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बेगुनाह ( एक थ्रिलर उपन्यास )

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एलेग्जैण्डर ने मेरे लिए किस प्रकार के स्वागत का इन्तजाम किया हुआ था ? पता नहीं क्यों मुझे हालात नॉर्मल नहीं लग रहे थे।

,,, थोड़ी देर सत्राटा छाया रहा । "नया पैग बनाऊं बॉस ?" - भीतर से आवाज आई।

"बना ।"

"आपको अभी उम्मीद है कि वो आयेगा ?" = "हां ! आयेगा वो । क्यों नहीं आयेगा ?"

"सवा सात बज गये हैं।"

"साढे सात तक इन्तजार करने का है। वह तब भी न आया तो निकलेंगे उसी की तलाश में ।"

"जरूरी थोड़े ही है, लेजर वो साथ लाये !"

"वो आये तो सही । लैजर साथ नहीं लाया होगा तो वो अपुन को वहां ले कर जायेगा जहां लैजर है।"

"बॉस, मेरे ख्याल से तो वो लैजर इतनी अहम नहीं कि..."

"बेवकूफ हो तुम । वो लैजर अगर इंकम टैक्स वालों के हाथ पड़ गयी तो अपुन जेल में पहुंच जायेगा । जो एलैग्जैण्डर बड़े-बड़े केसों में नहीं फंसा, उस लैजर की वजह से वो इंकम टैक्स के फेर में आ जायेगा। समझे ?"

"मैं तो समझा लेकिन जरूरी थोड़े ही है कि वह जासूस भी उस लैजर की अहमियत समझे ?"

"अहमियत तो खूब समझता है। तभी साला हलकट लैजर के बदले में एक लाख रुपया मांग रहा था ।"

"ओह !"

फिर खामोशी छा गई ।

भीतर दो आदमी थे। एक आदमी बाहर था। शायद कोई चौथा आदमी कहीं और भी मौजूद हो और वे लोग लैजर बुक को मुझसे जबरन छीनने के खतरनाक इरादे के साथ वहां मौजूद थे। उस नाजुक घड़ी में मुझे वहां से खिसक चलने में ही अपना कल्याण लगा।

मैं वापिस लौटने के लिये घूमा और आगे बढ़ा तो मेरा पांव किसी चीज से टकराया जो उस खामोश माहौल में बड़े जोर की आवाज के साथ नीचे नंगे फर्श पर गिरी ।

मैं एकदम जड़ हो गया।

एक क्षण उस आवाज की कोई प्रतिक्रिया सामने न आई ।

लेकिने जब मैं निश्चिन्त होकर फिर आगे बढ़ने लगा तो एकाएक भड़ाक से दरवाजा खुला और उसका पल्ला मेरी कनपटी से आकर टकराया।

उस कनपटी से आकर टकराया जिस पर पहले से चौधरी का डण्डा पड़ चुका था और जहां अंडे जितना बड़ा गूमड़ अभी भी मौजूद था। मैं वापिस दीवार से टकराया । मेरा सिर घूमने लगा। मैं अभी अपने आपको संभालने की ही कोशिश कर रहा था कि तीन काम लगभग एक साथ हुए । कोई बगोले के तरह बाहर निकला, रिसैप्शन की बत्ती जली और रिवॉल्वर मुझे अपनी तरफ तनी दिखाई दी। "हिलना नहीं ।" - मुझे राय दी गई।

,,, मैंने व्याकुल भाव से उसकी तरफ देखा । फिर मैंने नीचे देखा तो पाया कि मेरा पांव एक तीन टांगों वाले स्टूल में उलझा था। "बॉस ।" - रिवॉल्वर वाला उच्च स्वर में बोला - "अपना बकरा आ गया ।" बीच के दरवाजे पर एलैग्जैण्डर प्रकट हुआ।

वह एक कोई चालीस साल का दुबला-पतला आदमी था। उसने दाढ़ी रखी हुई थी और उसके बाल बड़े आधुनिक स्टाइल से कटे हुए थे । वह एक शानदार श्री पीस सूट पहने था। उसके दांतों में पाइप दबा हुआ था। "तू शर्मा ही है न ?"

- वह बड़े सहज भाव से बोला । मैने सहमति में सिर हिलाया ।

"भीतर आ ।"

रिवॉल्वर की छत्रछाया में मैंने एलैग्जैण्डर के ऑफिस में कदम रखा। रिवॉल्वर वाले ने मेरे पीछे दरवाजा बंद कर दिया। एलैग्जैण्डर अपनी कुर्सी पर जा बैठा तो बोला- "बैठ।" मैं एक कुर्सी पर बैठ गया। रिवॉल्वर वाला मेरे से थोड़ा परे दरवाजे के करीब खड़ा रहा। "तू तो साढे छ: बजे आने का था?"

"सॉरी ।" - मैं बोला - देर हो गई ।"

"थोमस !" - एलैग्जैण्डर रिवॉल्वर वाले से बोला - "रिवॉल्वर जेब में ।" तुरन्त आज्ञा का पालन हुआ ।

"साहब के लिये ड्रिक ।" उसका भी । मेरे सामने जैसे जादू के जोर से विस्की का जाम प्रकट हुआ। एलैग्जैण्डर ने यूं मेरे साथ चियर्स बोला जैसे मैं उसका निहायत मुअज्जिज मेहमान था।

"अपुन को नहीं मालूम था"- एलैग्जैण्डर बोला - "कि तू बाहर खड़ेला था । नहीं तो अपुन खुद तेरे स्वागत के लिए बाहर आता और तेरे कू यहां लेकर आता ।"

जर्रानवाजी का शुक्रिया।"

"चौधरी को बुला ले ।"- एलैग्जैण्डर थामस से बोला । थामस वहां से चला गया। उसके लौटने तक वहां खामोशी रही । उस दौरान मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया। थामस चौधरी के साथ लौटा।

चौधरी के थोबड़े का अभी भी बुरा हाल था और वह बड़ा डरावना लग रहा था । उसने मुझे यूं देखा जैसे निगाहों से मुझे भरम कर देना चाहता हो।

साब को पहचाना ?" - एलेग्जैण्डर बड़ी नर्मी से बोला।

"हो ।" - चौधरी विषभरे स्वर में बोला - "पहचाना ।"

"यह भीतर कैसे पहुंच गया इसे तो तूने अपने साथ भीतर लाना था ?"

"यह मेरे सामने से तो नहीं गुजरा था।"

"तो फिर यह जरूर छत फाड़कर यहां टपका होगा । क्यों छोकरे, तू छत फाड़कर यहां टपकेला है ?"

