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उधर मेरे पति और किशन भी अपनी माँ को और तेजी से चोद रहे थे. उनके मुंह से हर ठाप के साथ सिर्फ़ "ऊंघ! ऊंघ! ऊंघ! ऊंघ!" की आवाज़ आ रही थी.
सासुमाँ "हाय! उफ़्फ़!! आह!! उम्म्म!" करके अपने दोनो छेदों मे लन्ड ले रही थी.
चुदाई करते करते हम पांचों झड़ने के कगार पर आ गये.
ससुरजी को अपनी बाहों मे जकड़कर मैं चिल्लाने लगी, "हाय बाबूजी! और जोर से चोदो मेरी भोसड़ी को! आह!! फाड़ दो मेरी चूत को!! मैं झड़ने वाली हूँ! आह!! ओह!! आह!! आह!! उम्म!!"
ससुरजी भी बहुत जोश मे मुझे पेलने लगे. वह जोर जोर से सांसें ले रहे थे और बड़बड़ा रहे थे, "ले साली रंडी! ले अपने ससुर का लन्ड! आह!! कुतिया, अपने पति के सामने चुदवा रही है!! ले मेरा लौड़ा!! बेहया रांड!! चुद अच्छे से. बुझा ले अपनी हवस! ऊंह!!"
इधर मैं झड़ने लगी और मेरे ऊपर ससुरजी भी मेरी चूत मे झड़ने लगे. मुझे जोर जोर के ठाप लगाकर उन्होने मेरी चूत की गहराई मे अपना वीर्य उगल दिया.
फिर वह मेरे ऊपर पस्त होकर लेट गये. मैं अपने पास लेटी सासुमाँ की दोहरी चुदाई देखने लगी.
सासुमाँ भी जल्दी ही झड़ने लगी. "हाय, बलराम! मार मार के फाड़ दे मेरी गांड! आह!! किशन बेटा! चोद डाल अपनी रंडी माँ को! आह!! हाय इतना मज़ा मुझे कभी नही आया है! आह!! मैं अपने दोनो बेटों से चुदवा रही हूँ!"
"ले ना मेरा लौड़ा, साली रंडी!" किशन जोश मे अपनी माँ को गंदी गालियाँ देने लगा, "कुतिया कहीं की, अच्छे से चुद मेरे लौड़े पर!"
"हाँ, किशन बेटा! मैं रंडी ही हूँ!!" सासुमाँ झड़ते हुए बोली, "चोद अपनी रंडी को बेटा!! मैं तुम दोनो की रखैल बनके रहुंगी!! आह!! मुझे जब चाहे दोनो चोदना!! आह!! आह!! चोद चोदकर मेरा पेट बना देना!! आह!! आह!!"
सासुमाँ के साथ किशन भी झड़ने लगा, "आह!! ले मेरा पानी छिनाल माँ! ले मेरा पानी अपने गर्भ मे और अपनी पेट बना ले, हरामन!! आह!! आह!! आह!! आह!!" अपनी माँ की बुर मे अपना वीर्य उगलकर वह पस्त हो गया.
सासुमाँ थक कर किशन ऊपर लेट गयी.
पर मेरे पति ने उनकी गांड मारना जारी रखा. और 5-6 मिनट गांड मारने के बाद उन्होने सासुमाँ की गांड मे अपना पूरा लन्ड पेल दिया और अपना पेलड़ खाली करने लगे. 15-20 सेकंड तक अपनी माँ की गांड मे अपना वीर्य भरकर वह सासुमाँ के ऊपर निढाल होकर लेट गये.
हम पांचों बहुत देर तक इसी तरह नंगे पड़े रहे.
जब हमारी सांसें काबू मे आयी, सासुमाँ ने कहा, "चलो उठो सब लोग! बहु और मुझे बहुत काम है. चुदाई करते रहेंगे तो दोपहर का खाना नही बनेगा. यह गुलाबी न जाने अब तक क्यों नही आयी!"
"माँ, कहीं रामु उसे लेकर अपने गाँव तो नही चला गया?" मैने पूछा.
"नही, बहु." सासुमाँ बोली, "रामु जाना चाहे तो भी गुलाबी नही जायेगी. उसे यहाँ जितने लौड़े मिल रहे हैं ससुराल जाके कहाँ मिलेगा? किशन, उठकर कपड़े पहन और जाके देख यह रामु कहाँ छुपा बैठा है. उसे बोलना भैया उसे कुछ नही बोलेंगे. वह घर आ जाये."
हम सब एक दूसरे से अलग हुए और अपने कपड़े पहनने लगे.
