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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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ये नहीं हो सकता।” सरदार ने कहा और वहां से चला गया। कोमा चिढ़कर रह गई।

अब तुम एक ही काम कर सकती हो।” जगमोहन ने शरारत-भरे स्वर में कहा।

क्या?" मेरे पांव दबाओ।”

नहीं दबाती।” कोमा ने नाराजगी से कहा-“तुम सरदार से कहते तो वो मान जाता। परंतु तुमने जरा भी कोशिश नहीं की।”

“तुम कोशिश करती रहो।”

रात का जाने कौन-सा पर था।

कानों में शोर पड़ा तो जगमोहन की आंख खुल गई। उसने नजर घुमाई तो सामने की चारपाई पर कोमा को गुड़मुड़ नींद में पाया। सरदार के दोनों पहरेदार सतर्कता से पहरा दे रहे थे। एक तरफ मशाल जल रही थी।

“क्या हो रहा है बाहर?” जगमोहन ने कहा।

हमें नहीं मालूम।” पहरेदार ने कहा।

मालूम करो।”

“हमारा काम तुम पर नजर रखना है। हम यहां से हट नहीं सकते।” पहरेदार ने जवाब दिया। |

जगमोहन उठ बैठा। तभी एक व्यक्ति ने भीतर प्रवेश करके कहा।

रानी साहिबा ने हमारी जाति के लोगों को आजाद कर दिया है। वे आ पहुंचे हैं।” ख़बर देकर वो चला गया।

अब तक कोमा की आंख खुल चुकी थी। वो खुशी से बोली।

ये तो अच्छी बात है। सरदार अब इन दोनों को पहरे से हटा लेगा।”

“तुम नींद में भी इसी बात के सपने ले रही थी।”

तुम मेरे साथ सोने में चिढ़ते क्यों हो?” कोमा ने मुंह फुलाया।

मैं कहां चिढ़ता हूं। परंतु इस बात की तरफ ज्यादा सोचना भी ठीक नहीं होता।”

“ज्यादा सोचना?

तुम समझते क्यों नहीं कि मैं कुंआरी हूं। एक बार तुम्हें पा लूंगी तो चैन मिल जाएगा।”

“चैन मिल नहीं जाएगा, चैन छिन जाएगा। तब तुम खाते-पीते, जागते-सोते, इसी बात के सपने देखोगी।”

“ये नहीं होगा।” ।

“ये ही होगा।”

“देख्नेगी, पहले तुम एक बार तो मेरे हाथ के नीचे आओ।” कोमा ने चंचल स्वर में कहा।

“तुम किसी और के साथ...।”

“मुझे, तुम ही चाहिए।” कोमा की प्यार-भरी आवाज में, जिद के भाव भरे थे।

करों इंतजार।” ।

“अब कोई इंतजार नहीं है। सरदार अभी इन दोनों को यहां से हटा लेगा, उसके बाद तो...।”

तभी सरदार ने झोंपड़े में प्रवेश किया। साथ में नीली वर्दी पहने एक और व्यक्ति था। जिसने कपड़े में बंधा कुछ उठा रखा था।

जगमोहन उसे देखते ही बोला।

“तुम्हारे सब आदमी नानिया ने छोड़ दिए?”

हां-वो...।” । ।

“तो अब इन पहरेदारों को यहां से हटा लो।” कोमा कह उठी-“तुमने ही कहा था कि...”

अभी मुझे जग्गू की जरूरत है।” सरदार बोला।

क्या मतलब?”

ये हमें कालचक्र से बाहर निकालेगा। अगर ये भाग गया तो फिर हमें कौन यहां से बाहर निकालेगा।”

तुम अपनी बात से फिर रहे हो।” कोमा ने तीखे स्वर में कहा।

 
“तुम जग्गू को पाने के लिए बल क्यों खा रही हो। कोई और मर्द ले लो। बढ़िया मर्द दूंगा।”

नहीं, मुझे जग्गू ही चाहिए।” कोमा ने सिर हिलाकर कहा।

“ऐसा है तो ये बात मुझे जग्गू ने एक बार भी नहीं कही।”

“तुम कह दो जग्गू।” कोमा ने जगमोहन को देखा।

जगमोहन सरदार से कह उठा। ये नीले कपड़ों वाला मुझे, नानिया का सेवक लगता है।”

