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फूफी निलोफर
में अपनी एक फूफी को चोदने की ताक में था जो कराची में रहती थीं . उनका नाम नीलोफर था और उनके दो बचे थे. वो मेरी चारों फुफियों में सब से बड़ी थीं और उनकी उमर 43 साल के लग भाग तो ज़रूर हो गी. उमर के इस हिस्से में भी वो बड़ी खूबसूरत, लंबी, गोरी और निहायत सेहतमंद औरत थीं .
ये जिस्मानी ख़सूसियात मेरे ददिहाल की औरतों को विरासत में मिली थीं वरना हमारे हाँ औरतें कोई बहुत ज़ियादा लंबी नही होतीं. मेरे मरहूम दादा और दादी दोनों ही तवील क़ामत थे और इसी लिये उनके तक़रीबन सब ही बच्चे लंबे लंबे थे. फूफी नीलोफर का क़द भी बहुत लंबा था बल्के वो तो खानदान के कई मर्दों से भी लंबी थीं . फूफी शहनाज़ के अलावा मेरी सारी ही फूपियाँ क़द-आवर और लंबी चौड़ी थीं और फूफी नीलोफर भी बहुत सेहतमंद और लंबी औरत थीं . वो अपनी बहनो में फूफी खादीजा और फूफी नादिरा से बहुत ज़ियादा मिलती थीं . लेकिन अपनी बहनो से उनकी शबाहात सिरफ़ चेहरे की साख़्त की हद तक नही थी बल्के उनके बदन भी काफ़ी हद तक एक ही जैसे थे.
फूफी खादीजा मेरी पहली फूफी थीं जिनको में चोदने में कामयाब हुआ था. उन्हे चोदने के बाद अब में ये जान गया था के अपनी सग़ी फूफी को चोदना ना-मुमकिन नही होता. इसी लिये अब में किसी तरह फूफी नीलोफर की चूत भी मारना चाहता था. वो मुझे वैसे भी बहुत पसंद थीं . मेरे ज़हन में उन्हे चोदने के कई मंसूबे थे मगर डरता था के कहीं बात बिगड़ ना जाए क्योंके ऐसी सूरत में मेरी खैर नही थी. फूफी नीलोफर को नाराज़ करने में बहुत बड़ा ख़तरा था और इस की एक ख़ास वजह थी.
फूफी नीलोफर के मम्मे फूफी खादीजा के मम्मों की तरह बहुत मोटे थे और उनके चौड़े सीने पर खूब सजते थे. मैंने फूफी नीलोफर को बगैर ब्रा के एक दो दफ़ा ही देखा था. क़मीज़ के ऊपर से भी ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नही था के उनके मम्मों के निप्पल गैर मामूली तौर पर लंबे और बड़े थे. सारे बदन की तरह उनके चूतड़ भी बहुत तगड़े और मोटे थे. मज़े की बात ये थी के फूफी खादीजा ही की तरह चलते हुए उनके कसे कसाय गोल और सुडौल चूतड़ एक दूसरे के साथ रगड़ खाते रहते और उनकी गोलाइयाँ आगे पीछे हरकत करती रहतीं. फूफी नीलोफर का बदन बहुत मज़बूत और गदराया हुआ था.
फूफी नीलोफर को चोदने की कोशिश करना मधुमक्खी के छट्टेी में हाथ डालने जैसा था. लेकिन वो हर लिहाज़ से इतनी ज़बरदस्त औरत थीं के उन्हे चोदने की खाहिश को दिल से निकालना भी हिमाक़त ही होती. मै तो वैसे भी फूफी खादीजा को चोद लेने के बाद अपनी सारी फुफियों को अपने लिये एक नैमत समझता था और फूफी नीलोफर की मोटी ताज़ी चूत ना लेने का तो सवाल ही पैदा नही होता था चाहे इस में जितना भी ख़तरा होता. हाँ ये ज़रूर था के मुझे अच्छी तरह सोच समझ कर ही इस सिलसिले में कोई क़दम उठाना था.