"नहीं।" - मैं बड़े इत्मीनान से बोला - "फर्श उधेड़कर ।"

"बहुत खूब । लेकिन तू तब यहां आया होगा जब चौधरी यहां अपुन के सामने अपना ख्याल जाहिर कर रहा था ।”

"बॉस ।" - चौधरी ने मुट्ठियां भींचते हुए कदम बढ़ाया - "मुझे इसके साथ पांच मिनट, सिर्फ पांच, मिनट दीजिये ।”

"वहीं खड़ा रह ।" वह ठिठक गया । लेकिन अपनी आंखों से उसने मेरी तरफ भाले बर्छियां बरसाने बन्द न किये।

"अपुन का माल तेरे पास सलामत है ?"

,,,

"सलामत है ।" - मैं बोला ।

"शाबाश !"

उसने मेज का एक दराज खोला और उसमें से नोटों की एक मोटी गड्डी निकाली । फिर उसने वह गड्डी यूं मेरे सामने फेंकी जैसे किसी मंगते के सामने रोटी का टुकड़ा डाला हो ।
 
"लैजर निकाल ।” - एलैग्जैण्डर बोला। -

"ये दस हजार हैं?" - मैं बोला ।

"हां ! गिन ले । कोई नोट फटा हो तो बदल ले ।”

"यह रकम कम है।"

"टेलीफोन पर तेरे को यह रकम मंजूर थी।"

"तब मुझे माल की मुकम्मल अहमियत नहीं मालूम थी।"

"लैजर तेरे किसी काम की नहीं ।"

"लेकिन किसी और के बहुत काम की हो सकती है।"

"किसी और से तेरे को रोकड़ा नहीं मिल सकता।"

"यह साबित होना अभी बाकी है।"

"तू अपनी जुबान से फिर रहा है, छोकरे ?

" मैं सिर्फ मुस्कुराया।

“अपुन को जुबान से फिरने वाला भीडू पसन्द नहीं ।”

"मैं यहां तुम्हारी पसन्द-नापसन्द जानने नहीं आया ।”

"कुछ तो जानकर ही जायेगा यहां से । अगर जायेगा तो ।"

मैं खामोश रहा ।

"आखिरी बार तेरे को राय है । रोकड़ा उठा, उसकी जगह लैजर बुक रख और खुशी-खुशी घर जा ।"

"लैजर मेरे पास नहीं है।"

"तो कहां है?"

"वह किसी और के पास है।"

"किसके पास ? जिसके पास है, उसका नाम बोल ।"

"उसकी जरूरत नहीं । लैजर तुम्हें मिल जायेगी लेकिन उसकी मुनासिब कीमत हासिल होने से पहले नहीं ।"

"मुनासिब कीमत क्या है?"

"एक लाख ।"

,,, उसने हाथ बढ़ाकर मेरे सामने से नोट उठा लिये और उन्हें वापिस दराज में डाल लिया । "बिजनेस में कच्चा है तू।" - वह बोला - "तूने अभी-अभी दस हजार रुपये खो दिये ।”

"खोये नहीं है। उनकी उनसे ज्यादा बड़ी रकम की वसूली सिर्फ मुल्तवी की है।"

"अब लैजर के बदले में तेरे को कोई रोकड़ा नसीब नहीं होने वाला । अगर तू शुरू में ही अपनी एक लाख की मांग पर अड़ा रहता तो बात कुछ और होती । तब अपुन तेरे को समझदार बिजनेसमैन समझता लेकिन वो मौका तूने खो दिया।"

“अपना-अपना ख्याल है।"

"पीना खत्म कर ।"

"क्यों ?"

"ताकि खाने का प्रोग्राम शुरू किया जाये ।”

"क्या खाने का ?"

"मार ।"
 
मैंने उसे अपने पीछे खड़े थामस और चौधरी को इशारा करते देखा । मैंने मेज के साथ अपने दोनों पांव सटाये और जोर से अपने-आपको पीछे को धकेला । मैं कुर्सी समेत पीछे उलट गया और पीछे से अपनी तरफ बढ़ते थामस और चौधरी से टकराया। वे दोनों, मैं और कुर्सी सब आपस में उलझे-उलझे फर्श पर गिरे मैं फुर्ती से अलग हुआ और मैंने परे पड़ी एक-तिपाई की तरफ डाईव मारी जिस पर कि एक पीतल का फूलदान पड़ा था । फूलदान मेरे हाथ में आ गया तो मैंने उसे कमरे के इकलौते प्रकाश के साधन, डबल ट्यूब लाइट पर खींचकर मारा। दोनों ट्यूबें टूट गई और कमरे में एकाएक अंधेरा छा गया। मैंने तिपाई को एक टांग से पकड़ा और उसे एलैग्जैण्डर के पीछे की खिड़की पर फेंककर मारा।। शीशा टूटने की भयंकर आवाज हुई ।

"खिड़की से बाहर जा रहा है ।" - थामस चिल्लाया। लेकिन मैं उठकर दरवाजे की तरफ लपका।। मैंने टटोलकर दरवाजे का हैंडल थामा, उसे खोला और भड़ाक से वापिस बन्द कर दिया। खुद मैं दरवाजे से परे हटकर दीवार से चिपक गया।

"दरवाजे से भागा है।" - चौधरी की आवाज आई।

दो जोड़ी कदम दरवाजे की दिशा में लपके । वे दरवाजा खोलकर बाहर निकल गये तो मैंने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया और उसकी चिटखनी चढ़ा दी । अब मैं खिड़की की तरफ बढ़ा जिसके बाहर से गुजरती फायर एस्केप की लोहे की गोल सीढ़ियां मैंने वहां कदम रखते ही देखी थी ।

बाहर से दरवाजा भड़भड़ाया जाने लगा। तभी एक टॉर्च की तीखी-रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी। "गोली खाने का है तो आगे बढ़ ।” - एलैग्जैण्डर अपने पहले जैसे नर्म स्वर में बोला ।

में ठिठक गया। टॉर्च ने काम बिगाड़ दिया था वरना उसके हथियारबन्द होते हुए भी मैं वहां से खिसकने में कामयाब | हो गया होता । लेकिन अब आपके खादिम का आत्महत्या का कोई इरादा नहीं था।

उन्होंने मेरे हाथ-पांव बांधकर मुझे एक बोरे में बन्द किया और फिर बोरे को थामस और चौधरी उठाकर नीचे ले आये

००००

मैंने एलेग्जैण्डर को उन्हें कहते सुना कि वे मुझे पंजाबी बाग में स्थित उसकी कोठी में ले जायें । मुझे एक एम्बैसेडर की पिछली सीट पर डाल दिया गया और फिर बोरा मेरे जिस्म से अलग कर दिया गया। थामस ड्राइविंग सीट पर बैठा और चौधरी उसकी बगल में ।

