• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
भाग - 4

मनुष्य के भीतर की वस्तु को पहिचान कर उसके न्याय-विचार का भार अन्तर्यामी भगवान के ऊपर न छोड़कर मनुष्य जब स्वयं उसे अपने ही ऊपर लेकर कहता है 'मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, यह कार्य मेरे द्वारा कदापि न होता, वह काम तो मैं मर जाने पर भी न करता', आदि- तब ये बातें सुनकर मुझे शर्म आए बिना नहीं रहती। और फिर केवल अपने मन के ही सम्बन्ध में नहीं, दूसरों के सम्बन्ध में भी, मैं देखता हूँ, कि मनुष्य के अहंकार का मानो अन्त ही नहीं, है। एक दफे समालोचकों के लेखों को पढ़कर देखे, बिना हँसे रहा ही नहीं जाता। कवि को अतिक्रम करके वे काव्य के मनुष्य को चीन्ह लेते हैं और जोर के साथ कहते हैं, ''यह चरित्र किसी तरह भी वैसा नहीं हो सकता- वह चरित्र कभी वैसा नहीं कर सकता,'' ऐसी और कितनी ही बातें हैं। लोग वाहवाही देकर कहते हैं, ''वाह इसी को तो कहते हैं क्रिटिसिजम! इसी को तो कहते हैं चरित्र-समालोचना! सच, ही तो कहा! अमुक समालोचक के होते हुए चाहे जो कुछ लिख देने से कैसे चल सकता है! देखो, पुस्तक में जो अंटसंट भूलें और भ्रान्तियाँ थीं की सभी किस तरह छान-बीनकर रख दी गयी है!'' सो रख देने दो। भूल भला किससे नहीं होती? किन्तु, फिर भी तो मैं अपने जीवन की आलोचना करके- यह सब पढ़कर, उन लोगों की लज्जा के मारे अपना सिर ऊपर नहीं उठा सकता। मन ही मन कहता हूँ, ''हाय रे दुर्भाग्य! यह जो कहा जाता है कि मनुष्य की अन्तर की वस्तु अनन्त है सो क्या केवल कहने- भर की बात है! दम्भ प्रकट करने के समय क्या इसकी कानी कौड़ी की भी कीमत नहीं है? तुम्हारे कोटि जन्मों के न जाने कितने असंख्य कोटि अद्भुत व्यापार इस अनन्त में मग्न रह सकते हैं और एकाएक जागरित होकर तुम्हारी बहुज्ञता, तुम्हारा पढ़ना-लिखना, तुम्हारी विद्वता, और तुम्हारे मनुष्य की जाँच करने के क्षुद्र ज्ञान-भण्डार को एक मुहूर्त में चूर्ण कर सकते हैं, यह बात क्या एक दफा भी तुम्हारे मन में नहीं आती- यह भी क्या तुम नहीं समझ सकते कि, यह सीमाहीन आत्मा का आसन है?''

यही तो मैंने अन्ना जीजी में अपनी ऑंखों देखा है। उनकी उज्ज्वल दिव्य मूर्ति इस समय तक भी तो नहीं भूली; जीजी जब चली गयी तब न जाने कितनी गम्भीर स्तब्ध रात्रियों में ऑंखों के पानी से मेरा तकिया भीग गया है, और मन ही मन मैंने कहा है कि जीजी, मुझे अपने लिए अब और कुछ सोच नहीं है, तुम्हारे पारस-मणि के स्पर्श से मेरे अन्तर-बाहिर का समस्त लोहा सोना हो गया है। अब कहीं किसी भी तरह की आबोहवा की दुष्टता से जंग लगकर उसके क्षय होने का डर नहीं है; परन्तु कहाँ गयी तुम जीजी? जीजी, और किसी को भी मैं अपने इस सौभाग्य का हिस्सा नहीं दे सका, और कोई भी तुम्हें नहीं देख पाया! अन्यथा तुम्हारा दर्शन पाकर प्रत्येक उपस्थित व्यक्ति सच्चरित्र साधु हो जाता, इसमें मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं है। यह किस तरह सम्भव हो सकता है, इस बात को लेकर मैं उस समय बच्चों की-सी कल्पनाओं में सारी रात जागकर बिता देता था। कभी मन में आता, कि देवी चौधुरानी के समान यदि कहीं से मैं सात घड़े मुहरें पा जाऊँ तो अन्नदा जीजी को एक बड़े भारी सिंहासन पर बैठा दूँ, जंगल काटकर, जगह साफ करके, देश के लोगों को बुलाऊँ और उन्हें उनके सिंहासन के चारों ओर बसा दूँ। कभी सोचता, एक बड़े भारी बजरे में उन्हें विराजमान करके बैंड बजाता हुआ उन्हें देश-विदेश में लिये फिरूँ। इसी तरह न जाने कितने विलक्षण आकाश-कुसुमों की मैं मालाएँ गूँथता रहता, इस समय उन्हें याद करके भी मुझे हँसी आती है। साथ ही ऑंखों से ऑंसू भी कुछ कम नहीं गिरते।

