो मैं उस से शादी कर लूँगा......" इमरान ने भोलेपन से कहा.
"तुम्हारी ऐसी की तैसी...." तनवीर कॉफी का कप पटक कर खड़ा हो गया.
"अर्रे वाहह...." इमरान आँखें फाड़ कर बोला..."अभी तो तुम प्यार की बातें कर रहे थे...."
"मैं पुछ्ता हूँ इस कॉफी मे क्या था....?" तनवीर ने हलक फाड़ कर चीखने की कोशिश की लेकिन आवाज़ कंठ मे ही फसि रह गयी.
"नमक था प्यारे.......क्या तुम कॉफी मे नमक नहीं पीते? जासूसी की भाषा मे इसे सरकारी नमक कहते हैं....."
"कमीने...." तनवीर घूँसा तान कर इमरान पर झपटा.....मगर इमरान बाएँ तरफ खिसक गया और तनवीर बड़े टेबल पर जा गिरा. फिर उसने टेबल पर हाथ टेक कर उठने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे. अंत-तह वो एक लंबी कराह के साथ जिसमे गंदी किस्म की गालियाँ भी शामिल थीं, फर्श पर ढेर हो गया.
तनवीर बेहोश हो चुका था.......दूसरी तरफ इमरान के X2 वाले फोन की घंटी बज रही थी.
सवा दो बजे जुलीना फिट्ज़वॉटर ने सफदार की कॉल रिसीव की. वो कह रहा था "हेलो जूलीया.......ये तुम ने किस चक्कर मे फसा दिया था. वो इमारत तो भूत घर लगती है. उसके बारे मे जो पिच्छली सूचनाएँ दिया था उन पर भी अब मुझे संदेह हो रहा है."
"लेकिन क्यूँ?"
"पूरी इमारत वीरान पड़ी है. कभी उसकी खिड़कियों से रौशनी के झमाके(फ्लश लाइट) से दिखाई देते हैं और कभी चम्गादडो की चीखें सुनाई देती हैं.......और कभी उल्लुओं की...."
"तुम डर गये हो....."
"नहीं ये बात नहीं है......ये बात तो क्लियर है कि मैं यूँ ही उस इमारत मे नहीं घुस सकता था. उसके बारे मे मुझे सभी जानकारियाँ बाहर ही से जमा करनी पड़ेंगी. मैं तो कह रहा हूँ कि अगर हमें पता चल जाता कि हम ये सब किस मामले केलिए कर रहे हैं तो ज़्यादा अच्छा होता. इस तरह मैं ऐसा कोई उपाए करने की कोशिश करता.......शायद तुम समझ रही होगी....."
"तुम कहाँ से बोल रहे हो....?" जूलीया ने पुछा. उसके माथे पर बल पड़ गये थे......और आँखों से शंकाएँ झाँकने लगी थीं.
"क्वीन्स रोड के चौराहे वाली बूथ से..."
"बहुत सन्नाटा होगा...?"
"बिल्कुल...." सफदार ने हंस कर कहा. "मगर ये तुम क्यों पुच्छ रही हो?"
"ज़रा अचानक बाहर निकल कर संतुष्ट हो लो कि कोई तुम्हारी बातें सुन तो नहीं रहा...."
रिप्लाइ मे कुच्छ नहीं कहा गया. जूलीया ने केवल फोन काटने की आवाज़ सुनी. मगर फिर 3-4 मिनट बात जाने के बाद भी जब सफदार ने दुबारा संपर्क नहीं किया तो उसकी आशंकाएँ बढ़ गयीं.
दूसरे ही पल उसने X2 के नंबर डाइयल कर के उसे स्थिति से अवगत कराया.
"हुन्न्ञन्.....तो ये सफदार...कभी कभी खुद को अधिक स्मार्ट शो करने के चक्कर मे चोट भी खा जाता है.......ऑल राइट.....मैं देख लूँगा. लेकिन मैं कुच्छ देर मे फिर फोन करूँगा." X2 ने कहा और कॉल डिसकनेक्ट कर दिया.