एलेग्जेण्डर पता नहीं पीछे रह गया था या अलग कार में आ रहा था।

मुझे अपना भविष्य बड़ा अंधकारमय लग रहा था।

मुश्कें कसी होने की वजह से मैं कोई आराम से पिछली सीट पर नहीं पड़ा था । गाड़ी बहुत झटके खा-खाकर चल रही थी और मैं पीछे पड़ा गेंद की तरह इधर-उधर उछल रहा था । पटेलनगर की वह सड़क तो खराब थी ही लेकिन मुझे लग रहा था कि थामस गाड़ी जानबूझ कर रफ चला रहा था। कोई दस मिनट बाद गाड़ी पंजाबी बाग की एक कोठी के कम्पाउन्ड में जाकर रुकी। वे दोनों बाहर निकले । उन्होने मुझे भी भी घसीटकर बाहर निकाला और मुझे मेरे बंधे हुए पैरो पर खड़ा किया । दोनों मेरे दायें-बायें पहुंचे, उन्होंने मेरी बगलों में हाथ डाला और मुझे घसीटते, लुढ़काते, गिरते कोठी के भीतर ले चले। वे मुझे पिछवाड़े के एक कमरे में लाये जो शायद कोठी में इस्तेमाल में नहीं आ रहा था। वहां कुछ फालतू सामान भरा हुआ था और कमरे के बीचोंबीच एक बिलियर्ड की टेबल पड़ी थी । उन्होंने मुझे टेबल पर डाल दिया और कमरे के खिड़कियां-दरवाजे बन्द करके उन पर पर्दे सरका दिये।

फिर वे आपस में डिसकस करने लगे कि टार्चर की शुरुआत कौन से फेमस तरीके से की जानी चाहिये थी। फिर चौधरी मेरे पास पहुंचा। उसने मुझे उठाकर मेज पर इस प्रकार बिठा दिया कि मेरी टांगें मेज से नीचे लटक गई।

अपना विकराल चेहरा वह मेरे चेहरे के एकदम करीब ले आया और बड़ी खतरनाक हंसी हंसता हुआ बोला - "अब बोल तेरे साथ कैसा सलूक किया जाए ?"

"ऐसा नहीं ।" - मैं बोला और मैंने सिर नीचा करके पूरी शक्ति से उसकी ठोकर उसके पहले से ही बुरे हाल चेहरे पर जमाई । उसके मुंह से एक तेज चीख निकली और वह लड़खड़ाता हुआ पीछे को हटा । तुरंत उसकी नाक से खून का फव्वारा छूट पड़ा । एकाध दांत भी और चटक गया हुआ होता तो कोई बड़ी बात नहीं थी।

थामस लपक कर मेरे पास पहुंचा । उसने मेरी तरफ अपना घूसा ताना तो चौधरी तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोला - "ठहरो इस हरामजादे की खिदमत मुझे ही करने दो।" वह फिर मेरे करीब पहुंचा । खून से रंगा उसका चेहरा बड़ा वीभत्स लग रहा था। उसने ताबड़-तोड़ तीन-चार घूसे मेरे चेहरे पर यूं जमाये जैसे वह अभी महज प्रैक्टिस कर रहा हो । हाथ-पांव बंधे होने की वजह से अपने सिर को इधर-उधर झटके देकर थोबड़ा बचाने की कोशिश करने के अलावा मैं कुछ भी तो नहीं कर सकता था। फिर उसके घूसे मेरे सारे जिस्म पर बरसने लगे। फिर धीरे-धीरे मेरी चेतना लुप्त होने लगी।
 
जब मुझे होश आया तो मैंने थामस को कहते सुना - "इसे यूं धुनने से कोई फायदा नहीं । यह मर भी सकता है । बॉस

चाता है, हम इसकी जुबान खुलवायें । तुम्हारे स्टाइल की मार से इसकी जुबान खुलती नहीं मालूम होती । ऐसी मार इसने बहुत खाई मालूम होती है।"

"अब तुम अपना स्टाइल आजमा लो।" - चौधरी बोला - "मैं तो अपनी सारी वसर पूरी कर ली है।"

*इसके हाथ-पांव खोल दो।"

"वो किसलिये ?"

"मैं इसकी दो-चार उंगलियां तोड़ता हूं । एकाध बांह उखाड़ता है मैं इसकी । जरा लंबे दर्द का प्रोग्राम बनने दो । फिर खोलेगा यह अपनी जुबान ।”

"बेहतर।"

मेरे हाथ-पांव खोल दिये गए।

थामस ने मुझे अपने पैरों पर खड़ा किया। एकाएक उसने मेरी एक बांह थामी और उसे उमेठकर मेरी पीठ के पीछे ले गया । पीड़ा से मेरा जिस्म उकडू हुआ तो उसने मेरी पीठ में अपना भारी भरकम घुटना अड़ा दिया । वह लगातार मेरी बांह ज्यादा और ज्यादा उमेठता जा रहा था।

"बोल, लैजर कहां है?" पीड़ा से बिलबिलाते स्वर में उसकी मां का हवाला देकर मैंने उसे लैजर की एक जगह बताई।

"ठहर जा, हरामजादे ।" - वह क्रोध से आगबबूला होकर बोला। तभी एलैग्जैण्डर ने वहां कदम रखा। उसे आया देखकर थामस ने मुझे बंधनमुक्त कर दिया।

"कुछ बका ?" - उसने पूछा।

"नहीं ।" - थामस बोला ।

"इतनी मार चुपचाप खा गया ?"

"चुपचाप तो नहीं खा गया लेकिन बका नहीं।"

एलैग्जैण्डर मेरे करीब पहुंचा। मैंने उससे निगाह मिलाई ।। "कैसा है ?" - वह बोला ।

"अच्छा है।" - मैंने बड़ी दिलेरी से कहा।

"मिजाज ठिकाने आयेला है ?"

"अभी नहीं।" वास्तव में मैं पेंडुलम की तरह आगे-पीछे झूल रहा था और मेरी आंखें बन्द हुइ जा रही थीं ।

,,,

"आ जायेगा । आ जायेंगा।"

मैंने मेज का सहारा ले लिया ।

"अपुन को यह गलाटा पसन्द नहीं ।”

"वैरी गुड ।”

"छोकरे, जरूर तेरा भेजा फिरेला है जो खामखाह अपना इतना बुरा हाल करा रहा है । अक्ल से काम ले, अभी भी लैजर मेरे हवाले कर और खुशी-खुशी अपने घर जा ।"

"दस हजार में तो मैं...."

"रोकड़े को अब भूल जा । लैजर के बदले में रोकड़ा कमाने की स्टेज गई । रोकड़े के नाम पर तो अब तेरे को एक काला पैसा नहीं मिलने का । अब सिर्फ तेरी जानबख्शी की जा सकती है।"

"यानी कि इतनी मार मैंने खामखाह खाई ?"