हां। रानी साहिबा ने तुम्हारे लिए कोई किताब भेजी है।” सरदार बोला।

“जरूर। मुझे किताब की जरूरत थी।” कहकर जगमोहन ने नीले कपड़े पहने सैनिक से किताब थामी।

तुम सरदार से कह दो जग्गू कि तुम्हें एकांत चाहिए।”

“ये ठीक कहती है। मुझे एकांत चाहिए। किताब को पढ़ना है मैंने। तुम कोमा को बाहर ले जाओ।” ।

“ये क्या कर रहे हो?” कोमा गुस्से से बोली।

“मुझे किताब पढ़नी है। ये जरूरी है।”

तो मुझे क्यों बाहर निकलवा रहे हो?” ।

“तुम मुझे परेशान करोगी। किताब नहीं पढ़ने दोगी।”

“नहीं करती परेशान । मुझे कम-से-कम अपने पास तो रहने दो।” कोमा ने नाराजगी से कहा “पता नहीं कैसे मर्द हो, जो एक कुंआरी से दूर भाग रहे हो। दूसरा होता तो अब तक जाने क्या से

क्या हो गया होता।”

जवाब में जगमोहन मुस्कराकर रह गया।

अगले दिन की सुबह नानिया के लिए बहुत खुशगवार थी। उसका एक-एक अंग हिला-सा हुआ था। रात उसने जिंदगी के नए स्वाद का मजा चखा था। पचास साल की उम्र में इस नए स्वाद का मज़ा चखना, उसके लिए बहुत बड़ा अनुभव था। सोहनलाल ने अपनी तरफ से कोई कसर न छोड़ी थी। रात भर मस्ती में कराहतीं रही थी नानिया। कई बार तो उसके होंठों से निकलने वाली आवाज में ऐसे भाव थे कि जैसे कोई उसका गला काट रहा हो। ये सब एक बार नहीं, पांच बार चला। सोहनलाल ने तो एक बार के बाद ही बस कर दी थी, परंतु नानिया को चैन कहां था। वो तो जैसे पचास साल की कमी को एक ही रात में पूरा कर लेना चाहती थीं। आधी रात के बाद जाकर ही वो सो पाए थे। तब शायद रात के तीन बज रहे थे।

अगले दिन जब नानिया की आंख खुली तो चेहरे पर बच्चों जैसी मासूम मुस्कान थी।

जैसे उसे पसंदीदा चीज मिल रही हो। बीती रात का जागता सपना उसकी आँखों के सामने घूमने लगता कि रात क्या-क्या कैसे हुआ।

* आज नानिया को दुनिया की रंगीन तस्वीर कुछ अलग ही नजर आ रही थीं।

नानिया के शरीर पर गाऊन जैसा एक ही कपड़ा था। वो आगे बढ़ी और खिड़की खोलकर बाहर देखने लगी।

नगरी में तो कब की जाग हो गई थी। हर कोई अपने काम में व्यस्त दिखा। सिपाही नीली वर्दियों में अपने कामों में लगे दिखाई दिए। नानिया आंखों में रात की मस्ती समेटे देर तक बाहर देखती रहीं।

तभी नानिया पल भर के लिए चौंकी।

पीछे से सोहनलाल ने आकर उसकी कमर के गिर्द बांह डाल दी थीं।

शरारती हो तुम।” नानिया बिना पलटे मीठे स्वर में कह उठी।

“तुमसे कम्।” सोहनलाल के स्वर में मस्ती थी—“रात तुमने क्या किया?”

“मैंने तो कुछ नहीं किया। जो किया तुमने किया।” ।

मैंने तो एक बार किया, लेकिन तुमने चार बार...।”

 
तृभी नानिया उसकी बांहों के घेरे में फंसी घूम गई। दोनों की नजरें मिलीं। नानिया ने सोहनलाल के होंठों को चूमा।

मेरे लिए ये सब नया है।”

“नया?” ।

वो देखो, चादर का हाल। खून के दो-तीन धब्बे हैं वहां। तुम्हें इसी से समझना चाहिए कि रात जो हुआ, मेरे साथ पहली बार हुआ।”

सोहनलाल मुस्करा पड़ा। “मैं भाग्यशाली निकला जो तुम मुझे मिलीं।” सोहनलाल ने कहा।

शायद। लेकिन मैं तो कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी। पचास बरस से ।”

“अब मैं आ गया हूँ नानिया।”

तुम चले जाओगे।”

