• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

मेरे हाथ मेरे हथियार /अमित ख़ान

कमाण्डर अब एक छोटी सी पहाड़ी के ऊपर मौजूद था ।

कैमोफ्लाज किट उसने अपने ऊपर डाली हुई थी और वह आगे गये दोनों यौद्धाओं के वापस लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था ।

कमाण्डर जानता था, सबसे पीछे जो दो योद्धा आ रहे थे और जो शायद अभी ‘मंकी हिल’ पर भी नहीं पहुंचे थे, उन्हें अभी उस तक पहुँचने में काफी वक्त था ।

फिलहाल तो उसने हवाम और अबू निदाल को ही अपना शिकार बनाना था ।

मास्टर के हंसिये से कमाण्डर करण सक्सेना की जांघ काफी कट गयी थी । कमाण्डर ने अपनी जांघ पर एक ‘एण्टीसेप्टिक लोशन’ स्प्रे कर लिया, जिससे उसकी जांघ से खून बहना फौरन बंद हो गया ।

फिलहाल इतना ही काफी था ।

☐☐☐

उधर दोनों योद्धा चले जा रहे थे ।

हवाम के हाथ में उस समय अपनी ‘लिजर्ड रिवॉल्वर’ थी ।

जबकि अबू निदाल के हाथ में थी- स्नाइपर राइफल ।

“यहाँ तो कोई नहीं है ।” अबू निदाल क्रेन की भांति अपनी गर्दन इधर-से-उधर घुमाता हुआ बोला ।

“लेकिन उसने हमें काली पहाड़ी के नजदीक ही पहुँचने के लिए बोला था ।”

“हाँ ।”

“फिर वो कहाँ गया ?”

“मालूम नहीं ।”

“मास्टर !” हवाम ने जोर से आवाज लगायी- “मास्टर !”

शान्ति !

कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं ।

“मास्टर !” हवाम और ज्यादा जोर से गला फाड़कर चिल्लाया- “मास्टर कहाँ हो तुम ?”

पहले जैसी ही शांति ।

“कमाल है, बोल ही नहीं रहा ।”

“मुझे तो कुछ गड़बड़ लगती है हवाम भाई !” अबू निदाल बोला ।

“कैसी गड़बड़ ?”

“अब एकदम से क्या कहा जा सकता है ।”

दोनों के चेहरे सुत गये ।

इस बीच निदाल, मास्टर को तलाश करता हुआ काली पहाड़ी से थोड़ा आगे चला गया और वहाँ जाते ही वो चौंका ।

“हवाम, जल्दी यहाँ आओ ।”

हवाम दौड़कर अबू निदाल के नजदीक पहुँचा ।

“क्या हुआ ?”

“ये देखो, यहाँ खून की कुछ बूंदे पड़ी हुई हैं ।” अबू निदाल ने अंगुली से झाड़ियों में एक तरफ इशारा किया ।

हवाम ने देखा, वहाँ सचमुच खून की काफी बूंदे पड़ी हुई थीं ।

“य... यह किसके खून की बूंदें हैं ?” हवाम की आवाज कंपकंपायी- “कहीं कमाण्डर ने मास्टर को भी तो नहीं मार डाला ?”

“क्या कहा जा सकता है ।”

खून की वो बूंदे काफी दूर तक गिरती चली गयी थीं ।

वह दोनों खून की बूंदों का पीछा करते हुए झाड़ियों में घुसते चले गये । झाड़ियों में थोड़ा अंदर जाते ही उन्हें मास्टर की खून में बुरी तरह लथपथ लाश नजर आ गयी ।

“तौबा !” अबू निदाल के जिस्म में तेज सिहरन दौड़ी- “आखिर वही हुआ, जिसका शक था । कमाण्डर करण सक्सेना ने हमारे एक और योद्धा को ठिकाने लगा दिया है ।”

“वो जरूर यहीं कहीं आसपास है ।” हवाम गुर्राया-“ मास्टर ने बताया था कि वो एक ‘कैमोफ्लाज किट’ के नीचे छिपा हुआ है । हमें ऐसी झाड़ियों को तलाश करना चाहिये, जो बनावटी नजर आयें ।”

दोनों बिल्कुल अलग-अलग दिशा में झाड़ियों को देखते हुए आगे बढ़े ।

दोनों बहुत चौकन्ने थे ।

जरा सी आहट होते ही गोली चलाने के लिए तैयार ।

अबू निदाल झाड़ियों के अंदर कमाण्डर की तलाश करता हुआ अब उस छोटी सी पहाड़ी के करीब पहुंचा, जिस पर वास्तव में ही कमाण्डर छिपा था ।

कमाण्डर बहुत गौर से उसकी एक-एक एक्टिविटी देख रहा था ।

जैसे ही अबू निदाल पहाड़ी के थोड़ा और करीब आया । फौरन कमाण्डर पहाड़ी के ऊपर से ही एकदम चीते की तरह उसके ऊपर झपट पड़ा और अबू निदाल को अपने शिकंजे में इस तरह जकड़ लिया, जैसे गिद्ध अपने शिकार को जकड़ता है । फिर वो अबू निदाल को जकड़े-जकड़े उसे लेकर दौड़ता हुआ पहाड़ी के पीछे पहुँचा ।

अबू निदाल लड़खड़ाकर गिरा ।

उसके पैर की ठोकर एक पत्थर से लगी थी ।

गिरते ही वो कमाण्डर के शिकंजे से आजाद हो गया ।

वह संभलकर खड़ा हुआ और उसने फौरन अपनी ‘स्नाईपर’ राइफल से कमाण्डर की गर्दन के खास प्वाइंट पर गोली चलायी ।

“हवाम !” साथ ही वो गला फाड़कर चिल्लाया- “हवाम, जल्दी यहाँ आओ । यह रहा कमाण्डर करण सक्सेना ।”

कमाण्डर ने अद्वितीय फुर्ती के साथ नीचे झुककर खुद को गोली लगने से बचाया ।

कोल्ट रिवॉल्वर कमाण्डर की उंगुली के गिर्द फिरकनी की तरह घूमी और गोली चली ।

अबू निदाल चीख उठा ।

गोली अबू निदाल की टांग में लगी थी ।

उसने पुनः ‘स्नाइपर’ राइफल से निशाना लगाना चाहा ।

धांय !

तभी कोल्ट रिवॉल्वर से एक शोला और निकला ।

इस मर्तबा गोली अबू निदाल की गर्दन में ठीक उसी खास प्वाइंट पर जाकर लगी, जहाँ अक्सर वो निशाने लगाया करता था । गोली उसकी गर्दन में अंदर ही अंदर घूमती चली गयी ।

दहाड़ा अबू निदाल !

