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रहस्यमई आँखें complete

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नंदिनी किसी तरह से शहर में एक थाने तक पहुंची.

“यहाँ का इनचार्ज कौन हैं?” नंदिनी ने अन्दर जाकर एक हवलदार से पूछा.

हवलदार ने एक बार नंदिनी को ऊपर से नीचे घुरा. नंदिनी पूरी अस्त-व्यस्त थी. बाल बिखरे हुए थे. रात को ठीक से न सो पाने की वजह से उसकी आँखे भी सूजी हुई थी.

“आप कौन मेडम? क्या काम हैं आपको?” उस हवलदार ने पूछा.

“मैं जयपुर ब्लाक डी से एसीपी नंदिनी हूँ.” नंदिनी ने अपनी जेब से आईडी कार्ड निकाल कर दिखाते हुए कहा. यह तो गनीमत थी की नंदिनी आईडी कार्ड अपनी जेब में ही रखती थी वरना उसका पर्स, मोबाइल सब तो वही जीप में ही रह गया था.

“जय हिन्द मैडम....” उस हवलदार ने सैल्यूट करते हुए कहा. “माय सेल्फ कांस्टेबल मनीष.”

“जय हिन्द! मुझे यहाँ के इंचार्ज से मिलना हैं.” नंदिनी ने कहा.

“मैडम वो अभी आते ही होंगे, मैं अभी उन्हें फोन कर देता हूँ. आप यहाँ अचानक?” हवलदार ने वापस नंदिनी की हालत को देखते हुए पूछा. उसे यह समझ में नही आ रहा था कि नंदिनी यहाँ इस हालत में क्यों आई हैं.

“किसी केस के सिलसिले में मिलना हैं. मैं एक फोन कर सकती हूँ?”

“ जी बिलकुल मैडम...आप अन्दर केबिन में बेठिये, मैं चाय भिजवाता हूँ.” कांस्टेबल किसी को फोन करता हुआ बाहर चला गया.

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जयपुर के थाने में केबिन में सामने एक तरफ राणा ठाकुर बैठे थे तो दूसरी तरफ विजय बैठा था. विजय राणा ठाकुर के व्यक्तित्व को जानता था इसलिए उन्हें लॉकअप में रखने की बजाय एसी केबिन में बिठाया था.

“आपको उन ट्रक ड्राइवर्स के बारें में कैसे पता चला? क्या वो ट्रक आपके थे?” विजय ने पूछा.

“कैसी बात कर रहे हो विजय? हम तुम्हे इतने पागल लगते हैं कि खुद अपनी ट्रक पकडवाएंगे. वो तो उस ढाबे का मालिक हमारा दोस्त था, उसने उन ड्राइवरो को बात करते हुए सुना तो उसे कुछ शक हुआ, तो उसने हमको बता दिया.”

“हां...लेकिन ऐसे मामलो में तो अमूमन लोग पुलिस वालो को फोन करते हैं, उसने आपको क्यों बताया और उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की?”

“हमें क्या पता उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की और पुलिस की मदद करना कोई अपराध हैं क्या?” राणा ने थोडा सा गंभीर होते हुए कहा.

“हम्म...नही ऐसा तो नही हैं. नंदिनी की किडनेपिंग के बारें में आप क्या जानते हैं?”

“इस बारें में हम कुछ नही जानते हैं.” राणा ने सधा सा जवाब दिया.

“क्या ताश्री के केस का इससे कोई लेना देना हैं?”

“हम तुम्हे पहले ही बता चुके हैं कि हम ताश्री के मामले में कुछ नही जानते हैं.”

“हां...मगर आपने यह नही बताया कि ताश्री की मौत के बाद उसकी माँ आपकी ही एक होटल में काम करती थी.”

“क्या...?” राणा ने हडबडाते हुए पूछा.

“मुझे पता हैं राणा साहब...शुक्र मनाइए कि आपका लिहाज था कि की मैंने नंदिनी को इस बारें में अब तक कुछ नही बताया. ताश्री की माँ अब कहा हैं?”

“उनका नंदिनी के अपहरण से कुछ भी लेना देना नही हैं.”

“इस सब का एक दुसरे से कुछ न कुछ तो लेना देना हैं राणा साहब...यह नंदिनी की ज़िन्दगी का सवाल हैं, बेहतर हैं आप मुझे सबकुछ सच सच बता दे, वरना मेरे पास दुसरे तरीके भी हैं.”

“ठीक हैं मैं उन्हें जानता हूँ... मैं ताश्री को भी जानता था. मगर उस सबका अब क्या करना हैं? अगर नंदिनी की जान खतरे में हैं, तो बेहतर हैं कि मुझसे नही उससे सवाल करो जिसको इस केस के खुलने से सबसे ज्यादा खतरा हैं.”

“आपकी किसकी बात कर रहे हैं?”

“संगठन के अध्यक्ष मृत्युंजय महाराज.”

“मृत्युंजय महाराज जेल में हैं. वो नंदिनी का अपहरण कैसे करवा सकते हैं?”

“तो फिर तुम संगठन के वर्तमान अध्यक्ष को पकड़ो.”

“वेद सागर..उसके बारें में कोई कुछ नही जानता हैं. मैं सिर्फ शक की बिनाह पर एक राष्ट्रिय संस्था के खिलाफ कार्यवाही नही कर सकता हूँ. मेरे लिए अभी नंदिनी को बचाना बहुत जरुरी हैं, और अगर इसमें संगठन का हाथ हैं तो मेरी मदद सिर्फ दो लोग कर सकते हैं या तो आप या फिर ताश्री की माँ!”

“तुम नंदिनी से प्यार करते हो न?”

अचानक राणा के पूछे गये इस सवाल से विजय झेंप गया. “मुझे तो उसी दिन पता चल गया था, जब तुम पहली बार नंदिनी के साथ मेरे घर आये थे.” राणा कुछ देर रुका. “मैं वेद के बारें में कुछ नही जानता हूँ लेकिन जो सकता हैं ताश्री की माँ जानती हो...वो इस वक्त जोधपुर में हैं. मेरे एक मित्र के होटल धोराराणी में काम करती हैं.”

“शुक्रिया राणा साहब, मैं आपका अहसानमंद हूँ.”

तभी विजय का फोन बजा.

“हेल्लो कौन? इंस्पेक्टर विजय हियर.”

“विजय में नंदिनी बोल रही हूँ.”

“नंदिनी! तुम कहाँ हो नंदिनी?” विजय ने चौंकते हुए कहा. राणा ने भी आश्चर्य से विजय की और देखा.

“मैं अभी हरिद्वार मैं हूँ, बड़ी मुश्किल से उन गुंडों के चुंगल से भाग कर आई हूँ. अभी यहाँ एक पुलिस स्टेशन से फोन किया हैं.”

“तुम ठीक तो हो न?” विजय ने चैन की सांस लेते हुए कहा.

“हां मैं बिलकुल ठीक हूँ. मुझे कुछ पैसो और एक फोन की जरूरत हैं.”

“ठीक हैं वहां के इनचार्ज से मेरी बात करवा दो. मैं सब कुछ करवा दूंगा और तुम्हारे लिए आज शाम का फ्लाइट का टिकट भी करवा देता हूँ.”

“ठीक हैं.”

“ठीक हैं अपना ख्याल रखना.”

इसके बाद विजय ने फोन रखा. राणा उसे घुर रहा था जैसे बिना ईद के कोई बकरा कट गया हो.

“मिस नंदिनी कैसी हैं?” राणा ने संयत होते हुए पूछा.

“वो ठीक हैं. किसी तरह से उन गुंडों की गिरफ्त से भाग छुटने में कामयाब रही.”

“हम्म...तो मैं अब जा सकता हूँ?”

“जी...बिलकुल...मैं आपको जो तकलीफ हुई उसके लिये माफ़ी चाहता हूँ.” राणा ने एक बार फिर विजय को घुरा और बाहर चला गया.

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इंस्पेक्टर यशपाल ने केबिन में प्रवेश किया. अन्दर नंदिनी ने अभी फोन रखा ही था.

“जय हिन्द मैडम...मैं इंस्पेक्टर शर्मा यहाँ का इनचार्ज...” इंस्पेक्टर ने नंदिनी से हाथ मिलाते हुए कहा.

“मैं एसीपी नंदिनी...” नंदिनी को अपनी हालत पर तरस आ रहा था. वो इससे ज्यादा कुछ नही बोल पाई.

“जी कहिये मैडम मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ. इंस्पेक्टर ने अपनी सीट पर बैठते हुए कहा.

“आप इस नंबर पर बात कर लीजये वो आपको सब समझा देगा.” नंदिनी ने एक नंबर डायल करते हुए कहा.

“जी मैडम...”

नंदिनी ने विजय को फोन किया था, विजय ने उस इंस्पेक्टर को सब समझा दिया.

“मैडम यह मेरा क्रेडिट कार्ड हैं..२५२५ इसके पिन हैं..आपको जितना कैश चाहिए आप इसके जरिये निकाल सकती हैं...मैं यही पास ही एक होटल में कमरा बुक करवा रहा हूँ और आपको एक फोन भी दिलवा देता हूँ...”

“थैंक यू..” नंदिनी ने बस इतना ही कहा. इंस्पेक्टर कुछ देर के लिए बाहर गया और वापस आया.

“सब हो गया हैं मैडम...टैक्सी कुछ देर में आती ही होगी. और कुछ...”

“थैंक्स अगेन...मुझे एक हेल्प और चाहिए थी. यहाँ किसी जेल में मृत्यंजय महाराज करके कोई कैदी हैं, आप मुझे उसके बारें में डिटेल्स दे सकते हैं?”

“आप कही बिएसएस के अध्यक्ष श्री मृत्युंजय जी महाराज की बात तो नहीं कर रही हैं?”

“जी वहीँ...आप जानते हैं उनके बारें में?”

“उनके बारें में कौन नही जानता...२०१३ का सबसे हाई प्रोफाइल केस रहा हैं यहाँ का... मुझे तो अब तक विश्वास नही होता की मृत्युंजय जी महाराज ऐसा काम कर सकते हैं.”

“वो इस वक्त कौनसी जेल में हैं?”

“शायद सेंट्रल जेल में होंगे. वैसे उनका केस पास ही के एक थाने में था. मैं वहां के इनचार्ज से बात कर लेता हूँ वो आपको सारी जानकारी दे देंगे.”

“जी शुक्रिया..”

तभी एक हवलदार आया.

“सर...वो टैक्सी आ गयी हैं.”

“मैं चलती हूँ.” नंदिनी ने कहा और टैक्सी में बैठ गयी.

नंदिनी के जाने के बाद इंस्पेक्टर ने अपना फोन निकाला और किसी को फोन किया.

“जय महाकाल. हम नागपाल बोल रहे हैं.”

“जय महाकाल”

 
“हमें श्री वेद सागर जी से बात करनी हैं.”

“वेद सागर जी से?” सामने वाले ने चौंकते हुए कहा. “कोई विशेष प्रायोजन?”

“यह उस एसीपी नंदिनी के बारें में हैं.”

“एसीपी नंदिनी...ठहरिये अभी बात करवाते हैं.”

इतना कहकर सामने वाले ने फोन काट दिया. कुछ देर बाद वापस फोन आया.

“जय महाकाल...हम वेद सागर बोल रहे हैं.”

जय महाकाल...मैं राजपाल यहाँ हरिद्वार के....”

“हमें ज्ञात हैं...नंदिनी के बारें क्या जानते हो?”

“वो यहाँ आई थी. श्री मृत्युंजय महाराज से मिलने के लिए कह रही थी.”

“अवश्य...स्वयं मृत्यंजय महाराज भी यही चाहते हैं. उसे सुविधापूर्वक महाराज से मिलवाया जाए.”

“जी महोदय...और उसके बाद अगर कहे तो वापस उसे....”

“नही...उसकी कोई आवश्यकता नही हैं. उसे मुक्त रहने दीजिये. हमारा प्रायोजन पूरा हुआ.”

“जैसी आपकी आज्ञा.”

“आपका आभार.”

नंदिनी होटल गयी और वहां से वापस थाने गयी। इंस्पेक्टर ने पहले ही दूसरे थाने में बात कर रखी थी, वहां से एक* हवलदार आया हुआ था जो नंदिनी को जेल लेकर गया। वहां गेट पर एक पहरेदार ने एंट्री की और एक दूसरे व्यक्ति ने उन्हें अपने पीछे आने को कहा।

'तुम यही रुको मैं उससे अकेले में मिलना चाहती हूँ।" नंदिनी ने अपने साथ आये हवलदार से कहा।

वो व्यक्ति नंदिनी को अंदर एक बैरक में लेकर गया। "यहीं हैं वो" उसने सामने एक आदमी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

नंदिनी ने देखा कि सलाखों के पीछे एक आदमी बैठा हुआ था। उसने सामने दिवार की तरफ मुंह कर रखा था।

"महाभारत का युद्ध जितना पांडवों के लिए असंभव था अगर श्री कृष्णा उनके साथ न होते...श्री कृष्ण ने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया बल्कि वे मात्र अर्जुन के सारथि थे, किन्तु क्या यह सत्य था? शतरंज में चाल हमेशा मोहरे से चली जाती हैं इसका यह अर्थ तो नही कि खेल मोहरा खेल रहा हैं। वह तो एक माध्यम मात्र हैं, असली खेल तो खिलाडी खेलता हैं। तो युद्ध कौन लड़ रहा था, अर्जुन या कृष्ण?" उसने बिना नंदिनी की ओर देखे ही कहा।

"उससे फर्क क्या पड़ता हैं?" नंदिनी ने पास जाते हुए कहा।

"फर्क पड़ता हैं नंदिनी...तुम कौन हो कृष्ण या अर्जुन?" उसने मुड़ते हुए कहा। यह एक 55 साल का प्रौढ़ आदमी था। लंबी दाढ़ी, सफेद बाल, चेहरे पर हलकी झुर्रियां मगर आँखो में एक चमक...ऐसा लगता था मानो किसी तेज तर्रार* सांप को टोकरी में बंद कर रखा हो। नंदिनी* एक बारगी तो अपना नाम सुनकर चौंकी मगर फिर उसे लगा कि अगर मृत्यंजय ने उसका अपहरण करवाया है तो ज़रूर वो उसके बारे में जानता होगा।

"मैं कोई युद्ध नही लड़ रही हूँ।" नंदिनी ने उसकी आँखों में देखते हुए।

"हम सब लड़ रहे हैं। कोई अपना युद्ध तो कोई दूसरे का, कोई कृष्ण है, कोई पार्थ हैं, कोई दुर्योधन हैं तो कोई कर्ण हैं। कोई जीतने के लिए लड़ रहा हैं तो कोई जीत कर भी लड़ रहा हैं।"

"तुम किसकी तरफ से युद्ध लड़ रहे हो?"

"मैं! नही नही...मैं कारक हूँ कर्ता नही। मैं धृतराष्ट्र हूँ जो सिर्फ युद्ध होते हुए देख रहा हूँ।"

"तब तो सबसे ज्यादा नुकसान भी तुम्हारा ही होगा।"

"हानि की चिंता वो करता हैं जिसके पास खोने के लिए कुछ होता हैं। शून्य हमेशा अविभाज्य होता हैं।" मृत्यंजय पहेलियों में बात कर रहा था, तो नंदिनी भी पहेलियों से ही जवाब ढूंढ रही थी। मगर जब बात बनती नज़र नही आई तो उसने सीधा सवाल पूछा।

"मेरे अपहरण के पीछे तुम्हारा हाथ था?"

"जिन प्रश्नो के उत्तर ज्ञात हो उन प्रश्नो में समय क्यों व्यर्थ करना।"

"तो फिर मुझे वो बताओ जो ज्ञात नहीं हैं, तुमने ताश्री को क्यों मारा?"

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।

आत्मा अजर-अमर हैं। हम किसी के प्राण नही हर सकते हैं। कब, किसको, कैसे मरना हैं, यह उस महान ईश्वर के हाथ में हैं। मैं कौन होता हूँ किसी को मारने वाला, सब उसकी इच्छा पर हैं।"

"....और वो लडकिया जो तुम्हारे आश्रम से मिली थी, वो वहां क्या कर रही थी?"

"साधना...ईश्वर से साक्षात्कार का एक मार्ग हैं। कोई भी इस मार्ग पर चल सकता हैं। अगर कुछ बालिकाएँ मेरे सानिध्य में,* ईश्वर की साधना करना चाहती थी तो इसमें आपत्ति क्या हैं? कोई युवा स्त्री अगर पुरुष के संग हो तो इसका यह अर्थ तो नही की हमेशा कुछ अनुचित ही होगा।"

"बेशक! मगर यह उद्देश्य पर निर्भर करता हैं। यह किस तरह की साधना थी, जिसमें मासूम लड़कियों की जान खतरे में आ गयी थी।" नंदिनी ने मृत्युंजय की फ़ाइल पढ़ी थी, जिससे उसे मृत्यंजय की गिरफ्तारी के वक्त उन लड़कियों की हालत के बारें में पता चला था।

"कुछ रास्ते बहुत ही दुर्भर होते हैं। ईश्वर की प्राप्ति आसान नहीं होती हैं।"

"ईश्वर की आड़ में तुम क्या करना चाहते थे यह कौन जानता हैं? वैसे भी तुम्हे तुम्हारे किये की सजा मिल ही रही हैं।" नंदिनी कह कर जाने के लिए मुड़ी।

"तुम यहाँ क्यों आई थी? अपने सवालो के जवाब जानने के लिए...मगर तुम तो अब भी अनुत्तरित ही हो।"

"मुझे दीवारो से सर पटकने का कोई शौक नही हैं। मैं जानती हूँ तुम मुझे कुछ नही बताने वाले हो। कोई अपनी चिता की लकड़ियाँ खुद नही जमाता।"

"हां, परन्तु कुछ महान लोग समाधि भी लेते हैं...हाहाहा.." मृत्युंजय ने ठहाका लगाया। "तुम सत्य को पाना चाहती हो, मगर सत्य की प्राप्ति आसान नही हैं। तुम साधना कर रही हो, मगर बिन गुरु के साधना कठिन हैं। तुम अपना गुरु ढूंढो।"

"तूम किसकी बात कर रहे हो?" नंदिनी ने चोंकते हुए कहा।

मृत्यंजय मुस्कुराया और वापस पीछे मुड़कर बैठ गया।

"जगतीमवितुं कलिताकृतयो विचरन्ति महामहसश्छलतः ।

अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥"

नंदिनी* बाहर आ गयी।

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नंदिनी ने शाम को फ्लाइट पकड़ी और वापस जयपुर आ गयी। एअरपोर्ट पर विजय पहले से ही खड़ा था। नंदिनी को देखते ही उसने गले से लगा लिया।

"तुम ठीक तो हो।" विजय ने नंदिनी को देखते हुए पूछा।

"हां...अब ठीक हूँ।" नंदिनी और विजय दोनों जीप में बैठ गए।

"कुछ पता चला यह किसका काम हैं?" विजय ने पूछा

"हां उसी संगठन का..."

"मगर संगठन ऐसा क्यों करेगा?"

"शायद वो नही चाहते की उनके बारे में किसी को ज्यादा पता चले। लेकिन मुझे एक बात समझ में नही आई मेरी पिस्तौल खाली कैसे थी?"

"क्या? तुम्हारी पिस्तौल खाली थी!"

