• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

रहस्यमई आँखें complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date


इस घटना को दो दिन बित चुके थे। मुझे लगा की चलो मुसीबत टली, बाल-बाल बच गए। बाद में रणवीर मुझे मिला और इस मुसीबत से छुटकारा दिलाने के लिए शुक्रिया कहा। मैंने भी उसे संगठन के बारे में किसी को न बताने की सख्त हिदायत दे दी।

मै अपने कमरे में थी तभी गुरूजी आए। हालचाल पुछने के बाद उन्होंने कहा, “अवन्तिका कहीं तुमने रणवीर के साथ .....?" वो कहते-कहते रुक गये लेकिन मै उनकी बात समझ चुकी थी।

“मै आपको पहले ही कह चुकी हूँ की हमारे बिच ऐसा कुछ नहीं है।” मैंने पुरे विश्वास के साथ उनकी आँखों में देखते हुए कहा।

“तुम तो जानती हो की सूत्र साधना के लिए सभी लड़कियों का कौमार्य होना आवश्यक है ? उन्होंने थोडा झिझकते हुए कहा।

“आपसे यह किसने कहा ?” वो मेरा चेहरा देखने लगे।

“सूत्र सूक्त में यह अवश्य लिखा है कि ग्यारह सूत्रों का पवित्र होना आवश्यक है मगर यह पवित्रता का पैमाना शारीरिक हो ऐसा तो कहीं नहीं लिखा ।”

“मतलब?” उन्होंने मेरा चेहरा देखते हुए कहा।

“मतलब यह की सूत्र सूक्त कहीं से भी कौमार्य की मांग नहीं करता है, बल्कि सूक्त जिस पवित्रता की बात करता है वो आध्यात्मिक स्तर पर है। यह उद्देश्य के बारे में है, माध्यम के बारे में नहीं।”

“लेकिन एक समस्या और है !” उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा “संगठन में कुछ लोगों को तुम्हारी प्रतिबद्धता पर संदेह है।”

“क्या? मगर क्यों?” मैंने चौंकते हुए कहा।

“रणवीर वाले मामले के बाद उन्हें लगता है की हो सकता है तुम संगठन के साथ छल कर सकती हो।”

“तो मुझे अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए क्या करना होगा ?”

“विवाह!” उन्होंने मेरे पास आते हुए धीरे से कहा।

“क्या?” मै पूरी तरह से सिहर गयी। “मगर किसके साथ ?” मैंने आंखे फाड़ कर पूछा।

“शक्ति का मेल हमेशा शक्तिशाली के साथ होता है। संगठन में तुम्हारे बाद सबसे शक्तिशाली कौन है ?” मै उनका चेहरा देख रही थी।

“मृत्युंजय।” उन्होंने बिना मेरी ओर देखे कहा।

“मृत्युंजय ?” मैंने चौंककर कहा। “मेरा विवाह भला मृत्युंजय से कैसे हो सकता है ? और अभी तो आप कह रहे थे कि सभी सूत्रों का ब्रम्हचर्य का पालन अनिवार्य है तो फिर मै विवाह कैसे कर सकती हूँ ?” मैंने असमंजस में कहा ।

“ब्रम्हचर्य और अविवाहित होने में फर्क होता है । यह आवश्यक नहीं की विवाह से ब्रम्हचर्य टूटे । मृत्युंजय और तुम्हारा विवाह एक छद्म विवाह होगा जो सिर्फ संगठन के लोगों को विश्वास में लेने के लिए होगा, सूत्र साधना के पूर्ण होने के पश्चात तुम अपना जीवन जीने के लिए मुक्त हो जावोगी और इस विवाह के बंधन से भी ।” उन्होंने अपनी योजना मुझे समझायी ।

“मगर मृत्युंजय ही क्यों, कोई और क्यों नहीं ?” मैंने उन्हें संदेह की दृष्टी से देखते हुए कहा ।

“क्योंकि वो हमारा पुत्र है, संगठन के अध्यक्ष नित्यानंद का पुत्र.... उससे तुम्हारे विवाह के पश्चात किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं होगी की तुम पर उंगली उठा सके ।”

“लेकिन क्या मृत्युंजय इसके लिए तैयार होगा ?” उनकी बाँछे खिल गयीं । मृत्युंजय की आपत्ति पूछने का अर्थ था कि मै इस विवाह* के लिए तैयार थी ।

“मृत्युंजय कभी हमें मना नहीं कर सकता है, अगर हम उसे तुमसे विवाह करने के लिए कहते है तो उसे विवाह करना ही होगा ।” उन्होंने गर्व से सीना चौड़ा करते हुए कहा ।

“....और वो छद्म विवाह वाली बात ?” मैंने अपना भय व्यक्त करते हुए कहा ।

“तुम निश्चिंत रहो । मृत्युंजय से हम बात कर लेंगे..., तुम अपने माता-पिता को यहाँ बुला लो ।” उन्होंने मेरी सहमती मिलते ही मामला पक्का किया ।

“नहीं... उसकी कोई आवश्यकता नहीं है । आपने ही अभी-अभी कहा कि यह एक छद्म विवाह है तो फिर मेरे माता-पिता को इस सब के बारे में बताने की जरुरत नहीं* है । मै चाहती हूँ कि यह विवाह कम से कम लोगो तक सिमित रहे ताकि भविष्य में मुझे कोइ समस्या न हो

“हम्म.......ठीक है, जैसा तुम चाहो । यह विवाह सिर्फ इस आश्रम तक ही सीमित रहेगा।” उन्होंने मेरे कमरे से बाहर जाते हुए कहा।

-------------------------------------

मेरी सहमति मिलते ही इस विवाह की तैयारी शुरू कर दी गयी। जैसे ही यह खबर आश्रम में फ़ैली चारों तरफ चर्चाएँ होने लगी क्योंकि गुरु जी के पश्चात संगठन के अध्यक्ष का पद मृत्युंजय को ही संभालना था और मृत्युंजय की पत्नी होने का अर्थ था ‘गुरु माँ’ होना, जो की अध्यक्ष के बाद संगठन में सबसे महत्वपूर्ण पद था।

अगले दिन देवी मेरे कमरे में आई।

“अवन्तिका*यह मै क्या सुन रहीं हूँ ? तू मृत्युंजय से विवाह कर रही है ?” उसने मुझे घुर कर देखते हुए कहा। मेरे इस निर्णय से वो काफी गुस्सा लग रही थी ।

“हाँ बिलकुल सही सुना है तूने, मृत्युंजय से मेरा विवाह तय हो चूका है ।” मैंने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा ।

“लेकिन क्यों? तू तो मृत्युंजय से नफरत करती थी न?”

‘ हाँ, करती थी। मगर अब नहीं करती हूँ। गुरूजी स्वंय ऐसा चाहते है और भला मै गुरूजी की आज्ञा कैसे टाल सकती हूँ ?” मैंने अंतिम पंक्ति एक विशेष स्वर में कही जिससे मै उसे कुछ याद दिलाना चाहती थी । दरअसल देवी संगठन के बारे में कुछ नहीं जानती थी इसलिए मेरे लिए उसे सत्य बताना संभव नहीं था और इसीलिए मै उसे गोल-गोल घुमा रही थी ।

“अवनी, यह तेरी जिंदगी का सवाल है, तू किसी भी जल्दबाजी में फैसला मत ले। तू एक बार फिर से सोच ले। कहीं तू गुरुमाँ बनने के लिए तो.......?” उसने अपनी*अधूरी बात कही।

“तुम्हे ऐसा लगता है कि मै गुरु माँ बनने*के लिए मृत्युंजय से शादी कर रहीं हूँ ?” मैंने उठकर देवी के पास आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। “हो सकता है तू सही सोच रही हो । मृत्युंजय चाहे कितना भी कमीना क्यों ना हो एक बात तो है कि वो गुरूजी का बेटा है और उसके कुछ अपने ही फायदे है।” मैंने हँसते हुए कहा ।

“अवनी!” देवी ने चौकते हुए कहा । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मै* इस तरह की बातें क्यों कर रही हूँ ? कल तक तो मै उसे रणवीर से बात कराने को कह रही थी और आज मै मृत्युंजय से विवाह करने को तैयार थी । मेरे इस बदलाव से वो परेशान थी । वास्तव में यह छद्म विवाह एक बहुत बड़ा झूठ था जिसे मुझे सच बनाकर पेश करना था । किसी के साथ आपका रिश्ता जितना मजबूत होता है तो उससे झूठ बोलना उतना ही मुश्किल होता है और कई बार तो इस झूठ की कीमत उस रिश्ते में दरार के रूप में चुकानी पड़ती है । वही यहाँ भी हो रहा था, देवी मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी और मुझे अच्छे से जानती थी। वो अबतक समझ चुकी थी कि मै उससे कुछ ना कुछ छुपा रही हूँ। और यही बात शायद उसे दुःख पहूँचा रही थी।

“मृत्युंजय तेरे लिए सही लड़का नहीं है, तू उससे शादी करके पछताएगी।“ उसने मुझे चेतावनी देते हुए कहा।

“यही बात अगर मै तुझे मंथन के लिए कहूँ तो क्या तू मानेगी ? नहीं ना... देवी! हमें हमारी जिंदगी के कुछ फैसले खुद लेने पड़ते है और इसमे हमें किसी की भी दखल पसंद नहीं होती है ।” वो कुछ देर मुझे देखती रही ।

“ काश!* की ये फैसला तूने खुद लिया होता।” उसने कहा और गुस्से में बाहर चली गयी । मुझे उसे सच न बताने का दुःख तो था मगर मै जानती थी कि जिंदगी में कई बार हमें सख्त निर्णय लेने पड़ते है ।

देवी के बाद राणा और रणवीर को भी मुझे अलग-अलग तरीके से समझाना पड़ा । राणा को समझाना फिर भी मेरे लिए आसान था क्योंकि वो सच जानता था मगर रणवीर को समझाने में मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी । दरअसल उसे मै पूरा सच बता कर और मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी, इसलिए मैंने उससे सिर्फ इतना ही कहा कि मै जो कुछ भी कर रही हूँ हमारी भलाई के लिए ही कर रहीं हूँ ।

----------------------------------

नियत तिथि पर सादे तरीके से मृत्युंजय और मेरा विवाह संपन्न हुआ । मृत्युंजय खुद इस शादी से खुश नहीं लग रहा था । कई बार किसी चीज को पाने के लिए हम बहुत कोशिश करते है लेकिन फिर भी वो हमें नही मिलती है तो हमें उससे नफरत हो जाती है और फिर अगर कभी वो मिल भी जाए तब भी नफ़रत बरकरार ही रहती है । शायद मृत्युंजय के साथ भी यही हुआ था, उसे मुझसे नफरत थी और बस उसे वही चाहिए था । शादी के बाद भी शायद ही हममे कभी बात हुई, लेकिन एक दिन.......

सूत्र साधना में अब सिर्फ सात ही दिन बाकि थे और हम सब उसकी तैयारी में लगे हुई थे। उस दिन मै अपने कमरे में कुछ काम कर रही थी तभी मृत्युंजय आया, अन्दर आते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया, मै उसे देखकर चौंक गयी।“ तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” मैंने उसे घूरते हुए कहा ।

“अपनी पत्नी से मिलने आया हूँ, क्या मुझे उसके लिए भी गुरूजी से आज्ञा लेनी पड़ेगी?” उसने मुझे तीखी नजर से देखते हुए कहा ।

“तुम्हारा यहाँ कोई* काम नहीं है।” मैंने अपनी भौंहे सिकोड़ते हुए कहा ।

“ पति-पत्नी के बीच बहुत से काम होते है, मगर हमारे बीच तो एक भी नहीं हुआ, चलो मुख्य काम से ही शुरुआत करते है।” वो धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ने लगा, मै* धीरे-धीरे खुद को पीछे हटाने लगी और अंत में दीवार से लगकर खड़ी हो गई। वो मेरे बिलकुल पास आ गया, मै उसकी साँसों की गर्माहट को महसूस कर सकती थी ।

“नफरत जब हद से गुजर जाए तो प्यार में बदल जाती है । मुझे लगता है मुझे तुमसे प्यार हो गया है अवन्तिका।” उसने मेरे बालों की लटो को हटाते हुए कहा ।

“मगर मैं अब तक नफरत की हद में ही हूँ ।” मैंने अपनी आँखे बंद की और अपने हाथ की तर्जनी उंगली को जोर से उसकी दोनों भौंहों के बिच दबा दिया । वो दर्द से अपना सर पकड़कर पीछे हट गया और छटपटाने लगा ।

‘तुम अभी जो महसूस कर रहे हो उसे कुण्डलीनी उर्जा का आधिक्य प्रवाह कहते है, जो की तुम्हारे शरीर में उर्जा के असंतुलन का परिणाम है ।” वो वहीं दर्द के मारे निचे बैठ गया ।

“रवि! मुझे नहीं मालुम कि तुम तंत्र शास्त्र को कितनी गम्भीरता से लेते हो, मगर मेरे लिए यह काफी रोचक विषय है । अब अगर इस उर्जा का प्रवाह मै तुम्हारे सर के बजाय किसी अंग विशेष की तरफ कर दूँ तो तुम मुझे तो क्या किसी भी लड़की से प्यार करने के काबिल नहीं रहोगे।”

मै उसके पास गयी और कान में कहा, “ मै ग्यारहवां सूत्र हूँ बेवकुफ! गुरूजी ने मुझे अपनी रक्षा करना अच्छे से सिखाया है।" मैंने फिर से उसे वहीँ स्पर्श किया, इससे उसका दर्द कम हो गया मगर अबतक वो बेहोश हो चुका था।

-----------------------------------

आखिर वो घडी आ ही गयी जिसका सालो से इन्तजार था, आज वो दिन था जब सूत्र साधना होनी थी । उस बड़े से हॉल में सभी तांत्रिक इकठ्ठा हुए थे आज देश की विभिन्न शाखाओं से बड़े-बड़े तांत्रिको को आमंत्रित किया गया था जिन्हें साधना में मार्गदर्शन करना था। सभी लोग काफी उत्साहित लग रहे थे। आखिर दुनिया का हर तांत्रिक इस पल का साक्षी बनने के लिए आतुर रहता है।

गुरूजी, मै और मृत्युंजय तीनो मंच पर खड़े थे। गुरूजी ने अभिभाषण प्रारंभ किया ।

“मित्रो! वर्षो की प्रतीक्षा के पश्चात् आखिर यह शुभ पल आ ही गया है। आज हम एक नए चमत्कार के साक्षी होंगे । एक ऐसा चमत्कार जो मानव समाज की दशा और दिशा दोनों बदल देगा । अगर हम इस यज्ञ में सफल रहे तो इतिहास में हमारा नाम सदा-सदा के लिए अमर हो जाएगा* और अगर असफल रहे तो शायद कोई हमें पहचाने तक नहीं। मगर हम सफल हो या असफल, हमें यह हमेशा विदित रहेगा कि हम कौन है*और किस लिए है? हम रहे या ना रहे हमेशा यह ध्यान रखना की तुम सब इस महान संगठन का हिस्सा हो।” उन्होंने एक सांस ली और फिर ऊँचे स्वर में कहा।

“तंत्र ही संगठन का आधार है और संगठ का प्रत्येक व्यक्ति एक बात अच्छी तरह से जानता है कि धर्म की रक्षा कैसे करनी है ।”

मैंने मृत्युंजय की तरफ देखा उसके चहरे पर वही हंसी थी जो उस दिन कमरे से बाहर निकलते वक़्त थी ।

ॐ ह्रीं श्रीं भ्रीं भ्रों भ्रें भ्रः ,

ह्न-ह्न ङ्ग-ङ्ग पच-पच गृहाण-गृहाण,

मारय-मारय मर्धय-मर्धय ,

महा-महा भैरव-भैरव रूपैणः,

धूनयं-धूनयं खंपय-खंपय,

विग्नय-विग्नय विश्वेश्वर शोभय-शोभय,

गट-गट मोहय ओम्बट स्वाहाः।।

सबकी आँखे बंद थी, हजारों तांत्रिकों के एक साथ इस मन्त्र के उच्चारण के साथ ही सूत्र साधना प्रारंभ हुई। सबसे आगे मै उन दस लड़कियों के साथ बैठी थी, जिन्हें सूत्र साधना के लिए विशेष तौर पर तैयार किया गया था। वो सब मन्त्रों का उच्चारण एक दम सटीकता से कर रहीं थी, जिससे लगता था कि उन्हें भी मेरी तरह ही काफी जटिल दीक्षा दी गयी थी।

वो सब संगठन की अलग-अलग शाखाओं से आई थी, जिन्हें वहां के शाखा प्रमुखों ने नित्यानंद जी के मार्गदर्शन में चुना था। वो सब मेरी ही हमउम्र थी और काफी गंभीर लग रही थी।

 
हमारे बिच हवन की तीव्र अग्नि प्रज्वलित थी, जिसमे लगातार यज्ञ सामग्री स्वाहा की जा रही थी। उन दस लड़कियों का एक काम सूत्र साधना की समाप्ति तक इस अग्नि को प्रज्वलित रखना भी था क्योंकि कुछ समय पश्चात* मै अपने अंतर्मन से जुड़ने वाली थी और तब मेरा स्वयं से नियंत्रण पूरी तरह से समाप्त होने वाला था।

गुरूजी एक तरफ अन्य वरिष्ठ तांत्रिको के साथ बैठे थे और काफी गम्भीरता से साधना का निरीक्षण कर रहे थे, एक छोटी सी भूल भी इस साधना को असफल बना सकती थी।

कुछ देर बाद मेरी आँखों के सामने सफ़ेद प्रकाश हुआ और मै घास के हरे-भरे मैदान में थी, जहां पास ही एक नदी बह रही थी। दूर सफ़ेद बर्फ के पहाड़ दिख रहे थे, मुझे इन्ही पहाड़ों पर जाना था। लेकिन वहां तक जाना कैसे है यह मेरी समस्या थी। मै थोड़ी और आगे गयी जहाँ एक जंगल था। वहां मुझे एक बग्घी खड़ी मिली, इस बग्घी के आगे दस घोड़े थे। ये घोड़े जरुर उन दसों लड़कियों के अंतर्मन के प्रतिक थे जो मेरी सहायता के लिए सूत्र-साधना में मेरे साथ थी। यह काफी लम्बा रास्ता था क्योंकि मुझे समुद्र तट के चक्कर लगाकर उन पहाड़ तक पहुचना था। इसमें कोइ दो या तीन दिन लगने थे। जाग्रत स्वप्न में समय काफी तेज चलता है इसलिए यहाँ के तीन दिन बाहर की दुनिया के लिए चार-पांच घंटे के बराबर ही थे।

तीन दिन की अनवरत यात्रा के पश्चात मै उस पर्वत के शिखर तक पहुंची। यहाँ चारो तरफ बर्फ ही बर्फ फैली हुई थी किन्तु ठण्ड बिलकुल भी नहीं थी। सुरज अभी-अभी ही निकला था जिसकी रोशनी में यहां की बर्फ दर्पण की भाँती चमक रही थी। कुछ दूर चलने के पश्चात मुझे एक गुफा दिखाई दी जो कि पूर्ण रूप से बर्फ से ढंकी हुई थी। मैंने अपनी बग्घी को एक तरफ खड़ा कर दिया और उस गुफा की तरफ चल दी ।

गुफा में अन्दर घुसते ही एक द्वार था। यह दरवाजा बंद था और प्रथमदृष्टया इसे खोलने का भी कोइ साधन दिख नहीं रहा था लेकिन ध्यान से देखने पर मुझे पास ही एक गोल पत्थर दिखा जिसपर एक त्रिशूल का निशान बना हुआ था। मैंने गौर किया कि यह त्रिशूल ठीक वैसा ही था जैसा की मेरी हथेली पर था। मैंने अपना हाथ उस पत्थर पर रखा और उसे घुमाया।

“ठहरो।” तभी एक अवाज आई। “कौन हो तुम?” उसने गरजते हुए पूछा। यह काफी भारी आवाज थी तथा चारों तरफ से आ रही थी।

“मै......मैं अवन्तिका हूँ।” मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया।

“यहाँ क्यों आई हो?” उस आवाज ने पूछा।

‘मै रूद्र से साक्षात्कार करना चाहती हूँ।” मैंने इधर-उधर देखते हुए कहा ।

“रूद्र किसी से नहीं मिलते।” उसने कहा। “तुम लौट जाओ।”

“मै पात्र हूँ।” मैंने अपने हाथ की हथेली दिखाते हुए कहा। कुछ देर ख़ामोशी रही।

“मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो।” उस आवाज ने कहा। मै सवाल का इन्तजार करने लगी।

“वह क्या है जो इस सृष्टी के निर्माण से पूर्व भी था और इस सृष्टी के अंत के पश्चात् भी होगा एवं सर्वत्र वही विद्यमान है?”

