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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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उसके बारे में भी इसी प्रकार लिखा आया। नाम–मोना चौधरी। जन्म स्थान दिल्ली।। कद–पांच फुट, सात इंच। पूर्वजन्म का नाम मिन्नो। इसी प्रकार पोतेबाबा ने एक-एक करके सबके बारे में जाना।

आखिरकार पोतेवावा कुर्सी से उठता कह उठा। “सब ठीक है।”

जग्गू, गुलचंद इनमें नहीं हैं।” उस व्यक्ति ने पूछा।

उनके बारे में अभी मुझे खबर नहीं। परंतु इतना जानता हूं कि वो दोनों, कालचक्र से निकलकर, जथूरा की जमीन पर आ पहुंचे हैं।”

पोतेबाबा नजरें दौड़ाता कह उठा–“गरुड़ कहां है?”

सुबह वो जिन्नों के महल में जाने को कहकर निकला था।” पोतेबाबा ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया। उस हाल को पार करके बो अन्य हाल में पहुंचा। वहां पर आठ-दस लोग ही थे।

“जथूरा महान है।” अपने काम में व्यस्त एक लाल वर्दी वाला उसे देखते ही कह उठा।

उस जैसा दूसरा कोई नहीं।” पोतेबाबा ने जवाब दिया। सबके साथ इसी प्रकार शुरुआती बात हुई।

मोमो जिन्न कहां है?” पोतेवाबा कुर्सी पर बैठे एक व्यक्ति के पास पहुंचकर बोला।

“वो पनडुब्बी में जथूरा की जमीन पर आ पहुंचा है अन्य सबके साथ।” उस व्यक्ति ने कहा “उसके साथ लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा हैं। वो तीनों उन सबको छोड़कर, कहीं चले गए हैं।”

पता करो, वो कहां हैं?” पोतेबाबा बोला।। उस व्यक्ति की उंगलियां बटनों से खेलने लगीं।

आधे मिनट के बाद ही स्क्रीन पर मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा नजर आए। जो कि तेजी से जंगल में आगे बढ़ते जा रहे थे। ये देखकर वो कह उठा।

“ये रहे, वो कहीं जा रहे हैं शायद। पता करता हूं कि वो किधर की दिशा में हैं।"

उसकी उंगलियां पुनः बटनों पर चलीं। तभी स्क्रीन पर लिखा आया। मोमो जिन्न सोबरा के इलाके की दिशा की तरफ बढ़ रहा है।

मोमो जिन्न तो उन दोनों के साथ सोबरा के इलाके की तरफ जा रहा है।” उसके होंठों से निकला।।

पोतेबाबा मुस्करा पड़ा। उस व्यक्ति ने गर्दन घुमाकर पोतेबाबा को देखा और पूछा।

क्या मोमो जिन्न को उस दिशा में जाने का कोई काम सौंपा गया है?”

“नहीं।”

तो वो उस तरफ क्यों जा रहा है?”

जाने दो उसे ।”

मोमो जिन्न का चैकअप करूं। कुछ गड़बड़ लग रही है। पोतेबाबा।”

कुछ मत करो। जग्गू और गुलचंद के बारे में पता लगाओ।” उनकी आखिरी स्थिति क्या थी?” ।

“वो दोनों कालचक्र से बाहर निकल आए हैं।” उस व्यक्ति की उंगलियां पुनः स्विचों पर चलने लगीं। पोतेबाबा शांत-सा खड़ा रहा। चेहरे पर सोचों के भाव थे। इसी प्रकार पांच मिनट बीत गए।

तभी उस व्यक्ति के होंठों से निकला।

ये रहे। ये तो तीन हैं।”

तीन कौन?”

तीसरी औरत है कोई ।” कहने के साथ ही उसने कोई स्विच दबाकर दो पल का इंतजार किया तो फिर स्क्रीन पर नानिया का चेहरा दिखने लगा, जो कि पसीने से भरा था। वो तेजी से आगे बढ़ती जा रही थी।

“मैं इस औरत को नहीं पहचानता।”

वो व्यक्ति बोला–“मैं नहीं...।”

ये कालचक्र की नानिया है। जिसे सोबरा ने रानी साहिबा बना रखा था।”

ओह, तो जग्गू और गुलचंद के साथ ये भी बाहर आ गई है।”

पता करो, क्या ये तीनों इसी तरफ आ रहे हैं?” पोतेबाबा ने कहा।

वो पुनः स्विचों के साथ खेलने लगा। मिनट-भर बाद बोला।

ये तीनों भी सोबरा की जमीन की तरफ बढ़ रहे हैं।”

“ये नहीं हो सकता।” पोतेबाबा के होंठों से निकला।

सैटलाइट तो ये ही सिग्नल दे रहा है।” पोतेबाबा की नजरें स्क्रीन पर जा टिकीं ।

एक बार फिर चैक करो।” मैं सही कह रहा हूं।”

‘हैरानी है कि ये क्यों सोबरा की जमीन की दिशा की तरफ जा रहे हैं।” पोतेबाबा ने कहा।

“इन्हें रोकें क्या?” पोतेबाबा के चेहरे पर सोंच के भाव उभरे।

इन पर आंधी छोड़कर इन्हें भटका देते हैं।” वो व्यक्ति बोला।

“अभी कुछ मत करो।” पोंतेबाबा ने कहा-“ये कब तक सोबरा की जमीन पर पहुंच जाएंगे?” ।

“रात तक। मेरे खयाल में नानिया ही इन्हें रास्ता दिखा रही है,

वो आगे चल रही है।” ।

“मैं सोच रहा हूं क्या ये सोबरा के पास पहुंचकर, जथूरा को कोई नुकसान पहुंचा सकते हैं?” पोतेबाबा ने कहा।

“इस बारे में तो आप ही बताएंगे।”

देवा-मिन्नों, नगरी की तरफ आ रहे हैं। हमें इनकी परवाह नहीं करनी चाहिए।”

मोमो जिन्न का सोबरा के पास जाना हैरानी वाली समस्या है



मोमो जिन्न की कोई समस्या नहीं।”

जग्गू और गुलचंद का क्या करूं?”

