• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

वह लड़की भीगी सी

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
“क्या देख रहे हो? कभी कुछ देखा नहीं क्या?” उसने बड़े बेबाक अंदाज़ में पूछा।

“जी !” मैं एकदम से सकपका गया।

वह अजीब से अंदाज़ में हंसी… मैंने झेंप कर चेहरा घुमा लिया। इस वक़्त शाम के चार बजे थे मगर आकाश पर छाई घटाओं और बारिश ने दिन में ही रात कर दी थी। छुट्टी का दिन था इसलिए सड़कों पर ट्रैफिक भी न के बराबर था, मैं किसी काम से द्वारका आया था और इस वक़्त बस या ऑटो के इंतज़ार में एक सूने बस स्टॉप पर खड़ा था जो सेक्टर बारह के मेट्रो स्टेशन तक पहुँचा दे।

वह लड़की पास की एक बिल्डिंग से निकल कर आई थी और उसी स्टॉप पर आ खड़ी हुई थी… यहाँ तक आने में वो बुरी तरह भीग गई थी।

देखने में वो चौबीस-पच्चीस की उम्र की बेहद हसीं लड़की थी जो इस वक़्त एक चुस्त जींस और टी-शर्ट में थी। चुस्त कपड़ों की वजह से उसकी फिगर 36-30-38 के रूप में साफ़ नुमाया हो रही थी। उसके कपड़े भीग कर उसके तन से चिपक गए थे जिससे उसका ऊपरी हिस्सा साफ़ पता चल रहा था, ब्रा भी भीग गई थी जिससे उसकी तनी हुई चूचियों के चुचूक भी साफ़ दिख रहे थे और सच पूछिए तो मेरी नज़र उसी में अटकी थी। उसके बाल खुले हुए थे और भीग कर उसके कन्धों और पीठ पर फैल गए थे।

“सिग्रेट है?” उसने बड़ी बेतकल्लुफी से पूछा।

मैंने बड़ी शराफत से उसे सिग्रेट और लाईटर निकाल कर दे दिया। वह मेरे पास ही सरक आई और एक उत्तेजक परफ्यूम की खुशबू उसके भीगे तन की गंध के साथ मिक्स हो कर मेरे नथुनों से हो कर मेरे दिमाग में चढ़ गई, मैं मदहोश सा हो गया…

उसने सिग्रेट सुलगाई और पहले कश का धुआँ मेरे चेहरे पर छोड़ते हुए मुझे गौर से देखने लगी।

“कहाँ रहते हो?” उसके अंदाज़ में कुछ ऐसी बात थी जैसे मैं लड़की हूँ और वो लड़का।

“कृष्णा पार्क !” मैंने अपना संकोच और झिझक छोड़ कर उसकी गहरी काली आँखों में झाँका, मैं ये नहीं ज़ाहिर होने देना चाहता था कि मैं उससे कही कमज़ोर पड़ रहा था।

“इधर कैसे आ गए?”

“किसी काम के सिलसिले में आया था, मगर बारिश में फंस कर रह गया।”

“यहीं के रहने वाले हो? मेरा मतलब है दिल्ली के?”

“नहीं, भोपाल से हूँ, लेकिन यहाँ नौकरी करता हूँ।”

“गुड, जो देख रहे थे… पहले कभी देखे नहीं क्या, जो इतने गौर से देख रहे थे?”

“कई बार देखे हैं मगर हर बार नए लगते हैं…” जब वो खुद से बेशर्मी पे उतारू थी तो मैं कहाँ पीछे रहने वाला था- दरअसल भीगने की वजह से साफ़ दिख रहे थे इसलिए !

“हम्म… सुदेश को भी पसंद थे बहुत !” कहते हुए उसकी आँखे मुझ से हट के सड़क पर पड़ती बारिश में कही खो गईं जैसे किसी को देख रही हों।

“कौन सुदेश?” मैंने पूछ ही लिया.. जब वो खुद खुल रही थी तो मुझे खुलने में क्या ऐतराज़ था।

मौसम भी ऐसा मदहोश करने वाला था कि ऐसे में भी जो न बहके तो क्या?

