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अब तक,,,,,
"हां मेरी जान।" मैंने कहा____"अब मैं हवेली नहीं जाऊंगा। आज की रात तेरे ही घर में गुज़ारुंगा। कल कोई दूसरा ठिकाना देखूंगा।"
"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" रजनी ने हैरानी से पूछा____"और हवेली क्यों नहीं जाएंगे आप?"
"बस मन भर गया है हवेली से।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"असल में हवेली मेरे जैसे इंसान के लिए है ही नहीं। ख़ैर छोड़ ये बात और निकल यहाँ से। तेरे घर पहुंचने के बाद मैं भी कुछ देर में आ जाऊंगा।"
मैंने रजनी को घर भेज दिया और खुद बगीचे से निकल कर उस तरफ चल दिया जहां पर मकान बना हुआ था। मकान के पास आ कर मैं चबूतरे पर बैठ गया। रजनी को छोड़ने के बाद मेरे अंदर की कुछ गर्मी निकल गई थी और अब ज़हन कुछ शांत सा लग रहा था। अभी मैं रजनी के बारे में सोच ही रहा था कि तभी किसी चीज़ की आहट को सुन कर मैं चौंक पड़ा।
अब आगे,,,,,
आहट पीछे से आई थी और जब मैंने चौंक कर पीछे देखा तो चांदनी रात में कुछ दूर मुझे एक इंसानी साया नज़र आया। उस साए ने अपने बदन पर काला कपड़ा ओढ़ा हुआ था और उसका चेहरा भी काले कपड़े से ढंका हुआ था। उसके दाहिने हाथ में एक बड़ा सा लट्ठ था। मैं उस साए को देख कर एकदम से चौकन्ना हो गया। मुझे समझने में ज़रा भी देरी नहीं हुई कि वो साया मेरी वजह से ही यहाँ था। वो मुझसे क़रीब दस या पंद्रह फ़ीट की दूरी पर खड़ा था। उसे देख कर मैं चौकन्ना तो हो गया था किन्तु जाने क्यों मेरे जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी थी और मेरी धड़कनें भी तेज़ हो गईं थी।
मैं एक झटके में अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया। मेरे ज़हन में अचानक ही ख़याल उभरा कि कहीं ये वही साया तो नहीं जो उस रात मुझसे टकराया था और मुझे धक्का दे कर गायब हो गया था? मेरे मन में कई सारे सवाल अचानक से ही तांडव करने लगे थे। आख़िर कौन हो सकता है ये रहस्यमयी शख़्स और यहाँ पर क्यों आया होगा ये? क्या इसी ने प्रदीप काका की हत्या की होगी और क्या इसी ने मेरी फसल को जलाया होगा? ऐसे न जाने कितने ही सवाल मेरे ज़हन में उभरते जा रहे थे। मैं उसी की तरफ देख रहा था और वो भी अपनी जगह पर लट्ठ लिए मुझे ही देख रहा था।
मकान से बगीचा क़रीब सौ मीटर की दूरी पर था और चांदनी रात में इस वक़्त तीसरा कोई भी मुझे आस पास नहीं दिख रहा था। मैं ये तो नहीं जानता था कि वो साया यहाँ क्या करने आया था किन्तु मैंने मन ही मन ये ज़रूर सोच लिया था कि उस साए को अब हाथ से जाने नहीं दूंगा। मन में ये विचार कर के मैं उसकी तरफ बढ़ने लगा। मैं इस वक़्त एकदम निहत्था था किन्तु मेरे अंदर डर या घबराहट जैसी कोई बात नहीं थी बल्कि मेरी मुट्ठियां शख़्ती से कस गईं थी।
मैं निरंतर उस साए की तरफ बढ़ता ही जा रहा था और वो अपनी जगह पर किसी पुतले की तरह खड़ा जैसे मुझे ही घूर रहा था। मैं जब उसके और क़रीब पंहुचा तो मैंने देखा उसका चेहरा काले कपड़े से ढंका हुआ था। उसके बदन पर काला ही कपड़ा था जिसे उसने अपने जिस्म के चारो तरफ लपेट रखा था। साए की लम्बाई मुझसे थोड़ी ही ज़्यादा थी। मैं पूरी तरह चौकन्ना था और उसके द्वारा किए जाने वाले किसी भी हमले के लिए तैयार था। चलते हुए मैं उसके एकदम क़रीब पहुंच गया। अब उसके और मेरे बीच में सिर्फ चार या पांच क़दम का ही फासला था।
"कौन हो तुम?" मैंने उसे देखते हुए शख़्त भाव से उससे पूछा____"और इस वक़्त यहाँ क्या कर रहे हो?"
"अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ।" मेरे पूछने पर उसने ऐसी आवाज़ में कहा जैसे उसे बोलने में बहुत ही मेहनत करनी पड़ रही हो।
"शायद तुम जानते नहीं हो कि तुम किसके सामने खड़े हो।" मैंने कठोर भाव से कहा____"मेरा नाम ठाकुर वैभव सिंह है और वैभव सिंह उस बला का नाम है जो हर वक़्त अपनी जान अपनी हथेली पर ले कर चलता है। तुम मेरी नहीं बल्कि खुद अपनी सलामती की चिंता करो। अब इससे पहले कि मुझे गुस्सा आ जाए तुम फटाफट अपने बारे में बताओ और ये भी बताओ कि यहाँ किस लिए आए हो?"
"लगता है तुम्हें अपनी ताकत पर बहुत घमंड है।" साए ने कहा____"लेकिन तुम्हारे लिए ये जान लेना ज़रूरी है कि तुम्हारी ताकत मेरी ताकत के सामने बहुत ही मामूली है।"
"तो तुम मुझे धमकी दे रहे हो?" मैंने शख़्त भाव से उसे घूरते हुए कहा तो उसने कहा____"ये धमकी नहीं है लड़के बल्कि तुम्हें सच्चाई बता रहा हूं। इस लिए अगर अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ वरना फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।"
"चलो ये भी देख लेते हैं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अगर असली मर्द हो तो मेरी तरह निहत्था हो कर मुझसे मुक़ाबला करो।"
"हां क्यों नहीं।" उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहने के साथ ही अपने लट्ठ को एक तरफ उछाल दिया, फिर बोला_____"ये लो अब मैं भी तुम्हारी तरह निहत्था हो गया हूं। वैसे अभी भी वक़्त है तुम अपनी सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ।"
"वैभव सिंह एक ऐसे शख़्स से डर कर यहाँ से जाने वाला नहीं है जिसने खुद को छुपाने के लिए नक़ाब का सहारा ले रखा हो।" मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा____"बल्कि वो तो उस शख़्स से अब मुक़ाबला करेगा जिसने उसे मौत से डर कर भाग जाने की बात कही है। मैं भी देखना चाहता हूं कि किसका इतना बड़ा जिगरा है जो वैभव सिंह को नक़ाब पहन कर डराने आया है।"
"बहुत खूब।" उस साए ने कहा____"तो देर किस बात की है? अगर तुम में ताकत है तो ऐसा जिगरा रखने वाले का पता लगा लो फिर।"
"पहली बार कोई ऐसा मिला है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"जिसने वैभव सिंह को इस तरह से ललकारा है। मज़ा आएगा तुमसे मुक़ाबला कर के।"
मेरी बात सुन कर वो साया कुछ न बोला मगर मैंने महसूस किया जैसे मेरी बात सुन कर नक़ाब के अंदर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई हो। वो एकदम से लापरवाह सा खड़ा मुझे ही देख रहा था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि उसे मुझसे किसी बात का खतरा है, जबकि मैं अब मुक़ाबले के लिए एकदम से तैयार हो गया था। इतना तो मैं भी समझ गया था कि मुझसे इस तरह से उलझने वाला कोई मामूली शख़्स नहीं होगा। तभी उसने अपने दोनों हाथ के इशारे से मुझे अपनी तरफ हमला करने के लिए बुलाया।
मैं ये सोच कर गुस्से में आ गया कि वो मुझे किसी बच्चे की तरह पुचकार कर बुला रहा है। जैसे उसकी नज़र में मेरी कोई औकात ही न हो। मैं तेज़ी से आगे बढ़ा और उछल कर उसके ऊपर छलांग लगाया ही था कि वो बड़ी तेज़ी से अपनी जगह से हट गया जिससे मैं खाली ज़मीन पर गिर कर लुढ़कता चला गया। अभी मैं उठने ही लगा था कि उसके पैर की ठोकर मेरे पेट में पड़ी जिससे मैं दर्द से चीखते हुए दूर जा गिरा। मेरे पेट में उसके पैर का प्रहार बड़ा ज़ोर का हुआ था और इतने में ही मैं समझ गया था कि वो साया काफी ताकतवर है।
