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"ताहिरा के साथ शादी के बाद मेरी अगर दो ही औलाद हुई तो उन में से एक उस जलूस में शामिल होगा जो कश्मीर को इंडिया का ही हिस्सा मानता है और दूसरा उसके खिलाफ़ नारे लगाता रहेगा।" यह था करन का जवाब जब उस को पूछा गया कि कश्मीर के मसले को लेकर उनकी आनेवाली पीढ़ी किस का साथ देगी? माँ का या बाप का?
लेख के मुताबिक ताहिरा के हिन्दू पिता अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़माने में रायसाहिब थे और मुसलमान माँ एक मशहूर रेडिओ सिंगर।
लेख के आखिरी हिस्से में कहा गया था कि शादी के बाद लंदन आना करन और ताहिरा की ज़रूरत नहीं, मजबूरी थी। दिल्ली या कश्मीर में रहने पर उन दोनों के परिवारों को कट्टर मज़हबी लोग नुकसान पहुँचा सकते थे।
गैर मुल्की रस्मों–रिवाज़ों के बारे में अपनी जानकारी जताते हुए लिखने वाले ने यह भी कहा कि हिंदू घरों में शादी के बाद दुल्हनें अपने ससुराल में रहती हैं और मायके वाले उन्हें दान में दे देते हैं।
"ताहिरा का भी कन्यादान हुआ। दिल्ली की एक छोटी सी कचहरी में एक सादी सी सिविल मैरेज के बाद उसका कन्यादान किया दिल्ली के जाने माने मैजिस्ट्रेट गोपाल मलिक ने। ताहिरा के हिंदू पिता गोपाल के भी पिता थे। गोपाल की हिंदू माँ उनके पिता की ब्याहता पत्नी थी। और ताहिरा की मुसलमान माँ?
उनकी कोई शादी नहीं हुई।"
••••
ताहिरा और करन को क्लीवर विलेज में रहते करीबन छह महीने हो गए थे। रॉयल बोरोह ऑफ़ विंडसर की इस सबसे पुरानी बस्ती का नाम कभी क्लिफवेअर था शायद यानि कि पहाड़ी के रहने वाले। ज्यादातर सपाट धरातल वाले क्लेवर विलेज की पहाड़ियाँ वक्त ने कब और कैसे ज़मीन में छिपा दीं, यह तो यकीनन कोई नहीं जानता। बस कुछ पुराने घराने वालों का कहना है कि विंडसर कैसल उनके पुरखों की आँखों के सामने बना था। उस इलाके मे मीलों तक बाढ़ जैसा उमड़ता थेम्स दरिया तब भी कुछ दूर तक एक काफी चौड़ी सी गली बन कर बहता था। वहीं बस गया था क्लीवर विलेज। उन दिनों न कोई रेल की पटरी थी, न ही दरया पार करने का पुल। सिपाही, व्यापारी, कारीगर तंग दरिया पार करके इस किनारे से उस किनारे जाते थे।
क्लीवर विलेज वाले किनारे पर खड़े होकर जब ताहिरा ने पहली बार विंडसर कैसल को देखा तो कई बार निगाहें इधर उधर घुमाने के बाद भी पूरा नज़ारा एक साथ न देख पाई।
दूर दूर तक उठती गिरती लहरों से खींचा थेमस दरिया का हाशिया। हाशिये से उपर उठती घने पेड़ों की कद्दावर मेहराबें। मेहराबों से बहुत ऊपर उठती ठोस पत्थरों की दीवार और दीवार के सिर पर पहना कढ़ावदार बुर्जियों, उभरते गुम्बदों और तीखे तर्राशे स्टीपलस् का बुलंद बेमिसाल ताज। ईंट, पत्थर, गारा, चूना, मिट्टी की उम्रे दराज़ी की ज़िंदा दास्तान।