“मेरा एक्स ब्वायफ्रेंड… उसे बहुत पसंद थे ये !” एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी आवाज़ में कोई मायूसी हो, किसी को खो देने वाली लेकिन उसने अगले पल में खुद को संभल लिया और एक विद्रूप पूर्ण मुस्कराहट के साथ मुझे देखने लगी- पर वो औरों की तरह पजेसिव होने लगा था… बात बात पर शक करना, टोकना, चिड़चिड़ाना, मेरी जासूसी करना… आई डोंट लाईक इट। मैं जयपुर से हूँ और यहाँ नौकरी करती हूँ, अकेली रहती हूँ और आज़ाद ज़िन्दगी जीती हूँ। मुझे शादी और उसके बाद की बंधी टकी ज़िन्दगी बिलकुल नहीं पसंद। मेरी नज़र में ज़िन्दगी मौज मस्ती है न के कोई ज़िम्मेदारी। मैं किसी पुरुष को अपने ऊपर अधिकार नहीं दे सकती … मेरे लिए वो ‘यूज़ एंड थ्रो’ आइटम है, इस्तेमाल करो और जब जी भर जाए, फेंक दो।

कमाल है… ऐसे मौसम में जब मैं घर पहुँचने के लिए फिक्रमंद हो रहा था मुझे एक सूने बस स्टॉप पर मेरे जैसी ही कमीनी लड़की मिल गई थी जो खुद से चाँद मिनटों की मुलाक़ात में ही खुली जा रही थी।

“क्या सोच रहे हो?” उसने जैसे मेरी आँखों में उतर कर मेरे मन को पढ़ने की कोशिश की- मैं इतनी जल्दी खुल कैसे गई.. मैं ऐसी ही बिंदास हूँ। वैसे एक बात और भी है… सामने वाला भी मुझे पसंद आना चाहिए।

मेरा दिल जोर से धड़का… क्या कह रही थी वह?

मैं उसे पसंद आ रहा था !

“सुदेश के बाद से खाली हो?” मैंने होंठों पे जुबां फेरते पूछा।

“हाँ… वीक हो गया और कोई मिला ही नहीं अब तक। तुम्हें खुले दिमाग की लड़कियाँ पसंद हैं या वो शर्मीली, सकुचाई जो सम्भोग के आनन्ददायक पलों में आँखें बंद कर के धीरे धीरे सिसकारती हैं?”

“सच कहूँ तो मुझे वो लड़की पसंद आती है जो बाहर भले खुद को नकाब में छुपाये रखे और किसी को जल्दी छूने तक न करने दे लेकिन सम्भोग के पलों में किसी रंडी की तरह व्यवहार करे !” मैंने भी सीधे मन की बात कह दी और यह सुन कर उसकी आँखें चमक उठीं।

“और खुद नेचर में कैसे हो… सुदेश की तरह पजेसिव?”

“नहीं, मैं आम खाने से मतलब रखता हूँ, गुठलियाँ गिनने से नहीं। मुझे लाइफ में पहली बार मेरी बीवी ने यूज़ किया और मुझे उस तरह यूज़ होने से ऐतराज़ हुआ लेकिन उसके बाद से मैं खुद को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मैं भी इस यूज़ होने से अपना उल्लू साधूँ।”

“मतलब शादीशुदा हो?”

“नहीं, तलाकशुदा ! जिस लड़की के साथ शादी हुई थी वो किसी से सेट थी और उससे शादी होने में कई अड़चने थीं, सो उसने घर वालों के जोर डालने पे मुझसे शादी कर ली लेकिन मुझे तो हाथ भी न लगाने दिया और अपने यार से ठुकती रही.. उसका मतलब ही यही था कि मैं सब जान कर उसे तलाक दे दूँ और वो एक सेकेण्ड हैण्ड सामान की तरह अपने यार के घर पहुँच जाए और उसके घरवाले भी ऐतराज़ न कर पायें। मैंने उसकी मर्ज़ी पूरी कर दी लेकिन अब शादी से नफरत हो गई… मेरी ज़िन्दगी का उसूल भी ‘यूज़ एंड थ्रो’ हो गया है अब। बल्कि अब मैं तो खुद ही कहता हूँ कि आओ… मुझे यूज़ करो। मुझे कोई परमानेंट रिलेशन नहीं चाहिए, बस कैजुअल रिलेशनशिप ही ठीक है और मैं इसी लाइन पे चलता हूँ।”

“हम्म, मतलब मेरे ही जैसे हो।” उसने सिगरेट का काम तमाम कर के उसे बहार की भीगी हवा में उछाला और मेरी तरफ देखते हुए अर्थपूर्ण स्वर में कहा, “साइज़ क्या है?”