गर्दन धड़ से कटकर एकदम हवा में उछलती चली गयी ।

‘मंकी हिल’ पर शान्ति छा गयी, गहरी शान्ति ।

फिर हवाम के दौड़ते कदमों की आवाज उभरी । अबू निदाल की चीख और गोली चलने की आवाज सुनकर वह उसी तरफ भागा चला आ रहा था । ‘लिजर्ड’ रिवॉल्वर हाथ में पकड़े-पकड़े वह दौड़ता हुआ उसी पहाड़ी के पिछले हिस्से में आ गया ।

सामने ही अबू निदाल की गर्दन कटी लाश पड़ी थी ।

‘स्नाइपर’ राइफल भी उसे काफी दूर झाड़ियों में पड़ी नजर आयी ।

“माई गॉड ।” हवाम के शरीर में तेज सिहरन दौड़ी- “अबू निदाल भी मारा गया । यह सब क्या हो रहा है ।”

वह रिवॉल्वर पकड़े-पकड़े चारों तरफ घूम गया ।

“कमाण्डर करण सक्सेना ।” हवाम जोर से चीखा- “कहाँ हो तुम, सामने आओ ।”

खामोशी !

सन्नाटा !

“सामने क्‍यों नहीं आते तुम ?”

फिर खामोशी ।

कमाण्डर उस समय ‘मलायका टाइगर क्रेक’ छापामारों की तरह पेड़ पर चढ़ा हुआ था और अपने तीसरे शिकार पर हमला करने का कोई मुनासिब मौका ढूंढ रहा था ।

हवाम काफी देर तक उसे जोर-जोर से पुकारता रहा ।

पहले मास्टर और अब अबू निदाल की लाश देखने के बाद वो मानों पागल हो चुका था ।

वह नहीं जानता था, उसका इस तरह कमाण्डर को पुकारना कितना खतरनाक है ।

कमाण्डर ने वहीं पेड़ पर छिपे-छिपे हवाम की खोपड़ी का निशाना लगाना शुरू किया ।

हवाम, जो अभी तक अबू निदाल की लाश के आसपास ही मंडरा रहा था, एकाएक उसे न जाने क्या सूझा कि वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ पहाड़ी के दूसरी तरफ चला गया ।

कमाण्डर समझ न सका, उसे एकाएक क्या हुआ है ।

बहरहाल अब हवाम दिखाई देना बंद हो गया था ।

कमाण्डर फिर भी ‘मलायका टाइगर क्रेक’ छापामारों की तरह पेड़ पर छिपा बैठा रहा और हवाम की किसी अगली हरकत की प्रतीक्षा करने लगा ।

पेड़ पर बैठे-बैठे पुनः उसके ऊपर बेहोशी छाने लगी और कमाण्डर को ऐसा अहसास हुआ, जैसे वो अभी लुढ़ककर नीचे जा गिरेगा ।

उसकी हालत सचमुच काफी खराब थी ।

भूख से अंतड़िया कुलबुला रही थीं और आधे से ज्यादा शरीर खून में नहाया हुआ था । अपने आपको बेहोश होने से बचाये रखने के लिए कमाण्डर ने कंधे के जख्म को थोड़ा और स्प्रिंग ब्लेड से कुरेदा ।

इसके जवाब में पेड़ से काफी सारे पत्ते भी तोड़-तोड़कर खाये और हैवरसेक बैग में से कैन निकालकर पानी भी पिया ।

कमाण्डर की तबियत कुछ संभली ।

परन्तु वो जानता था कि इस प्रकार ज्यादा देर तक काम चलने वाला नहीं है ।

☐☐☐
 
वह न जाने कितनी देर उसी तरह पेड़ पर बैठा रहा ।

एकाएक कमाण्डर बुरी तरह चौंका ।

वो एक ‘लाल घेरा’ था, जो पेड़ की पत्तियों पर इधर-उधर मंडरा रहा था ।

खतरा !

फौरन यही बात कमाण्डर के दिमाग में कौंधी ।

वह जरूर ‘लिजर्ड’ रिवॉल्वर से निकलने वाला लेज़र बीम का लाल घेरा था, जो अब उसे अपने निशाने पर लेना चाहता था । तभी वो लाल घेरा उसकी खोपड़ी पर आकर टिक गया ।

कमाण्डर ने एक सेकण्ड की भी देर न की, फौरन उसने पेड़ से नीचे छलांग लगा दी ।

धांय !

गोली पेड़ के पत्तों के बीच में-से सनसनाती हुई गुजरी ।

कमाण्डर ने पहाड़ी की तरफ देखा, गोली वहीं से चलायी गयी थी ।

उसे पहाड़ी के ऊपर हवाम खड़ा नजर आया ।

जरूर उसने पहले ही कमाण्डर को वहाँ पेड़ पर छिपे देख लिया था और उसे धोखे में रखने के लिए वो जानबूझकर पहाड़ी के पीछे चला गया था । इस वक्त हवाम के हाथ में दो ‘लिजर्ड’ रिवॉल्वर थीं और उन दोनों रिवॉल्वरों में-से लेजर बीम के लाल घेरे निकल रहे थे ।

कमाण्डर अपनी पूरी ताकत के साथ भागा ।

हवाम भी पहाड़ी से दौड़ता हुआ नीचे उतरा और उसके पीछे-पीछे झपटा ।

लेजर बीम के लाल घेरे कमाण्डर को अपने टार्गेट प्वाइंट पर लेने की कोशिश करने लगे ।

कमाण्डर भागता रहा ।

वो सर्प की तरह लहराता हुआ भाग रहा था, ताकि हवाम उसे अपने निशाने पर न ले सके ।

लेजर बीम के लाल घेरे उसका पीछा करते रहे ।

उस समय पूरे ‘मंकी हिल’ पर शान्ति थी । अफ्रीकन गुरिल्लों की कहीं से कोई आवाज सुनायी नहीं पड़ी रही थी, मानों सब अपने-अपने बरूओं में जा छिपे थे ।

तभी कमाण्डर एक लेजर बीम के घेरे में आ गया । हवाम ने फौरन गोली चला दी ।

कमाण्डर चीखता हुआ उछला ।

गोली ठीक उसकी पीठ में जाकर लगी थी और वहीं से खून का फव्वारा छूट पड़ा ।

कमाण्डर फिर भी अपनी पूरी ताकत से भागता रहा ।

हवाम निरंतर उसके पीछे था ।

लेजर बीम बार-बार उसे अपने टार्गेट पर लेने की कोशिश कर रही थी ।

तभी पिट-पिट की कई सारी आवाजें कमाण्डर के कानों में पड़ी और एक के बाद एक कई गोलियां उसकी पीठ पर आकर चिपक गयीं ।

कमाण्डर भागता-भागता स्तब्ध होकर रूक गया ।

सन्न !