मैने और सासुमाँ ने अपनी चूत और गांड से बहते हुए वीर्य को पोछकर साफ़ किया. फिर कपड़े पहनकर हम रसोई मे चले गये.
ससुरजी अपने कमरे मे चले गये और किशन रामु को ढूंढने खेत मे चला गया. मेरे वह पलंग पर थक कर नंगे ही पड़े रहे.
किशन घंटे भर बाद रामु और गुलाबी को हाज़िपुर स्टेशन से पकड़कर लाया. वहाँ बैठकर रामु अपने गाँव जाने की ज़िद कर रहा था और गुलाबी उसे समझा रही थी. घर आकर रामु अपने कमरे मे छुप गया और दिन भर बाहर नही आया.
वीणा, उस रात सासुमाँ किशन के साथ सोयी और उससे एक और बार चुदवाई. ससुरजी गुलाबी को लेकर सोये और देर रात तक उसे चोदते रहे.
मै तुम्हारे बलराम भैया के साथ सोयी. उन्होने मुझे बहुत प्यार किया और बहुत चोदा. सोनपुर से आने के बाद यह हम दोनो की पहली चुदाई थी. इतने दिनो तक हम हर किसी के साथ चुदाई कर रहे थे - पर पति-पत्नी होने का फ़र्ज़ नही निभा रहे थे. है ना मज़े की बात?
वीणा, अब तक जो हुआ मैने इस ख़त मे लिख दी है. आगे की कहानी अगले ख़त मे.
तुम्हारी चुदक्कड़ भाभी
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भाभी की मनोरंजक चिट्ठी पढ़ते पढ़ते मैं दो बार झड़ गयी थी. अगर पढ़ने मे इतना मज़ा आ रहा था, तो मैं सोचा, भाभी को यह सब करने मे कितना मज़ा आ रहा होगा! मैने जल्दी से भाभी को जवाब भेजा.
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प्यारी भाभी,
तुम्हारी चिट्ठी मिली. मुझे जो उम्मीद थी वही पाया. मामा, मामी, और तुम्हारी घिनौनी योजना आखिर सफ़ल हो ही गयी! भई, मैं तो मान गयी तुम्हे! अब आगे की क्या योजना है? अब तो तुम सब बस दिन-रात चोदा-चोदी ही करते रहोगे! या फिर कुछ और भी सोच रखा है तुम ने? जैसे गुलाबी बेचारी को रंडीखाने मे बेच देने की! या फिर खुद रंडीबाज़ी करने की? मुझे तो सोचकर ही चुदास चढ़ रही है.
एक बात तो कहनी ही पड़ेगी. भाभी, तुम्हारी चिट्ठियां पढ़ पढ़ के और अपनी चूत मे बैंगन पेल पेल के मेरे तो दोनो हाथ बहुत मजबूत हो गये हैं! पर यह कब तक चलेगा? तुम ने लिखा था तुम ने मेरे लिये कुछ सोच रखा है. वह क्या है भाभी? और वह कब होगा? मुझसे तो और प्रतीक्षा नही होती.
तुम्हारी वीणा
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मीना भाभी की अगली चिट्ठी जल्दी ही आ गयी. आजकल नीतु मेरे कमरे मे ताक-झांक करती रहती है कि आखिर मैं अपना दरवाज़ा बंद करके क्यों भाभी की चिट्ठी पढ़ती हूँ. इसलिये अब की बार मैं चिट्ठी लेकर छत पर चली गयी.
हमारे घर के आंगन मे बहुत से पेड़ हैं जिसके कारण छत पर काफ़ी एकन्त है. मैं छत के एक कोने मे बैठकर भाभी की चिट्ठी पढ़ने लगी. और साथ ही अपनी साड़ी मे हाथ डालकर अपनी चूत सहलाने लगी.
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मेरी प्यारी ननद,
आशा करती हूँ कि तुम मज़े मे हो और तुम्हारे घर पर सब लोग अच्छे है. (अच्छा बाबा, मैं जानती हूँ तुम्हारी चूत को महीने भर से कोई लौड़ा नही मिला है. पर मुझे तुम्हारा कुशल-मंगल तो पूछना चाहिये ना!)
कल शाम को हमारे घर पर एक शानदार दावत हुई. दावत मे सिर्फ़ मै, तुम्हारे बलराम भैया, मेरा देवर किशन, तुम्हारे मामाजी और मामीजी, नौकर रामु और उसकी जोरु गुलाबी थे. तुम भी होती तो मज़ा चौगुना हो जाता!
