• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
तभी कमला रानी की निगाह देवराज चौहान पर पड़ी। देवराज चौहान उसे ही देख रहा था। कमला रानी ने मुस्कराकर आंख दबा दी। देवराज चौहान ने गहरी सांस ली और मुंह फेर लिया।

'हाथ नहीं रखने देगा। नखरे वाला है।' कमला रानी बड़बड़ा उठी।

तभी मोना चौधरी देवराज चौहान के पास पहुंची।

"मैं सोच रही हूं कि हमें महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के बारे में खास जानकारी नहीं है।"

“पोतेबाबा खास कुछ नहीं बता पाया।" देवराज चौहान ने कहा।

“ऐसे में हमारे लिए खतरे बढ़ जाएंगे...हमें...।"

“तुम नीलकंठ से तिलिस्मी पहाड़ी के बारे में जानकारी ले सकती हो।”

मोना चौधरी ने देवराज चौहान को देखा। देवराज चौहान की निगाह मोना चौधरी पर थी। “तुमने ठीक कहा। कल पूछंगी नीलकंठ से।”

"वो कैसे आएगा तुम्हारे पास?"

“मन-ही-मन पुकारूंगी तो वो आ जाएगा। यही बात उसने मेरे मन में डाली थी।"

/

देवराज चौहान ने स्नानघर वाली दिशा की तरफ देखकर कहा। “पोतेबाबा कमला रानी और मखानी से कोई बेहद खास बात करके गया है।"

"तुम कैसे कह सकते हो?"

“इस वक्त पोतेबाबा का आना इसी बात की तरफ इशारा करता है।"

“मैं मालूम कैसे करूं दोनों से?"

"कोई फायदा नहीं। वे बताने वाले नहीं।” देवराज चौहान ने इंकार में सिर हिलाया।

- “तुम्हें क्या लगता है कि पोतेबाबा हमसे कुछ छिपा रहा है?" मोना चौधरी बोली। ____

"मैं तो इतना जानता हूं कि वो हमें अपने काम के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये बात जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते। क्योंकि पूर्वजन्म में आने के बाद हम तभी वापस जा सकते हैं, जब यहां का कोई बिगड़ा काम संवार दें।" __

“ये नियम किसने बनाया?"

“मैं नहीं जानता। परंतु हमारी वापसी के दरवाजे तभी खुलेंगे, जब हम जथूरा को आजाद करा लेंगे।"

“माना कि न आजाद करा सके तो?"

"तब के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। जो भी हो, हमें सफल होने की पूरी चेष्टा करनी है।”

जगमोहन, सोहनलाल और नानिया सुबह जब उठे तो दिन निकल आया था। कुछ खास छेदों में से होकर सूर्य की किरणें भीतर

आ रही थीं।

“हम देर तक सोए रहे।” जगमोहन बोला। सोहनलाल ने नानिया को देखा। दोनों की नजरें मिलीं।

नानिया मुस्करा पड़ी। उसके चेहरे पर सुबह की खूबसूरती चमक रही थी। ___

“कम-से-कम सुबह के वक्त का तो खयाल कर लो।” जगमोहन कह उठा।

"हम गुड मॉर्निंग कर रहे हैं।” सोहनलाल ने जगमोहन से कहा।

"ऐसे होती है गुड मॉर्निंग।” ।

“तुम भी प्यार करना सीख लो, तो गुडमॉर्निंग करना जान जाओगे।” सोहनलाल मुस्करा पड़ा।

“तुम्हारा दोस्त चिढ़ता क्यों है हमारे प्यार से?" नानिया कह उठी।

"चिढ़ता नहीं है।"

"चिढ़ता है।"

"ये इसकी सामान्य हरकत है, जिसे तुम चिढ़ता महसूस कर लेती हो।” सोहनलाल ने कहा।

“सच में बहुत अजीब है तुम्हारा दोस्त।"

"प्यार के रंग से दूर है, इसलिए ।”

“तुम सीधे हो जाओ सोहनलाल ।” जगमोहन कह उठा—“एक औरत के चक्कर में तुम पूरी तरह बिगड़ गए हो।"

“सुना।” नानिया तीखे स्वर में कह उठी—“कहता है, मैंने तुम्हें बिगाड़ दिया है।"

"तुम इसकी बातों की परवाह मत करो। ये इसी तरह की बातें करता है।"

जगमोहन खड़ा होता कह उठा।

"हमें नहा-धोकर, सोबरा से मिलना है। ताकि उसे बता सकें कि हमने देवराज चौहान को समझाने का फैसला कर लिया है।"

तभी एक युवती ने भीतर प्रवेश किया।

"जाग गए आप लोग। मैं सोबरा के आदेश पर आपको जगाने ही आई थी।” वो बोली। ___

“हम सोबरा से मिलना चाहते हैं।" ____

“अवश्य, परंतु पहले नहा-धोकर कुछ खा लीजिए। उसके बाद ही सोबरा से मुलाकात होगी।" उसने कहा।

“नहाना-खाना जरूरी है क्या?" जगमोहन बोला।
 
"ये सोबरा का आदेश है। चूंकि आप हमारे मेहमान हैं, इसलिए सेवा-सत्कार पूरा करना चाहते हैं हम।” ।

“तुम जाओ। नहाकर हम तुम्हें आवाज दे लेंगे।” सोहनलाल ने कहा।

वो बाहर चली गई।

"देवराज चौहान और बाकी सब, अब तक महाकाली की पहाड़ी की तरफ चल पड़े होंगे?" सोहनलाल बोला। ___

"हां, मेरे खयाल में उनका सफर शुरू हो चुका होगा।" जगमोहन ने कहा। ___

“सोबरा के महल में रहने का मजा ही नया है।” नानिया कह उठी—“सोहनलाल।"

"हां" “

क्या तुम मेरे लिए ऐसा महल नहीं बनवा सकते।"

"महल?" सोहनलाल अचकचाया।

“ले ले प्यार का मजा।”

"फिर चिढ़ गया ये मेरी बात से।” नानिया ने मुंह बनाकर कहा।

"ये तो पागल है।"

जगमोहन मुस्कराकर सोहनलाल को देखे जा रहा था।

“सोहनलाल तुमने जवाब नहीं दिया मेरी बात का?" नानिया ने कहा। __

“हमारी दुनिया में लोग छोटे-छोटे घरों में रहते हैं। महलों में नहीं रहते।” सोहनलाल ने कहा।

“कोई बात नहीं। मैं छोटे घर में रह लूंगी। तुम्हारे साथ तो मैं झोंपड़ी में भी रह लूंगी।"

"क्या कहने।” जगमोहन मुस्कराकर बोला—“ये तो... ।”

"सोहनलाल ये फिर...."

