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मालगाड़ी के प्रत्येक डिब्बे में दो-दो सशस्त्र आदमी छिपा दिए गए। सामान के डिब्बों के साथ अधिक भी थे। कुछ आदमी ड्राइवर के कक्ष में थे और कुछ पीछे गार्ड वाले कक्ष में। इन्हीं के साथ अपने लिए विशेष और उपयुक्त जगहों का चुनाव करके ये दोनों अधिकारी श्यामनारायण और रिक्सन तथा अन्य सहयोगी अधिकारी भी मुस्तैद हो गए थे।
इसी तरह पूर्णतया सुरक्षा का प्रबंध हो जाने के बाद मालगाड़ी ने प्लेटफॉर्म छोड़ा। आगे के लिए उन्होंने अगले स्टेशनों पर भी इसके बारे में सूचनाएं भेज दी थीं। इस समय मालगाड़ी की पूर्ण सुरक्षा और बागियों पर आक्रमण करने के लिए वे पूरी तरह तैयार थे।
बागियों के आक्रमण करने का समय नियत था, और स्थान भी, जो उनकी जानकारी में था। आगे बीच वाले स्टेशनों पर भी मालगाड़ी के गुजर जाने तक आगे-पीछे की गाड़ियों को रोक दिया गया था। इस मुकाबले में भारी हानि होने की आशंका थी।
हर कर्मचारी और अधिकारी पूर्णतया एक भी शब्द सुनने के लिए या देखने के लिए चौकन्ने थे। हाथ हर समय हथियारों पर था।
गाड़ी अपने निश्चित वेग से चली जा रही थी।
बीच में पड़ने वाले छोटे-छोटे दो स्टेशन भी गुजर गए थे। अभी तक किसी किस्म के हमले का कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुआ था।
समय धीरे-धीरे बीतता जा रहा था और दूरी कम होती जा रही थी। जिस स्थान पर आक्रमण की संभावना थी, वह ज्यों-ज्यों पास आता जा रहा था, गाड़ी में मौजूद हर दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। उन लोगों के हाथ अपने-अपने हथियारों पर कसते चले जा रहे थे।
लेकिन वह निश्चित स्थान भी किसी प्रकार की कोई मुश्किल पेश आए बिना निकल गया। निश्चित स्थान पर भी बागियों ने हमला नहीं किया।
* * *
[ग्यारह]
खराब मौसम में…।
पिछली रात को काफी रात बीत गई थी, जब आनन्द अपने साथियों के पास नेताजी के अड्डे पर पहुंचा तो वह हैरान रह गया। वहाँ तो सिर्फ उसके साथी नवाब आदि ही थे। जिनसे मिलाने वह इन लोगों को ले आया था, वे तो वहाँ थे ही नहीं।
नवाब व अन्य सभी साथी उसी खंडहर में डेरा डाले बैठे हुए सुस्ता रहे थे। आनन्द भी एक स्थान पर अपना घोड़ा बांधकर आया और थका-हारा सा वहीं नवाब के पास बैठ गया। उसने पहला प्रश्न यही किया, “नेताजी वगैरह नहीं दिखाई देते। उनका कोई साथी या सामान भी नज़र नहीं आता। क्या कोई मिला तुम्हें ?”