"हां...मैंने जब अपने बचाव में फायरिंग करने की कोशिश की तो मुझे पिस्तौल खाली मिली और अजीब बात हैं कि किडनैपर्स को यह बात पहले से ही पता थी।"

"हम्म...यह जरूर दिनेश का काम होना चाहिए।"

"दिनेश का?" दिनेश उनका पहरेदार था।

"हां, वो आज सुबह ड्यूटी पर नही आया हैं, मैंने फोन किया तो उसका फोन बंद आ रहा था, घर पर फोन किया तो वहां भी कुछ* जवाब नही मिला। ऐसा लग रहा हैं कहीं भाग गया हैं।"

"उस दिन जब उस ड्राईवर ने आत्महत्या की थी वो तब भी ड्यूटी पर ही था।" नंदिनी ने आशंका व्यक्त की।

"हो न हो यह उसी का ही काम होगा। मैं सीसीटीवी फुटेज चेक करवाता हूँ।"

नंदिनी और विजय दोनों घर पहुंचे।

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"....तुम मृत्यंजय से मिली थी?" नंदिनी और विजय खाना खाते हुए बात कर रहे थे।

"हां...मगर आश्चर्य की बात यह हैं कि उसे पहले से ही पता था कि मैं वहां आने वाली हूँ।"

"तुम्हारे अपहरण के पीछे भी उसी का हाथ था?"

"उसने कबूल तो नही किया मगर उसकी बातों से लग रहा था कि हो न हो यह उसी का काम हैं।"

"उससे और कुछ पता चला?"

"कुछ ख़ास नही ऐसा लगता हैं यह सब वो किसी और से करवा रहा है। लगता है वेद सागर भी मृत्यंजय के इशारो पर काम कर रहा है, और अप्रत्यक्ष रूप से पूरा संगठन ही मृत्युंजय के हाथ में हैं...वो मुझे कोई गुरु ढूंढने को कह रहा था।" नंदिनी ने अचानक विजय से पूछा जैसे वो इस पहली का मतलब जानना चाहती हो।

"गुरु! मगर क्यों?"

"वो कह रहा था, अगर सत्य को पाना चाहती हो तो कोई गुरु ढूंढो। भला मुझे कौनसा सत्य जानना हैं?"

"सत्य कोई तथ्य न होकर तत्व हैं, यह एक उद्देश्य हैं, हम सब किसी उद्देश्य की और काम करते हैं, उस उद्देश्य का भान ही सत्य की प्राप्ति हैं।" विजय ने गंभीरता से कहा तो नंदिनी उसे घूरने लगी।

"मेरा उद्देश्य अब तुम ही हो।" नंदिनी ने विजय के हाथ के हाथ रखते हुए, प्यार से कहा। "जब उन गुंडों ने मेरा अपहरण किया था तब मैं तुम्हारे बारें में ही सोच रही थी कि अगर मुझे कुछ हो गया तो हमारा प्यार सिर्फ एक दिन की दास्ताँ बन कर ही रह जाएगा।"

"हा हा...नही ऐसा कुछ नही होगा, अभी हमें अपनी ज़िन्दगी में बहुत कुछ करना बाकि हैं। तुम अब बहुत थक गयी होगी, आराम कर लो।"

"हम्म...दो दिन से नींद पूरी नही हुई हैं, मुझे अब सो जाना चाहिए।"

"गुड़ नाइट।"

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सुबह नंदिनी और विजय दोनों थाने पहुंचे।

"...मगर तुम राणा को थाने क्यों लाये?" केबिन में बैठे दोनों बातें कर रहे थे।

"मुझे शक था कि तुम्हारे अपहरण के बारें राणा कुछ न कुछ जरुर जानता हैं और न भी जानता हो तब भी कुछ न कुछ मदद कर सकता हैं।"

"तो फिर उसने कुछ मदद की?"

"नही...उसने ताश्री की माँ के बारें में भी गलत बताया था।"

"ताश्री की माँ के बारें में! वो ताश्री की माँ के बारें में क्या जानता है?"

"नंदिनी...मैंने तुम्हे बताया नही था पर ताश्री की मौत के बाद ताश्री की माँ राणा के ही एक होटल में। काम करती थी।"

"लगा ही था।" नंदिनी ने शांत रहते हुए कहा। "तो उसने क्या बताया?"

"मैंने उससे पूछा था कि वो अब कहाँ हैं? उसने एक एड्रेस दिया था वो भी गलत निकला।"

"संगठन का हर व्यक्ति एक बात अच्छी तरह से जानता हैं और वो हैं छल करना, राणा अगर सचमुच संगठन का आदमी हैं तो वो तुम्हे कभी सही जानकारी नही देगा।"

"मुझे लगा ही था, इसलिए मैंने दूसरा तरीका अपनाया।"

"दूसरा तरीका?"

"हां मैंने राणा की कॉल डिटेल्स निकलवाई थी। और तुम जानती हो उसने यहाँ से बाहर निकलते ही किसे फोन किया था? ताश्री की माँ को।"

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी के पास भी भटकने की?" मेरी माँ ने अंदर आते हुए कहा. अंतस एक तरफ खड़ा हो गया जैसे किसी को सम्मान में आने के लिए रास्ता दे रहा हो. "मैं जानती थी मृत्यंजय किसी न किसी को तो भेजेगा मगर ये तुम होंगे मुझे विश्वास नहीं हो रहा हैं, मेरा नहीं तो कम से कम ताश्री के पिता का तो ख्याल किया होता, तुम्हे ज़रा सी भी शर्म नही आई." उन्होंने अंतस को किसी छोटे बच्चे की तरफ डाँटते हुए कहा. मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा था, कि माँ सच में अंतस को जानती थी. इसका मतलब था कि अंतस जो कुछ कह रहा था वो सब सच था. दूसरा माँ कह रही थी कि मृत्युंजय किसी न किसी को जरूर भेजेगा. मृत्यंजय भला किसी को क्यों भेजेगा.

"माँ आप मेरी बात तो सुनिए..." अंतस जैसे मिमियाया. ऐसा लग रहा था इस परिस्थिति में क्या कहना हैं उसे भी समझ में नही आ रहा हैं. उसकी सारी वाकपटुता माँ के सामने जैसे सुन्न पड़ गयी थी.

 


"कोयल को कौआ पाले तब भी वो रहती तो कोयल ही हैं, तुम तो अपनी जात तक भूल गए. ऐसा कौनसा लालच दिया मृत्यंजय ने तुम्हे जो तुम इस हद तक गिर गए..."

"आप जैसा सोच रही हैं वैसा कुछ नही हैं, मैं तो बस ताश्री..."

"...ताश्री संगठन के बारें में जानती हैं?" अंतस अपनी बात भी नही कह पाया था कि माँ ने सवाल दागा. माँ ने अब तक मेरी और देखा तक नही था, जैसे मुझसे उन्हें कोई मतलब ही नही हो.

"मुझे बताना पड़ा, राणा के लोगो ने कल मुझ पर हमला किया था."

मैंने अंतस का बचाव करते हुए कहा. वैसे मुझे कुछ समझ में तो नही आ रहा था पर इस तरह से अंतस का बेइज्जत होना अच्छा नही लगा रहां था.

"मैं गलत समझ रही हूँ? और तुम क्या जानती हो इसके बारें में, तुम तो इसका सही नाम तक नही जानती हो. क्यों ऋषि क्या नाम बताया तुमने इसे "अन्तस" और यह नही बताया कि तुम कौन हो और यहाँ क्यों आये हो?"

"मैं जानती हूँ माँ यह तांत्रिक हैं.." अब मैं भी गुस्से में थी, आखिर मेरी माँ ने मुझसे इतने लंबे वक्त तक झूठ बोला था और ऊपर से वो अंतस को ही डांटे जा रही थी. "...और यह कौन हैं उससे ज्यादा मतलब मुझे इस बात से हैं कि आप कौन हैं और इस तस्वीर में आपके साथ यह आदमी कौन हैं?" मैंने अपने पर्स से वो तस्वीर निकालकर माँ को दिखाते हुए कहा.

"यह तस्वीर इसे तुमने दी?" माँ ने मुझे नज़रअंदाज करते हुए अन्तस से पूछा. वो चुपचाप बिना कुछ बोले खड़ा था.

"आपने मुझे मेरे पिता के बारें में क्यों नही बताया माँ?" मैंने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा.

"तुम अपने पिता के बारें में सबकुछ जानती हो, रणवीर ही तुम्हारे पिता हैं." मेरी माँ ने मुझे घूरते हुए कहा.

"तो फिर तस्वीर में आपके साथ यह आदमी कौन हैं?" मैंने भी उन्हें घूरते हुए ही कहा.

"मैं तुम्हे बताती ताश्री, अगर तुमने यह सवाल किसी अजनबी की बजाय, सीधा मुझसे ही पूछा होता, मगर तुम समझने की बजाय जानने में विश्वास रखती हो . इसीलिए आज तुम सबकुछ जानकर भी अनजान हो. ना तुम मुझे जानती हो, न ऋषि को और न ही अपने पिता के बारें मे...

"माँ मेरा कोई भी गलत इरादा नही था, अगर आप मौका दे तो मैं आपको समझा सकता हूँ." अंतस ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, वो जानता था माँ ने मुझे शब्दों के चक्रव्यूह में फंसा दिया था जिससे निकलना मेरे लिए असंभव था.

"मुझे अब कुछ भी जानना और समझना नही हैं. सिर्फ एक बात तुम अच्छी से समझ लो, अगर आज के बाद मेरी बेटी के आसपास नज़र भी आये तो यह तुम्हारे और तुम्हारे संगठन दोनों के लिए अच्छा नही होगा, तुम जानते हो मैं क्या कर सकती हूँ." माँ ने अंतस को धमकी देते हुए कहा. "चलो यहाँ से ताश्री."

"माँ...मगर...वो.." मैंने माँ को रोकते हुए कहा.

"ताश्री....चलो.." माँ ने जैसे आदेश देते हुए कहा. मेरे पास उसे मानने के अलावा और कोई रास्ता नही था. अन्तस ने मेरी और देखा और वापस अपनी नज़रे झुका ली. वो कुछ नही बोला.

मैं माँ के साथ बाहर आ गयी. होटल के नीचे आकर हम दोनों खड़े हो गए. माँ ने फोन निकाला और किसी को फोन किया. मुझे मैं असमंजस में थी कि हम दोनों यहाँ क्यों खड़े हैं, ऑटो तो बाहर से ही मिलना हैं. तभी हमारे सामने एक लंबी सी कार आकर रुकी. यह शायद जैगुआर थी.

"अंदर बैठो." मैं कार को निहार ही रही थी, तभी माँ ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा. मैंने माँ को आँखे फाड़ कर देखा कि अब यह कौनसा नया बखेड़ा हैं, मगर वो बिलकुल सामान्य बनी हुई थी जैसे यह कोई बड़ी बात नही हैं.

"ताश्री..." माँ ने मेरी तन्द्रा तोड़ते हुए कहा. मैं चुपचाप कार में बैठ गयी. कार कोई ड्राईवर चला रहा था, मैं पीछे की सीट पर थी इसलिए उसका चेहरा नही देख पाई.

काफी देर तक हम दोनों खामोश बैठे रहे. कोई कुछ नही बोला.

"तुमने ऋषि की आँखों में क्यों नही देखा?" माँ ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

मैंने कुछ नही कहा बस चुपचाप बैठी रही. शायद इस सवाल का जवाब में खुद नही जानती थी या जानती भी थी तो बता नही सकती थी.

"क्या बेहतरीन चाल चली हैं मृत्युंजय ने, हमारे ही मोहरे से हमें ही मात दे दी. सबसे बेहतरीन ढाल के लिए सबसे बेहतरीन तलवार.."

"आप अंतस को कैसे जानती हैं?" मुझे उसे ऋषि बुलाना अच्छा नही लग रहा था. मैंने उसे शुरूसे ही अंतस ही माना था और वो मेरे लिए अंतस ही रहेगा, चाहे यह झूठ ही क्यों न हो.

"तुम्हे याद हैं उस दिन तुमने मुझसे कहा था कि तुमने अपने सपने में अपने पिता के साथ एक लड़का देखा हैं आठ साल का...वो ऋषि ही था. तुम उसे जानती हो ताश्री, तुम उसे तब से जानती हो जब से तुम पैदा हुई थी, तुम दोनों साथ में खेले हुए हो.

"तब तुम चार साल की थी, यह सब कुछ याद रखने के लिए तुम बहुत ही छोटी थी. उस वक्त तुम्हारा सिर्फ एक ही दोस्त था ऋषि, तुम पुरे दिन उसी के साथ खेलती रहती थी. जब तुम पैदा हुई थी ऋषि सिर्फ चार साल का था मगर किसी बड़े की तरह तुम्हारी देखभाल करता था.

वो तुम्हे अब याद नही होगा मगर तुम उसे पूरी तरह से भूली भी नही हो, तुम्हारे अंतर्मन में वो अब भी कहीं बसा हुआ हैं, वो तुम्हारा अंतस ही हैं. मृत्युंजय यह बात अच्छी तरह से जानता था. उसने तुम्हे अपने अंतर्मन से ही लड़ने पर मजबूर कर दिया. तुम्हारी ताकत को ही तुम्हारी कमजोरी बना दिया. अगर ऋषि की जगह कोई भी और होता तो तुम उसकी आँखों में झांक कर सारा सच जान लेती मगर तुम चाहकर भी उसकी आँखों में नही देख पाई क्योंकि अगर तुम ऐसा करती तो तुम हमेशा के लिए उसे खो देती. तुम्हारे इसी डर का उसने ने फायदा उठाया."

"मगर मृत्यंजय को मुझसे क्या चाहिए."

"उसे तुमसे कुछ नही चाहिए...बल्कि खुद तुम चाहिए...तुम ग्यारहवा सूत्र हो. "

"ग्यारहवा सूत्र ! मैं सुनकर सिहर गयी. मतलब की मेरे वो सपने सच थे. कही ऐसा तो नही की मेरे सपनो में आने वाला वो तांत्रिक अंतस न होकर मृत्यंजय हो.

तभी गाडी रुकी.

तभी गाडी रुकी. "मैडम घर आ गय." ड्राईवर ने पीछे मुड़कर कहा. उसे देखकर मेरे होश उड़ गए. यह उनमें से एक था जो कल अंतस को पीटने के लिए आये थे.

"माँ ये तो..." मैंने डरते हुए उसकी तरफ इशारा करत हुए कहा. वो एक बार मुझे देख कर हल्का सा मुस्कुराया और वापस आगे देखने लगा.

"घर में चलो ताश्री!" माँ ने गाड़ी से उतरते हुए कहा.

मैं चुपचाप उतरकर अंदर चली गयी. मुझे अब लगने लगा था कि हो न हो, मेरी माँ राणा को जानती हैं, और यह गाडी भी राणा की हैं. मेरे मन में तरह तरह के विचार आने लगे की कहीं मेरी माँ का राणा के साथ कुछ चक्कर तो नही हैं. मैं सोचते सोचते ही अंदर गयी. अंदर मैने देखा कि सामने सोफे पर राणा ठाकुर बैठ हुआ था. वो हमें देखकर खड़ा हो गया. अब मुझे ये माज़रा कुछ कुछ समझ में आने लगा था. राणा ने माँ को अंतस और मेरे बारें में बताया था.

"ये आदमी यहाँ क्या कर रहा हैं? इसी ने तो कल अंतस पर हमला करवाया था." मैं राणा की तरफ लपकी.

"तमीज से बात करो ताश्री...राणा तुम्हारे मामा हैं.

 
मामा! मुझे लगा की अब मेरा सर फटने वाला हैं. मैं वहीं सोफे पर ही बैठ गयी. एक-एक कर मेरे सामने इतने राज आ रहे थे कि मेरे लिए यह कुछ समझ पाना नामुमकिन हो रहा था. मुझे लग रहा था जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया से आई हूँ. हर शख्स जो मुझसे मिल रहा था मुझे अजनबी लग रहा था.

"उसने क्या कहा?" राणा ने मेरी माँ से पूछा.

"वो क्या कहता, कुछ कहने के लायक बचा ही नहीं था. कह रहा था मैं उसे गलत समझ रही हूँ. हूँ...मैं भला होती ही कौन हूँ उसे समझने वाली...उसे समझने जाने का ठेका तो मृत्युंजय ने ले रखा हैं.

"मुझे उसी दिन समझ जाना चाहिए था जब उसने मेरे भतीजे को पीटा था. मैंने उसे ताश्री का कोई आम दोस्त मान कर नज़रअंदाज कर दिया था." माँ और राणा इतनी गंभीरता से बातें कर रहे थे जैसे अंतस कोई आतंकवादी हो.

"...मैं ऋषि को हॉस्पिटल में देखते ही पहचान गयी थी. कोई चाहे कितना भी बड़ा चल कर ले, उसकी आँखे हमेशा सच बोलती हैं, मैं उन आँखों को बचपन से जानती हूँ.

"बेहतर होगा ताश्री के साथ तुम कुछ दिनों के लिये मेरे घर पर आ जाओ, वहां तुम ज्यादा सुरक्षित रहोगे." राणा ने प्रस्ताव रखा.

"ऋषि की इतनी हिम्मत नही हैं कि मेरे होते हुए अब वो ताश्री के पास भी फटक सके. "

"मुझे कोई समझायेगा कि यह हो क्या रहा हैं?" मैंने दोनों हाथो में अपना सर पकड़ते हुए कहा.

"तुम अपने कमरे में जाओ ताश्री." मेरी माँ ने रुखा सा जवाब दिया.

"क्या?" यहाँ मेरा दिमाग तरह तरह के सवालो से फटा जा रहा था और माँ मुझे अपने कमरे में जाने के लिए बोल रही थी.

"बेटा आप अभी अपने कमरे में जाइए, आपकी माँ आपको बाद में सब समझा देगी. राणा ने इतने प्यार से कहा जैसे चाशनी में डुबो कर शब्द निकाले हो.

मैं वहां से चुपचाप उठकर अपने कमरे में आ गयी. अंदर आते ही मैं पेड़ से ऐसे गिर पड़ी जैसे किसी पेड़ से कोई डाली टूट कर गिरी हो. मेरी आँखों से आंसू बाह पड़े. सबकुछ जानने का दावा करने वाली ताश्री आज खुद के बारें में कुछ नही जानती हैं. मैं जिनसे प्यार करती थी, जिनपर विश्वास करती थी सब के सब झूठे निकले.

तभी मुझे डोरबेल की आवाज सुनाई दी. इस वक्त कौन हो सकता हैं? मैं देखने के लिए वापस नीचे गयी और आधी सीढ़ियां उतरकर वही खड़ी हो गयी. राणा ने एक नज़र मुझे देखा और फिर नज़रअंदाज कर दिया. दरवाजा माँ ने खोला.

यह अंतस था!

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की. मेरे आदमी बाहर ही हैं. राणा ठाकुर ने अंतस की और लपकते हुए कहा. मैं भी सीढ़ियों से उतरकर नीचे आ गयी.

"आपके आदमी बाहर विश्राम कर रहे हैं और अब शायद प्राथमिक चिकित्सा मिलने पर ही उठ पाएंगे. अंतस ने अपनी आवाज में कुछ तीव्रता लाकर कहा तो राणा कुछ ठन्डे पड़े.

"तुम्हे आखिर चाहिए क्या?" मेरी माँ ने पूछा.

"मुझे ताश्री चाहिए." अंतस ने आत्मविश्वास से मेरी और देखते हुए कहा.

"लगता हैं तुम्हे अपनी ज़िन्दगी प्यारी नही हैं. मेरे होते हुए तुम ताश्री को छु तक नही सकते हो." राणा ने आगे आते हुए कहा.

"मुझे अपनी नहीं उन मासूमो की ज़िन्दगी की परवाह हैं."

"मतलब." माँ और राणा दोनों चोंक गए.

"मृत्यंजय फिर से सूत्र साधना कर रहा हैं." अंतस ने जवाब दिया.

"हां मैंने राणा की कॉल डिटेल्स निकलवाई थी। और तुम जानती हो उसने यहाँ से बाहर निकलते ही किसे फोन किया था? ताश्री की माँ को।"

"तुम जानते हो यह गैर कानूनी हैं, राणा को अगर इस बारें में पता चल गया तो वो हमारी बैंड बजा देगा, तुम्हे ताश्री की माँ की लोकेशन पता चली?"

"हां वो यही हैं जयपुर में...अपने किसी रिश्तेदार के यहां रह रही हैं."