“धीरे-धीरे इसे, तुम्हारी आदत पड़ जाएगी। तब ये ठीक हो जाएगा। तुम इसकी मत सुना करो।"

वो युवती नाश्ते के पश्चात उन तीनों को महल की बैठक में ले गई। वहां सोबरा पहले से ही मौजूद था।

उन्हें देखकर सोबरा मुस्कराकर बोला।

“आशा है मेरे महल में तुम तीनों को सुख से भरी नींद आई होगी।"

"सच में।” सोहनलाल ने कहा। सोबरा के इशारे पर युवती वहां से चली गई।

"बैठ जाओ।" कहने के साथ सोबरा भी आरामदेह कुर्सी पर जा बैठा।

वो तीनों बैठ गए तो सोबरा मुस्कराकर बोला।

“अब तुम लोग ये बताने वाले हो कि तुम लोग देवा-मिन्नो को समझाने को तैयार हो।"

"तुम्हें कैसे पता?" जगमोहन के होंठों से निकला।

"मैंने रात तुम लोगों की बातें सुनीं।”

"ओह।"

"तो तुमने सब इंतजाम कर रखे हैं।” सोहनलाल बोला।

"मेरे लिए ये जानना जरूरी है कि मेरे महल में ठहरे मेहमान, मेरे बारे में कैसे विचार रखते हैं।" ___

“हमने तुम्हारे बारे में तो कोई गलत बात नहीं कही।” जगमोहन ने कहा।

“जानता हूं, परंतु चालाकी कर रहे हो कि यहां कैद में रहने से अच्छा है कि महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश पा लिया जाए, ताकि देवा से तो मिल सको।” सोबरा के चेहरे पर मुस्कान थी।

सोहनलाल और जगमोहन की नजरें मिलीं।

“और मुझे कहोगे कि देवा-मिन्नो को पीछे हटने के लिए समझाओगे।"

"तो तुम सब जान गए।" जगमोहन ने होंठ सिकोड़े।

"क्योंकि तुम्हें मालूम नहीं था कि तुम लोगों की बातें सुनी जा रही हैं।” कहकर सोबरा ने नानिया से कहा—“तुम पहले से बहुत समझदार हो गई हो। रानी साहिबा के रूप में तमने, कालचक्र में बहुत कुछ सीख लिया है।"

“वहां मुझे बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ता था।" नानिया ने कहा।

“अब तुम क्या चाहते हो?" जगमोहन बोला।

"तुम लोगों की बातें सुनकर मेरे मन में किसी के प्रति भी कोई बुरा विचार नहीं आया। क्योंकि जब इंसान फंसा होता है तो बचने के लिए नए-नए उपाय खोजता है। हर कोई बचने का प्रयत्न करता है। तुम भी कर रहे हो। स्वाभाविक बात है ये। परंतु मैं तुम्हें तुम्हारे भले की राह दिखाऊंगा।" सोबरा सरल स्वर में बोला।

“कैसी राह?"

“महाकाली की पहाड़ी में प्रवेश करना तुम लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। क्योंकि वो तिलिस्मी पहाड़ी है। कदम-कदम पर मौत बिछी है। महाकाली ने ऐसे इंतजाम कर रखे हैं कि जो एक बार भीतर प्रवेश कर जाए तो जिंदा बाहर न आ सके। अगर तुम्हारा इरादा सिर्फ देवा से मुलाकात करने का है तो वहां मत जाओ। यही बेहतर है कि मेरी नगरी में कैदी बन जाओ। वहां मारे जाओगे।” ___
 
“मतलब कि तुम्हें कोई एतराज नहीं अगर हम वहां जाना चाहें तो?" जगमोहन बोला।

"मुझे कोई एतराज नहीं। लेकिन उससे तुम्हारा भला नहीं होगा। नुकसान ही होगा।”

“तुम हमें पहाड़ी में पहुंचा दो।"

“सोच लो। अभी भी वक्त तुम लोगों के हाथ में है। अगर पहाड़ी में प्रवेश कर गए तो फिर तभी बच सकोगे अगर देवा और मिन्नो को समझाकर, उन्हें बाहर ले आने के लिए तैयार कर लोगे। नहीं तो तुम तीनों की मौत होगी ही।" ___

“मान लो—मैं उन्हें तैयार कर लेता हूं तो तुम्हें कैसे बताऊंगा?"

जगमोहन ने पूछा।

"ये बात होते ही महाकाली को खबर मिल जाएगी।” सोबरा ने कहा—“फिर भी मैं ये राय जरूर दूंगा कि अगर तुम लोग देवा-मिन्नो को समझाना नहीं चाहते तो महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी में जाने की मत सोचना।”

"हम जाएंगे।” सोहनलाल कह उठा।

“ठीक कहता है ये। हम जाएंगे।” जगमोहन बोल पड़ा।

सोबरा मुस्कराया।

सोहनलाल ने नानिया से कहा। "तुम हमारे साथ मत जाना, वहां जान का खतरा... "

मैं तो तुम्हारे साथ जाऊंगी सोहनलाल । मैंने तुमसे ब्याह करना है।" नानिया कह उठी।

“अगर मैं वापस आ सका तो, तुम्हारे साथ ब्याह...।"

"मेरी मां कहा करती थी, मर्द का कभी भरोसा मत करो। मैं तो तुम्हारे साथ रहूंगी सोहनलाल ।”

“तुम समझती क्यों नहीं। वहां जान जाने का खतरा है। तुम मर..."

