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प्यासी जिंदगी complete

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जैसे-जैसे मूवी आगे बढ़ती जा रही थी.. बाजी की साँसें तेज होती जा रही थीं।

मैंने भी अपने लण्ड को पैंट की क़ैद से आज़ाद कर दिया था और बिल्कुल हल्के हाथ से सहला रहा था।

बाजी ने भी अपने एक हाथ से अपने सीने की उभरी चट्टानों को नर्मी से सहलाना शुरू कर दिया था और कभी-कभी बाजी अपने एक मम्मे को अपने हाथ में भर कर ज़ोर से दबा भी देती थीं।

बाजी के सीने के उभार बगैर दुपट्टे के देख कर मेरी बुरी हालत हो गई थी।

बाजी ने अब दोनों हाथों से अपने दोनों मम्मों को बहुत ज़ोर से मसलना और दबोचना शुरू कर दिया था। अज़ीयत और मुकम्मल संतुष्टि ना मिलने का भाव बाजी के चेहरे से ज़ाहिर हो रहा था। उनकी अजीब सी हालत थे.. उन्होंने अपने निचले होंठ को बहुत मजबूती से दाँतों में दबा रखा था।

अचानक बाजी ने अपने दोनों हाथ सिर से सीधे ऊपर उठाए और एक अंगड़ाई ली और अपने हाथों को सिर पर रख के अपने स्कार्फ को लगभग नोंच कर उतारा और अपनी राईट साइड में उछाल दिया.. साथ ही अपने बाल खोल दिए।

मुझे नहीं याद था कि होश संभालने के बाद मैंने कभी अपनी बाजी के बाल देखे हों। बाजी के बाल खुल गए थे और कुर्सी पर बैठे होने के बावजूद ज़मीन तक पहुँच रहे थे। मूवी में अब एक लड़की सीधी लेटी हुई थी और उसने अपनी चूत को अपने राईट हैण्ड से छुपा रखा था और लेफ्ट हैण्ड की बड़ी उंगली से इशारा करते हुए लड़के को अपनी तरफ बुला रही थी।

लड़का अपने लण्ड को हाथ में पकड़े उसकी तरफ बढ़ रहा था और फिर अगले ही लम्हें वो लड़का.. उस नंगी लड़की के टाँगों के बीच बैठ गया। अब उसने अपना हाथ लड़की के उस हाथ पर रखा.. जिस हाथ से चूत छुपी हुई थी और उसके हाथ को हटाते ही फ़ौरन अपना मुँह उस लड़की की चूत से लगा दिया।

उसी लम्हें बाजी ने एक ‘आह..’ भरी और अपने लेफ्ट हैण्ड को कपड़ों के ऊपर से ही अपनी टाँगों के बीच वाली जगह पर रखा और उस जगह को ज़ोर से दबोच लिया। साथ ही वे दूसरे हाथ से अपने लेफ्ट दूध को ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगीं।

मैं अपनी सग़ी बड़ी बहन का यह रूप देख कर बिल्कुल दंग रह गया।

बाजी कुछ देर तक यूँ ही अपने लेफ्ट दूध को दबाती रहीं और टाँगों के बीच वाली जगह को दबोचती और ढीला छोड़ती रहीं।

अब स्क्रीन पर सीन चेंज हो गया था.. वो लड़की सीधी लेटी थी.. उसने अपनी टाँगें फैला रखी थीं और लड़का उसकी टाँगों के बीच उस पर पूरा झुका हुआ लड़की के होंठों को चूस रहा था और लड़की की चूत में अपने लण्ड को अन्दर-बाहर कर रहा था।

कैमरे का व्यू पीछे का था इसलिए लण्ड का अन्दर-बाहर होना क्लोज़-अप में दिखाया जा रहा था। साथ ही लड़के की गाण्ड का सुराख भी वज़या नज़र आ रहा था.. तभी स्क्रीन पर इसी आसन में एक और लड़के की एंट्री हुई और उसने अपने लण्ड की नोक को लड़के की गाण्ड के सुराख पर टिकाया और एक ही झटके में तकरीबन आधा लण्ड अन्दर उतार दिया।

इस सीन को देखते ही बाजी के मुँह से एक तेज ‘अहह..’ निकली और उन्होंने अपनी टाँगों के बीच वाले हाथ को उठाया और ज़ोर-ज़ोर से 2-3 दफ़ा उसी जगह पर ऐसे मारा.. जैसे थप्पड़ मार रही हों और फिर ज़ोर से उस जगह को दबोच लिया। ऐसा लग रहा था कि इस सीन ने उन पर जादू सा कर दिया था.. उनका हर अमल इस सीन की पसंदीदगी की गवाही दे रहा था।

बाजी ने अपनी टाँगों के बीच से हाथ उठाया और थोड़ा झुक कर अपने अबाए को बिल्कुल नीचे से पकड़ा और ऊपर उठाने लगीं.. बाजी का अबया उनके घुटनों तक उठा.. तो मुझे हैरत का एक शदीद झटका लगा। बाजी ने अबाए के अन्दर कुछ नहीं पहना हुआ था.. मतलब बाजी अबाए के अन्दर बिल्कुल नंगी थीं।

मेरी बड़ी बहन.. मेरी बाजी जो पूरे खानदान में सबसे ज्यादा बा-हया समझी जाती थीं.. और सब लोग अपनी बहनों बेटियों को मेरी इस बहन की मिसालें दिया करते थे।

मेरी वो बहन सारा दिन घर में अबाए के अन्दर नंगी रहती है.. उफफफफ्फ़.. इस सोच ने मेरे जिस्म को गरमा के रख दिया था।

मैं पहली बार अपनी सग़ी बहन की टाँगों का दीदार कर रहा था। बाजी की पिंडलियाँ बहुत खूबसूरत और सुडौल थीं। उनके घुटने इतने मुतनसीब और प्यारे थे कि आप किसी भी फिल्म की हीरोइन से कंपेयर करें तो मेरी बहन के पैर ही खूबसूरत लगेंगे।

बाजी का अबया अब इतना ऊपर उठ चुका था कि उनके घुटने से ऊपरी रान आधी नज़र आ रही थी।

बाजी ने अपनी दाईं टांग पूरी नंगी करके अपने घुटने को थोड़ा सा खम देते हुए अपने पाँव कंप्यूटर टेबल के ऊपर टिका दिए। अब इसे मेरी बदक़िस्मती कहें कि जहाँ मैं मौजूद था वहाँ से बाजी का सिर्फ़ दायाँ पाँव ही नज़र आ रहा था।

बाजी ने अपना बायां हाथ अपनी नंगी टाँगों के बीच रखा और उनका हाथ तेजी से हरकत करने लगा.. जो मैं यहाँ से नहीं देख सकता था कि उनके हाथ की हरकत क्या है.. मुझे तो बस उनका हाथ हिलता हुआ नज़र आ रहा था।

बाजी ने अपने सिर को पीछे की जानिब ढलका दिया था और तेज-तेज अपने हाथ को हरकत दे रही थीं।

ये सब देखते हो मेरी अपनी हालत खराब हो चुकी थी, मैंने अपनी पैंट वहाँ खड़े-खड़े ही उतार दी थी.. मेरे जहन से खौफ.. डर या शर्मिंदगी जैसे तमाम अहसासात मिट चुके थे। किसी के बाहर से देखे जाने का ख़तरा तो था नहीं और घर में मेरे और बाजी के अलावा कोई नहीं था।

बाजी को देखते हुए मैंने अपने लण्ड को हाथ में पकड़ा और तेजी-तेजी से हाथ को आगे-पीछे करने लगा और 30 सेकेंड में ही मेरे लण्ड ने सफ़ेद गाढ़ा मवाद खारिज कर दिया और मेरे मुँह से मज़े के कारण तेज आवाज़ में एक ‘अहहहा..’ खारिज हुई।

मेरी इस ‘आआहहाअ..’ बाजी के कानों तक भी पहुँच गई थी।

बाजी एकदम अपनी कुर्सी से उछल पड़ीं.. उन्होंने फ़ौरन मॉनिटर को ऑफ किया और अपना गाउन ठीक करते-करते इधर-उधर देखने लगीं।

जैसे ही उन्होंने मुझे देखा वो तीर की तरह मेरी तरफ आईं, उस वक़्त उन्हें ये भी ख़याल नहीं रहा कि उनके सिर पर स्कार्फ नहीं है और जिस्म को छुपाने के लिए बड़ी सी चादर भी नहीं है।

उन्हें सिर्फ़ मेरा सीने का ऊपरी हिस्सा.. कंधे और मेरा चेहरा ही नज़र आ रहा था। उन्होंने क़रीब आकर खिड़की पूरी खोल दी और चिल्ला कर कहने लगीं- खबीस शख्स.. तुमने साबित कर दिया है कि तुम इन्तेहाई घटिया और कमीने इंसान हो.. पहले अपने सगे छोटे भाई के साथ गंदी हरकतें करते रहे हो और अब अपनी सग़ी बहन और वो भी बड़ी बहन को..!

यह कहते-कहते ही बाजी ने अचानक देखा कि मेरा लण्ड मेरी मुठी में पूरा खड़ा है और मेरे लण्ड का जूस मेरे पूरे हाथ पर और लण्ड की नोक पर फैला हुआ है।

‘वसीम.. तुम कितने बेहया हो.. तुम में शर्म नाम की चीज ही नहीं है.. ऐसे खड़े हो.. ऐसी जगह पर? क्या होगा अगर किसी ने तुम्हें इस हालत में देख लिया तो?’

बाजी की बात खत्म होते ही मैं कूद करके कमरे के अन्दर दाखिल हो गया।

बाजी एकदम कन्फ्यूज़ हो गईं और दो क़दम पीछे हटती हुई बोलीं- ये क्या..?? क्या बेहूदगी है ये.. तुम करना क्या करना चाह रहे हो?’

‘जैसा कि आपने एहतियात करने का कहा तो एहतियात कर रहा हूँ.. कहीं कोई देख ना ले..’ मैंने बेपरवाह से अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहा।

मुझ पर अब वो ही बागी मिज़ाज ग़ालिब आ गया था.. जो इस उम्र और मेरी तबियत का ख़ासा था कि ‘सोचना क्या.. जो भी होगा देखा जाएगा..’

 
शायद बाजी की जहांदीदा नज़र ने भी इसे महसूस कर लिया था। इसलिए वो नरम से लहजे में मेरे लण्ड की तरफ हाथ का इशारा करते हुए बोलीं- वसीम प्लीज़ कम से कम अपने जिस्म को तो कवर करो.. और गंदगी साफ करो वहाँ से.. और अपने हाथों से..’

‘छोड़ो बाजी.. आप मुझे एक से ज्यादा बार इस हालत में देख चुकी हो और अभी भी मैं इतनी देर से आपके सामने इस हालत में खड़ा हूँ.. अब इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं अपने लण्ड को आप से छुपाऊँ या नहीं..’ मैंने बाजी के सामने बिस्तर पर बैठते हुए कहा।

बाजी को मेरे मुँह से लफ्ज़ ‘लण्ड’ इतने बेबाक़ अंदाज़ में सुन कर शॉक सा लगा और उन्होंने एक भरपूर नज़र मेरे लण्ड पर डाली और फिर अपना रुख़ फेर कर खड़ी हो गईं।

मुझसे कहा- वसीम प्लीज़ कुछ पहन लो.. ये मेरी इल्तिजा है.. मुझे मेरी ही नजरों में मत गिराओ..

मैंने कहा- ओके बाजी.. लेकिन मेरी एक शर्त है.. आप मान लो.. फिर मैं कुछ पहन लूँगा।

मैं अब बिस्तर पर आधा लेटा हुआ था और मेरी टाँगें बिस्तर से नीचे लटक रही थीं। मेरा लण्ड फुल तना हुआ छत की तरफ मुँह किए खड़ा था।

‘शर्त..!’ उन्होंने हैरतजदा सी आवाज़ में दोहराया और मेरी तरफ घूम गईं।

मैंने अपनी पोजीशन चेंज करने की कोशिश नहीं की और उसी तरह पड़ा रहा। फिर कुछ देर खामोश खड़ी.. वो मेरी आँखों में देखती रहीं और मैंने भी अपनी आँखें नहीं झुकाईं और उनकी आँखों में ही देखता रहा। शायद वो मेरी आँखों में देख कर.. कुछ अंदाज़ा लगाना चाह रही थीं।

कुछ लम्हें मज़ीद खामोशी से गुज़रे और फिर वो बोलीं- बको क्या शर्त है?

मैं बिस्तर से उठा और उनकी आँखों में देखते-देखते ही कहा- आपको मैंने पहली दफ़ा बगैर स्कार्फ और बगैर बड़ी सी चादर के देखा है.. मैं कसम खा कर कहता हूँ कि आप से ज्यादा हसीन और पुरकशिश लड़की मैंने कभी नहीं देखी। आपके बाल बहुत खूबसूरत हैं.. क्या आप अपने बालों को चेहरे के एक तरफ से गुजार कर सामने नहीं ला सकती हैं?

मैं ये बोल कर सांस लेने को रुका.. तो बाजी बोलीं- ये शर्त है तुम्हारी?

‘नहीं.. ये शर्त नहीं इल्तिजा है..’ मैंने मासूम से लहजे में जवाब दिया।

बाजी ने फ़ौरन ही अपना राईट हैण्ड पीछे किया और बालों को समेट कर सामने अपनी लेफ्ट साइड पर ले आईं।

आप यक़ीन करें.. बाजी के बाल उनके घुटनों को छू रहे थे।

मेरा मुँह ‘वाउ..’ के अंदाज़ में खुला का खुला रह गया।

बाजी फिर बोलीं- वसीम अब बक भी दो जो शर्त है.. या उठ कर कुछ पहनो..

मैं अपनी हवस में वापस आया और मैंने अपने हाथ से अपने लण्ड को पकड़ा और आहिस्तगी से सहलाते हुए उठ बैठा और बाजी को कहा- मैं आपके दूध बगैर कपड़ों के नंगे देखना चाहता हूँ..

‘शटअप.. तुम होश में तो हो.. जो मुँह में आ रहा है बकवास करते चले जा रहे हो..!!’

वो मज़ीद कुछ कहना चाहती थीं.. लेकिन मैंने उनकी बात काट दी और लण्ड को हाथ में पकड़े खड़ा हुआ।

बाजी की नजरें मेरे लण्ड पर जैसे चिपक सी गई थीं।

मैं उनके चारों तरफ घूमते हुए अपने हाथ को लण्ड पर आगे-पीछे करते-करते कहने लगा- मेरी प्यारी सी बाजी मेरी बहना जी.. मैंने वैरी फर्स्ट डे भी देखा था आपको.. इसी खिड़की से.. जब आप मूवी देख कर अपने दूध को सहला रही थीं और टाँगों के बीच में हाथ फेर रही थीं।

मुझे इसका भी अंदाज़ा बहुत अच्छी तरह है कि आप 5 दिन तक सुबह से रात तक हमारे कमरे में क्या देखती और क्या करती रही हैं.. और मेरी सोहनी बाजी जी.. आज भी मैं उस वक़्त खिड़की में आया था.. जब आप बाथरूम में थीं।

मतलब ये कि आज भी मैंने देखा.. जब आप अपने दूध को दबोच-दबोच कर मसल रही थीं.. जब आप अपना अबया उठा रही थीं और जब आप अपनी खूबसूरत लंबी टांग को नंगा करके टेबल पर टिका रही थीं।’

वे सनाका खा कर मुझे हैरत से देख रही थीं।

‘और हाँ..’ मैंने हँसते-हँसते हुए कहा- जब आप अपने जज़्बात से तंग आकर अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को थप्पड़ों से नवाज रही थीं.. उस वक़्त भी मैं यहाँ ही था..

मेरी सोहनी बहन जी.. और अब आप लेडी मौलाना बनना छोड़ें.. और जो मैं कह रहा हूँ.. मेरी बात मान जाएं। मैं जानता हूँ कि आपको भी ये सब कुछ बहुत मज़ा देता है।

‘नहीं वसीम.. कभी नहीं.. मूवीज देखना या अपने हाथों से अपने आपको तसल्ली पहुँचाना एक अलग बात है और ये बिल्कुल अलहदा चीज़ है कि आप किसी और के साथ सेक्स करो और वो भी सगे भाई के साथ.. नो नो.. ये कभी नहीं हो सकता और अब तुम्हें खुदा का वास्ता है कुछ पहन लो.. मुझे इस तरह तो ज़लील मत करो..’