नवाब ने अनभिज्ञता जताई, “जब हम यहाँ पहुँचे, यह खंडहर यूँ ही सुनसान था। यहाँ कोई नहीं था। एक बार को मैंने सोचा, हम भटककर कहीं गलत जगह पर आ गए हैं। मगर फिर मैंने काफी सोच-समझकर यही फैसला किया कि तुम्हारे आने तक इंतज़ार करते हैं और यहीं डेरा डालते हैं।”
“हूँ।” बहुत थका-से स्वर था आनन्द का। तीन दिन से वह लगातार चल रहा था।
नवाब कह रहा था, “कुछ खा-पीकर और आराम करके फिर आगे का देखेंगे। अभी हम लोगों ने खाना बनाया और खाया है। तुम भी कुछ खालो न।”
“हूँ, मंगवाओ।” आनन्द ने इधर-उधर देखा। ईंटों को जोड़कर कुछ चूल्हे बनाए गए थे। उन्हीं पर आनन्द की नज़र चली गई। इन्हीं चूल्हों पर बनाकर रूखी-सूखी रोटी वे लोग खाते थे। कभी गुड़ के साथ, कभी अचार के साथ।
नवाब ने अपने एक आदमी को बुलाया। वह आनन्द के लिए खाना डालने लगा। तब तक आनन्द ने नवाब से वह थैला मांगा जिसमें उसने अपना भी कुछ सामान रखा था। उसी थैले में से ढूँढकर आनन्द ने वह बेतार वाला यंत्र निकाला।
खाना आ गया। आनन्द खाना खाने लगा।
खाना खाने के बीच आनन्द ने बताया, “मुझे यह तो पता है कि नेताजी थोड़े-थोड़े दिन बाद अपने अड्डे बदलते रहते हैं। उनका नियम है कि वे एक जगह कभी ज्यादा दिन नहीं ठहरते। यह हमारे मिशन के लिए ठीक भी है। मगर अभी अचानक वे जगह बदल लेंगे, ऐसा कोई इशारा तो उन्होंने नहीं दिया था। लगता है, अचानक उन्होंने कोई खतरा सूंघ लिया होगा औऱ आनन-फानन में ही यहाँ से निकलना उन्हें सही लगा होगा।”
नवाब और कुछ अन्य साथी भी उनके पास आ बैठे थे। अब वे आनन्द की बात ध्यान से सुन रहे थे।
खाने के बाद आनन्द ने बेतार के यंत्र से सम्पर्क साधा। बड़ी देर में और बड़ी मुश्किल से सम्पर्क स्थापित हो पाया। तब छोटी-सी बात हुई और सम्पर्क फिर टूट गया।
उस समय के यंत्र ऐसे ही थे। मगर तब इनका भी बड़ा सहारा होता था।
बेतार यंत्र को समेटकर फिर से थैले में रखते हुए आनन्द ने नवाब से कहा, “नवाब मुझे नेताजी के दल का पता चल गया है। उनका पड़ाव इस समय उत्तर-पूर्व में कहीं है। तुम फिर यहीं रुको और, मैं उनसे मिलकर आता हूँ।”
“अरे, अभी चल दोगे। अभी तो तुम आए हो और बहुत थके हुए हो।”
“कोई बात नहीं। कभी-कभी ऐसा भी होता है नवाब। जिंदगी इम्तहान लेती है।” कहकर आनन्द फीकी-सी हँसी हँसा, “सरदार से मेरी बात हुई है। वे कह रहे हैं कि किसी ने उनकी खुफियागिरी की थी। इसलिए वे यहाँ से निकल भागे।”
“ओह !” नवाब को आश्चर्य नहीं हुआ, बल्कि वह मुस्कराया।
“उधर, गांव वालों से उन्हें खबर मिल गई है कि खुफियागिरी के बाद छापा मारकर पुलिस निराश होकर वहाँ से जा चुकी है। अतः दो-एक दिन यहाँ अब कोई नहीं फटकेगा। तुम लोग यहाँ बेफिक्र होकर रुक सकते हो। मैं तुरन्त जाता हूँ और तुरन्त लौटकर आता हूँ क्योंकि नया खतरा आने से पहले ही हमें यह जगह छोड़ देनी है।”
आनन्द लपक कर आगे बढ़ा। चलने से पहले उसने सबसे हाथ मिलाए। जाकर उसने अपना घोड़ा खोला। तुरन्त उसकी पीठ पर सवार हुआ औऱ चल पड़ा।
रात काफी जा चुकी थी। आधी रात का समय रहा होगा। आसमान काला नज़र आ रहा था। लगता था बारिश होने के आसार हैं मगर अभी बहुत देर से हो भी नहीं रही थी।
ऐसे में झाड़ियों और फसलों भरे खेतों के बीच से होता हुआ आनन्द सुनसान रास्ते पर अकेला ही बढ़ रहा था। रात के सन्नाटे के साथ-साथ मेंढक और झींगुरों की आवाजों का शोर भी वातावरण में गूंज रहा था।
आनन्द अपने घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा था। वह शीघ्र नेताजी के नए पड़ाव तक पहुँच जाना चाहता था। वह सोचता जा रहा था, मगर उसके आँख और कान पूरी तरह सजग थे।
एक बात जो सरदार ने उसे बताई थी, वह उसने नवाब को नहीं बताई थी, वह यह थी कि इस बार पत्रकार लता के पिता ओंकारनाथ ने उनकी मुखबिरी की थी। उधर लता वहाँ रोज-रोज आने लगी थी। अब सरदार उससे भी पीछा छुड़ाना चाहते थे।
उसने यह बात नवाब से इसलिए छिपा ली थी कि अभी वे इस क्षेत्र में नए ही थे और ऐसी खबर सुनकर उनका मनोबल गिर सकता था।
आनन्द इसी विषय में सोचता जा रहा था। लता का भोला मासूम-सा चेहरा उसकी आँखों में उतर आया था। वह सोचने लगा — क्या अकेले उसके पिता ने ही यह धोखा किया है या लता की भी इसमें सहमति है ?
