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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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"लेकिन उन्होंने हमारे साथ ये व्यवहार क्यों किया?" पारसनाथ ने कहा।

"इस तरह वे हमें रास्ते से भटका रहे हैं।” रातला ने कहा।

“किस रास्ते से?" तवेरा कह उठी—“अभी तो रास्ता हमें मिला ही नहीं। हम भीतर पहुंचे तो महाकाली का सेवक बांदा हमारे साथ चल पड़ा। उसने हमें ठीक से सोचने ही नहीं दिया और हमें उलझाता चला गया।" ___

"ये ही बात है।” देवराज चौहान कह उठा—“हमने जथूरा तक पहुंचने के लिए रास्ता तय किया ही नहीं कि बांदा और प्रणाम सिंह हमें किसी-न-किसी रास्ते पर धकेले जा रहे हैं। हम जाने कहां पहुंचते जा रहे हैं।"

“ऐसा क्यों कर रहे हैं वो हमारे साथ?” महाजन ने कहा।

“शायद इसलिए कि हम सोच-समझकर सही रास्ता न चुन सकें।" ___

"ये हमारा विचार है। परंतु असल बात जाने क्या होगी।" रातुला गम्भीर स्वर में बोला।

“असल बात तो ये है कि महाकाली हमें जथूरा तक नहीं पहुंचने देना चाहती।” देवराज चौहान ने कहा।

“ये तो पक्का होईला बाप।” रुस्तम राव ने सिर हिलाया। __

“महाकाली के इशारे पर बांदा और प्रणाम सिंह कुछ-न-कुछ करके हमें भटका रहे हैं।"

“अब हम बांदा की कोई बात नहीं मानेंगे।” मोना चौधरी कह उठी। ___

“पहले भी हम कहां उसकी बात मानते रहे हैं।” नगीना ने कहा—“परंतु हालात हर बार इस तरह हो जाते हैं कि हमें बांदा की बात मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है। हमारे सामने दूसरा रास्ता नहीं होता।" __

"इस बार जो भी हो जाए, बांदा की बात नहीं मानेंगे।” मोना चौधरी ने दृढ़ स्वर में कहा।

“ऐसा ही करेंगे।" पारसनाथ ने कहा।

तभी देवराज चौहान ने मोना चौधरी से कहा।

"प्रणाम सिंह ने तुम्हें गहरे कुएं में फेंक दिया, परंतु नीलकंठ तुम्हें बचाने नहीं आया। बल्कि वो आया ही नहीं।"

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े। देवराज चौहान को देखने लगी वो। ___

“ओह, नीलकंठ के बारे में तो मैंने भी सोचा नहीं।” महाजन

ने मोना चौधरी को देखा।

“नीलकंठ क्यों नहीं आया तुम्हें बचाने?" नगीना कह उठी।

“मैं नहीं जानती।” मोना चौधरी के चेहरे पर उलझन थी। तभी महाजन ने पुकारा। "नीलकंठ।”

अगले ही पल मोना चौधरी के होंठों से मर्दानी, नीलकंठ की खरखराती आवाज निकली।

“क्या है?"

“तू मोना चौधरी को बचाने क्यों नहीं आया, जब प्रणाम सिंह ने इसे कुएं में फेंका।”

"मैं वहीं था तब।”

"तो बचाया क्यों नहीं?" नीलकंठ की तरफ से आवाज नहीं आई।

"तू तो मोना चौधरी के आशिक होने का दम भरता था। अब क्या हो गया तुझे?” नगीना बोली। __

“मैं इस मायावी पहाड़ी के हालातों को समझने की चेष्टा कर रहा हूँ।"

"क्या मतलब?"

“मतलब ही तो अभी तक मेरे सामने स्पष्ट नहीं है, जो बता सकू।" नीलकंठ की आवाज मोना चौधरी के होंठों से निकली।

“तुम स्पष्ट बात नहीं कर रहे ।” महाजन ने कहा।

"मैंने कब कहा कि मैं स्पष्ट बात कर रहा है। इस बारे में मैं फिर बात करूंगा। पहले कुछ समझ लूं।"

“तुम क्या समझना चाहते हो?"

“अभी नहीं बता सकता, परंतु मैं मिन्नो के पास ही हूं और मिन्नो का अहित नहीं होने दंगा। अभी मैं जा रहा ।"

उसके बाद नीलकंठ की आवाज नहीं आई। मोना चौधरी सामान्य अवस्था में आ गई थी।

“नीलकंठ पर किसी तरह का शक मत करो।” मोना चौधरी बोली—“वो हमारे ही काम में व्यस्त है।"

"हमारे काम में?" __

“महाकाली वाले काम में ही।” मोना चौधरी ने सोच-भरे स्वर में कहा।

देवराज चौहान की निगाह आसपास की जगहों पर घूमने लगी।

मखानी जो कि देर से सब्र किए बैठा था, वो दबे पांव कमला रानी के पास पहुंचा।

"मेरी कमला रानी कैसी है?" मखानी ने प्यार से कहा। कमला रानी ने उसे घूरा।

"ऐसे क्या देखती है?" मखानी का स्वर प्यार से भरा ही था।

"जब तू प्यार से बोलता है तो तेरी नीयत ठीक नहीं होती।"

“मेरी नीयत ठीक ही है।" मखानी प्यार में डूबा हुआ था।

"मांगेगा तो नहीं।”

“जरूर मांगूंगा।” मखानी ने दांत फाड़े—“उसके लिए ही तो प्यार से बोल रहा हूं। पानी में भीगने के बाद से ठंड लग रही है। गर्मी की जरूरत है। दे दे कमला रानी, थोड़ी तबीयत संभल जाएगी।"

“नहीं।"

“दे दे न?" मखानी ने मुंह लटकाकर कहा।
 
"चुम्मी ले ले।"

"नहीं। अब चुम्मी से काम नहीं चलता। ठोस चीज चाहिए, जिससे कि पेट भर जाए। आत्मा प्रसन्न हो जाए और.... ।”

"कुछ नहीं मिलेगा।” कमला रानी ने जिद-भरे स्वर में कहा।

“अड़ मत, कभी तो...।"

"चुम्मी दे रही हूं, वो ही ले ले। नहीं तो उससे भी जाएगा।"

"मैं कोई बच्चा थोड़े न हं जो चुम्मी से टरका रही है।" मखानी ने नाराजगी से कहा।

“अब तेरे को चुम्मी भी नहीं दूंगी।” कमला रानी ने मुंह बनाकर कहा।

“तू बहुत पत्थर दिल है।” मखानी बोला। कमला रानी ने लम्बी सांस ली और कह उठी।

"तेरे को कब समझ आएगी।”

“समझदार बहुत हूं, तभी तो... "

"बेवकूफ जब औरत चुम्मी देने के लिए तैयार हो तो समझ जा कि सब काम के लिए वो तैयार है। चुम्मी लेने के बहाने औरत को एक तरफ ले जा और...।"

"और?" मखानी की आंखें चमकी।

"और तेरा सिर।"

“समझ गया—समझ गया। चल आ जरा।"

"किधर?”