यह कहते ही बाजी को शायद बहुत शदीद किसम की जिल्लत का अहसास या फिर एहसासे बेबसी ने घेर लिया.. या फिर सेक्स की शदीद तलब और कुछ ना कर सकने का अहसास था.. पता नहीं क्या था कि बाजी ज़मीन पर बैठीं.. अपना सिर अपने घुटनों पर रख कर फूट-फूट कर रोने लगीं।

बाजी को रोता देखते ही मेरा दिल पसीज गया। जो भी हो वो थीं तो मेरी सग़ी बहन और मैं उनसे शदीद मुहब्बत करता हूँ।

मैंने फ़ौरन अपनी अलमारी से अपना ट्राउज़र निकाला और पहन लिया, फिर भागते हुए ही मैंने बाजी की बड़ी सी चादर उठाई और लाकर उनके जिस्म के गिर्द लपेटी.. हाथ बढ़ा कर क़रीब पड़ा उनका स्कार्फ उठा कर बाजी के हाथ में पकड़ाया और उनके पाँव को पकड़ता हुआ भर्राई हुई आवाज़ में बोला- बाजी.. प्लीज़ चुप हो जाओ.. मुझे माफ़ कर दो.. चुप हो जाओ.. नहीं तो मैं भी रो दूँगा।

और वाकयी मेरी कैफियत ऐसी ही थी कि चंद लम्हें और गुज़रते.. तो मैं भी रो देता।

मेरी बाजी ने अपना सिर घुटनों से उठाया उनकी बड़ी-बड़ी आँखें आँसुओं में भीग कर मज़ीद रोशन हो गई थीं। उनके पलकों पर रुके आँसू देख कर मेरी आँखें भी टपक पड़ीं। बाजी ने मेरी आँख में आँसू देखा तो तड़फ कर मेरे चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया और मेरे माथे को चूमते हुए भर्राई हुई आवाज़ में कहने लगीं।

‘नाअ.. मेरे भाई.. नहीं मेरे सोहने भाई.. कभी तेरी आँख में आँसू ना आएं.. मेरा सोहना भाई.. मेरा सोहना भाई..’

बाजी ये बोलती जा रही थीं और मेरा माथा चूमती जा रही थीं।

मेरा दिल भी भर आया था और मेरे आँसू भी नहीं थम रहे थे।

जब मेरी बर्दाश्त जवाब देने लगी तो मैंने अपने आपको बाजी से छुड़वाया और रोते हुए और अपने आँसू साफ करते हुए भाग कर बाथरूम में घुस गया।

मैं जब सवा घंटे बाद नहा कर बाथरूम से निकला.. तो अपने आपको बहुत फ्रेश महसूस कर रहा था। बाजी पता नहीं कब कमरे से चली गई थीं।

मैं भी नीचे आया तो बाजी से सामना नहीं हुआ और मैं घर से बाहर निकलता चला गया।

शाम हो चुकी थी.. मैं रात तक स्नूकर क्लब में रहा और रात 9 बजे घर लौटा तो अब्बू.. हनी और अम्मी डाइनिंग टेबल पर ही मौजूद थे।

हनी और अब्बू से मिलने के बाद मैं भी खाना खाने लगा।

अब्बू ने हनी से पूछा- रूही कहाँ है? भाई से मिली भी है या नहीं?

हनी ने कहा- अब्बू बाजी कोई बुक पढ़ रही हैं.. भाई तो दिन में ही आ गए थे.. बाजी तो घर में ही थीं.. मिल ली होंगी।

जब सब खाना खा चुके तो अब्बू ने हनी को कहा- जाओ बेटा जाकर सो जाओ.. सुबह स्कूल भी जाना है।

वे मुझसे गाँव के बारे में बातें पूछने लगे। उसके बाद वो भी सोने के लिए चले गए और मैं भी अपने कमरे में आ गया।

मैं बिस्तर पर लेटा तो सुबह बाजी के साथ गुज़ारा टाइम याद आने लगा।

फिर मुझे पता ही नहीं चला कि कब आँख लगी।

सुबह आँख खुली तो कॉलेज के लिए देर हो गई थी.. मैं जल्दी-जल्दी तैयार हुआ.. तो कमरे से निकलते हुए मेरी नज़र कंप्यूटर पर पड़ी.. तो बगैर कुछ सोचे-समझे ही मैंने पॉवर कॉर्ड निकाली और अपनी अलमारी में लॉक कर दी।

नीचे आया तो मेरा नाश्ता टेबल पर तैयार पड़ा था.. लेकिन वहाँ ना बाजी थीं.. ना अम्मी.. खैर.. मुझे वैसे ही देर हो रही थी.. मैंने नाश्ता किया और कॉलेज चला गया।

दिन का खाना में अमूमन कॉलेज के दोस्तों के साथ ही कहीं बाहर खा लेता था। शाम में 2-3 घन्टों के लिए घर में होता था.. फिर स्नूकर क्लब चला जाता था। जहाँ आजकल वैसे भी एक टूर्नामेंट चल रहा था.. और मेरा शुमार भी अच्छे प्लेयर्स में होता था.. इस वजह से रात घर भी देर से जाता.. तो अब्बू-अम्मी के साथ कुछ देर बातें करने के बाद सोने चला जाता।

आज ही अब्बू ने मुझे बताया कि ज़ुबैर एक महीने के लिए टूर पर जा रहा है गाँव के कज़न्स के साथ.. उनकी बात मैंने सुनी और सोने चला गया।

अजीब सी तबीयत हो गई थी इन दिनों.. सेक्स की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं जाता था। इसी तरह दिन गुज़र रहे थे.. सुबह नाश्ता टेबल पर तैयार मिलता था।

लेकिन वहाँ कोई नहीं होता था। अक्सर नाश्ता ठंडा हो जाता था.. जिसकी वजह से मैं आधा कप चाय.. आधा परांठा या ऑमलेट वैसे ही छोड़ कर निकल जाया करता था।

इस बात को शायद बाजी ने भी महसूस कर लिया था।

 
बाजी के साथ उस दिन वाले वाकये का आज सातवाँ दिन था। जब सुबह मैं डाइनिंग टेबल पर पहुँचा तो नाश्ता मौजूद नहीं था.. लेकिन किचन से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी.. जो वहाँ किसी की मौजूदगी का पता दे रही थीं। कुछ ही देर बाद बाजी आईं और मेरे सामने सारा नाश्ता सज़ा कर बगैर कुछ बोले वापस चली गईं।

मैंने पीछे मुड़ कर बाजी को देखा तो वो अपने कमरे की तरफ जा रही थीं और अपने यूजुअल ड्रेस यानि बड़ी सी चादर और स्कार्फ में थीं।

उस दिन के बाद आज पहली बार मेरा और बाजी का आमना-सामना हुआ था।

फिर रोज़ ही ऐसा होने लगा कि जब मैं आकर बैठ जाता.. तो बाजी गरम-गरम नाश्ता लाकर मेरे सामने रखतीं और अपने कमरे में चली जातीं।

उस वाक़ये को आज ग्यारहवां रोज़ था।

सुबह जब बाजी नाश्ता लेकर आईं.. तो उन्होंने मुझे एक पेपर दिया.. जिस पर कुछ बुक्स के नाम लिखे थे और मुझसे कहा- कॉलेज से आते हो.. याद से ये बुक्स खरीद लाना..

मैंने कहा- ठीक है बाजी..

नाश्ता करने के बाद मैं कॉलेज चला गया।

अब अक्सर ऐसा होता कि बाजी सुबह कोई ना कोई काम की बात कर लेती थीं और जो सन्नाटा हमारे बीच कायम हो गया था.. अब वो टूट रहा था लेकिन वो अब भी बहुत रिज़र्व रहती थीं।

अक्सर मेरे साथ ही बैठ कर नाश्ता भी करने लगी थीं.. लेकिन फालतू बातें या मज़ाक़ नहीं करती थीं।

उस वाक़ये का आज 17वां दिन था.. बाजी नाश्ता लेकर आईं.. तो उनके जिस्म पर बड़ी सी चादर नहीं थी.. सिर्फ़ स्कार्फ बाँधा हुआ था और सीने पर दुपट्टा फैला रखा था। उन्होंने मेरे साथ ही बैठ कर नाश्ता किया और मैं कॉलेज के लिए निकल गया।

उस वाकये का 20 वां दिन था.. बाजी ने मेरे सामने नाश्ता रखा.. तो ना ही उनके सिर पर स्कार्फ था और ना ही दुपट्टा। लेकिन सिर पर बालों का बड़ा सा जूड़ा बाँध रखा था।

मेरे होश संभालने के बाद से यह पहली बार था कि मैंने बाजी को सिर्फ़ क़मीज़ सलवार में देखा था.. ना दुपट्टा.. ना चादर.. ना स्कार्फ..

बाजी नाश्ता रख कर अपने कमरे की तरफ जा रही थीं.. तो मैंने पहली मर्तबा उनकी कमर देखी.. जो उनके शानों और कूल्हों के बीच काफ़ी गहराई में थी और कमान सी बनी हुई थी।

आज 20 दिन बाद मेरे लण्ड ने जुंबिश ली और मुझे अपने हरामी होने का अहसास दिलाया.. वरना मैं तो अपने लण्ड को भूल ही चुका था।

अगले दिन से बाजी अपनी यूजुअल ड्रेसिंग पर वापस आ चुकी थीं।

उस वाक़ये का आज 24वां दिन था.. जब बाजी ने मुझे नाश्ता दिया। वो उस दिन बड़ी सी चादर और स्कार्फ में मलबोस थीं और उनका चेहरा बहुत पाकीज़ा लग रहा था।

मैं नाश्ता करके उठा और दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि बाजी ने मुझे आवाज़ दी ‘वसीम..’

मैं रुका और मुड़ कर कहा- जी बाजी?

उस वक़्त तक वो मेरे क़रीब आ चुकी थीं।

बाजी ने बिना किसी झिझक या शर्मिंदगी के आम से लहजे में मुझसे पूछा- वसीम, पॉवर कॉर्ड कहाँ है?

बाजी का अंदाज़ ऐसा था.. जैसे वो किसी आम सी किताब का या किसी सब्ज़ी का पूछ रही हैं।

मैंने भी बाजी के ही अंदाज़ में अपने बैग से चाभी निकाली और बाजी के हाथ में पकड़ाते हुए कहा.. ऐसे-जैसे मैं भी उन्हें सब्ज़ी ही का बता रहा हूँ।

‘मेरी अलमारी में रखी है..’

और मैं बाहर निकल गया।

अगले दिन भी नाश्ते के बाद जब मैं बाहर निकलने ही वाला था.. तो बाजी अपनी चादर को संभालती हुई मेरे पास आईं और उसी नॉर्मल से अंदाज़ में कहा- वसीम तुम कितने बजे तक घर आओगे?

‘दो बजे तक आ जाऊँगा.. क्यूँ..??’ मैंने कुछ ना समझने वाले अंदाज़ में जवाब दिया।

‘नहीं कुछ नहीं.. बस मैं ये कहना चाह रही थी कि तुम 5 बजे तक घर नहीं आना.. मैं आज ज्यादा टाइम चाहती हूँ..’

‘ओके ठीक है.. मैं 5 बजे से पहले नहीं आऊँगा।’

हमारा बात करने का अंदाज़ बिल्कुल नॉर्मलौर सरसरी सा था.. लेकिन बाजी भी जानती थीं कि वो क्या कह रही हैं और मुझे भी अच्छी तरह पता था कि बाजी किस बात के लिए आज ज्यादा टाइम चाहती हैं।

आप लोग भी समझ ही गए होंगे कि मेरी सग़ी बहन.. मेरी हसीन और बा-हया बहन हार गई थी.. और उनके टाँगों के बीच वाली जगह जीत गई थी।

मैं 5:20 पर अपने घर में दाखिल हुआ तो बाजी इत्तिफ़ाक़ से उसी वक़्त ऊपर से नीचे आ रही थीं और उन्होंने अपना वो ही काला सिल्क का अबया पहना हुआ था, उनके पाँव में चप्पल भी नहीं थीं और बाल खुले हुए उनके कूल्हों से भी नीचे तक हवा में लहरा रहे थे।

बाजी के खड़े हुए निप्पल उनके अबाए में साफ ज़ाहिर हो रहे थे.. जो इस बात का पता दे रहे थे कि अबाए के अन्दर बाजी बिल्कुल नंगी हैं।

मैंने बाजी को सलाम किया.. तो उन्होंने अपने अबाए के बाजुओं को कोहनियों तक फोल्ड करते हुए मेरे सलाम का जवाब दिया और पूछा- खाना खाओगे?

‘नहीं.. मैं खाना खा कर आया हूँ.. बस एक कप चाय बना दें..’ मैंने बाजी के खूबसूरत सुडौल और बालों से बिल्कुल पाक बाजुओं पर नज़र जमाए हुए कहा।

‘ओके.. तुम बैठो मैं अभी बना देती हूँ..’ यह कह कर वो किचन की तरफ चल दीं।

मैंने बाजी को इतने इत्मीनान से इस हुलिए में घूमते देख कर कहा- बाजी क्या घर में कोई नहीं है?

‘नहीं.. हनी तो वैसे भी छुट्टियाँ नानी के घर गुजार रही है.. और अम्मी और अब्बू किसी ऑफिस के मिलने वाले की बेटी की शादी में गए हैं।’

उन्होंने चाय बनाते बनाते किचन से ही जवाब दिया।

मुझे चाय दे कर बाजी अपने कमरे में चली गईं और मैं बाजी के इस नए अंदाज़ को सोचने लगा।

फ़ौरन ही घंटी की आवाज़ ने मेरी सोच की परवाज़ को वहीं रोक दिया, बाहर मेरे कुछ दोस्त थे जो कहीं पिकनिक पर मुझे भी साथ ले जाना चाह रहे थे।

मैं बाजी को बता कर उनके साथ चला गया।

फिर अगली सुबह नाश्ते के वक़्त ही बाजी से सामना हुआ, वो आज भी सिर्फ़ गाउन में थीं और हालात कल शाम वाले ही थे।

बाजी मेरे साथ ही नाश्ता करने लगीं और हम इधर-उधर की बातें करते रहे।

मैंने बाजी के हुलिया के पेशे नज़र कहा- बाजी अम्मी-अब्बू घर में ही हैं ना?

‘हाँ.. लेकिन सो रहे हैं अभी..’

उन्होंने चाय का घूँट भरते हुए लापरवाह अंदाज़ में जवाब दिया।

मैंने भी चाय का आखिरी घूँट भरते हुए बाजी के मम्मों पर एक भरपूर नज़र डाली और ठंडी आह भरते हुए टेबल से उठ खड़ा हुआ।

दरवाज़े की तरफ रुख़ मोड़ते हुए मैंने बाजी से कहा- आप चेंज कर लो.. अम्मी-अब्बू के उठने से पहले पहले। मैं नहीं चाहता कि वो आपको इस हुलिये में देखें.. आपकी इज़्ज़त मुझे अपनी जान से भी ज्यादा अज़ीज़ है।

उन्होंने एक मुहब्बत भरी नज़र मुझ पर डाली और शैतानी सी मुस्कुराहट के साथ कहा- मैं तुम्हारी रग-रग से वाक़िफ़ हूँ.. वसीम तुम्हें ये टेन्शन नहीं कि वो मुझे इस हुलिया में देखें.. बल्कि तुम्हें ये फिकर है कि अगर अम्मी-अब्बू को पता चला कि मैं तुम्हारे सामने इस हालत में थी.. तो शायद आइन्दा के लिए तुम्हारी नजरें मेरे इस हुलिया से महरूम हो जाएँगी।

शायद यह सच ही था.. इसलिए मेरे मुँह से जवाब में कुछ नहीं निकल सका और बोझिल से कदमों से मैं बाहर की तरफ चल पड़ा।

आज कॉलेज जाने का बिल्कुल मन नहीं था। आज बहुत दिन बाद मेरे लण्ड में सनसनाहट हो रही थी और जी चाह रहा था कि आज पानी निकालूँ।

 
मैं गेट तक पहुँचा ही था कि बाजी की आवाज़ आई- वसीम..

मैं दरवाज़ा खोल चुका था.. इसलिए घर से बाहर निकल कर मैंने पूछा- जी बाजी?