उस समय मेरे मन के भीतर यह विश्वास हिमाचल के समान दृढ़ होकर बैठ गया था कि मुझे मुग्ध कर सके ऐसी नारी इस लोक में तो निश्चय से नहीं, है-परन्तु परलोक में भी है या नहीं इसकी भी मानो मैं कल्पना नहीं कर सकता था। सोचता था कि जीवन में जब कभी किसी के मुँह से ऐसी कोमल बोली, होठों में ऐसी मधुर हँसी, ललाट पर ऐसा अलौकिक तेज, ऑंखों में ऐसी सजल करुण दृष्टि पाऊँगा, तभी मैं ऑंख उठाकर उसकी ओर देखूँगा! जिसे मैं अपना मन दूँगा वह भी मानो ऐसी ही सती साध्वीं होगी; उसके भी प्रत्येक कदम पर मानो ऐसी ही अनिवर्चनीय महिमा फूट उठेगी, इसी तरह वह भी मानो संसार का समस्त सुख-दुख, समस्त अच्छा-बुरा, समस्त धर्म-अधर्म त्याग करके ही मुझे ग्रहण कर सकेगी।

¹ स्व. बंकिमचन्द्र चट्टोपाधयाय के प्रसिद्ध उपन्यास 'देवी चौधुरानी' की मुख्य नायिका।

मैं वही तो हूँ! तो भी आज सुबह नींद खुलते ही किसी के मुँह की वाणी ने, किसी के होठों की हँसी ने, किसी के चक्षुओं के जलने, याद आकर, हृदय में थोड़ी-सी पीड़ा उत्पन्न कर दी। मेरी संन्यासिनी जीजी के साथ कहीं किसी भी अंश में उसका बिन्दु मात्र भी सादृश्य था? फिर भी ऐसा ही मालूम हुआ। छ:-सात रोज पहले अन्तर्यामी भगवान भी आकर यदि यह कहते तो, मैं हसकर उड़ा देता और कहता, ''अन्तर्यामी इस शुभ कामना के लिए तुम्हें हजारों धन्यवाद! किन्तु तुम अपना काम देखो, मेरी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मेरे हृदय की कसौटी पर असल सोना कसा जा चुका है, वहाँ अब पीतल की दुकान खोलने से खरीददार नहीं जुटेंगे।''

परन्तु फिर भी खरीददार जुट गया। मेरे अन्तर में जहाँ कि अन्नदा जीजी के आशीर्वाद से खरा सोना भरा पड़ा था, एक अभागा, पीतल का लोभ नहीं सँभाल सका और उसे खरीद बैठा- यह क्या कुछ कम अचरज की बात है!

मैं खूब समझता हूँ कि जो लोग कठोर आलोचक हैं वे मेरी आत्मकथा में इस स्थान पर अधीर होकर बोल उठेंगे, ''इतना फुलाकर- अतिरंजित करके आखिर, बाबू, तुम कहना क्या चाहते हो? अच्छी तरह स्पष्ट करके ही कह दो न कि वह कौन है? आज सोकर उठते ही प्यारी का मुँह याद करके तुम व्यथित हो उठे थे- यही न? जिसे मन के दरवाजे पर से ही झाड़ू मारकर बिदा कर देते थे आज उसे ही बुलाकर घर में बसाना चाहते हो- यही न? तो ठीक है। यदि यह सत्य है, तो इसके बीच में तुम अपनी अन्नदा जीजी का नाम मत लो। क्योंकि, तुम चाहे जितनी बातें, चाहे जिस तरह बना-सजाकर क्यों न कहो, हम लोग मानव-चरित्र खूब समझते हैं। हम यह जोर देकर कह सकते हैं कि सती-साध्वीा का आदर्श तुम्हारे मन के भीतर स्थायी नहीं हुआ, उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर तुम कभी नहीं ग्रहण कर सके। यदि कर सके होते तो इस मिथ्या में अपने को न भुला सकते।''

