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वारदात complete novel

इन्सपेक्टर सूरजभान ने वापस आकर अपने आँफिस में प्रवेश किया ही था कि फोन की घन्टी को बजते पाया । आगे बढकर उसने रिसीवर उठा लिया ।

" हैलो , इन्सपेक्टर सूरजभान दिस साईड ।" …

“इन्सपेक्टर सूरजभान मैं खेड़ा बोल रहा हूं। सोहन लाल खेड़ा I"

" कहिए i" सूरजभान मन ही मन सतर्क हो गया ।

"इन्सपेक्टर साहब, मै अपने बेटे अरुण और दिवाकर-सूऱज हेगडे का पता बताना चाहता हूं।"

"इसकों मतलब आप जानते थे कि वह इस समय कहां पर हैं?"

"नहीं, जब तुम मुझसे मिले, तब मैं नहीं जानता था, परन्तु तुम्हारे जाने के वाद किसी से फोन करके मालूम किया कि वह लोग कहां हैं l ना चाहते हुए भी मुझे बताना पड़ रहा है कि मेरा बेटा और उसके दोस्त कहां पर हैं । दरअसल एक जुर्म तो कर ही चुके हैं । दूसरा उन्होंने अपने ही दोस्त की हत्या करके किया । मैं नहीं चाहता कि हालातों से मजबूर होकर वह अपने जुर्म की जंजीर में कडियां बढाते रहें इस समय वह डरे बैठे होंगे और घवराँहर्ट में वह कोई औरे जुर्म भी कर दें तो कोई बडी बात नहीं I"

" आप ठीक कह रहे है !"

"इन्सपेक्टर मेरे बेटे का ध्यान रखना । अगर हो सके तो… I” सोहन लाल जी की आवाज में भर्राहट थी ।

"आप चिन्ता मत कीजिए । मुझसे जो बन पड़ा, वह तो मैँ करूंगा ही, परन्तु उन लोगों को अपने किए की सजा अवश्य मिलेगी l, कानून कोई मजाक नहीं है जो चाहे उससे खेलना शुरू कर दे l"

"तुम ठीक कह रहे हो l"

" आप मुझें उस जगह के बारे मेँ बताइए जहा पर 'वह तीनों मोजूद हैं I”

सोहन लाल खेड़ा ने जिन्दल से मालूम हुए कमरे का पता सूरजभान को बता दिया ।

“शुक्रिया खेडा साहब, आपने उनके बारे मे बताकर कानून की बहुत बडी सहायता की हे I"

" कुछ भी समझो I मेरा बेटा बुरा ही सही, नशेडी ही सही, डकैती और खूनी ही सहीँ परन्तु यह उसके जुर्मों की शुरूआत हे । अभी तो फिर भी बचने कै चासिंज हे, सजा कम हो सकती है l अगर उसके जुर्मों की जंजीर बढ गई, लम्बी हो गहूँ तो फिर वह कभी वापस ना लोट सकेगा । अभी तो फिर भी थोड्री-व्रहुत गुंजाइश बची, हे. उसके सही राह पर लौट आने क्री । हो सके तो उन्हें कम ही सजा दिलवाना I"

"आपकी बात का -मैँ पूरा ध्यान रखूंगा !" इन्सपेक्टर सूरजभान ने रिसीवर रखा और चपरासी को बुलाकर तेज स्वर मे' कहा----"सब-इन्सपेक्टर कोहली को भेजो-। जल्दी !"

"जी ।“ चपरासी जल्दी से पलटकर बाहर निकल गया !!

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अंजना रात को स्टेशन के सामने से कल वाली ही बस पर चढ़ी और भीतर पहुंचकर कल वाली ही सीट पर बैठी ।

मन ही मन वह भगवान का नाम ले रही थी कि उस पुलिस वाले से उसकी मुलाकात हो जाए। कुछ आगे जाने पर बस कुछ खाली हुई तो उसने कंडक्टर कै पास जाकर कल वाले पुलिस वाले के बारे में पूछा ।

कंडक्टर उसे देखते ही पहचान गया कि यह कल वाली वही युवती हे जिसका हैंडबैग बदमाशों ने छीन लिया था ।

बहरहाल कंडक्टर ने भी असमर्थता प्रकट की उस पुलिस वाले कै बारे में कि वह उसे नहीं जानता।

अंजना गहरी सांस लेका वापस अपनी सीट पर आ बैठी । उसके पीछे वाली सीट पर जिन्दल का असिस्टेंट अशोक मौजूद था जो कि पिछले कई घंटों से उसके पीछे लगा, उसकी हरकतों पर निगाह रख रहा था ।

आधा घंटा गुजरने कै बाद अंजना की बेचैनी बढ़ गई । जिस स्टॉप पर भी बस रुकती, अंजना गर्दन घुमाकर प्रवेश द्वार की तरफ देखने लगती और फिर जब एक सुनसान जगह पर मौजूद स्टॉप पर बस रूकी और अजय सिन्हा बस में चढा तो उसे पहचानते हीँ अजना का दिल जोरों से.धड़क उठा । चेहरे पर प्रसन्नता से भरी लहरें उछाले मारने लगीं । उसे देखते ही वह पहचान चुकी थी कि वह कल वाला ही पुलिस वाला हे जोकि आज सादे कपडों में हे । उसका इस तरह आज आना स्पष्ट जाहिर करता है कि रात बदमाशों से उसने हैंडबैग छीन लिया होगा ।

अजय सिन्हा ने भी एक ही निगाह में अंजना क्रो पहचान लिया था कि वह कल वाली ही युवती है l मन ही मन उसने चैन की सांस ली कि युवती क्रो तलाश करने की मेहनत बेकार नहीं गई । उसकी मेहनत रंग ले ही आई l

टिकट लेकर वह आगे बढा और अंजना के बगल में जा बैठा । अशोक तनिक आगे सरक आया उनकी बातें सुनने कै लिए ।

हुलिए के आधार पर उसने पहचान लिया था कि यहीँ कल वाला पुलिस वाला है जो बदमाशों के पीछे बैग हासिल करने कै लिए दौड़ा था । राहुल ने उसे पुलिस बाले का हुलिया बहुत अच्छी तरह समझाया था ।

"कल तो आप पुलिस की वर्दी में थे?" अंजना आवेश में कापते स्वर में बोली ।

“ जी , कल में पुलिस की वर्दी में ही था ।" अजय ने अजीब-सी मुस्कान कै साथ कहा-"दरअसल पैं पुलिसं वाला नहीं हू । छोटा-सा स्टेज आर्टिस्ट हू । कल के ड्रामे में मेरा पुलिस इन्सपेक्टर का रोल था । समझी आप ? कल स्टेज करके लोट रहा था । मेरे कपडों का बण्डल कहीं खो गया था, नहीं तो मैं थियेटर से ही कपडे बदलकर आता और आपने और बस के यात्रियों ने समझ लिया कि मै असली पुलिस वाला हूं और मुझे उन बदमाशों के पीछे जाने पर मजबूर कर दिया ।"

अंजना तो हेंडवेग के बारे में जानने के लिए उतावली हुई जा रही थी ।

"वह हैंडबैग जो वह दोनों बदमाश लेकर भागें ?"

"हैंडबैग तो मैंने बदमाशों से हासिल कर लिया था ।” अजय ने उसकी बात काटकर कहा ।

"कं हां… है?” अंजना की आवाज कांपकर रह गई ।

“मेरे पास है, सुरक्षित है ।”

"साथ क्यों नहीं लाए आप ? "

"मुझे क्या पता था कि आपसे मुलाकात हो जाएगी I" अजय ने गहरी सांस लेकर कहा-----" सही पूछिए तो अगर उसमें तीस हजार कैश न होते तो शायद मै आपकी तलाश करने की चेष्टा भी न करता ।"

"मुझे उन पैसों की सख्त जरूरत थी ।” अंजना कम्पित स्वर मे बोली ।

"मैंने भी यही सोचा था कि जिसका तीस हजार रुपया चला गया हे, उसकी क्या हालत हो रही होगी । वेसे मुझें खुद पैसे की सख्त जरूरत है. परन्तु न जाने क्यों मेरा मन तीस हजार देखकर भी बेईमान नहीं हुआ I इसका एक कारण भी है । घर में मां है । धार्मिक विचारों वाली हे । उसके होते हुए कोई गलत काम करना भी कठिन हे I" अजय मुस्करा पडा-"अगर मैं तीस हजार रुपया रख, लेता तो मां को देर-सवेर में मालूम हो ही जाना था, फिर मैँ क्या जवाब देता कि यह पैसा मैं कहा से लाया I"

"आपकी मां का भी बहुत-बहुत शुक्रिया I" अजमा दिल से पार्वती देबी की शुक्रगुजार हुई । उसे तीस हजार की परवाह कहां थी I उसे तो हैंडबैग की छिपी जेब में पडी स्टेशन कै क्लाकरूम की रसीद की चिन्ता हो रहीँ थी जिस रसीद का छोटा-सा वजूद, कई लाखों रुपृयों में था ।

"आपने अपना नाम नहीं बताया" I" अजय ने पूछा ।

"अंजना ।"

"मेरा नाम अजय है , कहां रहती हैँ आप?" अंजना ने अपने घर का पता बताया फिर बोली I

"मेँ आपके साथ आपके घर चलती हू I वह हैंडबेग मुझे दे दीजिएगा I”

"कभी नहीं I” अजय के होठों …से निकला I "क्यों ??" अंजना का दिल धडक उठा I

"रात बहुत हो चुकी है । आप मेरे साथ जायेंगी तो मां को जवाब देना कठिन हो जाएगा I आप नृहीं जानतीं मां को I इन मामलों में वह बहुत सख्त मिजाज की हैं I उन्हें मालूम हो गया कि इतनी रात गए मैं जवान लडकी के साथ था, वह मेरे कान खा लेगी । मुझे बुरा-भला कहेंगी l दो-चार दिन तो खाना भी खुद बनाना पड़ेगा I आप तो चली जावेंगी-परन्तु मेरी जान आफत में पड़ जाएगी l”

"मैं बाहऱ खडी रहूंगी I आप ....l”

“नहीं हैँडवेग जेसी चीज को मां की निगाहों से छिपाकर रात के समय बाहर लाना कठिन है I आपने अपने पर का पता तो बता दिया है, मैं कल आपको हैँडबेग दै जाऊँगा l”

"मेरे धर पर ?” अजना बेचैनी के सागर में छलांगें लगाने. लगी ।

"हां l"

“अगर आप हैंडबैग दे देतें तो आपकी बहुत मेहरबानी होती .... मैँ !!"

"आपकी चीज हे, भला मुझे देने में क्या एतराज हो सकता हे l लेकिन हैंडबैग आपको कल सुबह ही मिलेगा ।" अजय ने मुस्कराकर सामान्य स्वर में कहा ।

अजना तो जल्द से जल्द डेंडबेग पाना चाहती थी । परन्तु अजय के इन्कार पर वह इतना जोर नहीँ देना चाहती थी कि यूं ही वह शक करने लगे । रात के कुछ ही धंटों की तो वात थी । सुबह अजय ने उसे हैँन्डबैग देही जाना था l

"कल सुबह आप पक्का मुझे वह हैंडबैग देने आयेंगे न?”

"पवके से भी पक्का l”

अजना ने एक बार फिर अपने घर का पता दोहराया ।।
 
पता अच्छी तरह याद करके अजय उठ ख…ड़ा हुआ । अंजना उसे जाने नही देना चाहती थी, परन्तु उसे रोक पाना भी सम्भव -नहीँ था ।।

उसे पूरा विश्वास था कि अजय सुबह अवश्य उसे हैंडबैग दे जाएगा ।

"मैं कल आऊँगा हैंडबैग लेकर..... ।" अजय ने कहा और बस कै उतरने वाले दरवाजे की तरफ आगे को बढ़ गया ।

पीछे बैठे अशोक ने सारी बातें सुनीं । वह भी अपनी सीट से उठा और अगले स्टॉप पर बस रुकने पर अजय कै पीछे वह भी उतर गया और अजय पर निगाह रखते हुए, उसका पीछा करते हुए उसका घर देख लिया था अशोक ने i

बसन्त और महबूब सुबह से ही अंजना के धर की गली कै आसपास टहल रहे थे I वह जब अजना से पूछताछ करने आए थे , तो घर का दरवाजा बाहर से वन्द पाया ।

तब से हीँ वह अंजना की वापसी की राह देख रहे थे l मन ही मन वह कुढ रहे थे कि साली सुबह से कहां जा मरी है, कहां गई होगी?

बहरहाल रात को बारह बजे उन्होंने अंजना को लौटते देखा ।

"महवूब, वह आ रही है I" बसन्त उसके कान में बोला ।

"आं पकड ले साली क्रो ।"

"अभी नहीं गली-मुहल्ले की बात हे जरा भी चीख पडी तो दसियों लोग आ जायेगे ।"

“फिर ?"

“इसे धर में घुसने दे । जब यह दरवाजा बन्द कर रही होगी तब… ।"

“समझ गया मैं… !!"

अंजना की सारी मायूसी अब समाप्त हों चुकी थी । दौलत के साथ सुनहरी भविष्य के सपनों को वह फिर से देखने लगी थी । दौलत हाथ से निकलकर फिर उसके हाथ आ गई थी । सुबह उसने फिर लाखों रुपयों की मालिक होना था l

' इन्हीं सोचों में डूबी. उसने अपने घर का ताला खोला और भीतर प्रवेश कै दरवाजा बन्द करने लगी कि दरवाजे को बाहर से तीव्र धक्का लगा । दरवाजे का पल्ला उसके कंधे से लगा । वह लड़खड़ाकर नीचे गिरी । उससे पहले वह सम्भल पाती, बसन्त और महबूब ने भीतर प्रवेश किया । महबूब ने फौरन अपनी हथेली उसके मुंह पर टिका दी, ताकि वह चीख न सकै और बसन्त ने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया और कमरे मेँ रोशनी कर दी।

अंजना कै होठों पर सख्ती से हथेली जमी हुई थी । फटी फटी आंखों से वह दोनों क्रो देख रही थी पहचानने में उसे जरा भी देर न लगी कि यह कल वाले ही दोनों बदमाश हें, जिन्होंने उससे हैंडबैग छीना था ।

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फीनिश

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अजय घर पहुंचा। हमेशा की भाँति उसने दरवाजा खटखटाया, परन्तु दरवाजा नहीं खुला I दो-चार बार ओर भी थपथपाने पर दरवाजा नहीं खुला तो उसे बहुत हैरानी हुई ।

आखिरकार उसने पीछे वाले कमरे की खुली खिडकी से भीतर प्रवेश किया । सारा धर घूमा ।

मां पार्वती देवी अपने वेड पर लोई हुई थी I

"माँ !" अजय ने आगे बढकर मां को जगाया ।

परन्तु पीर्वत्ती देवी कहां अब उठने बाली थीं। वह तो हमेशा की लिए ही सो चुकी थीं । भगवान ने उनके प्राण-पखेरू , . छीन लिए थे ।

बैड पर तो उनका नश्वर शरीर ही पड़ा था l अजय अपनी मां के मृत शरीर से लिपटकर बिलख-बिलखकर रो पड़ा I रोते हुए वह बच्चों की तरह मां को पुकारता रहा। पार्वती के शरीर को जोर जोर से हिलाता रहा ।

"अगर नुह से जरा भी आवाज निकली तो गर्दन काटकर रख दुंगा I" मेहबूब खतरनाक स्वर में गुर्रा उठा I उसकी हथेली अंजना के होठों पर टिकी हुई थी ।

अंजना छंटपटाकर रह गई I

“बोल !"