अभी इन्हें कुछ मत कहो। इन पर नजर अवश्य रखो।”

जो हुक्म।”

पोतेबाबा के चेहरे पर सोच के भाव थे।

“मुझे मखानी और कमला रानी के बारे में पता चला। इन दोनों के बारे में पहले कभी सुना नहीं।”

“कालचक्र का हिस्सा हैं ये।”

परंतु कालचक्र में इनका नाम कभी नहीं आया।”

भौरी और शौहरी को जानते हो?”

“अवश्य।”

भौरी और शौहरी ने जरूरत के मुताबिक इन दोनों को बाहरी दुनिया से इकट्ठा किया है।”

तो अब ये दोनों कालचक्र के बीच ही गिने जाएंगे?”

“हां। कालचक्र इन्हें स्वीकार कर चुका है। तुम जग्गू-गुलचंद, नानिया पर नजर रखो।” पोतेबाबा ने कहा और वहां से आगे बढ़ गया। उस हाल से बाहर निकला तो एक राहदारी में चल पड़ा। | सामने से जो भी आता ‘जथूरा महान है' के शब्दों के साथ आगे बढ़ जाता था।

पांच मिनट बाद कई राहदारियां पार करने के पश्चात पोतेबाबा नीचे जाते रास्ते की तरफ बढ़ गया, जो कि महल के नीचे तहखाने की तरफ जाता था। चौड़ा रास्ता, सुनसान था। नीचे जाकर रास्ता दाएं-बाएं दो भागों में बंट रहा था। पोतेबाबा दाईं तरफ वाले रास्ते पर बढ़ गया। ये रास्ता अब अंधेरे से भरा होने लगा।
 
आगे जाकर रास्ता एक तरफ मुड़ा तो बिल्कुल ही अंधेरे से भर गया। परंतू वहां पहले से ही मशाल दीवार पर लगे हुक में फंसी जल रही थी। उसकी रोशनी पर्याप्त थी वहां।। |ज्योंही पोतेबाबा ने मशाल को पार किया, तभी वहां पर कठोर आवाज गूंजी।

कौन है?”

“जथूरा महान है।” पोतेबाबा के होंठों पर शांत मुस्कान उभरी।

उस जैसा महान दूसरा कोई नहीं ।” वो ही आवाज कानों में पड़ी—“मुझे खुशी है कि आप वापस आ गए पोतेबाबा।”

वापस तो आना ही था।” आगे बढ़ता पोतेबाबा कह उठा।

“क्या देवा और मिन्नो को ला सके अपने साथ?”

“जथूरा का हाथ मेरी पीठ पर है तो क्यों न लाऊंगा उन्हें ।” पोतेबाबा ने कहा।

“ओह, ये तो अच्छी खबर है।”

रास्ते के अंत पर पहुंचकर पोतेबाबा ठिठका। सामने दीवार थी।

पोतेबाबा ने अपनी दाईं हथेली दीवार पर टिका दी। अगले ही पल दीवार में जैसे जान आ गई और वो दीवार धीरे-धीरे एक तरफ सरकतीं चली गई।

रास्ता बन गया। पोतेबाबा भीतर प्रवेश कर गया।

ये एक कमरा था। दीवार पर कई स्क्रीनें लगी थीं। जिनमें अलग-अलग तरह के दृश्य नजर आ रहे थे। उस गैलरी का दृश्य भी नजर आ रहा था, जहां से होकर, पोतेबाबा यहां तक पहुंचा था। चार-पांच लोग वहां पर काम कर रहे थे। तभी एक आदमी पास पहुंचकर, मुस्कराकर बोला।

“आपको सामने पाकर प्रसन्नता हुई।” ।

तुम्हें देखकर मुझे भी अच्छा लगा रातुला।” पोतेबाबा मुस्करा रहा था—“महाकाली के बारे में बताओ।”

वों वहीं है, जहां आप उसे रख गए थे।”

गई नहीं वहां से?”

“नहीं।”

पोतेबाबा सामने नजर आते रास्ते में बढ़ गया। वो आदमी पीछे चल पड़ा।

“अब तो आपको महाकाली की चिंता नहीं होनी चाहिए।” बों बोला।

क्यों?” क्योंकि देवा-मिन्नो, जथूरा की जमीन पर आ पहुंचे हैं।”

देवा-मिन्नो अपना काम पूरा करेंगे और मैं अपना। मैं अंत तक पूरी चेष्टा करूंगी कि महाकाली अपनी जिद छोड़ दे।”

वो नहीं मानेगी।” । पोतेबाबा ने कुछ नहीं कहा। आगे बढ़ता रहा वो। फिर नीचे जाने को सीढ़ियां दिखाई दीं तो पोतेबाबा नीचे उतरने लगा।

वो व्यक्ति सीढ़ियों के पास टिठकता कह उठा।

मैं आऊ क्या?” ।

नहीं।” पोतेबाबा नीचे उतरता बोला।

सीढ़ियां उतरकर पोतेबाबा थोड़ा-सा और चला और अंधेरे से भरे कमरे में जा पहुंचा। | कुछ पल खड़ा वो अंधेरे को देखता रहा फिर ऊंचे स्वर में बोला।।

*अंधेरे में क्यों बैठी है महाकालीं?”

