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माँ भारती के लाड़ले complete

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मालगाड़ी के प्रत्येक डिब्बे में दो-दो सशस्त्र आदमी छिपा दिए गए। सामान के डिब्बों के साथ अधिक भी थे। कुछ आदमी ड्राइवर के कक्ष में थे और कुछ पीछे गार्ड वाले कक्ष में। इन्हीं के साथ अपने लिए विशेष और उपयुक्त जगहों का चुनाव करके ये दोनों अधिकारी श्यामनारायण और रिक्सन तथा अन्य सहयोगी अधिकारी भी मुस्तैद हो गए थे।

इसी तरह पूर्णतया सुरक्षा का प्रबंध हो जाने के बाद मालगाड़ी ने प्लेटफॉर्म छोड़ा। आगे के लिए उन्होंने अगले स्टेशनों पर भी इसके बारे में सूचनाएं भेज दी थीं। इस समय मालगाड़ी की पूर्ण सुरक्षा और बागियों पर आक्रमण करने के लिए वे पूरी तरह तैयार थे।

बागियों के आक्रमण करने का समय नियत था, और स्थान भी, जो उनकी जानकारी में था। आगे बीच वाले स्टेशनों पर भी मालगाड़ी के गुजर जाने तक आगे-पीछे की गाड़ियों को रोक दिया गया था। इस मुकाबले में भारी हानि होने की आशंका थी।

हर कर्मचारी और अधिकारी पूर्णतया एक भी शब्द सुनने के लिए या देखने के लिए चौकन्ने थे। हाथ हर समय हथियारों पर था।

गाड़ी अपने निश्चित वेग से चली जा रही थी।

बीच में पड़ने वाले छोटे-छोटे दो स्टेशन भी गुजर गए थे। अभी तक किसी किस्म के हमले का कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुआ था।

समय धीरे-धीरे बीतता जा रहा था और दूरी कम होती जा रही थी। जिस स्थान पर आक्रमण की संभावना थी, वह ज्यों-ज्यों पास आता जा रहा था, गाड़ी में मौजूद हर दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। उन लोगों के हाथ अपने-अपने हथियारों पर कसते चले जा रहे थे।

लेकिन वह निश्चित स्थान भी किसी प्रकार की कोई मुश्किल पेश आए बिना निकल गया। निश्चित स्थान पर भी बागियों ने हमला नहीं किया।

* * *

[ग्यारह]

खराब मौसम में…।

पिछली रात को काफी रात बीत गई थी, जब आनन्द अपने साथियों के पास नेताजी के अड्डे पर पहुंचा तो वह हैरान रह गया। वहाँ तो सिर्फ उसके साथी नवाब आदि ही थे। जिनसे मिलाने वह इन लोगों को ले आया था, वे तो वहाँ थे ही नहीं।

नवाब व अन्य सभी साथी उसी खंडहर में डेरा डाले बैठे हुए सुस्ता रहे थे। आनन्द भी एक स्थान पर अपना घोड़ा बांधकर आया और थका-हारा सा वहीं नवाब के पास बैठ गया। उसने पहला प्रश्न यही किया, “नेताजी वगैरह नहीं दिखाई देते। उनका कोई साथी या सामान भी नज़र नहीं आता। क्या कोई मिला तुम्हें ?”

नवाब ने अनभिज्ञता जताई, “जब हम यहाँ पहुँचे, यह खंडहर यूँ ही सुनसान था। यहाँ कोई नहीं था। एक बार को मैंने सोचा, हम भटककर कहीं गलत जगह पर आ गए हैं। मगर फिर मैंने काफी सोच-समझकर यही फैसला किया कि तुम्हारे आने तक इंतज़ार करते हैं और यहीं डेरा डालते हैं।”

“हूँ।” बहुत थका-से स्वर था आनन्द का। तीन दिन से वह लगातार चल रहा था।

नवाब कह रहा था, “कुछ खा-पीकर और आराम करके फिर आगे का देखेंगे। अभी हम लोगों ने खाना बनाया और खाया है। तुम भी कुछ खालो न।”

“हूँ, मंगवाओ।” आनन्द ने इधर-उधर देखा। ईंटों को जोड़कर कुछ चूल्हे बनाए गए थे। उन्हीं पर आनन्द की नज़र चली गई। इन्हीं चूल्हों पर बनाकर रूखी-सूखी रोटी वे लोग खाते थे। कभी गुड़ के साथ, कभी अचार के साथ।

नवाब ने अपने एक आदमी को बुलाया। वह आनन्द के लिए खाना डालने लगा। तब तक आनन्द ने नवाब से वह थैला मांगा जिसमें उसने अपना भी कुछ सामान रखा था। उसी थैले में से ढूँढकर आनन्द ने वह बेतार वाला यंत्र निकाला।

खाना आ गया। आनन्द खाना खाने लगा।

खाना खाने के बीच आनन्द ने बताया, “मुझे यह तो पता है कि नेताजी थोड़े-थोड़े दिन बाद अपने अड्डे बदलते रहते हैं। उनका नियम है कि वे एक जगह कभी ज्यादा दिन नहीं ठहरते। यह हमारे मिशन के लिए ठीक भी है। मगर अभी अचानक वे जगह बदल लेंगे, ऐसा कोई इशारा तो उन्होंने नहीं दिया था। लगता है, अचानक उन्होंने कोई खतरा सूंघ लिया होगा औऱ आनन-फानन में ही यहाँ से निकलना उन्हें सही लगा होगा।”

नवाब और कुछ अन्य साथी भी उनके पास आ बैठे थे। अब वे आनन्द की बात ध्यान से सुन रहे थे।

खाने के बाद आनन्द ने बेतार के यंत्र से सम्पर्क साधा। बड़ी देर में और बड़ी मुश्किल से सम्पर्क स्थापित हो पाया। तब छोटी-सी बात हुई और सम्पर्क फिर टूट गया।

उस समय के यंत्र ऐसे ही थे। मगर तब इनका भी बड़ा सहारा होता था।

बेतार यंत्र को समेटकर फिर से थैले में रखते हुए आनन्द ने नवाब से कहा, “नवाब मुझे नेताजी के दल का पता चल गया है। उनका पड़ाव इस समय उत्तर-पूर्व में कहीं है। तुम फिर यहीं रुको और, मैं उनसे मिलकर आता हूँ।”

“अरे, अभी चल दोगे। अभी तो तुम आए हो और बहुत थके हुए हो।”

“कोई बात नहीं। कभी-कभी ऐसा भी होता है नवाब। जिंदगी इम्तहान लेती है।” कहकर आनन्द फीकी-सी हँसी हँसा, “सरदार से मेरी बात हुई है। वे कह रहे हैं कि किसी ने उनकी खुफियागिरी की थी। इसलिए वे यहाँ से निकल भागे।”

“ओह !” नवाब को आश्चर्य नहीं हुआ, बल्कि वह मुस्कराया।

“उधर, गांव वालों से उन्हें खबर मिल गई है कि खुफियागिरी के बाद छापा मारकर पुलिस निराश होकर वहाँ से जा चुकी है। अतः दो-एक दिन यहाँ अब कोई नहीं फटकेगा। तुम लोग यहाँ बेफिक्र होकर रुक सकते हो। मैं तुरन्त जाता हूँ और तुरन्त लौटकर आता हूँ क्योंकि नया खतरा आने से पहले ही हमें यह जगह छोड़ देनी है।”

आनन्द लपक कर आगे बढ़ा। चलने से पहले उसने सबसे हाथ मिलाए। जाकर उसने अपना घोड़ा खोला। तुरन्त उसकी पीठ पर सवार हुआ औऱ चल पड़ा।

रात काफी जा चुकी थी। आधी रात का समय रहा होगा। आसमान काला नज़र आ रहा था। लगता था बारिश होने के आसार हैं मगर अभी बहुत देर से हो भी नहीं रही थी।

ऐसे में झाड़ियों और फसलों भरे खेतों के बीच से होता हुआ आनन्द सुनसान रास्ते पर अकेला ही बढ़ रहा था। रात के सन्नाटे के साथ-साथ मेंढक और झींगुरों की आवाजों का शोर भी वातावरण में गूंज रहा था।

आनन्द अपने घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा था। वह शीघ्र नेताजी के नए पड़ाव तक पहुँच जाना चाहता था। वह सोचता जा रहा था, मगर उसके आँख और कान पूरी तरह सजग थे।

एक बात जो सरदार ने उसे बताई थी, वह उसने नवाब को नहीं बताई थी, वह यह थी कि इस बार पत्रकार लता के पिता ओंकारनाथ ने उनकी मुखबिरी की थी। उधर लता वहाँ रोज-रोज आने लगी थी। अब सरदार उससे भी पीछा छुड़ाना चाहते थे।

उसने यह बात नवाब से इसलिए छिपा ली थी कि अभी वे इस क्षेत्र में नए ही थे और ऐसी खबर सुनकर उनका मनोबल गिर सकता था।

आनन्द इसी विषय में सोचता जा रहा था। लता का भोला मासूम-सा चेहरा उसकी आँखों में उतर आया था। वह सोचने लगा — क्या अकेले उसके पिता ने ही यह धोखा किया है या लता की भी इसमें सहमति है ?

उसे लगा — नहीं, लता नौजवान है, क्रांतिकारियों के प्रति भावुक है और देशप्रेमी है। उसने ऐसा नहीं किया होगा। लेकिन यह हो सकता है कि ओंकारनाथ ने यह इसलिए किया हो कि क्रांति-दल पकड़ा जाएगा तो उसकी इकलौती बेटी निरुपाय होकर घर बैठ जाएगी। दीवानों की तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के लिए घर से गायब न रहेगी।

इससे भविष्य में उनकी बेटी की वजह से जो बदनामी होने वाली है, वह न होगी। मगर लता की वजह से उन पर तो यह नई मुसीबत आ गई। आनन्द को उस पल तो रह-रहकर लता पर ही गुस्सा आ रहा था। वह अब लता के बारे में ही सोचने लगा था।

एकाएक पास ही की झाड़ी से किसी उनींदे पक्षी के पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आई। आनन्द का ध्यान लता से हट गया औऱ उसे ऐसी ही एक पुरानी घटना याद आ गई तो वह हँस पड़ा।

तुरन्त उसके दिमाग में कौशल का चेहरा तैर गया।

कुछ देर यूँ ही तैरता रहा। फिर स्वतः वह चेहरा किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह भाव बदलने लगा। कभी वह चेहरा जिस पर करुणा का भाव था, कभी हल्का-सा क्रोधित चेहरा, कभी भयभीत चेहरा, तो कभी मूक प्यार की चमक लिए, कभी शरारती ढंग से मुस्कराता चेहरा उसके सामने आ रहा था।

धीरे-धीरे सब चेहरे सिमटते चले गए। आनन्द सोचने लगा — यह कौशल क्यों चाहे-अनचाहे उसके दिमाग में उतरती जा रही है ? उसने स्वयं से प्रश्न किया — क्या इसलिए कि वह पहली बार लड़की के सम्पर्क में रहा है ? हाँ शायद यही सच है। उसकी तो कोई बहन भी नहीं थी। उसने कोई मुंहबोली बहन भी नहीं बनाई। तो क्या यह बहन-भाई वाले प्रेम का आकर्षण है या वह स्त्री-सौंदर्य के आकर्षण में फंस गया है ?
 
