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नंदिनी किसी तरह से शहर में एक थाने तक पहुंची.
“यहाँ का इनचार्ज कौन हैं?” नंदिनी ने अन्दर जाकर एक हवलदार से पूछा.
हवलदार ने एक बार नंदिनी को ऊपर से नीचे घुरा. नंदिनी पूरी अस्त-व्यस्त थी. बाल बिखरे हुए थे. रात को ठीक से न सो पाने की वजह से उसकी आँखे भी सूजी हुई थी.
“आप कौन मेडम? क्या काम हैं आपको?” उस हवलदार ने पूछा.
“मैं जयपुर ब्लाक डी से एसीपी नंदिनी हूँ.” नंदिनी ने अपनी जेब से आईडी कार्ड निकाल कर दिखाते हुए कहा. यह तो गनीमत थी की नंदिनी आईडी कार्ड अपनी जेब में ही रखती थी वरना उसका पर्स, मोबाइल सब तो वही जीप में ही रह गया था.
“जय हिन्द मैडम....” उस हवलदार ने सैल्यूट करते हुए कहा. “माय सेल्फ कांस्टेबल मनीष.”
“जय हिन्द! मुझे यहाँ के इंचार्ज से मिलना हैं.” नंदिनी ने कहा.
“मैडम वो अभी आते ही होंगे, मैं अभी उन्हें फोन कर देता हूँ. आप यहाँ अचानक?” हवलदार ने वापस नंदिनी की हालत को देखते हुए पूछा. उसे यह समझ में नही आ रहा था कि नंदिनी यहाँ इस हालत में क्यों आई हैं.
“किसी केस के सिलसिले में मिलना हैं. मैं एक फोन कर सकती हूँ?”
“ जी बिलकुल मैडम...आप अन्दर केबिन में बेठिये, मैं चाय भिजवाता हूँ.” कांस्टेबल किसी को फोन करता हुआ बाहर चला गया.
______________________________________________________________
जयपुर के थाने में केबिन में सामने एक तरफ राणा ठाकुर बैठे थे तो दूसरी तरफ विजय बैठा था. विजय राणा ठाकुर के व्यक्तित्व को जानता था इसलिए उन्हें लॉकअप में रखने की बजाय एसी केबिन में बिठाया था.
“आपको उन ट्रक ड्राइवर्स के बारें में कैसे पता चला? क्या वो ट्रक आपके थे?” विजय ने पूछा.
“कैसी बात कर रहे हो विजय? हम तुम्हे इतने पागल लगते हैं कि खुद अपनी ट्रक पकडवाएंगे. वो तो उस ढाबे का मालिक हमारा दोस्त था, उसने उन ड्राइवरो को बात करते हुए सुना तो उसे कुछ शक हुआ, तो उसने हमको बता दिया.”
“हां...लेकिन ऐसे मामलो में तो अमूमन लोग पुलिस वालो को फोन करते हैं, उसने आपको क्यों बताया और उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की?”
“हमें क्या पता उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की और पुलिस की मदद करना कोई अपराध हैं क्या?” राणा ने थोडा सा गंभीर होते हुए कहा.
“हम्म...नही ऐसा तो नही हैं. नंदिनी की किडनेपिंग के बारें में आप क्या जानते हैं?”
“इस बारें में हम कुछ नही जानते हैं.” राणा ने सधा सा जवाब दिया.
“क्या ताश्री के केस का इससे कोई लेना देना हैं?”
“हम तुम्हे पहले ही बता चुके हैं कि हम ताश्री के मामले में कुछ नही जानते हैं.”
“हां...मगर आपने यह नही बताया कि ताश्री की मौत के बाद उसकी माँ आपकी ही एक होटल में काम करती थी.”
“क्या...?” राणा ने हडबडाते हुए पूछा.
“मुझे पता हैं राणा साहब...शुक्र मनाइए कि आपका लिहाज था कि की मैंने नंदिनी को इस बारें में अब तक कुछ नही बताया. ताश्री की माँ अब कहा हैं?”
“उनका नंदिनी के अपहरण से कुछ भी लेना देना नही हैं.”
“इस सब का एक दुसरे से कुछ न कुछ तो लेना देना हैं राणा साहब...यह नंदिनी की ज़िन्दगी का सवाल हैं, बेहतर हैं आप मुझे सबकुछ सच सच बता दे, वरना मेरे पास दुसरे तरीके भी हैं.”
