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माँ भारती के लाड़ले complete

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आनन्द ने नज़र घुमाकर स्थिति का जायजा लिया और अपना रास्ता साफ देखकर वह मकान की बाउंड्री फाँद गया। फिर वह सीधा सड़क पर दौड़ता चला गया।

आनन्द के साथी सिपाही भी असली पुलिस पर भारी पड़ रहे थे। हालाँकि अचानक आक्रमण होने से बहुत से पुलिस के सिपाही तो मुफ्त में मारे गए थे, मगर अब भी काफी पुलिस फोर्स उनके मुकाबले पर थी। देखने-सुनने वाले अचरज में थे कि पुलिस-पुलिस की यह आपस में लड़ाई क्यों ? मगर सच्चाई तो कोई भी न जानता था।

आनन्द पुलिस यूनिफॉर्म में सड़क पर बेतहाशा दौड़ा जा रहा था, उसे अभी कोई छिपने का मौका नहीं मिला था, क्योंकि दो हवलदार उसके पीछे अब भी दौड़े आ रहे थे। उन्होंने न जाने कैसे आनन्द का यह इरादा भाँप लिया था।

भागते-भागते शहर पीछे छूट गया था। मगर वे दोनों हवलदार न तो पीछे हटे और न आनन्द को पकड़ पाए। अब विवश होकर एक हवलदार ने फायर किया, जिसे आनन्द एक ओर को कूदकर बचा गया। मगर आनन्द ने भी अब एक पल ठहरकर निशाना लिया और गोली मारी।

गोली मारने वाला हवलदार लुढकियाँ लेता हुआ जमीन पर लोट गया। आनन्द का निशाना उसकी खोपड़ी में लगा था।

उसे लुढ़कता जान आनन्द फिर सीधा भागता चला गया। मगर दूसरा हवलदार भी जीवट वाला आदमी था। वह अब भी लगातार आनन्द का पीछा किए जा रहा था। आनन्द ने पीछे मुड़कर एक क्षण ठिठक कर उसको भी निशाने पर लिया और वह हवलदार भी कटे पेड़ की तरह ढह गया। लेकिन इस बार आनन्द गच्चा खा गया। उस मरते हुए हवलदार ने जो एक गोली चला दी थी, वह आनन्द के पाँव में टखने में उतर गई थी।

आनन्द ने अब अपना रास्ता साफ देखा तो एक जगह ओट लेकर अपने सिविल कपड़ों के ऊपर से पुलिस वर्दी उतारी और एक बड़ा चौड़ा-सा कपड़ा फाड़कर तुरन्त गोली लगे घाव पर कसकर बांध लिया। थोड़ा-सा खून जो छ्लककर ऊपर आ रहा था, वह एकदम रुक गया।

सामने ही रेलवे स्टेशन नज़र आ रहा था।

आनन्द सीधा उधर ही भाग पड़ा। उसने कुछ दिनों के लिए अब यह शहर छोड़कर चले जाना ही अपने लिए बेहतर समझा था।

एक गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी थी। आनन्द अवैध तरीक़े से जो बेटिकट यात्री ट्रेन में चढ़ते थे, उसी रास्ते से आज प्लेटफार्म पर चला गया। फिर भी आनन्द के पहुंचते-पहुँचते गाड़ी सीटी देकर चल पड़ी थी।

आनन्द तेजी से दौड़कर उस गाड़ी के एक डिब्बे में चढ़ गया। कुछ पलों में ही गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली।

* * *
 
रेल के डिब्बे में दाखिल होते ही एक झटके के साथ आनन्द ठिठककर रह गया। यह तो लेडीज का डिब्बा था। डिब्बे में सामने ही एक सीट पर एक सुंदर युवती बैठी थी और उसके साथ ही एक अधेड़ आयु की महिला बैठी थी। वह अधेड़ महिला शायद लड़की की माँ ही थी। जनाना डिब्बे में पुरुष को घुसते देख वह लड़की चौंककर बोली, “ऐ कौन हो तुम ? यह लेडीज कम्पार्टमेंट है। तुमने यहाँ घुसने की जुर्रत कैसे की ?”

आनन्द एकाएक सिटपिटा गया, “जी, माफ कीजिए। मैं गलती से घुस आया क्योंकि गाड़ी चल पड़ी थी। इसलिए बिना देखे-समझे इसी डिब्बे में चढ़ गया। अगला स्टेशन आते ही मैं उतर जाऊँगा।”

“अहाहा…गलती से चढ़ आया।” लड़की ने आनन्द की बात दोहराते हुए बुरा-सा मुँह बनाया, “मैं तुम लोगों की चालाकी खूब समझती हूँ। दो औरतों को डिब्बे में अकेले बैठा देखा तो तुम्हारी हिम्मत हो गई। पर मैं तुम्हें अभी इसका मज़ा चखाती हूँ।” वह जंजीर की तरफ झपटी।

आनन्द ने फौरन रिवाल्वर निकाल लिया और उसका रुख उन दोनों की तरफ करके बोला, “मैं कहता हूँ चुपचाप अपनी जगह बैठ जाओ। मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि मैं तुममें से किसी को कुछ नहीं कहूँगा। मगर हाँ अगर तुमने कोई चालाकी दिखाई तो बात और है…आह !” यह कहते-कहते सहसा उसके मुँह से एक कराह भी निकल गई थी।

दोनों महिलाएँ आनन्द की धमकी पर सहम गईं और चुपचाप बैठ गईं। मगर जब उसकी कराह सुनी तो लड़की ने आनन्द के चेहरे को देखा। आनन्द चुपचाप एक सीट पर आकर बैठ गया। अब उसका गोली लगने से हुआ घाव दर्द करने लगा था।

आखिर अधेड़ स्त्री ने हिम्मत करके पूछा, “लेकिन तुम हो कौन…औऱ तुम्हारे पैर से यह बहता हुआ खून…?”

“कम से कम कोई चोर उचक्का नहीं हूँ, यह भरोसा रखो। तुम्हें या तुम्हारे किसी सामान को छूऊँगा भी नहीं। क्या इसके बाद भी कुछ पूछना है ?” आनन्द ने उसे कड़ी दृष्टि से देखा। अब वह स्त्री चुप होकर बैठ गई थी।

रेल बराबर तीव्र गति से दौड़ती रही। पेड़-पौधे, खेत, गाँव; सब पीछे छूटते जा रहे थे।

आनन्द बराबर सतर्क हुआ बैठा रहा। वह अपने घाव से उठती हुई टीस को बराबर दबाने की कोशश कर रहा था मगर रह-रहकर उसके मुँह से “आह” निकल जाती थी। वह किसी तरह अपने होशोहवास पर काबू किए था।

दोनों माँ-बेटी उसकी उस स्थिति को देख और समझ रही थीं। उन्हें अब यह तो विश्वास हो गया था कि उस व्यक्ति से हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचने वाला है।

दिन बराबर ढलता जा रहा था और गाड़ी दौड़ती जा रही थी। आनन्द को इसका कोई ज्ञान नहीं था कि गाड़ी कहाँ जा रही है ? उसे अब अगला स्टेशन आने का बेसब्री से इंतज़ार था। वह उतरकर कहीं सुरक्षित जगह पहुँच जाना चाहता था। दर्द इतना था कि वह केवल अपने आत्मबल के कारण ही बार-बार अपनी चेतना खोते-खोते रह गया था। गोली घाव के अंदर थी और दर्द असहनीय था।

लड़की कुछ सहमी थी मगर फिर भी उसने दयाभाव दिखाते हुए कहा, “क्या पानी लीजिएगा।” आनन्द ने देखा, वह पानी का गिलास लिए खड़ी थी। आनन्द ने प्यासा होने के बावजूद भी कुछ सोचकर पानी लेने से इनकार कर दिया।

अधेड़ औरत ने बड़े स्नेह से कहा, “बेटे, तुम कोई भी हो, हमें इससे अब कुछ मतलब नहीं। तुम पानी ले लो। तुम जो कर रहे हो कोई अच्छा काम ही कर रहे हो, यह हम समझ गए हैं। हम तुम्हें पानी के बहाने कोई धोखा देने नहीं जा रहे हैं। क्यों लता, तुम भी तो इन्हें विश्वास दिलाओ।”