यह ठीक है। किन्तु अब और तर्क नहीं करूँगा। मैंने समझ लिया है कि मनुष्य अन्त तक किसी तरह भी अपना पूरा-पूरा परिचय नहीं पाता। वह जो नहीं है, वही अपने को समझ बैठता है और बाहर प्रचार करके केवल विडम्बना की सृष्टि करता है और जो दण्ड इसका भोगना पड़ता है, वह भी बिल्कुेल हलका नहीं होता। किन्तु रहने दो, मैं तो खुद जानता हूँ कि किस नारी के आदर्श पर इतने दिन क्या बात 'प्रीच' (उपदेश) करता फिरा हूँ। इसलिए, मेरी इस दुर्गति के इतिहास पर लोग जब कहेंगे कि श्रीकान्त 'हम्बग-हिप्पोक्रेट' है, तब चुपचाप मुझे सुन ही लेना पड़ेगा। फिर भी मैं 'हिप्पोक्रेट' नहीं था; 'हम्बग' करने का मेरा स्वभाव नहीं है। मेरा स्वभाव सिर्फ इतना ही है कि मुझमें जो दुर्बलता अपने आपको छुपाए हुई थी उसकी खबर मैंने नहीं रक्खी। आज जब वह, समय पाकर, सिर उठाकर खड़ी हो गयी और जब उसने अपने ही समान और भी एक दुर्बलता को सादर आह्नान करके एकबारगी अपने भीतर बिठा लिया, तब असह्य विस्म।य से मेरी ऑंखों में से ऑंसू गिर पड़े; किन्तु 'जा' कहकर उसे बिदा करते भी मुझसे नहीं बन पड़ा। यह भी मैं जानता हूँ कि आज लज्जा के मारे अपना मुँह छिपाने के लिए मेरे पास कोई स्थान नहीं है; किन्तु हृदय का कोना-कोना पुलक से आज परिपूर्ण हो उठा है! नुकसान जो होना हो सो हो, हृदय तो इसका त्याग करना नहीं चाहता!

''बाबू साहब!'' राजा का नौकर आ पहुँचा। शय्या पर मैं सीधा होकर बैठ गया। उसने आदरपूर्वक कहा, ''कुमार साहब तथा और भी बहुत से लोग आपकी गत रात्रि की कहानी सुनने के लिए आपके आने की राह देख रहे हैं।''

मैंने पूछा, ''उन्हें मालूम कैसे हुआ?'' बैरा बोला, ''तम्बू के दरबान ने बतलाया है कि आप रात के अन्त में वापिस लौट आए हैं।''

हाथ-मुँह धो कपड़े बदल, जैसे ही मैं बड़े तम्बू के अन्दर गया कि सब लोगों ने एक साथ शोर मचा दिया। एक ही साथ मानो एक लाख प्रश्न हो गये। मैंने देखा कि कल के वे वृद्ध महाशय भी वहाँ हैं और एक तरफ प्यारी भी अपने दल-बल को लेकर चुपचाप बैठी है। रोज के समान आज उससे चार ऑंखें नहीं हुईं। मानो वह जान-बूझकर ही और किसी तरफ ऑंखें फिराए बैठी थी।

आकुल सवालों की लहर के शान्त होते ही मैंने जवाब देना शुरू किया। कुमारजी बोले, ''धन्य है तुम्हारा साहस, श्रीकान्त। कितनी रात को वहाँ पहुँचे थे?''

''बारह और एक के बीच।''

वृद्ध महाशय बोले, ''घोर अमावस्या! साढ़े ग्यारह बजे के बाद अमावस पड़ी थी।''

चारों तरफ से अचरज सूचक ध्ववनि उठकर क्रमश: शान्त होते ही कुमारजी ने फिर प्रश्न किया, ''उसके बाद क्या देखा?''

मैं बोला, ''दूर तक फैले हुए हाड़-पिंजर और खोपड़ियाँ।''

कुमारजी बोले, ''उफ, कैसा भयंकर साहस है! श्मशान के भीतर गये थे या बाहर खड़े रहे थे?''

मैं बोला, ''भीतर जाकर एक बालू के ढूह पर जाकर बैठ गया था।''

''उसके बाद- उसके बाद? बैठकर क्या देखा?''