‘लिजर्ड’ रिवॉल्वर की विशेषताओं से वो परिचित था । कमाण्डर समझ गया, उसकी पीठ से फिलहाल कुछ बम आकर चिपक चुके हैं । अब हवाम के सिर्फ रिवॉल्वर के स्पेशल पैनल में लगा बटन दबाने की देर थी, फौरन उसके शरीर के चीथड़े बिखर जाते ।

कमाण्डर एकदम हवाम की तरफ पलटा ।

उसने देखा, हवाम स्पेशल पैनल में लगा वो बटन बस दबाने ही जा रहा है ।

फौरन बेपनाह फुर्ती के साथ कोल्ट रिवॉल्वर कमाण्डर की उंगली के गिर्द फिरकनी की तरह घूमी और गोली चली ।

इससे पहले कि हवाम उस बटन को दबा पाता, उसकी खोपड़ी के चीथड़े बिखर गये ।

☐☐☐

‘मंकी हिल’ पर थोड़ी हलचल मची ।

कुछ अफ्रीकन गुरिल्ले अपने-अपने बरुओं से निकलकर चक-चक की आवाज करते हुए इधर-उधर भागे । परन्तु जैसे ही गोली की तेज आवाज हुई, वह फिर झाड़ियों में जा छिपे ।

गुरिल्लों के लिए वह बिल्कुल नया अनुभव था, वह नहीं समझ पा रहे थे कि उनके ‘मंकी हिल’ पर वो सब क्या हो रहा है ।

तब तक माइक और रोनी भी ‘मंकी हिल’ पर पहुँच गये । माइक के हाथ में उस समय बजूका (एंटी टैंक गन) थी, जबकि रोनी के हाथ में 9 एम0एम0 की वह स्पेशल पिस्टल थी, जिसमें साइनाइट बुलेट चलती है ।

गोलियां चलने की आवाज सुनकर उन दोनों के कान भी खड़े हुए ।

“लगता है ।” रोनी बोला- “हमारे साथियों ने कमाण्डर करण सक्सेना को ढूंढ निकाला है और अब उसी से मुठभेड़ हो रही है ।”

“ऐसा ही मालूम होता है ।”

फिर वहाँ पहले जैसी ही खामोशी छा गयी । इतनी जल्दी व्याप्त हुई उस खामोशी ने न जाने क्यों उन दोनों योद्धाओ के दिल में डर पैदा किया ।

“हमें ट्रांसमीटर पर अपने साथियों से मालूम करना चाहिये, आखिर क्या चक्कर है ।”

“ठीक है ।”

रोनी ने फौरन अपनी ट्रांसमीटर रिस्टवॉच की एरिअल नॉब पकड़कर बाहर खींची और फिर एक-एक करके हवाम, अबू निदाल और मास्टर से सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश में जुट गया ।

मगर काफी देर की कोशिशों के बाद भी वो उन तीनों से सम्पर्क करने में कामयाब न हो सका ।

इससे उसके चेहरे पर निराशा घिर आयी ।

“क्या हुआ ?”

“मालूम नहीं, बात कैसे नहीं हो पा रही ।” रोनी की आवाज में कोतूहलता के भाव थे- “ट्रांसमीटर का सिग्नल लगातार दूसरी तरफ रिले हो रहा है, लेकिन तीनों में से कोई भी उसे सुन नहीं रहा ।”

“मुझे तो कुछ गड़बड़ी लगती है रोनी भाई ।” माइक शुष्क स्वर में बोला ।

“कैसी गड़बड़ ?”

“यह तो उनके पास जाने के बाद ही मालूम होगा । वरना पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने ट्रांसमीटर के सिग्नल की तरफ ध्यान न दिया हो ।”

दोनों योद्धा बहुत ज्यादा सस्पैंस में डूबे हुए ‘मंकी हिल’ पर आगे की तरफ बढ़े ।

“वह देखो ।” एकाएक माइक चौंका- “सामने झाड़ियों में मास्टर का हंसिया पड़ा है ।”

“हंसिया ।”

तब तक माइक दौड़ता हुआ झाड़ियों में भी जा पहुँचा और वहाँ पड़ा हंसिया उसने उठा लिया । हंसिया खून से सना हुआ था ।

“मास्टर का हंसिया यहाँ कैसे पड़ा है ?”

“मालूम नहीं ।” माइक ‘हंसिया’ हाथ में लिए-लिए संजीदा स्वर में बोला-“रहस्य हर पल गहराता जा रहा है । पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि मास्टर ने हंसिया अपने से अलग किया हो ।”

रोनी ने दोबारा मास्टर से सम्पर्क स्थापित करने की कौशिश की ।

लेकिन फिर कोई नतीजा न निकला । सिग्नल लगातार दूसरी तरफ रिले हो रहा था, मगर उस सिग्नल को सुनने वाला कोई न था ।

“मुझे तो एक ही बात लगती है ।” रोनी सकुचाये स्वर में बोला ।

“क्या ?”

“जरूर कमाण्डर ने हमारे तीनों साथियों को जान से मार डाला है ।”

“न... नहीं ।” माइक की आवाज कंपकंपायी- “ऐसी अशुभ बात भी अपनी जुब़ान से मत निकालो ।”

“बात अशुभ ज़रूर है, लेकिन सच्चाई से भरी है ।” रोनी बोला- “ख़ासतौर पर अब हंसिया मिलने के बाद शक की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है ।”

☐☐☐
 
फिर रोनी ने ट्रांसमीटर पर ही जैक क्रेमर से सम्पर्क स्थापित किया ।

“हैलो-हैलो !” वह ट्रांसमीटर पर चिल्लाने लगा- “रोनी स्पीकिंग ! रोनी स्पीकिंग ! !”

“यस !” फौरन ही ट्रांसमीटर पर जैक क्रेमर की आवाज सुनायी दी- “क्या बात है रोनी ? क्या रिपोर्ट है ?”

“रिपोर्ट काफी खतरनाक है सर !” रोनी बेहद आंदोलित लहजे में बोला- “माइक और मैं इस समय ‘मंकी हिल’ पर मौजूद हैं तथा हमारे बाकी तीन साथी यौद्धाओं का कहीं कुछ पता नहीं है ।”

“क्या कह रहे हो तुम ?” जैक क्रेमर बुरी तरह चौंका- “वह तीनों कहाँ गायब हो गये ?”