तेरा अफसोस मना रही हूं।” औरत की बेहद तीखी आवाज वहां गूंजी।

नाराज लगती है।”

तू देवा-मिन्नो को ले आया।”

मैं तेरे से कहकर गया था कि देवा-मिन्नो को लेकर ही लौटुंगा।”

तूने ठीक नहीं किया।”

मैंने ठीक किया है।” पतेबाबा शांत स्वर मैं कह उठा_“रोशनी कर। जरा तेरे को देखें तो सही।”

उसी पल वो सारी जगह रोशन हो उठी।

वो हाल जैसा कमरा था। सामान के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं था। कमरे के बीचोबीच चकोर टेबल पर कांच का जार रखा था। उस जार में छोटी-सी मात्र ढाई इंच की बहुत खूबसूरत औरत टहलती दिखाई दे रही थी। | पोतेबाबा आगे बढ़ा और उस टेबल के पास पड़ी कुर्सी पर जा बैठा। नजरें जार पर थीं ।

जार में टहलती वो ठिठकी और गुस्से-भरी निगाह से पोतेबाबा को देखने लगीं।

“तू पहले की तरह ही खूबसूरत है।”

“तूने क्या सोचा था कि यहां रहकर मुरझा जाऊंगी।”

“तू स्वयं जार में होती तो अवश्य मुरझाजाती। परंतु ये तेरी परछाई है।”

“मुझे कैद करने के सपने मत देख पोतेबाबा। मैं किसी के हाथ नहीं आने वाली।”

तेरे जाने के यहां के सारे रास्ते खुले हैं। तू चली क्यों नहीं जाती?”

चालाकी वाली बातें मत कर। मैं इस तरह जाने वाली नहीं ।”

तो तवेरा को ले के जाएगी तू?"

हां। जथूरा की बेटी मुझे दे दे। फिर दोबारा कभी नहीं लौटुंगी।”

“इसके अलावा कुछ और मांग ले। पूरा कर दूंगा।”

तेरे को पता है कि मुझे कुछ और नहीं चाहिए। तवेरा ही चाहिए।”
 
कुछ खामोश रहकर पोतेबाबा कह उठा।

महाकाली। तेरी ये इच्छा कभी भी पूरी नहीं हो सकती।”

“तो फिर भूल जा कि जथूरा कभी आजाद होगा। मैं वो ही करूंगी, जो मुझे सोबरा ने कहा है।”

तू सोबरा के हुक्म की गुलाम है।”

“पागलों वाली बातें मत कर। मैं चाहूं तो अपना मनचाहा भी कर सकती हूं। जथूरा को आजाद कर सकती हूं।”

कर दे आजाद ।”

“तवेरा मुझे दे दे।”

“सम्भव नहीं है तेरी ये मांग। जथूरा की आजादी की एवज में तेरे को जो चाहिए मैं दूंगा, परंतु तवेरा नहीं।”

“बाकी सब कुछ मेरे लिए बेकार है।”

महाकाली की परछाई जार के भीतर से कह रही थी—“तवेरा विद्वान है। वो तंत्र-मंत्र को बहुत ही बेहतरीन तरीके से जानती है। मुझ जैसी जादूगरनी को तवेरा की ही जरूरत है। वो मेरी सहायता करेगी, तंत्र-मंत्र में। मुझ भी कुछ आराम मिलेगा।” महाकाली ने कहा। _

“पिता की आजादी की खातिर, बेटी को तेरा गुलाम बना दें। ये कैसे सम्भव है।”

“तू क्यों चिंता करता है पोतेबाबा। दे दे मुझे तवेरा। तू तो नौकर है जथूरा का।”

“मैं नौकर नहीं, जथूरा का रखवाला हूँ। उसकी आजादी के बदले तवेरा तेरे को नहीं दे सकता। तवेरा को सुरक्षित रखना मेरी ही जिम्मेवारी है। जथूरा ने मुझ पर जो भरोसा किया, उस पर खरा उतरना चाहता हूं।”

। “ऐसी नगरी का क्या फायदा, जिसका राजा 50 बरसों से बंदी बना हुआ हो।”

“जथूरा के बिना भी सब ठीक चल रहा है, तू चिंता न कर।” पोतेबाबा शांत स्वर में कह उठा–“देवा-मिन्नो आ चुके हैं अब तेरा खेल ज्यादा नहीं चलेगा। जाकर सोबरा से कह दे।” ।

“मैं क्यों कहूं सोबरा से। मेरा काम तो जथूरा को कैद रखना है। तू तवेरा दे दे, सब ठीक हो जाएगा।” ।

“बकवास मत कर ।” पोतेबाबा उठ खड़ा हुआ।

तेरी जिद तुझे ले डूबेगी।”

“धमकी देती है।”

देवा-मिन्नों आ गए हैं तो अब मैं चुप नहीं रह सकती।” महाकाली कह उठी।

“क्या करेगी?”

सीधा वार करूंगी तवेरा पर् ।”

वो तेरे बस का नहीं।”

तू मेरी ताकत को अच्छी तरह समझता है पोतेबाबा कि मेरे बस में क्या-क्या हैं।”

“तवेरा की ताकतें भी कम नहीं हैं।”

“मेरे से कम ही हैं। वो मेरा मुकाबला नहीं कर सकती।”

तेरे वार से तो बच सकती है।”

हर बार नहीं ।”

“मैं तो तेरे को समझाने आया था कि देवा-मिन्नो आ गए हैं। तू जथूरा को छोड़कर चली जा। अब तेरी खैर नहीं। परंतु तू मेरी बात नहीं समझ रही। मैं चाहता हूं कि झगड़ा न हो, परंतु तेरी जिद बुरा कर देगी महाकाली ।”

महाकाली हंस पड़ी।

“क्यों हंसी?”

