S
StoryPublisher
Guest
"यह विक्रम कहाँ चला गया है, कल रात को भी नहीं दिखा, अभी भी कहीं नहीं दिख रहा.." सुहासनी ने अमर से पूछा जब वो दोनो घर के बॅकयार्ड में बैठे सुबह कीठंडी धूप का आनंद ले रहे थे.. अभी अमर कुछ कहता उससे पहले विक्रम का कॉल ही आ गया उसको
"अरे बेटे कहाँ हो, इधर माँ पूछ रही है और बिन बताए यूँ अचानक" अमर ने फोन उठाते कहा
"बीसीसीआइ के बाप का फोन आया था पापा, इसलिए अचानक जाना पड़ा मुझे पापा.. एलेक्षन्स के चलते इस साल के कुछ मॅच अबू धाबी में होंगे, अब अगर यहाँ से ऑपरेट करना है तो
यहाँ के बुक्कीस से भी सेट्टिंग करना पड़ेगा.. इसलिए कुछ ज़्यादा वक़्त लगेगा इधर, मेरे साथ हमारे नेटवर्क के कुछ आदमी आए हैं ताकि बात चीत करने में आसानी हो, और बीसीसीआइ के सेक्रेटरी भी हैं.." विक्रम ने जवाब में कहा
"ठीक है बेटे, कुछ दिक्कत हो तो कॉल करके बताना... चलो बाइ.." कहके अमर ने कॉल रखा और जैसे ही सुहासनी को कुछ बताता, तभी पीछे से किसी की मधुर आवाज़ उसके कानो में पड़ी
"गुड मॉर्निंग ताऊ जी....."
आवाज़ सुनते ही जैसे अमर के रग रग में एक लहर से दौड़ गयी.... पीछे मूड के उसने कहा
"ज्योति बेटे...कैसी है मेरी गुड़िया".. कहके उसने अपने बाहें फेलाइ और ज्योति आके उसके गले लग गयी..
"व्हाट आ प्लेज़ेंट सर्प्राइज़.. कैसी हो बेटी.." अमर ने उसका माथा चूम के कहा और उसे अपने साथ वाली चेअर पे बिठा दिया
"मैं ठीक हूँ ताऊ जी, लेकिन आप सुबह सुबह ताई जी के साथ चाइ के मज़े.. हाउ रोमॅंटिक हाँ" ज्योति ने सुहासनी को चिढ़ाने के लिए कहा
"उफ्फ यह लड़की, छोड़ो यह सब, बताओ कैसी हो.. और पढ़ाई कैसी चल रही है.." सुहासनी को ज्योति और शीना एक समान थी, लेकिन अमर के दिल में ज्योति और शीना की तुलना होती थी, ज्योति थोड़ी ज़्यादा प्यारी थी उसे, शायद वो उससे दूर रहती थी तभी...
ज्योति राइचंद... अमर के छोटे भाई की एक लौति बेटी, ज्योति अभी मास्टर्स कर रही थी, दिमाग़ से बिल्कुल रिकी जैसी, लेकिन स्वाभाव बिल्कुल रिकी से अलग.. जहाँ रिकी एक ठहरे हुए पानी जैसा था, ज्योति एक बहते झरने सी थी.. पूरा दिन दोस्तों के साथ घूमना फिरना, बातें करते रहना, मोबाइल इंटरनेट और ना जाने क्या क्या... कोई भी टॉपिक, कोई भी डिबेट या आर्ग्युमेंट, ज्योति हमेशा डिसकस करने में लग जाती, अपने कॉलेज ग्रूप की लीडर जो थी.. शायद दिमाग़ और पैसा, दोनो का इस्तेमाल करना जानती थी, तभी तो अपने शहेर के एसीपी के लौन्डे को अपनी उंगलियों पे नचाती थी.. दिखने में शीना से कहीं ज़्यादा सुंदर, तीखे नें नक्श, हल्की भूरी आँखें, लंबे काले बाल.. ज्योति ने अपना ध्यान काफ़ी रखा हुआ था, शहेर में रहके जहाँ शीना को शहेर की हवा लगी हुई थी, वहीं ज्योति छोटे से शहेर में रहके बिल्कुल एक नॅचुरल ब्यूटी थी.. ज्योति की बस एक कमज़ोरी थी, जो हमें आगे देखने को मिल जाएगी
"पढ़ाई ठीक चल रही है ताई जी, नेक्स्ट मंत प्रॉजेक्ट सबमिशन और फिर फाइनल एग्ज़ॅम्स..." ज्योति ने जवाब में कहा