“उनके बारे में कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है । मैं उनसे कई मर्तबा ट्रांसमीटर पर बात करने की कोशिश कर चुका हूँ । मगर कोई रेस्पांस नहीं मिल रहा । यहीं झाड़ियों में हमें मास्टर का खून से सना हुआ हंसिया भी पड़ा मिला । मुझे ऐसा लगता है सर, हमारे तीनों साथी योद्धा कमाण्डर करण सक्सेना की भेंट चढ़ गये हैं ।”

दूसरी तरफ एकाएक बड़ा खौफनाक सन्नाटा छा गया ।

रोनी के आखिरी शब्दों ने दूसरी तरफ भूकम्प ला दिया था ।

“मेरे और माइक के लिए अब आपका क्या आदेश है सर?” रोनी पुनः आंदोलित लहजे में बोला ।

जैक क्रेमर सोचने लगा ।

“तुम दोनों एक काम करो ।”

“कहिये सर !”

“फौरन ‘मंकी हिल’ से वापस बस्ती में लौट आओ ।”

“ल… लेकिन... !”

“बहस नहीं !” जैक क्रेमर गुर्रा उठा- “जो मैं तुमसे कह रहा हूँ, वह करो । दिस इज माई ऑर्डर ! क्विक ! अगर तुम दोनों थोड़ी देर और ‘मंकी हिल’ पर रूके, तो तुम्हारी जान को भी खतरा हो सकता है ।”

“ओके सर, हम अभी वापस लौटते हैं ।”

“गुड !”

रोनी ने ट्रांसमीटर बंद कर दिया ।

“क्या हो गया ?” माइक बोला ।

“जैक क्रेमर साहब ने हमें फौरन वापस बस्ती में लौटने का हुकुम दिया है ।”

“लेकिन क्या ऐसे हालात में हमारा वापस लौटकर जाना मुनासिब होगा ।” माइक बोला- “जबकि हम जानते हैं कि कमाण्डर यहीं कहीं हमारे आसपास मौजूद है ।”

“उन्होंने इसीलिए हमें वापस लौटने के लिए कहा है, क्योंकि वो नहीं चाहते कि हम भी कमाण्डर करण सक्सेना के कहर का निशाना बन जाये ।”

“ओह !” माइक के चेहरे पर वितृष्णा के भाव पैदा हुए- “सचमुच यह हमारे लिए डूब मरने की बात है कि बर्मा के जंगल में घुसे एक अकेले आदमी से हम इस कदर खौफ खाने लगे हैं ।”

तभी वह दोनों चौंके ।

दूर ‘मंकी हिल’ पर किसी के दौड़ने की आवाज आ रही थी ।

ऐसा लग रहा था, जैसे कोई दौड़ता हुआ उसी दिशा में आ रहा हो ।

“य... यह किसके दौड़ने की आवाज है ?” माइक का स्तब्ध स्वर ।

“ऐसा लगता है ।” रोनी बोला- “जैसे कोई चीता दौड़ रहा हो ।”

“चीता ।”

दोनों कुछ देर दौड़ने की आवाज ध्यान से सुनते रहे और फिर झाड़ियों में जा छिपे ।

अगले ही पल वह बुरी तरह चौंके ।

उन्होंने देखा, सामने से कमाण्डर दौड़ता हुआ चला आ रहा है ।

उसका आधे से ज्यादा शरीर खून से लथपथ था । कदम उल्टे-सीधे पड़ रहे थे । इसके अलावा दौड़ता हुआ कमाण्डर ऐसा लग रहा था, जैसे कोई मुर्दा दौड़ रहा हो, जो अभी हवा के एक झोंक से लरजकर नीचे जा गिरेगा ।

स्नाइपर राइफल उस वक्त भी उसके हाथ में थी ।

“यह तो आधे से ज्यादा मरा हुआ है ।” माइक चकित निगाहों से उसकी तरफ देखता हुआ बोला- “इस मरे हुए शेर का शिकार करना कौन सा मुश्किल काम है ।”

“ठीक कह रहे हो ।” रोनी भी कमाण्डर की हालत देखकर उत्साहित हुआ- “इसे तो मैं अभी जहन्नुम पहुँचाता हूँ ।”

रोनी ने वहीं झाड़ियों में छिपे-छिपे फौरन अपनी 9 एम0एम0 की पिस्टल उसकी तरफ तानी और फिर उसकी खोपड़ी का निशाना लगाकर ट्रेगर दबा दिया ।

लेकिन किस्मत भी कमाण्डर के पूरी तरह साथ थी ।

जैसे ही साइनाइट बुलेट उसकी तरफ झपटी, तभी वो लड़खड़ाकर नीचे गिरा । गोली सनसनाती हुई उसके ठीक ऊपर से गुजर गयी ।

गोली चलते ही कमाण्डर खतरा भांप गया ।

वह एकदम झपटकर झाड़ियों में जा छिपा ।

☐☐☐

दुश्मन एक बार फिर आमने-सामने थे ।

झाड़ियो में छिपे हुए ।

“तुमने सही निशाना न लगाकर गड़बड़ कर दी है ।” माइक डरे-डरे लहजे में बोला- “उसकी हालत जख्मी शेर जैसी है, जिसका मुकाबला करना आसान न होगा ।”

“मैंने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी, लेकिन किस्मत भी उस हरामजादे का खूब साथ दे रही है ।”

काश वह दोनों समझ पाते कि खतरा अब उनके बिल्कुल सिर पर मंडरा रहा है ।

कमाण्डर सिर्फ झाड़ियों में छिपा ही नहीं था बल्कि वह फौरन झाड़ियों के अंदर ही अंदर सरसराता हुआ अब बड़ी तेजी से उन दोनों की तरफ ही बढ़ रहा था ।

स्नाइपर राइफल अभी भी उसके हाथ में थी ।

जल्द ही वो बिल्कुल निःशब्द ढंग से उन दोनों के पीछे जा पहुँचा ।

रोनी !

माइक !

दोनों की पीठ अब उसकी तरफ थी ।

कमाण्डर को धोखे से उन पर वार करना मुनासिब न लगा ।

उसने एक दूसरा काम किया ।

उसने पीछे से ही स्नाइपर राइफल के द्वारा बजूका का निशाना लगाया और ट्रेगर दबा दिया ।

माइक, जिसने अपने हाथ में कसकर बजूका पकड़ी हुई थी, एकाएक उसके हाथ को इतना तेज झटका लगा, जैसे चार सौ चालीस वोल्ट का करेंट लगा हो । फौरन बजूका उसके हाथ से उछलती हुई नजर आयी ।

दोनो बिजली जैसी रफ़्तार से पलटे ।

रोनी ने पलटते ही अपनी 9 एम0एम0 की पिस्टल से फायर कर दिया ।

कमाण्डर ने जम्प ली ।

गोली उसके बिल्कुल करीब से सनसनाती हुई गुजरी ।

अगर वो साइनाइट बुलेट उसे छूते हुए भी गुजर जाती, तो तब भी उसका काम-तमाम हो जाता ।

फौरन ही रोनी ने दो फायर और किये ।

दो साइनाइट बुलेट कमाण्डर की तरफ और झपटीं, जिनसे बस वो बाल-बाल बचा ।

रोनी फिर अपनी 9 एम0एम की पिस्टल का ट्रेगर दबा पाता, उससे पहले ही कमाण्डर ने स्नाइपर राइफल का बस्ट फायर खोल दिया ।

धांय-धांय-धांय !