“तुम्हें कालचक्र से बाहर निकालूंगा।” सोहनलाल ने उसका गाल थपथपाया।

उसके बाद चले जाओगे।” सोहनलाल ने नानिया को गहरी निगाहों से देखा।

नानिया की आंखों में पानी चमकता दिखाई दिया।

“तुम मत जाना सोहनलाल।” नानिया का स्वर् भीग गया।

जाना तो मुझे है ही। यहां रुक नहीं सकता।”

मैं-मैं तुम्हारे बिना कैसे रह पाऊंगी। हर वक्त तुम मुझे याद आओगे।” आंसू गालों पर आ लुढ़के।।

सोहनलाल ने उंगली से उसके गालों पर आ पहुंचे आंसुओं को साफ किया।

“जानती हो नानिया, मैंने अभी तक शादी नहीं की।”

“नहीं की?”

नहीं। लेकिन अब कर सकता हूँ।” सोहनलाल मुस्करा पड़ा।

“तुम किसी से शादी कर रहे हो सोहनलाल?”

। किससे?”

अगर वो तैयार हो जाए तो।”

वो तैयार क्यों न होगी?” नानिया ने भीगे स्वर में कहा। सोहनलाल कुछ पल नानिया को देखता रहा फिर प्यार से कह उठा।

जानती हो नानिया। बीती रात तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी महत्त्वपूर्ण थी।”

“तुम्हारे लिए कैसे?”

रात पहली बार मुझे लगा कि मेरे पास कोई सम्पूर्ण औरत मौजूद है। मैंने रात तुम्हें भोगा नहीं, प्यार किया तुमसे।”

नानिया की निगाह सोहनलाल के चेहरे पर फिरती रही।

“मुझसे शादी करोगी?”

मैं?” नानिया का स्वर कांप उठा।

हां तुम मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। क्या तुम्हें मंजूर

नानिया की आंखों से आंसू बह उठे। चेहरा खुशी से भर उठा।

“सच सोहनलाल। हम हम शादी करेंगे?”

“जरूर करेंगे। लेकिन यहां नहीं। ये पूर्वजन्म की दुनिया है। यहां से वापस जाना है मुझे, तुम्हें भी अपने साथ ले जाऊंगा आगे की दुनिया में। वहां मेरा घर है। उस घर में हम शादी करके रहेंगे नानिया।” सोहनलाल मुस्करा रहा था।

सोहनलाल ।” नानिया सोहनलाल से लिपट गई। सोहनलाल उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा।

वो दुनिया कैसी है सोहनलाल?”

बहुत अच्छी। वहां हर कोई आजाद है और अपनी मर्जी कर सकता है। तुम्हें वहां पहुंचकर अच्छा लगेगा।”

चलो, हम आज ही, उस दुनिया में चल देते हैं। नानिया बोली।

सोहनलाल ने नानिया को अपने से अलग किया और कह उठा।

ये आसान नहीं।”

क्यों?

मेरे साथ रहोगी तो धीरे-धीरे समझ जाओगी। सब कुछ अभी जानने की चेष्टा मत करो।”

ओह। लेकिन तुम कालचक्र में कैसे आ फंसे?” नानिया ने पूछा।

“जथूरा की वजह से।” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा-“जथूरा नहीं चाहता था कि हम पूर्वजन्म में पहुंचे।” ।

हम कौन?”

“बहुत सारे लोग हैं। धीरे-धीरे तुम उनके बारे में जान जाओगी। जिसे तुम मेरा सेवक कहती हो, वो मेरा दोस्त है। हम दोनों कालचक्र में फंस चुके हैं तो बाकी लोग भी सुरक्षित न होंगे। उनके सामने भी समस्याएं आ रही होंगी। एक बात बताओ नानिया।”

क्या?”

कालचक्र से बाहर कैसे निकला जा सकता है, अगर मैं अपनी दुनिया में जाना चाहूं तो?”

शायद ये बहुत कठिन काम है।” नानिया गम्भीर हो उठी।

क्यों?”

ये कालचक्र का भीतरी हिस्सा है, जहां हम मौजूद हैं। कालचक्र की ऊपरी परत मौजूद होती तो शायद बाहर निकलने की चेष्टा की जा सकती थीं। परंतु यहां से बाहर नहीं निकला जा सकता।” ।

“कल चिमटा जाति का सरदार कह रहा था कि वो एक रास्ते को जानता है, वो बाहर जाता है।”

अगर उसकी बात सच है तो कम-से-कम वो रास्ता, तुम्हारी दुनिया में नहीं जाता होगा। मेरे खयाल में ऐसा कोई रास्ता है तो वो जथूरा की जमीन पर जाकर ही खुलेगा।” नानिया ने कहा।

“जथूरा की जमीन?”

