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रास्ते में मैं डॉली के बारे में ही सोच रहा था। फिर मुझे रूपचन्द्र का ख़याल आया तो मैं सोचने लगा कि कितना हरामी था साला और जाने कब से मेरा पीछा कर रहा था। शुक्र था कि उसने सरोज काकी से मेरे सम्बन्धों की बात प्रदीप काका से नहीं बता दी थी वरना प्रदीप काका से मैं नज़रें ही नहीं मिला पाता। ख़ैर आज जो कुछ हुआ था और जो कुछ मैंने देखा सुना था उससे ये तो पता चल गया था कि मेरी फसल में आग लगाने वाला रूपचन्द्र ही था किन्तु उसकी बातों से ये भी पता चला था कि प्रदीप काका की हत्या उसने नहीं की थी। उसके अनुसार तो उसे खुद नहीं पता था कि प्रदीप काका की हत्या किसने की होगी बल्कि जब उसे ये पता चला था कि जगन काका अपने बड़े भाई की हत्या का आरोप मुझ पर लगा रहा था तो उसे इस बात से ख़ुशी ही हुई थी और उसने इस बात का फायदा उठाते हुए वही किया था जो मेरे दुश्मन को मेरे साथ करना चाहिए था। ख़ैर अब सवाल ये था कि प्रदीप काका की हत्या अगर रूपचन्द्र ने नहीं की थी तो किसने की होगी?
मैं एक ऐसा इंसान था जिसका हमेशा साहूकारों के लड़कों के साथ झगड़ा हो जाता था और उस झगड़े में साहूकारों के लड़के मेरे द्वारा पेल दिए जाते थे। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि साहूकारों ने मेरे निष्कासित कर दिए जाने का फायदा उठाया हो? उन्होंने मेरे चरित्र के बारे में सोच कर ही प्रदीप की हत्या कर दी हो और मुझे उस हत्या में फंसा दिया हो? ऐसा होने की संभावना बहुत थी लेकिन सिर्फ सम्भावनाओं से कुछ नहीं हो सकता था बल्कि किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए था। प्रदीप काका एक ऐसा इंसान था जो दारू या शराब भले ही पीता था मगर उसकी किसी से ऐसी दुश्मनी हरगिज़ नहीं थी कि कोई उसकी हत्या ही कर दे।
मेरे ज़हन में कई सारे सवाल थे जिनका जवाब मुझे चाहिए था। एक सवाल तो यही था कि पिछली शाम बगीचे में मिलने वाला वो साया कौन था और उसने दूसरे सायों से मेरी रक्षा क्यों की थी? उसे कैसे पता था कि मैं उस वक़्त बगीचे में था? क्या वो शुरू से ही मुझ पर नज़र रखे हुए था? अगर ऐसा था तो फिर उसने ये भी देखा होगा कि बगीचे में मैंने मुंशी की बहू रजनी के साथ सम्भोग किया था। इस ख़याल के उभरते ही मेरे बदन में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई। दूसरा सवाल ये था कि वो दूसरे साये कौन थे और उस वक़्त मुझे मारने क्यों आये थे? क्या वो मेरे जानी दुश्मन थे? पहले वाले साए को यकीनन ये पता था कि कोई मेरी जान का दुश्मन है इसी लिए वो उस वक़्त मेरे सामने आया था। अब सवाल ये है कि अगर उस साए को ये सब पता था तो उसने उन दोनों सायों को पकड़ा क्यों नहीं? उसने उनका पता क्यों नहीं लगाया? हलांकि उसने क्या किया होगा इसके बारे में भी फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता था। ख़ैर ऐसे कई सारे सवाल थे और मैंने सोच लिया था कि अब जब वो साया मुझे दुबारा मिलेगा तो मैं उससे ये सारे सवाल ज़रूर करुंगा और उससे इनके जवाब मागूंगा।
अपने गांव की सरहद पर आया तो देखा सड़क के दोनों तरफ खेतों में मजदूर फसल की कटाई में लगे हुए थे। हलांकि आज रंगो का त्यौहार था और हर कोई रंग खेलने में ही ब्यस्त होगा मगर इन मजदूरों के लिए जैसे कोई त्यौहार था ही नहीं। सड़क के दोनों तरफ हमारे ही खेत थे। मैं खेत की तरफ मुड़ कर एक मजदूर की तरफ बढ़ चला। कुछ ही पलों में जब मैं उस मजदूर के पास पंहुचा तो उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे पहचानते ही वो एकदम से खड़ा हो गया और फिर झुक कर मुझे सलाम किया।
