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सबूत प्यार का

"महतारीचोद ये दोनों बोतल खाली कैसे हो गईं?" प्रदीप काका ने नशे में झूमते हुए जैसे खुद से ही कहा____"घर से जब लाया था तब तो ये दोनों भरी हुईं थी।"

"कैसी बात करते हो काका?" मैंने हंसते हुए कहा____"अभी तुमने ही तो दोनों बोतलों की शराब पी है। क्या ये भी भूल गए तुम?"

"उस बुरचोदी के चक्कर में कुछ याद ही नहीं रहा मुझे।" प्रदीप काका ने सिर को झटकते हुए कहा____"वैभव, आज तो मैं उस ससुरी को पेल के रहूंगा चाहे जो हो जाए।"

"दारु के नशे में कोई हंगामा न करना काका।" मैंने प्रदीप काका के कंधे पर हाथ रख कर समझाते हुए कहा____"तुम्हारी बेटी डॉली को पता चलेगा तो क्या सोचेगी वो तुम्हारे बारे में।"

"डॉली ?? मेरी बेटी???" प्रदीप काका ने जैसे सोचते हुए कहा____"हां मेरी बेटी डॉली । तुम नहीं जानते वैभव, मेरी बेटी डॉली मेरे कलेजे का टुकड़ा है। एक वही है जो मेरा ख़याल रखती है, पर एक दिन वो भी मुझे छोड़ कर अपने ससुराल चली जाएगी। अरे! लेकिन वो ससुराल कैसे चली जाएगी भला?? मैं इतना सक्षम भी तो नहीं हूं कि अपनी फूल जैसी कोमल बेटी का ब्याह कर सकूं। वैसे एक जगह उसके ब्याह की बात की थी मैंने। मादरचोदों ने मुट्ठी भर रूपिया मांगा था मुझसे जबकि मेरे पास दहेज़ में देने के लिए तो फूटी कौड़ी भी नहीं है। खेती किसानी में जो मिलता है वो भी कर्ज़ा देने में चला जाता है। नहीं वैभव, मैं अपनी बेटी के हाथ पीले नहीं कर पाऊंगा। मेरी बेटी जीवन भर कंवारी बैठी रह जाएगी।"

प्रदीप काका बोलते बोलते इतना भावुक हो गया कि उसकी आवाज़ एकदम से भर्रा गई और आँखों से आँसू छलक कर कच्ची ज़मीन पर गिर पड़े। प्रदीप काका भले ही नशे में था किन्तु बातों में वो खो गया था और भावुक हो कर रो पड़ा था। उसकी ये हालत देख कर मुझे भी उसके लिए थोड़ा बुरा महसूस हुआ।

"क्या तुम मेरे लिए कुछ कर सकोगे वैभव?" नशे में झूमते प्रदीप ने अचानक ही मेरी तरफ देखते हुए कहा____"अगर मैं तुमसे कुछ मांगू तो क्या तुम दे सकते हो मुझे?"

"क्या हुआ काका?" मैं उसकी इस बात से चौंक पड़ा था____"ये तुम क्या कह रहे हो मुझसे?"

"क्या तुम मेरे कहने पर कुछ कर सकोगे भतीजे?" प्रदीप ने लाल सुर्ख आँखों से मुझे देखते हुए कहा____"बेताओ न वैभव, अगर मैं तुमसे ये कहूं कि तुम मेरी बेटी डॉली का हाथ हमेशा के लिए थाम लो तो क्या तुम थाम सकते हो? मेरी बेटी में कोई कमी नहीं है। उसका दिल बहुत साफ़ है। उसको घर का हर काम करना आता है। ये ज़रूर है कि वो तुम्हारी तरह किसी बड़े बाप की बेटी नहीं है मगर मेरी बेटी डॉली किसी से कम भी नहीं है। क्या तुम मेरी बेटी का हाथ थाम सकते हो वैभव? बताओ न वैभव...!"

प्रदीप काका की इन बातों से मैं एकदम हैरान रह गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि प्रदीप काका अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में देने का कैसे सोच सकता है? मैं ये तो जानता था कि दुनिया का हर बाप अपनी बेटी को किसी बड़े घर में ही ब्याहना चाहता है ताकि उसकी बेटी हमेशा खुश रहे मगर डॉली के लिए मैं भला कैसे सुयोग्य वर हो सकता था? मुझ में भला ऐसी कौन सी खूबी थी जिसके लिए प्रदीप ऐसा चाह रहा था? हलांकि डॉली कैसी थी ये प्रदीप को बताने की ज़रूरत ही नहीं थी क्योंकि मैं खुद जानता था कि वो एक निहायत ही शरीफ लड़की है और ये भी जानता था कि उसमे कोई कमी नहीं है मगर उसके लिए जीवन साथी के रूप में मेरे जैसा औरतबाज़ इंसान बिलकुल भी ठीक नहीं था। जहां तक मेरा सवाल था तो मैं तो शुरू से ही डॉली को अपनी हवश का शिकार बनाना चाहता था। ये अलग बात है कि प्रदीप के अहसानों के चलते और खुद डॉली के साफ चरित्र के चलते मैं उस पर कभी हाथ नहीं डाल पाया था।

"तुम चुप क्यों हो वैभव?" मुझे ख़ामोश देख प्रदीप ने मुझे पकड़ कर हिलाते हुए कहा____"कहीं तुम ये तो नहीं सोच रहे कि मेरे जैसा ग़रीब और मामूली इंसान तुम्हारे जैसे बड़े बाप के बेटे से अपनी बेटी का रिश्ता जोड़़ कर अपनी बेटी के लिए महलों के ख़्वाब देख रहा है? अगर ऐसा है तो कोई बात नहीं भतीजे। दरअसल काफी समय से मेरे मन में ये बात थी इस लिए आज तुमसे कह दिया। मैं जानता हूं कि मेरी कोई औका़त नहीं है कि तुम जैसे किसी अमीर लड़के से अपनी बेटी का रिश्ता जोड़ने की बात भी सोचूं।"

"ऐसी कोई बात नहीं है काका।" मैंने इस विषय को बदलने की गरज़ से कहा____"मैं अमीरी ग़रीबी में कोई फर्क नहीं करता और ना ही मुझे ये भेदभाव पसंद है। मैं तो मस्तमौला इंसान हूं जिसके बारे में हर कोई जानता है कि मैं कैसा हूं और किन चीज़ों का रसिया हूं। तुम्हारी बेटी में कोई कमी नहीं है काका मगर ख़ैर छोड़ो ये बात। इस वक़्त तुम सही हालत में नहीं हो। हम कल इस बारे में बात करेंगे।"

मेरी बात सुन कर प्रदीप ने मेरी तरफ अपनी लाल सुर्ख आँखों से देखा। उसकी चढ़ी चढ़ी आंखें मेरे चेहरे के भावों का अवलोकन कर रहीं थी और इधर मैं ये सोच रहा था कि क्या उस वक़्त प्रदीप काका अपने इसी स्वार्थ की बात कह रहा था? आख़िर उसके ज़हन में ये ख़याल कैसे आ गया कि वो अपनी बेटी का रिश्ता मुझसे करे? उसने ये कैसे सोच लिया था कि मैं इसके लिए राज़ी भी हो जाऊंगा?

मैंने प्रदीप को उसके घर ले जाने का सोचा और उससे उठ कर घर चलने को कहा तो वो घर जाने में आना कानी करने लगा। मैंने उसे समझा बुझा कर किसी तरह शांत किया और फिर मैंने एक हाथ में लालटेन लिया और दूसरे हाथ से उसे उठाया।

पूरे रास्ते प्रदीप झूमता रहा और नशे में बड़बड़ाता रहा। आख़िर मैं उसे ले कर उसके घर आया। मैंने घर का दरवाज़ा खटखटाया तो डॉली ने ही दरवाज़ा खोला। मेरे साथ अपने बापू को उस हालत में देख कर उसने मेरी तरफ सवालिया निगाहों से देखा तो मैंने उसे धीरे से बताया कि उसके बापू ने आज दो बोतल देशी शराब चढ़ा रखी है इस लिए उसे कोई भी ना छेड़े। डॉली मेरी बात समझ गई इस लिए चुप चाप एक तरफ हट गई जिससे मैं प्रदीप को पकड़े आँगन में आया और एक तरफ रखी चारपाई पर उसे लेटा दिया। तब तक सरोज भी आ गई थी और आ कर उसने भी प्रदीप का हाल देखा।

"ये नहीं सुधरने वाले।" सरोज ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा____"इस आदमी को ज़रा भी चिंता नहीं है कि जवान बेटी घर में बैठी है तो उसके ब्याह के बारे में सोचूं। घर में फूटी कौड़ी नहीं है और ये अनाज बेच बेच कर हर रोज़ दारू चढा लेते हैं।" कहने के साथ ही सरोज मेरी तरफ पलटी____"बेटा तुम इनकी संगत में दारू न पीने लगना। ये तुम्हें भी अपने जैसा बना देंगे।"
 
डॉली वहीं पास में ही खड़ी थी इस लिए सरोज मुझे बेटा कह रही थी। सरोज की बात पर मैंने सिर हिला दिया था। ख़ैर उसके बाद सरोज के ही कहने पर मैंने खाना खाया और फिर लालटेन ले कर मैं वापस अपने खेत की तरफ चल पड़ा। सरोज ने मुझे इशारे से रुकने के लिए भी कहा था मगर मैंने मना कर दिया था।

प्रदीप के घर से मैं लालटेन लिए अपने खेत की तरफ जा रहा था। मेरे ज़हन में प्रदीप की वो बातें ही चल रही थीं और मैं उन बातों को बड़ी गहराई से सोचता भी जा रहा था। आस पास कोई नहीं था। प्रदीप का घर तो वैसे भी उसके गांव से हट कर बना हुआ था और मेरा अपना गांव यहाँ से पांच किलो मीटर दूर था। दोनों गांवों के बीच या तो खेत थे या फिर खाली मैदान जिसमे यदा कदा पेड़ पौधे और बड़ी बड़ी झाड़ियां थी। पिछले चार महीने से मैं इस रास्ते से रोज़ाना ही आता जाता था इस लिए अब मुझे रात के अँधेरे में किसी का डर नहीं लगता था। ये रास्ता हमेशा की तरह सुनसान ही रहता था। वैसे दोनों गांवों में आने जाने का रास्ता अलग था जो यहाँ से दाहिनी तरफ था और यहाँ से दूर था।

मैं हाथ में लालटेन लिए सोच में डूबा चला ही जा रहा था कि तभी मैं किसी चीज़ की आवाज़ से एकदम चौंक गया और अपनी जगह पर ठिठक गया। रात के सन्नाटे में मैंने कोई आवाज़ सुनी तो ज़रूर थी किन्तु सोच में डूबा होने की वजह से समझ नहीं पाया था कि आवाज़ किसकी थी और किस तरफ से आई थी? मैंने खड़े खड़े ही लालटेन वाले हाथ को थोड़ा ऊपर उठाया और सामने दूर दूर तक देखने की कोशिश की मगर कुछ दिखाई नहीं दिया। मैंने पलट कर पीछे देखने का सोचा और फिर जैसे ही पलटा तो मानो गज़ब हो गया। किसी ने बड़ा ज़ोर का धक्का दिया मुझे और मैं भरभरा कर कच्ची ज़मीन पर जा गिरा। मेरे हाथ से लालटेन छूट कर थोड़ी दूर लुढ़कती चली गई। शुक्र था कि लालटेन जिस जगह गिरी थी वहां पर घांस उगी हुई थी वरना उसका शीशा टूट जाता और ये भी संभव था कि उसके अंदर मौजूद मिट्टी का तेल बाहर आ जाता जिससे आग उग्र हो जाती।

कच्ची ज़मीन पर मैं पिछवाड़े के बल गिरा था और ठोकर ज़ोर से लगी थी जिससे मेरा पिछवाड़ा पके हुए फोड़े की तरह दर्द किया था। हालांकि मैं जल्दी से ही उठा था और आस पास देखा भी था कि मुझे इतनी ज़ोर से धक्का देने वाला कौन था मगर अँधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया। मैंने जल्दी से लालटेन को उठाया और पहले आस पास का मुआयना किया उसके बाद मैं ज़मीन पर लालटेन की रौशनी से देखने लगा। मेरा अनुमान था कि जिस किसी ने भी मुझे इस तरह से धक्का दिया था उसके पैरों के निशान ज़मीन पर ज़रूर होने चाहिये थे।

मैं बड़े ग़ौर से लालटेन की रौशनी में ज़मीन के हर हिस्से पर देखता जा रहा था किन्तु ज़मीन पर निशान तो मुझे तब मिलते जब ज़मीन पर हरी हरी घांस न उगी हुई होती। मैं जिस तरफ से आया था उस रास्ते में बस एक छोटी सी पगडण्डी ही बनी हुई थी जबकि बाकी हर जगह घांस उगी हुई थी। काफी देर तक मैं लालटेन की रौशनी में कोई निशान तलाशने की कोशिश करता रहा मगर मुझे कोई निशान न मिला। थक हार कर मैं अपने झोपड़े की तरफ चल दिया। मेरे ज़हन में ढेर सारे सवाल आ कर तांडव करने लगे थे। रात के अँधेरे में वो कौन था जिसने मुझे इतनी ज़ोर से धक्का दिया था? सवाल तो ये भी था कि उसने मुझे धक्का क्यों मारा था? वैसे अगर वो मुझे कोई नुक्सान पहुंचाना चाहता तो वो बड़ी आसानी से पहुंचा सकता था।

सोचते सोचते मैं झोपड़े में आ गया। झोपड़े के अंदर आ कर मैंने लालटेन को एक जगह रख दिया और फिर झोपड़े के खुले हुए हिस्से को लकड़ी से बनाये दरवाज़े से बंद कर के अंदर से तार में कस दिया ताकि कोई जंगली जानवर अंदर न आ सके। इन चार महीनों में आज तक मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था और ना ही यहाँ रहते हुए किसी जंगली जानवर से मुझे कोई ख़तरा हुआ था। हालांकि शुरू शुरू में मैं यहाँ अँधेरे में अकेले रहने से डरता था जो कि स्वभाविक बात ही थी मगर अभी जो कुछ हुआ था वो थोड़ा अजीब था और पहली बार ही हुआ था।
 
झोपड़े के अंदर मैं सूखी घांस के ऊपर एक चादर डाल कर लेटा हुआ था और यही सोच रहा था कि आख़िर वो कौन रहा होगा जिसने मुझे इस तरह से धक्का दिया था? सबसे बड़ा सवाल ये कि धक्का देने के बाद वो गायब कहां हो गया था? क्या वो मुझे किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाने आया था या फिर उसका मकसद कुछ और ही था? मैं उस अनजान ब्यक्ति के बारे में जितना सोचता उतना ही उलझता जा रहा था और उसी के बारे में सोचते सोचते आख़िर मेरी आँख लग गई। मैं नहीं जानता था कि आने वाली सुबह मेरे लिए कैसी सौगा़त ले कर आने वाली थी।

सुबह मेरी आँख कुछ लोगों के द्वारा शोर शराबा करने की वजह से खुली। पहले तो मुझे कुछ समझ न आया मगर जब कुछ लोगों की बातें मेरे कानों में पहुंची तो मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन ही हिल गई। चार महीनों में ऐसा पहली बार हुआ था कि मेरे आस पास इतने सारे लोगों का शोर मुझे सुनाई दे रहा था। मैं फ़ौरन ही उठा और लकड़ी के बने उस दरवाज़े को खोल कर झोपड़े से बाहर आ गया।

बाहर आ कर देखा तो क़रीब बीस आदमी हाथों में लट्ठ लिए खड़े थे और ज़ोर ज़ोर से बोल रहे थे। उन आदमियों में से कुछ आदमी मेरे गांव के भी थे और कुछ प्रदीप के गांव के। मैं जैसे ही बाहर आया तो उन सबकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो तेज़ी से मेरी तरफ बढ़े। कुछ लोगों की आंखों में भयानक गुस्सा मैंने साफ़ देखा।

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अब तक,,,,,

सुबह मेरी आँख कुछ लोगों के द्वारा शोर शराबा करने की वजह से खुली। पहले तो मुझे कुछ समझ न आया मगर जब कुछ लोगों की बातें मेरे कानों में पहुंची तो मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन ही हिल गई। चार महीनों में ऐसा पहली बार हुआ था कि मेरे आस पास इतने सारे लोगों का शोर मुझे सुनाई दे रहा था। मैं फ़ौरन ही उठा और लकड़ी के बने उस दरवाज़े को खोल कर झोपड़े से बाहर आ गया।

बाहर आ कर देखा तो क़रीब बीस आदमी हाथों में लट्ठ लिए खड़े थे और ज़ोर ज़ोर से बोल रहे थे। उन आदमियों में से कुछ आदमी मेरे गांव के भी थे और कुछ प्रदीप के गांव के। मैं जैसे ही बाहर आया तो उन सबकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो तेज़ी से मेरी तरफ बढ़े। कुछ लोगों की आंखों में भयानक गुस्सा मैंने साफ़ देखा।

अब आगे,,,,,

"ये सब क्या है?" मैंने अपनी तरफ बढ़े चले आ रहे आदमियों को देखते हुए ऊंची आवाज़ में किन्तु अंजान बनते हुए कहा____"आज तुम लोग यहाँ पर क्यों जमा हो रखे हो?"