"हम्म...ठीक हैं मैं उनसे आज ही मिल लेती हूँ...दिनेश के बारें में कुछ पता चला. सीसीटीवी से कुछ जानकारी मिली?"

"नही, कोई फायदा नहीं हैं...वो तो हमारे कंप्यूटर की हार्डडिस्क निकालकर ले गया."

"बहुत बढ़िया...पहले एक ड्राईवर जेल में आत्महत्या कर लेता हैं, फिर कोई मेरी पिस्तौल से गोलियां निकाल लेता हैं और अब हमारे कंप्यूटर्स की हार्डडिस्क ही गायब हैं, आखिर हो क्या रहा हैं इस थाने में?"

"अगर आसितन में ही सांप छुपा बैठा हो तो कोई भला कर भी क्या सकता हैं? मैं आज ही एसपी से बात करके दिनेश का सस्पेंशन करवाता हूँ."

"नही उसकी कोई जरुरत नही हैं...इससे बात और भी ज्यादा फैलेगी. अभी जब तक हम यह सारी गुत्थी सुलझा नही लेते यह बात ज्यादा न फैले तो ही बेहतर हैं."

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शाम का वक्त था. विजय और नंदिनी दोनों ताश्री की माँ से मिलने के लिए थाने से निकले.

"मुझे उम्मीद हैं आज इस केस के बारें में सबकुछ पता चल ही जाएगा. वैसे तुम लोगो ने डायरी के आधार पर ताश्री की माँ से पूछताछ की थी क्या? क्योंकि कम से कम वो तो अपनी बेटी की डायरी को झूठा नही बता सकती थी."

"उनसे सारी पूछताछ खुद चतुर्वेदी सर ने की थी. उनका कहना था कि उनकी बेटी ताश्री एक बहुत ही लेख़क भी थी, हो सकता हैं उसकी डायरी कोई फिक्शनल ऑटोबायोग्राफी हो. उसे रोमांच पसंद था तो वो अपनी डायरी में भी अपनी ज़िन्दगी रोमांचक तरीके से लिखती थी."

"और उसकी सम्मोहन की शक्ति के बारें में..."

"उनका कहना था कि ऐसा कुछ नही हैं...उसे बस आँखों की दिक्कत थी, सो डॉक्टर ने उसे हमेशा चश्मा लगाए रखने के लिए कहा था."

"काला चश्मा! ...और तुम लोगो ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया?"

"हमारे पास और कोई रास्ता भी नही था, भला हम एक हाल ही में मरी हुई लड़की की माँ से ऐसे सवाल कैसे करते जिनका कोई आधार ही नही था?"

"हां लेकिन अब आधार हैं, एक काल्पनिक संगठन ने मेरा अपहरण किया हैं. मैं इस संगठन का पर्दाफाश करके ही रहूंगी. अंतस पर ताश्री की माँ ने शक जताया था?"

"शक तो नही जताया था पर यह जरूर कहा था अंतिम बार उसे उसी लड़के के साथ देखा था, वो उसके साथ कही बाहर गयी थी."

"यह अजीब नही हैं, कोई भी माँ अपनी बेटी को किसी अनजान लड़के के साथ क्यों जाने देंगी?"

तभी गाडी एक मकान के सामने जाकर रुकी.

"यहीं मकान हैं?" नंदिनी ने पूछा.

"हां कॉल लोकेशन के हिसाब से तो यही होना चाहिए. चलो पूछते हैं."

दोनों जीप से उतरे और डोरबेल बजायी. एक महिला ने दरवाजा खोला. यह ताश्री की माँ ही थी, एक 50 साल की प्रौढ महिला थी, एक आम भारतीय साड़ी, श्रृंगार के नाम माथे पर एक बिंदी, किन्तु पहनावा बिलकुल व्यवस्थित, उनके चेहरे से एक अलग ही तेज झलक रहा था.

"जी कहिये." नंदिनी और विजय सादे कपड़ो में थे, शायद इसलिए ताश्री की माँ उन दोनों को पहचान नही पाई.

"मैं इंस्पेक्टर विजय हूँ और यह हैं एसीपी नंदिनी...हम ताश्री के मामले कुछ पूछताछ करने आये हैं..."

"कौन हैं अवंतिका?" पीछे से किसी औरत की आवाज आई.

"पुलिस वाले हैं, ताश्री के बारें में पूछताछ करने आये हैं."

नंदिनी और विजय अंदर आ गए. तभी किचन से वो दूसरी महिला निकलकर आई. उसे देखते ही नंदिनी खड़ी हो गयी....यह उसकी अंजनी माँ थी.

"अंजनी माँ आप?" नंदिनी ने चोंकते हुए कहा. वो अंजनी के पास में गयी. अंजनी को एक बार तो कुछ समझ में नही आया, फिर उसने पहचान लिया की यह नंदिनी हैं.

"नंदिनी बेटा तुम! बहुत दिनों बाद दिखी हो." अंजनी ने उसे गले से लगा लिया.

"आप यहाँ...?" नंदिनी ने अवंतिका की और देखते हुए अंजनी से पउच्च.. विजय चुपचाप खड़ा खड़ा यह सब देख रहा था.

"अवंतिका मेरी बहन हैं, ताश्री की मौत के बाद वो यहीं रहती हैं."

विजय, नंदिनी और अंजनी तीनो सोफे पर बैठ गए. अवंतिका अंदर चाय लेने के लिए चली गयी.

"आपने अनाथालय आना क्यों छोड़ दिया?" नंदिनी ने अंजनी से पूछा.

"बेटा उस वक्त अचानक ताश्री के साथ यह सब कुछ हुआ जिससे अवंतिका पूरी तरह से टूट गयी थी, उसे सँभालने वाला मेरे अलावा और कोई नहीं था. इस लिए मैंने नोकरी छोड़ दी थी, अभी अवंतिका और मैं यही पास में ही एक स्कूल में पढ़ाने का काम करती हैं."

"मैं यहाँ पर जोइनिंग होते ही अनाथालय आई थी, लेकिन मुझे पता चला कि आप छोड़ कर जा चुकी हैं. मैंने पता करने की कोशिश भी की थी मगर किसी को आपके बारें में कुछ भी पता नही था."

"हां...फिर मैं कभी वापस वहां गयी भी नही थी." तभी अवंतिका चाय लेकर आ गई.

"अंजनी तुम इन्हें कैसे जानती हो?" अवंतिका ने पूछा.

"अरे यह नंदिनी हैं, मैंने तुम्हे बताया तो था मेरे अनाथालय में सबसे होनहार लड़की थी यह...और देखो आज पुलिस इंस्पेक्टर बन कर आई हैं." यह सुनकर विजय थोडा सा मुस्कुरा दिया.

"पोलिस इंस्पेक्टर नही माँ, एसीपी!" नंदिनी ने हँसते हुए कहा.

"जो भी हो, तूने मेरे सपने को साकार कर दिया बेटा." अंजनी ने कुछ भावुक होते हुए कहा.

"यह सब आपकी ही दुआओं का असर हैं."

तभी विजय का फोन बजा.

"हेल्लो...हां कहो."

"क्या...कहाँ पर?"

"ठीक हैं...हम अभी पहुँचते है."

"क्या हुआ?" विजय के फोन रखते ही नंदिनी ने पूछा.

"दिनेश के बारें में कुछ पता चला हैं. एक खबरी ने उसे एमआई रोड के आस पास उसे कहीं देखा हैं."

"ओह...लेकिन...." नंदिनी ने अंजनी माँ की और देखते हुए कहा. विजय नन्दिनी की स्थिति समझ गया.

"कोई बात नही तुम इनसे बात करो, मैं उसे देखता हूँ." विजय चलने के लिए उठ खड़ा हुआ.

"ओके..थैंक्स.." नन्दीनी ने कहा. विजय इसके बाद निकल गया.

"बेटा तुम ताश्री के बारें में कुछ कह रही थी." अवन्तिका ने कहा.

"हां मैं ताश्री के मर्डर केस की फिर से जांच कर रही हूँ." नंदिनी ने पास ही पड़ी ताश्री की एक तस्वीर उठा ली और उसे निहारने लगी. लंबे बाल तीखे नैन नक्श वाली, पतली सी लड़की थी, कोई भी एक बार देखे तो पलक झपकाना भूल जाए. ननंदिनी उसको कुछ देर देखती रही .

"उस लड़के के बारें में कुछ पता चला क्या?" अवंतिका ने कहा तो नंदिनी की तन्द्रा टूटी.

"अभी तो नही लेकिन जल्द ही चल जाएगा, मगर उसके लिए आपको पहले सब सच बताना होगा." नंदिनी ने अवंतिका की आँखों में झांकते हुए कहा.

"सच...मगर कैसा सच?" अंजनी और अवंतिका दोनों चौक गये.

"संगठन के बारें में..."

"मैं पहले ही पुलिस को बता चुकी हूँ. संग़ठन जैसा कुछ नही ताश्री ने अपनी डायरी में कोई काल्पनिक कहानी लिखी थी."

"मैं मृत्युंजय से मिली हूँ, अवंतिका जी. उसी काल्पनिक संगठन ने मेरा अपहरण करने की कोशिश की थी. मैं राणा साहब से भी मिली हूँ. मैं इस केस से जुड़े हर शख्स से मिली हूँ. मगर ऐसा लगता हैं हर शख्श कुछ न कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा हैं. कम से कम आप तो सच बोलिये. मैं बस आपकी बेटी को न्याय दिलवाना चाहती हूँ. " नंदिनी थोड़ी सी रुआंसी हो गयी थी. उसे समझ में नही आ रहा था कि क्यों हर व्यक्ति उसे बेवकूफ बनाने पर तुला था.

अवंतिका कुछ देर नंदिनी को देखती रही और फिर उसने अंजनी की और देखा. अंजनी ने अपनी पलके झपका कर मौन सहमति दी.

"नंदिनी बेटा तुम नही जानती तुम किनके खिलाफ लड़ रही हो, वो बहुत ही खतरनाक लोग हैं." अवंतिका ने कुछ पल बाद कहा.

 
"मैं एक पोलिस अफसर हूँ, मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता कि मैं किसके खिलाफ लड़ रही हूँ, या वो कितने शक्तिशाली हैं, मेरे लिए बस यह मायने रखता की हर व्यक्ति को इन्साफ मिलना चाहिए. फिर इसके लिए मुझे किसी से भी लड़ना पड़े."

अवंतिका अब भी कुछ सोच रही थी. जैसे किसी अंतर्द्वंद में उलझी हुई हो.

"अवनि तुम नंदिनी को बता सकती हो, यह मेरी सबसे प्यारी बची हैं. यह तुम्हारी मदद कर सकती हैं." अंजनी ने अवंतिका को रास्ता दिखाते हुए कहा.

"यह किसी चक्रव्यूह की तरह हैं नंदिनी, तुम इसमें प्रवेश तो कर सकती हो मगर बाहर नही आ सकती हो. तुम जितना इसके अंदर जाओगी तुम्हारी लिए खतरा इतना ही बढ़ता जाएगा." अचानक अवंतिका के चेहरे पर एक गंभीरता आ गयी.

"आप मेरी परवाह मत कीजिए. मुझे सिर्फ सच जानना हैं."

"हम्म...वह सबकुछ सच था." अवंतिका ने एक निःश्वास छोड़ते हुए कहा. "ताश्री की डायरी में जो लिखा था, वो सबकुछ वास्तव में हुआ था, मैं संगठन की सातवी प्रमुख और पहली महिला प्रमुख गुरु माँ हूँ. तुम क्या जानना चाहती हो." अवंतिका ने सीधा होते हुए कहा.

"उससे आगे जहाँ से ताश्री की डायरी ख़त्म होती हैं, यह 'सूत्र साधना' क्या हैं?"

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"मुझे अपनी नहीं उन मासूमो की ज़िन्दगी की परवाह हैं."

"मतलब." माँ और राणा दोनों चोंक गए.

"मृत्यंजय फिर से सूत्र साधना कर रहा हैं." अंतस ने जवाब दिया.

मैं अब तक उनके पास आ चुकी थी.

"यह सूत्र साधना क्या हैं माँ?" मैंने माँ से पूछा.

मेरा जन्म यहाँ जयपुर में ही हुआ था, हम दो बहने और एक भाई थे.अंजनी सबसे बड़ी थी, मैं दो साल छोटी थी और आर्यन सबसे छोटा था. हमारे पिता श्री मणिप्रकाश जी यहाँ के जाने माने पंडित थे और संगठन की जयपुर शाखा के प्रमुख थे.* उन्होंने बचपन से हम तीनो भाई बहनो को वैदिक शिक्षा दी थी. मेरे दोनों भाई बहनो को तो इसमें कोई विशेष रूचि नहीं थी लेकिन मुझे बचपन से ही आध्यात्म में दिलचस्पी थी. मेरे पिता भी मुझसे विशेष स्नेह रखते थे.

बात तक की हैं जब मैं तेरह साल की थी. संगठन के प्रमुख नित्यानंद जी महाराज हमारे शहर में आये थे. मेरे पिता बहुत ही खुश थे क्योंकि नित्यानंद जी से व्यक्तिगत रूप से* मिलने का सौभाग्य बहुत ही कम व्यक्तियो को प्राप्त होता हैं. पिताजी ने काफी समय पहले ही उनके स्वागत की तैयारी शुरू कर दी थी.* वे रात-रात भर शाखा में ही रुकते थे और वहां सभी लोगो को प्रशिक्षित करते थे कि नित्यानंद जी के सामने कैसे व्यवहार करना हैं.

नियत तिथि को नित्यानंद महाराज शहर में पधारे. पहले वो संगठन की शाखा में गए. वहां भाषण देने के बाद उन्होंने सारी व्यवस्था देखी और फिर कुछ समय के लिए मेरे पिता के साथ चर्चा की. वो मेरे पिता के विचारो से काफी प्रभावित हुए थे.

"हमें* रात को वापस जोधपुर के लिए निकलना हैं, अगर आपको* आपत्ति न हो तो* तब तक हम आपके घर पर विश्राम कर लेंगे." नित्यानंद जी ने मेरे पिता जी से कहा. पिताजी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा. स्वयं नित्यानन्द जी उनके घर पधारे इससे बड़ी सौभाग्य की बात उनके लिए कुछ और हो ही नहीं सकती हैं. उन्होंने तुरंत घर पर सन्देश भिजवाकर माँ को भोजन और सारी तैयारी करने के लिए कहा.

कुछ समय बाद नित्यानंद जी अपने कुछ शिष्यो के साथ हमारे घर पधारे. वह कोई चालीस साल के प्रौढ़ व्यक्ति थे, किन्तु उनके चहेरे पर एक विचित्र* शांति और तेज था. उन्होंने सबसे पहले स्नान किया, फिर कुछ समय के लिए अपने शिष्यो के साथ ध्यान किया और फिर सब लोगो ने एक साथ भोजन ग्रहण किया. भोजन करते समय उन्होंने मेरे पिता को अपने साथ ही बिठाया था. भोजन के पश्चात् वो मेरे पिता के साथ बैठ कर किसी आध्यात्मिक मसले पर चर्चा करने लगे.

मेरे दोनों भाई-बहन तो बाहर खेलने के लिए गए थे, मगर मुझे माँ ने अधिक काम होने की वजह से घर में ही रोक लिया था. मैं किचन में ही छिप कर बैठी थी. मुझे इतना मालुम था कि कोई बड़ा व्यक्ति आया हैं इसलिए में उनके सामने जाने से कतरा रही थी. तभी माँ किचन में आयी.

"ले यह पानी नित्यानंद जी को देकर आ."

"कौन मैं?" मैंने चोंकते हुए कहा.

"तो क्या मैं? तू भी जाकर महाराज के चरण स्पर्श तो कर ले."

"नही माँ, मैं यहीं ठीक हूँ. आप ही दे आओ."

"ज्यादा चु-चपड़ मत कर, इतने बड़े व्यक्ति घर पर आये हैं, और तू यहाँ रसोई में छीप कर बैठी हैं, जा और यह पानी देकर आ...और हां चरण स्पर्श करके आशीर्वाद मांगना..."* माँ ने मुझे पट्टी पढ़ाते हुए कहा. मेरे पास माँ की बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नही था. मैं चुपचाप ट्रे लेकर बाहर आ गई.

महराज सामने एक कुर्सी* पर बैठे थे, मेरे पिता और उनके बाकि सारे शिष्य निचे चटाई पर बैठे थे.

"...तो फिर* मनुष्य का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए?" मेरे पिता ने सवाल पूछा.

"!!ॐ शांति ॐ!! मनुष्य का अंतिम लक्ष्य शान्ति होना चाहिए. हमें आध्यात्म के उस स्तर तक पहुंचना हैं जहाँ हम अपने मन को नियंत्रित कर अपनी इन्द्रियों पर काबू कर सके...."

"परंतु ऋग्वेद में तो मनुष्य का अंतिम लक्ष्य आनंद बताया गया हैं, शान्ति उस लक्ष्य तक पहुँचने का एक माध्यम मात्र हैं, सहस्त्रार चक्र की जाग्रति भी आनंद प्राप्ति होती हैं. आपका नाम भी तो नित्यानंद ही हैं." अचानक मेरे मुंह से निकल गया. सभी लोग मेरा चेहरा ताकने लगे. किसी ने भी एक तेरह साल की लड़की से इतने सटीक तर्क की अपेक्षा नही की थी.

"अवनि! अंदर जाओ." मेरे पिता ने मुझे गुस्से से झिड़कते हुए कहा.

"नही मणि, इन्हें यही रहने दो. आपका नाम क्या हैं पुत्री?" नित्यानंद जी ने मुझसे पूछा. मुझे समझ में आ चूका था कि मैंने अपना ज्ञान दर्शा कर कोई बड़ी भूल कर दी हैं. फिर भी मैंने तटस्थ रहना ही ठीक समझा.

"अवंतिका." मैंने धीरे से कहा.

"अवंतिका. हम क्षणिक की बजाय शाश्वत को प्राथमिकता देते हैं, आनंद क्षणिक होता हैं, शांति शाश्वत हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे जीवन क्षणिक हैं, परंतु मृत्यु शाश्वत हैं, इसलिए हम मृत्युत्व या मोक्ष की प्रति ध्यान देते हैं." नित्यानंद जी आध्यात्म के थोड़े और ऊँचे स्तर पर गए, उन्हें उम्मीद थी कि शायद मैं वहाँ तक नही पहुँच पाउंगी.

"किन्तु...मृत्यु से अधिक तो जीवन शाश्वत है, मृत्यु का आधार ही तो जीवन ही हैं, और अगर जीवन न हो तो मृत्यु का अस्तित्व ही कहाँ है?" नित्यानंद कुछ सोचने लगे. मेरे पिता और बाकि तमाम लोग मुझे घूरे जा रहे थे. कुछ लोगो के चहेरे पर प्रसंशा के भाव थे. मेरे पिता पसीना पसीना हो रहे थे.

"अवंतिका यहाँ आओ." नित्यानंद जी ने कहा. मैं उनके पास चली गयी.

"क्या ईश्वर का अस्तित्व हैं?" उन्होंने मेरा एक हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा. जैसे वास्तव में वो मुझसे कोई गूढ़ प्रश्न पूछ रहे हैं.

"हां बिलकुल हैं...वो मेरे सामने बैठे है." मैंने अपने पिता की तरफ इशारा करते हुए कहा.

"तुम कहना चाहती हो कि तुम्हारे पिता ईश्वर हैं?" उन्होंने मेरी हथेली को से देखते हुए कहा.

"जो हमारा पालन पोषण करे वही तो ईश्वर हैं, अगर ईश्वर हमारे पिता हैं तो हमारे पिता ईश्वर क्यों नही हो सकते हैं?" वो मेरी हथेली को ध्यान से देखते हुए अचानक रुक गए.

"ग्याहरवां सूत्र!" अचानक उनके मुंह से निकला.