ताहिरा जब भी यह नज़ारा देखती तो सोचती कि अगर दुनिया में पुराने किलों की कोई बिरादरी होती तो विंडसर कैसल बेचारा कितना अकेला होता। खंड़हरों और तारीख़ी इमारतों के बड़े से हजूम में बसा–बसाया किला। लेकिन बेचारा क्यों होता मगरूर होता वो तो अभी तक उन्हीं बादशाहों और मलकाओं की रिहायश है जिनके पुरखों ने उसे बनवाया था।
ताहिरा इस किनारे पर खड़े होकर उस किनारे पर बसे विंडसर कैसल को बार बार देखने आती। छोटा रास्ता लेती तो पंद्रह मिनट भी न लगते। लेकिन वो जब भी आती, एक नए रास्ते चल कर पहुँचती। कभी इंग्लिश समर की गुदगुदी धूप सेंकते कॉटेजेस के पिछवाड़ों में लगे बेशुमार गुलाबों के रंग पहचानती हुई, कभी अभी अभी बरस के थमी बरसात से धुले छोटे गिरजा घर की सरहदी हेज के यूज़् की पत्तियों की कतरन को सँवारती हुई, कभी सूखे पत्तों के कालीन पर अपने कदमों के चरमरी शोर के लिए ख़ामोश माफ़ी माँगती हुई और कुछ एक बार चर्चयार्ड की शुमाली दीवार के पास बनी एक कब्र को देखकर अपने हाथों की अँगुलियों को एक एक करके खींचती हुई।
किसी मेरी एैन हल्ल की कब्र थी जो अठारह साल तक मलका विक्टोरिया के बच्चों की नैनी रही थीं। उन सभी शहज़ादे, शहज़ादियों ने कब्र के उपर एक सिल में अपने नाम खुदवा कर उसके लिए अपने प्यार को पत्थर में लिख दिया था। ताहिरा ने वो नाम कभी नहीं पढ़े। उसकी नज़र बस देर तक उस क्रास पर टिकी रहती जो कब्र से उठकर एक बेहद बारीकी से खुदे हुए खजूर के पत्ते की शक्ल इख्तयार कर लेता था। ताहिरा अपनी अँगुलियाँ उस खुदे हुए पत्ते पर फिराती तो उसे लगता कि उसकी रगों में से किसी छोटे से बरतन में से छलक कर पानी की कुछ बूँदें उसकी हथेलियाँ गीली कर देती हैं। पैरों को नम हाथों से पुंछवा देती हैं। उसकी अँगुलियों के नम पोर कुछ छूना चाहते हैं, कुछ ऐसा जिसे वह गूँथ सके, सँवार दे, सजा सके, निखार दे। जो सब के बीच होता हुआ भी सबसे अलग हो।
केअरटेकर की हैसियत से रहने के लिए क्लीवर विलेज में जो घर करन को मिल गया था, उसके न आगे किसी मलबा फेंकने की हौदी थी, न पीछे कोई आम रास्ता। पाँचों कमरों में हर एक की अलग सजावट। चमकती लकड़ी के फ़र्श पर जहाँ तहाँ बिछे बेशकीमती छोटे बड़े कालीन। ऊँची चौड़ी साफ़ सुथरी शीशे की खिड़कियों के आगे महीन और मोटे दुहरे परदे। तपी गेरूआ ईंटों की फ़ायरप्लेस में सूखी साफ़ लकड़ियों का छोटा सा गठ्ठर, तहा के रखे बुरदार तौलिये, बिना सिलवट के चादरों और सिरहानों के गिलाफ़ों की सजी सजाई ढेरियाँ।
ताहिरा ने एक दिन लिविंग रूम के कोने वाली गोल मेज़ पर रखा बोन चायना का बड़ा सा नाजुक गुलदान उठा कर कमरे के बीचों बीच पड़ी कॉफ़ी टेबल पर सजा दिया। मेज़ के नीचे वाले हिस्से पर बिखरी रंग बिरंगी भारी जिल्दों वाली कला की किताबों को सहेज कर मेज़ के उपर रखना ही चाहती थी कि गुलदान ने निहायत तहज़ीब से टोक दिया।
"माफ़ कीजिएगा मैडम। किसी भारी सी किताब के साथ इत्तफ़ाकन छू जाने का खतरा मुझे परेशान करता रहेगा। वैसे भी कौन जाने कब कोई कॉफ़ी उँडेलता हुआ हाथ ज़रा सा काँप जाए? और मुझे उसकी गरम बूँदों के छालों से झुलसना पड़े?"