"तू मरेगा तो मैं भी मर जाऊंगी। तू जिंदा रहेगा तो मैं भी जिंदा रहूंगी।"

"तो तू नहीं मानेगी।" सोहनलाल झल्लाया।

“मैं तेरे साथ रहूंगी। तू भी मत जा।"

"मेरा जाना जरूरी है।” सोहनलाल ने होंठ भींचकर कहा।

"जैसे तेरा जरूरी है, वैसे ही मेरा जाना जरूरी है। नानिया ने सोहनलाल की बांह पकड़ ली।।

सोहनलाल ने अब कुछ भी कहना ठीक नहीं समझा। सोबरा मुस्कराता हुआ तीनों को देख रहा था।

"ठीक है लोबरा । तुम हमें महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करा दो।" जगमोहन बोला।

"क्यों नहीं। मैं अभी महाकाली से... "

"मैं आ गई सोबरा।” महाकाली की आवाज उभरी। चमकता बिंदू हवा में लहराता नजर आने लगा था।

"मेरी ताकतों ने मुझे पहले ही एहसास करा दिया कि तू मुझे बुलाने वाला है।”

“इन्हें जथूरा वाली पहाड़ी में प्रवेश करा दे।"

"क्यों?"

“ये अब देवा-मिन्नो को समझाकर, पीछे हटने को तैयार कर लेते हैं तो अपने साथ-साथ उन सबको भी बचा लेंगे। अगर ऐसा नहीं करते तो मरेंगे।"

“समझ गई। बता कहां से इन्हें प्रवेश कराऊं?"

“पीछे की तरफ से। ताकि देवा-मिन्नो की तरफ जाने में इन्हें कोई परेशानी न हो।” ___

“इन्हें बता दिया है कि तिलिस्मी रास्तों में आगे बढ़ेंगे तो कोई रोक-टोक नहीं होगी, परंतु पलटकर वापस चलेंगे तो वहां फैली मेरी तिलिस्मी ताकतें, इनके लिए खतरा बन जाएंगी।"

“बता चुका हूं।"

"इनका इरादा क्या है?"

“इन्हें अच्छा-बुरा समझा दिया है। जो भी इनका इरादा होगा, तेरे को खबर मिल जाएगी।"

“समझ गई। तू इन्हें खारे पानी तक पहुंचा दे। वहां से मेरी ताकतें इन्हें आगे ले जाएंगी।” महाकाली की आवाज सबने सुनी, फिर इसके साथ ही चमकता बिंदु गायब हो गया।

महाकाली वहां से चली गई थी। सोबरा ने अपने सेवक को बुलाकर कहा। "इन तीनों को खारा पानी पहुंचा दो।"

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
घोड़े मध्यम गति से आगे बढ़ रहे थे।

उन पर सवार थे देवराज चौहान, नगीना, मोना चौधरी, पारसनाथ—महाजन, बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव, मखानी, कमला रानी, तवेरा, गरुड़ और रातुला।

रातुला अंतिम वक्त पर, सबके साथ चलने को तैयार हो गया था।

पोतेबाबा ने रातुला के साथ जाने पर कोई एतराज न किया था। इस वक्त सूर्य चढ़ने लगा था। इन्हें चलते हुए तीन-चार घंटे हो चुके थे। सबके घोड़ों पर पानी की मुश्कें और खाने-पीने का सामान लदा था। पोतेबाबा सामान उठाने के लिए अपने सैनिकों को साथ भेज रहा था, परंतु मोना चौधरी ने किसी और के साथ जाने से मना कर दिया था। वो लश्कर को बड़ा करने के हक में नहीं थी।

तभी चलते-चलते मोना चौधरी अपना घोड़ा मखानी और कमला रानी के पास ले आई।

"कैसे हो तुम दोनों?” मोना चौधरी ने उनसे कहा।

"तुम्हें क्या?" मखानी बोला।

“रात स्नानघर की तरफ कितनी बार गए?” मोना चौधरी मुस्करा पड़ी।

मखानी पल-भर के लिए सकपकाया फिर कह उठा।

“तुम्हें क्या, हम जो भी करें।"

तभी कमला रानी कह उठी।

“क्या बात करना चाहती हो। तुम खामखाह तो हमारे पास आने से रहीं।”

“तुम दोनों का हमारे साथ क्या काम?"

"कोई काम नहीं।”

कमला रानी बोली—“हम यूं ही आ गए।"

"यूं ही तो नहीं आने वाले।" मोना चौधरी ने कहा-"आधी रात को पातेबाबा ने आकर तुम दोनों से बात की।"

"तो?"

__ “मेरे खयाल में वो तुम दोनों से आगे के काम के बारे में खास बातें कर रहा होगा।”

"तुम्हें क्या?" मखानी कह उठा।

"मुझे नहीं बताओगे कि रात पोतेबाबा ने तुमसे क्या बातें की?"

"क्यों बताए?"

“अब हम एक साथ महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी की तरफ जा रहे हैं। हमें मिलकर रहना चाहिए।"

“मिन्नो।” कमला रानी बोली-“हम तेरे को कुछ नहीं बताने वाले। बेकार की कोशिश मत कर।" _

"क्या कोई रहस्य वाली बात कही थी पोतेबाबा ने तुमसे?"