"चीखेगी ?" महबूब पुन: गुर्राया ।

अंजना ने सिर हिलाकर इस्कार किया ।

“अगर I" ,बसन्त ने चाकू निकाला और उसके करीब आकर उसकी आंखों कै सामने लहराता हुआ बोला----"जरा भी खामखाह की आवाज निकाली तो यह चाकू देख रही हो न । पूरा का पूरा तेरे पेट में होगा ओर पीठ से बाहर निकल जाएगा I तेरा दम भी बाहर होगा I सोच लेना कि मरना चाहती है या कि जीना । छोड दे महबूब इसे I"

महबूब ने अंजना के मुंह से हथेली हटाईं तो, अंजना गहरी-गहरी सांसें लेने लगी I वह समझ नहीं पा रही थी , यह दोनों बदमाश उसके पास क्यों आए हैँ I इन्हें उसके घर का कैसे पता चला? और अब उससे क्या पाना चाहते हैं?

"तेरा हैंडबैग कहां है?” बसन्त ने एकाएक सख्त स्वर में पूछा ।

अंजना चौकी कल इन्होंने हैंडबैग छीना और आज फिर उसका हैंडबैग मांग रहे हैं । आखिर उसके हेंडवेग में इन्हें इतनी दिलचस्पी क्यों?

"बोल हरामजादी ।" महबूब गुर्राथा-"तेरा हेंडवेग कहां है?"

“वह तो तुमने कल रात बस में छीन लिया था ।" नोचे पडी अंजना सतर्क हो उठी । अब वह इनसे घबरा नहीं रही थी, बल्कि उत्सुक थी कि; यह हैँडबेग ही क्यों चाहते हैं I

"छीन तिया था , तो पुलिस वाले ने हमसे जेकर फिर वापस तुझे दे दिया था ।”

"नहीं दिया था I” अंजना खडे होते हुए सावधानी से… बोली---"मुझे क्या मालूम उस पुलिस वाले ने तुमसे मरा हेडबेग वापस ले लिया था, क्योंकि जब पुलिस वाला तुम्हारा पीछे गया तो बस वहा पर ज्यादा देर नहीं रुकी थी l मजबूरन मुझे भी बस में ही वहा से जाना पड़ा था I उस वीरान जगह पर भला रात को अकेली कैसे खडी होती !"

"साली झूठ बोलती है ।" बसन्त ने महबूब को देखा ।

"'मैं सच कह रही हू।” अंजना बोल पडी----"बल्कि आज भी मैं उसी बस में सफ़र करके आई हूं। कंडक्टर से उस पुलिस वाले कै बारे में भी पूछा I चाहो तो कंडक्टर से बात करके तुम दोनों मेरी बात की सत्यता की जांच कर सकते हो I"

महबूब ओर बसन्त की निगाहें आपस में मिली l

"ठीक है, हमें हेडबेग से कुछ नहीं लेना -देना ।" बसन्त ने कहा-“तुम हमं स्टेशन कै क्लाकरूम की रंसीद दै दो । हमारे हवाले करो उसे।"

अंजना मन ही मन तीव्रता के साथ चोंकी कि इन्हें क्लाक, रूम की रसीद के बारे में कैसे जानकारी हुई । क्या ये दोनों सब कुछ जानते हैँ I

“रसीद ??" अंजना के होठों से निकला !

"उल्लूकी पट्टी, हम उन चार मोटे-भारी सुटकेसों की बात कर रहे-हैँ, जिनमें नोट भरकर तू स्टेशन कै क्लत्करूम में जमा करा आई हे । हमसे झूठ बोलने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि जब तू यह काम कर रही थी, हण तेरे पीछे थे । सब-कूछ हमने अपनी आंखों से देखा । अब बोल रसीद हमारे हाथ पर रखती है कि नहीँ? यह मत पूछने लग जाना कि हमेँ सबकुछ कैसे पता चला, कैसे हम इस मामले में घुसे I”

"तुम लोगों ने सबंकूछ देखा तो यह भी देखा होगा कि वह रसीद मैंने हैडवेग में रखी थी जो कल तुम दोनों ने बस में से मुझसे छीन लिया । वह हैंडबैग मेरे पास नहीं इसके जिम्मेदार तुम लोग ही हो । हैंडबैग न छीनते तो रसीद मेरे पास ही होती I"

" यह तो सारे मामले से पल्ला झाड रही हे I"

"ले चल इसे दादा कं पास I"

"कहीँ भी ले चलो, लेकिन वह रसीद मेरे पास नहीँ है । इसके सबसे बड़े गबाह तो तुम दोनों ही हो I" अंजना की आवाज में अब आत्मबिश्यास भर आया था ।

"दादा ही तुझे ठीक करेगा, चल तो सही I"

अंजना ने एक बार भी चलने में आना-कानी नहीं की ।

वह जानती थी कि आनाकानी करने से कोई फायदा भी नहीं होने वाला I यह दोनों वही करेंगे जों करना चाहते हैँ । घर को ताला लगाकर अंजना, महबूब और बसन्त के साथ बाहर निकल गई ।

रात का अंधेरां चारों तरफ़ फैला था । दो, बज रहे थे ।

आसमान में तारे चमक रहे थे । चन्द्रमा अपनी भरपूर रोशनी धरती पर फैला रहा था । उसी रोशनी में शहर के खास हिस्से में स्थित, छोटे-बड़े पहाडी पत्थर चमक रहै थे ।

वह नकापोश तेजी से वहां बिखरे पत्थरों से बचता हुआ आगे बढा जा रहा था I उसकी चाल में बला की फुर्ती थी I

रात का अंधेरां चारों तरफ़ फैला था । दो, बज रहे थे ।

आसमान में तारे चमक रहे थे । चन्द्रमा अपनी भरपूर रोशनी धरती पर फैला रहा था । उसी रोशनी में शहर के खास हिस्से में स्थित, छोटे-बड़े पहाडी पत्थर चमक रहै थे ।

वह नकापोश तेजी से वहां बिखरे पत्थरों से बचता हुआ आगे बढा जा रहा था I उसकी चाल में बला की फुर्ती थी I
 
चेहरे पर पड़े नकाब से झांकती आँखों में पैशाचिक चमक उभरी हुई थी । कुछ देर बाद वह एक पहाडी ऊचे टीले कै पास जाकर ठिठका । गर्दन घुमाकर उसने आसपास देखा । आधा मिनट बाद इस बात का निरीक्षण करता रहा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा।

तसल्ली हो जाने के पश्चात वह थोड़ा-सा आगे को बढा ओर उस खोखली चट्टान में जाने कै लिए उस संकरे से रास्ते से संरक कर भीतर प्रवेश कर गया ।

भीतर का माहौल दिल को कंपा देने कं लिए काफी था । वहा चार मशालों का पर्याप्त प्रकाश फैला हुआ था । (इस सीन कै बारे में आप उपन्यास के शुरू में भी पढ चूकै है ।)

बही भयानक-सा दिखने वाला तांत्रिक कमर पर हाथ रखे , चेहरे पर व्याकुलता की चादर ओढे, उस खोखली चट्टान के फर्श पर टहल रहा था I नकाबपोश को दखते ही वह ठिठका ।

तांत्रिक कै चेहरे पर उखड़ेपन के हल्के से भाव आ गए।

"प्रणाम गुरूदेव! "

तात्रिक लाल लाल आँखों से उसे घूरता रहा।

."आप कुछ मुझसे नाराज लग रहे हें गुरूदेव ।"" नकाबपोश नर्म स्वर में बोला ।

"नादान बालक तू हमसे जो काम करवा रहा है उसके कारण हम तुमसे कभी खुश हो भी नहीं सकते । वचन देकर हम मजबूर न हुए होते तो यह काम कभी न करते ।"

“गुरुदेव .....!" नकाबपोश हाथ जोडकर पूर्ववत: लहजे में बोला-“अगर यह काम अत्यन्त आवश्यक न होता तो मै कभी भी आपसे वायदा न लेता । मुझे पूरा बिश्वास है कि काम के पूरा होते ही आपकी सारी नाराजगी दूर हो जाएगी ।"

तात्रिक के होठों से हल्की -सी गुर्राहट निकली । वह बोला कुछ नहीँ ।

"काम हो गया गुरुदेव… .?"

"नादान !" तांत्रिक गर्जा-"ऐसे काम क्या चुटकी बजाते हो जाते हैं! वक्त लगता है, बहुत कुछ करना पड़ता हे । यह सब करना तुंम बच्चों का खेल समझते हो I"

“मेरा मतलब था अब तक आपने क्या किया ?"

“घोल में डाल रखा है मुर्दे को I बांस की तरह शरीर अकड़ा पड़ा था उसका, पहले उसे ठीक करूंगा तभी तो आगे कुछ हो सकेगा I" तांत्रिक ने गुस्से में भरे स्वर में कहा ।

"मैं देख सकता हूं गुरुदेब ?"

“हां-हां जा…देख ले… ।"

नकाबपोश भीतर की तरफ जाने लगा कि ठिठक गया । फिर लबादे में हाथ डालकर शराब की दो बोतलें निकालीं और तांत्रिक के पास पहुंचकर बोला ।

"यह आपके लिए हे गुरुदेब ।"

तांत्रिक की आंखों में हल्की सी चमक उभरी जो कि गायब हो गई । उसने दोनों बोतलें थाम लीं । फिर देखते ही देखते दांतों से एक बोतल की सील तोडी और होठों से लगा ली I पलक झपकते ही आधी बोतल उसके पेट में पहुच चुकी थी I इसके साथ ही तांत्रिक की आंखों की सुखों गहरी हो गई थी l चेहरे पर मोजूद तनाव में कुछ कमी आ गई थी I I

पलटकर वह आगे बढा और दूसरी बन्द बोतल को चौकी के पास रखकर होठों ही होठों में कोई मंत्र उच्चारण करने लगा l मन्त्र की समाप्ति पर उसने नीचे लाल कपड़े पर पडी

तीनों खोपड्रियों पर हाथ फेरा तो वह भक्क से जल उठी l

“जा.....अब जा....देख ले मुर्दे को I"

नकाबपोश ने सिर हिलाया और जाने लगा तो तांत्रिक बोला । तू अपना चेहरा ढककर क्यों आता है हर बार?"

"आपसे चेहरा क्या छिपाना गुरुदेव ।। आप तो हजारों बार मुझे देख चूकै हैँ । दरअसल यह सावधानी कै नाते करता हू कि कोई मुझे यहा आते देख भी ले तो पहचान न सके I आप तो जानते ही हैं गुरुदेव जो काम करने जा रहा हूं , वह कितना खतरनाक और गुप्त है I उसके खुलने की देर है कि मेरी गर्दन उड़ जाएगी I"

"ऐसा काम क्यों कर रहा हैं तू? साथ ही मुझसे… भी ---- बहुत कठिन काम करवा रहा हे l आराम से जिन्दगी नहीं बिताई जातो. I" तांत्रिक ने एकाएक क्रोध से कहा ।

"आपको बतां तो चुका हूं गुरुदेव कि ऐसा काम क्यों कर रहा हू।” नकाबपोश बोला ।

“जा भेरी शांति भंग मत कर ।" कहने कै साथ ही तात्रिक ने आधी भरी बोतलं होठों में लगा ली । उसमें मौजूद शराब गटागट गले के माध्यम् से उसके पेट में पहुचने लगी ।

नकाबपोश पलटा और तैज कदमों से आगे बढ गया I

दरवाजे जितनी खाली जगह से भीतर प्रवेश किया तो आगे एक ही आदमी के जाने लायक जगह थी । वह उसमें आगे बढता रहा। पन्द्रह कदम आगे जाते ही बीस फीट लम्बी सी

चट्टान का खोखला हिस्सा आ गया l वहां का दृश्य बहुत ही भयानक था I

उस खोखली चट्टान कै एक कोने में इन्सानी खोपडियां ओर हड्रिडयों का ढेर लगा हुआ था । कमरे कै बीचों-बीच प्रेतात्मा का आहवान करने का सारा सामान पड़ा था और तांत्रिक के बैठने के लिए बड्री सी चौकी मौजूद थी । वहां अजीब-सी दुर्गन्ध मौजुद थी, जो कि सांसों में अटर्काव पैदा कर रही थी ।

सामने ही कौने में दीवार से सटाकर हौंदी जैसी वस्तु रखी हुईं थी l नकाबपोश हौदी के समीप पहुंचकर ठिठका ओर भीतर झांका l हौदी में उसे किसी के हाथ पांव नजर आए। नकाबपोश ने बांह. पकडकर उसे ऊंचा किया तो मशाल की रोशनी मेँ चेहरा स्पष्ट चमका।

वह राजीव मल्होत्रा का मुर्दा था । नकाबपोश कई पलों तक टकटकी बांधे राजीव कै मुर्दा चेहरे को देखता रहा फिर उसे छोड दिया । राजीव मल्होत्रा का मुर्दा शरीर हरे रंग कै अजीब से पानी में डूबता चला गया ।

नकाबपोश ने दोनों हाथ हरे रंग के घोल में डालकर राजीव मल्होत्रा कै मुर्दा जिस्म को चैक किया । अब उसके मुर्दा जिस्म में अक्रड़ाहट ना बची थी । ऐसा लगता था जेसे कोई इन्सान सामान्य मुद्रा में सोया पड़ा हो । राजीव के मुर्दे की टांगें बिल्कुल सामान्य थी । उसे मुनासिब ढंग से मोड़ा जा सकता था । पहले जैसी खम्बे के समान अकड़ाहट नहीँ थी उसमें।

यही हाल बांहों का था I

अगर उसे घोल से निकालकर, नहला-धूलाकर नीचे लिटा दिया जाए तो कोई भी नहीँ कह सकता था कि वह मुर्दा जिस्म है, वल्कि यही लगेगा कि वह सोया पडा है ।

नकाबपोश को आखों की पैशाचिक चमक मे बढोतरी होती चली गई । तत्पश्चात् वह पलटा ओर वापस लोटकर तात्रिक के पास जा पहुचा ।

शराब की एक बोतल खाली करने के पश्चात् दूसरी बोतल भी एक तिहाई खत्म कर चुका , था । वह तरंग में था । नशे ने उसकी आंखों को अंगारों के समान सुर्ख कर रखा था ।

“देख आये?” तांत्रिक्र की आवाजे में गुर्राहट का भरपुर समावेश था l

"हां गुरुदेव । आपने तो कमाल का दिया ।।" नकाबपोश के स्वर में प्रसन्नता के भाव थे-“अब तो वह विल्कुल सामान्य इन्सानों की तरह लग रहा हे । कहीं भी अकड़ाहट बाकी नहीं _ रही l"

तात्रिक अजीब-सी हंसी हंसा । बोला कुछ भी नहीं ।

"एक बात पूछू गुरुदेव । आप नाराज तो नहीं होंगे !' नकाबपोश बोला ।

“क्या हे?" तात्रिक ने बोतल में से एक बड़ा-सा घूंट भरा ।

"काम पूरा हो जायेगा ना?"