''बालू के टीले साँय-साँय कर रहे हैं।''

''और?''

''काँस के झुरमुट और सेमर के वृक्ष।''

''और?''

''नदी का पानी।''

कुमारजी अधीर होकर बोले, ''यह सब तो जानता हूँ जी! पूछता हूँ कि वह सब कुछ...''

मैं हँस पड़ा और बोला, ''और दो-एक बड़े चमगीदड़ सिर के ऊपर से उड़कर जाते हुए देखे थे।''

वृद्ध महाशय ने स्वयं उस समय आगे बढ़कर पूछा, ''और कुछ नहीं देखा?'' मैं बोला, ''नहीं।''

उत्तर सुनकर तम्बू-भर के आदमी मानो निराश हो गये। उस समय वृद्ध महाशय एकाएक क्रूद्ध हो उठे, ''ऐसा कभी हो नहीं सकता। आप गये ही नहीं।'' उनके गुस्से को देखकर मैंने सिर्फ हँस दिया। क्योंकि बात ही गुस्से होने की थी। कुमारजी मेरा हाथ दबाकर मिन्नत भरे स्वर से बोले, ''तुम्हें कसम है श्रीकान्त, क्या-क्या देखा, सच-सच कह दो?''

''सच ही कहता हूँ, कुछ नहीं देखा।''

''कितनी देर ठहरे वहाँ पर?''

''तीनेक घण्टे।''

''अच्छा, देखा नहीं, कुछ सुना भी नहीं?''

''सुना।''

क्षण-भर में ही सबका मुँह उत्साह से प्रदीप्त हो उठा। क्या सुना, उसे सुनने के लिए लोग कुछ और भी आगे सरक आए। तब मैंने कहना शुरू किया कि किस तरह रास्ते के ऊपर एक रात्रि-चर पक्षी 'बाप' कहकर उड़ गया, किस तरह बच्चे की सी आवाज में एक पक्षी के बच्चे ने सेमर के वृक्ष पर रिरिया-रिरिया कर रोना शुरू कर दिया, किस तरह एकाएक ऑंधी उठी और मृत मनुष्यों की खोपड़ियाँ दीर्घ श्वास छोड़ने लगीं और सबके अन्त में किस तरह मानो कोई मेरे पीछे खड़ा होकर लगातार बरफ सरीखी ठण्डी साँस दाहिने कान पर छोड़ने लगा। मेरा कथन समाप्त हो गया किन्तु देर तक किसी के मुँह से एक भी शब्द बाहर न निकला। सारा तम्बू मानो सन्न हो रहा। अन्त में वह वृद्ध व्यक्ति एक लम्बी उसास छोड़कर मेरे कन्धों पर एक हाथ रखकर, धीरे-धीरे बोला, ''बाबूजी, आप सचमुच ही ब्राह्मण के बच्चे हैं, इसीलिए कल अपनी जान लिये लौट आए। नहीं तो और कोई जिन्दा नहीं लौट सकता था। किन्तु, आज से इस बुङ्ढे की कसम है बाबूजी, फिर कभी ऐसा दु:साहस न कीजिएगा। आपके माँ-बाप के चरणों में मेरे कोटि-कोटि प्रणाम- केवल उन्हीं के पुण्य-प्रताप से आप बच गये हैं।'' इतना कहकर उसने झोंक में आकर चट से मेरे पैर छू लिये।

पहले कह चुका हूँ कि यह मनुष्य बात कहना खूब जानता था। इस दफा उसने बात कहना शुरू किया! ऑंखों की पुतलियाँ और भौहें, कभी सिकोड़कर और कभी फैलाकर, कभी बुझाकर और कभी प्रज्ज्वलित करके उसने पक्षी के रोने से शुरू करके कान पर ठण्डी उसास के छोड़ने पर्यन्त की ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म व्याख्या जुटाई कि दिन के समय, इतने लोगों के बीच बैठे हुए भी मेरे सिर के बाल तक काँटों की तरह खड़े हो गये। कल सुबह की तरह आज भी प्यारी गुप-चुप कब सरक कर समीप आ बैठी, इस पर मेरा ध्याहन ही नहीं गया। एकाएक एक उसास के शब्द से गर्दन घुमाकर मैंने देखा कि वह ठीक मेरी पीठ के पीछे बैठी हुई निर्निमेष दृष्टि से बोलने वाले के मुँह की ओर देख रही है और उसके दोनों चिकने उजले गालों पर झड़े हुए अश्रुओं की दो धाराएँ सूखकर फूट उठी हैं। कब और किसलिए वह ऑंखों का जल बह निकला था, शायद वह बिल्कुमल ही जान नहीं सकी; नहीं तो उन्हें पोंछ डालती। किन्तु, उसी अश्रु-कलुषित तल्लीन मुख का पल-भर का दृष्टिपात ही मेरे हृदय में एक अग्नि की रेखा अंकित कर गया। बात समाप्त होते ही वह उठकर खड़ी हो गयी और कुमारजी को सलाम करके, अनुमति माँगकर, धीरे-धीरे बाहर चली गयी।