"साइड में। चुम्मी लेनी है।"

“अब तो पानी सारा ठंडा हो गया और तू अभी तक अंडा हाथ में पकड़े उबालने की सोच रहा है।” कमला रानी ने मुंह बनाया।

"क्या मतलब?"

"बाद में। अभी वक्त नहीं है।"

“ये क्या बात हुई?”

"सुना नहीं तूने। वक्त निकल गया। अंडा हाथ में पकड़े रख। दोबारा जब मौका मिले तो उबाल लेना।"

"तब तक तो अंडा टूट जाएगा।” मखानी ने फिर से मुंह लटका लिया।

__ “कोई बात नहीं टूटने दे। घर का अंडा है। दोबारा हाथ में आ जाएगा।

सामने घना जंगल नजर आ रहा था। इस तरफ बहती नदी थी। कोई और रास्ता नहीं था जाने का।

“अब क्या करें। किधर जाएं।” महाजन बोला—“हमें रास्ता भी तो नहीं पता।"

“ये भी नहीं पता कि हम कौन-सी दिशा में हैं।”

"हमें जंगल में जाना होगा। वो ही रास्ता है।” मोना चौधरी ने कहा—“कहीं तो पहुंचेंगे।"

"लेकिन हमने जथूरा को तलाशना है।" रातुला ने कहा।

“कहां है जथूरा?” मोना चौधरी ने रातुला से पूछा। रातुला से कुछ कहते न बना।

"मोना चौधरी ठीक कहती है कि हमें चल देना चाहिए।" देवराज चौहान बोला—“आगे जैसा रास्ता मिलेगा, वैसा ही काम करेंगे।”

दूसरी कोई राय नहीं थी। वे सामने नजर आ रहे जंगल की तरफ बढ़ गए। अंजान रास्ता, अंजान मंजिल, दिशा का भी कुछ पता नहीं था। चलते-चलते बांकेलाल राठौर, रुस्तम राव के पास जा पहुंचा।

"छोरे।"

"बोल बाप।"

"म्हारी तो जिंदगो ही खराबो हो गयो। ईक चांस मिलो ब्याह करने को, भी वो गयो।” ___

“आपुन तो पैले ही कहेला कि तुम्हारी उम्र ब्याह करनो की नहीं है। आशीर्वाद देने की होईला।” ___

“जिगरा मत जलायो म्हारा यो कह करो। अंम अभी ब्याहो करो हो।"

"करो बाप।”

"तम म्हारे साथो हौवो न?"

"किधर, ब्याह के बाद या पहले?"

"बादो में तंम का करो हो, अंम तो पैले की बातो करो हो।" ।

“आपुन साथ होईला बाप।” जंगल शुरू हो चुका था। सिर पर सूर्य था। परंतु जंगल में छाया और राहत मिल रही थी।

तभी सब ठिठकते चले गए। सामने ही, पेड़ के तने से टेक लगाए बांदा बैठा था।

"ये हरामो म्हारे से फिरो टकरा गयो हो। ईब यो कोई नयो झंझट डालो हो।"

"ये नया प्लान इस्तेमाल करेला बाप ।” देवराज चौहान और मोना चौधरी की नजरें मिलीं।

“अब हम इसकी कोई बात नहीं सुनेंगे।” मोना चौधरी ने दृढ़ स्वर में कहा। ___

“ये यूं ही हमारे सामने बार-बार नहीं आ रहा।” देवराज चौहान बोला—“इसका अवश्य कोई खास मतलब है।"

"और वो मतलब तुम नहीं जानते।"

"नहीं।"

“अब हम इसकी बातों में नहीं आने वाले।"

"मोना चौधरी ठीक कह रही है।” नगीना बोली—"हम इसके पास नहीं रुकेंगे।"

फिर वे सब बांदा को पार करते हुए जंगल में आगे बढ़ते चले गए।
 
ये देखकर बांदा फौरन उठा और उनके साथ-साथ चलता कह उठा।

“आप लोग मुझे हमेशा पीछे छोड़कर, आगे चल पड़ते हैं। मैं खुद को अकेला महसूस करता हूं।"

किसी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया।

“मेरे से क्या गलती हो गई जो बात भी नहीं कर रहे।” बांदा पुनः बोला।

"तंम बोत कमीनो हौवे।” बांकेलाल राठौर कह उठा।

"मैंने ऐसा क्या कर दिया भंवर सिंह।”

"तन्ने म्हारे ब्याहो को टांग मारो हो।"

“मैंने तो दुल्हन को कहा था कि मूंछों वाले को पसंद कर...।"

“दुल्हनो की जगहों थारो बापू बैठो हो। अंम का थारे बाप संगो सुहागरात मनायो हो।"

साथ चलते हुए बांदा ने गहरी सांस ली।

“ईब थारी फूंको निकलो हो... । काये को?"

"मैं अपने पिता की हरकतों से बहुत परेशान हूं। तभी तो मैंने ब्याह भी नहीं किया।”

“का करो हो थारा बापो, थारे ब्याहो में?"

“वो खुद दुल्हन बनकर बैठ जाता है।"

“पक्को ?"

"हां, सच कह रहा हूं मैं। दो बार शादी करने की चेष्टा की, दुल्हन को भगा कर, खुद चूंघट निकालकर बैठ जाता है।"

___ “थारे बापो को दूसरो स्वादो का चस्को लग गयो हौवे।"

“मुझे भी ऐसा ही लगता है। मैं अपने पिता से बोत परेशान

"अंम तो थारे से भी परेशान हौवे और थारे बापू से भी। म्हारो तो ब्याह होतो-होतो रह गयो।”

"मेरा नहीं हुआ तो तुम्हारा कैसे होगा?"

"तंम पक्को हरामो हौवे। एकदम पक्को।"

"मैं बहुत शरीफ इंसान हूं, मैं तो... ।”

"तंम महाकालो को चमचो हौवे।"

“महाकाली का नमक खाता हूं मैं। उसकी बात तो माननी ही पड़ेगी।" कहने के साथ ही बांदा तेजी से आगे बढ़ा और देवराज चौहान के पास पहुंच गया—“मेरे से नाराज मत हौवो देवा

।"

“तुम हर बार हमें भटका देते हो।"

"इसमें मेरा क्या कसूर ।”

“सब कुछ जानते हुए भी तुम जथूरा के बारे में नहीं बताते कि वो कहां पर मिलेगा। पूछने पर हमें नई मुसीबत में फंसा देते हो। अभी तक हम अपना रास्ता भी तय नहीं कर सके।"

“तुम्हें एक खुशखबरी सुनाऊं।" "कहते जाओ।" बातों के दौरान सब तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे।

“जग्गू, गुलचंद उस जगह पर पहुंच गए हैं, जहां जथूरा कैद

"क्या?" देवराज चौहान के होंठों से निकला।

"हैरान हो गए न?"