“देवा और मिन्नो बच्चे हैं मेरे। मैं उन्हें चुटकी बजाकर, काबू में कर लूंगी। तू उनकी धौंस मत दे मुझे।”

पोतेबाबा पलटा और वापस चल पड़ा।

“तवेरा मुझे दे दे। फिर कभी मैं जथूरा के रास्ते में न आऊंगी। वादा करती हूं।”

तवेरा तुझे कभी नहीं मिलेगी।” जाते-जाते पोतेबाबा बोला। सुन तो।” पोतेबाबा ठिठककर पलटा और जार में मौजूद महाकाली की परछाईं को देखा।

“सोबरा को भी सबक सिखा दूंगी कि वो जथूरा से झगड़ा न करे। बस, तवेरा मुझे चाहिए।”

| पोतेबाबा ने कुछ न कहा और वहां से बाहर निकलता चला गया।

‘देवा-मिन्नो।' महाकाली बड़बड़ा उठी–‘कब से इंतजार था इन दोनों के आने का।

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पोतेबाबा लक्ष्मी के पास पहुंचा।

क्या पता किया तूने?”

‘गरुड़ की नजर तवेरा पर है।” लक्ष्मी बोली “शायद वो जथूरा का दामाद बनना चाहता है।”

उसके ये विचार हैं तो पछताएगा।” पोतेबाबा ने कठोर स्वर में कहा-“गलत इरादे हैं उसके।”

लक्ष्मी कुछ न बोली। उसे देखती रही। तवेरा के इरादे, गरुड़ के बारे में क्या हैं?”

“तवेरा का गरुड़ के बारे में कोई इरादा नहीं लगता।” लक्ष्मी ने कहा।

“ठीक हैं। गरुड़ को समझाने की चेष्टा करूंगा।”

“वो न समझा तो?” ।

तो उसकी परवाह न करके, उसे कैद में डालना होगा।”

वो आपके बाद जथूरा का सर्वश्रेष्ठ सेवक है।”

इससे उसे इस बात की आज्ञा नहीं मिल सकती कि बो तवेरा पर नजर रखे। जथूरा पास में होता तो मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं था। परंतु अब तवेरा की देखभाल की जिम्मेवारी मुझ पर है। मेरा फर्ज है कि जथूरा की गैरमौजूदगी में सब ठीक रखें।”

“वो आप रख ही रहे हैं।”

“तवेरा का मामला भी ठीक रखना मेरा फर्ज हैं। गरुड़ को मैं इस तरह की कोई इजाजत नहीं दे सकता।” पोतेबाबा ने गम्भीर स्वर में कहा—“तुम मुझे खाना खिलाओ, उसके बाद मैं गरुड़ से मिलूंगा।”

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तवेरा।। जथूरा की बेटी।

उसने तंत्र-मंत्र की विद्या में महारथ हासिल कर रखी थी। परंतु वो महारथ, महाकाली के मामले में कम थी । सोबरा ने जथूरा को कैद करके, महाकाली को पहरे पर बैठा रखा था।

तवेरा परेशान रहती थी, अपने पिता, जथूरा की आजादी को लेकर।।

उसने जथूरा को आजाद कराने के कई प्रयत्न किए थे, परंतु महाकाली के आगे उसकी एक न चली।

पचास बरस बीत गए थे, ये सब होते-होते। परंतु तवेरा ने हौंसला न छोड़ा था।

इस वक्त भी वो एक कमरे में, जथूरा से बात करने के लिए, किसी मंत्र को बड़बड़ा रही थी। वो खूबसूरत थी। ऐसी कि देखने वाला देखता रह जाए। परंतु अपने पिता के बारे में इस कदर चिंतित थी कि अपने बारे में सोचने की उसके पास फुर्सत ही नहीं थी। वो हमेशा अपने पिता को आजाद कराने की उधेड़-बुन में लगी रहती। जिस कुर्सी पर वो बैठी थी, वो एकाएक कांपी। जोरों से हिली । तवेरा के होंठों से निकलने वाले मंत्र रुक गए। उसकी निगाह सामने एक फूल पर जा टिकी, जो कि धीरे-धीरे अपना रंग बदलने लगा था। तवेरा के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। तभी उसके कान में जथूरा का तेज स्वर पड़ा।

कौन है?”

मैं हूं पिताजी। मैं तवेरा।” तवेरा का स्वर् कांप उठा था।

“ओह तुम। तुमसे कितनी बार कहा है कि मंत्रों की धार पर मुझसे इस तरह बात मत किया करो। मुझे तकलीफ होती है। पहले से ही महाकाली मुझे बहुत तकलीफें देती है। अब और नहीं सहा जाता।” जथूरा का स्वर वहां गूंज उठा था।

आप तो बहुत बहादुर हैं पिताजी । हिम्मत कब से हारने लगे।”

450 बरसों की कैद ने मुझे थका दिया है।”

“आप हिम्मत रखिए।”

वों ही तो अब नहीं रही।” तवेरा के चेहरे पर दर्द के भाव आ ठहरे।

आप मुझे भी नहीं बताते मैं कैसे आपको आजाद कराऊं?” तवेरा बोली।

फूल बराबर रंग पर रंग बदले जा रहा था।

“मैं नहीं जानता। महाकाली ने सारे रास्ते सख्ती से बंद कर रखे हैं। वो बहुत कठोर है।”

“सोंबरा के आदेश पर, महाकाली ने आपको कैद किया है। मैं सोबरा से बात करूं क्या?”