"देखो तो।" मेरी तरफ बढ़ रहे आदमियों में से एक ने दूसरे से कहा____"देखो तो कैसे भोला बन रहा है ये। इतना बड़ा काण्ड करने के बाद भी कहता है कि हम लोग यहाँ क्यों जमा हो रखे हैं?"

"अब इसे हम बताएंगे कि इसने जो किया है उसका अंजाम क्या होता है।" दूसरे आदमी ने अपने लट्ठ को हवा में उठाते हुए कहा____"बड़े ठाकुर का बेटा है तो क्या ये किसी की जान ले लेगा?"

"मारो इसे।" तीसरा आदमी ज़ोर से चीखा____"और इतना मारो कि इसके जिस्म से इसके प्राण निकल जाएं।"

"देखो तुम लोग अपनी हद पार कर रहे हो।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"तुम लोग जो समझ कर यहाँ मेरी जान लेने आये हो वैसा कुछ नहीं किया है मैंने।"

"तुम्हीं ने मेरे भाई प्रदीप की बेरहमी से हत्या की है।" एक आदमी मेरे एकदम पास आते हुए ज़ोर से चीखा_____"तुम्हारे अलावा कल रात कोई नहीं गया था वहां। तुमने ही मेरे भाई की हत्या की है और अब हम तुम्हें भी ज़िंदा नहीं छोडेंगे।"

"मैं भला प्रदीप काका की हत्या क्यों करुगा?" मैं अंदर से तो बेहद हैरान था कि प्रदीप काका की हत्या हो गई है किन्तु अब इस बात से भी हैरान था कि उसकी हत्या का आरोप ये लोग मुझ पर लगा रहे थे इस लिए बोला____"आख़िर मेरी उनसे दुश्मनी ही क्या थी? तुम सब जानते हो कि चार महीने पहले मेरे बाप ने मुझे घर और गांव से निष्कासित कर दिया था। उसके बाद से मैं यहाँ सबसे अलग हो कर अकेले रह रहा हूं। ऐसे बुरे वक़्त में जब किसी ने भी मेरी कोई मदद नहीं की थी तब प्रदीप काका ने ही मेरी मदद की थी। वो न होते तो मैं कब का भूखों मर जाता। जो इंसान मेरे लिए फ़रिश्ते जैसा है उसकी हत्या मैं क्यों करुंगा?"

"क्योंकि तुम उसकी बेटी को अपनी हवश का शिकार बनाना चाहते थे।" उस आदमी ने चीखते हुए कहा जो प्रदीप का भाई जगन था____"मैं जानता हूं कि बड़े ठाकुर का ये सपूत गांव की किसी भी लड़की या औरत को अपना शिकार बनाने से नहीं चूकता। बड़े ठाकुर ने तुम्हे गांव से निकाल दिया था इस लिए तुम अपनी हवश के लिए किसी लड़की या औरत का शिकार बनाने के लिए तड़पने लगे और जब मेरा भाई ऐसे वक़्त में तुम्हारी मदद करने आया तो तुमने उसी की बेटी को अपना शिकार बनाने का सोच लिया। मैं अपनी भतीजी को अच्छी तरह जानता हूं। वो ऐसी वैसी लड़की नहीं है और ये बात तुम भी समझ गए थे इसी लिए जब तुम्हारी दाल किसी भी तरह से नहीं गली तो तुमने मेरे भाई की ये सोच कर हत्या कर दी कि अब कोई तुम्हारे रास्ते में नहीं आएगा मगर तुम भूल गए कि तुम्हारे रास्ते की दीवार बन कर प्रदीप का भाई भी खड़ा हो सकता है।"

"तुम पता नहीं ये क्या बकवास पेले जा रहे हो जगन काका।" मैंने इस बार गुस्से में कहा____"मैं ये मानता हूं कि चार महीने पहले तक मैं ऐसा इंसान था जो अपनी हवश के लिए किसी लड़की या औरत को अपना शिकार बनाता था मगर जब से यहाँ आया हूं तब से मैं वैसा नहीं रहा। भगवान जानता है कि मैंने प्रदीप की बेटी को कभी ग़लत नज़र से नहीं देखा। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं हूं कि जो मुझे अपने घर में दो वक़्त की रोटी दें उन्हीं के घर को बर्बाद कर दूं।"

प्रदीप के छोटे भाई का नाम जगन सिंह था और वो भी अपने भाई प्रदीप की तरह ही खेती बाड़ी करता था। प्रदीप की हत्या के बाद वो अपने गांव के कुछ आदमियों को ले कर सुबह सुबह ही मेरे झोपड़े पर आ गया था। प्रदीप की हत्या की ख़बर जंगल के आग की तरह फैलती हुई मेरे गांव तक भी पहुंच गई थी। पिता जी को जब इस ख़बर के बारे में पता चला होगा तो उन्होंने अपने कुछ आदमियों को यहाँ भेज दिया होगा। हालांकि ऐसा मेरा सिर्फ अनुमान ही था।

इधर मैं जगन को समझा रहा था कि मैंने प्रदीप की हत्या नहीं की है मगर वो मानने को तैयार ही नहीं था किन्तु बाकी लोग मेरी बातें सुन कर सोच में ज़रूर पड़ गए थे और यही वजह थी कि उन लोगों का गुस्सा ठंडा हो गया था। जाते जाते जगन मुझे धमकी दे कर गया था कि अब अगर मैंने प्रदीप के घर में क़दम भी रखा तो वो मुझे जान से मार देगा।

जगन के साथ उसके आदमी चले गए थे और उनके जाने के बाद मेरे गांव के लोग भी बिना मुझसे कुछ बोले चले गए। मैं ये सोच कर बेहद परेशान हो गया था कि जब मैंने प्रदीप की हत्या की ही नहीं है तो उसकी हत्या का आरोप मेरे सिर पर क्यों लगा रहा था जगन?

जगन से मेरी एक दो बार मुलाकात हुई थी और वो मुझे अपने बड़े भाई प्रदीप की तरह ही भला आदमी लगता था। हालांकि वो गांव में अपने बीवी बच्चों के साथ रहता था किन्तु प्रदीप के यहाँ उसका आना जाना था और आना जाना हो भी क्यों न? दोनों भाईयों के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी बल्कि काफी अच्छा ताल मेल था दोनों के बीच।

मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि रात में सोने के बाद जब सुबह मेरी आँख खुलेगी तो मुझे इतना बड़ा झटका लगेगा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि प्रदीप की हत्या किसने की होगी और क्यों की होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रदीप मेरी मदद करता था तो मेरे बाप ने उसे मरवा दिया हो। तभी मुझे याद आया कि कल रात जब मैं खा पी कर प्रदीप के घर से चला था तो रास्ते में किसी ने मुझे ज़ोर का धक्का मारा था। मैंने उस ब्यक्ति को खोजा भी था मगर ना तो वो खुद मिला था मुझे और ना ही उसका कोई निशान मिला था मुझे। इतना तो मैं भी समझ रहा था कि प्रदीप की हत्या रात में ही किसी वक़्त की गई थी मगर सवाल था कि किसने की थी उसकी हत्या? क्या उसी ब्यक्ति ने जिसने रास्ते में मुझे धक्का दिया था? आख़िर कौन था वो रहस्यमयी ब्यक्ति? क्या वो मेरे बाप का कोई आदमी था?

प्रदीप की हत्या के बारे में सुन कर मैं उसके घर जाना चाहता था मगर जगन ने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैं उसके घर गया तो वो मुझे जान से मार देगा। मेरी आँखों के सामने सहसा प्रदीप का चेहरा उभर आया। शुरू से ले कर अब तक का उसके साथ गुज़रा हुआ हर लम्हा याद आने लगा मुझे। एक वही था जिसने ऐसे वक़्त में मेरी इतनी मदद की थी और इतना ही नहीं अपने घर ले जा कर मुझे खाना भी खिलाता था। क्या ऐसे इंसान की मौत की वजह सिर्फ और सिर्फ मैं था? क्या उसकी हत्या किसी ने मेरी मदद करने की वजह से की थी? प्रदीप के बारे में सोचते सोचते मेरी आँखें भर आईं। मैंने मन ही मन ईश्वर से पूछा कि ऐसा क्यों किया उस नेक इंसान के साथ?

झोपड़े के बाहर माटी के चबूतरे में बैठा मैं प्रदीप के ही बारे में सोच रहा था। प्रदीप की हत्या से मैं बुरी तरह हिल गया था और ये सोचने पर मजबूर भी हो गया था कि उसकी हत्या किस वजह से और किसने की होगी? आख़िर किसी की प्रदीप से ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी जिसके तहत उसकी इस तरह से हत्या कर दी गई थी?

मुझे एहसास हुआ कि प्रदीप की इस अकस्मात हत्या से मैं बुरी तरह घिर गया हूं। प्रदीप का भाई जगन और उसके गांव वाले सब मुझे ही प्रदीप का हत्यारा कह रहे थे जबकि ये तो मैं ही जानता था कि मैं प्रदीप की हत्या करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मुझे एहसास हुआ कि एकाएक ही मैं कई सारी मुश्किलों में पड़ गया था।

मेरे ज़हन में ये भी ख़याल उभर रहे थे कि मुमकिन है कि प्रदीप की हत्या मेरे बाप ने करवाई हो। प्रदीप का मेरी इस तरह से मदद करना उसे शुरू से ही पसंद न रहा हो और जब उसके सब्र का बांध टूट गया तो उसने अपने आदमियों के द्वारा इस तरह से उसकी हत्या करवा दी हो कि उसकी हत्या का सारा इल्ज़ाम मेरे ही सिर पर आ जाए। इन ख़यालों से मैं फिर ये भी सोचता कि क्या मेरा बाप सच में ऐसा कर सकता है? क्या वो इस तरह से मुझे ऐसी मुश्किल में डालने का सोच सकता है? मैं ये तो मानता था कि मेरा बाप अपनी बदनामी को नहीं सह सकता किन्तु मेरा दिल इस बात को मानने से कतरा रहा था कि कोई बाप अपने बेटे को इतने संगीन अपराध में फंसा देगा। अब सोचने वाली बात थी कि अगर मेरे बाप ने प्रदीप की हत्या नहीं करवाई थी तो किसने की उसकी हत्या और क्यों की?
 
प्रदीप की इस प्रकार हुई हत्या से क्या उसकी बीवी और उसके बच्चे भी यही समझ रहे होंगे कि मैंने ही प्रदीप की हत्या की है? मेरा दिल कह रहा था कि वो मेरे बारे में ऐसा नहीं सोच सकते थे क्योकि इतना तो वो भी सोचेंगे कि मैं भला प्रदीप की हत्या क्यों करुंगा? दूसरी बात अगर वो ऐसा सोचते तो यकीनन वो मेरे पास आते और मेरा गिरेहबान पकड़ कर मुझसे पूछते कि मैंने ऐसा क्यों किया है? मतलब साफ़ था कि वो मेरे बारे में ऐसा नहीं सोच रहे थे या फिर ऐसा हो सकता था कि प्रदीप के भाई जगन ने उन्हें मेरे पास आने ही न दिया हो। मुझे मेरा ये विचार ज़्यादा सही लगा और अब मुझे लग रहा था कि मुझे प्रदीप के घर जा कर सरोज से मिलना चाहिए। आख़िर इतना तो मुझे भी पता होना चाहिए कि सरोज और उसकी बेटी डॉली मेरे बारे में क्या सोचती हैं?

जगन की धमकी के बावजूद मैंने फैसला कर लिया कि मैं प्रदीप के घर जाउंगा। मैं सरोज से चीख चीख कर कहूंगा कि मैंने उसके पति की हत्या नहीं की है बल्कि कोई और ही है जिसने उसके पति की हत्या कर के उसका सारा इल्ज़ाम मुझ पर थोप दिया है।

अपने अंजाम की परवाह किये बिना मैं अपने झोपड़े से प्रदीप के घर की तरफ चल दिया। मैं जानता था कि इस वक़्त उसके घर में उसके गांव वाले भी मौजूद होंगे और खुद जगन भी होगा जो मुझे वहां पर देखते ही मुझे जान से मारने की कोशिश करेगा। मुझे अपने अंजाम की अब कोई परवाह नहीं थी बल्कि मैं तो अब ये फैसला कर चूका था कि खुद पर लगे इस हत्या के इल्ज़ाम को अपने सर से हटाऊंगा और ये भी पता करुंगा कि प्रदीप की हत्या कर के किसने मुझे फंसाया है?

झोपड़े से निकल कर मैं अभी कुछ दूर ही बढ़ा था कि मुझे अपने दाहिने तरफ से एक बग्घी आती हुई दिखी। मैं दूर से ही उस बग्घी में बैठे अपने बाप को पहचान गया था। अपने बाप को बग्घी में बैठ कर अपनी तरफ आते देख मेरे अंदर की नफ़रत उबाल मारने लगी और मेरी मुट्ठिया कस ग‌ईं। चार महीने बाद ये दूसरा अवसर था जब मेरे घर का कोई सदस्य मेरी तरफ आ रहा था। पहले भाभी आईं थी और अब खुद मेरा बाप आ रहा था। अपने बाप को देख कर मेरे मन में एक ही सवाल उभरा कि जिसने खुद मुझे घर गांव से निष्कासित किया था और जिसने पूरे गांव वालों को भी ये हुकुम दिया था कि कोई मुझसे किसी भी तरह का राब्ता न रखे वरना उसे भी मेरी तरह घर गांव से निकाल दिया जायेगा तो ऐसा फैसला सुनाने वाला खुद क्यों अपने कानून को तोड़ कर मेरे पास आ रहा था?