“जथूरा उन्हें मिल गया?” देवराज चौहान बोला।

“मैंने कब कहा कि जथूरा उन्हें मिल गया। मैंने कहा है, वो उस जगह पर जा पहुंचे हैं।"

देवराज चौहान कुछ नहीं बोला। “तुम्हें खुश होना चाहिए।"

“जगमोहन और सोहनलाल के वहां पहुंचने का कोई फायदा नहीं होगा।"

"वो क्यों देवा?" __

“जथूरा की कैद का सिलसिला मेरे और मोना चौधरी के नाम से बांधा है। जब तक हम कैद के उस दरवाजे तक नहीं पहुंच जाते, तब तक जथूरा का किसी को दिखाई दे जाना भी सम्भव नहीं।

“ये बात तो सही कही। साथ चलते बांदा ने सिर हिलाया।

“तुम मुझे बता सकते हो कि जगमोहन-सोहनलाल इस वक्त कहां हैं?"

"नहीं बता सकता।"

"महाकाली से मेरी बात भी नहीं करा सकते?"

"ये तो मैं पहले ही मना कर चुका हूं।"

"तो तुम हमसे बातें क्यों करते हो?"

“अकेले में मन नहीं बहलता तो बातें करनी पड़ती हैं मुझे। एक बात और कहूं।"

“मैं सुन रहा हूं।"

“अगर तुम मेरे से रास्ते के बारे में पूछते तो मैं भी तुम्हें इसी रास्ते पर जाने को कहता।"

देवराज चौहान ने मुस्कराकर उसे देखा। कहा कुछ नहीं।

“मैं तुम्हें बता सकता हूं कि इस रास्ते के अंत में तुम्हें क्या नजर आएगा।"

देवराज चौहान खामोश रहा।

“तुम पूछोगे नहीं देवा कि क्या है इस रास्ते के अंत में। ये कहां जाकर खत्म होगा।"

"मुझे बता दे।” महाजन कह उठा।

"मैं तो देवा को बताऊंगा, वो भी अगर पूछे तो तब।” बांदा ने कहा—“क्यों देवा, बताऊं क्या?"

"बता।”

“सांभरा की नगरी है।"

"सांभरा कौन?"

"ये मैं नहीं बताऊंगा। वहां जाओगे तो खुद ही जानोगे।”
 
"फिर ये भी बताने की क्या जरूरत थी कि रास्ते के अंत में सांभरा की नगरी मिलेगी।"

"कोई तो बात करनी थी मैंने, ये कर दी।"

“थारे को बोत मारूंगा बांदो।"

“तुम जानते हो कि तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। एक बार कोशिश तो कर चुके हो।”

“थारे को देखकर तो म्हारे को अगन लग जावे।" बांदा मोना चौधरी को देखकर कह उठा।

“लगता है मिन्नो मेरे से ज्यादा ही नाराज है।"

"तुमने।” नगीना कह उठी—“ऐसा कोई काम नहीं किया कि तुमसे कोई खुश हो।” –

“मैं तो कोशिश कर रहा हूं कि आपको खुश करूं, परंतु आप सब खुश होते ही कहां हैं।"

“झूठ मत कहो।"

“मेरी सच बात को भी झूठ मानोगे तो...।" ।

“सांभरा की नगरी में क्या है?" मोना चौधरी ने पूछा।

"नगरी है।” "वहां क्या होता है?"

"ये नहीं बताऊंगा। तुम क्या सोचती हो कि मुझे बातों में लगा के सच निकलवा लोगी।”

तभी पीछे से बांके ने बांदा को जोरों से चूंसा मारा।

बांदा की परछाई वहां से छिन्न-भिन्न हो गई, जहां बांके ने घूसा मारा था। हाथ परछाई को पार करके आगे निकल गया। बांके के चेहरे पर गस्सा था। वार खाली जाते पाकर, बांके ने अपना हाथ वापस खींचा तो पल-भर में ही, बांदा की परछाई का पहले की तरह पूर्ण रूप नजर आने लगा। "

“हम इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।” तवेरा ने कहा—“क्योंकि ये परछाई के रूप में हमारे सामने है।" ____

“शरीरों के साथ सामणो होता तो अंम इसो को 'वड' देता।"

बांकेलाल राठौर गुर्राया।

बांदा हंस पड़ा।

“महाकाली को पता था कि ऐसा होगा, तभी तो उसने परछाई के रूप में तम लोगों के सामने जाने को कहा।

“तुम्हें लगता नहीं कि तुम घटिया हो।” पारसनाथ बोला।

"क्यों?"

"मुसीबत में पड़े लोगों के सामने और मुसीबतें डाल रहे हो।"

“मैं तुम लोगों को फौरन मुसीबत से छुटकारा दिला सकता हूं।"

“वो कैसे?"

"बस, एक बार कह दो कि महाकाली की मायावी पहाड़ी से बाहर निकलना चाहते हो।"

“और तुम हमें बाहर निकाल दोगे।"

"फौरन निकाल दूंगा। अच्छा रास्ता यही है कि यहां से वापस चले जाओ।”

“यही तो महाकाली चाहती है।”

“महाकाली तो बहुत कुछ चाहती है। परंतु इस वक्त तुम अपनी बात करो। निकालूं बाहर?"

“हम जथूरा को आजाद कराने आए हैं यहां।"

“ये काम तुम लोगों के बस का नहीं।"

“तुम हमें जथूरा तक पहुंचा दो। बाकी काम हम पूरा कर लेंगे।" पारसनाथ ने कहा।

तभी महाजन बोला।

"तुमने कहा कि जगमोहन-सोहनलाल उस जगह पर जा पहुंचे हैं, जहां जथूरा कैद है।"

“कहा तो?"

“वो वहां कैसे पहुंच गए?" ___

"किस्मत के धनी थे कि पहुंच गए। बूंदी ने तो बहुत चेष्टा की कि वो रास्ता भटक जाएं।” |

"इत्तफाक से पहुंचे?"

“यही समझो।"

"तुम्हें अब चले जाना चाहिए यहां से।"

"मैं जानता हूं मेरी कोई इज्जत नहीं है। क्योंकि हर जगह पर बिन बुलाए ही पहुंच जाता हूं।"

"तम तो नम्बरी बेईज्जतो हौवे। थारी तो मूंछों भी न होवे।"

“मेरे खयाल में मुझे चुपचाप तुम लोगों के साथ चलते रहना चाहिए।"

“तुम चले क्यों नहीं जाते?" ।

"क्योंकि तुम सब को समझाने की जरूरत पड़ेगी अभी। वरना बहुत बड़ी गलती कर दोगे।"

"कैसी गलती?"