तभी उसके मन ने इसे फटकारा — नहीं, यह सब अच्छा नहीं है। ऐसी बातों को दिल में जगह मत दो। एक क्रांतिकारी के लिए यह उचित नहीं। मोह-ममता औऱ प्रेम-प्यार की बातें कैसे निभाई जाएंगी ? इसलिए इस भावना पर काबू पाना ही होगा। दिल पर पत्थर रखकर ही देश के लिए जान कुर्बान की जा सकती है।

एकाएक जोर से बिजलियाँ कड़कीं। बादल जोरों से गरजे। कुछ ही पलों बाद पानी पड़ने लगा।

रास्ते भर तेज-हल्की बारिश होती रही और वह भीगता रहा।

आनन्द जब तक नेताजी के नए पड़ाव पर पहुंचा तो रात आधी से अधिक जा चुकी थी। बारिश तो बन्द हो गई थी, मगर आनन्द भीगकर तर हो गया था।

* * *

अगले दिन, दिन के निकलने में कुछ ही देर रह गई थी, जब आनन्द नेताजी से मिलने के बाद लौटकर नवाब के पास पहुंचा।

रात भर नवाब व अन्य साथी आनन्द के इंतज़ार में ही थे और गुजरी रात उन्होंने कभी सोते औऱ कभी जगते हुए बिताई थी। उन्होंने आनन्द के बैठते ही सवाल पूछने शुरू कर दिए थे। नवाब ने पूछा, “कुछ पता चला ?”

“हाँ। पता लग गया है। वे लोग उत्तर-पूर्व दिशा में एक जगह डेरा डाले हुए हैं। दिन चढ़ते ही उनका प्रोग्राम है ट्रेन डकैती का। एक मालगाड़ी धीरजगढ़ से चलेगी और साढ़े नौ बजे के आसपास, उत्तर-पश्चिम की लाइन पर नदी के पुल पर पहुंचेगी। उसमें फौजी कुमुक-रसद और अनाज व कपड़ा आदि जाएगा। उसी पुल पर वे लोग हमला करेंगे। हमें भी अब वहीं पहुंचना है।”

नवाब को एक झटका-सा लगा। उसके चेहरे के भाव बदल गए।

उन भावों को देखकर आनन्द ने उससे पूछा, “क्या बात है ?” साथ ही उसे छींक आई। फिर तो उसने दो-तीन बार छींका। शरीर का ताप कुछ बढ़ता हुआ महसूस हुआ।

नवाब बोला, “जब मैंने डीएसपी का खून किया था, उससे पहले ही मैंने डीएसपी और रिक्सन की बातें फोन पर सुनी थीं। फोन पर डीएसपी ने रिक्सन से यह जिक्र भी किया था कि उन्हें किसी मुखबिर ने क्रांतिकारियों द्वारा मालगाड़ी लूटे जाने के इरादे के बारे में खबर दी थी।”

“नवाब, यह क्या कह रहे हो ?” आनन्द चौंका।

नवाब बता रहा था, “तब मुझे मालूम नहीं था कि वह क्रांति-दल नेताजी वाला ही है। अब यह बात मुझे समझ आई है। आनन्द, वहाँ तो पुलिस द्वारा पूरा जाल बिछाया जा चुका होगा।”

“ओह, मेरे ईश्वर ! यह क्या हुआ ? तुमने मुझसे पहले ही जिक्र क्यों नहीं किया ?” आनन्द के चेहरे पर एकदम तनाव दिखने लगा, “वे तो साक्षात मौत के मुँह में जा रहे हैं। अंग्रेजी पुलिस उनका जाते ही गोलियों से स्वागत करेगी।”

“ओह !”

आनन्द दृढ़ स्वर में बोला, “नवाब तुरन्त यहाँ से कूच करो। उन्हें हमारी मदद की सख्त जरूरत है। समय पर हम पहुंच गए तो उन्हें हमला करने से पहले ही रोक लेंगे। वैसे वे पहले से निश्चित स्थान पर हमला नहीं करेंगे। दूसरी जगह करेंगे लेकिन खतरा तो ज्यों का त्यों है।” कहते-कहते आनन्द को एक के बाद एक कई छींके आ गईं।

तुरन्त तैयारी हो गई और उनका काफिला वहाँ से चल दिया। आनन्द उनका मार्गदर्शन कर रहा था।

रास्ते में ही उन्हें दिन निकल आया था। कुछ दूर आगे चलकर उन्होंने पुल की तरफ जाने के लिए एक दूसरा रास्ता पकड़ लिया था।

आनन्द को भीगने के कारण सर्दी लग गई थी। खाँसी उठने लगी थी और नाक बह चली थी। राह में चलते- चलते उसे तेज बुखार हो गया था मगर इस समय उसे इसकी फिक्र नहीं थी। वह तो खुद ज़ल्दी पहुंचकर अपने साथियों की जान खतरे में पड़ने से बचाना चाहता था। वह इस समय अर्ध-चेतना की सी अवस्था में था मगर उसने अपने होशोहवास पर पूरी तरह काबू कर रखा था।

लेकिन जो होना था, होकर ही रहा !

आनन्द आदि जब पुल पर पहुंचे तो सब कुछ घट चुका था। पुल पर और पुल के दोनों तरफ़ अंग्रेजी सैनिकों और क्रांतिकारियों की लाशें बिछी हुई थीं। किसी गद्दार मुखबिर की स्वार्थपूर्ति का शिकार सारे दल को होना पड़ा था।

सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से रह गए थे। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनके पैर जमीन पर से उखड़ गए थे और वे हवा में लटके हुए थे जो किसी भी समय मुँह के बल ज़मीन पर गिरने वाले थे।

आनन्द को लगा जैसे उसकी अब तक की एकत्र की हुई पूँजी कोई लूट ले गया है। उसे इस वक़्त एक बार फिर से वही अनुभूति हो आई जैसी उस वक़्त हुई थी जब उसके पूरे परिवार व मकान आदि को जलाकर रख कर दिया था। चार जिंदगियां छीन ली थीं। अब भी उसे यही लग रहा था कि दुबारा से बसाया गया उसका घर फिर उजड़ गया है, बर्बाद हो गया है। महीनों का किया धरा कुछ ही देर में समाप्त हो गया है। हाथ क्या लगा ?

आनन्द का दिमाग इस समय वैचारिक पीड़ा से भरा जा रहा था। तरह-तरह के विचार उसके दिमाग में कौंध रहे थे।

उसे लग रहा था कि कहीं कुछ कमी रह गई थी उनके निर्णय लेने में। उसने क्रांति के रास्ते पर कूदने का जो एकदम फैसला किया था, वह शायद जल्दबाज़ी में बिना सोचे-समझे किया गया था। लेकिन अब उसे यह भान हुआ था कि वह निर्णय कच्चा था, वह एकदम ठीक नहीं था।

महीनों दौड़धूप करके और जान हथेली पर रखकर जो कुछ किया, उसका कोई विशेष फल नहीं निकला। आखिर कब तक वे लोग इस तरह जुड़-जुड़कर टूटते रहेंगे ? शक्तिशाली शासन के सामने कब तक वह ये दुस्साहसपूर्ण कार्य करते रहेंगे ?

उसे लगा — इस प्रकार वह कभी भी अपनी इच्छित सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

यदि इस समय के व्यर्थ हुए इस बलिदानों को भुलाकर वे फिर से नया संगठन बनाते हैं तो भी क्या यही होगा ? इसी तरह के खून और डकैती डालने डालने जैसे कार्य ही करते रहेंगे ? इनसे क्या होगा ? इस तरह तो वे अपने देश की सम्पत्ति को ही नष्ट करने में अपना बल क्षीण करते रहेंगे। मुट्ठी भर क्रांतिकारी जब इन गोरे शासकों की तैयार की हुई भारतीय और गोरों की मिश्रित सेना के सामने पड़ेंगे, इसी तरह बेमौत मारे जाएँगे।

फिर क्या हो ?

कैसे चलेगा यह सब और कब तक ?

ये सब बातें आनन्द के दिमाग में एकाएक आज पहली बार इस दुर्घटना को देखते हुए उठ खड़ी हुई थी। उसके सामने उसके नेताजी वाले दल के सारे साथी मारे जा चुके थे। वे मौत के आगोश में उसके सामने सोए पड़े थे।

आनन्द अब किंकर्तव्यविमूढ़-सा उसी जगह ज्यों का त्यों खड़ा अपने विचारों से जूझ रहा था। वह नवाब से भी बातें करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

क्या फिर से सब कुछ शुरू किया जाए ? या फिर कोई और तरीका चुना जाए ?

मौजूदा परिस्थितियां ऐसी हैं कि कोई भी देशभक्त भारतीय ऐसी परिस्थिति में कैसे तटस्थ रह सकता है ? हर देशप्रेमी का यह फ़र्ज़ है कि वह इस समय में अपने देश के लिए कुछ करे, दूसरों को कुछ करने के लिए प्रेरित करे जिससे गुलामी की ये जंजीरें जल्द से जल्द टूट जाए। तो क्या क्रांति का जो रास्ता उन्होंने अपनाया है, वही ठीक है ?

फिर पहली सोच ने सिर उठा लिया — नहीं-नहीं, यह मारामारी और खून-खराबा, यह ठीक नहीं है।

दूसरी सोच उठी — नहीं, अब तुम देशद्रोह की भावना की तरफ बढ़ रहे हो।

आनन्द तिलमिला गया, “नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है। मैं… मैं क्या करूँ ?” यह शब्द वह जोर से बोला था। नवाब ने सुना तो वह उसके पास आया और उसके बदन को छूकर बोला, “तुम्हें तो बड़ा तेज बुखार हो चला है आनन्द।”

वह समझ गया कि आनन्द पिछली रात को तमाम रात बारिश में भीगा था और अब इस बुखार की अधिकता के कारण ही अंटशंट बोल रहा है।

“ऐंय…हाँ।” आनन्द नवाब की बात सुनकर चौंका था। फिर बोला था, “नवाब चलो अब चलो यहाँ से। यहाँ तो गोरों की पलटन ही मंडराएगी। हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने लोगों की मृत्यु पर यहाँ खड़े होकर आंसू भी नहीं बहा सकते। ओफ्फ !” स्वर बेहद कमजोर था।

तभी एकाएक उसी तरफ के रास्ते से भड़भड़ाती हुई दो पुलिस वैन आई जिस तरफ से होकर आनन्द व नवाब आदि यहाँ पहुंचे थे।
 
वैन पुल के पास आकर रुकीं और वहाँ पर बीसियों सिपाही बंदूकों समेत कूद पड़े। जब तक कि नवाब व अन्य साथी कुछ समझते और बचाव में या आक्रमण में कुछ कर पाते, उधर से फायरिंग शुरू हो गई।

“कोई भागने की कोशिश न करे, वरना गोलियों से भून दिया जाएगा।” पुलिस द्वारा चेतावनी जारी की गई।

पुलिस भागने पर गोली मारने की चेतावनी भी जारी कर रही थी, और वैसे लोगों को सीधे-सीधे गोलियों से भून भी रही थी।

नवाब व आनन्द ने जैसे-तैसे इधर से उधर दौड़कर मोर्चा संभाला और अपनी जान बचाई। मगर इस बीच उनके कई साथी अप्रत्याशित आक्रमण की वजह से मौत के पास पहुँच चुके थे।