"ऐसा ही समझ लो।"

“मैं किसी से न कहूंगी। मेरे कान में बता दो।” मोना चौधरी ने कहा।

"बेवकूफ मत समझो हमें। हम इस बारे में तेरे को कुछ नहीं बताने वाले।” कमला रानी ने कहा।

मोना चौधरी ने गहरी सांस ली और घोड़ा उनके पास से हटा लिया। तभी उसकी निगाह देवराज चौहान पर पड़ी, जो उसे ही सवालिया नजरों से देख रहा था। मोना चौधरी ने इंकार में गर्दन हिला दी।

देवराज चौहान समझ गया कि कमला रानी और मखानी कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं।

घोड़े मध्यम गति से आगे बढ़े जा रहे थे। घोड़ों की टॉपें गूंज रही थीं।

ये बंजर-सी जमीन थी। दूर तक स्पष्ट दिखाई दे रहा था। सूर्य आसमान में चढ़ने लगा था। धूप में तेजी आते ही, उन्हें गर्मी महसूस होने लगी थी। हवा भी गर्म थी।

तवेरा का खूबसूरत चेहरा तपने-सा लगा था। गर्मी में जैसे वो और भी खूबसूरत हो उठी थी। उसने घोड़े पर अपना व्यक्तिगत सामान भी लाद रखा था, जो कि तंत्र-मंत्र की विद्या के काम आता था।

तभी गरुड़ का घोड़ा चलते-चलते उसके पास आ गया। तवेरा ने उसे देखा और मुस्कराई। गरुड़ भी मुस्कराया। "तुम कितनी अच्छी लग रही हो तवेरा।"

तवेरा पुनः उसे देखकर मुस्कराई।

"मैं अभी तक उलझन में हूं।” गरुड़ धीमे स्वर में बोला।

"क्यों?" तवेरा ने उसे देखा।

“तुम नहीं चाहती कि तुम्हारे पिता आजाद हों।"

"हां। क्योंकि पिताजी की आजादी से, मेरी आजादी खत्म हो जाएगी।"

"फिर तुम्हें साथ नहीं चलना चाहिए था।"

“दुनिया को दिखावा भी तो करना है गरुड।" तवेरा बोली-“वरना लोग कहेंगे कि तवेरा, अपने पिता को आजाद कराने नहीं गई।"

गरुड़ ने सिर हिलाया।

"तुम क्या सोच रहे हो?" तवेरा ने पूछा।

“सोच रहा हूं प्यार इंसान को कमजोर कर देता है। गरुड़ ने मुस्कराकर कहा-“पहले मैं किसी से नहीं डरता था। परंतु अब ये सोचकर डर लगता है कि महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी पर तुम्हें या मुझे कुछ हो गया तो क्या होगा।" ।

"कुछ नहीं होगा।" तवेरा मुस्कराई।

"ये बात तुम कैसे कह सकती हो?"

"मेरे पास ऐसी शक्तियां हैं कि महाकाली की ताकतों से खुद को बचा सकू।"

"मेरा क्या होगा।"

"मैं तुम्हें भी बचा लूंगी।"

"मैं सोचता हूं कि अगर देवा-मिन्नो ने तुम्हारे पिता को कैद से आजाद करा लिया तो तुम्हें दुख होगा।”

तवेरा एकाएक मुस्करा पड़ी। घोड़े आगे बढ़ते जा रहे थे।

“तुम मुस्कराई क्यों—मैंने गलत कहा क्या?"

“तुम मुझे अच्छे लगने लगे हो।”

“सच तवेरा?"

"हां। सोचती हूं वापस महल में पहुंचकर तुमसे ब्याह कर लूंगी।"
 
"ओह । तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मेरा ब्याह तुमसे होगा।” गरुड़ खुश हो उठा।

"तुम्हें रहस्य की बात बताना चाहती हूं।"

"क्या?"

“देवा-मिन्नो का इरादा पिताजी को आजाद कराने का नहीं है।" तवेरा ने आहिस्ता से कहा।

“क्या कह रही हो?" गरुड़ के होंठों से निकला।

“सच ही तो कहा है।

"मैं—समझा नहीं तवेरा कि तुम क्या कह रही हो। स्पष्ट कहो।"

“देवा-मिन्नो से मेरी अकेले में बात हुई। उनकी जरा भी इच्छा नहीं है, जथूरा को आजाद कराने की।”

“ये...ये कैसे हो सकता है?" गरुड़ के होंठों से निकला।

(पाठक बंधु ध्यान रखें कि तवेरा बातों से गरुड़ को भटका रही है कि वो यंत्र पर सोबरा को गलत खबरें दे सके।)

"ये ही बात है। देवा-मिन्नो के मन में ये ही विचार थे पहले से। परंतु मुझे डर था कि कहीं, दोनों पिताजी को महाकाली की कैद से आजाद न करा लें। मैंने देवा-मिन्नो से बात की। कीमती पत्थरों का लालच दिया।" ___

“ओह, ये बात मेरे लिए नई है। तुमने पहले क्यों न बताया?" गरुड़ कह उठा।

"मैं फैसला नहीं कर पा रही थी कि तुम पर विश्वास करूं या न करूं।"

"मैं तुम्हें प्यार करता हूं तवेरा।"

"तुम्हारी इस बात पर मुझे धीरे-धीरे विश्वास होगा। मैं धोखा नहीं खाना चाहती।”

“विश्वास कर लो मेरा। खैर, फिर क्या हुआ?"

“देवा-मिन्नो बहुत लालची हैं।"

"क्यों?"

“जब मैंने बोरा भरकर कीमती पत्थर देने का वादा किया तो तब ये बात अपने होंठों पर लाए कि जथूरा की आजादी में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वो तो वापस अपनी दुनिया में लौटना चाहते हैं।"

"फिर?"

"मैंने उन्हें कह दिया कि मैं उन्हें वापस उनकी दुनिया में पहुंचा दूंगी। साथ में बोरा भरकर कीमती पत्थर भी दूंगी। शर्त ये है कि वो जथूरा को आजाद न कराएं। आजाद कराने का नाटक ही करें।"

"ओह, नाटक क्यों?"

“पोतेबाबा को दिखाने के लिए।"

“समझा।”

"जानते हो देवा ने क्या कहा?"

"क्या?"