"जब समझाऊंगा तो, समझ जाओगे।"

"ये हमें गलत रास्ता ही, गलत बात ही समझाएगा।” मोना चौधरी सख्त स्वर में कह उठी।

जवाब में बांदा मुस्कराता रहा। कहा कुछ नहीं।

लम्बे वक्त के बाद उन सबका सफर खत्म हुआ।

जंगल से वे बाहर निकल आए। सामने ही चारदीवारी जाती दिखाई दी, जो कि दस फीट ऊंची थी। कुछ दूर चारदीवारी में लगा

बीस फूट बड़ा लकड़ी का फाटक लगा नजर आया।

ये नजारा सब देख रहे थे।

"बांदो। ये का हौवे?"

“चारदीवारी के भीतर सांभरा की नगरी है।” बांदा ने बताया।

"वो इत्तो बड़ो दरवाजो?"

“नगरी के भीतर प्रवेश करने का दरवाजा है।"

"चल्लो, अंम नगरो के भीतरो जायो।” बांकेलाल राठौर ऊंचे स्वर में बोला।

“वहां लफड़ा होईला बाप।”

“थारे को कैसो पतो कि वां पे लफड़ो हौवे?"

“आपुन का दिल कहेला बाप।" ।

“थारा दिल जरूरतों से ज्यादो बोल्लो हो।" देवराज चौहान ने बांदा को देखा तो बांदा ने मुंह फेर लिया।

“इससे कुछ मत पूछो।" मोना चौधरी कह उठी। फिर सब चारदीवारी में लगे, लकड़ी के फाटक की तरफ बढ़ गए। तवेरा को चुप-चुप पाकर रातुला उसके पास आकर बोला।

“तुम क्यों खामोश हो तवेरा?"

“रातुला, मैं नीलकंठ के बारे में सोच रही हूं।” तवेरा सोच-भरे स्वर में कह उठी।

"क्या?"

"वो अचानक खामोश क्यों हो गया? वो तो मिन्नो का साथ देने का वादा करने को बोला, परंतु जब प्रणाम सिंह ने एक-एक करके सबको उस गहरी जगह में फेंका तो, नीलकंठ ने मिन्नो को बचाया क्यों नहीं?"

"तेरे को इसमें रहस्य लगता है?"
 
"रहस्य तो अवश्य है।"

"वो क्या?"

"मैं नहीं समझ पा रही। नीलकंठ बिना वजह तो पीछे हटा नहीं। अवश्य कोई गहरी बात है। जो कि पूछने पर भी नीलकंठ ने बताया नहीं।” तवेरा ने कहते हुए रातुला पर निगाह मारी।

रातुला ने फिर कुछ नहीं कहा।

मखानी चलते समय रह-रहकर नाराजगी-भरी निगाहों से कमला रानी को देख लेता था।

कमला रानी को उसकी नाराजगी का एहसास था तभी तो वो मखानी की तरफ देख ही नहीं रही थी।

वो सब चारदीवारी में लगे लकड़ी के फाटक पर जा पहुंचे।

वहां पीले कपड़ों में भाला थामे दो पहरेदार खड़े थे। दरवाजा बंद था। ____

“भीतरो को चल्लो। ठंडा पाणी तो पीनो के मिलो हो।” बांकेलाल राठौर कहता हुआ दरवाजे की तरफ बैठा।

तभी बांदा कह उठा। “ये गलती मत करना।”

बांके ठिठका। सबकी निगाह बांदा की तरफ गई। “थारे को का दर्द हौवे, म्हारे भीतरो जाणें से?"

“अंदर तुम सबके लिए भारी खतरा है।"

"कैसे?" महाजन ने पूछा।

“ये पहरेदार तो तुम लोगों को भीतर जाने देंगे, परंतु सांभरा के लोग तुम सबको पकड़कर बंदी बना लेंगे। सांभरा जाति की रीति है कि जो भी बाहरी व्यक्ति नगरी में प्रवेश करता है, उसे सांभरा का एक काम पूरा करना पड़ता है। जो उनके कहे काम को पूरा नहीं कर पाता, उसे वे जान से मार देते हैं।"

“थारी बातों का भरोसो म्हारे को न होवे।"

"ये बात मैं एकदम सच कह रहा हूं।" बांदा ने कहा।

"हम सांभरा की नगरी में जाएंगे।" मोना चौधरी कह उठी।

नगीना ने देवराज चौहान से पूछा। “आप क्या कहते हैं?"

“मुझे किसी भी बात पर कोई एतराज नहीं। क्योंकि हम दिशा भटके हुए हैं। हमें नहीं मालूम कि जथूरा कहां पर है और हमें किस तरफ जाना है। रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं है।" देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

“शायद इस नगरी से हमें पता चल सके कि जथुरा कहां पर है। क्या पता वो इसी नगरी में हो।” नगीना बोली।

तभी रातुला पास आकर बोला। "क्या तुम नगरी के भीतर जाने को तैयार हो?"

"हां।" बांदा पूनः कह उठा।

“इस नगरी के भीतर प्रवेश मत करना, वरना वो लोग तुम सबको मार देंगे।”

"बहुत चिंता हो रही है हमारी?" देवराज चौहान मुस्कराया।

“हां, क्योकि तुम लोगों की शिकायत है, मैं तुम्हारे बारे में नहीं सोचता। अब सोच रहा हूं। मैं तो... "

“तुम कभी भी हमारे बारे में, सही नहीं सोच सकते।"

"ऐसा न कहो।”

"तुम हमें हमेशा सही रास्ते पर बढ़ने से रोकोगे।” देवराज चौहान ने कहा।

"तो नहीं मानोगे?"

"नहीं।"

“ठीक है, जाओ नगरी के भीतर। मैं भी तो यही चाहता हूं कि तुम सब नगरी के भीतर जाओ।"

“यही चाहते हो तो फिर रोक क्यों रहे थे?"

“ताकि तुम पक्का इरादा बना सको, नगरी के भीतर जाने का।” बांदा मुस्करा पड़ा।

“यो बोत बड़ो हरामी हौवे।" ।

"हमें इसकी बात सुननी ही नहीं चाहिए।” पारसनाथ कह उठा।

तभी मोना चौधरी आगे बढ़ी और फाटक पर खड़े पहरेदारों के पास जा पहुंची।

“ये किसकी नगरी है?"