सुबह नाश्ते के बाद ही ससुरजी ने रामु को बुला भेजा और कहा, "रामु, आज शाम को एक दावत करनी है."
"जी मालिक. कितने मेहमान आ रहे हैं?" रामु ने पूछा.
"कोई मेहमान नही आयेंगे. बस हम लोग ही होंगे." ससुरजी बोले, "तु किशन के साथ हाज़िपुर बाज़ार जा और सब सामान लेकर आ. खाने का सामान तेरी मालकिन बता देगी - पर मुर्गा और गोश्त ज़रूर लाना. और हाँ, चार बोतल ओल्ड मॉन्क के ले आना. साथ मे कोकाकोला के दो बड़े बोतल ले आना."
"ई ओल्ड मॉन्क का है मालिक?" रामु ने पूछा.
"दारु है. दुकान मे बोलना वह दे देंगे."
"मालिक, दावत मे दारु भी चलेगा?" रामु ने पूछा, "आप तो पीते नही हैं."
"कभी कभी तो पी ही लेता हूँ."
"पर चार-चार बोतल? आप अकेले इतना सारा कैसे पीयेंगे?"
"अरे मैं अकेले क्यों पियुंगा? सब लोग पीयेंगे." ससुरजी बोले.
"बड़े भैया और किसन भैया भी आपके साथ पीयेंगे का?"
"तु ज़्यादा बहस मत कर. जो बोल रहा हूँ कर." ससुरजी झल्लाकर बोले.
"जी मालिक."
"और बलराम से पैसे भी ले लेना."
"मालिक, बड़े भैया हमको मारेंगे तो नही?" रामु ने डरकर कहा. जबसे मेरे पति ने उसे मेरी चुदाई करते पकड़ा था वह उनसे बच-बच के रह रहा था.
"कुछ नही कहेगा वो." ससुरजी बोले, "डरपोक कहीं का! परायी औरत के साथ मुंह भी काला करता है और उसके पति से डरता भी है. चल भाग जल्दी!"
रामु किशन को लेकर बाज़ार चला गया. तुम्हारे भैया खेत का काम देखने चले गये. मै, गुलाबी और सासुमाँ शाम के दावत की तैयारी मे लग गये.
दिन भर किसी ने और चुदाई नही की. दोपहर के भोजन के बाद हम लोग सो भी गये.
शाम को उठकर दावत के लिये खाना पकाया गया. सब कुछ तैयार होते होते रात के 7-8 बज गये.
सासुमाँ "हाय! उफ़्फ़!! आह!! उम्म्म!" करके अपने दोनो छेदों मे लन्ड ले रही थी.
चुदाई करते करते हम पांचों झड़ने के कगार पर आ गये.
ससुरजी को अपनी बाहों मे जकड़कर मैं चिल्लाने लगी, "हाय बाबूजी! और जोर से चोदो मेरी भोसड़ी को! आह!! फाड़ दो मेरी चूत को!! मैं झड़ने वाली हूँ! आह!! ओह!! आह!! आह!! उम्म!!"
ससुरजी भी बहुत जोश मे मुझे पेलने लगे. वह जोर जोर से सांसें ले रहे थे और बड़बड़ा रहे थे, "ले साली रंडी! ले अपने ससुर का लन्ड! आह!! कुतिया, अपने पति के सामने चुदवा रही है!! ले मेरा लौड़ा!! बेहया रांड!! चुद अच्छे से. बुझा ले अपनी हवस! ऊंह!!"
इधर मैं झड़ने लगी और मेरे ऊपर ससुरजी भी मेरी चूत मे झड़ने लगे. मुझे जोर जोर के ठाप लगाकर उन्होने मेरी चूत की गहराई मे अपना वीर्य उगल दिया.
फिर वह मेरे ऊपर पस्त होकर लेट गये. मैं अपने पास लेटी सासुमाँ की दोहरी चुदाई देखने लगी.
सासुमाँ भी जल्दी ही झड़ने लगी. "हाय, बलराम! मार मार के फाड़ दे मेरी गांड! आह!! किशन बेटा! चोद डाल अपनी रंडी माँ को! आह!! हाय इतना मज़ा मुझे कभी नही आया है! आह!! मैं अपने दोनो बेटों से चुदवा रही हूँ!"
"ले ना मेरा लौड़ा, साली रंडी!" किशन जोश मे अपनी माँ को गंदी गालियाँ देने लगा, "कुतिया कहीं की, अच्छे से चुद मेरे लौड़े पर!"
