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माँ भारती के लाड़ले complete

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[आठ]

लगभग एक सप्ताह ही होने को आ गया था। आनन्द अब बहुत स्वस्थ हो चुका था। चलने-फिरने लगा था। आनन्द या कौशल के साथ उनके खेतों पर आने-जाने लगा था। उन लोगों के मना करने के बावजूद वह थोड़ा-बहुत मेहनत-मशक्कत का काम भी करने लग गया था।

सुबह का वक़्त था।

नाश्ते आदि से निबटकर उनमें बातें हुईं और एक योजना के मुताबिक हरपाल ने आनंद को अपने दल से मिलाने का प्रस्ताव रखा। आनन्द ने भी स्वीकार कर लिया था। दोनों चलने को उद्यत ही थे कि कौशल भी कपड़े बदल कर आ गई। हरपाल ने पूछा, “हम बाहर जा रहे हैं। तू ऐसे में घर से बाहर कहाँ जा रही है ?”

कौशल ने हरपाल को देखा, मुस्कराईं। फिर देखा आनंद को, बोली, “मैं भी तो चलूँगी।”

“कहाँ ?” हरपाल ने माथे पर बल लाकर कहा।

“तुम्हारे साथ।” कहकर वह शरारतपूर्ण ढंग से मुस्कराईं।

हरपाल और आनन्द ने उसे आश्चर्य से देखा।

“मैं जानती हूँ कि तुम कहाँ जा रहे हो ? मैं भी साथ चलूँगी।”

हरपाल जानता था कि कौशल जिद्दी लड़की है। मानेगी नहीं। यदि नाराज हो गई तो उनका भी जाना मुश्किल कर देगी। हरपाल ने पराजय के से स्वर में कहा, “अच्छा बाबा, अच्छा। मगर हमारे साथ तुम…। ठीक नहीं है।”

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। पहले तुम लोग जाओ। बाद में चली आऊंगी। गणेश जी के मंदिर के पास रुककर दस-पंद्रह मिनट मेरा इंतज़ार करना।”

वे लोग चलने को हुए ही थे कि आ गए पटवारी जी। आनन्द मन ही मन झुंझला गया था मगर प्रकट में कुछ कहा नहीं। हरपाल की सूरत भी उस समय देखने लायक थी।

दरवाजा पार करके पटवारी जी हँसे और वहीं से बोले, “दोनों साथ हो।” फिर एक हाथ में पकड़े अखबार को दूसरे हाथ की हथेली पर मारते हुए बोले, “भई आनन्द बाबू, अब कैसे हो ?”

“अब तो काफी अच्छा हूँ। आइए, बैठिए।” बनावटी मुस्कान से आनन्द ने उनका स्वागत किया।

हरपाल ने भी छेड़ने के अंदाज़ से कहा, “आज क्या खबर लाए हैं पटवारी जी ?”

“पूछो मत हरपाल।” पटवारी जी खुशी से किलक कर बोले, “मुँह मीठा कराओ तो सुनाऊँ।”

उन्होंने सोचा — ज़रूर कोई अच्छी खबर लाए हैं पटवारी जी। हरपाल ने खुशामद की। पटवारी जी ने नखरे दिखाए। खैर, कौशल के कहने पर फैसला हुआ।

“बिटिया के कहने पर मान जाता हूँ। सुनो — कल कोई नवाब जहूर नाम का डाकू जेल तोड़कर भाग निकला। वार्डन ने जो झाँककर कोठरी में देखा तो खाली थी। मगर दरवाज़ा ज्यों का त्यों बन्द…हैंय।”

आनन्द को पटवारी जी से यह सूचना सुनकर एक सुखद झटका-सा लगा। वह खुशी से नाच उठना चाहता था मगर उसने अपने भावों पर काबू कर लिया। वह अब गौर से पटवारी जी की बातें सुनने लगा।

पटवारी जी कह रहे थे, “पट्ठा डाकू है और बढ़िया तालातोड़ भी। क्या सफाई से ताला बंद भी कर गया और पहरे पर खड़े वार्डनों का गला घोंट गया। और इससे भी बड़ा गज़ब यह है कि सीधा पहुँचा कलेक्टर ग्रीन के यहाँ…और साले को सरेआम गोली मारकर रफूचक्कर भी हो गया। भई, यह नवाब है शेर आदमी।”

सबने नवाब के लिए तालियाँ बजाई।

“एक और सुनो।” पटवारी जी का लहज़ा इस प्रकार था, जैसे कोई कथावाचक पण्डित कथा बांच रहे हों। और इस प्रकार वह सुनने वालों पर पुण्य का एहसान कर रहा हो। यह उनका हंसोड़ स्टाइल था, “धीरजगढ़ में ही…गोखले स्मारक से कुछ दूर पर दो कारों को खाई में धकेल कर जला दिया गया। इन दोनों कारों में से एक में स्पेशल सी.आई.डी. ब्रांच के लिए दिल्ली से एक स्पेशल तौर पर ऑफिसर आया था और दूसरी में उसके साथी कर्मचारी, जो उसे स्टेशन से रिसीव करके ला रहे थे।”

“ऐंय।” यह खबर सुनकर सब चौंके।

पटवारी जी किसी खबरनवीस की तरह बोले जा रहे थे, “बताया जा रहा है कि इस ऑफिसर की नियुक्ति बड़े गुप्त तरीके से हुई थी और बड़े ही गुप्त ढंग से वह आया था। मगर क्रांतिकारियों को न जाने कैसे खबर लग गई और दिन दहाड़े यह कांड कर डाला। भई वाह, कई दिन बाद अब जायका बदला है।”

“हाँ, यह तो बड़ी तारीफ के काबिल कार्य किया क्रांतिकारियों ने।” आनन्द बोला, “वाकई।”

पटवारी जी अब अपनी पूरी फॉर्म में आ चुके थे। किसी लीडर की तरह भाषण देने के अंदाज़ में बोले, “मैं कहता हूँ भाइयों, कमर कस कर खड़े हो जाओ। अपने देश को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करो। मारो या मरो। गांधी जी भी तो यही कहते हैं — हमें स्वराज्य लेना होगा। वह हमें माँगने से कभी नहीं मिलेगा। मैं भी कहता हूँ — करो या मरो। या…”

“बस…बस…बस आपने तो आज बहुत अच्छा भाषण दे डाला। यह भी याद रखो कि दीवारों के भी कान होते हैं पटवारी जी।” हँसते हुए हरपाल ने पटवारी जी की तूफानमेल जैसी बोलने की गति को एकदम रोक दिया, “काश ! आप तो गांधी बाबा की किसी शहर की टोली के लीडर होते।”

“भई मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मेरी बात में दम है। अब कल की ही बात है। एक किताब हाथ लग गई। भई किताब क्या, मेरी याद की ही बात है। बम्बई में मरते वक्त लोकमान्य तिलक ने कहा था — ‘यदि स्वराज्य न मिला तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता। स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिए बहुत ज़रूरी है।’ और मैं कहता हूँ स्वराज्य क्रांति के बिना थोड़े ही मिलने वाला है। गाँधी बाबा तो ऐसे ही…भोले भंडारी हैं बस…कि क्या कहूँ।”

आनन्द उनकी इस बात को बड़े ध्यान से सुनने लगा, “भगत सिंह आज़ाद, जो आज क्रान्तिकारियों के लिए अच्छे आदर्श हैं, उन्होंने भी कहा था — ‘मनुष्यों का खून बहाने के लिए हमें दुःख है पर क्या करें। क्रांति के लिए खून बहाना ज़रूरी है। हमारा मकसद ऐसी क्रांति है जो मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के शोषण को खत्म करके छोड़ेगी।” पटवारी कहते-कहते रुके। थोड़ा विचलित हुए और बोले, “पर नहीं, ठहरो। यह तो शायद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा था।”

फिर…फिर इसी तरह की कुछ बातों के बाद पटवारी जी ने पीछा छोड़ा और चले गए।

दोपहर हो गई थी। काफी तेज धूप पड़ने लगी थी। लगभग ग्यारह बजे का समय होगा। आनन्द और हरपाल तुरन्त घर से निकल पड़े।

हरपाल और आनन्द धीरे-धीरे गाँव से निकल गए थे और एक पगडंडी पर चलने लगे थे कि तभी एक तरफ से आवाज़ आई, “अरे भाई, फौजी बाबू।”

हरपाल ने मुड़कर आवाज़ की दिशा में देखा। खेतों में पानी ले जाने वाली नाली पर चलता हुआ एक आदमी उनकी तरफ आ रहा था। वह रुक गया। आनन्द ने उससे पूछा, “हरपाल जी, यह कौन है ?”

“है एक…अपने गाँव का ही परिचित।”

वह आदमी पास आ गया था, “जय राम जी की।”

“जय राम जी की।” हरपाल और आनन्द ने लगभग साथ ही साथ कहा था।

वह आदमी हरपाल से बातें करने लगा। आनन्द से वह परिचित ही न था। मगर इससे आनन्द उकता रहा था। वह ऐसे ही इधर-उधर देखने लगा था।

उस आदमी का बोलने का ढंग झगड़ने जैसा था। हरपाल ने बड़ा कह-सुनकर उसे शांत किया और उससे कहा, “इस वक़्त कुछ ज़रूरी काम है भाई, चलता हूँ। लौटकर तुमसे ज़रूर मिलूँगा। तुम नाराज न होओ। अपने गाँव वालों से कैसी बेरुखी ?”

वे दोनों आगे बढ़कर मंदिर के पास जाकर रुक गए। कुछ देर खड़े कौशल के आने का इंतज़ार करते रहे। दोनों ही इस समय चुप-चुप थे। कुछ देर बाद हरपाल ही बोला, “कौशल तो अभी तक नहीं आई। क्या अब चल दें ?”

“जरा और देख लें। नहीं तो तुम्हारा ही सिर खाएगी।”

आनन्द की बात पर हरपाल हँस पड़ा, “हाँ, सयानी बिल्ली है यह लड़की।”
 
“दोनों फिर चुपचाप खड़े रहे। हरपाल ज्यादा आतुर था। दो-एक मिनट बाद फिर बोला, “आई नहीं अभी।” आनन्द कुछ नहीं बोला। वह कुछ दूर पर आती हुई एक बुर्कापोश महिला को गौर से देखने लगा था। हरपाल भी उधर ही देखने लगा। फिर आनन्द से बोला, “ऐ भाई ! यहाँ की बुर्केवालियां मिर्च की तरह बड़ी चरचरी हैं। कहीं कोई जान को आ गई तो हम दोनों में से किसी की चाँद पर बाल नहीं बचेगा।”

आनन्द उसी तरह उस तरफ देखता हुआ बोला, “मैं नहीं समझा, तुम क्या कह रहे हो ? मुझे लगता है कि यही कौशल है।”

तभी बुर्क़े वाली पास आ गई और उसने अपनी नकाब उलट दी तो हरपाल चौंक पड़ा। आनन्द के कंधे पर हाथ मारकर बोला, “यार वाकई बड़ी पहचान की तुमने।”

कौशल भी उनके पास आकर रुक गई और बोली, “चलो।”

“हाँ…जल्दी करो। शाम तक लौटकर भी आना है। शायद आज अम्मा और चाचा (कई जगहों पर पिताजी को चाचा भी कहते थे) भी लौट आएं।”

तीनों एक पगडंडी पर चल पड़े। यह वह पगडंडी थी, जिस पर अक्सर बहुत कम लोग आते-जाते थे।

दोपहर की गर्मी और धूप अब अपने शिखर-बिंदु पर पहुंच चुकी थी। तीनों को पसीने आ रहे थे।

कब वे गांव बिदौली के रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो दोपहर ढलने लगी थी। बैठकर उन्होंने ट्रेन का इंतज़ार किया।