"सांभरा की।" एक पहरेदार ने कहा।

"दरवाजा खोलो, हमें भीतर जाना है।" मोना चौधरी ने कहा।

अगले ही पल पहरेदारों ने दरवाजे के एक पल्ले को धक्का देकर खोला।
 
अगले ही पल पहरेदारों ने दरवाजे के एक पल्ले को धक्का देकर खोला।

भीतर आते-जाते लोग सबको दिखे।

“आप लोग भीतर जाइए।" मोना चौधरी खुले दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

तभी बांदा का स्वर सुनाई दिया। "अभी भी वक्त है, रुक जाओ।"

“तुम तो घनचक्कर होईला बाप।” रुस्तम राव कह उठा—“कभी रुकने को बोईला तो कभी चलने को बोईला।" ___

“मैं तो इसलिए रोक रहा हूं कि तुम लोग जिद में आकर भीतर जाओ।" बांदा मुस्करा पड़ा। __

"तंम पागलों हौवे । थारा बापो भी पागलो हौवे जो साड़ी पहनो के दुल्हन बनो हो।”

बांदा हंस पड़ा।

"हंसो बोत तंम । दांतो साफ करो ना।" । एक-एक करके सब दरवाजे से नगरी के भीतर प्रवेश कर गए। पहरेदार धकेलकर ऊंचा दरवाजा बंद करने लगा। बांदा मुस्कराता हुआ बाहर ही खड़ा रहा।

नगरी में पर्याप्त चहल-पहल थी। रोज की तरह सारे कार्य हो रहे थे।

देवराज चौहान, नगीना, मोना चौधरी, बांके, रुस्तम, पारसनाथ, महाजन, मखानी, कमला रानी, तवेरा और रातुला सांभरा नगरी के लोगों में जा पहुंचे थे। हर कोई उन्हें उत्सुकता-भरी नजरों से देख रहा था। क्योंकि वे सब नगरी के लोगों से जुदा लोग थे। अजनबी थे। एक छोटे-से मकान के दरवाजे पर खड़ी महिला से बांकेलाल राठौर बोला।

"बहणो म्हारे को ठंडो पाणी पिलायो जरो।"

"अभी लाई।” कहकर वो भीतर चली गई। बाकी सब ठिठके।

"ये साधारण, किंतु साफ-सुथरी नगरी है।” तवेरा ने कहा।

“महाकाली की माया है ये। रातुला बोला।

“परंतु यहां हम करें क्या रातुला भैया।” नगीना बोली।

“तुम सबकी तरह हम भी यहां पहली बार ही आए हैं।” रातुला ने कहा- "देवा-मिन्नो से पूछो।”

“अभी तक महाकाली ने हमारे सामने खास खतरनाक हालात पैदा नहीं किए।" तवेरा ने कहा। ___

“हम तो खतरों में फंसे-फंसे ही यहां पहुंचे हैं।” महाजन कह उठा। __

“अभी तुम लोग महाकाली को जानते नहीं।” तवेरा कह उठी—“सच बात तो ये है कि अभी तक उसने अपना असली रूप दिखाया ही नहीं। लेकिन कभी भी हमें उसकी भयंकर चालों से सामना करना पड़ सकता है।"

“थारो मतलबो कि मुसीबतों अम्भी शुरू होवो?"

"कुछ भी हो सकता है।” तभी औरत जग जैसे बर्तन में पानी ले आई। बांके ने हाथ से पानी पिया कि मखानी भी पास आ पहुंचा।

“मैं भी पिऊंगा।" मखानी को भी औरत ने पानी पिलाया। पानी पीने के बाद मखानी औरत को देखकर मुस्कराया।

“तुम कितनी अच्छी हो।"

"क्या बोला।” गुस्से में आ गई औरत ने पानी का बर्तन मखानी पर दे मारा।

मखानी बर्तन से बाल-बाल बचा और तेजी से आगे बढ़ गया।

सब चल पड़े। कमला रानी मखानी के पास पहुंची और कह उठी। "क्या कहा था तूने औरत से?"

“कुछ नहीं।" मुंह फुलाए मखानी बोला।

"कुछ मांगा होगा उससे।"

"क्या?"

“वो ही जो तू मेरे से मांगता है।"

"वो नहीं मांगा।"

"तो?"

“वो पागल थी। अपनी तारीफ नहीं सुन सकी। मैंने तो उसकी तारीफ की थी।" _

“तूने सोचा कि तारीफ करेगा तो वो अपना सामान तेरे को दे देगी।"

“मैंने ऐसा नहीं सोचा। मुझे तो हर औरत खूबसूरत लगती है। तारीफ कर देता हूं। तुझे क्या?"

“मखानी दिल छोटा मत कर।” कमला रानी ने प्यार से कहा। मखानी ने मुंह फुलाए रखा। “मौका मिलते ही मैं तेरी सारी शिकायत दूर कर दूंगी।"

"तू अपनी बात पर खरी नहीं उतरती।"

“मौका मिलने दे। फिर तू एकदम खरी-खरी देखेगा मुझे।"

“सच कह रही है?"

"तेरी कमला रानी ने कभी झूठ बोला है क्या। याद कर महल में हम कितनी बार स्नानघर की तरफ गए थे।"

मखानी मुस्करा पड़ा। “अंडा संभाल के रखा है न?"

“हां, वो तो एकदम... "

"ठीक है, ठीक है। संभाल के रख उसे। मैं फोडूंगी जल्दी ही उसे।” ___

मखानी के लिए तो इतना ही काफी था। उसकी सब शिकायतें दूर हो गईं।

वो सब वहां के लोगों, वहां की जगहों को देखते आगे बढ़ रहे थे कि कानों में घोड़ों की टापों की आवाजें पड़ते ही उनके कदम ठिठक गए। वो सब पीछे को पलटे। पीले कपड़ों में आठ-दस घुड़सवार उनके पास आ पहुंचे। देखते-ही-देखते वे घोड़ों का घेरा बनाकर उनके गिर्द खड़े हुए और एक रोबीले स्वर में कह उठा।

"हमें अपनी नगरी में अजनबियों का आना पसंद नहीं।"
 
"हम यहां जथूरा की तलाश में आए हैं।”

“जथूरा?" वो घुड़सवार बोला—“उसे तो महाकाली ने कैद कर रखा है।"

"हम जथूरा को आजाद कराने आए हैं।"

“जथूरा की कैद ने तो हमारी नगरी की किस्मत बदल दी। वो आजाद हो जाए तो, हमें खुशी होगी।"

“तुम्हें मालूम है कि जथूरा कहां पर कैद है?"

“नहीं। इस बारे में हमें कुछ नहीं मालूम।"

तभी मोना चौधरी बोली।

"तुमने कहा कि जथूरा की कैद ने इस नगरी की किस्मत बदल दी। इसका क्या मतलब हुआ?"

“बांबा इस बारे में तुम्हें बताएगा।"

"बांबा कौन?"

“नगरी के मालिक सांभरा का सबसे विश्वसनीय सेवक। वो ही पचास बरसों से नगरी को चला रहा है।"

“सांभरा कहां गया?"