एक साथ कई गोलियां रोनी के शरीर में जाकर लगीं । उसकी हृदय विदारक चीख वातावरण में गूंजती चली गयी । उसका शरीर धुआंधार गोलियां लगने की वजह से अंधड़ में मौजूद सूखे पत्ते की तरह जोर से कंपकंपाया । कई जगह से खून के फव्वारे छूटे और फिर वो चीखता हुआ ही पीछे झाड़ियों में जा गिरा ।

☐☐☐
 
इस बीच माइक ने चालाकी से काम लिया ।

कमाण्डर की दहशत उसके दिलो-दिमाग पर इतनी बुरी तरह हावी हो चुकी थी कि फिलहाल उससे टकराने का ख्याल तक उसे न सूझा । उसने फौरन अपनी बजूका उठाई और मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ ।

रोनी को मारने के बाद कमाण्डर ने माइक को तलाशा ।

मगर माइक उसे कहीं न चमका ।

इतना तय था, वो अभी वहीं कहीं आसपास था । क्योंकि इतनी जल्दी उसके ‘मंकी हिल’ से भाग निकलने का कोई सवाल ही नहीं था ।

कमाण्डर ने स्नाइपर राइफल अपने से आगे तान ली ।

उसके बाद उसने बड़ी अलर्ट पोजीशन में उस पहाड़ी क्षेत्र में माइक को तलाशना शुरू किया ।

झाड़ियों में !

पेड़ों पर ।

छोटी-छोटी चट्टानों के पीछे ।

सब जगह वो माइक को देखता हुआ आगे बढ़ा ।

लेकिन माइक गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो चुका था ।

उसका कहीं कुछ पता न था ।

वो न जाने कहाँ जा छिपा था ।

कमाण्डर काफी देर तक उसकी तलाश में इधर-उधर भटकता रहा । जब वो निराश होने ही वाला था, तभी अंधकार में रोशनी की तेज किरण की तरह उसे माइक दिखाई पड़ा ।

दरअसल वहीं ‘मंकी हिल’ पर एक झरना था, जो एक ऊंची पहाड़ी से नीचे की तरफ गिर रहा था । निंरतर ऊपर से पानी गिरता रहने के कारण चट्टान में पीछे की तरफ थोड़ा सा गडढा भी हो गया था । इस वक्त माइक झरने और चट्टान के बीच में पैदा हुए उसी गड्ढे में छिपा था ।

झरने का पानी इतना साफ था कि उसके पीछे छिपे हुए माइक की झलक कमाण्डर को साफ़ दिखाई पड़ी ।

वाकई !

माइक ने छिपने के लिए एक बहुत बेहतरीन जगह चुनी थी ।

लेकिन छिपते समय वो भूल गया था, उसका मुकाबला कमाण्डर से है । जिसकी निगाह से बचना आसान नहीं होता ।

माइक को वहाँ देखने के बाद भी कमाण्डर ने ऐसा जाहिर किया, जैसे उसकी निगाहें उसके ऊपर न पड़ी हों ।

अलबत्ता अब वो हद से ज्यादा सावधान हो गया था और फिर टहलता हुआ पहले थोड़ा आगे चला गया । उसके बाद उसने साइड में उस पहाड़ी के ऊपर की तरफ चढ़ना शुरू किया, जहाँ से झरना नीचे बह रहा था ।

जल्द ही कमाण्डर पहाड़ी के ऊपर जा पहुँचा ।

वहाँ काफी बड़े-बड़े पत्थर रखे हुए थे । वह पत्थर कुछ इस तरह एक के ऊपर एक टिके हुए थे कि अगर नीचे से किसी एक पत्थर को भी अपनी जगह से हिला दिया जाता, तो तमाम पत्थर गड़गड़ाते हुए धड़ाधड़ नीचे गिरते ।

हालांकि कमाण्डर करण सक्सेना जख्मी था, लेकिन फिर भी उसने हिम्मत दिखाई ।

उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति टटोलकर नीचे रखे एक पत्थर को धकेलना शुरू किया ।

पत्थर अभी थोड़ा ही हिला था कि ऊपर रखे सारे पत्थर गड़गड़ाते हुए धड़ाधड़ नीचे गिरने शुरू हो गये । फौरन ही कमाण्डर को झरने के पीछे छिपे माइक की हृदयविदारक चीखें भी सुनाई दीं ।

वह बुरी तरह चिल्ला रहा था ।

करूणादायी अंदाज़ में ।

कमाण्डर तेजी के साथ दौड़ता हुआ नीचे पहुँचा ।

झरने के पीछे जो गड्ढा बना हुआ था, माइक अब वहाँ फंस चुका था और उसके सामने काफी पत्थर आकर जमा हो गये थे ।

अंदर से अभी भी माइक की भयंकर चीख सुनायी दे रही थीं ।

“नहीं-नहीं, अब और युद्ध नहीं ।” माइक चिल्ला रहा था- “मैं मरना नहीं चाहता कमाण्डर, मुझे बाहर निकालो ।”

कमाण्डर कुछ देर वही खड़ा हाँफता रहा ।

उसकी हालत खराब थी ।

“प्लीज, मुझे बाहर निकालो ।” वह गिडगिड़ाने लगा- “प्लीज कमाण्डर, मैं मरना नहीं चाहता । मैं अब और युद्ध नहीं चाहता ।”

उसकी आवाज में बेहद करूणा का भाव था ।

कमाण्डर को न जाने क्यों उस पर दया आ गयी ।

उसने फिर अपनी सम्पूर्ण शक्ति बटोरी और एक पत्थर को धकेलना शुरू किया ।

जल्द ही उसने एक पत्थर को पीछे धकेल दिया ।

अंदर माइक खून से लथपथ पड़ा हुआ था-लेकिन बजूका अभी भी उसके हाथ मे थी । सांस उल्टे सीधे चल रहे थे ।

“लाओ ।” कमाण्डर करण सक्सेना ने पत्थरों के बीच में से अपना हाथ माइक की तरफ बढ़ाया- “अपना हाथ मुझे दो ।”

अंदर फंसे माइक ने फौरन अपना हाथ कमाण्डर करण सक्सेना के हाथ में दे दिया ।

कमाण्डर ने फिर अपनी शक्ति बटोरी और पूरी ताकत लगाकर उसे पत्थरों के ढेर में-से बाहर पकड़कर खींचा ।

वह रगड़ खाता हुआ बाहर निकल आया ।

“प...पानी !” बाहर आते ही माइक हाथ पैर फैलाकर नीचे पड़ गया- “पानी !”

