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[आठ]
लगभग एक सप्ताह ही होने को आ गया था। आनन्द अब बहुत स्वस्थ हो चुका था। चलने-फिरने लगा था। आनन्द या कौशल के साथ उनके खेतों पर आने-जाने लगा था। उन लोगों के मना करने के बावजूद वह थोड़ा-बहुत मेहनत-मशक्कत का काम भी करने लग गया था।
सुबह का वक़्त था।
नाश्ते आदि से निबटकर उनमें बातें हुईं और एक योजना के मुताबिक हरपाल ने आनंद को अपने दल से मिलाने का प्रस्ताव रखा। आनन्द ने भी स्वीकार कर लिया था। दोनों चलने को उद्यत ही थे कि कौशल भी कपड़े बदल कर आ गई। हरपाल ने पूछा, “हम बाहर जा रहे हैं। तू ऐसे में घर से बाहर कहाँ जा रही है ?”
कौशल ने हरपाल को देखा, मुस्कराईं। फिर देखा आनंद को, बोली, “मैं भी तो चलूँगी।”
“कहाँ ?” हरपाल ने माथे पर बल लाकर कहा।
“तुम्हारे साथ।” कहकर वह शरारतपूर्ण ढंग से मुस्कराईं।
हरपाल और आनन्द ने उसे आश्चर्य से देखा।
“मैं जानती हूँ कि तुम कहाँ जा रहे हो ? मैं भी साथ चलूँगी।”
हरपाल जानता था कि कौशल जिद्दी लड़की है। मानेगी नहीं। यदि नाराज हो गई तो उनका भी जाना मुश्किल कर देगी। हरपाल ने पराजय के से स्वर में कहा, “अच्छा बाबा, अच्छा। मगर हमारे साथ तुम…। ठीक नहीं है।”
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। पहले तुम लोग जाओ। बाद में चली आऊंगी। गणेश जी के मंदिर के पास रुककर दस-पंद्रह मिनट मेरा इंतज़ार करना।”
वे लोग चलने को हुए ही थे कि आ गए पटवारी जी। आनन्द मन ही मन झुंझला गया था मगर प्रकट में कुछ कहा नहीं। हरपाल की सूरत भी उस समय देखने लायक थी।
दरवाजा पार करके पटवारी जी हँसे और वहीं से बोले, “दोनों साथ हो।” फिर एक हाथ में पकड़े अखबार को दूसरे हाथ की हथेली पर मारते हुए बोले, “भई आनन्द बाबू, अब कैसे हो ?”
“अब तो काफी अच्छा हूँ। आइए, बैठिए।” बनावटी मुस्कान से आनन्द ने उनका स्वागत किया।
हरपाल ने भी छेड़ने के अंदाज़ से कहा, “आज क्या खबर लाए हैं पटवारी जी ?”
“पूछो मत हरपाल।” पटवारी जी खुशी से किलक कर बोले, “मुँह मीठा कराओ तो सुनाऊँ।”
उन्होंने सोचा — ज़रूर कोई अच्छी खबर लाए हैं पटवारी जी। हरपाल ने खुशामद की। पटवारी जी ने नखरे दिखाए। खैर, कौशल के कहने पर फैसला हुआ।
“बिटिया के कहने पर मान जाता हूँ। सुनो — कल कोई नवाब जहूर नाम का डाकू जेल तोड़कर भाग निकला। वार्डन ने जो झाँककर कोठरी में देखा तो खाली थी। मगर दरवाज़ा ज्यों का त्यों बन्द…हैंय।”
आनन्द को पटवारी जी से यह सूचना सुनकर एक सुखद झटका-सा लगा। वह खुशी से नाच उठना चाहता था मगर उसने अपने भावों पर काबू कर लिया। वह अब गौर से पटवारी जी की बातें सुनने लगा।
पटवारी जी कह रहे थे, “पट्ठा डाकू है और बढ़िया तालातोड़ भी। क्या सफाई से ताला बंद भी कर गया और पहरे पर खड़े वार्डनों का गला घोंट गया। और इससे भी बड़ा गज़ब यह है कि सीधा पहुँचा कलेक्टर ग्रीन के यहाँ…और साले को सरेआम गोली मारकर रफूचक्कर भी हो गया। भई, यह नवाब है शेर आदमी।”
सबने नवाब के लिए तालियाँ बजाई।