मेरे बाप की बग्घी अभी थोड़ी दूर ही थी और मैं कुछ पलों के लिए अपनी जगह पर रुक गया था किन्तु फिर मैं उस तरफ से अपनी नज़र हटा कर फिर से आगे बढ़ चला। अभी मैं कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि मेरे कानो में मुंशी चंद्रकांत की आवाज़ पड़ी। वो मुझे रुकने को कह रहा था मगर मैंने उसकी आवाज़ को अनसुना कर दिया। जब मैं न रुका तो वो तेज़ तेज़ आवाज़ें लगाते हुए मुझे रुकने को बोलने लगा। मेरे धमनियों में मेरे बाप का ही खून दौड़ रहा था जो मुंशी जैसे ऐरे गैरे की आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर के आगे बढ़ा ही जा रहा था। असल में मैं चाहता था कि मेरा बाप खुद मुझे आवाज़ लगा कर रुकने को कहे। पता नहीं क्यों पर मैं चाहता था कि मेरा बाप खुद झुके और मुझे रुकने को कहे।

कहते हैं ना कि इंसान अपनी औलाद के आगे हार जाता है और मुझ जैसी औलाद हो तो हारने में ज़रा भी विलम्ब नहीं होता। अब ये मेरी बेशर्मी थी या खूबी इससे मुझे कोई मतलब नहीं था। जब मैं मुंशी की आवाज़ों पर नहीं रुका तो आख़िर मजबूरन मेरे बाप को खुद आवाज़ लगानी पड़ी और मैं यही तो चाहता था। अपने बाप की आवाज़ सुन कर मैं रुक गया और गर्दन घुमा कर उस तरफ देखा। बग्घी अब मेरे पास ही आ गई थी। आज चार महीने बाद मैं अपने बाप की सूरत देख रहा था। जिन आँखों में देखने की किसी में भी हिम्मत नहीं होती थी उन आँखों से मैं बराबर अपनी आँखें मिलाये खड़ा था।

"छोटे ठाकुर।" बग्घी में मेरे आप के नीचे बैठे मुंशी ने अपनी बत्तीसी दिखाते हुए कहा____"मैं कितनी देर से आपको आवाज़ें लगा रहा था और आप थे कि सुन ही नहीं रहे थे।"

"मैं तलवे चाटने वाले कुत्तों की नहीं सुनता।" मैंने शख़्त भाव से जब ये कहा तो मुंशी एकदम से हड़बड़ा गया।

"इतना कुछ होने के बाद भी तुम्हारी अकड़ नहीं गई?" ठाकुर प्रताप सिंह ने थोड़ा शख़्त भाव से कहा____"ख़ैर, कहा जा रहे थे?"

"आपसे मतलब?" मैंने अकड़ दिखाते हुए दो टूक भाव से कहा____"मेरी मर्ज़ी है। मैं जहां चाहूं अपनी मर्ज़ी से जा सकता हूं मगर चिंता मत करिये इस जन्म में मैं उस गांव में हरगिज़ नहीं जाऊंगा जिस गांव से चार महीने पहले मुझे निकाल दिया गया था।"

"ईश्वर जानता है कि हमने तुम्हें हर वो चीज़ दी थी जिसकी तुमने ख़्वाइश की थी।" ठाकुर प्रताप सिंह ने शांत लहजे में कहा____"हम आज तक समझ नहीं पाए कि हमने ऐसा क्या कर दिया था जिसके लिए तुमने हमारी इज्ज़त को उछालने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी? तुमने कभी ठंडे दिमाग़ से सोचा ही नहीं कि तुम जो करते थे वो कितना ग़लत था?"

"क्या यही सुनाने आये हैं यहाँ?" मैंने लापरवाही से कहा___"और अगर यही सुनाने आये हैं तो जान लीजिये कि मुझे आपका ये भाषण सुनने की ज़रा सी भी ख़्वाइश नहीं है।"

"क्या तुमने कभी ये सोचा है?" ठाकुर प्रताप सिंह ने पहले की भाँति ही शांत लहजे में कहा____"कि तुम्हारे इस रवैये से तुम्हारे माता पिता के दिल पर क्या गुज़रती है? हमने हमेशा तुम में अपनी छवि देखी थी और हमेशा यही सोचा था कि हमारे बाद हमारी बागडोर तुम ही सम्हाल सकोगे। तुम्हारे बड़े भाई में हमने कभी ऐसी खूबी नहीं देखी। हालांकि उससे हमें कभी कोई शिकायत नहीं रही है। उसने कभी भी तुम्हारी तरह हमें शर्मिंदा नहीं किया और ना ही गांव समाज में हमारी इज्ज़त पर दाग़ लगाया है मगर इसके बावजूद उसमे वो बात नहीं दिखी हमें जिससे की हम ये सोच सकें कि हमारे बाद वो हमारी बागडोर सम्हाल सकता है। तुमसे हमने बहुत सारी उम्मीदें लगा रही थी मगर तुमने हमेशा हमारी उम्मीदों पर पानी ही फेरा है।"

"इन बड़ी बड़ी बातों से आप इस बात पर पर्दा नहीं डाल सकते कि आपने क्या किया है।" मैंने कठोर भाव से कहा____"आपने अपनी ही औलाद को यहाँ मरने के लिए छोड़ दिया और ये ख़्वाहिश रखी कि आपके ऐसा करने से मैं खुश हो जाऊंगा मगर आपको ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि आपके ऐसा करने से मेरे अंदर आपके प्रति कितनी नफ़रत भर चुकी है। ठाकुर प्रताप सिंह आप सिर पटक मर जाइये मगर मेरे दिल में आपके लिए अब कोई जगह नहीं हो सकती। आज चार महीने हो गए और मुझे जन्म देने वालों ने एक पल के लिए भी यहाँ आ कर ये देखने की कोशिश नहीं की कि मैं यहाँ ज़िंदा बचा हूं या भूखों मर गया हूं? जाइये ठाकुर साहब जाइये... मैं अब आपका बेटा नहीं रहा। मैं आप सबके लिए मर चुका हूं।"

पता नहीं क्या हो गया था इस वक़्त मुझे? मैं ऐसे अल्फ़ाज़ में और ऐसे लहजे में अपने बाप से बातें कर रहा था जिसके बारे में शायद कोई बाप सोच भी नहीं सकता था। मेरी बातें सुन कर मेरा बाप मुझे इस तरह देखता रह गया था जैसे मैं कोई अजूबा था। उनके नीचे बैठे मुंशी की तो आश्चर्य से आँखें ही फटी पड़ी थी।

"छोटे ठाकुर।" फिर मुंशी ने हकलाते हुए पड़ा____"ये आपने अच्छा नहीं किया। आपको अपने ही पिता जी से इस तरह बातें नहीं करनी चाहिए थी।"

"मैंने कहा था न मुंशी।" मैंने मुंशी चंद्रकांत की तरफ क़हर भरी नज़रों से देखते हुए कहा____"कि मैं तलवे चाटने वाले कुत्तों की नहीं सुनता। इस लिए अपनी जुबान बंद रख तू और ले जा यहाँ से अपने ठाकुर साहब को।"

"आज तुमने हमारा बहुत दिल दुखाया है लड़के।" ठाकुर प्रताप सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"हम ये मानते हैं कि हमने तुम्हें ऐसी सज़ा दे कर अच्छा नहीं किया था किन्तु उस समय तुमने काम ही ऐसा किया था कि हम अपना आप खो बैठे थे और फिर गुस्से में हमने वैसा फैसला सुना दिया था। बाद में हमें भी एहसास हुआ था कि हमने वैसा फैसला सुना कर बिल्कुल भी ठीक नहीं किया था किन्तु फैसला सुनाने के बाद फिर कुछ नहीं हो सकता था। अगर हम ऐसा करने के बाद फिर से पंचायत बुला कर अपना फैसला बदलते तो लोग क्या कहते हमें? यही कहते न कि ठाकुर ने अपने बेटे के लिए अपना फैसला बदल दिया? लोग कहते कि अगर यही फैसला हमने किसी और के लिए सुनाया होता तो क्या हम अपना फैसला बदल देते? हम तुम्हारे अपराधी हैं और हमें पूरी तरह से एहसास है कि हमने तुम्हें घर गांव से निष्कासित करके ग़लत किया था लेकिन यकीन मानो तुम्हें अपने से दूर कर के हम भी कभी खुश नहीं रहे। तुम्हारे सामने भी सिर्फ इसी लिए नहीं आये कि गांव के लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे? वो यही कहेंगे कि हमने खुद ही अपने फैसले का पालन नहीं किया और पुत्र मोह में तुम्हारे पास पहुंच गए? गलतियां हर इंसान से होती है बेटे। इस धरती पर कोई भगवान नहीं है जिससे कभी कोई ग़लती हो ही नहीं सकती। ख़ैर छोड़ो ये सब बातें, और हां तुम्हें पूरा हक़ है हमसे नफ़रत करने का। हम तो यहाँ सिर्फ इस लिए आये हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि तुम किसी और मुसीबत में पड़ जाओ। हमें भी प्रदीप की हत्या के बारे में पता चल गया है और हमें यकीन है कि तुमने उसकी हत्या नहीं की है।"

"चार महीनों से मैं जिन मुसीबतों को झेल रहा हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"उससे इतना तो सक्षम हो ही गया हूं कि अब हर तरह की मुसीबतों का सामना खुद ही कर सकूं। इस लिए मेरे लिए फ़िक्र करने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है।"

"एक बात और भी है जो हम तुम्हें खुद बताने आये हैं।" ठाकुर प्रताप सिंह ने मेरी बातों को जैसे नज़र‌अंदाज़ करते हुए कहा____"और वो ये कि सभी गांव वालों का कहना है कि हम तुम्हें अपने इस फैसले से आज़ाद करके वापस बुला लें। इस लिए कल सभी गांव वालों के सामने पंचायत बैठेगी और उस पंचायत में सबकी रज़ामंदी से ये फैसला होगा कि तुम पर से सारी पाबंदियां हटा कर तुम्हें वापस बुला लिया जाए।"

"अगर आप ये सोचते हैं कि आपकी इस बात से मैं खुश हो जाऊंगा।" मैंने सपाट लहजे में कहा_____"तो ग़लत सोचते हैं आप। मैं पहले ही बता चूका हूं कि अब इस जन्म में मैं उस गांव में हरगिज़ नहीं जाऊंगा जिस गांव से आपने मेरा हुक्का पानी बंद कर के निकाल दिया था। अब यही मेरा घर है और यही मेरी कर्म भूमि है। जब तक साँसें चलेंगी यहीं रहूंगा और फिर इसी धरती की गोद में हमेशा के लिए सो जाऊंगा।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" कहने के साथ ही ठाकुर प्रताप सिंह ने मुंशी से कहा_____"चलिए मुंशी जी अब हम यहाँ एक पल के लिए भी नहीं रुकना चाहते।"

"पर ठाकुर साहब??" मुंशी ने कुछ कहना ही चाहा था कि मेरे बाप ने हाथ उठा कर उसे चुप करा दिया।

उसके बाद मेरे बाप की बग्घी वापस मुड़ी और जिधर से आई थी उधर ही चली गई। अपने बाप की हसरतों को अपने पैरों तले कुचल कर मुझे एक अजीब सी शान्ति मिली थी। मैं खुद भी जानता था कि मेरे बाप से मेरी आज की ये मुलाक़ात उस तरीके से तो बिलकुल भी ठीक नहीं थी जिस तरीके से मैं उनसे पेश आया था किन्तु ग़लत ही सही मगर इससे मुझे आत्मिक सुकून ज़रूर मिला था।
 
ठाकुर प्रताप सिंह के जाते ही मैं भी प्रदीप के घर की तरफ बढ़ चला। सारे रास्ते मैं अपने बाप से हुई बातों के बारे में सोचता रहा और मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब प्रदीप के घर के सामने पहुंच गया। मेरा ध्यान तो तब टूटा जब अचानक से ही किसी ने आ कर मेरा गिरेहबान पकड़ कर ज़ोर से चिल्लाया। मैंने हड़बड़ा कर सामने देखा तो पाया कि मेरा गिरेहबान पकड़ कर चिल्लाने वाला कोई और नहीं बल्कि प्रदीप का भाई जगन था।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?" जगन मेरा गिरेहबान पकड़े गुस्से में चीखा____"मैंने तुझसे कहा था न कि अगर तूने मेरे भाई के घर में क़दम भी रखा तो तुझे जान से मार दूंगा?"

जगन ने जिस तरह से मेरा गिरेहबान पकड़ कर गुस्से में मुझसे ये कहा था उससे मेरी झांठें तक सुलग गईं थी। एक तो मैंने कुछ किया नहीं था ऊपर से ये कुछ ज़्यादा ही उछल रहा था। मैंने एक झटके में अपना गिरेहबान उससे छुड़ाया और उसके दुबले पतले जिस्म को दोनों हाथों से ऊपर उठा कर पूरी ताकत से ज़मीन पर पटक दिया। कच्ची किन्तु ठोस ज़मीन पर गिरते ही जगन की चीख निकल गई और वो दर्द से कराहने लगा।

"अपनी औका़त में रह समझा?" फिर मैंने गुस्से में उसका गिरेहबान पकड़ कर उठाते हुए कहा___"वरना जो मैंने किया ही नहीं है वो अब तेरे साथ कर दूंगा और तू मेरी झाँठ का बाल तक नहीं उखाड़ पाएगा । जब मैंने कह दिया कि मैंने प्रदीप काका को नहीं मारा तो मान लेना चाहिए था ना कि नहीं मारा मैंने उन्हें। साले तुझसे ज़्यादा मुझे प्रदीप काका की इस तरह से हुई हत्या का दुःख है और तू होता कौन है मुझ पर इल्ज़ाम लगाने वाला?"

मेरे गुस्से को देख कर जगन ढीला पड़ गया था। वैसे भी वो दस आदमियों के बल पर ही उस वक़्त इतना ताव में उछल रहा था वरना उसकी कोई औका़त नहीं थी कि ठाकुर प्रताप सिंह के खानदान के किसी भी सदस्य से वो ऊंची आवाज़ में बात कर सके। जगन को जब मैंने वहां मौजूद लोगों के सामने ही इस तरह उठा कर ज़मीन पर दे मारा था तो किसी ने चूं तक नहीं किया था। वो सब जानते थे कि आज मैं भले ही ऐसे हालात में था किन्तु मैं आज भी वही था जो पहले हुआ करता था।

मैंने जब देखा कि वहां मौजूद हर आदमी एकदम से चुप हो गया है तो मैंने जगन को धक्का दे कर अपने से दूर किया और प्रदीप काका के घर के अंदर दाखिल हो गया। अंदर आया तो देखा सरोज काकी और डॉली एक कोने में बुत बनी बैठी हुई थीं। दोनों की आँखें रोने से लाल सुर्ख पड़ गईं थी। डॉली का छोटा भाई भी सरोज के पास ही दुबका बैठा हुआ था।

प्रदीप काका की लाश को ज़मीन में ही अर्थी पर लिटा कर सफ़ेद कपडे़ से ढंक दिया गया था। उस लाश के चलते पूरे घर में मरघट जैसा सन्नाटा छाया हुआ था। सरोज काकी और डॉली के आँसू रो रो कर सूख चुके थे। हालांकि किसी किसी वक़्त वो दोनों फिर से हिचकियां ले कर रोने लगतीं थी। मैं ख़ामोशी से आगे बढ़ा और प्रदीप काका की लाश के पास बैठ गया।

मैंने लाश से सफेद कपड़ा हटा कर देखा तो एक पल के मेरी रूह तक काँप ग‌ई। प्रदीप काका की गर्दन आधे से ज़्यादा कटी हुई थी और वहां से अभी भी खून रिस रिस कर नीचे अर्थी पर गिर रहा था। हत्यारे ने प्रदीप काका की गर्दन पर किसी तेज़ धार वाले हथियार से एक ही वार किया था जिससे उनकी गर्दन आधे से ज़्यादा कट गई थी। गर्दन का ये हाल देख कर कोई भी कह सकता था कि प्रदीप काका को उस वक़्त तड़पने का मौका भी ना मिला होगा और गले पर वार होते ही उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई होगी।

प्रदीप काका की इस निर्मम हत्या को देख कर मैं ये सोचने लगा था कि जिस किसी ने भी उनकी इस तरह से हत्या की थी वो बहुत ही बेरहम रहा होगा और ज़रा भी नहीं चाहता रहा होगा कि उसके वार से प्रदीप काका बच जाएं। मैं सोचने लगा कि प्रदीप काका जैसे साधारण इंसान का भला ऐसा कौन दुश्मन हो सकता है जिसने उनकी इतनी बेरहमी से हत्या कर दी थी?

मैने प्रदीप काका के चेहरे पर वापस कपड़ा डाला और उठ कर खड़ा हो गया। कुछ देर सोचने के बाद मैं पलटा और सरोज काकी की तरफ देखा। वो मुझे देख कर और भी ज़्यादा सिसकियां ले ले कर रोने लगी थी। यही हाल डॉली और उसके भाई का भी था।

"ये सब कैसे हुआ काकी?" मैंने गंभीर भाव से सरोज काकी से कहा____"कल रात तो मैंने खुद ही प्रदीप काका को चारपाई पर लेटाया था और फिर खा पी कर यहाँ से जब गया था तब तक तो वो बिलकुल ठीक ही थे। फिर ये सब कब और कैसे हुआ?"