"मणि क्या तुम्हारे पास तुम्हारी पुत्री की कुंडली हैं?" उन्होंने मेरे पिता से कहा.

"जी गुरुदेव."

"लेकर आओ." मेरे पिता दौड़ कर अंदर गए.

"तुमने सही कहा पुत्री! हम जिसका अपने ईश के रूप में वरण करे वही ईश्वर हैं. अगर तुम अपने पिता को ईश्वर मानती हो तो वह सही. "

कुछ देर बाद मेरे पिता अंदर से मेरी कुंडली लेकर आये. नित्यानद जी बड़े घोर से वो कुंडली देखने लगे. किसी को कुछ समझ में नही आ रहा था कि नित्यानंद आखिर कर क्या रहे हैं?

"मणि हम तुमसे कुछ माँगना चाहते हैं?" कुछ देर बाद* नित्यानंद ने ऊपर देखते हुए कहा.

"आज्ञा करे गुरुदेव..." मेरे पिता ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

"हमें आपकी पुत्री चाहिए." अचानक नित्यानंद ने कहा तो सब लोग चौक गए. सब दबे स्वर में कुछ बात करने लगे.

"क्या...किन्तु..." मेरे पिता के कुछ समझ में नही आया.

"हम चाहते हैं कि अवंतिका की आगे की दीक्षा हमारे सानिध्य में हमारे हरिद्वार आश्रम में हो."

"किन्तु महाराज यह तो अभी बच्ची हैं, इसे इतनी दूर कैसे भेज सकते हैं?" मेरे पिता असमंजस में थे.

"यह बच्ची ही हमारे संगठन का भविष्य हैं. तुम अपनी पत्नी से चर्चा कर लो. हम आज शाम को ही इसे अपने संग लेकर जाएंगे."

मेरे पिता अब पुरे पसीने से लथपथ थे. वो अंदर गए माँ से बात करने लगे. माँ इसके लिए बिलकुल तैयार नही थी. लेकिन वो भी नित्यानंद जी के प्रभाव को भलीभांति जानती थी*. पिता जी के बहुत समझाने के बाद माँ मान गयी.

मेरे माता पिता ने फटाफट मेरा सामान पैक किया. मैंने अपने भाई बहनो से विदा ली और शाम को मैं नित्यानंद जी के साथ ही निकल गयी.

सुबह तक हम हरिद्वार पहुंचे. शहर के बाहर ही संगठन का आश्रम था. यह केवल कहने को आश्रम था वरना सारी सुविधाओं से परिपूर्ण कोई महल था. बाहर गेट पर दो द्वारपाल खड़े थे, जहाँ से अंदर घुसते ही एक बड़ा सा गार्डन था, जहाँ पर योग करवाया जाता था. वहां से सामने एक बड़ी सी बहुमंजिला इमारत थी जिसमें कम से कम 200 कमरे गोलाकार रूप में बने थे, इन कमरो के बीचों* बीच में एक खुला बरामदा था. यहाँ पर बहुत सारे साधू, योगी और बच्चे थे जिन्हें चुन चुन कर आध्यात्म की दीक्षा के लिए लाया गया था.

मुझे थोडा डर लग रहा था क्योंकि मैं पहली बार अपने घर से इतना दूर आई थी मगर नित्यानंद जी बार-बार मुझे हौंसला दे रहे थे. पुरे रास्ते वो मुझे बताते रहे थे* कि सगंठन की शाखा में कैसे रहना हैं, कैसे व्यवहार करना हैं, कब क्या काम करना हैं, किससे कैसे बात करनी हैं वगैरह वगैरह।

वहां पहुँचने पर मुझे एक कमरा दिया गया. यह कोई ख़ास तो नही था, एक बिस्तर था जो जमीन पर ही पड़ा था जिसकी चादर साफ़ थी जिससे लगता था कि आज ही लगाया गया हैं.* एक पानी का मटका था , और एक पंखा था. सामने एक खाली* अलमारी थी जिसमें मैंने अपना सामान रख दिया. खिड़की से ठंडी ठंडी हवा आ रही थी.*और यहाँ रौशनी भी पर्याप्त थी। तभी एक लड़की आई, वो कोई मेरी उम्र की ही थी. दिखने में थोड़ी से साँवली थी मगर हँसमुख लग रही थी.

"तुम अवन्तिका हो." उसने मुझे घूरते हुए कहा. उसका दबाव अवंतिका पर कम और तुम पर ज्यादा था, जैसे वो अवंतिका को तो पहले से ही जानती थी. "मेरा नाम देवप्रभा हैं. मुझे गुरूजी ने भेजा हैं, कहा हैं अगर तुम्हे कोई जरुरत हो तो देख लूँ." वो अब भी मुझे निहारे जा रही थी.

"धन्यवाद, पर अभी मुझे कुछ भी जरूरत नही हैं." मैंने वापस उसे घूरते हुए देखा. जैसे पूछ रही हूँ क्या हुआ, मुझे घूर क्यों रही हो?
 


"तुम बहुत खूबसूरत हो." उसने कहा. मैं बस मुस्कुरा दी. वास्तव में मैं थोड़ी खूबसूरत तो थी. मेरा रंग बचपन से ही गोरा था और नैन नक़्श भी अच्छे थे.

"संभल कर रहना." उसने आगे कहा.

"क्या?"

"खूबसूरती बहुत महंगा गहना हैं, जल्दी चोरी होता हैं." मैं कुछ देर उसे देखती रही और फिर वापस अपना सामान ज़माने लगी. "तुम नहाकर प्रार्थना के लिए आ जाओ." उसने मुड़ते हुए कहा.

"प्रार्थना?" मेरे मुंह से निकला. मैं अब तक के सफर से बहुत थक चुकी थी. मैंने सोचा था कि अब कुछ देर आराम करुँगी. मगर इनकी* तो कुछ और ही योजना लग रही थी.

"हां प्रार्थना. हम प्रार्थना करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं. तुम्हे भूख भी लगी होगी न?" उसके खाने का नाम लेने के बाद ही मुझे याद आया था की मुझे खाना भी खाना हैं, वरना मैं तो थकान के आगे खाने के बारें में भी भूल गयी थी. "मगर नहाना कहा हैं?" मैंने आसपास नज़र डालते हुए कहा. यहाँ कही भी कोई गुसलखाना नज़र नही आ रहा था.

"हम लोग तो सुबह-सुबह* घाट पर ही नहाते हैं, मगर तुम अभी पीछे बने गुसलखाने में नहा लो." उसके बाद मैंने अपने कपडे लिए और पीछे-पीछे चल दी. वो किसी कुशल पथ-प्रदर्शक(गाइड) की तरह मुझे इस जगह का परिचय करवा रही थी. ऐसा लग रहा था मुझे देख कर वो भी बहुत खुश थी. रास्ते में मिलने वाला हर व्यक्ति मुझे कोतूहल की दृष्टि से देख रहा था. शायद उनमें से किसी को भी मेरे बारें में कुछ पता नहीं था.

स्नान के बाद देवप्रभा मुझे नीचे बने बड़े हॉल में ले गयी. यहाँ पर सभी लोग एक साथ पंक्तिवार एकत्रित हुए थे, बिलकुल जैसे किसी विद्यालय के छात्र हो. मैं और देवप्रभा भी लड़कियों की बनी एक लाइन में खड़े हो गए. उसमें कुछ स्त्रियां थी और कुछ हमारी उम्र की ही लड़कियां थी.

सामने एक ऊँचा आसान लगा था. जिसके पास ही दो सेवादार खड़े थे. कुछ देर बाद वहां नित्यानंद जी आये. सभी लोगो ने उन्हें प्रणाम किया. उन्होंने अपनी आँखे बंद की और मंत्र का जाप किया बाकि सब लोग भी आँखे बंद कर साथ-साथ जाप कर रहे थे.

"नमःस्ते अस्तु भगवन

विश्वेश्वराय

महादेवाय

त्रयंबकाय

त्रिपुरान्तकाय

त्रिकाग्निकलाय

कलाग्निरूद्राय

नीलकंठाय

मृत्युंजयाय्

सर्वेश्वराय

सदाशिवाय

श्रीमन् महादेवाय नमः

||ॐ शांतिः||"

मैंने कही पढ़ा था यह भगवान रूद्र का नमस्कार्थ मंत्र था, जिसे रूद्र की स्तुति में पढ़ा जाता था. इसके बाद सबने आँखे खोली. आखे खोलने पर मुझे लगा कि कोई मुझे घूर रहा हैं. यह कोई 16-17 साल का लड़का था पुरुषो की पंक्ति में जो मुझे देख कर भद्दी सी हंसी निकाल रहा था. अजीब बात हैं सब यहाँ प्रार्थना कर रहे थे और वो लड़का मुझे देख रहा था.

"मित्रो मैं आज आप सबको एक नए मेहमान से मिलवाना चाहता हूँ." तभी* नित्यानंद जी ने कहा.

"अवंतिका..." उन्होंने मेरी और देखते हुए मुझे ऊपर मंच पर आने के लिए कहा.* मैं क़तार से बाहर निकल कर ऊपर चली गयी.

"यह बच्ची यहाँ की नई विद्यार्थी हैं, अब यह यहीं रह कर ज्ञानार्जन करेगी. सभी लोग ख्याल रखे की इसे कोई तकलीफ नही होनी चाहिए." इसके बाद सभा समाप्त हुई और सब खाना खाने लगे. मैंने देखा कि वो लड़का अब भी रह-रह कर मुझे घूर रहा था. देवप्रभा मेरी नज़रो को भांप गयी.* उसने मुझे चुपचाप* खाना खाने का इशारा किया.*

खाना खाने के बाद हम वापस अपने कमरे की तरफ जाने लगे. तभी वो लड़का दौड़ते हुए मेरी तरफ आया. "अवंतिका..मेरा नाम रवि हैं. मुझसे दोस्ती करोगी." उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा. मैंने देवप्रभा की ओर देखा. उसने कहा तो कुछ नही मगर उसके चेहरे ने कह दिया कि न कर दो. मगर अचानक मेरा हाथ आगे बढ़ गया. उसने मेरे हाथ अपने हाथ में लिया और अजीब तरीके से मसलने लगा. मैंने अपना हाथ खींच लिया और वहां से भाग गयी. वो वहां खड़ा-खड़ा हंसने लगा.

अवन्तिका भी मेरे पीछे-पीछे ही आ गयी. "मैंने कहा था खूबसूरती महंगा गहना हैं. तुम्हे इन्ही चोरो से बचना हैं." उसने मेरे कमरे में आते हुए कहा.

"कौन था वो कमीना?"

"वो रवि हैं. नित्यानंद गुरु का लड़का हैं. मगर ऐसा लगता हैं देवता के घर राक्षस पैदा हुआ हैं. एक-दो बार मेरे साथ भी इसने ऐसा ही किया था. उसके बाद तो मैं उससे दूर ही रहती हूँ, तुम भी उससे सम्भल कर ही रहना" उसके बाद वो चली गयी.

मैं कुछ देर सोई और जब उठी तो* वो वापस मेरे कमरे में आ गयी. "चल तुझे घाट घुमा कर लाती हूँ." उसने मुझे पकड़कर खींचते हुए कहा.

"हम अकेली?"

"तो क्या पूरा शहर जाएगा? सुबह चार बजे उठकर हमें वहां नहाने जाना होता हैं. मगर सुबह तो वहां कुछ दिखेगा ही नही सो अभी घूम कर आते हैं." उसने एक चंचल आवाज में कहा, मगर मुझे कुछ समझ में नही आया।

हम दोनों घूमने निकल गए. घाट यहाँ से कोई दो-तीन किलोमीटर दूर था. वहां जाने में ही आधा-पौन घंटा लग गया. यह गंगा के किनारे विशाल घाट थे. कुछ लोग वहां अभी भी नहा रहे थे. उनमें से कुछ साधू थे. कुछ नागा साधू भी थे.जिन्हें देख कर मैं शरमा गयी.

"हा..हा...ऐसे नज़ारे यहाँ रोज देखने को मिलते हैं." देवप्रभा ने मुझे आँख मारते हुए कहा.

"मगर हम सुबह यहाँ कैसे नहायेंगे? यहाँ तो इतने सारे लोग रहते हैं." मैंने आशंकित होते हुए पूछा.

"हम सुबह जल्दी आएंगे. तब यहाँ कोई नही रहता सिर्फ स्त्रियां ही आती हैं. पुरुष उजाला होने के बाद ही आते हैं." उसने मुझे सारी व्यवस्था समझाते हुए कहा.

कुछ देर वहां और घूमने के बाद हम वहीँ पास के ही बाजार में गए. वहां तरह-तरह की दुकाने थी. मैं वो सब निहारने लगी. तभी मैं एक कंगन की दूकान पर रुकी.

"क्या हुआ?" देवप्रभा ने कहा.

"देख न कितने खूबसूरत कंगन हैं?" मैंने एक कंगन का सेट हाथ में लेते हुए कहा.

"तुझे पसंद हैं? मगर हम पैसे तो लाये ही नही!" उसने मायूस होते हुए कहा. मैंने कंगन का सेट वापस रख दिया और आगे बढ़ गयी।

"हम दिलवा दे कंगन?" तभी पीछे से आवाज आई. मैंने पीछे मुड़कर देखा तो यह वही लड़का था रवि.

"चल यहां से..." देवप्रभा ने मुझे खींचते हुए कहा. हम उसके बाद आश्रम आ गए. मुझे अपने कमरे में छोड़ने के बाद देवप्रभा चली गयी.

मैं अपना सामान देखने लगी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने दरवाजा खोला। यह रवि था.

"क्या हैं?" मैंने थोडा गुस्से से कहा.

"हम तुम्हारे लिए कंगन लाये हैं." उसने वही कंगन का सेट दिखाते हुए कहा जो मैं वहां छोड़ आई थी। वो अब तक कमरे के अंदर आ चूका था.

"मुझे नही चाहिए." मैंने उसी गुस्से में कहा. मेरे सर पर पसीना आ गया था.

"कैसे नही चाहिए? हम इतने प्यार से लाये हैं और तुम्हे पसंद भी तो थे."

"बोला न नहीं चाहिए....बाहर निकलो यहाँ से..." मैंने बाहर की तरफ इशारा करते हुए कहा.

"चलो न चाहिए तो न सही...एक बार पहन कर ही दिखा दो..." उसने जबरदस्ती मेरा एक हाथ पकड़ा और और उसमें कंगन पहनाने* लगा. मैं दूसरे हाथ से उसे रोकने लगी. इसी हाथापाई में एक कंगन टूट गया और मेरे हाथ में चुभ गया. वहां से खून बहने लगा लेकिन वो रुका ही नही जैसे उस पर कोई भुत सवार हो.

"रवि! यह क्या कर रहे हो?" तभी पीछे से एक आवाज आई. यह पन्दरह-सोलह साल का एक मोटा सा लड़का था. उसने पास में आकर रवि का गिरेबान पकड़कर उसे को दूर फेंक दिया.

"वीरेंद्र तु हमेशा मेरे फटे में टाँग अड़ाता हैं..." रवि न गुस्से से कहा.

"अभी तो तेरा कुछ फटा नही हैं...इससे पहले की* फटे चुपचाप निकल ले." वीरेन्द्र ने उसे आँखे दिखाते हुए कहा. रवि वहां से भाग खड़ा हुआ.* मेरे हाथ से खून बह रहा था और आँखों से आंसू... मैं सिसक कर रोने लगी।

"ओह! तुम्हे तो चोट लगी हैं." उसने मेरा हाथ देखते हुए कहा.

"देव..." मैंने रोते हुए ही कहा. "देवप्रभा को बुलाओ..."

वो कुछ देर में देवप्रभा को बुलाकर ले आया. वो अपने साथ में मलहम पट्टी भी लाई थी. मैंने पट्टी करवाते हुए उसे सारी बात बता दी.

"वो तो हैं ही राक्षस...आज ही गुरूजी से उसकी शिकायत करती हूँ."

"ये कौन था?" मैंने विरेन्द्र के बारें में पूछा.

"ये वीरेंद्र हैं....वीरेंद्र राणा!"

"अब तू आराम कर और दरवाजा अंदर से बंद कर देना, उस कमीने का कोई भरोसा नही है फिर से आ सकता हैं." देवप्रभा ने कहा और* उसके बाद देवप्रभा अपने कमरे में चली गयी. कुछ देर बाद मैं भी सो गई.

सुबह चार बजे के आस पास कोई जोर की आवाज हुई जिससे मेरी नींद खुली. यह एक घंटे की आवाज थी जो बाहर गार्डन में लगा हुआ था. उसकी आवाज इतनी तेज थी की इस इमारत के आखिर छोर तक भी सुनाई दे सकती थी. वो घंटा आठ-दस बार लगातार बजा. जिसके बाद वापस सो पाना लगभग असंभव था. मेरा सर भी दर्द करने लगा था. तभी मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई.

"कौन?" मैंने डरते हुए ही पूछा.

"मैं देवी...हमें नहाने जाना हैं." मुझे याद आया कि यहाँ तो रोज सुबह घाट पर नहाने जाते हैं. लेकिन इतनी ठण्ड में सुबह सुबह घाटे पर नहाने जाने के बारें में सोच कर ही सिहरन हो गई थी. फिर भी मैंने अपने कपडे उठाये और बाहर आ गयी.

"जल्दी चल सारी स्त्रियां निकल चुकी हैं." वो आगे चल दी. मैंने दरवाजा बंद किया और* दौड़ कर उसके पीछे हो गयी. फिर वही आधे-पौन घंटे के बाद हम घाट पर पहुंचे मगर इतनी देर चलने के बाद अच्छी खासी वर्जिश हो गई थी जिससे अब ठण्ड लगना कम हो गई थी. मैंने देखा कि घाट के दूसरे किनारे और भी काफी सारी स्त्रियां नहा रही हैं. उनमें से अधिकतर अर्धनग्न थी.* मैं पानी के पास गई और उसे हाथ लगा के देखा.

"अरे बाप रे! यह तो बहुत ठंडा हैं." मैंने डरते हुए कहा.

"जब तक हम पानी में नही उतरते वो ठंडा ही लगता हैं." मैंने उसकी तरफ देखा तो भौचक्की रह गयी. उसने भी अपने आधे कपडे उतार दिए थे और अर्धनग्न हो गयी थी.* वो मेरी और देख कर मुस्कुराई और फिर पानी में उतर गयी.

"ये क्या हैं?" मैंने उसे आँखे फाड़कर देखते हुए कहा.**

"यहाँ कोई नही देख रहा हैं." उसने पानी में डुबकी लेते हुए कहा. कोई नही का क्या मतलब? मैं तो देख रही थी. वैसे मैंने ध्यान दिया कि हम घाट के जिस किनारे थे वहां काफी अंधेरा था और एकांत भी था यहाँ किसी के द्वारा हमें देखे जाने की संभावना बहुत कम थी. मगर फिर भी मैं कैसे अर्धनग्न हो सकती हूँ? मैंने सिर्फ अपनी साडी उतारी और पानी में उतर गयी. पानी वास्तव में ठंडा था मगर कुछ ही देर में शरीर ने खुद का ताप बड़ा कर पानी के अनुकूल बना लिया था.