मैं दर्द को बरदास्त कर के फ़ौरन ही उठा और जैसे ही उसकी तरफ देखा तो मेरे चेहरे पर उसका ज़बरदस्त घूंसा पड़ा और मैं एक बार फिर से उछल कर ज़मीन पर जा गिरा। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मेरे जबड़े हिल गए हों। तभी मेरी नज़र उस पर पड़ी। वो बड़ी तेज़ी से मेरी तरफ आया और जैसे ही उसने अपना एक पैर उठा कर मुझ पर प्रहार किया तो मैं बड़ी तेज़ी से एक तरफ पलटा और झुक कर अपनी टांग उसके दूसरे पैर पर चला दी। परिणामस्वरूप साए का दूसरा पैर मेरी टांग लगते ही ज़मीन से हट गया और वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही मैं उछल कर उसके ऊपर आ गया मगर तभी उसने एक घूंसा मेरे चेहरे पर जड़ दिया और मैं एक तरफ को लहरा कर जा गिरा।
अभी मैं उठ ही रहा था कि उसने फिर से अपनी टांग घुमाई जिसे मैंने पकड़ लिया और उसकी टांग पकड़े ही मैं तेज़ी से खड़े हो कर उसे पूरी ताकत से उछाल दिया जिससे वो भरभरा कर ज़मीन पर गिर गया मगर गिरते ही वो बड़ी तेज़ी पलट गया। चांदनी रात थी इस लिए कोई समस्या नहीं थी किन्तु साया मेरी सोच से ज़्यादा फुर्तीला था और लड़ने के काफी दांव पेंच भी जानता था। जब तक मैं उसके क़रीब पंहुचा तब तक वो उछल कर खड़ा हो गया था।
मैं समझ गया था कि मेरा प्रतिद्वंदी मुझसे बिलकुल भी कमज़ोर नहीं है इस लिए मैं अब पूरी तरह से सतर्क हो गया था और कुछ सोचते हुए मैंने उसको मारने के लिए तेज़ी से हाथ चलाया तो वो झुक गया मगर यहीं पर उससे गलती हो गई। मैंने उसे मारने के लिए सिर्फ हाथ चलाने का उपक्रम किया था, वो मेरे वार से बचने के लिए झुक गया था और जैसे ही वो झुका तो मैंने अपने घुटने का वार ज़ोर से उसके माथे पर किया जिससे वो दर्द से बिलबिलाते हुए लहरा गया और इससे पहले कि वो सम्हलता मैंने उछल कर एक लात उसकी छाती पर मारी तो वो हिचकी लेते हुए धड़ाम से चित्त हो कर ज़मीन पर गिरा। इस बार वो जल्दी से उठा नहीं। मैं समझ गया कि उसकी छाती पर मेरा प्रहार बड़े ज़ोर का हुआ है जिससे वो शिथिल पड़ गया था।
अभी मैं उसके पेट पर लात मारने ही वाला था कि तभी दो तरफ से उसी के जैसे दो साए एकदम से आ गए। ये देख कर मैं चौंक पड़ा। उन सायों के हाथों में वैसे ही लट्ठ थे जैसे इस वाले साए के हाथ में था। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता एक साये ने अपना लट्ठ घुमा दिया जो सीधा मेरे बाजू में बड़े ज़ोर से लगा। मेरे हलक से दर्द में डूबी चीख निकल गई। तभी दूसरे वाले ने भी अपना लट्ठ घुमाया मगर ऐन वक़्त पर मैंने उसे लट्ठ घुमाते देख लिया था जिससे मैं फ़ौरन ही झुक गया था और उसका वार खाली चला गया था।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि ये दोनों साए कहां से आ गए थे और एकदम से मुझ पर हमला क्यों कर दिया था? मेरे बाजू में एक साए का लट्ठ लगा था जिससे मुझे बड़ा तेज़ दर्द हो रहा था। तभी मैंने देखा कि जिस साए से मैं पहले मुक़ाबला कर रहा था वो तेज़ी से उठा और एक ही जम्प में अपने लट्ठ को उठा लिया। उसे लट्ठ उठाते देख वो दोनों साए उसकी तरफ पलट गए और दोनों ने उस पर एक साथ हमला कर दिया। ये देख कर मैं फिर से चौंक पड़ा। उधर पहले वाला वो साया उन दोनों के हमलों का जवाब देने लगा था।
मैं उन दोनों सायों को पहले वाले साए के साथ इस तरह लड़ते देख काफी हैरान था। मुझे तो यही समझ में नहीं आ रहा था कि वो दोनों साए कहां से आ गए थे और जब वो दोनों मुझ पर हमला करने लगे थे तो वो पहले वाला साया उनसे कैसे भिड़ गया था। वातावरण में लट्ठ के टकराने की आवाज़ें गूँज रहीं थी। दोनों साए पहले वाले साए पर अपने अपने लट्ठ से वार करते जा रहे थे और पहला वाला साया उन दोनों के वार को बड़ी कुशलता से काटता जा रहा था। मैं कुछ देर तक भौचक्का सा खड़ा उन तीनों को लड़ते हुए देखता रहा उसके बाद मेरे ज़हन में अचानक ही ये ख़याल आया कि क्या मुझे इन तीनों के बीच में जाना चाहिए?