“एक और सुनो।” पटवारी जी का लहज़ा इस प्रकार था, जैसे कोई कथावाचक पण्डित कथा बांच रहे हों। और इस प्रकार वह सुनने वालों पर पुण्य का एहसान कर रहा हो। यह उनका हंसोड़ स्टाइल था, “धीरजगढ़ में ही…गोखले स्मारक से कुछ दूर पर दो कारों को खाई में धकेल कर जला दिया गया। इन दोनों कारों में से एक में स्पेशल सी.आई.डी. ब्रांच के लिए दिल्ली से एक स्पेशल तौर पर ऑफिसर आया था और दूसरी में उसके साथी कर्मचारी, जो उसे स्टेशन से रिसीव करके ला रहे थे।”
“ऐंय।” यह खबर सुनकर सब चौंके।
पटवारी जी किसी खबरनवीस की तरह बोले जा रहे थे, “बताया जा रहा है कि इस ऑफिसर की नियुक्ति बड़े गुप्त तरीके से हुई थी और बड़े ही गुप्त ढंग से वह आया था। मगर क्रांतिकारियों को न जाने कैसे खबर लग गई और दिन दहाड़े यह कांड कर डाला। भई वाह, कई दिन बाद अब जायका बदला है।”
“हाँ, यह तो बड़ी तारीफ के काबिल कार्य किया क्रांतिकारियों ने।” आनन्द बोला, “वाकई।”
पटवारी जी अब अपनी पूरी फॉर्म में आ चुके थे। किसी लीडर की तरह भाषण देने के अंदाज़ में बोले, “मैं कहता हूँ भाइयों, कमर कस कर खड़े हो जाओ। अपने देश को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करो। मारो या मरो। गांधी जी भी तो यही कहते हैं — हमें स्वराज्य लेना होगा। वह हमें माँगने से कभी नहीं मिलेगा। मैं भी कहता हूँ — करो या मरो। या…”
“बस…बस…बस आपने तो आज बहुत अच्छा भाषण दे डाला। यह भी याद रखो कि दीवारों के भी कान होते हैं पटवारी जी।” हँसते हुए हरपाल ने पटवारी जी की तूफानमेल जैसी बोलने की गति को एकदम रोक दिया, “काश ! आप तो गांधी बाबा की किसी शहर की टोली के लीडर होते।”
“भई मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मेरी बात में दम है। अब कल की ही बात है। एक किताब हाथ लग गई। भई किताब क्या, मेरी याद की ही बात है। बम्बई में मरते वक्त लोकमान्य तिलक ने कहा था — ‘यदि स्वराज्य न मिला तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता। स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिए बहुत ज़रूरी है।’ और मैं कहता हूँ स्वराज्य क्रांति के बिना थोड़े ही मिलने वाला है। गाँधी बाबा तो ऐसे ही…भोले भंडारी हैं बस…कि क्या कहूँ।”
आनन्द उनकी इस बात को बड़े ध्यान से सुनने लगा, “भगत सिंह आज़ाद, जो आज क्रान्तिकारियों के लिए अच्छे आदर्श हैं, उन्होंने भी कहा था — ‘मनुष्यों का खून बहाने के लिए हमें दुःख है पर क्या करें। क्रांति के लिए खून बहाना ज़रूरी है। हमारा मकसद ऐसी क्रांति है जो मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के शोषण को खत्म करके छोड़ेगी।” पटवारी कहते-कहते रुके। थोड़ा विचलित हुए और बोले, “पर नहीं, ठहरो। यह तो शायद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा था।”
फिर…फिर इसी तरह की कुछ बातों के बाद पटवारी जी ने पीछा छोड़ा और चले गए।
दोपहर हो गई थी। काफी तेज धूप पड़ने लगी थी। लगभग ग्यारह बजे का समय होगा। आनन्द और हरपाल तुरन्त घर से निकल पड़े।
हरपाल और आनन्द धीरे-धीरे गाँव से निकल गए थे और एक पगडंडी पर चलने लगे थे कि तभी एक तरफ से आवाज़ आई, “अरे भाई, फौजी बाबू।”
हरपाल ने मुड़कर आवाज़ की दिशा में देखा। खेतों में पानी ले जाने वाली नाली पर चलता हुआ एक आदमी उनकी तरफ आ रहा था। वह रुक गया। आनन्द ने उससे पूछा, “हरपाल जी, यह कौन है ?”