कमाण्डर ने अपने हैवरसेक बैग में से पानी की कैन निकाली । फिर उसने थोड़ा सा पानी माइक के मुंह में डाला और थोड़ा-सा खुद पीया ।

पानी पीते ही बुरी तरह हांफते माइक के शरीर में थोड़ी जान पड़ी । उसकी हालत कुछ सुधरी ।

“त… तुम सचमुच एक महान यौद्धा होने के साथ-साथ एक महान इंसान भी हो कमाण्डर ।” वो हांफता हुआ ही बोला- “ए... एक महान इंसान भी हो ।”

उसके उल्टे सीधे चलते सांस अब कुछ नियंत्रित होने लगे थे ।

“लेकिन एक बात कहूँ कमाण्डर ।”

“क्या ?”

“किसी आदमी को इतना ज्यादा अच्छा भी नही होना चाहिये, जो वह अपने दोस्त और दुश्मन के बीच के फर्क को न समझ सके ।”

“क... क्या मतलब ?”

“मतलब भी अभी समझ आता है ।”

माइक एकाएक बिजली जैसी अद्वितीय फुर्ती के साथ झपटकर खड़ा हुआ और उसने अपनी बजूका कमाण्डर की तरफ तान दी ।

“तुम्हारी इस शराफत ने तुम्हारी सारी मेहनत बेकार कर दी हैं कमाण्डर !” वह एकाएक जहरीले नाग की तरह फुंफकार उठा- “एक ही झटके में तुम्हारे तमाम पत्ते पिट चुके हैं । अब तुम मरने के लिए तैयार हो जाओ ।”

माइक ने जैसे ही बजूका का लीवर दबाना चाहा, तुरंत कमाण्डर की राउण्ड किक बड़ी तेजी के साथ घूमी और वो भड़ाक से माइक के सीने पर पड़ी ।

माइक की चीख निकल गयी ।

तभी राउण्ड किक की दूसरी लात घूमकर प्रचण्ड वेग से माइक के चेहरे पर पड़ी और अगले ही पल बजूका कमाण्डर के हाथ में दिखाई दे रही थी ।

माइक के नेत्र आतंक से फटे के फटे रह गये ।

सब कुछ सेकंड के सौंवे हिस्से में हो गया ।

“तुम शायद अपने छल-प्रपंच से भरे हुए इस खेल में एक बात भूल गये माइक ।” कमाण्डर उसे बेहद नफरतभरी निगाहों से देखता हुआ बोला- “जो आदमी जान बचाना चाहता है, वो जान लेना भी जानता है । गुड बाय ।”

कमाण्डर ने उस एंटी टैंक गन ‘बजूका’ का लीवर पकड़कर खींचा ।

माइक के मुंह से ऐसी वीभत्स चीख निकली, जैसे किसी ने उसका गला काट डाला हो ।

बजूका के अंदर से निकला तीन इंच व्यास का बड़ा गोला घूमता हुआ सीधा माइक के सीने में जा घुसा और वहाँ काफी बड़ा झरोखा-सा बनता चला गया ।

माइक वापस पत्थरों पर जा गिरा ।

उसके सीने में इतना चौड़ा छेद हो गया था, जैसे किसी ने तोप की पूरी नाल उसमें घुसा दी हो ।

पलक झपकते ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये ।

उसके बाद खुर कमाण्डर भी अपनी टांगों पर खड़ा न रह सका ।

पहले उसके हाथ से बजूका छूटकर नीचे गिरी ।

फिर वो खुद भी जमीन पर ढेर हो गया ।

☐☐☐
 
कमाण्डर करण सक्सेना के सांस अब बहुत ज्यादा उल्टे-सीधे चलने लगे थे ।

‘असाल्ट ग्रुप’ के उन योद्धाओं को मारने में उसे जरूरत से ज्यादा मेहनत करनी पड़ गयी थी । शरीर से खून काफी मात्रा में निकल गया था और अब उसके ऊपर बड़ी तेजी से बेहोशी छाने लगी । सिर घूमने लगा । पीठ में लगी गोली भी भयंकर दर्द कर रही थी । कमाण्डर को लगा, अब बेहोश होने से दुनिया की कोई ताकत उसे नहीं बचा सकेगी और फिर पता नहीं वो कभी होश में भी आ पायेगा या नहीं ?

कमाण्डर ने कंपकंपाते हुए हाथों से अपने ओवरकोट की गुप्त जेब से ट्रांसमीटर सैट निकाला, फिर वो मुम्बई के रॉ हैडक्वार्टर से सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश करने लगा ।

जल्द ही सम्पर्क स्थापित हो गया ।

“हैलो-हैलो, कमाण्डर करण सक्सेना स्पीकिंग ।”

“कमाण्डर करण सक्सेना स्पीकिंग ।”

वह उस समय उसी कोड भाषा में बोल रहा था, जो कोड भाषा मिशन पर रवाना होने से पहले गंगाधर महन्त और उसके बीच इजाद की गयी थी ।

“हैलो करण, मैं गंगाधर महन्त बोल रहा हूँ ।” फौरन दूसरी तरफ से बड़ी गर्मजोशी से भरी आवाज सुनायी दी- “क्या बात है, तुम ठीक तो हो न करण ?”

“प... प्लीज हैल्प मी !” कमाण्डर की आवाज बुरी तरह कंपकंपायी- “प... प्लीज हैल्प मी ! !”

गंगाधर महन्त सन्नाटे में डूब गये ।

“तुम जंगल में इस वक्त कहाँ हो ?” गंगाधर चिल्लाये ।

“म... मंकी हिल पर !”

“यौद्धाओं का क्या हुआ ?”

“म... मैंने लगभग सभी योद्धाओं को मार डाला है ।” कमाण्डर की आवाज हर पल मद्धिम पड़ती जा रही थी- “उ... उनका हैडक्वार्टर भी तबाह कर दिया है ।”

“लेकिन तुम्हें हुआ क्या है ? तुम्हारी हालत कैसी है ?”

उसी पल ट्रांसमीटर सैट कमाण्डर के हाथ से छूट गया ।

उसकी गर्दन दायीं तरफ जा गिरी ।

“तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे करण ?” गंगाधर महन्त पागलों की तरह चिल्ला उठें- “तुम खामोश क्यों हो ?”