लगभग एक-डेढ़ बजे के समय धीरजगढ़ को जाने वाली गाड़ी आई। स्टेशन पर इस समय कुल चार-पाँच यात्री ही थे, जो गाड़ी में चढ़े थे। हरपाल सहित ये तीनों भी रास्ते का टिकट लेकर गाड़ी में चढ़ गए।

गाड़ी चली और करीब बीस-पच्चीस मिनट बाद उस स्टेशन पर रुकी, जहां इन्हें उतरना था। यह भी एक छोटा-सा ही स्टेशन था, जहाँ यात्री और स्टाफ सहित कुल आठ आदमी थे।

वे तीनों गाड़ी से उतरकर रेल की पटरी के किनारे-किनारे चल दिए। लगभग डेढ़-दो फर्लांग आगे जाकर वे पटरी से उतरकर पश्चिम की तरफ चल दिए।

धूप कभी तेज हो जाती, कभी हल्की पड़कर बिल्कुल गायब हो जाती, और फिर कुछ देर बाद फिर तेज हो जाती थी। ऐसे मौसम में वे जंगली झाड़ियों और खेतों के बीच से आगे बढ़ते रहे।

एक-डेढ़ मील की दूरी तय करके वे एक स्थान पर जाकर रुके। जहां ये रुके थे, वहाँ से कुछ दूरी पर एक पानी का काफी संकरा और गंदा-सा जोहड़ (तालाब) नज़र आ रहा था और उसके इस किनारे पर एक काफी बड़ा मगर जीर्ण-शीर्ण सा मकान था।

इस समय की हालत को देखते हुए लगता था कि कभी किसी रईस नवाब ने तफरीह के लिए यह आरामगाह बनवाया होगा। इस समय जो जोहड़ नज़र आता था, किसी समय कोई स्वच्छ तालाब या झील रही होगी। पानी के इस स्रोत से दूसरे किनारे पर एक अच्छा बाग था।

हरपाल ने उन्हें कुछ दूर के फासले पर रोक दिया और उन्हें वहीं रुकने को कहकर, वह स्वयं उस खंडहर की तरफ बढ़ गया था।

आनन्द और कौशल इस समय अकेले अलग-अलग खड़े थे। दोनों इधर-उधर पैर उठाकर बढ़ते, फिर वापिस आ जाते थे। दोनों के मध्य कोई भी नहीं था, मगर संकोच की एक अदृश्य दीवार मौजूद थी। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा था। हाँ, एक-दूसरे पर नज़र पड़ जाती थी, यह अलग बात थी। मगर इस समय वे चुप थे। शायद बोलना भी चाहते थे मगर बोलने को कोई बात ही नहीं मिल रही थी।

काफी देर बाद, हरपाल दो आदमियों के साथ आ गया। वह उनसे कुछ बातें करता आ रहा था।

उन दोनों व्यक्तियों ने आते ही पहले तो आनन्द को ऊपर से नीचे तक घूरा। देखने का अंदाज़ बिल्कुल ऐसा था, जैसे वे किसी मंडी में बिकाऊ बकरे को देखने आए थे। फिर एक ने कौशल की तरफ इशारा करके हरपाल से पूछा, “ये कौन हैं ?”

जवाब कौशल ने दिया, “वही लड़की हूँ, जिसने कई बार आप लोगों के साथियों की मदद की। आप लोगों के सन्देश व चिट्ठी वगैरह खुद हरपाल और गाँव के एक-दो आदमियों को मदद पहुंचाती रही…हुलिया बदल-बदलकर। कौशल हूँ मैं।”

“अच्छा-अच्छा।” वही व्यक्ति बोल पड़ा। फिर मुड़ते हुए बोला, “आओ।”

वे सब उसी तरफ चल दिए जिधर वे व्यक्ति बढ़ रहे थे। जब वे खंडहर में घुसे तो उन्होंने महसूस किया कि वह इमारत अन्दर से काफी अच्छी हालत में है और एक सुरक्षित जगह है। वे अंदर सीधे जाकर एक गैलरीनुमा जगह में दाएँ तरफ बढ़ते चले गए।

* * *

उस खंडहरनुमा इमारत में अंदर, एक तरफ एक ऊंची सी जगह पर एक अधेड़ उम्र का ठिगना आदमी बैठा था। दाढ़ी-मूछें बढ़ी हुई थी जबकि कपड़ों की हालत कुछ अच्छी थी। गैलरी के खुले स्थान में कई आदमी इधर-उधर बैठे अपने-अपने कामों में मशगूल थे।

दोनों आदमी उस अधेड़ आदमी के सामने रुके। आनन्द आदि भी रुक गए। इन आदमियों में से एक ने उस अधेड़ ठिगने व्यक्ति को ‘सरदार’ कहकर पुकारा, “ये हैं हरपाल बाबू के साथी, जिनका ये अभी आपके पास आकर जिक्र कर गए थे।” इशारा आनन्द की तरफ था, “और ये हैं हरपाल जी की बहन।”

“हूँ।” सरदार ने एक पैनी और अनुभवी आंखों से आनन्द को देखा। फिर पूछा, “हरपाल जी ने तुम्हारे बारे में जो बताया, वह सच है। हमने भी अखबार आदि से जानकारी ले ली थी। क्या तुम इच्छुक हो कि हमारे साथ रहकर काम करो ?”

“जी।”

“लेकिन फिर तुम्हें व्यक्तिगत आज़ादी नहीं होगी। हमारे दल के उसूलों के अन्दर रहकर ही तुम्हें काम करना होगा।”

“जी, उसूल भी बता दीजिए।”

सरदार ने कहा, “आज़ादी पाने के लिए यह एक क्रांति है। जो मनुष्य मनुष्य का शोषण करता है, उसी के खिलाफ यह लड़ाई है। इसके लिए रक्तपात भी करना पड़ता है। मानवीय भावनाओं को उठाकर ताक पर रखना पड़ता है। सभी को अपने दल के उद्देश्यों के लिए काम करना पड़ता है।” यह कहकर सरदार चुप हो गया और आनन्द के बोलने का इंतज़ार करने लगा।

“मैं आपके उसूलों की कद्र करता हूँ और आपके मकसद की इज़्ज़त भी। मैं पहले ही यह सब सोच-समझकर मैदान में उतरा हूँ। मेरा अपने लिए कोई स्वार्थ है भी नहीं। दुनिया में अब अपना कोई है भी नहीं। माफ कीजिएगा, आपको यह सब कहने की ज़रूरत भी नहीं।”

सरदार की आंखों में एक विचित्र-सी चमक उभर आई थी। इसके पीछे कौन-सा ख्याल था, यह समझना कठिन था। सरदार ने भावहीन और सपाट स्वर में कहा, “इसके लिए तुम्हें परीक्षा देनी होगी। यदि तुम उस परीक्षा में सफल रहे तो हमारे विश्वासपात्र हो जाओगे; जैसे हरपाल और कौशल हैं। असफल होने पर सजा के तौर पर ऐसी जिंदगी तुम्हें बख्शी जाएगी जैसे…।” अपनी बात रोककर सरदार ने एक आदमी से कहा, “इन्हें ले जाओ और उस आदमी के हालात दिखा दो जो असफल हुआ था।”

जिस आदमी से कहा गया था, उसी ने आनन्द को अपने पीछे आने का संकेत किया। आनन्द उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

बराबर की दीवार के आखिरी सिरे तक जाकर वे एक तरफ को मुड़ गए। आनन्द ने वहीं से देखा। एक पेड़ पर जमीन से डेढ़-दो फुट ऊंचाई पर मोटे तने से एक आदमी रस्सियों से सीधा पेड़ के समानांतर बंधा हुआ था। पेड़ के नीचे चारों तरफ एक गोल दायरे में लगभग उसके पैरों को चूमती हुई आग की लपटें उठ रही थीं।

उस आदमी के अब सिर्फ पैर ही आज़ाद थे और वह आग की तपिश से बचने के लिए छटपटा रहा था और अपने आज़ाद पैरों को बार-बार ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर ले जा रहा था। वह जिधर भी पैर ले जा रहा था, वहीं आग की तपिश उसके पैरों को बुरी तह सेंक देती थी। इसी प्रयत्न में उसकी बुरी तरह साँस फूलने लगी थी।

यह दृश्य देखकर आनन्द का सिर चकराने लगा। उसे लगा कि आग की वे लपटें उसी की तरफ लपलपाती हुई बढ़ रही थीं। वह बड़बड़ाया, “नहीं।”
 
तभी सरदार और हरपाल वगैरह भी वहीं आ गए। सरदार की आवाज़ थी, “परीक्षा लेने और सजा देने का हमारा एक अलग तरीका है। क्या तुम परीक्षा के लिए तैयार हो ?”

आनन्द ने एकाएक घूमकर सरदार को देखा। कुछ क्षणों तक देखता ही रहा। उसे लगा कि इस व्यक्ति का चेहरा दोहरा है, कि जैसे दो परतों का बना हुआ है। सामने दिखाई देने वाले इस भोले-भाले भावहीन चेहरे के पीछे एक बड़ा ही वीभत्स चेहरा छिपा हुआ है। बड़ी मुश्किल से आनन्द के मुँह से निकला, “जी।”

“तो सुनो।” सरदार बोला, “तुम्हें इस आदमी को शूट करना है।” यह कहकर वह हँसा और बोला, “कितनी आसान परीक्षा है तुम्हारे लिए। मैं समझता हूँ कि तुम्हें गोली मारने में कतई हिचकिचाहट नहीं होगी।”

आनन्द प्रत्युत्तर में बोला, “माना कि मैं क्रांतिकारी हूँ मगर कोई पेशेवर खूनी नहीं हूँ कि आंखें मीचकर जिसे चाहे गोली मार दूँ। यह कहकर मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता। मगर सिद्धांत यह नहीं है। क्रांति का मतलब यह नहीं है। मैं इस पीड़ित व्यक्ति को क्यों गोली मार दूँ। कम से कम मुझे इसका अपराध भी तो पता होना चाहिए। इसके विपरीत मैं आपकी परीक्षा के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूं। आप लोग जो चाहो, मेरे साथ सुलूक कर सकते हो।’

एकाएक सरदार का चेहरा बदल गया। उसने दो-तीन आदमियों को पुकारा और कहा, “टाँग दो उसी व्यक्ति के साथ।”

आनन्द के चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसे अपने सामने धरती नाचती-सी प्रतीत हुई। मगर उसने विवेक को बनाए रखा। कौशल का मुँह भी पीला पड़ गया था।

सरदार ने पुनः पूछा। तब तक तीन आदमी आनन्द की तरफ बढ़ चुके थे। आनन्द को लगा, वह यहाँ बिना सोचे-समझे आकर बिना वजह मौत के मुँह में घुस आया है। ये तो अच्छे लोग नहीं हैं। क्रांति के उद्देश्यों को ही नष्ट कर देंगे। मगर बेमतलब जा रही जान को भी क्या बचा नहीं लेना चाहिए ? मगर उसके अन्तर्मन ने विद्रोह किया, ‘नहीं।’

तब तक उसे पकड़ने आ रहे वे तीनों आदमी उसके बिल्कुल निकट आ गए थे।

आनन्द ने अपने आपको परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार कर लिया था। उन तीनों आदमियों ने आनन्द पर हाथ डाला।

“ठहरो !” सरदार ने चीखकर कहा तो तीनों व्यक्ति ठिठक गए। इन्होंने इस तरह पलटकर अपने सरदार को देखा जैसे वे भूल से किसी गलत आदमी की तरफ बढ़ आए हों।

सरदार ने जोरदार अट्ठहास लगाया। सब आतंक और आश्चर्य से सरदार को देख रहे थे।

सरदार उसी अवस्था में आनन्द के पास आया और गम्भीर होकर उसके कंधे पर हाथ रखकर दो-तीन बार थपथपाया।