वो दरवाज़े के पास आकर बोलीं- 111 पूरी हो चुकी हैं.. अब न्यू का इंतज़ाम कर दो।

कह कर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया।

मैं सनाका खाए हुए की कैफियत में दरवाज़े के बाहर खड़ा था। अभी मेरी बेहद हया वाली बहन ने मुझसे न्यू ट्रिपल एक्स फिल्म के लिए कहा था।

मेरा लण्ड पैंट में तन गया था।

मैं उसी वक़्त अपने दोस्त के पास गया और उससे 3 न्यू सीडीज़ लीं और इतना टाइम बाहर ही गुज़ारा कि अब्बू अपने ऑफिस चले जाएँ और फिर कॉलेज के बजाए घर वापस आ गया।

अब्बू ऑफिस जा चुके थे और अम्मी के पास खाला बैठी थीं, मैंने उन्हें सलाम किया और अपने कमरे की तरफ चल दिया।

मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा खोलना चाहा तो वो अन्दर से लॉक था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि बाजी अन्दर हैं.. इसलिए ज़रा ज़ोर से हैण्डल घुमाया था जिससे आवाज़ भी पैदा हुई और बाजी को भी पता चल गया था कि बाहर कोई है।

कुछ ही देर बाद बाजी ने दरवाज़ा खोला, स्कार्फ उसी तरह बाँध रखा था, गुलाबी क़मीज़ पहनी थी और काली सलवार और काला ही दुपट्टा था.. जो कंधे पर इस तरह डाला हुआ था कि उनका एक दूध बिल्कुल छुप गया था और दूसरा दूध खुला था।

गुलाबी क़मीज़ में निप्पल की जगह बिल्कुल काली नज़र आ रही थी और निप्पल तना होने की वजह से साफ महसूस हो रहा था।

उनके गुलाबी गाल जो उत्तेजना की शिद्दत से मज़ीद गुलाबी हो रहे थे.. वे पिंक क़मीज़ के साथ बहुत मैच कर रहे थे। उनकी बड़ी सी काली आँखों में लाली उतरी हुई थी।

अपनी बहन को ऐसे देख कर फ़ौरन ही मेरे लण्ड में जान पैदा हो गई और वो बाहर आने के लिए फनफनाने लगा।

बाजी ने बाहर आते हुए कहा- आज तुम जल्दी आ गए हो।

और सीढ़ियों की तरफ चल दीं।

‘जी आज मन नहीं कर रहा था कॉलेज जाने को इसलिए वापस आ गया।’

मैंने बाजी की बैक को देखते हुए अपने लण्ड को टाँगों के बीच दबाया और जवाब दिया।

बाजी ने पहली सीढ़ी पर क़दम रखा ही था कि मैंने आवाज़ दी- बाजी..

उन्होंने वहीं खड़े-खड़े ही चेहरा मेरी तरफ घुमा कर कहा- हम्म?

मैंने 3 सीडीज उनको शो करते हुए कहा- 114..

बाजी के चेहरे पर खुशी और एक्साइटमेंट साफ नज़र आ रहा था। उनकी आँखों में अजीब सी चमक पैदा हुई.. उन्होंने मुस्कुरा कर मेरी आँखों में देखा.. और नीचे उतर गईं।

मैं फ़ौरन ही कमरे में दाखिल हुआ और अपनी पैन्ट उतार कर एक तरफ फैंकी और लण्ड को हाथ में थाम कर कंप्यूटर के सामने बैठ गया। सीडी ऑन करने से पहले मुझे ख़याल आया कि ज़रा देखूं बाजी क्या देख रही थीं।

मैंने मीडिया प्लेयर में से रीसेंट्ली प्लेड मूवीज क्लिक किया.. तो उससे देखते ही मेरे चेहरे पर बेसाख्ता मुस्कुराहट फैल गई। वो एक ‘गे’ मूवी थी.. जो बाजी देख रही थीं।

मैंने न्यू सीडी लगाई और अपने लण्ड को मुट्ठी में लेकर हाथ आगे-पीछे करने लगा।

आज बहुत दिन बाद ये अमल कर रहा था.. इसलिए बहुत ज्यादा मज़ा आ रहा था और बार-बार मूवी की हीरोइन की जगह मेरी सग़ी बहन मेरी बाजी का चेहरा मेरे सामने आ जाता।

जब मूवी में लड़की के मम्मों का क्लोज़ लिया जाता तो मुझे मेरी पाकीज़ा बहन के दूध याद आ जाते।

ऐसे ही मूवी चल रही थी और मैं अपने लण्ड को हिला-हिला कर अपने आपको मंज़िल तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा था।

अचानक मैंने देखा कि एक गुलाबी ब्रा कंप्यूटर टेबल के नीचे पड़ी हुई थी।

शायद मेरी बाजी ने मूवी देखते हुए इसे उतार फैंका था और फिर जाते हुए जल्दी में उन्हें उठाना याद ही नहीं रहा।

बरहराल.. मैंने स्क्रीन पर ही नज़र जमाए-जमाए हाथ बढ़ा कर ब्रा को उठाया..

पहली चीज़ जो मैंने नोटिस की वो एक छोटा सा वाइट टैग था.. जिस पर 36डी लिखा हुआ था। जब मैं उस टैग पर लिखे डिजिट पढ़ने के लिए ब्रा को अपनी आँखों के क़रीब लाया.. तो एक माशूर कन खुशबू के झोंके ने मेरा इस्तकबाल किया।

अजीब सी बात थी उस खुशबू में.. जो शायद अल्फ़ाज़ में बयान नहीं की जा सकती.. सिर्फ़ महसूस की जा सकती है। महसूस भी आप उसी वक़्त कर सकते हैं जब ब्रा हाथ में हो।

ब्रा भी ऐसी जो चंद लम्हों पहले ही जिस्म से अलग हुई हो और ब्रा भी अपनी सग़ी बहन की हो.. उफफ्फ़.. क्या अहसास था।

मैंने ब्रा में से अपनी सग़ी बहन के जिस्म की खुश्बू को एक तेज सांस के साथ अपने अन्दर उतारी.. तो मेरी आँखें बंद हो चुकी थीं और मेरा हाथ मेरे लण्ड पर बहुत तेज-तेज चलने लगा था। मैंने बाजी की ब्रा के कप को अपने मुँह और नाक पर मास्क की तरह रखते हुए आँखें बंद कर लीं और चंद गहरी-गहरी

साँसों के साथ उस कामुक महक को अपने अन्दर उतारने लगा।

फिर मैंने अपनी ज़ुबान को बाहर निकाला और बाजी की ब्रा के कप में पूरी तरह ज़ुबान फेरने के बाद ब्रा के अन्दर के उस हिस्से को चूसने लगा.. जहाँ मेरी सग़ी बहन के निपल्स टच रहते हैं। मेरा मुँह नमकीन हो चुका था.. शायद वो बाजी के उभारों का खुश्क (ड्राइ) पसीना था.. जो अब मेरे मुँह में नमक घोल रहा था।

मैं पागलों की तरह बाजी की ब्रा को अपने चेहरे पर रगड़ रहा था। कभी चूसने लगता.. कभी चाटने लगता और तेज-तेज अपने हाथ को अपने लण्ड पर आगे-पीछे कर रहा था।

अजीब सी हालत थी मेरी.. मेरी हालत का अंदाज़ा आपको उसी वक़्त हो सकता है.. जब आपके हाथ में आपकी अपनी सग़ी बहन का इस्तेमाल शुदा ब्रा हो और आप उसे चूम और चाट रहे हों.. और अपनी सग़ी बहन के जिस्म की खुशबू आपको उसकी याद दिला रही हो।

अचानक बाजी ने दरवाज़ा खोला और अन्दर का मंज़र देख कर उनका मुँह खुल गया और वो जैसे जम सी गईं।

वो अपनी ब्रा लेने ही वापस आई थीं.. लेकिन उन्हें जो देखने को मिला.. वो उनके वहमो-गुमान में भी नहीं था।

जब बाजी ने देखा तो उनकी ब्रा मेरे बायें हाथ में थी और मैं कप के अन्दर ज़ुबान फेर रहा था। मैंने बाजी को देखा लेकिन अब मैं अपनी मंज़िल के बहुत क़रीब था इसलिए अपने हाथ को रोक नहीं सकता था।

वैसे भी बाजी मुझे काफ़ी बार इस हालत में देख ही चुकी थीं.. तो अब छुपाने को था ही क्या।

बाजी को देख कर मैंने ब्रा वाला हाथ नीचे किया और ब्रा समेत अपने लेफ्ट घुटने पर रख लिया और सीधे हाथ से लण्ड को हिलाना जारी रखा।

‘उफ़फ्फ़ मेरे खुदा.. तुम जानते हो कि तुम बेमर इंसान हो.. लाओ मुझे वापस करो मेरी ब्रा..’ उन्होंने अपने माथे पर हाथ मारते हुए चिल्ला कर कहा।

‘यहाँ आकर ले लें.. आप देख रही हो कि मैं बिजी हूँ..’ मैंने अपने लण्ड पर तेज-तेज हाथ चलाते हुए.. उन पर एक नज़र डालने के बाद वापस स्क्रीन पर नजरें जमाए हुए कहा।

उनका चेहरा लाल हो चुका था.. लेकिन मैंने महसूस किया था कि गुस्से के साथ ही उनकी आँखों में वैसी ही चमक पैदा हो गई थी.. जैसी उस वक़्त न्यू सीडीज़ की खबर सुन कर हुई थी।

बाजी मेरे राईट साइड पर आईं और मेरे हाथ से अपना ब्रा खींचने की कोशिश की और एक भरपूर नज़र मेरे लण्ड पर भी डाली। मेरे लण्ड से जूस निकलने ही वाला था और मैं चाहता था कि वो इसे निकलते हुए देखें।

इसलिए मैंने उनकी ब्रा पकड़े हुए हाथ को 2-3 बार झटका दिया और जैसे ही मेरा लण्ड पिचकारी मारने वाला था.. मैंने ब्रा वाला हाथ लण्ड के क़रीब एक लम्हें को रोका और फ़ौरन बाजी ने ब्रा को पकड़ लिया..

और इसी वक़्त मेरे मुँह से एक ‘अहह..’ निकली और मेरे लण्ड ने गर्म गर्म लावा फेंकना शुरू कर दिया।

काफ़ी सारे क़तरे बाजी के नर्मो नाज़ुक हाथ और खूबसूरत बाज़ू पर भी गिरे।

‘एवववव.. तुमम.. खबीस शख्स.. ये क्या किया तुमने.. गंदे..’

उन्होंने अपना हाथ मेरी शर्ट से रगड़ कर साफ किया और भागती हुई कमरे से बाहर निकल गईं।

एक-डेढ़ घंटा आराम करने के बाद मैं दोबारा उठा और कंप्यूटर कुर्सी संभालते हुए मूवी स्टार्ट की।

अभी लण्ड को हाथ में पकड़ा ही था कि बाजी दोबारा अन्दर दाखिल हुईं।

‘या खुदा.. तुम क्या सारा दिन ये ही करते रहोगे?’

लेकिन उनके अंदाज़ से ऐसा बिल्कुल नहीं महसूस हो रहा था कि जैसे उन्हें मुझे इस हालत में देखने से कोई प्राब्लम हो। इस वक़्त वो ऐसे ही नॉर्मल थीं.. जैसे आम हालात में होती थीं।

शायद अब वो मुझे ऐसे देखने की आदी हो गई थीं।

‘आप भी तो सारा दिन लगाती हैं.. ये करते हुए.. मैंने कभी आपको कुछ कहा है?’ ये बोलते हुए भी मैं अपने लण्ड को सहलाता रहा।

‘बकवास मत करो और चलो बाहर जाओ और मुझे कुछ टाइम दो।’

वो सामने ही सोफे पर बैठते हुए बोलीं।

लेकिन उस सोफे से कंप्यूटर स्क्रीन नहीं नज़र आती थी।

‘आप भी मेरे साथ यहाँ आ जाएँ.. दोनों देख लेते हैं ना.. मुझे बाहर भेज के आपको क्या मिलेगा?’

‘पागलों वाली बातें मत करो.. मैं तुम्हारे साथ बैठ कर नहीं देख सकती.. मैं अकेली ही देखूंगी।’

यह बोल कर वो कुछ सेकेंड्स रुकीं और फिर शैतानी के से अंदाज़ में कहा- मैंने कुछ काम भी करना होता है।

 
‘ओह.. होऊऊओ..’ मैं बाजी की इस जुर्रत पर वाकयी हैरान हुआ और हैरतजदा अंदाज़ में उनकी आँखों में देखा.. तो उनके चेहरे पर शर्म की लाली फैल गई और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ उन्होंने नजरों के साथ-साथ सिर भी झुका लिया।

कुछ देर ना बाजी कुछ बोलीं.. और ना मैं..

पर मैं समझ गया कि वो बाहर नहीं जाएंगी, शायद वो यहाँ बैठना चाहती हैं।

मैंने भी ज़ाहिरी तौर पर उन्हें नज़र अंदाज़ किया और मूवी देखते हुए अपने लण्ड को हिलाने लगा और कुछ ही देर बाद फिल्म में इतना खो गया कि बाजी का ध्यान ही नहीं रहा।

तकरीबन 10 मिनट बाद मैंने सिर घुमा कर बाजी की तरफ देखा तो उनकी नजरें मेरे लण्ड पर ही जमी हुई थीं और बहुत इत्मीनान से मेरी हर हरकत को देख रही थीं।

बाजी की आँखों में लाल-लाल डोरे बन चुके थे और आँखें ऐसी हो रही थीं.. जैसे नशे में हों।

उन्होंने मेरी नज़र को अपने चेहरे पर महसूस करके नज़र उठाई और मुझे कहा- सामने देखो.. और अपना काम करते रहो.. मेरी तरफ मत देखो..

मैं उनके इस अंदाज़ पर मुस्कुरा दिया और फिर मूवी के तरफ ध्यान देने लगा.. कुछ-कुछ देर बाद में बाजी की तरफ देख लेता था।

बाजी कभी अपने एक दूध को दबोच देती थीं.. कभी अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को हाथ से रगड़ देती थीं.. लेकिन इस बात का ध्यान रखने की कोशिश कर रही थीं कि मैं ना देख सकूँ।

और अपनी इस कोशिश में कुछ हद तक कामयाब भी थीं। वैसे भी बाजी मुसलसल नहीं हाथ चला रही थीं.. बस कुछ-कुछ देर बाद ही हरकत करती थीं।

कुछ ही देर बाद मेरा जिस्म अकड़ना शुरू हो गया.. मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे पूरे जिस्म से कोई चीज़ बह-बह कर मेरे लण्ड में जमा हो रही है।

मुझे अंदाज़ा हो गया था कि बाजी को लण्ड से निकलते हुए पानी को देखना बहुत पसन्द है। मैंने कुर्सी को बाजी की तरफ घुमा दिया और बहुत तेज-तेज अपने हाथ से लण्ड को रगड़ने लगा।

अब बाजी मेरे बिल्कुल सामने थीं।

बाजी समझ गईं थीं कि मेरी मंज़िल अब क़रीब ही है। मेरे रुख़ फेरने पर बिगड़ने के बजाए वो और ज्यादा तवज्जो से मेरे लण्ड को देखने लगी थीं।

उनकी आँखों में बिल्कुल ऐसी खुशी थी जो किसी बच्चे की आँख में उस वक़्त होती है.. जब उससे मन पसन्द चीज़ मिलने वाली हो। बाजी की आँखें नहीं झपक रही थीं.. बस एकटक वो मेरे लण्ड पर नज़र जमाए हुए थीं और सोफे से कुछ इंच उठी हुई थीं।

मैं बाजी के चेहरे के बदलते रंग देख रहा था। मेरे हाथ की हरकत में बहुत तेजी आ चुकी थी.. मेरे जिस्म से लहरें लण्ड में इकठ्ठी होती जा रही थीं.. और तभी एकदम से मेरा लण्ड फट पड़ा..

‘आआआहह आअपीईईई ईईईईई.. उफफफ..फफ्फ़..’

मैं आज ऐसा डिसचार्ज हुआ था कि मेरी पहली पिचकारी तकरीबन 4 फीट तक गई थी और आज मेरे लण्ड ने पानी भी नॉर्मल से बहुत ज्यादा छोड़ा था। मैं 6-7 मिनट तक आँखें बन्द किए निढाल सा पड़ा रहा।

फिर अचानक मैंने एक हाथ अपने कंधे पर महसूस किया- वसीम.. तुम ठीक तो हो ना.. क्या हुआ..???

बाजी की फिक्रमंद आवाज़ मुझे सुनाई दी।

‘जी बाजी.. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. ऐसा होता है, ये नॉर्मल है..’