जूलीया ने रिसीवर क्रीडल मे डाल दिया.......और उसकी अगली कॉल का वेट करने लगी. उसकी निगाह वॉल क्लॉक पर थी. ठीक तीन मिनट बाद फिर फोन की घंटी बजी......और उस ने रिसीवर उठा लिया.
"यस जुलीना स्पीकिंग...."
दूसरी तरफ से X2 की आवाज़ आई....."ये तनवीर कहाँ जा मरा? मैने अभी उसके नंबर डाइयल किए थे लेकिन रिप्लाइ नहीं मिला....जबकि इन दिनों मेरे कठोरतम आदेश हैं कि कोई भी मुझे सूचना दिए बिना घर से ना निकले....क्या उसने तुम्हें सूचना दी थी....?"
"न....नहीं......सर...." जूलीया हक्लाई.
"जूलियाआअ...." X2 की गूंजीली आवाज़ ने उसपर कपकपि पैदा कर दी......और उसे अपने मस्तिस्क पर भी नियंत्रण करना कठिन हो गया. अतः उसे सच्ची बात उगल देने पर मजबूर हो जाना पड़ा.
"मैं मजबूर थी सर.....तंग आ गयी हूँ...."
"मेरे पास समय नहीं है.....कम से कम शब्दों मे बताओ..." उसने X2 की गुर्राहट सुनी.
"वो अक्सर सोने नहीं देता. कभी 2 बजे कभी 3 बजे.....अकारण रिंग करता है.....और कहता है कि उसे नींद नहीं आ रही......मैं माफी चाहती हूँ सर...."
"क्या तुम पागल हो गयी हो....? वो तुम्हें जगा देता है.......और तुम मुझ से माफी चाहती हो....!!"
"स...सुनिए तो सही सर.....मुझे से आज एक बड़ी ग़लती हो गयी है.....मैने आपकी आड़ मे....."
"जूलियाअ..."
"याइ....यस सर...." जूलीया की साँस रुकने लगी. इश्स बार X2 का लहज़ा पहले से भी अधिक ख़ूँख़ार था.
"तो तुम ने उस से ये कहा था कि वो X2 के आदेश के अनुसार इमरान के फ्लॅट पर पथराव करे....."
"पथराव.....न...नो सर...म्म....मैने..."
"सचमुच तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है......ओके मैं तुम्हें 2 मिनट का समय देता हूँ.......अपने हवस को ठिकाने पर लाओ.....फिर बात करना....अगर इस बार भी तुम ने हकला कर बात की या मीनिंगलेस सेंटेन्स बोले तो तुम्हें सख़्त सज़ा दूँगा...."
जूलीया बुरी तरह काँप रही थी. उसका पूरा शरीर थर थर काँप रहा था. अचानक उसने ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया......और रोती हुई बोली...."वो मुझे बहुत तंग करता है सर.....ल्ल....लेकिन मैने ये नहीं कहा....हिच....था....हिच....की वो इमरान के फ्लॅट पर....हिच....पथराव करे....हिच हिच हिच......"
"तुम पहले रोना बंद करो.....फिर बात करना...." इस बार भी X2 के लहजे मे जूलीया ने नर्मी महसूस नहीं किया. फिर वो अचानक अपनी इस कमज़ोरी पर झुंजलाहट महसूस करने लगी.
"मैने तनवीर से पिच्छा छुड़ाने के लिए यही उपयुक्त समझा था कि आप की आड़ ली जाए.....अगर ऐसा करना आप के विचार से ठीक नहीं था तो मैं हर प्रकार की सज़ा भुगतने को तैयार हूँ.
"मैं पुच्छ रहा हूँ कि तुमने उस से क्या कहा था?"
"मैने कहा था कि आपके आदेश के अनुसार वो इमरान को रात भर सोने ना दे.....उद्देश्य यही था कि इमरान उसकी मरम्मत कर दे...."
"फ्यूचर मे ऐसा नहीं होना चाहिए.....जूलीया.." X2 गुर्राया. "तुम लोग अपने पर्सनल मामले अपने तक ही रखा करो.....समझी..."