"देवा ने कहा कि वो जथूरा तक पहुंचकर, उसे गला दबाकर मार देगा। ताकि वो कभी नहीं लौट सके।"

"ऐसा देवा ने कहा?"

"तुम्हारी कसम"

“ओह। फिर तो तुम्हारा काम बन गया। तुम जथूरा की हर चीज की मालकिन बन जाओगी।"

“तभी तो मैं खुश हूं।"

और गरुड़ बेचैन हो उठा था। वो इन सब बातों की खबर यंत्र पर सोबरा को दे देना चाहता था। परंतु अभी मौका नहीं था। सब पास में थे। वो व्याकुलता से उस वक्त का इंतजार करने लगा। जब पड़ाव डाला जाएगा आराम करने के लिए तब आसानी से यंत्र पर सोबरा को इन सब बातों की खबर दे सकेगा।

और तवेरा जैसे गरुड़ के मन के भीतर उठ रही खलबली से अच्छी तरह वाकिफ थी। __

“मखानी।” कमला रानी तीखे स्वर में कह उठी—“तू बार-बार तवेरा को क्यों देख रहा है।" ।

"क्यों न देखू।” मखानी ने गहरी सांस ली—“साली क्या तूफानी चीज है।"

“चीज?” कमला रानी ने मुंह बनाया।

“जो खूबसूरत होती है, वो चीज होती है। टांगें देख उसकी। छातियां, ओह और चेहरा तो.... " ___ “अब तू मेरे पास मत आना।” कमला रानी नाराजगी से कह

उठी।
 
"नाराज हो गई।” मखानी मुस्कराया— “पुरानी बीमारी है।"

“बीमारी हो तेरे को। मेरे को मर्दो की कमी नहीं है।” कमला रानी ने नखरे वाले स्वर में कहा—“वो देख, भंवर सिंह तो मेरे को लाइन मार रहा है। बार-बार मेरे को देख रहा है।" ____

मखानी ने गर्दन घुमाकर कुछ दूर घोड़े पर मौजूद बांकेलाल राठौर को घूरा।

बांके ने हड़बड़ाकर नजरें फेर ली।

“तेरे को कैसे पता कि वो तेरे को बार-बार देख रहा है। तू भी उसे देखती रही होगी।"

"लग गई आग।” कमला रानी ने व्यंग्य से कहा—“मर्द दस जगह मुंह मार ले। औरत एक जगह मारे तो गुनाह हो गया।"

“मैंने कहां मुंह मारा है?" मखानी मुंह बनाकर बोला।

"तवेरा पर आंख गड़ाए है तू।" ।

“वो तो यूं ही बात कर रहा...।"

“यूं ही, तु तो उसकी खूबसूरत टांगों की बात कर रहा था। छातियां भी नाप ली तने और चेहरा तो...।"

"वो तो मैं यूं ही तेरे को जलाने को... "

“बस-चुप रह। तुम मर्दो की जात मैं अच्छी तरह पहचानती हूं।” कमला रानी व्यंग्य से कह उठी।

' “मैं उन मर्दो में नहीं आता। मैं तो तेरा दीवाना हूं कमला रानी।"

"दीवाना?" कमला रानी ने मखानी को घूरा।

“दीवाना न होता तो रात तेरे को बार-बार स्नानघर की तरफ चलने को क्यों कहता।"

"तू मेरा नहीं, उस चीज का दीवाना है, जो तेरे को स्नानघर जाकर मिलती रही हरामी के।"

मखानी ने सकपकाकर मुंह फेर लिया। “वो देख, भंवर सिंह अभी भी मुझे देख रहा है।" मखानी ने उधर देखा तो बांके ने तुरंत मुंह फेर लिया। 'मुच्छड़ तो ठरकी लगता है।' मखानी बड़बड़ा उठा।

"क्या कहा?" कमला रानी ने पूछा। सब घोड़े मध्यम गति से दौड़ रहे थे।

“वो तो बहता पानी है। तू मुच्छड़ के फेर में मत पड़। खा-पीकर चलता बनेगा।"

“और तू?"

"मैं तो अंत तक तेरा साथ निभाऊंगा।"

"तवेरा के बारे में क्या खयाल है?" कमला रानी ने व्यंग्य से कहा।

"जलन वाली बातें नहीं। वो तो मैं यूं ही टाइम पास कर रहा था।" ___

“मेरे से टाइम पास करता। मेरी टांग, मेरी छातियां देखता—तू तो...।" __

“तेरी ही तो देखता हूं।"

"तू किसी का सगा नहीं हो सकता। खैर जब तक निभती है, तब तक चलने दे। बाद में तू ही तरसेगा। मेरे को लाइन लगी मिल जाएगी। कहीं ऐसा न हो कि तू भी मुझे उस लाइन में लगा दिखे।"

“मजाक करती है।” मखानी ने दांत फाड़कर कमला रानी को देखा।

“जब लाइन में लगना पड़ेगा, तब पता चलेगा मेरा माल तेरे से हज्म नहीं हुआ।”

घोड़े दौड़े जा रहे थे। कुछ-कुछ धूल घोड़ों की टॉपों से उठ रही थी। सूर्य की गर्मी तेज होती जा रही थी। महाजन अपना घोड़ा रातुला के पास ले जाकर बोला। "कितनी देर का रास्ता बाकी है?"

“पूरा दिन लगेगा।” रातुला ने कहा।

“क्या सारा रास्ता इसी तरह तपता हआ ही है।"

“आगे जंगल भी आएगा। झरना भी, नदी भी। परंतु दोपहर तक का रास्ता इसी तरह का रहेगा।" __

बांकेलाल राठौर एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़े, दूसरे से मूंछों को संवारता कह उठा।

“छोरे म्हारी लाटरो लगनो को हौवे।"

"कैसे बाप?"