कोई फायदा नहीं होगा।”

पोतेबाबा से कहूं कि वो सोबरा से बात करे।”

नहीं। बात का वक्त अब रहा ही नहीं।” जथूरा की आवाज में तकलीफ के भाव थे—“मैं नहीं जानता था कि कालचक्र को पकड़ लेने की मुझे ये सजा मिलेगी। तब सोबरा ने कहा था परंतु मैं नहीं माना। सोचा व झूठ कहता है।”

“आपको आजाद कराने का एक रास्ता है पिताजी।” तवेरा ने सोच-भरे स्वर में कहा।

“बोल बेटी।” ।

“महाकाली चाहती है कि मैं उसके साथ उसके काम में शामिल हो जाऊँ।” ।

“कभी नहीं। मैं तुझे बुरी जिंदगी जीने की इजाजत कभी नहीं दूंगा।” जथूरा का तड़प-भरा स्वर सुनाई दिया–“तू महाकाली की ये बात कभी नहीं मानेगी। तेरे को अपनी मर्यादा में रहना होगा।”

मैं आपके कहे के बाहर कभी नहीं जाऊंगी।”

मुझे आजाद करा...मुझे...ठहर, महाकाली आई है।” उसके बाद वहां खामोशी छा गई। सामने पड़ा फूल बराबर रंग बदले जा रहा था। तवेरा की निगाह फूल पर टिकी हुई थी। चेहरे पर गम्भीरता थी।

लम्बी खामोशी के बाद जथूरा की आवाज सुनाई दी। महाकाली चली गई। वो कुछ नया बताकर गई है।”

“क्या?"

“देवा और मिन्नो मेरी जमीन पर आ पहुंचे हैं।”

न...हीं...5-5-5।” तवेरा की आवाज कांप उठी। वो झूठ क्यों कहेगी।” ये तो आपके लिए खुशी की बात है पिताजी, देवा और मिन्नो...।”

“मेरे लिए खुशी का दिन वो होगा, जब मैं आजाद हो जाऊंगा।”

आप...आप आजाद हो जाएंगे। पोतेबाबा नहीं लौटा। वो आ गए...।”

पोतेबाबा भी आ गया है।” जथूरा की आवाज सुनाई दी।

“ओह, और मुझे खबर नहीं । आप आराम कीजिए पापा। मैं अब आपको आजाद कराकर रहूंगी। देवा-मिन्नों के आने का ही तो इंतजार था। वो दोनों...।”

महाकाली को कम मत समझ ।”

“मैं उसे कम नहीं समझ रही। वो...” ।

देवा-मिन्नो भी चूक सकते हैं। ये जरूरी नहीं कि वो दोनों उस तिलिस्म को तोड़ने में सफल हो ही जाएं। वो भी मर सकते हैं। रास्ते में पग-पग में खतरे भरे पड़े हैं।” जथूरा की आवाज में थकान थी।

“आप आराम कीजिए पिताजी ।”

तू अपनी जिंदगी जी तवेरा। मेरी फिक्र मत कर। मैं तो...।”

तवेरा ने पूरी बात सुनी ही नहीं और हाथ आगे बढ़ाकर फूल को छू लिया।
 
फूल का रंग बदलना उसी पल थम गया। इसके साथ ही जथूरा से बातचीत का सम्बंध खत्म हो गया था। तवेरा उठी और आगे बढ़कर कमरे का बड़ा-सा दरवाजा खोला। बाहर दो सेविकाएं खड़ी थीं।

पोतेबाबा को संदेश भेजो कि मैं मिलना चाहती हूं।”

क्या वो आ पहुंचे हैं?”

हो।” एक सेविका फौरन सिर हिलाकर, वहां से चली गई।

“अब तुम भीतर आ सकती हो।” तवेरा ने दूसरी सेविका से कहा और भीतर चली गई।

सेविका ने भीतर प्रवेश करते हुए कहा।

जब आप कमरे में बंद थीं तो गरुड़ आया था।”

वों बार-बार मेरे पास आने की चेष्टा क्यों करता है?” तवेरा ने नाराजगी से कहा।

“आप खूब समझती हैं।”

लेकिन मुझे ये सब बातें पसंद नहीं। अबकी बार आए तो उसे कह देना।” ।

“जरूर कह दूंगी। अब तो देवा-मिन्नो आ गए हैं। आपके पिता कैद से आजाद हो जाएंगे?”

“जरूर आजाद हो जाएंगे।” तवेरा दृढ़ स्वर में कह उठी। “वों दिन कितना खुशी से भरा होगा जब...।”

“मुझे उस कमरे में जाना होगा।” एकाएक तवेरा बोली-“महाकाली से दोटूक बात करनी है कि...।” ।

“मैं आ गई तवेरा।” तभी वहां महाकाली की आवाज गूंज उठी। तवेरा और सेविका की नजरें घूमी। परंतु महाकाली कहीं भी न दिखी। “मुझे ढूंढ़ तो जानू ।” महाकाली का खिलखिलाने का स्वर गूंजा।

ये खेल खेलने का वक्त नहीं है।” तवेरा कठोर स्वर में बोली-“तेरे खेल अब ख़त्म होने जा रहे हैं।”

“खूब तो तू मेरे खेल खत्म करेगी।”

“कोई भी करे, तेरा खेल खत्म हो के ही रहेगा।” तवेरा का स्वर कठोर ही रहा।

मैं कुर्सी पर बैठी हूं।”

तवेरा और सेविका की निगाह कुर्सी की तरफ उठीं। वहां पर ढाई इंच की छोटी-सी, महाकाली दिखाई दी। “तूने अपनी परछाई भेजी है। स्वयं नहीं आई।”

क्या करूं, बहुत व्यस्त हूं। इसलिए अपनी परछाई को भेज दिया।”

तभी तवेरा ने होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदाया।

उसी पल ढाई इंच की महाकाली की परछाई कुर्सी से उछलकर नीचे जा गिरी।।

तूने मुझे कुर्सी से क्यों उतारा?” महाकाली की आवाज गूंजी।

तवेरा आगे बढ़ी और उसी कुर्सी पर बैठते हुए कह उठी।

“तू कुर्सी पर बैठने के काबिल नहीं है। मेरी कुर्सी पर बिल्कुल ही नहीं।”

ढाई इंच की महाकाली की परछाई, सिर उठाए, कुर्सी पर बैठी तवेरा को देखती रही फिर बोली।

तू तंत्र-मंत्र की विद्या में बहुत तेज है। परंतु वो विद्या तेरे किस काम की ।”

| क्यों?”