नहाकर हम लोग वापस लौटे. फिर से दो-तीन किलोमीटर चलने से मेरी तो थक कर हालत खराब हो चुकी थी.* आश्रम पहुँच कर नाश्ता वगेरह किया ही था कि फिर से एक घंटा बजा. यह घंटा योग के लिए था. सब लोग बाहर गार्डन में इक्कठे हो गए थे. कुछ देर बाद एक बूढ़ा सा व्यक्ति आया. उसने कुछ मन्त्र बोले और योग करवाना शुरू कर दिया.* यहाँ कोई एक से डेढ़ घंटे तक उसने योग करवाया था. फिर उसके बाद प्रार्थना का समय हो गया था. मेरी तो इस सब दिनचर्या से हालत खराब होने लगी थी. मैं सोचने लगी की अभी से ही यह हालत हैं तो आगे क्या होगा? प्रार्थना में आज गुरूजी ने कोई नया श्लोक सुनाया था, जिसका अर्थ तो मुझे नही मालुम था मगर शायद यह माँ दुर्गा की स्तुति थी. स्तुति ख़त्म होने के बाद गुरूजी की नज़रे इधर उधर घूमने लगी जैसे किसी को ढूंढ रही हो. जब उनकी नज़रे मुझ पर पड़ी तो वो हल्का सा मुस्कुराये...जवाब में मैं भी मुस्कुरा दी, लेकिन तभी उनके चेहरे पर चिंता की लकीरे उभर पड़ी.* प्रार्थना ख़त्म होने के बाद हम सब खाना खाने चले गए. खाना खाते समय कोई देवप्रभा को बुलाने आया.

"मैं आती हूँ." उसने कहा और खाना बीच में ही छोड़ कर चल दी. कुछ देर बाद वो वापस आई.

"तूने खाना खा लिया?" उसने पूछा.

"क्यों?"

"जल्दी खा. गुरूजी ने बुलाया हैं." ऐसा लग रहा था कुछ गंभीर मामला* हैं अपने खाने के बारें में तो वो भूल ही चुकी थी. मैं वैसे भी खाना खा चुकी थी सो जल्दी से उठी और उसके पीछे-पीछे चल दी.

 


कुछ ही देर में हम गुरूजी के कक्ष में पहुचे. वहां गुरु जी के अलावा दो लोग और थे* सम्भवतः यह गुरु जी के सेवादार थे. मैंने गुरूजी प्रणाम किया और वही खड़ी हो गयी.

"तुम्हे यह चोट कैसे लगी अवंतिका?" गुरुजी ने मेरे हाथ की तरफ इशारा करते हुए कहा.

"जी वो...कल...." मैं इससे आगे कुछ कह नही पाई. मुझे डर था कि यहाँ आने के पहले ही दिन मेरे साथ यह हादसा हो गया था और अब अगर मैं रवि का नाम लूँगी तो गुरूजी पता नही मेरे बारें में क्या सोचेंगे?

"क्या देवप्रभा ने जो बताया वो सत्य हैं? रवि ने कल शाम को तुम्हारे साथ* जबरदस्ती की थी." गुरूजी के चेहरे पर गुस्से के भाव साफ़ पढ़े जा सकते थे.

"हां..वो लेकिन..." मैं इससे ज्यादा और कुछ नही कह पाई.

"तुम्हे तुरंत ही मुझे बता देना चाहिए था." उन्होंने मुझसे कहा और फिर एक सेवक को आदेश दिया. "जाओ रवि को बुलाकर लाओ." वो सेवक गया और कुछ ही देर में रवि को बुलाकर ले आया. रवि अंदर आया. उसने एक बार मुझे और देवप्रभा को देखा और फिर गुरूजी को प्रणाम किया. उसका चेहरा झुका हुआ था मगर कही भी वो अपने किये पर शर्मिंदा हो ऐसा नहीं लग रहा था.

"रवि! क्या यह सत्य हैं कि अवंतिका को यह चोट तुम्हारे कारण लगी?" गुरुजी ने अपनी जगह से उठते हुए कहा. रवि कुछ नही बोला बस अपनी जगह जड़वत खड़ा रहा.

"जवाब दो रवि!" उन्होंने अपनी आवाज मे कठोरता लाते हुए कहा.

"जी हां यह सत्य हैं." रवि ने झुकी नज़रो से ही मेरी ओर देखते हुए कहा.

"और ऐसा तुमने क्यों किया?" गुरुजी ने रवि के पास आते हुए लगभग उसके कान में ही कहा.

"मैं इनसे प्रेम करता हैं."

"प्रेम! तुम प्रेम का अर्थ भी जानते हो? प्रेम समर्पण मांगता हैं, त्याग मांगता हैं. यह किसी को दर्द नही देता हैं बल्कि चेहरे पर मुस्कान लाता हैं. तुम्हारी आयु में सिर्फ आकर्षक होता है और तुम्हे जो हुआ हैं वो तो सम्भवतः लालसा मात्र हैं." गुरूजी ने एक ही सांस में सारी बात कह दी. रवि अब भी वैसे का वैसे खड़ा था.

"अवंतिका से अभी क्षमा मांगो." गुरूजी ने आदेश दिया. रवि कुछ नही बोला. वो बस ज़मीन में देखता रहा.

"तुमने सुना नही?" गुरूजी ने इतनी जोर से कहा कि एक बार तो मैं भी सिहर गयी.

"मैं उसकी कोई* आवश्यकता नही समझता हूँ." रवि ने नज़रे उठाकर मेरी और देखते हुए कहा.

गुरु जी की आँखे लाल हो गयी. "संगठन में गुरू की अवज्ञा का परिणाम* जानते हो न तुम? तुम्हे संगठन छोड़ कर जाना पड़ सकता हैं."

"संगठन मेरा परिवार हैं, मैं इसे छोड़कर कही नही जाऊँगा." रवि ने नज़रे उठाकर कहा और वापस नज़रे झुक ली.

"उत्तम...संगठन की प्रति तुम्हारा प्रेम अच्छा लगा किन्तु अपने किये की सजा तो तुम्हे भुगतनी ही होगी." उन्होंने वापस अपने आसान पर बैठते हुए कहा.

"अनिकेत! एक सामान्य इंसान बिना जल के कितने समय तक जीवित रह सकता हैं?" उन्होंने अपने एक सेवक से पूछा.

"तीन के सिद्धान्त के अनुसार एक आम इंसान तीन मिनट बिना वायु के, तीन दिन बिना जल के और तीन सप्ताह बिना भोजन के रह सकता हैं. किन्तु अनुकूल परिस्थितियों में कोई व्यक्ति बिना पानी के 8-10 दिन तक जीवित रह सकता हैं."

"किन्तु वो सामान्य इंसान हैं. हमारे गुरु श्री अनंत देव जी* तंत्र की शक्ति से अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करके बिना जल के 17 दिन तक जीवित रहे थे, हम जांचना चाहते है कि तंत्र शास्त्र का तुम्हे कितना ज्ञान* हैं रवि? क्या तुम बिना जल के 17 दिनों तक जीवित रह सकते हो?"*गुरु जी ने किसी आदेश की तरह कहा.

रवि कुछ नही बोला.

"या फिर तुम संगठन छोड़ कर जाना पसंद करोगे?" गुरूजी ने निश्वास लेते हुए कहा.

"मैं मृत्यु से लड़ना पसंद करूँगा." रवि ने नित्यानंद जी* की आँखों में देखते हुए कहा.

"जैसी तुम्हारी इच्छा...अनिकेत! इन्हें ऊपर वाले कमरे में बंद करके ताले चाबी मुझे दे दो."

"जो आज्ञा.." सेवक रवि को लेकर चला गया.* उसके बाद हम दोनों भी वापस अपने कमरे में आ गए.

"तुझे गुरूजी को कल के बारें में बताने की क्या जरुरत थी?" मैंने देवप्रभा को डपटते हुए कहा.

"उन्होंने प्रार्थना के समय तुम्हारे हाथ का ज़ख्म देख लिया था...उन्होंने मुझसे पूछा था तो मैं और क्या कहती?" उसने मासूमियत से कहा.

"कुछ भी कह देती की गिर गयी हैं...चाकू से लग गयी हैं." मैंने उसे बहाने बताये.

"तब उस कोठारी में मैं बंद होती...." उसने जैसे मन ही मन में कहा.

"क्या?"

"नहीं कुछ नही...अब तू अब आराम कर हम शाम को मिलते हैं. " वो कह कर चली गयी.

शाम को हम सब लोग खाना खा रहे थे. खाना खाने से पहले देवी ने पानी का एक लौटा मेरी तरफ किया.

"यह क्या हैं?" मैंने पूछा.

"यह गंगा जल हैं, खाना खाने से पहले हम इसे जरूर पीते हैं." मैंने गौर किया सबके सामने वैसा लौटा जरूर पड़ा था. मैंने वो लौटा लिया और उसका एक घूंट भरा. घूंट भरते ही मैंने उसे फ़ौरन उसे थूक दिया.

"छी: ये कितना कड़वा हैं." मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा.

"गंगा का शुद्ध जल तो ऐसा ही होता हैं. धीरे-धीरे तुझे इसकी आदत पढ़ जाएगी." उसने मेरे हाथ से लौटा लिया और घट-घट करके सारा पानी पी गयी. मैं सिर्फ उसका चेहरा देख रही थी. कहीं से भी ऐसा नही लग रहा था कि पानी उसे ज़रा सा भी कड़वा लगा होगा. पानी पीने के बाद उसने शान से मेरी और देखा.

"यहाँ खा खाना भी कितना फीका हैं...ऐसा लगता हैं कागज़ चबा रहे हैं.." मैंने फिर से बुरा मुंह बनाते हुए कहा.

"अत्यधिक मसालेदार खाना तामसिक खाने में आते हैं जो हमारे शरीर के लिए सही नही होता हैं....फिर भी मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ हैं." उसने अपने आँचल से नींबू निकालकर मेरी और बढ़ाते* हुए कहा.

"तेरा भला हो...कुछ तो स्वाद आएगा...ला चाकू दे." मैंने उसके हाथ से निम्बू लेते हुए कहा. उसके बाद हम दोनों खाना खाने लगे. तभी हमारे पास एक लड़का आया.

"ये तुमने ठीक नही किया." उसने मेरी और देखते हुए कहा. मैं असमंजस में उसे देखती रही. भला मेरे नींबू काटने से उसे क्या दिक्कत हो सकती हैं?

"रवि को कोठरी में डलवाकर तुम्हे क्या हासिल हुआ?" उसने मुझे घूरते हुए ही कहा. ओह! तो यह मामला है. ये रवि का कोई दोस्त था और इसे रवि के कमरे में बंद होने से गहरा सदमा पहुँचा था.

"रवि को कोठरी में मैंने नही उसके कर्मो ने डलवाया हैं." मैंने अपने चेहरे पर गंम्भीरता लाते हुए कहा.

"उसकी क्या गलती थी? वो सिर्फ तुमसे प्यार ही तो करता था..कितने प्यार से कंगन लाया था बेचारा तुम्हारे लिए..." उसने थोड़े गुस्से और थोड़ी बेचारगी* से कहा.

"प्यार! ये देखो तुम्हारे दोस्त के प्यार ने क्या किया?" मैंने उसे अपनी कलाई दिखाते हुए कहा.

"हां तो हो सकता हैं उसका तरीका गलत हो मगर इसका ये तो मतलब नही की वो गलत था." उसने मेरी कलाई की तरफ बिना देखे ही कहा. अब मेरा दिमाग फिरने लगा था. एक तो चोरी और ऊपर से सीना जोरी...ये तो माथे ही चढ़े जा रहा था.* मैंने अपने सामने पड़ा चाकू उठाया और उसके हाथ पर एक रेखा खिंच दी. वो हड़बड़ाहट में पीछे हटा. उसके हाथ से खून बहने लगा था.

"पागल हो क्या? ये क्या किया?" वो जोर से चिल्लाया. देवप्रभा मुझे आँखे फाड़ कर देखने लगी. बाकि के लोग भी हमारी और देखने लगे थे.

"अब ज़रा मेरे प्यार को महसूस कर के बताओ." मैंने एक झूठी मुस्कान लाते हुए कहा.

"तुम पछताओगी." उसने एक दूसरे हाथ से अपने ज़ख्म को दबाते हुए धमकी दी.

"वो फिलहाल तो तुम रहे हो." मैं वापस मुड़ी और खाना खाने लगी जैसे कुछ हुआ ही नही हो.

वो कुछ देर वहां खड़ा रहा और फिर वहां से निकल गया.

"ये तुमने क्या किया?" देवप्रभा ने पूछा.

"इन कमीनो को सबक सिखाना जरुरी हैं वरना एक के बाद एक आते ही रहेंगे." मैंने उसकी और देख कर कहा.

"मगर इतनी हिम्मत कहाँ से लाई?"

"मुझे नही मालुम...शायद पैदायशी हैं." मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

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उसके बाद खाना खाकर हम मेरे कमरे में आ गये. कुछ देर बात करने के बाद देवप्रभा अपने कमरे में चली गयी. मैं भी सो गयी.

आधी रात को* मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई. यह कोई रात के दो बज रहे थे. अभी कौन हो सकता हैं? मैंने मन ही मन सोचा.* देवप्रभा होगी. मगर अभी तो घंटा भी नही बजा था. "कौन हैं?" मैंने डरते हुए पूछा.

"हम हैं अवंतिका दरवाजा खोलो." बाहर से किसी पुरुष की आवाज आई. यह आवज जानी पहचानी लग रही थी. यह तो नित्यानंद जी थे!

मैंने खुद को व्यवस्थित किया और दरवाजा खोला.

"आप इस वक्त?" मैंने घबराते हुए पूछा.

"मेरे साथ चलो." उन्होंने मुझे अपने साथ चलने का इशारा करते हुए कहा.

"लेकिन...अभी..कहाँ..." मैंने घबराते हुए अधूरा सवाल पूछा. मुझे इस वक्त अचानक उनके साथ चलने में डर लग रहा था.

"डरने वाली कोई बात नही हैं, हम तुम्हे सब बताते हैं...आओ..." उन्होंने मेरे मन का डर भांपते हुए कहा. मैं उनके पीछे-पीछे चल दी.

"तुम्हे यहाँ कैसा लग रहा हैं?" उन्होंने चलते-चलते ही पूछा.

"ठीक..." मैंने धीरे से कहा.

"मैं समझ सकता हूँ, तुम्हारे लिए खुद को अचानक इस माहौल के अनुरूप ढालना थोडा मुश्किल होगा. अवंतिका हमें तुम्हे एक सत्य बताना हैं." गुरुजी ने धीरे होते हुए कहा. जिससे अब मैं उनके बराबर आ गयी थी.

"सत्य!" मैंने चोंक कर कहा. एक तो मैं अचानक नींद से उठी थी दूसरा गुरूजी मुझे इस तरह से अपने साथ ले जा रहे थे. मेरा सर घूमने लगा था.

"दरअसल यह संस्था* सिर्फ योग सिखाने और धर्म की दीक्षा देने के लिए नहीं हैं, इसका एक और गूढ़ रहस्य भी हैं..." वो कहते कहते रुक गए और मेरी प्रतिक्रिया देखने लगे.

"कैसा रहस्य?" मैंने शांत बने रहते हुए ही कहा.

"इस संस्था के आवरण में तांत्रिको की एक संस्था चलती हैं.."

"तांत्रिक..." मैं अचानक रुक गयी. अब मेरी नींद उड़ चुकी थी. मैं उनका चेहरा देखने लगी.

"मैं खुद एक तांत्रिक हूँ और इस संस्था एक अन्य कई अध्यापक तांत्रिक हैं जो तुम जैसे विद्यार्थियो को तंत्र शास्त्र की विद्या देते हैं." उन्होंने मेरा चेहरा देखा जो डर के मारें पीला पड चूका था. हम अब तक उनके कक्ष में आ चुके थे.

"मैं तुम्हारा डर समझ सकता हूँ, तुम्हारा यह डर तांत्रिको की समाज में जो नकारात्मक छवि हैं उसके कारण हैं. तंत्र विद्या का अधिकतर नकारात्मक प्रयोग ही किया गया हैं. उससे भी अधिक कुछ ढोंगी तांत्रिको ने हमारी छवि को और भी अधिक बिगाड़ा हैं. उन्होंने लोगो को मुर्ख बनाकर लालच देकर धन ऐंठा हैं जिससे लोगो को लगता हैं सभी तांत्रिक एक जैसे होते हैं." वो सामने बैठ गए और मुझे नीचे बैठने का इशारा किया. मैं वही बैठ गयी और चुपचाप उनकी बात सुनती रही.

"दरअसल तंत्र शास्त्र के बारें में ही लोगो को बहुत सी गलतफहमियां हैं, तंत्र योग का परिष्कृत रूप ही हैं,* वास्तव में यह ऊर्जा के प्रयोग से अधिक और कुछ नही हैं. ध्यान में हम अपनी आंतरिक ऊर्जा की पहचान करते हैं उसे केंद्रित करते हैं जबकि तंत्र शास्त्र में हम इसका प्रयोग करते हैं. यह बिलकुल वैसे ही हैं जैसे हम अपने घर में विद्युत(बिजली) का प्रयोग करते हैं, अब अगर किसी को बिजली से झटका लगता हैं तो इसमें गलती उस व्यक्ति की होगी न की विद्युत की क्योंकि विद्युत तो बस अपना काम कर रही हैं."

"मगर तांत्रिक तो काला जादू करते है न!" मैंने एक मासूम सा सवाल पूछा.

"हा हा...जादू जैसा कुछ नही होता हैं. हम हर अजीब लगने वाली चीज को चमत्कार का नाम दे देते हैं और जब कोई किसी चमत्कार को व्यवस्थित तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत करता हैं तो हम उसे जादू कहते हैं. जैसा की मैंने कहा कि ऊर्जा का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रयोग संभव हैं तो जब इस ऊर्जा का कोई तांत्रिक नकारात्मक प्रयोग करता हैं तो हम उसे काला जादू कह देते हैं. विज्ञान ने भी तो परमाणु बम और बारूद* जैसे आविष्कार किये हैं तो इसका यह मतलब थोड़े ही की विज्ञान बुरा हो गया."

"...तो तांत्रिको ने कुछ अच्छे काम भी किये हैं?" मैंने सवाल किया.

" 1962 में भारतीय ज्योतिषियों ने समवेत स्वर में भविष्यवाणी की कि 3 फ़रवरी को शाम 5:30 बजे संसार में सारा जीवन समाप्त हो जाएगा, क्योंकि उस पल आठ ग्रह एक सीध में आ जाएंगे।* स्कूल–कॉलेज बंद रहे, बसें, ट्रेनें और हवाई जहाज़ ख़ाली रहे। लोग घरों में ही रहे, ताकि प्रलय के वक्त्त परिवार के साथ रहें। तीन फ़रवरी आई और चली गई। कुछ नहीं हुआ। लोगो को आश्चर्य हुआ की यह कैसे हुआ? हम तांत्रिको की वजह से...हमने उस दिन से पहले हफ़्तों तक रूद्र साधना की थी. जिससे उस संकट को टालने में हम सफल रहे थे." उन्होंने एक गर्व के साथ कहा. फिर उन्होंने मुझे ध्यान से देखा मैं बस चुपचाप सुन रही थी.

"तुम्हारा जन्म कब हुआ अवंतिका?" उन्होंने अचानक पूछा तो मैं चोंक सी गयी.

"3 फरवरी...1962.." मैंने स्वयं एक अंतर्द्वंद में कहा. गुरूजी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी.