"बांबा के पास चलो। सब पता चल जाएगा। सांभरा की नगरी का नियम है कि बाहरी व्यक्ति जब नगरी में आता है तो उससे नगरी का कोई काम कराया जाता है। उसी नियम के मुताबिक तुम सबको भी नगरी का एक काम पूरा करना होगा। जो काम को पूरा न कर सकेगा, उसकी जान ले ली जाएगी। चलो हमारे साथ बांबा के पास।"

घोड़ों के घेरे में वो सैनिक सबको लेकर एक दिशा में चल पड़े।

“छोरे।"

"बोल बाप।” “इस बारो तो बांदो सच्चो बात ही कहो हो। वो ही बातो इधर यो बोल्लो हो।”

“बांदा बोत हरामी होईला।” ।

"उसो का बापो तो औरो भी हरामो हौवे । दुल्हन बनो के बैठो हो कि शायदो गोटी फिट हो जावो।” बांकेलाल राठौर ने मुंह बनाकर कहा—“वो तो अंम बचो के आ गयो, नेई तो जाणो का हो जायो।”

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छ: फीट का स्वस्थ, सेहतमंद व्यक्ति था। वो एक महल में मिला। सैनिक उन सबको बांबा के पास छोड़कर चले गए थे। इस वक्त वे सब महल के आम हॉल में मौजूद थे। आठ सैनिक पहरे पर, या सेवा के लिए पहले ही मौजूद थे। बांबा सबको देखता कह उठा। ___

“न तो तुम लोग मेरे मेहमान हो और न ही दुश्मन। नियम के मुताबिक तुम लोगों को, नगरी में प्रवेश करने की एवज में हमारा एक काम पूरा करना होगा। काम पूरा नहीं किया तो मार दिए जाओगे। कर दिया तो नगरी में रहने की जगह मिल जाएगी।

"हम यहां रहने नहीं आए।” नगीना बोली।

"तो?"

“जथूरा को कैद से आजाद कराने आए हैं।"

"बेशक तुम लोग अच्छा काम करने आए हो, परंतु हमारी नगरी के नियम तो पूरे करने ही होंगे।”

"तुम जानते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" ।

"इस बारे में हमारी नगरी में किसी को कोई ज्ञान नहीं। परंतु जथुरा को, जब महाकाली ने कैद किया तो हमारी नगरी का मालिक सांभरा नाराज होकर सामने की पहाड़ी पर चला गया। पचास बरस हो गए। परंतु सांभरा वापस नहीं लौटा। उसने पहाड़ी पर ऐसी रोक लगा रखी है कि, नगरी का कोई भी आदमी पहाड़ी चढ़कर उस तरफ नहीं पहुंच सकता। जबकि हम चाहते हैं कि सांभरा वापस आए और अपनी नगरी संभाले।" बांबा कह रहा था—“नगरी में जब भी किसी बाहरी व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया तो उसे एक ही काम सौंपा कि वो पहाड़ी पर जाए और सांभरा को समझाकर वापस नगरी में ले आए। अभी तक पच्चीस से ऊपर लोग सांभरा को समझाकर वापस लाने के लिए पहाड़ी पर जा चुके हैं लेकिन सांभरा का लौटना तो दूर, अभी तक वो भी वापस नहीं लौटे जो उसे बुलाने गए थे। अब मैं तुम लोगों को भी सांभरा को नगरी में लाने का काम सौंपता हूँ। तुम सब पहाड़ पर जाओ और सांभरा को समझाकर वापस ले आओ। अगर ये काम करने को तैयार नहीं हो तो कह दो. ताकि नगरी में प्रवेश करने की सजा के तौर पर तुम्हारी गर्दन अलग कर दी जाए।"

सब एक-दूसरे को देखने लगे।

बांबा सख्त किस्म का, अपनी बात पूरी करने वाला इंसान लगा था उन्हें।

बांकेलाल राठौर कह उठा। “म्हारी गर्दनो काये को 'वडो' हो। अंम थारे सांभरा को गोद में उठा के लायो पहाड़ो से।"

“सब तैयार हैं?" बांबा ने ऊंचे स्वर में पूछा।

“मन्ने कै दयो तो, एको ही बातो हौवे। सबो तैयार होवो। म्हारे को बोल्लो, पहाड़ किधरो हौवे?"

बांबा वहां खड़े सैनिकों से बोला। "इन्हें ले जाओ और पहाड़ के पास ले जाकर छोड़ दो।"

"खाणे-पीणो को कुछो न दयो भायो?"

“सांभरा को लेकर आओ। तब तक तुम सबके लिए खाना तैयार हो जाएगा।"

"म्हारी खातिर हलवाई बिठायो हो।” बांकेलाल राठौर कह उठा।

“जथूरा को कैद से आजाद कराने आए हैं।"

"बेशक तुम लोग अच्छा काम करने आए हो, परंतु हमारी नगरी के नियम तो पूरे करने ही होंगे।”

"तुम जानते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" ।

"इस बारे में हमारी नगरी में किसी को कोई ज्ञान नहीं। परंतु जथुरा को, जब महाकाली ने कैद किया तो हमारी नगरी का मालिक सांभरा नाराज होकर सामने की पहाड़ी पर चला गया। पचास बरस हो गए। परंतु सांभरा वापस नहीं लौटा। उसने पहाड़ी पर ऐसी रोक लगा रखी है कि, नगरी का कोई भी आदमी पहाड़ी चढ़कर उस तरफ नहीं पहुंच सकता। जबकि हम चाहते हैं कि सांभरा वापस आए और अपनी नगरी संभाले।" बांबा कह रहा था—“नगरी में जब भी किसी बाहरी व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया तो उसे एक ही काम सौंपा कि वो पहाड़ी पर जाए और सांभरा को समझाकर वापस नगरी में ले आए। अभी तक पच्चीस से ऊपर लोग सांभरा को समझाकर वापस लाने के लिए पहाड़ी पर जा चुके हैं लेकिन सांभरा का लौटना तो दूर, अभी तक वो भी वापस नहीं लौटे जो उसे बुलाने गए थे। अब मैं तुम लोगों को भी सांभरा को नगरी में लाने का काम सौंपता हूँ। तुम सब पहाड़ पर जाओ और सांभरा को समझाकर वापस ले आओ। अगर ये काम करने को तैयार नहीं हो तो कह दो. ताकि नगरी में प्रवेश करने की सजा के तौर पर तुम्हारी गर्दन अलग कर दी जाए।"

सब एक-दूसरे को देखने लगे।

बांबा सख्त किस्म का, अपनी बात पूरी करने वाला इंसान लगा था उन्हें।

बांकेलाल राठौर कह उठा।

“म्हारी गर्दनो काये को 'वडो' हो। अंम थारे सांभरा को गोद में उठा के लायो पहाड़ो से।"

“सब तैयार हैं?" बांबा ने ऊंचे स्वर में पूछा।

“मन्ने कै दयो तो, एको ही बातो हौवे। सबो तैयार होवो। म्हारे को बोल्लो, पहाड़ किधरो हौवे?"

बांबा वहां खड़े सैनिकों से बोला। "इन्हें ले जाओ और पहाड़ के पास ले जाकर छोड़ दो।" "खाणे-पीणो को कुछो न दयो भायो?"