हां। क्योंकि ये कालचक्र जथूरा का है इस वक्त। पहले कभी सोबरा का हुआ करता था। सोबरा ने जथूरा को तबाह करने के लिए कालचक्र उस पर फेंका कि सतर्क जथूरा ने कालचक्र को अपने काबू में कर लिया। अब ये कालचक्र जथूरा के इशारों पर ही काम करता है। ऐसी स्थिति में कोई कालचक्र से बाहर निकलेगा तो, वो अवश्य जथूरा की जमीन पर ही पहुंचेगा। जथूरा भला क्यों चाहेगा कि उसके कालचक्र से बाहर निकलने वाला इंसान, किसी और जमीन पर पहुंचे।”

 
“ये कालचक्र है क्या?” सोहनलाल ने कहा।

कालचक्र के बारे में मैं ज्यादा नहीं जानती, परंतु ये पता है कि कालचक्र मुसीबतों का बेड़ा है। जिसे कालचक्र घेर ले तो उसका बच पाना आसान नहीं रहता। सारी जिंदगी कालचक्र से आई मुसीबतों से मुकाबला करता है।” नानिया ने गहरी सांस ली–“मैं तो कहूंगी कि कोई दुश्मन भी कालचक्र की छाया में न आए।”

सोहनलाल गम्भीर-सा सोचने लगा।

“तुम कहां खो गए?”

सोच रहा हूं कि हम कालचक्र से कैसे निकलेंगे।”

मुझे विश्वास है कि हम निकल जाएंगे।”

“कैसे?

“ये तो मैं नहीं जानती। परंतु उस किताब में लिखी सोबरा की बात गलत नहीं हो सकती कि धुआं उड़ाने वाला आएगा और मुझे कालचक्र से आजाद कराएगा। साथ में उसका साथी भी होगा।” ।

*और क्या-क्या लिखा था उस किताब में?”

बहुत कुछ परंतु वो बातें मुझे समझ नहीं आईं। या यूं कह लो कि उन्हें समझने की चेष्टा नहीं की मैंने। जब-जब किताब को खोला तो अपने काम की बात पढ़ी और किताब बंद कर दी।” नानिया ने कहा।

“मुझे जगमोहन के पास जाना होगा।” सोहनलाल बोला।

क्यों?”

रात तुमने किताब उस तक पहुंचा दी थी। मुझे जानना है कि उसने किताब में क्या-क्या पढ़ा।”

“जल्दी मत करो। उसे किताब पढ़ लेने दो। रात के चंद घंटों में उसने किताब नहीं पढ़ी होगी।”

लेकिन मैं उसके पास जाना चाहता...।” ।

“जरूर चलेंगे। मैं भी चलेंगी। लेकिन पहले चिमटा जाति की तरफ से संदेश आने दो।”

“संदेश?”

किताब में कोई खास बात हुई तो तुम्हारा दोस्त अवश्य तुम्हारे लिए कोई संदेश भेजेगा। अभी इंतजार करो।” कहने के साथ ही नानिया कमरे के कोने में पहुंचीं और वहां लटकता रस्सा खींचा तो कमरे के बाहर कहीं घंटा बजा।।

सोहनलाल सोचों में था।

तभी दरवाजे पर लटका पर्दा हटाकर, एक युवती ने भीतर प्रवेश किया।

हुक्म रानी साहिबा।”

हमारे लिए कहवा ले आओ।”

“जी ।”

*और मंत्रीजी से मालूम करें कि रात चिमटा जाति के सब सेवकों को आजाद कर दिया था। वो किताब भी क्या वहां भिजवा दी थी?”