“ठीक हैं मैं उन्हें जानता हूँ... मैं ताश्री को भी जानता था. मगर उस सबका अब क्या करना हैं? अगर नंदिनी की जान खतरे में हैं, तो बेहतर हैं कि मुझसे नही उससे सवाल करो जिसको इस केस के खुलने से सबसे ज्यादा खतरा हैं.”
“आपकी किसकी बात कर रहे हैं?”
“संगठन के अध्यक्ष मृत्युंजय महाराज.”
“मृत्युंजय महाराज जेल में हैं. वो नंदिनी का अपहरण कैसे करवा सकते हैं?”
“तो फिर तुम संगठन के वर्तमान अध्यक्ष को पकड़ो.”
“वेद सागर..उसके बारें में कोई कुछ नही जानता हैं. मैं सिर्फ शक की बिनाह पर एक राष्ट्रिय संस्था के खिलाफ कार्यवाही नही कर सकता हूँ. मेरे लिए अभी नंदिनी को बचाना बहुत जरुरी हैं, और अगर इसमें संगठन का हाथ हैं तो मेरी मदद सिर्फ दो लोग कर सकते हैं या तो आप या फिर ताश्री की माँ!”
“तुम नंदिनी से प्यार करते हो न?”
अचानक राणा के पूछे गये इस सवाल से विजय झेंप गया. “मुझे तो उसी दिन पता चल गया था, जब तुम पहली बार नंदिनी के साथ मेरे घर आये थे.” राणा कुछ देर रुका. “मैं वेद के बारें में कुछ नही जानता हूँ लेकिन जो सकता हैं ताश्री की माँ जानती हो...वो इस वक्त जोधपुर में हैं. मेरे एक मित्र के होटल धोराराणी में काम करती हैं.”
“शुक्रिया राणा साहब, मैं आपका अहसानमंद हूँ.”
तभी विजय का फोन बजा.
“हेल्लो कौन? इंस्पेक्टर विजय हियर.”
“विजय में नंदिनी बोल रही हूँ.”
“नंदिनी! तुम कहाँ हो नंदिनी?” विजय ने चौंकते हुए कहा. राणा ने भी आश्चर्य से विजय की और देखा.
“मैं अभी हरिद्वार मैं हूँ, बड़ी मुश्किल से उन गुंडों के चुंगल से भाग कर आई हूँ. अभी यहाँ एक पुलिस स्टेशन से फोन किया हैं.”
“तुम ठीक तो हो न?” विजय ने चैन की सांस लेते हुए कहा.
“हां मैं बिलकुल ठीक हूँ. मुझे कुछ पैसो और एक फोन की जरूरत हैं.”
“ठीक हैं वहां के इनचार्ज से मेरी बात करवा दो. मैं सब कुछ करवा दूंगा और तुम्हारे लिए आज शाम का फ्लाइट का टिकट भी करवा देता हूँ.”
“ठीक हैं.”
“ठीक हैं अपना ख्याल रखना.”
इसके बाद विजय ने फोन रखा. राणा उसे घुर रहा था जैसे बिना ईद के कोई बकरा कट गया हो.
“मिस नंदिनी कैसी हैं?” राणा ने संयत होते हुए पूछा.
“वो ठीक हैं. किसी तरह से उन गुंडों की गिरफ्त से भाग छुटने में कामयाब रही.”
“हम्म...तो मैं अब जा सकता हूँ?”
“जी...बिलकुल...मैं आपको जो तकलीफ हुई उसके लिये माफ़ी चाहता हूँ.” राणा ने एक बार फिर विजय को घुरा और बाहर चला गया.
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इंस्पेक्टर यशपाल ने केबिन में प्रवेश किया. अन्दर नंदिनी ने अभी फोन रखा ही था.
“जय हिन्द मैडम...मैं इंस्पेक्टर शर्मा यहाँ का इनचार्ज...” इंस्पेक्टर ने नंदिनी से हाथ मिलाते हुए कहा.
“मैं एसीपी नंदिनी...” नंदिनी को अपनी हालत पर तरस आ रहा था. वो इससे ज्यादा कुछ नही बोल पाई.
“जी कहिये मैडम मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ. इंस्पेक्टर ने अपनी सीट पर बैठते हुए कहा.
“आप इस नंबर पर बात कर लीजये वो आपको सब समझा देगा.” नंदिनी ने एक नंबर डायल करते हुए कहा.