" वास्तव में रूद्र यानी की शिव ही त्तन्त्र विद्या और योग के जन्मदाता हैं, आदि योगी शिव ने ही इस संभावना को जन्म दिया कि मानव जाति अपने मौजूदा अस्तित्व की सीमाओं से भी आगे जा सकती है।* अपने शरीर और दिमाग को हर संभव इस्तेमाल करना है, लेकिन उसके कष्टों को भोगने की ज़रूरत नहीं है। कहने का मतलब यह है कि जीने का एक और भी तरीका है। हमारे यहां योगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर के तौर पर नहीं पूजा जाता है। इस संस्कति में शिव को आदि योगी माना जाता है। यह शिव ही थे जिन्होंने मानव मन में योग का बीज बोया था. जब हमने रूद्र साधना की थी तो उसका एक अन्य परिणाम भी रहा था. दुनिया का हर योगी योग करने के लिए किसी न को गुरु मानता हैं लेकिन इस संसार में सिर्फ दो ही कालगुरु हुए हैं एक तो स्वयं आदि योगी शिव और दूसरे योग गुरु श्री कृष्ण. रूद्र साधना से हमने स्वयं रूद्र से सम्पर्क किया था, और उस प्रलय को रोकने की विनती की थी. लेकिन उस दौरान हमें एक और बात पता चला थी..." उन्होंने एक पल रुक कर मेरी तरफ देखा. मैं मंत्रमुग्ध सी उनकी बातें सुन रही थी.*

"हमें पता चला था कि स्वयं आदि योगी शिव को गुरु बना कर दीक्षा लेना संभव हैं. परंतु इसके लिए एक उपयुक्त पात्र की आवश्यकता थी. शिव की कृपा से उस दिन वो पात्र भी हमें मिल गया जिसने की उसी दिन इन धरती पर जन्म लिया था मगर हमें यह नही मालुम था कि वो पात्र कौन था, उस दिन जब हम तुम्हारे घर आये थे हमने तुम्हारी हथेली को देखा था. उस पर दो रेखाएं जो सामान्यतः अंग्रेजी वर्णमाला के "Y" अक्षर की भांति होती हैं वो एक त्रिशूल के आकार की थी, यह वास्तव में उस पात्र की निशानी हैं. जब हमने तुम्हारी कुंडली मंगवा कर देखा तो पता चला कि तुम्हारा जन्म* 3 फरवरी,1962 को हुआ हैं... शाम को 5.30 बजे....ठीक उस समय जब इस संसार के ख़त्म होने की भविष्य वाणी की गयी थी."

 


वो कुछ देर रुके और फिर बोले. "हम इसीलिए तुम्हे यहाँ लेकर आये ताकि तुम्हे उचित दीक्षा देकर आदिगुरु से साक्षात्कार के लिए तैयार कर सके."

"लेकिन यह कैसे हो सकता हैं? आप जानते हैं यह कितना खतरनाक हैं. मैंने लगभग उछलते हुए कहा. स्वयं माँ शक्ति भगवान शिव से तंत्र- योग की दीक्षा लेने में असफल रही थी और परिणाम स्वरुप उन्हें माँ पार्वती के रूप में पुनः जन्म लेना पड़ा था तो भला कोई आम इंसान कैसे शिव से दीक्षा ले सकता हैं? किसी आम इंसान की चेतना के लिए तो यह संभव ही नही हैं कि वो उस ज्ञान स्वयं में गर्भित कर सके." मैंने अपनी शंका जाहिर की.

"हमें ज्ञात हैं मगर उसका भी एक उपाय हैं, हम चेतनाओं का संयोजन करेंगे." उन्होंने सीधा होते हुए कहा.

"चेतनाओं का संयोजन?" मैंने आँखे फाड़कर पूछा.

"हां..महाभारत में वर्णन हैं कि की आदि योगी* श्री कृष्ण हज़ारो साधको(गोपियों) के संग सामूहिक साधना करते थे जिसे आम जन रासलीला के नाम से जानती हैं, इसमें श्रीकृष्ण बिना स्पर्श किये भी साधक को कुण्डलिनी ऊर्जा के अंतिम स्तर तक पंहुचा देते थे, जिससे साधक परम आनन्द की अवस्था तक पहुँच जाता हैं. परम आनन्द* मानव का अंतिम लक्ष्य!" उन्होंने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा क्योंकि यह बात तो मैंने ही उन्हें बताई थी.

"मगर कृष्ण एक अवतार थे, उनके लिए यह एक लीला मात्र थी, हम इंसानो के लिए यह* कैसे संभव हैं?"

"संभव हैं...सूत्र साधना..." उन्होंने शांत रहते हुए कहा.

"सूत्र साधना?"

"तुमने सही कहा कि किसी व्यक्ति के लिए यह संभव नही है कि वो शिव से दीक्षा ले सके* इसलिए हम ग्यारह सूत्रो की चेतनाओं का संयोजन करके* एक जाल(network) स्थापित*करेंगे इसमें तुम मुख्य सूत्र होगी जिसे ग्यारहवां सूत्र कहा जाता हैं बाकि दस अन्य लड़कियां होगी. जो इस साधना के लिए विशेष रूप से तैयार की जाएगी." उन्होने मेरी और गर्व से* देखा मगर* उन्हें जल्द ही समझ में आ गया की मैने चतुराई पकड़ ली हैं.

"यह एक प्रयोग मात्र हैं!" मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा.

"निश्चित कुछ भी नही हैं. यह प्रयोग मानव मात्र की भलाई के लिए होगा, जो अगर सफल हो गया तो हम ज्ञान के उस अद्भुत भंडार को प्राप्त करेंगे जिसके लिए समस्त संसार सदियो से प्रयासरत रहा हैं. विज्ञान, कला, आध्यात्म सब क्षेत्रो में एक नई क्रान्ति आ जाएगी."

"...और अगर असफल रहा तो? मेरे साथ-साथ उन दस मासूम लड़कियो की भी जान जाएगी. किसी की ज़िन्दगी को दांव लगा कर हम क्या हासिल करेंगे?"

"हमें इतने बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए थोडा बहुत खतरा तो उठाना ही होगा. अवंतिका तुम्हारा जन्म हमारे लिए वरदान हैं हम इसे ऐसे ही व्यर्थ तो नही जाने दे सकते हैं? " वो मेरी और देखने लगे जैसे मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हो. मैंने अपना सर हिलाया और एक निःश्वास छोड़ी. जैसे मैं उनकी बातो को बस एक नादानी मान रही हूँ.

"फिर भी यह तुम्हारा जीवन हैं. निर्णय पूर्णतः तुम्हारे ऊपर हैं अगर तुम ऐसा नही चाहती तो हम कल ही* तुम्हारे घर जाने का प्रबंध कर देंगे... अभी तुम अपने कमरे में जा सकती हो." उन्होंने उठते हुए कहा.

उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गयी. मेरा सर अभी भी गोल गोल घूम रहा था. गुरूजी ने जो कुछ भी कहा था वो मुझे किसी कहानी की तरह लग रहा था, मगर फिर भी मुझे उनकी बातो पर विश्वास था. मैंने खुद काफी कुछ पढ़ा था और उन्होंने जो कहा था वो मेरे ज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता था. मेरी माँ ने एक बार कहा था कि जब मेरा जन्म हुआ था उससे एक दिन पहले सपने में उन्हें शिव जी के दर्शन हुए थे मगर उनकी बात को हमारें परिवार में किसी ने भी गंभीरता से नही लिया था. हम वास्तव में सकारात्मक चीजो को काफी गंभीरता से लेते ही नही हैं वही अगर कोई नकारात्मक बात होती हैं तो हम सब दौड़ पड़ते हैं. मैं सोचते-सोचते अपने हाथ कि हथेली को देखने लगी. इसमें वाकई तीन* रेखाए त्रिशूल की आकृति में थी जबकि दूसरे हाथ में दो रेखाएं थी. पिताजी अक्सर कहा करते थे कि इंसान की रेखाए उसके भाग्य का निर्माण करती है लेकिन मैं कभी उनकी बात से सहमत नही थी क्योंकि मेरा मानना था कि इंसान का कर्म ही उसकी हाथ की रेखाओ का निर्माण करता हैं. अगर कोई व्यक्ति पुरे दिन आराम करता रहता है तो उसके हाथ की रेखाए उस व्यक्ति से पूर्णतयः अलग होगी जो पुरे दिन मज़दूरी करता हैं. किसी व्यक्ति के हाथ की रेखाएं उसके भविष्य का दर्पण न होकर उसके इतिहास की किताब मात्र हैं. परंतु यह रेखाएं किसी के दैवीय होने का भी सबूत हो सकती हैं यह मुझे गुरूजी ने सोचने पर मजबूर कर दिया था.

अभी कोई आधा घंटा भी न गुजरा होगा कि घंटा बजा मैं समझ गयी थी की चार बज गए हैं और कुछ ही देर में देवप्रभा मेरे दरवाजे पर होगी. मैंने मुंह-वुंह धोया और तैयार होकर बैठ गयी. अपेक्षानुरुप कुछ ही देर में देवप्रभा ने दरवाजा खटखटाया. मैंने दरवाजा खोला.

"क्या बात हैं आज तो पहले ही तैयार होकर बैठी हैं?" उसने मुझे देखते ही कहा.

"हां..आज कुछ देर पहले ही नींद खुल गयी थी." जब ओखली में सर दे ही दिया हैं तो फिर मूसल के क्या डरना? मैंने मन ही मन सोचा. फिर हम दोनों नहाने चले गए.

"अरे! तेरे हाथ का ज़ख्म तो बिलकुल ही ठीक हो गया." जब मैं साड़ी उतार रही थी तो उसने मेरा हाथ देखते हुए कहा.

"हां..ज्यादा गहरी चोट नही थी." मैंने नज़रअंदाज करते हुए कहा. मैं अब भी गुरुजी की बातो में ही खोई हुई थी. वैसे मेरे ज़ख्म कुछ जल्दी ही भरते थे.

"क्या ज्यादा नही थी? मैंने पट्टी की थी मुझे पता हैं और तेरे तो निशान भी गायब हो गए." उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर देखते हुए कहा. "यह तो जादू हैं!" उसने आँखे फाड़ते हुए कहां.

उसकी अंतिम बात ने मुझे चोंका दिया. कहीं यह ज़ख्मो का जल्दी भरना मेरे 'ख़ास' की वजह से तो नही हैं. जब भी हमारे दिमाग में कोई किसी चीज का बीज डाल देता हैं हम बार-बार* उसी के बारें में सोचने लगते हैं और हर छोटी-बड़ी चीज को उसीसे जोड़ने लगते हैं.

"ये क्या कर रही हैं?" देवप्रभा फिर से अर्धनग्न हो गयी थी. "तू कपडे पहन कर नही नहा सकती?" मैंने उसे झिड़कते हुए कहा.

"तेरे लिए यह नया होगा, मैं तो रोज ही ऐसे ही नहाती हूँ." उसने अपने चेहरे पर एक कटीली मुस्कान लाते हुए कहा.

"रोज नहाती हैं इसका यह मतलब थोड़ी हो गया कि यह सही हो गया. गंगा हमारी माँ हैं उसमें ऐसे नंगे नहाते हुए तुम्हे शर्म नही आती?" मैंने अपना विरोध थोडा प्रखर करते हुए कहा.

"गंगा हमारी माँ हैं तो फिर माँ से कैसी शर्म और कपड़ो के अंदर भी तो हम सभी नंगे ही हैं न?" उसने पानी में उतरते हुए कहा. यह देवप्रभा मुझे कोई विद्वान सी लगती थी, इसके मासूम से तर्क मुझे कई बार लाजवाब कर देते थे. "मेरी बात मान तू भी ऐसे ही आ जा, ज़रा महसूस तो कर यह जल जब हमारे बदन को छूता हैं तो कैसा महसूस होता हैं?" उसने मुस्कान के साथ मुझे न्योता* देते हुए कहा. मुझे ऐसा लग रहा था कि वो मेरी हया का आनंद उठा रही हैं.

"तू ही महसूस कर यह स्पर्श, मैं यहाँ नहाने आती हूँ कुछ महसूस करने नही..." मैं भी अब तक पानी में उतर चुकी थी. वो पानी में डुबकियां लेने लगी. मेरे तो एक डुबकी बाद ही साँस फूलने लगती थी. हम नहा कर वापस आश्रम के लिए निकल पड़े.

"क्या हुआ आज तु इतनी चुप क्यों हैं? कल तो बड़ी सारी बातें कर रही थी." उसने मुझे घुमसुम देखकर कहा. मैं अब भी दुविधा में थी कि गुरु जी की बात मानूं या न मानूं. वास्तव में मुझे इस सब से डर भी लग रहा था और* एक अनजाना सा आकर्षण मुझे अपनी ओर खींच भी रहा था.

"तुम गंगा में कितनी गहराई तक गई हुई हैं?" मैंने अपनी दुविधा एक पहेली के रूप में देवप्रभा से पूछी.

"मतलब?" उसने चोंकते हुए कहा. शायद उसे मेरी बात का संदर्भ समझ में नही आया था. "मेरा मतलब हैं कि हम लोग जहा पर नहाते हैं वहां तो समतल सीढ़ियां हैं, आगे गहरा पानी भी होगा, कीचड भी होगा?" मैने उसकी आँखों में देखते हुए कहा जैसे वही से पढ़ने की कोशिश कर रही हूँ की उसे समझ में आया की नही?

"मुझे तैरना आता हैं..." उसने अपनी चीर परिचित मासूमियत के साथ कहा. "हमें गहराई और कीचड से तब तक डरने की जरूरत नही हैं जब तक हमें तैरना आता हो, बस किनारे से इतना* दूर नही जाना चाहिए कि वापस लौटने की ताकत ही न बचे." उसने अपनी आँखों को नचाते हुए ही कहा. मुझे अपने सवालो के जवाब मिल चुके थे. देवप्रभा ने अनजाने में ही मेरी सबसे बड़ी समस्या हल कर दी थी.

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आज पुरे दिन में गुरुजी मुझे एक बार ही दिखे थे प्रार्थना के समय. वो बार-बार मुझे ही देख रहे थे, जैसे मेरे चेहरे से कुछ अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे हो. मगर मैं बिलकुल शांत थी जिससे उन्हें कुछ भी अंदाजा लगाना नामुमकिन था.

पूरा दिन ऐसा ही निकल गया. अब मुझे यहाँ की दिनचर्या के बारें में पता चलने लग गया था. कब क्या होता था, कहाँ होता था, सब दिमाग में नक्शा बनने लग गया था. मुझे वैसे अब यह सब अच्छा भी लगने लगा था. यहाँ का अनुशासन, यहाँ की शान्ति लगता था मैं इसी सब के लिए बनी हूँ.

रात को लगभग बारह बजे मेरे कमरे पर दस्तक हुई. मैं अब तक जाग ही रही थी. शायद मुझे मालुम था वो आएंगे इसलिए मेरी नींद पहले से ही उड़ी हुई थी.

"तो तुमने क्या निर्णय किया हैं?" उन्होंने दरवाजा खुलते ही मुझसे पूछा. शायद मुझसे ज्यादा तो वो बैचेन थे.

"मैं तैयार हूँ मगर एक शर्त पर!" मैंने दृढ़ता के साथ कहा. उन्होंने मुझे अचरज से देखा जैसे उन्हें मेरे 'शर्त' कहने के बारे में सुनकर कर झटका लगा हो. वो मेरा मुंह ताकने लगे.

"अगर कभी मुझे ऐसा लगा कि कही कुछ गलत हैं तो मैं वापस अपने घर लौट जाउंगी. किसी को बिना कुछ कहे हुए." मैंने कहा.

"निश्चित रूप से..." उन्होंने बिलकुल शांत रहते हुए कहा. उनका चेहरा देखकर नही लग रहा था कि उनके व्यक्तव में लेश मात्र भी सन्देह था.

"मेरे साथ चलो." उन्होंने इशारा करके कहा. मैं फिर से चुपचाप उनके पीछे चल दी. हम उनके* कक्ष तक पहुंचे तब तक हम दोनों खामोश ही थे जैसे हम दोनों ही अपने निर्णय पर मंथन कर रहे हो.

"दरवाजा बंद कर दो." उन्होंने अंदर पहुँच कर कहा. मैंने आशंकित होकर उन्हें देखा जैसे पूछ रही हूँ इसकी क्या जरूरत हैं?

"डरो मत हम यहाँ अकेले नही हैं." उन्होंने अपने आसन के पीछे की दीवार को एक तरफ धकेलते हुए कहा. दिवार एक तरफ सरक गयी. यह एक गुप्त रास्ता था. उन्होंने मेरी तरफ देखा में भी उनके पीछे पीछे चलने लगी. आगे एक संकरा गलियारा था जो फिर जाकर एक बड़े से हॉल में खुलता था. हम जहाँ निकले थे यह एक छत जैसा था जहाँ पर बैठने के लिए एक आसन लगा हुआ था. नीचे हॉल में चालीस-पचास लोग थे जिसमें पुरुष-स्त्रियां और कुछ बच्चे भी थे. उन सबने सामान्य कपडे पहन रखे थे मगर सबके कपड़ो का रंग काला था. ऐसा लगता था इस हॉल तक पहुँचने के और रास्ते भी थे जहाँ से ये सब लोग आये थे.

"जय महाकाल!" नित्यानंद जी ने अंदर पहुँचते ही इतनी जोर से कहा कि एक बार तो मैं काँप गयी. जवाब नीचे खड़े सभी लोगो ने भी 'जय महाकाल' कहा.

इनमें* आगे की पंक्ति में राणा भी खड़ा था उसने मुझे देखकर अभिवादन किया.

"संगठन में तुम्हारा स्वागत हैं अवंतिका!" गुरुजी ने मेरी ओर देख कर कहा. "तुम आज से इस संगठन का हिस्सा हो, इसके प्रति तुम्हारा भी उतना ही कर्त्तव्य हैं जितना की अन्य लोगो के लिए हैं. मगर तुम्हे* संगठन से जुड़ने से पहले एक शपथ लेनी होगी कि तुम चाहे संगठन में रहो या न रहो संगठन के बारें में कोई भी जानकारी यहाँ से बाहर नही जानी चाहिए, हमारा पहला कर्त्तव्य संगठन की के रहस्य की रक्षा करना हैं चाहे इसके लिए प्राण देने पड़े या फिर लेने पड़े." मैंने बस हां मैं सर हिला दिया.

"मित्रो वर्षो की प्रतीक्षा के बाद आज हमें वो वरदान मिल गया हैं जो हमारे महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं 'ग्यारहवाँ सूत्र'. वर्षो से हमारे तांत्रिक समाज ने इस क्षण की प्रतीक्षा की हैं और यह हमारा सौभाग्य हैं की हम सब इस सुअवसर के साक्षी बने हैं. अवंतिका की उचित दीक्षा हम सब की जिमेदारी हैं और हमें यह देखना हैं की इसे किसी भी प्रकार की तकलीफ न हो." सभी लोगो ने गुरजी की बात से सहमत होते हुए हुंकार भरी, उसके बाद हम मंच से नीचे उतर गए. मुझे सब से मिलवाया गए और सगंठन एवं इसके नियमो के बारें में जानकारी दी गयी. घंटे भर तक वहां रुकने के बाद में वापस अपने कमरे में आ गयी और फिर सो गई.

सुबह घंटे की आवाज से मेरी नींद खुली और मैं देवप्रभा के साथ घाट पर नहाने गयी. मैं आज भी गुमसुम ही थी मगर मेरे चेहरे पर ख़ुशी के भाव थे. संगठन के लोगो द्वारा मुझे जो सम्मान मिला था उससे मुझे काफी अच्छा लगा था. घाट पर पहुँचने पर देवप्रभा ने रोज की भाति अपने कपडे उतारे और पानी में उतर गयी. कुछ देर बाद मैं भी पानी में उतर गयी. उसने एक डुबकी ली और बाहर आई. मैं उसकी और देख कर मुस्कुरा रही थी. "क्या हुआ?" उसने मेरी आँखों की चमक देख कर पूछा.

"पानी का स्पर्श!" मैंने पानी से अपना अँगिया(blouse) निकाल कर उसे दिखाते हुए कहा.

इसके बाद संगठन में मेरी दीक्षा प्रारम्भ हो गयी. रोज रात को हम सब उस हॉल में इकठ्ठा होते और हमें तंत्र शास्त्र से जुड़े विभिन्न विषयो के बारें में पढाया जाता. अभी यह हमारे सिखने की प्रारम्भिक अवस्था थी, जिसमें कुण्डलिनी ऊर्जा, नाड़ियों, ऊर्जा के प्रवाह, चक्र इत्यादि के बारें में बताया जा रहा था. शुरू में संगठन के लोगो से मिलने-जुलने में मुझे थोड़ी दिक्कत हो रही थी क्योंकि मुझे उनसे एक तरह से डर लगता था मगर धीरे-धीरे मैं उनमें घुल-मिल गयी. वास्तव में हम किसी चीज के बारें में जितना कम जानते हैं उससे उतना ही अधिक डरते हैं, जैसे-जैसे हम उसके बारें में जानने लगते हैं हमारा डर भी ख़त्म होने लगता हैं. इस सब में वीरेन्द्र मेरी काफी मदद कर रहा था. संगठन में गुरूजी के बाद सबसे ज्यादा मुझे उस पर ही विश्वास था. वो यूँ तो थोडा गंभीर स्वाभाव का था मगर फिर भी मुझसे वो खुल कर बात करता था और मेरी सारी आशंकाओ का निवारण भी करता था.