"कमलो रानी म्हारे पे फिदा होवे लगो हो। बारो-म-बार म्हारे को ताको हो।"

रुस्तम राव ने कमला रानी की तरफ देखा फिर कह उठा। “आपुन को ऐसा नेई लगेला।”
 
"म्हारी आंख धोखो न खायो। कमलो रानी गर्म होवे, म्हारे को देखो हो।”

"बाप"

"बोल छोरे।”

“तुम्हारी उम्र आशीर्वाद देने की होईला, इधर-उधर नेई देखने की होईला।”

“का बात करो हो। अंम भी जवानो हौवे हो छोरो।"

"जरूर जवान होईला बाप। पर आंख लड़ाने की उम्र न होईला।”

__“अंखियां तो पैंसठो बरसो की उम्रो में लड़ जायो। अंखियों का, का हौवे । म्हारो दिल एकदमो सोलह बरसों का हौवे छोरे। थारें से भी जवान हौवे ।”

“आपुन से भी जवान होईला?"

"हां छोरे।"

"तब तो तेरे को कमला रानी की गोद में बैठेला । क्योंकि आपुन बच्चा होईला।”

“छोरे तंम बूढ़ो की तरहों बातो मतो मारो। म्हारे साथो रहनो हौवे तो जवानो की तरह बातों करो हो।"

'बुढ़ऊ जवान होईला।' रुस्तम राव बड़बड़ा उठा।

“का बोल्लो हो छोरे?"

“भगवान का नाम ले रिया हूं बाप।” रुस्तम राव ने गहरी सांस लेकर कहा।

सोबरा का एक सेवक जगमोहन, सोहनलाल और नानिया के साथ घोड़ों पर सवार होकर, एक घंटे का सफर करके, सोबरा की नगरी से दूर ऐसी मैदानी जगह पर पहुंचा, जहां छोटा-सा तालाब बना हुआ था। __ ऐसे मैदानी इलाके के बीच, यह तालाब होना कुछ अटपटा लग रहा था।

सेवक कह उठा। “अब मैं जाता हूं।"

"लेकिन हम यहां क्या करेंगे?" जगमोहन बोला।

"मैं नहीं जानता। मुझे हुक्म था कि तुम लोगों को खारे पानी तक पहुंचाना है, सो पहुंचा दिया।"

“खारा पानी?" जगमोहन की निगाह तालाब की तरफ उठी—“क्या इस तालाब को खारा पानी कहते हैं।"

"हां" सेवक ने कहा और अपना घोड़ा वापस दौड़ा दिया। देखते-ही-देखते वो निगाहों से ओझल होता चला गया। सोहनलाल की निगाह दूर-दूर तक हर तरफ जा रही थी। तभी नानिया कह उठी। "ये तालाब पहले तो यहां नहीं होता था।"

“पहले कब?" सोहनलाल ने उसे देखा।

“सोबरा के कालचक्र बनाने तक। तब तो मैंने खारा पानी नाम का शब्द भी नहीं सुना था।" नानिया बोली।

"लेकिन हम यहां करेंगे क्या?” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।

अगले ही पल वे तीनों चौंके। वो छोटा-सा तालाब जैसे बीच में से दो हिस्सों में बंट गया हो।

इस प्रकार पानी के हिस्से दाएं-बाएं हो गए और बीच में सीढ़ियां नजर आने लगीं।

“ये क्या?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

दो पल भी न बीते कि सीढ़ियों पर छोटे कद का एक व्यक्ति दिखाई दिया। सिर पर जरा-जरा बाल थे और कमर में लंगोट जैसा

कोई कपड़ा पहना हुआ था। वो मुस्कराकर इनसे बोला।

“महाकाली की दुनिया में स्वागत है तुम तीनों का। भीतर आ जाओ।”

“भीतर?"

“हां, मालूम पड़ा तुम तीनों महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी में, पीछे के रास्ते से प्रवेश करने वाले हो।”

जगमोहन ने गहरी सांस ली। "तुम कौन हो?"

“मैं महाकाली का छोटा-सा सेवक खोतड़ा हूं।"

"खोतड़ा?"

"ये मेरा नाम है। सब मुझे इसी नाम से बुलाते हैं। भीतर आइए। अभी हमें लम्बा रास्ता तय करना है।"

"चलो।” जगमोहन ने सोहनलाल से कहा।

“हम किसी नई मुसीबत में तो फंसने नहीं जा रहे?" सोहनलाल

बोला।
 
“जब तक पूर्वजन्म की जमीन पर रहेंगे, इसी प्रकार मुसीबतें आती रहेंगी।” जगमोहन ने उलझन-भरे स्वर में कहा।

सोहनलाल ने नानिया से पूछा। “तुम क्या कहती हो, हमें खोतड़ा ही बात माननी चाहिए?"

"मुझे नहीं पता।” नानिया की निगाह खोतड़ा पर थी। खोतड़ा मुस्कराता हुआ, नानिया को देखने लगा था।

"अगर हम तुम्हारे साथ जाने को मना कर दें तो?"

“अब तुम लोगों का तीर कमान से निकल चुका है। महाकाली की शक्तियों ने तुम तीनों को घेर लिया है। चाहकर भी तुम तीनों अपनी मनमानी नहीं कर सकते। तुम तीनों को पीछे वाले रास्ते से तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करना ही होगा, उसके बाद तुम लोग अपनी मनमानी करने पर आजाद हो। उससे पहले नहीं।"

“तुम्हारा मतलब कि हम महाकाली के बंदी हैं?"