“जी मैडम...”
नंदिनी ने विजय को फोन किया था, विजय ने उस इंस्पेक्टर को सब समझा दिया.
“मैडम यह मेरा क्रेडिट कार्ड हैं..२५२५ इसके पिन हैं..आपको जितना कैश चाहिए आप इसके जरिये निकाल सकती हैं...मैं यही पास ही एक होटल में कमरा बुक करवा रहा हूँ और आपको एक फोन भी दिलवा देता हूँ...”
“थैंक यू..” नंदिनी ने बस इतना ही कहा. इंस्पेक्टर कुछ देर के लिए बाहर गया और वापस आया.
“सब हो गया हैं मैडम...टैक्सी कुछ देर में आती ही होगी. और कुछ...”
“थैंक्स अगेन...मुझे एक हेल्प और चाहिए थी. यहाँ किसी जेल में मृत्यंजय महाराज करके कोई कैदी हैं, आप मुझे उसके बारें में डिटेल्स दे सकते हैं?”
“आप कही बिएसएस के अध्यक्ष श्री मृत्युंजय जी महाराज की बात तो नहीं कर रही हैं?”
“जी वहीँ...आप जानते हैं उनके बारें में?”
“उनके बारें में कौन नही जानता...२०१३ का सबसे हाई प्रोफाइल केस रहा हैं यहाँ का... मुझे तो अब तक विश्वास नही होता की मृत्युंजय जी महाराज ऐसा काम कर सकते हैं.”
“वो इस वक्त कौनसी जेल में हैं?”
“शायद सेंट्रल जेल में होंगे. वैसे उनका केस पास ही के एक थाने में था. मैं वहां के इनचार्ज से बात कर लेता हूँ वो आपको सारी जानकारी दे देंगे.”
“जी शुक्रिया..”
तभी एक हवलदार आया.
“सर...वो टैक्सी आ गयी हैं.”
“मैं चलती हूँ.” नंदिनी ने कहा और टैक्सी में बैठ गयी.
नंदिनी के जाने के बाद इंस्पेक्टर ने अपना फोन निकाला और किसी को फोन किया.
“जय महाकाल. हम नागपाल बोल रहे हैं.”
“जय महाकाल”
“यहाँ का इनचार्ज कौन हैं?” नंदिनी ने अन्दर जाकर एक हवलदार से पूछा.
हवलदार ने एक बार नंदिनी को ऊपर से नीचे घुरा. नंदिनी पूरी अस्त-व्यस्त थी. बाल बिखरे हुए थे. रात को ठीक से न सो पाने की वजह से उसकी आँखे भी सूजी हुई थी.
“आप कौन मेडम? क्या काम हैं आपको?” उस हवलदार ने पूछा.
“मैं जयपुर ब्लाक डी से एसीपी नंदिनी हूँ.” नंदिनी ने अपनी जेब से आईडी कार्ड निकाल कर दिखाते हुए कहा. यह तो गनीमत थी की नंदिनी आईडी कार्ड अपनी जेब में ही रखती थी वरना उसका पर्स, मोबाइल सब तो वही जीप में ही रह गया था.
“जय हिन्द मैडम....” उस हवलदार ने सैल्यूट करते हुए कहा. “माय सेल्फ कांस्टेबल मनीष.”
“जय हिन्द! मुझे यहाँ के इंचार्ज से मिलना हैं.” नंदिनी ने कहा.
“मैडम वो अभी आते ही होंगे, मैं अभी उन्हें फोन कर देता हूँ. आप यहाँ अचानक?” हवलदार ने वापस नंदिनी की हालत को देखते हुए पूछा. उसे यह समझ में नही आ रहा था कि नंदिनी यहाँ इस हालत में क्यों आई हैं.
“किसी केस के सिलसिले में मिलना हैं. मैं एक फोन कर सकती हूँ?”
“ जी बिलकुल मैडम...आप अन्दर केबिन में बेठिये, मैं चाय भिजवाता हूँ.” कांस्टेबल किसी को फोन करता हुआ बाहर चला गया.
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जयपुर के थाने में केबिन में सामने एक तरफ राणा ठाकुर बैठे थे तो दूसरी तरफ विजय बैठा था. विजय राणा ठाकुर के व्यक्तित्व को जानता था इसलिए उन्हें लॉकअप में रखने की बजाय एसी केबिन में बिठाया था.