में ज़हन लड़ाता रहा के फूफी नीलोफर को चोदने के लिये किया करूँ. किसी भी औरत को अपनी चूत देने पर राज़ी करने के लिये मर्द का उस की शख्सियत के मुख्तलीफ़ पहलो’ओं से वाक़िफ़ होना बहुत ज़रूरी है. मै उनका भतीजा होने की वजह से फूफी नीलोफर को बड़े क़रीब से जानता था. वो मेरे सामने खुली किताब की तरह थीं और मुझे किसी ना किसी हद तक ये आगाही थी के उन्हे अपनी चूत देने पर राज़ी करने के लिये किया करना चाहिये.
फूफी नीलोफर का मिज़ाज अगरचे फूफी खादीजा से मिलता तो था मगर वो कुछ चीज़ों में उन से मुख्तलीफ़ भी थीं . वो एक सख़्त-गीर, तेज़ तबीयत और जल्द गुस्से में आ जाने वाली औरत मशहूर थीं . वो इतनी जल्दी किसी से फ्री नही होती थीं . फिर ये भी था के वो खुद को दुनिया की खूबसूरत तरीन औरत समझती थीं . उन्हे अपने आप से बड़ी मुहब्बत थी और बाक़ी सब औरतों को वो खुद से बहुत कम तर जानती थीं . अपनी तारीफ से उन्हे बहुत खुशी होती थी. ऐसा तो खैर सारी ही औरतों के साथ होता है मगर फूफी नीलोफर तो अपने मुक़ाबले में किसी दूसरी औरत का ज़िकर भी नही सुन सकती थीं . अगर कोई उनके सामने किसी औरत की तारीफ करता तो वो फॉरन उस में हज़ार कीड़े निकालने लगतीं.
इस के अलावा पैसा भी फूफी नीलोफर की बहुत बड़ी कमज़ोरी था और अगरचे वो दौलतमंद थीं मगर पैसे पर फिर भी जान देती थीं . जेवर और कपड़ों की दीवानी थीं और कभी भी अपने आप को ऐसी चीज़ों से दूर नही रख पाती थीं . शॉपिंग करना उनके लिये ज़िंदगी का सब से पसंदीदा काम था. इन्ही कमज़ोरियों का सोच कर और मामी शाहिदा वाले तजरबे की रोशनी में मैंने हिम्मत कर के उनकी फुद्दी मारने का प्लान बना ही लिया. बात बिगड़ भी सकती थी मगर में जानता था के फूफी नीलोफर अगर नाराज़ भी हुईं तो अपनी नाराज़गी मुझ तक ही रक्खेंगी किसी और को कुछ नही बताएं गी क्योंके इस में उनकी भी बड़ी रुसवाई होती. मै खामोशी से अपने प्लान को अमली जामा पहनाने के लिये सही वक़्त का इंतिज़ार करने लगा.
कुछ अरसे बाद मुझे पता चला के फूफी नीलोफर बा-रास्ता लाहोर पिंडी आ रही हैं. मेरे लिये उन पर हाथ डालने का ये बेहतरीन मोक़ा था. मैंने डैड से कहा के मैंने भी लाहोर जाना है में फूफी नीलोफर को वापस आते हुए पिंडी लेता आऊँ गा. उन्होने फूफी नीलोफर से इस सिलसिले में फोन पर बात कर ली. मै चाहता था के मामी शाहिदा की तरह फूफी नीलोफर को भी किसी होटेल में ही चोदने की कोशिश करूँ क्योंके वहाँ पर किसी को पता ना चलता और अगर वो नाराज़ भी होतीं तो उन्हे संभालना और उनके गुस्से को ठंडा करना निसबतन आसान होता.