आनन्द जो एक तरफ पुल के किनारे पर खड़ा था, फौरन कूदकर पीछे पुल के ढलवान के नीचे चला गया और वहाँ से दूसरी तरफ निकल गया। मगर नवाब थोड़ा आगे खड़ा था, वह भी उधर ही भाग कर छुप गया मगर तब तक एक गोली उसकी टाँग के ऊपर घुस गई थी। मगर उसने दर्द को जबड़े भींचकर पी लिया और आगे ही बढ़ता रहा, आनन्द के पीछे।

नवाब के कुछ अन्य साथियों ने भी किसी तरह बचकर पोजिशन ले ली थी। जवाबी फायरिंग होने लगी।

अब दोनों तरफ़ से फायरिंग चल रही थी। दोनों तरफ के लोगों की लाशें गिरने लगीं।

उधर, पुलिस की तरफ़ से फिर चेतावनी जारी की गई थी, “हम कहते हैं, अपने हथियार फेंककर आत्म-समर्पण कर दो। वरना तुम लोगों में से कोई जिन्दा नहीं बचेगा।”

पुलिस दस्ता पुल पार करने के लिये आगे बढ़ते आने की कोशिश कर रहा था मगर नवाब व साथियों ने जवाबी फायरिंग करके उन्हें किसी तरह अब तक रोक रखा था।

तभी पुल के इस तरफ एक हथगोला आकर फटा। क्रांतिकारियों में भगदड़ मच गई। कई लोग तो वहीं झुलस गए और वहीं दम तोड़ दिया।

इसी तरह धीरे-धीरे बहुत साथी काम आ गए तो नवाब ने डटे रहना और मुकाबला करते रहना ठीक न समझा, क्योंकि पुलिस दस्ता उनसे दूनी-तिगनी ज्यादा तादाद में था। उसने अपने साथियों को चुपके से निकल जाने के लिए एक-दूसरे के द्वारा सन्देश देने शुरू कर दिए।

रुक-रुक कर फायरिंग होती रही।

आनन्द एक घोड़े पर चढ़ चुका था। नवाब भी उसकी तरफ दौड़ा। आनन्द ने उसे हाथ का सहारा देकर घोड़े पर बिठा लिया। “धान्यं-धान्यं” करके एक के बाद एक दो गोलियां उनके आसपास से गुजर गईं। दोनों बाल-बाल बचे। उन्हें जीवनदान मिल गया।

पीछे नवाब और आगे आनन्द था। नवाब ने आनन्द को पकड़ रखा था। आनन्द घोड़े को दौड़ाता ले गया।

जब वे काफी दूर निकल गए तो उन्होंने एक जोरदार धमाके की आवाज़ सुनी।

* * *

लता परेशान थी। रोज अखबार पढ़ती। रेडियो पर आने वाली खबरों को ध्यान से सुनती, बार-बार सुनती, मगर कुछ अनुमान नहीं लगा पाती थी कि इस समय आनन्द और नवाब कहाँ हैं और उनका मिशन कैसे चल रहा है ? वह एकाध बार नेताजी के अड्डे पर भी गई थी मगर नेताजी वह जगह छोड़ कर जा चुके थे। बाद में रेडियो और अखबारों द्वारा ये खबरें भी आईं कि नेताजी का क्रांति-दल अँग्रेजी फोर्स से मुकाबले में लगभग खत्म हो गया था और नेताजी भी लापता हैं।

इस तरह, लता छटपटा रही थी कि आनन्द की कैसे भी कहीं से भी कोई खबर मिले। हरपाल फौज में अपनी ड्यूटी पर था।

हो सकता है पटवारी जी कुछ बता सकें। अचानक ही उस दिन लता को पटवारी जी की याद आ गई।

हरपाल ने एक दिन उसे पटवारी जी से मिलवाया भी था। मगर उनसे मिलना भी तो आसान नहीं। वे तो घुमक्कड़ प्रवृत्ति के इंसान हैं। कब कहाँ होंगे, यह पता कर पाना ही टेढ़ी खीर है।

अब उनसे कैसे मिलना हो ? वह यह सोच ही रही थी कि माँ आ गई, “लता, नाश्ता क्यों नहीं कर लेती ? तुम कह रही थी कि तुम्हें कही जाना है ?”

“हाँ माँ…मेरा किसी काम में मन ही नही लग रहा है। आनन्द व उनके क्रांतिकारियों की कोई खबर नहीं मिल रही है। पिता जी से तो कुछ मदद नहीं मिल सकती। मैं क्या करूँ ?”

“हूँ, यह बात तो है। पता नहीं ये क्रांतिकारी कहाँ हैं, कैसी हालत में हैं ? मगर ऐसे भी क्या होगा। अपना खाना-पीना तो समय पर करते रहो। सुबह के दस बजने को आ रहे हैं और तुम ऐसे ही बैठी हो।” माँ ने लता को तसल्ली देते हुए उसका ध्यान दूसरी तरफ लगाने की कोशिश की।

लता कुछ कहने ही जा रही थी कि तभी द्वार खटखटाया गया। माँ ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा कि इस वक़्त कौन आया होगा ?

लता उठकर गई। द्वार खोला तो आश्चर्यचकित रह गई। सामने पटवारी जी खड़े थे।

लता का चेहरा खिल गया। नमस्कार में हाथ जोड़कर वह बोली, “नमस्कार…आइए पटवारी जी।”

“हाँ। आ तो गया हूँ मगर खड़े-खड़े दो बात करना है तुमसे।” कहते हुए वे अंदर आ गए और लता की माँ को नमस्कार कर बोले, “उलझन में हूँ और सोच रहा हूँ कि आप लोगों को बताऊँ कि न बताऊँ ?”

“पटवारी जी, आप आइए। दो मिनट बैठिए तो सही।” लता की मां बोली। लता बोली, “क्रांतिकारियों का कुछ पता चला ? आनन्द…।”

“दरअसल कई घटनाओं में एक साथ मात खाने के कारण इन लोगों का मिशन अब ख़त्म होने के कगार पर है। यह क्यों और कैसे हो रहा है, मुझे इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं है। मैं तो बस थोड़ी-बहुत दिलचस्पी ही रखता हूँ। सक्रिय तो मैं नहीं हूँ।”

लता का चेहरा फक्क पड़ गया था। वह बस सन्न सी पटवारी जी का मुँह देखे जा रही थी।

“दरअसल तुम्हें बताने के लिए ही इतनी दूर चलकर आया हूँ। क्योंकि मुझे हरपाल ने क्रांतिकारियों के बारे में तुम्हारी दिलचस्पी के बारे में बताया था। आनन्द को तेज बुखार है औऱ नवाब आदि ज़ख्मी हैं। अब उनके लिए डॉक्टर का मिलना तो मुश्किल है। मैं ही कुछ अच्छी-सी दवाएं जानता हूँ तो वही खरीदकर ले जा रहा हूँ। कुछ उनका इलाज हो जाएगा। फिर मेरा मन नहीं माना। सोचा खड़े-खड़े ही सही, लता को भी बताता चलूँ।”

“ओह !” लता आनन्द की बीमारी की बात सुनकर परेशान हो गई।

“इसलिए मैं अब रुक नहीं सकता। पहले ही बड़ा समय लग गया है। जल्दी पहुँचूँ तो जल्दी उनका इलाज शुरू हो। अब मुझे आज्ञा दो।”

यह कहकर पटवारी जी पलट गए। वे द्वार से बाहर निकल गए। यह मानो कि वे आंधी की तरह आए थे और तूफान की तरह चले गए।

लता उनके जाने के बाद भी स्तब्ध-सी खड़ी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि इन सब हालात में अब वह क्या कर सकती है ? सहसा उसे सुध हुई और आनन्द का ख्याल आया तो वह अपनी माँ से बोली, “माँ मैं भी देखने जाऊँ ?”

माँ छूटते ही बोली, “पहले यह बता कि तुझे आनन्द में दिलचस्पी है कि उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों में ?”

“दोनों में माँ, दोनों में।”

“तो जा, गाड़ी लेकर जा। मैं आज तेरे पिताजी से बात करूँगी। उन्हें समझाऊंगी कि वे तेरी और आनन्द की जोड़ी जमाने में ध्यान दें।”

“ओ माँ।” एक क्षण को वह अपनी माँ का मुख देखती रह गई। वे लता का मज़ाक उड़ा रही थीं कि सचमुच गम्भीर होकर यह बात कर रही थीं ?

“आप गम्भीर हो कि ऐसे मज़ाक कर रही हो ?” लता ने गुस्से में आकर पूछा।

“मैं गम्भीर हूँ मगर मुझे हँसी भी आ रही है।” यह कह कर वे हँस पडीं।

लता फिर भी कुछ नहीं समझी।

* * *
 
[बारह]

आनन्द बुखार की तीव्रता की वजह से निढाल-सा हो गया था। आत्मबल भी जैसे जवाब दे रहा था। अब उसे लग रहा था कि उसे अब डाक्टर की और उस सेवा की ज़रूरत है जो घर के सदस्य ही कर सकते हैं। मगर घर-बार व संसार सब छूट चुका था। अब उसे क्रांति के पथ पर चलते हुए अब भूमिगत जीवन जीना और परिवार को भूल जाना ही एक विकल्प है। वरना कहाँ से आएगा घर-परिवार ?

जब वह और ज़ख्मी नवाब बिदौली गांव की तरफ लौटे तो दिशाहीन और उद्देश्यहीन थे। गाँव के एक छोटे से बच्चे को ढूंढा गया और उससे पटवारी जी का घर पूछा गया। फिर उस बच्चे को ही पटवारी जी के घर भेज कर गाँव के बाहर बुलाया गया।

पटवारी जी तुरन्त दौड़े चले आए। उन्हें आनन्द ने सानुरोध कहा कि हरपाल के घर में उसके बीमार होने की बात न बताई जाए। कौशल अकेली है, वह यह सब सुनकर घबरा जाएगी।

पटवारी जी समझ गए कि उनका यह बुरा समय है। कैसे उनकी मदद करनी है, वे सब समझ गए। आनन्द को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

उन्होंने कौशल के घर से बिल्कुल विपरीत दिशा में गाँव में एक गुप्त जगह पर एक बेकार से मकान में इन लोगों को ठहराया दिया। खुद वे तुरन्त ही धीरजगढ़ की ओर भागे दवा वगैरह लाने के लिए।

अब पटवारी जी के लौटने का ही इंतज़ार हो रहा था।

इस समय आनन्द तेज बुखार के कारण अर्धमूर्छावस्था जैसी स्थिति में था। नवाब उसके बिल्कुल पास देख-भाल के लिए रुक गया था। जबकि वह स्वयं बहुत ज़ख्मी था। गोली उसके पैर में फंसी थी और उसमें दर्द भी था और खून भी रिस रहा था। मगर ऐसे में वे दोनों ही एक-दूसरे का सहारा थे।

दोपहर के तीन बजे पटवारी जी पहुंचे तो साथ में लता भी थी। वह आनन्द को देखते ही रोने लगी। पटवारी जी ने उसे किसी तरह चुप कराया और दोनों ने मिल कर उन सबको दवा दी व खाना-पीना कराया।