"और ये तुम्हें सुबह से पहले नहीं पता चल सकेगा कि इमरान ने उसकी कैसी दूरगत बनाई है. अगर तुम्हें अपनी उस हरकत का परिणाम देखना हो तो सुबह ग्रीन स्ट्रीट की पूर्वी छोर पर चली जाना..."
X2 ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया और जूलीया बेड पर गिर कर हाँफने लगी.
*********
*****
ब्लॅक ज़ीरो क्वीन्स रोड के चौराहे पर पहुच कर रुक गया. इमरान ने उसे सफदार के बारे मे बता कर सब कुच्छ समझा दिया था. और सफदार से सामना हो जाने पर ब्लॅक ज़ीरो को X2 ही का रोल प्ले करना था.
वो टेलिफोन बूथ की तरफ बढ़ा. लेकिन बूथ खाली था. वो बूथ मे घुस गया......और गेट बंद करके टॉर्च निकाली. तुरंत उसकी निगाह काग़ज़ के एक टुकड़े पर पड़ी जो रिसीवर के क्लिप मे फँसा हुआ था. उसने उसे निकाल लिया. काग़ज़ पर लिखा था...
"मैं एक आदमी का पिछा कर रहा हूँ.....'स'. "
ये सफदार रियली बहुत चालाक है. ब्लॅक ज़ीरो ने सोचा. अब वो बूथ से निकल आया था. फिर वो अपनी कार मे आ बैठा. उसे सफदार के मिल जाने पर X2 का रोल करना था इसलिए उसके चेहरे पर काला नक़ाब भी था. जिसे छुपाने केलिए उसने ओवर कोट का कॉलर खड़ा कर लिया था और फेल्ट हॅट का सिरा माथे पर झुका हुआ था.
कार क्वीन्स रोड की 18थ बिल्डिंग की तरफ चल पड़ी......लेकिन वो बिल्डिंग तो अंधकार मे डूबी हुई थी. किसी जगह हल्की सी रौशनी भी नहीं दिखाई दी.
यहाँ की बिल्डिंग्स एक दूसरे से कुच्छ दूरी पर थीं......और शायद ही कोई ऐसी बिल्डिंग रही हो जिस से अटॅच्ड नहीं रहा हो.
ब्लॅक ज़ीरो ने अपनी कार 18थ बिल्डिंग के बराबर वाली गली मे मोड़ दी......और उसे बिल्डिंग के बॅक साइड ले आया. अचानक हेड लाइट की रौशनी चार आदमियों पर पड़ी जो जानवरों की तरह लड़ रहे थे. लेकिन उसे शांत हंगामा ही कहना चाहिए.....क्योंकि उन मे से किसी के भी कंठ से आवाज़ नहीं निकल रही थी. उन मे ब्लॅक ज़ीरो को सफदार की झलक भी दिखाई दी.
रौशनी पड़ते ही चारो अलग हो गये थे और ब्लॅक ज़ीरो ने कार उनकी तरफ दौड़ा दी और उनके निकट पहुच कर एंजिन बंद कर दिया.
"खबरदार......जो जहाँ है वहीं रुक जाओ...." उसने X2 की आवाज़ की नकल की...."मेरे हाथ मे रेवोल्वर है और तुम सब उसके निशाने पर हो...."
दूसरों के साथ ही सफदार ने भी अपने हाथ उठा दिए. लेकिन ठीक उसी समय बिल्डिंग के किसी भाग से एक पत्थर आ कर ब्लॅक ज़ीरो के हाथ मे लगा जिसमे रेवोल्वर था.
रेवोल्वर दूर जा पड़ा. ब्लॅक ज़ीरो ने कार से बाहर छलान्ग लगा कर रिवॉल्वार पर दुबारा क़ब्ज़ा करने की कोशिश की लेकिन वो तीनो उस पर टूट पड़े. सफदार पता नहीं किस उलझन मे था......कि X2 की आवाज़ नहीं पहचान सका......वरना ब्लॅक ज़ीरो तो X2 की आवाज़ का बहुत कामयाब नकल करता था.