कमाण्डर करण सक्सेना बेहोश हो चुका था ।

☐☐☐

मुम्बई के रॉ हैडक्वार्टर में हड़कम्प मच गया ।

न सिर्फ गंगाधर महन्त बल्कि तमाम रॉ एजेंटों के लिए यह बात हैरान कर देने वाली थी कि कमाण्डर करण सक्सेना जैसे आदमी ने मदद मांगी है ।

“जरूर करण की हालत बहुत गंभीर है ।” गंगाधर महन्त परेशान हो उठे- “वरना ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि करण ने किसी मिशन के दौरान मदद मांगी हो । ऐसा लगता है, करण उन योद्धाओं से लड़ता हुआ बहुत जख्मी हो गया है ।”

“फिर तो हमें कमाण्डर की फौरन मदद करनी चाहिये चीफ !” रॉ एजेंट रचना मुखर्जी बोली !

“बिल्कुल !”

“लेकिन हम इतनी जल्दी कमाण्डर की मदद के लिए बर्मा के खौफनाक जंगलों में कैसे पहुँच सकते हैं ?” वह एक दूसरे एजेंट की आवाज थी ।

“इसका बस एक ही तरीका है ।”

“क्या ?”

“मुझे बर्मा के रक्षा मंत्री से बात करनी होगी । बर्मा की फौज ही करण की मदद के लिए सबसे पहले वहाँ पहुँच सकती है ।”

फिर गंगाधर महन्त टेलीफोन की तरफ झपट पड़े ।

☐☐☐

जैसे ही बर्मा के रक्षा मंत्रालय में यह खबर पहुंची कि कमाण्डर करण सक्सेना ने लगभग सभी योद्धाओं को मार डाला है और अब वो खुद मंकी हिल पर बहुत गंभीर हालत में पड़ा है, तो वहाँ भी सनसनी दौड़ गयी ।

“फौरन जंगल में घुसने की तैयारी करो ।” तुरंत रक्षा मंत्री चिल्लाये- “हमने किसी भी हालत में कमाण्डर करण सक्सेना को बचाना है । वह जांबाज आदमी मरना नहीं चाहिये, जिसने हमारे देश की हिफाजत के लिए अपनी जान खतरे में डाल दी ।”

“लेकिन अब कमाण्डर करण सक्सेना को बचाने के लिए हम क्या करें ?” रक्षा मंत्री का सेक्रेटरी बोला ।

“जंगल में योद्धाओं का अब पहले जैसा डर नहीं है, फौज को हुकुम दो कि वह तुरंत जंगल में घुसे ।”

“ओके सर !”

☐☐☐

थोड़ा ही समय गुजरा होगा कि फौरन बर्मा के फौजी हैलीकॉप्टर बड़ी तादाद में जंगल के ऊपर मंडराने लगे ।

फौजी गाड़ियाँ दनदनाती हुई जंगल के अंदर घुसीं ।

देखते ही देखते बर्मा की फौज ने उस जंगल को चारों तरफ से घेर लिया ।

“सब ‘मंकी हिल’ की तरफ बढ़ें ।” फौज के कम्पनी कमाण्डर ने लाउस्पीकर पर आदेश दनदनाया- “और रास्ते में यौद्धाओं के जितने भी सैनिक नजर आयें, सबको मार डालो । कोई नहीं बचना चाहिये ।”

एकाएक जंगल में चारों तरफ फौज-ही-फौज नजर आने लगी ।

सिग्नल बजने लगे ।

जंगल का माहौल खौफनाक हो गया ।

फौज अब यौद्धाओं के बचे-कुचे सैनिकों को गोलियों से भूनती हुई आगे बढ़ रही थी ।

जंगल में आदिवासियों के ऊपर फौज को गोलियां चलाने की जरूरत नहीं पड़ी, उससे पहले ही आदिवासियों ने फौज के सामने हथियार डाले दिये ।

थोड़ी ही देर में पूरे जंगल पर बर्मा की फौज का कब्जा हो चुका था ।

यही वो पल था, जब फौज के चार हैलीकॉप्टर भयानक गर्जना करते हुए ‘मंकी हिल’ पर उतरे ।

“कमाण्डर करण सक्सेना यहीं कहीं होना चाहिये ।” वायुसेना का एक बड़ा ऑफिसर हैलीकॉप्टर से नीचे कूदता हुआ चिल्लाया- “उसे चारों तरफ ढूंढों, मंकी हिल का चप्पा-चप्पा छान मारों ।”

देखते ही देखते बर्मा के फौजी मधुमक्खी के छत्ते की भांति पूरी ‘मंकी हिल’ पर फैलते चले गये ।

“इस बात की क्या गारण्टी है ।” एक फौजी बोला- “कि कमाण्डर करण सक्सना यहीं होगा ।”

“क्योंकि उसने यहीं से अपना आखिरी मैसेज सर्कुलेट किया था ।”

“ओह !”

फौजी दौड़ते हुए आगे बढ़े ।

“लगता है, वहाँ कोई है ।” तभी एक फौजी ने दूर झाड़ियों की तरफ उंगली उठाई ।

“कमाण्डर करण सक्सेना मालूम होता है ।”

“जरूर वही है ।”

फौजी दौड़ते हुए उस व्यक्ति की तरफ बढ़ते चले गये, जो खून से लथपथ हालत में झाड़ियों में पड़ा था ।

वह सचमुच कमाण्डर करण सक्सेना था ।

“इसे जल्दी से उठाकर हैलीकॉप्टर में लाओ । हमने कमाण्डर करण सक्सेना को लेकर फौरन हॉस्पिटल पहुँचना है ।”

ऑफिसर के आदेश की देर थी, तुरन्त दो फौजियों ने कमाण्डर करण सक्सेना को उठा लिया और वह उसे लेकर वहीं खड़े एक हैलीकॉप्टर की तरफ दौड़े ।

☐☐☐

दर्द की वजह से कमाण्डर का सिर फटा जा रहा था । उसे ऐसा लग रहा था, मानो वह किसी बहुत गहरी नींद से जागा हो । आँखें खोलते ही उसने बड़ी अचम्भित निगाहों से इधर-उधर देखा । वह बिल्कुल नई जगह थी और इस समय वह एक बहुत साफ-सुथरे कमरे में था ।

तभी कमाण्डर की निगाह अपने बैड के नजदीक ही रखी एक तख्ती पर पड़ी, वह बर्मा की राजधानी रंगून का कोई हॉस्पिटल था ।

कमाण्डर ने देखा, उसके शरीर पर जगह-जगह पट्टियां बंधी हुई थीं ।

कपड़े बदले जा चुके थे ।

इसके अलावा हैवरसेक बैग का सामान भी वहीं कमरे में फैला हुआ था । उसी क्षण कमाण्डर की निगाह अपनी कलोरोफार्म की बोतल पर पड़ी । न जाने किस बेवकूफ ने क्लोरोफार्म की शीशी का ढक्कन खोल दिया था और अब उसमें से आधी से ज्यादा क्लोरोफार्म उड़ चुकी थी ।