“है एक…अपने गाँव का ही परिचित।”
वह आदमी पास आ गया था, “जय राम जी की।”
“जय राम जी की।” हरपाल और आनन्द ने लगभग साथ ही साथ कहा था।
वह आदमी हरपाल से बातें करने लगा। आनन्द से वह परिचित ही न था। मगर इससे आनन्द उकता रहा था। वह ऐसे ही इधर-उधर देखने लगा था।
उस आदमी का बोलने का ढंग झगड़ने जैसा था। हरपाल ने बड़ा कह-सुनकर उसे शांत किया और उससे कहा, “इस वक़्त कुछ ज़रूरी काम है भाई, चलता हूँ। लौटकर तुमसे ज़रूर मिलूँगा। तुम नाराज न होओ। अपने गाँव वालों से कैसी बेरुखी ?”
वे दोनों आगे बढ़कर मंदिर के पास जाकर रुक गए। कुछ देर खड़े कौशल के आने का इंतज़ार करते रहे। दोनों ही इस समय चुप-चुप थे। कुछ देर बाद हरपाल ही बोला, “कौशल तो अभी तक नहीं आई। क्या अब चल दें ?”
“जरा और देख लें। नहीं तो तुम्हारा ही सिर खाएगी।”
आनन्द की बात पर हरपाल हँस पड़ा, “हाँ, सयानी बिल्ली है यह लड़की।”
लगभग एक सप्ताह ही होने को आ गया था। आनन्द अब बहुत स्वस्थ हो चुका था। चलने-फिरने लगा था। आनन्द या कौशल के साथ उनके खेतों पर आने-जाने लगा था। उन लोगों के मना करने के बावजूद वह थोड़ा-बहुत मेहनत-मशक्कत का काम भी करने लग गया था।
सुबह का वक़्त था।
नाश्ते आदि से निबटकर उनमें बातें हुईं और एक योजना के मुताबिक हरपाल ने आनंद को अपने दल से मिलाने का प्रस्ताव रखा। आनन्द ने भी स्वीकार कर लिया था। दोनों चलने को उद्यत ही थे कि कौशल भी कपड़े बदल कर आ गई। हरपाल ने पूछा, “हम बाहर जा रहे हैं। तू ऐसे में घर से बाहर कहाँ जा रही है ?”
कौशल ने हरपाल को देखा, मुस्कराईं। फिर देखा आनंद को, बोली, “मैं भी तो चलूँगी।”
“कहाँ ?” हरपाल ने माथे पर बल लाकर कहा।
“तुम्हारे साथ।” कहकर वह शरारतपूर्ण ढंग से मुस्कराईं।
हरपाल और आनन्द ने उसे आश्चर्य से देखा।
“मैं जानती हूँ कि तुम कहाँ जा रहे हो ? मैं भी साथ चलूँगी।”
हरपाल जानता था कि कौशल जिद्दी लड़की है। मानेगी नहीं। यदि नाराज हो गई तो उनका भी जाना मुश्किल कर देगी। हरपाल ने पराजय के से स्वर में कहा, “अच्छा बाबा, अच्छा। मगर हमारे साथ तुम…। ठीक नहीं है।”
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। पहले तुम लोग जाओ। बाद में चली आऊंगी। गणेश जी के मंदिर के पास रुककर दस-पंद्रह मिनट मेरा इंतज़ार करना।”
वे लोग चलने को हुए ही थे कि आ गए पटवारी जी। आनन्द मन ही मन झुंझला गया था मगर प्रकट में कुछ कहा नहीं। हरपाल की सूरत भी उस समय देखने लायक थी।
दरवाजा पार करके पटवारी जी हँसे और वहीं से बोले, “दोनों साथ हो।” फिर एक हाथ में पकड़े अखबार को दूसरे हाथ की हथेली पर मारते हुए बोले, “भई आनन्द बाबू, अब कैसे हो ?”