आज सुबह ही मेरे बिदा होने की बात थी। परन्तु, शरीर स्वस्थ नहीं था, इसलिए कुमारजी का अनुरोध स्वीकार करके मैं उस समय, जाना स्थगित करके, अपने तम्बू में वापस लौट आया। इतने दिनों के बाद आज प्यारी के आचरण में पहले-पहल मैंने दूसरा भाव देखा। इतने दिन उसने परिहास किया है, व्यंग किया है, और कलह का आभास तक भी उसके दोनों नेत्रों की दृष्टि में कुछ दिन घनीभूत हो गया है- यह सब मैंने अनुभव किया है। परन्तु, इस तरह की उदासीनता पहले कभी नहीं देखी। फिर भी, व्यथित होने के बदले मैं खुश ही हुआ। क्यों, सो जानता हूँ। यद्यपि युवती स्त्रियों के मन की गतिविधि को लेकर माथापच्ची करना मेरा पेशा नहीं है, और न इसके पहले यह काम मैंने कभी किया ही है, पर मेरे मन के भीतर जो बहुत जन्मों की अखण्ड धारावाहिकता छिपी हुई मौजूद है, उसके बहुदर्शन की अभिज्ञता से रमणी-हृदय का गूढ तात्पर्य स्पष्ट प्रतिभासित हो उठा। वह उसे अपना अपमान समझकर क्षुब्ध नहीं हुआ वरन् उसे प्रणय अभिमान समझकर पुलकित हो उठा। शायद, इसी छिपी हुई धारावाहिकता के गुप्त इशारे से मैंने अपनी श्मशान यात्रा के लिए यहाँ तक के इतिहास में, इस बात का उल्लेख तक नहीं किया कि कल-रात को मुझे श्मशान से लौटा लाने के लिए आदमी भेजे थे और वह स्वयं भी बात पूरी होते ही उसी तरह गुप-चुप बाहर चली गयी थी। इसीलिए है यह अभिमान! कल रात को लौटकर उसे मुलाकात करके मैंने यह नहीं कहा कि वहाँ क्या हुआ था। उससे जिस बात को अकेले बैठकर सुनने का सबसे पहले अधिकार था उसी को आज वह सबसे पीछे बैठकर मानो दैवात् ही सुन सकी है। परन्तु, अभिमान भी इतना मीठा होता है! जीवन में उसके स्वाद को उस दिन सबसे पहले उपलब्ध करके मैं बच्चे की तरह एकान्त में बैठ गया और लगातार चख-चखकर उसका उपभोग करने लगा।