"आज तो रंगो का त्यौहार है न काका?" मैंने उस मजदूर से कहा____"फिर तुम सब यहाँ खेतों की कटाई क्यों कर रहे हो? जाओ सब लोग और त्यौहार का आनंद लो।"
"हम सब लोग तो कल के दिन इस त्यौहार को मनाते हैं छोटे ठाकुर।" उस मजदूर ने कहा____"इसी लिए आज हम सब यहाँ खेतों में फसलों की कटाई कर रहे हैं। हलांकि दादा ठाकुर जी हम सबको आज के दिन छुट्टी दे रहे थे लेकिन जब हम लोगों ने उन्हें बताया कि हम लोग कल के दिन त्यौहार मनाएंगे तो वो बोले ठीक है फिर कल के दिन छुट्टी कर लेना।"
मुझे आया देख आस पास के बाकी मजदूर भी मेरे पास आ गए थे और मुझे झुक कर सलाम कर रहे थे। ख़ैर उस मजदूर की ये बात सुन कर मैंने उससे कहा कि ठीक है अगर ऐसी बात है तो फिर लगे रहो। तभी मेरे मन में सरोज काकी के खेतों की कटाई का ख़याल आया तो मैंने सोचा इन्हीं मजदूरों में से किन्हीं दो आदमियों को बोल देता हूं।
"अच्छा काका ये बताओ कि कल के दिन क्या तुम सब छुट्टी लोगे या कुछ लोग कटाई करने भी आएंगे यहाँ?" मैंने उस मजदूर से ये पूछा तो उसने कहा____"नहीं ऐसा तो नहीं है छोटे ठाकुर। कुछ लोग आज भी मनाते हैं ये त्यौहार इस लिए जो आज मनाते हैं वो आज यहाँ नहीं आये हैं बल्कि वो कल यहाँ आएंगे।"
"ठीक है फिर।" मैंने कहा____"मुझे कल के लिए तुमसे दो आदमी चाहिए काका। वो दो आदमी पास वाले गांव के प्रदीप काका के खेत की कटाई करेंगे। तुम सबको तो पता चल ही गया होगा कि कुछ दिनों पहले प्रदीप काका की किसी ने हत्या कर दी है। इस लिए ऐसे वक़्त में उनके घर वालों की मदद करना हमारा फ़र्ज़ है। पिछले चार महीने जब मैं निष्कासित किए जाने पर गांव से दूर उस बंज़र जगह पर रह रहा था तो प्रदीप काका ने मेरी बहुत मदद की थी। इस लिए ऐसे वक़्त में अगर मैं उनकी और उनके परिवार की मदद न करूं तो बहुत ही ग़लत होगा।"
"आपने सही कहा छोटे ठाकुर।" एक दूसरे मजदूर ने कहा____"हर इंसान को एक दूसरे की मदद करनी ही चाहिए। हमें बहुत अच्छा लगा कि आप प्रदीप की मदद करना चाहते हैं।"
"आप चिंता मत कीजिए छोटे ठाकुर।" पहले वाले मजदूर ने कहा____"मैं आज ही घर जा कर अपने दोनों बेटों को बोल दूंगा कि वो प्रदीप के खेतों पर जा कर उसकी फसल की कटाई करें।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा____"उन दोनों से कहना कि वो दोनों कल सुबह सुबह ही वह पहुंच जाएं। मैंने सरोज काकी को बोल दिया है कि मैं दो लोगों को कल सुबह उनकी फसल की कटाई के लिए भेज दूंगा।"
कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद मैं उन सभी मजदूरों से विदा ले कर वहां से चल दिया। अब मैं बेफिक्र था क्योंकि प्रदीप काका के खेतों की कटाई के लिए मैंने दो लोगों को भेज देने का इंतजाम कर दिया था। कुछ ही देर में मैं मुंशी के घर के पास पहुंच गया। मैं जानता था कि मुंशी अपने बेटे रघुवीर के साथ इस वक़्त हवेली पर ही होगा। आज के दिन हवेली में बड़ा ही ताम झाम होता था। हवेली में भांग घोटी जाती थी और हर कोई भांग पी कर मस्त हो जाता था। उसके बाद हर कोई रंग गुलाल खेलता था और एक तरफ फाग के गीत होते थे जो निचली जाति वाले छोटी छोटी डिग्गियां बजाते हुए बड़ी ख़ुशी से गाते थे।