-तांत्रिक कै चेहरे पर क्रोध उमड आया । वह गुर्राहट भरे स्वर में बोला ।

"बेवकूफ. तू हमारी काबलियत पर शक कर रहा हे?”

"ऐसी बात नहीं हे, गुरुदेव, मैं....I"

"नादान बालक तू स्पष्ट तौर पर हमारी शिक्षा पर शक कर रहा है । तू शक में हे कि हम इस मुर्दे को पुनः पहले की भांति जिन्दा कर पायेंगे कि नहीं ।" तात्रिक के चेहरे पऱ गुस्से कै गहरे भाव नाचने लगे थे।
 
"नाराज मत होईये गुरुदेव । इस बात कै लिए मैँ आपसे पहले ही क्षमा मांग चुका हू कि मेरी बात बुरी लगे हैं तो आप मुझे क्षमा कर देंगे ।" नकाबपोश ने धीमे-स्वर में कहा-"दरअसल किसी मुर्दे को जिन्दा होते मैंने पहले कभी नहीं देखा । इसलिए… !*

" नहीं देखा तो अब देख लेना I" तांत्रिक ने गुर्राहटपरे लहजे में कहते हुए बोतल बाला हाथ हवा में लहराया 'भेरोनाथ की तपस्या हमने बरसों तक यूं ही नहीं की । बहुत कृपा हे भैरोनाथ की अपने बच्चों पर । मैं सबकूछ कर सकता हूं । जिन्दे को मुर्दा और मुर्दे को जिन्दा कर सकता हू। भैरोनाथ ने वहुत शक्ति दी है मुझे !"

"क्या गुरुदेवा में यही बात जानना चाहता था… !" नकाबपोश ने आदर भरे स्वर में कहा ।

तांत्रिक ने क्रोघभरे अंदाज में बोतल से घूंट भरा ।

"अब तो मुर्दे का जिस्म ठीक हो चुका है । अकड़ाहट बाकी नहीं रही । आप काम शुरु का सकते हैं गुरुदेव । मैं जल्द काम हुआ देखना चाहता हूं।"

"आज रात मैं गद्दी पर बैठने जा रहा हूं ।

भेरोनाथ को याद करूंगा । उसे बुलाकर उसका आशीर्वाद लेने के पश्चात् ही काम शुरु करूंगा ।” तांत्रिक ने कहने के साथ हीं पलटकर जलती खोपड्रियों की तरफ खास अन्दाज में इशारा किया तो उनका जलना बन्द हो गया । इसके बाद तांत्रिक ने बोतल को होठों से लगा लिया ।

देखते ही देखते वह सारी शराब उसके पेट में. उतरती चली गई l दो बोतलें शराब की उसने कुछ ही देर में समाप्त कर दी थी । अब वह हल्के-हल्के नशे में लग रहा था ।

"एक बात और बता दे " तांत्रिक नशे की तरंग में बोला ।

"क्या गुरुदेव?"

"इस मुर्दे में किसकी अत्मा डालूं? इसकी या किसी और की?"

“इसी की आत्मा इसमें प्रवेश करांईयेगा गुरुदेव 1"

नकाबपोश न कहा-"यह अपनी जिन्दगी में बडा शरीफ रहा है । सिवाय एक बुरे काम के, इसने कोई बुरा काम नहीँ किया । दूसरी आत्मा जाने कैसी होगी । किन आदतों की मालिक होगी । उससे तो मुझें परेशानी भी हो सकती है।”

"ठीक हे । इस मुर्दे में में इसी की आत्मा डालकर इसे जिन्दा कर डालूंगा । क्या नाम था इसका?”

"राजीव मल्होत्रा ।"

"हूं। क्या किया था इसने ।”

“अपनी मौत से एक दिन पूर्व बैंक-डकैती की थी अपने दोस्तों के साथ मिलकर किसी बात पर झगढ़ा हो गया तो इसके दोस्तों ने इसकी जान ले ली 1" नकाबपोश ने बताया ।

"यह तो अच्छा हुआ कि इसकी मौत चाकू…रिबॉंत्त्वर से नहीं हुई 1 नहीं तो इसमें दोबारा जान नहीं डाल पाता । टूटे फूटे शरीर में आत्मा नहीं ठहरती। उसे शरीर पसन्द का नहीं मिलता तो वह शरीर में प्रवेश से इन्कार कर देती हे । इन्सान हो या आत्मा हर कोई नई चीज…नया जिस्म चाहता हे ।” तांत्रिक ने पुन: हाथ हिलाकर कहा ।

" इस काम में कितने दिन तग जायेंगे?"

"बहुत दिन लगेंगे ।” तांत्रिक ने नकाबपोश की आंखों में झांका-"सप्ताह लग जाना तो बहुत ही मामूली बात हे । मुझे बहुत मेहनत करनी पडेगी । कई बार आत्माओं का आहवान करके बडी-बडी आत्माओं को बुलाना पडेगा, जो इसकी आत्मा को मुझ तक लेकर आयेगी। बहुत कुछ करना पडेगा । तुम बच्चे हो, अभी इस बारे में नहीं जानते ।"

"आप ठीक कहै रहे हैं गुरुदेव । इस मामले में मैँ बच्चा हू' ! "

"अब कब आऊ?”

"आज से आठवें दिन आना ! भैरोंनाथ ने चाहा तो मुर्दा जिन्दा हो चुका होगा । मुर्दे मेँ यानी कि राजीव के मुर्दे में राजीव की आत्मा पड़ चुकी होगी और वह जिन्दा होगा !"

"गुरुदेव! !” नकाबपोश कै होठों से प्रसन्नताभरा स्वर निकला…"आप महान हें I" कहने के साथ ही नकाबपोश ने आगे बढकर तांत्रिक कै पांव छू लिए।

तांत्रिक फौरन पीछे हटा क्रोध भरे स्वर में बोला ।

"नादान । तुझे कितनी बार कहा है हमारे पांव छू कर हमारी शक्ति कमजोर मत कर । आज कै बाद ध्यान रखना । फिर कभी मुझे यह बात दोहरानी न पड़े l”

. 'भविष्य मेँ आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा गुरुदेव !"

"जा अब खढ़ा क्यों हे?” तात्रिक गुर्राया ।

"आठवें दिन आऊ गुरूदेव?"

"हां-हां आ जाना । अब जा । मुझे गद्दी पर बेठना है !" तात्रिक ने सिर हिलाया-"अब मुझ भेरीनाथ का आर्शीवाद लेकर काम शुरू करना है !"

“जैस्री गुरुदेव की इच्छा ।" नकाबपोश ने हाथ जोड़े और खोह के पुन: उसी रास्ते से बाहर निकलता चला गया । उंसकी आंखों में भरपूर चमक विद्यमान हो चूकी थी ।

राजीव के मुर्दे में जान पड़ते ही उसकी मेहनत सफल होने जा रही थी । आज से आठवें दिन तक राजीव मल्होत्रा को पुन: जिन्दा हो जाना था ।

तांत्रिक बाबा ने ऐसा ही तो कहा था ।

नकाबपोश के कानों में तांत्रिक कै शब्द बराबर गूंज रहे थे कि राजीव में वह पुन: जान डाल देगा । अब नकाबपोश को पूर्ण विश्वास हो गया था कि तांत्रिक अपना कहा करके ही रहेगा I

राजीव के शरीर में वह अवश्य जान डाल देगा ।

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शकंर दादा का नाम अंजना अच्छी तरह जानती थी । यह भी जानती थी कि वह किस तरह का आदमी हैं । शकर दादा कें सामने पहुंचकर ही उसे मालूम हुआ कि बसन्त और महबूब शंकर दादा के आदमी हैँ ।

उधर शकर दादा भी सारी बात जान चुका था कि स्टेशन कै सामान-घर की रसीद हेडबैग मेँ थी जो कि उस पुलिस वाले के पास पहुंच चुका था । परन्तु फिर भी हो सकता है कि इसंने पुलिस वाले की तलाशे कर ली हो ।

उससे हैंडबैग वापस ले भी लिया हो । क्योंकि सारा दिन वह जाने कहां गायब रही है । अगर हैंडबैग वापस ले भी लिया हो तो, इसके पास क्यों नहीँ है?

क्या मालूम है हैंडबैग इसने फेंकं दिया हो ओर रसीद कहीँ छिपा ली हो!

शंकर दादा ने सख्त निगाहों से अंजना को देखा।

"ऐ छोकरी ! मुझे स्टेशन के क्लाकरूम की रसीद चाहिए ।”

"अपने आदमियों से पुछो वो हैँडवेग इन्होंने मुझसे छीना था, उसी में वह रसीद थी ।"

"तुम ठीक कह रही हौं । लेकिन मुझे मालूम हुआ है कि तुम्हें वह हैँडबेग वापस मिल गया हे । उस रसीद को तुम वापिस हासिल कर चुकी हो।”

अंजना कं चेहरे पर व्यंग्यात्मक भाव फैल गए।

"जो चीज मुझे हासिल हुई ही नहीं, उसके बारे मेँ तुम्हें कैसे मालूम हो गया कि वह मुझे मिल चूकीं है अंधेरे में तीर मत चलाओ शंकरा दादा ।”

शंकर दादा के होंठ भिंच गए। वह बोला कुछ नहीं ।

“मुझसे हैंडबैग छीनने को अपेक्षा तुम्हें सीघे तौर पर मुझसे बात करनी चाहिए थी । मैं शराफत से बैक लूट की दोलत को तुम्हारे साथ आधा आधा कर लेती । मेरा हैंडबैग छीनकर ना तो तुम्हारे हाथ कुछ लगा ना ही मेरे हाथ क्या फायदा हुआ? वैसे तुम्हें मालूम कैसे हुआ कि मेरे पास बैंक लूट की दौलत हे?"

“छोड़, वह बात तेरे जानने की नहीं है I" शंकर दादा , एकएक शब्द चबाकर कह उठा-“ सीधी तरह बता तू रसीद मेरे हवाले करती है या नहीं?”

"रसीद मेरे पास है ही नहीं तो दूं कहां से?" अंजना ने तीखे स्वर में कहा ।

"महबूब ! इसे लेजाकर बन्द कर दे I दो-चार दिन मेँ इसकी अक्ल ठिकाने आ जाएगी I” शकर दादा ने क्रोध से भरे सख्त स्वर में कहा I

“चल l" महबूब अंजना का हाथ पकड़े खींचता हुआ . , बाहर निकल गया ।

शंक़र दादा ने गम्भीरता में डूबे सिगरेट सुलगाई फिर बोला--- "बसन्त ! इसके पास रसीद नहीं हे । वह हैंडबैग इसे 'वापस नहीं मिला ।"

"फिर इसे बन्द करने को क्यों कह दिया?” बसन्त के होठों से निकला ।

"यूं ही । साली कुछ ज्यादा ही अकडकर बोल रही थी । दो चार दिन बाद इसे छोड देंगे I"

बसन्त खामोश ही रहा I

"तुम दोनों… I" शंकर दादा ने कहा… "उस पुलिस वाले को ढूंढते रहो I तब तक ढूंढते रहो जब तक कि वह नहीं मिलता I उसकै मिले बिना नोट हमारे हाथ नहीं लगने वाले I"

बसन्त ने सिर हिला दिया ।

उधर अंजना को महबूब एक कमरे में बन्द कर गया ।

अंजना ने चैक किया । कमरे से भागने का कोई रास्ता नहीं था I मात्र एक दरवाजा था, जिसे अच्छी तरह बन्द कर दिया गया था । अंजना मन ही मन इस बात की शुक्रगुजार थी कि उसने अजय से हैंडबैग वापस नहीं लिया था और उसने नहीं दिया अगर हैंडबैग ले लिया होता तो वह अब तक शंकर दादा के कब्जे में जा चुका होता और वह हमेशा के लिए खाली हाथ हो जाती l I

इसके साथ ही अंजना को एक और चिन्ता सताने लगी कि क्या सुबह जव अजय उसका हैंडबैग लौटाने आयेगा तों उसे दस्वाजा बन्द मिलेगा ।

तब वह क्या सोचेगा । दो चार दिन और चक्कर लगा लेगा ।
 
जाने शंकर दादा उसे कब तक कैद रखै I उसके ना मिलने पर अजय फिर उसके पास आना छोड देगा I उस पर तीस हजार की दौलत का लालच सवार हो जाएगा । हैंडबैग में से तीस हजार निकालकर, खाली हैंडबैग किसी नाले मेँ फेंक देगा । लाखों की रसीद उस हैँडवेग में मौजूद, किसी नाले में पडी स्वाह हो जायेगी I अंजना के -मस्तिष्क में तरह-तरह कै बिचार पलने लगे I

ठीक तरह से वह कुछ भी विचार नहीँ कर पा रही थी।

जिन्दल की आंखों में नींद भरी पडी थी I कुछ देर पहले ही अशोक ने आकर उसे नींद से उठाया था और सारी बात बताई थी I सुनकर जिन्दल का दिल धडक उठा था । सपना भी , . नींद में आंखें मलती वहां आ गई थी l उसने भी सारी बात सुनी I

"तुमने अजय का घर ठीक तरह से देखा था ना?" अपने पर काबू पाकर जिन्दल ने पूछा I

"हां I भला इस काम में मैं धोखा कैसे खा सकता हूं।” अशोक ने विश्वास भरे स्वर में कहा ।

“ठीक हे, तुम रुको, में कपडे बदलकर आता हूं।" जिन्दल उत्साहभरे स्वर में बोला ।

" नहीँ I तुम लोगों का अभी वहां जाना ठीक नहीं होगा l" एकाएक सपना बोल पडी I

"क्यों ?" जिन्दल ने प्रश्वभरी निगाहों से उसको देखा ।

"रात का समय है I उस लडकी का हैंडबैग उससे लेने में जरा भी शोर-शराबा हुआ तो आस-पडोस के लोगे जाग जाएँगे !"

