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रामु का लन्ड मेरी गांड मे पेलड़ तक घुस गया. हालांकि मैं गांड बहुत मरवा चुकी थी, पर रामु का लन्ड औरों की अपेक्षा मोटा है. मेरे गांड की स्नायु पूरी फैल गयी और मेरी गांड उसके लन्ड से पूरी भर गयी.
मेरी चूत मे मेरे देवर का लन्ड भी पेलड़ तक घुसा हुआ था. मेरा शरीर एक सुखद अनुभुति से सिहरने लगा. मेरे गांड और चूत के स्नायु दोनो लौड़ों को जकड़ने लगे.
"आह!! रामु, अब मेरी गांड को अच्छे से मारो!" मैने कराहकर कहा, "देवरजी, तुम भी मेरी चूत को अच्छे से मारो!"
किशन नीचे से अपनी कमर उचकाने लगा जिससे उसका लन्ड मेरी चूत मे आने-जाने लगा. रामु ने अपना लन्ड खींचकर सुपाड़े तक निकाल लिया, फिर धक्का लगाकर अन्दर तक पेल दिया. दोनो मिलकर मेरी चूत और गांड का कचूमर बनाने लगे.
5-7 मिनट की लगातार ठुकाई के बाद मैं और खुद को सम्भाल नही पायी. एक तो शराब का नशा. ऊपर से मेरी चूत और गांड मे दो दो मोटे लन्ड! मैं अपने आपे से बाहर हो गयी. मैं जोर जोर से मस्ती मे कराहने लगी और बिस्तर के चादर को मुट्ठी मे लेकर नोचने लगी.
"ऊह!! रामु! कितना मज़ा आ रहा है...तुम्हारा काला लन्ड...गांड मे लेने मे!! आह!! आह!! देवरजी! और जोर से पेलो! उम्म!! और जोर से! रामु! आह!! फाड़ दो मेरी गांड! आह!! मैं बस झड़ने वाली हूँ! ओह!!"
रामु जोर जोर से मेरी गांड को पेलने लगा. "ले साली कुतिया! गांड मराने का...बहुत शौक है न तुझे! ले मेरा लन्ड गांड मे...ले और जी भर के झड़!" रामु बोला.
मेरी चूत और गांड मे एक साथ दो दो लन्डों की पेलाई से मुझे इतना तीव्र सुख मिलने लगा कि मैं जोर से झड़ गयी. जोर जोर से आह!! आह!! आह!! आह!! करके मैं अपना पानी छोड़ने लगी.
"अरे किसन भैया!" रामु बोला, "ई साली तो झड़ गयी! ठहर, साली! हम भी तेरी गांड भरते हैं अपनी मलाई से!"
मैं इधर झड़ रही थी और उधर रामु जोर जोर से मेरी गांड मारते हुए झड़ने लगा. वह मेरी पीठ पर लेट गया था और ऊंघ!! ऊंघ!! करके मेरी गांड की गहराइयों मे अपना वीर्य भरने लगा.
रामु झड़ गया तो तुम्हारे मामाजी बोले, "रामु, तु उतर. अब मैं थोड़ी बहु की चूत मारुं."
आज्ञाकारी सेवक की तरह रामु मेरी पीठ पर से उठ गया और मेरी गांड से अपना चिपचिपा लन्ड निकाल लिया. मेरी गांड से उसका वीर्य रिसने लगा.
मेरा देवर अब भी मुझे नीचे से चोदे जा रहा था.
ससुरजी उसके पाँव के बीच बैठे तो मैने सोचा अब वह मेरी गांड मे अपना लन्ड डालेंगे. पर वह अपने लन्ड का सुपाड़ा मेरी चूत पर दबाने लगे.
"बाबूजी, यह आप क्या कर रहे है?" मैने हैरान होकर पूछा.
"तेरी चूत मे अपना लन्ड घुसा रहा हूँ, बहु!"
"पर बाबूजी, मेरी चूत मे तो पहले से ही देवरजी का लन्ड है!"
"अरे तु रुक ना!" ससुरजी ने कहा. वह अपना लन्ड पकड़कर मेरी चूत मे घुसाने की कोशिश कर रहे थे. "चूत मे दो दो लन्ड लेगी तो बहुत मज़ा आयेगा. तु पहले कभी ली नही ना, इसलिये डर रही है. बलराम और मैने तेरी सास की चूत मे एक साथ अपना लन्ड डाला था. वह भी बहुत मज़ा ली थी."
"पर बाबूजी, सासुमाँ की चूत तो पूरी भोसड़ी है. मेरी चूत तो फट जायेगी!"
"चूत मराकर कभी कोई चूत फटी नही है, बहु! चाहे लन्ड एक हो कि पांच. बस...प्यार से...डालना चाहिये..." ससुरजी मेरी चुत पर अपने मोटे सुपाड़े को दबाकर बोले.