अभी मालूम करती हूं।” युवती ने कहा और पलटकर बाहर निकल गई।

नानिया ने मुस्कराकर सोहनलाल से कहा।

हम आज के दिन की शुरुआत गुलाब जल से नहाने से शुरू करेंगे। उसके बाद कुछ खाएंगे। उसके बाद तुम्हें नगरी दिखाने ले चलूंगीं । तुम खुद को नगरी का मालिक समझना। मालिक हो भी तुम, क्योंकि तुम मेरे मालिक बन गए हो। हर कोई तुम्हें सलाम करेगा। ये सब तुम्हें जरूर अच्छा लगेगा। तुम खुद को शानदार महसूस करेंगे।”

“जो आराम तुम्हें यहां है, वैसा आराम तुम्हें मेरी दुनिया में नहीं मिलेगा।” सोहनलाल मुस्करा पड़ा।

“मैं समझी नहीं ।”

वहां नौकर-दासियां नहीं होंगे। हर काम तुम्हें खुद ही करना पड़ेगा।”

वो मेरा घर होगा।” नानिया मुस्कराई।

हां।" तो अपने घर में मैं अपना काम क्यों नहीं करूंगी। ये सब तो कालचक्र के ठाठ-बाट हैं। सोबरा ने किसी को रानी बना दिया तो किसी को नौकरानी। यहां कोई भी अपना असली जीवन नहीं जी रह्म। ये तो शीशे में दिखने वाली छाया जैसा नकली जीवन है। जब तक हम कालचक्र में रहेंगे। ये ही जीवन जिएंगे।”

“तुम कालचक्र से मुक्त क्यों होना चाहती हो। यहां हर चीज़ की सुविधा है तुम्हें ।” ।

“मुझे अपने बचपन की याद आती है। जब मैं पांच साल की थी और मुझे कालचक्र में डाल दिया गया। कितना अच्छा लगता था तब। पेड़ों पर झूला डालकर मैं अपनी सहेलियों के साथ झूला झूला करती थी। पेड़ों पर पत्थर मारकर पके आमों को गिराती और उन्हें खाती थी। बहुत मजा आता था। वो मैं कभी नहीं भूल सकती।” नानिया उदास भी हो उठी–“अब वो जीवन तो वापस नहीं आ सकता, परंतु आजादी पा लेना चहाती हूं, कालचक्र से निकलकर ।”

“जरूर।” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा “मैं तुम्हें कालचक्र से बाहर निकालने की चेष्टा करूंगा।”

तभी उसी युवती ने भीतर प्रवेश किया। हाथ में पकड़ी चांदी की ट्रे में दो चांदी के प्याले थे।

रानी साहिबा, कहवा?”

सोहनलाल और नानिया ने कहवे का एक-एक गिलास उठा लिया।

मंत्रीजी कहते हैं कि रात आपने जैसे कहा उन्होंने वैसे ही काम कर दिया है।” युवती बोली।

“ठीक हैं—जाओ तुम।” युवती बाहर निकल गई।

सोहनलाल कुर्सी पर जा बैठा और कहवे का घूट भरा। नानिया भी बैठ गई।

नगरी घूमना जरूरी नहीं है।” सोहनलाल ने कहा “मैं जगमोहन के पास जाना चाहता हूं।”

“अगर तुम जरूरी समझते हो तो ऐसा ही करेंगे।”

ये जरूरी है नानिया। हमें कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता तैयार करना है।” ।

“ठीक है। हम चिमटा जाति के पास चलेंगे। जगमोहन से मिलेंगे। उस किताब में लिखा है कि तुम्हें खुश रखने पर ही, मैं कालचक्र से निकल पाऊंगी। इसलिए तुम्हारी हर बात मैं मानूंगी।” नानिया बोली ।।

चिमटा जाति की बस्ती में चहल-पहल जारी थी।

रोज की तरह ही, सारे काम हो रहे थे।

परंतु जिस झोंपड़े में जगमोहन को रखा गया था, वहां के जैसे सारे काम रुके हुए थे। जगमोहन सोबरा की लिखी किताब पढ़ने में व्यस्त था। इसके अलावा जैसे उसे कोई होश ही नहीं था। अब किताब के कुछ आखिरी पन्ने ही बाकी बचे थे। दो पहरेदार झोंपड़ी के उसी कमरे में थे। दिन निकलते ही रात के पहरेदार चले गए थे और उनकी जगह नए पहरेदार आ गए थे। परंतु जगमोहन को तो जैसे आसपास की सुध ही नहीं थी।

 
कोमा उन पहरेदारों की वजह से रात-भर कुढ़ते-कुढ़ते सो गई थी।

सुबह जब आंख खुली तो तब भी जगमोहन को किताब पढ़ते ही पाया।

तुम इंसान हों या जानवर!” कोमा गुस्से से कह उठी।

जगमोहन ने किताब से नजर हटाकर उसे देखा।

क्या हुआ?” जगमोहन बोला।

कुछ नहीं हुआ, तभी तो तुम्हें जानवर कह रही हूं।” गुस्से में ही थी कोमा–“मैं रात भर तुम्हें पाने के लिए तड़प रही थी और एक बार भी इन पहरेदारों को दूर भगाने की चेष्टा नहीं की।”