“वास्तव में मुझे तुम पर विश्वास हो चला है। लगता है कि आज भी ऐसे नौजवान हैं जिनका खून पानी नहीं हुआ है। उनका खून आज भी गाढ़ा और जोशीला है…और अपनी भारतमाता के प्रति वफादार है। तुमने पूछा था उस आदमी का अपराध। उसका अपराध यह है कि वह पुलिस के लिए मुखबिरी करने लगा था। हम केवल यह देखना चाह रहे थे कि तुम्हारे अंदर धैर्य, अन्याय से लड़ने की शक्ति और विवेक कितना है। तुम वाकई बहुत बुद्धिमान युवक हो।”

सरदार के मुँह से आनन्द की यह प्रशंसा सुनकर सबके चेहरे फिर से चमक उठे। आनन्द बोला, “आपने यह सजा चुनी है इसके लिए ?” उसके स्वर में अब व्यंग्य का पुट था, “पूछ लीजिए, गोली खाना तो यह सहर्ष स्वीकार कर लेगा। इसके लिए इससे भी बड़ी सजा होगी, इसे जिंदा रहने का एक मौका देना। मरकर तो यह छूट जाएगा। इसे छोड़ दीजिए। अब तक की सजा ही इसके लिए बहुत है।”

“वन्डरफुल !” सरदार ने तालियाँ बजाई। यह कोई मान प्रकट करने का तरीका न था, बल्कि इस संकेत के द्वारा उसने अपने आदमियों का ध्यान अपनी तरफ केंद्रित किया, “आनन्द बाबू के कहने पर इसे खोलकर पेड़ से उतार लिया जाए।”

फिर सरदार एक बार एक निगाह हरपाल और कौशल पर डालकर आनन्द से बोला, “बहुत अच्छे ! अब तुम्हारे लिए एक फाइनल परीक्षा है। वह यह कि कल हमारे एक साथी का धीरजगढ़ जेल से कानपुर जेल को ट्रांसफर हो रहा है। यह खबर हमारे एक साथी ने कुछ देर पहले ही हमें लाकर दी है। ध्यान से सुनो।”

“जी। मैं ध्यान से सुन रहा हूँ।” आनन्द ने चौकन्ना होकर कहा।

“कल उसे धीरजगढ़ जेल से रेलगाड़ी द्वारा कानपुर की तरफ ले जाया जाएगा। इस मिशन पर हमारे कई आदमी जाएंगे। उसे गाड़ी से ही उड़ा लाना है अपने साथ। मेरे पास पूरा प्लान है। देख-समझ लेना। कहने का अर्थ यह है कि कल की सफलता तुम्हारी योग्यता पर निर्भर है। चाहो तो मेरे प्लान में शामिल होकर खुद कमांड कर लेना… या अलग से काम करने के लिए कोई अपनी टीम तैयार कर लेना।”

सरदार ने अपनी बात पूरी करके समर्थन पाने के लिए हरपाल की तरफ देखा।

“जी सरदार।” हरपाल बोला, “आनन्द, जरा इधर तो आओ। पीछे चलकर इस विषय में बात करते हैं। आओ।”
 
आनन्द को साथ लेकर हरपाल और कौशल खंडहर में दूसरी तरफ को चले गए।

तभी सरदार के एक आदमी ने आकर सरदार से पूछा, “सरदार, एक अधेड़ उम्र के आदमी ओंकारनाथ जी अक्सर आपसे मिलने आया करते हैं न ? वे आज फिर आपसे मिलने आए हैं।”

“अच्छा-अच्छा। उनसे कहो, अभी मिलता हूँ उनसे आकर। उन्हें बिठाओ। वे गाड़ी से आए होंगे ?”

“जी नहीं। वे पैदल चलकर आए हैं।”

“ओफ्फ, यह दोमुंहा पत्रकार। गाड़ी कहीं आधा मील दूरी पर कहीं झाड़ी में छिपाकर आया होगा। वैसे तो क्रांतिकारियों के खिलाफ लिखता है मगर यहाँ मिलने और शाबाशी देने भी चला आता है।” वह अपने आपसे बड़बड़ाकर बोले और तुरन्त ही उठकर चल दिए।

* * *

रेलगाड़ी 2214-अप, धीरजगढ़ से बनकर चलती थी। इसका ठीक समय सुबह नौ बजे था लेकिन आज वह लेट चली थी।

रेल में एक विशेष डिब्बा था। यह डिब्बा दूसरे डिब्बों से बिल्कुल अलग तरह का था। यह चारों तरफ से पूर्णतया बन्द और सुरक्षित था; जैसे कि एक दरवाजे व खिड़की वाला एक कमरे का कोई मकान होता है। बीच में जैसे लोहे की बड़ी चौड़ी-मोटी और ऊँची अलमारी जुड़ी हो, ऐसा संडास का कमरा था।

इस डिब्बे को अक्सर अलग तरह के यात्रियों के लिए प्रयोग किया जाता था। इसके दो भाग थे। इस डिब्बे में अक्सर पागल, कैदी या अन्य सामाजिक व्यक्तियों से अलग तरह के व्यक्तियों को ले जाया जाता था; क्योंकि धीरजगढ़ में बड़ी जेलें और पागलखाना थे। इसलिए लाने और ले जाने के लिए इस डिब्बे को अलग ही रूप दिया गया था।

इस डिब्बे के एक हिस्से में एक सीट पर एक कैदी बैठा हुआ था। उसके हाथों में हथकड़ी और पैरों में वजनी बेड़ियां पड़ी हुई थीं। इसके अलावा इस हिस्से में कैदी को घेरे हुए कई बंदूकधारी सिपाही मौजूद थे। यह कैदी जब इधर-उधर पहलू बदलता था तो उसकी हथकड़ी और बेड़ियाँ बज उठती थीं।

रेल अपनी पूरी गति में चली जा रही थी।

उस कैदी ने एकाएक अपने सामने के बंदूकधारी को टहोका दिया और अपने हाथ की छोटी उंगली उठाकर उसे इशारा किया कि अब उसकी बेड़ियाँ खोल दी जाएँ ताकि वह चलकर संडास तक के लिए जा सके।

बंदूकधारी झुंझलाया। फिर अपने कंधे की बन्दूक को सही करके उठा और उसकी बेड़ियाँ खोलने लगा।

बेड़ियाँ खोलकर वह सिपाही कैदी के साथ-साथ संडास के दरवाजे तक गया। कैदी संडास में घुस गया और बंदूकधारी बाहर से दरवाजा बन्द करके वहीं खड़ा हो गया। वह पूरी तरह चौकन्ना था। दूसरे सिपाही बैठे हुए लगभग ऊंघ ही रहे थे।

तभी एकाएक झटका सा लगा और गाड़ी रुकती चली गई। ऊंघते हुए बाकी सिपाही एकदम चौंककर उठ बैठे। उन्होंने कैदी की सीट पर देखा। एक सिपाही हड़बड़ाकर बोला, “वो नेताजी का बच्चा कहाँ गया ?”

संडास के बाहर खड़ा बंदूकधारी बोला, “अंदर।”

पूछने वाला सिपाही जवाब से संतुष्ट हो गया। फिर वे सभी सिपाही डिब्बे से नीचे मामले की जांच करने के लिए उतर गए थे, यह जानने के लिए कि गाड़ी कहाँ रुकी थी और क्यों रुक गई थी ? इस समय गाड़ी किसी स्टेशन से दूर कहीं जंगल में खड़ी थी। शायद किसी डिब्बे से जंजीर खींची गई थी।

डिब्बे में इस समय वही अकेला बंदूकधारी रह गया जो कैदी की निगरानी में नियुक्त था और इसीलिए वह अब भी संडास के पास खड़ा था।

तभी उसने देखा — डिब्बे में चार आदमी चढ़ आए थे। बंदूकधारी चौंका। उन्हें डपटकर बोला, “ऐ, क्या है ? इस डिब्बे में क्यों घुसे आ रहे हो ? दूसरे डिब्बे में चले जाओ।” शायद उसने समझा था कि ये कोई अनाड़ी लोग हैं जो भूल से इस डिब्बे में आ चढ़े हैं। मगर वह बौखला गया, जब उसने उन लोगों के हाथों में पिस्तौल देखे।

इन आने वाले लोगों में आनन्द भी था। वही बोला था, “चीखोगे तो गोली अंदर और दम बाहर हो जाएगा।”

वह बंदूकधारी घबरा गया।

“चुपचाप वहीं खड़े रहो। अभी कुछ देर में तुम्हारे साथी पुलिसिए आएंगे। उनसे यदि इस बात का जरा भी इशारा किया कि हम यहाँ छिपे हैं तो फिर तुम्हारी खैर नहीं।”

वह बंदूकधारी कांस्टेबल कुछ नहीं बोला। थूक निगलते हुए उसने “हाँ” में गर्दन हिला दी।

आनन्द के एक साथी ने सहसा उसके कंधे पकड़ लिए तो उसकी घिग्घी बंध गई। आनन्द का साथी उससे बोला, “बीवी-बच्चे हैं ?”

उसने फिर “हाँ” के उत्तर में गर्दन हिला दी। गले से बोल नही निकल पाया।

“तो फिर अपने बीवी-बच्चों का ख्याल कर लेना। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी किसी गलती के कारण वे अनाथ हो जाएं।”

औऱ बिना किसी जवाब या प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए वे चारों संडास का दरवाजा खोलकर अंदर घुस गए। दरवाजा फिर बन्द हो गया।

कुछ देर में नीचे गए सिपाही भी लौटकर डिब्बे में आ गए। उनमें से एक कह रहा था, “पता नहीं किस…” उसने एक भद्दी-सी गाली देकर कहा, “जंजीर खींच दी। ख़ामोख्वाह टाइम बर्बाद किया।”

थोड़ी देर बाद गाड़ी चल पड़ी।

संडास के पास वह बंदूकधारी उसी तरह खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद एक सिपाही उससे बोला, “अरे भाई क्या हुआ ? अभी तक अंदर घुसा हुआ है। कहीं संडासी पर बैठा-बैठा तो नहीं सो गया। आवाज़ तो दे उसे।”

संडास के पास वाले ने दरवाज़ा थपथपाया और अंदर से जवाब सुनने का उपक्रम करते हुए दरवाजे की झिर्री से कान लगा दिए। फिर अपने साथी सिपाहियों की तरफ मुँह करके बोला, “कहता है पेट में जोर का दर्द हो रहा है। अभी पेट साफ नहीं हुआ है।”

एक अन्य सिपाही भद्दे तरीके से हँसकर अपने साथी सिपाही से बोला, “अबे तो तू क्यों मरी सी आवाज़ में बोल रहा है। क्या तेरे भी पेट में दर्द उठ रहा है।” यह कहकर उसने अपने साथियों की तरफ देखा।

सब के सब उसकी इस बात पर हँस पड़े। वह सिपाही मन ही मन कुढ़कर रह गया।

गाड़ी अब अपने पूरे वेग से दौड़ रही थी।

एकाएक संडास का दरवाजा खुला और कैदी समेत चारों आदमी बाहर आ गए। इस समय कैदी के हाथ की हथकड़ी गायब थी और उसके हाथ में पिस्तौल चमक रही थी। बाकी लोगों ने भी अपने पिस्तौल निकाल लिए।

सभी सिपाही यह देखकर दंग रह गए। घबराहट उनके चेहरों पर दिखने लगी थी। मगर वह फिर भी दबंग बनना चाह रहे थे।

“ना…ना-ना। बंदूकें वहीं रहने दो, जहां हैं।” कैदी जो कथित नेताजी थे, कड़क कर बोले।