नवाब के ज़ख्म की भी उन्होंने मरहम-पट्टी की और उसकी दवाएँ उसे दे दीं। नवाब ने पटवारी जी से कहा था कि पहले किसी तरह उसके पैर के जख्म में फंसी गोली का छर्रा निकाला जाए। मगर इसका अनुभव पटवारी जी को नहीं था। अतः जब उन्होंने झिझक दिखाई तो नवाब ने एक चाकू गर्म करवाकर खुद ही अपना ज़ख्म बड़ी बेदर्दी से कुरेदा और गोली बाहर निकाली थी।

इस तरह आनन्द और नवाब दोनों की प्राथमिक चिकित्सा हुई।

दवा खाकर नवाब भी सो गया था। ज़ख्म के कारण कई घण्टे की असीमित पीड़ा भोग लेने के बाद जब आराम मिला तो वह सो गया था।

थोड़ी देर के लिए पटवारी जी आनन्द का ख्याल रखने के लिए लता को बिठाकर कहीं चले गए।

लता बुखार में बेसुध आनन्द के चेहरे को गौर से देख रही थी। इस समय वह बहुत दुखी थी।

दवाई खाने के बाद से अब तक एक घण्टा हो गया था। लता इतनी व्याकुल थी कि हर दस मिनट में आनन्द का माथा छूकर देख लेती थी। कभी नब्ज़ छूकर देखने लगती थी। मगर आनन्द का शरीर जल-भून रहा था। अतः बुखार कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

उसके मन में आ रहा था कि वह आनन्द को अपनी बांहों में भरकर उठाए और अपनी गाड़ी में बिठाकर दौड़ती हुई उसे धीरजगढ़ ले जाए। किसी अस्पताल में उसे दिखाए, या किसी डाक्टर के क्लिनिक में दिखाए और उसका इलाज कराए।

इस निर्जन क्षेत्र में बुखार में पड़े रहने से उसकी जान को खतरा भी हो सकता है। मगर अफसोस वह ऐसा भी तो नहीं कर सकती है। यहाँ से निकलते ही पुलिस का डर है। पुलिस ने रास्ते में ही उसे पकड़ लिया तो वह क्या करेगी ?

लता का हाथ अनायास फिर आनन्द के माथे पर चला गया। उसने महसूस किया कि इस बार उसके माथे पर पसीना चुहचुहा रहा था। उसने तुरन्त नीचे झुककर आनन्द की आंखों में झाँका। वे अभी बन्द थीं। उसने आवाज़ दी, “आनन्द !”

कोई हरकत नहीं की आनन्द ने।

“आनन्द, उठो। देखो, मैं लता। मैं तुमसे मिलने आई हूँ। तुम्हारे लिए दवाई लाई हूँ।”

आनन्द ने आंखें खोलीं। वह बड़बड़ाया, “तुम कौन ? लता ?”

“हाँ, मैं लता। मुझे देखो, मुझसे बात करो। अब आप की तबियत कैसी है ?” यह कहते-कहते फिर लता का हाथ उसके माथे पर चला गया। वास्तव में अब बुखार काफी कम हो गया था।

आनन्द लता का नाम सुनकर तुरन्त उठ बैठा। उसे कमजोरी महसूस हो रही थी। अपने हाथ से ही अपने माथे को दबाते हुए ही वह बोला, “मगर तुम यहाँ क्यों आई हो ?”

“मुझे पता चला था कि तुम और भैया नवाब बहुत बीमार हैं तो मैं चली आई। पटवारी जी के साथ में चली आई थी। तुम्हारे लिए हम दवा ले आए थे। वही तुम्हें खिलाई है जिससे तुम्हारा बुखार उतरा है।”

आनन्द चुप उसकी बातें सुन रहा था। वह बोली, “मैं तो बहुत डर गई थी। मगर अब लगता है कि तुम ठीक हो जाओगे। भगवान का लाख-लाख शुक्र है।”

“मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ कि तुम्हें मेरा इतना ख्याल है। मगर लता हमारे साथ बहुत बुरा हुआ।”

“हाँ, सचमुच बहुत बुरा हुआ। सारा नेताजी का इधर वाला दल खत्म हो गया और रास्ते में मुझे पटवारी जी ने बताया कि आज भी तुम लोग पुलिस मुठभेड़ करके आ रहे हो और किसी दल के आदमी ने ही मुखबिरी कर दी और बहुत जानें चली गईं।”

“हाँ…बस मैं, नवाब और अन्य दो-तीन लोग बचे हैं। तुम जानती हो कि तुम्हारे पिताजी ने भी हमारी मुखबिरी की है। मतलब मेरी और नवाब की तो नही मगर नेताजी के दल की उन्होंने ही मुखबिरी की है।”

“ऐसा नहीं हो सकता आनन्द। मेरे पिता ऐसे नहीं है। वे देशभक्त व्यक्ति हैं। वे भले ही क्रांतिकारियों केखिलाफ बातें करते हों, मगर वे मुखबिरी नहीं कर सकते। वे देश के लिए हर लड़ने वाले की इज़्ज़त करते हैं। बस वे हिंसा के रास्ते को छोड़ने की सलाह देते हैं। मगर वे क्रांतिकारियों से नफरत नहीं करते।”

“ओह !” आनन्द को लता की बात का यकीन करना पड़ा। वह बोला, “तुम्हारी बात का मैं यकीन कर सकता हूँ। मगर मुझे ऐसे ही संकेत मिले हैं।”

“नहीं। तुम कभी हमारे घर आना और उनसे मिलना। फिर अपनी राय कायम करना।”

तभी नवाब खांस पड़ा था। लगता है, वह भी जाग गया था औऱ अब उनकी बातें सुन रहा था।

लता कुछ कहने ही जा रही थी कि तभी पटवारी जी आ पहुंचे और आनन्द को बैठा देखकर उनकी आंखों में चमक आ गई, “ओये शेर के बच्चे। उठ गया ?” पटवारी जी ने आनन्द के कंधे पर हल्के-से हाथ मारा, “अब तो बुखार उतर गया न ?”

“हाँ पटवारी जी। बड़ी मेहरबानी हुआ आपकी।”

“मेहरबानी जैसी बात कुछ मत कहो। लगता है मेरा दवाइयों का ज्ञान आज काम कर गया। मैं तो यह सोच-सोच कर खुश हूँ।”

“जी, आपकी दवा ने बड़ा अच्छा काम किया।” नवाब बोला।

“अरे, हाँ नवाब बताओ, तुम्हारे ज़ख्म में अब आराम आ रहा है ?”

“जी बहुत राहत मिली है। बस अब दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा।”

“तुम क्यों मुँह लटकाए बैठी हो लता रानी ? अब तो खुश हो जाओ।”

“जी।” लता हँसने लगी।

“अरे आनन्द, तुम नहीं जानते यह तुम्हारी कितनी चिन्ता करती है। मैं जब इसके घर इसे बताने के लिए गया तो सुनकर यह बहुत परेशान हो गई। मेरे इनके घर से निकलते ही यह तो मेरे पीछे-पीछे गाड़ी लेकर आ गई। और यहाँ आई तो तुम्हारी हालत देखकर बहुत देर तक बैठी रोती रही। बड़ी मुश्किल से मैंने इसे चुप कराया था।”

आनन्द कृतज्ञतापूर्वक लता को देखने लगा।

लता शरमा गई और कृत्रिम नाराजगी से पटवारी जी को देखकर बोली, “आप भी बड़े खराब हो।”

“हाहाहाहा…” पटवारी जी हँस कर बोले, “चल बेटा, बहुत देर हो गई तुझे। अब तेरी गाड़ी तक तुझे छोड़ आता हूँ। अब अपने घर जा बेटा।” पटवारी जी लता से बोले और उठकर बाहर की ओर चल दिए।

लता उठ भी उठ खड़ी हुई।

* * *

गाँव का वह मकान जो अब आनन्द व नवाब का नया आवास था…।

यह मकान खत्म होते गाँव के मकानों के सिलसिले से अलग हटकर तो जरूर था, मगर यह गाँव के अंदर ही था और उपेक्षित पड़ा था। यह मकान काफी बड़ा और लम्बा-चौड़ा था, जो न जाने कब से मरम्मत और देख-रेख के बिना बाहर से और आगे-पीछे से ढह गया था।

अंदर से भी यह एक उजाड़ सा था। मगर आधी छत लटके दो-तीन बरामदे और कई कमरे ऐसे थे कि इसमें पांच-छः आदमी आराम से बारिश या आंधी में दुबककर बैठ जाएं। इस मकान के मालिक अलीगढ़ शहर में जाकर बहुत दिन पहले ही बस गए थे।

इस मकान में भूतों का बासा था, यह गाँव वालों की धारणा थी, इसलिए इस मकान के दूर-दूर तक भी कोई गाँव वाला दिखाई नहीं देता था। लोगों की इस धारणा के तहत उपेक्षित पड़े मकान से आनन्द, नवाब व दोएक साथियों को रहने की शरण मिल रही थी।

इसी मकान के एक टूटे-फूटे से अव्यवस्थित कमरे में आनन्द अकेला बैठा था। नवाब व दूसरे साथी कहीं घूमने चले गए थे।

इन दिनों आनन्द और नवाब दोनों ही स्वास्थ्य-लाभ करते हुए आराम कर रहे थे। पटवारी जी के सौजन्य से पैसों और आवश्यक सामान की व्यवस्था हो रही थी। ऐसे काफी धनाढ्य लोग उस समय भी थे जो ऐसे कार्यों के लिए धन देते थे और इस धन देने को पुण्य का या देशभक्तिपूर्ण कार्य समझकर गौरवान्वित होते थे।

कौशल को किसी तरह पता लग गया था कि आनन्द यहीं रह रहा है और बीमार है। पटवारी जी किसी डॉक्टर के सम्पर्क में हैं और उसकी मदद लेकर खुद उसका इलाज़ कर रहे हैं। बस तभी से वह चोरी-छुपे उसके लिए कुछ न कुछ खाने-पीने के लिए या कपड़े आदि धोकर दे जाने लगी थी।

नवाब, आनन्द अन्य साथी आजकल इधर-उधर घूम कर अपने दल को बढ़ाने के लिए नए साथी तलाश कर रहे थे। आसपास के गांवों के जो नवयुवक उनसे प्रभावित हो जाते थे, उन्हें इसी जगह एकत्र करके वे लोग उनसे राय-मशवरा करते थे। पिछले दस दिनों में आनन्द और नवाब ऐसी दस मीटिंग कर चुके थे। मगर आज जुमे (शुक्रवार) का दिन था और नवाब भी जुमे की नमाज पढ़ने के लिए पास के एक बड़े गांव में गया हुआ था। क्योंकि यहाँ कोई जामा मस्जिद न थी।

करीब एक बजने जा रहा था। आनन्द अकेला बैठा कुछ सोच रहा था कि कौशल अभी क्यों नहीं पहुंची। उसे चिंता हो रही थी क्योंकि कौशल का इधर आना बहुत कठिन काम था और वह मना करने से भी मानती न थी। वह यही सोच रहा था कि उसके साथ कुछ अप्रिय न घट जाए और साथ में उनके उस निवास की भी पोल खुल जाएगी तो फिर एक और संकट हो जाएगा।

तभी उसे कौशल आती दिखाई दी। उसे आता देख आनन्द के मन की चिन्ता जाती रही। वह खिल उठा। उधर आते हुए कौशल ने भी देखा कि आज आनन्द अकेला है।
 
उसने आते ही मुस्कराकर आनन्द को देखा औऱ पूछा, “अब तो तबियत ठीक है ?”