"उसका हिसाब तू उस मार से बराबर कर ले जो तूने चौधरी को लगाई है।"

"मैंने ज्यादा मार खाई है।" एलेग्जैण्डर ने अपना चमड़े का पर्स निकाला । बड़ी नफासत से गिनकर उसने उनमें से सौ-सौ के दस नोट निकाले । "उसके बदले में यह ले ।" - उसने नोट जबरन मेरे कोट की ऊपरली जेब मैं ठूस दिये - "जाकर अपनी मलहम-पट्टी करा बादाम खा । दूध पी ।"
 
"इस बात की क्या गारण्टी है कि लैजर हासिल होने के बाद मुझे छोड़ दिया जायेगा ?"

"एलैग्जैण्डर की जुबान गारंटी है।"

मुझे एलैग्जैण्डर की जुबान का कोई तर्जुबा नहीं।"

"अब हो जायेगा ।" - वह एक क्षण ठिठका और बोला - "अब बोलो, लैजर कहां है?"

"मेरे पास ।" "वह तो बराबर है लेकिन तेरे पास कहां ?"

"मेरे पास । मेरे कोट में ।"

"तेरे कोट में ?"

"हां ।”

एलैग्जैण्डर ने कहरभरी निगाहों से अपने चमचों की तरफ देखा। "यह झूठ बोलता है।" - थामस आवेशपूर्ण स्वर में बोला - "मैंने खुद इसकी तलाशी ली है, लैजर इसके पास नहीं है।

"लैजर मेरे कोट के अस्तर में सिली हुई है ।" - मैं बोला - "एक ब्लेड मंगाओ, मैं निकालकर दिखाता हूं।"

"लेकिन...."

"ज्यासती बात नहीं ।" - एलेग्जैण्डर घुड़ककर बोला - "ब्लेड लाने का है।"

,,, भुनभुनाता हुआ थामस ब्लेड लाने चला गया। मैंने कोट की दाई बाहरली जेब में हाथ डाला और हाथ को जेब के भीतर इस प्रकार अकड़ाया कि कोट का भीतर का भाग वहां से तन गया।

"यह देखो" - कोट का वह भाग मैं एलैग्जैण्डर के आगे करता हुआ बोला - "यहां है डायरी ।" | कोट का मुआयना करने की नीयत से एलैग्जैण्डर दो कदम आगे बढ़ा और तनिक आगे को झुका । = मेरा बायां हाथ आगे को लपका। मैंने बड़ी सफाई से उसके शोल्डर होल्स्टर में से उसकी रिवॉल्वर खींच ली और उसे उसकी पसलियों से सटा दिया ।

“खबरदार !" - मैं कर्कश स्वर में बोला ।

एलेग्जैण्डर हड़बड़ाया लेकिन फौरन ही संभल गया । वह सीधा हुआ। मैंने कोट की जेब से दायां हाथ निकाला और रिवॉल्वर उस हाथ में स्थानान्तरित कर दी। "थामस के आने तक यूं ही खड़े रहो ।" - मैं बोला - "और चौधरी को समझा दो, उसे अपनी जगह से हिलना नहीं है।

"चौधरी ।" - एलैग्जैण्डर बोला।

"यस बॉस ।"

"अपुन का रिवॉल्वर इस घड़ी शर्मा के हाथ में है और यह अपुन को कवर कियेला है।"

चौधरी के छक्के छूट गये।

"तेरे को खड़ा रहने का है।"

"यस बॉस ।” एलैग्जैण्डर मेरी तरफ आकर्षित हुआ।

"होशियार आदमी है।" - वह बोला ।

"पहले नहीं था । अभी मार खाकर होशियार हुआ हूं। पहले से होशियार होता तो क्या तुम्हारे काबू में आता ?"

"तो लैजर तेरे कोट में नहीं है?"

"नहीं है।"

"तो कहां है ?"

"एक सुरक्षित जगह पर ।”

"तू उसका क्या करेगा ?"

"मैं उसको पुलिस को दूंगा ।"

"काहे को ?"

ताकि चावला की हत्या का उद्देश्य उनकी समझ में आ सके । ताकि वे चावला की हत्या के इलजाम में दिल्ली शहर के सिकन्दर को गिरफ्तार कर सकें।"

,,, "अपुन का चावला के कत्ल से कोई वास्ता नहीं । अपुन ने अगर लैजर की खातिर चावला का कत्ल किया होता तो लैजर अपुन के पास वापिस होती । लैजर का चावला के कत्ल के बाद भी चावला के पास होना ही इस बात का । सबूत है कि कत्ल एलैग्जैण्डर नहीं किएला है । एलैग्जैण्डर ऐसा झोल-झाल काम नहीं करता कि सांप तो मरे नहीं और लाठी टूट जाए।"

वह ठीक कह रहा था।
 
तभी थामस ने वहां कदम रखा।

मैंने थोड़ा-सा पहलू बदला ताकि उसके साहब को कवर किये हुये मेरे हाथ में थमी रिवॉल्वर की झलक उसे मिल

जाती और बोला - "खबरदार।"

___

वह दरवाजे के पास ही थमककर खड़ा हो गया।

"दरवाजे से परे हटो और चौधरी के पास जाकर खड़े होवो ।"

उसने आदेश का पालन किया।

"चौधरी के हाथ-पांव बांधो ।"

"रस्सी !" - थामस बोला - "रस्सी कहां है?"

"पर्दे की डोरियां निकालो।"

उसने वैसा ही किया। मेरे आदेश पर थामस ने चौधरी के और एलैग्जैण्डर ने थामस के हाथ-पांव बांधे।

उस काम से निपटकर एलैग्जैण्डर ने उठकर सीधा होने का उपक्रम किया तो मैंने रिवॉल्वर को नाल की तरफ से । पकड़कर उसकी मूठ का एक भीषण प्रहार उसकी कनपटी पर किया । वह निशब्द थामस के पहलू में ढेर हो गया। तुरन्त उसकी चेतना लुप्त हो गयी। उसके दिये दस-दस के नोट मैंने उसके मुंह में ठूस दिये। फिर मैंने सावधानी से कमरे के बाहर कदम रखा। वहां मुझे कोई शख्स दिखाई न दिया । पिछवाड़े से ही मैं कोठी से बाहर निकला और उसका घेरा पार कर सामने पहुंचा। सामने कम्पाउन्ड में दो कारें खड़ी थीं। एक इम्पाला कार के करीब एक वर्दीधारी शोफर खड़ा था । जरूर वह कार एलैग्जैण्डर की थी। मैं उसकी तरफ बढ़ा। मैं उसके काफी करीब पहुंच गया तो उसे मेरे उधड़े हुए चेहरे और खून से रंगे कपड़ों की झलक मिली। उसका हाथ फौरन वर्दी के भीतर की तरफ लपका।