सपना ने गम्म्भीर स्वर में कहा…“उसकै पास सुबह जाना ठीक होगा l”

"सुबइं वह निकल गया तो?”

"नहीं I" सपना ने सिर हिलाया-"नहीँ निकलेगा। कम से कम सुबह छ: बजे तक तो घर पर ही रहेगा I तुम लोग छ: बजे जाकर उसे पकड़ सकते हो । बल्कि छ बजे तुम लोग उस पर आसानी से काबू पा सकते हो I वह नींद कै प्रभाव मेँ होगा I इस समय तो वह पूरी तरह एक्टिव होगा I मुकाबला करने की ही चेष्टा कर सकता हे I"

जिन्दल को सपना की बात जची I

"अशोक ! सपना ठीक कहती हे । तुम कुछ घंटे यहीँ पर नींद ले लो । हम सुबह छ: बजे अजय के घर पहुच जायेंगे ।" जिन्दलं ने सहमतिपूर्ण ढंग से सिर हिलाया।

सुवह छ: बजे जिन्दल और अशोक जब अजय कै धर पर पहुचे तो वहां पर अडोस-पडोस के पांच-सात लोगों को बेठे पाया I जल्दी ही उन्हें मालूम हो गया कि रात की अजय की मां स्वर्गवासी हो गइई है I

अजय भी वहीँ था I अपनी मां के नश्वर शरीर के पास बैठा था । आंखें रो-रो कर लाल हो गई थी । मां की मौत से उसे वास्तव में सदमा पहुचा था I

जिन्दल औरर अशोक की आंखें मिलीं । वह दोनों भी नीचे बिछी दरी पर जा बैठे । अंजय ने उन्हें देखा । सोचा, होंगे कोई मां की पहचान वाले I

"सर ! अब वया करना हे?" अशोक फुसफुसाया I

"अभी कुछ नहीं हो सकता I” जिन्दल ने बेहद धीमे स्वर में बोला-"खुद को हालात की नाव पर छोड दो और अजय का पूरा साथ दो I मुनासिब मौका मिलने पर ही इसका काम करेगे ।"

अशोक सिर हिलाकर रह गया ।

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फीनिश

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" वैंक डकैती के मुजरिम गिरफ्तार एक, जज का बेटा , दूसरा शाही खानदान से सम्बन्ध रखने बाला। तीसरा, शहर के बहुत बड़े उद्योगपति का बेटा।

आगे अखबार में समाचार का ब्यौरा कुछ इस प्रकार था ......

चन्द रोज पहले हुईं बैंक-डकैती के चार मुजरिमों में से तीन को गिरफ्तार कर लिया गया हे । यह गिरफ्तारी कल आधी रात के समय हुईं l माना जा रहा है कि डकैती की चौथा मुजरिम आपसी झगड़े में मारा गया ओर उसके साथियों ने कानून को धोखा देकर उसका दाह-संस्कार भी कर दिया है । डकैती करने वाले आदी मुजरिम ना होकर शहर के नामी खानदानी के रोशन चिराग हैं जो कि अब बुझ चुक हें ।

पकड़े गये मुजरिमों में से एक शहर के नामी जज कृष्णलाल हेगडे का बेटा सूरज है ।

दूसरा दिवाकर शाही खानदान का छोटा बेटा सुरेश हेगड़े ।

तीसरा सोहन लाल खेडा जेसे उद्योगपति का मंझला बेटा अरुण खेडा हे ।

मिली ख़बर कै अनुसार यह तीनों ड्रग्स एडिक्ट हैं और अपने नशे की पूर्ति कै लिए ही इन्होंने बैंक-डकैती की हे । अभी पूछताछ जारी हे और आज इन तीनों को अदालत में पेश किया जाएगा ।

इसके साथ ही इन्सपेक्टर सूरजभान की भूरी भूरी प्रशंसा की गई थी और सुरेश दिवाकर, अरुण खेड़ा ओर सूरज हेगडे की तस्वीरें छपी थी l

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फीनिश

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इन्सपेक्टर सूरजभान रात भर नहीं सोया । तीन तीन हत्याओं कै जिम्मेदार, बैंक राँवरी कै खतरनाक मुजरिम दिवाकर, सूरज हेगडे और अरुण खेडा को अदालत में पेश करना था । इसलिए सारी रात वह कैस की फाइल तैयार करता रहा I सब-इंस्पेक्टर कोहली बराबर उसकी मदद में लमा रहा।

इन्सपेक्टर सूरजभान रात भर नहीं सोया । तीन तीन हत्याओं कै जिम्मेदार, बैंक राँवरी कै खतरनाक मुजरिम दिवाकर, सूरज हेगडे और अरुण खेडा को अदालत में पेश करना था । इसलिए सारी रात वह कैस की फाइल तैयार करता रहा I सब-इंस्पेक्टर कोहली बराबर उसकी मदद में लमा रहा।

यूं उसके पास इस बात का कोई खास सबूत नहीँ था कि इन तीनों ने ही राजीव मल्होत्रा की हत्या की है । फिर भी उसकी फाइल में राजीव की हत्या का जिक्र डाल दिया था l अभी तक सूरजभान ने उन्हे उगली तक नहीं लगाई थी ।

शात भाव से उसने उनसे उनका जुर्म पूछा था । परन्तु वह तीनों इसी बात पर अड़े रहे कि उन्होने डकैती नहीँ की ।

इन्सपेक्टर सूरजभान को उनके जुर्म इकबाल करने या ना करने पर कोई फ़र्क नहीं पडना था क्योंकि उसके पास ठोस शाहदत उंगलियों के निशान थे ।

बैंक में काम करने वालें कईं कर्मचारी थे जिन्होंने अपनी आंखों से उन्हें बेंक मेँ डकैती करते देखा था ।

तीनों को अपराधी सिद्ध करने कं लिए यह बातें काफी थीं I रात को गिरफ्तारी कै बाद भी उसने तीनों की उंगलियों के निशान लिए थे और पहले वाले निशानों से मिलाकर अपनी पूरी तसल्ली कर ली थी ।

केस की पूरी फाइल तैयार करने के पश्चात् वह ओर कोहली सुबह साढे चार बजे सोये थे कि साढे छट बजे कमिश्नर राममूर्ति का फोन आ गया ।

हवलदार ने सूरजभान कौं उठाया ।

"हैलो ।" सूरजभान ने भारी स्वर में रिसीवर उठाकर कहा ।

"इन्सपेक्टर सूरजभान ।" कमिश्नर राममूर्ति की आवाज उसके कानों में पडी-"बैंक-डकैत्ती कै मुजरिमों के सिलसिले में कोई कदम उठाने से पहले मुझसे बात तो कर लेते ।"

“मै समझा नहीं सर… ।” इन्सपेक्टर सूरजभान की नींद गायब हो गई ।

"तुमने जिनको गिरफ्तार किंया हे, वह शहर की बडी बडी हस्तियों की औलादें हैं । फिर दिवाकर तो शाही खानदान का चिराग हे । जानते हो उसकै पिता चन्द्रप्रकाश दिवाकर की पहुंच कहां तक है । वह चाहें तो तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा कर सकते है ! क्या तुम्हें अपनी भी परवाह नहीं?"

सूरजभान के जबड़े कसते चले गये ।।

"साफ-साफ कहिए सर ।”

" सुनो सूरजभान । इन तीनों को बैक डकैती का मुजरिम नहीं ठहराना है । किनारे से निकालकर ले जाओ इन्हें । ऐसा करके तुम्हें बहुत बड़ा फायदा होगा । दिवाकर साहब तुम्हें मुंहमांगी दोलत देंगे और में तुम्हें अपनी पसन्द का थाना दूंगा । अभी तुमने उन तीनों को अदालत में पेश करना है । उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया है तो कैस को कमजोर बनाकर अदालत में पेश कर दो l इस तरह कि दो चार पेशियों मेँ अदालत इन्हें छोड दे l"

"आपकी राय अच्छी हे सर ।”

"गुड ! अब तुम समझदार होते जा रहे हो सूरजभान" I"

"लेकिन मुझे आपकी राय मजूर नहीँ हे । मैं कानून का रक्षक हू। भक्षक नहीं । गुनाहगारों को सजा दिलवाना मेरा फर्ज हे । यह तीनों बेंक-डकेत्ती के जिम्मेदार ही नहीं बल्कि तीन कत्ल भी किए हें इन्होंने । मैं इन्हे किसी भी कीमत पर नहीं छोढ़ सकता I"

"सूरजभान I” कमिश्नर साहब की आवाज मेँ तीखापन आता चला गया ।

"यस सर l"

"मैरी बात ना मानकर तुम अपना बहुत बुरा करोगे । दिवाकर साहब तुम्हें किसी भी हालत में नहीं छोडेंगे, ओर मैं तुम्हें इससे भी बुरा थाना दे दूंगा । जहां तुम… I”

"कोई बात नहीं सर । आप मुझे कोई भी थाना दीजिए 'लेकिन' मैं आपकी बात किसी भी कीमत पर नहीँ मानूंगा ।" सूरजभान ने एक एक शब्द चबाकर कहा-“रहीँ बात दिवाकर साहब की कि वह मेरा बुरा करेगे तो इस बात की परवाह नहीं हे मुझे । वह मेरा कुछ नहीँ बिगाड सकते । मैंने कोई जुर्म नहीं किया I खतरनाक अपराधियों क्रो ही गिरफ्तार किया हे । उनकी जुर्म की जंजीर में लगी हर कडी का सबूत है मेरे पास I”

“सूरजभान क्यों अपने दुश्मन बने बैठे हो? मेरी बात मानो तो ।।"

"माफ कीजिएगा-सर, आप -मुझे गलत राय दे रहे हैं । आपको ऐसा नहीँ करना चाहिए I" . चन्द पलों की खामोशी के पश्चात् कमिश्नर साहब बोले ।।

"इन्सपेक्टर सूरजभान।। मैँ इस समय घर' से बोल रहा हू। तुम हेडक्वार्टर, मेरे आँफिस में पहुचो मैं भी वहीँ आ रहा हू। तुमसे बात करना चाहता हूं ।"

"सॉरी सर ।। आप जो बात करना चाहते हें, मैं बाखूबी जानता हू। इस समय मेरे पास इतनी फुर्सत नही हे कि हेडक्वार्टर पहुचकर, मैँ आपकी कानून-विरोधी बातें सुन सकू। मुझें बहुत काम करने हें अभी । फिर भी आप चाहते हें तो दोपहर तक आपकै पास आ सकता हू।”

"उन तीनों को अदालत में पेश करने के बाद?"

"हाँ । उसके बाद मुझे फुर्सत ही फुर्सत होगी क्योकि---उन तीनों को मैं तब सप्ताह-दस दिन के लिंए रिमाण्ड पर ले चुका होऊगा तब… ।”

“मुझे नहीं लगता तुम उन्हें रिमाण्ड पर ले सको । खुद दिवाकर इस मामले में… . !"

"सर , दिवाकर कानून नहीं जानता । मै जानता हूं। उसकी पहुच ऊपर तक हो सकती है, परन्तु मेरे पास मौजूद सबूतों का मुकाबला वह अदालत में नहीं कर सकता ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा… "इस मामले में दिवाकर की नहीं चल सकेगी ।"

"तुम पागलपन नहीँ छोडोगे?"

“मैँ दोपहर को हेडक्वार्टर आऊंगा सर, तब बातें होंगी l”

"दिवाकर तुम्हारा कुछ बुरा कर दे तो यह मत कहना कि मैने तुम्हें सचेत नहीँ किया।" . .

जवाब में इन्सपेक्टर सूरजभान हंसा ।

कमिश्वर साहब ने लाइन काट दी ।

सूरजभान ने रिसीवर रखा और पास खडे हवलदार से कहा ।

“’कोहली साहव को बुलाओ ।"

हवलदार फौरन पलटकर वहा से बाहर निकलता चला गया ।

कुछ ही देर में कोहली वहा पर हाजिर था । इन्सपेक्टर सूरजभान ने कोहली क्रो कमिश्नर साहब से हुई सारी बात बताकर कहा----“कोहली दिवाकर अदालत मेँ शरारत कर सकता हे । इन लोगों को रिभाण्ड पर लेने में कुछ दिक्कत आ सकती है, तुम बेंक कै दो चार उन कर्मचारियों को ले आओ जो बैक-डकैतों का चेहरा अच्छी तरह पहचानते हैँ । उस कर्मचारी को भी लाना जिसनें ड्रैकैती के दोरान, डकैतों कै मुह से अपने साथी क्रो पुकारते हुऐ 'हेगडे' सुना था I"

"यस सर I”

"सावधानी के तौर पर मैं ऐसा कर रहा हू । शायद पहली पेशी मेँ ही हमेँ गवाहों की जरूरत पड जाए I मैं हर हाल मेँ इन तीनों को रिमाण्ड पर लेना चाहता हू।" सूरजभान ने कठोर स्वर में कहा ।।

"ठीक हे सर, उन्हें लेकर मैँ अभी आता हू I” कोहली र्ने सतर्क स्वर में कहा और सूरजभान का इशारा पाकर वह बाहर निकलता चला गया।

कमिश्चर राममूर्ति ने रिसीवर रखकर सिगरेट सुलगाई पलटकर सोच भरी गम्भीरता से सामने बेठे चन्द्रप्रकाश दिवाकर को देखने लगे ।

"मैंने बात की इन्सपेक्टर सूरजभान से I लेकिन..... I"

कमिश्नर साहब को खामोश होते देखकर चन्द्रप्रकाश दिवाकर कठोर स्वर में बोला I

"लेकिन वह नहीं मान रहा… I यही कहना चाहते हैं न आप .?"

"हां ।" कमिश्नर ने सिर हिलाकर कहा-"अभी तो वह नहीं मान रहा , परन्तु जल्दी ही मान जाएगा । दोपहर को वह , मुझसे आफिस में मिलने आएगा, तबं खुलकर बात होंगी । वह… !"