मै कुछ देर सोचने लगी। यह कोई आसान सवाल नहीं था क्योंकि इस प्रश्न का प्रयोजन क्या है यह भी महत्वपूर्ण था।

“कुछ नहीं।” मैंने कुछ सोचकर कहा। “कुछ भी होने से पहले भी यह शुन्यता ही थी एवं सबकुछ होने के पश्चात भी यह शुन्यता ही होगी। सर्वत्र यह शुन्यता ही विद्यमान है। सारे द्रव्य इस शुन्यता के अवशेष मात्र है।”

“सही उत्तर.........कैलाश पर्वत पर तुम्हारा स्वागात है।” उस आवाज़ ने कहा और वह द्वार खुल गया।

मै अन्दर चली गई। यहाँ सामने अत्यंत खुबसूरत हरा भरा पहाड़ था। जिसके एक तरफ से झरना गिर रहा था और पास ही एक पोखर था जिसमे कमल के फुल खिले हुए थे एवं खुबसूरत बत्तख तैर रहे थे। सामने कुछ हिरण चर रहे थे। उन्होंने एक बार नजर उठा कर मुझे देखा फिर वापस चरने लगे। जगह-जगह पर सुन्दर फुल खिले हुए थे जिनकी सुगंध वातावरण में घुली हुई थी। आसमान पूरी तरह से नीला था और हल्की-हल्की सुरज की किरणे चारो ओर फैली हुई थी जो वहां की सुन्दरता को और बढा रही थी। ऐसा रमणीय दृष्य और शांतिपूर्ण माहौल मैंने आज से पहले कभी भी महसूस नहीं किया था।

मै आगे बढ़ने लगी तभी मुझे कुछ भगदड़ सुनाई दी। हिरण वहां से भाग गए थे और बत्तख उड़ चुके थे।

“तुमने छल किया है अवन्तिका!” फिर से वो आवाज गुंजी।

“मैंने क्या किया है?” मैंने घबराते हुए पूछा।

“तुम यहाँ अकेली नहीं आई हो।”

तभी मैंने देखा की उस गुफा के रास्ते, जहाँ से मै आई थी एक तांत्रिक ने प्रवेश किया है, लम्बी दाढ़ी, काला चोगा और बड़ी-बड़ी लाल आँखे। उसके सर पर एक नकाब था जिससे उसका चेहरा पूरी तरह से दिख नहीं रहा था।

“हा......हा........हा......” वो जोर से हँसा। “आखिर मै यहाँ तक पहुँच ही गया।”

“यहाँ से निकल जाओ अवन्तिका! तुम्हारे प्राण संकट में है।”* उस आवाज ने मुझसे कहा।

जमीन हिलने लगी थी, सूरज की रौशनी तेज हो गयी और माहौल में अजीब सी रौद्रता छा गयी। मै तेज़ी से वापस उस गुफा की तरफ भागी। वो तांत्रिक भी मेरे पीछे-पीछे आ रहा था। दौड़ते-दौड़ते मै गुफा से बाहर निकली। मैंने देखा कि उस दरवाजे से वो तांत्रिक भी बाहर निकला है। उसके बाहर निकलते ही वो दरवाजा बन्द हो गया।

बाहर काफी ठंडी हवा का तूफ़ान चल रहा था। और धरती भी काँप रही थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और*बिजलियाँ चमक रही थी। सामने ही मेरी बग्घी खड़ी थी, मै उसकी तरफ भागी तभी जोर से धरती हिलने लगी, मै जहां थी वहीं रुक गयी, ऊपर पहाड़ से बर्फ का ढेर आया और बग्घी को बहा ले गया।

“नहीं...... ।” मै जोर से चिल्लाई।

"मुझे भी अपने साथ ले चलो।” वो तांत्रिक मेरे करीब आने लगा।

“दूर रहो मुझसे...........” मैंने चिल्लाते हुए कहा।

मगर वो मेरे करीब आते ही जा रहा था। मैंने आसमान में देखा और अपनी आँखे बन्द की, एक बिजली आकर हम दोनों के बीच गिरी और फिर अँधेरा छा गया।

-------------------------

मुझे जब होश आया तो मैं अपने कमरे में लेटी हुई थी। मेरा सिर काफी जोर से दर्द कर रहा था और बदन पूरा टूट रहा था। मेरे समीप ही देवप्रभा खड़ी थी, ऐसा लग रहा था की वो अभी कहीं से दौड़कर आई है।

“आराम से ........” उसने मुझे सहारा देते हुए कहा।

“क्या हुआ था?” मैंने अपना सिर पकड़कर उठते हुए कहा।

“तुम बाथरूम में गिर गयी थी।” देवप्रभा ने कहा। मैंने उसकी और आश्चर्य से देखा।

“तुम मृत्युंजय के साथ घुमने गयी थी न! वहां बाथरूम में तुम्हारा पैर फिसला और तुम गिर गयी। तुम्हारे सिर में चोट आई थी। तुम एक सप्ताह से बेहोश हो। मैंने अपने सिर पर हाथ लगाया तो वहाँ कोइ लेप लगा हुआ था।

मै सारा मामला समझ गयी। दरअसल गुरूजी ने सूत्र साधना को छुपाने के लिए यह झूठ बोला था कि हम दोनों हनीमून पर गए है और मेरी बेहोशी को दुर्घटना का नाम दे दिया था।

“अब तुम्हे कैसा लग रहा है?” देवी ने पुछा।

“गुरूजी कहाँ है ?” मैंने चिंतित होते हुए कहा।

“तुम्हे जैसे ही होश आने लगा था, मैंने गुरूजी को बुलवा लिया था, वे अभी आते ही होंगे।”*

तभी सामने से गुरूजी आते दिखे। उनके साथ मृत्युंजय, राणा और रणवीर भी थे। उन्होंने आते ही देवी को बाहर जाने का इशारा किया। उसके जाते ही राणा ने दरवाजा बंद कर दिया।

“तुम्हारी तबियत कैसी है?”* गुरूजी ने पूछा।

“सूत्र साधना का क्या हुआ?” मैंने लगभग उठते हुए कहा।

“हम असफल रहें।” गुरूजी ने अपनी नजरें झुका ली। उनके चेहरे पर एक दर्द था।

“मगर कैसे?” मैंने व्याकुल होते हुए पुछा।

“यह तो सिर्फ तुम बता सकती हो।” मृत्युंजय ने कहा। वो मुझे ऐसे घुर रहा था जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।

“मुझे नहीं पता....... सबकुछ ठीक चल रहा था कि पता नहीं अचानक वो तांत्रिक वहां कहाँ से आ गया।” मैंने परेशान होते हुए कहा।

“तांत्रिक! मगर सूत्र साधना में तो सिर्फ ग्यारह सूत्र थे तो फिर कोई और वहां कैसे आ सकता है?” राणा ने पूछा।

“मुझे नहीं मालुम। वो किसी छल की बात कर रहा था। जरुर कोई धोखे से साधना में आ गया था।” मै खुद से बाते कर रही थी। “कोइ बात नहीं हम फिर से प्रयास करेंगे।” मैंने गुरूजी की तरफ देखते हुए कहा। गुरूजी और बाकी सबके चहरे उतरे हुए थे।

“हम नहीं कर सकते है।” राणा ने कहा। हमारी असफलता की हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, वो दसों सूत्र....... वो अब इस दुनिया में नहीं है, सिर्फ तुम बची हो।” अंतिम वाक्य राणा ने बिलकुल डूबते हुए कहा। गुरूजी की आंखों में पानी साफ़ देखा जा सकता था। रणवीर इन सब से ज्यादा मेरे लिए परेशान था। मेरी आंखों से भी आंसू छलक गए। सिर्फ मृत्युंजय था जो अभी तक तटस्थ था।

-----------------------------

सूत्र साधना की असफलता हम सबके लिए गहरा सदमा था। ये एक तरह से हमारे लिए जीवन के उद्देश्य की समाप्ति थी। मुझे किसी तरह रणवीर, देवी और राणा ने संभाला। धीरे-धीरे परिस्थितियाँ सामान्य होने लगी थी। गुरूजी इस घटना से बुरी तरह से टूट चुके थे। वो उन दस लड़कियों के मौत का जिम्म्मेदार खुद को मानते थे। वो तनाव में रहने लगे और उनकी जगह मृत्युंजय संगठन संभालने लगा। वो क्या करता था मुझे पता नहीं था मगर इतना पता था कि वो कुछ ना कुछ गलत तो कर रहा था। वैसे मुझे शक नहीं पूरा यकीन था की मेरे अंतर्मन में आने वाला वो तांत्रिक और कोइ नहीं मृत्युंजय ही था। अवश्य उसने मेरे अंतर्मन में घुसपैठ करने के लिए कोई छल किया था

....और एक दिन हमें ऐसी सूचना मिली जिसने सबकुछ ख़त्म कर दिया। गुरूजी ने आत्महत्या कर ली थी। वो शायद पश्चाताप में इतना डूब चुके थे कि उन्हें मृत्यु का वरण ही आखिरी रास्ता प्रतीत हुआ था। उनकी मौत के पश्चात मैंने स्वयं को संगठन से पूरी तरह से अलग कर लिया लेकिन मै आश्रम में ही रह रही थी। मृत्युंजय को इससे कोई तकलीफ नहीं थी बल्कि वो खुश था कि उसके दोनों लक्ष्य आसानी से पुरे हो गए थे। पहला, संगठन के अध्यक्ष पद की प्राप्ति और दूसरा मेरी बर्बादी। मैंने रणवीर से शादी कर ली और उसके साथ ही रहने लगी। कुछ साल बाद तुम पैदा हुई। हम दोनों बहुत खुश थे। सबकुछ ठीक होने ही लगा था की फिर से एक ऐसी घटना हुई जिससे मै पूरी तरह से टूट गयी। जब तुम चार साल की थी, एक सड़क हादसे में तुम्हारे पिता चल बसे। उसके बाद मुझे उस आश्रम में घुटन होने लगी। मैंने वो आश्रम छोड़ दिया और यहाँ आ गयी। राणा ने भी मेरे साथ ही संगठन छोड़ दिया क्योंकि मृत्युंजय जिन तरीकों से संगठन चला रहा था, वो उसे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था। खुद मृत्युंजय को भी राणा का बार-बार टांग अडाना पसंद नहीं था इसलिए उसने बिना किसी समस्या के हमे जाने दिया। मै यहाँ आ गयी और एक आम जिंदगी बसर करने लगी। मेरा पूरा ध्यान तुम्हारे पालन-पोषण पर ही था।

“अब तुम ही बताओ ताश्री! क्या तुम अब भी चाहती हो कि मै तुम्हे उस नरक में जाने दूँ? क्या मै ऋषि, मृत्युंजय या उस संगठन पर विश्वास कर सकती हूँ? क्या मै खुद अपनी बच्ची को उसी मौत के मुंह में धकेल सकती हूँ जिससे मै खुद निकल कर आई हूँ?"

“गुरुमाँ! आपने सारी बाते सही कहीं है सिवाय एक बात छोड़कर!” अन्तस ने शांत बने रहते हुए कहा। हम सब उसका चेहरा देखने लगे।

“आपके पति रणवीर की सड़क दुर्घटना में मौत नहीं हुई । उनकी हत्या हुई थी!”

“क्या? मै उछल कर खड़ी हो गयी। “ह्त्या, मगर किसने की?”

“मृत्युंजय ने....... क्योंकि रणवीर अंकल यह सच जान चुके थे कि गुरूजी ने आत्महत्या नहीं की थी।”

“आत्महत्या नहीं की थी मतलब?” यह मेरे लिए दूसरा झटका था।

“मृत्युंजय ने जब संगठन की बागडोर अपने हाथों में ली तो उसने संगठन का आधार ही बदल दिया। उसने संगठन का मूल तंत्र के बजाय छल कर दिया। वो हमें बताता था की किस तरह वो छल के सहारे ही मृत्युंजय बना था, बल्कि तंत्र के सहारे आप और गुरूजी असफल रहे थे।

जब गुरूजी ने मृत्युंजय को दण्ड के लिए कमरे में बन्द कर दिया था तब उनका मित्र मोहन रोज पाइप के सहारे चढकर उस तीन मंजिला कमरे में खाना पहुंचाता था। मगर एक दिन मोहन ऊपर से गिर गया और सर में चोट की वजह से उसकी मौत हो गयी। इस घटना के बाद मृत्युंजय को एक बात समझ में आ गयी थी कि इस संसार में अगर जीवीत रहना है तो छल के सहारे ही रहा जा सकता है।

सूत्र साधाना की असफलता के बाद जब आप और गुरूजी तनाव में थे, मृत्युंजय ने संगठन का इस्तेमाल अपने इरादों को पूरा करने के लिए शुरू कर दिया। संगठन का देशव्यापी जाल था और उसके समर्पित सदस्य अध्यक्ष के एक इशारे पर कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे। मृत्युंजय ने संगठन की इसी विशेषता को अपने काले कारनामो को पूरा करने के लिए प्रयोग किया।

.........मगर एक दिन गुरूजी को पता चल गया की मृत्युंजय संगठन की ताकत का दुरूपयोग कर रहा है। यह बात गुरूजी को बिलकुल भी बर्दास्त नहीं हुई और उन्होंने मृत्युंजय को तुरंत बुलाकर इसके लिए फटकारा। मगर अपनी आदत के अनुरूप मृत्युंजय अपनी गलती स्वीकारने के लिए तैयार ही नहीं था। उल्टा वो गुरूजी पर ही बरस पड़ा की उन्होंने इतने सालों में हासिल ही क्या किया है? गुरूजी समझ गए की मृत्त्युन्जय को संगठन का अध्यक्ष बनाना बहुत बड़ी भूल होगी अत: उन्होंने निर्णय लिया की आप ही संगठन की अगली अध्यक्ष होंगी।

मृत्युंजय, गुरूजी के इस निर्णय से बुरी तरह बौखला गया। उसने गुरूजी को मनाने की बहुत कोशिश की मगर गुरूजी कुछ सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। गुस्से में आकर मृत्युंजय ने गला दबाकर गुरूजी की ह्त्या कर दी।

अगले दिन उनकी लाश कमरे में लटकी मिली, सबने यही समझा कि सूत्र साधाना की असफलता के दबाव में आकर गुरूजी ने आत्महत्या कर ली है। मृत्युंजय के लिए रास्ता बिलकुल साफ़ हो गया क्योंकि अब न तो उसे टोकने वाले गुरूजी थे और न आप ही थी।

मगर एक दिन........... मृत्युंजय का किसी बात पर रणवीर अंकल से झगडा हो गया। गुस्से में मृत्युंजय के मुह से यह निकल गया की उसी ने गुरूजी को मारा है। उसके बाद रणवीर अंकल अपने कमरे आ गए। आप कहीं बाहर गयी थी और ताश्री और मै कमरे में ही खेल रहे थे। रणवीर अंकल बिस्तर पर बैठ गए, वो च्न्तित लग रहे थे।

कुछ देर बाद ताश्री रोंने लगी। रणवीर अंकल ने कहा की इसे भूख लग रही होगी, निचे जाकर बिस्किट ले आओ। मै जब निचे से वापस लौटा तो ताश्री रो रही थी,रणवीर अंकल फर्श पर मृत पड़े थे और पास ही मृत्युंजय खड़ा था। उसने मुझे धमकी दी अगर मैंने किसी से कुछ भी कहा तो वो मुझे और ताश्री को जान से मार देगा। मै डर गया और मैंने किसी से कुछ भी नहीं कहा। उसके बाद आपने संगठन छोड़ दिया और मुझे आपसे कुछ कहने का मौक़ा नहीं मिला।”

मेरी आँखे आंसुओं से भर चुकी थी। ताश्री भी बेसुध थी। शायद उसने कभी सोचा भी नहीं था कि सच इतना कडवा होगा।

“मगर हम कैसे विश्वास कर ले की तुम सच कह रहे हो?” राणा ने ऋषि की आँखों में देखते हुए कहा।

“आपको करना ही होगा, आपने इतने साल मेरी माँ पर विश्वास किया है, एक बार आपको मुझ पर भी विश्वास करना होगा।”

“माँ पर? ताश्री ने चौंककर कहा।

“ऋषि देवप्रभा का बेटा है।” राणा ने कहा। “मगर छल तो संगठन का आधार है।”

“छल संगठन का नहीं मृत्युंजय का आधार है। हालांकि संगठन के अधिकतर लोग मृत्युंजय की बात अक्षरश: मानते है मगर फिर भी कुछ लोग ऐसे है जो उसकी नीतियों का पालन नहीं करते है। मै उनमे से ही एक हूँ। मै मृत्युंजय के साथ जरुर रहा हूँ मगर कभी उसके प्रभाव में नहीं रहा।”

“लेकिन तुम्हे ताश्री क्यों चाहिए” राणा ने अगला सवाल किया।

“आप अच्छी तरह से जानते है की कोई भी बाहरी व्यक्ति संगठन तक नहीं पहुँच सकता है। मृत्युंजय को अगर रोकना है तो यह भीतर से ही हो सकता है। हम में से कोइ भी इतना शक्तिशाली नहीं है कि मृत्युंजय को रोक सके। सिर्फ ताश्री ही उसे रोक सकती है और वो तो खुद ताश्री को अपने पास बुला रहा है।”

“चाहे कुछ भी हो जाए मै अपनी बेटी को वहां मरने के लिए नहीं भेजूंगी।” मैंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा।

“मै जाउंगी माँ!” यह ताश्री थी। “ये आप ही ने कहा था ना की मेरी शक्तियां वरदान है, तो इस वरदान के प्रयोग का यही सही वक़्त है।”

“तुम ऐसा इसलिए कह रही हो क्योंकि तुम मृत्युंजय और संगठन को नहीं जानती हो, अगर तुम्हे जरा सा भी अंदाजा होता कि यह क्या है तो वहां कभी नहीं जाती।” राणा ने ताश्री को समझाते हुए कहा।

“हो सकता है, मगर यह मै अच्छे से जानती हु की मै कौन हूँ, और अब चाहे मृत्युंजय हो या कोइ और मुझे कोइ फर्क नहीं पड़ता। वहाँ दस लड़कियों की जान खतरे में है, मेरे पिता का हत्यारा खुलेआम घूम रहा है और मै यहाँ चुपचाप बैठ जाऊ यह मेरे लिए संभव नहीं है।”
 
हमने ताश्री को रोकने की बहुत कोशिस की मगर वो कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। अंत में हमें उसे अन्तस के साथ जाने देना पड़ा और शायद यही मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। उस दिन के बाद न तो अंतस और न ही ताश्री का कुछ पता चला, और फिर हफ्ते भर बाद ही यहाँ के जंगल में ताश्री की लाश मिली। मैंने और मेरी बेटी, दोनों ने अन्तस पर विश्वास करके बहुत बड़ी गलती कर दी। अगर उस दिन मैंने ताश्री को ना जाने दिया होता तो ताश्री आज ज़िंदा होती।

कहते-कहते अवन्तिका की आँखों से आंसू बहने लगे। अंजनी की भी आँखे भर आई थी।

“उसके बाद आपने अन्तस के बारे में पता लगाने की या फिर मृत्युंजय से बात करने की कोशिस नहीं की।” नन्दीनी ने कहा।

‘उसका कोइ फायदा नहीं, मृत्युंजय कभी मुझे सच नहीं बताएगा।”

“मै पूरी कोशिस करुँगी की ताश्री के हत्यारे को जल्द से जल्द सालाखों के पीछे लाऊं। फिर चाहे उसके लिए मुझे मृत्युंजय की खाल ही क्यों ना उधेरनी पड़े।

वहां से नन्दीनी सीधे थाने पहुंची। “क्या हुआ दिनेश के बारे में कुछ पता चला?” नन्दीनी ने विजय से पूछा।

“नहीं, हम पहुंचे तबतक वह भाग चुका था।...........और तुम्हे?

“बहुत कुछ, एक आम लड़की के मौत के पीछे भी बहुत बड़ी कहानी छुपी हुई है।”

“मतलब?”

“मतलब यह कि ताश्री के मौत के पीछे मृत्युंजय महाराज का हाथ है और उस अन्तस का भी या फिर ताश्री और अन्तस दोनोकी ह्त्या हुई थी और हमें सिर्फ एक की लाश मिली।”

“तो फिर से एक डेड एण्ड?”

“नहीं........मृत्युंजय जानता है कि ताश्री के साथ क्या हुआ था और अब मै उससे सच उगलवा कर रहूंगी।”

“तुमने सिर्फ संगठन के बारे में जानें की कोशिस की थी और उन्होंने तुम्हारा अपहरण कर लिया था,और अब तुम मृत्युंजय पर हाथ डालना चाहती हो?” विजय ने कहा।

“वहां एक मासूम का हत्यारा खुलेआम घूम रहा है और मै यहाँ चुपचाप बैठ जाऊं। यह मेरे लिए संभव नहीं है। नन्दीनी ने कहा।

नन्दीनी उसके बाद घर आ गयी। मगर अब भी उसके दीमाग में ताश्री ही घूम रही थी। अवन्तिका की कही गयी एक-एक बात किसी रील की तरह उसके दीमाग में चल रही थी। वह हर एक बात पर गौर कर रही थी और समझने की कोशिस कर राही थी। उसे अब भी एक बात समझ नहीं आ रही थी की आखिर मृत्युंजय जेल कैसे पंहुचा? और वो लडकियां जो मिली थी वो जरुर बाकी की दस सूत्र थीं। इसका मतलब ताश्री ने संगठन में कुछ ना कुछ तो जरुर किया था जिसकी वजह से मृत्युंजय अपने मकसद में नाकामयाब हुआ था। मगर फिर ताश्री की मौत? नंदीनी का दीमाग घूम रहा था और कुछ समझ नहीं आ रहा था।

नन्दीनी यह सब सोच ही रही थी और खाना खा रही तभी उसकी नजर सामने लगी एक तस्वीर पर पड़ी। यह उस दिन की तस्वीर थी जब नन्दीनी अनाथ आश्रम में संस्थापक की मूर्ति का अनावरण करने गयी थी। इसे देखकर नन्दीनी खड़ी हो गयी।

“छल ही संगठन का आधार है लेकिन आप भी तो गुरु माँ है, आप इसमे कैसे पीछे रह सकती है?” नन्दीनी ने मन ही मन कहा।

नन्दीनी ने ताश्री के घर ताश्री की जो तस्वीर देखि थी उसमे ताश्री के पीछे वही मूर्ति थी, जिसका अनावरण नन्दीनी ने किया था।

नन्दीनी ने अपना फोन निकाला और विजय को फोन किया।

“विजय! मुझे पता चल गया है की ताश्री और अन्तस कहाँ है?”

“कहाँ है मतलब?”

“ताश्री कभी मरी ही नहीं थी, ताश्री की माँ ने हमसे झूठ बोला था।”

“तो कहाँ है वो?”

“उसी अनाथ आश्रम में जहाँ मैंने अपनी सारी जिंदगी गुजारी है। अजीब बात है वो मेरे इतने करीब थी और मै उसे कहाँ-कहाँ तलाश रही थी?” मै अभी इसी वक़्त वहां जा रही हूँ।”

“अभी! इस वक़्त?”

“हाँ अभी। मै अब और इन्तजार नहीं कर सकती।”

“ठीक है मै भी थाने जाकर आता हूँ।”

विजय ने फोन रखा और उसने एक राहत की साँस ली। वो उठा और अपने टेबल का ड्रावर खोला। उस ड्रावर में एक फोटो के ऊपर एक पिस्तौल और दो गोलियां पड़ी हुई थी। विजय ने वो फोटो अपने हाथ में ले लिया।

“आखिर तुम्हारे कातिलो को सजा देने का वक़्त आ ही गया दिव्या!” विजय ने पिस्तौल में दो गोलियां डालते हुए कहा।

नन्दीनी अनाथ आश्रम के लिए निकली। उसके मन में तरह-तरह के सवाल आ रहे थे कि ताश्री की माँ ने आखिर उससे झूठ क्यों बोला? अगर सचमुच ताश्री जिन्दा है तो वो लाश किसकी थी और आखिर ताश्री की माँ ने उसे ताश्री की लाश क्यों माना? मृत्युंजय ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा। आखिर ताश्री के साथ उस दिन हुआ क्या था और वो इस तरह से छुप कर क्यों रह रही है?

नन्दीनी अनाथ आश्रम के सामने पहुंची। उसने एक बार अनाथ आश्रम की ओर गौर से देखा। वो यहीं तो पली-बढ़ी थी और यह उसका घर ही तो था। जिसे वो इतने वक़्त से ढून्ढ रही थी वो यही रह रही थी और उसे भनक तक नहीं लगी। यह तो बिलकुल वैसे ही है जैसे दीपक सारे कमरे में उजाला करता है लेकिन खुद उसके निचे ही अँधेरा रहता है।

नन्दीनी अन्दर गयी। उसने सोचा था की वो यहाँ के वार्डन को ताश्री की फोटो दिखाएगी और ताश्री के बारे में पूछ लेगी लेकिन अन्दर प्रवेश करते ही उसे सामने से एक लड़का आते दिखा। नन्दीनी को ऐसा लगा की उसने उस लडके को कहीं न कहीं देखा है। वो लड़का भी नन्दीनी को देखकर चौकन्ना हो गया और नज़रे चुराकर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

नन्दीनी अपने दीमाग पर जोर डालने लगी कि आखिर उसने उस लडके को कहाँ देखा था? तभी उसे याद आया कि यह तो वही लड़का है जो उसके सपने में ताश्री के साथ था...मतलब की यह अन्तस है!