लेकिन तब तक मैं उसके सिर पर पहुंच चुका था । रिवॉल्वर वाला हाथ मैं अपने से आगे फैलाए हुए था। रिवॉल्वर पर निगाह पड़ते ही उसके कस-बल निकल गए।

मैं उसके समीप जाकर ठिठका। "जेब में रिवॉल्वर है ?" - मैंने पूछा।

,,, उसने सहमति में सिर हिलाया। "उसके दस्ते को दो उंगलियों से थामकर रिवॉल्वर बाहर निकाल ।”

उसने ऐसा ही किया ।

मैंने उसकी रिवॉल्वर की गोलियां निकालकर कम्पाउन्ड से बाहर उछाल दीं और रिवॉल्वर को झाड़ियों में फेंक दिया। "कार की चाबियां कहां हैं ?" - मैंने पूछा।

"इग्नीशन में ।" - उत्तर मिला।

"जमीन पर औंधे मुंह लेट ।"

अपनी शानदार वर्दी के साथ कम्पाउंड की धूल में वह औंधा लेट गया।

मैं कार में सवार हुआ। चाबियां इग्नीशन में मौजूद थीं। मैंने कार स्टार्ट की और निर्विघ्न कोठी से बाहर पहुंच गया। एक निगाह मैंने अपने पीछे डाली। पीछे कोई नहीं था। मैंने पूरी रफ्तार से कार वहां से भगा दी। पहले मेरा ख्याल एलैग्जैण्डर की कार राजेन्द्र प्लेस छोड़कर वहां से अपनी कार उठाने का था लेकिन राजेन्द्र प्लेस पहुंचते-पहुंचते मैंने वह ख्याल त्याग दिया । राजेन्द्र प्लेस एलैग्जैण्डर का अड्डा था। मेरे वहां पहुंचने से पहले वह इसीलिए अपने दादाओं को वहां फोन कर चुका हो सकता था कि मैं वहां अपनी कार लेने के लिए आ सकता था। फिलहाल दोबारा फौरन किसी झमेले में फंसने का मेरा कोई इरादा नहीं था। मैं कार को पूरी रफ्तार से राजेन्द्र प्लेस के आगे से दौड़ा ले गया। मैंने अपने घर का रुख किया। वहां पुलिस मेरा इन्तजार कर रही थी।

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बेगुनाह चॅप्टर 3

मेरे फ्लैट वाली इमारत के सामने पुलिस की एक जीप खड़ी थी जिसमें दो पुलसिये सवार थे। उन्होंने मुझ जीप के पीछे कार पार्क करते देखा । मैं कार में से उतरकर उसे ताला-वाला लगाकर इमारत के फाटक पर पहुंचा । फाटक खोलकर मैं भीतर दाखिल होने ही वाला था कि मेरे कानों में एक आदेश पड़ा - "ठहरो !" मैं ठिठका, घूमा । मैंने देखा, वे दोनों पुलसिये जीप में से उतर आये थे ओर मेरी तरफ बढ़ रहे थे। उनमें से एक ए एस आई था और

दूसरा हवलदार । "राज !" - ए एस आई बोला- "तुम्हारा नाम राज है?"

"है।" - मैं बोला - "फिर ?"

"तुम्हें हमारे साथ चलना है।"

"कहां ?"

"नारायणा ।"

"वहां क्या है ?"

"वहां एक आदमी पुलिस की हिरासत में है जो कहता है कि वो तुम्हारा आदमी है।"

"मेरा आदमी ?"

"हां । तुम प्राइवेट डिटेक्टिव हो ?"

"हां।"

"वो कहता है, वो तुम्हारे लिए काम कर रहा था।"

"क्या काम कर रहा था ?"

"बॉडीगार्ड का काम कर रहा था वो।"

"कर रहा था ? अब नहीं कर रहा है ?"

"नहीं, अब नहीं कर रहा ।"

"क्यों ?"

"एक तो इसलिए क्योंकि वो पुलिस की हिरासत में है और दूसरे इसलिए कि अब उस काम की जरूरत नहीं रही ।"

"जरूरत नहीं रही !" - चिन्तित तो मैं पहले ही हो उठा था, अब तो मेरा कण्ठ सूखने लगा - "क्यों जरूरत नहीं रही

"क्योंकि जिस लड़की का वो बॉडीगार्ड बना हुआ था वो मर चुकी है।"
 
"मर चुकी है ? लेकिन अभी कुछ घण्टे पहले तो मैं उसे सही-सलामंत छोड़कर आया था !"

"उसे मरे दो घण्टे हो चुके हैं।"

,,, मुझे कमला चावला का ख्याल आया। कहीं मेरे जाने के बाद उसी ने तो जूही का काम तमाम नहीं कर दिया था !

"देखो।" - मैं बोला - "तुम उस लड़की की बात कर रहे हो न जिसका नाम जूही चावला है, जो फैशन मॉडल है और

जो नारायना विहार के सत्तर नम्बर बंगले में रहती है ?"

"हां । उसी की बात कर रहे हैं हम।" "और जो आदमी हिरासत में है और अपने-आपको मेरा आदमी बताता है, उसका नाम हरीश पाण्डे है ?"

"हां ।"

"जूही की मौत के वक्त पाण्डे कहां था ?"

"असल में पता नहीं कहां था, लेकिन जो कुछ वो अपनी जुबान से कह रहा है, वो यह है कि वो उसके बंगले के बाहर बैठा था।"

"कोई गिरफ्तार हुआ ?"

"गिरफ्तार ! काहे के लिए ?"

"जूही के कत्ल के लिए और काहे के लिए ?"

"यह किसने कहा कि उसका कत्ल हुआ है ?"

"और क्या वो जुकाम से मर गई ?"

"उसने आत्महत्या की है।"

"आत्महत्या !"

"हां । खुदकुशी ! सुसाइड !"

"वो किसलिए?"

"कुछ बताकर नहीं मरी वो।"

"अपने पीछे कोई सुइसाइड नोट नहीं छोड़ा उसने ?"

"नहीं छोड़ा। अब जुबानदराजी बन्द करो और चलने की तैयारी करो।"

"मैं ऐसे नहीं चल सकता ।"

"तो कैसे चल सकते हो ?"

“पहले मुझे ऊपर अपने फ्लैट में जाकर कपड़े बदलने दो और हुलिया सुधारने दो।"

"तुम्हारे हुलिए को क्या हुआ है ? ऐसी गत कैसे बनी तुम्हारी ?"