' …"रहने दो कमिश्नर ।" दिवाकर साहब सख्त स्वर में बोले----"तुम्हारे बस कर कुछ नहीं है । सब-कुछ मुझे ही करना होगा । तुम अब किसी काबिल नहीं रहे ।"

" मैंने कहा न दिवाकर साहब, चिन्ता मत कीजिए । दोपहर कों इन्सपेक्टर सूरजभान की मुझसे बात होंगी तो मैँ उसे चाहे कैसे भी हो सीधे रास्ते पर ले आऊँगा ।" कमिश्नर राममूर्ति ने शांत स्वर में कहा-"फिर भी एक प्रतिशत चाअंस हे कि वह न माने । केस उसके हाथ… में हे, लेकिन में पूरी कोशिश करूंगा ।”

चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने दांत किटकिटाए ।

"इन्सपेक्टर सूरजभान की कोई कमजोरी है?"

"जहां तक मेरा ख्याल है , नहीं । अगर है भी तो नहीं जानता। परिवार के नाम पर मां-बहन हैं, जो कि गांव में रहती हैं । वहां इनकी खासी जमीनं खेती-बाडी हे I"

. "हूं।'हुँ चंद्रप्रकाश दिवाकर ने सिर हिलाया-“तुम उससे बात करना कमिश्नर । हो सका तो दोपहर को मैं भी तुम्हारे आँफिस में पहुंच जाऊंगा । इन्सपेक्टर सूरजभान पर काबू पाना बहुत ज़रूरी हे । अगर वह नहीं माना तो मुझे मजबूरन ऊपर तक जाना होगा ।"

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फीनिश

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चन्द्रप्रकाश दिवाकर अपने बंगले में पहुंचा और रिसीवर उठाकर जज कृष्णलाल हेगडे के नम्बर मिलाने लगा । कुछ ही पलों बाद जज साहव लाइन पर थे

“मैं चन्द्रप्रकाश दिवाकर बोल रहा हूं हेगड़े साहब ।"

"ओह । नमस्कार ।" जज साहब की थकी थकी आवाजं आई…“कैसे हैं आप ।"

चन्द्रप्रकाश दिवाकर अपने बंगले में पहुंचा और रिसीवर उठाकर जज कृष्णलाल हेगडे के नम्बर मिलाने लगा । कुछ ही पलों बाद जज साहव लाइन पर थे !

“मैं चन्द्रप्रकाश दिवाकर बोल रहा हूं हेगड़े साहब ।"

"ओह । नमस्कार ।" जज साहब की थकी थकी आवाजं आई…“कैसे हैं आप ।"

"ठीक ही हूं अपने बेटे कै बारे में आपने क्या कदम उठाया ?"

"मैंने क्या कदम उठाना है I" जज साहब की आवाज में स्थिरता आने लगी ।

"जज साहब, आपकी चलती हे I सुप्रीम कोर्ट कै मालिक हे आप । बड़े बड़े ओहदेदार आपके आगे -पीछे फिरते हैं । आप चाहे तो क्या नहीं कर सकते I मुझें हैरानी हे कि अपने बेटे को बचाने के लिए अभी तक आपने कोइ कदम नहीं उठाया ।" दिवाकर बोला I

"दिवाकर साहब I" अब जज साहब का स्वर शांत था…“अगर मेरे बेटे ने मुझसे पूछकर बैंक डकैती और तीन कत्ल किए होते तो, मैं अवश्य उसे बचाने की चेष्टा करता । जो काम उसने मुझतें पूछकर नहीं किया उस बारे में में उसकी काई सहायता नहीं कर सकता। जो उसने किया उसकी सजा तो उसे भुगतनी ही पड़ेगी I"

"जज साहब, सूरज आपका बेटा है l”

"तो क्या हो हुआ? ? हर अपराधी किसी न किसी का बेटा होता हे I मैंने आज तक जाने कितनों को बडी से बडी सख्त सजा दी होगी । वह भी तो किसी कै बेटे ही थे । परन्तु अपराधी भी थे । जो बुरा काम उन्होंने किया था उसकी सजा ही उन्हें मिली थी I आज़ मेरा बेटा पहले अपराधी है बाद में मेरा बेटा । कानून का हक उस पर ज्यादा बनता है I”

" तो आप सूरज को छुडाने की चेष्टा नहीँ करेंगे?” दिवाकर ने होंठ भीच लिए I “चन्द्रप्रकाश दिवाकर साहब, मैं जज हूं I इन्साफ करता हूं। कानून का भला चाहने वाला हूँ। अपराधियों का दलाल नहीं कि अपने रुतबे का इस्तेमाल करके उन्हें बचाता फिरूं ।" जज साहब की आवाज में कठोरता भर आईं…"मैं किसी भी हाल में सूरज'को बचाने की चेष्टा नहीं करूंगा I मेरा अपना नजरिया है कि अपराधी को उसके किए की सजा अवश्य मिलनी चाहिए I"

चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने दांत किटक्रिटाकर रिसीवर 'रख दिया ।।

तत्पश्वात् दिवाकर साहब ने सोहन लाल खेडा को फोन किया I

"नमस्कार खेडा साहब, मैं चन्द्रप्रकाश दिवाकर बोल रहा हूं ।

"नमस्कार दिवाकर साहब ।" सोहन लाल जी का स्वर i उनके कानों में पड़ा-----"मुझे आशा थी कि आपका और जज साहब का फोन जल्दी ही आएगा कहिए !"

"अरुण को बचाने के लिए आपने क्या किया?"

"दिवाकर साहब, हम भला इसमें कर भी क्या सक्रत्ते है । जब औलादों को हमारी इज्जत की परवाह नहीं, खानदान की परवाह नहीं, तो हमेँ क्या पड्री जो हम उन्हें बचाते रहे l”

"फिर भी वह हमारे बेटे हैँ, अगर हमने उन्हें बचा लिया तो समाज कै सामने हमारा सिर ऊचा ही रहेगा कि हमारी औलादें बेगुनाह थीं l उनके हाथ खून में रंगे नहीं थे। वह डकैत नहीं थे I”

"चन्द्रप्रकाश जीं हमारी ओलादे नशेडी हैं । वह किसी काम की नहीं रहीँ । अगर हम उन्हें पहले नहीँ सम्भाल सकै तो अब भी नहीँ सम्भाल सकते । उन्हें छूड़ाकर बुरा काम करने की छूट ओर देंगे । मेरा अपना ख्याल है, उन्हें अपने कर्मों की सजा मिलनी ही चाहिए, ताकि उन्हें मालूम तो हो कि जुर्म करना कोई खेल नहीं है, उसके लिए कानून को जवाबदेही भी करनी पडती हे l"

“मुझे लगता है आप ठीक तरह सोच नहीं पा रहे खेडा साहब ।"

“मैं ठीक तरह सोच रहा हूं आपको यूं कहना चाहिए कि मैं उस तरह नहीं सोच रहा जिस तरह आप सोच रहे हें । यानी कि आप अपने बेटे को बचाना चाहते हैं और मुझे अरुण को बचाने में कोई दिलचस्पी नहीँ । मेरी दिली ख्वाईश है कि वह कुछ साल जेल मेँ बिताए । अगर वह कुछ साल जेल में बिताकर ठीक हो जाता है, नशों क्रो छोड देता है तो मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात ओर क्या होगी । रही बात खानदान की इज्जत की तो आज़ कै वक्त में किसके पास इतना समय है जो यह बातें याद रख सकै । दो दिन मामला गर्म रहेगा, उसके बाद कोई याद भी न रखैगा कि सोहन लाल खेड़ा का बेटा डकैती के जुर्म में जेल में हे, समाज मुझे जानता है कि मैं कैसा इन्सान हू। जिसका वास्ता मुझसे हे, उसे मेरे बेटे से कुछ नहीं लेना-देना । यानी कि यह अपने ही मन का वहम हे किं हमारे बेटों ने हमारी इज्जत खस्ता की है । खानदान कै नाम पर धब्बा लगाया है । हर किसी को अपनी मनमर्जी कै मुताबिक काम करने का पूरा हक हे I"

"आप तो बहुत ही अजीब बात कर रहे हैं खेंड़ा साहब !!"

“मैंने जो कहा है बिल्कुल सही-ठीक कहा हे, अरुण के मामले में दखल देने की मेरी ज़रां भी दिलचस्पी नहीं हैं।"

सोहन लाल खेडा ने दो टूकं स्वर में कहा ।

"लेकिन मैं अपने बेटे को किसी भी हालत में सजा नहीं होने दूंगा l"

"मेरा इरादा आपके काम में भी दखल देने का नहीं हे I"

चंन्द्रप्रकाश दिवाकर ने गुस्से में रिसीवर वापस पटक दिया !!

" सर! !" नो बज रहे थे, दस बजे अदालत मेँ पेशी थी । वह लोग अदालत रवाना होने की तैयारी कर रहे थे .... कोहली गवाहों को ले आया था-"तीनों अपराधी तो यहीँ नहीं मान रहे हैं कि इन्होंने डकैती की है तो डकैती का पैसा हमें वहां कहां से हासिल होगा I"

" सर! !" नो बज रहे थे, दस बजे अदालत मेँ पेशी थी । वह लोग अदालत रवाना होने की तैयारी कर रहे थे .... कोहली गवाहों को ले आया था-"तीनों अपराधी तो यहीँ नहीं मान रहे हैं कि इन्होंने डकैती की है तो डकैती का पैसा हमें वहां कहां से हासिल होगा I"

“होगा.......हर हाल में होगा । थोडा वक्त तो गुजरने दो ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने जहरीले स्वर में कहा-“आज रिमाण्ड लेने दो बाद मे इनका मुंह न खुलवाया तो मेरा नाम सूरजभान नहीं । "

" इनके घर वाले इन्हें छुडाने की पूरी कोशिश करेंगे । सब रसूख वाले हैं ।"

"वह कुछ नहीं कर सकेंगे ।” इन्सपेक्टर सूरजभान ने एक एक शब्द चबाकर कहा-"मेरे गवाह ओर सबूत बहुत पक्के हैं और, कोइ भी सिफारिश इन्हें हिला नहीं सकती I"

"कह तो आप ठीक ही रहे हैं, परन्तु कहीँ भी कोई गड़बड़ हो सकती हे l”

"कोई गडबडी नहीं होगी । इस बारे में तुम निश्चिन्त रहो I" सूरजभान ने विश्वास भरे स्वर मेँ कहा-"तीनों क्रो बाहर खडी वेन में डालो । सुरक्षा के लिए पुलिस वाले साथ ले लेना । कहीं रास्ते में वह तीनों कोई मड़बड़ करने की चेष्टा न करे l आखिंर तीनों बडे घरों के बिगड़े शहजादे हे । अमी तक कानून को खेल समझ रहे हैं रिमाण्ड लेने के बाद इन्हें कानून का मतलब समझाऊगा । मैं जीप पर गवाहों को लेकर वेन कै पीछें पीछे आऊँगा I"

रोजमर्रा की भांति अदालत की गैलरी खचाखच भरी हुई थी I लोग अपने आपमें व्यस्त तेजी से आजा रहे थे I कुछ एक तरफ़ खड़े अपने वकीलों कै साथ बात कर रहे थे I किसी को किसी की तरफ देखने की फुर्सत नहीं थी । इन्सपेक्टर सूरजभानं सब-इत्सपेक्टर कोहली बाहर पुलिस वालों कै साथ सुरेश दिवाकर, सूरज, हेगडे ओर अरुण खेड़ा को लेकर अदालत के परिसर में पहुचे ।

“रामसिंह !” सूरजभान ने हवलदार से कहा-'तुम गवाहों को लेकर कमरे तक पहुंचो । कोर्ट जारी होने में चालीस मिनट बाकी हैं, हम मुजरिमों को लेकर आ रहे हैँ I"

“जी साहव" ।" हवलदार रामसिंह ने कहा और बैंक में काम करने वाले चारों गवाहो क्रो साथ लेकर वह तेजी से आगे बढ़ गया l

"कौहली-वैन का दरवाजा खोलो l" कहते हुए सूरजभान . ने बगली होलेस्टर खोल लिया, ताकि जरूरत पड़ने पर फोरन रिवॉल्वर को निकालकर उसका इस्तेमाल किया जा सकै । कोहली के इशारे पर दो,कास्टेबिलों ने वेन का दरवाजा खोला । भीतर छ: पुलिस वाले हथियारों सहित चाक-चौबन्द बैठे थे l दिवाकर, खेडा और हेगड़े की कलाइयों में हथकडियां पडी थीं । तीन हवलदारों की बेस्टों से उनकी हथकांड़ेयों का सिरा बंधा हुआ था l ' वह सब सावधानी से उन तीनों को लेकर नीचे उतरे । तीनों की निगाहें फौरन आसपास घूमी । किसी अपने को ना पाकर उनके चेहरों पर मायूसी की छाप गहरी होती चली गई।। मुर्झाये चेहरे और भी मुरझा गए I

"हमें बचाने कोई नहीं आयेगा ।" दिवाकर ने गहरी सांस ली ।

"घर वाले तो भगवान का शुक्र मना रहे होंगे कि हमसे पीछा छूटा ।" अरुण खेड़ा दात भीचकर बोला ।

"हमने काम ही ऐसा किया है l" सूरज हेगडे ने दोनों कै चेहरों पर -निगाह मारी ।।

"ठीक है, काम बुरा किया है l फिर भी हमें एक मौका तो मिलना चाहिए सुधरने का l" दिवाकर ढीले स्वर में कह उठा-"इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारे घर वाले हमारी सुध ही ना ले ।”

दो कदम के फासले पर खड़े इन्सपेक्टर सूरजभान के चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई l

"अगर यहीँ बातें तुम अदालत कै सामने कहो तो शायद अदालत तुम लोगों के साथ कुछ रियायत इस्तेमाल करे । अदालत में जुर्म मानने कं साथ-साथ माफी भी मांग लो ।'मैं वायदा करता हू कि तुम लोगों को कम से कम सजा होगी । मैं अपना पूरा जोर लगा दूगा कि

"इसकी बातों में ना आना l" अरुण खेड़ा बोल पड़ा-" यदृ हमसे जुर्म इकबाल कराना चाहता है और जुर्म इकबाल करने की देर है कि हमारा बचना वेहद कठिन हो जायेगा ।”

"गलत'कह रहे हो । बल्कि मेरी बात मानकर तुम लोगों को कई आसानियां हो जायेगी l"

" हमें कठिनाइयां पसन्द हैं, तुम अपनी फिक्र करो ।" दिवाकर ने कटु स्वर में कहा ।

"साला ज्यादा चालाक बनता है I” हेगड़े ने दांत धींच लिए ।
 
इन्सपेक्टर सूरजभान ने उनकी बातों का जरा भी बुरा न माना I वह जानता था कि जब अपराधी कानून कै शिकंजे में फंस जाये तो वुरी से बुरी भाषा का इस्तेमाल करता हे ।

"तुम लोग कुछ भी बोल सकते हो । कैसा भी बोल सकते हो।” इन्सपेक्टर सूरजभान ने बेहद स्थिर लहजे---" लेकिन याद रखो, कुछ ही देर मेँ में अदालत से तुम तीनों को रिमाण्ड पर लूंगा I तब तुम तीनों मेरे रहमोकरम पर होंगे । समझ रहे हो ना मेरी बात? अगर टार्चर से बचना चाहते हो तो, अदालत में शराफत के साथ अपना अपराध कबूल कर लेना । नेक सलाह दे रहा हूं तुम तीनों को । अपराध तो तुम तीनों मानोगे ही l क्या फायदा टार्चर होने कै बाद मानी I"

" तुम किसी भी हालत में हमारा मुंह नहीं खुलवा सकोगे ।” दिवाकर गुर्राया i

"यह आने वाले चन्द दिनों में मालूम हो जायेगा।" इन्सगेवटर सूरजभान की आवाज सख्त हो उठी ।।

“सर ।" कोहली बोला----" इन लोगों की अकड अभी कम नहीं हुई । अभी तक अपने खानदान के प्रभाव में हैं । इन्हें थोडा ठोक-बजाकर लाना चाहिए था ।"

“ऐसा करना अभी ठीक नहीं था, क्योंकि रात को इन्हें पकड़ा है और कुछ ही घन्टे बाद सुबह यानी की इस समय इन्हें अदालत में पेश करना था। ठुक्राईं का कोई निशान चेहरे पर या शरीर पर मिलता तो अदालत पुलिस की तरफ उंगली उठा सकती थी। लेकिन रिमाण्ड लेने दो बाद हम---- ---- सारी कसर पूरी कर देंगे और जब इन्हें दोबारा अदालत में पेश करेंगे तो इनके चेहरे-मोहरे ठीक होंगे । समझे कोहली?"