“ले लीजिए पानी, माँ ठीक कह रही हैं।” लता नाम की उस युवती ने फिर अनुरोध किया तो आनन्द मना न कर सका। उसने हाथ बढ़ाकर पानी का गिलास पकड़ लिया। फिर झटपट पानी पीकर गिलास वापिस दे दिया।

दिन कभी का छिप गया था। रात हो चुकी थी। वह चाँदनी रात थी। बाहर चाँद की चाँदनी फैलती हुई नज़र आने लगी थी। आनन्द अपनी सीट से उठकर संडास में जा घुसा।

कुछेक क्षण गुज़रे होंगे कि कोई स्टेशन आ गया था। गाड़ी रुकी और दो मिनट बाद फिर चल पड़ी। आनन्द पछताया। वह संडास में था, इसलिए स्टेशन पर उतर नहीं सकता था। उसने सोचा, बहुत देर बाद किसी स्टेशन पर यह गाड़ी रुकती है, अब जाने कितनी देर बाद कोई स्टेशन आएगा।

फारिग होकर वह जैसे ही संडास से बाहर आने को हुआ, दरवाजे की ओर से कुछ आवाज़ें सुनीं। शायद नए कुछ यात्री चढ़े थे, इसलिए अभी भी लोगों के बोलने की आवाज़ें आ रही थीं।

“अच्छा बागी है। हो सकता है जी। मगर हमें तो कम्पार्टमेंट में कहीं दिखा नहीं।” यह लता की माँ की ही आवाज़ थी।

“आपने संडास का इस्तेमाल करके देखा है ?” किसी पुरुष का प्रश्न था।

“जी नहीं। हम तो यहीं बैठे हैं। कहीं नहीं गए।” माँ का उत्तर था।
 
आनन्द बिना आवाज़ किए संडास से निकला और एक दरवाजे की आड़ में जाकर छिप गया। निकट ही खिड़की थी और पास ही सामने दूसरी तरफ का दरवाजा था।

वह आदमी जो लता की माँ से पूछताछ कर रहा था, आगे बढ़ गया। वह निकट आया तो आनन्द ने स्पष्ट देखा, वह कोई पुलिस का आदमी था। वह जाकर संडास में चैक करने लगा।

आनन्द ने त्वरित बुद्धि से सबसे पहले अपनी सुरक्षा का उपाय सोचा। उसने खिड़की से बाहर देखा। किनारे पर बालू रेत की काफी लम्बी-चौड़ी कतार सी जाती हुई उसे भासित हुई।

आनन्द ने आव देखा न ताव। वह अपनी टाँग के दर्द को भी भूल गया। दृढ़ निश्चय किया और रेल से कूदने के लिए खिड़की से बाहर छलाँग लगा दी। रेल की “छुक-छुक-छुक” की आवाज़ में कोई भी न देख पाया, न आवाज़ सुन पाया।

मगर बाहर रेत की कतार होना आनन्द की आंखों का भ्रम ही था। वहाँ कुछ भी नहीं था। हो सकता है चाँदनी रात में चाँदनी के कारण ही यह भ्रम हो गया था कि वहाँ बालू रेत दूर तक बिछी हुई है।

ट्रेन से गिरते ही आनन्द ढलान में गिरा और उसी में नीचे लुढ़कता चला गया था। इसी बीच उसकी चेतना जाती रही।

रेलगाड़ी तेज रफ्तार में थी। एक-दो मिनट में कहीं की कहीं निकल गई। किसी को कुछ पता नहीं चला कि वहाँ कौन कूदा, कौन गिरा ?

* * *

पुलिस वाला भी चला गया और आनन्द भी चलती ट्रेन से कूद गया मगर इसका पता लता व उसकी माँ को नहीं था। काफी देर गुज़र जाने के बाद लता ने माँ से कहा, “माँ, वह क्रांतिकारी कहाँ है ?”

“अरे हाँ लता…वह तो संडास में गया था। अभी लौटा ही नहीं ?” माँ हैरान होकर बोलीं।

“कहीं छुप गए होंगे। पुलिस वाले की हमसे पूछताछ को उन्होंने भी तो सुना ही होगा।”

“हाँ, आगे कहीं चला गया होगा।” माँ बोली। फिर स्वयं भी उठकर संडास की दिशा में चली गईं, जैसे आनन्द को ही ढूंढने गई हों। संडास खोलकर एक नज़र उसके भीतर डाली। फिर द्वार बन्द करके ट्रेन में आगे बढ़ गईं। पूरे डिब्बे में घूम कर आने के बाद वापिस आकर लता से बोलीं, “कहीं चलती ट्रेन में से तो नीचे नहीं कूद गया वह बागी ?”

“बागी नहीं माँ, क्रांतिकारी कहो। मुझे ‘क्रांतिकारी’ शब्द ठीक लगता है।” लता ने माँ से कहा तो वह भी मुस्कराईं, “हाँ, ठीक कहती हो। बागी शब्द से ऐसा लगता है जैसे गलत बात पर कोई बगावत कर रहा है। बगावत करने वाले की एक खराब सी छवि मन में आती है। मगर उसी व्यक्ति के लिए क्रांतिकारी शब्द प्रयोग करो तो मन में आदर उपजता है। ऐसे व्यक्ति की पूजा करने का मन करता है।”

“हाँ माँ, बिल्कुल ठीक बयान किया तुमने। पूजा करने का ही मन करता है।” लता माँ की इस व्याख्या से बड़ी खुश हुई।

तभी लता की नज़र एक तरफ पड़े एक लाल कपड़े पर पड़ी। उसने झुककर वह कपड़ा उठाया। वह रुमाल था।

“माँ, यह तो लाल रंग का रुमाल है।” लता रुमाल को हाथ में लेकर, उसे गौर से देखने लगी।

“उसी क्रांतिकारी का लगता है।” माँ ने कहा “दिखा तो मुझे।”

“आनन्द !” लता रुमाल के एक कोने पर लिखे नाम को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। सहसा वह बोली, “आनन्द नाम है इन क्रांतिकारी का।” वह रुमाल लता ने माँ को दे दिया।

माँ ने भी रुमाल के एक कोने पर लिखे नाम को पढ़ा, “हाँ, आनन्द ही नाम है। रुमाल पर धागे से किसी ने काढ़ दिया है यह नाम।”

“क्या करें इसका ? माँ, यह रुमाल हम रख लें ?” लता ने पूछा।

“क्यों ? क्या करेंगे इसका ? अब वह आनन्द हमें कहीं फिर मिले न मिले।”

“माँ !” लता भावुक हो गई, “क्रांतिकारी तो पूजा के काबिल होते हैं न ? हम इस रुमाल को पूजा के आले में रख लेंगे। पूजा करेंगे इसकी और उस देवता को याद कर लिया करेंगे, जो देश को आज़ाद कराने के लिए, अपनी जान हथेली पर लिए फिरता है। यह आज़ादी वह अकेले अपने लिए ही तो नहीं माँग रहे हैं। यह तो हम सब हिंदुस्तानियों के लिए होगी।”

“लता ! मेरी बेटी…ई…” माँ गदगद हो गईं, “सही कहती है तू। रख ले इस रुमाल को। उसके जाने के बाद अब हमें अक्ल आई है कि वह क्रांतिकारी था। वरना पहले तो हम उसे कोई चोर-उचक्का समझे थे।”

लता ने उस रुमाल को अपने माथे से छुआकर, उसके मालिक का अभिनन्दन किया और उसकी सलामती के लिए मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।

* * *
 
[छह]

नवाब ने एक स्त्री की चीख सुनी थी। उसी चीख के बाद राबर्ट ग्रीन की भरभराई चीख भी उसके कानों में पड़ी।

नवाब का माथा ठनका। वह समझ गया कि राबर्ट ग्रीन ने आनन्द को पहचान लिया था। इसी बात पर आनन्द ने राबर्ट ग्रीन को मारना चाहा होगा और बीच में आकर बेमौत मर गई थी उसकी पत्नी।

