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आनन्द ने नज़र घुमाकर स्थिति का जायजा लिया और अपना रास्ता साफ देखकर वह मकान की बाउंड्री फाँद गया। फिर वह सीधा सड़क पर दौड़ता चला गया।
आनन्द के साथी सिपाही भी असली पुलिस पर भारी पड़ रहे थे। हालाँकि अचानक आक्रमण होने से बहुत से पुलिस के सिपाही तो मुफ्त में मारे गए थे, मगर अब भी काफी पुलिस फोर्स उनके मुकाबले पर थी। देखने-सुनने वाले अचरज में थे कि पुलिस-पुलिस की यह आपस में लड़ाई क्यों ? मगर सच्चाई तो कोई भी न जानता था।
आनन्द पुलिस यूनिफॉर्म में सड़क पर बेतहाशा दौड़ा जा रहा था, उसे अभी कोई छिपने का मौका नहीं मिला था, क्योंकि दो हवलदार उसके पीछे अब भी दौड़े आ रहे थे। उन्होंने न जाने कैसे आनन्द का यह इरादा भाँप लिया था।
भागते-भागते शहर पीछे छूट गया था। मगर वे दोनों हवलदार न तो पीछे हटे और न आनन्द को पकड़ पाए। अब विवश होकर एक हवलदार ने फायर किया, जिसे आनन्द एक ओर को कूदकर बचा गया। मगर आनन्द ने भी अब एक पल ठहरकर निशाना लिया और गोली मारी।
गोली मारने वाला हवलदार लुढकियाँ लेता हुआ जमीन पर लोट गया। आनन्द का निशाना उसकी खोपड़ी में लगा था।
उसे लुढ़कता जान आनन्द फिर सीधा भागता चला गया। मगर दूसरा हवलदार भी जीवट वाला आदमी था। वह अब भी लगातार आनन्द का पीछा किए जा रहा था। आनन्द ने पीछे मुड़कर एक क्षण ठिठक कर उसको भी निशाने पर लिया और वह हवलदार भी कटे पेड़ की तरह ढह गया। लेकिन इस बार आनन्द गच्चा खा गया। उस मरते हुए हवलदार ने जो एक गोली चला दी थी, वह आनन्द के पाँव में टखने में उतर गई थी।
आनन्द ने अब अपना रास्ता साफ देखा तो एक जगह ओट लेकर अपने सिविल कपड़ों के ऊपर से पुलिस वर्दी उतारी और एक बड़ा चौड़ा-सा कपड़ा फाड़कर तुरन्त गोली लगे घाव पर कसकर बांध लिया। थोड़ा-सा खून जो छ्लककर ऊपर आ रहा था, वह एकदम रुक गया।
सामने ही रेलवे स्टेशन नज़र आ रहा था।
आनन्द सीधा उधर ही भाग पड़ा। उसने कुछ दिनों के लिए अब यह शहर छोड़कर चले जाना ही अपने लिए बेहतर समझा था।
एक गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी थी। आनन्द अवैध तरीक़े से जो बेटिकट यात्री ट्रेन में चढ़ते थे, उसी रास्ते से आज प्लेटफार्म पर चला गया। फिर भी आनन्द के पहुंचते-पहुँचते गाड़ी सीटी देकर चल पड़ी थी।
आनन्द तेजी से दौड़कर उस गाड़ी के एक डिब्बे में चढ़ गया। कुछ पलों में ही गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली।
* * *
आनन्द के साथी सिपाही भी असली पुलिस पर भारी पड़ रहे थे। हालाँकि अचानक आक्रमण होने से बहुत से पुलिस के सिपाही तो मुफ्त में मारे गए थे, मगर अब भी काफी पुलिस फोर्स उनके मुकाबले पर थी। देखने-सुनने वाले अचरज में थे कि पुलिस-पुलिस की यह आपस में लड़ाई क्यों ? मगर सच्चाई तो कोई भी न जानता था।
आनन्द पुलिस यूनिफॉर्म में सड़क पर बेतहाशा दौड़ा जा रहा था, उसे अभी कोई छिपने का मौका नहीं मिला था, क्योंकि दो हवलदार उसके पीछे अब भी दौड़े आ रहे थे। उन्होंने न जाने कैसे आनन्द का यह इरादा भाँप लिया था।
भागते-भागते शहर पीछे छूट गया था। मगर वे दोनों हवलदार न तो पीछे हटे और न आनन्द को पकड़ पाए। अब विवश होकर एक हवलदार ने फायर किया, जिसे आनन्द एक ओर को कूदकर बचा गया। मगर आनन्द ने भी अब एक पल ठहरकर निशाना लिया और गोली मारी।
गोली मारने वाला हवलदार लुढकियाँ लेता हुआ जमीन पर लोट गया। आनन्द का निशाना उसकी खोपड़ी में लगा था।
उसे लुढ़कता जान आनन्द फिर सीधा भागता चला गया। मगर दूसरा हवलदार भी जीवट वाला आदमी था। वह अब भी लगातार आनन्द का पीछा किए जा रहा था। आनन्द ने पीछे मुड़कर एक क्षण ठिठक कर उसको भी निशाने पर लिया और वह हवलदार भी कटे पेड़ की तरह ढह गया। लेकिन इस बार आनन्द गच्चा खा गया। उस मरते हुए हवलदार ने जो एक गोली चला दी थी, वह आनन्द के पाँव में टखने में उतर गई थी।
आनन्द ने अब अपना रास्ता साफ देखा तो एक जगह ओट लेकर अपने सिविल कपड़ों के ऊपर से पुलिस वर्दी उतारी और एक बड़ा चौड़ा-सा कपड़ा फाड़कर तुरन्त गोली लगे घाव पर कसकर बांध लिया। थोड़ा-सा खून जो छ्लककर ऊपर आ रहा था, वह एकदम रुक गया।
सामने ही रेलवे स्टेशन नज़र आ रहा था।
आनन्द सीधा उधर ही भाग पड़ा। उसने कुछ दिनों के लिए अब यह शहर छोड़कर चले जाना ही अपने लिए बेहतर समझा था।
एक गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी थी। आनन्द अवैध तरीक़े से जो बेटिकट यात्री ट्रेन में चढ़ते थे, उसी रास्ते से आज प्लेटफार्म पर चला गया। फिर भी आनन्द के पहुंचते-पहुँचते गाड़ी सीटी देकर चल पड़ी थी।
आनन्द तेजी से दौड़कर उस गाड़ी के एक डिब्बे में चढ़ गया। कुछ पलों में ही गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली।
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