मुंशी के घर पहुंच कर मैंने दरवाज़े की कुण्डी को पकड़ कर बजाया तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुल गया। मेरे सामने मुंशी की बहू रजनी खड़ी नज़र आई। उसके चेहरे पर रंग गुलाल लगा हुआ था और कुछ रंग उसके कपड़ों पर भी लगा हुआ था। मैं समझ गया कि गांव का ही उसका कोई देवर यहाँ आया होगा और उसने उसके साथ रंग खेला होगा। मुझे देखते ही रजनी के सुर्ख होठों पर दिलकश मुस्कान उभर आई।
"क्या बात है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"आज तो रजनी भौजी का चेहरा कुछ ज़्यादा ही लाल लाल हुआ नज़र आ रहा है।"
"वो तो नज़र आएगा ही।" रजनी ने बड़ी अदा से कहा____"आज हमारे कई देवर हमें रंग लगाने आये थे।"
"ये तो ग़लत बात है भौजी।" मैं भौजी इस लिए कह रहा था क्योंकि मुझे अंदेशा था कि प्रभा काकी अंदर कहीं पास में ही न हो और वो मेरी बातें सुन ले। ख़ैर मैंने आगे कहा_____"तुम पर तो सबसे पहला हक़ मेरा है। आख़िर मैं तुम्हारा सबसे अच्छा वाला देवर जो हूं और तुमने किसी ऐरे गैरे देवर से रंग लगवा लिया। रुको मैं काकी से शिकायत करता हूं इस बात की।"
मेरी बात सुन कर रजनी खिलखिला कर हंसते हुए एक तरफ हट गई तो मैं अंदर दाखिल हो गया। मैं अंदर आया तो रजनी ने दरवाज़ा अंदर से कुण्डी लगा कर बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद कर के वो पलटी तो मैंने उसे फ़ौरन ही दबोच लिया मगर फिर जल्दी ही उसे छोड़ भी दिया। उसके कपड़ो में रंग गुलाल लगा हुआ था जो मेरे कपड़ों में लग सकता था और काकी जब मुझे देखती तो वो समझ जाती कि मैं उसकी बहू से लिपटा रहा होऊंगा। हलांकि इसकी संभावना कम ही थी।
"क्या हुआ छोटे ठाकुर?" रजनी ने हैरानी से कहा____"मुझे अपनी बाहों में भरने के बाद इतना जल्दी छोड़ क्यों दिया? अरे! चिंता मत कीजिए माँ जी अंदर नहीं हैं। वो थोड़ी देर पहले ही उनके(रघुवीर) साथ हवेली चली गई हैं। इस वक्त मैं घर पर अकेली ही हूं।"
"ऐसी बात है क्या।" मैंने खुश हो कर उसे फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया____"फिर तो आज तुझे पूरा नंगा कर के तेरे पूरे बदन में रंग लगाऊंगा।"
"मैं तो सोच ही रही थी कि काश ऐसे वक़्त में आप यहाँ होते।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तो कितना मज़ा आता। ख़ैर लगता है भगवान ने मेरी फ़रियाद सुन ली है तभी तो आप आ गए हैं।"
"चल फिर अंदर।" मैंने रजनी को खुद से अलग करते हुए कहा____"मुझे क्या पता था कि तू इस वक़्त घर में अकेली होगी वरना मैं बहुत पहले ही आ जाता। ख़ैर कोई बात नहीं, अब जल्दी से अंदर चल मेरी जान। तुझे पूरा नंगा कर के पेलूंगा आज।"
मेरी बात सुन कर रजनी मुस्कुराते हुए अंदर की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे पीछे मैं भी होठों पर मुस्कान सजाए चल पड़ा था। रजनी मेरे आने से बड़ा खुश हो गई थी और इस वक़्त वो अपने चूतड़ों को मटका मटका कर चल रही थी, जैसे मुझे इशारा कर रही हो कि मैं लपक कर उसके गोल गोल चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में ले कर मसलने लगूं। मेरे लंड ने तो उसके चूतड़ों को देख कर ही अपना सिर उठा लिया था।
कुछ ही पलों में हम दोनों अंदर आँगन में आ गए। आँगन में जगह जगह रंग और गुलाल बिखरा पड़ा था। आँगन में एक तरफ खटिया रखी हुई थी। मैं आगे बढ़ कर उस खटिया में बैठ गया।