तभी पुलिस की जीप आकर रुकी थी।

नवाब एकाएक हड़बड़ा गया था, क्योंकि आनन्द अभी तक बाहर नहीं निकला था और राबर्ट का उसे पहचान लेना…इसके साथ ही दरवाजे से प्रविष्ट हुई पुलिस।

नवाब ने चाहा कि कोई निर्णय ले मगर उसे अपने पूर्व के प्लान के मुताबिक अभी आनन्द के सिग्नल का इंतज़ार था। इसी कारण वह अब तक धर्मसंकट में था। मगर उसका दिमाग अभी भी तेजी से काम कर रहा था।

तभी यकायक आनन्द का सिग्नल मिल गया था। बस फिर क्या था ? नवाब के साथियों ने, जो इस वक़्त पुलिस की वर्दी में थे, राबर्ट के मकान की आड़ लेकर हथियार संभाल लिए थे और चहारदीवारी के दरवाजे से मकान के दरवाजे तक बढ़ती हुई पुलिस को बिना सोचने-समझने का वक़्त दिए, भूनना शुरू कर दिया।

इस अचानक के हमले से बेचारे पुलिस के सिपाही बेमौत ही मौत के मुँह में पहुंचने लगे। बेचारे अपने कातिल से बचने के लिए कुछ कर भी न पाए।

इसी बीच आनन्द भी एक तरफ की चाहरदीवारी फांदकर बाहर कूद गया था। मगर उससे पहले उसे मरते-मरते एक इंस्पेक्टर से संघर्ष करना पड़ा था।

तभी एक पुलिस जीप और रुकी। फायरिंग की आवाज़ वे पुलिस वाले पहले ही सुन चुके थे।

कुछ सिपाही भागते हुए हुए आनन्द के पीछे गए थे और बाकी ने चहारदीवारी के चारों ओर तितर-बितर होकर पूरी नाकेबंदी करके नवाब और उसके साथियों को घेर लिया था।

नवाब व उसके कई साथी फंस गए थे। जीप के माइक से डी.वाई.एस.पी. की आवाज़ गूंजी थी, “नवाब हथियार फेंक दो और अपने साथियों से कह दो कि खुद को पुलिस के हवाले कर दें। तुम देख ही रहे हो कि पुलिस ने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है।”

नवाब की तरफ से तुरन्त कोई उत्तर नहीं मिला था और न कोई प्रतिक्रिया हुई थी। नवाब के साथियों को उसके आदेश का इंतज़ार था।

नवाब बड़ी तेजी से सोच रहा था।

उसने अपने साथियों को आदेश दे दिया, “भून दो सालों को। जो भी नज़र आए, उसे जिन्दा मत छोड़ना।”

यहीं उसने सोचने में गलती की थी। उसने अपनी सामर्थ्य का पूरा हिसाब नहीं लगाया था। बस मात्र आवेश में ही यह कदम उठा दिया।

दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई थी।

नवाब घूमा था। अपने पीछे चहारदीवारी पर चढ़ते हुए उसने दो-तीन सिपाहियों की आहट ले ली थी। उसकी राइफल ने तड़ातड़ गोलियां उगलीं और तीनों सिपाही ढेर होकर नीचे गिर पड़े लेकिन एक राइफल उसके पीछे भी तन गई थी।

नवाब खाली हुई चहारदीवारी की तरफ दौड़ा। पीछे तनी हुई राइफल से गोलियाँ उगलतीं कि माइक पर आवाज़ गूँजी, “डोंट शूट हिम। वी वांट हिम अरेस्ट।” इस आदेश के बाद, नवाब के जिस्म को बचातीं हुई मगर चारों तरफ गोलियाँ उसके कदमों में नाचने लगी थीं। मगर नवाब चहारदीवारी तक पहुंच चुका था।

एकाएक एक राइफलधारी सिपाही चहारदीवारी पर चढ़ आया था। नवाब ने भी इसे भाँप लिया था। मगर राइफल चलाते ही वार खाली। गोलियाँ खत्म हो गईं। उधर चारों तरफ से गोलियाँ उसके जिस्म में घुसने को बेकरार।

उसके कई साथी पुलिस द्वारा कवर कर लिए गए थे और कई मारे गए थे।

नवाब को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने राइफल गिरा दी और हाथ सिर के ऊपर उठाकर खड़ा हो गया था। साथ ही उसने अपने साथियों को भी आदेश दे दिया था, “गिरा दो हथियार।”

हथियार गिरा दिए गए थे। पुलिस दौड़कर अंदर घुस पड़ी थी।

* * *
 
आधी रात के बाद किसी समय आनन्द को होश आया।

उसके पूरे शरीर में टीसें उभर रही थीं। उसके शरीर का एक-एक जोड़ बुरी तरह दुख रहा था। उसे लगा कि किसी गाड़ी की तरह उसका भी एक-एक पुर्जा अपनी जगह से हट गया था और वह खुद किसी भी क्षण अलग होकर, टूट-टूटकर बिखर जाएगा। उसका जोड़-जोड़ अलग हो जाएगा।

फिर भी वह हिम्मत करके उठा और उठकर बैठ गया। मगर बैठते ही उसके कण्ठ से दर्द के मारे चीख निकल गई। फिर भी उसने हिम्मत की। उसने देखा, वह रेलवे लाइन के किनारे बनी एक खाई में पड़ा था। शायद इसीलिए वह जीवित भी बच गया था।

उसे आश्चर्य हुआ कि वह यहाँ क्यों आ पड़ा ? यदि दर्द की अनुभूति न होती तो वह यही समझता कि वह इस समय कोई सपना ही देख रहा है…कि जैसे किसी दुःस्वप्न में आदमी कहीं-कहीं भटका और परेशान हुआ करता है।

शरीर के गवाही न देने के बावजूद भी वह हिम्मत करके उठा। उठकर खड़ा हो गया। अपने अंग-अंग को समेटा, उसे फिर से उसके सही खाँचे में फिट करके जोड़ा-संभाला। सामने की तरफ नज़र डाली।

सामने रेलवे स्टेशन की लोहे की पटरियाँ जमीन की छाती से लिपटी हुई, आगे तक जाकर आसमान के दूसरे छोर से मिल गई थीं।

सहसा उसे ख्याल आया कि वह किसी ट्रेन में सफर कर रहा था। दो पुलिसकर्मी डिब्बे में घुस आए थे और उसके बारे में उन दो स्त्रियों से पूछताछ कर रहे थे। फिर उसे ढूंढने ही लगे थे। उनके हाथ पड़ने के डर से वह किसी बालू रेत की ढेरी पर रेल से कूद पड़ा था।

चाँदनी उसी तरह अब भी फैली हुई थी। मगर रेत के कण का तो वहाँ कोई नामोनिशान न था।

“क्या वह चाँदनी से भ्रमित होकर कूद गया था ?” उसने स्वयं से पूछा। हाँ, वह भ्रम का ही शिकार हो गया था। वरना शायद वह चलती गाड़ी से इस तरह न कूदता। कोई और उपाय सोचता।

उसने सोचा, शायद ये भ्रम ही होते हैं, जिनमें मनुष्य जीता है। भ्रम ही तो जिंदगी है और शायद जिंदगी ही पूरी की पूरी एक भ्रम है।

खैर,…! उसने अपने मस्तिष्क को एक झटका दिया और सारे विचार छिटक देने चाहे। छिटक भी दिए।

उसने अनुमान लगाया। अब रात्रि का कोई तीसरा प्रहर होगा। शायद ढाई-तीन बजे का कोई समय होगा।

एक टीस सी फिर उठी और खड़ा रहना उसके लिए मुश्किल हो गया। किसी तरह दांतों को भींचकर वह दर्द को उस क्षण पी गया।