मैंने आँखें खोल कर देखा तो बाजी एक हाथ मेरे कंधे पर रखे हुए थीं और दूसरे हाथ में पानी का गिलास पकड़े हुए मेरे सामने खड़ी थीं।

‘लो पानी पियो और ठहर-ठहर कर घूँट-घूँट पीना।’

बाजी ने मुझे पानी का गिलास दिया और फिर वापस मुड़ गईं।

मैंने फिर आँखें बंद कर लीं और एक घूँट पानी पीकर थोड़ी देर रुका.. फिर दूसरा घूँट ले ही रहा था कि मुझे अपने लण्ड पर ऊँगलियाँ महसूस हुईं।

मैंने आँखें खोल कर देखा तो बाजी मेरी टाँगों के सामने अपने घुटने ज़मीन पर टेके बैठी थीं और उन्होंने लेफ्ट हैण्ड की दो ऊँगलियों में मेरे नरम हुए लण्ड की टोपी थाम रखी थी।

उन्होंने खींच कर मेरे लण्ड को सीधा किया और दूसरे हाथ में पकड़े टिश्यू पेपर से मेरे लण्ड पर लगे पानी को साफ करते हुए फिक्रमंद लहजे में बोलीं- कितनी ही मूवीज में.. मैंने कितने ही लड़कों को डिसचार्ज होते देखा है.. लेकिन इतनी कमज़ोरी तो किसी को नहीं होती.. तुम अपनी सेहत का भी कुछ ख़याल करो।

ये कह कर बाजी ने हाथ में पकड़े गंदे टिश्यूस को कंप्यूटर टेबल के नीचे पड़े डस्टबिन में फेंका और पैकेट में से 5-6 टिश्यू और निकाले और फिर से मेरे लण्ड और मेरी जाँघों पर लगी मेरी गाढ़ी सफ़ेद मनी को साफ करने लगीं।

मैं पानी का गिलास हाथ में पकड़े बाजी को देखने लगा.. कितना मासूम और पाकीज़ा लग रहा था मेरी बाजी का चेहरा.. कितनी मुहब्बत थी उनकी नजरों में.. मेरे लिए ममता भरी मुहब्बत.. कोई लस्ट नाम की चीज़ नहीं थी उनकी आँखों में.. सिर्फ़ प्यार था.. ऐसा प्यार जो सिर्फ़ बड़ी बहन अपने छोटे भाई से करती है।

बाजी का प्यार देख कर मेरी आँखों में भी नमी आ गई। वो इतनी ज्यादा तवज्जो से सफाई कर रही थीं कि कहीं कोई क़तरा चिपका ना रह जाए। बाजी ने मेरे लण्ड के नीचे बॉल्स को पकड़ा और उनकी सफाई करते हो ऐसे हँसी जैसे किसी ने गुदगुदी कर दी हो

‘ही..हहहे.. ये कितने प्यारे से हैं ना.. मासूम से.. छू छू छुउऊउउ..’ ये कहते हुए बाजी ने मेरे बॉल्स को नीचे से हथेली में लिया और नर्मी से इस अंदाज़ में हाथ को हरकत देने लगीं.. जैसे कोई चीज़ तौल रही हों।

फिर नर्मी से दूसरे हाथ की ऊँगलियों से मेरे बॉल्स की सिलवटों को सहलाने लगीं।

‘इन पर क्यों बाल उग आते हैं?’ बाजी ने मेरे बॉल्स पर बालों को महसूस करते हुए बुरा सा मुँह बना कर गायब दिमागी की सी हालत में अपने आपसे कहा।

मेरे बॉल्स पर बाजी के हाथ का रदे-ए-अमल फौरी हुआ और मेरे सोए लण्ड में जान पड़ने लगी।

‘नहीं.. बिल्कुल भी नहीं..’ ये कहते हुए बाजी ऐसे पीछे हटीं और खड़ी हो गईं जैसे उन्हें करंट लगा हो।

‘फ़ौरन.. फ़ौरन उठो.. और अपना ट्राउज़र पहनो.. क्यों अपनी सेहत के दुश्मन हुए हो?’

बाजी ने लेफ्ट हैण्ड क़मर पर रखा और सीधे हाथ की ऊँगली का इशारा मेरे ट्राउज़र की तरफ करते हुए हुक्मिया लहजे में कहा और इसके बाद वे कमरे से बाहर निकल गईं।

मैं बस ट्राउज़र पहन कर कुर्सी पर बैठा ही था कि बाजी दोबारा कमरे में दाखिल हुईं.. उनके हाथ में दूध का गिलास था। उन्होंने दूध का गिलास टेबल पर रखा.. मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा और मुस्कुराते हुए मुहब्बत भरी नज़र से कुछ सेकेंड्स मुझे देखा.. फिर मेरे माथे को चूमते हो कहा- मेरा सोहना भाई.. चलो दूध पी लो फ़ौरन..

मुझे हुकुम देती हुईं वे सोफे पर जा बैठीं।

कुछ देर तक हम इधर-उधर की बातें करते रहे, मेरी पढ़ाई के बारे में कुछ बातें हुईं.. उसके बाद बाजी ने अचानक ही मुझसे पूछा- तुम्हारे और ज़ुबैर के बीच ये सब कैसे शुरू हुआ?

मैंने कहा- बाजी अगर मैंने सब तफ़सील से बताना शुरू किया.. तो 2-3 घंटे लग जाएंगे.. आपको खास-खास बातें बता देता हूँ।

‘नहीं.. मुझे ए से जेड तक सुनाओ.. चाहे 5-6 घन्टे ही क्यूँ ना लग जाएं।’

उन्होंने गर्दन को राईट-लेफ्ट हरकत देते हो ज़िद्दी अंदाज़ में कहा।

‘उम्म्म्म.. ओके.. मैं कोशिश करूँगा कि कोई बात भूलूं नहीं.. ये सब जब शुरू हुआ उस वक्त मेरी उम्र..’

मैंने बाजी को शुरू से अपनी पूरी दास्तान सुनाना शुरू की। बाजी ने दोनों पाँव ऊपर सोफे पर रखे और टाँगों को आपस में क्रॉस करके दोनों हाथों को जोड़ कर अपनी गोद में रखते हो बैठीं और पूरी तवज्जो से मेरी बात सुनने लगीं।

जैसे-जैसे दास्तान आगे बढ़ती जा रही थी बाजी की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी। वो कभी टाँगों को आपस में भींचती थीं तो कभी अपनी दोनों रानों को एक-दूसरे से रगड़ देती थीं.. शायद उनकी बेचैनी की वजह ये थी कि वो मेरे सामने अपनी टाँगों के बीच सहला नहीं पा रही थीं।

उनके गोरे गाल सेक्स की चाहत से गुलाबी हो गए.. आँखों में नशा सा छा गया था और आँखों में लाली भी आ गई थी। मेरा लण्ड भी फुल टाइट हो चुका था और थोड़ी-थोड़ी देर बाद बेसाख्ता ही मेरा हाथ लण्ड तक चला जाता था और मैं ट्राउज़र के ऊपर से ही लण्ड को पकड़ कर भींच देता था।

 
मुझे दास्तान सुनाते एक घन्टे से ज्यादा हो गया था.. मैं थोड़ी देर पानी पीने के लिए रुका, मैं टेबल से पानी उठाने के लिए दूसरी तरफ मुड़ा तो बाजी को भी मौका मिल गया और उन्होंने अपनी टाँगें सीधी कीं और अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को अपने हाथ से रगड़ दिया।

यक़ीनन बाजी की टाँगों के बीच वाली जगह भी मुसलसल निकलते पानी से बहुत गीली हो चुकी थी और उन्होंने अपना गीलापन सलवार से साफ किया था।

मैंने कुर्सी पर बैठते ही जहाँ दास्तान छोड़ी थी.. वहीं से शुरू की.. दस मिनट बाद ही बाजी की बेचैनी दोबारा शुरू हो चुकी थी, शायद उनका पानी फिर बहने लगा था।

जब बाजी की बर्दाश्त से बाहर होने लगा तो बाजी ने मेरी बात को काटते हुए कहा- वसीम प्लीज़ तुम अपनी कुर्सी को घुमा लो.. और मेरी तरफ पीठ करके सुनाते रहो..

मैं फ़ौरन ही समझ गया कि मेरी प्यारी बहन क्या करना चाह रही हैं, मैंने हँसते हुए फिल्मी अंदाज़ में कहा- बाजी मेरे सामने ही कर लो ना.. मैं भी आपके सामने ही कर रहा हूँ। ये दुनिया है कभी हम तमाशा देखते हैं.. तो कभी हमारा तमाशा बनता है।

‘बकवास मत करो.. तुम बेशर्म हो.. मैं नहीं.. जल्दी से घूमो ना.. प्लीज़ अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है..’

बाजी अपनी फोल्डेड टाँगें खोलती हुई बोलीं और बेख़याली में मेरे सामने ही अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को रगड़ दिया।

फ़ौरन ही उन्हें अंदाज़ा हुआ कि उन्होंने क्या कर दिया है.. उन्होंने शर्म से लाल होते हुए कहा- घूम जा ना कमीने.. इतना क्यूँ तंग करते हो अपनी बहन को..

मैंने हँसते हुए अपनी कुर्सी को घुमाया उनकी तरफ पीठ करके कहा- बाजी ज़रा प्यार से रगड़ना.. कहीं छील ना देना..

‘शटअप..!’ वो झेंपते हुए बोलीं।

मैंने दोबारा दास्तान शुरू कर दी और साथ ही अपना ट्राउज़र भी उतार दिया और लण्ड को मुठी में लेकर हाथ आगे-पीछे करने लगा।

थोड़ी-थोड़ी देर बाद बाजी की ‘आआआहह.. उफफ्फ़..’ जैसी आवाजें भी सुनाई दे रहीं थीं और सोफे की चरचराहट बता रही थी कि बाजी कितनी तेज-तेज हाथ चला रही हैं।

दास्तान खत्म होने के क़रीब थी.. तो बाजी के हलक़ से निकलती आवाज़ ‘अक्खहूंम्म्म.. उफफफ्फ़.. उखं..’ सुन कर मैंने अपना रुख़ बाजी की तरफ किया..

बाजी की आँखें बंद थीं उनका जिस्म अकड़ा हुआ था.. टाँगें खुली हुई थीं.. पाँव ज़मीन पर टिके थे.. और कंधे और कमर का ऊपरी हिस्सा सोफे की पुश्त पर था। सिर पीछे की तरफ़ ढलक गया था और पेट और सीने का हिस्सा कमान की सूरत में मुड़ा हुआ था.. उनके कूल्हे सोफे से उठे हुए थे..

बायें हाथ से बाजी ने अपने बायें दूध को दबोचा हुआ था और दायें से बाजी अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को कभी भींचती थीं.. कभी लूज कर देती थीं.. उनके हलक से ऐसी आवाजें आ रही थीं.. जैसे वो बहुत करीब में हैं।

उनकी क़मीज़ पेट से हट गई थी… मैंने पहली बार अपनी सग़ी बहन का पेट देखा था.. गोर पेट पर खूबसूरत सा नफ़ (नेवेल) बहुत प्यारा लग रहा था। उनके पेट पर नफ़ के बिल्कुल नीचे एक तिल भी था।

अपनी डीसेंट सी बहन को इस हालत में देख कर मैं अपने ऊपर कंट्रोल खो बैठा था.. मैं बहुत तेज-तेज हाथ चला रहा था।

दूसरी तरफ बाजी भी डिसचार्ज हो गई थीं और उनका जिस्म नीचे सोफे पर टिक गया था।

मैंने देखा बाजी की सलवार के बीच का बहुत बड़ा हिस्सा गीला हो गया था और उनका हाथ भी उनके पानी की वजह से चमक रहा था।

उसी वक़्त मेरी बर्दाश्त करने की हद भी खत्म हो गई और मेरे लण्ड से भी पानी एक धार की सूरत में निकाला और ज़मीन पर गिरा और उसके बाद क़तरा-क़तरा निकल कर मेरे हाथ और रानों पर सजने लगा।

कुछ देर बाद जब मैंने आँखें खोलीं.. तो उसी वक़्त बाजी भी आँखें खोल रही थीं। बाजी ने आँख खोली और मुझसे नज़र मिलने पर मुस्कुरा दीं।

मैं भी मुस्कुरा दिया.. मेरा लण्ड मेरी मुठी में ही था और बाजी का भी एक हाथ टाँगों के बीच और दूसरा उनके एक उभार पर था.. लेकिन उनके अंदाज़ में कोई घबराहट या जल्दी नहीं थी, वो कुछ देर ऐसे ही आधी लेटी मेरी तरफ देखती रहीं.. फिर आहिस्तगी से उन्होंने अपनी सलवार से ही अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को साफ किया और फिर सीधी बैठीं और अपने मम्मों को पकड़ कर अपनी क़मीज़ सही करने लगीं।

मम्मों और पेट से क़मीज़ सही करने के बाद बाजी ने फिर मेरी आँखों में देखा.. मैं उन्हीं को देख रहा था।

‘अब उठो.. और साफ करो अपने आपको.. कितनी गंदगी फैलाते हो तुम..’

फिर उन्होंने अपने हाथ को देखा और सिर झुका कर अपनी सलवार को दोनों हाथों से फैला कर देखने लगीं.. जो ऐसी हो रही थी जैसे उन्होंने पेशाब किया हो।

सलवार देखते हुए उन्होंने कहा- तुम्हारे साथ रह-रह कर मैं भी गंदी हो गई हूँ।

‘बाजी मुझे भी साफ कर दो ना..’

मैंने निढाल सी आवाज़ में कहा।

‘जी नहीं.. मैं हर किसी को इतना फ्री नहीं करती..’ बाजी ने किसी फिल्मी हीरोइन के तरह नखरीले स्टाइल में कहा और खड़ी होकर मेरी तरफ पीठ करके सिर को टिकाया ‘हम्म..’ और कैटवॉक के स्टाइल में कूल्हों को मटका कर चलती हुई बाहर जाने लगीं।

दरवाज़े में खड़े होकर उन्होंने सिर्फ़ गर्दन घुमा कर पीछे मुझे देखा और बहुत सेक्सी से स्टाइल में एक्टिंग करते हुए उन्होंने मुझे आँख मारी और बाहर निकल गईं।

बाजी की इस मासूमाना हरकत ने मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट फैला दी और मेरी सुस्ती को भी कम कर दिया। मेरा लण्ड अभी भी मेरी मुट्ठी में ही था और जिस्म में इतनी जान ही नहीं बची थी कि में हाथ-पाँव हिला सकता।

करीबन 15 मिनट ऐसे ही पड़े रहने के बाद मैं उठा और नहाने के लिए बाथरूम चला गया।

रात में खाना खाने के बाद सब अपने कमरों में सोने जा चुके थे.. मैं अकेला बैठा टीवी देख रहा था.. जब ज़ुबैर बैग उठाए घर में दाखिल हुआ।

मैं उठ कर उससे मिलते हुए बोला- यार फोन ही कर देते.. मैं आ जाता तुम लोगों को लेने..

‘हमारा इरादा तो ये ही था.. लेकिन इजाज़ खालू के एक दोस्त जो एयरपोर्ट पर ही काम करते हैं.. उन्होंने ज़िद करके अपने ड्राइवर को साथ भेज दिया.. इसलिए आप लोगों को इत्तला नहीं दी.. मैं ज़रा नहा लूँ भाई.. फिर बातें करेंगे।’ ज़ुबैर ने ऊपर कमरे की तरफ जाते हुए कहा।

फिर पहली सीढ़ी पर रुकते हुए कहा- बाक़ी सब तो सो गए होंगे?

‘हाँ..’ मैंने जवाब दिया।

‘आप भी आ जाओ ना यहाँ.. क्या कर रहे हैं..’

उसने कहा और ऊपर चला गया।

उसके जाते ही बाजी अपने रूम से निकलीं और आकर सोफे पर मेरे बराबर बैठ गईं।

‘ज़ुबैर की आवाज़ आ रही थी.. क्या वो आ गया है?’

