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इस घटना को दो दिन बित चुके थे। मुझे लगा की चलो मुसीबत टली, बाल-बाल बच गए। बाद में रणवीर मुझे मिला और इस मुसीबत से छुटकारा दिलाने के लिए शुक्रिया कहा। मैंने भी उसे संगठन के बारे में किसी को न बताने की सख्त हिदायत दे दी।
मै अपने कमरे में थी तभी गुरूजी आए। हालचाल पुछने के बाद उन्होंने कहा, “अवन्तिका कहीं तुमने रणवीर के साथ .....?" वो कहते-कहते रुक गये लेकिन मै उनकी बात समझ चुकी थी।
“मै आपको पहले ही कह चुकी हूँ की हमारे बिच ऐसा कुछ नहीं है।” मैंने पुरे विश्वास के साथ उनकी आँखों में देखते हुए कहा।
“तुम तो जानती हो की सूत्र साधना के लिए सभी लड़कियों का कौमार्य होना आवश्यक है ? उन्होंने थोडा झिझकते हुए कहा।
“आपसे यह किसने कहा ?” वो मेरा चेहरा देखने लगे।
“सूत्र सूक्त में यह अवश्य लिखा है कि ग्यारह सूत्रों का पवित्र होना आवश्यक है मगर यह पवित्रता का पैमाना शारीरिक हो ऐसा तो कहीं नहीं लिखा ।”
“मतलब?” उन्होंने मेरा चेहरा देखते हुए कहा।
“मतलब यह की सूत्र सूक्त कहीं से भी कौमार्य की मांग नहीं करता है, बल्कि सूक्त जिस पवित्रता की बात करता है वो आध्यात्मिक स्तर पर है। यह उद्देश्य के बारे में है, माध्यम के बारे में नहीं।”
“लेकिन एक समस्या और है !” उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा “संगठन में कुछ लोगों को तुम्हारी प्रतिबद्धता पर संदेह है।”
“क्या? मगर क्यों?” मैंने चौंकते हुए कहा।
“रणवीर वाले मामले के बाद उन्हें लगता है की हो सकता है तुम संगठन के साथ छल कर सकती हो।”
“तो मुझे अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए क्या करना होगा ?”
“विवाह!” उन्होंने मेरे पास आते हुए धीरे से कहा।
“क्या?” मै पूरी तरह से सिहर गयी। “मगर किसके साथ ?” मैंने आंखे फाड़ कर पूछा।
“शक्ति का मेल हमेशा शक्तिशाली के साथ होता है। संगठन में तुम्हारे बाद सबसे शक्तिशाली कौन है ?” मै उनका चेहरा देख रही थी।
“मृत्युंजय।” उन्होंने बिना मेरी ओर देखे कहा।
“मृत्युंजय ?” मैंने चौंककर कहा। “मेरा विवाह भला मृत्युंजय से कैसे हो सकता है ? और अभी तो आप कह रहे थे कि सभी सूत्रों का ब्रम्हचर्य का पालन अनिवार्य है तो फिर मै विवाह कैसे कर सकती हूँ ?” मैंने असमंजस में कहा ।
“ब्रम्हचर्य और अविवाहित होने में फर्क होता है । यह आवश्यक नहीं की विवाह से ब्रम्हचर्य टूटे । मृत्युंजय और तुम्हारा विवाह एक छद्म विवाह होगा जो सिर्फ संगठन के लोगों को विश्वास में लेने के लिए होगा, सूत्र साधना के पूर्ण होने के पश्चात तुम अपना जीवन जीने के लिए मुक्त हो जावोगी और इस विवाह के बंधन से भी ।” उन्होंने अपनी योजना मुझे समझायी ।
“मगर मृत्युंजय ही क्यों, कोई और क्यों नहीं ?” मैंने उन्हें संदेह की दृष्टी से देखते हुए कहा ।
“क्योंकि वो हमारा पुत्र है, संगठन के अध्यक्ष नित्यानंद का पुत्र.... उससे तुम्हारे विवाह के पश्चात किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं होगी की तुम पर उंगली उठा सके ।”
“लेकिन क्या मृत्युंजय इसके लिए तैयार होगा ?” उनकी बाँछे खिल गयीं । मृत्युंजय की आपत्ति पूछने का अर्थ था कि मै इस विवाह* के लिए तैयार थी ।