उसने सोचा — वह कहाँ आ गया है ? कौन सा इलाका है यह ? सामने रेल की पटरियां और उसके पार कुछ खुला और कुछ झाड़ियों से घिरा इलाका। वह कहाँ कूद गया ? यहाँ न कोई रास्ते का चिन्ह है, न जीवन का। वह कहाँ है इस वक़्त ? मुरादाबाद के इलाके में है या अलीगढ़ के, कुछ पता नहीं। उसने भी तो ट्रेन में किसी से यह तक नहीं पूछा कि ट्रेन कहाँ जा रही है। बस दौड़कर चढ़ गया था। और फिर गर्दिश पड़ी तो यहाँ कूद गया था।

खैर, अब यहाँ से कहीं चलना चाहिए। कहीं भी आस-पास कोई गाँव या शहर तो मिलेगा। फिर कुछ करेगा। यहाँ पड़ा रहा तो कोई जंगली जानवर खाने को आ जाएगा या कोई ढूंढने आया पुलिस वाला उसे पकड़ ले जाएगा।

वह हिम्मत करके एक तरफ को चल पड़ा। तभी दूर कहीं सियार के बोलने की आवाज़ आई। खैर, अपने भविष्य को ईश्वर के हवाले करके चल पड़ा। फिर दर्द उठा। फिर वह कराह उठा। किसी तरह जबड़े को भींचकर उसने दर्द को पी लिया और पैरों को तेज-तेज चलाने लगा।

जब भी उसका पैर कहीं ऊंचे-नीचे पर पड़ जाता तो दर्द की तेज लहरें उठतीं और वह कराह उठता। मगर वह किसी न किसी तरह आगे बढ़ता ही रहा।

मस्तिष्क में उमड़ते विचार भी उसे परेशान कर रहे थे — क्या वह यहाँ सुरक्षित है ? या किसी सुरक्षित जगह पर पहुंच जाएगा ? वह अपने साथियों को जो जय- नगर में राबर्ट ग्रीन के मकान पर जूझता छोड़ आया था, वे सफल हो गए होंगे ? नवाब ने आकर सब कुछ ठीक से संभाल लिया होगा ? कैसे यह सब जाना जा सकता है ? किसी सुरक्षित जगह पर पहुंचकर ही कल उनकी खैरखबर ली जा सकती है !

उसे याद आया कि उसने एक जगह नवाब के वे कागज़ात जो राबर्ट ग्रीन के कमरे से चुराए थे एक जगह फाड़ कर फेंक दिए थे। अब उन कागज़ात का करना भी क्या था? यह उसे याद आया तो उसे बड़ा संतोष हुआ।

एकाएक उसके विचारों को झटका लगा। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया था। बदन में दर्द बिजली की तरह फैल गया था। वह वहीं का वहीं रुक गया। उसका ध्यान गया कि उसका रिवाल्वर भी उसकी जेब में न था। अब क्या करे ? क्या वापस वहाँ जाकर देखे जहां वह गिरा था। नहीं, अब यह संभव नहीं। अब तो आगे ही बढ़ना होगा।

उसने सामने नजर उठाकर देखा। लगभग आधा मिल दूर कुछ मकानों के शीर्ष दीख रहे थे। बीच में से झाँक रहा था किसी मंदिर का एक बुर्ज। यानी नजदीक ही कोई गाँव था। यह देखकर मन में आशा का नया संचार हुआ। शरीर भी जैसे कुछ चेतन हुआ। वह अपेक्षाकृत कुछ तेजी से चलने लगा।

एकाएक एक झाड़ी की शाखा खड़खड़ा उठी। एक भय भरी सिहरन आनन्द के पूरे शरीर में फैल गई। वह औऱ तेजी से चल पड़ा। लगभग दौड़ने ही लगा। मगर जैसे ही उसने मुड़कर देखा। एक जंगली कुत्ता उस झाड़ी से निकल कर दूसरी तरफ को भाग गया। आनन्द की जान में जान आई। पल भर में ही वह पसीने से सराबोर हो गया था।

एकाएक चलते-चलते उसे लगा कि उसके ज़ख्म वाले पाँव पर कुछ रेंग रहा है। उसने ठिठक कर ज़ख्म पर हाथ फिराया तो खून उसके हाथ पर लगा। वह समझ गया कि अब ज़ख्म से खून रिसने लगा है। क्योंकि गोली लगे बहुत वक़्त बीत चुका था। उसने पट्टी को खोलकर फिर दुबारा से थोड़ा सख्त करके बाँधा। फिर वह धीरे-धीरे चलने लगा।

अभी कुछ ही दूर चला था आनन्द कि जैसे वह किसी चिकनी चीज पर फिसला। शायद जमीन गीली थी या वह यूँ ही घास पर फिसल गया था, वह नहीं देख पाया और संतुलन नहीं बना पाने के कारण गिर पड़ा। उसके जिस्म में उठती हुई दर्द की लहरें उसके दिमाग की चेतना पर हावी होती चली गई और वह वहीं पर पड़े-पड़े बेहोश हो गया।

* * *
 
पौ फटने वाली थी। अंधकार अपना स्थान छोड़ता जा रहा था और उसके स्थान पर दिन का दूधिया उजाला छाता जा रहा था।

हरपाल सिंह सुबह सवेरे ही अपने घर से निकला। उसने दोनों हाथों से अपनी आंखें मसली और फिर आंखें फाड़कर देखता चल दिया। वह सुबह की सैर के लिए निकला था।

रह-रहकर अब भी गाँव की गलियों के कुत्ते भौंक उठते थे। मगर अब उनके सुरों में रात जैसी बेकरारी न थी।

राह में उसे एक-दो औरतें मिली जो पानी भरने के लिए कुएँ पर जा रही थी। हरपाल ने एक औरत की मटकी अपनी उंगली से बजाकर पूछा, “कैसी हो चाची ?”

“भगवान का शुक्र है ! हरपाल, तू कब आया रे ?” कुछ हल्के आश्चर्य और प्रसन्नता के लहजे में उस औरत ने पूछा।

“अरे चाची, परसों से आया हुआ हूँ। तू तो जब से दिखी नहीं। कहीं बाहर चली गई थीं क्या ?”

अभी चाची कोई जवाब देती कि सामने से एक तांगेनुमा-कम-बैलगाड़ी आ गई। गाड़ी हाँकने वाले ने हरपाल को पहचान लिया था। उस आदमी को देख कर घूँघट नीचे खींचकर पनिहारिन आगे बढ़ गई थी। हरपाल अब गाड़ी वाले आदमी से बातें करता चलने लगा, “तुम अब जा रहे हो खेत में ?”

“हाँ भाई, वो ससुरी भैंस ने आज दूध नहीं दिया था। लाख जतन किए तो अब जाकर दूध दिया। बिना दूध निकाले कैसे जाता ? और किसी को घर में दूध देगी नहीं। इसलिए मुझे रुकना पड़ा और आज खेत पहुंचने को देर हुई।”

और फिर इसी तरह की बातें करके गाड़ी वाला भी आगे बढ़ गया। और हरपाल बढ़ गया अपने रास्ते की तरफ। अलस्सुबह की शीतल व सुगन्धित हवा मन को बड़ा सुख दे रही थी।

अचानक हरपाल ने अपने पीछे आहट सुनी। मुड़कर देखा तो उसका कुत्ता भी पीछे-पीछे चला आ रहा था। वह रुक गया और कुत्ते के पास आते ही उस पर झुककर, उसकी कमर पर हाथ फेरकर पुचकारा, “आ गया तू भी ? तो आ चल।”

हरपाल के साथ ही कुलांचे भरता हुआ उसका कुत्ता भी चल दिया।

दोनों गांव से निकल कर खुले खेतों के बीच बने रास्ते पर निकल गए थे। कुत्ता बराबर साथ चल रहा था। दोनों ऐसे ही घूमते हुए काफी दूर निकल गए।

एक जगह पर पानी भरा देखकर हरपाल रुक गया। वह कुत्ते से बोला, “यहीं टहलना। कभी किसी कुतिया के पीछे चला जाए। मैं अभी आया…बस पाँच मिनट में दिशा-मैदान से फारिग होकर।”