"हमें तो खुद ही नहीं पता चला कि उनके साथ ये सब कब हुआ था बेटा?" सरोज काकी ने सिसकते हुए कहा____"रात में तुम्हारे जाने के बाद मैंने एक बार उन्हें खाना खाने के लिए उठाने की कोशिश की थी मगर वो नशे में थे और गहरी नींद में सो गए थे इस लिए मेरे उठाने पर भी नहीं उठे। उसके बाद हम सबने खाना खाया और फिर सोने चले गए थे कमरे में। सुबह आँख खुली तो देखा वो अपनी चारपाई पर नहीं थे। मैंने सोचा शायद सुबह सुबह दिशा मैदान के लिए निकल गए होंगे। कुछ देर में मैं और डॉली भी दिशा मैदान के लिए घर से निकले। घर के पीछे की तरफ आये तो देखा वो घर के पीछे महुआ के पेड़ के पास खून से लथपथ पड़े थे। हम दोनों की तो डर के मारे चीखें ही निकल गई थी। बस उसके बाद तो बस रोना ही रह गया बेटा। सब कुछ लुट गया हमारा।"

कहने के साथ ही काकी हिचकियां ले कर रोने लगी थी। उसके साथ डॉली भी रोने लगी थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि रात के उस वक़्त नशे की हालत में प्रदीप काका घर के पीछे कैसे आएंगे होंगे? क्या वो खुद चल कर आये थे या फिर नशे ही हालत में उन्हें कोई और उठा कर घर के पीछे ले गया था? लेकिन सवाल ये है कि अगर कोई और ले गया था तो काकी या डॉली को इसका पता कैसे नहीं चला? सबसे बड़ी बात ये कि क्या उस वक़्त घर का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था? प्रदीप काका की हालत ऐसी नहीं थी कि वो खुद चल कर घर के पीछे तक जा सकें।

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अब तक,,,,,

कहने के साथ ही काकी हिचकियां ले कर रोने लगी थी। उसके साथ डॉली भी रोने लगी थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि रात के उस वक़्त नशे की हालत में प्रदीप काका घर के पीछे कैसे आएंगे होंगे? क्या वो खुद चल कर आये थे या फिर नशे ही हालत में उन्हें कोई और उठा कर घर के पीछे ले गया था? लेकिन सवाल ये है कि अगर कोई और ले गया था तो काकी या डॉली को इसका पता कैसे नहीं चला? सबसे बड़ी बात ये कि क्या उस वक़्त घर का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था? प्रदीप काका की हालत ऐसी नहीं थी कि वो खुद चल कर घर के पीछे तक जा सकें।

अब आगे,,,,,

मेरा सिर चकराने लगा था मगर कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मुझे याद आया कि कल रात जब मैं यहाँ से अपने झोपड़े के लिए निकला था तो रास्ते में मैं किसी आवाज़ को सुन कर रुक गया था और फिर कुछ देर में मुझे किसी ने ज़ोर का धक्का मारा था। मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या उस अंजान ब्यक्ति का प्रदीप काका की हत्या से सम्बन्ध हो सकता है? आख़िर कौन था वो और उस वक़्त वो वहां पर क्या करने गया था? इसके पहले तो कभी ऐसा कुछ नहीं घटित हुआ था फिर कल रात ही ऐसा क्यों हुआ था?

प्रदीप काका की हत्या उसी अंजान ब्यक्ति ने की थी ऐसा मेरा अनुमान था बांकी कोई और मेरे ज़हन में नहीं आ रहा था किन्तु सबसे बड़ा सवाल यही था कि वो अंजान और रहस्यमय ब्यक्ति था कौन?

"क्या किसी ने पुलिस में इसकी रिपोर्ट की?" फिर मैंने दिमाग़ से सारी बातों को झटकते हुए काकी से पूछा____"अब तक तो पुलिस को यहाँ पर आ जाना चाहिए था और इस मामले को उसे अपने हाथ में ले लेना चाहिए था।"

"जगन कुछ लोगों को ले कर रपट लिखवाने तो गया था।" सरोज काकी ने कहा____"पर एक घंटा हो गया और अभी तक पुलिस का दरोगा नहीं आया । क्या हम इनकी अर्थी को यहाँ पर ऐसे ही रखे रहेंगे?"

"अगर जगन काका ने थाने में रिपोर्ट की होगी तो दरोगा ज़रूर आएगा काकी।" मैंने कहा____"थोडी देर इंतज़ार करो।"

"और कितना इंतज़ार करें बेटा?" सरोज काकी ने दुखी भाव से कहा____"इतनी देर तो हो गई मगर अभी तक कोई पुलिस वाला नहीं आया। मैं सब समझती हूं। हम गरीबों की कोई सुनने वाला नहीं है। जिसने मेरे मरद की हत्या की है उसने दरोगा को रूपिया खिला दिया होगा। तभी तो दरोगा अभी तक नहीं आया। मेरे मरद के हत्यारे का कोई पता नहीं लगाएगा और ना ही उसे कोई सज़ा देगा।"

"ऐसा नहीं होगा काकी।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"अगर पुलिस प्रदीप काका के हत्यारे का पता नहीं लगाएगी तो मैं खुद उनके हत्यारे का पता लगाऊंगा।"

"नहीं बेटा।" सरोज काकी ने झट से कहा____"तुम इस झमेले में मत पड़ो। मैं नहीं चाहती कि इस लफड़े की वजह से तुम पर कोई मुसीबत आ जाए। वैसे भी मेरा मरद तो अब मुझे वापस मिलेगा नहीं। धीरे धीरे सब भुला देंगे कि मेरे मरद के साथ क्या हुआ था।"

"मैं किसी लफड़े से नहीं डरता काकी।" मैंने गर्मजोशी से कहा____"मैं प्रदीप काका के हत्यारे का पता लगा के रहूंगा, क्योंकि उनकी हत्या के लिए मुझ पर भी इल्ज़ाम लगाया गया है। इस लिए मैं हर कीमत पर ये पता कर के रहूंगा कि प्रदीप काका की इस तरह से हत्या किसने की है और उनकी हत्या में मुझे किसने फंसाया है?"

सरोज काकी और डॉली मेरी बातें सुन कर मेरी तरफ देखती रह गईं थी। उसके बाद सरोज काकी ने मुझसे इस बात के लिए माफ़ी मांगी कि प्रदीप काका की हत्या की वजह से उसके देवर जगन ने मुझे उल्टा सीधा बोला था।

मैं सरोज काकी के घर में करीब एक घंटे तक रहा मगर कोई पुलिस वाला नहीं आया। ये देख कर मैं सोच में पड़ गया था कि कहीं सरोज काकी की बातें सच तो नहीं हैं? क्या सच में हत्यारे ने पुलिस को रूपिया खिला दिया होगा और प्रदीप काका की हत्या के इस मामले को दबा दिया होगा? मेरे मन में सवाल उभरा कि ऐसा कौन कर सकता है? हत्या जैसा संगीन अपराध करने के बाद ऐसा कौन है जो पुलिस को इस हत्या की जांच करने से ही रोक दे? अगर सच में ऐसा ही था तो ऐसा काम कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता था। ज़रूर कोई ऐसा ब्यक्ति होगा जिसका दबदबा पुलिस और कानून पर है। जहां तक मैं जानता था ऐसा इंसान आस पास के गांव में कोई नहीं था तो फिर कौन हो सकता है?

मैं ये सोच ही रहा था कि एकदम से मेरे दिमाग़ की बत्ती जल उठी और मेरे ज़हन में जो नाम उभर कर आया वो नाम खुद मेरे बाप का था___ठाकुर प्रताप सिंह। आस पास के गांवों में एक मेरा बाप ही ऐसा था जिसका दबदबा पुलिस पर ही नहीं बल्कि शहर के बड़े बड़े लोगों पर भी था। मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या ऐसा करने वाला शख़्स मेरा बाप ही हो सकता है? वो बड़ी आसानी से प्रदीप की हत्या के मामले को पुलिस के द्वारा दबा सकते थे। अब सवाल ये था कि उन्होंने प्रदीप की हत्या क्यों करवाई होगी? अगर उन्हें प्रदीप से कोई समस्या थी तो वो प्रदीप काका को पहले अपने तरीके से समझा बुझा सकते थे जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। अगर हुआ होता तो प्रदीप काका मुझसे इस बात का ज़िक्र ज़रूर करते।

मैं बुरी तरह उलझ कर रह गया था और किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था। अभी मैं इन सब बातों को सोच ही रहा था कि तभी बाहर से जगन कुछ लोगों के साथ अंदर आया और मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया।

"देख लिया छोटे ठाकुर?" जगन ने अजीब भाव से कहा____"सुबह मैं अपने भाई की रपट लिखाने के लिए थाने गया था और दरोगा को सब कुछ बताया भी था, किन्तु देख लो सुबह से दोपहर हो गई और दरोगा अभी तक नहीं आया। इसका मतलब तो तुम भी खूब समझते होगे छोटे ठाकुर।"

"कहना क्या चाहते हो तुम?" मैंने कठोर भाव से उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"मैं कहना कुछ नहीं चाहता छोटे ठाकुर।" जगन ने अपना एक हाथ झटकते हुए कहा____"मगर समझ में सबके आ रहा है कि इसका मतलब क्या है। तुम मेरे भाई की तरह मेरी भी हत्या कर दो मगर मैं ये चीख चीख कर कहूंगा कि तुमने ही मेरे भाई की हत्या की है और तुम्हारे पिता ठाकुर प्रताप सिंह ने तुम्हें मेरे भाई की हत्या के जुर्म से बचाने के लिए थाने में दरोगा को रूपिया खिला दिया है। अगर ऐसा न होता तो दरोगा यहाँ बहुत पहले ही आ चुका होता।"

"तुम्हें जो सोचना है सोचते रहो।" मैंने जगन से कहा___"मैं और मेरा भगवान जानता है कि मैंने प्रदीप काका की हत्या नहीं की है। इसके बावजूद अगर तुम और तुम्हारे गांव वाले इस हत्या का दोषी मुझे मानते हैं तो मैं वादा करता हूं तुमसे कि प्रदीप काका के असल हत्यारे का पता मैं खुद लगाऊंगा।"

कहने के साथ ही मैं दरवाज़े की तरफ बढ़ा तो पीछे से जगन ने कहा___"मैं अब और अपने भाई की लाश को इस तरह यहाँ नहीं रख सकता। दरोगा को आना होता तो कब का आ जाता। इस लिए मैं अपने भाई का अब अंतिम संस्कार करने जा रहा हूं। बाद में अगर दरोगा आया और उसने कोई लफड़ा किया तो उसके जिम्मेदार भी तुम ही होगे।"

मैं जगन से बिना मतलब की बहस नहीं करना चाहता था इस लिए बिना कुछ बोले ही मैं प्रदीप काका के घर से निकल कर अपने खेत की तरफ चला गया। रास्ते में मैं यही सोच रहा था कि अगर सच में थाने के दरोगा को हत्यारे ने रूपिया खिला कर इस मामले को दबा दिया होगा तो क्या मैं खुद इतनी आसानी से प्रदीप के हत्यारे का पता लगा पाऊंगा? क्योंकि उस सूरत में संभव था कि मेरे लिए खुद कोई बड़ी मुसीबत हो जाए। हत्यारा किसी भी हाल में नहीं चाहेगा कि मैं उसका पता लगाऊं और उसे सबके सामने लाऊं। इसके लिए वो कुछ भी कर सकता था मेरे साथ। इसका मतलब ये हुआ कि अगर मैं प्रदीप के हत्यारे का पता लगाता हूं तो मुझे खुद बहुत ही ज़्यादा सतर्क और सावधान रहना होगा।

मैं यही सब सोचते हुए अपने झोपड़े के करीब पंहुचा ही था कि मेरी नज़र आसमान की तरफ जाते हुए भीषण धुएं पर पड़ी। सामने कुछ पेड़ थे इस लिए ठीक से कुछ दिख नहीं रहा था मगर इतने भयंकर धुएं को देख कर मेरे मन में बुरे बुरे ख़याल आने लगे और फिर एकदम से मेरे मस्तिष्क में बिजली की तरह ख़याल आया कि ये धुआँ कहीं मेरी गेहू की फसल जलने का तो नहीं? ये ख़याल दिमाग़ में आते ही मैं तेज़ी से खेत की तरफ दौड़ पड़ा और जैसे ही मेरी नज़र मेरे खेत के उस भाग पर पड़ी जिस भाग पर मैंने गेहू की पुल्लियों का गड्ड जमा किया था मेरे होश उड़ गए।

चार महीने में अपनी जी जान लगा कर जिस फसल को मैंने उगाया था वो भयानक आग की लपटों में घिरी धू धू कर के जल रही थी और मैं सिर्फ देखने और तड़पने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। अपनी इतनी मेहनत से उगाई गई फसल को मैं पत्थर की मूरत बना बस देखे जा रहा था। एक तरफ मेरी फसल जल रही थी और दूसरी तरफ मेरा दिल मेरा जिस्म जलने लगा था। इस भयानक मंज़र को देख कर जैसे मेरे अंदर से मेरे प्राण ही निकल गए थे। वो फसल मेरा प्राण ही तो थी जिसे मैंने पिछले चार महीनों में अपना खून पसीना बहा कर उगाया था और वही फसल मेरी आँखों के सामने जल कर ख़ाक होती जा रही थी। मेरा जी चाहा कि मैं दहाड़ें मार कर रोना शुरू कर दूं और जिसने भी ये किया था उसे भी इसी आग में डाल कर ख़ाक में मिला दूं।

सूखी हुई गेहू की फसल को जल कर ख़ाक होने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगा। आसमान तक उठता हुआ आग और धुआँ धीरे धीरे शांत पड़ता चला गया मगर अब मेरे अंदर उससे भी ज़्यादा आग जलने लगी थी। मैं किसी भी कीमत पर उस इंसान को खोज लेना चाहता था जिसने मुझसे अपनी दुश्मनी मेरी फसल को जला कर निकाली थी किन्तु सबसे पहला सवाल तो यही था कि किसने किया था ये सब? आख़िर मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था जो किसी ने मेरे साथ ऐसा किया था? अगर किसी की मुझसे कोई दुश्मनी ही थी तो सामने आ कर मुझसे मुकाबला करता। यूं कायरों की तरह फसल जला कर कौन सी मर्दानगी दिखाई थी उसने?

किसी हारे हुए जुवांरी की तरह बेबस और लाचार सा मैं खेत के किनारे पर ही बैठ गया। अपनी मेहनत को इस तरह जल कर ख़ाक में मिलते देख मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े। ऊपर बैठे भगवान से मैंने मन ही मन पूछा कि इस फसल ने किसी का क्या बिगाड़ा था प्रभू? अगर किसी का कुछ बिगड़ा था तो मुझसे बोलता। फिर ऐसा क्यों करवाया तुमने?

जाने कितनी ही देर तक मैं बेजान सा वहीं पर बैठा रहा। इन चार महीनों से मैं अपनी उस फसल के सहारे ही तो यहाँ रह रहा था मगर अब ना तो कोई सहारा बचा था और ना ही कोई मकसद। दिलो दिमाग़ तो जैसे कुंद सा पड़ गया था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मुझे इस तरह से बर्बाद करने वाला कौन था और उसने ऐसा क्यों किया था?