“ऐसा करना अभी ठीक नहीं था, क्योंकि रात को इन्हें पकड़ा है और कुछ ही घन्टे बाद सुबह यानी की इस समय इन्हें अदालत में पेश करना था। ठुक्राईं का कोई निशान चेहरे पर या शरीर पर मिलता तो अदालत पुलिस की तरफ उंगली उठा सकती थी। लेकिन रिमाण्ड लेने दो बाद हम-------- सारी कसर पूरी कर देंगे और जब इन्हें दोबारा अदालत में पेश करेंगे तो इनके चेहरे-मोहरे ठीक होंगे । समझे कोहली?"

"यस सर ।”

"ले चलो इन्हें । मैं सरकारी वकील से मिलकर आता हू। उसे केस समझाना हे और इस केस की डुप्लीकेट फाइल उसके हवाले करनी है I" इन्सपेक्टर सूरजभान ने बगल में दबा रखी फाइल को हाथ में पकड लिया…"ध्यान रखना इनका I"

, “ आप निश्चिन्त रहे सर I" सब-इन्सपेक्टर कोहली ने सतर्क स्वर में कहा ।

इन्सपेक्टर सूरजभान जाने के लिए पलटा ही था कि ठिठक गया । चन्द कामों के फासले पर चन्द्रप्रकाश दिवाकर जी मोजूद थे और तीनों के हाथों में पडी हथकडियों को घूरे जा रहे थे।

चेहरे पर दुख क्रोध के मिले…जुले भाव व्याप्त थे । फिर उनकी निगाहें घूमती हुईं इन्सपेक्टर सूरजभान कै चेहरे पर स्थिर होती चली गई । ईन्सपेक्टर सूरजभान चन्द्रप्रकाश जी की आंखों में झांक रहा था ।

चन्द्रप्रकाश दिवाकर आगे बढे ओर सूरजभान कै समीप आकर ठिठक गए ।

“इन्सपेक्टर इनमें से एक मेरा बेटा सुरेश है और बाकी दो उसके दोरतं। इसलिए अपने बेटे को छुडाने कै साथ इन दोनों को छुड़ाना भी जरूरी हे । क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता ~ हूं कि बचेंगे तो तीनो एक साथ ही, नहीं तो एक भी नहीँ बचेगा l" चंद्रप्रकाश दिवाकर जी ने एक-एक शब्द चबाकर सर्द, किन्तु धीमे रवर में कहा !

"दिवाकर साहब ! इनमें से एक भी नहीं बचेगा !" इन्सपेक्टर सूरजभान सख्त स्वर में बोला-"इन्होंने बैंक-डकैती की है ! डकैती के साथ तीन कत्ल भी किए हैं । अपने दोस्त राजीव मल्होत्रा की हत्या की है और उसकी लाश का कानून को धोखा देकर अन्तिम संस्कार भी कर दिया गया I------- एक जुर्म होता तो मैं सोचता भी । इनके जुर्मों की जंजीर लम्बी हे । काफी लम्बी कि दुनिया की कोई भी अदालत इन्हें माफ नहीं कर सकती और ज़हां तक मेरा ख्याल है, अदालत चन्द ही पेशियों कै बाद इन्हें सजा-ए-मौत का हुक्म सुनायेगी । जिनके हाथ चार लोगों के खून से रगे हों, उन्हें छोडा नहीं जा सकता । माफी नहीँ दी जा सकती l"

"खून से रंगे हाथ तो और भी बहुत मिल जायेंगे जो आजाद घूमते रहते हैँ I”

"कानून से बच पाना आसान नहीं होता चन्द्रप्रकाश जी । एक ना एक दिन हर अपराधी को कानून की लाठी खानी ही पड़ती हे ।” इन्सपेक्टर सूरजभान ने एकएक शब्द चबाकर

कहा ।।

"में चाहता हू कि तुम केस को ढीला करके इन लोगों को कानून से बचा लो I"

"आप नामुमकिन बात कह रहे हैं ।"

"इस दुनिया में कोई बात भी नामुमकिन नहीं I” दिवाकर साहब ने टुढ़ताभरे स्वर में कहा-"तुम मेरी बात मान जाओ ।

" मैं तुम्हें सोने-चांदी से तोल दूंगा । जो मांगोगे वही दूंगा I”

"अगर अपनी औलाद से इतना ही प्यार था तो यह सोना-चांदी उन्हें दे देते, ताकि, सिर्फ पेंतीस लाख रुपए की खातिर, यह लोग जुर्म तो ना कंरते I हत्यायें तो ना करते l"

"बीते चक्त को मैं बहस का मुद्दा नहीं बनाना चाहता l तुम अब की बात करो ।"

"हत्यारों ओर डकैतों को छोडना मैनें-कभी नहीं सीखा । कोई ओर जुर्म होता तो शायद मैं इन्हें छोड भी देता । इन्हें अपने अपराधों की सजा मिलकर ही रहेगी ।”

"ठीक हे इन्सपेक्टर तुम भी देख लेना I अच्छी तरह देख लेना l हम अपने बेटे क्रो सजा नहीं होने देंगे ।" चन्द्रप्रकश दिवाकर ने एक…एक शब्द चबाकर विश्वास भरे. स्वर मेँ कहा, फिर अपने बेटे से कह उठे…।।

“सुरेशा तुम फिक्र न करना अभी हम जिन्दा हैँ I हमारे शाही खानदान का रुतबा खत्म नहीँ हो गया । हम तुम्हें ओर तुम्हारे दोस्तों को सजा नहीँ होने देगे । थोडे दिन की तकलीफ बर्दाश्त कर लो ।।” दिवाकर, अरुण और सूरज के चेहरे खुशी से खिल उठे । चंद्रप्रकाश जो ने चुनौती से भरीं निगाहों से इन्सपेक्टर सूरजभान की आंखों में झांका फिर पलट कर आगे बढते चले गए ।। सूरजभान का चेहरा सख्त हो उठा था ।

"कोहली ले जाओ इन्हें 1” कहने के साथ ही फाइल थामे सूरजभान आगे बढ गया ।।

शहर की नामी हस्तियों की औलादों के खिलाफ, अदालत में केस चल रहा था ! इसलिए अदालत खचाखच भरी थी ! दर्शकों की कुर्सियों पर जज साहब भी खामोशी से बैठे थे ।

कुछ हटकर सोहन लाल खेडा भी मोजूद थे । वह भी केस की कार्यवाही सुनने आए थे । वकील अपनी अपनी जगह ले चुकें थे । सरकारी वकील बनवारी लाल ओर इन्सपेक्टर सूरजभान एक तरफ ख़ड़े अभी बात कर रहे थे ।

बनवारी लाल ने सूरजभान की दी गंई फाइल खोल रखीं थी ओर बातों के दोरान बारम्बार उस पर निगाह मार लेता था ।

बनवारी बहुत ही तेज़ वकील था ।

शायद ही कोई केस हो, जो वह हारा हो, अन्यथा जीत उसकी किस्मत का हिस्सा थी ।

दूसरी तरफ चन्द्रप्रकाश जी ने शहर के सबसे बड़े वकील ~ किशोरी लाल गुप्ता को किया था । गुप्ता का भी रिकार्ड था कि उसने आज़ तक केसो को जीता ही हे ।

स्याह क्रो सफेद ओर सफेद को स्याह करना उसके बायें हाथ का खेल था ।

यानी कि दोनों वकीलों की टक्कर बराबर की थी ।

इन्हीं वकीलों की बहस सुनने के लिए वहां कई वकील इकट्ठे हुए पड़े थे । हर किसी को जज साहब के आने का इन्तजार था । ठीक समय पर जज साझ्व अदालत में पधारे ।।

जज भानुप्रताप सिंह ।

सटीक फैसले देने में माहिर और ज़ज़ कृष्णलाल हेगडे से तगड़ा याराना।

पांच मिनट तक जज भानुप्रताप सिंह अपनी कुर्सी के सामने रखे कागजों को पढते रहे, फिर गम्भीर स्वर में बोले ।

"अदालत की कार्यवाही शुरू की जाए l”

३सबकी निगाहें एक ही कटघरे में खडे सुरेश दिवाकर, सूरज हेगड़े ओर अरुण खेडा की तरफ उठ गई, जिनके चेहरों पर इस समय अपमान की छाप मोजूद थी ।

सरकारी वकील बनवारी लाल अपनी जगह से उठा और सिर झुकाकर बोला ।

"जज साहब कटघरे में खड़े तीनों युवक देखने में बहुत ही मासूम नजर अवश्य आ रहे हे, परन्तु बेहद खतरनाक मुजरिम हें । पिछले शुक्रवार बारह तारीख को इन्होंने सुबह साढे दस बजे बेंक-डकैती की । जिसके बारे में अखबारों ने भी काफी हंगामा मचाया था । सिर्फ डकैती ही की होती तो यह इतना संगीन अपराध न होता, परन्तु डकैती कै समय इन्होंने बेंक मैनेजर, दरबान ओर बैंक में आए ग्राहक की' हत्या की I तीन…तीन हत्याओं के यह जिम्मेदार भी हैं। मैं अदालत को बताना चाहूगा कि बैंक-डकैती करने के पीछे असली कारण क्या था । यह तीनों ड्रग्स एडिक्ट हैं । इनकी आदतों से परेशान होकर इनके घर बालों ने ख़र्चा-पानी देना बन्द कर दिया । जबकि नशा करने के लिए इन्हें पेसे की जरूरत थी और अपनी पैसे की जरूरत क्रो पूरा करने के लिए ही इन्होंने बैंक-डकैती ओर हत्याएं कीं ।"

इतना कहने के पश्चात् चन्द कागजों की छोटी सी फाइल सरकारी वकील बनवारी लाल ने जज साहब तक पहुचा दी ।

"इस फाइल में उंगलियों कै निशान हैं जज साहब बैंक-डकेती के दौरान, बैंक से उठाए गए उंगलियों के निशान । जिस कार में बैंक का पैसा लूटकर भागे उस कार से उठाए गए उंगलियों कै निशान । र्किराये के कमरे को इन तीनों ने अपना ठिकाना बना रखा था । वहां पर यह सब नशा करते थे I वहीँ पर ही इन्होने डकैती का प्लान बनाया । उस कमरे से उठाए गए उंगलियों कै निशान और गिरफ्तारी के पश्चात् इनकी उगलयों कै लिए गए निशान सारे निशान इनके ही हैं । यह तीनों बहुत खतरनाक मुजरिम हैं जज साहब । इन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए । अदालत की जानकारी के लिए मैं बता देना चाहता हूं कि इनमें से एक सुरेश दिवाकर, शाही खानदान से सम्बन्ध रखता है । दूसरा जज का बेटा है और तीसरा शहर के बहुत बड़े उद्योगपति का बेटा है । इन सबकें घरों मेँ बहुत पैसा है । यह डकैती महज़ अपने नशों को पूरा करने की खातिर से की गई थी I" जज साहब ने उंगलियों के निशानों वाली फाइल पर गोर किया ।

"अगर अदालत चाहे तो मैं बैंक के उन कर्मचारियों को भी अदालत में पेश कर सकता हू जिन्होने अपनी आंखों से डकैतों ओर हत्यारों को सबकुछ करते देखा । मेरे पास उंगलियों के निशानों कै रूप में'गवाहीँ कै रूप में पर्याप्त सबूत हैं इस बात के कि इन तीनों ने इतना भयानक कांड किया । इसलिए अदालत इनसे किसी भी तरह का रहम न बरते ।"

तभी बचाव पक्ष वकील किशोरी लाल गुप्ता उठकर बोला ।

“जज साहब । जहां तक मुझें मालूम हैं, बैंक-डकैती के चार मुजरिम थे, परन्तु मेरे वकील दोस्त तो तीन से आगे बढने का नाम ही नहीं ले रहे।”

जज साहब ने प्रश्चभरी निगाहों से बनवारी लाल को देखा ।

बनवारी लाल एकाएक मुस्कराकर बोला l

"जी हा, मेरे वकील दोस्त ठीक कह रहे हैं और -मैं चौथे डकैत और हत्यारे की तरफ आने ही वाला था I जज साहब, चौथे का नाम हैं राजीव मल्होत्रा, जो कि अब इस दुनिया में नहीं रहा । उसे इन तीनों ने ही आपसी किसी झगडे को लेकर … मार डाला है और सामान्य मौत दिखाकर उसका अन्तिम संस्कार भी कर डाला हे । अभी इस बात के मेरे पार्स पुख्ता सबूत नहीँ हैँ, परन्तु आशा हे कि जल्द ही इस बारे में भी अदालत कै सामने सबूत पेश किए जाएंगे l” वकील किशोरी लाल गुप्ता पुन: सामांन्य स्वर में कह उठा ।
 
"जज साहब यह तो अच्छी बात हे कि संगीन डकैती और तीन हत्याओं के मुजरिम पकड़े गए हैं l लेकिन मेरे वकील दोस्त ने डकैती की दौलत का कोई जिक्र नहीँ किया?" जज साहब ने सरकारी वकील से पूछा ।

"डकैती का पैसा कहां हे?”