कुत्ता उनका पालतू था। तुरन्त समझ गया और वहीं ठहर गया। हरपाल एक खेत में भीतर घुसता चला गया। कुत्ता उसे खेत के अंदर जाते देखता रहा। कुछ देर बाद कुत्ते ने मुँह फिरा लिया। फिर ऐसे ही जमीन सूंघने लगा। धरती सूँघते-सूँघते हुए वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

सहसा उसने कान खड़े करके इधर-उधर चौंक कर देखा। फिर नीचे झुककर जमीन सूंघी। फिर दुलकी चाल से एक तरफ को चला गया।

कुछ देर में हरपाल खेत से बाहर निकल कर आया। उसने अपने आसपास देखा।

दिन का स्पष्ट उजाला अभी भी नहीं हुआ था। कुछ न कुछ अंधेरे का उजाले में मिश्रण था। हरपाल ने कुत्ते को उधर नहीं पाया तो फिर एक तरफ को चलना शुरू कर दिया।

एक जगह रुककर उसने सिगरेट सुलगाई थी और फिर कुत्ते को पुकारता हुआ और सिगरेट के कश का मज़ा लेता हुआ आगे बढ़ने लगा।

कुछ आगे जाकर उसने देखा। उस जगह से कुछ दूर उसका कुत्ता खड़ा हुआ नीचे झुककर किसी चीज को सूंघ रहा था। हरपाल ने उसे पुकारा, तब भी कुत्ता नहीं लौटा तो हरपाल स्वयं उसके पास चला गया।

वहाँ जाकर उसने देखा तो उसके सारे शरीर में सनसनी-सी दौड़ गई। हलक में जैसे कुछ फंसकर रह गया। देखा तो एक आदमी औंधा पड़ा है। उसने सोचा, कौन है यह ? इसे किसने यहाँ मारकर फैंक दिया है ? फिर किसी ख्याल से वह उसके समीप गया।

हरपाल ने उस आदमी की नब्ज टटोली। नब्ज़ तो चल रही थी। एक आशा की चमक उसकी आँखों में हल्के-से उतर आई, “ज़िन्दा है…बेहोश है।” वह खुद ही होंठों-होंठों में बड़बड़ाया, “बहुत खून बह गया है इसके शरीर से। शायद किसी से जमकर सँघर्ष किया है इसने।”

उसने कुछ पल रुककर खड़े-खड़े सोचा। कोई चोर या डाकू हुआ तो…?” फिर न जाने क्यों उसके मन ने कहा, “नहीं-नहीं।” फिर सोचा, “इसे यहीं पड़ा रहने दो। …नहीं-नहीं, उठाकर अपने घर ले चलूँ…नहीं, अगर किसी ने देख लिया और मुझसे पूछ बैठा तो…? मैं क्या जवाब दूँगा ? जाने दो, पड़ा रहे यहीं।”

हरपाल के मन में विचारों का अंतर्द्वंद छिड़ गया था। फिर मन ने कहा — बिना देखभाल के यह मर गया तो…। यदि जल्दी ही इसकी देखभाल न की गई तो यह मर भी सकता है। नहीं, इसके मर जाने से मुझे क्या मिलेगा। बेचारा जी उठे तो अच्छा ही है। क्या पता है, बाल-बच्चों वाला हो।

हरपाल ने दृढ़ निश्चय करके उसके शरीर को उठाकर अपने कंधे पर लाद लिया और अपने कुत्ते से बोला, “चल भाई ! जो होगा देखा जाएगा।”

पाठक मित्रों, पहचान गए न अपने आनन्द को ? जिस अचेत शरीर को हरपाल अपने कंधे पर डाल कर ले गया, यह आनन्द ही था।

* * *
 
[सात]

आनन्द घर के आँगन में चारपाई पर बैठा था।

उसका एक ज़ख्मी पैर मुड़ा हुआ चारपाई पर रखा था और दूसरा पैर नीचे लटक रहा था।

पैर की गोली उसने खुद निकाल ली थी, गर्म चाकू की नोक से। खून काफी बहा था मगर आनन्द ने किसी को इसका अहसास भी न होने दिया था।

वैद्य जी आए थे। आनन्द ने बदन में दर्द की बीमारी बता दी। वैद्य जी उसी की दवा देकर चले गए। बदन में मालिश की और खाने की दवा दे दी, दर्द निवारक कोई जड़ी-बूटी, पिसी हुई। कुछ पका कर पिलाने वाली दवा दी थी, जिसे कौशल को समझा दिया गया कि कैसे पकानी और पिलानी है। कौशल, हरपाल की अविवाहित बहन।

हरपाल को उसने बताया कि मेरे गुप्तांगों के पास चोट लगी है। जरा एकांत में ही दवा लगाऊंगा। इस तरह उसने गोली के घाव वाली बात सबसे छिपा ली। हरपाल उसे छोड़कर बाहर चला गया। घर में उस वक़्त बस कौशल थी। वह अपने घर के काम-काज में लगी हुई थी। माँ-बाप हफ्ते भर के लिए पास गाँव में किसी शादी में शामिल होने चले गए थे। भाग्य से ऐसा अवसर मिला था आनन्द को कि उसकी सब बातें छिपी रह गई थीं।

आनन्द ने मौका देखा और अपने कमरे से लगी रसोई में चला गया। चूल्हा जल रहा था। ऊपर पतीली में कुछ पकता छोड़ गई थी कौशल। आनन्द ने एक चाकू उठाया। उसे आग में डालकर अपने कमरे में चला गया। फिर दो-तीन मिनट में चुपके से आया और गर्म चाकू ले गया।

फिर कमरा बन्द करके एक कोने में बैठकर हिम्मत जुटाई और दुखते ज़ख्म में चाकू घुसेड़ कर गोली का छर्रा निकल दिया। मगर इस दुस्साहसिक कार्य में वह दर्द से बिलबिला उठा और मुँह से चीख निकल गई। उसे चक्कर सा आ गया। मुश्किल से घाव पर पट्टी बांधी। किसी तरह उठकर कमरा भी उसने खोल दिया। मगर वह वहीं चक्कर खाकर गिर गया।

जब उसकी चेतना लौटी तो उसने देखा कि कौशल उसे सहारा देकर चारपाई तक ले आई थी।

“आप चीख पड़े थे। यह देखना कितना खून बह गया है। कोई गहरा घाव है शायद।”

उसके पास बोलने के लिए शब्द ही नहीं थे। कौशल सब जान गई थी। अब “हाँ” कहने का भी कोई अर्थ नहीं, और “ना” कहने पर भी अब कुछ छिपने वाला नहीं था। वह चुपचाप बिस्तर पर लेट गया। घाव से खून अब भी बह रहा था।

कौशल जाकर घर में कोई रखी दवा उठा लाई। उसने पट्टी खोली। वही दवा घाव पर लगाई। फिर दुबारा पट्टी बाँधी। आनन्द रह-रहकर मना करता रहा मगर उसने जबर्दस्ती यह काम कर दिया।

फिर बोली, “हम किसान लोग हैं। खेतों में भी काम करने जाते रहते हैं। हमारे समाज में लड़कियों को बाहर निकलने और काम करने की छूट है। हम अन्य समाजों की तरह नहीं कि लड़की है तो घर से बाहर नहीं निकलेगी, किसी पराए मर्द से बात नहीं करेगी। छुईमुई बनी रहेगी। किसी को दुख-तकलीफ हो तो हम यह नहीं देखतीं कि वह मर्द है या औरत।”

“तुम धन्य हो। तुम्हारा समाज धन्य है। मैं ऐसे ही भारत की कल्पना करता हूँ। जहां स्त्री-पुरुष में भेद न हो, जाति और धर्म के भेद न हों और…”

“तुम जानना नहीं चाहोगे हमारी जाति और समाज के बारे में, जिसने ऐसी बेटियां बनाई हैं ?”