अपनी आंखों में दहकते हुए अंगारे और अंदर गुस्से का जवालामुखी भड़काये मैं उठा और पलट कर झोपड़े की तरफ बढ़ चला। अभी कुछ क़दम ही आगे बढ़ा था कि मेरी नज़र दूर से आते हुई एक बग्घी पर पड़ी। बग्घी में बैठे हुए दो इंसानों को मैंने अच्छी तरह पहचान लिया। चार महीने बाद अब ये क्यों हो रहा था? मेरे घर परिवार का कोई सदस्य क्यों मेरी तरफ बढ़ा चला आ रहा था। सच कहूं तो अपने घर परिवार के लोगों से इतनी नफ़रत हो गई थी मुझे कि अब मैं उनमे से किसी की भी शक्ल नहीं देखना चाहता था। इस वक़्त मैं नहीं चाहता था कि मेरे घर का कोई सदस्य मेरे गुस्से का शिकार हो जाये पर कदाचित होनी को कौन टाल सकता था? थोड़ी ही देर में वो बग्घी मेरे झोपड़े के पास आ कर रुकी और बग्घी में बैठे मेरे घर के दोनों सदस्य बग्घी से उतर कर मेरे सामने आ ग‌ए। उन दोनों सदस्यों में एक मेरी माँ थी और दूसरा मेरा बड़ा भाई ठाकुर अभिनव सिंह।
 
"ये क्या हालत बना रखी है तुमने मेरे बेटे?" माँ ने तड़प कर मुझसे कहा____"चल घर चल। मैं तुझे लेने आई हूं।"

"माफ़ करना मैं ठाकुर खानदान के किसी भी सदस्य को नहीं जानता।" मैंने अपने गुस्से को किसी तरह काबू करते हुए शख़्त भाव से कहा____"और ना ही अब कभी जानना चाहता हूं। इस लिए बेहतर होगा कि आप लोग यहाँ से चले जाएं।"

"ये तू किस लहजे में बात कर रहा है वैभव?" मेरे भाई ने शख़्त भाव से कहा____"अपने से बड़ों का आदर करना आज भी नहीं आया तुझे।"

"और आगे भी मुझसे किसी आदर की उम्मीद मत रखना।" मैंने भाई की आँखों में आँखें डाल कर कहा____"अगर अपने इज्ज़त सम्मान की इतनी ही परवाह है तो यहाँ नहीं आना चाहिए आपको।"

"तुझे मैंने मना किया था ना कि तू इससे कोई बात नहीं करेगा?" माँ ने भाई को डांटते हुए कहा____"तू भी अपने बाप की तरह इज्ज़त और सम्मान का झूठा टोकरा लिए फिरता है। किसी दिन सोचा है कि अपने छोटे भाई को एक बार देख आंऊ कि वो किस हाल में है?" कहने के साथ ही माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तू इसकी बातों पर ध्यान मत दे बेटा। तू मेरे साथ घर चल। तू नहीं जानता कि जब से तू यहाँ आया है तब से मेरी क्या हालत थी? ठाकुरों के गुरूर के आगे किसी का बस नहीं चलता। वो ये नहीं समझ सकते कि उनके द्वारा ऐसा करने से एक माँ पर क्या गुज़रती है? तू अब घर चल बेटा। मैं अब और तुझे यहाँ नहीं रहने दूंगी।"

"सुना है औलाद पर अपने माता पिता का कर्ज़ होता है।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"जिसे औलाद को चुकाना पड़ता है। बाप ने तो औलाद को कर्ज़ चुकाने का अवसर ही नहीं दिया बल्कि घर गांव से निष्कासित कर के खुद ही अपना कर्ज़ वसूल कर लिया है। अब रह गया माता का कर्ज़ तो तुम मेरी जान मांग लो माता श्री, मैं ख़ुशी से अपनी जान दे दूंगा मगर ये वैभव सिंह उस हवेली की दहलीज़ पर अब कभी अपने क़दम नहीं रखेगा....इस जनम में तो हरगिज़ भी नहीं।"

"ये तू क्या कह रहा है मेरे लाल?" माँ की आँखों से आँसू बह चले____"इतना कठोर कैसे हो सकता है मेरा खून? नहीं नहीं तू ऐसा नहीं कर सकता। तू अभी और इसी वक़्त मेरे साथ घर चलेगा।"

"मैंने तो ये सोच लिया था माता श्री।" मैंने सपाट लहजे से ही कहा____"कि अपने बाप की इज्ज़त और खोखले गुरूर को एक दिन मिट्टी में मिला दूँगा मगर अब ऐसा नहीं करुंगा। जानती हैं क्यों? क्योंकि ऐसा ना कर के अब मैं अपनी माता का क़र्ज़ भी चुकाऊंगा। अब हमारे बीच कुछ नहीं रह गया। इस लिए जाइये माता श्री। आपके खानदान का वंश चलाने के लिए आपका एक बेटा तो है ही।"

मैने ये कहा ही था कि माँ ने आगे बढ़ कर मेरे गाल पर खींच के एक थप्पड़ रसीद कर दिया, फिर रोते हुए बोलीं____"बेशरम, ऐसी बातें सोच भी कैसे सकता है तू?

माँ ने मुझे थप्पड़ मार दिया था और थप्पड़ मार कर खुद सिसकने लगीं थी। उनके थप्पड़ मार देने से मेरे अंदर जो आग जल रही थी वो और भी ज़्यादा भड़क उठी थी जिसे मैंने बड़ी ही मुश्किल से सम्हाला। मेरा बड़ा भाई मुझे इस तरह देख रहा था जैसे वो मुझे कच्चा चबा जाएगा। हालांकि मुझे उसके इस तरह देखने से घंटा कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था किन्तु माँ के थप्पड़ पर और उनकी बात पर मैं बोला कुछ नहीं। उधर कुछ देर सिसकने के बाद माँ ने मेरी तरफ करुण भाव से देखा।

"एक मैं ही नहीं बल्कि सारा गांव ये समझता है कि तुम्हारे पिता ने तुम्हे इस तरह गांव से निष्कासित कर के ठीक नहीं किया था।" माँ ने कहा____"और ये बात खुद ठाकुर साहब भी कबूल करते हैं कि उन्होंने ऐसा कर के ग़लत किया था मगर अपने फैसले को तुरंत ही बदल देना उनके बस में नहीं था। उस दिन के बाद से उनके चेहरे का तेज़ जैसे बुझ ही गया है। वो अपने फैसले के लिए दुखी हो गए थे और जिस इंसान को मैंने हमेशा गर्व से अपना सर उठाए ही देखा था उस इंसान को अपने उस फैसले के बाद से बेहद थका हुआ और बेबस सा देखा है मैंने। तू ये समझता है कि इतने महीनों में कोई तुझे देखने नहीं आया तो तू ग़लत समझता है बेटे। मुझे उनसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी थी और उन्होंने तेरी सुरक्षा का पूरा प्रबंध कर दिया था जिससे कि यहाँ अकेले रहते हुए तुझ पर कोई मुसीबत न आए। जब तू यहाँ रात में अपने इस झोपड़े पर सो जाता था तो तेरी सुरक्षा के लिए तेरे पिता जी गुप्त रूप से अपने आदमियों को यहाँ पहरे पर लगा देते थे।"

मां की बातें सुन कर मैं मन ही मन बुरी तरह चौंका। मेरे अंदर जल रही आग मुझे ठंडी पड़ती महसूस हुई और मैं सोचने पर मजबूर हो गया था कि क्या सच में ऐसा ही था या माँ मुझे घर ले जाने के लिए मुझसे ये सब झूठी बातें कह रहीं थी?

"मां बाप कभी भी अपनी औलाद का बुरा नहीं सोचते बेटा।" मुझे ख़ामोश देख कर माँ ने बड़े प्यार से कहा____"औलाद चाहे जैसी भी हो वो अपने माँ बाप के लिए अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी होती है। माँ बाप अगर औलाद पर किसी तरह की शख़्ती करते हैं तो उसके पीछे अपनी औलाद के लिए भलाई की भावना ही छिपी होती है। मैं तुझसे किसी बात के लिए शिकायत नहीं कर रही बेटा, बल्कि तुझे वो दिखाने का प्रयास कर रही हूं जो तुझे कभी दिखा ही नहीं।" कहने के साथ ही माँ आगे बढ़ी और मेरे चेहरे को अपने हाथों से सहलाते हुए कहा____"मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा सब कुछ भुला कर अपनी माँ के साथ घर चले। तू नहीं जानता कि तेरे बिना वो घर वो हवेली कितनी वीरान लगती है। तूने उस दिन अपनी भाभी को गुस्से में दुत्कार दिया था जिससे वो घर आ कर बहुत रोई थी और दो दिनों तक खाना नहीं खाया था उसने। किसी को सज़ा देना बहुत आसान होता है बेटा मगर किसी को प्यार दे कर उसे खुश रखना बहुत ही मुश्किल होता है।"

मां की बातें बिजली बन कर मेरे दिल को चीरती जा रही थी और मेरे दिलो दिमाग़ को जैसे झकझोरती भी जा रहीं थी। मेरे अंदर विचारों की आँधियां सी चलने लगीं थी जिसे रोक पाना मेरे बस में नहीं था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये एकदम से मुझे क्या होने लगा था। मेरे दिल में तो अपने घर परिवार के सदस्यों की शक्ल तक देखने की हसरत बाकी नहीं रही थी और उनके लिए गुस्सा और नफ़रत ही भरा हुआ था किन्तु अब मेरे अंदर से वो गुस्सा और वो नफ़रत बड़ी तेज़ी से गायब होती जा रही थी। मेरे दिलो दिमाग़ में जैसे एक द्वन्द सा चलने लगा था और मैं पूरी कोशिश कर रहा था कि इस द्वन्द से खुद को आज़ाद कर लूं मगर मैं अपनी इस कोशिश में कामयाब नहीं हो पा रहा था।

"मैं जानती हूं मेरे बेटे कि जो कुछ हुआ है उससे तेरे दिल में हम सभी के लिए गुस्सा और नफ़रत भर गई है।" मेरी ख़ामोशी को देख माँ ने जैसे मुझे समझाते हुए कहा____"यही वजह थी कि तूने उस दिन अपनी भाभी से गुस्से में बात की और उसे दुत्कार दिया था। उसके बाद जब तेरे पिता जी आये तो तूने उनसे भी ऐसी बातें की जो शायद ही आज तक किसी बेटे ने अपने पिता से की हों। तेरा गुस्सा और तेरी नाराज़गी जायज़ थी बेटा लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि हम गुस्से में बहुत कुछ ऐसा बोल जाते हैं जिसके लिए बाद में हमें बेहद पछतावा होता है। इसी लिए बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि बिना सोचे समझे और बिना सच को जाने कभी भी ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए क्योंकि जब बाद में हमें असलियत का पता चलता है तो हम खुद की ही नज़रों से गिर जाते हैं। मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे को ऐसा दिन देखना पड़े। ख़ैर छोड़ ये सब बातें और चल मेरे साथ। मैं तुझसे वादा करती हूं कि अब से वही होगा जो तू कहेगा।"

"आप जाइये मां।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा। इस वक़्त मेरा ज़हन एकदम से शांत सा हो गया था। ये अलग बात थी कि कोई चीज़ बड़ी शिद्दत से मेरे दिलो दिमाग़ को हिलाये दे रही थी। इस लिए कुछ सोच कर मैंने कहा_____"मैं शाम को आ जाऊंगा।"

"शाम को नहीं बेटे।" माँ ने ब्याकुल भाव से कहा____"तू अभी मेरे साथ ही घर चलेगा। मैं तुझे लिए बिना यहाँ से नहीं जाऊंगी।"

"ज़िद मत कीजिये मां।" मैंने बेचैन लहजे में कहा____"मैंने कह दिया ना कि शाम को आ जाऊंगा तो आ जाऊंगा। अभी आप जाइये।"

मेरे ऐसा कहने पर माँ मेरी तरफ बड़े ग़ौर से देखने लगीं। जैसे परख रही हों कि मेरी बातों में कोई सच्चाई है या मैं यूं ही उन्हें जाने को कह रहा था? मैं उन्हीं को देख रहा था। ख़ैर कुछ देर मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने के बाद माँ ने कहा____"ठीक है मैं जा रही हूं लेकिन अगर तू शाम को घर नहीं आया तो सोच लेना। अपनी इस माँ का मरा हुआ मुँह देखेगा तू।"

ये कहते हुए माँ की आँखें एक बार फिर से भर आईं थी जिन्हें उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा और फिर पलट कर बग्घी की तरफ बढ़ ग‌ईं। उनके पीछे पीछे मेरा बड़ा भाई भी चल पड़ा था। उसने दूसरी बार मुझसे कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं समझी थी।

मां और भाई के जाने के बाद मैं वहीं अपने झोपड़े के बाहर बने माटी के चबूतरे पर बैठ गया था। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी वक़्त आ जायेगा जब मेरे अंदर का गुस्सा और नफ़रत इस तरह से छू मंतर हो जाएगी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ये कोई ईश्वर का चमत्कार था या मेरी माँ की बातों का गहरा असर पड़ा था मुझ में?

मैंने माँ को इस लिए वापस भेज दिया था ताकि मैं अकेले में बैठ कर उनकी बातों के बारे सोच सकूं और फिर उस सब के बारे में भी सोच सकूं जिसके बारे में सोचने की कभी ज़रूरत ही नहीं समझी थी मैंने।

किसी ने सच ही कहा है कि वैसा कभी नहीं होता जैसा हम चाहते हैं बल्कि अक्सर वही होता है जैसा ईश्वर चाहता है और ईश्वर जो चाहता है उसका हम इंसान कभी तसव्वुर भी नहीं कर सकते। ईश्वर के खेल बड़े निराले हैं। सब कुछ उसके हाथ में है। सब कुछ उसके बस में है। वो असंभव को संभव और संभव को असंभव बना देने की क्षमता रखता है। भला मैं ये कल्पना कहां कर सकता था कि जिस परिवार से मैं नफ़रत करता था और जिस घर की दहलीज़ पर इस जनम में न जाने की मैं सोच के बैठ गया था आज उन्हीं लोगों के लिए मेरे अंदर मौजूद गुस्सा और नफ़रत को पलक झपकते ही इस तरह से काफूर हो जाना था।

देर से ही सही किन्तु इंसान इस बात को समझ ही जाता है कि परिवर्तन इस दुनिया का नियम है। एक जैसा वक़्त कभी नहीं रहता। आज अगर बुरा वक़्त है तो कल अच्छा वक़्त भी आ जाएगा। ख़ैर माँ की बातों का गहरा असर हुआ था मुझ पर। सच ही तो कहा था उन्होंने कि इंसान गुस्से में अक्सर ऐसी बातें बोल जाता है जिसके लिए बाद में उसे पछताना पड़ता है। मेरे ज़हन में एक एक कर के वो सब बातें उभरने लगीं जो मैंने सबसे पहले भाभी से कही थीं और फिर पिता जी से।

पिता जी से मैंने जिस तरीके से बातें की थी वैसी बातें संसार का कोई भी बेटा अपने पिता से नहीं कर सकता था। इंसान के दिल को तो ज़रा सी बातें भी चोट पहुंचा देती हैं जबकि मैंने तो पिता जी से ऐसी बातें की थी जो यकीनन उनके दिल को ही नहीं बल्कि उनकी आत्मा तक को घायल कर गईं होंगी। सारी ज़िन्दगी मैंने गलतियां की थी और यही सोचता था कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वो सब अच्छा ही है किन्तु जब एक ग़लती मेरे पिता जी से हुई तो मैंने क्या किया?? उनकी एक ग़लती के लिए मैंने घर के हर सदस्य से नाता तोड़ लिया और उनके प्रति अपने दिल में गुस्सा और नफ़रत भर कर यही सोचता रहा कि एक दिन मैं उन सबकी इज्ज़त को मिट्टी में मिला दूंगा। भला ये कैसा न्याय था? मैं खुद जो कुछ करूं वो सब सही माना जाए और कोई दूसरा अगर कुछ करे तो वो दुनिया का सबसे ग़लत मान लिया जाए?