“हे...रुको!” नन्दीनी ने आवाज दी तो वो भागने लगा। “रुक जाओ, वरना गोली मार दूंगी।” नंदीनी ने अपनी पिस्तौल उस पर तान दी। वो जहाँ था वही रुक गया।

“अन्तस उर्फ़ ऋषि तुम ही हो न?” नन्दीनी ने उसके करीब जाते हुए कहा।

“जिन सवालों के जवाब मालुम हो वो सवाल नहीं पुछने चाहिए।” अन्तस के चहरे पर मुस्कान थी।

“ताश्री कहाँ है?” नन्दीनी ने और भी गंभीर होते हुए कहा।

“वो जहाँ भी है सुरक्षित है, बेहतर है आप उससे दूर ही रहे।” अन्तस अब भी शान्त बना हुआ था।

“मै एक पुलिस अफसर हूँ, और तुम्हे पुलिस को गुमराह करने के जुर्म में गिरफ्तार करने वाली हूँ। इसलिए सीधे-सीधे बता दो की ताश्री कहाँ है?”

“मै जानता हूँ आप पुलिस अफसर है एसीपी नंदीनी, हम पहले भी मिल चुके है। आपको जो याद है वो कोई सपना नहीं है बल्कि आपकी मिटाई गयी यादों के अवशेष है।”

“हो सकता है। लेकिन अबकी बार इससे पहले की तुम ऐसा कुछ भी करोगे, मेरी पिस्तौल की गोली तुम्हारी सारी यादें मिटा चुकी होगी। इसलिए बिना किसी होशियारी के मुझे ताश्री के पास ले चलो।”

“जैसी आपकी इच्छा।” अन्तस ने कुछ देर सोच कर कहा। “लेकिन पहले आप अपनी बन्दुक अन्दर रख ले, यहाँ के बच्चे आपको या मुझे इस हालत में देखकर खुश नहीं होंगे।” अन्तस ने नन्दीनी की आँखों में देखकर कहा।

नन्दीनी ने कुछ देर सोचकर पिस्तौल वापस रख दी और अन्तस के पीछे –पीछे चल दी। अनाथ आश्रम के अंत में एक छोटा स मकान बना हुआ था।

“तुम यहाँ रहते हो?” नन्दीनी ने पूछा।

“हम अतीत के बारे में इतने चिंतित रहते है की भविष्य के बारे में सोच ही नहीं पाते है।” नन्दीनी अन्तस को घूरने लगी जैसे उसकी पहेली का अर्थ पुछ रही हो।

‘आप जब यहाँ आई थी तब आपने अपनी सहेलियों से पुरानी वार्डन के बारे में तो पुछ लिया मगर यह नहीं पूछा कि उनकी जगह नई वार्डन कौन है?”

नन्दीनी प्रतिप्रश्न पुछती उससे पहले ही उसे जवाब मिल गया। उस मकान के दरवाजे पर वार्डन की प्लेट लगी थी जिसमे नीचे ताश्री का नाम लिखा हुआ था। अन्तस के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी, मगर नन्दीनी खामोश थी, वो किसी भी बहकावे में नहीं आना चाहती थी।

अन्तस ने दरवाजा खोला और अन्दर जाते ही आवाज दी, “ताश्री! कोई तुमसे मिलने आया है!”

अन्दर किचन से सफ़ेद सलवार कुरते में, आटे से सने हाथों में बेलन लिए एक लड़की बाहर आई। यह ताश्री थी। माथे पर पसीने की कुछ बुँदे छलक रहीं थी मगर चेहरे पर वो शान्ति थी जैसे कोई नदी मिलो यात्रा करने के पश्चात समुद्र में मिल गयी हो।

“ओह! नन्दीनी!” ताश्री ने अपनी पलकें उछालते हुए कहा। "आखिर तुम यहाँ पहुँच ही गयी।” उसने अपनी कलाई की उलटी तरफ से अपने माथे का पसीना पोछा।

“तुम जिन्दा हो!” नन्दीनी ने ताश्री को अपलक निहारते हुए कहा। उसे लग रहा था जैसे उसकी वर्षों की तलाश पूरी हो गयी है।

“एक सेकंड! मेरी सब्जी जल जाएगी।” ताश्री तेजी से वापस किचन में गयी और गैस बन्द करके हाथ धोकर वापस आई। तब तक नन्दीनी वैसे ही बुत बने खड़ी थी। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस ताश्री के लिए उसने दिन-रात एक कर रखा था वो यहाँ इतनी सादगी से अपनी जिन्दगी जी रही थी।

“बैठिये न!” ताश्री ने नन्दीनी को बैठने का इशारा करते हुए कहा।” आप क्या लेंगी? चाय, कॉफ़ी या और कुछ...”

“तुम्हे लगता है मै यहाँ चाय, कॉफ़ी पीने आई हूँ?” नन्दीनी ने गंभीर होते हुए कहा।

“समझ गयी कुछ नहीं लेंगी...बैठिये।” ताश्री खुद पास पड़े एक सोफे पर बैठ गयी । नन्दीनी भी बैठ गयी।

“तुम्हारी माँ ने मुझसे झूठ क्यों बोला?”

“कोइ भी माँ-बाप वही करते है जो उनके बच्चों की भलाई के लिए होता है, मेरी माँ भी वही कर रही थी।”

“तुम यहाँ इस तरह छुप कर क्यों रह रही हो?”

“मेरी माँ ने आपको संगठन के बारे में बताया था। शायद आप खुद भी जानती है कि संगठन क्या कर सकता है और मैंने जो किया था उसके बाद तो मै संगठन की सबसे बड़ी दुश्मन बन गयी हूँ।”

“क्या किया था तुमने?” नन्दीनी ने आगे झुकते हुए पूछा।

“मैंने संगठन की नींव हिला दी थी।” ताश्री ने पास ही पड़े गिलास से पानी पिते हुए कहा।

-----------------------

उस दिन मै अन्तस के साथ आ गयी। हमें अगले दिन हरिद्वार के लिए निकलना था, इसलिए आज हम संगठन की स्थानीय शाखा में रुके हुए थे। मैंने अपने साथ कुछ ख़ास सामान नहीं लिया था क्योंकि अन्तस ने कहा था कि इसकी कोई जरुरत नहीं है, और वैसे भी मेरे दीमाग में इतना सबकुछ चल रहा था कि मुझे इन सब पर ध्यान देने का वक़्त ही नहीं मिला।

यहाँ की शाखा में ऐसा लग रहा था कि हर एक व्यक्ति अन्तस को जानता था और सब उसका सम्मान भी कर रहे थे। शायद मृत्युंजय के इतना करीब होने की वजह से ऐसा था। मेरा भी सब सम्मान कर रहे थे क्योंकि वे सब जानते थे कि मै यहाँ के पूर्व शाखा प्रमुख की नातिन हूँ। हमें यहाँ रहने के लिए एक कमरा दिया गया। अन्तस ने मुझे बताया की उसे मुझे कुछ सीखाना है इसलिए वो मेरे साथ ही रहेगा। मुझे कुछ अजीब लगा मगर मेरे पास उस पर विश्वास करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मै अब तक खामोश थी और मैंने किसी से कुछ नहीं कहा था। हम कमरे में आ गए।

“तुम नहा कर चेंज कर लो, मै अभी आता हूँ।” उसने पलंग की तरफ इशारा करके कहा, जहाँ पीले रंग के कपडे पड़े हुए थे। मैंने एक बार उधर देख कर नज़रे फेर ली।

“तुमने कहा था की तुम जबतक कमरे में पहुंचे मेरे पिता मर चुके थे!” मैंने अन्तस को घूरते हुए कहा।

अन्तस जाते-जाते रुक गया। “नहीं! वो जिन्दा थे। उन्होंने ही मुझे बताया की मृत्युंजय ने उन्हे क्यों मारा था और...”

वो कहते-कहते रुक गया और जाने के लिए मुडा।

“और?” मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे रोकते हुए पूछा।

“.....और उन्होंने कहा था कि मेरी बच्ची का ख्याल रखना।” कहते-कहते अन्तस की आँखे छलक आई थी। मैंने आज पहली बार अन्तस की आँखों में आंसू देखे थे।

“और तुम तबसे मेरा ख्याल रख रहे हो। तुमने सही कहा था, तुम बचपन से मेरे पीछे पड़े हो। मगर किसलिए? सिर्फ अपने वादे को पूरा करने के लिए?” इतना रोने की वजह से मेरी आवाज दब चुकी थी और मै बिलकुल धीरे बोल रही थी।

“मै सिर्फ तुम्हारी एक जिम्मेदारी हूँ, एक ख़ास व्यक्ति... ग्यारहवां सूत्र!” मै उसके करीब आते जा रही थी, उसने अपनी नज़रे नीचे झुका रखी थी।

“कुछ हीरे इतने महंगे होते है कि उन्हें सिर्फ सजा कर रखा जाता है, पहना तक नहीं जाता। क्या मै इतनी ख़ास हूँ की कोई मुझसे प्यार तक नहीं कर सकता?" मै अन्तस के बिल्कुल करीब आ चुकी थी। वो

“तुम जानते हो मैंने आजतक तुम्हारी आँखों में क्यों नहीं देखा?” उसने अपनी नज़रे उठाकर मेरी तरफ देखा। मेरा चेहरा अबतक लाल पड़ चूका था। मैंने अपनी आँखे बंद कर ली और अपना चश्मा उतार लिया। हम दोनो की साँसे आपस में टकराने लगी थी। उसने मेरे हाथ से चश्मा लिया और मुझे वापस पहना दिया।

“साधना में साधक को कई बार ऐसी अनुभूतियाँ होती है जो उसे क्षणिक आनन्द का अनुभव कराती है, साधक को यह भ्रम होता है की यही उसका लक्ष्य है और वो अपने मूल लक्ष्य से भटक जाता है, तुम मेरा लक्ष्य नहीं हो ताश्री!” उसने कहा और बाहर निकल गया। मै स्तब्ध सी उसे देखती रही। मै आजतक यह मान रही थी कि मै अन्तस से प्यार करती हूँ और वो भी मुझसे प्यार करता है। मगर उसके इस बर्ताव ने मुझे पूरी तरह से चौंका दिया था।

मैंने नहा कर कपडे बदल लिए। मुझे इन कपड़ों में अजीब लग रहा था। कुछ देर बाद अन्तस भी आ गया। उसने भी ठीक वैसे ही कपडे पहन रखे थे। उसने आलमारी से कुछ सामान निकाला जिसमे श्री चक्र, सिन्दूर और कुछ ऐसी ही चीजे थी। उसने फर्श पर दो आसन बिछाये, बीच में श्री चक्र और वो सब सामान जमाया और मुझे बैठने का इशारा किया।

“अपनी आँखे बन्द कर लो।” उसने सिन्दूर से श्री चक्र पर कुछ निशान बनाते हुए कहा। मैंने अपनी आँखे बन्द कर ली। उसने भी अपनी आँखे बन्द कर ली और एक मन्त्र बुदबुदाने लगा।

“।।ॐ मणिपद्मे हूं।।

तटीत्वं त्वं शक्त्या,

तिविर परिपन्धीश पुरणया,

स्पुर्णनानार्तनाभरण,

परिणत इन्द्रधनुष,

तवश्यामम् मेघं कमपि मणिपुरेक्षरण,

निशेवे मरषन्धं हरमिर्तप्तं,

त्रिपुवन।”

मुझे हंसी आ गई।

“क्या हुआ?” उसने अपनी आँखे खोल कर कहा।

“इतना सब नाटक किसलिए? मै तो यह वैसे भी कर सकती हूँ। मुझे ध्यान करने के लिए इन बकवास मन्त्रों और टोटकों की जरुरत नहीं है।”

एक अच्छा कैमरा हो तो कोई भी अच्छी तस्वीर ले सकता है, मगर फिर भी वो किसी प्रशिक्षित फोटोग्राफर की टक्कर नहीं कर सकता है। बेशक तुम्हारी कुण्डलिनीं उर्जा जाग्रत है मगर वह अव्यवस्थित है, अगर तुम्हे मृत्युंजय से लड़ना है तो तुम्हे सबकुछ सिखना होगा।”

“मगर मुझे यह सब करने की जरुरत ही क्यों है? अगर ग्यारहवां सूत्र न हो तो सूत्र साधना वैसे भी असफल हो जाएगी।”

"सूत्र साधना असफल होने पर भी अपना काम कर देती है।” अन्तस ने मुझे देखते हुए कहा। “तुम खुद को ही देख लो। तुम्हारी माँ सूत्र साधना में असफल रही थी फिर भी उन्हें वरदान के रूप में तुम मिली, ग्यारहवां सूत्र हो या ना हो मृत्युंजय यह साधना जरुर करेगा और अगर वो गलती से भी इसमें सफल हो गया तो तुम सोच भी नहीं सकती की वो क्या कर सकता है।”

“तुमने कहा की मेरे पिता ने तुम्हे मेरा ख्याल रखने के लिए कहा था तो तुम मुझे ही मृत्युंजय के खिलाफ क्यों लड़ाना चाहते हो?”

उसके चहरे पर एक मुस्कान आ गयी। ‘तुम जानती हो तुम्हारे पिता ने तुम्हारा नाम ‘ताश्री’ क्यों रखा?” मै उसे ताकने लगी क्योंकि मै खुद इस सवाल का जवाब जानना चाहती थी।

“क्योंकि जिस तरह से शिव की शक्ति उनका त्रिशूल है तुम भी उनकी शक्ति हो। तुम्हरे पिता की मौत का जिम्मेदार मृत्युंजय है और उससे तुम्हारे लावा और कोइ नहीं लड़ सकता।”

मै सोचने लगी। मुझे आज तक लगता था कि आखिर मेरे पिता ने मेरा नाम इतना बेतुका क्यों रखा है?

‘शिव का त्रिशुल...ताश्री’ क्या बात है!

“अब अगर तुम चाहो तो हम आगे बढे।”

“हम्म!” मैंने अपनी आँखे बन्द कर ली।

"हमारे शरीर में उर्जा का प्रवाह एक कुण्डलिनी के रूप में होता है। यह उर्जा हमारे शरीर के नाड़ियों से प्रवाहित होती है। जहाँ यह नाड़ियाँ मिलती है उन संगम बिन्दुओं को चक्र कहा जाता है। वैसे तो हमारे शरीर में अनेको चक्र है लेकिन मूल रूप से सात चक्र होते है। मूलाधार, स्वाधिस्थान, मणिपुरा, अनाहत, विशुद्धा, अग्नाय और सहस्त्रार।

“एक आम व्यक्ति की समस्त उर्जा सुषुप्त अवस्था में रहती है। इस उर्जा का जागरण क्रमशः मूलाधार से सहस्त्रार की ओर होता है जिसे कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। मगर तुम्हारे शरीर में सारे चक्र पहले से ही जाग्रत है। तुम्हारी उर्जा इन चक्रों में बिखरी हुई है। तुम्हारी उर्जा का केंद्र मणिपुरा है जो हमारी नाभि के ऊपर स्थित होता है, इसलिए तुम इस चक्र पर केन्द्रित होकर ध्यान करो।"

मै कुछ देर तक उसी का ध्यान करती रही। मुझे गुलाबी रौशनी दिखने लगी थी।

“अपनी आँखे खोलो ताश्री।” अचानक अन्तस ने कहा। मैंने अपनी आँखे खोली तो चारो तरफ सिर्फ गुलाबी रौशनी दिख रही थी और वो। “मेरी आँखों में देखो।” उसने मेरा चश्मा उतारते हुए कहा।

“नहीं! मै ऐसा नहीं कर सकती।” मैंने अपनी आँखे बन्द कर ली।

“डरो मत, मै जैसा कह रहा हूँ, वैसे करो।”

मैंने अपनी आँखे खोली और उसकी आँखों में देखा। एक सफ़ेद रौशनी हुई और मै एक जंगल में थी। मगर मै अकेली नहीं थी, मेरे साथ अन्तस भी था।

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" मैंने उसे देखकर कहा।

"क्यों, जब तुम आ सकती हो तो मै नहीं आ सकता?”

बिल्कुल आये मुझे क्या फर्क पड़ता है? उसका अंतर्मन, उसकी इच्छा! मैंने मन में कहा।

“जंगल! यह अंतर्द्वंद का प्रतिक है। ऐसा लगता है तुम किसी उलझन में हो” । मैंने आगे बढ़ते हुए कहा।

“जंगल छल का भी प्रतिक हो सकता है, हो सकता है हमें भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा हो।”

“मै वर्षो से यह सब कर रही हूँ, मुझे भ्रमित करना नामुमकिन है।”

“कोई भी काम तब तक ही नामुमकिन है जब तक कोई उसे कर नहीं लेता है।”

“बेशक....... तुम कोशिश कर सकते हो।” मै बड़ी आसानी से इस जंगल में रास्ता ढूढ़ते हुए आगे बढ़ रही थी। मै अन्तस को देख कर मुस्कुराई मगर वो शांत बना रहा। कोइ आधे घंटे जंगल में चलने के बाद हम जंगल से बाहर निकले। यह समुन्द्र तट था। सामने एक सफ़ेद बर्फ का पहाड़ नजर आ रहा था।

“मैंने कहा था न।” मैंने इठलाते हुए कहा। तभी मुझे कुछ दुरी पर एक सफ़ेद घोडा दिखा।

“अरे वाह! तुम्हारे पास भी सफ़ेद घोडा है, यह तो बिलकुल मेरे घोड़े जैसा ही है।” मै दौड़ कर उसके पास चली गयी। अन्तस भी मेरे पीछे-पीछे ही आ गया। मैंने उस घोड़े को ध्यान से देखा तो चौंक गयी।

“यह तो......... ।“ वो मुस्कुरा रहा था।

“हम तुम्हारे अंतर्मन में है ताश्री!”

“मगर यह कैसे संभव है?” मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखकर कहा।

“जब तुम किसी के अंतर्मन में प्रवेश करती हो तो तुम उसके और अपने अंतर्मन के मध्य एक द्वार खोलती हो। अब जो द्वार उस तरफ जाने के लिए प्रयोग हो सकता है, वही द्वार इस तरफ आने के लिए भी प्रयोग हो सकता है।”

मै उसे घुर कर देख रही थी। दरअसल मुझे अपनी नादानी पर गुस्सा आ रहा था। अन्तस ने मुझे इतनी सफाई से बेवकूफ बना दिया था कि मुझे कुछ पता ही नहीं चला था। आसमान में काले बादल मंडराने लगे थे और समुद्र में लहरे ऊँची हो गयी थी।

“शान्त रहो । तुम अगर उद्वेलित हुई तो तुम्हारा अंतर्मन हम दोनों को बाहर फेंक देगा।”

“लेकिन यह ठीक नहीं है।” मैंने अपनी आशंका व्यक्त करते हुए कहा।

“तुम्हे डरने की जरुरत नहीं है। किसी की यादों को देखने की शक्ति सिर्फ तुम्हारे पास है, इसलिए मै तुम्हारे अतीत के बारे में कुछ नहीं जान सकता हूँ।” लहरे और भी ऊपर उठ गयी थी और आसमान में बिजलियाँ चमकने लगी।

उसने अपने हाथ का इशारा किया, जिससे लहरे निचे बैठ गयी और बादल भी छट गए।

“ये तुमने कैसे किया?” अब मेरी आशंका जिज्ञासा में बदल गयी थी।
 
“हम दूसरों के अंतर्मन में ज्यादा शक्तिशाली होते है। हम जो कुछ यहाँ देख रहे है यह मात्र हमारी ऊर्जाओं का प्रतिक है। जब हम किसी दुसरे के अंतर्मन में होते है, तब हमारी उर्जा उसकी उर्जा पर हावी होती है। यही मै तुम्हे समझाना चाहता हु। मृत्युंजय तंत्र जानता है, वह छल जानता है और वह तंत्र में छल भी जानता है। अभी मैंने जो किया है वो तंत्र में छल का एक उदहारण है। मृत्युजय इसमे पारंगत है।”

“मतलब की अगर मै मृत्युंजय के दीमाग में घुसने की कोशिश करूँ तो वो उल्टा मेरे दीमाग में भी घुस सकता है?”

“हाँ, मगर वो इससे भी बुरा कुछ कर सकता है........”

“जैसे की?”

“तुम्हे अंतर्मन में कैद करना....... कुछ भी संभव है, तुम्हे हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा।” मैंने हाँ में सर हिलाया जैसे मुझे कुछ-कुछ समझ में आ रहा हो।

“चलो।” अचानक उसने कहा।

“कहाँ? वहां ऊपर जाने का रास्ता बहुत ही लम्बा है। उसके लिए हमें उड़कर जाना होगा और मेरे पास एक ही घोडा है।” मैंने पहले पहाड़ की तरफ देखा फिर घोड़े की तरफ देखकर कहा।

“हम अक्सर ऊपर जाने के लिए इतने लालायित रहते है कि अपने मूल को ही भूल जाते है। तुम्हे तैरना आता है न?” उसने समुद्र के किनारे पानी में उतरते हुए कहा।

“आता तो मुझे उड़ना भी नहीं था, मगर यहाँ सबकुछ सिख गयी हूँ।” मै भी उसके पीछे-पीछे चल दी।

हम दोनों समुद्र की गहराइयों में गोता लगा रहे थे। जिस तरह से पहाड़ पर ठण्ड नहीं थी यहाँ भी सांस लेने* में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। बस थोडा सा अँधेरा ज्यादा था।

“यहाँ हमें क्या मिलेगा?” मैंने अन्तस से पूछा।

“यह तो तुम जानती हो, तुम इतने समय से किसे खोज रही हो?”

अब क्या बताऊँ मै इसे? जिसे खोज रही थी वो तो मेरे साथ था। मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा। कुछ गहराई में जाने के पश्चात हमें एक बड़ी सी ईमारत दिखी। इसके सामने एक बड़ा सा गेट था, फिर एक बड़ा सा गार्डन और तीन मंजिला वह ईमारत थी। यह बिलकुल जर्जर अवस्था में थी।

“यह कौनसी जगह है?” मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। मैंने आजतक यह जगह कभी नहीं देखी थी।

“तुम्हे शायद याद नहीं है, यह संगठन का वह आश्रम है जहाँ तुम्हारी माँ रहती थी और तुम पैदा हुई थी।” हम उस गेट के सामने थे।

“मगर मुझे यह अबतक याद कैसे है?”