“नहीं, यह विविधताओं से भरा मेरा भारत है। तुम एक भारतीय हो। मेरे लिए यही काफी है। मेरे लिए तो तुम और हरपाल मसीहा बनकर आए हो। इसके लिए मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूँ।”

“डरो मत। हम अछूत भी नहीं हैं।”

“मैंने कहा न कि मैं यह जानने का इच्छुक नहीं हूँ।” आनन्द निढाल-सा बिस्तर पर पड़े-पड़े बोला।

“तो जब तक बीमार हो तो बीमार बनकर रहो। हमें सेवा करने का मौका दो। मेरा भाई आपकी पूरी मदद करेगा। आपको जो खाने-पीने की ज़रूरत होगी, वह मैं बनाकर दूँगी।”

“ओह…। मैं कैसे आप लोगों का यह अहसान उतारूंगा ?”

और अब…शाम ढलती जा रही थी।

आनन्द अपने इन्हीं विचारों में खोया था कि कल और आज दिन भर में उसके साथ क्या-क्या हुआ था। अपने विचारों में मग्न वह अधलेटा-सा बैठा था।

तभी उसने आहट सुनी। सिर घुमाकर देखा तो पाया कि कौशल हाथ में एक दूध का गिलास लिए खड़ी थी जिसे दूध गर्म होने के कारण उसने कपड़े की मदद से थाम रखा था।

आनन्द ने उसे एक बार पहली दफा भरपूर दृष्टि से देखा। कौशल एक सुंदर और सुडौल बदन की तंदुरुस्त युवती थी। आखिर किसान की बेटी थी।

आनन्द को इस प्रकार देखते देख वह सकुचा गई, “दवा ले लो। गर्म दूध है। शाम की दवा का वक़्त भी हो गया है।”

अनन्द अब भी संकोच कर रहा था, “आपने बेकार कष्ट किया। दवा तो मैं पानी से भी ले लेता।”

“जी…वो।” आनन्द की झिझक उतारने के उद्देश्य से वह बोली, “गर्म दूध में हल्दी डालकर पीने से ज़ख्म जल्दी अच्छे हो जाते हैं। वैद्य जी भी कह गए थे।”

आनन्द ने दूध का गिलास थामने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि कौशल के हाथ से गिलास डगमगाया और गिलास छूटकर गिर गया। थोड़ा-बहुत गर्म दूध कौशल के कुर्ते पर भी पड़ा था।

“ओह ! माफ कीजिए, गिलास बहुत ज्यादा गर्म था।”

कौशल कुछ नहीं बोली। उसने अपने कपड़ों पर पड़ा दूध झाड़ा और नीचे से गिलास उठाकर चली गई।

तभी हरपाल आंगन में दाखिल हुआ। आनन्द ने देखा, उसके एक हाथ में अखबार था। दूध गिरा देखकर उसने अपनी बहन को जरा प्यार से डाँटा, “ओह, कौशल। तुझे पता नहीं इतना आलस क्यों है। मुझे तो हमेशा गर्म दूध दिया ही करती है, इन्हें भी दे दिया। जा और दूध ले आ।”

कौशल झेंपती-मुस्कराती चली गई। हरपाल आनन्द के पास ही चारपाई पर बैठ गया, “हाँ भाई आनन्द बाबू। अब दर्द का क्या हाल है ?”

“अब तो बहुत कुछ ठीक है।”

“हूँ…खैर। वैद्यजी कह रहे थे कि अभी तुम्हें ठीक होने में कई रोज लग जाएंगे।” फिर वह अखबार आनन्द की ओर बढ़ाकर बोला, “लो, सरपंच के यहाँ आता है यह अखबार। मैं तुम्हारे लिए उठा लाया हूँ।”
 
आनन्द ने महसूस किया कि आखिरी शब्द “तुम्हारे लिए” पर हरपाल ने बड़ा जोर दिया था। उसने मुड़े हुए अखबार को खोलकर मुखपृष्ठ देखा। फिर मोड़कर उसे अपने पास रख लिया, “देख लूँगा।”

हरपाल शायद आनन्द की मनोस्थिति को भाँप गया था। उसके होंठों पर एक रहस्यात्मक मुस्कान खेल रही थी।

आखिरकार वह बोल ही पड़ा, “आनन्द, किसी नवाब नाम के डाकू का फोटो छपा है जिसका जय नगर इलाके में काफी आतंक है। तुमने बताया था कि तुम भी उधर के ही हो। इस अखबार में लिखा है कि कल जय नगर के कलेक्टर राबर्ट ग्रीन के बंगले पर डाका डाला गया था और उनमें से ही उसके एक मुख्य साथी ने राबर्ट को व उसकी पत्नी को गोली मार दी थी, और कई अन्य को गोलियों से भून दिया था और फिर घटनास्थल से भाग गया था।”

आनन्द चुपचाप उसकी बात सुन रहा था।

हरपाल बोल रहा था, “लेकिन उस भागे हुए नवाब के साथी का पुलिस को यह सुराग मिला कि वह रेल में सवार होकर निकल भागा है। पुलिस ने उसकी रेल में तलाश की तो वह रेल के डिब्बे से ही कूद गया था। बाद में पता चला कि हमारे गाँव वाले बिदौली रेलवे स्टेशन से एक-सवा मील दूर पहले ही बहुत-सा खून और कोई मानव वहाँ था, इसके चिन्ह मिले हैं। नवाब और उसके अन्य साथियों को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। बस एक यही साथी अचेतावस्था में कहीं किसी जँगली जानवर का भोजन बन गया।”

आनन्द के होठों पर बार-बार यह बात आते-आते रह जाती थी कि वह अचेत व्यक्ति मैं ही हूँ। मगर वह स्वयं को यह बात कहने से हर बार रोक लेता था। इसलिए वह चुपचाप हरपाल की बात सुन रहा था।

हरपाल बोलता जा रहा था, “पुलिस का तो ऐसा ही विचार है। इस बात में भी संदेह सामने आए हैं कि कल की दुर्घटना डाका नहीं बल्कि कुछ आतंकवादियों की राबर्ट से पुरानी लाग-डांट थी ” हरपाल ने एक गहरा साँस लिया और फिर बोला, “अब तुम्हारी क्या राय है आनन्द ?”

आनन्द अन्दर से बुरी तरह काँप गया था मगर अपनी स्थिति पर काबू किए हुए ही उसने कहा, “हो सकता है कि क्रांतिकारियों की कुछ दुश्मनी रही हो। लेकिन क्रांतिकारियों को “आतंकवादी” नाम देना कुछ जँचा नहीं।”

“तो मैं तुम्हें कौन सा नाम दे दूँ ?” हरपाल ने लापरवाही सी दिखाते हुए कहा।

लेकिन आनन्द उस सीधे से कटाक्ष को भी न समझता, इतना तो नासमझ नहीं था। वह एकाएक सन्नाटे में आ गया। तुरन्त कोई जवाब नहीं दे पाया। कनखियों से उसने देखा। कौशल दुबारा दूध के गिलास लेकर आ खड़ी हुई थी।

शायद वह काफी देर से हरपाल की बात सुन रही थी। आनन्द ने उसके हाथ से गिलास ले लिया। मगर कौशल हरपाल के मुँह से उसका अंतिम वाक्य सुन कर चौंक गई थी।

हरपाल भी समझ गया कि आनन्द यूँ उत्तर न देगा। उसने बात बदल दी, “मि. आनन्द, तुमने कुछ नोट नहीं किया ?”

आनन्द ने दूध पीते हुए ही प्रश्नपूर्ण दृष्टि से उसकी तरफ देखा, “?”

हरपाल हँस पड़ा, “यही कि ये अपनी कौशल तुम्हारा इतना ध्यान क्यों रखने लगी है ?”