‘जी.. ऊपर चला गया है..’ मैंने जवाब दिया और उनको देखने लगा।

उनके चेहरे पर परेशानी सी छाई हुई थी।

‘कमीने अगर दिन में मुझे मूवी देखने दे देते तो अच्छा था ना.. तुम तो उसके साथ सब कुछ कर ही सकते हो..’ वो झुँझलाते हुए बोलीं।

अब मुझे समझ आ गई थी बाजी की परेशानी की वजह.. मुझसे बाजी की झिझक अब बिल्कुल खत्म हो गई थी और वो मुझसे हर तरह की बात कर रही थीं।

मैंने भी हैरत का इज़हार नहीं किया और नॉर्मल रह कर ही बात करने लगा।

‘बाजी उसे तो आना ही था.. आज नहीं तो कल आ जाता.. आपकी 114 खत्म होने के बाद 115वीं.. 116वीं भी तो आनी ही हैं ना.. आप हमारे साथ ही देख लिया करो। वैसे भी अब हमारे बीच कोई बात छुपी हुई तो है नहीं.. आप भी जानती हैं कि हम सेक्स के मामले में बिल्कुल पागल हैं और मैं भी जानता हूँ कि आप भी हमारी ही सग़ी बहन हैं। अगर हमारे खून में इतना उबाल है.. तो आप की रगों में भी वो ही खून है.. उबाल उसका भी हमारे जितना ही है।’

‘तुम्हारी और बात है.. तुम समझदार हो.. और नेचुरल नीड्स को समझ सकते हो.. इस बात को समझ सकते हो कि जब हमारे जिस्मों को जेहन के बजाए टाँगों के बीच वाली जाघें कंट्रोल करने लगती हैं.. तो सोचने समझने की सलाहियत खत्म हो जाती है.. क्या हालत होती है उस वक़्त.. इसका अंदाज़ा तुम्हें है। लेकिन ज़ुबैर अभी बच्चा है.. उसके सामने मैं..!’ इतना कह कर बाजी चुप हो गईं।

उनके चेहरे से बेचारगी और लाचारी ज़ाहिर हो रही थी।

‘बाजी आपकी इतनी लंबी तक़रीर का मेरे पास एक ही जवाब है कि ज़ुबैर भी सब समझता है.. वो बच्चा नहीं है.. कईयों बार मुझे चोद चुका है वो..’ मैंने शरारती अंदाज़ में कहा और हँसने लगा।

मेरी इस बात का असर वो ही हुआ जो मैं चाहता था। बाजी के चेहरे से भी परेशानी गायब हो गई और उन्होंने भी शरारती अंदाज़ में हँसते हुए मेरे सीने पर मुक्का मारा और कहा- तुम्हारा बस चले तो तुम तो गधे घोड़े को भी नहीं छोड़ो..’

बाजी की इस बात पर मैं भी हँस दिया।

माहौल की घुटन खत्म हो गई थी।

फिर मैंने सीरीयस होते हुए कहा- बाजी मैं जानता हूँ कि आपको लड़कों-लड़कों का सेक्स देखना पसन्द है। मैंने काफ़ी दफ़ा आपके जाने के बाद हिस्टरी चैक की है। तो ज्यादा मूवीज ‘गे’ सेक्स की ही होती हैं.. जो आप देखती हैं। ज़रा सोचो आप मूवीज के बजाए हक़ीक़त में ये सब अपने सामने होता हुआ भी देख सकती हैं।

मेरी बात सुन कर बाजी की आँखों में चमक सी लपकी थी.. वो चंद लम्हें कुछ सोचती रहीं फिर बोलीं- हाँ मुझे इस किस्म की कुछ मूवीज ने बहुत एक्साइट किया था और वो सब देख कर अजीब सा मज़ा आया था। ये सच है कि मैं रियल एक्शन देखना चाहती हूँ।

बाजी यह कह कर फिर से कुछ सोचने लगीं, मैं भी चुप ही रहा और उन्हें सोचने का टाइम दिया।

कुछ देर बाद बाजी बोलीं- ओके.. ठीक है.. लेकिन ये सब होगा कैसे?

मैंने कहा- इसकी आप फ़िक्र ना करें.. ये सब मुझ पर छोड़ दें.. लेकिन आप ये जेहन में रखें कि आपके और मेरे बीच जो कुछ हुआ.. वो सब कुछ उसे बताना होगा.. तभी मैं उसे भरोसे में ले सकूँगा।

बाजी से उन बातों के दौरान मेरा लण्ड थोड़ी सख्ती ले चुका था और ट्राउज़र में टेंट सा बन गया था।

बाजी ने कुछ देर सोचा और फिर शायद उनको भी उसी बागी मिज़ाज ने अपनी लपेट में ले लिया।

मतलब वही जो मैं सोच रहा था कि सोचना क्या.. जो भी होगा देखा जाएगा। आख़िर थीं तो वो मेरी सग़ी बहन ही ना.. खून तो एक ही था और शायद ये बागी मिज़ाज भी हमें जीन्स में ही मिला था कि हमारे अम्मी अब्बू ने भी कोर्ट मैरिज की थी।

उन्होंने हाथ को मक्खी उड़ाने के स्टाइल में लहराया और कहा- ओके.. गो अहेड.. कुछ भी करो.. अब सब तुम पर छोड़ती हूँ।

कह कर वो खड़ी हुईं और थप्पड़ के अंदाज़ में हाथ मेरे खड़े लण्ड पर मारा..

जैसे ही थप्पड़ मेरे खड़े लण्ड पर पड़ा.. मैं तक़लीफ़ से एकदम दुहरा हो गया और मेरे मुँह से ‘आहह..’ के साथ ही निकला ‘बहनचोद बाजीईई..’ और बाजी हँसते हुए फ़ौरन अपने कमरे की तरफ भाग गईं।

मैंने पीछे से आवाज़ लगाई- याद रखना बदला ज़रूर लूँगा।

बाजी अपने कमरे में पहुँच गई थीं.. उन्होंने दरवाज़े में खड़े होकर कहा- सोचना क्या.. जो भी होगा देखा जाएगा!

और ये कह कर दरवाज़ा बंद कर लिया।

 
कुछ देर बाद जब लण्ड की तक़लीफ़ कम हुई तो मैं कमरे में आ गया। ज़ुबैर सो चुका था.. शायद इतने दिन बाद अपने बिस्तर का सुकून नसीब हुआ था इसलिए।

मैं भी बिस्तर पर लेटा और जल्द ही दुनिया-ओ-माफिया से बेखबर हो गया।

सुबह जब आँख खुली तो 10 बज रहे थे, ज़ुबैर अभी तक सो रहा था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ अभी खत्म नहीं हुई थीं।

मैंने बाथरूम जाने से पहले ज़ुबैर को भी जगा दिया।

मैं बाथरूम से बाहर आया.. तो ज़ुबैर इन्तजार में ही बैठा था। मेरे निकलते ही वो अन्दर घुस गया.. तो मैं उससे नीचे आने का कह कर खुद भी नीचे चल दिया।

जब मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा तो किचन में से अम्मी की आवाज़ आई- उठ गए बेटा.. बस थोड़ी देर बैठो.. मैं नाश्ता बना देती हूँ।

मैंने कहा- अम्मी 2 बन्दों का नाश्ता बनाइएगा.. ज़ुबैर भी वापस आ गया है.. नीचे आ ही रहा है और बाजी नहीं हैं घर में क्या.. जो आप नाश्ता बना रही हैं?

‘नहीं.. वो तो सुबह ही यूनिवर्सिटी चली गई थी और वो छोटी निक्कमी भी जाकर नानी के घर ही बस गई है.. ना कुछ खाना बनाना सीखती है.. ना सीना पिरोना.. कल दूसरे घर जाएगी तो..!’ अम्मी का ना रुकने वाला सिलसिला शुरू हो चुका था।

फर ऐसे ही अपनी फिक्रें बताते हुए और शिकायत करते हुए ही अम्मी नाश्ता बनाने लगीं, मैं उनकी बातों का जवाब देते हुए ‘हूँ.. हाँ..’ करने लगा।

ज़ुबैर नीचे आया तो अम्मी की आवाज़ सुनते ही सीधा किचन में गया और उन्हें सलाम करने और उनसे प्यार लेने के बाद उनके साथ ही नाश्ते के बर्तन पकड़े बाहर आया और मेरे साथ वाली कुर्सी पर ही बैठ गया।

हमने नाश्ता शुरू किया और अम्मी का रुख़ अब ज़ुबैर की तरफ हो गया था। नाश्ता करते-करते ज़ुबैर अम्मी से भी बातें करता रहा.. जो गाँव के बारे में ही पूछ रही थीं।

नाश्ता खत्म करके में टिश्यू से हाथ साफ कर ही रहा था कि ज़ुबैर ने पीछे मुड़ कर अम्मी को देखा और उन्हें किचन में बिजी देख कर ज़ुबैर ने मेरे ट्राउज़र के ऊपर से ही मेरे लण्ड को पकड़ कर दबाया और बोला- भाई चलो ना आज.. बहुत दिन हो गए हैं।

‘फिर किसी ख़याल के तहत चौंकते हुए उसने कहा- अम्मी का बिहेव तो ठीक ही है.. इसका मतलब है बाजी ने अम्मी अब्बू को नहीं बताया ना कुछ..!

उसकी बात के जवाब में मैंने मुस्कुराते हो उसका हाथ अपने लण्ड से हटाया और खड़े होते हुए कहा- नाश्ता खत्म करके कमरे में आ जाओ।

कह कर मैं ऊपर चल दिया।

जब ज़ुबैर कमरे में दाखिल हुआ तो मैं बिस्तर पर लेटा हुआ बाजी के बारे में ही सोच रहा था और मेरा लण्ड खड़ा था। ज़ुबैर ने मेरी तरफ आते हुए कहा- अम्मी सलमा खाला के घर चली गई हैं.. कह रही थीं कि इजाज़ खालू से भी मिल लेंगी और शाम को ही वापस आएँगी।

बात खत्म करके ज़ुबैर मेरे पास आकर बैठा.. तो मैं भी उठ कर बैठ गया।

ज़ुबैर ने मेरे खड़े लण्ड को अपने हाथ में पकड़ा और बोला- भाई आज तो ये कुछ बड़ा-बड़ा सा लग रहा है।

मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया.. मैं अपनी सोच में था।

ज़ुबैर ने मुझे सोच में डूबा देख कर मेरे लण्ड को ज़ोर से दबाया और बोला- भाई बाजी ने किसी को शिकायत नहीं लगाई.. तो लाज़मी बात है कि आपको बहुत बुरा-भला कहा होगा?

मैंने ज़ुबैर की तरफ देखा और उससे कहा- जो मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ.. सुन कर तुम्हारे होश उड़ जाएंगे।

वो बगैर कुछ बोले आँखें फाड़ते हुए मेरी तरफ देखने लगा।

और मैंने उससे शुरू से बताना शुरू किया।

‘उस रात तुम्हारे सोने के बाद मुझे ख़याल आया कि मैं कंप्यूटर में से अपना पॉर्न मूवीज का फोल्डर तो डिलीट कर दूँ.. ताकि बाजी अब्बू को बता भी दें तो कोई ऐसा सबूत तो ना हो। मैं उठा और कंप्यूटर टेबल पर आकर कंप्यूटर ऑन करने लगा.. तो मैंने देखा कि उसकी पॉवर कॉर्ड गायब थी। कुछ देर तो मुझे समझ नहीं आया.. लेकिन आख़िर में याद आया कि बाजी कमरे से जाने से पहले कंप्यूटर के पास आई थीं। यक़ीनन वो ही पॉवर कॉर्ड निकाल कर ले गई होंगी..’

पूरी बात ज़ुबैर को बताने के बाद जब मैंने ध्यान दिया.. तो हम दोनों ही बिल्कुल नंगे हो चुके थे और हम दोनों ने एक-दूसरे के लण्ड को अपने हाथों में ले रखा था।

हमें पता ही नहीं चला था कि कब हमने कपड़े उतार कर फैंके और कब लण्ड हाथों में ले लिए।

ज़ुबैर की हालत बहुत खराब थी.. बाजी के बारे में सुन कर उसके होशो-हवास गुम हो गए थे।

ये तो होना ही था.. क्योंकि हमारी बहन जो हर वक़्त बड़ी सी चादर में रहती थी जिसके सिर से कभी किसी ने स्कार्फ उतरा हुआ नहीं देखा था.. जो नफ़ासत.. और पाकीज़गी का पैकर थी.. उसको इस हाल में देखना तो दूर की बात.. सोचना भी मुश्किल था। और ज़ुबैर को मैं वो सच बता रहा था.. ऐसा सच जो चाँद की तरह सच था।

मैं अपनी जगह से उठा और मैंने अपने होंठ ज़ुबैर के होंठों से चिपका दिए और हमने एक-दूसरे का लण्ड चूसा.. गाण्ड का सुराख चाटा.. एक-दूसरे को चोदा.. मतलब हम जो-जो कुछ कर सकते थे.. सब कुछ किया।

जब एक शानदार चुदाई के बाद हम दोनों फारिग हुए.. तो 3 बज चुके थे, मतलब 4 घन्टे से हम चुदाई का खेल खेल रहे थे और अब थक कर बिस्तर पर नंगे ही लेटे हुए थे।

हम दोनों के हलक़ खुश्क हो चुके थे।

ज़ुबैर को इसी हालत में छोड़ कर मैंने अपने कपड़े पहने और पानी लेने के लिए नीचे चल दिया।

उसी रात मुझे और ज़ुबैर को फिर एमर्जेन्सी में गाँव जाना पड़ गया। इस बार हम 8 दिन रुके और सब काम मुकम्मल निपटा कर साथ ही वापस लौटे थे।

जब 8 दिन बाद भरपूर सेक्स करने के बाद ज़ुबैर सो गया था और मैं अपने कमरे से निकल कर नीचे आ गया था।

जब मैंने आखिरी सीढ़ी पर क़दम रखा तो सामने सोफे पर बाजी आधी लेटी आधी बैठी हुई सी हालत में सोफे पर पड़ी थीं और पाँव ज़मीन पर थे।

उनकी टाँगें थोड़ी खुली हुई थीं.. उनकी गर्दन सोफे की पुश्त पर टिकी थी और सिर पीछे को ढलका हुआ था.. आँखें बंद थीं।

यूनिवर्सिटी बैग सामने कार्पेट पर पड़ा था.. शायद वो अभी-अभी ही यूनिवर्सिटी से आईं थीं और गर्मी से निढाल हो कर यहाँ ही बैठ गईं थीं।

मैंने किचन के तरफ रुख़ मोड़ा ही था कि किसी ख़याल के तहत मेरे जेहन में बिजली सी कौंधी और मैं दबे पाँव बाजी की तरफ बढ़ने लगा।

मैं उनके बिल्कुल क़रीब पहुँच कर खड़ा हुआ और अपना रुख़ सीढ़ियों की तरफ करके भागने के लिए अलर्ट हो गया। मैंने एक नज़र बाजी के चेहरे पर डाली.. उनकी आँखें अभी भी बंद थीं।

मैंने अपना सीधा हाथ उठाया और थप्पड़ के अंदाज़ में ज़ोर से अपनी सग़ी बहन की टाँगों के बीच मारा और फ़ौरन भागा.. लेकिन 3-4 क़दम बाद ही किसी ख़याल के तहत रुक गया। वहाँ हाथ मारने से ना ही कोई आवाज़ आई थी और मुझे ऐसा महसूस हुआ था जैसे मैंने फोम के गद्दे पर हाथ मारा हो.. पता नहीं मेरा हाथ बाजी की टाँगों के बीच वाली जगह पर लगा भी था या मैं सोफे पर ही हाथ मार के भाग आया था।

फ़ौरन ही बाजी के हँसने की आवाज़ पर मैं घूमा.. तो बाजी बेतहाशा हँस रही थीं और उनके चेहरे पर जीत की खुशी थी।

उन्होंने हँसते-हँसते ही कहा- कमीने तुमने बदला ले लिया है.. यह अलग बात है कि इसका नुक़सान मुझे हुआ ही नहीं.. लेकिन हिसाब बराबर हो गया है। अब तुम दूसरी कोशिश नहीं कर सकते समझ गए?

‘ओके मेरा वादा है कि दोबारा कोशिश नहीं करूँगा हिसाब बराबर..’

मैंने कन्फ्यूज़ और कुछ ना समझ आने वाली कैफियत में जवाब दिया।

बाजी ने मुझे कन्फ्यूज़ देखा तो मेरी कैफियत को समझते हुए और मेरी हालत से लुत्फ़-अंदोज़ होते हुए कहा- उल्लू के चरखे.. कन्फ्यूज़ ना हो.. मैं महीने से हूँ और शुरू के और आखिरी दिनों में मेरा बहुत हैवी फ्लो होता है इसलिए में डबल पैड लगाती हूँ.. आज आखिरी दिन है.. समझे बुद्धू..’

यह कह कर उन्होंने एक नज़र मुझ पर डाली और फिर खिलखिला कर हँस पड़ीं.. क्योंकि मेरी शक्ल ही ऐसे हो रही थी।

मेरी हालत उस शख्स जैसी थी जैसे भरे बाज़ार में किसी गंजे के सिर पर कोई एक चपत रसीद करके भाग गया हो।

बाजी ने मुझे वॉर्निंग देते हुए कहा- मैंने भी तुमसे एक बात का बदला लेना है मैं भूली नहीं हूँ उस बात को..