“मृत्युंजय कभी हमें मना नहीं कर सकता है, अगर हम उसे तुमसे विवाह करने के लिए कहते है तो उसे विवाह करना ही होगा ।” उन्होंने गर्व से सीना चौड़ा करते हुए कहा ।
“....और वो छद्म विवाह वाली बात ?” मैंने अपना भय व्यक्त करते हुए कहा ।
“तुम निश्चिंत रहो । मृत्युंजय से हम बात कर लेंगे..., तुम अपने माता-पिता को यहाँ बुला लो ।” उन्होंने मेरी सहमती मिलते ही मामला पक्का किया ।
“नहीं... उसकी कोई आवश्यकता नहीं है । आपने ही अभी-अभी कहा कि यह एक छद्म विवाह है तो फिर मेरे माता-पिता को इस सब के बारे में बताने की जरुरत नहीं* है । मै चाहती हूँ कि यह विवाह कम से कम लोगो तक सिमित रहे ताकि भविष्य में मुझे कोइ समस्या न हो
“हम्म.......ठीक है, जैसा तुम चाहो । यह विवाह सिर्फ इस आश्रम तक ही सीमित रहेगा।” उन्होंने मेरे कमरे से बाहर जाते हुए कहा।
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मेरी सहमति मिलते ही इस विवाह की तैयारी शुरू कर दी गयी। जैसे ही यह खबर आश्रम में फ़ैली चारों तरफ चर्चाएँ होने लगी क्योंकि गुरु जी के पश्चात संगठन के अध्यक्ष का पद मृत्युंजय को ही संभालना था और मृत्युंजय की पत्नी होने का अर्थ था ‘गुरु माँ’ होना, जो की अध्यक्ष के बाद संगठन में सबसे महत्वपूर्ण पद था।
अगले दिन देवी मेरे कमरे में आई।
“अवन्तिका*यह मै क्या सुन रहीं हूँ ? तू मृत्युंजय से विवाह कर रही है ?” उसने मुझे घुर कर देखते हुए कहा। मेरे इस निर्णय से वो काफी गुस्सा लग रही थी ।
“हाँ बिलकुल सही सुना है तूने, मृत्युंजय से मेरा विवाह तय हो चूका है ।” मैंने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा ।
“लेकिन क्यों? तू तो मृत्युंजय से नफरत करती थी न?”
‘ हाँ, करती थी। मगर अब नहीं करती हूँ। गुरूजी स्वंय ऐसा चाहते है और भला मै गुरूजी की आज्ञा कैसे टाल सकती हूँ ?” मैंने अंतिम पंक्ति एक विशेष स्वर में कही जिससे मै उसे कुछ याद दिलाना चाहती थी । दरअसल देवी संगठन के बारे में कुछ नहीं जानती थी इसलिए मेरे लिए उसे सत्य बताना संभव नहीं था और इसीलिए मै उसे गोल-गोल घुमा रही थी ।
“अवनी, यह तेरी जिंदगी का सवाल है, तू किसी भी जल्दबाजी में फैसला मत ले। तू एक बार फिर से सोच ले। कहीं तू गुरुमाँ बनने के लिए तो.......?” उसने अपनी*अधूरी बात कही।
“तुम्हे ऐसा लगता है कि मै गुरु माँ बनने*के लिए मृत्युंजय से शादी कर रहीं हूँ ?” मैंने उठकर देवी के पास आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। “हो सकता है तू सही सोच रही हो । मृत्युंजय चाहे कितना भी कमीना क्यों ना हो एक बात तो है कि वो गुरूजी का बेटा है और उसके कुछ अपने ही फायदे है।” मैंने हँसते हुए कहा ।
“अवनी!” देवी ने चौकते हुए कहा । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मै* इस तरह की बातें क्यों कर रही हूँ ? कल तक तो मै उसे रणवीर से बात कराने को कह रही थी और आज मै मृत्युंजय से विवाह करने को तैयार थी । मेरे इस बदलाव से वो परेशान थी । वास्तव में यह छद्म विवाह एक बहुत बड़ा झूठ था जिसे मुझे सच बनाकर पेश करना था । किसी के साथ आपका रिश्ता जितना मजबूत होता है तो उससे झूठ बोलना उतना ही मुश्किल होता है और कई बार तो इस झूठ की कीमत उस रिश्ते में दरार के रूप में चुकानी पड़ती है । वही यहाँ भी हो रहा था, देवी मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी और मुझे अच्छे से जानती थी। वो अबतक समझ चुकी थी कि मै उससे कुछ ना कुछ छुपा रही हूँ। और यही बात शायद उसे दुःख पहूँचा रही थी।
