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हों। जरूरी है। कोमा को मुझसे दूर ही रखना। कहीं वो पास आकर, मेरी नींद खराब न कर दें।”
सरदार ने सिर हिला दिया।
….
सोहनलाल और नानिया बस्ती में पहुंचे तो दोपहर का एक बज रहा था।
जगमोहन को उठाया गया।
सोहनलाल के चेहरे पर उभरी चमक को देखकर जगमोहन मुस्कराया।
तुझे क्या हो गया है?” जगमोहन ने पूछा।
मुझे? मुझे क्या होना है।” सोहनलाल भी मुस्करा पड़ा।
कल तक तो तेरा चेहरा बुझा-बुझा सा था, लेकिन आज तो तेरे चेहरे के नजारे ही कुछ और हैं।” कहते हुए जगमोहन ने नानिया को देखा–
“तुम भी कुछ अलग सी दिख रही हो आज।”
मुझे नानिया से प्यार हो गया है।” सोहनलाल ने बेहिचक कहा। जगमोहन के होंठ सिकुड़े।
सोहनलाल को प्यार?”
क्यों क्या सोहनलाल को प्यार नहीं हो सकता?”
अटपटा-सा लग रहा है सुनकर ।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।।
हम शादी करेंगे, तुम्हारी दुनिया में जाकर।” नानिया ने कहा।
जगमोहन ने सोहनलाल को देखा तो सोहनलाल ने ‘हाँ' में सिर हिलाया।
“ये अच्छी बात है। जगमोहन ने कहा
“परंतु हमारी दुनिया में पहुंचोगे कैसे? कालचक्र से कैसे बाहर निकलोगे?”
“क्या तुम्हें रास्ता नहीं मिला।” नानिया बोली–“सरदार ने नहीं बताया?”
बताया भी, दिखाया भी। वो अजीब-सा रास्ता है।”
“वो किताब पढ़ी तुमने?” सोहनलाल ने पूछा।
“हो।” जगमोहन की निगाह नानिया के हाथ में फंसी मोटी-सी अंगूठी पर जा टिकी—“किताब पढ़ी। सारी पढ़ ली। रास्ता हमें मिल जाएगा, परंतु पहले जो बाहर निकलेगा, वो जान गंवा बैठेगा।”
“क्या मतलब?” ।
“मतलब भी समझ में आ जाएगा।” फिर जगमोहन ने नानिया से कहा-“वो अंगूठी मुझे दे दो।”
नानिया ने अपने हाथ में पड़ी अंगूठी को देखा फिर कह उठी।
ये अंगूठी मैं किसी को नहीं दूंगी। सोबरा ने कहा था कि ये अंगूठी मैं अपने से अलग न करूं।”
अब अंगूठी को अलग करने का वक्त आ गया है।” तुमसे किसने कहा?”
किताब में लिखा है।”
लेकिन तुम इसका करोगे क्या?”
साथ रहना और देख लेना।” । नानिया ने सोहनलाल को देखा।
सोहनलाल के सिर हिलाने पर नानिया ने अंगूठी निकालकर जगमोहन को थमा दी।
“तुमने।” सोहनलाल बोला—“किताब में क्या पढ़ा?”
जगमोहन ने सब कुछ बताया।
सरदार ने सिर हिला दिया।
….
सोहनलाल और नानिया बस्ती में पहुंचे तो दोपहर का एक बज रहा था।
जगमोहन को उठाया गया।
सोहनलाल के चेहरे पर उभरी चमक को देखकर जगमोहन मुस्कराया।
तुझे क्या हो गया है?” जगमोहन ने पूछा।
मुझे? मुझे क्या होना है।” सोहनलाल भी मुस्करा पड़ा।
कल तक तो तेरा चेहरा बुझा-बुझा सा था, लेकिन आज तो तेरे चेहरे के नजारे ही कुछ और हैं।” कहते हुए जगमोहन ने नानिया को देखा–
“तुम भी कुछ अलग सी दिख रही हो आज।”
मुझे नानिया से प्यार हो गया है।” सोहनलाल ने बेहिचक कहा। जगमोहन के होंठ सिकुड़े।
सोहनलाल को प्यार?”
क्यों क्या सोहनलाल को प्यार नहीं हो सकता?”
अटपटा-सा लग रहा है सुनकर ।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।।
हम शादी करेंगे, तुम्हारी दुनिया में जाकर।” नानिया ने कहा।
जगमोहन ने सोहनलाल को देखा तो सोहनलाल ने ‘हाँ' में सिर हिलाया।
“ये अच्छी बात है। जगमोहन ने कहा
“परंतु हमारी दुनिया में पहुंचोगे कैसे? कालचक्र से कैसे बाहर निकलोगे?”
“क्या तुम्हें रास्ता नहीं मिला।” नानिया बोली–“सरदार ने नहीं बताया?”
बताया भी, दिखाया भी। वो अजीब-सा रास्ता है।”
“वो किताब पढ़ी तुमने?” सोहनलाल ने पूछा।
“हो।” जगमोहन की निगाह नानिया के हाथ में फंसी मोटी-सी अंगूठी पर जा टिकी—“किताब पढ़ी। सारी पढ़ ली। रास्ता हमें मिल जाएगा, परंतु पहले जो बाहर निकलेगा, वो जान गंवा बैठेगा।”
“क्या मतलब?” ।
“मतलब भी समझ में आ जाएगा।” फिर जगमोहन ने नानिया से कहा-“वो अंगूठी मुझे दे दो।”
नानिया ने अपने हाथ में पड़ी अंगूठी को देखा फिर कह उठी।
ये अंगूठी मैं किसी को नहीं दूंगी। सोबरा ने कहा था कि ये अंगूठी मैं अपने से अलग न करूं।”
अब अंगूठी को अलग करने का वक्त आ गया है।” तुमसे किसने कहा?”
किताब में लिखा है।”
लेकिन तुम इसका करोगे क्या?”
साथ रहना और देख लेना।” । नानिया ने सोहनलाल को देखा।
सोहनलाल के सिर हिलाने पर नानिया ने अंगूठी निकालकर जगमोहन को थमा दी।
“तुमने।” सोहनलाल बोला—“किताब में क्या पढ़ा?”
जगमोहन ने सब कुछ बताया।