"हाँ, किशन बेटा! मैं रंडी ही हूँ!!" सासुमाँ झड़ते हुए बोली, "चोद अपनी रंडी को बेटा!! मैं तुम दोनो की रखैल बनके रहुंगी!! आह!! मुझे जब चाहे दोनो चोदना!! आह!! आह!! चोद चोदकर मेरा पेट बना देना!! आह!! आह!!"
सासुमाँ के साथ किशन भी झड़ने लगा, "आह!! ले मेरा पानी छिनाल माँ! ले मेरा पानी अपने गर्भ मे और अपनी पेट बना ले, हरामन!! आह!! आह!! आह!! आह!!" अपनी माँ की बुर मे अपना वीर्य उगलकर वह पस्त हो गया.
सासुमाँ थक कर किशन ऊपर लेट गयी.
पर मेरे पति ने उनकी गांड मारना जारी रखा. और 5-6 मिनट गांड मारने के बाद उन्होने सासुमाँ की गांड मे अपना पूरा लन्ड पेल दिया और अपना पेलड़ खाली करने लगे. 15-20 सेकंड तक अपनी माँ की गांड मे अपना वीर्य भरकर वह सासुमाँ के ऊपर निढाल होकर लेट गये.
हम पांचों बहुत देर तक इसी तरह नंगे पड़े रहे.
जब हमारी सांसें काबू मे आयी, सासुमाँ ने कहा, "चलो उठो सब लोग! बहु और मुझे बहुत काम है. चुदाई करते रहेंगे तो दोपहर का खाना नही बनेगा. यह गुलाबी न जाने अब तक क्यों नही आयी!"
"माँ, कहीं रामु उसे लेकर अपने गाँव तो नही चला गया?" मैने पूछा.
"नही, बहु." सासुमाँ बोली, "रामु जाना चाहे तो भी गुलाबी नही जायेगी. उसे यहाँ जितने लौड़े मिल रहे हैं ससुराल जाके कहाँ मिलेगा? किशन, उठकर कपड़े पहन और जाके देख यह रामु कहाँ छुपा बैठा है. उसे बोलना भैया उसे कुछ नही बोलेंगे. वह घर आ जाये."
हम सब एक दूसरे से अलग हुए और अपने कपड़े पहनने लगे.
मैने और सासुमाँ ने अपनी चूत और गांड से बहते हुए वीर्य को पोछकर साफ़ किया. फिर कपड़े पहनकर हम रसोई मे चले गये.
ससुरजी अपने कमरे मे चले गये और किशन रामु को ढूंढने खेत मे चला गया. मेरे वह पलंग पर थक कर नंगे ही पड़े रहे.
किशन घंटे भर बाद रामु और गुलाबी को हाज़िपुर स्टेशन से पकड़कर लाया. वहाँ बैठकर रामु अपने गाँव जाने की ज़िद कर रहा था और गुलाबी उसे समझा रही थी. घर आकर रामु अपने कमरे मे छुप गया और दिन भर बाहर नही आया.
वीणा, उस रात सासुमाँ किशन के साथ सोयी और उससे एक और बार चुदवाई. ससुरजी गुलाबी को लेकर सोये और देर रात तक उसे चोदते रहे.
मै तुम्हारे बलराम भैया के साथ सोयी. उन्होने मुझे बहुत प्यार किया और बहुत चोदा. सोनपुर से आने के बाद यह हम दोनो की पहली चुदाई थी. इतने दिनो तक हम हर किसी के साथ चुदाई कर रहे थे - पर पति-पत्नी होने का फ़र्ज़ नही निभा रहे थे. है ना मज़े की बात?
वीणा, अब तक जो हुआ मैने इस ख़त मे लिख दी है. आगे की कहानी अगले ख़त मे.
तुम्हारी चुदक्कड़ भाभी
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भाभी की मनोरंजक चिट्ठी पढ़ते पढ़ते मैं दो बार झड़ गयी थी. अगर पढ़ने मे इतना मज़ा आ रहा था, तो मैं सोचा, भाभी को यह सब करने मे कितना मज़ा आ रहा होगा! मैने जल्दी से भाभी को जवाब भेजा.
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प्यारी भाभी,
तुम्हारी चिट्ठी मिली. मुझे जो उम्मीद थी वही पाया. मामा, मामी, और तुम्हारी घिनौनी योजना आखिर सफ़ल हो ही गयी! भई, मैं तो मान गयी तुम्हे! अब आगे की क्या योजना है? अब तो तुम सब बस दिन-रात चोदा-चोदी ही करते रहोगे! या फिर कुछ और भी सोच रखा है तुम ने? जैसे गुलाबी बेचारी को रंडीखाने मे बेच देने की! या फिर खुद रंडीबाज़ी करने की? मुझे तो सोचकर ही चुदास चढ़ रही है.