"जज साहब ।" बनवारी लाल आदत के मुताबिक मुस्कराता हुआ बोला-“डकैतों ने डकैती का पैसा कहीँ छिपा दिया है । पुलिस को अभी इतना वक्त नहीं मिला कि इनसे पूछताछ की जा सकै । क्योंकि आधी रात को ही अपराधियों को गिरफ्तार किया गया है, इसलिए पुलिस रिमाण्ड पर इन तीनों अपराधियों को पूछताछ के लिए लेना चाहती है I”

तभी किशोरी लाल गुप्ता ने कहा ।

"जज साहब…अभी मुझे कैस की रीडिंग करने का वक्त नहीं मिला । सुबह ही कैस मेरे हाथ में आया है , मैं अदालत से रिक्वेस्ट करूंगा कि इन्हें रिमाण्ड पर पुलिस को न देकर जेल मेँ भेजा जाए । वैसे भी अभी इन पर कोई जुर्म साबित नही हुआ । सिर्फ उंगलियों के निशानों की लेकर किसी के सिर पर इतना बड़ा जुर्म ठोक देना ठीक नहीं । मैँ चाहूगा कि इस बात का फैसला अगली पेशी में ही किया जाए कि उन्हें र्रिपाण्ड पर देना हे या नहीं ।"

"अगर अदालत की… l” बनवारी लाल ने पुन: कहा… "उंगलियों के निशानों पर' कोई शक हो तो आंखों दैखे गवाह मैं अभी और इसी समय अदालत कै सामने पेश कर सकता हूं परन्तु पुलिस द्वारा इन्हें रिमाण्ड पर लेना बहुत जरूरी है !"

"गवाह तो नकली भी बनाए जा सकते हैं जज साहब ।"

बनवारी लाल अजीब से अन्दाज में मुस्कराया।

"जज साहब !! मेरे वकील दोस्त, उंगलियों के निशानों को अहमियत नहीं देना चाहते जो कि बहुत ही ठोस गवाही होती हे । मेरे वकील दोस्त आखों देखे बैंक के कर्मचारियों की गवाही को नकली गवाह कहकर बात उडाना चाहते हैं । मुझे समझ में नहीँ आ रहा कि यह किस तरह की गवाही और सबूतों को असली मानेंगे?"

किशोरी लाल गुप्ता ने फौरन कहा I

"जज साहब, मैं जो कहने जा रहा हूं उस पर अदालत अवश्य गौर करे I कटघरे मे खड़े तीन में से एक युवंक शाही खानदान से सम्बन्ध रखता है, ऐसा शाही खानदान, जिसके पास धन दौलत कै अम्बार हैं I करोडों अरबों की दौलत है, जबकि यह डकैती महज-पैतीस लाख की थी । दूसरा युवक जज कृष्णलाल हेगडे का बेटा हे I शहर कै नामी ज़ज़ है । उनकी शराफत को सब जानते हें । दोलत रूपये पैसे की कोई कमी है नहीं । लाखों रुपड़े कै मालिक हैँ जज साहब । कई हजार सरकार से महीने तनख्वाह लेते हैँ I ऐसे इन्सान का बेटा क्या डकैती में हिस्सा ले सकता है? तीसरा शहर के बहुत बडे उद्योगपति खेडा साहब का बेटा हे । खेडा साहब करोडों के मालिक हैँ I बीस तीस करोड़ तो कम से कम है शायद इससे कहीं ज्यादा , भी हो सकते हैँ । क्या ऐसे इन्सान का बेटा पैंतीस लाख की खातिर बैंक'डकैती ओर हत्याएं करेगा?" क्षण भर ठिठककर किशोरी लाल गुप्ता ने पुन: कहां-“मेँ यह नहीं कहता कि उंगलियों के वो निशान झूठे हैं, या फिर गवाह झूठे हें I मैं यह कहना चाहता हूं शायद हम इस मामले की असलियत ठीक प्रकार से समझ नहीं रहे"?

तभी बनवारी लाल ने गुप्ता की बात काटकर कहा I "मेरे ख्याल सै मेरे वकील दोस्त के पास कहने के लिए कुछ नहीं है I यह अदालत का वक्त खामखाह ही जाया कर रहे हें . . … !"

"मैं तो अदालत से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इन्हें पुलिस रिमाण्ड पर नहीं दिया जाए। अगली पेशी की बहस के पश्चात् ही अदालत इंस बात पर बिचार करे कि इन्हें रिमाण्ड पर देना है कि नहीं I"

"क्यों ?" जज साहब ने पूछा… "पुलिस रिमाण्ड पर क्यों न दिया जाए? कारण स्पष्ट करेंगे आप ?”

"सबसे बड़ा कारण यह है कि पुलिस इन्हें खामखाह टार्चर करेगी l यह लोग अपराधी नहीं हैँ ।"

"अपराधी न होने का आपने अभी तक कोई सबूत नहीं दिया l जबकि सरकारी वकील ने ठोस सबूत अदालत के सामने पेश कर डाले हैं I”

किशोरी लाल गुप्ता के पास कहने को कुछ भी नहीं था । अदालत मेँ मोजूद सारे लोग सांस रोके सब कुछ देख सुन रहे थे l

चन्द पलो की खामोशी के पश्चात् जज साहब का स्वर अदालत में गूंजा ।

"अदालत सुरेश द्रिवाकर सूरज हेगड़े और अरुण खेड़ा को सात दिन के लिए पुलिस रिमाण्ड पर देती हे । साथ ही अदालत पुलिस को हिदायत देती है कि इनके साथ ज्यादा सख्ती न की जाए l आज से आठवें दिन, बाईस तारीख को इस केस की पुन: सुनवाई होगी । तब तक के लिए अदालत बर्खास्त होती है ।”

अदालत कै उठने कै पश्चात् वकील बनवारी लाल कुछ देर तक इन्सपेक्टर सूरजभान से बात करता रहा फिर अपने चैम्बर की तरफ रवाना हो गया I चेम्बर मेँ प्रवेश करते ही ठिठक गया I चन्द्रप्रकाश दिवाकर वहां पर मौजूद थे ।

बनवारी लाल के होठों पर मुस्कान बिखरती चली गई ।

“ दिवाकर साहब…। इतना बड़ा आदमी मेरे

छोटे-से आँफिस में?"

"मुझे अपने बेटे कं कारण यहां आना पड़ा ।" दिवाकर साहब सर्द लहजे में बोले ।

" कहिये कहिये मैँ आपकी क्या सेवा कर सकता हू?” बनवारी लाल फौरन बोला ।

"मैं अपने बेटे को बचाना चाहता हू ।”

"आपका बेटा अकेला नहीं बचेगा l बचेंगे तो वह तीनों ही बचेंगे !"

"मेरे लिए एक ही बात है ।सुरेश को हर हाल में बचना चाहिए । अगर तुम अदालत में सही तरह से बहस न करो । केस को कुछ कमजोर कर दो तो मेरा काम हो सकता है l”

बनवारी लाल गहरी सोच में डूब गया ।

"सोच लो बनवारी लाल । इस काम की एवज में तुम्हें बहुत पैसा दे सकता हू।"

"दिवाकर साहब वेसे ऐसा काम मैंने कभी किया नहीं, फिर भी आप कहते तो मुझे आपकी बात मानने मे कोई एतराज नहीं । मुझसे जो हो सकेगा जरूर करूंगा ।"

"मेरा बेटा बचना चाहिए I”

"इस बात की गारन्टी तो नहीं देता । अलबत्ता मैं , कमजोर ढंग से बहस करूंगा । आगे आपके वकील की काबलियत कि वह अपनी बात अदालत क्रो कैसे समझाता I"

दिवाकर साहब ने कुछ गड्डियां निकालकर टेबल पर रख दीं ।

"अभी इतना पैसा तो रखो । बाद में और भी मिलेगा l”

"शुक्रिया !" बनवारी लाल के चेहरे पर पैट मुस्कान फैलती चली गई ।

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फीनिश

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बसन्त .ने दरवाजा खोला तो शंकर दादा भीतर प्रवेश कर गया । हाथ में अखबार थाम रखा था ।

एक कोने में सिकुडी सिमटी बैठी अंजना फौरन खडी हो गई ।

"डरो नहीं l” शकर दादा हंसा-"मैं उन लोगों में से नहीं , हू जो किसी की मजबूरी का फायदा उठाते हैँ मैँने तुम्हें कैद कर रखा है मेरे लिए बस इतना ही बहुत है I"

"मुझे कैद में रखने का तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा शंकर दादा ।" अंजना’ने सपाट स्वर में कहा ।

"होगा । तुम मुझे क्लाकरूम की रसीद दोगी ।”

“जो चीज मेरे पास है नहीँ, वह में तुम्हें कैसे दे सकती हू?"

"यह देखो I" शंकर दादा ने अखबार उसकी तरफ बढाया-"वैंक-डकैतीं कै तीनों मुजरिम पकडे गए हैं । आज अदालत में उनकी पहली पेशी हैं ।"

अंजना ने तुरन्त अखबार थामा और खोलकर उसे पढने लगी I एक ही सांस में वह डकैती का सारा ब्योरा पढ गई ।

नीचे दिवाकर 'हेगडे और खेडा की तस्वीरें थीं I अंजना ने पहले कभी राजीव के दोस्तों कै चेहरे को नही देखा था I वह काफी देर तक तीनों के चेहरे देखती रही ।

"समझी कुछ?” शंकर दादा अपने शब्दों पर जोर देकर बोला… "पुलिस ने डकैतों को गिरफ्तार कर लिया है । आज उन्हें अदालत में भी पेश कर दिया होगा । परन्तु पुलिस .को डकैती की दौलत नहीं मिली । अब पुलिस डकैती की उस दौलत की तरफ ध्यान देगी; जिसे तुमने स्टेशन कै क्लाकरूम में, चार बडे-वड़े सूटकंसों कें रूप मेँ जमा करा रखा हे और

जिसकी रसीद तुम दबाए बैठी हो । बेवकूफ हो तुम । मेरे साथ समझौता कर लो I माल आधा-आधा कर लेते हैं, तुमं भी खुश मैं भी खुश !"

"कितनी बार कहूं कि क्लाकरूम की रसीद मेरे पास नहीं हे।" अंजना खीझ भरे स्वर में कह उठी I

" झूठ मत बोलो,,तुम्हारा झूठ शंकर दादा कै सामने नहीं चलने वाला I” शंकर दादा एकाएक सख्त स्वर में कह उठा----" कल सारा दिन तुम अपने घर से गायब रहीँ । रात को बारह बजे लोटीं । जाहिर हे कि दिनभर की भागदीड़ करके तुमने अवश्य उस पुलिस वालें को तलाश कर लिया होगा जिसने मेरे आदमियों से तुम्हारा हैंडबैग छीन लिया था I बच्ची नहीं हो तुम खेली-खाई हो I जेबों को काटने का धधा करती हो I तुमने आसानी से उस पुलिस वाले को खोज निकाला होगा ।"

“वहम हे तुम्हारा । अगर मैंने उसे ढूंढ निकाला होता तो मेरे पास हैंडबैग होता । वह रसीद होती । तुम मेरी तलाशी ले लौ । मेरे धर की तलाशी ले जो । मेरे पास कुछ नही है I”

" तुम्हारा झूठ मेरे सामने नहीँ चलने वाला I" शकर दादा अंधेरे में तीर चला रहा था-“दो दिन का और वक्त ले लो । तीसरे दिन रसीद हर हाल में मिल जानी चाहिए । नहीं तो मेँ तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा, और उन्हें बता दूगा कि बेकडकैती की दीलत को तुमने क्लाकरूम में रखा हुआ है I पुलिस उन दोनों कुलियों को भी तलाश कर लेगी, जिन्होंने तुम्हारे चार बड़े-बड़े सूटकेस उठाकर क्लाकरूम में जमा, करवाए थे और रसीद तुम्हारे हवाले की थी । वह तुम्हें भी फौरन पहचान लेगे l”

अंजना का चेहरा पल-भर के लिए फक्क पड़ गया ।

"सिर्फ दो दिन का समय है तुम्हारे पास I"

"शंकर दादा… ।” अंजना भारी स्वर में कह उठी…“तुम जो करना चाहते हो कर लौ । लेकिन इतना याद रखो कि क्लाकरूम की रसीद मेरे पास नंहीं हे । मुझसे बात करके तुम अपना वक्त बरबाद कर रहे हो I"

"बाकी बातें तो में दो दिन के बाद करूगां ।।" शंकर दादा ने धमकी भरे स्वर मेँ कहा और बाहर निकलकर दरवाजा पुन: बाहर से बन्द कर दिया ।

अंजना कै होठों से गहरी सांस निकल गई I

उसकी निगाहें पुन: सामने पड़े अखबार पर जा टिकीं I जहा पर हेगडे… दिवाकर और खेड़ा की तस्वीरें मौजूद र्थी I

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फीनिश

दोहपर के दो बज रहे थे, जब इन्सपेक्टर सूरजभान ने पुलिस कमिश्नर राममूर्ति के आँफिस में प्रवेश किया I भीतर प्रवेश करते ही सूरजभान ठिठक गया । चन्द्रप्रकाश दिवाकर भी वहां मौजूद था । उसे देखते ही सूरजभान कै चेहरे पर दृढता के भाव विद्यमान होते चले गए l उसने कमिश्नर साहब को सैल्यूट दिया ।

. "बैठो सूरजभान I" राममूर्ति जी ने अपनापन दिखाते हुए कहा ।

सूरजभान कुर्सी पर जा बैठा I

कमिश्नर राममूर्ति ने सिगरेट सुलगाकर कश लेने कै पश्चात् शान्त लहजे मेँ कहा ।

“दिवाकर, हेगडे और खेडा को तुमने रिमाण्ड पर ले लिया । इस जीत की तुम्हें मुबारक्वाद्र देता हूँ।"

"शुक्रिया सर I"

"कहां हैं वह तीनों?"

"वह तीनों… l" सूरजभान ने चन्द्रप्रकाश जी पर निगाह. मारकर तीखे स्वर में कहा-"पुलिस स्टेशन के पीछे वाले कमरे में, जो कि टार्चररूम है । वहां कुर्सियों पर बांधकर उन्हें टार्चंर किया जा रहा है । लेकिन टार्चर करने की एवज में उनसे कुछ पूछा नहीं जा रहा । वहां तीनों तड़प रहे हैं, नशा मांग रहे हें I”

चन्द्रप्रकाश दिवाकर की मुट्टियां मिच गई । जबड़े सख्ती से बन्द हो गए।

“वह तीनों मुह खोल देंगे?" कमिश्नर राममूर्ति ने गम्भीर स्वर में पूछा ।

"अवश्य सर । वह तीनों हर हाल में मुंह खोलेंगे ! नशे कै लिए तड़प-तडपकर बिना पूछे खुद ही सबकुछ बताने के लिए तैयार हो जायेंगे । मैं उनकी कमजोरी भांप चुका हू । इसलिए उनसे कुछ भी नहीं पूछ रहा I मैं जो भी जानना चाहता हुं, नशा पाने के लालच में वह बिना पूछे ही बतायेंगे सर !"