जाने कितनी ही देर तक मैं इस तरह के विचारों के चक्रव्यूह में फंसा रहा उसके बाद गहरी सांस ले कर उठा और प्रदीप काका के घर की तरफ चल दिया। मुझे याद आया कि जगन ने उस वक़्त अपने भाई का अं‌तिम संस्कार करने की बात कही थी। प्रदीप काका जैसे इंसान के अंतिम संस्कार पर मुझे भी जाना चाहिए था। आख़िर बड़े़ उपकार थे उनके मुझ पर।

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अब तक,,,,,

पिता जी से मैंने जिस तरीके से बातें की थी वैसी बातें संसार का कोई भी बेटा अपने पिता से नहीं कर सकता था। इंसान के दिल को तो ज़रा सी बातें भी चोट पहुंचा देती हैं जबकि मैंने तो पिता जी से ऐसी बातें की थी जो यकीनन उनके दिल को ही नहीं बल्कि उनकी आत्मा तक को घायल कर गईं होंगी। सारी ज़िन्दगी मैंने गलतियां की थी और यही सोचता था कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वो सब अच्छा ही है किन्तु जब एक ग़लती मेरे पिता जी से हुई तो मैंने क्या किया?? उनकी एक ग़लती के लिए मैंने घर के हर सदस्य से नाता तोड़ लिया और उनके प्रति अपने दिल में गुस्सा और नफ़रत भर कर यही सोचता रहा कि एक दिन मैं उन सबकी इज्ज़त को मिट्टी में मिला दूंगा। भला ये कैसा न्याय था? मैं खुद जो कुछ करूं वो सब सही माना जाए और कोई दूसरा अगर कुछ करे तो वो दुनिया का सबसे ग़लत मान लिया जाए?

जाने कितनी ही देर तक मैं इस तरह के विचारों के चक्रव्यूह में फंसा रहा उसके बाद गहरी सांस ले कर उठा और प्रदीप काका के घर की तरफ चल दिया। मुझे याद आया कि जगन ने उस वक़्त अपने भाई का अं‌तिम संस्कार करने की बात कही थी। प्रदीप काका जैसे इंसान के अंतिम संस्कार पर मुझे भी जाना चाहिए था। आख़िर बड़े़ उपकार थे उनके मुझ पर।

अब आगे,,,,,

मैं प्रदीप काका के घर से थोड़ी दूर ही था कि मुझे बाएं तरफ काफी सारे लोग दिखाई दिए। मैं समझ गया कि वो सब लोग प्रदीप काका की अर्थी ले कर उस जगह पर उनका अंतिम संस्कार करने आये हैं। ये देख कर मैं भी उसी तरफ मुड़ कर चल दिया। थोड़ी ही देर में मैं उन लोगों के पास पहुंच गया। प्रदीप काका के गांव के कुछ लोग प्रदीप काका के खेतों से कुछ दूरी पर ही लकड़ी की चिता तैयार कर चुके थे और अब उस चिता पर प्रदीप काका के शव को रखने जा रहे थे। सरोज काकी और डॉली एक कोने में खड़ी ये सब देख कर अपने आंसू बहा रहीं थी।

मुझे देख कर वहां मौजूद लोगों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की अलबत्ता जगन ने ज़रूर मुझे घूर कर देखा था। ख़ैर अंतिम संस्कार की सारी विधियां निपट जाने के बाद प्रदीप काका की चिता को प्रदीप काका के बेटे के द्वारा आग लगवा दिया गया। देखते ही देखते आग ने अपना उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया और प्रदीप काका की चिता के चारो तरफ फैलने लगी।

प्रदीप काका के गांव के कुछ और लोग भी आते दिखाई दिए जिनके हाथो में तुलसी की सूखी लकड़ियां थी। यहाँ जो लोग मौजूद थे उनके हाथों में भी तुलसी की सूखी लकड़ियां थी। असल में तुलसी की ये सूखी लकड़ियां मरने वाले की जलती चिता पर अर्पण कर के लोग दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। हर आदमी अपनी स्वेच्छा और क्षमता अनुसार तुलसी की छोटी बड़ी लकड़ियां घर से ले कर आता है और फिर तुलसी की सात लकड़ियां जोड़ कर जलती चिता पर दूर से फेंक कर अर्पण कर देता है। मेरे पास तुलसी की लकड़ी नहीं थी इस लिए मैंने कुछ ही दूरी पर दिख रहे आम के पेड़ से सूखी लकड़ी तोड़ी और उससे सात लड़की तोड़ कर बनाया। यहाँ ये मान्यता है कि अगर किसी के पास तुलसी की लकड़ी नहीं है तो वो आम की सात लकड़ियां बना कर भी जलती चिता पर अर्पण कर सकता है। जब सब गांव वालों ने जलती चिता को सत लकड़ियां दे दी तो मैंने भी आगे बढ़ कर आम की उन सात लकड़ियों को एक साथ जलती चिता पर उछाल दिया और फिर प्रदीप काका के जलते शव को प्रणाम किया। मन ही मन मैंने भगवान से उनकी आत्मा की शान्ति के लिए दुआ भी की।

काफी देर तक मैं और बाकी लोग वहां पर रहे और फिर वहां से अपने अपने घरों की तरफ चल दिए। जगन और उसके कुछ ख़ास चाहने वाले वहीं रह गए थे। जगन के कहने पर सरोज काकी भी अपने दोनों बच्चों को ले कर चल दी थी।

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि कल तक जिस प्रदीप काका से मैं मिलता रहा था और हमारे बीच अच्छा खासा सम्बन्ध बन गया था आज वही इंसान इस दुनिया में नहीं है। मेरे ज़हन में हज़ारो सवाल थे जिनका जवाब मुझे खोजना था। आख़िर किसने प्रदीप काका की इस तरह से हत्या की होगी और क्यों की होगी? प्रदीप काका बहुत ही सीधे सादे और साधारण इंसान थे। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। वो देशी शराब ज़रूर पीते थे मगर गांव में किसी से भी उनका मन मुटाव नहीं था।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे इंसान की हत्या कोई क्यों करेगा? क्या किसी ने महज अपने शौक के लिए प्रदीप की हत्या की थी या उनकी हत्या करने के पीछे कोई ऐसी वजह थी जिसके बारे में फिलहाल मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था? प्रदीप काका के जाने के बाद उनकी बीवी और उनके दोनों बच्चे जैसे अनाथ हो गए थे। डॉली तो जवान थी और प्रदीप काका उसका ब्याह करना चाहते थे किन्तु उसका भाई अभी छोटा था। प्रदीप काका को डॉली के बाद दो बच्चे और हुए थे जो छोटी उम्र में ही ईश्वर को प्यारे हो गए थे।

प्रदीप काका के इस तरह चले जाने से सरोज काकी के लिए अपना घर चलाना यकीनन मुश्किल हो जाना था। हालांकि प्रदीप काका का छोटा भाई जगन ज़रूर था किन्तु वो अपने परिवार के साथ साथ सरोज काकी के परिवार की देख भाल नहीं कर सकता था। जगन को दो बेटियां और एक बेटा था। उसकी दोनों बेटियां बड़ी थी जो कुछ सालों बाद ब्याह के योग्य हो जाएंगी। लड़की ज़ात पलक झपकते ही ब्याह के योग्य हो जाती है और पिता अगर सक्षम न हो तो उसके लिए अपनी बेटियों का ब्याह करना एक चुनौती के साथ साथ चिंता का सबब बन भी जाता है।

सारे रास्ते मैं यही सब सोचता रहा और फिर झोपड़े में पहुंच कर मैंने अपने कपड़े उतारे और उन्हें पानी से धोया। नहा धो कर और दूसरे कपड़े पहन कर मैं झोपड़े के अंदर आ कर बैठ गया। प्रदीप काका की हत्या के बाद से मैं एक सूनापन सा महसूस करने लगा था। मेरे ज़हन में ख़याल उभरे कि ये कैसा समय था कि एक तरफ प्रदीप काका की इस तरह अकस्मात हत्या हो जाती है और दूसरी तरफ मेरे परिवार के लोग मुझे वापस घर ले जाने के लिए मेरे पास आते हैं। माँ ने तो साफ कह दिया था कि आज अगर मैं शाम को घर नहीं गया तो मैं उनका मरा हुआ मुँह देखूंगा।

मैं गहरी सोच में डूब गया था और ये सोचने लगा था कि ये दोनों बातें क्या महज एक इत्तेफ़ाक़ हैं या इसके पीछे कोई ख़ास वजह थी? मेरे परिवार वाले इस समय ही मेरे पास क्यों आये जब मेरे ताल्लुकात प्रदीप काका से इस क़दर हो गए थे? पहले भाभी फिर पिता जी और फिर माँ और बड़ा भाई। ऐसे समय पर ही क्यों आये जब प्रदीप काका की हत्या हुई? चार महीने हो गए मुझे यहाँ आये हुए किन्तु आज से पहले मेरे घर का कोई सदस्य मुझे देखने नहीं आया था तो फिर ऐसे समय पर ही क्यों आये ये लोग?

एक तरफ प्रदीप काका का छोटा भाई जगन मुझे अपने भाई का हत्यारा बोल रहा था और दूसरी तरफ पिछली रात एक अंजान और रहस्यमयी शख्स मुझे धक्का दे कर गायब हो जाता है तो वहीं दूसरे दिन पिता जी मुझसे मिलने आ जाते हैं। पिता जी के जाने के बाद आज माँ बड़े भाई के साथ आ गईं थी। ये सब बातें इतनी सीधी और स्वाभाविक नहीं हो सकतीं थी। कहीं न कहीं इन सब बातों के पीछे कोई न कोई ख़ास बात ज़रूर थी जिसका मुझे इल्म नहीं हो रहा था।

मेरे ज़हन में कई सारे सवाल थे जिनका जवाब मुझे चाहिए था। एक सीधे सादे इंसान की हत्या कोई क्यों करेगा? पिछली रात मुझे धक्का देने वाला वो रहस्यमयी शख्स कौन था? क्या प्रदीप काका की हत्या से उसका कोई सम्बन्ध था? चार महीने बाद ऐसे वक़्त पर ही मेरे घर के लोग मुझसे मिलने क्यों आये थे? क्या ठाकुर प्रताप सिंह ने प्रदीप की हत्या करवाई होगी किन्तु उनकी बातें और फिर माँ की बातें मेरे ज़हन में आते ही मुझे मेरा ये विचार ग़लत लगने लगता था।

मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि जगन ने मुझ पर प्रदीप काका की हत्या का आरोप लगाया था और जिस वजह से लगाया था वो हालांकि बचकाना तो था किन्तु सोचने वाली बात थी कि वो ये कैसे सोच सकता था कि मैं महज इतनी सी बात पर उसके भाई की हत्या कर दूँगा? दूसरी बात जगन को किसने बताया कि कल रात मैं प्रदीप के घर गया था? क्या सरोज काकी ने बताया होगा उसे? पर सरोज काकी ने उससे ये तो नहीं कहा होगा कि मैंने ही उसके मरद की हत्या की है। मतलब ये जगन के अपने ख़याल थे कि मैंने ही उसके भाई की हत्या की है।

क्या जगन खुद अपने भाई की हत्या नहीं कर सकता? मेरे ज़हन में अचानक से ये ख़याल उभरा तो मैं इस बारे में गहराई से सोचने लगा किन्तु मुझे कहीं से भी ये नहीं लगा कि जगन अपने भाई की हत्या कर सकता है। क्योंकि दोनों भाईयों के बीच कोई बैर जैसी भावना नहीं थी। अगर ऐसी कोई बात होती तो प्रदीप काका मुझसे इस बारे में ज़रूर बताते। मैंने इन चार महीनों में कभी भी दोनों भाईयों के बीच ऐसी कोई बात होती नहीं देखी थी जिससे कि मैं शक भी कर सकता कि जगन अपने भाई की हत्या कर सकता है।

प्रदीप काका की हत्या मेरे लिए एक न सुलझने वाली गुत्थी की तरह हो गई थी और इस बारे में सोचते सोचते मेरा सिर फटने लगा था। अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि मुझे अपने झोपड़े के बाहर किसी की हलचल सुनाई दी। मैंने ठीक से ध्यान लगा कर सुना तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई चल कर मेरे झोपड़े की तरफ ही आ रहा हो। मैं एकदम से सतर्क हो गया। सतर्क इस लिए हो गया क्योंकि पिछली रात एक रहस्यमयी शख़्स ने मुझे ज़ोर का धक्का दिया था इस लिए हो सकता था कि इस वक़्त वो मुझे यहाँ अकेले देख कर मेरे पास किसी ग़लत इरादे से आया हो। मैं फ़ौरन ही उठा और झोपड़े के अंदर ही एक कोने में रखे लट्ठ को हाथ में ले कर झोपड़े से बाहर आ गया।

झोपड़े से बाहर आ कर मैंने इधर उधर नज़र घुमाई तो देखा मेरी ही उम्र के दो लड़के मेरे पास आते दिखे। चार क़दम की दूरी पर ही थे वो और मैंने उन दोनों को अच्छी तरह पहचान लिया। वो मेरे ही गांव के थे और मेरे दोस्त थे। एक का नाम चेतन था और दूसरे का सुनील। उन दोनों को इस वक़्त यहाँ देख कर मेरी झांठें सुलग गईं।

"कैसा है वैभव?" दोनों मेरे पास आ गए तो उनमे से चेतन ने मुझसे कहा।

"महतारीचोद तमीज़ से बात कर समझा।" गुस्से में मैंने झपट कर चेतन का गिरहबान पकड़ कर गुर्राया था_____"अपनी औकात मत भूल तू। तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरा नाम लेने की?"

चेतन को मुझसे ऐसी उम्मीद सपने में भी नहीं थी। उसने तो ये सोचा था कि उन दोनों के आने से मैं खुश हो जाऊंगा और उन दोनों को अपने गले लगा लूंगा मगर उन दोनों को क्या पता था कि ठाकुर वैभव सिंह को अब दोस्तों से कितनी नफ़रत हो गई थी।

"ये तू क्या कर रहा है वैभव?" सुनील ने हैरत से आंखें फाड़ कर मुझसे ये कहा तो मैंने खींच कर एक लात उसके गुप्तांग पर जमा दिया जिससे उसकी चीख निकल गई और वो मारे दर्द के अपना गुप्तांग पकड़े दोहरा होता चला गया।

"भोसड़ीवाले।" फिर मैंने गुस्से में फुँकारते हुए उससे कहा____"दुबारा मेरा नाम लिया तो तेरी बहन को खड़े खड़े चोद दूंगा।" कहने के साथ ही मैं चेतन की तरफ पलटा____"अगर तुम दोनों अपनी सलामती चाहते हो तो अपना कान पूँछ दबा कर यहाँ से दफा हो जाओ।"

"हम तो तुझसे मिलने आये थे वैभव आआह्ह्ह्।" चेतन ने ये कहा ही था कि मैंने घुटने का वार उसके पेट में ज़ोर से किया तो उसकी चीख निकल गई।

"मादरचोद।" फिर मैंने उसके चेहरे पर घू़ंसा मारते हुए कहा____"बोला न कि मेरा नाम लेने की हिम्मत मत करना। तुम सालों को मैंने पालतू कुत्तों की तरह पाला था और तुम दोनों ने क्या किया? इन चार महीनों में कभी देखने तक नहीं आये मुझे। अगर मुझे पहले से पता होता कि मेरे पाले हुए कुत्ते इतने ज़्यादा बेवफ़ा निकलेंगे तो पहले ही तुम दोनों का खून कर देता।"

"हमे माफ़ कर दो वैभव।" सुनील ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हम आना तो चाहते थे लेकिन बड़े ठाकुर साहब के डर से नहीं आये कि कहीं वो हमें भी तुम्हारी तरह गांव से निष्कासित न कर दें।"

"इसका मतलब तो यही हुआ न कि तुम दोनों ने सिर्फ अपने बारे में ही सोचा।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"क्या यही थी तुम दोनों की दोस्ती? थू है तुम दोनों पर। अभी के अभी यहाँ से दफा हो जाओ वरना तुम दोनों की इतनी बार गांड मारुंगा कि हगना मुश्किल हो जाएगा।"

"माफ़ कर दे यार।" चेतन बोला____"अब आ तो गए हैं ना हम दोनों।"

"तेरी माँ को चोदूं मादरचोद।" मैंने चेतन को एक और घूंसा जड़ते हुए कहा____"यहां आ कर क्या मुझ पर एहसान किया है तूने? कान खोल कर सुन लो तुम दोनों। आज के बाद तुम दोनों कभी मुझे अपनी शकल न दिखाना वरना घर में घुस कर तुम दोनों की माँ बहन को चोदूंगा। अब दफा हो जाओ यहाँ से।"

