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"ओह.. तो सिगरेट..." शीना ने रिकी के हाथ से सिगरेट छीनते हुए कहा
"माँ को नही बताना प्लीज़..." रिकी ने धीरे से कहा
"ऑफ कोर्स नही भैया... मुझे भी दो ना एक, काफ़ी दिन से नहीं ली है.." शीने ने रिकी के सामने खड़े होके कहा.. रिकी ग्रिल के भरोसे सामने बाहर की तरफ देख रहा था और शीना ठीक उल्टे होके पेर ग्रिल पे किए रिकी के चेहरे पे देख रही थी... रिकी ने कुछ रिएक्ट नहीं किया और शीना को भी उसकी सिगरेट दे दी... दोनो भाई बहेन जानते थे कि कौनसी चीज़ कब और कितनी लिमिट में करनी चाहिए. इसलिए दोनो आराम से बातें कर रहे थे और सिगरेट के कश पे कश लगाए जा रहे थे... सर्द हवा में रिकी के साथ सिगरेट पीके शीना बहुत रोमांचित हो रही थी.. ठंडी ठंडी हवा, सिगरेट का धुआँ और सामने खड़े महबूब के जिस्म से आती उसकी महक.. शीना ने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी टाइम वो रिकी के साथ बिता पाएगी....
"क्या हुआ.... कुछ तो बोलो, कब से मैं बोले जा रहा हूँ.." रिकी ने शीना के ध्यान में भंग डालते हुए कहा
"भैया, आप लंडन नही जाओ ना.. मैं यहाँ बहुत अकेली हो जाती हूँ प्लीज़..." शीना ने अचानक भावुक होके कहा और रिकी से गले लग गयी
"अरे.. क्या हुआ अचानक स्वीटहार्ट... आज इतना प्यार क्यूँ भाई पे... कुछ चाहिए क्या लंडन से...." कहके रिकी ने शीना को अलग किया लेकिन उससे दूर नहीं हुआ, बल्कि उसे सट के खड़ा हो गया और दोनो भाई बहेन अब बाल्कनी के बाहर ही देख रहे थे... शीना कुछ देर तक खामोश रही, लेकिन फिर सिगरेट का कश खीचते हुए बोली
"नोट दट भाई.. बट आप होते हो तो लगता है कोई है जिसके साथ मैं सब कुछ शेअर कर सकती हूँ, लेकिन आप के जाने के बाद फिर अकेली.. पापा और भैया पूरा दिन काम में होते हैं, मम्मी और भाभी के अलग तेवर देखो.. यह सब देख के मैं अब थक गयी हूँ..पूरा दिन खुद को बिज़ी रखने के लिए फ्रेंड्स के साथ घूमती रहूं, इसके अलावा कुछ करती ही नहीं हूँ.. अब आप बताओ, ऐसे में मैं क्या करूँ..." कहके शीना ने फिर रिकी की तरफ हाथ बढ़ाया और अपने लिए दूसरी सिगरेट सुलघा ली
"शीना, तुम आगे क्यूँ नहीं पढ़ाई करती, मतलब बॅच्लर्स तो तुमने किया है, तो मास्टर्स भी कर लो.. वैसे भी शादी वादी का प्रेशर तो कुछ है नहीं तुम्हारे उपर, और अगर वो कभी आया भी तो मैं डॅड से बात कर लूँगा..." रिकी ने भी अपने लिए दूसरी सिगरेट सुलघा ली...
रिकी की बात में दम तो था और शीना के लिए इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था कि वो रिकी के साथ टाइम स्पेंड करे सबसे दूर और बिना किसी डिस्टर्बेन्स के.. लेकिन फिर भी शीना को पता नहीं कौनसी बात डिस्टर्ब कर रही थी के वो इस प्लान के लिए भी नहीं मानी...
"नही भैया, मैं नहीं आउन्गि वहाँ.. आप ही रहो ना इधर, आप यहाँ कंटिन्यू करो अपनी स्टडीस... नतिंग लाइक आमची मुंबई.. राइट" कहके शीना ने रिकी को हाई फाइ का इशारा किया
दोनो भाई बहेन दो घंटे तक एक दूसरे को कन्विन्स करते रहे लेकिन दोनो अपनी बातों पे अड़े रहे और देखते देखते सिगरेट के पॅकेट के साथ 4 कप कॉफी भी ख़तम कर चुके थे.. दोनो ने ढेर सारी बातें की और दोनो में से किसी को वक़्त का होश नहीं रहा.. यह पहली बार था कि जब दोनो ने घंटों एक दूसरे के दिल की बातें जानी हो.. ऐसा नहीं था कि यह दोनो पहली बार बात कर रहे थे, जब कभी भी शीना को किसी अड्वाइज़ की ज़रूरत पड़ती तो वो अपने माँ बाप के बदले रिकी की सलाह लेती.. शीना के लिए रिकी एक शांत ठहरे पानी जैसा था, जो स्थिर था और उसके पास जाने से किसी को ख़तरा नहीं था, लेकिन वो यह भी जानती थी कि पानी जितना शांत होता है उतना ही गहरा भी होता है.. इसलिए जब भी रिकी लंडन से शीना को दो दिन तक कॉल नहीं करता तब वो सामने से कॉल करती और उससे कुरेद कुरेद के बातें पूछती.. अभी भी दो घंटे में जब भी दोनो के बीच कुछ खामोशी रहती तो रिकी किसी सोच में डूब जाता..