मैंने उन्हे कराची फोन किया के में लाहोर कार पर आ रहा हूँ और होटेल में ठहरूं गा आप मेरे साथ ही रहें. हम फाइव स्टार होटेल में ठहरे गे और आप को कोई तक़लीफ़ नही हो गी. उन्होने कहा के खादीजा का घर जो है होटेल में रहने की किया ज़रूरत है. मैंने बताया के होटेल में कमरा पहले से बुक है और ऐसी सूरत में वहाँ रहने में किया मुज़ायक़ा है. इस पर वो मान गईं और कहा के ठीक है तुम मुझे एरपोर्ट से ले लाना. मैंने उन से पुछा के किया उन्होने फूफी खादीजा को अपने लाहोर आने के बारे बताया है? उन्होने कहा के नही उससे अभी बताना है. मैंने कहा के जब हम होटेल में ठहर रहे हैं तो आप उन्हे अपने आने का ना बताएं क्योंके वो आप को अपनी तरफ रहने पर मजबूर करें गी. वो कुछ देर खामोश रहीं लेकिन फिर कहा अच्छा ठीक है.
मैंने अवारी होटेल लाहोर में एक रूम बुक करवया और मुकरर दिन लाहोर एरपोर्ट पर उन्हे रिसीव किया. उस दिन फूफी नीलोफर ने पीले कपड़े पहन रखे थे जिन में से उनका गोरा सेहतमंद बदन झाँक रहा था. उन्होने व की शकल में दुपट्टा ले रखा था जिस के नीचे उनके मोटे मोटे सेहतमंद मम्मे छुपाये नही चुप रहे थे. उनके मम्मे इतने बड़े थे के दुपट्टा, क़मीज़ और ब्रा मिल कर भी उन्हे धक नही पा रहे थे और मम्मों के दोनो उभार काफ़ी बाहर निकले हुए थे. फूफी नीलोफर के मम्मे ब्रा में फँसे फाँसये बिल्कुल साकित थे और उन में थोड़ी सी भी हरकत नही हो रही थी. उन्होने यक़ीनन सही साइज़ का और बड़ा टाइट ब्रा पहन रखा था.
उनकी मोटी गांड़ भी हमेशा ही की तरह हिलती और झटके खाती दिखाई दे रही थी. उनके दोनो चूतड़ एक दूसरे के साथ बिल्कुल जुड़े हुए थे और जब वो चलतीं तो उनके चूतड़ों की हरकत एक समा बाँध देती. उनके गोल मज़बूत बाज़ू और कंधों का ऊपरी हिस्से बे-इंतिहा सफ़ेद थे और गर्मी की वजह से गुलाबी हो गए थे.
वो लिबर्टी मार्केट में शॉपिंग करना चाहती थीं और लाहोर आने का उनका बुन्यादि मक़सद यही था. हम ने कोई चार घंटे लिबर्टी मार्केट में शॉपिंग की. मैंने फूफी नीलोफर के लिये बहुत सी चीजें अपनी जेब से भी खरीदीन. उन्होने कई दफ़ा मुझे कहा के में ऐसा ना करूँ मगर में बड़े इसरार और खलाऊस के साथ उनके लिये खरिदारी करता रहा. वो बहुत खुश थीं और ये बात उनके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर थी. आम हालात में वो ज़रा सीरीयस ही रहती थीं मगर उस दिन उन्होने काफ़ी बे-तकल्लूफ़ी से मेरे साथ बहुत सारी बातें कीं. फिर हम दोनो अवारी होटेल अपने रूम में आ गए. मैंने बाथरूम जा कर T-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिये.
अगर इंसान खुश हो तो उस का किसी बात पर नाराज़ हो जाने का इंकान ज़रा कम हो जाता है. आज फूफी नीलोफर इतनी सारी चीजें खरीद कर बहुत खुश थीं और मेरे लिये हालात काफ़ी साज़गार नज़र आ रहे थे.
“अमजद तुम ने बिला-वजा इतने पैसे लगा दिये. बहुत सी चीज़ों की तो मुझे ज़रूरत भी नही थी और तुम ने फिर भी खरीद लीं.” उन्होने कहा.
“फूफी नीलोफर कोई बात नही मैंने अगर आप के लिये चंद चीजें खरीद लीं तो किया हो गया.” मैंने जवाब दिया.
“तुम बताओ तो सही तुम्हारे कितने पैसे लगे? में तुम्हे देती हूँ. यहाँ होटेल में भी तुम्हारा बहुत खर्चा होगा.” उन्होने कहा.