आनन्द बोला, “बोलो, तुम्हारे साथ क्या सुलूक किया जाए ? यदि तुकेम्हें अपने बीवी-बच्चे प्यारे हैं तो चुपचाप सिर से ऊपर हाथ उठाकर खड़े हो जाओ। हम सिर्फ तुम्हारी बंदूकें ले जाएंगे, तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे। और अगर मरना ही चाहोगे तो हम तुम्हारी यह खुशी भी पूरी कर देंगे। अब हमें यहीं पर उतरना है। जरा सी भी आवाज़ गले से बाहर मत निकालना।”

वे सब क्रमशः दरवाजे की तरफ बढ़ते जा रहे थे। आनन्द फिर बोला, “मैं नहीं चाहता कि फिजूल खून-खराबा करूँ। मगर तुम मजबूर करोगे तो फिर बात दूसरी है।”

जहां उन्हें उतरना था, उनके प्लान के मुताबिक रेल उस जगह से गुजरने ही वाली थी। तभी एक साथी ने तुरन्त जंजीर खींच दी।

गाड़ी झटका लेकर मंदी पड़ती चली गई। गाड़ी के रुकते न रुकते, वे सब गाड़ी से कूद पड़े। एक के हाथ में उन सिपाहियों से छीनी हुई बंदूकें थीं। उसी साथी का पिस्तौल अब नेताजी के हाथ में था।

अन्य डिब्बों की सवारियां झांकती ही रह गई। जब तक गाड़ी रुकी, वे बहुत दूर निकल गए थे।

जिस जगह गाड़ी रुकी थी, उसके पीछे रेल की पटरियों से समकोण बनाती हुई दाईं तरफ एक डामर की सड़कनुमा पगडंडी चली जाती थी। वे पाँचों इसी पगडंडी पर भागते चले गए थे, जो आगे जाकर जी.टी. रोड से मिल जाती थी।

इससे पहले कि कोई कुछ करता, वे पाँचों आंखों से ओझल हो गए थे।

* * *
 
[नौ]

उस दिन ट्रेन में आनन्द से लता और उसकी माता जी की संक्षिप्त-सी मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के बारे में लता की माताजी अपने किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बड़े गर्व से बताती हैं कि एक दिन अचानक उन्हें एक क्रांतिकारी मिल गया था…कि बेचारा ज़ख्मी था…कि पुलिस उसे ढूंढने डिब्बे में आई थी…आदि-आदि।

माँ का अपना तरीका था, उस घटना को महसूस करने का। और बेटी का उस घटना को महसूस करने का बिल्कुल अलग तरीका था। वह युवा थी, देशभक्ति का जज़्बा भी बहुत अधिक था। वह अखबार रोज देखती थी। अखबार में सत्याग्रह के दम पर आज़ादी की लड़ाई में डटे रहने वाले सेनानियों की खबरें वह बड़ी दिलचस्पी से पढ़ती थी। क्रांतिकारी तरीके से लड़ाई लड़ने वालों के बारे में भी वह खूब पढ़ती थी।

उसे गांधी जी और कांग्रेस वाला सत्याग्रह का मार्ग ही अधिक पसन्द आता था। किन्तु जब से वह आनन्द से ट्रेन में मिली थी, उसे क्रांति वाला मार्ग ही ज्यादा अच्छा लगने लगा था। उसके पिता ओंकारनाथ जी एक प्रसिद्ध अखबार में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करते थे। वे क्रांतिकारियों से बहुत चिढ़ते थे। इसलिए लता इस विषय में उनसे कुछ बात नहीं करती थी।

उस दिन आनन्द से ट्रेन में मिलने और बिछड़ने के बाद, उसे जो आनन्द का लाल रंग का रुमाल मिला था, वह उसने माँ की स्वीकृति के बाद अपने पास रख लिया था।

फिर एक घण्टे के बाद उनका स्टेशन आ गया था धीरजगढ़। दोनों माँ-बेटी वहीं उतर गई थीं। किन्तु आनन्द का व्यक्तित्व उसके साथ ही चला आया था। घर पहुंचकर उसने आनन्द का वह रुमाल पूजा के आले में रख दिया गया था। मगर आनन्द और उसकी क्रांतिकारी विचारधारा उसके मन में कहीं चिपककर रह गए थे।

अगले दिन का अखबार उसने बड़ी व्यग्रता से खंगाला। एक-एक खबर ढूंढ कर पढ़ी। पिछले दिन की वारदात की खबर उसे पढ़ने को मिल गई। खबर पढ़ने के बाद उसे पता लगा कि आनन्द जयनगर क्षेत्र का निवासी है। वहीं से तो वह ट्रेन में चढ़ा था।

लता ने आनन्द के साथी के रूप में नवाब डाकू को भी जाना। फिर उसे यह जानने को भी मिला कि अलीगढ़ से चल कर ट्रेन जब धीरजगढ़ की तरफ जा रही थी, वहीं वह अपने ज़ख्मी पैर के साथ ट्रेन से नीचे कूद गया था। उसके बाद उसे कोई जंगली जानवर रेलवे लाइन के किनारे बेहोश पड़ा देखकर खा गया था, या वह स्वयं ही कहीं जाकर छिप गया था। इस बारे में उस अखबार के समाचार-लेखक के पास कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी।

उस दिन के बाद लता हर दिन का अखबार पढ़ रही थी। जो भी उसे थोड़ा-बहुत अनुमान लगता, वह अपनी माँ को भी बता देती थी। फिर एक दिन के अखबार में उसने नवाब डाकू का जेल तोड़कर भागना, फिर कलेक्टर राबर्ट ग्रीन को गोली मार देना जैसा समाचार पढ़े। और फिर हाल ही में धीरजगढ़ जेल से कानपुर जेल ले जाते हुए कैदी नेताजी को क्रांतिकारियों द्वारा छुड़ा ले जाने की खबर पढ़ी तो इस वारदात में उसने आनन्द के होने की खुशबू को सूंघा।

उसका मन अब कह रहा था कि आनन्द मरा नहीं बल्कि जिन्दा है और आजकल इधर के क्षेत्र में ही सक्रिय है। वह अब आनन्द के बारे में और अधिक सोचने लगी थी। यहाँ तक कि दिन या रात में कभी भी उसे आनन्द का ख्याल आ जाता था, और वह घण्टों सोचती रहती थी या माँ से बातें करती रहती थी। अपने पिता की वह बहुत लाड़ली थी। मगर उनसे आनन्द के बारे में बात करते वह झिझकती थी।

मगर उस दिन उससे रहा न गया तो बात करने के लिए वह सुबह ही सुबह अपने पिता के कमरे में पहुंच गई। उस समय उसके पिता कमरे में न थे। वे दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे, शायद उस समय वे नहाने गए हुए थे।

लता उनके लौटकर आने तक प्रतीक्षा करने के लिए वहीं रुक गई।

कुछ खोजती हुई वह उनकी मेज तक पहुँच गई। मेज पर कुछ कागज लिखकर उसके पिता जी ने रख छोड़े थे, लता का ध्यान उन कागजों पर ही चला गया।

उसने वे कागज हाथ में उठा लिए। यह कोई लेख था, जो आज उसके पिता अपने अखबार में छपने देने वाले थे। लेख का हैडिंग था — “आज के भटके हुए नौजवान और क्रांति की राह।”

लता लेख को तेजी से पढ़ने लगी। कुछ पंक्तियों को पढ़ने के बाद उस लेख में आनन्द का नाम भी आ गया था। वह पढ़ती चली गई। लेख पढ़कर लता अपने पिताजी की सोच को समझ गई। वे आनन्द या उस जैसे युवकों को भटका हुआ समझते थे और उन्होंने लेख के अंत में ऐसे भटके हुए नौजवानों को लौट आने की सलाह भी दे दी थी।

लेख पढ़कर लता ने उन कागजों को फिर मेज पर यथास्थान रख दिया। फिर पिताजी की प्रतीक्षा में कमरे में टहलने लगी औऱ सोचने लगी। उसे अपने पिताजी की सोच का पता था। इसलिए उसे आनन्द के विरुद्ध लिखा यह लेख पढ़कर न हैरानी हुई, न गुस्सा आया। मगर कैसे वह अपने पिता से बात शुरू करेगी, उसी के सूत्र संभालने लगी।

अगले दो मिनट बाद उसके पिता कमरे में आ गए। लता को इतनी सुबह अपने कमरे में आया देख चहक उठे, “ओह लता, माई डार्लिंग डॉटर। हाऊ आर यू ?”

“मैं अच्छी हूँ पिताजी। मगर मैं आपसे नाराज़ हूँ।”

“अरे-अरे…सुबह-सुबह बेटी बाप से नाराज़।” वे हँसकर बोले, “क्या हुआ ?”

“मुझे किसी भी तरह क्रांतिकारी आनन्द से मिलना है।आप मुझे उनसे मिलवाइए।” वह बच्चों की तरह मचल कर बोली।

ओंकारनाथ ने हैरानी से अपनी बेटी का मुँह देखा। उन्हें लगा था कि लता ऐसे ही मजाक में कह रही है। उन्होंने पूछा, “क्या कहा तुमने ?”

“मैं मजाक नहीं कर रही हूँ। आपको तो पता है, मुझे स्वतंत्रता सेनानियों के किस्से सुनने-पढ़ने में बड़ा इंटरेस्ट है।”

“हाँ पता है।”

“मैं अब क्रांतिकारी विचारधारा पर कुछ लेख लिखना चाहती हूँ। इसलिए मुझे इस विषय में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए कुछ क्रांतिकारियों से मिलने और बात करने की सूझी है।”

“हूँ…तो फिर आनन्द से ही क्यूँ मिलना ? किसी भी क्रांतिकारी से मिलकर काम चल जाएगा।”

“आजकल अखबारों में आनन्द जी का ही जिक्र है न, इसलिए मेरा मन था कि उन्हीं से बात हो जाए तो अच्छा रहेगा।”

“पत्रकार होने से एक-दो क्रांतिकारियों से मेरी थोड़ी-बहुत पहचान है। मैं तुम्हें उनसे मिलवा दूँगा किसी दिन। फिर आनन्द से तुम अपने आप मिल लेना।” आखिरी बात कहकर ओंकारनाथ हँसे थे। यह बात उन्होंने बेटी से मजाक में कही थी। वह समझते थे कि वह लड़की की जात है तो अकेले आनन्द जैसे क्रांतिकारी से मिलने की बात सुन कर ही घबरा जाएगी।

“हूँ, देखा जाएगा। पहले आप मुझे अपने परिचित क्रांतिकारी से ही मिलवा दीजिए।”

“मगर ध्यान रहे लता, यह बात भूल से भी किसी से मत कह देना कि मेरी किसी क्रांतिकारी से जान-पहचान है और मैं तुम्हें उससे मिलवा रहा हूँ। मेरी शामत आ जाएगी।”

“मैं जानती हूँ कि आपके क्रांतिकारियों से बेशक सम्बन्ध हों, पर आप कोई गलत काम नहीं कर सकते। और आपने ही मुझे बताया था कि यह पत्रकारों की निजता और गोपनीयता के अधिकार में आती है। कोर्ट भी आपसे नहीं पूछ सकता कि आपके विश्वस्त सूत्र या निजी सूत्र कौन हैं और क्यों आपके किसी ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध हैं। राइट पिताजी ?”