"भाई, एक बात बताओ, पर सच बताना प्लीज़ हाँ..." शीना ने दोनो के लिए एक एक सिगरेट सुलगाई और उसके हाथ में पकड़ा दी
"शीना, तुमसे मैं झूठ कब बोलता हूँ.. पूछो, क्या बात है.." रिकी ने घड़ी में समय देखते हुए कहा जिसमे अब सुबह के 4.30 होने वाले थे
"भाई, आप हमेशा किस सोच में खोए रहते हैं.. इतनी देर से देख रही हूँ आपका दिमाग़ रुकने का नाम ही नहीं ले रहा, देखते देखते आप ने 7 सिगरेट ख़तम की और साथ में मुझे भी दी.. ऐसे तो कभी नहीं हुआ, ना ही आप ने मुझे रोका.. अब सीधे सीधे बताओ क्या बात है, झूठ नही कहना.." शीना ने सिगरेट का एक कश लिया और उसके धुएँ का छल्ला बना के हवा मे उड़ाते हुए कहा... शीना की बात सुनकर रिकी फिर यह सोचने लगा कि अब इसे क्या कहे, ना तो वो शीना से झूठ बोल सकता था, और ना ही वो उसे सच बता सकता था.. कुछ देर खामोश रहने के बाद जैसे ही उसने कुछ कहना चाहा के तभी फिर शीना बोल पड़ी
"अब बोलो भी, मार्केट में भी आज खोए हुए थे , और जैसे ही मैने पीछे से आपको टच किया, आप डर गये...." शीना ने बीती शाम की बात रिकी से कही...
"शीना.. आज एक अजीब हादसा हुआ मेरे साथ मार्केट में..." रिकी ने शीना की आँखों में देखते हुए उसे कहा और उसने फ़ैसला कर लिया कि शीना को वो अपना हमराज बनाएगा.. रिकी ने शीना को मार्केट में हुई बात के बारे में बताया. रिकी की बात सुन शीना डरने लगी, क्यूँ कि रिकी को मुंबई में कम लोग जानते थे, तो महाबालेश्वर में भला कोई कैसे जान सकता है... शीना भी रिकी की बात सुन पसीना पसीना होने लगी... उसने जल्दी से अपने और रिकी के लिए सिगरेट जलाई और रिकी की बाहों में समा गयी जैसे एक प्रेमिका अपने प्रेमी की बाहों में जाती है... बिना कुछ कहे, शीना धीरे धीरे रिकी के साथ आगे बढ़ने लगी और नीचे की सीढ़ियों की तरफ चलने लगी.. अभी सुबह के 5 बजे थे, लेकिन ठंड की वजह से अंधेरा काफ़ी था और स्नेहा और सुहासनी भी अपने कमरे से निकले नहीं थे... शीना और रिकी जैसे ही नीचे पहुँचे, शीना ने रिकी को सोफे पे बिठाया और खुद किचन की तरफ बढ़ गयी... करीब 15 मिनट बाद शीना अपने दोनो हाथों में कॉफी के कप और अपनी सिगर्रेट को मूह में दबाए रिकी की तरफ बढ़ी... सोफे पे बैठ के शीना ने अपनी सिगरेट ख़तम की और कॉफी पीने लगी... रिकी ने भी कुछ नहीं कहा, वो भी बस सिगरेट और कॉफी में खोया हुआ था...
"भाई... कोई ऐसा मज़ाक नहीं कर सकता, आइ मीन आपको यहाँ कोई जानता नहीं,यहाँ क्या, मुंबई में भी नहीं जानते काफ़ी लोग तो.. तो फिर यह कैसे हो सकता है..." शीना ने फाइनली सिगरेट का पॅकेट रिकी के हाथ से छीना और उसे अपने हाथ में ले लिया... " अब नो मोरे सिगरेट फॉर आ मंथ.." कहके शीना ने फिर रिकी की आँखों में जवाब पाने की उम्मीद से देखा