“मृत्युंजय तेरे लिए सही लड़का नहीं है, तू उससे शादी करके पछताएगी।“ उसने मुझे चेतावनी देते हुए कहा।
“यही बात अगर मै तुझे मंथन के लिए कहूँ तो क्या तू मानेगी ? नहीं ना... देवी! हमें हमारी जिंदगी के कुछ फैसले खुद लेने पड़ते है और इसमे हमें किसी की भी दखल पसंद नहीं होती है ।” वो कुछ देर मुझे देखती रही ।
“ काश!* की ये फैसला तूने खुद लिया होता।” उसने कहा और गुस्से में बाहर चली गयी । मुझे उसे सच न बताने का दुःख तो था मगर मै जानती थी कि जिंदगी में कई बार हमें सख्त निर्णय लेने पड़ते है ।
देवी के बाद राणा और रणवीर को भी मुझे अलग-अलग तरीके से समझाना पड़ा । राणा को समझाना फिर भी मेरे लिए आसान था क्योंकि वो सच जानता था मगर रणवीर को समझाने में मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी । दरअसल उसे मै पूरा सच बता कर और मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी, इसलिए मैंने उससे सिर्फ इतना ही कहा कि मै जो कुछ भी कर रही हूँ हमारी भलाई के लिए ही कर रहीं हूँ ।
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नियत तिथि पर सादे तरीके से मृत्युंजय और मेरा विवाह संपन्न हुआ । मृत्युंजय खुद इस शादी से खुश नहीं लग रहा था । कई बार किसी चीज को पाने के लिए हम बहुत कोशिश करते है लेकिन फिर भी वो हमें नही मिलती है तो हमें उससे नफरत हो जाती है और फिर अगर कभी वो मिल भी जाए तब भी नफ़रत बरकरार ही रहती है । शायद मृत्युंजय के साथ भी यही हुआ था, उसे मुझसे नफरत थी और बस उसे वही चाहिए था । शादी के बाद भी शायद ही हममे कभी बात हुई, लेकिन एक दिन.......
सूत्र साधना में अब सिर्फ सात ही दिन बाकि थे और हम सब उसकी तैयारी में लगे हुई थे। उस दिन मै अपने कमरे में कुछ काम कर रही थी तभी मृत्युंजय आया, अन्दर आते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया, मै उसे देखकर चौंक गयी।“ तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” मैंने उसे घूरते हुए कहा ।
“अपनी पत्नी से मिलने आया हूँ, क्या मुझे उसके लिए भी गुरूजी से आज्ञा लेनी पड़ेगी?” उसने मुझे तीखी नजर से देखते हुए कहा ।
“तुम्हारा यहाँ कोई* काम नहीं है।” मैंने अपनी भौंहे सिकोड़ते हुए कहा ।
“ पति-पत्नी के बीच बहुत से काम होते है, मगर हमारे बीच तो एक भी नहीं हुआ, चलो मुख्य काम से ही शुरुआत करते है।” वो धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ने लगा, मै* धीरे-धीरे खुद को पीछे हटाने लगी और अंत में दीवार से लगकर खड़ी हो गई। वो मेरे बिलकुल पास आ गया, मै उसकी साँसों की गर्माहट को महसूस कर सकती थी ।
“नफरत जब हद से गुजर जाए तो प्यार में बदल जाती है । मुझे लगता है मुझे तुमसे प्यार हो गया है अवन्तिका।” उसने मेरे बालों की लटो को हटाते हुए कहा ।