मैंने पूछा- कौन सी बात?

बाजी ने जवाब दिया- मैं सही टाइम पर ही बदला लूँगी.. अभी नहीं.. देखो शायद वो टाइम आ जाए और हो सकता है कि ऐसा टाइम कभी ना आए।

मैं कुछ देर खड़ा रहा.. फिर झेंपी सी हँसी हँसते हुए.. सिर खुजाते किचन में चला गया और बाजी भी उठ कर अपने कमरे की तरफ चली गईं।

लेकिन मैंने देखा था बाजी के चेहरे पर अभी भी शैतानी मुस्कुराहट सजी थी।

मैंने पानी पीकर कमरे में ले जाने के लिए जग भरा और किचन से निकला तो बाजी भी अपने कमरे से बाहर आ रही थीं।

वो अभी-अभी मुँह हाथ धोकर आई थीं.. उनका चेहरा बहुत बहुत ज्यादा खूबसूरत और फ्रेश लग रहा था।

उन्होंने क्रीम रंग का स्कार्फ जिस पर बड़े-बड़े लाल फूल थे.. बहुत सलीक़े से अपने मख़सूस अंदाज़ में सिर पर बाँध रखा था।

क्रीम रंग की ही कॉटन की कलफ लगी क़मीज़ थी और उस पर भी लाल रंग के बारे बारे फूल थे।

सफ़ेद कॉटन की सादा सी सलवार थी।

बाजी ने अपने जिस्म के गिर्द ग्रे कलर की बड़ी सी चादर लपेट रखी थी.. वो नंगे पाँव थीं।

उनके गोरे पाँव मैरून कार्पेट पर बहुत खिल रहे थे।

‘बाजी आप इस सूट में बहुत ज्यादा हसीन लग रही हैं..’ मैंने भरपूर नज़र बाजी पर डालते हुए कहा।

‘अच्छा अभी तो तुमने सही तरह से सूट देखा ही कहाँ है.. चलो तुम भी क्या याद करोगे.. देख लो..’ ये कहते हुए बाजी ने अपनी चादर उतारी और अपने बाज़ू पर लटका दी।

बाजी के चादर हटते ही उनके बड़े-बड़े मम्मे मेरी नजरों के सामने थे। बाजी की ये क़मीज़ भी उनकी बाक़ी सब कमीजों की तरह टाइट थी और बाजी के मम्मे उनमें बुरी तरह से दबे हुए थे।

ब्रा का रंग नहीं मालूम पड़ रहा था.. लेकिन गौर से देखने पर पता चलता था.. जहाँ-जहाँ ब्रा का कपड़ा मौजूद था.. वहाँ-वहाँ से क़मीज़ का रंग गहरा हो गया था और ब्रा की शेप और डिजाइन वज़या नज़र आ रहा था।

ब्रा ही की वजह से निप्पल बिल्कुल छुप गए थे और उनका निशान भी नहीं नज़र आता था।

‘यार बाजी.. ये इतने ज्यादा दबे हुए हैं, इतना टाइट होने से इनमें दर्द नहीं होता क्या?’ मैंने अपनी सग़ी बहन के सीने के उभारों पर ही नज़र जमाए हुए उनसे पूछा।

‘अरे नहीं यार.. अब आदत हो गई है बिल्कुल भी महसूस नहीं होता.. लेकिन जब ब्रा पहनना शुरू किया था.. तो उस वक़्त मैं बहुत तंग होती थी.. ब्रा ना पहनने पर रोज़ ही अम्मी से डांट पड़ती थी और उस वक़्त ब्रा से बचने के लिए ही मैंने बड़ी सी चादर लेनी शुरू की थी.. जो बाद में मेरी आदत ही बन गई।’

बाजी ने यह कह कर मेरे हाथ से जग लिया और जग से ही मुँह लगा कर पानी पीने लगीं।

पानी पीकर वो सोफे के तरफ बढ़ीं.. तो मैंने कहा- आप यहीं रहना.. मैं पानी कमरे में रख कर आता हूँ।

मैं कमरे में पहुँचा तो ज़ुबैर सो रहा था।

मैंने उसके पास पानी रखा और बाहर निकल कर दरवाज़ा बंद करते हुए.. मैंने बाहर से लॉक भी कर दिया।

 
जब मैं वापस नीचे हॉल में पहुँचा तो बाजी सोफे पर अपने पाँव कूल्हों से मिलाए और घुटने सीने से लगा कर घुटनों पर अपनी ठोड़ी टिकाए बैठी थीं।

बाजी ने दोनों बाजुओं को अपनी टाँगों से लपेट रखा था.. उनकी चादर और स्कार्फ दोनों ही नीचे कार्पेट पर पड़े थे।

मैंने उनके बिल्कुल सामने.. ज़मीन पर बिछे कार्पेट पर बैठ कर पूछा- तो फिर आपने ब्रा कैसे पहनना शुरू की?

‘बाजी को पता था कि मैं ब्रा नहीं पहनती हूँ.. और इस बात को सबसे छुपाने के लिए बड़ी सी चादर लिए रखती हूँ.. तो उन्होंने ही मुझे समझाया था कि ब्रा ना पहनने से ये लटक जाएंगे और इनकी शेप भी खराब हो जाएगी और ब्रेस्ट कैन्सर जैसी बीमारी भी लग सकती है वगैरह वगैरह..’

अब मैं आपसे बाजी का तवारूफ भी करवा दूँ.. हम अपनी सबसे बड़ी बहन जिनका नाम समीना है.. उनको बाजी कह कर बुलाते हैं। वो बाजी से 7 साल बड़ी हैं।

उनकी शादी 4 साल पहले हुई थी उनके शौहर उनके साथ यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे.. वहाँ ही उनका लव हुआ.. लेकिन शादी दोनों के घरवालों की मर्ज़ी से हँसी खुशी हुई थी और अब बाजी अपने सुसराल वालों के साथ लाहौर में रहती हैं।

बाक़ी की तफ़सील उस वक़्त बताऊँगा.. जब वो हमारी कहानी में शामिल होंगी। तब तक के लिए इन्तजार कीजिए।

‘उस वक़्त क्या उम्र थी आपकी?’ मैंने पूछा।

बाजी ने अपनी आँखें छत की तरफ़ कर के सोचते हुए कहा- मैं उस वक़्त तकरीबन 13 साल की थी।

बाजी की बात खत्म होते ही मैंने एक और सवाल कर दिया- बाजी आपके दूध किस उमर में निकले थे कि आपको 13 साल की उम्र में ब्रा की जरूरत पड़ गई।

‘गुठलियाँ सी तो 10 साल की उम्र में ही बन गई थीं और 12 साल की उम्र में साफ नज़र आने लगी थीं और 13 साल में तो फुल डवलप हो चुके थे। मैंने पहली बार ब्रा 32सी साइज़ का पहना था। तभी तो अम्मी डांटा करती थीं कि मामू वगैरह घर आते थे.. तो अम्मी को शर्म आती थी।

‘इतनी जल्दी निकल आते हैं क्या दूध?’ मैंने हैरत से पूछा।

बाजी ने कहा- नहीं हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता.. नॉर्मली तो 13 साल की उम्र में गुठलियाँ ही होती हैं.. लेकिन हम लोगों का ये खानदानी सिलसिला है। बाजी और सलमा खाला के भी 10 साल की उम्र में शुरू हो गए थे और नानी बताती हैं कि अम्मी के और उनके अपने तो 10 साल की उम्र में इतने बड़े थे.. जितने हमारे 13 साल की उम्र में थे.. और उन दोनों की ही गुठलियाँ तो 7 साल की उम्र में ही बन गई थीं.. इसी लिए तो सब के इतने बड़े-बड़े हैं। तुमने भी नोटिस किए ही होंगे.. मैं जानती हूँ कि तुम बहुत बड़े कमीने हो।

बाजी ने ये कहा और मुझे देख कर शरारती अंदाज़ में मुस्कुराने लगीं।

मैंने फ़ौरन कहा- नहीं बाजी.. आपकी कसम मैंने कभी नानी या अम्मी के बारे में ऐसा कुछ नहीं सोचा।

‘अच्छा इसका मतलब है बाजी और सलमा खाला के बारे में सोचा है.. हाँ..!’

‘बाजी आपको तो पता है.. एक तो बाजी का जिस्म इतना भरा-भरा है.. और बाजी और खाला आपकी तरह चादर लेना तो दूर की बात.. हमारे सामने दुपट्टे तक का ख़याल नहीं करती हैं। बाजी तो शादी के बाद से अपने आपसे बिल्कुल ही लापरवाह हो गई हैं। आप जानती ही हैं.. गले इतने खुले होते हैं कि कभी ना कभी नज़र पड़ ही जाती है।’

मैं ये कह कर नीचे देखने लगा और नाख़ून से कार्पेट को खुरचने लगा।

‘अच्छा जी तो मेरे सोहने भाई की कहाँ-कहाँ नज़र पड़ी है.. और क्या-क्या देखा है जनाब ने.. अपनी सग़ी बाजी और सग़ी खाला का?’ बाजी ने ये कह कर सोफे से पाँव उठाए और टाँगें सीधी करते हुए पाँव ज़मीन पर टिका दिए।

मैंने जवाब देने के लिए चेहरा ऊपर उठाया तो बाजी के घुटने मेरे चेहरे के बिल्कुल सामने थे और दोनों घुटनों के बीच मुझे काफ़ी गहराई में बाजी की टाँगों के बीच सिर्फ़ अंधेरा दिखाई दिया बस..

मेरी नजरों को अपनी टाँगों के बीच महसूस करके बाजी ने अपने घुटनों को थोड़ा और खोला और अपनी क़मीज़ के दामन को सामने से हटा कर रान की बाहर वाली साइड पर कर दिया और बोलीं- क्या ढूँढ रहे हो..?? अरे खून आना बंद हो गया था इसलिए मैं जब मुँह हाथ धोने गई तो पैड भी निकाल दिए थे। बताओ ना.. क्या-क्या देखा है तुमने बाजी और खाला का?’

बाजी की टाँगों के बीच से उनकी सलवार का बहुत सा हिस्सा गीला हो चुका था.. पता नहीं उनको इन बातों में ही इतना मज़ा आ रहा था या मेरी नजरें अपनी टाँगों के बीच महसूस करके वो गीली हो गई थीं।

‘अब बोल भी दो और पहले बाजी का बताओ..’

‘जब वो यहाँ थीं.. उस वक़्त तो मैं काफ़ी छोटा था.. लेकिन पिछले साल गर्मीयों में जब मैं और आप बाजी के घर 10 दिन रहे थे.. तब अक्सर ऐसा होता था कि बाजी सफाई वगैरह के लिए या बच्चों को ज़मीन से उठाने.. या किसी और काम से झुकती थीं.. तो अक्सर नज़र पड़ ही जाती थी उनके गले में..

तो ऐसे कुछ दफ़ा उनके आधे-आधे दूध देखे हैं.. और उनके मम्मों की लकीर तो अक्सर बैठे हुए भी नज़र आती ही रहती है।

कितनी बार मैंने नोट किया था कि मुझे आता देख कर आप बाजी की क़मीज़ का गला सही करती थीं..

शायद आपको भी याद होगा एक बार बाजी मुन्ने को गोद में लिटा कर दूध पिला रही थीं..

मैं जैसे ही अन्दर आया तो बाजी की निप्पल मुन्ने के मुँह से निकल गई थी क़मीज़ पहले ही आधे मम्मे से ऊपर थी। आप दोनों ही बातों में इतनी गुम थीं कि बाजी को तो वैसे ही परवाह नहीं होती और आपका ध्यान भी उधर नहीं गया था और तकरीबन 25-30 सेकेंड बाद आपने इस अंदाज़ से उनकी क़मीज़ खींची थी कि ना बाजी को पता चल सके और ना मुझे।

लेकिन मैंने नोट कर लिया था.. बस उस दिन मैंने पहली और आखिरी बार बाजी का निप्पल देखा था।”

‘इसके अलावा क्या देखा..?’

बाजी ने मेरे चेहरे पर नज़र जमाए-जमाए पूछा।

इसके अलावा मैंने बाजी की टाँगें देखी हैं.. आप जानती ही हैं कि वो जब भी फर्श धोती हैं.. तो अपने पाएंचे घुटनों तक चढ़ा ही लेती हैं और 3-4 बार उनका पेट और कमर देखी है। अक्सर जब वो करवट के बल लेट कर कोई रिसाला वगैरह पढ़ रही होती हैं.. तो उनकी क़मीज़ पेट या कमर या दोनों जगह से हटी होती है। उस वक़्त ही देखा है और उनके नफ़ के आस भी एक तिल है.. जैसे आपका है..’

आखिरी जुमला कह कर मैं बाजी की आँखों में देख कर मुस्कुरा दिया।

‘बको मत और बताते रहो…’

बाजी ने शर्म से लाल होते हुए कहा।

फिर खुद ही 4-5 सेकेंड बाद ही बोलीं- तुम्हारी मालूमात में मैं इज़ाफ़ा कर दूँ कि सिर्फ़ मेरा और बाजी का ही नहीं, बल्कि अम्मी की नफ़ के नीचे भी वैसा ही तिल है।

अम्मी का जिक्र को अनसुनी करते हुए मैं बाजी से ही सवाल कर बैठा- बाजी प्लीज़ एक बात तो बताओ.. आपको तो पता ही होगा।

‘क्या..??’ बाजी ने एक लफ्ज़ कहा और मेरे बोलने का इन्तजार करने लगीं।

‘बाजी के सीने के उभारों का क्या साइज़ है.. आप से तो बड़े ही लगते हैं उनके?’ ये पूछते हुए मैंने एक बार फिर बाजी के मम्मों पर नज़र डाली।

‘लगते ही नहीं.. यक़ीनन बड़े ही हैं उनके.. शायद 42 डी साइज़ है बाजी का.. और भी किसी का पूछना है.. या बस?’ उन्होंने डायरेक्ट मेरी आँखों में देख कर कहा।

‘नहीं.. मैंने पूछना तो नहीं है लेकिन अगर आप मजबूर करती हैं तो पूछ लेता हूँ..’

मैंने ये कहा ही था कि बाजी ने मेरी बात काट कर कहा- जी नहीं.. मैं आपको मजबूर नहीं कर रही.. आप ना ही पूछो!’

मैं मुस्कुरा दिया।

‘अब मुझे ये बताओ कि बाजी के जिस्म में ऐसी कौन सी चीज़ है.. जिसे देख कर तुम्हें बहुत मज़ा आता है और तुम्हारा जी चाहता है बार-बार देखने का?’

ये बोल कर वो फिर सवालिया नजरों से मुझे देखने लगीं।

मैंने कुछ देर सोचा और फिर अपने खड़े लण्ड को नीचे की तरफ दबा कर छोड़ा और कहा- बाजी की बैक.. मतलब उनकी गाण्ड.. उनकी गाण्ड है भी काफ़ी भरी-भरी और थोड़ी साइड्स पर और पीछे को निकली हुई भी है। उनकी गाण्ड की लकीर में जब क़मीज़ फंसी होती है और वो चलती हैं.. तो उनके दोनों कूल्हे आपस में रगड़ खाकर अजीब तरह से हिलते.. और थिरकते हैं.. जब भी ये सीन देखता था.. तो बहुत मज़ा आता था।

आप जानती ही हैं कि जब भी वो बैठने के बाद खड़ी होती हैं.. तो उनके कूल्हों की दरार में उनकी क़मीज़ फंसी होती है.. मैंने बहुत बार देखा था.. आप पीछे से उनकी क़मीज़ खींच कर सही करती थीं.. जिसका वो कभी ख़याल नहीं करतीं।

मैंने बात खत्म की ही थी कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और बाजी ने फ़ौरन अपनी चादर और स्कार्फ़ उठाया और अपने कमरे में भाग गईं।

कुछ देर बाद ही अम्मी अन्दर दाखिल हुई थीं।

मैंने सलाम किया तो अम्मी ने कहा- बेटा एक गिलास पानी पिला दो।

मैं इतने एतिहात से उठा कि अम्मी को मेरे खड़े लण्ड का पता ना चल सके और किचन में जाकर पानी का गिलास भरा ही था कि बाजी अपने कमरे से निकालीं और मम्मी को सलाम करके किचन में आ गईं।

उन्होंने स्कार्फ बाँध लिया था और चादर लपेटी हुई थी। मेरे हाथ से गिलास लिया और मेरे लण्ड की तरफ इशारा करते हुए दबी आवाज़ में कहा- पहले अपने जहाज़ को तो लैंड करवा दो.. इससे बिठा कर ही बाहर जाना..