“6×2” कहते हुए मेरे स्वर में हीनता का पुट था।

“इम्प्रेसिव… मैंने अक्सर लोगों को कहते देखा है कि मेरा 7, 8, 9, इंच तक है… अन्तर्वासना पर भी कहानियों में अक्सर लोगों को यही लिखते देखा है जबकि एशियन कॉन्टिनेंट में यह साइज़ नहीं होता, कुछ अपवाद ज़रूर होते हैं। हालाकि सेक्सुअल सैटिसफिक्शन का लम्बे अंग से लेना देना नहीं होता… योनि बोतल जैसी होती है पहले मुंह, फिर गर्दन और आगे बोतल का पेट … योनि में घर्षण को महसूस करने वाली सारी मांसपेशियाँ इसी गर्दन टाइप डेढ़ दो इंच के संकरे पैसेज में होती हैं जिसे 4 इंच के अंग से भी महसूस किया जा सकता है।”

मैंने राहत महसूस की।

“तुम्हारे घर में कोई टोका टोकी करने वाला तो नहीं… मतलब देर से क्यों आये? रात में कहाँ थे? वगैरा वगैरा…?”

“नहीं ! मैं अकेला रहता हूँ यहाँ।”

“गुड, ऑटो आ रहा है… फैसला तुम्हारे हाथ में है, मेट्रो स्टेशन जाना है या मेरे फ्लैट पर !”

अब ऐसी मिलती चीज़ को कोई भला यूँ ही छोड़ता है। उसने ऑटो रुकवाया और मैं भी उसके साथ ही बैठ गया। ऑटो वाला शीशे में बार बार उसे देख रहा था लेकिन वह बाहर कहीं बारिश में देख रही थी। ऑटो ने कुछ मिनट में हमें सेक्टर बारह की एक बिल्डिंग तक पहुँचा दिया जिसमें उसका फ्लैट था।

उसकी रिहाइशगाह उसके जैसी ही डीसेंट और सुसज्जित थी।

“तुम टीवी देखो, मैं बुरी तरह भीग गई हूँ… चेंज करके आती हूँ।”

वह चली गई और मैं बैठ कर टीवी देखने लगा… करीब दस मिनट बाद वो वापस अवतरित हुई तो सिर्फ सिल्क के गाउन में थी और ऐसी सेक्सी लग रही थी कि मेरे पप्पू को सर उठाना ही पड़ गया। मैं टीवी से निगाहें हटा कर उसे देखने लगा। वो मेरे पास ही आकर बैठ गई।

“कैसी लग रही हूँ?”

“बहुत खूबसूरत… पर मेरे ख्याल से इन कपड़ों के बगैर ज्यादा अच्छी लगोगी।”

उसने मुस्कराते हुए गाउन को अपने जिस्म से अलग कर दिया… एक पल के लिए भी ऐसा न लगा वो असहज हुई हो। मेरी आँखें चमक कर रह गई… कुंदन सा बदन आवरण रहित होकर मेरी आँखों को चुन्धियाने लगा… पूरा जिस्म जैसे संगमरमर की तरह तराशा हुआ था। दिलकश चेहरा, खुली घनेरी जुल्फें, पतली सुराहीदार गर्दन, गोल मांसल कंधे, भरी और कसे हुए वक्ष, जिनके अग्रभाग पे गुलाबी सी नोक और आसपास बड़ा सा कत्थई घेरा, उनके नीचे नाज़ुक सी कमर और पेडू के नीचे बेहद हल्के रोयें जैसे अभी परसों ही शेव की हो और उनकी घेराबंदी में वो ज्वालामुखी का दहाना… जिसके गहरे रंग का ऊपरी हिस्सा मुझे मुँह चिढ़ा रहा था।