“यस गुड गर्ल।” ओंकारनाथ ने लाड़ से बेटी के कंधे थपथपा दिए।

“मगर पिताजी, मुझे आज ही आनन्द से मिलना है या बस कल तक।”

“ओह ! बड़ी जिद्दी हो तुम, ऐसे नहीं मानोगी। मगर अब जाओ। मुझे अपने दफ्तर जाना है। जाओ और अपनी माँ को भेजो। कुछ जरूरी बात करनी है।”

“ओके पिताजी। ओके माई स्वीट डैडी।” लता हँसती-कूदती वहाँ से चली गई।

* * *
 
गाड़ी की गति क्रमशः धीमी पड़ती चली गई थी। फिर वह एक झटका लेकर रुक गई।

यह बिदौली स्टेशन था।

आनन्द जो बीच के एक स्टेशन से चढ़ा था, अपनी सीट से उठा और नीचे उतर गया। उसके साथ ही तीन और यात्री भी वहाँ उतरे थे।

कुछ दूर तक वे यात्री भी उसके साथ-साथ चलते रहे। कुछ आगे जाकर, आनन्द अपना वह रास्ता बदल लेने के लिए मुड़ा कि उसी मोड़ से विपरीत दिशा की तरफ एक कार तेज़ी से गुजरी। आनन्द उस कार से टकराते-टकराते बाल-बाल बचा।

आनन्द जैसे-तैसे करके संभलकर टकराने से बचा था। संभलने के तुरन्त बाद उसने पलट कर उस कार को देखा जो अभी उसके बराबर से गुजरी थी। उसे एक युवा लड़की चला रही थी। आगे की सीट पर उस युवती के साथ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति भी बैठा था, जो युवती पर बिगड़ पड़ा, “लता, सड़क पर सामने देखते हुए गाड़ी चलाओ। अभी वह (आनन्द) गाड़ी से कुचला जाता तो पता है क्या होता…।”

“सॉरी पिताजी। अब मैं ध्यान रखूँगी।” लता ने गाड़ी रोककर पीछे आनन्द को देखा और पहचानने की कोशिश की। मगर वह जल्दी में थी इसलिए भी पहचान न पाई और तेजी से गाड़ी आगे बढ़ा ले गई।

पाठक मित्रों, ये ओंकारनाथ और लता ही थे। ओंकार नाथ जी लता के जिद करने पर उसे अपने परिचित क्रांतिकारी और उस क्रांति-दल के ‘सरदार’ से मिलाने ले जा रहे थे, जिससे हाल ही में आनन्द जुड़ा था।

आनन्द इस कार वाली घटना को भूलकर अपने रास्ते पर फिर आगे बढ़ गया। वह भी इस समय क्रांति के बारे में ही सोच रहा था।

क्रांति किसी अकेले आदमी के बस की बात नहीं। इसके लिए मनुष्य को समूह बनाना ही पड़ता है। कुछ सिद्धान्त बनाने पड़ते हैं, जो परिस्थितियों पर निर्भर है। मनुष्य को अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का गला घोंट देना होता है। आतंक फैलाने के लिए बिना बात किसी की भी पकड़कर हत्या कर देना क्रांति नहीं है, वह आतंकवाद है। चोरों-डाकुओं और देशद्रोहियों जैसा काम है।

क्रांतिकारी का तो बस एक ध्येय होना चाहिए — एकजुट होकर देश के लिए काम करो। ज्यादा से ज्यादा व्यक्तियों को अपने इस विचार के साथ जोड़ो। अर्थात गुलामी की जंजीरों को तोड़ना है…और एकता की जंजीरों में नई-नई कड़ियों को जोड़ते जाना है यानी एकता की जंजीरों को और मजबूत बनाना है –जंजीरें…जंजीरें… जंजीरें…। यह एक शब्द उस के कानों में बार-बार गूंज रहा था।

आनन्द सोचता जा रहा था। अभी तक वह दिशाहीन था और किसी अज्ञात मंजिल की तरफ बढ़ रहा था। खतरों से खेलते हुए भी वह क्रांति से दूर ही था। इस क्रांति-दल से जुड़ने पर उस पर कई जिम्मेदारियाँ और आ गईं। इस दल ने उसे अपने जय नगर के चारों तरफ का इलाका कार्य-क्षेत्र के रूप में सौंपा था।

उसको जो कार्य सौंपे गए थे — साधारण जन समाज से मिलना, उन्हें क्रांति का मकसद समझाना, और बड़े से बड़े संगठन का रूप देने के लिए मुख्यतः आदमियों को तन-मन-धन तीनों रूप से तैयार करना। आनन्द इसके लिए तैयार भी हो गया था। अखबार में पहले ही उसकी मौत की खबर आ चुकी थी। फिर आज तक जिसने उसे देखा था, सिवाय उसके अपने साथियों के, अब कोई भी इस दुनिया में नहीं था। अतः वह इस समय निश्चिन्त था।

यह सब सोचता हुआ आनन्द गांव बिदौली की तरफ बढ़ रहा था। जब वह गाँव में पहुंचा तो दिन ढल गया था। जब वह हरपाल के घर पहुंचा तो उसने देखा कि हरपाल के माता-पिता आ चुके थे।

आनन्द की आशा के विपरीत, हरपाल और उसके माता-पिता ने बड़े स्नेहपूर्ण तरीके से उसका स्वागत किया था। माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और पिता ने मुस्कराकर उसकी पीठ ठोंकी। फिर उससे पूछा कि वह पिछले दो-तीन दिन कहाँ पर था और उसके ये दिन कैसे गुज़रे ?

“जी, अच्छे ही बीते।” आनन्द ने उत्तर दिया। बीते तीन दिन उसने क्रांति दल के साथ गुजारे, यह बताने से उसने परहेज किया।

पिता कुछ कहने ही जा रहे थे कि बीच में माँ बोल पड़ीं, “बेटा अब तुम्हारी तबियत ठीक हो गई है ? हरपाल ने मुझे तुम्हारे बारे में सब बताया है। तुम्हारा ललितपुर गाँव में घर-बार है, जमीन-जायदाद है। कुछ दुश्मनों ने तुम्हारे घर-बार में आग लगा दी, तुम्हारे घर-परिवार को जिंदा जला दिया गया। यह बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ। सुनकर बहुत दुख हुआ बेटा।” देखते ही देखते माँ की आंखें भर आईं और उन्होंने अपनी धोती के पल्लू से आंखें पौंछी। उनकी आवाज़ भर आईं थी।

हरपाल के पिता बोले, “लेकिन बेटा हम इतना कह सकते हैं कि अब तुम इसे भी अपना ही घर समझो।”

माँ फिर कहने लगी, “तुम्हारे बारे में बहुत तारीफें सुनी हैं। हरपाल तुम्हारे अच्छे स्वभाव की बातें बताते नहीं थकता। पटवारी जी भी तुम्हें भला बता रहे थे। और… और ये कौशल तो तुम्हारी ही बातें करती है। हमें तो तुम यह सब सुन-देखकर अपने घर के से आदमी लगने लगे हो बेटा। परसों हम लौट आए थे और तबसे ही तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।”

हरपाल के पिता जी ने माँ को मीठी-सी फटकार दी, “हरपाल की माँ, तुमने तो बिल्कुल हद कर दी। बेचारे के आते ही सवालों-जवाबों की झड़ी लगा दी। उसके खाने-पीने और आराम करने का भी ख्याल करोगे या नहीं ? डेढ़-दो मील पैदल चलकर आ रहा है। वह बेचारा खड़ा ही है मगर तुम्हारी बातें खत्म होने में ही नहीं आ रही हैं।”

इन उबा देने वाली बातों में भी आनन्द ने आज कुछ रस महसूस किया। एक सुख महसूस किया। वह उनकी बातों पर बराबर मुस्कराता जा रहा था।

हरपाल की मां हरपाल के पिता की बात पर हँस पड़ी। थोड़ा झेंप गई। फिर कौशल को वहीं से आवाज़ देकर बोलीं, “अरी कौशल, दूध ले आ।”

जैसे कहने का ही इंतज़ार था, कौशल फौरन हाथ में दूध का गिलास लिए आ गई, “बस गर्म करके मीठा ही कर रही थी।”

अब जाकर आनन्द ने कौशल को और कौशल ने उसे देखा था। मुस्करा कर एक दूसरे का अभिवादन किया। आनन्द ने उसके हाथ से लेकर दूध पिया। दूध का खाली गिलास लेने जब कौशल आई तो उसने आनन्द के पास जाकर धीरे से कुछ पूछा। यह बात शायद क्रांतिकारी नेताजी के बारे में थी क्योंकि उसने कुछ ऐसा ही संकेत किया था। आनन्द ने भी धीरे से कुछ जवाब दिया, जिस पर दोनों ठठाकर हँस पड़े।

सब लोग उन्हें हँसता देखकर हँस पड़े। फ़िर आनन्द ने कौशल के कान में कुछ कहा तो फिर कौशल ने माँ से चुपके से वही बात कही। इस पर माँ, कौशल औऱ आनन्द, तीनों के चेहरे मुस्कुराहट से चमक उठे।

आनन्द ने तब एक गहरी और संतोष भरी साँस लेकर उन सबसे कहा, “आज बहुत दिनों बाद पूरे परिवार के साथ रहने जैसा सुख मिला।”

सबके चेहरों पर एक सौम्य-सी शांति दिखने लगी।
 
थोड़ी देर बाद हरपाल भी आ गया। पहले तो दोनों में कुछ खास बातें हुईं। फिर सबके साथ संयुक्त रूप से हँसी-मजाक और छेड़छाड़ का दौर चला।

काफी रात गए वे सब सोए।

अगले दिन, दैनिक क्रियाओं से निपटकर नाश्ते आदि के बाद आनन्द ने अपने जाने की बात कही।

यह सुनकर सबके चेहरे उतर गए। हरपाल और कौशल तो ज्यादा ही उदास हो गए। आखिर आनन्द से काफी समय से उन दोनों का स्नेह चलता आ रहा था। मुँह से तो कौशल ने कुछ नहीं कहा मगर दिल की बात चेहरों पर स्पष्ट झलक रही थी।

हरपाल तो आनन्द के काम की जिम्मेदारी समझता था, पर कौशल चाहकर भी कुछ न कह सकी। आनन्द उसकी स्त्रियोचित झिझक को समझ रहा था।

मायूसी के वातावरण में उन लोगों से आनन्द ने विदा ली। उसका मन भारी था। अगर इस समय पर उसके सिर ये जिम्मेदारियां न होतीं तो वह स्वयं भी अभी यहाँ से जाना न चाहता। क्योंकि अब इस दुनिया में घर-परिवार का कहने को उसका कोई न था। हाँ, जय नगर में उसके एक चाचा जरूर थे और किठौर में उसके मामा थे। मगर अब जब वह क्रांतिकारी बन गया था तो वह किसी के पास इसलिए भी नहीं जाना चाहता था कि उसके आने-जाने से पुलिस इन पर भी शक करेगी और उन्हें बाद में परेशान ही करेगी।

वह चल पड़ा। ये रास्ते उसके देखे हुए थे। गलियां पैरों से नापी हुई थीं। लेकिन न जाने आज क्यों आनन्द को कुछ ऐसा लग रहा था कि वह इस रास्ते पर पहली बार चल रहा है। लग रहा था कि रास्ते और गलियाँ सब नई सी थीं।

इस प्रकार का अनुभव उसे आज पहली बार हो रहा था। वह पहले भी तो अपने घर से कई-कई दिनों के लिए बाहर आता-जाता था। घर वाले बड़ा मन भारी करते थे। पिताजी भी और माता जी भी; बड़ा भैया और भाभी भी। मगर उसे इस तरह का अहसास तो कभी न हुआ था। तो इस अहसास का कारण ? क्या कौशल के कारण ?