उसे लगा — नहीं, लता नौजवान है, क्रांतिकारियों के प्रति भावुक है और देशप्रेमी है। उसने ऐसा नहीं किया होगा। लेकिन यह हो सकता है कि ओंकारनाथ ने यह इसलिए किया हो कि क्रांति-दल पकड़ा जाएगा तो उसकी इकलौती बेटी निरुपाय होकर घर बैठ जाएगी। दीवानों की तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के लिए घर से गायब न रहेगी।
इससे भविष्य में उनकी बेटी की वजह से जो बदनामी होने वाली है, वह न होगी। मगर लता की वजह से उन पर तो यह नई मुसीबत आ गई। आनन्द को उस पल तो रह-रहकर लता पर ही गुस्सा आ रहा था। वह अब लता के बारे में ही सोचने लगा था।
एकाएक पास ही की झाड़ी से किसी उनींदे पक्षी के पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आई। आनन्द का ध्यान लता से हट गया औऱ उसे ऐसी ही एक पुरानी घटना याद आ गई तो वह हँस पड़ा।
तुरन्त उसके दिमाग में कौशल का चेहरा तैर गया।
कुछ देर यूँ ही तैरता रहा। फिर स्वतः वह चेहरा किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह भाव बदलने लगा। कभी वह चेहरा जिस पर करुणा का भाव था, कभी हल्का-सा क्रोधित चेहरा, कभी भयभीत चेहरा, तो कभी मूक प्यार की चमक लिए, कभी शरारती ढंग से मुस्कराता चेहरा उसके सामने आ रहा था।
धीरे-धीरे सब चेहरे सिमटते चले गए। आनन्द सोचने लगा — यह कौशल क्यों चाहे-अनचाहे उसके दिमाग में उतरती जा रही है ? उसने स्वयं से प्रश्न किया — क्या इसलिए कि वह पहली बार लड़की के सम्पर्क में रहा है ? हाँ शायद यही सच है। उसकी तो कोई बहन भी नहीं थी। उसने कोई मुंहबोली बहन भी नहीं बनाई। तो क्या यह बहन-भाई वाले प्रेम का आकर्षण है या वह स्त्री-सौंदर्य के आकर्षण में फंस गया है ?
इसी तरह पूर्णतया सुरक्षा का प्रबंध हो जाने के बाद मालगाड़ी ने प्लेटफॉर्म छोड़ा। आगे के लिए उन्होंने अगले स्टेशनों पर भी इसके बारे में सूचनाएं भेज दी थीं। इस समय मालगाड़ी की पूर्ण सुरक्षा और बागियों पर आक्रमण करने के लिए वे पूरी तरह तैयार थे।
बागियों के आक्रमण करने का समय नियत था, और स्थान भी, जो उनकी जानकारी में था। आगे बीच वाले स्टेशनों पर भी मालगाड़ी के गुजर जाने तक आगे-पीछे की गाड़ियों को रोक दिया गया था। इस मुकाबले में भारी हानि होने की आशंका थी।
हर कर्मचारी और अधिकारी पूर्णतया एक भी शब्द सुनने के लिए या देखने के लिए चौकन्ने थे। हाथ हर समय हथियारों पर था।
गाड़ी अपने निश्चित वेग से चली जा रही थी।
बीच में पड़ने वाले छोटे-छोटे दो स्टेशन भी गुजर गए थे। अभी तक किसी किस्म के हमले का कोई चिन्ह प्रकट नहीं हुआ था।
समय धीरे-धीरे बीतता जा रहा था और दूरी कम होती जा रही थी। जिस स्थान पर आक्रमण की संभावना थी, वह ज्यों-ज्यों पास आता जा रहा था, गाड़ी में मौजूद हर दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। उन लोगों के हाथ अपने-अपने हथियारों पर कसते चले जा रहे थे।
लेकिन वह निश्चित स्थान भी किसी प्रकार की कोई मुश्किल पेश आए बिना निकल गया। निश्चित स्थान पर भी बागियों ने हमला नहीं किया।
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[ग्यारह]
खराब मौसम में…।
पिछली रात को काफी रात बीत गई थी, जब आनन्द अपने साथियों के पास नेताजी के अड्डे पर पहुंचा तो वह हैरान रह गया। वहाँ तो सिर्फ उसके साथी नवाब आदि ही थे। जिनसे मिलाने वह इन लोगों को ले आया था, वे तो वहाँ थे ही नहीं।
नवाब व अन्य सभी साथी उसी खंडहर में डेरा डाले बैठे हुए सुस्ता रहे थे। आनन्द भी एक स्थान पर अपना घोड़ा बांधकर आया और थका-हारा सा वहीं नवाब के पास बैठ गया। उसने पहला प्रश्न यही किया, “नेताजी वगैरह नहीं दिखाई देते। उनका कोई साथी या सामान भी नज़र नहीं आता। क्या कोई मिला तुम्हें ?”