“बेचारा परेशान हो रहा है।” उसने मेरे पप्पू की तरफ इशारा किया जो पैंट में तम्बू की तरह तन गया था।

मैंने उसका आशय समझ कर अपने कपड़े उतारने में देर नहीं लगाई। चूँकि मैं एक अच्छे कसरती शरीर का स्वामी था इसलिए उसे पसंद न आने का सवाल ही नहीं था… बाकी मेरा पप्पू ज़रूर मेरे हिसाब से छोटा था लेकिन वो उसके साथ संतुष्ट थी तो ठीक ही था। मैं उसके पास ही बैठ गया।

“कुछ खाओगे?”

इस हालत में भी खाना?

“हाँ ! तुम्हें।”

उत्तर तो देना ही था और सुन कर वो मादक अंदाज़ में हंस पड़ी।

अब मेरा एक हाथ उसके एक कंधे पर था और दूसरा स्पंजी चूचियों को सहला रहा था और उसने मेरे पप्पू को अपने हाथ से पकड़ कर अंगूठे से टोपी को रगड़ना शुरू कर दिया था।

 
मैंने उसका आशय समझ कर अपने कपड़े उतारने में देर नहीं लगाई। चूँकि मैं एक अच्छे कसरती शरीर का स्वामी था इसलिए उसे पसंद न आने का सवाल ही नहीं था… बाकी मेरा पप्पू ज़रूर मेरे हिसाब से छोटा था लेकिन वो उसके साथ संतुष्ट थी तो ठीक ही था। मैं उसके पास ही बैठ गया।

“कुछ खाओगे?”

इस हालत में भी खाना?

“हाँ ! तुम्हें।”

उत्तर तो देना ही था और सुन कर वो मादक अंदाज़ में हंस पड़ी।

अब मेरा एक हाथ उसके एक कंधे पर था और दूसरा स्पंजी चूचियों को सहला रहा था और उसने मेरे पप्पू को अपने हाथ से पकड़ कर अंगूठे से टोपी को रगड़ना शुरू कर दिया था।

“मैं अभी आती हूँ।” कह कर वो उठी और चली ही गई।

लेकिन दो मिनट में ही वापस लौट आई, अब उसके हाथ में एक फाइबर का कटोरा था जिसमें कोई लिक्विड था।

“यह क्या है?”

“लिक्विड चॉकलेट है… यह मस्त है, मेरी बनाई।”

और उसने उंगली से थोड़ी लेकर मेरे होंठों पर फिराई, मैंने उसकी उंगली अन्दर ले ली और उसे चूसने लगा। फिर उसने उंगली से थोड़ी और लेकर अपने एक चुचूक पर लगाई और मुझे उसे मुँह में लेने के लिए और पास खिसकना पड़ा। एक हाथ मैंने दूसरी चूची के साथ लगा दिया और होंठों से दूसरे के निप्पल से चॉकलेट का स्वाद लेने लगा। उसके मीठे स्वाद के साथ उसके जिस्म से उठती भीनी भीनी खुशबू भी रल-मिल रही थी।

इधर की चॉकलेट ख़त्म हुई तो उसने दूसरे निप्पल पर लगा दी। मैं उसका रसपान करने लगा… अब मैं खाली पड़ा हाथ उसकी ऊपर से लकीर सी दिखती मुनिया पे ले गया और उसे उंगली से खोदने लगा जो पानी से चिपचिपी हो रही थी। वो अपने हाथ से मेरा सर सहला रही थी। दोनों चूचियाँ इस चुसाई से कठोर हो गई थीं और उनकी घुन्डियाँ भी तन कर कड़ी हो गई थीं।

कुछ देर बाद उसने मुझे आहिस्ता से अलग किया और मेरे एकदम टाईट खड़े पप्पू को सहलाने लगी.. फिर खुद पीछे खिसक कर अधलेटी सी हो गई और कटोरे से चॉकलेट लेकर मेरे लंड को उसमें लपेट दिया और जब लंड पूरी तरह लिक्विड से सन गया तो उसने मुँह खोल कर सुपारे को अन्दर ले लिया और बड़े मस्त अंदाज़ में चूसने लगी।