“अब तो काफी अच्छा हूँ। आइए, बैठिए।” बनावटी मुस्कान से आनन्द ने उनका स्वागत किया।
हरपाल ने भी छेड़ने के अंदाज़ से कहा, “आज क्या खबर लाए हैं पटवारी जी ?”
“पूछो मत हरपाल।” पटवारी जी खुशी से किलक कर बोले, “मुँह मीठा कराओ तो सुनाऊँ।”
उन्होंने सोचा — ज़रूर कोई अच्छी खबर लाए हैं पटवारी जी। हरपाल ने खुशामद की। पटवारी जी ने नखरे दिखाए। खैर, कौशल के कहने पर फैसला हुआ।
“बिटिया के कहने पर मान जाता हूँ। सुनो — कल कोई नवाब जहूर नाम का डाकू जेल तोड़कर भाग निकला। वार्डन ने जो झाँककर कोठरी में देखा तो खाली थी। मगर दरवाज़ा ज्यों का त्यों बन्द…हैंय।”
आनन्द को पटवारी जी से यह सूचना सुनकर एक सुखद झटका-सा लगा। वह खुशी से नाच उठना चाहता था मगर उसने अपने भावों पर काबू कर लिया। वह अब गौर से पटवारी जी की बातें सुनने लगा।
पटवारी जी कह रहे थे, “पट्ठा डाकू है और बढ़िया तालातोड़ भी। क्या सफाई से ताला बंद भी कर गया और पहरे पर खड़े वार्डनों का गला घोंट गया। और इससे भी बड़ा गज़ब यह है कि सीधा पहुँचा कलेक्टर ग्रीन के यहाँ…और साले को सरेआम गोली मारकर रफूचक्कर भी हो गया। भई, यह नवाब है शेर आदमी।”
सबने नवाब के लिए तालियाँ बजाई।
“एक और सुनो।” पटवारी जी का लहज़ा इस प्रकार था, जैसे कोई कथावाचक पण्डित कथा बांच रहे हों। और इस प्रकार वह सुनने वालों पर पुण्य का एहसान कर रहा हो। यह उनका हंसोड़ स्टाइल था, “धीरजगढ़ में ही…गोखले स्मारक से कुछ दूर पर दो कारों को खाई में धकेल कर जला दिया गया। इन दोनों कारों में से एक में स्पेशल सी.आई.डी. ब्रांच के लिए दिल्ली से एक स्पेशल तौर पर ऑफिसर आया था और दूसरी में उसके साथी कर्मचारी, जो उसे स्टेशन से रिसीव करके ला रहे थे।”
“ऐंय।” यह खबर सुनकर सब चौंके।
पटवारी जी किसी खबरनवीस की तरह बोले जा रहे थे, “बताया जा रहा है कि इस ऑफिसर की नियुक्ति बड़े गुप्त तरीके से हुई थी और बड़े ही गुप्त ढंग से वह आया था। मगर क्रांतिकारियों को न जाने कैसे खबर लग गई और दिन दहाड़े यह कांड कर डाला। भई वाह, कई दिन बाद अब जायका बदला है।”
“हाँ, यह तो बड़ी तारीफ के काबिल कार्य किया क्रांतिकारियों ने।” आनन्द बोला, “वाकई।”
पटवारी जी अब अपनी पूरी फॉर्म में आ चुके थे। किसी लीडर की तरह भाषण देने के अंदाज़ में बोले, “मैं कहता हूँ भाइयों, कमर कस कर खड़े हो जाओ। अपने देश को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करो। मारो या मरो। गांधी जी भी तो यही कहते हैं — हमें स्वराज्य लेना होगा। वह हमें माँगने से कभी नहीं मिलेगा। मैं भी कहता हूँ — करो या मरो। या…”
“बस…बस…बस आपने तो आज बहुत अच्छा भाषण दे डाला। यह भी याद रखो कि दीवारों के भी कान होते हैं पटवारी जी।” हँसते हुए हरपाल ने पटवारी जी की तूफानमेल जैसी बोलने की गति को एकदम रोक दिया, “काश ! आप तो गांधी बाबा की किसी शहर की टोली के लीडर होते।”