“वो जरूरी काम नहीं था।”

किताब पढ़ना जरूरी है।” कोमा चिल्लाई।

“शायद हां ये तो अच्छा हुआ कि मैंने किताब पढ़ ली।”

“क्यों ऐसा क्या लिखा है इसमें?” ।

लिखा है कि जो आदमी चिमटा जाति की बस्ती में रहेगा, उसे औरत को भोगना मना है।”

“ऐसा लिखा है?”

हां। अगर मैंने तुम्हें भोग लिया होता तो हमारे लिए कालचक्र से बाहर जाने का रास्ता कभी न खुलता।”

“तुम झूठे हो।”

“सच कह रहा हूं।” जगमोहन गम्भीर था—“तुम पढ़ सकती हो तो, पढ़ लेना।”

“तुम तो ऐसे कह रहे हो कि जैसे कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता तुम्हें मालूम हो गया हो।”

जगमोहन ने कुछ न कहा और पुनः किताब पढ़ने लगा। तभी सरदार ने भीतर प्रवेश किया।

क्या बात है।” वो बोला-“तुम्हारे चिल्लाने की आवाज मैंने सुनी है।”

* “कह तो ऐसे रहे हो कि जैसे तुम्हें पता ही न हो कि मुझे गुस्सा किस बात का है।” कोमा कह उठी।

जग्गू तुम्हें प्यार नहीं करना चाहता तो...।”

जग्गू को तो मैं सीधा कर देती, परंतु तुमने रात-भर से ये जो दो झंडे खड़े कर रखे हैं, इनका क्या करूं?”

“ये मैंने इसी वास्ते खड़े किए कि सब ठीक रहे।”

क्या मतलब?”

“सोबरा ने इस बस्ती का सरदार बनाते वक्त मुझे कहा था कि अगर बाहरी दुनिया से आने वाला व्यक्ति तुम्हारी बस्ती में सम्भोग करेगा तो हालात बदल जाएंगे। फिर तुम कालचक्र से कभी बाहर निकल पाओगे।” सरदार बोला।

जगमोहन ने नजरें उठाकर सरदार को देखते हुए कहा। इस किताब में भी ऐसा ही कुछ लिखा है।”

फिर तो अच्छा हुआ कि जो तुमने सम्भोग नहीं किया।” कोमा एकाएक कुछ शांत-सी दिखने लगी।

मैं तो समझी थी कि जग्गू ये बात झूठ कह रहा है।” वो बोली।

किताब से कोई फायदा हुआ?” सरदार ने पूछा।

हां।”

“कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता पता चल गया?”

कुछ—कुछ ।”

“ओह—कैसे—हम्...।”

“जल्दी मत करो। कुछ पन्ने बचे हैं। वो मुझे पढ़ लेने दो। लेकिन इतना जान लो कि रास्ता पता होने के बाद भी निकलना आसान नहीं।”

“वों क्यों?

वक्त आएगा तो पता चल जाएगा।” जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कोमा से कहा-“तुम नहा-धो लो।”

“गंदी हुई नहीं तो नहाने-धोने में क्या मजा जाएगा।” कोमा ने तीखे स्वर में कहा।

जगमोहन मुस्कराया।

 
वक्त आएगा तो पता चल जाएगा।” जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कोमा से कहा-“तुम नहा-धो लो।”

“गंदी हुई नहीं तो नहाने-धोने में क्या मजा जाएगा।” कोमा ने तीखे स्वर में कहा।

जगमोहन मुस्कराया।

कम-से-कम मुझे चाट तो सकता था।” कोमा उठते हुए बोली-“पर तू तो सामने बैठा ढोलकी बजाता रहा।”

“तुम्हें कहा तो था कि मैं तुम्हें कोई बढ़िया मर्द दे देता...।” सरदार ने कहना चाहा।।

जो करूंगी, जग्गू के साथ करूंगी। मुझे ये ही अच्छा लगता है।” कहकर कोमा बाहर निकल गई।