नवाब ने अनभिज्ञता जताई, “जब हम यहाँ पहुँचे, यह खंडहर यूँ ही सुनसान था। यहाँ कोई नहीं था। एक बार को मैंने सोचा, हम भटककर कहीं गलत जगह पर आ गए हैं। मगर फिर मैंने काफी सोच-समझकर यही फैसला किया कि तुम्हारे आने तक इंतज़ार करते हैं और यहीं डेरा डालते हैं।”
“हूँ।” बहुत थका-से स्वर था आनन्द का। तीन दिन से वह लगातार चल रहा था।
नवाब कह रहा था, “कुछ खा-पीकर और आराम करके फिर आगे का देखेंगे। अभी हम लोगों ने खाना बनाया और खाया है। तुम भी कुछ खालो न।”
“हूँ, मंगवाओ।” आनन्द ने इधर-उधर देखा। ईंटों को जोड़कर कुछ चूल्हे बनाए गए थे। उन्हीं पर आनन्द की नज़र चली गई। इन्हीं चूल्हों पर बनाकर रूखी-सूखी रोटी वे लोग खाते थे। कभी गुड़ के साथ, कभी अचार के साथ।
नवाब ने अपने एक आदमी को बुलाया। वह आनन्द के लिए खाना डालने लगा। तब तक आनन्द ने नवाब से वह थैला मांगा जिसमें उसने अपना भी कुछ सामान रखा था। उसी थैले में से ढूँढकर आनन्द ने वह बेतार वाला यंत्र निकाला।
खाना आ गया। आनन्द खाना खाने लगा।
खाना खाने के बीच आनन्द ने बताया, “मुझे यह तो पता है कि नेताजी थोड़े-थोड़े दिन बाद अपने अड्डे बदलते रहते हैं। उनका नियम है कि वे एक जगह कभी ज्यादा दिन नहीं ठहरते। यह हमारे मिशन के लिए ठीक भी है। मगर अभी अचानक वे जगह बदल लेंगे, ऐसा कोई इशारा तो उन्होंने नहीं दिया था। लगता है, अचानक उन्होंने कोई खतरा सूंघ लिया होगा औऱ आनन-फानन में ही यहाँ से निकलना उन्हें सही लगा होगा।”
नवाब और कुछ अन्य साथी भी उनके पास आ बैठे थे। अब वे आनन्द की बात ध्यान से सुन रहे थे।
खाने के बाद आनन्द ने बेतार के यंत्र से सम्पर्क साधा। बड़ी देर में और बड़ी मुश्किल से सम्पर्क स्थापित हो पाया। तब छोटी-सी बात हुई और सम्पर्क फिर टूट गया।
उस समय के यंत्र ऐसे ही थे। मगर तब इनका भी बड़ा सहारा होता था।
बेतार यंत्र को समेटकर फिर से थैले में रखते हुए आनन्द ने नवाब से कहा, “नवाब मुझे नेताजी के दल का पता चल गया है। उनका पड़ाव इस समय उत्तर-पूर्व में कहीं है। तुम फिर यहीं रुको और, मैं उनसे मिलकर आता हूँ।”
“अरे, अभी चल दोगे। अभी तो तुम आए हो और बहुत थके हुए हो।”
“कोई बात नहीं। कभी-कभी ऐसा भी होता है नवाब। जिंदगी इम्तहान लेती है।” कहकर आनन्द फीकी-सी हँसी हँसा, “सरदार से मेरी बात हुई है। वे कह रहे हैं कि किसी ने उनकी खुफियागिरी की थी। इसलिए वे यहाँ से निकल भागे।”
“ओह !” नवाब को आश्चर्य नहीं हुआ, बल्कि वह मुस्कराया।
“उधर, गांव वालों से उन्हें खबर मिल गई है कि खुफियागिरी के बाद छापा मारकर पुलिस निराश होकर वहाँ से जा चुकी है। अतः दो-एक दिन यहाँ अब कोई नहीं फटकेगा। तुम लोग यहाँ बेफिक्र होकर रुक सकते हो। मैं तुरन्त जाता हूँ और तुरन्त लौटकर आता हूँ क्योंकि नया खतरा आने से पहले ही हमें यह जगह छोड़ देनी है।”
आनन्द लपक कर आगे बढ़ा। चलने से पहले उसने सबसे हाथ मिलाए। जाकर उसने अपना घोड़ा खोला। तुरन्त उसकी पीठ पर सवार हुआ औऱ चल पड़ा।