"चल अब पूरी तरह नंगी हो जा मेरी जान।" फिर मैंने रजनी की तरफ देखते हुए कहा____"आज खिली धूप में मैं तेरे नंगे बदन को देखूंगा और फिर मेरा जो मन करेगा वो करुंगा।"
"आज आपके इरादे मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहे छोटे ठाकुर।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा____"तुझ जैसी माल को देख कर किसी के भी इरादे ठीक नहीं हो सकते मेरी जान। चल अब देर न कर। जल्दी से अपने कपड़े उतार।"
मैं एक ऐसा इंसान था जिसका हमेशा साहूकारों के लड़कों के साथ झगड़ा हो जाता था और उस झगड़े में साहूकारों के लड़के मेरे द्वारा पेल दिए जाते थे। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि साहूकारों ने मेरे निष्कासित कर दिए जाने का फायदा उठाया हो? उन्होंने मेरे चरित्र के बारे में सोच कर ही प्रदीप की हत्या कर दी हो और मुझे उस हत्या में फंसा दिया हो? ऐसा होने की संभावना बहुत थी लेकिन सिर्फ सम्भावनाओं से कुछ नहीं हो सकता था बल्कि किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए था। प्रदीप काका एक ऐसा इंसान था जो दारू या शराब भले ही पीता था मगर उसकी किसी से ऐसी दुश्मनी हरगिज़ नहीं थी कि कोई उसकी हत्या ही कर दे।
मेरे ज़हन में कई सारे सवाल थे जिनका जवाब मुझे चाहिए था। एक सवाल तो यही था कि पिछली शाम बगीचे में मिलने वाला वो साया कौन था और उसने दूसरे सायों से मेरी रक्षा क्यों की थी? उसे कैसे पता था कि मैं उस वक़्त बगीचे में था? क्या वो शुरू से ही मुझ पर नज़र रखे हुए था? अगर ऐसा था तो फिर उसने ये भी देखा होगा कि बगीचे में मैंने मुंशी की बहू रजनी के साथ सम्भोग किया था। इस ख़याल के उभरते ही मेरे बदन में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई। दूसरा सवाल ये था कि वो दूसरे साये कौन थे और उस वक़्त मुझे मारने क्यों आये थे? क्या वो मेरे जानी दुश्मन थे? पहले वाले साए को यकीनन ये पता था कि कोई मेरी जान का दुश्मन है इसी लिए वो उस वक़्त मेरे सामने आया था। अब सवाल ये है कि अगर उस साए को ये सब पता था तो उसने उन दोनों सायों को पकड़ा क्यों नहीं? उसने उनका पता क्यों नहीं लगाया? हलांकि उसने क्या किया होगा इसके बारे में भी फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता था। ख़ैर ऐसे कई सारे सवाल थे और मैंने सोच लिया था कि अब जब वो साया मुझे दुबारा मिलेगा तो मैं उससे ये सारे सवाल ज़रूर करुंगा और उससे इनके जवाब मागूंगा।
अपने गांव की सरहद पर आया तो देखा सड़क के दोनों तरफ खेतों में मजदूर फसल की कटाई में लगे हुए थे। हलांकि आज रंगो का त्यौहार था और हर कोई रंग खेलने में ही ब्यस्त होगा मगर इन मजदूरों के लिए जैसे कोई त्यौहार था ही नहीं। सड़क के दोनों तरफ हमारे ही खेत थे। मैं खेत की तरफ मुड़ कर एक मजदूर की तरफ बढ़ चला। कुछ ही पलों में जब मैं उस मजदूर के पास पंहुचा तो उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे पहचानते ही वो एकदम से खड़ा हो गया और फिर झुक कर मुझे सलाम किया।
"आज तो रंगो का त्यौहार है न काका?" मैंने उस मजदूर से कहा____"फिर तुम सब यहाँ खेतों की कटाई क्यों कर रहे हो? जाओ सब लोग और त्यौहार का आनंद लो।"