“छोड़ें भी फूफी नीलोफर ये आप किया बातें ले बैठीं. मै तो और भी बहुत कुछ खरीदना चाहता था मगर आप ने मुझे रोक दिया.” मैंने जवाबन कहा.
“नही, नही तुम तो छोटे हो में तुम्हारे पैसे नही लगवाना चाहती थी. मुझे तो चाहिये था के तुम्हे कुछ ले कर देती.” वो बोलीं.
“अब बस भी कर दें फूफी नीलोफर ये किन बातों को ले कर बैठ गईं हैं आप.” मैंने थोड़ा बे-तकल्लूफ होते हुए बात बदलने की कोशिश की.
इसी तरह की कुछ और बातों के बाद ह मुझे अंदाज़ा हो गया के फूफी नीलोफर बड़े अच्छे मूड में थीं. मैंने गर्मी के हवाले से उनके ब्रा की तरफ देख कर कहा:
“फूफी नीलोफर एक तो औरतें गर्मी में भी इतने ज़ियादा कपड़े पहनती हैं. ऊपर भी कपड़े और कपड़ों के नीचे उन से भी मोटे कपड़े.”
वो हंस पड़ीं और समझ गईं के मेरा इशारा उनके ब्रा की तरफ है.
“सीने पर भी तो कुछ पहनना पड़ता है इसे हिलता जुलता कैसे छोड़ें.” उन्होने बड़ी बे-तकल्लूफ़ी से कहा.
“घर के अंदर तो सिर्फ़ क़मीज़ काफ़ी है ब्रा की ज़रूरत नही.” मैंने उन्हे टेस्ट करने लिये खुल कर ब्रा का ज़िकर छेड़ा.
“हाँ ब्रा ना हो तो गर्मी में सकूँ रहता है.”
बात ठीक जा रही थी क्योंके फूफी नीलोफर मुझ से ब्रा जैसी प्राइवेट चीज़ के बारे में बात कर रही थीं .
में अपनी एक फूफी को चोदने की ताक में था जो कराची में रहती थीं . उनका नाम नीलोफर था और उनके दो बचे थे. वो मेरी चारों फुफियों में सब से बड़ी थीं और उनकी उमर 43 साल के लग भाग तो ज़रूर हो गी. उमर के इस हिस्से में भी वो बड़ी खूबसूरत, लंबी, गोरी और निहायत सेहतमंद औरत थीं .
ये जिस्मानी ख़सूसियात मेरे ददिहाल की औरतों को विरासत में मिली थीं वरना हमारे हाँ औरतें कोई बहुत ज़ियादा लंबी नही होतीं. मेरे मरहूम दादा और दादी दोनों ही तवील क़ामत थे और इसी लिये उनके तक़रीबन सब ही बच्चे लंबे लंबे थे. फूफी नीलोफर का क़द भी बहुत लंबा था बल्के वो तो खानदान के कई मर्दों से भी लंबी थीं . फूफी शहनाज़ के अलावा मेरी सारी ही फूपियाँ क़द-आवर और लंबी चौड़ी थीं और फूफी नीलोफर भी बहुत सेहतमंद और लंबी औरत थीं . वो अपनी बहनो में फूफी खादीजा और फूफी नादिरा से बहुत ज़ियादा मिलती थीं . लेकिन अपनी बहनो से उनकी शबाहात सिरफ़ चेहरे की साख़्त की हद तक नही थी बल्के उनके बदन भी काफ़ी हद तक एक ही जैसे थे.
फूफी खादीजा मेरी पहली फूफी थीं जिनको में चोदने में कामयाब हुआ था. उन्हे चोदने के बाद अब में ये जान गया था के अपनी सग़ी फूफी को चोदना ना-मुमकिन नही होता. इसी लिये अब में किसी तरह फूफी नीलोफर की चूत भी मारना चाहता था. वो मुझे वैसे भी बहुत पसंद थीं . मेरे ज़हन में उन्हे चोदने के कई मंसूबे थे मगर डरता था के कहीं बात बिगड़ ना जाए क्योंके ऐसी सूरत में मेरी खैर नही थी. फूफी नीलोफर को नाराज़ करने में बहुत बड़ा ख़तरा था और इस की एक ख़ास वजह थी.