“हाँ, अब मैं ठीक हूँ।”

“नवाब कहाँ है ?” उसने बैठते हुए पूछा। कपड़े में बंधी रोटियाँ और सब्जी का बर्तन खोलकर आनन्द को देते हुए बोली, “लो खाना खाओ।”

आनन्द ने खाना शुरू करते हुए कहा, “आज जुमा है न। पास के गाँव में जो जामा मस्जिद है, वहीं गया है नमाज पढ़ने।”

“ओह !” कौशल ने आनन्द को बताया, “जब से तुमने बुखार ठीक होने के बाद अपनी गतिविधियों के लिए फिर से लोगों को जोड़ने की बात की है, आप लोगों के लिए जासूसी किए जाने का फिर खतरा बढ़ गया है। यह ध्यान देने की ज़रूरत है। अब अपने तौर-तरीक़े बदलो।”

“हूँ।” आनन्द ने अपना खाना समाप्त कर लिया। कुल्ला करने के लिए वह एक तरफ चला गया। फिर लौटते हुए बोला, “तुम मेरा कितना ख्याल रखती हो। तुम्हारा पूरा परिवार ही मुझे प्यार करता है।”

“हम तुम्हें अपना समझते हैं बाबू। पर क्या तुम भी हमें अपना समझते हो ?”

“बिल्कुल समझता हूँ।”

“तुम नहीं समझते। इसीलिए तो ऐसी बात कहते हो।”

“नहीं। मैं सोचता हूँ कि कल क्रांति की राह पर चलते हुए, मैं मर भी जाऊँ तो तुम लोग ही मेरा क्रिया-कर्म करो।” आनन्द एकदम भावुक हो गया।

“हे भगवान।” कौशल रो पड़ी, “तुम ऐसी बातें मत करो। मेरी उम्र भी तुम्हें लग जाए। मेरे भाई की उम्र भी…।” उसका स्वर भर्रा रहा था।

“शायद मेरी सगी बहन भी होती तो इतना प्यार मुझे करती कि नहीं ?”

“मैं तुम्हारी सगी बहन हूँ, आज से ऐसा ही समझ लो।”

“कौशल !” आनन्द ठगा-सा उसका मुंह देखता रह गया। उससे कुछ जवाब न बना। उसकी आंखें भी गीली हो गईं।

अपने आंसू पोंछते हुए कौशल बोली, “आगे कुछ दिन बाद सलूनो (रक्षा बंधन) आ रही है। मैं तुम्हारे हाथ में बांधने के लिए पोहंची (राखी) लाऊं मेरे भैया ? भैया हरपाल के लिए मैं खरीदूंगी तो तुम्हारे लिए भी खरीद कर रख लूँगी।”

“बिल्कुल ले आना और मेरी कलाई पर बांधना। मेरी बहन बनी हो तो यह तो तुम्हारा और मेरा, दोनों का हक है।”

तभी अकस्मात् द्वार से अंदर आती हुई लता ने भी यह बात सुन ली। अंदर आकर वह रुक गई और गौर से कौशल को देखते हुए बोली, “ओह-ओ। भाई-बहन का प्यार चल रहा है ? लगता है, मैं गलत मौके पर पहुँच गई।”

आनन्द और कौशल, दोनों हँसने लगे। हँसते हुए ही कौशल ने अपनी आंखों से खुशी के आंसू पोंछे। फिर वह बोली, “नहीं…तुम सही समय पर पहुंची हो। अब आनन्द भाई को समझाओ कि मुझे अपनी बहन बनाया है तो पोहंची (राखी) बांधने का हक भी दें।”

लता बोली, “हाँ-हाँ, यह हक तो इन्हें देना ही चाहिए। कितनी सुंदर औऱ प्यारी-सी बहन है तुम्हारी आनन्द “

यह सुनकर कौशल खुश हुई और शरमा कर गर्दन झुका ली। नीचे धरती पर देखने लगी।

तभी द्वार से लता के पिता ओंकारनाथ ने प्रवेश किया। उन्हें देखा तो आनन्द चौंककर अपनी जगह खड़ा हो गया। यह कौन आ गया — उसने सोचा था।

लता अपने पिता के वहाँ पहुंचते ही पलटकर फिर उन्हीं के पास चली गई और आनन्द से बोली, “ये हैं मेरे पिता श्री ओंकारनाथ जी। आनन्द, तुम्हारे बारे में मेरी बातें सुन-सुन कर इनकी भी तुमसे मिलने की इच्छा हो गई। मेरे कहने पर ये भी आज मेरे साथ यहाँ आ गए।”

“ओह, अब मैं समझा।” आनन्द थोड़ा-सा झिझका। फिर नमस्ते की औऱ हाथ जोड़कर बोला, “तो आइए, बैठिए न।”

लता और ओंकारनाथ आनन्द से बातें करने लगे और कौशल उनसे आज्ञा लेकर अपने घर को चल पड़ी।

* * *

कौशल के जाने के बाद ओंकारनाथ आनन्द से बोले,

“तुम्हारे ज़ज़्बे को मैं सलाम करता हूँ कि तुमने बहुत थोड़े से साधनों में ही देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी तरीके से लड़ाई लड़ी।”

“जी।” आनन्द ने निगाहों से उनका धन्यवाद ज्ञापन किया।

“अब जबकि तुम्हारे साथी देश की इस लड़ाई में खेत रहे हैं तो आगे की लड़ाई कैसे लड़ोगे ?”

“हाँ, इस विषय में क्या कहूँ। प्रयास तो कर रहा हूँ कि फिर से जीरो से शुरू करूँ।” आनन्द ने झिझकते हुए कहा।

“कितनी बार जीरो से शुरू करोगे ? कभी सोचा है इस बारे में ?” ओंकारनाथ तो एक पत्रकार के रूप में ही उससे खोद-खोदकर पूछने लगे थे।

“सशस्त्र क्रांति करके आज़ादी पाने का ख्याल बुरा नहीं। मगर इस रास्ते से सफलता पाने के लिए बहुत सारे साधन चाहिए होते हैं, जैसे आधुनिक शस्त्र, खुफिया जानकारी जुटाने के लिए वैसे ही स्रोत हों जैसे अंग्रेजी सरकार की पुलिस औऱ आर्मी के पास हैं। इसके अलावा एक सिपाही जैसी ट्रेनिंग और…”

लता अपने पिता की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी और उन बातों का असर आनन्द पर होते हुए देखने के लिए बराबर आनन्द के चेहरे पर नज़र रखे हुए थी।

मगर आनन्द निरुत्तर था, यह देखकर लता कुछ चिन्ता में थी कि कहीं आनन्द उसके पिता की बातों से नाराज़ तो नहीं है ?

“अनट्रेंड लोगों को क्रांति की राह पर ज़्यादा सफलता नहीं मिलती। यही शीशा मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूँ। गरीब, अज्ञानी, भूखी और साधनहीन जनता कैसे क्रांति में भागीदारी करे, यह मुख्य मसला है। इसके लिए सत्याग्रह का रास्ता थोड़ा बेहतर है। अब उस तरह से शुरू करके देखो न ?”

“हूँ।” एक लंबी सी साँस खींचकर आनन्द बोला, “आप ठीक कह रहे हैं। मगर मैं और नवाब कैसे यह रास्ता शुरू कर सकते हैं। वह अंग्रेज सरकार के कानून के तहत कितने ही मामलों में ‘वांटेड’ है। अंग्रेज सरकार के इन काले कानूनों के रहते उसे कभी भी यह सरकार सत्याग्रह करते समय ही उठा लेगी और जेल में डाल देगी। और मेरे ऊपर भी तो कई केस वह बना देगी ?”

“तुम केवल अपनी बात करो तो मैं कुछ बोलूं ? तुम पर अभी कोई केस बनाने का आधार नहीं है। पुलिस के पास तुम्हारी कोई फोटो भी नहीं है। हाँ तुम्हारे नाम से कहीं-कहीं किसी पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई हो सकती है। ऐसी रिपोर्टों को मैं ढूँढ-ढूंढकर रद्द करवा सकता हूँ। इतनी पावर तो है मेरी। फिर तुम्हें छिप-छिपकर रहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तुम जब चाहे अपने गाँव ललितपुर जा सकते हो, जयनगर जा सकते हैं…जहां जी चाहे जाकर अपना काम कर सकते हो।”

आनन्द ने चौंककर ओंकारनाथ का मुँह देखा। देखता रहा। कुछ समझ नहीं पाया कि क्या कहे और क्या पूछे ? वह अचानक सवालों के कई झंझावातों में घिर गया था।

“मुझे गलत मत समझो। मैं तुम्हारी दोस्ती को तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, बल्कि तुम्हें यह बता रहा हूँ कि तुम्हें अपनी क्षमताओं का सही उपयोग कैसे करना चाहिए।”

आनन्द इसके बाद कुछ नहीं बोला। ओंकारनाथ ही बोलते रहे और वह धैर्यपूर्वक सुनता रहा। बहुत देर तक ओंकारनाथ उसे समझाते रहे। अंत में वे भी जब यह समझ गए कि आनन्द उनकी बातों का जान-बूझ कर कोई जवाब नही दे रहा है तो वे भी चुप हो गए। फ़िर थोड़ी देर बाद वे उठते हुए बोले, “अब चलना चाहता हूँ। किसी दिन लता के साथ घर आना।” वे मुड़ चले।

लता भी उठ गई। कुछ देर यूँ ही खड़े रहकर आनन्द को प्यार भरी दृष्टि से देखती रही। आनन्द ने उसे कहा, “लता, अब जब तुम आओ तो कुछ कोरे कागज़ और एक दवात-कलम मेरे लिए लेकर आना।”

लता मुस्कराकर बोली, “क्या दुबारा लिखना-पढ़ना शुरू करोगे ?”

“हाँ। कभी-कभी मेरे मन में कुछ ख्याल उमड़ते हैं। सोचता हूँ, कोई कविता या कोई लेख लिखूं।”

“भई वाह, ज़रूर लिखना। मैं इस बार कागज-कलम ले आऊँगी।”
 
दो कदम चलकर फिर रुकते हुए ओंकारनाथ बोले, “मेरी बेटी तुम्हें पसन्द करती है। अब मैं भी तुम्हें पसन्द करता हूँ। इसके आगे मैं और कुछ नहीं कह सकता। चलते-चलते तुम्हें बस यही कहना चाहता हूँ कि मेरी किसी मदद की ज़रूरत पड़े तो निस्संकोच कहना।”

“आपकी सारी बातें मुझे अच्छी लगीं। लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं नवाब को अकेला छोड़कर कोई फैसला नहीं कर सकता।”

“भगवान तुम दोनों की दोस्ती को सलामत रखें।”

यह कहकर ओंकारनाथ ने लता के साथ बाहर का रुख किया और ठीक उसी समय नवाब ने भी अंदर प्रवेश किया।

* * *

आनन्द ने अपनी लिखी एक कविता लता को दिखाई। आनन्द से वह लिखा हुआ कागज़ लेकर वह पढ़ने लगी —

“भारती ! माँ भारती !!

हर दिशा उचारती।

सन्तति ये तेरी माँ,

तुझी पे प्राण वारती।।

आकण्ठ रक्त में खड़ी।

है विडम्बना बड़ी।।

पर तू न यूं निश्वास भर।

निज सुत पे तू विश्वास कर।।

ये राष्ट्र न बंट पायेगा।

फिर शत्रु मुंह की खायेगा।।

देखती रहना तू बस,

अपना खड्ग चमकारती।

भारती ! माँ भारती !!