“विद्या का इस्तेमाल करने का मौका तो तुझे मिलता नहीं। तू मेरे पास आ जा। मैं तेरे को और भी तेज बना देंगी।”

फिक्र मत कर। तवेरा कड़वे स्वर में बोली-“मेरे को अब जल्द ही मौका मिलेगा।”

सेविका शांत-सी खड़ी थी।

अच्छा—वो कैसे?”

“तिलिस्म तोड़ने देवा और मिन्नो आ पहुंचे हैं। मैं उनके साथ रहूंगीं ।”

महाकाली हंस पड़ी।

“तो ये बात है। आज की बच्ची है तू और मेरे से मुकाबले की सोच रहीं है।”

तवेरा के होंठ भिंचे रहे।

जवाब दे तवेरा।”

मेरे पिता को छोड़ दे। अब तेरी भलाई इसी में है।” तवेरा बोली।

तो तू मुकाबले का फैसला कर चुकी है।”

“हो ।”

मैं तेरी जान नहीं लेना चाहती। अगर तूने मेरा मुकाबला किया तों, तुझे मारना पड़ेगा।”

“मैं तेरा मुकाबला करूंगी। देवा- मिन्नों आ चुके हैं। उन्हीं के इंतजार में तो मैं कब से बैठी थी।”

“देवा-मिन्नों मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। वो दोनों अपनी जान गंवा बैठेंगे।”

। “मेरे पिता की आजादी की चाबी उन दोनों के पास है।”

मैं उन्हें वहां तक पहुंचने दूंगी तब न?” महाकाली के हंसने की आवाज आई।

तवेरा ने होंठ भींच लिए।

बेवकूफ हो तुम सब। तू मेरे पास आ जा। उसके बाद सब ठीक हो जाएगा। जथूरा को मैं आजाद कर देंगी ।”

कभी नहीं ।”

तो अब हमारा मुकाबला पक्का है तवेरा?”

हां।”

बच्चों से मुकाबला करना मुझे अच्छा नहीं लगता। अब तू नहीं मानती तो मैं क्या करूं।” ।
 
“मैं कितनी बच्ची हूँ ये तू जानती है, तभी तो मेरा साथ पाने को मरी जा रही है।” तवेरा गुस्से से कह उठी–“अब तक तो मैं इसलिए खामोश थी कि अकेली थी मैं, परंतु अब...।”

देवा-मिन्नो आ गए हैं।” महाकाली ने व्यंग्य से शब्दों को पूरा किया। ।

“हाँ। अब मैं तेरा मुकाबला करने की कोशिश तो कर ही सकती

" “नादान है, भुगतेगी।” इसके साथ ही महाकाली की परछाई गायब हो गई।

तवेरा होंठ भींचे कुर्सी से उठी और टहलने लगी।

महाकाली नहीं मानेगी।” सेविका कह उठी।

बेशक मत माने। लेकिन मैं उसका मुकाबला जरूर करूंगी।” तवेरा दांत भींचे कह उठी।

वो ताकतवर है।” तवेरा ने सेविका को देखा और पूर्ववतः स्वर में बोली।

बेशक वो ताकतवर है मुझसे। परंतु मुझे हराने के लिए उसे काफी मेहनत करनी पड़ेगी।”

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गरुड़!

पच्चीस बरस का तेज-तर्रार युवक। (जैसा कि आप सब जानते हैं कि पूर्वजन्म के लोगों की उम्र ठहर चुकी है। पूर्व उपन्यासों में इस बात को आप पढ़ चुके हैं।) चुस्त-चालाक। हर काम को जैसे जल्द पूरा कर देना चाहता हो। वो पोतेबाबा के बाद, जथूरा का सर्वश्रेष्ठ सेवक था।

गरुड़ ने महल में अपने कमरे में प्रवेश किया और ठिठक गया। एक सेवक कमरे की साफ-सफाई कर रहा था।

तुम जाओ। अभी कुछ देर मैं आराम करना चाहता हूं।” गरुड़ ने सेवक से कहा।

“जी। पोतेबाबा आपको याद कर रहे हैं।”

गरुड़ ने हौले-से सिर हिलाया।

कहां हैं वो?

” पीछे वाले हॉल में।” सेवक बोला।

उनसे कहो, मैं अभी आता हूं।”

सेवक बाहर निकल गया। गरुड़ ने दरवाजा बंद किया और कमरे में नजरें दौड़ाईं।

फिर आगे बढ़ा और अलमारी खोलकर उसने जिल्द वाली एक किताब निकाली और उसे खोला। किताब के पन्ने बीचोबीच चकोर मुद्रा में कटे हुए थे और वहां माचिस की डिब्बी के आकार का छोटा-सा यंत्र रखा था। जिस पर सफेद रंग के बटन लगे हुए थे। गरुड़ उस किताब को थामे कुर्सी पर आ बैठा और यंत्र में लगे बटनों में से एक-एक करके चार बटनों को दबाया तो यंत्र के बीच में से रोशनी निकलने लगी।

चंद पलों बाद यंत्र के बीच में बारीक-सी आवाज आई। तुमने बहुत दिनों से बात नहीं की गरुड़?”

“मैं बहुत व्यस्त था सोबरा ।” गरुड़ ने धीमे स्वर में कहा।

“तवेरा को लेकर तुम कहां तक पहुंचे?”