सरदार मुस्करा पड़ा।

“सरदार।” जगमोहन बोला–“मेरे दोस्त सोहनलाल और नानिया को यहां बुला लो। किसी को भेजो उन्हें बुलाने के लिए।

अभी अपने बंदे दौड़ा देता हूं।” सरदार ने कहा और पलटकर बाहर चला गया। OO

जगमोहन पूरी किताब पढ़ चुका था।

उसके बाद वो पास की नदी पर जाकर नहाया। कोमा उसके साथ थी और नहाने के दौरान, वो भी पानी में उतरकर उसके पास आ गई थी। जगमोहन पर नजर रखने वाले दो पहरेदार नदी किनारे ही खड़े रहे। ।

“सुनो।” कोमा पास पहुंचकर जग्गू की बांह थामते कह उठी “तुम यहां से भागना चाहते हो?”

क्यों?" जगमोहन ने उसे देखा।

“मैंने कहा है भागना चाहते हो तो, मेरे पास रास्ता है। ये पहरेदार हमें नहीं पकड़ सकेंगे। नदी के उस पार एक ऐसा रास्ता है मैं जानती हूं, जहां से हम जल्दी ही रानी साहिबा की नगरी में पहुंच जाएंगे।” कोमा का स्वर धीमा था। ।

“लेकिन मैं नहीं भागना चाहता।” ।

बेवकूफ हो तुम। सरदार ने तुम्हें बंदी बना रखा है, वो तुम्हारे पर पहरेदारी...।”

जगमोहन मुस्करा पड़ा।

तुम्हें लगता है कि मैं बंदी हूं, लेकिन मैं तो यहां अपनी मर्जी से रह रहा हूं। जब चाहूंगा, निकल जाऊंगा।”

बहुत बहादुर हो?” कोमा ने आंखें नचाईं। पता नहीं।

“ठीक है, तुम मुझे यहां से निकलकर दिखाओ। मैं भी तो देखें कि जग्गू कितना बहादुर है।”

। “सरदार हमारा दुश्मन नहीं दोस्त है।”

वो दुश्मन है। रानी साहिबा के सिपाहियों के साथ हमेशा, इसके आदमी झगड़ते हैं।”

“अब झगड़ा नहीं होगा। वो वक्त निकल चुका है।” जगमोहन बोला।

तुम मुझे पागल लगते हो कभी-कभी ।”

जगमोहन नहाने में व्यस्त हो गया।

कोमा पानी में उसके करीब आ गई। उसके अंग जगमोहन के शरीर को छूने लगे।

जगमोहन ने कोमा को देखा। कोमा ‘आह' भरकर मुस्कराई।

“पीछे हट जाओ।”

“हम सम्भोग तो नहीं कर रहे। यूं ही मजे ले रहे हैं।” कोमा ने। कहा-“इस पर तुम्हें क्या ऐतराज है।”

“सम्भोग क्रिया की शुरुआत यहीं से होती है। मेरे से दूर रहो।” कोमा का चेहरा नाराजगी से भर उठा।

तभी किनारे पर खड़े दोनों में से एक पहरेदार बोला ।

 
तभी किनारे पर खड़े दोनों में से एक पहरेदार बोला ।

ऐ तुम बाहर आ जाओ।”

क्यों?कोमा ने तीखे स्वर में कहा।

“सरदार का आदेश है कि तुम्हें, जग्गू के ज्यादा करीब न जाने दिया जाए।”

“ये क्या बात हुई। मैं क्या सरदार की नौकर हूं। मैं रानी साहिबा की सेविका हूं। नहीं बाहर आती, जाओ।”

मैंने कहा न कि सरदार हमारा दुश्मन नहीं है। वो हमें दूर रखकर हमारा भला करना चाहता है।” जगमोहन कह उठा।

“इससे मेरा भला नहीं होता जग्गू। मेरा भला तो सम्भोग से होगा।” ।

“और फिर हममें से कोई भी कालचक्र से बाहर नहीं निकल सकेगा।”

कोमा गहरी सांस लेकर रह गई। जगमोहन नहाने में व्यस्त हो गया। कोमा उदास सी नदी से बाहर निकलकर, किनारे पर आ खड़ी हुई।

। नहाने के बाद जगमोहन ने वो ही कपड़े पहने, जो उतार रखे थे। कोमा हसरत भरी नजरों से जगमोहन के शरीर को देखती रही। उसके बाद वो चारों बस्ती में पहुंचे तो जगमोहन को एक पेड़ के नीचे बैठाकर खाने को दिया गया। खाने में अजीब-सी चपाती और बे-स्वाद सी चटनी जैसी कोई चीज थीं। परंतु इस स्थान पर ये सब खाना उसे अच्छा लगा।