“ऐसा ही समझ लो।"

एकाएक सोहनलाल ने घोड़ा मोड़ा और दौड़ाने के लिए एड़ मारी। परंतु घोड़ा वहीं खड़ा रहा।

सोहनलाल ने पुनः चेष्टा की। परंतु कोई फायदा नहीं हुआ। जगमोहन होंठ भींचे ये सब देख रहा था।

"यहां से भाग नहीं सकते।" खोतड़ा की आवाज आई—“कोशिश करना बेकार है।"

सोहनलाल घोड़े से उतरा और वापसी को कदम बढ़ाए।

परंतु अगले ही पल उसे ऐसा लगा, जैसे सामने कोई दीवार आ खड़ी हुई हो।

सोहनलाल ने गहरी सांस लेकर जगमोहन को देखा। "हमें महाकाली ने घेर लिया है।" नानिया बोली।

“अब वो हमें भागने नहीं देगी। तिलिस्मी पहाड़ी में हमें प्रवेश करा के ही रहेगी।" जगमोहन ने कहा।

"हमने ही तो हामी भरी थी, वहां जाने की।” नानिया बोली।

"तो हम भी कहां पीछे हट रहे हैं।” सोहनलाल बोला—“जरा देखभाल ही तो कर रहे हैं।" ।

"देखभाल हो गई हो तो यहां आ जाओ।” खोतड़ा बोला। जगमोहन और नानिया भी घोड़े से उतरे।। फिर तीनों सीढियों पर खड़े खोतड़ा के पास जा पहुंचे।

खोतड़ा वापस पलटकर सीढ़ियां उतरता बोला। "मेरे पीछे आओ।"

तीनों सीढ़ियां उतरने लगे। “ये कैसी जगह है?" सोहनलाल ने कहा।

"देखते जाओ, समझ में आ जाएगा।" वो काफी सीढ़ियां उतर आए।

परंतु सीढ़ियां खत्म होने को नहीं आ रहीं थीं। अब वहां अंधेरा छाने लगा था। ऊपर से आती रोशनी बंद हो चुकी थी। घुप्प अंधेरे से तंग आकर नानिया कह उठी।

“कम-से-कम रोशनी तो कर दो।"

“अभी सब ठीक हो जाएगा। रोशनी होने ही वाली है।” खोतड़ा की आवाज सुनाई दी—“तुम नानिया हो न?"

“तुम मुझे जानते हो?"

“नहीं। परंतु तुम्हारे बारे में जानकारी मिली कि तुम कालचक्र से निकली और अब सोहनलाल से ब्याह करना चाहती हो।”

"एतराज है तेरे को?" नानिया ने चुभते स्वर में कहा।

“नहीं। सोहनलाल भाग्यशाली है जो उसे तुम जैसी मिली।"

"मेरे में क्या खास है जो...।"

“तू वफादार है। तेरी सबसे बड़ी खासियत ही यही है।" तभी सामने रोशनी दिखाई देने लगी।

"हम आ पहुंचे पहाड़ी पर?” सोहनलाल ने पूछा।

"अभी तो लम्बा रास्ता बाकी है।” खोतड़ा ने कहा "लेकिन आज के दिन में तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश कर जाओगे।"

सीढ़ियां खत्म हो गईं। नीचे भरपूर दिन का प्रकाश फैला था।

"ये कैसी जगह है?" जगमोहन बोला। सामने रोशनी से भरा चौड़ा रास्ता दिखाई दे रहा था। खोतड़ा उसी रास्ते पार आगे बढ़ गया। तीनों उसके पीछे थे। जल्दी ही वे सब रास्ते से बाहर आ गए।

उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने वहां नई जमीन, नया आसमान देखा। महज पचास सौ सीढ़ियां ही तो उतरे थे वे। हर तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी। फलों के बगीचे। बाग और लम्बे वृक्ष।
 
तीनों की निगाह हर तरफ घूम रही थी। सामने घोड़ागाड़ी खड़ी थी। खोतड़ा मुस्कराता हुआ उन्हें देख रहा था।

"ये सब क्या है?" जगमोहन ने खोतड़ा को देखा।

"इसमें हैरानी की क्या बात है।" खोतड़ा कह उठा।

"हमने थोड़ी-सी सीढ़ियां उतरी हैं तो जमीन का सारा नक्शा कैसे बदल गया?"

"ये ही तो महाकाली की माया है।"

"क्या मतलब?”

"ये महाकाली की अपनी बसाई दुनिया है। मायावी दुनिया। महाकाली की ताकतों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।"

“ये मायावी दुनिया है?" सोहनलाल ने पूछा।

"हां। ये तो महज महाकाली की ताकतों का नमूना-भर है।" खोतड़ा ने कहा-"जब तिलिस्मी पहाड़ी पर पहुंचोगे तो असली रंग तब दिखेगा। अभी तुम लोग महाकाली के बारे में जानते ही क्या हो।"

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं। नानिया बहुत हद तक शांत थी। “वो खारे पानी का तालाब क्या है?"

“छलावा है वो।"

"क्या मतलब?"

“राहगीर मैदानी इलाके में भटककर थका-हारा जब पानी देखता है तो उसे पीने की इच्छा के साथ पानी में हाथ डालता है तो वहां मौजूद महाकाली की ताकतें उसे भीतर खींच लेती हैं। इस तरह वो हमेशा-हमेशा के लिए गुलाम बनकर महाकाली की सेवा में आ जाता

___ “ये तो धोखा है।” जगमोहन कह उठा। ___

"धोखा नहीं ताकतों का खेल है। वो खारा पानी नहीं, महाकाली की वहां रखी ताकतों का जरा सा रूप है। जो भी उन ताकतों के साथ छेड़छाड़ करेगा, वो महाकाली के कब्जे में आ जाएगा। जो बचना चाहता है, वो उस पानी से दूर रहे।"

“ये तो धोखा ही है, मैदानी इलाके में पानी को रखकर दूसरे को बुलावा देना।"

खोतड़ा मुस्कराता हुआ जगमोहन को देखता रहा। फिर बोला।

"लगता है तुम महाकाली के बारे में कुछ ज्यादा नहीं जानते जग्गू?"

“सच में। में सिर्फ महाकाली के नाम से वाकिफ हूं और सुना है वो तंत्र-मंत्र में माहिर है।"

“महाकाली की शक्तियों का कोई अंत नहीं। धीरे-धीरे तुम्हें समझ आ जाएंगी। अब घोडागाड़ी पर बैठ जाओ।"

"तिलिस्मी पहाड़ी पर जाने के लिए?"