अभी तक मैं तवेरा को अपने प्यार के शीशे में नहीं उतार सका। मैंने कोशिश की, परंतु इन बातों की वो परवाह नहीं करती।”

“तुमने ये बताने के लिए मुझसे बात की ।” यंत्र से निकलती सबरा की आवाज में तीखापन आ गया।

“नहीं, मैं...।” ।

“गरुड़।” सोबरा की आवाज कानों में पड़ी_“मेरी खामोश कोशिश के बाद ही तुम जथूरा की नगरी में अपनी जगह बना सके हो। तुम आठ साल के थे तो तुम्हें जथूरा की नगरी में छोड़ दिया गया था। उसके बाद मेरे साथी चुपचाप तुम्हारी सहायता करते रहे। जहाँ आज तुम हो, वहां तक पहुंचाने में, मेरा ही हाथ है।”

मैं जानता हूं।”

“तुम्हें छोटा-सा काम कहा था कि तवेरा को प्रेमजाल में फंसा लो, परंतु तुम असफल रहे।

“मैं असफल नहीं हुआ। कोशिश चल रही है मेरी।”

“मुझे काम पूरा चाहिए गरुड़। इसमें तुम्हारा भला है। तुम जथूरा की नगरी के मालिक बन जाओगे तवेरा से ब्याह करके, परंतु मेरे अधीन रहोगे। मैं चाहता हूं जथूरा का सब कुछ मेरे पास आ जाए।”

“जरूर आएगा आपका सेवक ऐसा कर दिखाएगा।”

“मुझे सफल लोग पसंद आते हैं। तुम भी सफल बनो।”

अवश्य ।”

कोई और बात?”

देवा और मिन्नो आ पहुंचे हैं जथूरा की जमीन पर । महाकाली ने उन दोनों के नाम से ही तिलिस्म बांधा था।”

तब महाकाली ने सोचा था कि देवा और मिन्नो कभी भी इकट्टे नहीं हो सकेंगे। क्योंकि दोनों इस जन्म में एक-दूसरे के दुश्मन हैं। परंतु पोतेबाबा अपनी चालाकियों का इस्तेमाल करके दोनों को यहां तक ले आया है।” सोबरा की आवाज आई।

बुरा हुआ ये।”

हां। तिलिस्म टूट गया तो बुरा होगा। जथूरा आजाद हो जाएगा।”

बताइए मैं क्या करूं?” पोतेबाबा अब क्या करने जा रहा है?”

“मैं नहीं जानता। अभी पोतेबाबा से मेरी मुलाकात नहीं हुई।”

ये जानो कि वो क्या करेगा अब और मुझे बताओ।”

“ठीक है।”

देवा-मिन्नों महल तक आ गए हैं?" ।

“नहीं। अभी वे महल तक नहीं पहुंचे।”

तुम्हें सबसे पहले पोतेबाबा से मिलना चाहिए था, ताकि उसके दिल की बात जानो।”

“मैं अभी ऐसा ही करता हूं।” गरुड़ ने किताब को चेहरे के पास रखा हुआ था—“मैं कुछ कहना चाहता हूं।”

कहो।” देवा-मिन्नो को खत्म कर दें तो...।” ।

समझदारी की बातें करो गरुड़। देवा-मिन्नो पर इस वक्त जथूरा के सेवक सैटलाइट द्वारा नजर रख रहे होंगे।”

“ओह।”

“तैश में कदम मत उठाओ। संभलकर चलो।”

“ठीक है।”

पोतेबाबा की टोह लेकर मुझे बताओ और तवेरा को अपने प्यार के जाल में फंसाओ।”

“मैं ऐसा ही करूंगा।”

“करूंगा नहीं, करके दिखाओ।”

जी।”

“मुझे तुमसे बहुत आशाएं हैं गरुड़। मैंने सोच रखा है कि मेरे वारिस तुम हीं बनोगे। मैंने शादी नहीं की। औलाद नहीं है। अब अपनी औलाद का चेहरा मैं तुममें देखता हूं गरुड़। खुद को साबित करके दिखाओ।”

अवश्य।” उसके बाद किताब में फसे यंत्र में से कोई आवाज नहीं आई।

गरुड़ ने किताब बंद की और वापस अलमारी में रखकर, अलमारी बंद की।

“चेहरे पर गम्भीरता थी। आंखों के सामने तवेरा का खूबसूरत चेहरा नाच रहा था।

दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकला और आगे बढ़ गया।
 
कुछ देर में ही उसने एक मीडियम साइज के हॉल में प्रवेश किया। | सजावट से भरा हॉल था ये। आरामदेह कुर्सियां लगी हुई थीं। लेटने के लिए गद्देदार बैड थे।

सामने ही पोतेबाबा एक कुर्सी पर बैठा था। गरुड़ को देखकर मुस्कराया पोतेबाबा और उठ खड़ा हुआ। | गरुड़ तब तक पास आ पहुंचा था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। । “ओह, पोतेबाबा, आपको सामने पाकर मुझे बहुत खुशी महसूस हो रही है। गरुड़ कह उठा।

दोनों गले मिले।

“कैसे हो मेरे बच्चे?"

गरुड अलग होता कह उठा। *आपके आशीर्वाद से मैं खुश हूं।” दोनों कुर्सियों पर बैठे।

मुझे तुम पर गर्व है गरुड़ कि तुमने मेरे पीछे से सारा काम बखूबी संभाला।” पोतेबाबा मुस्कराकर कह उठा।

क्यों न संभालूंगा। आपसे ही तो शिक्षा ली है सब कामों की ।” गरुड़ ने हंसकर कहा।

“शिक्षा तो मैने बहुतों को दी, परंतु सबसे काबिल तुम रहे।”

“मेरे बारे में आप ऐसा सोचते हैं तो मेरे लिए खुशी की बात है।” गरुड़ ने कहा।

तुमसे शिकायत भी है।”

“क्या?”