फूफी नीलोफर के मम्मे फूफी खादीजा के मम्मों की तरह बहुत मोटे थे और उनके चौड़े सीने पर खूब सजते थे. मैंने फूफी नीलोफर को बगैर ब्रा के एक दो दफ़ा ही देखा था. क़मीज़ के ऊपर से भी ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नही था के उनके मम्मों के निप्पल गैर मामूली तौर पर लंबे और बड़े थे. सारे बदन की तरह उनके चूतड़ भी बहुत तगड़े और मोटे थे. मज़े की बात ये थी के फूफी खादीजा ही की तरह चलते हुए उनके कसे कसाय गोल और सुडौल चूतड़ एक दूसरे के साथ रगड़ खाते रहते और उनकी गोलाइयाँ आगे पीछे हरकत करती रहतीं. फूफी नीलोफर का बदन बहुत मज़बूत और गदराया हुआ था.
फूफी नीलोफर को चोदने की कोशिश करना मधुमक्खी के छट्टेी में हाथ डालने जैसा था. लेकिन वो हर लिहाज़ से इतनी ज़बरदस्त औरत थीं के उन्हे चोदने की खाहिश को दिल से निकालना भी हिमाक़त ही होती. मै तो वैसे भी फूफी खादीजा को चोद लेने के बाद अपनी सारी फुफियों को अपने लिये एक नैमत समझता था और फूफी नीलोफर की मोटी ताज़ी चूत ना लेने का तो सवाल ही पैदा नही होता था चाहे इस में जितना भी ख़तरा होता. हाँ ये ज़रूर था के मुझे अच्छी तरह सोच समझ कर ही इस सिलसिले में कोई क़दम उठाना था.
में ज़हन लड़ाता रहा के फूफी नीलोफर को चोदने के लिये किया करूँ. किसी भी औरत को अपनी चूत देने पर राज़ी करने के लिये मर्द का उस की शख्सियत के मुख्तलीफ़ पहलो’ओं से वाक़िफ़ होना बहुत ज़रूरी है. मै उनका भतीजा होने की वजह से फूफी नीलोफर को बड़े क़रीब से जानता था. वो मेरे सामने खुली किताब की तरह थीं और मुझे किसी ना किसी हद तक ये आगाही थी के उन्हे अपनी चूत देने पर राज़ी करने के लिये किया करना चाहिये.
फूफी नीलोफर का मिज़ाज अगरचे फूफी खादीजा से मिलता तो था मगर वो कुछ चीज़ों में उन से मुख्तलीफ़ भी थीं . वो एक सख़्त-गीर, तेज़ तबीयत और जल्द गुस्से में आ जाने वाली औरत मशहूर थीं . वो इतनी जल्दी किसी से फ्री नही होती थीं . फिर ये भी था के वो खुद को दुनिया की खूबसूरत तरीन औरत समझती थीं . उन्हे अपने आप से बड़ी मुहब्बत थी और बाक़ी सब औरतों को वो खुद से बहुत कम तर जानती थीं . अपनी तारीफ से उन्हे बहुत खुशी होती थी. ऐसा तो खैर सारी ही औरतों के साथ होता है मगर फूफी नीलोफर तो अपने मुक़ाबले में किसी दूसरी औरत का ज़िकर भी नही सुन सकती थीं . अगर कोई उनके सामने किसी औरत की तारीफ करता तो वो फॉरन उस में हज़ार कीड़े निकालने लगतीं.