"मैं रोड़ी कूटने वाले इंजन से टकरा गया था ।"

"जाओ, जो करना है, करके आओ । पांच मिनट में नीचे आ जाना।"

"अच्छा ।"

पांच मिनट में नीचे न आये तो मैं ऊपर आ जाऊंगा ।"

,,, "अच्छा-अच्छा ।" मैं अपने फ्लैट में पहुंचा। वहां अपने दो कमरों में अस्त-व्यस्त तो मुझे कोई चीज न दिखाई दी लेकिन फिर भी मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि | मेरी गैर मौजूदगी में वहां किसी के पांव पड़े थे।

मैं टॉयलेट में पहुंचा। है यह देखकर मैंने चैन की सांस ली कि वहां पानी की टंकी में लैजर बुक सही-सलामत मौजूद थी।

लैजर बुक के दर्शन कर चुकने के बाद कहीं मुझे अपनी जेब का ख्याल आया । मैंने जल्दी से अपने कोट की भीतरी जेब टटोली । मेरी मुकम्मल कमाई गायब थी।

और किसी जेब में नोटों के होने की सम्भावना नहीं थी लेकिन फिर भी मैंने सारी जेबें टटोलीं । बाईस हजार के नोट कहीं से बरामद न हुए ।

और अब पुलिस के झमेले की वजह से मैं उसकी वसूली के लिए पंजाबी बाग वापिस भी नहीं जा सकता था। फिर मैंने यही सोचकर अपने-आपको तसल्ली दी कि अभी लैजर बुक मेरे पास थी जो कि बाईस हजार से कहीं ज्यादा नोटों में बदल सकती थी। सबसे पहले मैंने अपने खून के रंगे कपड़े उतारे । फिर मैंने गरम पानी में डिटौल डालकर और उनमें रुई डुबो-डुबोकर अपने सूजे थोबड़े की मरम्मत आरम्भ की। उसके बाद मैंने कपड़े तब्दील किए। अन्त में मैंने रायल सैल्यूट की बोतल निकाली और एक मिनट में उसके बड़े बड़े दो पैग हलक से नीचे उतारे। तभी ए एस आई वहां पहुंचा। मैंने बोतल उसे आफर की लेकिन उसने हिचकिचाते हुए इनकार में सिर हिला दिया।

"मैंने तुम्हें पांच मिनट में नीचे आने के लिए कहा था।" - वह कठोर स्वर में बोला ।

"बस, आ ही रहा था ।"

"अब हिलो ।”

"बस, सिर्फ एक मिनट और ।"

"अब क्या है ?"

"जो है वो अभी सामने आता है।"

मैंने अपनी मैटल की चपटी फ्लास्क निकाली, जिसमें कि आधी बोतल व्हिस्की आ जाती थी। उस फ्लास्क को मैंने व्हिस्की से भर लिया और उसे अपनी पतलून की पिछली जेब में डाल लिया।

"चलो।" - मैं बोला।

उसके साथ मैं नीचे आया।

मुझे नीचे बरामदे में अपना मकान-मालिक खड़ा दिखाई दिया। "क्या बात है?" - मेरे साथ एक पुलिसिये को देखकर वह बोला । बाहर खड़ी जीप पहले ही उसके नोटिस में आ चुकी थी।

"कुछ नहीं, ओक साहब ।" - मैं बोला - "कोई खास बात नहीं ।" |

"तुम बड़ी जल्दी लौट आए ?"

"जल्दी ! मतलब?" |

"जैसे तुमने अपने कपड़े मंगवाए थे, उससे तो नहीं लगता था कि तुम आज ही वापिस आ जाओगे ।"

"मैंने अपने कपड़े मंगवाये थे ?"

"हां । ले नहीं गया था वह आदमी तुम्हारे कुछ कपड़े ?"
 
"कौन आदमी ?"

"जो यहां आया था ?"

"किस्सा क्या है, ओक साहब ?"

"भई चन्द घंटे पहले यहां एक आदमी आया था । मैं इत्तफाक से तब तक यहीं खड़ा था। उसने मुझसे पूछा था कि तुम्हारा फ्लैट कौन-सा था । मैंने कहा था कि तुम घर पर नहीं थे । वह बोला कि उसे मालूम था और यह कि दरअसल तुम्हीं ने उसे यहां अपने कुछ कपड़े ले आने के लिए भेजा था।"

"यानी कि वह मेरे फ्लैट में गया था ?"

"गया ही होगा । मैं कोई आधा घंटा यहां ठहरा रहा था । मेरे सामने तो वह नीचे उतरा नहीं था।" "उसने मेरे फ्लैट का ताला खोला था ?"

"खोला ही होगा।"

"आप उस आदमी का हुलिया बयान कर सकते है ?"

उसने किया। वह सरासर जान पी एलैग्जैण्डर का हुलिया था। "वह यहां पहुंचा कैसे था ?"

"एक शोफर ड्रिवन शानदार विलायती कार पर ।"

"बाहर एक विलायती कार खड़ी है, जरा देखिये, वह वो ही तो नहीं ?" उसने बाहर खड़ी इम्पाला को फौरन पहचान लिया। तो मेरा शक गलत नहीं था कि मेरे पीछे कोई मेरे फ्लैट में घुसा था।

इसीलिए एलेग्जैण्डर राजेंद्र प्लेस से हमारे साथ पंजाबी बाग नहीं आया था। अपने चमचों के साथ मुझे पंजाबी बाग रवाना करके वह पहले मेरे फ्लैट पर पहुंचा था। लैजर की तलाश में जो कि उसे नहीं मिली थी।

"अब चलो।" - ए एस आई उतावले स्वर में बोला । मैं उसके साथ जाकर जीप में सवार हो गया। हवलदार ने फौरन जीप वहां से भगा दी।

"क्या हुआ ?" - रास्ते में मैंने पूछा - "कैसे आत्महत्या की लड़की ने ?"

"उसने अपने-आपको किचन में बंद कर लिया और कुकिंग गैस का सिलेण्डर खोल दिया।" –

"गैस से मरी है वो ?"

"हां । ओपन एण्ड शट केस है आत्महत्या का ।"

"लेकिन क्यों की उसने आत्महत्या ?"

"दिल जो टूट गया था बेचारी का ।"

"दिल कैसे टूट गया था ?"

"भई, वो अमर चावला से मुहब्बत करती थी । वो मर गया तो उसके गम में लड़की ने आत्महत्या कर ली । ऐसा.

आम होता है।"

"लेकिन इस बार भी ऐसा ही हुआ है, यह मुबारक ख्याल किसका है? तुम्हारा ?"

"नहीं । सब-इंस्पेक्टर यादव का ।"

"बाई दि वे, तुम्हारा क्या नाम है ?"

"मेरा नाम रावत है । भूपसिंह रावत ।"

"यादव इस वक्त कहां है?"

"वहीं है । मौकायवारदात पर ।"

"जूही चावला के बंगले पर ? नारायणा ?"

"हां ।"

"मुझे क्यों तलब किया है उसने ?"

"तुम्हारे आदमी की वजह से।"

"और मेरा आदमी क्यों गिरफ्तार है ?"

"गिरफ्तार किसने कहा है ?"