मैने ये साफ़ देखा था कि वो दोनों साए आते ही बिना कुछ बोले मुझ पर वार करने लगे थे लेकिन मैंने किसी तरह खुद को बचाया था और फिर उसके बाद पहले वाला साया उन दोनों से भीड़ गया था। इसका मतलब ये हुआ कि पहला वाला साया ये नहीं चाहता था कि वो दोनों साए मुझ पर हमला करें। अब सवाल था कि ऐसा क्यों? आख़िर पहला वाला साया ऐसा क्यों चाहता था और कौन था वो? बाद में ये जो दो साए आये हैं तो ये कौन हैं और इस तरह अचानक से मुझ पर हमला क्यों कर दिया था? तभी मुझे पहले वाले साए की कही बात याद आई, उसने कहा था कि अगर अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ। इसका मतलब वो इन्हीं दो सायों के बारे में ऐसा कह रहा था। इसका मतलब ये भी हुआ कि उसे पहले से पता था कि ये दोनों साए यहाँ आएंगे और मुझ पर हमला करेंगे। अब सवाल ये था कि पहले वाले साए को ये सब कैसे पता था? सोचते सोचते मेरा दिमाग़ चकराने लगा मगर कुछ समझ में नहीं आया मुझे।
"हां मेरी जान।" मैंने कहा____"अब मैं हवेली नहीं जाऊंगा। आज की रात तेरे ही घर में गुज़ारुंगा। कल कोई दूसरा ठिकाना देखूंगा।"
"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" रजनी ने हैरानी से पूछा____"और हवेली क्यों नहीं जाएंगे आप?"
"बस मन भर गया है हवेली से।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"असल में हवेली मेरे जैसे इंसान के लिए है ही नहीं। ख़ैर छोड़ ये बात और निकल यहाँ से। तेरे घर पहुंचने के बाद मैं भी कुछ देर में आ जाऊंगा।"
मैंने रजनी को घर भेज दिया और खुद बगीचे से निकल कर उस तरफ चल दिया जहां पर मकान बना हुआ था। मकान के पास आ कर मैं चबूतरे पर बैठ गया। रजनी को छोड़ने के बाद मेरे अंदर की कुछ गर्मी निकल गई थी और अब ज़हन कुछ शांत सा लग रहा था। अभी मैं रजनी के बारे में सोच ही रहा था कि तभी किसी चीज़ की आहट को सुन कर मैं चौंक पड़ा।
अब आगे,,,,,
आहट पीछे से आई थी और जब मैंने चौंक कर पीछे देखा तो चांदनी रात में कुछ दूर मुझे एक इंसानी साया नज़र आया। उस साए ने अपने बदन पर काला कपड़ा ओढ़ा हुआ था और उसका चेहरा भी काले कपड़े से ढंका हुआ था। उसके दाहिने हाथ में एक बड़ा सा लट्ठ था। मैं उस साए को देख कर एकदम से चौकन्ना हो गया। मुझे समझने में ज़रा भी देरी नहीं हुई कि वो साया मेरी वजह से ही यहाँ था। वो मुझसे क़रीब दस या पंद्रह फ़ीट की दूरी पर खड़ा था। उसे देख कर मैं चौकन्ना तो हो गया था किन्तु जाने क्यों मेरे जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी थी और मेरी धड़कनें भी तेज़ हो गईं थी।