आज दोपहर को मैं सो जाना चाहता था। बिस्तर पर लेटे-लेटे बीच-बीच में तन्द्रा भी आने लगी; परन्तु रतन के आने की आशा बार-बार हिला-हिलाकर उसे तोड़ देने लगी। इस तरह समय तो निकल गया परन्तु रतन नहीं आया! वह आएगा अवश्य, यह विश्वास मेरे दिल में ऐसा दृढ़ हो रहा था कि, जब बिस्तर छोड़कर बाहर आकर मैंने देखा कि सूर्य पश्चिम की ओर ढल पड़ा है, तब मुझे मन ही मन यह निश्चय हो गया कि जब मैं तन्द्रा में पड़ा हुआ था तब रतन, मेरे यहाँ आया है और मुझे निद्रित समझकर लौट गया है। मूर्ख! एक दफे पुकार ही लेता तो क्या हो जाता! दोपहर का निर्जन समय यों ही निरर्थक चला गया, यह सोचकर मैं क्रुद्ध हो उठा; परन्तु संध्या के बाद वह फिर आएगा और एक छोटा-सा अनुरोध- नहीं तो लिखा हुआ एक पुर्जा- जो कुछ भी हो, गुप-चुप हाथ में थमा जायेगा; इसमें मुझे जरा भी संशय नहीं था; किन्तु यह समय कटे किस तरह? सामने की ओर देखते ही कुछ दूर पर विशाल जल-राशि एकदम मेरी ऑंखों के ऊपर झक्-झक् कर उठी। वह किसी विस्मृत जमींदार का विशाल यश था। वह तालाब करीब आधा कोस विस्तृत था। उत्तर की ओर से वह खिसक कर पुर गया था और घने जंगल से ढँक गया था। गाँव के बाहर होने के कारण गाँव की स्त्रियाँ उसके जल का उपयोग नहीं कर पाती थीं। बातों ही बातों में सुना था कि यह तालाब कितना पुराना है और किसने बनवाया था, इसका पता किसी को नहीं है। एक पुराना टूटा घाट था, उसी के एकान्त कोने में जाकर मैं बैठ गया। एक समय इसके चारों ओर बढ़ता हुआ गाँव था जो न जाने कब हैजे और महामारी के प्रकोप से ऊजाड़ होकर, फिर अपने वर्तमान स्थान में, सरक आया है। छोड़े हुए मकानों के बहुत-से निशान चारों ओर विद्यमान हैं। डूबते हुए सूर्य की तिरछी किरणों की छटने धीरे-धीरे झुककर तालाब के काले पानी में सोना मथ दिया, मैं एकटक होकर देखता रहा।

इसके बाद धीरे-धीरे सूर्य डूब गया। तालाब का काला पानी और भी काला हो गया। पास के ही जंगल में से दो-एक प्यासे सियार बाहर निकल कर डरते-डरते पानी पीकर चले गये। वहाँ से मेरे उठने का समय हो गया है- जिस समय को काटने के लिए मैं वहाँ गया था वह कट गया है, यह सब अनुभव करके भी मैं वहाँ से उठ न सका- मानों उस टूटे घाट ने मुझे जबरन बिठा रखा!

खयाल आया कि जहाँ पैर रखकर मैं बैठा हुआ हूँ वहीं पर पैर रखकर न जाने कितने आदमी कितनी दफा आए हैं, गये हैं। इसी घाट पर वे स्नान करते, मुँह धोते, कपड़े छाँटते और जल भरते थे। इस समय वे कहाँ के किस जलाशय में ये समस्त नित्य-कर्म पूर्ण करते होंगे? यह गाँव जब जीवित था तब निश्चय से वे लोग इस समय यहाँ आकर बैठते थे। कितने ही गान गाकर और कितनी ही बातें करके दिन-भर की थकावट दूर करते थे। इसके बाद अकस्मात् एक दिन जब महाकाल महामारी का रूप धारण करके सारे गाँव को नोच ले गया तब न जाने कितने मरणोन्मुख व्यक्ति प्यास के मारे यहाँ दौड़े आए हैं और इसी घाट के ऊपर अपना अन्तिम श्वास छोड़कर उसके साथ चले गये हैं। शायद उनकी पिपासातुर आत्मा आज भी यहीं पर चक्कर काटती फिरती होगी। यह भी कौन जोर देकर कह सकता है कि जो ऑंखों से नहीं दिखाई देता वह है ही नहीं? आज सुबह ही उस वृद्ध ने कहा था, ''बाबूजी, मन में यह कभी मत सोचना कि मृत्यु के उपरान्त कुछ शेष नहीं रहता- असहाय प्रेतात्माएँ हमारे ही समान सुख-दु:ख, क्षुधा-तृषा लेकर विचरण नहीं करतीं।'' इतना कहकर उसने वीर विक्रमाजीत की कथा, और न जाने कितनी ही तान्त्रिक साधु-सन्यासियों की कहानियाँ विस्तार से कह सुनाई थीं। और कहा था कि ''यह भी मत सोचना कि समय और सुयोग मिलने पर वे दिखाई नहीं देती हैं या बात नहीं कर सकती हैं, अथवा नहीं करती हैं। तुम्हें उस स्थान पर और कभी जाने के लिए मैं नहीं कहता, परन्तु जो लोग यह काम कर सकते हैं उनके समस्त दु:ख किसी भी दिन सार्थक नहीं होते, इस बात पर स्वप्न में भी कभी अविश्वास मत करना।''