"तो और क्या है ?"

"मैंने कहा है, वो पुलिस की हिरासत में है।"

"हिरासत में भी क्यों है ?"

"क्योंकि उसने लाश बरामद की थी।"

,,, "लाश बरामद करने से वया कोई...."

"छोड़ो, यार" - रावत बोला - "ऐसे सवाल यादव साहब से करना । खामखाह मेरे कान मत खाओ । मैं पहले ही बहुत खपा बैठा हूं।"

मैं खामोश हो गया।

मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और जीप के नारायणा पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगा। - यह बात मेरे गले से नहीं उतर रही थी कि जूही ने आत्महत्या की थी । हकीकतन जरूर उसका कत्ल हुआ था। वह | चावला के हत्यारे को जानती थी और हत्यारा इस हकीकत से वाकिफ था । जूही चावला का मुंह सदा के लिए बंद कर देने की नीयत से ही उसने उसका काम तमाम किया था।

और यह काम कमला चावला का हो सकता था। जिस वक्त जीप जूही के बंगले पर पहुंची, उस वक्त ठीक साढ़े ग्यारह बजे थे । बंगले की तकरीबन सारी बत्तियां जल रही थीं । वहां पुलिस की एक गाड़ी और मौजूद थी। रावत मुझे लेकर यूं बंगले में दाखिल हुआ, जैसे वह कोई इनाम के काबिल काम करके लौटा था। यादव अपने दल-बल के साथ मुझे ड्राइंगरूम में मिला ।

वहां मनहूस सूरत बनाए पाण्डे भी मौजूद था।

"बधाई ।" - मुझे देखते ही यादव व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।

"किस बात की ?" - मैं सकपकाया।

“इतनी शानदार बॉडीगार्ड सर्विस की । बहुत खूब गार्ड दिया तुम्हारे क्लायंट की बॉडी को तुम्हारे आदमी ने !" ३

"जूही ने आत्महत्या की है ?" –

"हां । गैस से ।"

"फिर मेरा आदमी इसमें क्या कर सकता था? बॉडीगार्ड क्लायंट के दुश्मन से उसकी जान की हिफाजत के लिए। होता है। जब कोई खुद अपना दुश्मन बन जाए और खुद अपनी जान लेने पर उतारू हो जाए, तो इसमें बॉडीगार्ड। क्या कर सकता है ? बॉडीगार्ड क्लायंट के साथ नहीं सो सकता । वह उसके साथ टॉयलेट में नहीं जा सकता था।"

"मरने वाली तुम्हारी क्लायंट थी ?"

"हां ?"

"क्या सबूत है ?"

"क्या मतलब ?" - मैं अचकचाया।

"इस बात का क्या सबूत है कि तुमने इस आदमी को" - उसने पाण्डे की तरफ इशारा किया - "जूही के कहने पर यहां तैनात किया था ? मुमकिन है जूही की निगरानी तुम किसी और की खातिर करवा रहे हो ।”
 
"कोई और कौन ?"

"जैसे कमला चावला ।"

"नॉनसैंस ।"

"तुम साबित कर सकते हो कि जूही ने तुमसे बॉडीगार्ड की मांग की थी ? अपने क्लायंट से तुम कोई एग्रीमेण्ट तो करते होगे ?"

"करता हूं, लेकिन जुबानी।"

"फीस ! फीस तो लेते होगे ?"

"लेता हूं।"

"जूही से भी ली होगी ?"

"ली थी।"

"दिखाओ ?" - उसने मेरी तरफ हाथ फैलाया।

"क्या ?"

"फीस का चैक जो तुम्हें जुही ने दिया था।"

"उसने मुझे नकद रकम दी थी।"

"उसकी रसीद तो तुमने उसे दी होगी ?"

,,, "नहीं दी ।"

"यह कैसे धन्धा चलाते ही तुम ! तुम पर तो इंकमटैक्स का केस बन सकता है।"

"भाई साहब, रसीद बुक मैं कोई जेब में थोड़े ही लिए फिरता हूं ! आज शाम ही तो मैं उससे मिला था। कल सुबह ऑफिस पहुंचता तो वहां से रसीद भिजवा देता ।"

"मार कहां से खाई ?"

"कहीं से नहीं ।”

"थोबड़ा तो उधड़ा पड़ा है तुम्हारा ?"

"बाथरूम में पांव फिसल गया था । मुंह के बल गिरा था मैं ।"

"यह झूठ बोल रहा है।" - रावत बोला - "इसकी फ्लैट में दाखिल होने से पहले ही बुरी हालत थी । जब यह अपने फ्लैट के सामने पहुंचा था, तब इसके कपड़े खून से रंगे हुए थे और चेहरा लहूलुहान था ।"

यादव ने गौर से मेरी ओर देखा।

मैंने लापरवाही से सिगरेट का एक कश लगाया ।

"और यह" - रावत फिर बोला - "एक इन्तहाई शानदार इम्पाला कार पर वहां पहुंचा था। मुझे तो इसकी इम्पाला कार की औकात नहीं लगती।"

"तुम्हारी अपनी खटारा फियेट कहा गई ?" - यादव ने पूछा।

"मरम्मत के लिए गई है।" - मैं बोला।

"उसकी मरम्मत अभी मुमकिन है ?"

"अभी है।"

"इम्पाला किसकी है?"

एक दोस्त की ।”

"दोस्त का नाम बोलो ।"

मैं खामोश रहा। "अरे यह कोई छुपने वाली बात है ! कार अभी भी तुम्हारे घर के आगे खड़ी होगी । मैं उसके रजिस्ट्रेशन से मालूम कर लूंगा।"

"कार का नम्बर मुझे याद है।" - रावते बोला - "डी आई बी 9494 ।"

"और उसका रंग सफेद था ?" - यादव बोला ।

"हां ।"

"भीतर की अपहोलस्ट्री वगैरह भी सफेद ?"

"हां ।"

"वो एलैग्जैण्डर की कार है ।" - यादव ने फिर मुझे घूरा - "तुम्हारे हत्थे एलैग्जैण्डर की कार कैसे चढ़ गई ?"

,,,

मैंने उत्तर न दिया।

"जरूर तुम्हारी यह दुर्गति भी उसी की वजह से हुई है।"

मैं परे देखने लगा। मैंने जेब से फ्लास्क निकालकर विस्की का एक पूंट भरा।

"यह क्या है ?" - यादव बोला।

"हैल्थ टानिक ।” उसने मुझे घूरकर देखा।

"विस्की । रायल सैल्यूट । खींचोगे ?"

"शटअप !"

मैंने फ्लास्क वापिस जेब में रख ली।

"अब साफ-साफ बोलो।" - यादव बोला - "क्या माजरा है ?"

"पहले तुम बताओ, क्या माजरा है!" - मैं बोला - "क्या किस्सा है जूही की आत्महत्या का ? क्यों कर ली उसने .