बॅकयार्ड में सुखाई धुली हुई चादरों को तहा कर अलमारी में रखने वाली थी कि एक मुलायम इल्तज़ा हुई।
"अगर आप बुरा न माने तो एक गुज़ारिश है मेरी। एक दो मिनट का अपना कीमती वक्त मुझे देकर आप मेरी सलवटें निकाल देंगी क्या? आज बाहर धूप में कोई खास गरमी नहीं थी। इस्त्री करने वाला फ़ोल्डिंग बोर्ड वहाँ लांड्री रूम की दीवार से टँगा हुआ है, ये तो आप जानती ही हैं।"
लकड़ी के फ़र्श पर उसके हाथ से छूट कर एक टमाटर गिर गया था जो उसी के पाँव के नीचे आकर कुचला गया। जब वो फ़र्श पोंछने के लिए किचन टॉवेल गीला करके लाई तो लकड़ी का तख्ता कराह दिया।
लेख के मुताबिक ताहिरा के हिन्दू पिता अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़माने में रायसाहिब थे और मुसलमान माँ एक मशहूर रेडिओ सिंगर।
लेख के आखिरी हिस्से में कहा गया था कि शादी के बाद लंदन आना करन और ताहिरा की ज़रूरत नहीं, मजबूरी थी। दिल्ली या कश्मीर में रहने पर उन दोनों के परिवारों को कट्टर मज़हबी लोग नुकसान पहुँचा सकते थे।
गैर मुल्की रस्मों–रिवाज़ों के बारे में अपनी जानकारी जताते हुए लिखने वाले ने यह भी कहा कि हिंदू घरों में शादी के बाद दुल्हनें अपने ससुराल में रहती हैं और मायके वाले उन्हें दान में दे देते हैं।
"ताहिरा का भी कन्यादान हुआ। दिल्ली की एक छोटी सी कचहरी में एक सादी सी सिविल मैरेज के बाद उसका कन्यादान किया दिल्ली के जाने माने मैजिस्ट्रेट गोपाल मलिक ने। ताहिरा के हिंदू पिता गोपाल के भी पिता थे। गोपाल की हिंदू माँ उनके पिता की ब्याहता पत्नी थी। और ताहिरा की मुसलमान माँ?
उनकी कोई शादी नहीं हुई।"
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ताहिरा और करन को क्लीवर विलेज में रहते करीबन छह महीने हो गए थे। रॉयल बोरोह ऑफ़ विंडसर की इस सबसे पुरानी बस्ती का नाम कभी क्लिफवेअर था शायद यानि कि पहाड़ी के रहने वाले। ज्यादातर सपाट धरातल वाले क्लेवर विलेज की पहाड़ियाँ वक्त ने कब और कैसे ज़मीन में छिपा दीं, यह तो यकीनन कोई नहीं जानता। बस कुछ पुराने घराने वालों का कहना है कि विंडसर कैसल उनके पुरखों की आँखों के सामने बना था। उस इलाके मे मीलों तक बाढ़ जैसा उमड़ता थेम्स दरिया तब भी कुछ दूर तक एक काफी चौड़ी सी गली बन कर बहता था। वहीं बस गया था क्लीवर विलेज। उन दिनों न कोई रेल की पटरी थी, न ही दरया पार करने का पुल। सिपाही, व्यापारी, कारीगर तंग दरिया पार करके इस किनारे से उस किनारे जाते थे।
क्लीवर विलेज वाले किनारे पर खड़े होकर जब ताहिरा ने पहली बार विंडसर कैसल को देखा तो कई बार निगाहें इधर उधर घुमाने के बाद भी पूरा नज़ारा एक साथ न देख पाई।
दूर दूर तक उठती गिरती लहरों से खींचा थेमस दरिया का हाशिया। हाशिये से उपर उठती घने पेड़ों की कद्दावर मेहराबें। मेहराबों से बहुत ऊपर उठती ठोस पत्थरों की दीवार और दीवार के सिर पर पहना कढ़ावदार बुर्जियों, उभरते गुम्बदों और तीखे तर्राशे स्टीपलस् का बुलंद बेमिसाल ताज। ईंट, पत्थर, गारा, चूना, मिट्टी की उम्रे दराज़ी की ज़िंदा दास्तान।
ताहिरा जब भी यह नज़ारा देखती तो सोचती कि अगर दुनिया में पुराने किलों की कोई बिरादरी होती तो विंडसर कैसल बेचारा कितना अकेला होता। खंड़हरों और तारीख़ी इमारतों के बड़े से हजूम में बसा–बसाया किला। लेकिन बेचारा क्यों होता मगरूर होता वो तो अभी तक उन्हीं बादशाहों और मलकाओं की रिहायश है जिनके पुरखों ने उसे बनवाया था।