“सांभरा को लेकर आओ। तब तक तुम सबके लिए खाना तैयार हो जाएगा।"

"म्हारी खातिर हलवाई बिठायो हो।” बांकेलाल राठौर कह उठा।

वे सब पहाड़ी के नीचे खड़े थे। बांबा का सेवक उन्हें वहां छोड़कर चला गया था। पहाड़ी काफी ऊंची थी।

तेज, कड़कती धूप थी। ऐसे में पहाड़ी पर चढ़ना किसी मुसीबत से कम नहीं था। शरीरों पर पसीने की लकीरें बह रही थीं। यूं ही बुरा हाल हो रहा था। - “खाणो-पीणो भी न दयो हो बांबो ने और पहाड़ो पर चढ़ने को बोल दयो।" ___

“सच में इतनी गर्मी में पहाड़ी पर चढ़ना कठिन काम है।" महाजन कह उठा। ___

“जाना तो पड़ेगा ही, वरना बांबा हमारी जानें ले लेगा।" पारसनाथ ने कहा।

“आओ। चढ़ाई शुरू करें।” देवराज चौहान ने कहा और आगे बढ़ गया।
 
सब उसके पीछे चल पड़े। फौरन ही वे पहाड़ी पर चढ़ने लगे। पहाड़ तप रहा था।

“छोरे।” बांके ने कहा—“तंम म्हारे पीछे कू रहो।"

"क्यों बाप?"

"अभी पहाड़ से नीचो गिरो तो तंम म्हारे को थाम लयो।”

“और आपुन को कौन थामेला बाप।”

“यो बात भी तन्ने ठीको बोल्लो हो। तंम तो म्हारे साथ पीछो को लुढ़को जायो।"

पहाड़ पर चढ़ते हुए नगीना, देवराज चौहान के पास पहुंचकर कह उठी।

“यहां पर हमारे साथ क्या हो रहा है, बताएंगे आप?"

"क्या पूछना चाहती हो?" देवराज चौहान बोला।

“जब से हमने महाकाली की मायावी पहाड़ी में प्रवेश किया है, तब से हमें चैन नहीं मिल रहा। हमारे साथ कुछ-न-कुछ ऐसा हो रहा है कि अपने इरादों को छोड़कर हम फालतू के कामों में व्यस्त होते जा रहे हैं।" नगीना ने कहा।

"हां, हर समय महाकाली हमें उलझाए हुए है।"

"अगर हमारे साथ यही सब होता रहा तो हम जथूरा को कैसे तलाश कर पाएंगे।"

"तुम्हारी आशंका सही है। इन कामों में उलझकर हमारा वक्त खराब हो रहा है।"

“हम जितना सोचते हैं कि इन बातों में नहीं उलझेंगे, उतना ही उलझ जाते हैं।" ___

“महाकाली ने अपनी गोटियां इस तरह फैला रखी हैं कि एक गोटी पर पांव पड़ता है तो दूसरी गोटी तक पहुंच जाते हैं, इसी प्रकार तीसरी गोटी पर। वो हमें सोचने का मौका नहीं दे रही कि हमारे साथ क्या हो रहा है।" देवराज चौहान ने कहा। __ “हम करें तो क्या करें । महाकाली तो हमें रास्ते से भटका रही है।"

__ “अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस वक्त तो सांभरा नाम की समस्या हमारे सामने है।"

"उसे नगरी में लाना होगा तभी बच सकेंगे।" देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।

"सांभरा मान जाएगा, नगरी में आने को।”

“नगरी में उसे लाना ही पड़ेगा। बेशक कंधों पर उठाकर ही उसे क्यों न लाना पड़े।"

“ये क्या बात हुई?"

“वो चलने को नहीं मानेगा तो ऐसा करना ही पडेगा।

तपती गर्मी में गर्म पहाड़ पर चढ़ने में उन्हें भारी परेशानी आ रही थी। कहीं-कहीं पर तो रास्ता इतना सीधा था कि नीचे गिरने

का खतरा लगा रहता। _ मोना चौधरी और तवेरा के खूबसूरत चेहरे तपकर सुर्ख-से हो रहे थे।

सबकी सांसें उखड़-सी रही थीं। प्यास से गला सूख रहा था। महाजन ने पारसनाथ से कहा।

“हम पूर्वजन्म में प्रवेश करने से बचना चाहते थे, परंतु बच न सके।" ____

“पोतेबाबा ने हमें घेरा ही इस प्रकार कि हम अपने बचाव में कुछ न कर सके।” पारसनाथ ने गहरी सांस ली। ___

"इन झंझटों से जाने कब मुक्ति मिलेगी। तुम्हारा क्या खयाल है कि हम जथूरा तक पहुंच जाएंगे।"

“जो हालात हमारे सामने आ रहे हैं, उन्हें सामने रखें तो यही लगता है कि हम जथूरा तक नहीं पहुंच सकते।" ___

“महाकाली पर्दे के पीछे रहकर हमें नचा रही है।" ।

"ये महाकाली की मायावी पहाड़ी है। शायद यहां हम अपनी मर्जी नहीं चला सकते।"

"फिर तो हमारा आना बेकार ही हुआ। शायद हमें अपनी जान बचाने के लाले पड़ जाएं।"

पारसनाथ गहरी सांस लेकर रह गया। मखानी पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते कमला रानी के पास पहुंचा। दोनों के चेहरे सुर्ख-से हो रहे थे। “थक गई कमला रानी।" मखानी बोला।

"हां कहूंगी तो क्या तू मुझे उठा लेगा?" कमला रानी ने कहा।

"तू हर समय सड़ी क्यों रहती है?"

“तू बातें ही ऐसी करता है।"

“मैंने तो प्यार से पूछा था।"

“मैं भी प्यार से ही जवाब दे रही हूं। तेरे को सब कुछ सड़ा-सड़ा सा लगता है तो मैं क्या करूं?"

"जानती है, जब भी तेरे पास आता हूं मेरा अंडा मेरे को चैन नहीं लेने देता।”

"जानती हूं।"

“जानती है—कैसे?"

"तेरे को तो उंगली थमा दूं तो तेरे अंडे का आमलेट बन जाता है। आगे की तो बात ही अलग है।"

"ऐ कमला रानी।"

"बोल-बोल, तेरे को ही तो सुन रही हूं मैं।"

“एक बार गले तो लग जा।" ।

"क्यों?"

"अंडे को कुछ आराम मिलेगा।"

"मैं क्या मशीन हूं तेरे अंडे को आराम देने के लिए। पहाड़ पर चढ़ रहा है और बात अंडे की कर रहा है। ये तेरा हाल है।"

“समझा कर।"

"सब समझती हूं मैं । तेरी तो नस-नस पहचानती हूं। तेरे को अंडे की देखभाल के अलावा, दूसरा कोई काम नहीं।"

“ये काम क्या कम है।"

"कमीना, साला।" बड़बड़ा उठी कमला रानी।

“क्या कहा?"