इस पर आनन्द के गले में फंदा लग गया। कौशल ने घबराई हुई दृष्टि से अपने भाई की तरफ देखा।

हरपाल अब भी हँस रहा था। वह आनन्द के और निकट जाकर बोला, “ये कौशल है ना…चोरी-छिपे क्रान्तिकारियों की मदद करती रहती है। और इसने आपको भी अपने पाँव से गोली निकालते हुए देख लिया है।”

जैसे पास ही कहीं कोई बम फट गया हो। कौशल और आनन्द दोनों ने एक-दूसरे को देखा। फिर एक साथ ही हरपाल को देखा। वह रहस्यपूर्ण ढंग से हँस रहा था। उसने आनन्द के कंधे पर हाथ मारा, “आई एम प्राउड ऑफ यू…एंड माई सिस्टर।”

आनन्द और कौशल अंग्रेजी बोलते हरपाल को हैरानी से देखने लगे थे। वह कह रहा था, “तुम दोनों अपने-अपने तरीके से क्रांतिकारियों के साथ मिल-जुलकर और उनकी मदद करके भारतमाता की कुछ तो सेवा कर रहे हो। मगर मैं…” बात बीच में छोड़कर वह एक फीकी-सी हँस पड़ा था। शायद कुछ कहना चाह रहा था मगर कहने से डर रहा था।

“हाँ भैया, अपनी न कहोगे।” कौशल ने इस बार उसे भी आड़े हाथों ले लिया, “ये मत समझना कि बहन यहाँ घर में बैठकर सिर्फ भैंस का दूध ही दुहती है या खेत पर जाकर कभी-कभी पिता जी की रोटियां दे आती है। इससे ज्यादा कुछ नहीं जानती। मैं भी बहुत कुछ जानती हूं। तुम जब भी गांव आते हो…हहह…मैं तुम्हारी हर हरकत पर नज़र रखती हूँ।”

हरपाल आनन्द से बोला, “अब तुमसे क्या छिपाऊँ। अपने गाँव के एक हैं पटवारी जी। कभी सर्विस में थे मगर अब तो कई साल से छोड़ दी है। उन्हीं की प्रेरणा से एक दल से मेरा सम्पर्क हो गया है और फौजी होने के कारण उन्हें मुझसे कुछ न कुछ मिल जाता है…अगर…।” हरपाल की बात पूरी न हुई थी कि एक व्यक्ति उसे आवाज़ देता हुआ अंदर चला आया था।

“आइए पटवारी जी।” हरपाल उस व्यक्ति को बैठने के लिए जगह देता हुआ आनन्द से बोला, “ये हैं पटवारी जी। आप ही का जिक्र कर रही थी कौशल।”

पटवारी जी कुछ औसत कद से कम ही ऊँचाई के आदमी थे। हाँ, चेहरे से यह लगता था कि यह व्यक्ति दीन-दुनिया को अच्छी तरह समझता है।

पटवारी जी बोले, “हाँ भाई हरपाल, ठीक प्रकार से तो हो ? और फौज का क्या रंग-ढंग चल रहा है ?”

“सब ठीक है पटवारी जी। हम हिंदुस्तानी फौजियों का क्या है ? या तो लड़ना है या मरना है।”

“सो तो फौज में होता ही है।”

“मेरा मतलब नहीं समझे पटवारी जी। मतलब ये कि जहां भी आर्डर मिले जाओ औऱ लड़ो। चाहे वह अपने नेताजी बोस की आज़ाद हिंद फौज हो, कोई प्रांतीय सिरफिरे नवाब या सुल्तान की फौज हो…बस आर्डर मिला है तो लड़ो। वरना हमारे पीछे गोरी पलटन तैनात होती है। उनकी गोली खाकर अपना जन्म सार्थक करो, या अपने भाइयों को मारो या खुद उनकी गोली से मरो। हर हाल में हिंदुस्तानी खून ही बहना है।”

और इसी तरह की बातों के बाद, जब पटवारी जी चले गए तो हरपाल ने आनन्द से कहा, “आनन्द बाबू, अब क्या कहते हो ?”
 
आनन्द बोला, “आप ठीक ही समझे हैं हरपाल जी। मुझे आपके इस रहस्योद्घाटन से प्रेरणा मिली। स्पष्ट स्थिति अब आपके सामने आ गई है। मेरा विचार है कि मुझे कल ही यहाँ से चल देना चाहिए। इधर आप पर खतरा आने की आशंका है, और उधर मेरे साथी भी संकट में फंस गए हैं। मुझे जाकर कुछ न कुछ प्रबंध तो करना ही है।”

हरपाल बोला, “अब आप चार-पाँच दिन तक कहीं भी जाने की स्थिति में नहीं हो। यदि फिजूल जिद करके यहाँ से जाआगे भी तो पुलिस आपकी स्थिति को देख कर तुरन्त आपको दबोच लेगी।”

कौशल ने भी कहा, “जब तक अम्मा-पिताजी नहीं लौटते। आप पूर्ण आराम कीजिए और भविष्य के लिए कोई कार्यकारी योजना बनाइए। हम भी आपकी जहाँ तक मदद होगी, उस योजना में सहयोग करेंगे।”

आनन्द कुछ सोचने लगा।

* * *
 
इसी गाँव बिदौली (अलीगढ़ और कानपुर के बीच) से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर…।

शहर का रेलवे स्टेशन…नाम इस शहर का असली नाम लेना हम उचित नहीं समझते। वैसे चाहे कुछ भी कह लीजिए। कुछ भी…चलो धीरजगढ़ नाम रख लेते हैं। धीरजगढ़ रेलवे जंक्शन था। दूरदराज से आने वाली गाड़ियां भी यहाँ पर कुछ देर रुककर चलती थीं।

इसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बड़ी भीड़ थी। प्लेटफॉर्म पर हर तरफ आदमी ही आदमी थे। कोई कहीं जाने के लिए अपनी गाड़ी के आने का इंतज़ार कर रहा था, तो कोई अपने किसी स्वजन या आने वाले मेहमान का इंतज़ार कर रहा था।

एक तरफ खड़े तीन आदमी आपस में बातचीत कर रहे थे। आइए, इन्हें पहचानिए।

इनमें से एक तो वह व्यक्ति है जिसका जिक्र सबसे पहले परिच्छेद में पहले ही दृश्य में नेताजी के साथी के रूप में था।

इधर आइए…। एक एक्सप्रेस ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई है। उन तीनों व्यक्तियों ने घूमकर देखा। आपस में कुछ इशारा किया और तीनों वहाँ से हटकर, कुछ दूरी पर फासले से अलग-अलग जा खड़े हुए।

भीड़ रेलगाड़ी की तरफ टूट कर पड़ी।

इधर स्पेशल कम्पार्टमेंट से एक लम्बा गोरा उतरा। उसके नीचे आते ही कुछ लोग उसकी तरफ बढ़े। कुछ बातें हुईं, कुछ संकेत हुए।

वह लम्बा गोरा अकेला ही आगे बढ़ गया। बाकी लोग चले गए।

प्लेटफार्म पार करके अपना टिकट टिकट कलेक्टर को सौंप कर वह बाहर निकल गया। थोड़ा आगे चलकर उसे एक कार खड़ी मिली। वह उसका पिछला दरवाजा खोलकर उसमें समा गया। उसके बैठते ही कार चल पड़ी।

तभी ठीक उसी स्थल पर एक टैक्सी आकर रुक गई। वही तीनों व्यक्ति, जिनमें से एक था नेताजी का साथी, टैक्सी की तरफ बढ़े। अब सुविधा के लिए इनके नाम रख लेते हैं। नेताजी के साथी का नाम ‘क’ रख लेते हैं, और क के दोनों साथियों का नाम रख लेते हैं — ‘ख’ और ‘ग’।

‘क’ ने अपने साथियों को संकेत करके बुलाया और बाहर खड़ी उस टैक्सी में आकर बैठ गए। ड्राइवर ने स्थान पूछा तो ‘क’ ने उस आगे जाने वाली कार के बारे में समझाया और कहा, “पीछा करो।”

आगे वाली कार अभी तक चमक रही थी। टैक्सी अपने आगे जाने वाले वाहनों को पास करती हुई दौड़ने लगी।

कुछ ही देर बाद टैक्सी ने कार को ओवरटेक कर लिया।

अब आगे वालों को भी कुछ संदेह हो गया था या वे स्वयं देखना चाहते थे कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा है। अगली कार एक निर्जन सड़क की तरफ मुड़ गई।

तभी पीछे से किसी ट्रक ने हॉर्न देकर टैक्सी को पास किया। अतः टैक्सी की रफ्तार मन्द हो गई। तब तक अगली कार काफी दूर हो गई थी। मगर अभी ओझल नहीं हुई थी।

ट्रक के गुजर जाने पर टैक्सी भी उसी तरफ मुड़ गई। ‘क’ चिल्लाया, “जल्दी करो। गोखले स्मारक से पहले ही हमें उसे कवर कर लेना चाहिए।”

टैक्सी और अधिक तेज गति से उधर की ही तरफ दौड़ती रही जिधर कार जा रही थी। काफी देर तक पीछा होता रहा।

टैक्सी ड्राइवर, जिससे उन्होंने पहले ही सांठगांठ कर ली थी, अब अपनी उत्सुकता दबा न पाया और बोला, “कौन है उस कार में ?”