एक बात तो कहनी ही पड़ेगी. भाभी, तुम्हारी चिट्ठियां पढ़ पढ़ के और अपनी चूत मे बैंगन पेल पेल के मेरे तो दोनो हाथ बहुत मजबूत हो गये हैं! पर यह कब तक चलेगा? तुम ने लिखा था तुम ने मेरे लिये कुछ सोच रखा है. वह क्या है भाभी? और वह कब होगा? मुझसे तो और प्रतीक्षा नही होती.
तुम्हारी वीणा
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मीना भाभी की अगली चिट्ठी जल्दी ही आ गयी. आजकल नीतु मेरे कमरे मे ताक-झांक करती रहती है कि आखिर मैं अपना दरवाज़ा बंद करके क्यों भाभी की चिट्ठी पढ़ती हूँ. इसलिये अब की बार मैं चिट्ठी लेकर छत पर चली गयी.
हमारे घर के आंगन मे बहुत से पेड़ हैं जिसके कारण छत पर काफ़ी एकन्त है. मैं छत के एक कोने मे बैठकर भाभी की चिट्ठी पढ़ने लगी. और साथ ही अपनी साड़ी मे हाथ डालकर अपनी चूत सहलाने लगी.
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मेरी प्यारी ननद,
आशा करती हूँ कि तुम मज़े मे हो और तुम्हारे घर पर सब लोग अच्छे है. (अच्छा बाबा, मैं जानती हूँ तुम्हारी चूत को महीने भर से कोई लौड़ा नही मिला है. पर मुझे तुम्हारा कुशल-मंगल तो पूछना चाहिये ना!)
कल शाम को हमारे घर पर एक शानदार दावत हुई. दावत मे सिर्फ़ मै, तुम्हारे बलराम भैया, मेरा देवर किशन, तुम्हारे मामाजी और मामीजी, नौकर रामु और उसकी जोरु गुलाबी थे. तुम भी होती तो मज़ा चौगुना हो जाता!
सुबह नाश्ते के बाद ही ससुरजी ने रामु को बुला भेजा और कहा, "रामु, आज शाम को एक दावत करनी है."
"जी मालिक. कितने मेहमान आ रहे हैं?" रामु ने पूछा.
"कोई मेहमान नही आयेंगे. बस हम लोग ही होंगे." ससुरजी बोले, "तु किशन के साथ हाज़िपुर बाज़ार जा और सब सामान लेकर आ. खाने का सामान तेरी मालकिन बता देगी - पर मुर्गा और गोश्त ज़रूर लाना. और हाँ, चार बोतल ओल्ड मॉन्क के ले आना. साथ मे कोकाकोला के दो बड़े बोतल ले आना."
"ई ओल्ड मॉन्क का है मालिक?" रामु ने पूछा.
"दारु है. दुकान मे बोलना वह दे देंगे."
"मालिक, दावत मे दारु भी चलेगा?" रामु ने पूछा, "आप तो पीते नही हैं."
"कभी कभी तो पी ही लेता हूँ."
"पर चार-चार बोतल? आप अकेले इतना सारा कैसे पीयेंगे?"
"अरे मैं अकेले क्यों पियुंगा? सब लोग पीयेंगे." ससुरजी बोले.
"बड़े भैया और किसन भैया भी आपके साथ पीयेंगे का?"
"तु ज़्यादा बहस मत कर. जो बोल रहा हूँ कर." ससुरजी झल्लाकर बोले.
"जी मालिक."
"और बलराम से पैसे भी ले लेना."
"मालिक, बड़े भैया हमको मारेंगे तो नही?" रामु ने डरकर कहा. जबसे मेरे पति ने उसे मेरी चुदाई करते पकड़ा था वह उनसे बच-बच के रह रहा था.
"कुछ नही कहेगा वो." ससुरजी बोले, "डरपोक कहीं का! परायी औरत के साथ मुंह भी काला करता है और उसके पति से डरता भी है. चल भाग जल्दी!"
रामु किशन को लेकर बाज़ार चला गया. तुम्हारे भैया खेत का काम देखने चले गये. मै, गुलाबी और सासुमाँ शाम के दावत की तैयारी मे लग गये.
दिन भर किसी ने और चुदाई नही की. दोपहर के भोजन के बाद हम लोग सो भी गये.
शाम को उठकर दावत के लिये खाना पकाया गया. सब कुछ तैयार होते होते रात के 7-8 बज गये.