मैं एक झटके में अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया। मेरे ज़हन में अचानक ही ख़याल उभरा कि कहीं ये वही साया तो नहीं जो उस रात मुझसे टकराया था और मुझे धक्का दे कर गायब हो गया था? मेरे मन में कई सारे सवाल अचानक से ही तांडव करने लगे थे। आख़िर कौन हो सकता है ये रहस्यमयी शख़्स और यहाँ पर क्यों आया होगा ये? क्या इसी ने प्रदीप काका की हत्या की होगी और क्या इसी ने मेरी फसल को जलाया होगा? ऐसे न जाने कितने ही सवाल मेरे ज़हन में उभरते जा रहे थे। मैं उसी की तरफ देख रहा था और वो भी अपनी जगह पर लट्ठ लिए मुझे ही देख रहा था।
मकान से बगीचा क़रीब सौ मीटर की दूरी पर था और चांदनी रात में इस वक़्त तीसरा कोई भी मुझे आस पास नहीं दिख रहा था। मैं ये तो नहीं जानता था कि वो साया यहाँ क्या करने आया था किन्तु मैंने मन ही मन ये ज़रूर सोच लिया था कि उस साए को अब हाथ से जाने नहीं दूंगा। मन में ये विचार कर के मैं उसकी तरफ बढ़ने लगा। मैं इस वक़्त एकदम निहत्था था किन्तु मेरे अंदर डर या घबराहट जैसी कोई बात नहीं थी बल्कि मेरी मुट्ठियां शख़्ती से कस गईं थी।
मैं निरंतर उस साए की तरफ बढ़ता ही जा रहा था और वो अपनी जगह पर किसी पुतले की तरह खड़ा जैसे मुझे ही घूर रहा था। मैं जब उसके और क़रीब पंहुचा तो मैंने देखा उसका चेहरा काले कपड़े से ढंका हुआ था। उसके बदन पर काला ही कपड़ा था जिसे उसने अपने जिस्म के चारो तरफ लपेट रखा था। साए की लम्बाई मुझसे थोड़ी ही ज़्यादा थी। मैं पूरी तरह चौकन्ना था और उसके द्वारा किए जाने वाले किसी भी हमले के लिए तैयार था। चलते हुए मैं उसके एकदम क़रीब पहुंच गया। अब उसके और मेरे बीच में सिर्फ चार या पांच क़दम का ही फासला था।
"कौन हो तुम?" मैंने उसे देखते हुए शख़्त भाव से उससे पूछा____"और इस वक़्त यहाँ क्या कर रहे हो?"
"अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ।" मेरे पूछने पर उसने ऐसी आवाज़ में कहा जैसे उसे बोलने में बहुत ही मेहनत करनी पड़ रही हो।
"शायद तुम जानते नहीं हो कि तुम किसके सामने खड़े हो।" मैंने कठोर भाव से कहा____"मेरा नाम ठाकुर वैभव सिंह है और वैभव सिंह उस बला का नाम है जो हर वक़्त अपनी जान अपनी हथेली पर ले कर चलता है। तुम मेरी नहीं बल्कि खुद अपनी सलामती की चिंता करो। अब इससे पहले कि मुझे गुस्सा आ जाए तुम फटाफट अपने बारे में बताओ और ये भी बताओ कि यहाँ किस लिए आए हो?"