इस के अलावा पैसा भी फूफी नीलोफर की बहुत बड़ी कमज़ोरी था और अगरचे वो दौलतमंद थीं मगर पैसे पर फिर भी जान देती थीं . जेवर और कपड़ों की दीवानी थीं और कभी भी अपने आप को ऐसी चीज़ों से दूर नही रख पाती थीं . शॉपिंग करना उनके लिये ज़िंदगी का सब से पसंदीदा काम था. इन्ही कमज़ोरियों का सोच कर और मामी शाहिदा वाले तजरबे की रोशनी में मैंने हिम्मत कर के उनकी फुद्दी मारने का प्लान बना ही लिया. बात बिगड़ भी सकती थी मगर में जानता था के फूफी नीलोफर अगर नाराज़ भी हुईं तो अपनी नाराज़गी मुझ तक ही रक्खेंगी किसी और को कुछ नही बताएं गी क्योंके इस में उनकी भी बड़ी रुसवाई होती. मै खामोशी से अपने प्लान को अमली जामा पहनाने के लिये सही वक़्त का इंतिज़ार करने लगा.
कुछ अरसे बाद मुझे पता चला के फूफी नीलोफर बा-रास्ता लाहोर पिंडी आ रही हैं. मेरे लिये उन पर हाथ डालने का ये बेहतरीन मोक़ा था. मैंने डैड से कहा के मैंने भी लाहोर जाना है में फूफी नीलोफर को वापस आते हुए पिंडी लेता आऊँ गा. उन्होने फूफी नीलोफर से इस सिलसिले में फोन पर बात कर ली. मै चाहता था के मामी शाहिदा की तरह फूफी नीलोफर को भी किसी होटेल में ही चोदने की कोशिश करूँ क्योंके वहाँ पर किसी को पता ना चलता और अगर वो नाराज़ भी होतीं तो उन्हे संभालना और उनके गुस्से को ठंडा करना निसबतन आसान होता.
मैंने उन्हे कराची फोन किया के में लाहोर कार पर आ रहा हूँ और होटेल में ठहरूं गा आप मेरे साथ ही रहें. हम फाइव स्टार होटेल में ठहरे गे और आप को कोई तक़लीफ़ नही हो गी. उन्होने कहा के खादीजा का घर जो है होटेल में रहने की किया ज़रूरत है. मैंने बताया के होटेल में कमरा पहले से बुक है और ऐसी सूरत में वहाँ रहने में किया मुज़ायक़ा है. इस पर वो मान गईं और कहा के ठीक है तुम मुझे एरपोर्ट से ले लाना. मैंने उन से पुछा के किया उन्होने फूफी खादीजा को अपने लाहोर आने के बारे बताया है? उन्होने कहा के नही उससे अभी बताना है. मैंने कहा के जब हम होटेल में ठहर रहे हैं तो आप उन्हे अपने आने का ना बताएं क्योंके वो आप को अपनी तरफ रहने पर मजबूर करें गी. वो कुछ देर खामोश रहीं लेकिन फिर कहा अच्छा ठीक है.
मैंने अवारी होटेल लाहोर में एक रूम बुक करवया और मुकरर दिन लाहोर एरपोर्ट पर उन्हे रिसीव किया. उस दिन फूफी नीलोफर ने पीले कपड़े पहन रखे थे जिन में से उनका गोरा सेहतमंद बदन झाँक रहा था. उन्होने व की शकल में दुपट्टा ले रखा था जिस के नीचे उनके मोटे मोटे सेहतमंद मम्मे छुपाये नही चुप रहे थे. उनके मम्मे इतने बड़े थे के दुपट्टा, क़मीज़ और ब्रा मिल कर भी उन्हे धक नही पा रहे थे और मम्मों के दोनो उभार काफ़ी बाहर निकले हुए थे. फूफी नीलोफर के मम्मे ब्रा में फँसे फाँसये बिल्कुल साकित थे और उन में थोड़ी सी भी हरकत नही हो रही थी. उन्होने यक़ीनन सही साइज़ का और बड़ा टाइट ब्रा पहन रखा था.
उनकी मोटी गांड़ भी हमेशा ही की तरह हिलती और झटके खाती दिखाई दे रही थी. उनके दोनो चूतड़ एक दूसरे के साथ बिल्कुल जुड़े हुए थे और जब वो चलतीं तो उनके चूतड़ों की हरकत एक समा बाँध देती. उनके गोल मज़बूत बाज़ू और कंधों का ऊपरी हिस्से बे-इंतिहा सफ़ेद थे और गर्मी की वजह से गुलाबी हो गए थे.