खाने से फारिग हुआ तो सरदार उसके पास आ बैठा।

जगमोहन अपने कामों में व्यस्त, बस्ती के आते-आते लोगों पर नजरें दौड़ाने लगा। फिर बोला।

तुमने सोहनलाल और नानिया को बुलाने के लिए किसी को भेजा?” ।

“चार आदमी भेज दिए हैं। वो वहां पहुंचने वाले होंगे अब तो।” सरदार ने कहा।

जगमोहन ने सिर हिलाया। किताब तो तुमने पूरी पढ़ ली?” सरदार कह उठा।

“हाँ।” जगमोहन ने उसे देखा।

क्या लिखा है उसमें?” । जगमोहन कुछ नहीं बोला। कालचक्र से बाहर निकलने वाले रास्ते का पता चला।”

रास्ता वहीं से है, जहां कल शाम तुम मुझे ले गए थे।”

वो गोटियों पर?

” वहीं।”

एक गोटी कम क्यों है, उसका रहस्य पता चला?” सरदार ने सिर आगे करके पूछा।

हां।” “क्यों कम है गोटी?”

 
जो कम है वो मिल जाएगी।

” कैसे?”

जगमोहन चुप रहा।

“तुम मुझे कुछ बता नहीं रहे?” सरदार ने कहा।

मेरे सामने कोई समस्या है। उसका समाधान ढूंढ़ने की चेष्टा कर रहा हूं।”

कैसी समस्या?” सरदार ने कहा-“कुछ मुझे भी तो बताओ।” |

जगमोहन ने सरदार को देखा फिर बोला।

“गोटी, जो कम है, वो खाने में फिट करने पर, वहां की कोई दीवार रास्ते से हट जाएगी। उस जगह से बाहर निकलते ही हम कालचक्र से बाहर, जथूरा की जमीन पर पहुंच जाएंगे।”

“तो समस्या कहां है?"

समस्या ये है कि किताब में लिखा है, रास्ता बनने के पश्चात, जो भी सबसे पहले बाहर निकलेगा, वो मारा जाएगा।”

नहीं।” सरदार के होंठों से निकला। ये सच है।”

“ओह। तुमने ठीक से किताब पढ़ी थी?” जगमोहन ने हां में सिर हिला दिया। सरदार चिंतित दिखने लगा।

अब सवाल ये उठता है कि कौन अपनी जान गंवाना चाहेगा।” जगमोहन बोला।

“मैं तो अपने किसी आदमी की जान खतरे में नहीं डालूंगा। किसी को धोखे में रखकर आगे नहीं भेजूंगा।”

मैं भी नहीं चाहूंगा कि ऐसा हो।”

ये तो सच में समस्या वाली बात हो गई।” सरदार चिंतित हो उठा।

दोनों कुछ देर खामोश रहे।

तुम्हीं कुछ सोचो कि क्या हो सकता है। कैसे हम बाहर निकलेंगे?”

वो हीं तो सोच रहा हूं।”

मैं बस्ती के लोगों से इस बारे में बात करूंगा। शायद कोई हिम्मती दूसरों की खातिर जान गंवाना पसंद कर ले।”

“ये बेवकूफी होगी।”

होगी तो सही। तुम कोई और रास्ता निकाल लो तो किसी-न-किसी की तो जान बचेगी ही।” ।

“अभी तो मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा।” जगमोहन बोला–“पहले हम वो रास्ता खोलेंगे। उसके बाद ही कुछ सोचेंगे।”

“ठीक है, चलो। पहले वो रास्ता खोल...।” ।

“रास्ता खोलने में नानिया की जरूरत पड़ेगी। उसे आ लेने दो।”

रानी साहिबा की जरूरत पड़ेगी, भला उसकी क्या जरूरत है रास्ता खोलने में?”

“देख लेना।” जगमोहन ने कहा-“मैं रात-भर का जगा हुआ हूं। जब सोहनलाल और नानिया आएं तो मुझे नींद से जगा देना।”

सो रहे हो?”

हों। जरूरी है। कोमा को मुझसे दूर ही रखना। कहीं वो पास आकर, मेरी नींद खराब न कर दें।”

सरदार ने सिर हिला दिया।

 
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