"लगता है तुम्हें अपनी ताकत पर बहुत घमंड है।" साए ने कहा____"लेकिन तुम्हारे लिए ये जान लेना ज़रूरी है कि तुम्हारी ताकत मेरी ताकत के सामने बहुत ही मामूली है।"
"तो तुम मुझे धमकी दे रहे हो?" मैंने शख़्त भाव से उसे घूरते हुए कहा तो उसने कहा____"ये धमकी नहीं है लड़के बल्कि तुम्हें सच्चाई बता रहा हूं। इस लिए अगर अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ वरना फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।"
"चलो ये भी देख लेते हैं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अगर असली मर्द हो तो मेरी तरह निहत्था हो कर मुझसे मुक़ाबला करो।"
"हां क्यों नहीं।" उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहने के साथ ही अपने लट्ठ को एक तरफ उछाल दिया, फिर बोला_____"ये लो अब मैं भी तुम्हारी तरह निहत्था हो गया हूं। वैसे अभी भी वक़्त है तुम अपनी सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ।"
"वैभव सिंह एक ऐसे शख़्स से डर कर यहाँ से जाने वाला नहीं है जिसने खुद को छुपाने के लिए नक़ाब का सहारा ले रखा हो।" मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा____"बल्कि वो तो उस शख़्स से अब मुक़ाबला करेगा जिसने उसे मौत से डर कर भाग जाने की बात कही है। मैं भी देखना चाहता हूं कि किसका इतना बड़ा जिगरा है जो वैभव सिंह को नक़ाब पहन कर डराने आया है।"
"बहुत खूब।" उस साए ने कहा____"तो देर किस बात की है? अगर तुम में ताकत है तो ऐसा जिगरा रखने वाले का पता लगा लो फिर।"
"पहली बार कोई ऐसा मिला है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"जिसने वैभव सिंह को इस तरह से ललकारा है। मज़ा आएगा तुमसे मुक़ाबला कर के।"
मेरी बात सुन कर वो साया कुछ न बोला मगर मैंने महसूस किया जैसे मेरी बात सुन कर नक़ाब के अंदर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई हो। वो एकदम से लापरवाह सा खड़ा मुझे ही देख रहा था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि उसे मुझसे किसी बात का खतरा है, जबकि मैं अब मुक़ाबले के लिए एकदम से तैयार हो गया था। इतना तो मैं भी समझ गया था कि मुझसे इस तरह से उलझने वाला कोई मामूली शख़्स नहीं होगा। तभी उसने अपने दोनों हाथ के इशारे से मुझे अपनी तरफ हमला करने के लिए बुलाया।
मैं ये सोच कर गुस्से में आ गया कि वो मुझे किसी बच्चे की तरह पुचकार कर बुला रहा है। जैसे उसकी नज़र में मेरी कोई औकात ही न हो। मैं तेज़ी से आगे बढ़ा और उछल कर उसके ऊपर छलांग लगाया ही था कि वो बड़ी तेज़ी से अपनी जगह से हट गया जिससे मैं खाली ज़मीन पर गिर कर लुढ़कता चला गया। अभी मैं उठने ही लगा था कि उसके पैर की ठोकर मेरे पेट में पड़ी जिससे मैं दर्द से चीखते हुए दूर जा गिरा। मेरे पेट में उसके पैर का प्रहार बड़ा ज़ोर का हुआ था और इतने में ही मैं समझ गया था कि वो साया काफी ताकतवर है।
मैं दर्द को बरदास्त कर के फ़ौरन ही उठा और जैसे ही उसकी तरफ देखा तो मेरे चेहरे पर उसका ज़बरदस्त घूंसा पड़ा और मैं एक बार फिर से उछल कर ज़मीन पर जा गिरा। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मेरे जबड़े हिल गए हों। तभी मेरी नज़र उस पर पड़ी। वो बड़ी तेज़ी से मेरी तरफ आया और जैसे ही उसने अपना एक पैर उठा कर मुझ पर प्रहार किया तो मैं बड़ी तेज़ी से एक तरफ पलटा और झुक कर अपनी टांग उसके दूसरे पैर पर चला दी। परिणामस्वरूप साए का दूसरा पैर मेरी टांग लगते ही ज़मीन से हट गया और वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही मैं उछल कर उसके ऊपर आ गया मगर तभी उसने एक घूंसा मेरे चेहरे पर जड़ दिया और मैं एक तरफ को लहरा कर जा गिरा।