मगर उसके दिल से आवाज़ आई — कौशल के प्रति आकर्षण को अभी उसने महसूस नहीं किया था। तो शायद इसलिए कि उसे इस पूरे परिवार से ही प्रेम हो गया था, और यह परिवार भी उससे बहुत प्रेम करता था, जो नितांत उसीसे न था, बल्कि उसके उद्देश्यों के प्रति भी था। इस परिवार से लगभग सभी लोग किसी न किसी रूप में देशभक्ति के कार्यों में ही लगे हुए थे।

उसकी आँखों के पटल पर कई चेहरे आ और जा रहे थे। कभी हरपाल का, कभी, कौशल का, कभी माँ का, कभी हरपाल के पिता का और कभी नवाब का।

उसने अपने सिर को झटक कर उस समय इन सब चेहरों को अपने मानस-पटल से हटा दिया औऱ निर्द्वन्द होकर सुनसान रास्ते पर आगे बढ़ने लगा।

* * *

आनन्द गाँव से अभी बाहर ही निकला होगा कि पीछे से हरपाल की आवाज़ आई, “अरे, आनन्द जरा रुको।”

आनन्द ने पलटकर देखा। एक साइकिल पर चढ़ा हरपाल उसकी तरफ ही आ रहा था। वह रुक गया, “क्यों क्या हुआ ?”

“एक जानने वाले की साइकिल उठा लाया हूँ। मेरा मन नहीं माना। तुम्हें साइकिल पर बैठाकर स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। थोड़ी देर और साथ हो जाएगा हमारा-तुम्हारा।”

“चलो, यह भी अच्छा सोचा। वैसे तो बिदौली गाँव से उसका रेलवे स्टेशन आधा मील दूर ही है।”

“हाँ। आओ बैठो भी।” हरपाल ने उसके पास लाकर साइकिल रोक ही दी तो आनन्द भी बैठ ही गया।

दोनों साइकिल पर चढ़े पाँच मिनट में स्टेशन के पास ही पहुँच गए। आनन्द चौंककर साइकिल से उतर गया। कोई नारी स्वर आया था, “हरपाल जी, ठहरिए।”

हरपाल ने साइकिल के ब्रेक लगा दिए। खुद भी साइकिल से उतर गया, “आप लता जी ? आज फिर यहाँ ? क्या हुआ ?”

एक सुंदर सी अट्ठारह-उन्नीस वर्ष की आयु की लड़की सामने खड़ी थी। आनन्द ने उसे नज़र भरकर देखा तो लता ने भी उसे देखा। वह मुस्कराईं और अभिवादन किया। फिर हरपाल से बोली, “यदि मैं गलत नहीं हूँ तो आप हैं मि. आनन्द। मैं आपसे मिलने के लिए ही इस समय हरपाल जी के घर जा रही थी।”

“हाँ-हाँ।” हरपाल लपककर लता के निकट गया और फुसफुसा कर बोला, “यह क्या कर रही हैं आप ? ऐसे नाम मत लीजिए। और जरा इधर एक तरफ आइए। वहाँ थोड़ा अलग खड़े होकर बातें करते हैं। आइए।”

तीनों एक तरफ खड़े होकर बात करने लगे। लता बोली, “उस दिन ट्रेन में मिले थे। जब आपके पैर में गोली लगी थी और आप महिलाओं के डिब्बे में चढ़ आए थे। मेरी माताजी औऱ मैं, हम दोनों ही थे। याद आया ?”

आनन्द याद करने लगा। थोड़ा सोचकर बोला, “हाँ कुछ-कुछ देखा हुआ सा लग रहा है आपका चेहरा। मगर पक्के तौर पर याद नहीं।” आनन्द झेंपी-सी हँसी हँसकर बोला, “मगर आपको मेरा और हरपाल का पता कैसे मिला ?”

“अरे, बस यही मत पूछिए कि आपसे मिलने के लिए हमने क्या-क्या पापड़ नहीं बेले। रोज आपकी खबर पाने के लिए अखबार में आपकी खबर ढूँढ-ढूंढ कर पढ़ती थी। बस, यूँ समझो किसी तरह आपके दल के सरदार तक मेरे पिताजी ने पहुँचा दिया।”

“मगर हरपाल जी तक कैसे पहुंची आप ?” आनन्द ने जानना चाहा।

“सरदार और नेताजी से मिलने अब मैं दो-तीन बार जा चुकी हूँ। कल मैं फिर गई थी…और आपका पता लगाने के लिए उनकी मदद माँगी तो मेरे सौभाग्य से कल वहाँ हरपाल जी मौजूद थे। सरदार ने हरपाल जी से मुझे मिलवा दिया। हरपाल जी ने आपसे मिलवाने की मेरी अर्ज कुबूल कर ली।”

“मगर हरपाल जी, तुमने मुझे तो इनके बारे में नहीं बताया। आजकल हमारा किसी से भी मिलना…।”

“इन्होंने मुझसे वचन ले लिया था कि मैं तुम्हें इनके बारे में अभी न बताऊँ।” हरपाल ने झेंपी-सी हँसी हंसते हुए कुबूल कर लिया।

“और तुमने इन्हें वचन दे दिया ? इनकी जगह कोई गलत उद्देश्य से मिलने वाली लड़की होती….कोई जासूस होती तो ?” आनन्द ने हैरानी से हरपाल का मुँह देखा।

“अरे यह भोली-प्यारी-सी लड़की। जैसे इसने सरदार को शीशे में उतार लिया तो मैं किस खेत की मूली हूँ। यह लड़की जो खुद इतनी बेवकूफ है कि एक बार तुमसे मिलने के बाद क्रांतिकारी बनने तक को तैयार हो गई है, यह हमें क्या बेवकूफ बनाएगी।” हरपाल यह कह कर हँसने लगा तो आनन्द उसका मुँह देखने लगा।

“हाँ तो देवी जी, अब आप भी बताइए, क्या कहना चाहती हैं ?”

“और बस…। अब क्या कहूँ…आप खुद ही समझ लीजिए न। आप मेरे आदर्श बन गए हैं अब। मैं भी क्रांतिकारी बनूंगी। मैंने सोच लिया है। आपको अपना गुरु भी बनाऊंगी।” वह एक साँस में यह सब कह गई। फिर सोचा तो खुद ही शर्म से नीचे जमीन को देखने लगी औऱ फिर पाँव के अंगूठे से धरती कुरेदने लगी।

लता की नजरें ऊपर ही नहीं उठ पा रही थीं। आनन्द और हरपाल एक-दूसरे का मुँह देखते रह गए। अभी तक बेधड़क घूमने वाली और मुँहफट बोलने वाली लड़की अचानक कैसे शर्म के घेरों में ऐसी फंस गई थी कि न नज़र ऊपर उठा पा रही थी और न ही कुछ बोल पा रही थी।

हरपाल ने आनन्द से पूछा, “तुम्हारी गाड़ी कितने बजे है आनन्द ?”

“यही तो मुश्किल है। अब बात करने का समय नहीं है। गाड़ी का समय हो चुका है। किसी भी पल गाड़ी आ जाएगी। आप कुछ बोलिए लता जी।”

“मुझे आपसे मिलने की तीव्र इच्छा थी। आप चाहेंगे तो दुबारा मिलूंगी। नहीं चाहेंगे तो नहीं मिलूंगी। मगर आपसे उस दिन ट्रेन में हमसे हिमाकत हो गई थी। आपको चोर-उचक्का समझकर कुछ बुरा-भला कह दिया था। उसके लिए क्षमा माँगने आई हूँ। मुझे क्षमा कर दीजिए।”

“ओह ! यह बात ? उसके लिए इतना परेशान हुईं हैं आप ? मेरा मन आपकी तरफ से साफ है। अब तो आप खुश हैं ?” आनन्द ने हँसकर यह बात कही तो लता झेंप गई। तभी गाड़ी स्टेशन पर आती दिखाई दी। आनन्द सतर्क होकर गाड़ी में चढ़ने के लिए तैयार हो गया और हरपाल उसे विदा करने के लिए।

आनन्द ने लता को देखा। विदा माँगने के लिए उसके सामने हाथ जोड़ दिए। चलने की स्वीकृति चाही, “आप से मिलकर बहुत खुशी हुई। देखिए, फिर कभी मिलते हैं। अब तो जाना ही होगा। अच्छा विदा लता जी !”

कोई देखता तो इस समय लता की आंखों में नन्हें-नन्हें आँसू झिलमिला रहे थे, जो बाहर तो नहीं आए मगर पलकों नें अटककर रुक गए थे। यह बात आनन्द ने किंचित महसूस की। किन्तु एकदम अनजान बन गया वह।

गाड़ी स्टेशन पर आकर रुकी। यात्री चढ़ने-उतरने लगे। बिछड़ने की बेला आ ही गई। हरपाल ने आनन्द को बांहों में भर लिया और अचानक भर्रा गए स्वर से बोला, “तू बहुत याद आएगा मेरे यार।”

आनन्द ने कुछ नहीं कहा। बस जवाब में हरपाल की जोर से पीठ थपथपाई और एक नज़र लता पर डालते हुए वह ट्रेन में चढ़ गया।

लता आनन्द और उसकी ट्रेन को अंतिम समय तक जाते हुए देखती रही।

ट्रेन चली गई। हरपाल और लता, दोनों ने स्वयं को सामान्य किया। तभी एक तरफ से हरपाल को पटवारी जी आते दिखाई दिए। हरपाल बोला, “अब चलोगी मेरे घर ?”

“नहीं, फिर किसी दिन चलूँगी। आज तो ये पटवारी जी मिल गए हैं।”

“अच्छा ? इन्हें तुम भी जानती हो ?” आश्चर्य से हरपाल ने लता को देखा।

“हाँ…ये तो दसियों साल से शहर में हमारे कॉलेज में आते हैं। बस इससे ज़्यादा मैं भी इन्हें नहीं जानती।”

“चलो आज इन्हें और ज़्यादा जान लेना।” कहकर हरपाल ने पटवारी जी को आवाज़ देकर पास बुलाया।

* * *
 
दोपहर एक-डेढ़ बजे के लगभग समय था।

डीएसपी ग्राहम जैक्वीन्स अपने ऑफिस में बैठे थे। उनके सामने सावधानी की मुद्रा में सीनियर इंस्पेक्टर श्यामनारायण खड़ा था। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था।

डीएसपी महोदय भड़क रहे थे, “कहीं बीस आडमी मारा जाटा हैय, कहीं पाचास आड़मी मारा जाटा हैय। कहीं किसी का खून, कहीं किसी का खून। कबी किसी को लूट लिया, कबी किसी को किडनैप कर लिया।”

“यस सर।” श्यामनारायण थूक निगलते हुए बोला था। तुरन्त सैल्यूट मारा।

डीएसपी ने बड़े जोर से अपनी मेज पर मुक्का मारा और लगभग चीख कर बोले, “जिदर देखो खून ई खून। बागी अपनी मनमानी करटा हैय। टूम लोग क्या करटा हैय। कोई भी बागी पर काबू नहीं पा सका हैय।”

गर्दन नीची किए इंस्पेक्टर श्यामनारायण चुपचाप सुन रहा था। उसके चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव थे।

“इंस्पेक्टर, हम बागियों को अरेस्ट करना मांगटा हैय। कुच बी हो, इस बार हम किसी बी मामला में अनसक्सेस नहीं सुनना माँगटा।”

“यस सर।” श्यामनारायण के मुँह से मुश्किल से बोल फूटा।

“टूम अगर चाहटा तो अपनी गारद से कुच बी काम निकाल सकटा था। मगर टूम ने कुच नई किया। हाम टूमको बहोट बहादुर अफसर समझटा था। मगर टूमने हामारे इरादों पर पानी फेर दिया हैय। बागी डीन पर डीन जोर पकड़टा जा रहा हैय। अब हमें लगटा हैय के टूम कुच नई कर पाएगा। हामें इस काम का वासटे स्पेशल दस्ता मंगवाना पड़ेगा।”

“आई एम सॉरी सर। मगर पुलिस क्या करे सर ? सारे बंदोबस्त के बावजूद भी बागी अपना काम कर जाते हैं। पुलिस को मौका ही नहीं मिल पाता कि कुछ कर पाए। बागी बड़े होशियार और धूर्त हो गए हैं। कब क्या कर जाते हैं, कुछ समझ में नहीं आता।” श्यामनारायण ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए यह कहा।