“मगर मैं अब तक नफरत की हद में ही हूँ ।” मैंने अपनी आँखे बंद की और अपने हाथ की तर्जनी उंगली को जोर से उसकी दोनों भौंहों के बिच दबा दिया । वो दर्द से अपना सर पकड़कर पीछे हट गया और छटपटाने लगा ।
‘तुम अभी जो महसूस कर रहे हो उसे कुण्डलीनी उर्जा का आधिक्य प्रवाह कहते है, जो की तुम्हारे शरीर में उर्जा के असंतुलन का परिणाम है ।” वो वहीं दर्द के मारे निचे बैठ गया ।
“रवि! मुझे नहीं मालुम कि तुम तंत्र शास्त्र को कितनी गम्भीरता से लेते हो, मगर मेरे लिए यह काफी रोचक विषय है । अब अगर इस उर्जा का प्रवाह मै तुम्हारे सर के बजाय किसी अंग विशेष की तरफ कर दूँ तो तुम मुझे तो क्या किसी भी लड़की से प्यार करने के काबिल नहीं रहोगे।”
मै उसके पास गयी और कान में कहा, “ मै ग्यारहवां सूत्र हूँ बेवकुफ! गुरूजी ने मुझे अपनी रक्षा करना अच्छे से सिखाया है।" मैंने फिर से उसे वहीँ स्पर्श किया, इससे उसका दर्द कम हो गया मगर अबतक वो बेहोश हो चुका था।
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आखिर वो घडी आ ही गयी जिसका सालो से इन्तजार था, आज वो दिन था जब सूत्र साधना होनी थी । उस बड़े से हॉल में सभी तांत्रिक इकठ्ठा हुए थे आज देश की विभिन्न शाखाओं से बड़े-बड़े तांत्रिको को आमंत्रित किया गया था जिन्हें साधना में मार्गदर्शन करना था। सभी लोग काफी उत्साहित लग रहे थे। आखिर दुनिया का हर तांत्रिक इस पल का साक्षी बनने के लिए आतुर रहता है।
गुरूजी, मै और मृत्युंजय तीनो मंच पर खड़े थे। गुरूजी ने अभिभाषण प्रारंभ किया ।
“मित्रो! वर्षो की प्रतीक्षा के पश्चात् आखिर यह शुभ पल आ ही गया है। आज हम एक नए चमत्कार के साक्षी होंगे । एक ऐसा चमत्कार जो मानव समाज की दशा और दिशा दोनों बदल देगा । अगर हम इस यज्ञ में सफल रहे तो इतिहास में हमारा नाम सदा-सदा के लिए अमर हो जाएगा* और अगर असफल रहे तो शायद कोई हमें पहचाने तक नहीं। मगर हम सफल हो या असफल, हमें यह हमेशा विदित रहेगा कि हम कौन है*और किस लिए है? हम रहे या ना रहे हमेशा यह ध्यान रखना की तुम सब इस महान संगठन का हिस्सा हो।” उन्होंने एक सांस ली और फिर ऊँचे स्वर में कहा।
“तंत्र ही संगठन का आधार है और संगठ का प्रत्येक व्यक्ति एक बात अच्छी तरह से जानता है कि धर्म की रक्षा कैसे करनी है ।”
मैंने मृत्युंजय की तरफ देखा उसके चहरे पर वही हंसी थी जो उस दिन कमरे से बाहर निकलते वक़्त थी ।
ॐ ह्रीं श्रीं भ्रीं भ्रों भ्रें भ्रः ,
ह्न-ह्न ङ्ग-ङ्ग पच-पच गृहाण-गृहाण,
मारय-मारय मर्धय-मर्धय ,
महा-महा भैरव-भैरव रूपैणः,
धूनयं-धूनयं खंपय-खंपय,
विग्नय-विग्नय विश्वेश्वर शोभय-शोभय,
गट-गट मोहय ओम्बट स्वाहाः।।
सबकी आँखे बंद थी, हजारों तांत्रिकों के एक साथ इस मन्त्र के उच्चारण के साथ ही सूत्र साधना प्रारंभ हुई। सबसे आगे मै उन दस लड़कियों के साथ बैठी थी, जिन्हें सूत्र साधना के लिए विशेष तौर पर तैयार किया गया था। वो सब मन्त्रों का उच्चारण एक दम सटीकता से कर रहीं थी, जिससे लगता था कि उन्हें भी मेरी तरह ही काफी जटिल दीक्षा दी गयी थी।
वो सब संगठन की अलग-अलग शाखाओं से आई थी, जिन्हें वहां के शाखा प्रमुखों ने नित्यानंद जी के मार्गदर्शन में चुना था। वो सब मेरी ही हमउम्र थी और काफी गंभीर लग रही थी।