ये कह कर वे बाहर चली गईं और अम्मी के साथ बैठ कर बातें करने लगीं। मैं किचन से निकला और सीधा ऊपर चला गया। अपने कमरे को बाहर से अनलॉक करके खोला ही था कि ज़ुबैर ने दरवाज़ा खोला और मुझे देख कर कहा- अरे भाई आप यहाँ क्यूँ खड़े हो?

तो मैंने जवाब दिया- यार कमरे में ही जा रहा था.. लेकिन फिर प्यास लगी तो सोचा नीचे जाकर ही पानी पी लूँ।

मैं ये बोल कर नीचे चल पड़ा.. थोड़ी देर बाद ज़ुबैर भी नीचे आ गया और उसने सिर झुकाए-झुकाए ही बाजी को सलाम किया।

बाजी उसकी आवाज़ सुन कर अपनी चादर को संभालते हुए उठीं और ज़ुबैर का चेहरा दोनों हाथों में ले कर उसका माथा चूमने के बाद बोलीं- ठीक ठाक हो तुम.. वहाँ तुम्हें हमारी याद तो बहुत आई होगी.. खास तौर पर अपने भाई को तो बहुत याद किया होगा ना..’

ज़ुबैर बाजी के इस हमले के लिए तैयार नहीं था.. इसलिए थोड़ा सा घबरा गया, शायद अम्मी सामने थीं इसलिए भी इहतियात कर रहा था।

उसने यहाँ से निकल जाने में ही गनीमत समझा और बाजी के सामने से हट कर बाहर जाता हुआ बोला- बाजी मैं बच्चा तो नहीं हूँ.. जो अकेले परेशान हो जाऊँगा..

यह कह कर वो बाहर निकल गया।

 
अम्मी उठ कर अपने कमरे में चली गईं.. तो मैंने बाजी से कहा- क्या दिमाग खराब हुआ है आपका.. ऐसे तंज़ मत करो ज़ुबैर पर.. वरना सब काम बिगड़ जाएगा। जब आपने सब कुछ मुझ पर छोड़ा है.. तो मेरे तरीक़े से मुझे संभालने दें ना।

‘अरे मैंने तो वैसे ही मज़ाक़ में कह दिया था.. लेकिन मैं भूल गई थी कि वो ज़ुबैर है.. वसीम नहीं.. शायद वो बेचारा अभी भी मुझसे डरा हुआ ही है।’

बाजी ने फ़िक्र मंदी से कहा।

मैं फ़ौरन बोला- अच्छा अब आप परेशान नहीं होओ.. जाओ मैं देख लूँगा सब..

कह कर मैं भी बाहर जाने लगा.. तो बाजी ने पूछा- क्या तुमने मेरे बारे में सब बता दिया है ज़ुबैर को?

मैंने चलते-चलते ही जवाब दिया- हाँ.. एक-एक लफ्ज़..

और मैं बाहर निकल गया।

रात में जब मैं घर में घुसा.. तो सब खाने के लिए बैठ ही रहे थे.. मैंने भी सबके साथ खाना खाया और अपने कमरे में आ गया।

आधे घंटे बाद ज़ुबैर भी अन्दर आया तो उसका मूड ऑफ था।

‘भाई बाजी आपसे तो इतनी फ्री हो गई हैं.. लेकिन मुझ पर तंज़ करती हैं..’

मैंने समझाया- यार.. वो मज़ाक़ कर रही हैं तुमसे.. बेतकल्लुफ होने के लिए ऐसे ही बातें कह देती हैं.. तुम टेन्शन मत लो.. और तुम भी तो भीगी बिल्ली बने हुए हो ना.. उनके सामने घबराए-घबराए से रहते हो.. तो अम्मी-अब्बू को कुछ शक भी हो सकता है.. इसलिए भी बाजी तुम को छेड़ लेती हैं.. और मेरी बात कान खोल कर सुनो.. और इसको जेहन में बिठा लो कि बाजी की किसी हरकत पर हैरत मत ज़ाहिर करो.. उनकी हर बात.. हर हरकत को नॉर्मल ट्रीट करो.. और बाक़ी सब मुझ पर छोड़ दो।

फिर ज़ुबैर के लण्ड को सलवार के ऊपर से ही पकड़ते हुए मैंने कहा- बहुत जल्दी ही इसको बाजी की टाँगों के बीच वाली जगह की सैर करवा दूँगा। बस तुम कुछ मत करो और हालत के साथ-साथ चलते रहो.. मैं हूँ ना हालात कंट्रोल करने के लिए।

ज़ुबैर ने अपने दोनों हाथों को भींचते हुए कहा- भाई अगर ऐसा हो जाए.. तो मज़ा आ जाए..

कुछ देर मैं ज़ुबैर को समझाता रहा और फिर हम दोनों कंप्यूटर के सामने आ बैठे.. ट्रिपल एक्स मूवी देखने लगे।

अचानक ही दरवाज़ा खुला और बाजी अन्दर दाखिल हुईं- आह्ह.. मेरे ख़ुदा.. तुम लोग ज़रा भी टाइम ज़ाया नहीं करते हो..

ज़ुबैर ने फ़ौरन डर कर मॉनिटर ऑफ कर दिया.. लेकिन फिर कॉन्फिडेंस से बोला- बाजी आप.. मिस मौलवी.. नहीं हैं.. आपने भी तो सारी मूवीज देखी ही हैं ना..

मैंने ज़ुबैर को इशारे से चुप करवाया और कहा- अच्छा बहना जी.. तो अब आप क्या चाहती हैं..?

बाजी ने मुस्कुराते हुए कहा- रूको मुझे सोचने दो.. उम्म्म्मम.. मुझे नहीं समझ आ रहा.. मैं तुम लोगों को क्या करने को कहूँ..’

यह कह कर बाजी हमारे राईट साइड पर पड़े हुए सोफे पर जा बैठीं।

‘क्या मतलब..?’ ज़ुबैर ने सवालिया अंदाज़ में कहा।

बाजी बोलीं- ज़ुबैर, दरवाज़ा बंद कर दो।

ज़ुबैर उठा और जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया।

‘लॉक भी लगा दो..’

ज़ुबैर ने लॉक भी लगाया और वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया।

‘हाँ मुझे तुम्हारे कंप्यूटर में कुछ फ़िल्में वाकयी ही बहुत अच्छी लगी हैं.. तो मैं सोच रही हूँ कि आज रियल ही क्यूँ ना देख लूँ.. चलो शुरू करो.. जो तुम लोग मेरे आने से पहले करने जा रहे थे।’

‘बिल्कुल नहीं..’

ज़ुबैर ने चिल्ला कर कहा- आप ऐसा कैसे कर सकती हैं.. आप हमारी सग़ी बड़ी बहन हैं।

बाजी तंज़िया अंदाज़ में बोलीं- अच्छाआ.. देखो देखो ज़रा.. अब कौन.. मिस्टर मौलवी.. बन रहा है.. उस रात तो बहुत मज़े ले-लेकर चूस रहे थे.. क्या वो तुम्हारा सगा बड़ा भाई नहीं था?

मैं काफ़ी देर से खामोश होकर उनकी बातें सुन रहा था। मैंने हाथ उठा कर दोनों को खामोश होने का इशारा करते हुए खड़ा हुआ और ज़ुबैर से कहा- चलो यार ज़ुबैर.. अब बस करो.. हमारी कोई बात ऐसी नहीं है जो बाजी को ना पता हो.. वो पहले ही सब जानती हैं। फिर बहस का क्या फ़ायदा?

मेरा लण्ड पहले से ही पूरा खड़ा था.. मैंने अपने कपड़े उतारे और ज़ुबैर का हाथ पकड़ कर बिस्तर की तरफ चल पड़ा।

बाजी की नजरें मेरे नंगे लण्ड पर ही जमी हुई थीं.. वो सोफे से उठीं और कंप्यूटर कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने मॉनिटर भी ऑन कर दिया.. जहाँ मूवी पहले से ही चल रही थी।

ज़ुबैर अभी भी झिझक रहा था.. मैंने ज़ुबैर को खड़ा किया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूसने लगा।

अपनी एक आँख मैंने मुस्तक़िल बाजी पर रखी हुई थी.. क्योंकि मैं बाजी का रिएक्शन देखना चाहता था।

अपने एक हाथ से मैंने ज़ुबैर का शॉर्ट नीचे किया और उसका लण्ड उछल कर बाहर निकल आया। ज़ुबैर का लण्ड भी थोड़ी सख्ती पकड़ चुका था.. शायद ज़ुबैर भी बाजी की यहाँ मौजूदगी से एग्ज़ाइटेड हो रहा था।

मैंने ज़ुबैर के होंठों से अपने होंठों को अलग किया और ज़ुबैर की शर्ट और शॉर्ट मुकम्मल उतार दिए।

अब हम दोनों बिल्कुल नंगे हो चुके थे, दोनों बाजी की तरफ घूम गए।

बाजी के गाल सुर्ख हो रहे थे और उनकी आँखें भी नशीली हो चुकी थीं।

‘बाजी कैसा लग रहा है आपको.. अपने सगे भाइयों को नंगा देख कर.. और उनके लण्ड देख कर.. क्या आप एंजाय कर रही हैं?’ मैंने मुस्कुराते हो कहा।

‘शटअप.. बकवास मत करो और अपना काम जारी रखो..’

यह बोल कर बाजी ने मुझे आँखों से इशारा किया कि प्लीज़ ये मत करो.. शायद बाजी अभी जहनी तौर पर मुकम्मल तैयार नहीं थीं और उन में अभी काफ़ी झिझक बाक़ी थी।

मैंने फिर ज़ुबैर के होंठों को चूसना शुरू कर दिया और ज़ुबैर को घुमा दिया, अब बाजी की तरफ ज़ुबैर की पीठ थी, मैंने अपने एक हाथ से ज़ुबैर के कूल्हों को रगड़ना और दबोचना शुरू कर दिया।

कुछ देर बाद मैंने अपने दोनों हाथों से ज़ुबैर के दोनों कूल्हों को खोल दिया.. ताकि बाजी ज़ुबैर की गाण्ड के सुराख को साफ देख सकें।

बाजी को दिखाते हुए मैंने अपनी एक उंगली को अपने मुँह में लेकर गीला किया और ज़ुबैर की गाण्ड के सुराख में डाल दी।

ज़ुबैर हल्का सा मचला.. लेकिन मैंने किसिंग जारी रखी और अपनी ऊँगली को अन्दर-बाहर करने लगा।

बाजी आँखें फाड़-फाड़ कर मेरी ऊँगली को अन्दर-बाहर होता देख रही थीं। मैंने ज़ुबैर के होंठों से होंठ हटाए और उसकी गर्दन को चूमते और ज़ुबान से सहलाते नीचे जाने लगा।

मैंने ज़ुबैर के निप्पल को बारी-बारी से चूसा और फिर ज़मीन पर घुटने टेक कर बैठ गया। अब मैंने ऊँगली ज़ुबैर की गाण्ड से निकाल कर बाजी को दिखाते हुए ज़ुबैर की गाण्ड के सुराख पर फेरी।

मैंने ज़ुबैर के लण्ड को हाथ में लिया और अपना चेहरा लण्ड के पास ला कर एक नज़र बाजी पर डाली।

बाजी की नजरें मेरी नजरों से मिलीं तो मैंने देखा.. कि बाजी बहुत एग्ज़ाइटेड हो रही थीं.. शायद वो समझ गईं थीं कि मेरा अगला अमल क्या होगा।

फिर मैंने ज़ुबैर के लण्ड को अपने मुँह में लिया और आहिस्ता-आहिस्ता 3-4 बार मुँह आगे-पीछे करने के बाद मैंने एक हल्के से झटके से ज़ुबैर का लण्ड जड़ तक अपने मुँह में ले लिया।

उसकी टोपी मेरे हलक़ में टच हो रही थी।

मैंने इसी हालत में रुकते हुए बाजी को देखा.. तो वो बहुत ज्यादा बेचैन नज़र आ रही थीं.. वो बार-बार अपनी पोजीशन चेंज कर रही थीं, शायद वो अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को अपने हाथ से रगड़ना चाह रही थीं.. लेकिन अपने आपको रोके हुए थीं।

मैं कुछ देर तेज-तेज ज़ुबैर के लण्ड को अपने मुँह में अन्दर-बाहर करता रहा और फिर लण्ड मुँह से निकालते हुए खड़ा हुआ और ज़ुबैर को इशारा किया कि अब वो चूसे।

ज़ुबैर मेरी टाँगों के बीच बैठा और मेरे लण्ड को चूसने लगा। कुछ देर मेरा लण्ड चूसने के बाद ज़ुबैर ने मुँह नीचे किया और मेरी बॉल्स को अपने मुँह में भर लिया।

वाउ.. ज़ुबैर की इस हरकत ने मेरे अन्दर मज़े की एक नई लहर पैदा कर दी। ज़ुबैर नर्मी से मेरी बॉल्स को चूसने लगा।

मैंने बाजी को देखा तो वो भी एकटक नज़रें जमाए ज़ुबैर को मेरे बॉल्स चूसते देख रही थीं। मैं जानता था कि बाजी को मेरी बॉल्स बहुत अच्छी लगी थीं.. इसलिए भी बाजी को ज़ुबैर की ये हरकत बहुत पसन्द आई थी।

ज़ुबैर ने मेरी बॉल्स को मुँह से निकाला और मेरे पीछे जाकर मेरे कूल्हों को दोनों हाथों में लेकर खोला और मेरी गाण्ड के सुराख पर अपनी ज़ुबान फेरने लगा।

‘एवव.. ज़ुबैर.. तुम तो बहुत ही गंदे हो..’ बाजी ने बुरा सा मुँह बना कर कहा.. लेकिन अपनी नज़र नहीं हटाई।

ज़ुबैर बाजी को कुछ कहना चाहता था लेकिन मैंने ज़ुबैर के सिर को वापस अपनी गाण्ड पर दबा दिया। मैंने अपने लण्ड को अपने हाथ में लिया और बहुत स्पीड से लण्ड पर हाथ को आगे-पीछे करने लगा।

 
बाजी बिल्कुल मेरे सामने थीं.. मैं डाइरेक्ट बाजी की आँखों में देख रहा था और लण्ड पर अपना हाथ चला रहा था।

बाजी भी कुछ देर मेरी आँखों में देखती रहीं और फिर अपना चेहरा फेर लिया। मैं भी घूमा और फिर ज़ुबैर को किसिंग करने लगा। अब हम दोनों की नजरें बाजी पर नहीं थीं। मैंने आँखों के कॉर्नर से देखा.. बाजी ने अपना एक हाथ टाँगों के बीच रख लिया था और मसलने लगी थीं।

ये नज़ारा देखते ही मेरे लण्ड को झटका सा लगा.. जैसे ही हम बाजी की तरफ घूमे, उन्होंने फ़ौरन हाथ अपनी टाँगों के बीच से हटा लिया।

अब मैं डॉगी पोजीशन में झुका सा हुआ और ज़ुबैर मेरे पीछे आ गया। उसने अपने लण्ड पर और मेरी गाण्ड के सुराख पर तेल लगाना शुरू किया।

मेरी नजरें बाजी पर थीं और मुझे यक़ीन था कि बाजी हर एक सेकेंड को एंजाय कर रही हैं।

ज़ुबैर ने आहिस्ता से अपना लण्ड मेरे अन्दर डाला और अपना लण्ड मेरी गाण्ड में अन्दर-बाहर करने लगा।

मेरे मुँह से कुछ आवाजें तो वैसे ही मज़े और दर्द से निकल रही थीं और कुछ मैं खुद भी माहौल को सेक्सी बनाने और बाजी को सुनाने के लिए निकालने लगा।

‘आ ह.. हाँ.. ज़ुबैर ज़ोर से धक्का मारो.. ज़ोर से.. हाँ पूरा डालो… अहह और ज़ोर से.. चोदो अपने सगे भाई को.. ज़ोर से.. झटका मारो.. हाँ फाड़ दो अपने बड़े भाई की गाण्ड..’