दोनों ने पहली बार मुझे इतने गुस्से में देखा था और उन्हें ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि मैं दोनों पर इतना ज़्यादा क्रोधित हो जाऊंगा। दोनों बुरी तरह सहम गए थे और जब मैंने ये कहा तो दुबारा उन दोनों में बोलने की हिम्मत न हुई।

चेतन और सुनील जा चुके थे। पता नहीं क्यों उन दोनों को देख कर इतना गुस्सा आ गया था मुझे? शायद इस लिए कि इन चार महीनों में मुझे पता चल गया था कि कौन मेरा चाहने वाला था और कौन नहीं। सच कहूं तो अब दोस्ती जैसे शब्द से नफ़रत ही हो गई थी मुझे।

दोनों के जाने के बाद मैं कुछ देर तक दोस्तों के बारे में ही सोचता रहा। दोपहर से ज़्यादा का समय हो गया था और अब मुझे भूख लग रही थी। आज से पहले मैं या तो प्रदीप के घर में खाना खा लेता था या फिर जंगल में जा कर उसी नदी से मछलियाँ पकड़ कर और फिर उन्हें भून कर अपनी भूख मिटा लेता था। प्रदीप काका की हत्या हो जाने से मैं प्रदीप काका के घर खाना खाने के लिए नहीं जा सकता था। हालांकि मैं अगर जाता तो सरोज काकी डॉली से बनवा कर ज़रूर मुझे खाना देती मगर ऐसे वक़्त में मुझे खुद उसके यहाँ खाना खाने के लिए जाना ठीक नहीं लग रहा था। इस लिए मैं उठा और जंगल की तरफ बढ़ गया।

रास्ते में मैं सोच रहा था कि अब ऐसे वक़्त में मुझे क्या करना चाहिए? यहाँ पर मैं दो वजहों से रुका हुआ था। एक तो बंज़र ज़मीन पर फसल उगा कर मैं अपने बाप को दिखाना चाहता था और दूसरे प्रदीप काका की वजह से क्योंकि उनसे मेरे अच्छे ताल्लुक बन गए थे। हालांकि एक वजह और भी थी और वो ये कि सरोज काकी से मुझे शारीरिक सुख मिलता था और कहीं न कहीं ये बात भी सच ही थी कि मैं उसकी बेटी डॉली को भी हासिल करना चाहता था।

मैं अक्सर सोचता था कि मैं डॉली के साथ शख्ती से पेश क्यों नहीं आ पाता? चार महीने पहले तक तो ऐसा था कि मैं जिस लड़की या औरत को चाह लेता था उसे किसी न किसी तरह हासिल कर ही लेता था और फिर उसे भोगता था मगर डॉली के मामले में मेरी कठोरता जाने कहां गायब हो जाती थी और उसके लिए एक कोमल भावना आ जाती थी। यही वजह थी कि चार महीने गुज़र जाने के बाद भी मेरे और डॉली के बीच की दूरी वैसी की वैसी ही बनी हुई थी जैसे चार महीने पहले बनी हुई थी।

आज शाम को मुझे घर भी जाना था क्योकि मैं माँ को बोल चुका था कि मैं शाम को आऊंगा मगर सच कहूं तो घर जाने की अब ज़रा भी हसरत नहीं थी मुझे। प्रदीप काका और उसके घर से एक लगाव सा हो गया था मुझे। उसके घर में डॉली के हाथ का बना खाना मैं अक्सर ही खाता रहता था। चूल्हे में उसके हाथ की बनी सोंधी सोंधी रोटियां और आलू भांटा का भरता एक अलग ही स्वाद की अनुभूति कराता था। डॉली का चोर नज़रों से मुझे देखना और फिर जब हमारी नज़रें आपस में मिल जातीं तो उसका हड़बड़ा कर अपनी नज़रें हटा लेना। जब वो हलके से मुस्कुराती थी तो उसके दोनों गालों पर हलके से गड्ढे पड़ जाते थे। मैं जानता था कि घर लौटने के बाद फिर मैं प्रदीप काका के घर इस तरह नहीं जा पाऊंगा और डॉली जैसी बेदाग़ चीज़ मेरे हाथ से निकल जाएगी।

मुझे याद आया कि कल रात प्रदीप काका मुझसे अपनी बेटी का हाथ थामने की बात कह रहे थे। कल रात वो देशी शराब के नशे में थे और शराब के नशे में अक्सर इंसान सच ही बोलता है तो क्या प्रदीप काका सच में यही चाहते थे कि मैं उनकी बेटी का हाथ हमेशा के लिए थाम लूं? क्या मुझे सच में प्रदीप काका की इस इच्छा को मान लेना चाहिए? डॉली में कोई कमी नहीं थी। उसकी मासूमियत और उसकी सादगी उसका सबसे बड़ा गहना थी। उसके मासूम चेहरे को देख कर कभी कभी मेरे ज़हन में ये ख़याल भी आ जाता था कि उसके लिए कितना ग़लत सोचता हूं मैं। दुनिया में क्या लड़कियों और औरतों की कमी है जो मैं उस मासूम को दाग़दार करने की हसरत पाले बैठा हूं? ये ख़याल भी एक वजह थी कि मैं डॉली के क़रीब ग़लत इरादे से जा नहीं जा पाता था।

प्रदीप काका एक ग़रीब इंसान थे और मैं एक बड़े और उच्च कुल का नालायक चिराग़। अब तो मुझे घर वापस लौटना ही था क्योकि माँ ने धमकी दी थी कि अगर शाम तक मैं घर नहीं गया तो मुझे उनका मरा हुआ मुँह देखना पड़ेगा। इस लिए जब मैं घर चला जाऊंगा तो मैं एक बार फिर से बड़े बाप का बेटा बन जाऊंगा और मुमकिन है कि मेरे माता पिता डॉली के साथ मेरा ये रिश्ता पसंद न करें। ऐसे में मैं कैसे प्रदीप काका की इच्छा को पूरा कर पाऊंगा। हालांकि सबसे बड़ा सवाल तो अभी यही था कि क्या मैं खुद ये चाहता हूं कि डॉली का हाथ मैं हमेशा के लिए थाम लूं? मुझे एहसास हुआ कि ये सब इतना आसान नहीं था क्योंकि इसमें मेरे पिता जी के मान सम्मान का सवाल था और उनसे ज़्यादा मेरा सवाल था कि मैं खुद क्या चाहता हूं?

जंगल के अंदर उस नदी में पहुंच कर मैंने कुछ मछलियाँ पकड़ी और उन्हें वहीं भून कर खाया। अब कुछ राहत महसूस हो रही थी मुझे। मैं जंगल से निकल कर वापस झोपड़े पर आ गया। मेरी फसल जल कर ख़ाक हो गई थी और अब मेरे यहाँ रुकने की कोई वजह भी नहीं रह गई थी। शाम को घर लौटना मेरी मज़बूरी बन गई थी वरना मैं तो घर जाना ही नहीं चाहता था। असल में मैं ये चाहता था कि इस समय मैं जिन परिस्थितियों में था उससे बाहर निकल आऊं और ऐसा तभी हो सकता था जब मैं प्रदीप काका के हत्यारे का पता लगा लूं और जगन के साथ साथ उसके गांव वालों को भी दिखा दूं कि मैं प्रदीप काका का हत्यारा नहीं था।

इस वक़्त प्रदीप काका के घर जाना उचित नहीं था क्योंकि उनके घर में इस वक़्त मातम सा छाया होगा। हालांकि मेरे वहां जाने से सरोज काकी या डॉली को कोई समस्या नहीं होनी थी किन्तु मैं नहीं चाहता था कि अगर जगन वहां पर हो और उसने मुझसे कुछ उल्टा सीधा बोला तो मेरे द्वारा कोई बवाल मच जाए। इस लिए मैंने सोचा कि एक दो दिन बाद जाऊंगा क्योंकि तब तक घर का माहौल कुछ ठीक हो जाएगा। दूसरी बात मुझे सरोज काकी से ये भी बताना होगा कि अब से मैं झोपड़े में नहीं रहूंगा बल्कि अपने घर पर ही रहूंगा।

झोपड़े में पड़ा मैं सोच रहा था कि जगन के रिपोर्ट लिखवाने पर भी थाने से दरोगा नहीं आया था जबकि हत्या जैसे मामले में दरोगा को फ़ौरन ही आना चाहिए था और प्रदीप की हत्या के मामले को अपने हाथ में ले कर उसकी छानबीन शुरू कर देनी चाहिए थी मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। प्रदीप काका की लाश को दोपहर तक घर में ही रखा गया था उसके बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। मतलब साफ़ था कि हत्यारे ने दरोगा को घूंस दे कर हत्या के इस मामले को दबा दिया था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन ब्यक्ति हो सकता है जिसकी पहुंच पुलिस के दरोगा तक है और वो हत्या जैसे गंभीर मामले को भी दबा देने की कूवत रखता है?

मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर मुझे प्रदीप के हत्यारे का पता लगाना है तो मुझे खुद पुलिस के दरोगा की तरह इस मामले की छानबीन करनी होगी। आख़िर मुझे भी तो इस हत्या से अपने ऊपर लगे इल्ज़ाम को हटाना था। इस ख़याल के साथ ही मैं एक झटके में उठा और झोपड़े से बाहर निकल आया। बाहर आ कर मैंने झोपड़े के पास ही रखे अपने लट्ठ को उठाया और प्रदीप काका के घर की तरफ चल पड़ा। मैंने सोच लिया था कि हत्या के इस मामले की मैं खुद बारीकी से जांच करुंगा।

प्रदीप काका के घर के सामने पेड़ के नीचे बने एक चबूतरे पर कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे। उन लोगों के साथ प्रदीप काका का छोटा भाई जगन भी था। मुझे देख कर सब के सब चुप हो गए और चबूतरे से उतर कर ज़मीन पर खड़े हो ग‌ए। जगन की नज़र मुझ पर पड़ी तो उसने घूर कर देखा मुझे।

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अध्याय - 08

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अब तक,,,,

मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर मुझे प्रदीप के हत्यारे का पता लगाना है तो मुझे खुद पुलिस के दरोगा की तरह इस मामले की छानबीन करनी होगी। आख़िर मुझे भी तो इस हत्या से अपने ऊपर लगे इल्ज़ाम को हटाना था। इस ख़याल के साथ ही मैं एक झटके में उठा और झोपड़े से बाहर निकल आया। बाहर आ कर मैंने झोपड़े के पास ही रखे अपने लट्ठ को उठाया और प्रदीप काका के घर की तरफ चल पड़ा। मैंने सोच लिया था कि हत्या के इस मामले की मैं खुद बारीकी से जांच करुंगा।

प्रदीप काका के घर के सामने पेड़ के नीचे बने एक चबूतरे पर कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे। उन लोगों के साथ प्रदीप काका का छोटा भाई जगन भी था। मुझे देख कर सब के सब चुप हो गए और चबूतरे से उतर कर ज़मीन पर खड़े हो ग‌ए। जगन की नज़र मुझ पर पड़ी तो उसने घूर कर देखा मुझे।

अब आगे,,,,,

जगन को अपनी तरफ इस तरह घूरते देख कर मेरे ज़हन में ये बात आई कि मुझे इस तरह सबकी मौजूदगी में प्रदीप काका के घर के अंदर नहीं जाना चाहिए क्योंकि ऐसे में वहां मौजूद सभी लोगों के मन में ग़लत सोच पैदा हो सकती थी। जगन तो वैसे भी सबके सामने मुझसे कह ही चुका था कि मैं उसकी भतीजी डॉली को अपनी हवश का शिकार बनाना चाहता था और इसी लिए अपने रास्ते के कांटे प्रदीप काका की हत्या कर दी है।

"मुझे माफ़ कर दो जगन काका क्योंकि मैंने तुम पर हाथ उठाया था उस समय।" फिर मैंने जगन के सामने जा कर उससे कहा____"हालाँकि जिस तरह का आरोप तुमने मुझ पर लगाया था और जिस तरीके से मेरे चरित्र को उछाला था उस तरह में मेरी जगह कोई भी होता तो वो तुम पर ऐसे ही हाथ उठा देता।"

मेरी बातें सुन कर जगन कुछ न बोला। वहां पर मौजूद लोगों में से भी कोई कुछ न बोला। वो इस तरह अपनी अपनी जगह पर खड़े हुए थे जैसे उन्हें डर हो कि अगर वो मेरे सामने इस तरह खड़े न रहेंगे तो मैं उन सबका खून कर दूंगा।

"मैं मानता हूं जगन काका कि मेरा चरित्र अब से पहले अच्छा नहीं था।" जगन के साथ साथ सभी को ख़ामोश देख मैंने फिर से कहा____"और मैं ये भी मानता हूं कि मैंने अब से पहले गांव की न जाने कितनी ही बहू बेटियों की इज्जत के साथ खेला है मगर अब ऐसा नहीं रहा मैं। मैं जानता हूं कि अगर मैं ये बात अपना सर पटक पटक के भी कहूंगा तो तुम लोग मेरी बात का यकीन नहीं करोगे मगर तुम्हारे यकीन न करने से ना तो सच्चाई बदल जाएगी और ना ही मुझ पर कोई फ़र्क पड़ेगा।"

इतना कहने के बाद मैं सांस लेने के लिए रुका। मेरे चुप होते ही वातावरण में ख़ामोशी छा गई। सभी के चेहरों पर ऐसे भाव उभर आये थे जैसे अब वो मेरे आगे बोलने का शिद्दत से इंतज़ार करने लगे हों।

"ग़लतियां हर इंसान से होती हैं।" सबकी तरफ एक एक नज़र डालते हुए मैंने कहा____"इस धरती पर कोई भगवान नहीं है जिससे कभी कोई ग़लती ही न हो। मुझसे बहुत सी गलतियां हुईं जिसके लिए आज मुझे कुछ ही सही मगर पछतावा ज़रूर है। मेरे पिता ने मुझे उन्हीं गलतियों की वजह से गांव से निष्कासित किया और आज मैं पिछले चार महीने से यहाँ हूं। इन चार महीनों में अगर मैंने किसी की बहू बेटी की इज्ज़त ख़राब की हो तो बेझिझक तुम लोग मेरा सर काट डालो।"

अपनी बात कहने के बाद मैंने सबकी तरफ देखा। वहां मौजूद सभी लोग एक दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगे थे जैसे आँखों से ही एक दूसरे से पूछ रहे हों कि तुम में से क्या किसी की बहू बेटी के साथ इस ठाकुर के लड़के ने कुछ किया है? आँखों से पूछे गए सवाल का जवाब भी आँखों से ही मिल गया उन्हें।

"तुमने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया था जगन काका कि मैं तुम्हारी भतीजी डॉली को अपनी हवश का शिकार बनाना चाहता हूं।" मैंने जगन की तरफ देखते हुए कहा____"अगर सच में ऐसा होता तो क्या अब तक तुम्हारी भतीजी मेरा शिकार न हो गई होती? जब अब तक किसी ने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ लिया था तो तुम्हारी भतीजी का जब मैं शिकार कर लेता तो तुम में से कोई मेरा क्या बिगाड़ लेता? इस पर भी अगर तुम्हें यकीन नहीं है तो जा कर अपनी भतीजी से पूछ लो काका। चार महीने से मैं इस घर में आता जाता हूं और इन चार महीनों में अगर मैंने कभी भी तुम्हारी भतीजी को ग़लत नज़र से देखा हो तो वो तुम्हें ज़रूर बताएगी और फिर तुम मेरा सर काटने के लिए आज़ाद हो।"

मेरी इन बातों को सुन कर जगन ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर बेचैनी जैसे भाव उभरे। उसने नज़र उठा कर वहां मौजूद सभी लोगों को देखा और फिर मेरी तरफ ख़ामोशी से देखने लगा।