हर दिशा उचारती।।1।।

एकता बनी रहे।

स्वतंत्रता बनी रहे।।

दूर, चाहे पास हों।

सारे एक साथ हों।।

धर्म कोई भी रहे।

क्षेत्र कोई भी रहे।।

हर जाति निरापद रहे,

यहां राष्ट्रीयता विचारती।

भारती ! माँ भारती !!

हर दिशा उचारती।।2।।

प्रेम का वरदान दे।

दुखों का अवसान दे।।

गणतंत्र हो निर्भय यहाँ।

लोकतंत्र की रहे जय यहाँ।।

‘विश्व विजयी तिरंगा प्यारा।

झंडा ऊँचा रहे हमारा’।।

यही ध्वनि गूँजती रहे,

राष्ट्र-कण गुंजारती।

भारती ! माँ भारती !!

हर दिशा उचारती।।3।।”

आनन्द बोला, “किसी धुन में गाओ न। इसे राष्ट्रभक्ति गीत बनाना है और अपने आज़ादी की लड़ाई में साथ देने वाले देशभक्त साथियों को इस गीत को गाना सिखाना है।”

“हाँ। बहुत मार्मिक गीत बनेगा। तुमने लिखा बहुत अच्छा है।” लता कुछ धुनों के बारे में अपने मन में सोचने लगी। फिर उसने एक-दो गानों की धुन में इसे गाकर भी दिखाया। पर आनन्द कुछ संतुष्ट नज़र नहीं आया। फिर वह बोली, “तुमने कोई धुन सोची है ? तो उसी में गाकर दिखाओ।”

आनन्द ने एक धुन में दो-चार पंक्तियाँ गाकर सुनाईं तो लता उछल पड़ी, “यही तो है इसकी धुन। अब इसी में पूरा गीत गाकर सुनाओ।”

आनन्द अपनी बनाई धुन में गाने लगा।

अभी एक-दो लाइनें उसने गाई थीं कि नवाब भी आ गया, “वाह आनन्द, यह तो बहुत बढ़िया गाना है। क्या यह किसी फिल्म का गाना है ?”

आनन्द हँस पड़ा, “नहीं। यह मैंने लिखा है और अभी इसकी ऐसे ही कच्ची-पक्की धुन बनाकर गाकर देख रहे हैं।”

“क्या बात करता है आनन्द। यह तो जबरदस्त गाना बन गया है।”

आनन्द फिर गाने लगा था। ऊँची आवाज़ में और जोशपूर्ण आवाज़ में वह गा रहा था।

तभी पटवारी जी ने प्रवेश किया। आनन्द को गाते देखा तो वहीं खड़े होकर ध्यान लगाकर सुनने लगे। फिर पूरा गाना उन्होंने बड़े धैर्यपूर्वक सुना। तब बोले, “बहुत बढ़िया। यह गाना तो लोगों को भावुक कर देगा। इसे अच्छे से तैयार करो और अपनी मीटिंग में आने वालों को सुनाओ। फिर उन सबको भी इसे गाना सिखाओ। तुमने तो कमाल का गाना बना दिया है। यह तो आग लगा देगा।”

आनन्द हँसने लगा। लता बोली, “मैं इस गाने को स्कूल के कुछ बच्चों को तैयार करा दूँ। स्कूल में अपनी प्रार्थना के बाद गा लिया करेंगे। बच्चों के जरिए यह उनके माँ-बाप तक पहुंच जाएगा। क्यों पटवारी जी ?”

नवाब बोला, “खुदा कसम, मज़ा आ गया इस गाने में।”

आनन्द बोला, “ऐसा है तो आओ हम सब मिलकर इसे गाते हैं।”

और सब मिलकर उस राष्ट्र-भक्ति गीत को गाने लगे।

* * *
 
[तेरह]

आज फिर जुमे का दिन था।

नमाज का समापन हुआ और नमाजी लोगों का रेला मस्जिद से बाहर आने लगा। मस्जिद से निकल कर सड़क पर आने वाले इस रेले में नवाब भी था।

बाहर आकर वह नमाजी लोगों के रेले से अलग हो गया। अलग होकर वह एक तरफ को चलने लगा। सिर की टोपी उतारकर जेब में रख ली।

लगभग दो बजे का समय होगा।

नवाब उस गाँव से बाहर निकल आया। कुछ देर और पैदल चलने के बाद वह एक बाग में पहुँचा।

एक पेड़ से उसका घोड़ा बंधा हुआ था और उसका एक साथी उसके इंतज़ार में पहले से ही तैयार खड़ा था। नवाब ने जाकर अपना घोड़ा खोला।

घोड़े की पीठ थपथपाता हुआ नवाब कुछ दूर तक ऐसे ही उसके साथ पैदल चलता रहा। फिर सौ-सवा सौ कदम चलकर वह घोड़े की पीठ पर बैठ गया। उसका साथी भी घोड़े पर सवार हो उसके साथ-साथ चल दिया।

दोनों के घोड़े दुलकी चाल से चलते जा रहे थे। गाँव बिदौली यहीं से चमक रहा था। इन दोनों गाँवों में कुल एक-डेढ़ मील का ही फासला था। नवाब जब से इधर रह रहा था, जुमे की नमाज पढ़ने इसी गाँव की मस्जिद में आता था। उसकी यह बड़ी पुरानी आदत थी कि वह चाहे रोज नमाज अता करे या न कर पाए, मगर जुमे की नमाज वह ज़रूर अता करता था; चाहे कैसे भी हो और कहीं भी हो।

इस इलाके में भी इन लोगों को लगभग एक-डेढ़ महीना हो गया था। आसपास के दो-तीन गाँव के लोगों में आनन्द और नवाब की बड़ी इज़्ज़त हो गई थी। गांव वाले उनकी हरसम्भव मदद करते थे। आसपास के गाँवों में रहने वाले बहुत सारे नवयुवक अब आनन्द के साथ बैठते थे उसकी बातें सुनते थे और देशभक्ति के ज़ज़्बे को सीखते थे। जगह-जगह छोटे-मोटे सत्याग्रह औऱ उपवास आदि के कार्यक्रम कर रहे थे।

किसी भी योजना को क्रिया-रूप देने के लिए वे लोग आकर पहले आनन्द से उसके अड्डे पर मिलते थे। उग्र व आक्रामक घटना को अंजाम देना होता तो आनन्द उन्हें नवाब के सम्पर्क में रहने और राय-मशवरा करने को कहता।

इधर, आनन्द आजकल शांतिपूर्ण कार्यक्रम कर रहा था। बीमारी के कारण वह जोखिमपूर्ण गतिविधियों में हाथ नहीं डाल रहा था। आश्चर्य यह था कि उसके ऐसे कार्यक्रमों को भी भरपूर जनसमर्थन मिल रहा था और इस काम में पटवारीजी, लता, कौशल, कौशल के पिता बलबीर सिंह व अनेकों गांव के लोगों का आनन्द को साथ मिल रहा था।

मगर नवाब अपने उग्र स्वभाव और उग्र तरीके से ही काम कर रहा था। धन की व्यवस्था तो उसी के कामों से हो रही थी; या धनिक वैश्यों द्वारा स्वेच्छा से उन्हें दिए गया धन उनका आर्थिक सहारा था।

गाँव के लोग अंग्रेजों के खिलाफ किए गए उनके कामों में, उनके साथ आ रहे थे। यही ही नहीं पिछली दो-तीन बार जब ख़ुफ़िए लोग क्रांतिकारियों को गाँव-गाँव कुत्तों की तरह सूँघते फिर रहे थे, तो गाँव वालों ने उन्हें बाहर से बाहर ही खदेड़ दिया था।

नवाब और उसका साथी, दोनों अपने-अपने घोड़ों पर गाँव की ओर बढ़ रहे थे।

फिर एक दोराहा-सा आया औऱ वे सीधे रास्ते से उतर कर, खेतों और झाड़ियों वाले रास्ते पर चल पड़े।

गाँव अभी यहाँ से कुछ दूरी पर था।

एकाएक रास्ते से गुजरते हुए झाड़ियों में खड़खड़ाहट की सी आवाज़ सुनकर दोनों के घोड़े रुक गए। दोनों ने किसी भी स्थिति से निपटने के लिए कंधों से राइफल उतारकर अपने-अपने हाथों में ले ली।

तभी झाड़ियों में से एक कुत्ता निकलकर बीच रास्ते में आ गया। दोनों के हाथ में राइफल देखकर वह “च्याऊँ” की आवाज़ मुँह से निकालता हुआ आगे निकल गया औऱ वहाँ से फिर वापिस झाड़ियों में घुस गया।

नवाब ने चैन की सांस ली। राइफलें दोनों ने फिर कंधे पर टाँग ली थीं। घोड़ों को फिर से दौड़ा दिया।

वे 10-15 गज ही आगे गए होंगे कि फिर पीछे की तरफ खड़खड़ाहट हुई। नवाब ने समझ लिया कि वही कुत्ता अब बाहर निकला होगा। मगर ज्यों ही उसने मुड़कर देखा, वह सन्न रह गया।

उसके पीछे राइफलें लिए पुलिस के कई सिपाही झाड़ियों से बाहर आए थे। उन्होंने तुरन्त राइफलें नवाब व उसके साथी की तरफ तान दी थीं।

अब उन दोनों ने पीछे देखना छोड़कर अपने आगे की ओर देखा। आगे की झाड़ियों में से कई सिपाही और एक इंस्पेक्टर के साथ एक अंग्रेज कप्तान पिस्तौल और राइफलों के साथ उनकी तरफ आगे बढ़ रहे थे।

यह सब इस प्रकार और इतनी जल्दी में हुआ कि वे दोनों कुछ करने की सोच भी नहीं सकते थे। दोनों के घोड़े जहां के तहां खड़े होकर रह गए थे।

उनकी विवशता पर अंग्रेज कप्तान ने अट्टहास लगाया, “टूम चारों टरफ से घिर चुखा हाय। अपनी राइफलें फेंक दो।”

नवाब और उसके साथी, दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

इस समय राइफल फेंक देने के अलावा उन दोनों के पास क्या चारा था ?

