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वक्त की धूल

सरजू नदी का तट ।

एक छोटा सा झोपड़ा, जहाँ एक बूढ़ा हिजड़ा मौजूद था । यह हिजड़ा सड़कों पर ढोल नहीं पीटता था, बल्कि उसकी एक नाव थी और लोगों को किश्ती से इस पार से उस पार ले जाया करता था ।

जब हीरा उस झोपड़े में पहुंचा तो बूढ़े ने उसे पुरजोश अंदाज में सीने से लगा लिया ।

“आ गई मेरी हीरा रानी... बड़े दिन के बाद आई मेरी बच्ची । कैसी है... ? आँखें तरसती हैं तेरे लिए, पूछ ले किसी से, हर आने-जाने वाले से पूछती थी तेरे बारे में, मेरी औलाद नहीं मगर औलाद की तरह चाहा है तुझे ।”

“मैं आ गई अम्मा ! अब मैं तुम्हारे साथ रहूंगी, मेरी यही दुनिया है अम्मा ! मैं न जाने अब तक कहाँ भटकती रही ।” अमर ने कहा ।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे । लेकिन बूढ़े हिजड़े की आँखों में खुशी के तूफान उमड़ रहे थे । उसने जोर से आवाजें लगाईं–-

“अरी गुलबदन....अरी गोरी....कहाँ मर गयीं सब की सब, तैयारियां करो....जश्न मनाओ...राम नगरी में हीरा रानी आ गई है हमेशा के लिए....अरी सुनती हो । मेरी हीरा आ गई अपनी अम्मा के पास, जल्दी करो...सबको खबर कर दो हीरा यहीं रहेगी ।”

और हिजड़े जश्न की तैयारियां करने लगे ।

हिजड़ों की यह सबसे पुरानी बस्ती कही जाती है । यह वही बस्ती है जहाँ भगवान राम का वापसी की समय सबसे पहले स्वागत किया गया था । जश्न की तैयारियां हो रही थीं । बावर्ची बुलाया गया और खाना पकने लगा ।

तीन दिन तक जश्न चलता रहा – दूर-दूर से नाचने वालियां या वाले आने लगे....कमाल दिखाने लगे...दौलत कमाने लगे...फिर बूढ़ी अम्मा उसे लेकर तीर्थ की ओर चल दीं जहाँ भगवान राम का मंदिर था, जहाँ केवट ने उनके पांव धोये थे ।

यहाँ खुशियाँ थी और वहाँ मातम था । एक तरफ चिराग जल रहे थे दूसरी तरफ चिराग बुझ रहे थे । अमर गायब तो पहले भी हो जाता था पर इस तरह कभी गायब नहीं हुआ था । राजा प्रताप सिंग को उसका पत्र मिल गया था । वह आँसू बहा रहे थे । गायत्री देवी का देहांत हो गया था । उनका शव भी न्यूयार्क से हिन्दुस्तान पहुँच गया था । शमशान में चिता जल रही थी और इसका धुआं चारों तरफ फैला हुआ था ।

धुआं ही धुआं....रेत ही रेत.... ।

और सबसे अधिक डॉली के दिल में अँधेरा था । वह जीते जी चिता जल रही थी । और उसके भीतर से भी धुआं उठ रहा था । अंदर भी धुआं, बाहर भी धुआं । सब गड्ड-मड्ड होकर रह गया था ।

राजा प्रताप सिंग ने भी बिस्तर पकड़ लिया था । अमर की बहुत तलाश की गई । उसे न मिलना था न मिला । दिन महीनों और महीने सालो में बदल गए । लोग अब अमर को भूल गए थे । मृत्यु शैय्या पर लेटे राजा प्रताप सिंग अपनी बहू अपनी बेटी को एक बार फिर सुहाग जोड़े में देखना चाहते थे – मरने से पहले वह अपने खानदान को यूँ डूबते नहीं देखना चाहते थे । डॉली अब उनकी बेटी थी । बेटी सुहागिन भी बन गई विधवा भी हो गई....कुंआरी भी रह गई....यह कैसी विडम्बना थी ?

आखिर डॉली को उनकी अंतिम आवाज सुननी ही पड़ी- और डॉली की शादी जय से हो गयी । जय उनका घर दामाद बनकर आ गया.... तब राजा जी सब कुछ उन्हें सौंपकर चैन से स्वर्गवासी हो गए ।

धीरे-धीरे जिंदगी सामान्य स्थिति की ओर लौटने लगी । धुआं भी छट गया । रेत भी उड़ गयी... कोहरा भी छंट गया । अब वहाँ एक चमकता सूर्य उदय हो रहा था । नयी सुबह थी...नयी जिंदगी थी ।

और यह जीवन शायद इसी तरह चलता है । वक्त की धूल इतनी गाढ़ी होती है कि सबकुछ अपने आप में ढांप लेती है । वक्त की इस धूल तले कुछ उजड़ गए....तो कुछ बन गए ।

बूढ़ी अम्मा भी स्वर्गवासी हो गयी और हिजड़ों की उस राम नगरी में हीरा नामक हिजड़ा अब भी रहता है । शायद उसे टी.बी. हो गई है, नाचता है तो खून आने लगता है । लेकिन अब पैसे कहाँ से आएं कि इलाज हो और फिर इलाज की जरूरत भी क्या है ? मौत तो मुकद्दर है और मुकद्दर से कौन लड़े.... ?

समाप्त
 
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