“यानी कि फिर वह तुम्हारे मतलब का बयान देंगे?"

"मेरे मतलब का बयान नहीं सरा अपनी खतरनाक हरकतों का सच्चा ब्यौरा ! बेंक-डकैती और तीन'हत्याओँ का जुर्म वह खुद कबूल करेंगे I अपने दोस्त राजीव मल्होत्रा को किन हालातों में और क्यों मारा, इस बारे में वह अपना मुँह खोलेंगे I" सूरजभान ने एक-एक शब्द को चबाकर कहा ।

"ठीक है ।" राममूर्ति जी ने सिर हिलाकर कहा…“मान लिया-तुम जो कह रहे हो वैसा ही होगा । परन्तु उसके बाद वह अदालत में जाकर अपने बयान से पीछे हट गये तो । अदालत से उन्होंने यह कहा कि तुमने उन्हें मार-मार कर अपनी मर्जी की बात उनके मुंह से निकलवाई है तो?"
 
"'ऐसा नहीं होगा सर । उनके बयान फर्स्ट क्लास मजिऱट्रेट के सामने होंगे । उस वक्त मैं कानून की चन्द बडी हस्तियों को वुलाऊगा, उनमें एक आप भी होंगे वह इस बात को सबके सामने स्पष्ट तोर पर मानेंगे कि जो भी कह हैँ अपनी मनमर्जी से कह रहे हें । उनके जिस्म पर चोट का एक निशान भी नहीं होगा, क्योंकि मैं उन्हें मारूंगा नहीं । वह तीनों अपना जुर्म नशा पाने कै लालच में कंबूल करेगे । सबके सामने में डॉक्टरी परीक्षण करवाऊंगा ताकि सबको मालूम हो जाए, जो जुर्म वह कबूल कर रहे हें, वह किसी दबाव में आकर नहीँ, बल्कि अपनी इच्छा से कर रहे हें । अगर हो सका तो इस केस की सुनवाई कर रहे जज भानुप्रताप सिंह क्रो भी बुलाऊंगा । अरुण खेडा कै पिता सोहन लाल खेडा और सूरज हेगड़े के पिता जज कृष्णलाल हेगड़े जीं को वहां बुलाऊगा जो कि बाद में अदालत में बयान देंगे कि इन तीनों ने बिना किसी दबाव के अपने जुर्म का इकबाल किया था ।”

राममूर्ति जी ने व्याकुल भाव से चन्द्रप्रकाश जी को देखा ।

चन्द्रप्रकाश दिवाकर जो ने बेचैनी से पहलू बदला ।

"सूरजभान । क्या तुम एक बार उन तीनों की माफ नहीँ कर सकते?” राममूर्ति जी ने कहा ।

"नो सर ।। उन्होने चार जानें ली हैँ । हत्यारों को मैँ माफ नहीं कर सकता !"

"मैं तुम्हारा आँफिसर हू और रिक्वेस्ट के तोर पर यह बात तुमसे कह रहा हू कि उन तीनों को एक बार माफ कर दो । मेरा आदेश तो तुम मानोगे नहीं, क्योकि तुम जो कर रहे हो; कानून कै दायरे मे' रहकर; समाज कै भले ही लिए ही कर रहे हो । इसलिए तुम्हें कोई गलत नहीं कह सकता ।।"

राममूर्ति जी ने गम्भीर स्वर में कहा-"कभीकभी ऐसी बाते भी माननी पड़ जाती हैं, जिन्हें मानने को दिल नहीं करता l"

"सॉरी सर ! मैं आपकी यह बांत नही मान सकता I उन तीनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोडूंगा I"

"सुंरज़भान,.मेरी बात मान जाओ । इसी में तुम्हारा भला हे I"

"मेरे भले की आप फिक्र न कीजिए, सर ! मेरे साथ जो होगा, मैं भुगत लूंगा ।”

"उन तीनों का केस कमजोर कर दो । बदले मेँ तुम्हें लाखों की दौलत मिलेगी। दस बीस पचास लाख, जितना भी तुम मांगोगे । दिवाकर साहब देंगे तुम्हें पैसा । तुम हां तो करो, कुछ ही घन्टी में दिवाकर साहब तुम्हारी जिन्दगी बदल देंगे । बंगला कार भी साथ देंगे । तमाम उम्र तुम शानदार जिन्दगी बिताओ । दिवाकर साहब कुछ ही दिन मेँ इस बात का भी इन्तजाम कर देंगे । जो चाहोगे तुम्हें वही मिलेगा । बस तुम्हें उन तीनों को कानून की सजा से बचाना होगा I वह तीनों इस समय तुम्हारे रहमोकरम पर हैँ । केस तुम्हारे अण्डर है । तुम चाहो तो उन्हें बचा सकते हो I नईं जिन्दगी दे सकते हों… I"

“सर । यह बात अब ना ही की जाए तो बेहतर होगा । मैं अपनी बात पर अन्त तक़ पक्का रहूगा ।”

"इसका मतलब, तुम किसी भी तरह, मेरे बेटे को रिहा नहीँ करवाओगे?" एकाएक चन्द्रप्रकाश दिवाकर की आवाज में सख्ती भरती चली गई । चेहरा लाल सुर्ख हो उठा I

“नहीँ, आपका बेटा किसी भी कीमत पर नहीं बचेगा। उसे किए की सजा मिलकर ही रहेगी I"

"इन्सपेक्टर I" चन्द्रप्रकाश जी गुर्राये---- “तुम नहीं जानते में क्या कर सकता हू? मेँ चन्द ही घन्टो में तुम्हारी हत्या करवा सकता हूं। तुम्हारी मौत कै पश्चात् जो पुलिस वाला इस कैस क्रो डील करेगा, 'वह दो लाख लेकर ही मेरी बात मान जायेगा । इन्कार करके अपनी मौत को आवाज मत दो ।" इन्सपेक्टर सूरजभान का चेहरा धधक उठा । आंखें लाल सुर्ख हो गई । वह उठ खड़ा हुआ ।

'कमिश्नर साहब !” सूरजभान एकएकं शब्द चबाकर कठोर स्वर में कह उठा-"'यहाँ पर में आपके बुलाने पर आया था । आँफिशयली तौर पर आपसे बात करने ना कि आपके दोस्त की धमकियां सुनने । मेरे ख्याल में आपने जो बात करनी थी वह कह चुके । अब मैं जा रहा हूं। अपने दोस्त को समझा दीजिएगा कि अगर उनका हाथ मेरी तरफ उठा . तो, यह इस बात को ना भूलें कि इनके बेटे को मैँने रिमाण्ड पर लिया हुआ हे । मेरा कुछ बुरा होने से पहले इन्हें इनके बेटे की लाश ही मिलेगी । चाहे वह जेल मेँ ही क्यों न पहुंच जाए, इनके बेटे को में छोडूंगा नहीं । इन्हें इस बातं पर ही तसल्ली कर लेनी चाहिए कि इनका बेटा जिन्दा है । अगर फांसी की सजा ना हुई तो जिन्दा ही रहेगा ।'" कहनें के साथ ही सूरजभान ने कमिश्नर साहब क्रो सेल्यूट दिया और होंठ भींचे बाहर निकलता चला गया ।

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फीनिश

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शाम क्रो चार बजे अजय सिन्हा अन्तिम संस्कार के लिए मां के शरीर को शमशान ले गया । साथ में गली मोहल्ले वाले और भी बहुत-से लोग थे । शवयात्रा के साथ चलते जिन्दल और अशोक ने मौका देखकर बापस पलटी मारी और अजय कै घर पर आ पहुचे ।

घर में पडोस की बहुत-सी बूढी औरतें थीं जो थक… टूटकर दीवार कै सहारे वेठी-बैठी ही सो गई थीं । दोनों ने तसल्ली , से घर की तलाशी ली । वह दोनों अंजना वाला हैंडबैग तलाश कर रहे थे, जिसके बारे में अजय ने अंजना से कहा था कि उसके पास हे । और पीछे बेठे अशोक ने यह बात स्पष्ट शब्दों में सुनी थी । एक धन्टे तक उन्होंने पूरे धर को छान मारा । परन्तु हेडबेग उन्हें नहीं मिला । वह तो अजय कं कमरें में उसके पिता की तस्वीर के पीछे पड़ा था । जहां देखने का उन्हें ख्याल ना आया था ।

" अशोक, घर में तो वह हैंडबैग नहीं हैं I" जिन्दल ने गहरी सांस लेकर कहा ।

"हैरानी हे सर ! अजय की बात कै मुताबिक हैंडबैग को घऱ में ही होना चाहिए ।"

"अगर हे तो मिल क्यों नहीं रहा?"

"यही बात तो समझ नहीं आ रही !" अशोक खुद उलझन मे था ।

“हो । सकता हे, उनकी बातचीत सुनने में तुमसे कोई गलती हुई हो ।" जिन्दल बोला l

"नो नेवर सर । उनकी बात सुनने में, मुझे कोई गलती नहीं लगी !" अशोक ने दृढता से कहा ।

जिन्दल गहरी सोच में डूब गया ।

“वया सोच रहे हैँ सर?"

"यही कि अब अजय से हमें सीधे-सीघे बात करनी पड़ेगी । हैंडबैग हमें मिलना बहुत जरूरी हे I"

"लेकिन अजय तो इन दिनों अपनी माँ के अन्तिम संस्कार में व्यस्त है , ओर तेरहवीं तक तो उसे लोग घेरे ही रहेंगे । .. अजय से बात करनी कठिन होगी l” अशोक बोला

"हम तेरहवीं तक. इन्तजार कर लेंगे और तब तक उस पर निगाह रखेंगे l"

"राईट सर । ऐसा करना ही ठीक होगा I" अशोक ने सोच भरे अन्दाज में सिर हिला दिया l

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फीनिश

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अघेरे से भरा कमरा I ना कोई खिडकी, ना कोई रोशनदान. कहीं से भी हवा आने या रोशनी का रास्ता नहीं था । कमरे कै भीतर पहुचते ही दमं सा घुटने लगता था । इसी कमरे की छत पर तार द्वारा तीन तेज प्रकाश की लाइंटैं तीन तीन फीट के फासले पर लटक रही थीं । उन लाईटों के ठीक नीचे, तीन कुर्सियों पर दिवाकर, हेगडे और खेड़ा बंधे हुए थे ।

एक-एक लाईट का तीव्र प्रकाश उनकै सिरों पर पड़ रहा था । लाईट इतने करीब थी कि बल्ब की गर्माहट सिर को बराबर महसूस हो रहीँ थी । उस गर्माहट से बचने के लिए वह तडप-तडप कर सिर इधर-उधर हिला रहे थे, परन्तु बच ना पा रहे थे l

रोशनी की गर्माहट उन्हें बेचैन किए दे रही थी ।

पसीना उनके बदन पर इस तरह रेंग रहा था जैसे कोई कीड़ा उनके बदन-पर चल रहा हो । वह छटपटाते हुए अपनी. इस अवस्था से मुक्ति पाने की असफल चेष्टा कर रहे थे । परन्तु हाथ-पांबों के बन्धन उन्हें कुर्सी पर बैठने कै लिए मजबूर किए हुए थे ।।

कोर्ट से वापस लोटने के बाद उन्हें इसी स्थिति में लाकर बांध दिया गया था । जब भी वह पानी के लिए चिल्लाते तो कमरे के बन्द दरवाजे के बाहर -खड़ा पुलिस वाला पार्नी का जग लिए भीतर आता और चन्द घूंट पानी जग कै द्वारा ही उनके कंठ में उड़ेलता, फिर बाहर निकलकर दरवाजा बन्द कर लेता । जब तक पानी का गीलापन उनके चुभते कंठ मेँ रहता उन्हें राहत रहती उसके बाद वह फिर छटपटाने लग जाते । उनके दांत किटकिटाने की आवाज स्पष्ट वहां गूंजने लगी ।

"हेगडे ।" एकाएक खेड़ा चीखा… "मुझसे यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा ।"

"उल्लू के पट्ठे बर्दाश्त कर… ।” दिवाकर गला फाड़कर चीखा ।

"इस मामूली -सी तकलीफ से हमें तक्लीफ नहीं हो रही ।" हेगडे ने दांत पीसकर कहा…"हमारा नशा कब का टूट चुका हे । हमेँ नशा चाहिए । यह टूटा नशा हमें बैचेन किए दे रहा हे ।"

“तुम अच्छी तरह समझते हो कि यहां हमेँ नशा नहीँ मिल . सकता । नशे के बिना ही हमें रहना हे । नशा न मिलने के कारण मैं खुद तकलीफ में हू । लेकिन खुद पर काबू कर रखा हे मैँने । इस वक्त हमेँ समझदारी से काम लेना है ।" दिवाकर चिल्लाया ।

"पहले ही समझदारी से काम लिया होता तो कितना अच्छा होता ।" खेडा बोला ।

"जैसे भी हमारा वक्त कट रहा था जोढ़ तोड़ करके हम वेसे ही नशों का इन्तजाम करते रहते । डकैती की तरफ ध्यान न देते तो कितना अच्छा रहता! इन मुसीबतों में तो ना पड़ने !"

"खेडा ठीक कह रहा है ।'" हेगडे ने लम्बी सांस ली !! "सब दिवाकर की करामात है जों.......!"

“मेरी कोई करामात नहीं है । तुम लोगों के कहने पर ही, दोलत पाने के लिए मैंने डकैती के बारे में सोचा था । अगर मेरी बात मानीं होती तो इस समय हम इतनी ज्यादा मुसीबत मेँ न होते !" दिवाकर गुर्रा उठा !!

"कौंन सी बात?”

"मैने पहले हीँ कहा था, डकैती के साथ हमें हत्या नहीं करनी हैँ । तुम लोगों ने हत्याएं करके अपराध को और भी संगीन बना लिया हैं । खून से रंगे हाथों को कानून कभी माफ नहीं करता । अगर हमारे हाथ खूनं से ना ऱगे होते तो ड़कैती जैसी मामूली बात की कोई परवाह भी नही करता ।"

"उस समय हाथों को खून से रंगना हमारी मजबूरी बन गई थी ।।”

तभी दरवाजा खुला ओर इन्सपेक्टरं सूरजभान ने भीतर प्रवेश किया ।

तीनों एकदम खामोश हो गए ।

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फीनिश

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