“तुमने कई बार तवेरा से मिलने की चेष्टा की, मिले भी।”

“तवेरा से मिलना मैंने जरूरी समझा।” गरुड़ सहज ढंग से कह उठा–“मैंने सोचा कि वो खुद को अकेली महसूस कर रहीं होगी। जथूरा, महाकाली की निगरानी में कैद है। आप दूसरी दुनिया में थे तो इसलिए...।” ।

“यहां के नियम के मुताबिक तवेरा से तभी मिला जा सकता है, जब वो स्वयं बुलाए।”
 
“यहां के नियम के मुताबिक तवेरा से तभी मिला जा सकता है,

जब वो स्वयं बुलाए।”

जानता हूं।”

“तो तुम्हें उसके पास नहीं जाना चाहिए था।”

“मैं तो तवेरा की बेहतरीं पूछने गया था। अंजाने में अगर मुझसे गलती हो गई हो तो मैं क्षमा चाहता हूं।” पोतेबाबा गरुड़ को देखता रहा।

मुझे क्षमा कर दीजिए पोतेबाबा।” गरुड़ पुनः बोला।

क्षमा किया।” पोतेबाबा के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।

आपका दिल बहुत बड़ा है।” गरुड़ कह उठा।

अब सच बोलो गरुड़।” पोतेबाबा बेहद शांत स्वर में बोला–“तवेरा के लिए तुम्हारे मन में क्या है?”

गरुड़ ने पोतेबाबा को देखा। पोतेबाबा की निगाह उसके चेहरे पर थीं। बोलो।” पोतेबाबा ने शांत स्वर में कहा।

वो मुझे अच्छी लगती है।”

अच्छी से मतलब?”

मैं उससे ब्याह करना चाहता हूं।”

“तुम जानते हो कि ये सम्भव नहीं ।

” गरुड़ खामोश रहा।

“जथूरा कैद में है। तवेरा की जिम्मेवारी मुझ पर है। जथूरा यहां होता तो तुम ये बात जथूरा से कह सकते थे।”

क्या अब ये बात मैं आपसे नहीं कह सकता।”

मुझे तवेरा के ब्याह का फैसला लेने का अधिकार नहीं ।”

तवेरा को है?” ।

“अवश्य । वो अपना कोई भी फैसला लेने के लिए आजाद है

“तों मुझे तवेरा के करीब जाने का मौका मिलना चाहिए। इससे शायद मैं उसे तैयार कर सकें।”

“क्या उसके मन में तुम्हारे लिए कुछ है?”

शायद नहीं। मैं तो अपनी कोशिश कर...।”

बेहतर होगा कि अब तुम तवेरा के करीब मत जाओ।” पोतेबाबा के स्वर में आदेश के भाव थे।

ये तो ज्यादती है मेरे साथ।”

मेरी बात तुम्हें माननी पड़ेगी गरुड़।”

*आपका आदेश मैं जरूर मानूंगा।” गरुड़ ने बेहद शांत स्वर में कहा।

तुम अच्छे बच्चे हो। मैं तुम्हें पसंद करता हूं।” गरुड़ पोतेबाबा को देखकर शांत भाव में मुस्कराया। “अब हम कुछ दूसरी बातें कर लें?”

*अवश्य पोतेबाबा” गरुड़ ने सिर हिलाया—“मैं मोमो जिन्न के बारे में कुछ कहना चाहूंगा।”

“कहो।”

मैं अभी जिन्नों के महल में होकर आया हूं। वहां खबर मिली कि मोमो जिन्न लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा को लेकर, सोबरा की जमीन की दिशा की तरफ जा रहा है। उस स्थिति में मैंने मोमो जिन्न की स्थिति का निरीक्षण किया तो पता चला कि उसके भीतर इंसानी इच्छाएं मौजूद हैं।”

पोतेबाबा मुस्कराया।

ये हैरानी की बात है कि उसके भीतर इंसानी इच्छाएं हैं।” तो तुमने क्या किया?”

तब तक मुझे आपके आ जाने की खबर मिल चुकी थी। मैंने सोचा कि इस बारे में आपसे बात कर लें। क्योंकि मोमो जिन्न जिस दूसरी दुनिया से लौटा है, वहां आप भी थे। कहीं आपने उसके भीतर इंसानी इच्छाएं किसी योजना के तहत डाली हों ।”

“तुम्हारा विचार बिल्कुल सही है। मैंने ही उसके भीतर इंसानी इच्छाएं डाली हैं।”

क्यों?” ।

ताकि वो डर जाए कि अब जथूरा के सेवक उसे मार देंगे और यहां पहुंचते ही बचने के लिए वो सोबरा की तरफ भाग जाए।”

“ये आप क्या कह रहे हैं। मोमो जिन्न् हमारा काबिल जिन्न है, उसे आप...।”

काबिल है, तभी तो उसे मोहरा बनाकर चाल चली है मैंने।”

कैसी चाल?” ।

टापू पर कमला देवी और मखानी को खत्म करना था, ताकि देवा-मिन्नो के बीच की लड़ाई रुक सके। मैं जानता था कि मोमो जिन्न के भीतर जागी इच्छाएं, उन दोनों को लड़ने से रोकेंगी। ऐसा ही हुआ। मोमो जिन्न ने सपन चड्ढा और लक्ष्मण दास के द्वारा कमला रानी और मखानी की हत्या करवा दी। उसी के बाद तों मोमो जिन्न सबको पनडुब्बी पर लेकर आया और वे यहां पहुंचे।” पोतेबाबा ने कहा।

ये आदेश तो आप मोमो जिन्न को यूं भी दे सकते थे।”
 
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