"यह शायद मेरी वजह से है। मेरा अंतर्मन यादें साझा कर रहा है।” अन्तस ने दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया। हमारे अन्दर घुसते ही दरवाजा बन्द हो गया। यहाँ अन्दर पानी नहीं था। सामने एक गलियारा था और फिर बड़ा सा हाल।

“यहाँ पर सब प्रार्थना करते थे।” उसने मुझे बताते हुए कहा। “और वो गुरूजी का कमरा था।” उसने सामने एक कमरे की तरफ इशारा किया, जहाँ तक सीढियाँ जा रही थी।

“मेरी माँ का कमरा कहाँ है?” मैंने उत्सुकता से पूछा।

“वो वहां ऊपर है।” उसने दूसरी तरफ की सीढियों की ओर इशारा करते हुए कहा। हम दोनों ऊपर की तरफ बढ़ गए।

“मुझे डर लग रहा है।” मैंने उसका हाथ थोडा कस कर पकड़ लिया। हम सीढ़िया चढ़ रहे थे।

“यहाँ पर यह आम बात है। मूलाधार भावनावों का केंद्र है। गनीमत है की अभी तुम्हारी दूसरी भावनाएँ बलशाली नहीं है।” उसने मेरी ओर आँख मार कर कहा। मुझे उसके कहने का मतलब समझ में नहीं आया पर मै चुपचाप चलती रही। कुछ देर बाद हम मेरी माँ के कमरे के बाहर थे।

“तुम सचमुच यहाँ जाना चाहती हो?” अन्तस ने मेरा हाथ छोड़ते हुए कहा।

“क्यों कोई दिक्कत है?” मैंने घूरकर पूछा।

“नहीं कुछ नहीं।” उसने दरवाजे को धकेलते हुए कहा। जैसे ही दरवाजा खुला मै अन्दर का नजारा देखकर स्तब्ध रह गयी। वहां मेरे पिता की लाश पड़ी थी, पास ही एक बच्ची बैठी हुई रो रही थी और एक बच्चे ने मेरे पिता का हाथ पकड़ा हुआ था। मै यह सब देखकर विचलित हो गयी। मेरी सांस फूलने लगी थी। ऐसा लग रहा था जैसे ऑक्सीजन की कमी हो रही हो।

“अपने आप पर नियंत्रण रखो, तुम यहाँ रो नहीं सकती, तुम्हारी किसी भी भावना की आधिक्यता तुम्हे यहाँ से बाहर फेंक देगी। तुम्हे अपनी भावनावों पर नियंत्रण पाना सिखना होगा, ये केवल यादे मात्र है।” मै अन्तस की भी साँसों को फूलता हुआ महसुस कर रही थी।

“हमें यहाँ से चलना होगा।” उसने मेरा हाथ पकड़कर खीचते हुए कहा। उसने कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया और हम सीढियों पर आ गए।

“तुम मुझे यह सब क्यों दिखाना चाहते हो?”

“मै? यह तो तुम देखना चाहती थी, यह तुम्हारा अंतर्मन है।” हम सीढियों से उतर कर नीचे आ गए, तभी सामने किसी को देखकर मेरे कदम जहाँ थे वहीँ रुक गए।

सामने वही तांत्रिक था। काला चोंगा, हाथ में त्रिशूल, लाल आँखे, चेहरा ढका हुआ।

“ये यहाँ क्या कर रहा है?” मैंने घबराते हुए कहा। अन्तस मुझसे चार कदम पीछे खड़ा था।

“यह तुम्हारा डर है, इससे तुम्हे खुद ही लड़ना होगा।” अन्तस ने वहीं खड़े हुए ही कहा।

“हाँ, क्यों नहीं?” मै गुस्से से भर गयी थी। तेज़ हवाएं चलने लगी और सभी चीजे हिलने लगी। मै आसमान में बिजलियों की कड़क साफ़ सुन सकती थी।

“तुम ग्यारहवां सूत्र हो।” उस तांत्रिक ने कहा और वो मेरी ओर बढ़ने लगा। मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया, बिजलियों की आवाज बढ़ने लगी।

“रुक जाओ ताश्री।” अन्तस ने कहा। “हम अपने डर से लड़ सकते है, उस पर काबू पा सकते है मगर उसे ख़त्म नहीं कर सकते है। ऐसा करने का परिणाम तुम पहले ही भुगत चुकी हो।” उसने मुझे याद दिलाया कि कैसे मैंने पहले याग्निक* के दीमाग की बैंड बजाई थी। अभी भी अन्तस और मेरा दीमाग जुड़े हुए ही थे।

“मैंने उसकी बात समझते हुए हाँ में सर हिलाया। मैंने एक तरफ देखा जहाँ एक टेबल पड़ा था। मैंने उसे ध्यान से देखा और वो उड़कर उस तांत्रिक के ऊपर जा गिरा।

“चलो भागो।” मै जोर से चिल्लाई और दरवाजे की तरफ भागी। अन्तस भी मेरे पीछे ही था। हम दरवाजे तक पहुंचे तब तक वो तांत्रिक भी उठ चूका था। हमने बाहर निकल कर दरवाजा बन्द कर दिया।

---------------------

मेरी आँख खुली तो मै अन्तस के साथ ही सोई हुई थी। हम दोनों ही उस श्री चक्र के ऊपर पड़े हुए थे। रात का दूसरा पहर जा रहा था। मै उठी और खुद को व्यवस्थित किया और अन्तस को झकझोरा। मुझे डर था की कहीं उसे कोई नुकसान न हुआ हो। मगर जल्द ही वो आँखे मलते हुए उठ गया।

“तुम ठीक तो हो।” मै उसके सामने खड़ी थी।

“तुम और तुम्हारा अन्तर्मन!” उसने निःश्वास लेते हुए कहा, और कमरे के बाहर चला गया।

अगले दिन सुबह जब मै उससे मिली तो अन्तस बिलकुल सामान्य लग रहा था, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो।

यहाँ सुबह प्रार्थना हुई। जिसका एक शब्द भी मुझे समझ में नहीं आया था। मै सिर्फ औपचारिकता के लिए साथ-साथ बुदबुदा रही । फिर हम सबने खाना खाया। खाना क्या था बस राशन भर था। कुछ चपाती, चावल, दाल और सब्जी। सब्जी चखकर तो ऐसा लगा जैसे उसे मसाला दिखाया भर गया हो।

दिन में सबसे मिलने के दौरान हम ऐसे व्यवहार कर रहे थे , जैसे हम दोनों एक दुसरे को अच्छी तरह से जानते थे। मगर मै फिर भी पुरे समय गुमसुम थी।

दिन को आराम करने के इए मै अपने कमरे में आई। मेरे पीछे-पीछे अन्तस भी आ गया। शायद वो मेरी मनोस्थिति समझ चूका था।

“क्या हुआ?” उसने अन्दर आकर पूछा। “तुम कुछ परेशान लग रही हो।”

‘यह सब बकवास है।” मैंने झुंझलाते हुए कहा। वो मेरी ओर ताकने लगा। “यह सूत्र साधना यह रूद्र..... इन सबका कोई मतलब नही हैं।”

“तुम कहना क्या चाहती हो।” वो मेरे करीब आ गया।

“तुम्ही ने कल कहा था न कि हमने वहां जो कुछ भी देखा था, वो हमारी उर्जा का प्रतिक मात्र था।”

“सही है..........” उसने बैठते हुए कहा।

“तो यह भी तो हो सकता है रूद्र भी एक प्रतिक ही हो। समुद्र तल मूलाधार, वो जंगल स्वधिस्थान, वो घास का मैदान मणिपुरा, मेरी माँ ने गुफा में जो कमल के फुल देखे थे वह अनाहत, वो पहाड़ की चोटी विशुद्धा, उससे आगे कुछ अग्नेय हो और शायद रूद्र सहस्त्रार चक्र के जागृति का प्रतिक हो............ या फिर ये सब हमारे मन का भ्रम मात्र हो, कोई रूद्र है ही नहीं।” मैंने उसे देखकर कहा।

अन्तस के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। “तुमने सही कहा कोई रूद्र नहीं है।” मैंने उसे देखकर* कहा।

अन्तस के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। “तुमने सही कहा कोई रूद्र नहीं है।”

“रूद्र का प्रथम वर्णन ऋग्वेद में मिलता है।* यजुर्वेद का 'श्रीरुद्रम मन्त्र' रूद्र देवता को समर्पित है। वेदों में 'रूद्र' परमात्मा, जीवात्मा तथा शुरवीर के लिए प्रयोग हुआ है। यजुर्वेद में रूद्र के अनन्त रूपों का वर्णन है, मगर फिर श्वेताश्वर उपनीषद में कहा गया है, 'एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्यु:।' ( श्वेताश्वतर उप. ३.२) यानी की मात्र एक रूद्र है, दूसरा नहीं है।मगर जरा ध्यान दे तो ऋग्वेद में कहा गया है-

'भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी,

रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ।

बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नं,

ऋधग्हुवेम कविनेषितार:॥ (-ऋग्वेद ६.४९.१०)

यहाँ रूद्र को ‘भुवनस्य पितंर’ यानी की तीनो लोको का पिता कहा गया है, वही वह शक्ति है जिससे* संसार की उत्पत्ति हुई है।”

“मगर संसार की रचना तो ब्रम्हा जी ने की है, रूद्र तो विनाशक है।” मैंने कहा तो अन्तस हंस पड़ा।

“तुम उपनिषदों की बात कर रही हो, मै वेदों की बात कर रहा हूँ। ब्रम्हा का प्रथम उल्लेख पहली सहस्त्राब्दी ईसा पुर्व में लिखीत मैत्रायणी उपनीषद के पाँचवे पाठ में है। बल्कि रूद्र ऋग्वेद से है।”

“वेद....... उपनीषद! यह सब अलग है क्या?" मैंने भोलेपन से कहा।

“वेद मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित ग्रन्थ है। मानव सभ्यता की उत्पत्ति से ही यह ग्रन्थ श्रुति ग्रन्थ के रूप में थे। यानी की गुरु इसे सुनाते और शिष्य इसे याद कर लेते थे। कोइ भूल ना हो इसलिए यह ग्रन्थ मंत्रो के रूप में थे जिन्हें गाया जाता था। पुरा सामवेद ही संगीत के ऊपर है कि कैसे इन सूक्तो को गाया जाता हैं। पहले इन्हें ताम्र पत्रों पर लिखा गया था और इस प्रकार धीरे-धीरे इनके संरक्षण का काम प्रारंभ हुआ।

उपनीषद ३,००० साल पहले लिखे गए थे। यह वेदों की व्याख्या थे। वेदों में मुश्किल मन्त्र थे और उपनीषद उन मन्त्रो की व्याख्या करते थे।

उस समय ऋषि इन मंत्रो को यज्ञ करते समय प्रयोग करते थे। यज्ञ का मूल लाभ यह था कि इससे एकाग्रता बनी रहती थी और इस तरह यजुर्वेद का जन्म हुआ, जो की मुख्य रूप से यज्ञ, संस्कारों और रीतियों के बारे में बात करता है।”

“तो फिर रामायण और महाभारत कब आये?” मैंने धीरे से पूछा। उसने एक नजर उठा कर मुझे देखा और जारी रखा।

“यज्ञ करते वक़्त ब्राम्हण मन्त्र कहते थे और उनकी व्याख्या करते थे, लेकिन आम जन के लिए यह काफी उबाऊ होता था। श्रोताओ की रूचि को बनाये रखने के लिए उन्होंने उन मन्त्रों के संदेशों की सिख देने वाली कहानियां बनाई, कुछ पात्र गढे और वेदों के मन्त्रो के साथ साथ वो कहानिया सुनाने लगे। लोगो को ये कहानियां काफी पसंद आई और ये धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गई। यह पात्र, यह कहानियां आम जनता के मन में बस गए। धीरे-धीरे इन कहानियों का मंचन शुरू हुआ, और नाट्य हमारे साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। नाट्यशास्त्र को पाँचवा वेद भी कहा जाता है।”

“तो तुम कहना चाहते हो की रामायण महर्षि वाल्मिकी ने नहीं लिखी और महाभारत भी वेदव्यास जी ने नहीं लिखी, ये सब लोक कहानियाँ मात्र है और हमारा धार्मिक इतिहास झूठा है?”

“महर्षि वाल्मीकि?” उसने मुझे चिढ़ाने के अंदाज़ में कहा।

“रामायण में एक प्रसंग आता है जब राम के पुत्र लव-कुश उन्हें रामायण सुनाते है, तब राम पुछते है कि यह किसकी कहानी है? उनके पुत्र कहते है कि यह आपकी ही कहानी है। राम कहते है कि इतनी सुंदर मेरी कहानी नहीं है, तुमने यह कहाँ से सुनी? उनका जवाब था वाल्मीकि से। वाल्मीकि लवकुश के गुरु थे, और उन्होंने ही उन्हें रामायण सुनाई थी, मगर उन्होंने भी रामायण किसी और से सुनी थी।”

“किसी और से का क्या मतलब है?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
 
“कहानी कुछ यूँ है कि वाल्मीकि पहले एक डाकू थे। वे अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए लोगो को लुटते थे। मगर एक दिन उन्हें एक महर्षि मिलते है और उनसे पूछते है कि क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे कर्मो के फल में भागीदार बनेगा? जब वाल्मीकि अपने परिवार से यह पुछते है तो उनके परिवार के सदस्य इससे मना कर देते है और कहते है कि तुम्हे अपने परिवार का भरण पोषण करना है और तुम यह कैसे करते हो इससे हमें कोई मतलब नहीं है। दु:खी होकर वाल्मीकि पुनः उस ऋषि के पास आते है। ऋषि वाल्मीकि को राम नाम का जाप करने को कहते है। वाल्मीकि उनके कहे अनुसार तप करते हैं। लम्बे समय तक ताप करने से उनके चारों ओर मिट्टी का ढेर जम गया। मिटटी के ढेर को संस्कृत में ‘वल’ कहा जाता है और इस तरह उनका नाम वाल्मीकि पडा। मगर वाल्मीकि महर्षि नहीं थे वो कवि थे।

कुछ दिनों बाद वो ऋषि पुनः वहां से गुजरे तो उन्हें मिटटी के ढेर में सने वाल्मीकि दिखे तब उन्होंने वाल्मीकि को रामायण सुनाई। कहते है वो ऋषि कोइ और नहीं नारद थे, उन्होंने वो कहानी एक कौवे काग्भुशंडी से सुनी थी और उसने? शिव से।”

मै उसकी ओर बस देख रही थी। मुझे लग रहा था कि मै आज तक जो भी जानती थी सब गलत था।

“एक दिन वाल्मीकि को तीर लगा हुआ एक पक्षी मिला जो किसी के शिकार करने से घायल हो गया था। तब उसकी पीड़ा देखकर वाल्मीकि के मुख से कुछ पंक्तियाँ निकली। वो पंक्तियाँ विश्व की प्रथम कविता थी और वाल्मीकि आदिकवि वाल्मीकि हुए। तब उन्होंने रामायण कविता के रूप में लिखना शुरू किया।”

“और महाभारत भी वेदव्यास जी ने नहीं लिखी?” मैंने आगे झुकते हुए पूछा।

“रामायण का उद्भव त्रेतायुग के अंत और द्वापर युग के प्रारंभ में माना जाता है वहीं महाभारत द्वापर युग के अंत से कलयुग के प्रारंभ तक थी। दरअसल महाभारत कोई एक कहानी नहीं है बल्कि कहानियों का समूह है। कहा जाता है की जो महाभारत में नहीं है वो कभी हो ही नहीं सकता है। तुम जिन्हें वेदव्यास जी कह रही हो वो कोई व्यक्ति नहीं थे, कई व्यक्तियों के समूह थे। महाभारत का संकलन काल २,००० वर्ष है। अब या तो कोई व्यक्ति दो हजार साल जिया था या फिर ये सब अलग अलग शिक्षार्थी थे। वास्तव में 'वेदव्यास जी' ने जो एक और सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया था, वो था वेदों को व्यवस्थित करना। वेदों के जो मन्त्र थे उन्हें ‘रिग्स’ या ‘ऋचायें’ कहा जाता है, उन्होंने इन ‘ऋचाओं’ को ‘सूक्तों’ में जमाया, फिर सूक्तों से ‘मंडल’ बने और मंडल से ‘संहिता’। इस प्रकार उन्होंने वेदों की एक्सल शीट बनाई थी जिससे हमें किसी भी मन्त्र को पहचानने में आसानी होती है, बिलकुल किसी कंप्यूटर के आई.पी. एड्रेस की तरह।” अन्तस ने मुस्कुरा कर कहा। “और इसीलिए उन्हें वेदव्यास कहा जाता है, वेद का व्यास करने वाले। कुल 108 पुराण है जिनमे से रामायण, महाभारत, शक्ति पुराण और देवी पुराण प्रमुख है.........”

“शक्ति पुराण और देवी पुराण! यह क्या है?”

“अब मै जो तुम्हे कहने जा रहा हु उसके बाद तुम मुझे धर्म का विरोधी कह सकती हो, मगर तुमने पूछा है इसलिए बता रहा हूँ।” उसने सांस ली।

“लगभग २,५०० वर्ष पुर्व, देश में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ। इस धर्म का मूल ही वैराग्य था, लोगो की इस धर्म में रूचि बढ़ी और लोग गृहस्थ जीवन छोड़कर वैराग्य अपनाने लगे। समाजविदो के लिए यह महत्वपूर्ण समस्या थी और उन्होंने गृहस्थ जीवन का महत्व बताने के लिए ‘शक्ति’ की अवधारणा का विस्तार किया। शिव या रूद्र जो की स्वयं एक शक्ति थे, उनमें से शक्ति तत्व नारी के रूप में परिभाषित किया गया। उन्हें गृहस्थ बताया गया और उनका विवाह किया गया। शक्ति तत्व की व्याख्या के लिए शक्ति पुराण रचा गया। इसी तरह वैष्णव पंथ में देवी की स्थापना की गयी जो की विष्णु की पत्नी है। तुम्हे जानकार आश्चर्य होगा की पुरे महाभारत में कहीं भी राधा या कृष्णलीला का जिक्र नहीं है। इनका जिक्र ‘विष्णुपुराण’ के हरिवंशा’ में है जो की १५०० साल पुराने है।”

“तुम्हारा मतलब है की आजतक हमें गलत इतिहास बताया गया?”

“यह इसपर निर्भर है कि तुम इतिहास किसे मानती हो, सनातन धर्म में इतिहास का अर्थ है, ‘ऐसा ही हुआ है....... ऐसा ही होता रहेगा।’ यहाँ सबकुछ शाश्वत है और इसीलिए इसे सनातन धर्म कहा जाता है। दिक्कत यह है की हम चरित्र के बजाय पात्रों को महत्त्व देते है, शिक्षा की बजाय कहानियों में उलझते है, मूल की बजाय शाखाओं पर बसते है।” उसने मेरी ओर देखा।

“रूद्र है या नहीं हम नहीं जानते है। वह किस रूप में है? वह ऊर्जा हैं, शक्ति है, तत्व है या फिर तथ्य है। वह उद्गम है या फिर अंत है। वह सर्व है या फिर शून्य है, हम नहीं जानते है और जानना जरुरी भी नहीं है, जरूरी है समझना। क्या हम उसे समझते है और उससे भी ज्यादा क्या हम स्वयं को समझते है?’

"तो तुम यह कहना चाहते हो कि मुझे इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए की रूद्र है या नहीं हैं?"

“बिल्कुल नहीं........... मगर तुम्हे पहले ही किसी निष्कर्ष पर भी नहीं पहुचना चाहिए।"

“ठीक है मै कोशिश करती हूँ।” मैंने मुस्कुरा कर कहा।

“तुम कुछ देर आराम कर लो हम शाम को निकलेंगे।” उसने बाहर निकलते हुए कहा।

मुझे अब थोडा सा डर लगने लगा था। शाम को माँ का फोन आया। वो चाहती थी कि मै ना जाऊं मगर मेरा निर्णय पक्का था और मैंने उन्हें चिंतित न होने के लिए कहा। उन्होंने मुझे सिर्फ एक ही बात कही कि किसी पर भी विश्वास मत करना।

--------------------------------

शाम को हम रेलवे स्टेशन पहुचे। कुछ देर बाद हमे ट्रेन मिल गयी। उसने एसी कोच बुक करवाया था, इसलिए हमें अपना अलग से बर्थ मिल गया। हमारे सेक्शन में और कोई नहीं था, सिर्फ हम दोनों ही थे। मै अपने बर्थ पर चुपचाप* लेटी हुई थी और और वो भी मेरे सामने वाले बर्थ पर लेटा हुआ था। मै रुक-रुक कर थोड़ी देर में उसे देख रही थी और कई बार मैंने उसे भी अपनी ओर देखते हुए पाया था। मगर मेरे देखते ही वो अपनी नजरे चुरा लेता था।

“एक तांत्रिक के अलावा तुम और क्या हो?” मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा। वो थोडा झेप गया।

“तुम्हारे हिसाब से मुझे क्या होना चाहिए?”

“तुम कभी सीधा जवाब नहीं दे सकते क्या?” मैंने थोडा खीजते हुए कहा।

“मैंने M.Sc. की हुई है और कुछ समय तक एक फार्मा कंपनी में काम भी किया था।” उसने नरम पड़ते हुए कहा।

“देवप्रभा......... मेरा मतलब है तुम्हारे माता-पिता कहाँ है?”

“वो हरिद्वार में ही रहते है, मै जिस कंपनी में काम करता हूँ वो मेरे पिता की ही है।”

“वो जानते है की तुम तांत्रिक हो?” ‘तांत्रिक’ के बाद मेरा वाक्य थोडा धीमा पड गया था।

“मेरी माँ जानती है। वो तुम्हारी माँ के बारे में भी जानती थी। वो शुरू से ही संगठन का हिस्सा थी।” उसने ऐसे कहा जैसे कोइ बहुत बड़ा रहस्य खोला हो, मगर मैंने उससे आगे पूछा।

“तुम्हारी शादी वगैरह हो गयी है?”

“हा.....हा......हा....... नहीं और मेरी कोइ गर्लफ्रेंड भी नहीं है।” मैंने आज पहली बार उसे हसते हुए देखा था। लग रहा था पहाड़ के बिच से झरना फुट गया हो।

“मैंने गर्लफ्रेंड के लिए कब पूछा?”

“मगर पुछना तो चाहती थी।” उसने इस अंदाज में कहा की मैं घबरा गयी और दूसरी तरफ देखने लगी।

“ताश्री! जरुरी नहीं है की जिससे हम प्यार करें वो भी हमसे प्यार करे और बेहतर है कि जो हमसे प्यार नहीं करता हम भी उसे अपने दिल से निकाल दे।”

“मगर प्यार न करने का कोई कारण भी तो होना चाहिए। हर इन्सान किसी न किसी से प्यार करता है...... तुम किससे प्यार करते हो?”