ताहिरा इस किनारे पर खड़े होकर उस किनारे पर बसे विंडसर कैसल को बार बार देखने आती। छोटा रास्ता लेती तो पंद्रह मिनट भी न लगते। लेकिन वो जब भी आती, एक नए रास्ते चल कर पहुँचती। कभी इंग्लिश समर की गुदगुदी धूप सेंकते कॉटेजेस के पिछवाड़ों में लगे बेशुमार गुलाबों के रंग पहचानती हुई, कभी अभी अभी बरस के थमी बरसात से धुले छोटे गिरजा घर की सरहदी हेज के यूज़् की पत्तियों की कतरन को सँवारती हुई, कभी सूखे पत्तों के कालीन पर अपने कदमों के चरमरी शोर के लिए ख़ामोश माफ़ी माँगती हुई और कुछ एक बार चर्चयार्ड की शुमाली दीवार के पास बनी एक कब्र को देखकर अपने हाथों की अँगुलियों को एक एक करके खींचती हुई।
किसी मेरी एैन हल्ल की कब्र थी जो अठारह साल तक मलका विक्टोरिया के बच्चों की नैनी रही थीं। उन सभी शहज़ादे, शहज़ादियों ने कब्र के उपर एक सिल में अपने नाम खुदवा कर उसके लिए अपने प्यार को पत्थर में लिख दिया था। ताहिरा ने वो नाम कभी नहीं पढ़े। उसकी नज़र बस देर तक उस क्रास पर टिकी रहती जो कब्र से उठकर एक बेहद बारीकी से खुदे हुए खजूर के पत्ते की शक्ल इख्तयार कर लेता था। ताहिरा अपनी अँगुलियाँ उस खुदे हुए पत्ते पर फिराती तो उसे लगता कि उसकी रगों में से किसी छोटे से बरतन में से छलक कर पानी की कुछ बूँदें उसकी हथेलियाँ गीली कर देती हैं। पैरों को नम हाथों से पुंछवा देती हैं। उसकी अँगुलियों के नम पोर कुछ छूना चाहते हैं, कुछ ऐसा जिसे वह गूँथ सके, सँवार दे, सजा सके, निखार दे। जो सब के बीच होता हुआ भी सबसे अलग हो।
केअरटेकर की हैसियत से रहने के लिए क्लीवर विलेज में जो घर करन को मिल गया था, उसके न आगे किसी मलबा फेंकने की हौदी थी, न पीछे कोई आम रास्ता। पाँचों कमरों में हर एक की अलग सजावट। चमकती लकड़ी के फ़र्श पर जहाँ तहाँ बिछे बेशकीमती छोटे बड़े कालीन। ऊँची चौड़ी साफ़ सुथरी शीशे की खिड़कियों के आगे महीन और मोटे दुहरे परदे। तपी गेरूआ ईंटों की फ़ायरप्लेस में सूखी साफ़ लकड़ियों का छोटा सा गठ्ठर, तहा के रखे बुरदार तौलिये, बिना सिलवट के चादरों और सिरहानों के गिलाफ़ों की सजी सजाई ढेरियाँ।
ताहिरा ने एक दिन लिविंग रूम के कोने वाली गोल मेज़ पर रखा बोन चायना का बड़ा सा नाजुक गुलदान उठा कर कमरे के बीचों बीच पड़ी कॉफ़ी टेबल पर सजा दिया। मेज़ के नीचे वाले हिस्से पर बिखरी रंग बिरंगी भारी जिल्दों वाली कला की किताबों को सहेज कर मेज़ के उपर रखना ही चाहती थी कि गुलदान ने निहायत तहज़ीब से टोक दिया।
"माफ़ कीजिएगा मैडम। किसी भारी सी किताब के साथ इत्तफ़ाकन छू जाने का खतरा मुझे परेशान करता रहेगा। वैसे भी कौन जाने कब कोई कॉफ़ी उँडेलता हुआ हाथ ज़रा सा काँप जाए? और मुझे उसकी गरम बूँदों के छालों से झुलसना पड़े?"
बॅकयार्ड में सुखाई धुली हुई चादरों को तहा कर अलमारी में रखने वाली थी कि एक मुलायम इल्तज़ा हुई।
"अगर आप बुरा न माने तो एक गुज़ारिश है मेरी। एक दो मिनट का अपना कीमती वक्त मुझे देकर आप मेरी सलवटें निकाल देंगी क्या? आज बाहर धूप में कोई खास गरमी नहीं थी। इस्त्री करने वाला फ़ोल्डिंग बोर्ड वहाँ लांड्री रूम की दीवार से टँगा हुआ है, ये तो आप जानती ही हैं।"
लकड़ी के फ़र्श पर उसके हाथ से छूट कर एक टमाटर गिर गया था जो उसी के पाँव के नीचे आकर कुचला गया। जब वो फ़र्श पोंछने के लिए किचन टॉवेल गीला करके लाई तो लकड़ी का तख्ता कराह दिया।