“आपको उन ट्रक ड्राइवर्स के बारें में कैसे पता चला? क्या वो ट्रक आपके थे?” विजय ने पूछा.
“कैसी बात कर रहे हो विजय? हम तुम्हे इतने पागल लगते हैं कि खुद अपनी ट्रक पकडवाएंगे. वो तो उस ढाबे का मालिक हमारा दोस्त था, उसने उन ड्राइवरो को बात करते हुए सुना तो उसे कुछ शक हुआ, तो उसने हमको बता दिया.”
“हां...लेकिन ऐसे मामलो में तो अमूमन लोग पुलिस वालो को फोन करते हैं, उसने आपको क्यों बताया और उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की?”
“हमें क्या पता उस ड्राईवर ने आत्महत्या क्यों की और पुलिस की मदद करना कोई अपराध हैं क्या?” राणा ने थोडा सा गंभीर होते हुए कहा.
“हम्म...नही ऐसा तो नही हैं. नंदिनी की किडनेपिंग के बारें में आप क्या जानते हैं?”
“इस बारें में हम कुछ नही जानते हैं.” राणा ने सधा सा जवाब दिया.
“क्या ताश्री के केस का इससे कोई लेना देना हैं?”
“हम तुम्हे पहले ही बता चुके हैं कि हम ताश्री के मामले में कुछ नही जानते हैं.”
“हां...मगर आपने यह नही बताया कि ताश्री की मौत के बाद उसकी माँ आपकी ही एक होटल में काम करती थी.”
“क्या...?” राणा ने हडबडाते हुए पूछा.
“मुझे पता हैं राणा साहब...शुक्र मनाइए कि आपका लिहाज था कि की मैंने नंदिनी को इस बारें में अब तक कुछ नही बताया. ताश्री की माँ अब कहा हैं?”
“उनका नंदिनी के अपहरण से कुछ भी लेना देना नही हैं.”
“इस सब का एक दुसरे से कुछ न कुछ तो लेना देना हैं राणा साहब...यह नंदिनी की ज़िन्दगी का सवाल हैं, बेहतर हैं आप मुझे सबकुछ सच सच बता दे, वरना मेरे पास दुसरे तरीके भी हैं.”
“ठीक हैं मैं उन्हें जानता हूँ... मैं ताश्री को भी जानता था. मगर उस सबका अब क्या करना हैं? अगर नंदिनी की जान खतरे में हैं, तो बेहतर हैं कि मुझसे नही उससे सवाल करो जिसको इस केस के खुलने से सबसे ज्यादा खतरा हैं.”
“आपकी किसकी बात कर रहे हैं?”
“संगठन के अध्यक्ष मृत्युंजय महाराज.”
“मृत्युंजय महाराज जेल में हैं. वो नंदिनी का अपहरण कैसे करवा सकते हैं?”
“तो फिर तुम संगठन के वर्तमान अध्यक्ष को पकड़ो.”
“वेद सागर..उसके बारें में कोई कुछ नही जानता हैं. मैं सिर्फ शक की बिनाह पर एक राष्ट्रिय संस्था के खिलाफ कार्यवाही नही कर सकता हूँ. मेरे लिए अभी नंदिनी को बचाना बहुत जरुरी हैं, और अगर इसमें संगठन का हाथ हैं तो मेरी मदद सिर्फ दो लोग कर सकते हैं या तो आप या फिर ताश्री की माँ!”
“तुम नंदिनी से प्यार करते हो न?”
अचानक राणा के पूछे गये इस सवाल से विजय झेंप गया. “मुझे तो उसी दिन पता चल गया था, जब तुम पहली बार नंदिनी के साथ मेरे घर आये थे.” राणा कुछ देर रुका. “मैं वेद के बारें में कुछ नही जानता हूँ लेकिन जो सकता हैं ताश्री की माँ जानती हो...वो इस वक्त जोधपुर में हैं. मेरे एक मित्र के होटल धोराराणी में काम करती हैं.”
“शुक्रिया राणा साहब, मैं आपका अहसानमंद हूँ.”
तभी विजय का फोन बजा.
“हेल्लो कौन? इंस्पेक्टर विजय हियर.”
“विजय में नंदिनी बोल रही हूँ.”
“नंदिनी! तुम कहाँ हो नंदिनी?” विजय ने चौंकते हुए कहा. राणा ने भी आश्चर्य से विजय की और देखा.