रवि को कमरे में बंद किये हुए 13 दिन बीत गए थे और ज्यो-ज्यो दिन बीतती जा रहे थे गुरुजी के चेहरे पर चिंता बढ़ती जा रही थी. बाहर से भले ही वो काफी मजबूत दीखते थे और अपनी चिंता किसी को जाहिर नही करते थे मगर फिर भी अंदर से वो शायद घुट रहे थे. उस रोज़ हम सुबह प्रार्थना कर रहे थे तभी एक व्यक्ति गुरूजी को बुलाने आया. उसने प्रार्थना ख़त्म होने का इंतजार किया और जैसे ही प्रार्थना ख़त्म हुई गुरूजी के पास जाकर उनके कान में कुछ कहा. गुरुजी तत्काल उठ कर चले गए. उसके बाद हम सब खाना खाने चले गए. आज माहौल में मुझे एक अजीब सा सन्नाटा लग रहा था. कुछ देर बाद देवप्रभा दौड़ती हुए आई.

"अवंतिका! वो मोहन....." वो हांफती हुई आई थी. मैं उसकी और देखने लगी. "मोहन मर गया.." उसने कुछ देर रुककर सांस ली और फिर कहा.

"कौन मोहन...?" मैंने चोंकते हुए कहा.

"अरे वही जिसका उस दिन तुमने हाथ काट दिया था...रवि का दोस्त.." उसने मुझे घूरते हुए कहा, जैसे उसे आश्चर्य हो की मैं मोहन को कैसे नही जानती?

"ओह वो..क्या हुआ उसे?" मैंने उसी तरह शांत रहते हुए ही कहा.

"वो कही से गिर गया था, उसके सर में चोट आई हैं , शायद गुरूजी को सुबह से ही पता था मगर उन्होंने किसी को बताया नही."

"ओह! यह तो बहुत बुरा हुआ." मैंने भी दुःखी होते हुए कहा. वैसे मुझे यह समझ में नही आ रहा था कि मैं दुखी किस बात पर हो रही हूँ? क्योंकि मोहन से मेरा जितना भी रिश्ता था वो तो बुरा ही था. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गयी. कमरे में आते ही मैं हमेशा सो जाया करती हूँ क्योंकि मैं रात की नींद अभी ही पूरी करती हूँ लेकिन आज मैं मोहन के बारें में सोच रही थी इसलिए सो नही पा रही थी. तभी मेरे दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. यह देवप्रभा थी. उसके साथ एक लड़का और भी था, वो पूरी जर्जर हालत में था, ऐसा लग रहा था वो अभी बहुत रोया हैं.* मैं उन्हें सवालिया नज़र से घूरकर देखने लगी.

"अवनी यह मंथन* हैं... मोहन का दोस्त...इसे तुमसे कुछ बात करनी थी." देवप्रभा ने कहा. मैं अब मंथन का चेहरा ताकने लगी.

"वो मोहन..." उसकी आवाज ही नही निकल रही थी. ऐसा लग रहा था रोने से उसकी आवाज भारी हो गयी हैं और उसकी आँखों से आंसू भी निकलने लगे थे. वो उससे आगे कुछ नही बोल पाया और फफक कर रोने लगा. देवप्रभा ने मामला बिगड़ते देख खुद बोलना ही उचित समझा.

 


"मोहन और रवि काफी अच्छे दोस्त थे. मोहन के इस दुनिया में न रहने का सबसे ज्यादा दुःख रवि को ही होता. क्योंकि रवि अभी कमरे में बंद हैं वो मोहन को आखिरी बार भी नही देख पायेगा. इसने गुरूजी से बात की थी लेकिन वो मानने को तैयार ही नही हैं, अगर तुम गुरूजी से बात कर सको तो रवि आखिरी बार...." देवप्रभा कहते कहते रुक गयी. मुझे सब वैसे ही समझ में आ गया था. मुझे मंथन की हिम्मत पर आश्चर्य हो रहा था जो इतना सब होने के बाद भी पहले गुरूजी और बाद में मुझ तक आ गया था.

"ठीक हैं...मैं बात करुँगी." मैंने धीरे से कहा. मंथन और जोर से रोने लगा. शायद वो शुक्रिया कह रहा था.*

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मैं* उठकर बाहर गुरूजी के पास गयी, देवप्रभा और मंथन भी मेरी पीछे-पीछे ही आ गए. गुरूजी मोहन के अंतिम संस्कार की तैयारी करवा रहे थे.

"..पुलिस वालो से तुम बात कर लेना, मैं नही चाहता कि बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की चीर-फाड़ हो, समझे?"* गुरूजी ने अपने सेवक को समझाते हुए कहा. वो बिलकुल धीरे बोल रहे थे और उनकी आवाज भी कांप रही थी जिससे पता चलता था कि उन्हें इस घटना का गहरा दुःख हैं.

"अवंतिका तुम! कहो क्या हुआ?" उन्होंने मुझे देखकर खुद को सँभालते हुए थोड़ी तेज आवाज में कहा.

"गुरूजी वो मैं यह कहना चाहती थी कि..." मुझे समझ में नही आ रहा था कि में अपनी बात कैसे रखूं? "...मोहन और रवि काफी अच्छे दोस्त थे, अगर रवि को मोहन के अंतिम दर्शन का अवसर मिल जाता तो...?"

"तुम चाहती हो कि हम रवि को समाधी से उठाये?" उन्होंने मोहन की तरफ देखते हुए कहा.

"जी गुरूजी...रवि को वैसे भी अपने किये की सजा मिल ही चुकी हैं और वो अगर अब तक* जीवित हैं तो उसका तन्त्र के प्रति समर्पण भी सिद्ध हो चूका हैं..." मुझे 'अगर' कहने में थोड़ी झिझक महसूस हुई थी. गुरूजी ने एक बार मुझे घुरा और फिर मोहन और देवप्रभा की तरफ देखकर इशारा किया. वो वहां से चले गए.

"अवंतिका! तुम तंत्र के बारे में क्या समझती हो? यह कोई खेल हैं कि अगर कोई समस्या हुई तो समय थोडा सा कम कर दिया. तंत्र एक व्यवस्था हैं, अनुशासन हैं. यह कुछ सिद्ध करने के लिए नही होता, यह सिद्धि के लिए हो होता हैं. यह कोई अंगिया नही हैं जो किसी के बहकावे में आकर उतार कर फेंक दिया जाए...यह हमारी आत्मा हैं जो मृत्युपरंत हमारे साथ रहती हैं."

उनकी अंतिम बात सुनकर में सिहर गयी. भला गुरूजी को अँगिया वाली बात के बारें में कैसे पता चला? कही देवप्रभा ने तो नही....उनकी यह बात सुनकर मेरी नज़रे नीचे जमींन में ही गढ़ गयी. आगे कुछ और बोलने की तो क्या मेरी ऊपर देखने की हिम्मत भी नही हो रही थी.* मैं चुपचाप वहां से चली आई. कुछ दूर ही देवप्रभा और मंथन मेरा इंतज़ार कर रहे थे. मैंने देवप्रभा को गुस्से से देखा और चुपचाप आगे बढ़ गयी. वो दोनों मेरे पीछे-पीछे दौड़ने लगे.

"अवनी! गुरुजी माने क्या?" देवप्रभा ने दौड़ कर मेरे बराबर आते हुए कहा.

"नही लेकिन वो अँगिया वाली बात..." मैंने गुस्से में कहा मगर फिर मंथन को देख कर रुक गयी.

"माफ़ करना मैंने काफी कोशिश की, मगर गुरूजी कुछ सुनने को ही तैयार नही थे." मैंने मंथन की और देखकर कहा.

"कोई बात नही...तुमने कोशिश तो की...शुक्रिया!" मंथन ने धीरे से कहा और वो वहां से चला गया. देवप्रभा वही नज़रे झुकाये खड़ी थी जैसे उसे मेरे डांट खिलाने का इंतज़ार हो. मैं उसका हाथ पकड़ उसे घसीटते हुए अपने कमरे में लेकर आ गई.

"गुरूजी को मेरी अँगिया वाली बात के बारें में कैसे पता चला?" मैंने पुरे गुस्से से चिल्लाते हुए एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

"गुरूजी अंतर्यामी हैं, उन्हें सब पता हैं." देवप्रभा ने नज़रे झुकाये ही कहा.

"बकवास मत कर..गुरूजी अंतर्यामी हो सकते हैं मगर मैं इतनी पागल नही हूँ जो यह सब न समझ पाऊं. तू गुरूजी के लिए मेरी जासूसी करती हैं." मैंने गुस्से से कहा.

"मैं कुछ नही जानती, तु गुरूजी से ही पूछ लेना..." उसने दबी हुई आवाज में कहा और जाने लगी.

"मेरी दोस्त गुरूजी हैं या तू हैं?" मैंने फिर से चिल्लाते हुए कहा. "मैंने तुझ पर इतना विश्वास किया और तूने मेरे साथ यह किया? छीः! तुझे शर्म नही आई?" मेरा गुस्सा अब सातवे आसमान तक पहुच चूका था.

"मैं क्या करती..मुझे गुरूजी ने ही यह सब करने के लिए कहा था." उसने भर्राते हुए कहा उसकी आँखों से आंसू झर रहे थे. ऐसा लग रहा था वो खुद भी इस सब से बुरी तरह से दुखी हैं. "...जब से तू यहाँ आई हैं गुरूजी ने मुझे तेरे पीछे लगा रखा हैं. तू कहा जाती हैं? क्या खाती हैं? किससे क्या बात करती हैं? हर बात का मुझे लेखा रख कर उन्हें बताना पड़ता हैं. मुझे खुद को यह सब अच्छा नही लगता मगर क्या करूँ, गुरूजी का आदेश था मानना पड़ा. " उसने रोते-रोते कहा. मुझे कुछ समझ में नही आ रहा था कि मैं उससे क्या कहूँ?

"तू जा अभी यहाँ से मैं बाद में बात करुँगी." मैंने बिना उसकी ओर देखे ही झल्लाते हुए कहा. वास्तव में मेरी आँखों में भी आंसू आ गए थे जो मैं उसे दिखाना नही चाहती थी. वो कुछ देर वहां खड़ी रही और फिर चुपचाप चली गयी.

मोहन के अंतिम संस्कार के दौरान भी मैं उससे दूर-दूर ही रही. वो मुझे सुखी* नज़रो से देख रही थी, जिससे साफ़ पता चल रहा था कि वो अपने किये पर कितना शर्मिंदा हैं! मुझे भी अब गुस्सा देवी की बजाए गुरूजी पर आ रहा था, आखिर इस सब के कर्ता-धर्ता तो वहीँ थे.

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मोहन अंतिम संस्कार* के बाद में अपने कमरे में जाकर सो गयी. मैं शाम का खाना भी नही खाया था. रात को मैं संगठन के हॉल में पहुची. गुरूजी एक जगह बैठ कर कुछ पढ़ रहे थे.

"अवंतिका! तुमने भोजन किया?" उन्होंने बिना मेरी ओर देखे ही कहा.

"मैंने भोजन किया या नही किया, क्यों नही किया? देवी ने आपको सब बता ही दिया होगा!" मैंने गुस्से से कहा. गुरूजी ने एक बार मेरी ओर देखा और फिर पढ़ने लगे जैसे उन्हें इस बात से कोई खास फर्क ही नही पड़ा हो.

"आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप देवी से मेरी जासूसी करवा रहे थे?"

"संगठन के कुछ नियम होते हैं अवंतिका." उन्होंने बिना मेरी ओर देखे ही कहा.

"...और उनमें किसी की जासूसी करना भी आता हैं." मैं उनका जवाब जानने के लिए आतुर हो रही थी. उन्होंने अपना हाथ किताब को लगाया, फिर माथे को लगा कर कुछ बुदबुदाया और फिर किताब बन्द कर दी.

"तुम हमारे लिए महत्वपूर्ण हो, इतनी की हम तुम्हे किसी भी प्रकार के खतरे में नही पड़ने दे सकते हैं. देवप्रभा तुम्हारी अंगरक्षिका की भांति थी. अगर हम तुम्हारी जासूसी कर रहे होते* तो क्या हम स्वयं इसे तुम्हारे बारे में बताते?"

"आपने स्वयं बता दिया इसका यह अर्थ तो नही हैं कि यह सही हो गया. देवी को मैं अपनी सखी मानती हूँ और आपने उसी को मेरे खिलाफ इस्तेमाल किया?" मुझे अब खीझ हो रही थी.

"देवप्रभा भी तुम्हे उतनी ही अच्छी सहेली मानती हैं जितना की तुम उसे मानती हो. अभी हाल ही में उसने मुझे आकर यह सब करने से मना कर दिया था. मैंने भी उसकी मनोस्थिति को समझते हुए उसे इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया था...तो वास्तव में हमें अभी नही पता हैं कि तुमने खाना खाया हैं या नही? वो तो आज काफी लोगो ने दुःख में खाना नही खाया था इसलिए हमने तुमसे भी पूछ लिया." उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा. अजीब बात थी मैं यहाँ गुस्से से आग बबूला हो रही थी और गुरूजी मुस्कुरा रहे थे. मैं गुस्से में ही वापस अपने कमरे में गयी.

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धीरे-धीरे दिन गुज़रने लगे. मैंने देवप्रभा को भी माफ़ कर दिया. था जब उसकी कोई गलती थी ही नही तो उससे किस बात का गुस्सा होना? और वैसे भी मैं अब यह समझ गयी थी कि जिस संगठन का मैं हिस्सा थी उसमें यह सब कोई बड़ी बात नही थी.

आज रवि को कमरे में बंद किये हुए. सत्रह दिन हो गए थे. गुरूजी सुबह से ही काफी परेशान लग रहे थे. उनकी चिंता साफ़ समझी जा सकती थी क्योंकि आज उनका बेटा इस दुनिया से विदा लेगा या फिर पुनर्जन्म लेगा इस बात का निर्णय होने वाला था और किसी भी पिता के लिए इससे बड़ी और कोई बात हो ही नही सकती हैं.

प्रार्थना के पहले नियत समय पर उस कक्ष का दरवाजा खोला गया. गुरूजी समेत सब लोग बाहर ही खड़े रहे. सिर्फ तीन-चार सेवादार अंदर गए. अंदर से काफी बदबू आ रही थी. एक तरफ बिस्तर पर रवि पड़ा हुआ था. वो बिलकुल हड्डियों का ढांचा बन चूका था. एक सेवादार ने उसकी धड़कन जाँची और जोर से चिल्लाया "गुरूजी! यह जीवित हैं!"

यह सुनते ही गुरूजी अंदर दौड़ पड़े. वो रवि से लिपट कर फफक-फफक रोने लगे.

"रवि ने मृत्यु पर विजय हासिल की हैं, यह मृत्यंजय हैं." एक बूढ़े से व्यक्ति ने कहा. यह एक वरिष्ठ तांत्रिक था, जिसका संगठन में काफी सम्मान था. "रवि मृत्यंजय हैं!" सब लोग चिल्लाने लगे जैसे किसी की जय-जयकार कर रहे हो.

इसके बाद रवि को पानी और ज्यूस पिलाया गया. हम सब बाहर ही खड़े थे. दो सेवादार रवि को कंधे का सहारा देकर बाहर लाये. रवि की हालत बिलकुल दयनीय हो गयी थी, उसकी आँखे भी आधी ही खुल रही थी, वो पूरा झुक कर चल रहा था मगर जब वो मेरे सामने से गुज़रा तो उसने अपनी आँखे पूरी खोली और मुझे देख कर अपने चेहरे पर एक शातिर मुस्कान लाया और फिर आँख मारी...

मुझे रवि की इस हरकत पर आश्चर्य हुआ, किसी ने सच ही कहा हैं कुते की दुम को 12 साल तक नली में रखोगे तब भी वो टेड़ी ही रहेगी.

एक दिन में खाना खाने के बाद देवी से कुछ बात कर रही थी की गुरूजी ने मुझे बुलाया. मैं उनके पास गयी.

"यह फलरस रवि को दे आओ." उन्होंने मेरे हाथ में एक गिलास थमाते हुए कहा.

"मैं?" मैंने उन्हें अचरज से देखते हुए कहा. गुरूजी को अच्छी तरह से पता था कि हम दोनों के बीच कैसा रिश्ता था फिर भी वो मुझे ही भेज रहे थे, बल्कि वहां कई सारे अन्य लोग भी थे जो यह काम कर सकते थे. शायद वो चाहते थे कि हमारे सम्बन्ध कुछ सुधर जाए. मगर पानी और आग का भला कभी मेल हुआ हैं?

खैर गुरूजी की आज्ञा सिर-माथे पर धर कर में ज्यूस ले कर चल दी. मैं उसके कमरे के बाहर पहुंची तो दरवाजा आधा खुला हुआ था वो अन्दर बिस्तर पर बैठ कर कुछ पढ़ रहा था.

"आज खुद महारानी ने एक सेवक के लिए इतना कष्ट कैसे उठा लिया?" उसने मुझे देखते ही सचेत होते हुए कहा.

"गुरूजी का आदेश था." मैंने सूखी आवाज में बिना उसकी तरफ देखे ही ज्युज मेज* पर रखते हुए कहा.

"गुरूजी का आदेश..." उसने निःश्वास छोड़ते हुए कहा. "गुरूजी का आदेश न किसी को जीने देता हैं और न ही मरने देता हैं." वो लगातार मुझे ही घूर रहा था. उसकी तीखी नज़रे में अपने जिस्म पर महसूस कर सकती थी.

"चलो अब आ ही गई हो तो थोड़ी सी सेवा और कर दो." उसने मुझे घूरते हुए ही कहा. मैंने चौक कर उसकी तरफ* देखा. "तकिया! नीचे गिर गया था, ऊपर रख दो." उसने नीचे पड़े तकिये की तरफ इशारा करते हुए कहा.* मैं तकिये को घूरने लगी. वास्तव में जब मैं कमरे में आई थी तब तकिया अपनी जगह पर ही था. शायद रवि ने जानबूझकर तकिया गिराया था ताकि वो इसी बहाने मुझे पास से देख सके. मैंने तकिया उठाया और पास की टेबल पर ही रख दिया.

"गन्दा हो गया हैं धुलवाने दे दूंगी, तुम्हारे लिए नया भिजवाती हूँ." मैंने उसे उसी तरह से उसे घूरते हुए कहा.

"तुम क्या-क्या धुलवाओगी अवंतिका? यहाँ तो सब कुछ गन्दा हुआ पड़ा हैं." उसकी नज़रे लगातार मेरा पीछा कर रही थी. मुझे घुटन सी होने लगी.

"तुम इतने दिन जीवित कैसे बचे?" मैंने विषय बदलते हुए कहा.

"प्रेम के सहारे..." उसके चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान आई और फिर गायब हो गयी. "प्रेम में बड़ी ताकत होती है,* यह किसी को मरवा भी सकता हैं और जीवनदान भी दे सकता हैं. तुम्हारे प्रेम ने मुझे* मृत्यु की तरफ धकेल दिया और किसी के प्रेम ने मुझे मौत के मुंह से बचा लिया." मैं उसका चेहरा देखने लगी, किसी को इससे भी प्यार हो सकता हैं यह मेरी समझ से बाहर था. उसने ज्यूस का गिलास उठा लिया था.