“रात बहुत हो गयी है, हमें सो जाना चाहिए।” उसने लाइट का स्विच बन्द करते हुए कहा।

“मुझे अँधेरा पसंद नहीं है।” मैंने लाइट का स्विच फिर से चालु कर दिया। “ या तो तुम मुझे सच बताओ या फिर मैं अगले स्टेशन पर उतर जाउंगी।” मैंने अपनी आवाज में सख्ती लाते हुए कहा।

“सत्य कभी परिभाषित नहीं होता है, ये वही होता है जो हम सुनना चाहते है।”

"तब तुम वो कहो जो तुम कहना चाहते हो।”

उसने मेरा चश्मा हटा दिया। मेरी आँखे बंद हो गयी थी। मुझे अपने होठों पर उसके होंठ महसूस हुए और कुछ ही देर में मैं उसके नशे में खो गयी।

“ग्यारहवा सूत्र अपवित्र हो जाएगा।” उसने मुझे छोड़ते हुए मुस्कुरा कर कहा।

“भाड़ में गया तुम्हारा ग्यारहवां सूत्र।” मैंने उसे अपनी ओर खिंच लिया।

सुबह जब मेरी नींद खुली तो अन्तस मेरे पास में नहीं था। ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी थी। मै थोड़ी चिंतित हो गयी और उसे ढूढने लगी। मै प्लेटफार्म पर उतरी ही थी कि सामने से मुझे वो दो चाय के ग्लास और नाश्ता लेकर आते दीखा।

“क्या हुआ तुम नीचे क्यों उतर गयी?” उसने मेरे पास आकर ट्रेन में चढते हुए कहा।

“तुम दिखे नहीं तो .............” मै कहते-कहते रुक गई।

“तुमने सोचा की मै तुम्हे छोड़कर भाग गया हूँ।” मै भी ट्रेन में चढ़ गयी थी। “तुम्हे लगता है मै तुम्हे इतनी दूर इस सब के लिए लाया हूँ।” उसने हंसते हुए कहा।

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा। बस थोड़ी सी परेशान हो गयी थी।” मैंने थोडा गुस्सा होते हुए कहा।

“परेशान किसके लिए?” उसने मुझे चिढाते हुए कहा।

“किसी के लिए नहीं।” मै शरमाकर बाहर देखने लगी।

“लब सिले-सिले, नैन झुके-झुके,

ऐसा पहले तो न था, ये अंदाज किसका है?

रात भर जागते रहते हो, दिन भर सोचते रहते हो,

इतना डूबे रहते हो, ये ख्याल किसका है?

यूँ अकेले रहने की कोशिश, दिल में अजीब सी कशिश,

यह मोहब्बत नहीं है, तो फिर पैगाम किसका है?”

अन्तस ने कहा तो मै मुस्करा कर उसकी ओर देखने लगी।

“तो तुम्हे मंत्रो के अलावा शायरी भी आती है?” मैंने हँसकर कहा।

“तुम्हे ऐसा क्यों लगा की अगर कोइ तांत्रिक है तो वो सिर्फ तंत्र-मन्त्र ही जानता होगा?” फिर से वही सवाल के बदले सवाल। ऐसा लगता है जवाब शब्द तो इसकी डिक्शनरी में है ही नहीं।

“वैसे तो तुम तांत्रिक भी किसी एंगल से नहीं लगते।" मैंने उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए कहा। हल्का सा सांवला चेहरा जिस पर हल्की सी दाढ़ी, हल्की भूरी आँखे जो पहली नजर में ही मंत्रमुग्ध कर दे, नज़रों में एक अजीब सा पैनापन जो हरपल उसकी सतर्कता दर्शाती है, चौड़ी छाती जो उसके कसरती बदन का प्रतिक है। कुल जमा दीखने में वो किसी आकर्षक युवा सा ही लगता था।

“लगती तो तुम भी नहीं हो।” उसने भी मुझे उसी अंदाज में देखते हुए कहा।

“मै! क्या तांत्रिक!?” मैंने अपनी आँखे फाड़ कर उसे देखते हुए कहा।

“तंत्र योग का ही एक परिष्कृत रूप है। जब हम उस स्तर तक पहुँच जाते है तो हम एक तांत्रिक होते है और तुम तो मुझसे कई गुना आगे हो।”

“ना बाबा ना....... मै कोइ तांत्रिक नहीं हूँ और वैसे भी मुझे तांत्रिकों से डर लगता है।”

“हम किसी चीज से तब तक ही डरते है जबतक हम उसे पूरी तरह से जान नहीं लेते, जब हम उसे जान लेते है हमारा डर भी खत्म हो जाता है।”

मैंने उसकी ओर देखा और फिर उसकी बात का विश्लेषण करने लगी। वो भी मेरा चेहरा पढ़ने लगा, जैसे देख रहा हो मुझे उसकी बात समझ आई या नहीं।

“अगर तंत्र इतना ही सही है तो तुम लोग इसके अच्छे पहलुओ को सामने क्यों नहीं लाते, पुरे देश में हजारों तांत्रिक घूम रहे है जो झूठे आश्वासनों से लोगो को बेवकूफ बनाते है। तुम उनकी हकीकत सबको क्यों नहीं बताते?” मैंने थोडा तैश में आके कहा।

“किसके सामने?” उसने मुझे घुर कर कहा। “कोई भी झूठा तांत्रिक खुद किसी के पास नहीं जाता है। लोग खुद उसके पास जाते है अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिये, अपनी लालसाओ के लिए, या फिर अपनी कुंठावों को शांत करने के लिए आते है।

“किसी को कोई लड़की भाव नहीं देती तो वो पहुँच जाता है किसी चमत्कारी बाबा के पास अपना ‘सच्चा प्यार’ हासिल करने के लिए। किसी को बेटा चाहिए तब भी किसी बाबा का आशीर्वाद हासिल करने के लिए पहुंच जाता है। कोई तंत्र से हारता हुआ केस जितना चाहता है तो कोई अपने शत्रु का विनाश करना चाहता है। कोई गढ़ा हुआ धन पाना चाहता है। तो कोई सोना दुगुना करना चाहता है। तंत्र को तो तुम लोगो ने मज़ाक बना रखा है।” मै उसका चेहरा देख रही थी जो गुस्से और पीड़ा से लाल था।

“मै यह नहीं कहता कि वो झूठे तांत्रिक निर्दोष है, मगर दोषी तो तुम भी कम नहीं हो, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है।”

तभी ट्रेन धीमी पड़ गयी। अन्तस ने बाहर देखा।

“हम पहुँच चुके है।” उसने उठते हुए कहा।

प्लेटफार्म पर उतरने के बाद अन्तस ने किसी को फोन किया और कुछ ही देर में एक कार हमें लेने के लिए आ गयी। कुछ गलियों से गुजरते हुए हम मुख्य सड़क पर आ गए और फिर कार शहर से बाहर निकल गयी। अंत में हम एक कॉलेज के सामने जाकर रुके।

‘भारत सेवा विश्वविद्यालय’ हम जिस बड़े से गेट के सामने रुके थे उसके ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में एक बोर्ड लगा था।

“हम यहाँ क्यों रुके है?” मैंने अन्तस से पूछा।

“यही संगठन का आश्रम है।” अन्तस ने सामान उतारते हुए जवाब दिया। “मृत्युंजय महाराज जब संगठन के अध्यक्ष बने तब उन्हें एक बात समझ आ गयी की आने वाले समय में एक आश्रम के रूप में संगठन के अस्तित्व को अक्षुण्ण रख पाना संभव नहीं है, अत: उन्होंने एक ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’ के रूप में संगठन का पंजीयन करवा लिया।” वो आगे-आगे चल रहा था और मै उसके पीछे-पीछे थी। “ ‘मृत्युन्जय महाराज’ दरअसल अब ‘प्राचार्य मृत्युंजय’ है।” उसने मेरी ओर देख कर हसते हुए कहा।

“मगर मुझे तो यहाँ एक भी विद्यार्थी नहीं दिख रहा है!, आज छुट्टी है क्या?” मैंने खाली पड़े परिसर को देखकर कहा।

“इस विश्वविद्यालय में कभी छुट्टी नहीं होती है। सब विद्यार्थी यहीं रह कर पढाई करते है। अभी प्रार्थना का समय है।”

हम अन्दर पहुँच चुके थे। अन्दर बड़े से हाल में हजारों विद्यार्थी पीले वस्त्रों में कतारबद्ध एक स्वर में प्रार्थना कर रहे थे।

।।ॐ।।

सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु ।

सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।

सर्वेशां पुर्णंभवतु ।

सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अंतिम स्वर कई बार इस इमारत की दीवारों के मध्य गूंजता रहा।

“सभी लोग सुखी रहे, सभी निरोग रहे, किसी को भी कोई दुःख न देखना पड़े। यही हमारा धर्म है और यही हमारे धर्म का सार है। सभी मन्त्रों, सभी क्रियायों, सभी ग्रंथों का अध्ययन व्यर्थ है अगर उनका उद्देश्य इसके अपितु और कुछ भी है।”

सामने लगे एक बड़े से आसन पर पीले वस्त्रों में एक पतले शरीर का पौढ़ व्यक्ति बैठा था जिसके चेहरे पर लम्बी सफ़ेद दाढ़ी थी। संभवतः यह मृत्युंजय ही था। उसकी नजर दरवाजे पर खड़े अन्तस और मुझपर पड़ती है।

“सभी विद्यार्थी योग के लिए प्रस्थान करे।” उसने हमारी ओर देखते हुए ही अपनी आवाज ऊँची कर कहा। समस्त विद्यार्थी कतारबद्ध किसी सेना की टुकड़ी की तरह उस हॉल से बाहर निकलने लगे। बाहर निकलते वक़्त कुछ विद्यार्थी अन्तस को देखकर चहक उठे थे। ऐसा लगता था कि वो अन्तस के दोस्त थे। उन्होंने आँखों ही आँखों से अन्तस का अभिवादन किया पर कतार तोड़कर बाहर आने की हिम्मत शायद उनमे न थी।

मृत्युंजय ने अन्तस को अपने पीछे आने का ईशारा किया और अपने कमरे की ओर चला गया।

मै और अन्तस भी पीछे-पीछे ही गए। अन्दर एसी, कंप्यूटर, टीवी जैसी आधुनिक सुविधाओ से सुसज्जित एक भव्य ऑफिस था। सामने टेबल के पीछे कुर्सी पर मृत्युंजय बैठा एक पेपर वेट गोल-गोल घुमा रहा था।

“प्रणाम गुरुदेव।’ अन्तस ने अन्दर प्रवेश करते ही आधा झुककर कहा। मै जो कि अब तक मृत्युंजय को घृणा भरी दृष्टी से देख रही थी, अन्तस को घूरने लगी। उसने आँखों से मुझे भी ऐसा ही करने के लिए कहा। मै कुछ देर ऐसे ही खड़ी रही मगर फिर जब दुबारा उसने थोडा गुस्से से ईशारा किया तो मुझे मज़बूरी में प्रणाम करना ही पड़ा। अपनी माँ की बर्बादी के कारण और अपने पिता के हत्यारे को प्रणाम करने पर कैसा महसूस होता है आज मुझे मालुम हुआ था। शायद मेरी आँखों पर काला चश्मा होने की वजह से मृत्युंजय उनमे खुद के प्रति नफ़रत न देख पाया था।

“आप वही है?” मृत्युंजय ने मेरी ओर देखकर अन्तस से पूछा।

“जी महोदय!” अन्तस ने जुबां से ज्यादा आँखों से कहा।

“तुम जानते हो न विश्वविद्यालय में चश्मे जैसी चीजों की अनुमति नहीं है।” शायद मेरा काला चश्मा लगाना उसे अजीब लग रहा था, इसलिए उसने अन्तस से कहा।

“इनकी आँखों में कुछ तकलीफ है, इसलिए डॉक्टर ने हर समय यह चश्मा लगाकर रखने की सलाह दी है।” अन्तस ने टेबल के निचे से मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया, जैसे मुझे शान्त रहने को कह रहा हो।

“खैर...... ताश्री शायाद आपको विदित न हो मगर आपकी माँ और मै काफी अच्छे मित्र रह चुके है, अंत में हमारा कुछ मनमुटाव जरुर रहा था, मगर आज भी मै उनका काफी सम्मान करता हूँ।” मृत्युंजय ने मुस्कुराकर कहा। अजीब आदमी था, मेरे चेहरे पर सफ़ेद झूठ बोल रहा था। मन में तो आया कि यहीं खींच कर थप्पड़ जड़ दूँ, पर अन्तस ने मेरा हाथ पकड़ रखा था।
 
मैंने चेहरे पर झूठी मुस्कान लाते हुए सहमति में सर हिला दिया।

“आप शायद सफ़र से थक गयी होंगी। अभी आप आराम कीजिये। हम दोपहर के बाद मिलते है।” उसने मेरी असहजता भांपते हुए कहा।

अन्तस और मै जाने के लिए उठ खड़े हुए, तभी मेरी नजर सामने लगी एक तस्वीर पर पड़ी। मै उसे देखकर चौंक गयी।

“यह कौन है?” मैंने पास में जाते हुए कहा।

“ये हमारे परमपूज्य पिताजी श्री नित्यानंद जी महाराज है।” मृत्युंजय ने मुस्कुरा कर कहा।

“यह असंभव है!” मैंने मन ही मन कहा।

अन्तस और मै ऑफिस से बाहर आ गए। सीढ़िया उतरते ही एक लड़का और एक लड़की हमारा इन्तजार करते मिल गए।

“जय महाकाल।” लडके ने अपनी बाहें फैला कर कहा। अन्तस ने भी ‘जय महाकाल’ कहते हुए उसे गले लगा लिया। “कैसे हो बड़े भाई।” अन्तस ने धीरे से कहा।

“बस बढ़िया हूँ। तुम सुनाओ।” उसने अन्तस को छोड़ते हुए कहा।

“जय महाकाल” उस लड़की ने भी झुककर प्रणाम करते हुए कहा। मगर उसकी आँखे शायद और भी बहुत कुछ कह गयी। “जय महाकाल” अन्तस ने झुककर उसे भी जवाब दिया।

वो लड़का और लड़की दोनों अब मेरी ओर देखने लगे थे। “यह ताश्री है गुरुमाँ की पुत्री।” अन्तस ने मेरा परिचय करवाया। मैंने भी झुककर उसी अंदाज से प्रणाम किया मगर मै चुप थी।

“यह मेरे बड़े भाई है ‘वेद सागर’।” अन्तस ने उस लडके की तरफ देख कर कहा। मगर मेरी नजर उस लड़की पर टिकी थी जो लगातार अन्तस को निहारे जा रही थी।

“यह दिव्या है, मृत्युंजय महाराज की पुत्री।” अन्तस ने कहा तो उसकी तन्द्रा टूटी, वो मेरी ओर देखकर मुस्कुराई।

मैं उसके बाद कमरे में आ गयी। यह कमरा किसी आम हॉस्टल के कमरे की तरह न होकर एक होटल के कमरे की तरह था। टीवी, पंखा, शानदार बिस्तर वह सब कुछ जो इसे आरामदेह बनाने के लिए आवश्यक था, यहाँ उपलब्ध था। अन्तस मेरे साथ-साथ ही आ गया था।

“ठीक है अब तुम जाओ, मुझे कुछ देर आराम करना है।” मैंने बैग रखते हुए बेरुखी से कहा।

“अगर किस भी चीज की जरूरत हो तो मुझे फोन कर देना।” वो मेरा चेहरा घूरते हुए वापस मुड़ा वो मेरी बेरुखी का कारण जानना चाहता था। मगर फिर वो मेरी इसे मृत्युंजय से मुलाक़ात का परिणाम मानकर चुपचाप बाहर चला गया।

उसके बाहर जाते ही मैंने दरवाजा अन्दर से बन्द कर दिया और अपना फोन निकालकर माँ को फोन किया।

“ताश्री! तुम ठीक तो हो न!” फोन उठाते ही उन्होंने चिंतित होते हुए पूछा।

“मैं ठीक हूँ माँ। मैं मृत्युंजय से मिली थी।” मैंने अपनी आवाज को संयत रखकर कहा। “वो कह रहा था कि वो और आप अच्छे दोस्त थे।”

“बेशक! वो झूठ बोल रहा है।”

“और आप.......एक झूठ तो आपने भी बोला है।” मैंने कहा तो कुछ पल के लिए माँ खामोश हो गयी।

“कैसा झूठ?” उन्होंने गंभीर होकर पूछा।

“उस दिन सूत्र साधना में क्या हुआ था? क्या आपके अंतर्मन में घुसपैठ करने वाला वो तांत्रिक मृत्युंजय ही था?”

“हाँ, वो मृत्युंजय ही था, पर क्यों?” माँ ने इतनी दृढ़ता से कहा कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ झूठ पकड़ने वाली मशीन भी इसे सच ही मानती। मगर मैं सच जानती थी।

“वह कौन था ? सच-सच बताइए माँ! मैं तबतक मृत्युंजय का सामना नहीं कर सकती जबतक यह हकीकत नहीं जान लेती।”

मेरी माँ फिर से कुछ देर के लिए खामोश हो गयी। “वो तांत्रिक मेरे गुरुदेव नित्यानान्द जी थे।” उन्होंने चुप्पी तोड़कर कहा।

“सूत्र साधना की असफलता के बाद गुरुजी दुखी रहने लगे थे। मुझे लगा था कि इसका कारण उन दस सूत्रों की मौत है, जिनका कारण शायद वो खुद को मान रहे थे। मगर अपनी मौत के कुछ दिन पहले उन्होंने मुझे आकर बताया कि सूत्र साधना के असफलता के कारण व खुद थे और उनकी अतृप्त अभिलाषाएँ थी। वो चाहते थे की वो स्वयं भी रुद्र के दर्शन करें, मगर सीधे तौर पर यह संभव नहीं था क्योंकि सूत्र साधना में ग्यारह सूत्रों के अलावा कोई भी और भाग नहीं ले सकता था। अतः उन्होंने छल रचा और मुझे साधना सिखाते वक़्त धीरे-धीरे उन्होंने मेरे अंतर्मन में प्रवेश का एक गुप्त मार्ग बना लिया। सूत्र साधना वाले दिन वो उसी गुप्त मार्ग से मेरे अंतर्मन में आ गए थे। परिणाम स्वरूप सूत्र साधना असफल रही थी।” उन्होंने एक सांस में ही पूरी बात कह दी। “मगर तुम यह क्यों पुछ रही हो?”

“क्योंकि नित्यानंद जी मेरे भी सपनों में आते है।” मैंने रुक कर कहा। “आज तक मेरे सपनों में आके मुझे डराने वाला तांत्रिक और कोई नहीं नित्यानंद जी ही है, आज जब मैंने उनकी तस्वीर देखी तब कहीं जाकर मुझे पता चला।” मैंने सांस लेकर कहा।

“यह असम्भव है। जब तुम उनसे कभी मिली ही नहीं हो तो वो तुम्हारे सपने में कैसे आ सकते है?” मेरी माँ ने वही सवाल पूछा जो उस वक़्त मेरे मन में था।

“हो सकता है सूत्र साधना की आधी सफलता का फायदा मुझे मिला तो उसकी असफलता के परिणाम भी मुझे ही भुगतने पड़े। आपका डर ही मेरा डर बन गया है।” मैंने खुद सारी बात समझाते हुए कहा।

“तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है ताश्री! नित्यानंद जी एक अच्छे इंसान थे। हाँ...... उनसे कुछ गलतियाँ जरूर हुई है मगर उनके ईरादे कभी गलत नहीं थे।”

माँ के फोन रखने के बाद मैं कुछ देर सो गई। उठकर बाहर आई तो अन्तस कहीं नहीं दिखा। मैंने उसे फोन करने के लिए अपना फोन निकाला ही था कि मुझे सामने से मृत्युंजय आता दिखा। मैं जहाँ थी वही खड़ी रह गयी।

“ताश्री! तुम उठ गयी। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।” उसने मुझे अपने साथ चलने का ईशारा किया तो मैं उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

“अन्तस ने तुम्हें बताया तो होगा कि वह तुम्हें यहाँ किस लिए लाया है?” उसने मेरी और देखकर कहा। अब मैं उसे क्या जवाब देती? वह तो मुझे यहाँ मृत्युंजय का खेल ख़त्म करने के लिए लाया था।

“सूत्र साधना.......” मैंने धीरे से कहा। हम उसके ऑफिस तक पहुँच चुके थे।

“बिलकुल सही, देखो यह साधना हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिर्फ दो दिन बचे है उस शुभ मुहूर्त में, हमें उम्मीद है कि तुम तैयार हो?” मृत्युंजय कहते-कहते नित्यानंद जी की तस्वीर के पास गया। मुझे लगा कि वो उन्हें प्रणाम करने के लिए गया है मगर मृत्युंजय ने अपने पिताजी की तस्वीर एक तरफ खिसकाई तो उसके पीछे कुछ बटन दिखे। “अब हम जो तुम्हें दिखाने जा रहे है तुम किसी को नहीं बताओगी।” उसने मेरी ओर देखकर कहा। मैंने हाँ में सर हिला दिया। उसने मेरी ओर देखकर कहा और एक नंबर दबाया। “२१२१” मैं ध्यान से यह नंबर देख रही थी, क्योंकि अन्तस ने मुझसे कहा था कि मुझे नंबर याद रखना था।

मृत्युंजय के नंबर दबाते ही पास वाली दीवार एक तरफ खिसक गई और एक गुप्त रास्ता खुल गया।

“संगठन में तुम्हारा स्वागत है ताश्री!” मृत्युंजय ने अन्दर प्रवेश करते हुए कहा।

“वहां से निचे उतरने पर सामने एक बहुत बड़ा ऑफिस दिखा। यहाँ पर बहुत से कंप्यूटर लगे हुए थे जिनपर कई सारे लोग काम कर रहे थे। यह किसी कंपनी के कॉर्पोरटर ऑफिस जैसा था। कई सारे फोन बज रहे थे जिनका वहां बैठे लोग शान्ति से जवाब दे रहे थे। उनका लहजा शुद्ध हिंदी था और हर फोन उठाने के बाद वो ‘जय महाकाल’ कहते थे।

“यह क्या है?” मैंने आश्चर्य से पूछा। “यह संगठन का मुख्य केंद्र है जहां से देश भर में संगठन की सैकड़ों शाखाओं का संचालन होता है। हमारे हजारों ‘सदस्य’ सीधे हमसे जुड़े रहते है जिससे उनके उद्देश्य की प्राप्ति में उन्हें कोई दिक्कत न हो।”

“जय महाकाल।” मृत्युंजय ने ऊँची आवाज में कहा तो सभी लोग अपना काम जहाँ तक तहाँ छोड़ कर उठ खड़े हुए। “जय महाकाल।” सभी ने एक स्वर में कहा और फिर अपने काम पर लग गये।

“आप सूत्र साधना क्यों करना चाहते है?” मैंने मृत्युंजय की ओर देख कर सवाल दागा। मैं देखना चाहती थी कि आखिर उसके मन में क्या है?