मै किशन के लन्ड को चूत मे लिये उसके नंगे सीने पर पड़ी रही. अपनी मुट्ठी मे मैने बिस्तर के चादर को जोर से पकड़ रखा था.
थोड़ी कोशिश के बाद ससुरजी के लन्ड का सुपाड़ा मेरी चूत मे घुस गया. मेरे कमर को पकड़कर उन्होने अपने कमर से जोर लगाया तो उनका लन्ड भी मेरी चूत मे पूरा घुस गया. अब बाप-बेटे दोनो के लन्ड साथ साथ मेरी चूत मे घुसे हुए थे.
वीणा, मुझे लग रहा था जैसे मेरी चूत चौड़ी होकर इंडिया गेट बन गयी है! मैने पहले कभी अपनी चूत को इतना भरा हुआ महसूस नही किया था.
अब बाप और बेटा मेरी चूत को मिलकर चोदने लगे. कभी कभी ताल मे उन दोनो का लन्ड एक साथ मेरी चूत मे घुसता और निकलता. और कभी एक घुसता तो दूसरा निकलता. अपनी इस मजबूर हालत में मुझे इतना मज़ा आने लगा कि मैं फिर से गरम हो गयी.
उन दोनो के लन्ड मेरी चूत के अन्दर एक दूसरे से घिस रहे थे और उन्हे बहुत आनंद आ रहा था. किशन ने ऐसा मज़ा पहले कभी नही लिया था. वह मस्ती मे कराहने लगा और झड़ने लगा.
ससुरजी भी और एक मिनट ही पेल सके. वह भी मेरी चूत मे अपना वीर्य छोड़ने लगे. दोनो बाप और बेटे एक साथ अपने वीर्य से मेरी चूत की सिंचाई करने लगे.
मेरी चूत इतनी चौड़ी हो गयी थी कि लन्डों की पेलाई से "फचक! फचक!" आवाज़ हो रही थी और हर धक्के के साथ बहुत सारा वीर्य बाहर निकल रहा था.
पूरे झड़ जाने के बाद ससुरजी मेरी पीठ पर लेट गये. उनका लन्ड मेरी चूत मे घुसा ही रहा. मैं अपने ससुर और देवर के बीच पिचक कर पड़ी रही. मेरी प्यास अभी बुझी नही थी, पर यह दोनो तो खलास हो गये थे.
उधर रामु जो अब तक मेरी चुत की दोहरी चुदाई देख रहा था, खिड़की के पास गया और बाहर देखने लगा.
फिर पलंग के पास आकर बोला, "मालिक, जरा उठकर देखिये अमोल भैया का कर रहे हैं!"
"क्या कर रहा है अमोल?" मैने उत्सुक होकर पूछा, "अपनी दीदी की सामुहिक चुदाई देख रहा है कि नही?"
"नही, भाभी. खिड़की के पास आइये तो दिखायें!" रामु ने कहा.
ससुरजी मेरी पीठ पर से उठ गये और उन्होने मेरी चुत से (जिसे अब भोसड़ी कहना ज्यादा ठीक होगा) अपना लन्ड निकाल लिया. मैं जल्दी से किशन के ऊपर से उठ गयी और नंगी ही खिड़की के पास चली गयी. मेरी चूत से मेरे ससुर और देवर का भरपूर वीर्य निकलकर मेरी जांघों पर बहने लगा.
मेरा नशा थोड़ा उतर गया था. इसलिये मेज़ के ऊपर से मैने शराब की बोतल भी उठा ली और जल्दी से दो घूंट गले से उतार ली.
कमरे की खिड़की बगीचे मे खुलती थी. यहीं खड़े होकर अमोल ने मेरी चुदाई देखी थी. पर अब वह वहाँ नही था.
खिड़की से थोड़ा हट के बगीचे मे एक नींबू का पेड़ है. वहाँ घाँस पर सासुमाँ लेट हुई थी. वह ऊपर से नंगी थी और उनकी साड़ी और पेटीकोट कमर तक चढ़ा हुआ था. अमोल उनके ऊपर चढ़ा हुआ था. वह पूरा नंगा था और हुमच हुमचकर सासुमाँ को चोद रहा था. उसका गोरा गोरा लन्ड सासुमाँ को मोटी बुर के अन्दर बाहर हो रहा था. वह सासुमाँ की विशाल चूचियों को मसल रहा था और सासुमाँ उसके जवान होठों को मज़े से पी रही थी. दोनो चुदाई मे इतने डूबे हुए थे कि उन्हे खबर ही नही थी कि हम उन्हे देख रहे हैं.
तभी पीछे से कमरे का दरवाज़ा खुला और मेरे पतिदेव अन्दर आये. आते ही उन्होने देखा हम चारों नंगे होकर खिड़की के बाहर झांक रहे हैं.
उन्हे देखते ही मैं मुस्कुरा दी.