“पोलिस की नाकामयाबी को हाम बागियों की होशियारी नेई मान सकटा। टूम लोग बेवकूफ हैय। पोलिसी से काम लेना नेई जानटा।” डीएसपी का लहज़ा उसी तरह उसके पीछे पड़ जाने वाला ही था।

“सर, इस बार मुझे एक खास इन्फॉर्मेशन मिली है। और इस बार हम योजना-बद्ध तरीके से बागियों का सामना करेंगे। उन्होंने हमारी एक मालगाड़ी लूटने की योजना बनाई है। यह खबर हमें एक खास आदमी ने दी है। आप इस बार मौका और दें सर।”

डीएसपी जैक्वींस इंस्पेक्टर श्यामनारायण को आग्नेय नेत्रो से देख रहे थे।

“इट इज सर्टेन सर। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि इस बार हम इन बागियों को अरेस्ट करने में ज़रूर कामयाब हो जाएंगे।”

डीएसपी बोले, “किसने डी ये खबर ?” इस बार उसका अंदाज शंकालु था।

“एक मुखबिर है सर।”

“हूँ।” डीएसपी ने गम्भीरता से सोचकर कहा, “ओके ट्राई करो।”

“थैंक यू सर।” श्यामनारायण ने एड़ियां बजाकर सैल्यूट किया। फिर एड़ियों पर घूमा और पलटकर ऑफिस से बाहर निकल गया।

श्यामनारायण के जाते ही डीएसपी ने टेलीफोन का चोंगा उठाया और डायल पर कोई नम्बर मिलाने लगा।

दूसरी तरफ से तुरन्त फोन उठाया गया। वे तुरन्त माउथ पीस में बोले, “आई एम डीएसपी ग्राहम जैक्वींस दिस साइड।”

दूसरी तरफ से कोई बोला तो उन्होंने सीधा प्रश्न किया, “इज बॉब रिक्सन देयर ?”

“यस सर…वेट ए लिटिल।”

कुछ देर बाद दूसरी तरफ से आवाज़ आई, “यस सर…आई एम बॉब रिक्सन हियर — फ्रॉम स्पेशल ब्रांच फ़ॉर डिटेक्टिव इंटेलीजेंसी।”

“ओ यस। एक ख़ास बात करनी है टूमसे। अबी ऑफिस में या घर पर मिलो। मिल सकटा हैय ना ?”

“मैं आधे घण्टे बाद आपके घर पर पहुंच रहा हूँ सर। क्या बात है अभी आपका स्वर इतना उत्तेजना भरा क्यों है ? क्या बात है, थोड़े से शब्दों में बतलाइए।”

“हाँ, तुम्हारा हिंदी तो अच्चा हैय। मैं बी कोशिश करटा हूँ। दरअसल, श्यामनारायण ने मुझे एक केस के बारे में बहुत खास खबर डिया है। टूम्हें बाकी सब जानकारी तो श्यामनारायण ई डेगा। मगर मुज़े उसके बारे में ई बात करनी हैय। बताया गया हैय कि कोई बागी ई मुखबिर बन गया हैय। उसने खबर डी है कि बागी हामारी कोई मालगाड़ी लूटने वाला हैय। ओह ! बाट लम्बी हो रहा हैय। अबी मैं घर जाटा हैय। बाकी बाटें अब वहीं करूँगा। ओके ?” इतना कहकर डीएसपी ने अपनी तरफ से फोन रख दिया।

डीएसपी ने आराम की मुद्रा में कुर्सी पे बैठकर निश्वास लिया। फिर सिगरेट सुलगा ली। सिगरेट के कश लेते हुए वे सोचने लगे।

फिर सहसा सिगरेट मेज पर रखी ऐश-ट्रे में मसलकर छोड़ दी और मेज पर रखी घन्टी बजाने के लिए हाथ मारा।

तुरन्त ही नौकर कमरे में आ गया। डीएसपी बोले, “ड्राइवर से कहो कि जीप टयार रखे। हम अबी घर जाएगा।”

नौकर फौरन ही बाहर चला गया। कुछ देर बाद लौटकर अंदर आया, “जीप तैयार है साब।”

“अच्चा हाम आटा हैय।”

पहले नौकर बाहर निकला। उसके बाद डीएसपी महोदय अपनी कुर्सी से उठे। उन्होंने एक बार फोन पर नज़र डाली और दफ्तर से बाहर निकल गए।

कोई फोन पर उनकी बात सुन चुका था। इसका किसी को भी पता नहीं चल पाया था।

डीएसपी पुलिस लाइन की इमारत से बाहर निकले।

एक तरफ जीप खड़ी हुई थी और ड्राइवर जीप में बैठा हुआ था। डीएसपी ने चलते हुए घड़ी में समय देखा और जीप में जा बैठे। उनके बैठते ही जीप ने एक चक्कर लिया और सड़क पर आकर सीधी आगे दौड़ती चली गई।

* * *

लगभग तीन बजे का वक़्त हो चला था। एक कार डीएसपी ग्राहम जैक्वींस के मकान के सामने आकर रुकी।

यह कार अंग्रेज रिक्सन की थी। यह गाड़ी आज की फिएट कार का ही पुराना मॉडल थी। रिक्सन खुद ड्राइव करके आया था।

उसे देखते ही बाहर गेट पर खड़े चौकीदार ने फौरन झपटकर अधखुला गेट खोल दिया और एक तरफ खड़े होकर उसने पैर जोड़ कर और हाथ माथे से चिपका कर सलाम ठोंका।

रिक्सन ने उसके सलाम पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह अंग्रेजों की सोच थी — ये इंडियन लोग हैं, इनके सलाम का क्या जवाब देना। इन्हें तो हमें सलाम करना ही है। हाँ, यदि कोई सलाम करना भूल जाए, तो उसे सजा दो, यह हर अंग्रेज याद रखता था। यह मानकर रिक्सन अपनी कार उसी तेज गति से चलाता हुआ अंदर चला गया।

अंदर अहाते में कार रुकते ही चौकीदार दौड़कर पास गया और एक तरफ़ का दरवाज़ा खोलकर माथे से हाथ चिपकाए सावधान की मुद्रा में तनकर खड़ा हो गया।

रिक्सन कार से बाहर आया। घड़ी में समय देखा और फिर बड़बड़ाया, “माई गॉड !” फिर चौकीदार की तरफ कड़ी दृष्टि से घूरते हुए पूछा, “ऐ ! इधर आओ। तुम्हारे साब आ गए ?”

प्रश्न शायद ठीक ढंग से नहीं किया गया या चौकीदार नहीं समझा। वह हड़बड़ाकर बोला, “जी…जी…न… नहीं तो।”

“क्या बकते हो तुम ?” डाँटना ज़रूरी था। बात-बात पर वे इंडियन को डाँटते थे, “ड्यूटी देते हो या इधर-उधर तफरीह करते फिरते हो ? तुम्हारे साब ने मुझे ढाई बजे घर पर मिलने को कहा था। जबकि मैं थोड़ा लेट भी हूँ। और तुम क्हते हो कि साब अभी आए ही नहीं। तुम झूठा है…” औऱ एक भद्दी सी गाली देकर रिक्सन मकान के अंदर चला गया।

अंदर उसका स्वागत डीएसपी की पत्नी ने किया। औपचारिक बातों के बाद रिक्सन ने अंग्रेजी में पूछा, “डीएसपी साब कहाँ हैं ? उन्होंने मुझे अभी घर पर बुलाया था।”
 
“व्हाई ?” डीएसपी की पत्नी की आंखों में हल्का-सा आश्चर्य उतर आया था। वह भी अंग्रेजी में ही बोली, “नहीं, ग्राहम तो अभी नहीं आये।”

“ताज़्ज़ुब है। दफ्तर से तो उन्होंने मुझे फोन किया था और कहा था कि मैं तुरन्त घर पहुंच रहा हूँ। तुमसे ज़रूरी बात करनी है। जल्दी घर आ जाओ।”

गोरी औऱ रगड़ खाई चमड़ी वाले गाल कुछ फैले। मिसेज डीएसपी ने हँसकर कहा, “डोंट वारी, आते होंगे। तब तक आप बैठिए। मैं चाय भिजवा देती हूँ।

“ओह, नो थैंक्स मैडम। मैं चाय नहीं पिऊँगा। डीएसपी साहब का वेट करता हूँ।”

मिसेज डीएसपी अंदर चली गई। रिक्सन एक सिगरेट निकाल कर पीने लगा।

काफी देर बीत गई। रिक्सन बार-बार घड़ी में समय देख रहा था। बेचैनी उसके चेहरे पर दिख रही थी। मिनटों पर मिनटें लदती चली गईं और यूँ ही घण्टा भर निकल गया।

रिक्सन बैठा-बैठा ऊब गया पर डीएसपी नहीं आए। रिक्सन चलने के लिए तैयार होकर मिसेज डीएसपी से बोला, “मैं चलता हूँ। साहब आएं तो बोल देना कि मैं शाम को घर पर ही मिलूँगा, मुझे फोन कर लेंगे। मैं अब ऑफिस की तरफ निकल लेता हूँ। वे ऑफिस में हुए तो वहीं मिल लूँगा।। या फिर मैं श्यामनारायण से मिलता चला चला जाऊँगा।”

यह कहकर रिक्सन वहाँ से चल दिया। मकान से बाहर निकल कर वह अपनी कार में बैठा और कार को पुलिस लाइन जाने के लिए सड़क पर मोड़ते हुए आगे बढ़ गया।

रिक्सन डीएसपी के इंतज़ार में उनके घर में बैठकर जितना बोर हुआ था, उस बोरियत से पीछा छुड़ाने के लिए उसने कोई अंग्रेजी गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया। ड्राइविंग करना औऱ गुनगुनाना, कई लोगों का बड़ा मनपसंद शौक होता है। बॉब रिक्सन भी ऐसे ही मस्त हुआ गाड़ी चला रहा था।

कार सड़क पर दौड़ती जा रही थी।

तभी रिक्सन ने देखा। सामने से एक पुलिस जीप आ रही थी। उसने जीप के कुछ निकट आ जाने पर इंस्पेक्टर श्याम नारायण को जीप में बैठे देखा। तुरन्त उसने उसको रुकने का संकेत किया।

जीप वालों ने भी उसे देख लिया था। अतः जीप रोक ली गई।

रिक्सन ने भी अपनी कार एक तरफ किनारे पर लगाकर रोक ली। फिर कार से उतरकर वह जीप की तरफ बढ़ा। श्यामनारायण भी उसके संकेत पर जीप से बाहर आ गया था।

रिक्सन ने देखा श्यामनारायण का चेहरा उतरा हुआ था। वह अपने कदमों को संयत करता हुआ उसकी तरफ बढ़ रहा था। किसी आशंका के भय से रिक्सन सहम गया। उसने पूछा, “क्या हुआ इंस्पेक्टर ?”