“जानना...... मैं जानना चाहता हूँ कि सूत्र साधना का सत्य क्या है? क्या सच में यह रुद्र से मिलने का रास्ता है या फिर एक दिखावा मात्र है।”

“मतलब की आपको सूत्र साधना पर विश्वास नहीं है?” मैंने आश्चर्य से मृत्युंजय की ओर देखकर कहा।

“विश्वास.........? उसने मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा।

“विश्वास मत करो क्योंकि किसी विद्वान व्यक्ति ने ऐसा कहा है।

विश्वास मत करो क्योंकि तुम्हारी पौराणिक पुस्तकों में ऐसा लिखा है।

विश्वास मत करो क्योंकि कोई दैवीय उत्पत्ति यह कहती है।

विश्वास मत करो क्योंकि कोई और विश्वास करता है।

केवल तभी विश्वास करो, जब तुम स्वयं इसे जांच लो और इसे सत्य मान लो।” वो कुछ देर के लिए रुका। “भगवान बुद्ध ने कहा था। मैं सूत्र साधना पर तबतक विश्वास नहीं कर सकता हूँ जबतक स्वयं इसे परख न लूँ।”

“मगर बुद्ध तो नास्तिक थे।” मैंने अपने अधूरे ज्ञान का पूरा प्रयोग किया।

“कठोपनिषद के दूसरे अध्याय के तेईसवें भाग के बीसवें सूक्त में कहा गया है आत्मा को न वेदों के अध्ययन से समझा जा सजता है और न ही धार्मिक पुस्तकों को सुनने से समझा जा सकता है। इसे केवल वह ही समझ सकता है जिसे यह स्वयं चुनती है। यही मुण्डक उपनिषद में भी कहा गया है।”

‘यहाँ सब ज्ञानी है।’ मैंने मन ही मन में कहा।

“मगर मैं कोई पात्र नहीं हूँ।” मैंने उसे अपनी हथेली दिखाते हुए कहा। वहां कोई त्रिशूल का निशान नहीं था।
 
“ यह आवश्यक भी नहीं है।” उसने हँसकर कहा।

मृत्युंजय से ज्ञान लेने के बाद मैं बाहर आई तो मुझे निचे अन्तस और दिव्या कोई गुप्त मंत्रणा करते दिखे। मैं इनके पास गई तो वो दोनों चुप हो गये।

“कहा गई थी तुम? मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे में ढूँढ कर आया था।” उसने एक बार दिव्या और फिर मेरी ओर देखकर कहा।

“मृत्यंजय महाराज मुझे ‘कॉलेज’ दिखाने ले गए थे।” मैंने कॉलेज पर दबाव देकर कहा जिससे अन्तस इसका असली अर्थ समझ जाए।

“दिव्या मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ।” अन्तस ने दिव्या को जाने का ईशारा करते हुए कहा। मैं और अन्तस दोनों बाहर गार्डन में आ गए।

“तुमने वो नंबर देखा था?” अन्तस ने मुझसे पूछा।

“हाँ वो......” तभी ‘धम्म’ की आवाज आई। मेरे पीछे पेड़ की एक बड़ी सी शाखा गिरी हुई थी। हमने ऊपर देखा तो कोई मजदूर डाल काट रहा था। अन्तस ने गुस्से से उसकी तरफ देखा तो वो बेशर्मी से मुस्कुराया। “माफ़ करना भैया, गलती से गिर गया।”

अन्तस ने उसे फिर गुस्से से देखा मगर फिर मुझे लेकर आगे बढ़ गया।

“तुम क्या कह रहे थे?” मैंने अन्तस से पूछा।

तभी अन्तस का पैर पानी में गिरा। उसके जुते पूरे पानी से सन गए थे।

“ये पानी का नल किसने खुला छोड़ दिया?” अन्तस गुस्से से चिल्लाया। सामने एक पाइप पड़ा था जिससे पानी निकल रहा था, पूरे गार्डन में पानी भर गया था।

“२१२१” मैंने उसे देखकर कहा।

“चलो तुम्हारे कमरे में चलते है।” उसने मुड़ते हुए कहा।

‘अंतर्मन पर नियंत्रण का पहला चरण है कि सामने वाले को यकीन दिलाओ कि वह जो देख रहा है वह बिलकुल वास्तविक है।” अन्तस मुझे अंतर्मन को नियंत्रित करने के कुछ रहस्य बता रहा था।

“फिर उसके लिए एक उद्देश्य पैदा करो, जिसकी प्राप्ति में वो रत हो जाए और इसकी परवाह करना ही छोड़ दे कि यह हकीकत है या भ्रम।” मैं उसे ध्यान से सुन रही थी।

“तीसरा और महत्वपूर्ण चरण है कृतिम भ्रम पैदा करो। यह एक नियंत्रित छल होता है, किसी टिके की तरह। जिससे व्यक्ति को यकीं होता है कि सिर्फ यही भ्रम है बाकी सब सत्य है।“

“चौथे चरण में उस व्यक्ति के उद्देश्य से स्वयं के उद्देश्य का इस तरह से मिलान करना होता है कि उसे एहसास ही न हो कि कब वह तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति में लग गया है। “

“और अंतिम चरण होता है उस व्यक्ति के सपने से बिना किसी छेड़छाड़ के बाहर निकलना।” उसने मुझे समझाते हुए कहा।

“और अगर कभी उस व्यक्ति को पता चल जाए की हम उसके सपने में है तो?” मैंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।

“उसके अंतर्मन के रक्षक तुम्हारे पीछे पड जायेंगे और तुम्हें वहाँ से बाहर निकालकर ही दम लेंगे।” मुझे याग्निक के अंतर्मन का वो कुत्ता याद आ गया।

“और कभी अगर हम खुद किसी के अंतर्मन में सपने की हकीकत भूल जाए तब?”

उसके चेहरे पर चिन्ता की लकीरे उभर आई जैसे मैंने कोई गहरा सवाल पुछ लिया हो।

“नहीं ऐसा कभी नहीं होता है।” उसने उठते हुए कहा।

“क्यों नहीं हो सकता है, तुमने ही तो कहा था कि यह छल संभव है।”

“हाँ मगर छल हम दूसरे के अंतर्मन में करते है।”

“फिर भी अगर अभी ऐसा हो जाए तो।” मैंने जोड़ डालकर पूछा।

“इसके लिए तुम्हें खुद के अंतर्मन के रक्षक तैयार करने होंगे जो ऐसी परिस्थिति में फंसने पर तुम्हें ढूंढ़कर उसके अंतर्मन से बाहर निकालेंगे।”

मैंने हाँ में सर हिला दिया।”

अगले दिन मैं खाना खा कर अपने कमरे में आई ही थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो यह मृत्युंजय था।

“तुम साधना के लिये तैयार तो हो न?” उसने अन्दर आते हुए पूछा।

“हम्म,,,,” ,मैं उसका चेहरा देखने लगी जैसे असली बात का पता लगाना चाहती हूँ।

“ताश्री!” उसने सांस लेकर कहा जैसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा हो। मैं उसे ही देख रही थी।

“हम तुमसे कुछ कहना चाहते है।”

वो बेड पर बैठ गया। उसने मुझे ईशारा किया तो मैंने दरवाजा बन्द कर दिया।

“यह सच जानना तुम्हारे लिए आवश्यक है।

तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी, उनकी हत्या हुई थी। उसने वापस उठते हुए कहा।

“...........और उनकी हत्या मैंने करवाई थी।”

मैं आँखें फाड़कर उसे देखने लगी. मुझे मृत्युंजय से ये उम्मीद कभी नहीं थी. मुझे लगा था कि वो भरसक कोशिश करेगा कि यह बात मुझे पता न चले. मगर यहाँ तो वो खुद मुझे बता रहा था.

“किस लिए?” मैंने अपने गुस्से को शांत रखकर पुछा. मैं हकीकत जानती थी मगर फिर भी देखना चाहती थी कि मृत्युंजय क्या कहता है? मुझे इस तरह शांत देखकर उसे आश्चर्य हुआ.

“अन्तस ने अगर तुम्हें संगठन के बारे में बताया होगा तो यह भी बताया होगा कि संगठन के कुछ सिद्धांत है जिसमें से एक सिद्धांत यह भी है कि हम संगठन के रहस्यों की रक्षा के लिए प्राण दे भी सकते है और प्राण ले भी सकते है. अफ़सोस की तुम्हारे पिता इसी सिद्धांत की बलि चढ़े थे. वह संगठन के कुछ ऐसे रहस्य जान गए थे जो उन्हें नहीं जानने चाहिए थे. फलस्वरूप संगठन कि रक्षा हेतु हमें विवशता वश वो करना पड़ा जो हम नहीं करना चाहते थे.”

“विवशता...... रहस्य...... सिद्धांत....... बलि.....” मैं मृत्युंजय को घूरते हुए एक-एक शब्द जोर देकर कहते गयी.

“संगठन के ऐसे कौन से रहस्य थे कि जिनकी रक्षा के लिए किसी की जान लेने कि आवश्यकता पड गयी, किसी का गुप्त होना तभी आवश्यक होता है जब वो अनुचित हो या फिर उसे डर लगता हो. संगठन किस बात से डरता है?”

“कुछ रहस्य इतने मूल्यवान होते है कि उनकी रक्षा अनिवार्य होती है. संगठन सैकड़ों वर्षों कि मेहनत का परिणाम है.”

“आपका संगठन एक भ्रम मात्र है, एक झूठा विश्वास जिसे संगठित तौर पर हजारों लोग ढो रहे है. इनके रहस्य और कुछ नहीं है एक पेंडुलम है जिसे दिखा कर तुम इस संगठन के सदस्यों को वशीकृत रखते हो और शायद तुम स्वयं इसके प्रभाव में हो. अफ़सोस इस झूठे भ्रम की रक्षा में मेरे पिता और न जाने कितने मासूमों कि जान गयी है.” मेरी आँखें छलक आई थी.

“हो सकता है की तुम सही हो, मगर फिर भी जब कोई विश्वास एक जनसमूह द्वारा लम्बे समय तक अपनाया जाता है, वह सत्य बन जाता है, एक ऐसा सत्य जिसे नकारना नामुमकिन होता है. संगठन एक ऐसा ही सत्य है. सही या गलत हम इसे नकार नहीं सकते.”

“………. लेकिन तुम यह सब मुझे क्यों बता रहे हो.” मैंने भरी हुई आवाज में कहा. “जिस बात को तुमने इतने समय तक गुप्त रखा उसे आज बताने कि जरूरत कैसे महसूस हुई.”

“प्रायश्चित........” उसने बिलकुल धीरे से कहा. “तुम्हारे पिता की हत्या मेरा सबसे निष्कृष्टम् निर्णय था जिसका मुझे आज तक अफ़सोस है. अवन्तिका से मेरा जो भी रिश्ता रहा हो रणवीर से मेरा कभी बैर नहीं रहा. उसकी हत्या का पाप आज भी मेरी अंतरात्मा को कचोटता है. उस दुष्कर्म का संताप मेरी आत्मा को अग्नि की भाँति जलाता है. इसीलिए मैंने अन्तस को तुम्हें यहाँ लाने के लिए कहा था ताकि मैं तुमसे अपने अपराधों के लिए क्षमा मांग सकूं. इससे शायद मुझे कुछ शांति मिल सके.” उसने बिलकुल दुखी होकर कहा, जैसे उसे सच में इसका अफ़सोस हो.

‘तुम्हें लगता है मैं तुम्हें माफ कर दूंगी?” मैंने उसे घूरकर कहा.

“नहीं..... बिलकुल नहीं. कुछ गुनाहों कि कभी माफ़ी नहीं होती. तुम मुझे जो चाहो वो सजा दे सकती हो. उसने हाथ जोड़ते हुए कहा. उसकी आँखों से आंसुओं कि कुछ बुंदे छलक आई थी. “मुझे इस भार से मुक्ति चाहिए.” उसने कातर दृष्टि से मेरी और देखकर कर कहा जैसे मेरा निर्णय जानना चाहता हो. मैं बिलकुल तटस्थ थी.

“तुम पुलिस में समर्पण कर दो. मैंने निर्दयता से कहा. वो मेरी और देखने लगा जैसे उसे ऐसे निर्णय कि अपेक्षा न थी.

“ठीक है, जैसा तुम चाहो. मगर...........” उसने एक पल रुककर मुझे देखा. “मेरी एक अंतिम इक्षा है..... मैं मेरे पिता और तुम्हारी माँ को सूत्र साधना कि असफलता के कलंक से मुक्ति दिलाना चाहता हूँ. अवन्तिका की पुत्री और नित्यानंद का पुत्र अगर सूत्र साधना में सफल हो जाते हैं तो उन पर लगे कलंक हमेशा के लिए मिट सकते हैं . मैं सूत्र साधना करना चाहता हूँ.” उसने मेरी ओर देखकर कहा.

तुम फिर से ग्यारह जिंदगियां दांव पर लगा रहे हो मैंने उससे सीधा प्रश्न किया. अब तक के घटनाक्रम से मेरे मन में उसके प्रति भय बिलकुल ख़त्म हो चूका था .

“नहीं , ऐसा कुछ नहीं होगा . मेरे पिता से यह गलती हुई थी कि उन्होंने बाकी सूत्रों को एक माध्यम मात्र माना था किन्तु मैंने सभी सूत्रों को व्यक्तिगत रूप से दीक्षा दी है . वे सब सामान रूप से समर्थ है जितना कि ग्यारहवां सूत्र है वे सब अपनी रक्षा कर सकते है .” उसने कुछ विश्वास और कुछ गर्व से कहा .

“मैं तैयार हूँ.” मैंने कुछ सोचकर कहा. “मगर तुम्हारी परिणीत निश्चित है,” मैंने उसे फिर से याद दिलाया कि मैं किस शर्त पर हुई हूँ. उसने हाँ में सर हिला दिया.

.............................................................................................................................................

मृत्युंजय के जाते ही मैं अन्तस के पास गयी. मैं उसे बताना चाहती थी कि मृत्युंजय ने खुद अपना गुनाह कबूल कर लिया है. वो मुझे उसके कमरे में ही मिल गया. मुझे इतना परेशान देखकर वह समझ गया कि कुछ गंभीर मामला है. वो मेरी ओर जिज्ञासा से देखने लगा.

“मृत्युंजय ने खुद मुझे बता दिया कि उसी ने मेरे पिता की हत्या कि थी.” मैंने झुंझलाते हुए कहा. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैंने जो निर्णय लिया वो सही था या नहीं.

“और तुमने क्या कहा?” उसने दरवाजा बंद करते हुए कहा.

“यही कि वह पुलिस में समर्पण कर दे.” मैंने गर्व के भाव से कहा.

“और वो मान गया?” उसने मेरे चेहरे के भाव पढ़ते हुए पुछा.

‘हां......मगर वो पहले सूत्र साधना करना चाहता है.” उसने मुझे इस तरह देखा मानो पुछ रहा हो कि मेरा निर्णय क्या है?

“वो अपने पिता को सूत्र साधना कि असफलता के कलंक से मुक्त करना चाहता है.” मैंने अपने निर्णय का कारण उसे बता दिया.

“और तुम क्या चाहती हो?”

“मैं भी अपनी माँ के लिये वही चाहती हूँ.”

“मैं सूत्र साधना करूँगी.” मैंने स्पष्ट किया.

‘वो तो तुम वैसे भी करने ही वाली थी.” अन्तस ने मुस्कुरा कर कहा. मैं उसे घूरने लगी जैसे उसकी मुस्कराहट का रहस्य जानना चाहती हूँ.

“तुमने यह नहीं सोचा कि जब तुम पहले से ही सूत्र साधना के लिए तैयार थी तो मृत्युंजय ने तुम्हें सच बताकर व्यर्थ का ख़तरा क्यों लिया?”

मैं उसके ओर देखने लगी. दरअसल मैं उसे प्रायश्चित वाली बात बताना नहीं चाहती थी. क्योंकि मुझे खुद पर विश्वास नहीं था.

“मैंने तुमसे पहले ही कहा था मृत्युंजय छल में पारंगत है. अंतर्मन पर नियंत्रण का तीसरा सिद्धांत.......” उसने मुझे याद दिलाया. “कृतिम भ्रम पैदा करो. एक नियंत्रित छल... जिससे व्यक्ति को लगे कि सिर्फ यही भ्रम है.” मैं अन्तस को ताकने लगी क्योंकि मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया था.

“मृत्युंजय जानता था कि हो सकता है कि तुम पहले से उसके बारे में जानती हो और अगर ऐसा है तो तुम उसके प्रति सचेत भी हो. इसलिए उसने स्वयं तुम्हें बताया ताकि तुम उसके प्रति निश्चिंत हो जाओ.” उसने रुककर मेरी ओर देखा. ‘विश्वास ही वो गुप्त मार्ग है जिससे हम किसी के अंतर्मन में प्रवेश कर सकते है.”

“तो अब?” मैं मुंह खोले उसे देखने लगी. मुझे तो अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

“मैं तुम्हें किसी से मिलवाना चाहता हूँ.” उसने दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलते हुए कहा. मैं भी उसके पीछे-पीछे चल दी.

हम एक गुप्त मार्ग से संगठन में पहुंचे और एक कमरे के दरवाज़े के सामने खड़े हो गये. अन्तस ने दरवाज़ा खोला तो सामने जमीन पर दस लडकियां बैठी थी, उनके सामने एक लड़की हमारी तरफ पीठ करके बैठी थी. सबकी आँखें बंद थी. हमने कुछ देर प्रतीक्षा कि.

‘दिव्या......, ताश्री तुमसे मिलना चाहती है.” उनके आँखें खोलने पर अन्तस ने कहा. दिव्या ने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

सूत्र साधना का समय आ चूका था. हम सब उसी बड़े हॉल में थे. वहाँ से सारे कम्प्यूटर हटा कर जगह बना दी गयी थी. वहाँ हजारों तांत्रिक खड़े थे. सामने एक मंच बनाया गया था, जहाँ मैं, मृत्युंजय और बाकी दस लड़कियों के साथ खड़ी थी. मंच पर ही एक हवन कुण्ड बनाया गया था. जिसके एक तरफ मेरे बैठने की व्यवस्था थी. वही सामने कतार से बाकी सूत्रों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. सामने ही एक बड़ा सा आसन था, जो शायद मृत्युंजय ने स्वयं के लिए लगवाया था. शायद वो अब भी विशेष होने के मोह से मुक्त नहीं हो पाया था.

सभी लोग काले वस्त्रों में थे. मुझे भी वैसे ही कपडे पहनाये गए थे. मेरे असली कपडे, मोबाइल सब इन्होंने पहले ही ले लिया था. अन्तस यहाँ मौजूद नहीं था, उसे होना भी नहीं था.

मृत्युंजय आगे आया और गरजती हुई आवाज में बोलना शुरू किया.

“उस रात्रि कि तरह जो सूर्योदय के पूर्व सर्वाधिक अन्धकारमय होती है.

उस दिन कि तरह जो बरसात से पहले सर्वाधिक गर्म होता है.

उस लोहे कि तरह जो ढलने से पहले सबसे जादा कमजोर होता है.

इन सबकी तरह हम सब श्रेष्ठ होने से पूर्व पतित है. लोग हमें महान या पतित के रूप में देख सकते है. मगर हम वही है जो हम बनना चाहते है. हम महान नहीं है और शायद बन भी ना पाए मगर इसका अर्थ तो नहीं है कि हम इसका प्रयास ही न करें.”

“जय महाकाल.”

“जय महाकाल.” सभी लोगों ने एक स्वर में कहा.

मैं अपनी जगह पर बैठ गयी. वो लडकियां और मृत्युंजय भी अपनी जगह पर बैठ गए थे. एक तांत्रिक आया और हवन की आग जलाने लगा.

“इसकी कोई जरूरत नहीं है.” मैंने उसे रोकते हुए कहा. मृत्युंजय मुझे घूरने लगा. सभी लोग कानाफूसी करने लगे.

“तुम सब मेरी आँखों में देखना.” मैंने अपना चश्मा उतारते हुए उन दसों लड़कियों से कहा.

मेरी आँखों के सामने उजाला हुआ और मैं एक मरुस्थल में थी। चारों तरफ रेत ही रेत थी। सांयसांय कर गर्म हवाएं चल रहीं थी। बस रेत के बड़े-बड़े टीले दिखाई दे रहे थे। आसमान बिलकुल खाली था, कहीं बादल का एक टुकड़ा भी नहीं था। मैं आगे चलने लगी। कुछ चलने पर मुझे दूर कुछ दिखाई दिया। मैं और पास गयी तो यह साफ़ दिखने लगा था, यह एक महल था, पूरा रेत से बना हुआ महल!