दोनों ने अपनी-अपनी राइफलें फेंक दी।

* * *

नवाब के पकड़े जाने से अंग्रेज कप्तान बड़ा खुश हुआ कि बागी अब परकटे पंछी की तरह उड़ान भर पाने में असमर्थ हो जाएंगे, पंगु बनकर रह जाएंगे। मगर जो हुआ, अंग्रेज अधिकारियों की आशा के विपरीत हुआ, उनकी तमाम उम्मीदों पर कहीं न कहीं से कोई न कोई क्रांतिकारी पानी फेर देता ही था।

बागी चोट खाए साँप की तरह फुंकार मारकर दूनी गति से अंग्रेजी सत्ता पर टूट पड़े।

नवाब को उन्होंने गिरफ्तार तो कर लिया था। मगर उसे धीरजगढ़ या कानपुर की जेल में रोक कर रख पाने में अंग्रेज सरकार अपने को असफल मानती थी। इस क्षेत्र के अंग्रेज अफसर मानते थे कि किसी भी दिन नवाब जेल से उड़नछू हो जाएगा। वह पहले भी कई बार जेल से भाग चुका था।

इस डर की वजह से वे उसकी जेल बदलना चाहते थे। औऱ एक दिन जब उसे दूसरी जेल में ट्रांसफर किया जा रहा था, रास्ते में फिर उसको कुछ अजनबी साथियों ने छुड़ा लिया और अपने साथ भगा ले गए। अंग्रेज अफसर देखते रह गए।

मगर इस बार नवाब जेल से जो भागा तो लौटकर आनन्द के पास नहीं आया। वह कहीं अज्ञात जगह को चला गया। आनन्द ने उसकी बहुत दिन राह देखी। बहुत पता किया उसके बारे में, मगर कुछ ठीक पता न चला। यूँ बार-बार कहीं न कहीं से ख़बर मिलती रहती थी कि आज उसने फलाँ जगह डाका डाला, आज उसने फलाँ जगह किसी अंग्रेज अफसर का अपहरण कर लिया…या मार डाला। मगर वह लौटकर नहीं आया, न उसने आनन्द को किसी के हाथ कोई सन्देश ही भेजा।

आनन्द उसकी इस बात से बड़ा दुखी हुआ। इसी के मद्देनजर वह एक दिन ओंकारनाथ जी को साथ लेकर अपने गांव ललितपुर भी हो आया था। मगर नवाब का वहाँ से भी कुछ पता नहीं चला था।

कुछ क्रांतिकारी वहाँ भी काम कर रहे थे। उन लोगों के पास जाकर, आनन्द मिला और उसने हरिया को भी

उन क्रांतिकारियों के साथ जोड़ दिया था।

देश में चारों तरफ आंदोलन चल रहे थे। कहीं हिंसक और कहीं अहिंसक। महात्मा गांधी का “अंग्रेजो भारत छोड़ो” बड़ा भारी आंदोलन साबित हो रहा था। यह काफी सफल था। देश के बाहर “आज़ाद हिंद फौज भी” काफ़ी दबाव बनाए हुए थी। कांग्रेस के सीनियर लीडर लियाकत अली जिन्ना ने अपनी मुस्लिमों की एक पार्टी “मुस्लिम लीग” बना ली थी और मुसलमानों के लिए एक अलग देश “पाकिस्तान” की माँग कर दी थी।

वायसराय लार्ड माउंटबेटन कुछ दिनों से सक्रिय दिख रहा था। वह भारतीयों को आज़ादी देने के लिए सौदेबाजी कर रहा था। वह कभी जवाहरलाल नेहरू से बात करने जाता था, कभी जिन्ना से, कभी कुछ प्रांतीय नेताओं से मिलता था और भारत को आज़ाद करने के लिए कुछ शर्तें रख रहा था।

आम जनता इसे लॉर्ड माउंटबेटन का ढोंग मान रही थी। किसी को भी विश्वास न था कि इस बार अंग्रेज भारत को आज़ाद करने के लिए सच्चे मन से कोशिश कर रहे हैं। माउंटबेटन की इस मुहिम को भारतीय जन अंग्रेजों की कोई नई चाल ही मान रहे थे।
 
आनन्द भी आजकल रोज अखबार पढ़ रहा था। लता उसे प्रायः रोज ही मिलने आती थी और उसके लिए अखबार लाती थी। इस तरह आनन्द भारत के वर्तमान परिदृश्य की भी कुछ जानकारी प्राप्त कर लेता था।

आज़ादी कब मिलेगी, कब नहीं, यह किसी को भी कुछ गुमान न था मगर अब यह मिलकर रहेगी, ऐसा लगने लगा था।

आज़ादी के दीवाने अपने-अपने ढंग से काम कर रहे थे। आनन्द भी अपने ढंग से काम कर रहा था, और नवाब अपने ढंग से काम कर रहा था। उसका बनाया गीत “भारती ! माँ भारती !!” अब तक काफी लोकप्रिय हो गया था।

आज़ादी के बाद अपने स्वतंत्र राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय ध्वज के रूप में आज के तिरंगे झंडे का प्रारूप भी तय कर लिया गया था। तिरंगे झंडे को कुछ क्रांतिकारी तो यहां-वहाँ फहराने भी लगे थे। इस पर लोगों में आम सहमति बनती जा रही थी।

* * *

यह बारह अगस्त, उन्नीस सौ सैंतालीस का दिन था।

गाँव की कच्ची पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई दो कारें गाँव बिदौली की तरफ बढ़ रही थीं। कारों के गाँव में घुसते ही वहाँ के लोगों में विचित्र प्रकार की हलचल मच गई थी, जिससे एक सुरसुराहट सी चारों तरफ फैल गई थी।

गाँव का चौकीदार भी फौरन दौड़कर मुखिया के पास पहुँच गया। उसने मुखिया को गाँव की तरफ मय फोर्स के आती हुई पुलिस कप्तान की कारों के बारे में बताया।

खबर सुनकर मुखिया जी ज्यों के त्यों उठ खड़े हुए। धोती की लांग ठीक की। सिर पर बंधे साफे को ठीक किया और पैरों में जूतियाँ डालकर चौकीदार के साथ कप्तान की अगवानी के लिए चल दिए। चेहरे पर एक आशंका सी तैर गई।

सारे गाँव में तुरन्त यह खबर फैल गई कि कप्तान साहब अपने सिपाहियों की फौज लेकर आ गए हैं — दो मोटरों में।

कारें चौपाल के पास आकर रुकीं। एक अगली कार में अंग्रेज कप्तान और उनके सहयोगी थे तथा पिछली जीप कार में सिपाही मय हथियारों के बैठे हुए थे।

मुखिया कप्तान की कार की तरफ बढ़े। दरवाजा खोला — कप्तान साहब बाहर आए।

ऊँचा-गोरा कद्दावर जवान था अंग्रेज कप्तान — कंजी आंखें और बाल सुनहरी।

सभी लोग चौपाल पर आ विराजे।

फौरन भागदौड़ शुरू हो गई। कप्तान व उसके साथ आए पुलिसकर्मियों के सत्कार की व्यवस्था की गई। गाँव के अन्य सम्मानित व्यक्ति भी चौपाल पर आने लग गए थे।

चौपाल के इर्द-गिर्द लोगों की भीड़ लग गई। आसपास के घरों की खिड़की-पर्दों और छतों से औरतें झांकने लगी थीं। कानाफूसियां होने लगी थीं। कोई कुछ कह रहा था, कोई कुछ कह रहा था। सब अपने-अपने विचार बता रहे थे मगर असली बात जानने के लिए सभी आतुर थे।

चौपाल पर …।

शिष्टाचार और जलपान की औपचारिकताओं के बाद अंग्रेज कप्तान ने अपना मुँह खोला —

“मुखिया ! कई बार हामारा आडमी बागियों के वास्टे इदर आया मगर नाकामी मिला। टूमने कहा ठा के वो बागी गाँव में नेई हाय। मगर ये सब देखटे हुए बी बागी बराबर हमला करटा जा रहा हाय। किसी बी अंग्रेज को पकड़कर मार डेटा हाय। सरकारी बसें और ट्रेन घेरकर खजाने का पैसा लूट ले जाटा हाय। मगर अफसोस कि टूम और टूमारा गाँव वाले उन्हें पनाह डेटा हाय।”

मुखिया ने चौंकने का उपक्रम किया, सिटपिटाए भी। अपने होंठों को जीभ से तर करके बोले, “हुजूर, मैं क्या और मेरी औकात क्या ? आप क्या और आपके कुत्ते क्या ? गाँव में तो आपके हर आदमी की इज़्ज़त की जाती है। बेशक आपके आदमी आये थे मगर उन्होंने तो खुद गाँव का चप्पा-चप्पा छान मारा था। बागी गाँव में होते तो ज़रूर मिल जाते।”

“बेकार की बाट हाय मुखिया।” कप्तान मुखिया का उत्तर सुनकर कुछ झुंझला उठा, “जब टूम गाँव वाला लोग उनको छिपाए रखेगा तो हामारा टालासी लेने से ख्या होगा ? टूम गाँव का मुखिया हाय…और हाम बी कोई बच्चा नेई हाय। अगर गाँव का भला चाहटे हो टौ बागियों को हामारे हवाले कर दो। वरना आज हाम पूरी तरह तैयार होकर आया हाय। आज कोई झूठा बाहाना नेई सुना जाएगा। ना ई कोई रियायत की जाएगी। सोच-समझ लो।”

मुखिया सहम गए। लोग वहाँ इकट्ठा थे और यह अंग्रेज अफसर बेइज़्ज़ती करता जा रहा था। उन्हें बुरा लग रहा था। अपनी पोजिशन साफ करने के लिए बोले, “मगर सरकार, मुझे इसका कतई कोई इल्म नहीं और फिर बागी गांव में आते रहते तो देर-सवेर मुझे कोई खबर न मिलती क्या ? मैं भला आपसे बाहर गया हूँ कभी ?”

“हूँ।” अंग्रेज कप्तान ने जैसे मुखिया को चिढ़ाया, “गाँव में अब टूमारा इज्जत नेई। टूमारा गांव का आधा से जियादा लोग बागियों के साथ हाय। टूम्हारा बाट अब कोई सुनटा-मानटा नेई हाय। हमें एक-एक बाट का खबर रहटा हाय। मगर दुख हाय कि वो पटवारी बी एक बार सुबूतों की कमी की वजह से छूट गया ठा और जब से वह छूटा था, तो बहुट गड़बड़ कर रहा हाय।” कप्तान ने मुखिया की दुखती रग पर हाथ रख दिया।

मुखिया जी सन्न रह गए। कुछ बोल ही नहीं पाए।

अंग्रेज कप्तान बोलता जा रहा था, “जब से टूमारा नेटाजी का इडर दौरा हुआ है। गाँव वालों में हिम्मत आ गई है। और अब आनन्द नाम का नया नेटा बन गया हैय। इन लोगों ने पब्लिक में जो फूंक भर दी है, वो तुमारे लिए ही नुकसानडेह हाय। नेटा लोग टो कुर्सी और वाहवाही का भूखा हाय।'”

मुखिया के चेहरे का रंग एकदम फीका पड़ गया। किसी तरह वह बोला, “सरकार आप जैसे भी चाहें अपने शक को मिटा लें। मुझे कोई एतराज नहीं, अलबत्ता मुझे कोई इल्म भी नहीं।”

“शक नहीं है हमें बल्कि यक़ीन है। हमें हामारे एक खास आदमी ने यह खबर दी है कि बागियों का सरदार यहीं गाँव में पनाह लेटा रहा मगर अब वह कुछ डीन से गायब है। और आजकल कोई आनन्द यहाँ आ गया है। गांधी बाबा की तरह बाट करटा हाय और लोगों को बरगलाटा हाय। कान खोल कर सुन लो मुखिया, हाम किसी को अब पनपने नहीं डेगा। और उसे भी पनाह बलबीर सिंह (हरपाल के पिता) ही डे रहा है।”
 
मुखिया चौंके। अपने एक आदमी को उन्होंने बलबीर सिंह को चौपाल पर बुला लाने के लिए भेज दिया।