खिड़की में से छनकर आती धूप इस समय सीधे उस क्लोरोफार्म की शीशी पर पड़ रही थी ।

कमाण्डर ने थोड़ी हिम्मत जुटाई । उसने बिस्तर पर लेटे-लेटे आगे को झुककर क्लोरोफार्म की शीशी उठाई और उसका ढक्कन वापस बंद कर दिया ।

फिर उसे लेटे-लेटे कब नींद आ गयी, पता न चला ।

काफी देर बाद कमाण्डर की आँखें खुली थीं ।

उसने देखा, बिल्कुल उसी क्षण एक बिल्कुल सफेद झक्के बालों वाला डॉक्टर कमरे में दाखिल हुआ । उसने सफेद ओवरऑल पहना हुआ था और आँखों में खूंखार भाव थे ।

“हैलो कमाण्डर !” वह कमाण्डर के नजदीक आकर खड़ा हो गया और मुस्कराया ।

कमाण्डर चौंका ।

उस आदमी की सूरत न जाने क्यों उसे जानी पहचानी सी लगी ।

वह उसे पहले कहीं देख चुका था ।

कहाँ ?

यह कमाण्डर को एकदम से याद न आया ।

“शायद तुम मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हो कमाण्डर ।” वह रहस्यमयी डॉक्टर इंजेक्शन की सीरींज भरता हुआ बोला- “मेरा नाम जैक क्रेमर है, ‘असाल्ट ग्रुप’ का आखिरी योद्धा ।”

कमाण्डर के दिमाग में धमाका हो गया ।

फौरन वह उसे पहचान गया ।

वह वास्तव में ही जैक क्रेमर था ।

“तुमने मेरे सभी ग्यारह योद्धाओं को मार डाला है कमाण्डर !” जैक क्रेमर गुस्से में फुंफकारा- “तुमने बर्मा पर कब्जा करने के मेरे सपने को चकनाचूर कर डाला । लेकिन अब तुम्हारी मौत का समय आ चुका है । तुम शायद जानते हो, नारकाटिक्स का कारोबार करने के साथ-साथ मैं विष का भी विशेषज्ञ हूँ । यह जो इंजेक्शन मेरे हाथ में देख रहे हो, इसके अंदर पौटेशियम साइनाइट से भी ज्यादा खतरनाक ‘कुर्री’ नाम का जहर भरा है । जैसे ही यह जहर तुम्हारे शरीर में पहुंचेगा, फौरन सेकण्ड के सौंवे हिस्से में तुम्हारी मौत हो जायेगी ।”

फिर जैक क्रेमर, कमाण्डर के वह इंजेक्शन लगाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा, तुरंत कमाण्डर बैड से एकदम जम्प लेकर खड़ा हो गया और उसकी ताइक्वांडों किक बड़ी स्पीड के साथ घूमकर जैक क्रेमर के चेहरे पर पड़ी ।

जैक क्रेमर चीख उठा ।

इंजेक्शन उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ा और गिरते ही टूट गया ।

कमाण्डर की निगाह पुनः क्लोरोफार्म की बोतल पर जाकर ठहर गयी ।

वो जानता था, क्योंकि क्लोरोफार्म की वह बोतल किसी ने धूप में खुली छोड़ दी थी और थोड़ी देर पहले कमाण्डर उसे बंद कर चुका था, तो अब उसके अंदर खाली जगह में जरूर ‘फोसजिन गैस’ बन गयी होगी ।

फोसजिन-जो बहुत जहरीली गैस होती है और इंसान के ऊपर सीधे नर्व गैस का काम करती है ।

कमाण्डर ने झपटकर बोतल उठा ली और उसे लेकर बिजली जैसी फुर्ती के साथ दरवाजे की तरफ दौड़ा ।

“तुम आज बचकर नहीं जा सकोगे कमाण्डर !” जैक क्रेमर ने भी उसके पीछे जम्प लगायी ।

उसके हाथ में ‘कुर्री’ जहर से भरा दूसरा इंजेक्शन आ चुका था ।

रूका कमाण्डर !

घूमा !

फिर भड़ाक से उसकी एक और ताइक्वांडों किक घूमकर जैक क्रेमर के चेहरे पर पड़ी ।

उसी क्षण कमाण्डर ने ‘फोसजिन गैस’ से भरी वो बोतल सामने दीवार पर दे मारी ।

धड़ाम !

बोतल फटने की ऐसी आवाज हुई, जैसे बम फटा हो ।

कमाण्डर दौड़कर कमरे से बाहर निकल गया और बाहर निकलते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया ।

अंदर से अब जैक क्रेमर की वीभत्स चीखें गूंजने लगीं और फिर वो चीखें भी शांत हो गयीं ।

☐☐☐
 
कमाण्डर करण सक्सेना इस समय हॉस्पिटल के ही गलियारे वाली टेबिल पर पड़ा जोर-जोर से हांफ रहा था ।

उसके कई टांके टूट चुके थे ।

जख्मों में-से फिर खून रिसने लगा था ।

लेकिन कमाण्डर करण सक्सेना या फिर किसी को भी उस बात की परवाह न थी । पूरे हास्पिटल में अफरा-तफरी मची थी ।

यह बात अब वहाँ फैल चुकी थी कि कमाण्डर करण सक्सेना ने आखिरी योद्धा जैक क्रेमर को भी ‘फोसजिन गैस’ से मार डाला है । उस कमरे में से ‘फोसजिन गैस’ बाहर न निकलने पाये, इसके लिए दरवाजे की झिरी में जगह जगह गीला कपड़ा लगा दिया गया था । फिर तुरंत ही वहाँ ‘विषैली गैस निरोधक दस्ता’ बुलाया गया ।

उस दस्ते ने वहाँ आते ही सबसे पहले ऐसे यंत्र लगाये, जो उस बंद कमरे के अंदर से ही सारी गैस सोख ली गयी । उसके बाद कमरे का दरवाजा खोला गया ।

सामने ही जैक क्रेमर की लाश पड़ी थी ।

जैक क्रेमर ।

वह मास्टर माइण्ड आदमी, जो खुद को विष का विशेषज्ञ कहता था, लेकिन अपने आखिरी समय में उसी विष के कारण वो मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

अगले दिन कमाण्डर करण सक्सेना अपने जीवन के उस सबसे खतरनाक मिशन को पूरा करके वापस भारत लौट आया । भारत लौटते ही उसके पास बधाइयों का तांता लग गया ।

भारत के तमाम अखबारों में उसे ‘भारत रत्न’ मिलने की खबर सुर्खियों के साथ छपी ।

सचमुच वो भारत का रत्न था ।

भारत रत्न, कमाण्डर करण सक्सेना !

जिस पर कोई भी सच्चा भारतीय गर्व कर सकता है ।

समाप्त
 
Back
Top