“भई मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मेरी बात में दम है। अब कल की ही बात है। एक किताब हाथ लग गई। भई किताब क्या, मेरी याद की ही बात है। बम्बई में मरते वक्त लोकमान्य तिलक ने कहा था — ‘यदि स्वराज्य न मिला तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता। स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिए बहुत ज़रूरी है।’ और मैं कहता हूँ स्वराज्य क्रांति के बिना थोड़े ही मिलने वाला है। गाँधी बाबा तो ऐसे ही…भोले भंडारी हैं बस…कि क्या कहूँ।”
आनन्द उनकी इस बात को बड़े ध्यान से सुनने लगा, “भगत सिंह आज़ाद, जो आज क्रान्तिकारियों के लिए अच्छे आदर्श हैं, उन्होंने भी कहा था — ‘मनुष्यों का खून बहाने के लिए हमें दुःख है पर क्या करें। क्रांति के लिए खून बहाना ज़रूरी है। हमारा मकसद ऐसी क्रांति है जो मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के शोषण को खत्म करके छोड़ेगी।” पटवारी कहते-कहते रुके। थोड़ा विचलित हुए और बोले, “पर नहीं, ठहरो। यह तो शायद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा था।”
फिर…फिर इसी तरह की कुछ बातों के बाद पटवारी जी ने पीछा छोड़ा और चले गए।
दोपहर हो गई थी। काफी तेज धूप पड़ने लगी थी। लगभग ग्यारह बजे का समय होगा। आनन्द और हरपाल तुरन्त घर से निकल पड़े।
हरपाल और आनन्द धीरे-धीरे गाँव से निकल गए थे और एक पगडंडी पर चलने लगे थे कि तभी एक तरफ से आवाज़ आई, “अरे भाई, फौजी बाबू।”
हरपाल ने मुड़कर आवाज़ की दिशा में देखा। खेतों में पानी ले जाने वाली नाली पर चलता हुआ एक आदमी उनकी तरफ आ रहा था। वह रुक गया। आनन्द ने उससे पूछा, “हरपाल जी, यह कौन है ?”
“है एक…अपने गाँव का ही परिचित।”
वह आदमी पास आ गया था, “जय राम जी की।”
“जय राम जी की।” हरपाल और आनन्द ने लगभग साथ ही साथ कहा था।
वह आदमी हरपाल से बातें करने लगा। आनन्द से वह परिचित ही न था। मगर इससे आनन्द उकता रहा था। वह ऐसे ही इधर-उधर देखने लगा था।
उस आदमी का बोलने का ढंग झगड़ने जैसा था। हरपाल ने बड़ा कह-सुनकर उसे शांत किया और उससे कहा, “इस वक़्त कुछ ज़रूरी काम है भाई, चलता हूँ। लौटकर तुमसे ज़रूर मिलूँगा। तुम नाराज न होओ। अपने गाँव वालों से कैसी बेरुखी ?”
वे दोनों आगे बढ़कर मंदिर के पास जाकर रुक गए। कुछ देर खड़े कौशल के आने का इंतज़ार करते रहे। दोनों ही इस समय चुप-चुप थे। कुछ देर बाद हरपाल ही बोला, “कौशल तो अभी तक नहीं आई। क्या अब चल दें ?”
“जरा और देख लें। नहीं तो तुम्हारा ही सिर खाएगी।”
आनन्द की बात पर हरपाल हँस पड़ा, “हाँ, सयानी बिल्ली है यह लड़की।”