वो लिबर्टी मार्केट में शॉपिंग करना चाहती थीं और लाहोर आने का उनका बुन्यादि मक़सद यही था. हम ने कोई चार घंटे लिबर्टी मार्केट में शॉपिंग की. मैंने फूफी नीलोफर के लिये बहुत सी चीजें अपनी जेब से भी खरीदीन. उन्होने कई दफ़ा मुझे कहा के में ऐसा ना करूँ मगर में बड़े इसरार और खलाऊस के साथ उनके लिये खरिदारी करता रहा. वो बहुत खुश थीं और ये बात उनके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर थी. आम हालात में वो ज़रा सीरीयस ही रहती थीं मगर उस दिन उन्होने काफ़ी बे-तकल्लूफ़ी से मेरे साथ बहुत सारी बातें कीं. फिर हम दोनो अवारी होटेल अपने रूम में आ गए. मैंने बाथरूम जा कर T-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिये.
अगर इंसान खुश हो तो उस का किसी बात पर नाराज़ हो जाने का इंकान ज़रा कम हो जाता है. आज फूफी नीलोफर इतनी सारी चीजें खरीद कर बहुत खुश थीं और मेरे लिये हालात काफ़ी साज़गार नज़र आ रहे थे.
“अमजद तुम ने बिला-वजा इतने पैसे लगा दिये. बहुत सी चीज़ों की तो मुझे ज़रूरत भी नही थी और तुम ने फिर भी खरीद लीं.” उन्होने कहा.
“फूफी नीलोफर कोई बात नही मैंने अगर आप के लिये चंद चीजें खरीद लीं तो किया हो गया.” मैंने जवाब दिया.
“तुम बताओ तो सही तुम्हारे कितने पैसे लगे? में तुम्हे देती हूँ. यहाँ होटेल में भी तुम्हारा बहुत खर्चा होगा.” उन्होने कहा.
“छोड़ें भी फूफी नीलोफर ये आप किया बातें ले बैठीं. मै तो और भी बहुत कुछ खरीदना चाहता था मगर आप ने मुझे रोक दिया.” मैंने जवाबन कहा.
“नही, नही तुम तो छोटे हो में तुम्हारे पैसे नही लगवाना चाहती थी. मुझे तो चाहिये था के तुम्हे कुछ ले कर देती.” वो बोलीं.
“अब बस भी कर दें फूफी नीलोफर ये किन बातों को ले कर बैठ गईं हैं आप.” मैंने थोड़ा बे-तकल्लूफ होते हुए बात बदलने की कोशिश की.
इसी तरह की कुछ और बातों के बाद ह मुझे अंदाज़ा हो गया के फूफी नीलोफर बड़े अच्छे मूड में थीं. मैंने गर्मी के हवाले से उनके ब्रा की तरफ देख कर कहा:
“फूफी नीलोफर एक तो औरतें गर्मी में भी इतने ज़ियादा कपड़े पहनती हैं. ऊपर भी कपड़े और कपड़ों के नीचे उन से भी मोटे कपड़े.”
वो हंस पड़ीं और समझ गईं के मेरा इशारा उनके ब्रा की तरफ है.
“सीने पर भी तो कुछ पहनना पड़ता है इसे हिलता जुलता कैसे छोड़ें.” उन्होने बड़ी बे-तकल्लूफ़ी से कहा.
“घर के अंदर तो सिर्फ़ क़मीज़ काफ़ी है ब्रा की ज़रूरत नही.” मैंने उन्हे टेस्ट करने लिये खुल कर ब्रा का ज़िकर छेड़ा.
“हाँ ब्रा ना हो तो गर्मी में सकूँ रहता है.”
बात ठीक जा रही थी क्योंके फूफी नीलोफर मुझ से ब्रा जैसी प्राइवेट चीज़ के बारे में बात कर रही थीं .