मैंने सोफे की पुष्ट से टेक लगाई, अपना हाथ उसकी मस्त उभरी हुई गाण्ड पर फिराने लगा और उंगली से उसके छेद को खोदने लगा।

कुछ मिनट की चुसाई में लंड बिल्कुल साफ़ तो हो गया लेकिन इस ज़बरदस्त अनुभव के बाद ऐसा लगा जैसे पानी अब छूटा कि अब छूटा।

“सॉरी ! लगता है निकल जाएगा।” मैंने कराहते हुए कहा।

“हम्म… ऐसे न वेस्ट करो… एस-होल में निकाल दो.. वो भी गीला होता रहेगा। मुझे अच्छा लगता है जब मर्द का रस योनि या एस-होल से धीरे धीरे बहता रहता है।” कहते हुए वो सोफे पे ही घुटने के बल बिल्ली जैसी पोजीशन में आ गई और उसने अपने चूतड़ मेरे सामने कर दिए।

इस रगड़ा-रगड़ी से और मेरे खोदने से गुदा का छेद भी दुपदुपाने लगा था। मैंने ढेर सा थूक उसमें डाला और छेद को अंगूठों के दबाव से फैलाया, थोड़ा थूक अन्दर गया और थोड़ा बाहर फैल गया।

मैंने सुपारे को छेद पे टिका के दबाया, उसकी चटाई से वो गीला और चिकना हो चुका था… चुन्नटें फैली और वो आराम से गहराई में उतर गया। उसके मुँह से एक मस्ती भरी धीमी सिसकारी छूटी।

“अभी गेम बाकी है, थोड़ा कंट्रोल करके !” उसने गर्दन घुमा कर मुझे देखा।

मुझे पता था, मैंने दो चार धक्के लगाये, अन्दर के कसाव और गर्मी ने एकदम से निचोड़ना चाहा और मैंने ध्यान ऐसा हटाया कि पहली पिचकारी में ही बस हो गया। फिर कुछ बुज्जे छूटे… वो पैर सीधे करके औंधी ही लेट गई और मैं भी उसी पोजीशन में लंड घुसाए घुसाए उस पर लेट गया।

दो मिनट में लंड ढीला होकर बाहर निकल आया और फिर हम उठ बैठे।

उसने लंड को खास अंदाज़ में भींचना शुरू किया और चूंकि वो पूरी तरह स्खलित नहीं हुआ था इसलिए वापस खड़ा होने लगा तो उसने चॉकलेट का कटोरा मुझे थमा दिया।

उसका मंतव्य समझ कर मैंने उसमें से चॉकलेट लेकर उसके पेट, नाभि और योनि पे लगा दी… उसकी कलिकाएँ छोटी ही थी और गीली हो चुकी कली जैसी चूत बड़ी प्यारी लग रही थी। वो सोफे पर ही सुविधाजनक अंदाज़ में टाँगे फैलाये लेट गई और मैं उसके जिस्म से चॉकलेट को चाटने लगा… चूत चाटते वक़्त मैंने बीच की उंगली अन्दर डाल दी जो पानी पानी हो रही थी और क्लिटारिस हुड को जुबां से छेड़ते वक़्त उंगली से उसे बाकायदा चोदने लगा।

वो बुरी तरह ऐंठने लगी।

जब उसे लगा कि वो झड़ जायेगी तो उसने दोनों हाथों से मेरे सर को अपनी बुर पर ऐसे दबा दिया कि मेरे लिए सांस लेना मुश्किल हो गया। वो जोर से कांपी और बुर से नमकीन पानी उबल कर बाहर आया पर मैंने उसे भी ग्रहण कर लिया और फिर वो ढीली पड़ गई तो मैं ऊपर आ गया।

उसने मेरा इशारा समझा और लंड को फिर मुँह में ले लिया और सिर्फ दो मिनट में खास अंदाज़ में चाट कर तैयार कर दिया।