"कमीना, साला।”

“कह ले।” मखानी दांत फाड़कर मुस्कराया-"तेरी बात का बुरा थोड़े न मानूंगा।"

“सब अंडे का कमाल है, जो तू इतने मीठे बोल बोल रहा है।"

पहाड़ चढ़ते-चढ़ते शाम ढलने लगी थी।

सूर्य के सरक जाने से उन्हें बहुत राहत मिली थी। पहाड़ की चोटी अब ज्यादा दूर नहीं थी। वहां से नगरी की तरफ देखने पर, नगरी बहुत छोटी सी नजर आ रही थी। नगरी में रोशनियां होती, नजर आने लगी थीं।

“पौंच गयो ईब तो।”

“पक्का बाप। आपुन की तो जान खिसकेला।"

"तंम तो जवानो हौवे छोरे।”

“तुम क्या बुढ़ेला होईला बाप।"

“अंम भी जवानो हौवो। म्हारी मूंछ न देखो हो।”

सबकी हालात थकान-प्यास की वजह से बुरी हो रही थी। पसीनों से भरे हए थे वो।

अगर चोटी अब पास में न होती तो, थकान की वजह से उन्होंने चढ़ना बंद कर देना था। परंतु चोटी के पास में होने की वजह से थकान-भरे शरीरों में उत्साह भर आया था और पहाड़ पर चढ़ना उन्होंने नहीं छोड़ा था।

आखिर वो वक्त भी आया, जब वे पहाड़ के ऊपर जा पहुंचे। अभी दिन की रोशनी जरा-जरा बाकी थी।

पहाड़ का ऊपरी हिस्सा उन्हें समतल दिखा और वहां पेड़ खड़े भी दिखे। दूर एक जगह रोशनी होती दिखी। सब नीचे बैठे गहरी-गहरी सांसें ले रहे थे कि तभी सामने से एक आदमी आता दिखा।

"कोई आ रहा है।" मोना चौधरी बोली।

"सांभरा होगा।" तवेरा ने कहा।

सबकी निगाह करीब आते उस व्यक्ति पर जा टिकी थी।

“छोरे तंम जाणों हो इसो को?"

"आराम करने दे बाप।” मखानी ने मुस्कराकर प्यार-भरी निगाहों से कमला रानी को देखा। कमला रानी ने मुंह बनाकर दूसरी तरफ देखा।

‘साली नखरे बहुत लगाती है। मखानी बड़बड़ाया।

तभी वो व्यक्ति पास पहुंचा और मधुर स्वर में कह उठा। “सांभरा की तरफ से मैं आप सबका पहाड़ी पर स्वागत करता हूं।"

“तुम सांभरा नहीं हो?" पारसनाथ बोला।

“नहीं। मैं तो सांभरा का सेवक हूं।" “सांभरा अपने साथ सेवक भी पहाड़ पर ले आया था?" “नहीं। आया तो वो अकेला था। मैं और मेरे जैसे कुछ लोग वो हैं, जो अंजाने में नगरी में आ गए थे। तो बांबा ने हमें सांभरा को पहाड़ से नीचे लाने का काम दिया। हम पहाड़ पर पहुंचे और सांभरा की सेवा में लग गए।" __

“सेवा में क्यों लग गए?" |

“वो तपस्वी और प्रभावी इंसान है। दूसरों को राह पर लगाना उसे आता है।"

"तुम्हारा मतलब कि वो जादू-टोना जानता है?"

"मैंने ये नहीं कहा। उसके पास शक्तियां हैं। ताकतें हैं। जिनसे वो मनचाहा काम करा लेता है। वो महाकाली का सच्चा सेवक है।"

___ "हमने तो सुना कि सांभरा महाकाली की हरकत से नाराज होकर, पहाड़ पर आ गया था।"

"इस बारे में सांभरा ही कुछ कहे तो बेहतर होगा। मैं तो आप लोगों को लेने आया हूं।"

"कहां?"

"सांभरा के पास तो चलेंगे आप?"

देवराज चौहान की निगाह दूर होती रोशनी की तरफ उठी।

“हां, हम सांभरा से ही मिलने आए हैं।” मोना चौधरी ने कहा।

"तो चलिए मेरे साथ।” । थकान से भरे सब वहीं बैठे रहे।

"वहां पर थकान उतारने के लिए, ठंडे पानी का तालाब मिलेगा। उसके बाद गर्मा-गर्म खाना...।"

“खाना...पहाड़ पर?" मोना चौधरी बोली।
 
“जी हां। सांभरा को आप लोगों के आने की खबर थी। उसने पहले ही हमें खाना तैयार करने को कह दिया था। सांभरा को जो भी जानना होता है, अपनी ताकत के सहारे जान लेता है। उसकी नगरी में होने वाली हर बात की खबर उसे रहती है।" ___

"चलो उठो।" मोना चौधरी उठते हुए बोली— "हमें फौरन सांभरा के पास चलना चाहिए।"

.

.

उस व्यक्ति के साथ वे सब उस रोशनी के पास जा पहुंचे।

वहां पांच-छः व्यक्ति और भी दिखे, जो कि अपने कामों में व्यस्त थे। चार झोंपड़े वहां बने हुए थे, जिनमें रोशनियां हो रही थीं। प्रकाश फैलाने के लिए मशालें, पास के पेड़ों में फंसा रखी थीं।

सबने वहां की जगह का जायजा लिया। “सांभरा कहां है?" रातुला ने पूछा।

“वो अपने झोंपड़े में है। कुछ देर बाद वे खाने के लिए बाहर आएंगे, तब आप सबकी मुलाकात उनसे हो जाएगी। तब तक आप लोग तालाब पर चलकर नहा लीजिए। ठंडक मिलेगी नहाने से।”

"चलो।"

वो व्यक्ति कछ दूर एक छोटे-से तालाब पर पहुंचा।

चांद की रोशनी में पानी चांदी की तरह चमकता लग रहा था, खासतौर से तब जब चांद की परछाई तालाब से नजर आती। पहाड़ी पर इतने ऊपर तालाब पाकर सबकी सकून मिला।

"तंम इधरो आयो।" बांके ने उस व्यक्ति को बुलाया।

वो फौरन पास पहुंचकर बोला। “कहिए।"

"म्हारे को यो समझायो कि पहाड़ो पर तालाबो कैसो बन गयो?" बांके ने पूछा।

“सांभरा ने अपनी शक्तियों से ये तालाब बनाया है।"

"शक्तियों से?"

"हां। सांभरा ने वो विद्या ग्रहण कर रखी है, जिससे उसे शक्तियां हासिल हैं। महाकाली का आशीर्वाद भी है सांभरा पर। महाकाली ने भी कई शक्तियां सांभरा को वरदान के रूप में दी हैं।"

“मन्ने तो सनो हो कि जबो महाकालो ने जथरा को कैदो के लियो. सांभरो तभो से ही नाराज हो के पहाड़ो पे आ गयो।"

"आपने ठीक सुना है।"

“यो मामलो म्हारे को समझ में न आयो। तंम जरो खुलो के समझायो।”

"इस बारे में तो आप सांभरा से ही बात करें।"

"तंम न बतायो?"

"मुझे ज्यादा नहीं पता। वैसे भी मेरी जिम्मेवारी इस समय एक सेवक जैसी है।"
 
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