रात काफी जा चुकी थी। आधी रात का समय रहा होगा। आसमान काला नज़र आ रहा था। लगता था बारिश होने के आसार हैं मगर अभी बहुत देर से हो भी नहीं रही थी।
ऐसे में झाड़ियों और फसलों भरे खेतों के बीच से होता हुआ आनन्द सुनसान रास्ते पर अकेला ही बढ़ रहा था। रात के सन्नाटे के साथ-साथ मेंढक और झींगुरों की आवाजों का शोर भी वातावरण में गूंज रहा था।
आनन्द अपने घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा था। वह शीघ्र नेताजी के नए पड़ाव तक पहुँच जाना चाहता था। वह सोचता जा रहा था, मगर उसके आँख और कान पूरी तरह सजग थे।
एक बात जो सरदार ने उसे बताई थी, वह उसने नवाब को नहीं बताई थी, वह यह थी कि इस बार पत्रकार लता के पिता ओंकारनाथ ने उनकी मुखबिरी की थी। उधर लता वहाँ रोज-रोज आने लगी थी। अब सरदार उससे भी पीछा छुड़ाना चाहते थे।
उसने यह बात नवाब से इसलिए छिपा ली थी कि अभी वे इस क्षेत्र में नए ही थे और ऐसी खबर सुनकर उनका मनोबल गिर सकता था।
आनन्द इसी विषय में सोचता जा रहा था। लता का भोला मासूम-सा चेहरा उसकी आँखों में उतर आया था। वह सोचने लगा — क्या अकेले उसके पिता ने ही यह धोखा किया है या लता की भी इसमें सहमति है ?
उसे लगा — नहीं, लता नौजवान है, क्रांतिकारियों के प्रति भावुक है और देशप्रेमी है। उसने ऐसा नहीं किया होगा। लेकिन यह हो सकता है कि ओंकारनाथ ने यह इसलिए किया हो कि क्रांति-दल पकड़ा जाएगा तो उसकी इकलौती बेटी निरुपाय होकर घर बैठ जाएगी। दीवानों की तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के लिए घर से गायब न रहेगी।
इससे भविष्य में उनकी बेटी की वजह से जो बदनामी होने वाली है, वह न होगी। मगर लता की वजह से उन पर तो यह नई मुसीबत आ गई। आनन्द को उस पल तो रह-रहकर लता पर ही गुस्सा आ रहा था। वह अब लता के बारे में ही सोचने लगा था।
एकाएक पास ही की झाड़ी से किसी उनींदे पक्षी के पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आई। आनन्द का ध्यान लता से हट गया औऱ उसे ऐसी ही एक पुरानी घटना याद आ गई तो वह हँस पड़ा।
तुरन्त उसके दिमाग में कौशल का चेहरा तैर गया।
कुछ देर यूँ ही तैरता रहा। फिर स्वतः वह चेहरा किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह भाव बदलने लगा। कभी वह चेहरा जिस पर करुणा का भाव था, कभी हल्का-सा क्रोधित चेहरा, कभी भयभीत चेहरा, तो कभी मूक प्यार की चमक लिए, कभी शरारती ढंग से मुस्कराता चेहरा उसके सामने आ रहा था।
धीरे-धीरे सब चेहरे सिमटते चले गए। आनन्द सोचने लगा — यह कौशल क्यों चाहे-अनचाहे उसके दिमाग में उतरती जा रही है ? उसने स्वयं से प्रश्न किया — क्या इसलिए कि वह पहली बार लड़की के सम्पर्क में रहा है ? हाँ शायद यही सच है। उसकी तो कोई बहन भी नहीं थी। उसने कोई मुंहबोली बहन भी नहीं बनाई। तो क्या यह बहन-भाई वाले प्रेम का आकर्षण है या वह स्त्री-सौंदर्य के आकर्षण में फंस गया है ?