“मैं अभी हरिद्वार मैं हूँ, बड़ी मुश्किल से उन गुंडों के चुंगल से भाग कर आई हूँ. अभी यहाँ एक पुलिस स्टेशन से फोन किया हैं.”
“तुम ठीक तो हो न?” विजय ने चैन की सांस लेते हुए कहा.
“हां मैं बिलकुल ठीक हूँ. मुझे कुछ पैसो और एक फोन की जरूरत हैं.”
“ठीक हैं वहां के इनचार्ज से मेरी बात करवा दो. मैं सब कुछ करवा दूंगा और तुम्हारे लिए आज शाम का फ्लाइट का टिकट भी करवा देता हूँ.”
“ठीक हैं.”
“ठीक हैं अपना ख्याल रखना.”
इसके बाद विजय ने फोन रखा. राणा उसे घुर रहा था जैसे बिना ईद के कोई बकरा कट गया हो.
“मिस नंदिनी कैसी हैं?” राणा ने संयत होते हुए पूछा.
“वो ठीक हैं. किसी तरह से उन गुंडों की गिरफ्त से भाग छुटने में कामयाब रही.”
“हम्म...तो मैं अब जा सकता हूँ?”
“जी...बिलकुल...मैं आपको जो तकलीफ हुई उसके लिये माफ़ी चाहता हूँ.” राणा ने एक बार फिर विजय को घुरा और बाहर चला गया.
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इंस्पेक्टर यशपाल ने केबिन में प्रवेश किया. अन्दर नंदिनी ने अभी फोन रखा ही था.
“जय हिन्द मैडम...मैं इंस्पेक्टर शर्मा यहाँ का इनचार्ज...” इंस्पेक्टर ने नंदिनी से हाथ मिलाते हुए कहा.
“मैं एसीपी नंदिनी...” नंदिनी को अपनी हालत पर तरस आ रहा था. वो इससे ज्यादा कुछ नही बोल पाई.
“जी कहिये मैडम मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ. इंस्पेक्टर ने अपनी सीट पर बैठते हुए कहा.
“आप इस नंबर पर बात कर लीजये वो आपको सब समझा देगा.” नंदिनी ने एक नंबर डायल करते हुए कहा.
“जी मैडम...”
नंदिनी ने विजय को फोन किया था, विजय ने उस इंस्पेक्टर को सब समझा दिया.
“मैडम यह मेरा क्रेडिट कार्ड हैं..२५२५ इसके पिन हैं..आपको जितना कैश चाहिए आप इसके जरिये निकाल सकती हैं...मैं यही पास ही एक होटल में कमरा बुक करवा रहा हूँ और आपको एक फोन भी दिलवा देता हूँ...”
“थैंक यू..” नंदिनी ने बस इतना ही कहा. इंस्पेक्टर कुछ देर के लिए बाहर गया और वापस आया.
“सब हो गया हैं मैडम...टैक्सी कुछ देर में आती ही होगी. और कुछ...”
“थैंक्स अगेन...मुझे एक हेल्प और चाहिए थी. यहाँ किसी जेल में मृत्यंजय महाराज करके कोई कैदी हैं, आप मुझे उसके बारें में डिटेल्स दे सकते हैं?”
“आप कही बिएसएस के अध्यक्ष श्री मृत्युंजय जी महाराज की बात तो नहीं कर रही हैं?”
“जी वहीँ...आप जानते हैं उनके बारें में?”
“उनके बारें में कौन नही जानता...२०१३ का सबसे हाई प्रोफाइल केस रहा हैं यहाँ का... मुझे तो अब तक विश्वास नही होता की मृत्युंजय जी महाराज ऐसा काम कर सकते हैं.”
“वो इस वक्त कौनसी जेल में हैं?”
“शायद सेंट्रल जेल में होंगे. वैसे उनका केस पास ही के एक थाने में था. मैं वहां के इनचार्ज से बात कर लेता हूँ वो आपको सारी जानकारी दे देंगे.”
“जी शुक्रिया..”
तभी एक हवलदार आया.
“सर...वो टैक्सी आ गयी हैं.”
“मैं चलती हूँ.” नंदिनी ने कहा और टैक्सी में बैठ गयी.
नंदिनी के जाने के बाद इंस्पेक्टर ने अपना फोन निकाला और किसी को फोन किया.
“जय महाकाल. हम नागपाल बोल रहे हैं.”
“जय महाकाल”