फिर सोफे पे ही अधलेटी अवस्था में आकर उसने एक टांग नीचे लटका ली और दूसरी पुष्ट पर चढ़ा ली। चढ़ा ली। प्यार से अपनी चूत को थपथपाया और मैं उसकी टांगो के बीच में आ गया, लंड को चूत के छेद पर सटाया तो उसे गीली और चिकनी चूत में अन्दर जाने में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी… आराम से अन्दर उतरता चला गया।

वो सेक्सी अंदाज़ में होंठ चबाते हुए मुस्कराई और मैंने धक्के लगाने शुरू कर दिया।

उसकी ‘आह… ओह्ह… आह… आह…’ चालू हो गई जो मेरे कानों में रस घोल रही थी।

थोड़ी देर के धक्कों के बाद उसने मुझे रोक दिया और मुझे अलग करके सोफे से टिकते नीचे फर्श से पीठ टिका ली और दोनों खुली टांगें हवा में फैला दी… इस तरह उसकी ताज़ी चुदी बुर हल्के फ़ैलाव के साथ अब मेरे सामने थी और मुझे उसे चोदने के लिए अपना लंड नीचे करके उसमे घुसाना पड़ा। एकदम नया स्टाइल था मगर मैं छोटे लंड की वजह से इस आसन को ज्यादा एन्जॉय नहीं कर सका और जल्दी ही वो भी सीधी हो गई।

“एक काम करो… पीछे से करो !”

और वो सोफे पे ही चौपाये की तरह हो गई और कमर अन्दर दबाते हुए अपने चूतड़ ऐसे उभारे कि उसकी चूत निकल कर जैसे मेरे सामने आ गई… मैंने लंड टिका कर अन्दर सरकाया, वो आराम से अन्दर चला आया और मैंने उसके गोरे नितम्ब थपथपाते हुए तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा। वो हर धक्के पर जोर जोर से सिस्कार रही थी। साथ ही लंड के अन्दर जाने के वक़्त अपनी मांसपेशियों को सिकोड़ लेती और बाहर निकलने के वक़्त ढीला छोड़ देती।

“कैसा लग रहा है?” उसने सिसकारियों के बीच में पूछा।

“अमेजिंग !” मेरे मुँह से निकला।

“फक्क माय एस !” उसने मुझे आदेश दिया।

ओह ! यह तो मेरा फेवरिट आइटम है, मैंने ख़ुशी ख़ुशी लंड बाहर निकाल कर मेरे ही वीर्य से गीले हो कर बह रहे गुदा द्वार में ठेल दिया… लंड आराम से अन्दर उतरता चला गया और अन्दर की चिकनाहट में ज़रा भी परेशानी नहीं हुई और आराम से अन्दर बाहर होने लगा।

अब वो कुतिया सी बनी हुई थी और मैं उसकी कमर पकड़े जोर जोर जोर से उसे चोद रहा था।

हाल में जैसे गर्म बेतरतीब सांसों का तूफ़ान आ गया और उसकी उत्तेजक सिसकारियों के साथ हमारे संगम की फच्च-फच्च की आवाजें आग भर रही थीं। वो चरम पर पहुँचने लगी तो जोर जोर से किसी रांड की तरह गन्दी गन्दी गलियों के साथ मुझे उकसाने लगी, मैं और भी उत्तेजित होकर उसके साथ ही गालियाँ बकते हुए उसे और तेज़ चोदने लगा।

और जल्दी ही एक तेज़ कराह के साथ वो अकड़ गई… अंतिम पलों में उसने अपनी मांसपेशियों को ऐसे सिकोड़ा कि मेरे पप्पू का दम भी साथ ही निचुड़ गया और मैंने उसे कस कर थाम कर पूरी ट्यूब अन्दर ही खाली कर दी।

फिर दोनों अलग हो कर सोफे ही पर पड़े पड़े बुरी तरह हांफने लगे।

यहाँ से उसके मुझे यूज़ करने की शुरूआत हुई जो करीब 3 महीने चली, जब तक कि उसे मुझसे बेहतर ऑप्शन नहीं मिल गया।

कहानी कैसी लगी, मुझे ज़रूर बताएँ…

 
Back
Top