मेरे सामने जाते ही उस महल का दरवाज़ा खुल गया। सामने एक बड़ा सा हॉल था, मेरे अन्दर जाते ही वो दरवाज़ा वापस बंद हो गया। यहाँ अन्दर भी रेत ही रेत थी पर चारों तरफ कुछ दरवाज़े थे। मैं एक दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी। अन्दर एक गलियारा था जिस पर कुछ अजीब पेंटिंग्स लगी हुई थी। मैं उस पेंटिंग्स को देखते हुए आगे बढ़ने लगी। ये कुछ अजीब से निशान थे जिन्हें समझाना मेरे बस से तो बाहर था। मैं जैसे ही कुछ आगे बढ़ी मेरे पीछे एक और दरवाज़ा बंद हो गया था। मैं रुक कर उसे देखने लगी, तभी मुझे एक आवाज सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई मदद के लिए पुकार रहा हो। मैं तेज़ी से उस ओर भागी। मैं वहां पहुंची तो देखा कि एक जेलनुमा कमरे में मेरे पिता पड़े थे और उनके सीने में चाक़ू गडा हुआ था। मैं उनके पास गयी तो उन्होंने कहा, ‘भागो ताश्री! वो यहीं है।” मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वही तांत्रिक खड़ा था काले कपड़ों में, गले में माला, लाल आँखें, हाथ में त्रिशूल......... । मैं उसे देखकर भागने लगी। वो भी मेरे पीछे ही भागने लगा। ‘तुम ग्यारहवां सूत्र हो’ वो चिल्ला रहा था। मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी मेरे पीछे दरवाज़े बंद होते जा रहे थे। तभी मैं अचानक रुक गयी। वो तांत्रिक भी मुझसे कुछ कदम दूर ही रुक गया। ‘तुम ग्यारहवां सूत्र हो’ उसने धीमी आवाज में कहा, जैसे वो भी दौड़ते दौड़ते थक गया हो।
 
“मैं ताश्री हूँ।” मैंने उसके पास जाते हुए कहा। “मैं कोई ग्यारहवां सूत्र नहीं हूँ गुरुदेव!” मैं उनका चेहरा साफ़ देख सकती थी। यह वही चेहरा था जो उस तस्वीर में था। “हम सभी हैं।” उन्होंने मुस्कुराकर कहा और रेत बन कर फर्श पर गिर गये। वहाँ सिर्फ वो त्रिशूल बची थी, जो उनके हाथ में थी।

“मेरे अंतर्मन में तुम्हारा स्वागत है ताश्री।” एक आवाज गूंजी यह मृत्युंजय की थी। “जिज्ञासा एक बुरी चीज है ताश्री! यह अक्सर हमसे वह करवाती है जो हमें नहीं करना चाहिए।” मैंने वो त्रिशूल उठा लिया। “किसी के अन्तर्मन पर नियंत्रण का सबसे आसान तरीका है उसके डर को समझना। हम मंत्र के प्रयोग से व्यक्ति को खिलौने कि तरह नचा सकते हैं।” उसने कहा। मैं इस कमरे कि दीवारों को देखने लगी जो पूरी तरह से रेत से बनी हुई थी। इस महल को बहुत ही सोच समझकर बनाया गया था। रेत कोई निशान नहीं छोड़ती, यह भावशून्यता का प्रतीक है, बल्कि मृत्युंजय के पूरे अंतर्मन में ही कहीं पानी नहीं था, यादों को छिपाने का एक सोचा समझा तरीका....... यह एक स्वनिर्मित अंतर्मन था जिसका एक-एक हिस्सा मृत्युंजय ने खुद तैयार किया था और मैं अब उसके छल के सबसे मजबूत किले में कैद थी। एक अन्तिम दरवाज़ा बंद हुआ और अब मैं एक छोटे से कमरे में कैद थी।

“यह सब किसलिए? तुम आखिर चाहते क्या हो?” मैंने दरवाज़े कि सलाखें पकड़ते हुए कहा।

“पहिये की खोज किसने कि थी?” वो मेरे सामने सलाखों के उस पार प्रकट हुआ। “वह कौन था जिसने पहली नाव बनाई थी या फिर वो जिसने पहली खेती की होगी? घडी का आविष्कारक........ कपड़ों का....... या पहले कागज़ और पेन का...... या फिर तुम्हारे चश्मे के लेंस का..... इन सब के आविष्कारक कौन थे? कौन थे जिन्होंने ये सृजन किये थे..... हम नहीं जानते। इतिहास सृजनकर्ताओ को याद नहीं रखता, वह सिर्फ विनाशकों को याद रखता है।” उसकी आवाज इतनी तेज़ थी कि पूरे महल में गूंज रही थी मगर उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। । “कौन सा युद्ध कब हुआ था? कौन जीता कौन हारा....... कितने लोग मरे। हम यह याद रखते है। पहला और दूसरा विश्वयुद्ध, इन्हें तो हमने समय मापने कि इकाई बना दिया है। हम विनाशकों को महिमामण्डित करते है, उनकी मूर्तियाँ लगाते है उनकी याद में कवितायेँ सुनाते है और सृजनकर्ता? वे इतिहास की धुल में दब कर रह जाते है.....” वो एक पल रुका और फिर बोलता रहा।

“मेरे पिता एक अच्छे इन्सान थे, वे सृजन करना चाहते थे मगर अफ़सोस इतिहास उन्हें याद नहीं रखेगा। यह उसकी विशेषता ही नहीं है। मैं वो भूल नहीं करूँगा, ,मैं कुछ ऐसा करूँगा की इतिहास सदियों तक मुझे याद रखेगा। तुम्हें एक उपहार मिला है ताश्री! तुम्हारी आँखों में एक अद्भुत शक्ति है, यह शक्ति कुछ मनचलों से स्वयं का बचाव करने या फिर किसी के अंतर्मन से खेलने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, इसका उचित प्रयोग होना चाहिए, दुनिया को पता चलना चाहिए कि तुम चमत्कार हो, तंत्र का चमत्कार........ हजारों तांत्रिकों की मेहनत का परिणाम! लोगों को पता चलाना चाहिए कि तंत्र शास्त्र और तांत्रिक कोई मज़ाक नहीं है, वो कुछ ऐसा अद्भुत भी कर सकते है। हमें तुम्हारी ताकत को दुनिया के सामने लाना होगा।” वो मेरी ओर देखने लगा जैसे मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहता हो।

“तुम विज्ञान कि बात कर रहे हो, मैं तुम्हें विज्ञान के बारे में बताती हूँ।” मैंने कुछ पल सोचा और कहा। “ 1997 में नासा ने अन्तरिक्ष में वायेजर नाम का एक यान प्रक्षेपित किया था। यह यान अभी पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर है और आने वाले वर्षों में हजारों वर्षों तक ब्रम्हाण्ड की यात्रा करता रहेगा। इस यान में एक रिकार्ड है जिसमें पृथ्वी से जुडी आवाजें, चित्र आदि है ताकि भविष्य में अगर किसी बुद्धिमान जीव को यह मिले तो वह पृथ्वी के बारे में जान सके और यकीन मानो मृत्युंजय उस रिकार्ड में किसी भी विनाशक का नामों निशान तक नहीं होगा। वहाँ सिर्फ सृजनकर्ता ही है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इतिहास किसे याद रखता है, महत्वपूर्ण यह है कि भविष्य किसे याद रखता है, यह हमारे ऊपर है कि हम क्या बनना चाहते है? अपने इतिहास कि परछाई या फिर भविष्य की चमक............” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और फिर मुस्कुराया, जैसे मेरी बात उसे कोई नादानी लगी हो।

“मैं जानता था तुम नहीं मानोगी, इसीलिए मैंने यह योजना बनाई थी। काल के क्रम में सिर्फ शक्तिशाली बचता है, कमज़ोर हमेशा विलुप्त हो जाता है। तुम इस शक्ति को संभालने के योग्य नहीं हो इसलिए अब तुम्हारा अंतर्मन हमेशा के लिए यहीं कैद रहेगा। मैं तंत्र कि सहायता से तुम्हारी शक्ति वहां मौजूद हजारों तांत्रिकों तक पहुंचा दूंगा। उनमें से प्रत्येक के पास वह ताकत होगी जो तुम्हारे पास है और तब विश्व को तांत्रिक समाज की ताकत पता चलेगी। हम एक शक्तिशाली समाज बनकर उभरेंगे जो युगों तक जाना और माना जायेगा। हम ही भविष्य है”। उसने ठहाका लगाकर कहा। मैंने अपना सर झटका। मृत्युंजय, मैंने जितना सोचा था उससे भी जादा खतरनाक था। उसने सोच समझकर एक छल रचा था ताकि वो मेरा फायदा उठा सके, और मैं आसानी से उसके जाल में फंस गयी थी। मैं इधर-उधर देखने लगी मगर मुझे कुछ भी ऐसा नहीं दिख रहा था जिससे यहाँ से बाहर निकला जा सके। तभी मुझे कुछ याद आया। मैंने अपनी आँखें बंद की।

“कोई फायदा नहीं है। तुम किसी भी हालत में यहाँ से बाहर नहीं निकल सकती।” मृत्युंजय ने मुझे आँखें बंद करते हुई देखकर कहा।

“तुमने इस महल को कितनी भी बारीकी से क्यों ना बनाया हो मगर तुमने एक भूल कर दी।” मृत्युंजय मुझे घूरने लगा। “तुमने इसे रेत से बनाया है।” मैंने अपनी आँखें खोल दी। बाहर बादलों के गरजने कि आवाज आई। मृत्युंजय ने दौड़कर खिड़की से बाहर देखा। “यह असंभव है, इस रेगिस्तान में कभी बारिश नहीं होती है।”

“तुम भूल गए मृत्युंजय, हम दूसरों के अंतर्मन में ज्यादा शक्तिशाली होते है। हम अभी तुम्हारे अंतर्मन में है।” बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गयी।

इस महल की दीवारें, छत सब गलने लगीं। कुछ ही देर में सिर्फ रेत ही रेत बची थी।

‘मैं ताश्री हूँ बेवकूफ!” मैंने मुस्कुराकर मृत्युंजय की तरफ देखकर कहा। ऊपर काले बादलों से घिरा आसमान दिख रहा था। चारों तरफ उस महल के बड़े-बड़े टूकडे दिख रहे थे। मैं वहाँ से बाहर निकलने लगी।

“ तुम कुछ भी हो, यहाँ से बच कर नहीं जा सकती।” उसने गुस्से से मेरी ओर देखा और मेरी तरफ बढ़ने लगा।

“तुम्हें लगता है तुम अपनी बेटी से लड़ पाओगे?” मैंने कहा।

“तुम मेरी बेटी नहीं हो।” मृत्युंजय ने झल्ला कर कहा।

“मैंने ऐसा कब कहा?” मैंने आसमान कि तरफ देखते हुए कहा। वहाँ से उड़ते हुए घोड़ों से बंधी एक बग्घी आ रही थी जिसे दिव्या चला रही थी।

“क्षमा करना हमें पहुँचने में विलम्ब हो गया।” जैसे ही वो बग्घी जमीन पर उतरी दिव्या ने उतरते हुए कहा।

“नहीं तुम बिल्कुल सही समय पर आई हो।” मैंने मुस्कुराकर कहा।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?” मृत्युंजय ने गुस्से से दिव्या कि तरफ देखते हुए कहा।

‘यही सवाल तो मैं भी आपसे पुछ सकती हूँ। ताश्री को पहले ही आपके गलत इरादों का अंदेशा हो गया था। इसलिए उसने मुझे पहले ही अपने अंतर्मन में बुला लिया था। ताश्री को जाने दीजिये पिताजी।”

“मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, तंत्र और तांत्रिक समाज कि भलाई के लिए कर रहा हूँ। तंत्र विलुप्त होने की कगार पर है और उसे बचाने का यही एक मात्र रास्ता है।”

“तंत्र को किसी की रक्षा कि आवश्यकता नहीं है, कम से कम आप जैसे रक्षक कि तो नहीं।” दिव्या ने घृणा से कहा।

“तुम्हें उसका परिणाम भुगतना पडेगा।” मृत्युंजय ने गुस्से से कहा।

“क्यों नहीं...... ताश्री, तुम जाओ, इनसे मैं निपट लुंगी।” दिव्या ने मुझे जाने का इशारा कर कहा।

“मैं बग्घी पर सवार हो गयी। “अलविदा मृत्युंजय! फिर मिलते है।” मैंने मृत्युंजय से कहा और अपनी आँखें बंद कर ली, एक सफ़ेद प्रकाश हुआ और मैं एक घास के हरे भरे मैदान में थी। मैंने घोड़ों कि लगाम खींची और वे हवा में उड़ गये। पहले जंगल, फिर समुद्र, फिर पहाड़ के ऊपर से उड़ते हुए हम बर्फ कि सफ़ेद चोटियों तक पहुँच गये। अंत में हम उस गुफा तक पहुंचे। मैंने बग्घी को खोल दिया और जाने का इशारा किया। वो जाने को तैयार नहीं थे। “तुम अपना मकसद पूरा कर चुकी हो अब तुम लौट जाओ, मेरी चिंता मत करो मैं जल्द ही लौट आऊंगी। उन्होंने हाँ में सर हिलाया और फिर हवा में उड़ गये। मैं कुछ देर उन्हें उड़ते हुए देखती रही। फिर मैंने उस गुफा कि तरफ देखा और फिर एक निःश्वास लेकर गुफा कि तरफ बढ़ गयी। कुछ अन्दर जाने पर मुझे एक दरवाज़ा दिखा। यह बंद था। मैंने थोडा ढूंढा तो मुझे वो पत्थर दिख गया जिसपर त्रिशूल का निशान था। मैंने अपने हाथ में जो त्रिशूल था उसे उस निशान पर रख दिया।

“ठहरो......... कौन हो तुम?” एक आवाज गूंजी।

“मैं ताश्री हूँ।” मैंने कहा।

“मैं ताश्री हूँ।” मैंने कहा।

“यहाँ क्यों आई हो?” उस आवाज ने गरजते हुए पूछा।

“मुझे रुद्र से मिलना है।” मैंने एक पल रुककर कहा।

“रुद्र किसी से नहीं मिलते।” उसने कहा। “तुम तो पात्र भी नहीं हो।”

“हम सब है, मुझसे किसी ने कहा था।” मैंने असमंजस में कहा।

“ठीक है। मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो, फिर तुम अन्दर जा सकती हो। उसने थोडा सा ढीला पड़ते हुए कहा।

“तुम अगर कोई आध्यात्मिक पहेली पुछने वाले हो तो रहने दो, मैंने कोई शास्त्र-वास्त्र नहीं पढ़े हैं।” मैंने बेरुखी से कहा।

“मैं तुमसे वो पुछ ही नहीं सकता हूँ जो तुम्हें ज्ञात न हो।”

वह कुछ देर रुका और फिर बोलना शुरू किया।

“एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया।

लडके ने लड़की को क्यों मारा, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था?

मैं उसके सवाल का एक-एक शब्द बहुत ध्यान से सुन रही थी, मगर अंत तक आते-आते मैं चौंक गयी। ‘ये कैसा बेतुका सवाल है।’ मैंने मन ही मन में कहा। मैं अपने दीमाग पर जोर डालने लगी मगर उस सवाल का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। लड़का अगर लड़की से प्यार करता तो वो उसे क्यों मारेगा? अगर लड़की को कोई खतरा था तो उसे लड़की को बचना चाहिए था, मारने से क्या होगा?

“क्या हुआ?” मुझे परेशान देखकर फिर से वो आवाज आई।

“बड़ा अजीब सवाल है। मुझे नहीं लगता है कि मैं इसका जवाब जानती हूँ। तुम कोई दूसरा सवाल पूछो।” मैंने निराश होकर कहा।

“कोई दूसरा सवाल नहीं है, सिर्फ एक ही सवाल है। एक ही होता है, जिसका जवाब ढूंढना होता है। मैंने कहा था तुम जवाब जानती हो, बस तुम्हें समझना है।”

“नहीं! मैं नहीं जानती।” मैंने झुंझलाकर कहा।

“तब तुम वापस लौट सकती हो।”

“नहीं मैं वापस नहीं लौट सकती। यहाँ तक पहुँचने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है?” मैंने घबराकर कहा। मुझे लगा था मैं मेरी माँ से बेहतर हूँ, मगर मैं तो उतना भी नहीं कर पाई थी जो उन्होंने आसानी से कर दिया था। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था।

“कोई दूसरा रास्ता नहीं है।” उस आवाज ने कहा।

“हमेशा से एक दूसरा रास्ता होता है।” मैंने विश्वास से कहा और अपनी आँखें बंद की। वो दरवाजा मुड़ने लगा, कुछ ही देर में वो टूटकर निचे गिर गया। “मैंने कहा था न!” मैंने मुस्कुराकर कहा और आगे बढ़ गयी।
 
“आगे सब कुछ वैसा ही था जैसा मेरी माँ ने कहा था। एक पानी का तालाब, आगे हरा भरा मैदान और उससे आगे एक पर्वत था। यह बाहर के वातावरण से बिल्कुल अलग था। मैंने एक बार उस पर्वत कि तरफ देखा और फिर आगे बढ़ने लगी। काफी देर चलने के बाद आखिर मैं उस पर्वत के ऊपर पहुँच ही गयी। मगर यह क्या? यहाँ तो कुछ भी नहीं था। थोडा सा खुला मैदान था और फिर आगे एक गहरी खाई थी।

“यह क्या है, रुद्र कहाँ है?” मैंने झल्लाकर कहा।

“वो यहीं हैं, मगर तुम उन्हें तबतक नहीं देख सकती जबतक तुम उस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ लेती।” फिर से वो आवाज गुंजी।

“क्या बकवास है? मैं इतनी मेहनत से यहाँ आई हूँ, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?” मैंने गुस्से से कहा।

“मैंने तुम्हें पहले ही कहा था। तुम्हें जब उस सवाल का जवाब मिल जाए तुम वापस आ सकती हो।” एक तेज़ रोशनी चमकने लगी। “नहीं।” मैं जोर से चिल्लाई। वो रोशनी चारों तरफ फ़ैल गयी और मेरी आँखें खुल गयी।

सूत्र साधना को शुरू हुए तीन घंटे हुए थे। मेरे जागने के आधे घंटे पहले ही मृत्युंजय भी जागा था, मगर इस आधे घंटे में ही उसने अपना खेल रच दिया था।

जब मुझे होश आया तब मैंने देखा कि वो दस लडकियां बेहोश पड़ी हुई थी, मगर वे सभी सुरक्षित थीं। सारे तांत्रिक गुस्से से मेरी ओर देख रहे थी।

“तुम रुद्र से मिली?” मेरे जागते ही मृत्युंजय ने पूछा। उसकी आवाज इतनी शालीन थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने ना में सर हिला दिया।

“तुम मिल भी नहीं सकती थी।” वह गुस्से से मेरी ओर देख कर बोला। “मैंने कहा था साथियों इस लड़की ने छल किया है....... यह अपवित्र है।” मृत्युंजय ने मेरी ओर घृणा भरी नज़रों से देखकर सभी तांत्रिकों को संबोधित करते हुए कहा। अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने चश्मा नहीं पहना है मगर मैं किसी के अंतर्मन में नहीं थी।

‘संगठन की वर्षों की मेहनत इस लड़की के वासना कि अग्नि में स्वाहा हो गयी।” मृत्युंजय ने आवेश में कहा। सभी तांत्रिक आपस में बात करने लगे जैसे कोई निर्णय ले रहे हो। “इसको इसके किये का दण्ड मिलना चाहिए।” एक तांत्रिक चिल्लाया। “हां..... सूत्र साधना कि असफलता के कारक को दण्ड मिलना ही चाहिए।” दूसरा तांत्रिक भी चिल्लाया और फिर कोहराम मचने लगा।

“बेशक मिलना चाहिये।” मैंने उठकर कहा। “सूत्र साधना की असफलता के कारक को दण्ड मिलना ही चाहिए। यही वो व्यक्ति है जिसने मेरे अंतर्मन में घुसपैठ कि थी।” मैंने अपना बचाव करते हुए कहा।

“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे.......” मृत्युंजय ने हंसते हुए कहा। “यह लड़की अपनी असफलता का भार मुझ पर लादना चाहती है। मैं ही वो व्यक्ति हूँ जिसने इस साधना के लिए सर्वाधिक परिश्रम किया था, भला मैं इसे असफल क्यों बनाना चाहूंगा?”

“तुम असफलता के कलंक से बचने के लिए बकवास बातें कर रही हो, बल्कि हकीकत यह है कि इसकी असफलता की मात्र तुम जिम्मेदार हो।” मृत्युंजय के चेहरे पर उसकी कुटिलता साफ़ नजर आ रही थी।

“जिम्मेदार वही होते है, जो प्रयास करते है।” मैंने मृत्युंजय कि आँखों में आँखे डालकर कहा। इस बार वो मेरी आँखों में खुद के प्रति नफ़रत साफ़ देख सकता था। “क्यों हर बार साधना के लिए बाहर से कुछ मासूमों को बुलाया जाता है?” मैंने सभी तांत्रिकों की तरफ देखकर गरजते हुए पूछा।

“क्यों आप तांत्रिकों में से कोई इस साधना के लिए सूत्र नहीं बनता है?” सब मेरी ओर ही देख रहे थे। “क्योंकि आप जानते है कि इस साधना में जान का खतरा है। आप इसकी सफलता का फल तो लेना चाहते है मगर इसकी असफलता का काल दंश नहीं सहना चाहते। किसी पर असफलता का लांछन लगाना आसान होता है, मगर कोशिश करना मुश्किल होता है।”

मुझे लगा था कि मेरी इस बात का उनपर कोई असर होगा, मगर उन्हें यह मेरी असफलता पर सफाई भर लगी। दरअसल इंसान वही सुनता है जो उसे अच्छी लगती है। फिलहाल मेरी हर बात उनका गुस्सा और बढ़ा रही थी।

“इसे मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।” मृत्युंजय ने मेरे पास आते हुए कहा। “हाँ इसे मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।” फिर से एक तांत्रिक ने हाँ में हाँ मिलाई। “मृत्यु दण्ड..... मृत्यु दण्ड..........” और सभी एक स्वर में चिल्लाने लगें। हर इंसान के मन में एक गुस्सा भरा होता है, उसे बस एक अवसर चाहिए उस गुस्से को बाहर निकालने के लिये....... फिलहाल वो अवसर मैं थी।

“मैं मृत्युंजय हूँ......” मृत्युंजय ने मेरे पास आकर धीरे से कहा। “.........तुम छल में कभी मुझसे नहीं जीत सकती।” उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी।

“हाँ.... मगर तंत्र में जीत सकती हूँ।” मैंने मुस्कुराकर कहा।

मैंने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद की और फिर दुबारा खोल कर उन तांत्रिकों की ओर देखने लगी। उनके चिल्लाने कि आवाज कम पड़ने लगी थी और सब मंत्रमुग्ध होकर मेरी ओर देखने लगे। कुछ देर बाद एक-एक कर वो सब बेहोश होने लगें। एक मिनट से भी कम समय में सारे तांत्रिक जमीन पर पड़े थे। मृत्युंजय हक्का-बक्का मुझे यह सब करते देख रहा था।

“रवि!” मैंने कहा तो मृत्युंजय मेरे मुंह से अपना असली नाम सुनकर चौंक गया। “मुझे नहीं मालूम की तुम तंत्र को कितनी गंभीरता से लेते हो, मगर मैं इसे बचपन से जीती आई हूँ।” मैंने उसकी आँखों में देखा और कुछ ही पल में वो भी जमीन पर पड़ा था।

उस हॉल में हजारों तांत्रिक एक साथ बेहोश पड़े थे। उनकी साँसों की आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं थी। मैं हमेशा से यह करना चाहती थी, यह मेरी सम्मोहित करने की ताकत की पराकाष्ठा थी। मगर मेरा सर तेजी से दर्द कर रहा था और शायद मुझे डर भी लग रहा था। शायद भय स्त्री का स्वाभाविक गुण है।

मैं तेज़ी से वहाँ से बाहर निकली और अन्तस के कमरे की तरफ बढ़ी जहाँ अन्तस दिव्या के साथ मेरा इंतज़ार कर रहा था। यह अन्तस की ही योजना थी कि दिव्या को मेरे अंतर्मन में भेजा जाए। वो जानता था कि मृत्युंजय कोई न कोई छल अवश्य करेगा और ऐसे में सिर्फ उसकी बेटी ही उसे रोक सकती है।

मैं उसके कमरे तक पहुंची और दरवाज़ा खोला तो देखा कि दिव्या लेटी हुई थी और उसके पास ही अन्तस बैठा था।