"हां" वो तीनों घोड़ागाड़ी पर जा बैठे।

खोतड़ा ने कोचवान बनकर दोनों घोड़ों की लगाम थामी और घोडागाड़ी दौड़ा दी।

अभी तक यहां कोई दूसरा न दिखा था। घोडागाड़ी मध्यम गति से दौड़ रही थी। सोहनलाल ने नानिया से कहा। "तुमने मुझे ठीक से महाकाली की शक्तियों के बारे में नहीं बताया?"

“ज्यादा मैं भी नहीं जानती। परंतु इतना सुन रखा है कि महाकाली बड़ी शक्ति है।" नानिया बोली।

सोहनलाल ने गहरी सांस ली। जगमोहन ने सोहनलाल से कहा।

"मेरे खयाल में तिलिस्मी पहाड़ी पर पहुंचकर हम भारी खतरे में फंसने वाले हैं।"

"मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।"

“तुम डर रहे हो सोहनलाल?" नानिया ने पूछा।

“नहीं। आने वाले वक्त के बारे में सोच रहा हूं।" तभी बग्गी दौड़ाता खोतड़ा कह उठा। "तुम लोगों को महाकाली की ताकतों से नहीं डरना चाहिए।"

"क्यों?"

“क्योंकि तुम लोग तो देवा-मिन्नो को समझाकर, इस काम से हटाने जा रहे हो।"

जगमोहन, सोहनलाल की नजरें मिलीं। "मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?” खोतड़ा ने पूछा।

"हमने अभी फैसला नहीं किया कि क्या करना है हमें।" जगमोहन ने कहा। __

“कर लेना फैसला। सोचने के लिए तुम लोगों के पास बहुत वक्त

.

“यहां अभी तक हमें कोई नजर क्यों नहीं आया?” सोहनलाल बोला। ___

“इस तरफ कम लोगों का आना होता है। मायावी रास्ते मतलब के लिए बनाए जाते हैं।" __

“तुम्हारा मतलब कि मायावी जगहों पर लोग बसते नहीं __

"क्यों नहीं बसते। महाकाली की कई मायावी नगरियां बसी हुई

हैं। फल-फूल रही हैं।"

"तो यहां कोई क्यों नहीं है?"

"इस दिशा की तरफ लोगों का कम ही आना-जाना होता है।”

सोहनलाल ने बग्गी से सिर निकालकर आसमान में चमक रहे सूर्य की तरफ देखा। आंखें चौंधिया गईं तो फौरन सिर भीतर कर लिया और खोतड़ा से पूछा।

“ये सूर्य वो ही है, या मायावी है?" खोतड़ा खामोश रहा।

“जवाब नहीं दिया तुमने?"

"चांद-सितारे-सूरज के बारे में बात करना मना है।” खोतड़ा ने कहा।

"क्यों?

“मायावी दुनिया में चांद-सितारों की बात करना अपशगुन माना जाता है।"
 
"ओह। ये बात महाकाली ने कही।"

“सब बातें महाकाली ही बताती है।"

“तुम लोग अपशगुन को मानते हो?"

"हां। इसमें न मानने वाली क्या बात है। महाकाली की शगुन-अपशगुन में पूरी आस्था है।"

घोडागाड़ी की रफ्तार अब पहले से ज्यादा तेज हो चुकी थी।

"महाकाली रहती कहां है?"

“वो हर जगह रहती है। उसके कई रूप हैं, जो कि लगभग हर जगह मौजूद रहते हैं।"

"अभी तक महाकाली हमसे क्यों नहीं मिली?"

“महाकाली ने जरूरत नहीं समझी होगी सामने आने की।" खोतड़ा बोला।

तभी जगमोहन कह उठा। "ये तो पक्की बात है कि महाकाली बेवकूफ है।" ।

"क्या मतलब?”

“इतनी बड़ी ताकतों की मालिक होकर, वो सोबरा की बातों में आकर जथूरा को कैद में रखे हुए है।" । ___

"इस बात का जवाब तो महाकाली ही दे सकती है कि उसने जथूरा की बात क्यों मानी। परंतु ये तो तय है कि महाकाली बिना किसी मतलब के, कोई काम नहीं करती।" खोतड़ा ने कहा। __

“तुम्हारा कहना है कि महाकाली ने अपने किसी मतलब की ही खातिर जथरा को कैद में रखा है।"

“यही मेरा मतलब है। ठीक समझे तुम।" जगमोहन ने सोहनलाल से कहा।

"उलझी बातें हैं। हमारी समझ में नहीं आने वाली।" सोहनलाल ने कुछ नहीं कहा। घोडागाड़ी तेजी से दौड़ी जा रही थी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सोबरा अपने शयनकक्ष में, खिड़की पर खड़ा, वहां से नजर आती नगरी में नजरें दौड़ा रहा था। चेहरे पर सोच के भाव तैर रहे थे। दोपहर बाद का वक्त हो रहा था।

तभी उसकी जेब में पड़ा यंत्र बजने लगा।

सोबरा ने जल्दी से कुर्ते की जेब से यंत्र निकाला और बटन दबाकर बात की।

"कहो गरुड़।” सोबरा बोला।

"हम सुबह ही, महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी की तरफ चल पड़े थे।” गरुड़ की महीन-सी आवाज यंत्र से निकली।

“खबर है मुझे।"

"हमने आधा रास्ता तय कर लिया है। सुस्ताने के लिए रास्ते में पड़ाव डाला तो मुझे बात करने का वक्त मिला।"

“साथ में कौन-कौन है?"

"देवा-मिन्नो, बेला, भंवरसिंह, त्रिवेणी, परसू, नीलसिंह, मखानी, कमला रानी, तवेरा और रातुला।"

“रातुला भी?" सोबरा के होंठों से निकला।

"हां। आखिरी वक्त पर उसने साथ चलने का मन बना लिया था।"
 
Back
Top