"हम सब लोग तो कल के दिन इस त्यौहार को मनाते हैं छोटे ठाकुर।" उस मजदूर ने कहा____"इसी लिए आज हम सब यहाँ खेतों में फसलों की कटाई कर रहे हैं। हलांकि दादा ठाकुर जी हम सबको आज के दिन छुट्टी दे रहे थे लेकिन जब हम लोगों ने उन्हें बताया कि हम लोग कल के दिन त्यौहार मनाएंगे तो वो बोले ठीक है फिर कल के दिन छुट्टी कर लेना।"
मुझे आया देख आस पास के बाकी मजदूर भी मेरे पास आ गए थे और मुझे झुक कर सलाम कर रहे थे। ख़ैर उस मजदूर की ये बात सुन कर मैंने उससे कहा कि ठीक है अगर ऐसी बात है तो फिर लगे रहो। तभी मेरे मन में सरोज काकी के खेतों की कटाई का ख़याल आया तो मैंने सोचा इन्हीं मजदूरों में से किन्हीं दो आदमियों को बोल देता हूं।
"अच्छा काका ये बताओ कि कल के दिन क्या तुम सब छुट्टी लोगे या कुछ लोग कटाई करने भी आएंगे यहाँ?" मैंने उस मजदूर से ये पूछा तो उसने कहा____"नहीं ऐसा तो नहीं है छोटे ठाकुर। कुछ लोग आज भी मनाते हैं ये त्यौहार इस लिए जो आज मनाते हैं वो आज यहाँ नहीं आये हैं बल्कि वो कल यहाँ आएंगे।"
"ठीक है फिर।" मैंने कहा____"मुझे कल के लिए तुमसे दो आदमी चाहिए काका। वो दो आदमी पास वाले गांव के प्रदीप काका के खेत की कटाई करेंगे। तुम सबको तो पता चल ही गया होगा कि कुछ दिनों पहले प्रदीप काका की किसी ने हत्या कर दी है। इस लिए ऐसे वक़्त में उनके घर वालों की मदद करना हमारा फ़र्ज़ है। पिछले चार महीने जब मैं निष्कासित किए जाने पर गांव से दूर उस बंज़र जगह पर रह रहा था तो प्रदीप काका ने मेरी बहुत मदद की थी। इस लिए ऐसे वक़्त में अगर मैं उनकी और उनके परिवार की मदद न करूं तो बहुत ही ग़लत होगा।"
"आपने सही कहा छोटे ठाकुर।" एक दूसरे मजदूर ने कहा____"हर इंसान को एक दूसरे की मदद करनी ही चाहिए। हमें बहुत अच्छा लगा कि आप प्रदीप की मदद करना चाहते हैं।"
"आप चिंता मत कीजिए छोटे ठाकुर।" पहले वाले मजदूर ने कहा____"मैं आज ही घर जा कर अपने दोनों बेटों को बोल दूंगा कि वो प्रदीप के खेतों पर जा कर उसकी फसल की कटाई करें।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा____"उन दोनों से कहना कि वो दोनों कल सुबह सुबह ही वह पहुंच जाएं। मैंने सरोज काकी को बोल दिया है कि मैं दो लोगों को कल सुबह उनकी फसल की कटाई के लिए भेज दूंगा।"
कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद मैं उन सभी मजदूरों से विदा ले कर वहां से चल दिया। अब मैं बेफिक्र था क्योंकि प्रदीप काका के खेतों की कटाई के लिए मैंने दो लोगों को भेज देने का इंतजाम कर दिया था। कुछ ही देर में मैं मुंशी के घर के पास पहुंच गया। मैं जानता था कि मुंशी अपने बेटे रघुवीर के साथ इस वक़्त हवेली पर ही होगा। आज के दिन हवेली में बड़ा ही ताम झाम होता था। हवेली में भांग घोटी जाती थी और हर कोई भांग पी कर मस्त हो जाता था। उसके बाद हर कोई रंग गुलाल खेलता था और एक तरफ फाग के गीत होते थे जो निचली जाति वाले छोटी छोटी डिग्गियां बजाते हुए बड़ी ख़ुशी से गाते थे।
मुंशी के घर पहुंच कर मैंने दरवाज़े की कुण्डी को पकड़ कर बजाया तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुल गया। मेरे सामने मुंशी की बहू रजनी खड़ी नज़र आई। उसके चेहरे पर रंग गुलाल लगा हुआ था और कुछ रंग उसके कपड़ों पर भी लगा हुआ था। मैं समझ गया कि गांव का ही उसका कोई देवर यहाँ आया होगा और उसने उसके साथ रंग खेला होगा। मुझे देखते ही रजनी के सुर्ख होठों पर दिलकश मुस्कान उभर आई।