"अच्छा हैं.. मैं प्रार्थना करुँगी कि तुम्हे जीवन भर ऐसा ही प्रेम मिलता रहे." मैंने मुड़ते हुए कहा.

"अब नही मिल सकता...उसे तो तुमने छीन लिया हैं." तभी छन्न की आवाज आई. मैंने मुड़कर देखा तो ज्यूस का गिलास फर्श पर गिरा हुआ था.

"कड़वा हो गया था." उसने गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए कहा. मैं चुपचाप बाहर आ गई.

*

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धीरे-धीर समय गुजरने लगा. सब कुछ काफी अच्छे से चल रहा था. राणा, मैं और देवप्रभा काफी अच्छे दोस्त थे. संगठन में भी मैं सबकुछ काफी तेजी से सीख रही थी, इसलिए सब मेरा काफी सम्मान करते थे. मृत्युंजय मुझसे अब भी उतनी ही नफरत करता था मगर उसके बाद उसने कभी मुझसे न तो कुछ कहा और न ही कोई उल्टी सीधी हरकत की थी. वो शायद कोई बड़ा मौका तलाश रहा था.

आश्रम में काफी दिनों से एक लड़के की मुझ पर नज़र थी. यह कोई मुझसे एक साल बड़ा होगा. दिखने में और व्यवहार में मुझे भी अच्छा लगा था. कभी उससे बात तो नही हुई मगर उसकी आँखे जैसे हज़ारो बाते करती थी. जब भी मेरा उससे आमना-सामना होता था वो सांस रोक कर खड़ा हो जाता था और बार-बार नज़रे चुरा कर मुझे देखता था. जब मैं उसकी तरफ देखती वो नीचे देखने लगता. मैंने कई बार उसे मुझे देखते हुए पाया था लेकिन कभी बात करने की मेरी भी हिम्मत नही हुई थी.

"यह लड़का कौन हैं?" एक दिन खाना खाते वक्त* मैंने देवप्रभा से पूछा. वास्तव में मैं आश्रम में बहुत कम ही लोगो को जानती थी मगर देवी इस काम में शातिर थी यहाँ के हर व्यक्ति का कच्चा-चिट्ठा उसके पास था.

"कौन लड़का?" उसने मेरी आँखों को देख उसी दिशा में देखा मगर वहां तीन चार लड़के खड़े थे, इसलिए शायद उसे कुछ समझ में नही आया.

"वो...सफेद कमीज वाला.." मेरी आँखों में चमक साफ़ देखी जा सकती थी.

"यहाँ तो सभी ने सफ़ेद कमीज पहन रखी हैं, तेरी सफ़ेद कमीज कौनसी हैं?" उसने मेरी तरफ देखते हुए ही कहा. मैंने देखा की वो मुझे देखकर मुस्कुरा रही हैं. शायद उसे सारा माज़रा समझ में आ गया था. मैं शरमा गयी. "क्या तू भी...वो जिसके गले में माला हैं." मैंने नीचे देखते हुए कहा.

"रणवीर! देख रही हूँ कि राजकुमारी का काफी दिनों से नैन-मटका चल रहा हैं राजकुमार के साथ..." वो लगातार मुझे घूरे जा रही थी और मैं यहां शर्म से गड़ी जा रही थी. "तू कहे तो उसके साथ कुछ* सेटिंग-वेटिंग करवाऊँ?" उसने हँसते हुए कहा.

"हट! मुझे कोई सेटिंग-वेटिंग नही करनी हैं." मगर मैं बार-बार नज़रे चुरा कर उसे ही देख रही थी और देवी मुझे, जैसे वो मेरे मजे ले रही हो.

"देवी!" मैंने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा. "हां बोलो राजकुमारी." देवी को जब भी मुझे चिढ़ाना होता तो वो मुझे राजकुमारी ही बुलाती थी.

"बात करवा सकती हैं." मैंने रणवीर की* तरफ देखते हुए कहा, वो भी मेरी तरफ ही देख रहा था.

"काजर की कोठरी में कैसा ही सयानो जाय, एक लीक काजर की तो लागे ही लागे..." देवी ने गाते हुए मुझे चिढ़ाते हुए कहा. "करती हूँ, तेरा भी कुछ न कुछ करती हूँ." उसने मुस्कुराते हुए कहा.*

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दिन को सोने के बाद में उठी ही थी की देवी मेरे कमरे में आ गई.

"टिक-टिक, टीक-टीक घड़िया कटना,

गर यार मिले तो कुछ बात बने...

घोर-घनघोर घटा का घटना,

बरसात गिरे तो कुछ बात बने...

नीर विहीन नैनो का झरना,

गम चार मिले तो कुछ बात बने...

पल-पल मुश्किल दिन दिल करे,

अंग यार मिले तो कुछ बात हैं." ♀

देवी ने दरवाजे पर खड़े खड़े ही कहा.

"क्या बात हैं आज बड़ी कविताएँ सूझ रही हैं तुझे?"

"हम जो सोचते थे अक्सर,

वो बात कहीं पर हुई तो हैं..

दूर कहीं उठता हैं धुँआ,

ये आग कहीं पर लगी तो हैं." ◆

"क्या हैं? क्यों परेशान कर रही हैं? सीधे-सीधे बोल न क्या हुआ?"* मैंने खीजते हुए कहा. उसने दरवाजा बंद किया और अंदर आ गई.

"आपके राजकुमार से मिली थी राजकुमारी! आग* दोनों तरफ बराबर जल रही हैं."* उसने बिस्तर पर बैठते हुए कहा.

"राजकुमार! मतलब?" मैंने अपने चेहरे की ख़ुशी छुपाते हुए कहा.

"अबे नोटंकी! नाटक बंद कर, तुझसे आज शाम को मिलने आएगा."

"क्या शाम को? कौन.. कब...कहाँ?" मैंने चोंकते हुए कहा. मुझे इतनी जल्दी यह सब होने की उम्मीद नही थी.

"वो तो वो जाने और तू जाने. मैं तो बस इतना ही जानती हूँ कि आज शाम को चाँद अकेला नही होगा...हाय! मेरा चाँद कहाँ हैं?" उसने आह भरते हुए कहा.

"तेरा चाँद भी दीख रहा हैं. बस लपकने की देर हैं."

"मतलब?" अब उसने चोंकते हुए कहा.

"मंथन! तेरी भी तो उससे सेटिंग-वेटिंग हैं न!" मैंने भी उसी के टोन में कहा.

"न..नही...ऐसा कुछ नही हैं. वो तो बस.."

"बस..बस रहने दे. मुझे सब पता हैं. दोस्त हूँ इसलिए पूछ रही हूँ. कोई मदद चाहिए हो तो बता देना, बदला चूका दूंगी."

उसके बाद वो चली गयी. शाम को मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ गई. मुझे काफी बैचैनी हो रही थी. पता नही उससे कैसे बात करुँगी, वो मेरे बारे में क्या सोचता होगा? मैंने देवी को उसके पास भेजा था तो कहीं वो मुझे गलत न समझ ले. इस तरह के कई सारे विचार मेरे मन में आ रहे थे. मैं कब से ही तैयार होकर बैठी थी. मैंने कोई खास श्रृंगार तो नही किया था मगर खुद को संवार कर हो सके जितना खूबसूरत दिखने की कोशिश कर रही थी.

 


इंतज़ार करते-करते रात की साढ़े दस बज गयी थी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. मैं अचानक सिहर गयी. मैं उठी और खुद को ठीक किया. मेरी धड़कन रेलगाडी से भी तेज चल रही थी. मैंने आँखे बंद करके ही दरवाजा खोला.

"अवंतिका!"

ये आवाज सुनकर मैं चौक गयी. यह तो कोई जानी-पहचानी आवाज थी. मैंने आँखे खोली तो सामने गुरूजी खड़े थे. मैं सकपका गयी. उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा मगर ऐसा नही लगा की उन्हें कोई ख़ास फर्क पड़ा हो.

"हमारे साथ चलो, एक* महत्वपूर्ण बात हैं." उन्होंने मुड़ते हुए कहा. मैं उनके पीछे-पीछे हो ली.

हम दोनों संग़ठन के हॉल में पहुंचे. वहां पर सब लोग इकठ्ठा हुए थे. हम दोनों ऊपर मंच पर थे.

"मित्रो! हम जिस महत्वपूर्ण क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे, वो क्षण आने वाला हैं. अगले माह की पूर्णिमा को वो शुभ घडी हैं जब हम सूत्र साधना कर सकते हैं." उन्होंने मेरी और देखकर मुस्कुराते हुए कहा. मैं यह सुनकर चोंक गयी. वास्तव में मैंने उस दिन के बाद आजतक कभी सूत्र साधना के बारें में सोचा ही नही था. सब कुछ इतने अच्छे से चल रहा था कि मैं इस सब में ही रम गयी थी. अचानक इसके बारे में सुनकर मुझे झटका लगा.

"मित्रो हमें आज से ही इस अनुष्ठान के लिए तैयारी शुरू कर देनी होगी. मैं इसमें किसी भी तरफ की भूल नही चाहता हूँ. हमने वर्षो तक इसके लिए प्रतीक्षा की हैं और अगर यह अवसर हमारे हाथ से निकल गया तो शायद मैं अपने जीवन में दुबारा इसका साक्षी न बन सकूँ." मैं चुपचाप खड़ी यह सब सुन रही थी.

"आ..छु...!" तभी एक आवाज आई. हम सब चोंक गए क्योंकि यह हमसे किसी के भी छींकने की आवाज नही थी. यह दरअसल गुरूजी के कमरे से यहाँ तक आने का जो गलियारा था वहां से आई थी. हम सब उधर ही देखने लगे.

"कौन हैं वहां?" एक तांत्रिक तेजी से मच पर चढ़ा और उस गलियारे की तरफ लपका. हम सब की नज़रे उधर ही जमी हुई थी. वो तांत्रिक किसी को खींचते हुए* लाया जिसे देखकर मेरी साँसे अटक गयी. यह तो रणवीर था. आखिर यह यहाँ तक कैसे पहुँचा ? जरुर मुझसे मिलने के लिए आया होगा और मेरे पीछे-पीछे यहाँ तक आ गया होगा ।

“रणवीर तुम ?” गुरूजी ने उसे देखकर चौंकते हुए कहा ।

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?” रणवीर आश्रम का एक होनहार लड़का था, इसलिए गुरूजी उसे अच्छी तरह से जानते थे, मगर रणवीर का इस तरह से यहाँ आना उनकी भी समझ से परे था । जवाब में रणवीर ने बस आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। गुरूजी ने भी उसकी नजरो का पीछा करते हुए मेरी तरफ देखा। अब शायद उन्हें सारा मामला समझ में आ गया था। उनके मुझे बुलाने आते वक़्त मेरा इस तरह तैयार होकर रहना, मेरा आँखे बंद करके दरवाजा खोलना, उन्हें देखकर चौक जाना और फिर रणवीर का अचानक यहाँ आ जाना। उनके दीमाग में एक के बाद एक कड़ी जुड़ती गयी और पूरी कहानी बन गयी।

“तू यहाँ क्या कर रहा है ? जानता है न बिना आज्ञा के हमारे कमरे में आना सख्त मना है ?”

“जी मै तो वो.......” रणवीर कहते-कहते इधर-उधर देखने लगा। जल्द ही उसे समझ आ गया कि यह आश्रम की कोई गुप्त सभा है और उसने यहाँ आकर कोई बड़ी गलती कर दी है।

“ये जरुर कोई जासूस है और यहाँ पर जासूसी करने आया है।” भीड़ में से एक तांत्रिक ने कहा।

यह शब्द सुनते ही सब आपस में गुटुर-गु करने लगे।

“संगठन के शत्रु को सख्त सजा मिलनी चाहिए।” एक दुसरे तांत्रिक ने सुर में सुर मिलाते हुए कहा।

“हम संगठन के रहस्यों की रक्षा के लिए प्राण ले भी सकते है और प्राण दे भी सकते है।” यह रवि था। शायद गुरूजी की तरह वो भी असली माजरा समझ गया था या फिर वो पहले से ही हम दोनों के बारे में जानता था, इसलिए वो मौके का पूरा फायदा उठाने की फिराक में था और आग में घी डाल रहा था।

“पहले हम सुन तो ले की रणवीर कहना क्या चाहता है ?” राणा ने मामला सम्भालते हुए कहा।

“हम एक चोर से ये अपेक्षा करे की वो अपनी चोरी स्वीकार करेगा ।” रवि ने राणा की आवाज को दबाते हुए कहा।

“शान्ति...........” गुरूजी ने सख्त आवाज में कहा।

“हम पहले रणवीर से बात करना चाहेंगे।” गुरूजी ने रणवीर पर एक पैनी निगाह डालते हुए कहा।

“लेकिन गुरूजी............” मौका हाथ से जाता देखकर रवि छटपटाया।

“बस हम निर्णय कर चुके है, आप सब प्रतीक्षा करे।” गुरूजी ने रवि का मुह बंद करते हुए कहा।

“अवन्तिका आप भी हमारे साथ आइये ।” गुरूजी ने इशारा किया। मै भी गुरूजी के पीछे-पीछे चल दी।

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गुरूजी के कमरे में सामने गुरूजी खड़े थे और इधर रणवीर और मै दोनो सर झुकाए खड़े थे।

“अवन्तिका! क्या रणवीर तुमसे मिलने आया था ?” गुरूजी ने रणवीर की बजाय मुझसे पूछा। शायद वो जानते थे की मै झूठ नहीं बोल सकती हूँ। मै बस सिर झुकाए खड़ी रही।

“तुम समझ रही हो न यह मामला कितना गंभीर है ? यह रणवीर के जीवन का सवाल है। इसलिए मै जो पूछ रहा हूँ उसका ठीक-ठीक जवाब दो। क्या तुम रणवीर से मिलने वाली थी ?”

जान का खतरा सुनकर रणवीर हक्का-बक्का गुरूजी को देखने लगा। उसे समझ में नहीं आ रहा था की उसने ऐसा क्या गुनाह कर दिया की इतना कोहराम मचा हुआ है ? मैंने हाँ में सर हिला दिया।

“गुरूजी वो तो मैंने अवन्तिका को आपके साथ देखा था तो मै भी पीछे-पीछे चला आया था और फिर आपके कमरे में एक गुप्त द्वार देखा तो जिज्ञासवस वहां तक पहुच गया।” रणवीर ने एक ही सांस में पूरी सफाई पेश कर दी।

मुझे अब समझ में आया यह मामला कितना गंभीर है।

“गुरूजी! गलती हमारी है की हमने समय से पहले ही सभा बुलायी और ऊपर से द्वार भी खुला छोड़ दिया, हमारी गलती की सजा एक निर्दोष को नहीं मिल सकती है।”मैंने रणवीर का बचाव करते हुए कहा। रणवीर ने एक नजर उठाकर मुझे देखा, जैसे मन ही मन शुक्रिया कह रहा हो।

“अवन्तिका, समस्या यह नहीं है की रणवीर सभा तक पंहुचा, बल्कि समस्या यह है की वो तुम्हारे पीछे वहां तक पंहुचा था। संगठन में कुछ लोग यह बात समझ चुके है और इसे तुम्हारे विरुद्ध इस्तेमाल करेंगे। मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि सूत्र साधना की सफलता के लिए सूत्रों का ब्रम्हचर्य पालन अनिवार्य है। अगर मै सच बताता हूँ तो ये रणवीर के लिए और भी घातक होगा, क्योकि संगठन का कोइ भी व्यक्ति सूत्र साधना की असफलता के कारक को निर्दोष नहीं मानेगा। गुरूजी ने मुझे पूरा मामला समझाया। रणवीर हमें इस तरह देख रहा था जैसे की हम दोनों किसी विदेशी भाषा में बात कर रहे थे।

“लेकिन गुरूजी हम दोनों के बिच ऐसा कुछ भी नहीं है।” मैंने गिडगिडाते हुए कहा।

“.....और यह सिद्ध कैसे होगा ? चलो मै तो एक क्षण के लिए मान भी लु लेकिन निचे खड़े उन लोगो में से कोइ भी यह मानने के लिए तैयार नहीं होगा।” गुरूजी ने मुझे दबाते हुए कहा।

“तो आप कहना क्या चाहते है की रणवीर को.........” मै कहते-कहते रुक गयी। वास्तव में, मै रणवीर को और नहीं डराना चाहती थी।

“मै किसी भी हाल में सूत्र साधना को खतरे में नहीं डाल सकता हूँ।”

“लेकीन इतनी सी भूल के लिए भला कैसे रणवीर को ............?” मै फिर से रुक गयी मगर इस वक्त इसका कारण मेरे दीमाग में चल रहा डर का बवंडर था।

“हम प्रतिबद्ध हैं, स्वयं तुमने संगठन से जुड़ने से पहले संगठन के रहस्य की रक्षा के लिए प्रण लिया था।” गुरूजी ने अंतिम तर्क पेश किया। वो शायद इस मामले को यहीं ख़त्म करना चाहते थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था की गुरूजी ऐसा कैसे कह सकते है ? एक छोटी सी भूल के लिए कैसे रणवीर को इतनी बड़ी सजा मिल सकती है , और सबसे ज्यादा दुःख मुझे इस बात का हो रहा था की रणवीर मेरी वजह से इस मुसीबत में फसा था, वो बेचारा तो सिर्फ मुझसे मिलने आया था।

“मगर संगठन से जुडने से पहले मैंने एक शर्त भी रखी थी” मैंने अपना ब्रम्हास्त्र फेंका। शर्त के बारे में सुनकर गुरूजी के रोंगटे खड़े हो गए। शायद वो इस बारे में भूल ही चुके थे। “अगर रणवीर को खरोंच भी आती है तो मै इसी वक़्त संगठन और यह आश्रम छोड़ कर चली जाउंगी।” मैंने लगभग धमकी देते कहा।

“अवंतिका......” अब गिडगिडाने की बारी गुरूजी की थी। उन्हें आश्चर्य हो रहा था की सीधी-साधी दिखने वाली अवन्तिका इतनी शातिर भी हो सकती है।

“सूत्र साधना तो वैसे भी खतरे में है, बेहतर है आप रणवीर को जाने दे।” मैंने अंतिम तीर फेंका। गुरूजी अपनी दाढ़ी को सवाँरते हुए सोचने लगें।

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बाहर सभी लोग बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहे थे। गुरूजी मेरे और रणवीर के साथ मंच पर पहुँचे, सब हमारी तरफ देखने लगे।

“हम रणवीर से बात करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि वो निर्दोष है और यहाँ सिर्फ भूलवश पहुँच गया था।” गुरूजी ने घोषणा करते हुए कहा।

“लेकिन फिर भी यह संगठन के रहस्यों को जान चूका है, इसे ऐसे ही तो नहीं जाने दे सकते हैं।”

“इसकी जिम्मेदारी मै लेती हूँ।” मैंने कहा, “रणवीर कोइ भी जानकारी किसी को भी नहीं देगा।”

“और तुम्हारी जिम्मेदारी कौन लेगा ?” यह रवि था। सब उसकी तरफ देखने लगे।

“क्या यह सत्य नहीं है कि तुम रणवीर से प्यार करती हो और वो तुम्हारे पीछे ही यहाँ आया है ?” रवि ने अपनी चाल चली।

“नहीं ऐसा कुछ नहीं है, रणवीर बस भूलवश यहाँ आया था।” मैंने गुरूजी की तरफ देखते हुए कहा व गुरूजी ने आँखों ही आँखों में मुझे झूठ कहने की स्वीकृति दे दी।

“लेकिन मैंने तो......”

“बस रवि !” वो आगे कुछ और कहना चाहता था, मगर गुरूजी ने उसे वहीं रोक दिया। “हम निर्णय कर चुके है। रणवीर तुम जा सकते हो।” गुरूजी ने रणवीर की तरफ देखते हुए कहा। रवि अब भी मुझे गुस्से से घुर रहा था।

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