ब्लॅक ज़ीरो ने जम कर उन तीनो का मुकाबला किया. लेकिन अब वो भी खामोश हो गया था. सफदार कुच्छ देर तो अलग खड़ा रहा फिर अचानक वो भी इस लड़ाई मे शामिल हो गया. पता नही स्थिति उसको समझ मे आ गयी थी या ये कि कुच्छ देर पहले तक वो उन तीनो से भिड़ रहा था इसलिए अब अच्छा अवसर समझ कर वो भी उन पर टूट पड़ा.
थोड़ी ही देर मे तीनो भाग निकले. लेकिन बिल्डिंग से फिर किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं हुआ. ब्लॅक ज़ीरो और सफदार भागने वालों के पिछे दौड़े. लेकिन यहाँ अंधेरा था. दोनों कुच्छ ही दूर दौड़े थे कि उन्होने कार स्टार्ट होने की आवाज़ सुनी.
वो रुक कर मुड़े. कोई ब्लॅक ज़ीरो की कार उड़ा ले जाने के चक्कर मे था. ब्लॅक ज़ीरो पलट पड़ा. सफदार ने भी उसी का साथ दिया. शायद उसने अभी तक ये नहीं सोचा था कि वो भी उन्हीं लोगों मे से कोई होगा. मगर चूँकि दोनों एक दुश्मन के विरुद्ध लड़ चुके थे इसलिए अनायास सफदार उस अग्यात व्यक्ति केलिए अपनापन महसूस करने लगा था.
कार कुच्छ ही दूर चल कर रुक गयी थी......और वो दोनों किसी के दौड़ते हुए कदमों की आवाज़ सुन रहे थे.
"धोका...." ब्लॅक ज़ीरो बडबडाया. वो दोनों कार के निकट पहुच गये थे. ब्लॅक ज़ीरो की कार खाली थी. लेकिन एंजिन बंद नहीं किया गया था.
"ओह्ह.....ये इसी लिए किया गया था कि हम उनका पिच्छा ना कर सकें..." सफदार ने कहा.
"आओ बैठो..." सफदार ने फिर X2 के से अंदाज़ मे कहा.
"आररीए.....आप हैं...." सफदार अचानक उच्छल पड़ा.
ब्लॅक ज़ीरो हंस कर बोला....."अब पहचाना है तुम ने...."
"याइ.....यस सिर.....मैं नहीं पहचान सका था...."
"लीव दट.....आओ पिछे बैठ जाओ..."
सफदार पिच्छली सीट पर बैठ गया और कार चल पड़ी.
"पीछे ध्यान रखना.....कोई हमारा पिछा तो नहीं कर रहा...." ब्लॅक ज़ीरो ने कहा...."ये लोग बहुत चालाक लग रहे हैं..."
"मैं देख रहा हूँ सर. जी हां ये लोग बहुत चालाक हैं. शायद वो मुझे पकड़ना चाहते थे. मैने चौराहे के बूथ से जूलीया को फोन किया था. उसी के ध्यान दिलाने पर मैने धीरे से बूथ का गेट खोल कर बाहर देखा......वास्तव मे एक आदमी बाहर गेट के सामने ही मौजूद था. मुझे गेट खोलते देख कर वो आगे बढ़ गया. चूँकि जूलीया को मेरी दूसरी कॉल की प्रतीक्षा होती लेकिन कॉल ना होने पर पर अवश्य वो किसी ना किसी को उस बूथ की तरफ भेजती. इसलिए मैने ठीक समझा कि उस व्यक्ति के पिछे जाने से पहले कोई संदेश बूथ मे छोड़ दूं.....जिस से मेरी तलाश मे आने वाले को परिस्थिति का पता हो जाए और उन्हें आशंका मे ग्रस्त ना होना पड़े........वो व्यक्ति बहुत धीरे धीरे क्वीन्स रोड पर चल रहा था. इसलिए मुझे वहाँ मेसेज छोड़ने का मौका मिल गया. वो आदमी 18थ बिल्डिंग के साथ वाली गली मे मूड गया. लेकिन उसका पिछा करते हुए जैसे ही मैं उस बिल्डिंग के बॅक साइड पहुचा दो आदमी मुझ पर टूट पड़े. और फिर वो तीसरा भी पलट पड़ा. अब मेरी समझ मे आया कि मेरे लिए वास्तव मे जाल तैयार किया गया था...."