"प्रदीप काका मेरे लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं थे जगन काका।" मैंने जगन काका के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"मेरे बुरे वक़्त में सिर्फ उन्होंने ही मेरा साथ दिया था। उनके घर का नमक खाया है मैंने। मेरे दिल में उनके लिए मरते दम तक जगह रहेगी। जिस इंसान ने मेरे लिए इतना कुछ किया उस इंसान की अगर मैं हत्या करुंगा तो मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। हवश ने मुझे इतना भी अँधा नहीं कर दिया है कि मैं अपने ही फ़रिश्ते की बेरहमी से हत्या कर दूं।"

"मुझे छोटे ठाकुर पर विश्वास है जगन।" वहां मौजूद लोगों में से एक आदमी ने जगन से कहा____"इन्होंने सच में प्रदीप की हत्या नहीं की है और ना ही तुम्हारी भतीजी पर इनकी नीयत ग़लत है। अगर ऐसा होता तो तुम्हारी भतीजी खुद सबको बताती कि इन्होंने उसके साथ ग़लत किया है।"

"मैं किशोर की बातों से सहमत हूं जगन।" एक दूसरे आदमी ने कहा____"छोटे ठाकुर ने कुछ नहीं किया है। तुमने बेवजह ही इन पर इतने गंभीर आरोप लगाये थे।"

एक के बाद एक आदमी जगन से यही सब कहने लगा था जिसे सुन कर जगन ने फिर से एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे भी ये बात समझ आ गई थी कि मैं वैसा नहीं हूं जैसा वो समझ रहा था।

"मुझे माफ़ कर दो छोटे ठाकुर।" फिर जगन ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई जो मैंने तुम पर ये इल्ज़ाम लगाये थे। मुझे माफ़ कर दो।"

"माफी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है जगन काका।" मैंने जगन काका के जुड़े हुए हाथों को पकड़ते हुए कहा____"क्योंकि तुमने वही किया है जो ऐसे वक़्त में और ऐसी परिस्थिति में करना चाहिए था। ख़ैर छोड़ो ये सब। मैं यहाँ ये बताने आया था कि अब से मेरा वनवास ख़त्म हो गया है और अब से मैं अपने घर में ही रहूंगा किन्तु मैं ये वादा करता हूं कि जिस किसी ने भी प्रदीप काका की हत्या की है उसका पता मैं लगा के रहूंगा और फिर उसे सज़ा भी दूंगा।"

"छोटे ठाकुर।" जगन ने कहा____"मैं तो यही कहूंगा कि तुम अब इस झमेले में न पड़ो। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी जान को कोई ख़तरा हो जाए। वैसे भी मेरा भाई तो अब चला ही गया है।"

"नहीं जगन काका।" मैंने दृढ़ता से कहा____"मुझे अपनी जान की कोई परवाह नहीं है। मेरे लिए अब ये जानना बेहद ज़रूरी हो गया है कि प्रदीप काका की हत्या किसने और किस वजह से की है और बात सिर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि मुझे लगता है कि जिस किसी ने भी प्रदीप काका की हत्या की है उसी ने मेरी फसल भी जलाई है।"

"फसल जलाई है???" जगन तो चौंका ही था किन्तु मेरी ये बात सुन कर वहां मौजूद बाकी लोग भी बुरी तरह चौंका थे, जबकि जगन ने हैरानी से कहा____"ये तुम क्या कह रहे हो छोटे ठाकुर? तुम्हारी फसल जला दिया किसी ने??"

"हां काका।" मैंने गंभीरता से कहा____"आज सुबह जब मैं यहाँ से वापस अपने खेत की तरफ गया तो मैंने देखा कि गेहू की पुल्लियों का जो गड्ड बना के रखा था मैंने उसमे भीषण आग लगी हुई थी। अपनी मेहनत को जल कर राख होते देखता रह गया था मैं। भला मैं कैसे उस आग को बुझा सकता था? ख़ैर इतना कुछ होने के बाद अब ये सोचने का विषय हो गया है कि मेरी गेहू की फसल को आग किसने लगाईं और अगर किसी ने ये सब मुझसे अपनी दुश्मनी निकालने की वजह से किया है तो उसने फसल को ही क्यों जलाया? वो अपनी दुश्मनी मुझसे भी तो निकाल सकता था?"

"बड़ी हैरत की बात है छोटे ठाकुर।" जगन ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"भला ऐसा कौन कर सकता है?"

"यही तो पता करना है काका।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"एक तरफ प्रदीप काका की हत्या का मामला और दूसरी तरफ मेरी फसल को जला देने का मामला। ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जिनके बारे में फिलहाल कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा किसी ने क्यों किया है?"

जगन काका से थोड़ी देर और कुछ बातें करने के बाद मैं घर के अंदर की तरफ दाखिल हो गया। मैंने महसूस कर लिया था कि जगन काका के ज़हन में जो मेरे प्रति नाराज़गी थी वो काफी हद तक दूर हो चुकी थी। हालांकि मेरे ज़हन में ये ख़याल अब भी उभरता था कि प्रदीप काका की हत्या क्या जगन ने की होगी? माना कि दोनों भाइयों के बीच कोई मन मुटाव या बैर जैसी भावना नहीं थी किन्तु कोई अपने अंदर कैसी भावना छुपाये बैठा है इसका पता किसी को कैसे चल सकता है? कहने का मतलब ये कि हो सकता है कि जगन के मन में अपने बड़े भाई की ज़मीन हड़पने का इरादा पहले से ही रहा हो जिसके लिए उसने अवसर देख कर अपने भाई की हत्या कर दी और हत्या के इस मामले में मुझे बड़ी सफाई से फंसा दिया हो।

अगर सोचा जाए तो ये ख़याल अपनी जगह तर्क संगत ही था। ज़र जोरु और ज़मीन होती ही ऐसी है जिसके लिए इंसान कुछ भी कर सकता है। जगन के लिए ये सुनहरा अवसर था अपने भाई की हत्या करने का और अपने भाई की हत्या में मुझे फंसा देने का। उसे अच्छी तरह पता था कि मैं कैसा आदमी हूं और आज कल कैसे हालात में हूं। उसे ये भी पता था कि प्रदीप काका से मेरा गहरा ताल्लुक बन गया था और मेरा उनके घर आना जाना भी था। मेरे चरित्र का फायदा उठा कर ही उसने अपने भाई की हत्या की होगी और उस हत्या का इल्ज़ाम मेरे सर मढ़ दिया होगा।

मेरे मन में ये ख़याल अक्सर उभर आते थे लेकिन मेरे पास कोई प्रमाण नहीं था कि मैं अपने इस ख़याल को सही साबित कर सकूं। ख़ैर ये तो अब आने वाला वक़्त ही बताएगा कि प्रदीप काका की हत्या से किसे फायदा होने वाला है। मैं यही सब सोचते हुए घर के अंदर आया तो देखा सरोज काकी अंदर वाले भाग के बरामदे के पास बैठी थी। उसके साथ गांव की कुछ औरतें भी बैठी हुईं थी। डॉली मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। ख़ैर मैं जब अंदर पहुंचा तो सरोज काकी के साथ साथ उन औरतों ने भी मेरी तरफ देखा।

"काकी अब से मैं अपने घर में ही रहूंगा।" मैंने कुछ देर उन सबको देखने के बाद सरोज काकी से कहा____"कल पिता जी आये थे और आज माँ और बड़ा भाई आया था। माँ ने अपनी क़सम दे कर मुझे घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया है इस लिए आज शाम को मैं चला जाऊंगा लेकिन मैं यहाँ आता रहूंगा। प्रदीप काका के बड़े उपकार हैं मुझ पर इस लिए मैं ये पता लगा के रहूंगा कि उनकी हत्या किसने और किस वजह से की है?"

"मैं तो अब भी यही कहती हूं बेटा कि तुम इस झमेले में मत पड़ो।" सरोज काकी ने गंभीर भाव से कहा____"मेरा मरद तो चला ही गया है। क्या हत्यारे का पता लगा लेने से वो मुझे वापस मिल जायेगा?"

"ये तुम कैसी बातें करती हो काकी?" मैंने बाकी औरतों की तरफ देखने के बाद काकी से कहा____"माना कि प्रदीप काका अब कभी वापस नहीं मिलेंगे मगर ये जानना तो हम सबका हक़ है कि उनकी हत्या किसने की है? स्वर्ग में बैठे प्रदीप काका भी यही चाहते होंगे कि उनके हत्यारे का पता लगाया जाए और उसे सज़ा दी जाए। अगर ऐसा न हुआ तो उनकी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी। मैं खुद भी तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक कि काका के हत्यारे का पता नहीं लगा लेता। क्योंकि प्रदीप काका की हत्या से मैं खुद को भी कहीं न कहीं अपराधी मानता हूं। क्या पता किसी ने मुझसे अपनी दुश्मनी निकालने के लिए ही प्रदीप काका की इस तरह से जान ले ली हो। इस लिए मैं इस सबका पता लगा के ही रहूंगा।"

सरोज काकी मेरी तरफ उदास नज़रों से देखती रही। उसके पास बैठी बाकी औरतें भी ख़ामोशी से मेरी बातें सुन रही थी। तभी मेरी नज़र डॉली पर पड़ी। वो अभी अभी एक कमरे से निकल कर बाहर आई थी। उसने एक नज़र मेरी तरफ देखा और फिर चुप चाप घर के पीछे की तरफ जाने के लिए जो दरवाज़ा था उस तरफ बढ़ ग‌ई।

"तुम्हेँ पता है काकी।" मैंने काकी से कहा____"आज सुबह जब मैं यहाँ से अपने खेत की तरफ गया तो देखा कि खेत में मेरी गेहू की फसल में आग लगी हुई थी। सारी की सारी फसल जल कर राख हो गई।"

"ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?" सरोज के साथ साथ बाकी औरतें भी मेरी बात सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"हां काकी।" मैंने कहा____"इतनी मेहनत से मैंने जिस फसल को उगाया था उसे किसी ने आग लगा दी और मैं कुछ नहीं कर सका। तुम खुद सोचो काकी कि ऐसा किसी ने क्यों किया होगा? प्रदीप काका की हत्या होना और मेरी फसल को आग लगा देना ये दोनों मामले साथ साथ हुए हैं। मतलब साफ़ है कि दोनों मामलों का आपस में सम्बद्ध है और इन दोनों मामलों को जन्म देने वाला कोई एक ही इंसान है। ख़ैर अपनी फसल के जल जाने का मुझे इतना दुःख नहीं है मगर प्रदीप काका की हत्या जिस किसी ने भी की है उसे मैं पाताल से भी खोज निकालूँगा और फिर उसे ऐसी सज़ा दूंगा कि उसके फ़रिश्ते भी थर्रा जाएंगे।"

मैं ये सब कहने के बाद पलटा और घर से बाहर निकल कर अपने झोपड़े की तरफ चल दिया। आसमान में चमकता हुआ सूरज पश्चिम दिशा की तरफ पहुंच चुका था और कुछ ही देर में शाम हो जानी थी। ये देख कर मुझे याद आया कि आज शाम को मुझे अपने घर जाना है। घर जाने की बात याद आते ही मेरे मन में एक अजीब सा एहसास होने लगा और साथ ही ज़हन में ये ख़याल भी उभर आये कि घर में पिता जी से जब मेरा सामना होगा तब वो क्या कहेंगे मुझे? मैंने उस दिन गुस्से में भाभी को दुत्कार दिया था तो क्या वो मुझसे गुस्सा होंगी? ऐसे कई सारे ख़याल मेरे मन में उभर रहे थे और मेरे अंदर अजीब सा एहसास जगा रहे थे।

फागुन का महीना चल रहा था और कल होली का त्यौहार है। मैं सोचने लगा कि इस साल की ये होली प्रदीप काका के घर वालों के भाग्य में नहीं थी। मुझे याद आया कि हर साल मैं अपने दोस्तों के साथ होली के इस त्यौहार को अपने तरीके से मनाता था। भांग के नशे में गांव की कुछ लड़कियों को मैं उठवा लेता था और गांव से दूर खेतों में बने अपने मकान में ले जा कर उनके मज़े लेता था। ऐसा नहीं था कि मैं हर किसी पर जुल्म करता था बल्कि बहुत सी ऐसी भी होतीं थी जो अपनी ख़ुशी से मेरे साथ सम्भोग करतीं थी क्योंकि मैं उन्हें संतुष्ट भी करता था और पैसे से उनकी मदद भी करता था। इस बार का ये त्यौहार मेरे लिए एक नए रूप में था और मैं खुद भी एक नए रूप में था।

मैंने एक थैले में अपने कपड़े समेट कर डाले और घर जाने के लिए तैयार हो गया। मेरा मन ज़रा भी नहीं कर रहा था कि मैं यहाँ से घर जाऊं। इस जगह से एक लगाव हो गया था और इस जगह पर कई सारी यादें बन गईं थी। इस जगह पर प्रदीप काका जैसे इंसान ने बुरे वक़्त में मेरा साथ दिया था। इस जगह पर सरोज काकी ने मुझे जिस्मानी सुख दिया था और इसी जगह पर मैंने अपने बुरे वक़्त में जीवन का असली रंग देखा था। डॉली जैसी एक आम सी लड़की ने बिना कुछ किये ही मेरी मानसिकता को बदल दिया था। मुझे एक बार फिर से याद आ गया कि प्रदीप काका ने पिछले दिन मुझसे अपनी बेटी डॉली का हाथ थाम लेने की बात कही थी। मेरे मन में तरह तरह के विचार चलने लगे। क्या मैं सरोज काकी और उसके बच्चों को ऐसे ही छोड़ कर चला जाऊंगा? क्या मैं प्रदीप काका के उपकारों को भूल कर ऐसे ही यहाँ से चला जाऊंगा? नहीं, मैं ऐसे नहीं जाऊंगा बल्कि प्रदीप काका के उपकारों का बदला ज़रूर चुकाऊंगा।

जाने कितनी ही देर तक मैं ये सब सोचता रहा। सूर्य अपने वजूद पर लालिमा चढ़ाये पश्चिम दिशा में उतर चुका था। आस पास कोई नहीं था बस हवा चलने की आवाज़ें ही सुनाई दे रहीं थी। मेरे मन में बहुत सी बातें इस जगह के लिए पनप चुकी थी और मैंने एक फैसला कर लिया था।

अपना सामान एक थैले में भर कर मैं झोपड़े से बाहर निकला और एक बार खेत के उस हिस्से की तरफ देखा जहां पर मेरी फसल का जली हुई राख के रूप में ढेर पड़ा था। कुछ देर उस राख के ढेर को देखने के बाद मैं खेत की तरफ बढ़ गया। खेत के पास आ कर मैंने उस खेत की ज़मीन पर अपना हाथ रखा और फिर उस हाथ को अपने माथे पर लगा कर मैंने उस ज़मीन को प्रणाम किया।

खेत की उस ज़मीन को प्रणाम करने के बाद मैं उठा और पलट कर चल दिया। अभी मैं झोपड़े के करीब ही पंहुचा था कि मेरी नज़र सामने से आती हुई एक बग्घी पर पड़ी। उस बग्घी में पिता जी का एक आदमी बैठा हुआ था। मेरे मन में ख़याल उभरा कि शायद ये बग्घी माँ ने मुझे लाने के लिए भेजी होगी।

"प्रणाम छोटे ठाकुर।" बग्घी मेरे पास आई तो बग्घी चला रहे उस आदमी ने मुझसे बड़े अदब से कहा____"ठाकुर साहब ने आपको लाने के लिए मुझे भेजा है।"

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी काका।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"ईश्वर ने मुझे दो पैर दिए हैं जो कि अभी सही सलामत हैं। इस लिए मैं पैदल ही घर आ जाता।"

"ऐसा कैसे हो सकता है छोटे ठाकुर?" उस आदमी ने कहा_____"ख़ैर छोड़िये, लाइए ये थैला मुझे दीजिए।"

बग्घी से उतर कर वो आदमी मेरे पास आया और थैला लेने के लिए मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो मैंने उसे ख़ामोशी से थैला दे दिया जिसे ले कर वो एक तरफ हट गया। मैं जब बग्घी में बैठ गया तो वो आदमी भी आगे बैठ गया और फिर उसने घोड़ों की लगाम को हरकत दी तो घोड़े आवाज़ करते हुए चल दिए।

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