"तुम्हारा बाप कहाँ है, बाहर से तो नहीं चला गया डर के..हाहहः" अमर ने ठहाका लगा के कहा
"हम यहाँ है भैया.... ज़रा इधर भी देखिए.." अमर के भाई राजवीर ने पीछे से जवाब दिया
"अरे बेटे कहाँ हो, इधर माँ पूछ रही है और बिन बताए यूँ अचानक" अमर ने फोन उठाते कहा
"बीसीसीआइ के बाप का फोन आया था पापा, इसलिए अचानक जाना पड़ा मुझे पापा.. एलेक्षन्स के चलते इस साल के कुछ मॅच अबू धाबी में होंगे, अब अगर यहाँ से ऑपरेट करना है तो
यहाँ के बुक्कीस से भी सेट्टिंग करना पड़ेगा.. इसलिए कुछ ज़्यादा वक़्त लगेगा इधर, मेरे साथ हमारे नेटवर्क के कुछ आदमी आए हैं ताकि बात चीत करने में आसानी हो, और बीसीसीआइ के सेक्रेटरी भी हैं.." विक्रम ने जवाब में कहा
"ठीक है बेटे, कुछ दिक्कत हो तो कॉल करके बताना... चलो बाइ.." कहके अमर ने कॉल रखा और जैसे ही सुहासनी को कुछ बताता, तभी पीछे से किसी की मधुर आवाज़ उसके कानो में पड़ी
"गुड मॉर्निंग ताऊ जी....."
आवाज़ सुनते ही जैसे अमर के रग रग में एक लहर से दौड़ गयी.... पीछे मूड के उसने कहा
"ज्योति बेटे...कैसी है मेरी गुड़िया".. कहके उसने अपने बाहें फेलाइ और ज्योति आके उसके गले लग गयी..
"व्हाट आ प्लेज़ेंट सर्प्राइज़.. कैसी हो बेटी.." अमर ने उसका माथा चूम के कहा और उसे अपने साथ वाली चेअर पे बिठा दिया
"मैं ठीक हूँ ताऊ जी, लेकिन आप सुबह सुबह ताई जी के साथ चाइ के मज़े.. हाउ रोमॅंटिक हाँ" ज्योति ने सुहासनी को चिढ़ाने के लिए कहा
"उफ्फ यह लड़की, छोड़ो यह सब, बताओ कैसी हो.. और पढ़ाई कैसी चल रही है.." सुहासनी को ज्योति और शीना एक समान थी, लेकिन अमर के दिल में ज्योति और शीना की तुलना होती थी, ज्योति थोड़ी ज़्यादा प्यारी थी उसे, शायद वो उससे दूर रहती थी तभी...
ज्योति राइचंद... अमर के छोटे भाई की एक लौति बेटी, ज्योति अभी मास्टर्स कर रही थी, दिमाग़ से बिल्कुल रिकी जैसी, लेकिन स्वाभाव बिल्कुल रिकी से अलग.. जहाँ रिकी एक ठहरे हुए पानी जैसा था, ज्योति एक बहते झरने सी थी.. पूरा दिन दोस्तों के साथ घूमना फिरना, बातें करते रहना, मोबाइल इंटरनेट और ना जाने क्या क्या... कोई भी टॉपिक, कोई भी डिबेट या आर्ग्युमेंट, ज्योति हमेशा डिसकस करने में लग जाती, अपने कॉलेज ग्रूप की लीडर जो थी.. शायद दिमाग़ और पैसा, दोनो का इस्तेमाल करना जानती थी, तभी तो अपने शहेर के एसीपी के लौन्डे को अपनी उंगलियों पे नचाती थी.. दिखने में शीना से कहीं ज़्यादा सुंदर, तीखे नें नक्श, हल्की भूरी आँखें, लंबे काले बाल.. ज्योति ने अपना ध्यान काफ़ी रखा हुआ था, शहेर में रहके जहाँ शीना को शहेर की हवा लगी हुई थी, वहीं ज्योति छोटे से शहेर में रहके बिल्कुल एक नॅचुरल ब्यूटी थी.. ज्योति की बस एक कमज़ोरी थी, जो हमें आगे देखने को मिल जाएगी
"पढ़ाई ठीक चल रही है ताई जी, नेक्स्ट मंत प्रॉजेक्ट सबमिशन और फिर फाइनल एग्ज़ॅम्स..." ज्योति ने जवाब में कहा
"तुम्हारा बाप कहाँ है, बाहर से तो नहीं चला गया डर के..हाहहः" अमर ने ठहाका लगा के कहा
"हम यहाँ है भैया.... ज़रा इधर भी देखिए.." अमर के भाई राजवीर ने पीछे से जवाब दिया