“है एक अंग्रेजी जासूस…कुत्ता। स्पेशल ब्रांच फ़ॉर सी.आई.डी.। स्पेशल तौर पर राजधानी दिल्ली से आया है।” ‘क’ ने बताया, “अब तुम अपना काम करो। इस सब से तुम्हें क्या ?”

टैक्सी ड्राइवर फिर कुछ नहीं बोला। टैक्सी उसी तरह दौड़ती रही।

एकाएक आगे वाली कार एक झटके से रुक गई। टैक्सी भी झोंक में जा रही थी। ड्राइवर ने पूरी शक्ति से ब्रेक लगाकर टैक्सी को रोक लिया।

क, ख और ग टैक्सी से बाहर निकल ही रहे थे कि अगली कार से उस अंग्रेज ने गोली चला दी। उस गोली के लगने से टैक्सी ड्राइवर का भेजा उड़ गया। बेचारा कुछ समझ भी न पाया।

तीनों इस एकाएक हुई प्रतिक्रिया से हतप्रभ रह गए।

‘ग’ तुरन्त ड्राइवर की तरफ झपटा जो अब अंतिम हिचकियाँ ले रहा था। क चिल्लाया, “मि. ग सावधान। ड्राइविंग सीट संभालो।”

वह अंग्रेज तुरन्त अपनी अगली कार में बैठा और अगली कार फिर वैसे ही दौड़ने लगी, जैसे पहले दौड़ रही थी। मगर टैक्सी को ‘ग’ चलाने लगा था, उतनी ही फुर्ती से।

अगली कार वाले गोरे ने पीछे एक गोली छोड़ी जो टैक्सी की पिछली सीट के ऊपर कार के पिछले शीशे में उतर गई थी। ‘ग’ ‘क’ की चेतावनी स्वरूप बाल-बाल बच ही गया। ‘ख’ पहले ही झुकाई लेकर बच गया था।

‘ग’ ने टैक्सी चलाते-चलाते ही मृत ड्राइवर को परे धकेल कर ड्राइविंग सीट पर बैठने के लिए अपनी जगह बनाई। फिर टैक्सी को तेजी से आगे बढ़ा ले गया।

ड्राइवर के लिए वे विवश-से कुछ नहीं कर पाए। इसका उन्हें अफसोस था। सबने मृत आत्मा को शांति देने की मंशा से हृदय पर हाथ रखकर और आसमान की ओर देखकर, ईश्वर से प्रतीकात्मक वंदना की।

कार और टैक्सी आगे-पीछे तीव्र गति से दौड़ रही थीं। ‘ग’ ने फिर बहुत ही कम दूरी के फासले में कार को ओवरटेक कर लिया। इस बार ‘ख’ ने कार के पिछले पहिए को निशाना बनाकर गोली दाग दी। लेकिन लगता था कार का ड्राइवर भी मंजा हुआ था। गोली छूटी होगी कि तुरन्त उसने अपनी कार को एक तरफ को झुकाव दे दिया।

‘ख’ की एक के बाद एक, दागी गई दोनों गोलियां बेकार हो गईं। इस बार जवाब में गोरे ने भी पीछे को फायर झोंक दिया। ‘ग’ भी कमाल का ड्राइवर था। उसने टैक्सी एकदम तिरछी कर दी। गोली टैक्सी की बॉडी में समा गई।

‘क’ को यह देखकर गुस्सा आ गया था। उसने ‘ख’ के हाथ से रिवाल्वर छीन लिया, “बड़ी मेहनत से प्राप्त होती हैं हमें ये गोलियां। हर गोली काम आनी चाहिए।”

वास्तव में ‘क’ ने अपनी कही बात को पूरा कर दिया।। पहली ही गोली ने कार के पिछले टायर को छेदकर बेकार कर दिया। कार की गति एकदम कम हो गई थी। मगर लगता था ड्राइवर उसे इस अवस्था में भी दौड़ा ले जाना चाहता था। पर ‘क’ की दूसरी लक्ष्यपूर्ण गोली ने उसकी रही-सही उम्मीदों पर पानी फिरा दिया। पिछले दोनों टायर बर्स्ट होकर जमीन से जा मिले थे। कार अब जरा-सा रेंगकर रुक गई थी।

अंग्रेज तो फौरन कूदकर कार की आड़ में हो गया मगर ड्राइवर नहीं बच पाया। कार रुकने से पहले ही एक गोली उसके कंधों के ठीक बीच में गर्दन के नीचे पीठ में उतर गई।

‘ग’ ने टैक्सी कुछ फासले से रोक दी थी और अपनी पिस्तौल निकालकर नीचे उतर आया था। ‘क’ गोरे जासूस के छिपे होने की जगह की तरफ सड़क के नीचे उतर गया था। ‘ग’ ने गोरे को अपने स्थान पर खड़े ही खड़े ललकारा, “बाहर आ अंग्रेजी कुत्ते।”

मगर जवाब में गोली चली थी। ‘ग’ को अनुमान था कि ऐसा ही होगा। वह तुरन्त झुकाई दे गया था। इस पर उसे और गुस्सा आ गया, “कुत्ते, देख रहा हूँ, बहुत वफादार औऱ होशियार कुत्ता है तू। पर हमें भी अपनी जान की परवाह नहीं। तुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे।”

मगर काफी देर तक न आवाज़ हुई, न कोई उत्तर ही आया।

कुछ देर बाद ‘ग’ ने देखा कि वह जासूस कार की आड़ से बाहर आ रहा था। पर उसके हाथों में कुछ होने की बजाय उसके दोनों हाथ सिर से ऊपर उठे हुए थे। उसकी कमर में रिवाल्वर सटाए ‘क’ भी उसे लिए आ रहा था। जासूस का रिवाल्वर भी ‘क’ के ही हाथ में था। ‘क’ वहीं से चिल्लाया, “एक तरफ धकेल कर कार में आग लगा दो !”

‘ख’ उधर बढ़ा ही था कि देखा सामने से एक कार आ रही थी। ‘ग’ ने कार में बैठे व्यक्तियों को पहचान लिया। ये वे ही व्यक्ति थे जो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर उस गोरे से बातें कर रहे थे। ये सादे वेश में खुफिया पुलिस के आदमी थे।

‘ग’ सड़क के बीचोंबीच हाथ फैलाकर खड़ा हो गया।

“कार रोको…रोको।”

कार एकदम रुक गई।

‘ग’ ने उनकी तरफ रिवाल्वर तानकर कहा, “अपने हाथ सिर से ऊपर उठाकर बाहर निकल आओ। यदि कोई चालाकी दिखाने की कोशिश की तो…।” वाक्य उसने गोरे की तरफ इशारा करके पूरा किया।

किसी ने कोई हरकत न की। सिर से ऊपर हाथ उठाकर वे पंक्ति में चलते हुए ‘ग’ की तरफ बढ़ने लगे।

तभी उनमें से एक व्यक्ति ने कोई चालाकी की…और धायं…धायं…धायं…धायं…।”

पंक्ति में चलते हुए खुफिया सिपाही चीख मार-मार कर एक-के-बाद-एक करके गिरते चले गए। गोलियां ‘ग’ ने चलाई थी और ठहाका मारकर हँसा था — ‘ख’।

* * *
 
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