मेरे ये अल्फ़ाज़ बाजी पर जादू कर रहे थे और बार-बार बेसाख्ता उनका हाथ उनकी टाँगों के बीच चला जाता और वो अपना हाथ वापस खींच लेतीं।

मैं चाहता था कि बाजी पूरा मज़ा लें.. इसलिए मैंने ज़ुबैर से पोजीशन चेंज करने को कहा।

अब हम दोनों की बैक बाजी की तरफ थी और ज़ुबैर मेरे ऊपर था। बाजी हम दोनों की गाण्ड और मेरी गाण्ड में अन्दर-बाहर होता ज़ुबैर का लण्ड साफ देख सकती थीं और हम बाजी को डाइरेक्ट नहीं देख सकते थे।

लेकिन दीवार पर लगे आईने में हम अपनी पोजीशन भी देख सकते थे.. और बाजी को भी साफ देख रहे थे।

अब बाजी के सामने उनका बहुत पसंदीदा नजारा था, उन्होंने हमारी गाण्ड पर नज़र जमाए हुए अपने हाथ को अपनी टाँगों के बीच रखा और बहुत तेज-तेज रगड़ने लगीं।

वो नहीं जानती थीं कि हम उन्हें आईने में साफ देख सकते हैं। बाजी को ऐसे देखना मुझे बहुत उत्तेजित कर रहा था।

मैंने सरगोशी करते हुए ज़ुबैर को बुलाया और आईने की तरफ इशारा किया.. जैसे ही ज़ुबैर ने आईने में देखा.. मैंने महसूस किया कि उसके बाद उसकी मेरी गाण्ड में लण्ड अन्दर-बाहर करने की स्पीड बढ़ती जा रही थी।

कुछ ही देर बाद उसके लण्ड ने मेरी गाण्ड में ही गर्म पानी छोड़ दिया।

उसके रुकने पर मैंने तेज आवाज़ में कहा- आह्ह.. अब तुम आ जाओ नीचे.. अब मेरी बारी है करने की..

बाजी ने यह सुना तो फ़ौरन अपना हाथ टाँगों के बीच से निकाल लिया।

ज़ुबैर और मैंने अपनी जगहें चेंज कर लीं, अब ज़ुबैर डॉगी पोजीशन में था और मैंने उसकी गाण्ड में अपना लण्ड डाल दिया था। मैंने आहिस्ता-आहिस्ता लण्ड अन्दर-बाहर करना शुरू कर दिया।

मुझे ज़ुबैर का पानी अब भी अपनी गाण्ड में महसूस हो रहा था.. जो बाहर निकलना चाह रहा था.. लेकिन मैंने अपनी गाण्ड के सुराख को भींचते हुए पानी को बाहर आने से रोक लिया और अपनी स्पीड को बढ़ाने लगा। मैंने आईने में देखा तो बाजी अपना हाथ वापस अपनी टाँगों के बीच ला चुकी थीं और रगड़ना शुरू कर दिया था।

मैंने ज़ुबैर की गाण्ड में झटके मारते-मारते ही अपनी गाण्ड के सुराख को लूज किया और ज़ुबैर के लण्ड का गाढ़ा सफ़ेद पानी मेरी गाण्ड से लीक होकर मेरे टट्टों से होता हुआ मेरे लण्ड और फिर ज़ुबैर की गाण्ड में जाने लगा।

मुझे अंदाज़ा था कि यह सीन देख कर बाजी बिल्कुल पागल ही हो जाएंगी और जैसे कि मैं आईने में देख सकता था, बाजी ने एक हाथ को अपनी टाँगों के बीच चलाते-चलाते दूसरे हाथ से अपने लेफ्ट दूध को दबोच लिया था और अपनी निप्पल को चुटकी में लेकर बुरी तरह से मसल रही थीं।

जैसे-जैसे ज़ुबैर की गाण्ड में अन्दर-बाहर होते मेरे लण्ड की स्पीड तेज होती जा रही थी.. बाजी भी अपने हाथों की स्पीड को बढ़ाती जा रही थीं।

थोड़ी देर बाद मुझे पता चल गया कि बाजी डिसचार्ज होने ही वाली हैं.. क्योंकि उन्होंने अपना हाथ सलवार के अन्दर डाल लिया था। उन्हें यह नहीं मालूम था कि हम उन्हें आईने में देख रहे हैं।

बाजी का हाथ उनकी सलवार में जाता देख कर मैं अपना कंट्रोल खो बैठा और मैंने फ़ौरन ज़ुबैर की गाण्ड से अपने लण्ड को निकाला और उसके कूल्हों पर अपने लण्ड का गाढ़ा सफेद पानी छोड़ने लगा।

शायद यह बाजी के लिए सबसे ज्यादा हॉट सीन था.. फ़ौरन ही बाजी का जिस्म अकड़ गया और उनकी आँखें बंद हो गईं।

मैं और ज़ुबैर दोनों ही घूम कर सामने बाजी को देखने लगे।

वो दुनिया से बेख़बर हो चुकी थीं.. उनके जिस्म को ऐसे झटके लग रहे थे.. जैसे उन्हें इलेक्ट्रिक शॉक लग रहे हों।

उनका पूरा जिस्म काँपने लगा और बाजी बहुत स्पीड से अपना हाथ अपनी टाँगों के दरमियाँ वाली जगह पर चलाने लगीं और दूसरे हाथ से अपने दूध को मसलने लगीं।

अचानक उनका जिस्म अकड़ा और गर्दन कुर्सी की पुश्त पर टिका कर और पाँव ज़मीन पर जमाते हुए उन्होंने अपने कूल्हे कुर्सी से उठा लिए और कमान की सूरत उनका जिस्म मुड़ गया। उन्होंने अपनी टाँगों के बीच वाली जगह और अपने दूध को अपनी पूरी ताक़त से भींच लिया।

‘अहह.. अककखह.. ओह..’ की आवाज़ उनके मुँह और हलक़ से खारिज हुई और फिर उनका जिस्म ढीला होकर कुर्सी पर गिर सा गया।

कुछ देर ऐसे पड़ी वो अपनी साँसों को दुरुस्त करती रहीं.. और जब उन्होंने आँखें खोलीं.. तब उन्होंने हमें देखा कि हम बिल्कुल उनके सामने बैठे मुस्कुराते हुए अपने-अपने लण्ड को हाथ में लेकर सहला रहे थे।

बाजी ने अपने आप पर एक नज़र मारी.. कि उनका एक हाथ उनकी सलवार के अन्दर था और दूसरा उनके मम्मे पर था और उससे रगड़ते हुए उनके पेट से भी क़मीज़ हटी हुई थी। बाजी का खूबसूरत सा नफ़ भी नज़र आ रहा था।

बाजी ने ये सोचा कि वो अपने सगे भाईयों.. छोटे भाईयों के सामने अपने मम्मे और टाँगों के बीच वाली जगह को रगड़ती रही हैं और फ़ौरन ही अपने हाथ को सलवार से निकाला और अपना लिबास सही करने लगीं।

उनकी हया की निशानी उनका स्कार्फ और चादर ज़मीन पर पड़ी थी.. पता नहीं कब उन्होंने चादर और स्कार्फ निकाल फेंका था कि उन्हें खुद भी खबर नहीं हुई।

ज़ुबैर ने अपने दोनों हाथों को जोड़ा और ताली बजाते हुए शरारत से बोला- ब्रावो बाजी.. ग्रेट शो था। मेरे ख़याल में आप अपने सगे भाईयों को एक्शन में देखने के लिए बैठी थीं.. लेकिन आपकी तरफ से हमें एक शानदार शो देखने को मिल गया.. थैंक यू बाजी.. इतने खूबसूरत शो के लिए..

बाजी का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया था.. तो मैंने बात संभालते हुए कहा- कोई बात नहीं बाजी.. हमने सिर्फ़ एंड ही नहीं देखा.. बल्कि शुरू से आख़िर तक सब देखा है.. उस आईने में..!

मैंने आईने की तरफ इशारा किया.. जहाँ हम सब बिल्कुल क्लियर नज़र आ रहे थे।

बाजी बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस कर रही थीं.. तो मुझे बहुत अफ़सोस हुआ उनके लिए और मैंने कहा- कोई बात नहीं बाजी.. ये एक नेचुरल चीज़ है.. आपकी जगह कोई भी होता.. वो ये ही करता आप परेशान ना हों.. बल्कि खुल कर हमारे साथ ही ये सब एंजाय करें।

ये कहते हुए मैं खड़ा हुआ और बाजी की तरफ 2 क़दम ही बढ़ा था कि बाजी फ़ौरन खड़ी हो गईं और अपनी चादर और स्कार्फ उठा कर सिर झुकाए-झुकाए कमरे से बाहर निकल गईं।

शायद उन्हें बहुत अफ़सोस हो रहा था अपनी इस हरकत पर.. या फिर शर्म आ रही थी अपने सगे भाईयों से..

बाजी बाहर निकल गई थीं.. मैं वहाँ ही खड़ा था कि ज़ुबैर की आवाज़ आई- भाई आज मज़ा ही आ गया.. बाजी को इस हालत में देख कर.. उफफ्फ़ सग़ी बहन सामने इस हॉल में..

उसने एक झुरझुरी सी ली।

‘फ़िक्र ना करो मेरे छोटे शहज़ादे.. बस तुम सब कुछ मुझ पर छोड़ दो.. देखो मैं तुम्हें क्या-क्या दिखाता हूँ।’

मैंने शैतानी मुस्कुराहट से कहा।

अगली रात हमने मूवी स्टार्ट की ही थी कि दरवाज़ा खुला और बाजी अन्दर आईं। हम दोनों की नजरें बाजी पर ही थीं। बाजी सिर झुकाए-झुकाए ही अन्दर आईं और हमारी तरफ नज़र उठाए बगैर ही जाकर सोफे पर बैठ गईं। उन्होंने आज भी क़मीज़ सलवार पहनी हुई थी.. सिर पर स्कार्फ मौजूद था। लेकिन चादर नहीं थी.. उन्होंने दुपट्टा उतारा और सलीक़े से तह करके साइड टेबल पर रख दिया और चुपचाप सिर झुका कर बैठ गईं।

हम दोनों भी बगैर कुछ बोले बाजी की ही तरफ देख रहे थे.. लेकिन वो नज़र नहीं उठा रही थीं।

मैंने गौर किया तो मेरे लण्ड को झटका सा लगा। बाजी की जर्द क़मीज़ में निप्पल वाली जगह काली नज़र आ रहा था और जब वो दुपट्टा ठीक करते हुए या किसी और वजह से जिस्म को हल्की सी भी हरकत देती थीं तो बाजी के मम्मे हिलने लगते थे।

‘भाईजान लगता है हमारी सोहनी सी बहना जी ने आज ब्रा नहीं पहनी।’

ज़ुबैर ने आँख मार कर मुस्कुराते हुए बाजी के चेहरे पर नज़र जमाए-जमाए कहा।

बाजी ने नज़र नहीं उठाई और झेंपते हुए कहा- बकवास मत करो और अपना काम शुरू करो। मेरी तरफ़ नहीं देखो.. वरना मैं उठ कर चली जाऊँगी।

मैंने ज़ुबैर को इशारा किया कि बाजी को तंग नहीं कर.. वरना वो वाकयी ही चली जाएंगी।

मैं और ज़ुबैर फ़ौरन खड़े हुए और अपने कपड़े उतार कर नंगे हो गए। चूमा चाटी करने के बाद मैंने सोचा कि आज कुछ बदलाव किया जाए। मैंने ज़ुबैर को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसकी गर्दन को बिस्तर के किनारे पर टिका कर.. सिर को पीछे की तरफ नीचे झुका दिया। फिर मैंने ज़ुबैर के मुँह में अपने खड़े लंड को डाला और उसके ऊपर झुकते हुए ज़ुबैर के लण्ड को अपने मुँह में भर लिया। अब हम 69 की पोजीशन में थे।

‘नाइस पोजीशन..’ बाजी के मुँह से बेसाख्ता ही निकला।

मैंने सिर उठा कर बाजी को देखा तो उन्होंने फ़ौरन अपना हाथ अपनी टाँगों के बीच से हटा लिया। उनके निप्पल खड़े हो गए थे और क़मीज़ का वो हिस्सा नुकीला हो चुका था.. क्योंकि उन्होंने ब्रा नहीं पहनी थी।

‘प्लीज़ बाजी.. अगर आप अपने जिस्म से मज़ा लेना ही चाहती हैं.. तो फ्री हो कर मज़ा लें.. प्लीज़ हम यहाँ बिल्कुल नंगे हैं और आपके सामने एक-दूसरे के लण्ड को चूस रहे हैं। अगर आप अपने जिस्म को टच करेंगी.. तो हमें भी एक-दूसरे के साथ सब करने में मज़ा आएगा। हम आपको कल ये करते हुए देख चुके हैं और इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा कि हम आज फिर देख लेंगे। आप अपने मज़े को तो कत्ल मत करें।’

मैंने समझाने वाले अंदाज़ में कहा।

बाजी कुछ देर तक तो सिर झुकाए बैठी रहीं और फिर अपना हाथ उठा कर अपनी टाँगों के बीच वाली जगह पर रख कर 2-3 बार रगड़ा और हमारी तरफ देखते हुए कहा- बस खुश हो अब..!

ज़ुबैर फ़ौरन ही बोला- जी बाजी.. आप इस हाल में गज़ब लग रही हैं।

और वाकयी ही बहुत सलीक़े से सिर पर और चेहरे के गिर्द ब्लैक स्कार्फ जिसमें गोरे-गोरे गाल अब सेक्स की हिद्दत से लाल हो चुके थे। सोफे पर कुछ लेटी.. कुछ बैठी सी हालत में ज़मीन पर पाँव फैलाए.. थोड़ी सी टाँगें खुली हुईं और ठीक टाँगों के बीच वाली जगह पर ब्लैक सलवार के ऊपर गुलाबी खूबसूरत हाथ.. बाजी बिल्कुल परी लग रही थीं।

मैंने और ज़ुबैर ने फिर से एक-दूसरे के लण्ड मुँह में लिए और लण्ड मुँह में अन्दर-बाहर करना शुरू कर दिए और बाजी भी फ्रीली अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को रगड़ने लगीं।

अब मैंने ज़ुबैर को सीधा लेटने को कहा और हमने अपना रुख़ भी थोड़ा चेंज कर लिया। ज़ुबैर की टाँगों को अपने कंधों पर जमाते हुए मैंने लण्ड ज़ुबैर की गाण्ड में डाला और 2-3 झटके मारने के बाद झुक कर उसके होंठों को चूसने लगा। आज मुझे कुछ ज्यादा ही मज़ा आ रहा था।

पता नहीं ये ज़ुबैर के नर्म और नाज़ुक होंठ थे.. या अपने लण्ड पर ज़ुबैर की गाण्ड के अन्दर की गर्मी का अहसास था.. या शायद आज के अनोखे मज़े की वजह ये सोच थी कि मेरी सग़ी बहन जो बहुत बा-हया और पाकीज़ा है.. जिसका चेहरा ही शर्म-ओ-हया का पैकर है.. वो मुझे देख रही हैं कि मैं अपने सगे छोटे भाई की टाँगों को अपने कंधे पर रखे उसकी गाण्ड में अपना लण्ड अन्दर-बाहर कर रहा हूँ।

मेरी पाकीज़ा बहन ये सब देखते हुए मज़े से अपनी टाँगों के बीच वाली जगह को अपने ही हाथ से मसल रही है और अपने मम्मों को दबा-दबा कर बेहाल हुए जा रही है।

बाजी को हक़ीक़तन ही ये सब बहुत अच्छा लग रहा था और वो अपने मम्मों को अपने हाथ से मसलती थीं.. तो कभी उन्हें दबोच लेती थीं.. तो कभी अपने निप्पल्स को चुटकी में लेकर खींचने लगती थीं।

ज़ुबैर और मेरी नजरें बाजी पर ही थीं.. बाजी भी हमें ही देख रही थीं, कभी-कभी हमारी नजरें भी मिल जाती थीं।

कुछ देर बाद मैं ज़ुबैर की गाण्ड में ही डिसचार्ज हुआ और अब मैं नीचे और ज़ुबैर मेरे ऊपर आ गया और ज़ुबैर ने मुझे चोदना शुरू कर दिया और हम दोनों ने नजरें बाजी पर जमाए रखीं।

बाजी अब बिल्कुल फ्री होकर अपने जिस्म को रगड़ रही थीं और मज़े में अपने मुँह से आवाजें भी निकाल रही थीं।

ज़ुबैर के लण्ड का जूस निकालने तक बाजी भी 2 बार डिसचार्ज हो चुकी थीं।

इस तरह नजारा ये रहा कि बाजी रोज रात को आ जातीं.. अब उनकी झिझक खत्म हो चुकी थी.. वो बस कमरे में आकर अपनी जगह पर बैठ जातीं और अपनी टाँगों के बीच हाथ रख कर हमें हुकुम दे देतीं कि शुरू हो जाओ.. हम एक-दूसरे को चोदते और बाजी अपने हाथ से अपने आपको सुकून पहुँचा लेतीं।

 
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