“इसे अभी तक होश नहीं आया?” मैंने अन्दर प्रवेश करते हुए कहा। “हमें निकलना होगा। मामला काफी बिगड़ चुका है।” वो चुपचाप गुमसुम बैठा हुआ था, मैंने ध्यान से देखा तो पता चला कि दुखी भी था। “क्या हुआ?” मैंने उसके पास जाकर पूछा। उसकी आँखों में आंसुओं कि बुंदे थी, जिन्हें देखकर मैं जडवत हो गयी। मुझे किस अनहोनी कि आशंका हो रही थी। “क्या हुआ अन्तस?” मैंने अन्तस को झकझोरते हुए कहा। उसकी आँखों से आंसुओं कि धारा बहने लगी थी। “वो नहीं रही......” अन्तस ने टूटे हुए शब्दों में कहा। ‘दिव्या..... वो.....” उसने एक बार दिव्या की तरफ देखा और फिर मेरी ओर। “क्या बकवास कर रहे हो? ऐसा कैसे हो सकता है?” मैं दिव्या को हिलाने लगी मगर उसमें कोई हलचल नहीं थी। उसकी धड़कन बंद थी और शरीर ठंढा पड चुका था। “ऐसा नहीं हो सकता है, यह तो सूत्र साधना कि हिस्सा भी नहीं थी फिर इसके साथ ऐसा कैसे हो सकता है?” मेरे भी आंसू बहने लगे थे। मेरे लिए यह स्वीकार करना असंभव था कि मेरी वजह से किसी कि जान भी जा सकती है। मैं तंत्र को आज तक एक खेल मानते आई थी, मगर आज पहली बार मुझे इसकी गंभीरता का एहसास हुआ था। पहली बार इसकी वजह से मेरे किसी अपने की जान गयी थी और आज मुझे महसूस होता है कि इसकी पीड़ा कैसी होती है। मेरी माँ वर्षों तक जिस दर्द के साथ रही थी।

कुछ देर बाद जब मैं संभली तो मुझे याद आया कि मैं एक और बड़ा खतरा पीछे छोड़कर आई थी। अगर मृत्युंजय यहाँ पहुँच गया तो उसे एक पल नहीं लगेगा यह साबित करने में की दिव्या कि मौत के जिम्मेदार मैं और अन्तस हैं।

“हमें चलना होगा अन्तस यहाँ रहना अब हम दोनों के लिए खतरनाक है।” मैंने अन्तस को वास्तविकता का आभास कराते हुए कहा।

“सूत्र साधना का क्या हुआ?” उसने कुछ देर बाद खुद को संभालते हुए मुझसे पूछा।

“मैं असफल रही और मृत्युंजय सबको यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि इसकी वजह हम दोनों है......” मैं कहते-कहते रुक गयी। “मतलब.........?” उसने अपेक्षानुरूप प्रश्न किया।

“मैं तुम्हें सब बता दूंगी, फिलहाल यहाँ से चलो, वो लोग किसी भी वक्त आ सकते है।” मैं दरवाजे की तरफ बढ़ गयी। अन्तस ने अंतिम बार दिव्या की तरफ देखा और फिर मेरे साथ निकल गया।

“तुम्हारा चश्मा कहाँ है?” अचानक अन्तस को ध्यान आया तो उसने अपनी नजरें फेरते हुए कहा।

“मुझे अब उसकी जरूरत नहीं है। मैं स्वयं पर नियंत्रण रखना सिख चुकी हूँ।” अन्तस ने सही कहा था असफल सूत्र साधना भी कुछ ना कुछ फल अवश्य देती है, शायद यह उसी का परिणाम था कि मैं अपनी ताकत को नियंत्रित कर पा रही थी।

यह आधी रात का वक़्त था । पूरे कॉलेज परिसर में शांति पसरी थी। यहाँ के विद्यार्थियों को तो इस बात कि भनक ही नहीं थी कि यहाँ कितनी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा रहा था। मगर आसमान में काले बादल थे और ठण्डी हवायें भी चल रहीं थी। हम कॉलेज के गेट तक पहुँच ही थे कि हमें किसी की आवाज सुनाई दी। “रुको।”

हमने मुड़कर देखा, वहाँ वेद खड़ा था।

मैं और अन्तस दोनों उसे देखकर चौंक गये। यह कैसे बच गया जबकि सारे तांत्रिक तो बेहोश थे। हो सकता है शायद यह वहाँ मौजूद ही न हो।

“कहाँ जा रहे हो अन्तस?” उसने पास आकर कहा। अन्तस को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था जैसे कि वो वेद को देखकर डरा हो, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब बेचैनी झलक रही थी।

“वो असफल रही, तुम्हें अब लौटना होगा।” वेद ने धीमी आवाज में कहा।

“मैं अब भी इसकी मदद कर सकता हूँ।” अन्तस ने मेरी ओर देखकर कहा। उसकी आँखों में अजीब रहस्य था।

“वो तुम्हारा काम नहीं है, तुम्हारा काम ख़त्म हो चुका है, तुम्हारे पास नंबर है, 0, इस सब को यहीं ख़त्म करो और वापस जाओ।” कहते हुए वेद ने पिस्तौल निकाल ली और मुझपर तान दी। “वरना मुझे मजबूरन यह करना पडेगा।”

नंबर के बारे में सुनकर मैंने आश्चर्य से अन्तस की ओर देखा। मगर वो लगातार वेद की तरफ ही देख रहा था, जैसे उसे आँखों ही आँखों में कुछ समझा रहा हो। बरसात शुरू हो गयी थी।

“हमें देर हो रही है, मैंने अन्तस की तरफ देखकर कहा।” मुझे एक पल लगता वेद को बेहोश करने में, मगर मुझे मामला थोडा पेचीदा लग रहा था, इसलिए मैंने पहले अन्तस की स्वीकृति लेनी चाही।

“एक सेकंड।” अन्तस ने कहा और फुर्ती से आगे बढ़ते हुए वेद की पिस्तौल को नीचे गिरा दिया। उसने वेद के पास जाते हुए अपने अंगूठे से जोर से वेद की दोनों आँखों के बीच दबाया। वेद कुछ ही पल में बेहोश होकर निचे गिर गया। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि मुझे कुछ समझ ही न आया। मैंने आश्चर्य से अन्तस कि तरफ देखा। उसने मेरी ओर देखा और उसके बाद हमने वहां खड़ी एक कार उठाई और वहाँ से भाग निकले।

“वेद कहाँ लौटने की बात कर रहा था?” जब हम वहाँ से इतनी दूर निकल गए कि हम खतरे से बाहर लग रहे थे तो मैंने अन्तस से पूछा।

अचानक जोर से ब्रेक लगा। सामने एक गाय आ गई थी। मेरी साँसे फुल गयी। अन्तस अब भी शांत बना हुआ था।

“साधना में क्या हुआ था?” अन्तस ने पूछा।

“उसने मुझसे एक प्रश्न पूछा जिसका जवाब मुझे नहीं मालूम। ‘एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया।

लडके ने लड़की को क्यों मारा, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था।‘

“अन्तस कोई लड़का अपनी ही प्रेमिका की जान क्यों लेगा?” मैंने अन्तस कि ओर देखकर पूछा। अन्तस ने एक बार मेरी ओर देखा और फिर सामने देखने लगा।

“ताश्री! कुछ सवालों के जवाब हमें खुद ही ढूंढने होते है। यहाँ तुम्हारा सवाल है, जवाब भी तुम्हारा ही होना चाहिए। हो सकता है मेरा जवाब दूसरा हो और तुम्हारा दूसरा हो।” मैं फिर से खामोश बैठ गयी। अन्तस से पुछने इसे तो अच्छा था कि मैं मृत्युंजय से ही पुछ लेती, कम से कम वो जवाब तो देता। तभी अन्तस ने फोन निकाला और किसी को फोन किया। “हैल्लो पुलिस स्टेशन.........”

नन्दीनी और ताश्री को बैठे-बैठे एक घंटा हो चुका था। अँधेरा ढल चुका था, बाहर बादलों की गर्जन साफ़ सुनाई दे रही थी जो की ताश्री के चेहरे की शान्तिः के साथ विरोधाभास कर रही थी। अन्तस चाय बना कर लाया था।
 
“संगठन ने दुबारा तुम्हें कभी ढूंढने की कोशिश नहीं की?” नन्दीनी ने चाय का प्याला उठाते हुए कहा।

“मुझे ढूँढ़ना संगठन का पहला लक्ष्य है, मगर जो कोई भी यहाँ आता है, अपनी याददाश्त के कुछ नुकसान के साथ ही लौटता है। आप पहली वो इंसान हैं जो मेरी मर्जी के बिना यहाँ तक पहुंची हो।” ताश्री ने अन्तस की तरफ देखकर कहा जैसे उसकी गलती पर उलाहना दे रही हो। “वैसे तुम्हें मेरे केस में इतनी दिलचस्पी क्यों है? मेरा मतलब है कि तुम्हें मेरे बारे में पता कैसे चला?” ताश्री ने चाय का घूंट भरते हुए कहा। उसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो एक पुलिस अफसर से बात कर रही है। ऐसा लगता था कि वो कोई दो पुरानी सहेलियां मिली हैं।

“मुझे तुम्हारी डायरी मिली थी, जिसे पढ़कर मुझे तुम्हारे बारे में पता चला और फिर एक के बाद एक ऐसी घटनाएं हुई कि मैं इस केस से जुड़ गई और फिर तो मुझे ऐसा लगा कि यह मेरा अंतिम लक्ष्य है।” नन्दीनी ने ताश्री की आँखों में देखकर कहा। ताश्री की आँखों में एक अजीब कशिश थी जो सामने वाले को नजर रोक कर रखने पर मजबूर कर देती थी।

“अवन्तिका आंटी ने तो आपको हमारे बारे में नहीं बताया, फिर आप यहाँ तक कैसे पहुंची?” अन्तस ने नन्दीनी का ध्यान भंग करते हुए पूछा।

नन्दीनी के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। “मैं यहीं पली बढ़ी हूँ, यह अनाथ आश्रम ही वर्षों तक मेरा घर रहा है। जब मैंने ताश्री के घर पर इसकी तस्वीर देखी तो इसके पीछे यहाँ के संस्थापक की मूर्ति थी। जिसे देखकर मैं समझ गयी की तुम दोनों यहीं हो।”

“आप अंजनी मौसी को जानती थी!” ताश्री ने थोडा आगे झुककर कहा।

“हाँ....... मगर तुम उनकी बहन की बेटी हो यह बात मुझे आज ही पता चली।” ताश्री ने अन्तस कि ओर देखा और उन्होंने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया।

“क्या हुआ...?” नन्दीनी ने उन्हें देखकर पूछा।

“नन्दीनी अगर आप बुरा न मानो तो मैं आपकी आँखों में देख सकती हूँ?”

“क्यों तुम मेरी याददाश्त मिटाना चाहती हो?” नन्दीनी ने हंसकर कहा।

“नहीं उसके लिए मुझे पुछने कि जरूरत नहीं थी। मुझे बस कुछ जानना है।” ताश्री ने सीधा बैठते हुए कहा।

“ठीक है.......” नन्दीनी को थोडा डर लग रहा था। मगर उसे ताश्री के ऊपर विश्वास था। ताश्री ने कुछ मिनटों तक नन्दीनी की आँखों में देखा और फिर सामान्य हो गयी। नन्दीनी को लगा जैसे उसने कुछ देर कि झपकी ली हो।

“नन्दीनी! आपको मेरी डायरी कहाँ मिली थी।" ताश्री ने नन्दीनी के सामान्य होने पर पूछा।

“मेरे टेबल के ड्रावर में। क्यों?” नन्दीनी ने आशंकित होते हुए पूछा। उसे लग रहा था कि कुछ न कुछ तो जरूर है।

“तुम्हें कभी आश्चर्य नहीं हुआ कि दो साल पुराने केस के पेपर तुम्हारे टेबल के ड्रावर में क्या कर रहें थे?” ताश्री ने नन्दीनी के चेहरे के भाव पढ़ते हुए कहा। “आप मुम्बई जैसे बड़े शहर में इतना अच्छा काम कर रहीं थी तो आपको जयपुर जैसे छोटे शहर में क्यों बुलाया गया?”

“यह मेरा गृहनगर है इसलिए....” नन्दीनी खुद संशय में थी।

“और आपने इसके लिए कोई आवेदन भी नहीं किया था।" नन्दीनी आश्चर्य से ताश्री कि तरफ देखने लगी।

“तुम कहना क्या चाहती हो?”

“मेरी डायरी मिलते ही आपका राणा के घर जाना, फोन करते ही चतुर्वेदी का खुद आपके थाने आ जाना, आपके हवलदार का उसी हॉस्पिटल में एडमिट होना जहां याग्निक काम करता था, विजय का ठीक याग्निक के घर के सामने जीप रोकना, आपको डीनर कराने के लिए उसी रेस्टोरेंट में लेकर जाना जो पूजा का था...... आपको क्या लगता यह सब एक संयोग मात्र है?”

“तुम कहना चाहती हो की.....” नन्दीनी की साँसे फूलने लगीं थी।

“उस ड्राईवर तक रस्सी पहुंचाने वाला और कोई नहीं विजय ही था, विजय ही वेद सागर है।” ताश्री ने अन्तस की तरफ देखकर कहा तो अन्तस भी चौंक गया। नन्दीनी की आँखों में पानी भर आया था।

“मगर मैं ही क्यों?” नन्दीनी ने भार्राते हुए कहा।

“आपके अलावा कोई और हो भी नहीं सकता था। आप अंजनी मौसी को जानती थी, आप याग्निक को जानती थी, आप इस शहर में पली बढीं थी और सबसे बड़ी बात आप एक अच्छी इंसान है। संगठन को इस काम के लिए आपसे बेहतर कोई और नहीं मिल सकता था। मृत्युंजय ने आपसे एक पहेली कही थी। संगठन के इस रणक्षेत्र में आप अर्जुन और विजय वह सारथी जो आपसे युद्ध लड़वा रहा था। संगठन जानता था कि वो मुझे कभी नहीं ढूंढ सकता है और इसीलिए उन्होंने एक सोची समझी साजिश के तहत आपका इस्तेमाल किया। असली छल आपके साथ हुआ है नन्दीनी!” ताश्री ने एक निःश्वास लेकर कहा।

“...........और मुझे हमेशा इसका अफ़सोस रहेगा।” तभी एक आवाज गुंजी, यह आवाज विजय की थी, उसने अपनी आँखों पर काला चश्मा लगा रखा था और वह पिस्तौल थामे खड़ा था। ताश्री, अन्तस और नन्दीनी तीनों एक साथ खड़े हुए।

“तुमने दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं किया?” ताश्री ने तीखी नज़रों से अन्तस को देखकर कहा।

“कैसे हो छोटे?” विजय ने पिस्तौल अन्तस की तरफ घुमाते हुए कहा।

“स्वागत है आपका बड़े भाई।” अन्तस ने मुस्कुराकर कहा।

“मुझे माफ करना नन्दीनी तुम एक अच्छी इन्सान हो और तुम्हारा फायदा उठाते हुए मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मगर कुछ उद्देश्य इतने महान होते हैं कि उनकी प्राप्ति में कुछ त्याग करने पड़ते है।” नन्दीनी बस गुस्से से विजय की ओर देख रही थी। वो बहुत कुछ कहना चाहती थी मगर उसे कोई शब्द नहीं सूझ रहा था। अजीब बात थी वक़्त ने दोबारा उसे उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था।

“तुम्हारा खेल ख़त्म हुआ अन्तस। उसे अलविदा कह दो।” विजय ने पिस्तौल लोड करते हुए कहा।

“रुको।“ ताश्री ने चिल्लाते हुए कहा। “दिव्या की मौत का जिम्मेदार अन्तस नहीं है, मैं हूँ।” बाहर बादल गरजने लगे थे और बरसात शुरू हो चुकी थी। लगातार बिजलियाँ चमक रहीं थी। ऐसा लग रहा था प्रकृति आज अपना रौद्र रूप दिखाने वाली थी।

‘मैं जानता हूँ, इसीलिए मैंने तुम्हें अलविदा कहने को कहा था।” विजय ने पिस्तौल का मुंह ताश्री की ओर मोड़ दिया।

“मैं अब भी सब ठीक कर सकता हूँ। बस इसे एक और बार मौक़ा चाहिए।” अन्तस ने विनती करते हुए कहा।

“तो अभी करो। या तो तुम ख़त्म करो या फिर मैं करता हूँ।” बाहर हवाएं तेज़ी से चलने लगी थी, खिड़की दरवाजे खड़खड़ाने लगे । ताश्री को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है।

अन्तस काफी देर विजय को देखता रहा जैसे कोई निर्णय ले रहा हो। “तो मैं यह करना चाहूँगा।” अन्तस ने आगे बढ़ कर विजय के हाथ से पिस्तौल ले ली और ताश्री पर तान दी।

ताश्री बिल्कुल आश्चर्यचकित हो गयी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अन्तस ने उसपर पिस्तौल तान रखा है। नन्दीनी के भी हाथ-पाँव फुल गये। “यह क्या कर रहे हो अन्तस। तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है। नन्दीनी ने चिल्लाते हुए कहा।

“वही जो तुम्हें करना चाहिए था।” विजय ने मुस्कुराकर नन्दीनी कि ओर देखकर कहा।

अन्तस ने अपनी आँखें बंद कर ली। ताश्री बस अन्तस को देखे जा रही थी। बरसात अपने चरम पर थी और बरसात का पानी धीरे-धीरे घर में घुसने लगा था। अचानक एक कांच का गुलदस्ता फर्श पर गिरा। नन्दीनी ने उधर देखा तो वह टेबल जिस पर वह गुलदस्ता पड़ा था ऊपर हवा में उठाने लगा था। धीरे-धीरे घर का सारा सामान ऊपर हवा में उठाने लगा। नन्दीनी ने ताश्री की तरफ देखा। वह बस अन्तस की ओर देख रही थी। बिना किसी डर के, बिना किसी घबराहट के अपनी परिणिति की प्रतीक्षा में। ‘एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया। लडके ने लड़की को क्यों मारा ताश्री, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था।‘

अन्तस ने अपनी आँखें खोली और गोली चला दी। गोली लगते ही ताश्री दो कदम पीछे हटी और फिर सोफे पर गिर गयी। सारा सामान धम्म से जमीन पर गिर गया।

“नहीं............!” नन्दीनी जोर से चिल्लाई।

ताश्री ने आखिरी बार अन्तस को देखा, वो मुस्कुरा रहा था। उसने अपनी आँखें बंद की, एक सफ़ेद प्रकाश हुआ और वो उस जगह खड़ी थी जहां वो सूत्र साधना के अन्तिम चरण पर पहुंची थी। उस पर्वत के शिखर पर जहां एक सपाट मैदान था और आगे एक गहरी खाई थी।

अन्तस ने अपनी आँखें खोली तो वो एक हॉस्पिटल के बेड पर था। उसके सर से कुछ तार जुड़े हुए थे जो पास ही पड़ी एक मशीन से लगे थे और उसी मशीन से निकले कुछ तार पास ही के बेड पर पड़ी एक लड़की के सिर से जुड़े थे। यह ताश्री थी। अन्तस को होश आते ही उस कमरे में हलचल मच गयी और दो व्यक्ति दौड़कर उसके पास आ गए। इनमें से एक अवन्तिका थी और दूसरी एक नर्स थी जिसने अन्तस को सहारा देकर उठने में मदद की।

“मुझे कितना वक़्त लगा?” अन्तस ने अपनी आँखें दबाकर रोशनी के हिसाब से उन्हें संयोजित करते हुए पूछा।

“एक सप्ताह हुआ है। मुझे लगा आप भी कोमा में चले गए है।” उस नर्स ने अन्तस के सिर से तार हटाते हुए कहा।

“कुछ हुआ डॉक्टर अन्तस, मेरी बेटी ठीक तो हो जायेगी न?” अवन्तिका ने आतुरता से पूछा। अन्तस ने एक बार ताश्री की तरफ देखा। वह शांत चित लेटी हुई थी। “मैंने पूरी कोशिश की थी” अन्तस ने दुखी होकर अवन्तिका की तरफ देखा। “अब यह सिर्फ उसके ऊपर है।”

‘मगर आपने तो कहा था कि आप उसे कोमा से बाहर ला सकते है!” अवन्तिका ने दुखी होकर कहा।

“देखिये मैं सिर्फ कोशिश कर सकता हूँ....... और आप सोच भी नहीं सकती की कि मैंने कितनी कोशिश की थी।” अन्तस ने ताश्री की ओर देखकर एक निःश्वास लेते हुए कहा। “मगर अभी भी एक उम्मीद बाकी है।” अन्तस ने खड़े होते हुए कहा।

अवन्तिका निढाल सी ताश्री कि बेड पर बैठ गयी।”हाँ... वो लाकर का पासवर्ड..... 2121 है।” अन्तस ने अवन्तिका की तरफ देखकर कहा।

“मुझे मालूम है..... वो तो मैंने आपकी काबिलीयत जाँचने के लिए माँगा था।” अवन्तिका ने ताश्री के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

अन्तस ने हाँ में गर्दन हिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गया।

“नर्स मेरे घर से क्या खबर है?” अवन्तिका को एक आवाज दूर जाती हुई सुनाई दी।

“हाँ दिव्या मैडम ने आज सुबह ही फोन किया था..”

ताश्री उस पर्वत के शिखर पर खड़ी थी, जहां सामने एक गहरी खाई थी। ठण्डी हवाएं चल रही थी।

“तुम्हें उस सवाल का जवाब मिल गया?” वो आवाज गूंजी।

“बिलकुल!” ताश्री ने कदम आगे बढायें और उस खाई के मुहाने पर जाकर खड़ी हो गयी। “तुमने सही कहा था। मैं तब तक रुद्र को नहीं देख सकती जबतक मैं उस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ लेती।” ताश्री ने उस खाई के अन्दर देखते हुए कहा। यह एक गहरी, अँधेरी खाई थी जिसके अन्दर कुछ भी देख पाना मुमकिन नहीं था। “वो हमेशा से यहीं था मगर मैं उसे देख ही नहीं पाई। मेरी माँ ने सही कहा था, वह कुछ नहीं है।”

“तो तुम्हें उस सवाल का जवाब मिल गया।” उस आवाज ने निश्चितता के साथ कहा।

“हाँ..... क्योंकि वो लड़की सपने में थी।”

ताश्री ने मुस्कुराकर कहा और फिर उस खाई में कूद गयी।

“स”

मनस्त्वं

व्योमत्वं

मरुदशी

मरुत्सारथीदशी

त्वं आपस

त्वं भुमि

त्वयी परिणताय

नहियरम्

त्वमेव सात्वानं

ऋणमणिपुं

विश्वव्भुषा

चिदानन्दाकारम्

शिवेन्दति

भावेनविग्नशे

“हं”

“स्वप्न और वास्तविकता के मध्य एक सूक्ष्म अन्तर होता है और जब हम यह अन्तर पहचान लेते हैं, हम जाग जाते हैं।”

-ताश्री

-------------------------------------------------The End--------------------------------------------
 
Back
Top