"क्या बात है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"आज तो रजनी भौजी का चेहरा कुछ ज़्यादा ही लाल लाल हुआ नज़र आ रहा है।"
"वो तो नज़र आएगा ही।" रजनी ने बड़ी अदा से कहा____"आज हमारे कई देवर हमें रंग लगाने आये थे।"
"ये तो ग़लत बात है भौजी।" मैं भौजी इस लिए कह रहा था क्योंकि मुझे अंदेशा था कि प्रभा काकी अंदर कहीं पास में ही न हो और वो मेरी बातें सुन ले। ख़ैर मैंने आगे कहा_____"तुम पर तो सबसे पहला हक़ मेरा है। आख़िर मैं तुम्हारा सबसे अच्छा वाला देवर जो हूं और तुमने किसी ऐरे गैरे देवर से रंग लगवा लिया। रुको मैं काकी से शिकायत करता हूं इस बात की।"
मेरी बात सुन कर रजनी खिलखिला कर हंसते हुए एक तरफ हट गई तो मैं अंदर दाखिल हो गया। मैं अंदर आया तो रजनी ने दरवाज़ा अंदर से कुण्डी लगा कर बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद कर के वो पलटी तो मैंने उसे फ़ौरन ही दबोच लिया मगर फिर जल्दी ही उसे छोड़ भी दिया। उसके कपड़ो में रंग गुलाल लगा हुआ था जो मेरे कपड़ों में लग सकता था और काकी जब मुझे देखती तो वो समझ जाती कि मैं उसकी बहू से लिपटा रहा होऊंगा। हलांकि इसकी संभावना कम ही थी।
"क्या हुआ छोटे ठाकुर?" रजनी ने हैरानी से कहा____"मुझे अपनी बाहों में भरने के बाद इतना जल्दी छोड़ क्यों दिया? अरे! चिंता मत कीजिए माँ जी अंदर नहीं हैं। वो थोड़ी देर पहले ही उनके(रघुवीर) साथ हवेली चली गई हैं। इस वक्त मैं घर पर अकेली ही हूं।"
"ऐसी बात है क्या।" मैंने खुश हो कर उसे फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया____"फिर तो आज तुझे पूरा नंगा कर के तेरे पूरे बदन में रंग लगाऊंगा।"
"मैं तो सोच ही रही थी कि काश ऐसे वक़्त में आप यहाँ होते।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तो कितना मज़ा आता। ख़ैर लगता है भगवान ने मेरी फ़रियाद सुन ली है तभी तो आप आ गए हैं।"
"चल फिर अंदर।" मैंने रजनी को खुद से अलग करते हुए कहा____"मुझे क्या पता था कि तू इस वक़्त घर में अकेली होगी वरना मैं बहुत पहले ही आ जाता। ख़ैर कोई बात नहीं, अब जल्दी से अंदर चल मेरी जान। तुझे पूरा नंगा कर के पेलूंगा आज।"
मेरी बात सुन कर रजनी मुस्कुराते हुए अंदर की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे पीछे मैं भी होठों पर मुस्कान सजाए चल पड़ा था। रजनी मेरे आने से बड़ा खुश हो गई थी और इस वक़्त वो अपने चूतड़ों को मटका मटका कर चल रही थी, जैसे मुझे इशारा कर रही हो कि मैं लपक कर उसके गोल गोल चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में ले कर मसलने लगूं। मेरे लंड ने तो उसके चूतड़ों को देख कर ही अपना सिर उठा लिया था।
कुछ ही पलों में हम दोनों अंदर आँगन में आ गए। आँगन में जगह जगह रंग और गुलाल बिखरा पड़ा था। आँगन में एक तरफ खटिया रखी हुई थी। मैं आगे बढ़ कर उस खटिया में बैठ गया।
"चल अब पूरी तरह नंगी हो जा मेरी जान।" फिर मैंने रजनी की तरफ देखते हुए कहा____"आज खिली धूप में मैं तेरे नंगे बदन को देखूंगा और फिर मेरा जो मन करेगा वो करुंगा।"
"आज आपके इरादे मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहे छोटे ठाकुर।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा____"तुझ जैसी माल को देख कर किसी के भी इरादे ठीक नहीं हो सकते मेरी जान। चल अब देर न कर। जल्दी से अपने कपड़े उतार।"