अभी मैं उठ ही रहा था कि उसने फिर से अपनी टांग घुमाई जिसे मैंने पकड़ लिया और उसकी टांग पकड़े ही मैं तेज़ी से खड़े हो कर उसे पूरी ताकत से उछाल दिया जिससे वो भरभरा कर ज़मीन पर गिर गया मगर गिरते ही वो बड़ी तेज़ी पलट गया। चांदनी रात थी इस लिए कोई समस्या नहीं थी किन्तु साया मेरी सोच से ज़्यादा फुर्तीला था और लड़ने के काफी दांव पेंच भी जानता था। जब तक मैं उसके क़रीब पंहुचा तब तक वो उछल कर खड़ा हो गया था।
मैं समझ गया था कि मेरा प्रतिद्वंदी मुझसे बिलकुल भी कमज़ोर नहीं है इस लिए मैं अब पूरी तरह से सतर्क हो गया था और कुछ सोचते हुए मैंने उसको मारने के लिए तेज़ी से हाथ चलाया तो वो झुक गया मगर यहीं पर उससे गलती हो गई। मैंने उसे मारने के लिए सिर्फ हाथ चलाने का उपक्रम किया था, वो मेरे वार से बचने के लिए झुक गया था और जैसे ही वो झुका तो मैंने अपने घुटने का वार ज़ोर से उसके माथे पर किया जिससे वो दर्द से बिलबिलाते हुए लहरा गया और इससे पहले कि वो सम्हलता मैंने उछल कर एक लात उसकी छाती पर मारी तो वो हिचकी लेते हुए धड़ाम से चित्त हो कर ज़मीन पर गिरा। इस बार वो जल्दी से उठा नहीं। मैं समझ गया कि उसकी छाती पर मेरा प्रहार बड़े ज़ोर का हुआ है जिससे वो शिथिल पड़ गया था।
अभी मैं उसके पेट पर लात मारने ही वाला था कि तभी दो तरफ से उसी के जैसे दो साए एकदम से आ गए। ये देख कर मैं चौंक पड़ा। उन सायों के हाथों में वैसे ही लट्ठ थे जैसे इस वाले साए के हाथ में था। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता एक साये ने अपना लट्ठ घुमा दिया जो सीधा मेरे बाजू में बड़े ज़ोर से लगा। मेरे हलक से दर्द में डूबी चीख निकल गई। तभी दूसरे वाले ने भी अपना लट्ठ घुमाया मगर ऐन वक़्त पर मैंने उसे लट्ठ घुमाते देख लिया था जिससे मैं फ़ौरन ही झुक गया था और उसका वार खाली चला गया था।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि ये दोनों साए कहां से आ गए थे और एकदम से मुझ पर हमला क्यों कर दिया था? मेरे बाजू में एक साए का लट्ठ लगा था जिससे मुझे बड़ा तेज़ दर्द हो रहा था। तभी मैंने देखा कि जिस साए से मैं पहले मुक़ाबला कर रहा था वो तेज़ी से उठा और एक ही जम्प में अपने लट्ठ को उठा लिया। उसे लट्ठ उठाते देख वो दोनों साए उसकी तरफ पलट गए और दोनों ने उस पर एक साथ हमला कर दिया। ये देख कर मैं फिर से चौंक पड़ा। उधर पहले वाला वो साया उन दोनों के हमलों का जवाब देने लगा था।
मैं उन दोनों सायों को पहले वाले साए के साथ इस तरह लड़ते देख काफी हैरान था। मुझे तो यही समझ में नहीं आ रहा था कि वो दोनों साए कहां से आ गए थे और जब वो दोनों मुझ पर हमला करने लगे थे तो वो पहले वाला साया उनसे कैसे भिड़ गया था। वातावरण में लट्ठ के टकराने की आवाज़ें गूँज रहीं थी। दोनों साए पहले वाले साए पर अपने अपने लट्ठ से वार करते जा रहे थे और पहला वाला साया उन दोनों के वार को बड़ी कुशलता से काटता जा रहा था। मैं कुछ देर तक भौचक्का सा खड़ा उन तीनों को लड़ते हुए देखता रहा उसके बाद मेरे ज़हन में अचानक ही ये ख़याल आया कि क्या मुझे इन तीनों के बीच में जाना चाहिए?
मैने ये साफ़ देखा था कि वो दोनों साए आते ही बिना कुछ बोले मुझ पर वार करने लगे थे लेकिन मैंने किसी तरह खुद को बचाया था और फिर उसके बाद पहले वाला साया उन दोनों से भीड़ गया था। इसका मतलब ये हुआ कि पहला वाला साया ये नहीं चाहता था कि वो दोनों साए मुझ पर हमला करें। अब सवाल था कि ऐसा क्यों? आख़िर पहला वाला साया ऐसा क्यों चाहता था और कौन था वो? बाद में ये जो दो साए आये हैं तो ये कौन हैं और इस तरह अचानक से मुझ पर हमला क्यों कर दिया था? तभी मुझे पहले वाले साए की कही बात याद आई, उसने कहा था कि अगर अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ। इसका मतलब वो इन्हीं दो सायों के बारे में ऐसा कह रहा था। इसका मतलब ये भी हुआ कि उसे पहले से पता था कि ये दोनों साए यहाँ आएंगे और मुझ पर हमला करेंगे। अब सवाल ये था कि पहले वाले साए को ये सब कैसे पता था? सोचते सोचते मेरा दिमाग़ चकराने लगा मगर कुछ समझ में नहीं आया मुझे।