आत्महत्या ? कैसे कर ली ? कब कर ली ? लाश कहां है ?"

"इतने सवाल एक साथ ?"

"बारी-बारी पूछू ?"

"नहीं । ऐसे ही ठीक है। और इनके जवाब कोई सीक्रेट नहीं है।"

"दैट्स वैरी गुड ।”

"आत्महत्या, जाहिर है कि, उसने अपने आशिक अमर चावला की मौत से गमजदा होकर की । ऐसा उसने किचन की गैस इस्तेमाल करके किया । आत्महत्या का वक्त हमारा डॉक्टर कोई शाम आठ बजे का फिक्स करके गया है और लाश यहां से उठवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी गई है।"

"यहां एक नौकरानी भी तो थी । वो उस वक्त कहां थी ?"

"वो सात बजे यहां से चली गई थी। वह करीब एक गांव में रहती है। मेरी उससे बात हो चुकी है।"

"वह यहां नहीं रहती ?"

"यहीं रहती है लेकिन बुधवार और शनिवार शाम को सात बजे घर चली जाती है और फिर सुबह आठ बजे आती है।

"रावत कहता है कि लाश पाण्डे ने बरामद की थी ?"

"हां । और इसी ने पुलिस को लाश की खबर भी की थी। तुम्हें तो पता नहीं ये क्या कहानी सुनायेगा लेकिन हमें इसने यही कहा है कि यह साढ़े सात बजे यहां पहुंचा था। इसने इमारत को अंधेरे में डूबी पाया था और जब इसने कॉलबैल बजाई थी तो भीतर से कोई जवाब नहीं मिला था । इसने समझा था कि जूही कहीं चली गई थी। यह बाहर ही बैठकर उसका इंतजार करने लगा था। फिर दस बजे तक भी जूही यहां न लौटी तो इसने बंगले का मुआयना । करने का फैसला किया था। वह पिछवाड़े में पहुंचा था। वहां एक रोशनदान की झिरीं में से निकलती गैस की तीखी गन्ध इसे मिली थी । इसने रोशनदान पर चढ़कर उसके शीशे में से भीतर झांका था तो इसने किचन को गैस से भरा पाया था। तब इसने पुलिस को फोन किया था।"

,,,

"आई सी !"

"हमें तो इसने यही कहानी सुनाई है। तुम्हें शायद कुछ और कहे ?"

“यही हकीकत है ।" - पाण्डे बोला ।

"अब तुम अपनी कहानी सुनाओ।" - यादव बोला । =
 
"मेरी कहानी बहुत मामूली है।" - मैं बोला - "पांच बजे जूही के ही बुलावे पर मैं यहां आया था। जूही मुझे बतौर बॉडीगार्ड एंगेज करना चाहती थी। मेरे पास वक्त नहीं था इसलिए मैंने उसे समझा दिया कि यह काम मेरा एक आदमी कर सकता था। उसे यह इंतजाम मंजूर था इसलिये मैंने यह काम पाण्डे को सौंपा था।"

"तुम कब तक यहां थे?"

"तकरीबन साढे छ: बजे तक ।"

"तब लड़की यहां अकेली थी ?"

"नहीं । उसकी नौकरानी थी।"

"मैंने नौकरानी के बारे में नहीं पूछा । कोई और था यहां पर ?" मैं हिचकिचाया।

उसकी आंखें सलाखों की तरह मेरे चेहरे पर गड़ी रहीं । "तब यहां"

- मैं कठिन स्वर में बोला - "कमला चावला थी ।"

"वह पहले से यहां मौजूद थी ?"

"नहीं । मेरे सामने आई थी। मेरी रवानगी से थोड़ी ही देर पहले ।

” "क्यों आई थी ?"

"मुझे नहीं मालूम ।"

"तुम्हें जरूर मालूम है। जब मुझे मालूम है तो तुम्हें क्यों नहीं मालूम ?"

"मालूम है तो पूछ क्यों रहे हो ?"

"मैं तुम्हारी जुबानी सुनना चाहता हूं। वह वसीयत की वजह से यहां आई थी ?"

"तुम्हें वसीयत के बारे में मालूम हो चुका है?"

"हां । आज मैं बलराज सोनी से मिला था ।"

"उसी ने बताया होगा कि उससे मिलने मैं भी आया था ?"

"हां । अब कबूल करो कि बीवी माशूका से लड़ने आई थी कि मरने वाला माशूका को बीवी से ज्यादा दौलत का वारिस क्यों बना गया?"

"वजह यही थी लेकिन जब मैं यहां से विदा हुआ था तब तक बीवी का कहरभरा मूड रुख्सत हो चुका था और वो दोनों बड़े प्रेमभाव से यहां बैठी थीं।"

"उन दोनों में और प्रेमभाव ! मैंने तो नहीं सुना कि किसी औरत का अपनी सौतन से कभी कोई प्रेमभाव स्थापित

हुआ हो !"

"वो पुराने जमाने की बातें हैं । आजकल तो इस मामले में मर्द निरा उल्लू का पट्टा साबित होता है । वे मर्द को ताक में रख देती हैं और खुद बहनें बन जाती हैं।"

"तुमने उन दोनों को अपना क्लायंट कैसे बना लिया ? उनमें से किसी को एतराज नहीं हुआ था ?" |

"अभी नहीं हुआ था । जब होता तो जाहिर है कि एक पार्टी मेरा पत्ता काट देती ।”

"जूही की मौत से तो मिसेज चावला को बड़ा फायदा हुआ !"

मैं खामोश रहा । उसके इसी नतीजे से तो मुझे दहशत हो रही थी। "चावला की वसीयत के मुताबिक जूही चावला के पहले मर जाने की सूरत में उसकी मुकम्मल जायदाद की मालकिन उसकी बेवा थी ।"

"तुम्हारी इस बात से तो ऐसा लगता है जैसे तुम्हें शक है कि मिसेज चावला ने जूही का कत्ल किया है। साथ ही तुम

कह रहे हो कि लड़की आत्महत्या करके मरी है।"

"पहली बात मेरी अक्ल कहती है । दूसरी हालात कहते हैं ।"

"जरा हालात का नजारा मैं भी कर सकता हूं? आखिर मरने वाली मेरी क्लायंट थी।"

"आओ।"

पिछवाड़े के बरामदे के रास्ते यादव मुझे विशाल किचन में लाया । उसमें दो दरवाजे थे, एक जो बरामदे में खुलता था, जिससे कि मैं अभी दाखिल हुआ था और जो टूटा पड़ा था। दूसरा दरवाजा भीतर कहीं खुलता था और उस वक्त भी मजबूती से बन्द था। वहां माहौल में गैस की गन्ध अभी भी बसी हुई थी।"
 
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