अंग्रेज कप्तान अपनी विजय पर मन ही मन मुस्कराया। मगर प्रकट में थोड़ा और रौब ग़ालिब करते हुए बोला, “दो-टीन बार पहले बी टूमारा गांव वालों ने मिल-जुलकर हामारे ख़ुफ़िए लोगों को मारा और बगा दिया था। मगर ख्याल रखना, आज जो किसी ने ऐसी हरकट की तो मेरे सिपाई कतई नहीं हिचकिचाएंगे। गाँव को लाशों से पाट दिया जाएगा। टूम लोगों ने बाग़ियों को पनाह देकर हमसे सीधी दुश्मनी मोल ले ली हाय।”

यह बात उसने भीड़ के लोगों को सम्बोधित करके कही थी। मुखिया तो खामोश ही सुन रहे थे।

चौपाल को घेरे खड़े लोगों में कनफूसियां सी होने लगीं। कुछ लोग वहाँ से चले गए, तो कुछ और इधर उधर से आकर खड़े हो गए थे।

तभी दो आदमी बलबीर सिंह को पकड़ कर चौपाल पर ले आए।

अंग्रेज कप्तान ने कहर भरी दृष्टि से उनको देखा। फिर उसने संकेत से कहा कि बलबीर सिंह को छोड़ दिया जाए।

उसने उन्हें अपने सामने बैठाया। फिर कुछ रूखे और तेज स्वर में बोला, “बलबीर, टूमने गाँव के मुखिया को नजरअंदाज करके बागियों को पनाह डिया। लेकिन हम मुकिया का लिहाज़ करके टूम्हें कुछ नहीं कहेंगे, बशरटे कि टूम सीधे टरीक़े से बागियों को हमारे हावाले कर डो।”

बलबीर सिंह कुछ नहीं बोले। चुप बैठे रहे।

उनके इस मौन पर अंग्रेज कप्तान झुंझला गया और बोला, “चोप रहने से काम नहीं चलेगा बलबीर सिंह। टूम्हें उन बागियों को हामारे हावाले करना ही पड़ेगा। अच्चा यही है कि टूम उन्हें हामारे हावाले कर डो और अपनी गुस्ताखी की माफी माँग लो और आइंदा हमारी वफादारी की कसम खा लो। ऐसी चुप्पी की हालत में टूम्हें भोत कष्ट उटाना पड़ेगा।”

इस बार बलबीर सिंह बोले, “आपको किसी ने मेरे खिलाफ बहका दिया है हुजूर। मैं किसी बागी-वागी को नहीं जानता।” जवाब सहज औऱ सपाट था मगर लहज़ा ठंडा। कप्तान ने जैसे जहर का घूँट पिया; बुरा मुँह बनाकर गुस्से से बोला, “तो टूम नेई मानेगा ?” फिर मुखिया की तरफ प्रश्न भरी दृष्टि डाली। कप्तान ने फिर अपने एक आदमी को पुकारकर कहा, “यह मुँह नहीं खोलेगा। खुलवाना पड़ेगा।”

उपस्थित जनसमूह के बीच सन्नाटा खिंच गया था। ऐसी चुप्पी छा गई कि कोई होंठों-ही-होंठों में बुदबुदाए तो भी उसकी आवाज़ साफ सुनाई दे।।

तभी दूर कहीं से कुछ युवकों के नारा लगाने की बहुत धीमी मगर स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी, “अंग्रेजो भारत छोड़ो।”

अग्रेज कप्तान ने चौंक कर इधर-उधर देखा। वह हड़बड़ाकर बोला, “कौन है ? ये कहाँ से आवाज़ आटा हैय ?”

नारे लगाने का समवेत स्वर फिर आया, “अंग्रेजो, भारत छोड़ो।”

यह आवाज़ थोड़ा पास आती हुई लगी मगर अभी भी बहुत दूर थी, “अंग्रेजो, भारत छोड़ो।”

कप्तान खड़ा हो गया, “देख रहा है टूम मुखिया ? ‘अंग्रेजो भारत चोड़ो’ का नारा लगाटी भीड़ गांव में घूम रई है और टूम बोलता हाय के टूमको कुच पटा नेई।”

अबी मज़ा चकाटा हाय।”

कप्तान की आवाज़ गूँजी, “ऐय, उगलवाओ इस बलबीर से के इसके सगे कहाँ हैंय।”

उसका आदमी जो पास ही खड़ा कब से कप्तान के आदेश का इंतज़ार कर रहा था, वह आगे बढ़ा और बलबीर सिंह के पास जाकर खड़ा हो गया।

बलबीर सिंह को लगा कि आज वे बच न पाएंगे। भरी चौपाल में उनकी बेइज्जती की जाएगी। उनसे भेद उगलवाने के लिए उन्हें शारीरिक पीड़ाएँ दी जाएंगी। कोई अन्य कुछ भी नहीं बोलेगा। भीड़ केवल तमाशा देखेगी।

बलबीर सिंह ने भीड़ में खड़े ऐसे कई लोगों को पहचान लिया था, जो बढ़-चढ़कर दावे करते थे कि वक़्त आने पर अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे। वे आज कप्तान के साथ आए सात-आठ सिपाहियों से डर गए थे और उनके अंदर प्राणों का यह पैदा हो गया था।

उन्होंने सिर झुका लिया। वह नौजवान सिपाही बोला, “बोल…अब भी बता दे।”

बलबीर सिंह के अंदर कुछ टूटा मगर वे ऊपर से स्थिर बने रहे। उन्होंने एक नज़र मुखिया पर डाली। मगर मुखिया उनसे नज़र मिल जाने के डर से पहले ही मुँह फेरकर बैठा हुआ था।

“अंग्रेजो…भारत छोड़ो।” आवाज़ कुछ पास आ रही थी। कप्तान के इशारे पर तीन-चार पुलिस के लोग उसी दिशा में भागे। चौपाल पर अब कुल चार पुलिस-मैन रह गए थे।

बलबीर सिंह के पास खड़े सिपाही ने अपने जूते की ठोकर मारकर उनसे कहा, “अबे जल्दी बोल।”

बलबीर सिंह ने नजरें झुका लीं। अब बेइज्जती होने से उनका दिल तेजी से धड़कने लगा था। मगर वे चुप रहकर इस पीड़ा को पी गए।

“अबे बोल…कहाँ छुपा रखा है अपने जमाइयों को ?” साथ ही उस पुलिसमैन का एक घूँसा भी उनके मुंह पर पड़ा और वे एक तरफ को गिरते-गिरते संभल गए मगर इस घूंसे की पीड़ा से उनका सिर झनझना गया था। उन्हें लगा कि उनकी एक आँख में रोशनी जाना बंद हो गई है।

तभी एक दूसरा घूँसा भी पड़ गया। वे एक तरफ को गिर गए। किसी तरह जमीन पर मुँह लगने से बचा था।

तभी एक दिशा से कोई गीत गाते हुए बढ़ते आते कुछ लोगों की आवाज़ आई, “भारती ! माँ भारती !! हर दिशा उचारती। सन्तति ये तेरी माँ…तुझी पे प्राण वारती।।”

पुलिसमैन ने बलबीर सिंह के जमीन पर टिके हाथों पर अपने जूतों की एड़ी उठाकर जोर से मारी। बलबीर सिंह के मुँह से एक चीख निकल गई।

तभी “अंग्रेजो, भारत छोड़ो” की आवाज एकदम पास से आ गई। नारे लगाने वाला जत्था बिल्कुल पास आ गया था। दूसरी दिशा से “भारती, माँ भारती” गीत गाते लोगों की आवाज़ भी आई थी।

अगले पल ही दोनों दोनों जत्थे चौपाल पर आकर मिल गए। एक जत्थे का नेतृत्व आनन्द कर रहा था। इसमें 15-20 लोग थे। दूसरे जत्थे का नेतृत्व कौशल और लता मिलकर कर रही थीं। इसमें 20-22 महिलाएँ थीं।

आनन्द ने आगे बढ़कर बलबीर सिंह को गले से लगा लिया। कप्तान और पुलिसमैन हैरान-से यह मिलन देखते रह गए।

तभी एक तीसरा जत्था भी नारे लगाता आ गया, “इंकलाब जिंदाबाद…अंग्रेजों भारत छोड़ो।”

इस जत्थे के लोगों का नेतृत्व पटवारी जी कर रहे थे। वे लपककर चौपाल पर चढ़े और जाकर मुखिया जी को गले लगा लिया।

तीनों जत्थे एक साथ मिलकर चौपाल पर खड़े हो गए। पहले से ही भीड़ वहाँ खड़ी थी। सबको मिलाकर भारी भीड़ वहाँ जमा हो चुकी थी।

यह सब देखकर अंग्रेज कप्तान भड़क गया। उसने अपने सभी सिपाहियों को बुलाया और लोगों की भीड़ को खदेड़ने के लिए डंडा बजाने का आदेश दिया।

आनन्द ने आदेश दिया, “भाइयों ! ये डंडा बजाकर खुश हो लेंगे, इन्हें हो लेने दो। कोई पलटकर हाथ नहीं उठाएगा।”

सात-आठ पुलिसमैन थे। डंडा बजाकर थक गए। मगर यहीं कप्तान से चूक हो गई। उसने लोगों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए, “फायर।”

पुलिस ने गोली चलानी शुरू कर दी। अभी दो-तीन गोली चली थीं कि लोगों में भगदड़ मच गई।

उसी समय एक दिशा से कई गोलियां एक साथ चलीं और एक-एक करके पुलिस के सिपाही ढेर होने लगे। चीख मारकर जमीन पर गिरने लगे।

दी-तीन मिनट में सारे सिपाही दम तोड़ चुके थे। सब लोगों ने हैरानी से गर्दन उठाकर इस दिशा में देखा। आनन्द बढ़कर उधर लपक गया। सामने नवाब अपने 10-12 साथियों के साथ राइफलें लिए खड़ा था। इन लोगों ने ही गोलियां चलाई थीं।

नवाब आगे बढ़कर आ गया और कप्तान के सीने पर राइफल की नाल टिकाकर आनन्द से बोला, “ये कुत्ते की दुम हैं। शांति, अहिंसा और सत्याग्रह की लड़ाई लड़ने से मान जाएंगे ? कभी नहीं मान सकते।”

“इन्हें मानना होगा। इन्हें भारत की जनता की शक्ति को मानना होगा।” आनन्द ने एक बाजू उठाकर नारा लगाया, “भारतमाता की जय। इंकलाब जिंदाबाद।”

चारों तरफ से यही आवाज़ उठी।

आनन्द ने आगे बढ़कर नवाब को गले लगा लिया और उसने इशारा किया तो लता, कौशल, पटवारी जी व अन्य कुछ युवा कार्यकर्ता आकर नवाब और आनन्द से चिपक गए।

एक तरफ बलबीर सिंह और मुखिया भी गले मिल रहे थे। अंग्रेज कप्तान शर्मसार-सा यह सब देख रहा था।

शेष लोग गाने लगे — “भारती…माँ भारती…”

इस राष्ट्र भक्ति-गीत से उस गाँव की धरती तो क्या वहाँ का आसमान भी गूंज उठा था। वहाँ मौजूद सब लोग भारत माँ के लाड़ले थे और थे आज़ादी के दीवाने।

फिर अंग्रेजों की हिम्मत नहीं हुई कि बाद में आकर उन एकजुट हुए दीवानों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई करते।

……और संयोग ही था कि तीन दिन के बाद ही, पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को इन दीवानों का बहाया खून और पसीना अपना रंग लाया। भारत आज़ाद हो गया।

जय हिंद !

(समाप्त)

★★★
 
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