श्यामनारायण कुछ नहीं बोल पाया। उसने एक चिट निकालकर रिक्सन की तरफ बढ़ा दी। रिक्सन ने देखा। उसके हाथ काँप रहे थे।

शंका और आश्चर्य के मिले-जुले भाव से उसने श्याम नारायण के हाथ से चिट लेकर पढ़ी —

“एक औऱ अंग्रेज कुत्ते की बलि, भारतमाता के लिए। यह अपने एक दोस्त क्रांतिकारी के खून के बदले में। अंग्रेजो, तुम्हें जाना होगा। — नवाब।”

डीएसपी की हत्या की खबर पढकर रिक्सन का सिर घूम गया और वह अवाक् खड़ा रह गया था।

* * *

[दस]

नवाब और उसके दल के साथी आनन्द के साथ चल रहे थे। वे सब अपने साथ अपनी खाद्य सामग्री लिए हुए थे, जिसे उन्होंने खाली घोड़ों पर लाद रखा था औऱ शस्त्रों से लैस वे स्वयं भी इस समय घोड़ों पर चढ़कर चल रहे थे।

जयनगर से नेताजी के दल के पास उनके अड्डे पर जाने के लिए एक अलग और कच्चे रास्ते वाले गुप्त मार्ग को चुना गया था। आनन्द इन सबको नेताजी के दल से मिलाने के लिए ले जा रहा था।

आनन्द कल ही जयनगर पहुँचा था। नवाब व उसके अन्य साथियों से राय-मशविरा हुआ। तुरन्त फैसला हुआ और तुरन्त के तुरन्त सब वहाँ से नेताजी के अड्डे की तरफ चल दिए थे। कारण ? पिछले कुछ दिनों में नवाब व उसके साथियों ने कई वारदातों को अंजाम दिया था, जिस कारण इधर खुफिया एजेंसियां और स्थानीय पुलिस कुत्तों की तरह उन्हें ढूंढ रहे थे। अतः यही उचित समझा गया कि उस क्षेत्र से कुछ दिन दूर रहकर अपनी शक्ति बढ़ाई जाए।

आनन्द का नेताजी से मिलने जाने का प्रस्ताव उनके लिए सही समय पर आया था। और यह प्रस्ताव भी सबको पसन्द आया था। कई छोटे-छोटे दल बनाने से अच्छा है कि मिलकर काम किया जाए। इसलिए यही तय हुआ कि नेताजी और सरदार से मिलकर भविष्य की योजना पर काम किया जाए। इसीलिए कल शाम के चले हुए, वे रात भर चलकर और अब फिर पूरा दिन चलने के बाद वे अलीगढ़ से आगे की तरफ निकल आए थे।

दल का काफिला बढ़ा जा रहा था।

बीच में पड़ा वही गाँव बिदौली।
 
गाँव के पास आकर एक ऐसे रास्ते पर आनन्द रुक गया, जहां से तिराहा शुरू होता था। एक रास्ता गाँव बिदौली को जाता था और एक रास्ता उसी के विपरीत बाहर की तरफ जाता था।

आनन्द को रुकते देखकर, वे सभी रुक गए थे। अब शाम हो गई थी। सभी की आंखों में एक प्रश्न था कि क्या यहीं पड़ाव डाला जाएगा। आनन्द ने उनकी प्रश्नपूर्ण दृष्टि का समाधान किया।

आनन्द ने उन्हें समझाते हुए नवाब से कहा, “नवाब मैं समझता हूँ कि तुम्हें चलता रहना चाहिए। मैं कुछ देर में गाँव बिदौली से होकर लौटता हूँ।”

आनन्द ने उन्हें नेताजी के अड्डे पर इधर से जाने वाला रास्ता अच्छी तरह समझा दिया, “मैं तुरन्त लौट रहा हूँ। तुम शायद तब तक वहाँ पहुंच भी नहीं पाओगे कि मैं तुम्हें जाकर पकड़ लूँगा।”

फिर भी आनन्द ने उनके नेताजी से सम्पर्क करने के लिए सिग्नल और कोडवर्ड्स नवाब को अच्छी तरह समझा दिए।

इसके बाद नवाब अपने साथियों के साथ आनन्द के बताए रास्ते पर चल दिया और आनन्द ने अपना घोड़ा गाँव की तरफ मोड़ दिया।

शाम ढलते-ढलते अंधेरे की तरफ लुढ़कती जा रही थी। धूल उड़ाता हुआ आनन्द का घोड़ा भी दुलकी चाल से चला जा रहा था। सूरज पश्चिम की गोद में मुँह छुपाने के लिए लपक रहा था।

रास्ते में आनन्द ने घास का गट्ठर सिर पर उठाए जाती हुई एक युवती को देखा। उसे लगा कि यह युवती कौशल है। वह उस युवती के समीप जाकर बोला, “तुम कौन हो ? कौशल हो न ?”

वह युवती कौशल ही थी। उसका चेहरा घास के गट्ठर में ही छुपा था क्योंकि घास का गट्ठर फैलकर दाएँ और बाएं कान, दोनों को ढँकता हुआ कंधों तक ढुलका जा रहा था। आनंद की आवाज़ सुनकर वह तुरन्त घूमी और आनन्द को देखा। देखने का भाव बिल्कुल आश्चर्यजनित था जैसे उसे उस समय आनन्द के मिलने की बिल्कुल आशा न थी, और वह मिल गया था तो कौशल को सूझ नहीं रहा था कि वह ऐसे में आनन्द से कैसे पेश आए ?

वह कुछ देर यूँ ही आनन्द को देखती रही। फिर बोली, “आनन्द बाबू, आप ?”

“हाँ। आनन्द बाबू नहीं, सिर्फ आनन्द कहो न।”

आनंद समझ रहा था कि कौशल उसके इस तरह वाक्य-संशोधन को हल्के-से मज़ाक के रूप में लेगी और हँसेगी। मगर वह तो बहुत गम्भीर थी। उसकी आंखों में अजीब से भाव थे — जैसे खीझ, अविश्वास और निराशा; ये सारे भाव ही मिल गए थे। वह आज आनन्द से अजनबियों जैसा व्यवहार कर रही थी। यह देखकर आनन्द सन्न रह गया था।

कौशल कुछ क्षण उसको ऐसे ही सपाट नजरों से देखती रही। फिर बोली, “बाबू, तुम चले जाओ।”

“कौशल, यह क्या कह रही हो ?” आनन्द कौशल के मुँह से यह सुनकर थोड़ा नाराज हुआ।

“हाँ बाबू। पुलिस को तुम पर शक हो गया है। आज सुबह ही घर पर दो फिरंगी सिपाही आए थे। तुम्हें ही पूछ रहे थे। हमें बोले कि तुमने बागी को घर में पनाह दी है।”

“फिर ?” आनन्द को अब समझ में आया कि कौशल ऐसा रूखा व्यवहार क्यों कर रही थी।

“गांव वालों के कहने-सुनने से वह सुबह तो चले गए। मगर सुना है, वे अभी भी गांव में ही कहीं घूम रहे हैं। अच्छा हुआ बाबू, तुम मुझे यहीं मिल गए। घर पहुंच जाते तो राम जाने क्या होता। अब तुम फौरन यहाँ से चले जाओ।”

आनन्द कुछ नहीं बोला। वह सोच रहा था कि कितने चतुर हैं ये फिरंगी। एक तरफ अखबार में किसी जँगली जानवर द्वारा आनन्द के मारे जाने की खबर निकलवाते हैं और दूसरी तरफ छुप-छुपकर जासूसी भी कर रहे हैं।

आनन्द ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि वह दो दिन पहले ही गाँव से निकल कर जय नगर की तरफ चला गया था।

और कौशल सोच रही थी कि आनन्द बड़े जिद्दी स्वभाव का है। अभी भी खड़ा सोच ही रहा है। वह इस सूचना को हल्के में ले रहा है शायद। उसके इरादों से अनजान वह शंकित हो रही थी। उसे डर लगने लगा था कि आनन्द कहीं जिद पकड़कर गाँव में और फिर घर की तरफ न चल दे। वह गिड़गिड़ाकर बोली, “भगवान के लिए तुम अभी यहाँ से चले जाओ।”

फिर भी आनन्द को सोच में पड़ा देख वह बिल्कुल नर्वस हो गई और बोली, “मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ बाबू। अभी तो तुम यहाँ से चले जाओ। फिर किसी दिन आ जाना। बाबू, तुम्हें मेरी कसम।” एकाएक कौशल ने मुँह फिरा लिया। शायद वह अपने चेहरे के भाव आनन्द को दिखाना नहीं चाहती थी या उसे लग रहा था कि वह आनन्द को अपने घर जाने से मना करके कुछ गलत कर रही है।

आनन्द ने भी उसकी इस मनःस्थिति को भाँप लिया था। मगर उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप अपने घोड़े को मोड़ लिया। चलते हुए ही उसने एक बार रुककर कौशल की तरफ मुड़कर देखा।

कौशल अभी वहीं खड़ी थी। वह भी पलटकर आनन्द को देख रही थी। कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को यूँ ही देखते रहे। आखिर आनन्द ने ही पुनः कहा, “हरपाल को नेताजी के उसी अड्डे पर भेजना जहां हम तीनों गए थे। मैं अब वहीं जा रहा हूँ।”

आनन्द ने बिना किसी उत्तर का इंतज़ार किए अपने घोड़े को टिटकारी दी और तेजी से दौड़ चला।

पीछे से उसके कानों में कौशल का यह उत्तर पड़ा था, “वह तो फौज में चले गए हैं। भैया की छुट्टियां खत्म हो गई थीं।”

आनन्द ने फिर दुबारा मुड़कर नहीं देखा।

आगे चलते-चलते उसे याद आया कि सरदार ने उसे एक बेतार का यंत्र दिया था, जिसमें कोई ट्रांसमीटर काम करता था, उससे कभी-भी सरदार से छोटी-मोटी बात की जा सकती थी। आनन्द ने उसे अपने थैले में ढूंढा। बेतार का वह यंत्र उसे नहीं मिला। वह शायद एक अलग थैले में रख दिया गया था, और वह थैला नवाब के सामान में गलती से रख दिया गया था, जो अब नवाब के पास पहुंचने पर ही मिल सकता था।

उस बेतार यंत्र के याद आते ही आनन्द की बेचैनी बढ़ गई। नए हालात में उसे सरदार से अभी बात करना बहुत ज़रूरी लगा। उसने घोड़े को तेज दौड़ाने के लिए ऐड़ लगाई। घोड़ा तेजी से दौड़ने लगा।

* * *

धीरजगढ़ का रेलवे जंक्शन…।

धीरजगढ़ से आगे लाइन पर जाने वाली गाड़ियों के लिए कई लाइनें हैं जैसे कि हर जंक्शन पर होती हैं। यहाँ से एक लाइन मथुरा को होकर आगे निकल गई है। एक और लाइन गई है जयनगर के लिए। तीसरी लाइन बदायूँ को होकर आगे फिर बरेली आदि की तरफ निकल जाती हैं और एक लाइन इसी लाइन से उत्तर-पश्चिम की तरफ चली जाती है।

उत्तर-पश्चिम की ओर जाने वाली इसी लाइन पर एक मालगाड़ी खड़ी थी। इस गाड़ी में गेहूं, फौजी कुमुक रसद व कपड़ा आदि लदे थे। अभी इस गाड़ी के चलने में काफी समय प्रतीत होता था क्योंकि यहाँ से भी माल लादा ही जा रहा था।

तभी स्टेशन पर एक तरफ से पैंतीस-चालीस आदमियों का एक जत्था आ गया। ये सब सादे कपड़ों में थे। इसी जत्थे के साथ सीनियर इंस्पेक्टर श्यामनारायण और सीआईडी की स्पेशल ब्रांच के अधिकारी बॉब रिक्सन भी थे। रेलवे की खुफिया एजेंसी का भी अलग से प्रबंध था।

मालगाड़ी में सामान लादा जा रहा था। समय लग रहा था।

इसी दौरान श्यामनारायण ने रिक्सन से सलाह-मशविरा किया। इसके बाद श्यामनारायण ने अपने दस्ते से एक-एक करके आदमी को बुलाया और प्रत्येक को उसका काम समझाकर मालगाड़ी में यथास्थान छिपा दिया गया। उन सबको एक साथ ही बागियों पर हमला करने के लिए आदेश के रूप में एक सिग्नल बता दिया गया था।

आज बीच के एक स्थान पर मालगाड़ी को बागियों द्वारा लूटे जाने की आशंका थी। इस बारे में इन अधिकारियों को बागियों के एक मुखबिर से खबर प्राप्त हुई थी। यह सब तैयारी बागियों (क्रांतिकारियों) के मुकाबला करने के लिए की जा रही थी।
 
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