"ओके.....ख़तम करो....." ब्लॅक ज़ीरो ने X2 की तरह कहा. "तुम ने भरसक संघर्ष किया है......अब ये संयोग ही तो है.....देखो मैं भी धोका खा गया. ये बात जल्दी मे समझ मे नहीं आई कि कार उड़ा ले जाने वाली धमकी केवल भागते हुए लोगों को हम से बचना था.....देखो....पिछे ध्यान रखना...."
"मैं देख रहा हूँ सर....."
"तुम दोनों गधे हो...." अचानक सफदार के पैरों के पास से आवाज़ आई......और सफदार उच्छल पड़ा. दूसरे ही पल उसके दोनों हाथ जेबों मे चले गये. एक हाथ से रिवॉल्वार निकला और दूसरे हाथ से टॉर्च. टॉर्च की रौशनी मे उसने अपने पैरों के पास जो कुछ भी देखा वो अविश्वसनीय था. डेढ़ फीट का एक बच्चा पड़ा हाथ पैर फेक रहा था. उसकी आँखे बिल्ली की आँखों की तरह चमक रही थीं.
तभी उसके होन्ट हिले और किसी वयस्क पुरुष की आवाज़ आई...."मैं स्परसिया का निवासी हूँ.......स्परसिया जिसे तुम सब शुक्र या वीनस कहते हो. मेरे तीन दोस्तों को अभी अभी तुम लोग बहुत तंग कर चुके हो. मैं तुम्हें वॉर्निंग देता हूँ कि इस चक्कर मे मत पडो. वरना हम तुम्हारे इस ग्रह रयामी को जिसे तुम सब अर्थ कहते हो टुकड़े टुकड़े कर देंगे...."
ब्लॅक ज़ीरो ने कार रोक कर भीतर की लाइट जला दी और उस विचित्र बच्चे को विस्फरित नेत्रों से देखने लगा था.
"तुम जो कोई भी हो अपनी इन गतिविधियों को विराम दे दो और उस बूढ़े ऑफीसर से कह दो कि रेड पॅकेट को जल्द से जल्द समुद्रा मे फेंक दे......इस प्रकार समुद्र की प्यास बुझ जाएगी वरना प्यासा समंदर तुम्हारी बस्तियों पर चढ़ दौडेगा और ये ग्रह रयामी........इस महान अंतरिक्ष मे तिनके की तरह बिखर जाएगा.....जैसे पानी का बुलबुला एक छन्न मे टूट जाता है और उसका निशान भी नहीं मिलता..."
ब्लॅक ज़ीरो और सफदार ने एक दूसरे को देखा और फिर उस हैरत अंगेज़ बच्चे को देखने लगे.
अब मुझे उठाओ.......और गाड़ी से बाहर फेक दो...." बच्चे ने कहा. "वरना तुम दोनो इस गाड़ी समेत फ़ना हो जाओगे. मेरी ज़िंदगी अब केवल 2 मिनूट की है."
सफदार ने बिल्कुल मशीन की तरह उसे गर्दन से पकड़ कर उठाया और पूरी शक्ति से बाहर फेंक दिया. वो काफ़ी दूरी पर गिरा. लेकिन गिरते ही एक कान फाड़ देने वाला धमाका हुआ.....और ऐसी ही चमक दिखाई दी जैसे बॉम्ब फटा हो. इमारतों की खिड़कियों मे रौशनी होती चली गयीं. लोगों की भयभीत सी चीखें भी सुनाई देने लगी थीं.
"अब खिस्को यहाँ से." ब्लॅक ज़ीरो ने कहा..."वरना किसी नयी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा...." कार तेज़ गति से आगे बढ़ गयी.