उस समय, सुबह के प्रकाश में, जिन कहानियों ने केवल निरर्थक हँसी का उपादान जुटा दिया था, इस समय वे ही कहानियाँ निर्जन गहरे अन्धकार के बीच कुछ दूसरे ही किस्म के चेहरे धारण करके दिखाई दीं। मन में आने लगा कि जगत में प्रत्यक्ष सत्य यदि कोई वस्तु है तो वह मृत्यु ही है। भली-बुरी सुख-दु:ख की ये जीवनव्यापी अवस्थाएँ मानो आतिशबाजी हैं, जो तरह-तरह के साज-सरंजाम के समान केवल किसी एक विशेष, दिन जलकर राख हो जाने के लिए ही इतने यत्न और कौशल्य के साथ बनकर तैयार हुई हैं। तब मृत्यु के उस पार का इतिहास यदि किसी तरह सुन लिया जा सके तो उसकी अपेक्षा बड़ा लाभ और क्या है? फिर उसे कोई भी कहे और कैसे भी कहे।

हठात् किसी के पैरों के शब्द से मेरा ध्यातन भंग हो गया। पलटकर देखा, केवल अन्धकार है, कहीं कोई नहीं है। मैं बदन झाड़कर उठ खड़ा हुआ। गत रात्रि की बात याद करके मन ही मन हँसकर बोला, नहीं, अब और यहाँ नहीं बैठ रहना चाहिए। कल दाहिने कान के ऊपर उसासा छोड़ गया था, आज आकर यदि बाएँ कान पर छोड़ना शुरू कर दे, तो यह कुछ अधिक सहज न होगा।

वहाँ बैठे-बैठे कितनी देर हो गयी और अब कितनी रात है, यह मैं ठीक तौर से निश्चित नहीं कर सका। मालूम होता है कि आधी रात के आस-पास का समय होगा। परन्तु अरे यह क्या? चला जा रहा हूँ तो चला ही जा रहा हूँ, उस सँकरी पगडण्डी का जैसे अन्त ही नहीं होना चाहता! इतने बहुत से तम्बुओं में से एक दीपक का भी प्रकाश नजर नहीं आता! बहुत देर से सामने एक बाँस का वृक्ष नजर रोके खड़ा था; एकाएक खयाल आया कि इसे तो आते समय देखा नहीं था! दिशा भूलकर, कहीं और किसी ओर तो नहीं चल दिया हूँ? कुछ और चलने पर मालूम हुआ कि वह बाँस का वृक्ष नहीं है, किन्तु, कुछ इमली के पेड़, एक दूसरे से सटे हुए, दिशाओं को ढके जमात बाँधकर खड़े हैं और उन्हीं के नीचे से रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा होकर अदृश्य हो गया है। स्थान इतना अन्धकारपूर्ण है कि अपना हाथ भी अपने को नहीं दिखाई देता। छाती धड़धड़ाने लगी। अरे मैं जा कहाँ रहा हूँ? ऑंख-कान बन्द करके किसी तरह उन इमली के वृक्षों के पार जाकर देखता हूँ कि सामने अनन्त काला आकाश, जितनी दूर नजर जाती है उतनी दूर तक, विस्तृत हो रहा है। किन्तु सामने वह ऊँची-सी जगह क्या है? नदी के किनारे का सरकारी बाँध तो नहीं है? दोनों पैर मानो टूटने से लगे, फिर भी उन्हें किसी तरह घसीटकर मैं उसके ऊपर चढ़ गया। जो सोचा था ठीक वही हुआ। उसके ठीक नीचे ही वह महाश्मशान था! फिर किसी के कदमों का शब्द सामने से होकर नीचे श्मशान में जाकर विलीन हो गया। इस बार मैं किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चला और उसी धूल-रेती के ऊपर बेहोश की तरह धप्प् से बैठ गया। अब मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं रहा कि कोई मुझे एक महाश्मशान से लेकर दूसरे महाश्मशान तक रास्ता दिखाता हुआ पहुँचा गया। जिसके पद-शब्द सुनकर, उस फूटे घाट पर, शरीर झाड़कर मैं उठ खड़ा हुआ था उसी के पद-शब्द, इतनी देर बाद, उस तरफ, सामने की ओर, विलीन हो गये।

 


000

हरेक घटना का कारण जानने की जिद मनुष्य को जिस अवस्था में होती है उस अवस्था को मैं पार कर गया हूँ। इसलिए, किस तरह उस सूचीभेद्य अन्धकार-पूर्ण आधी रात को मैं अकेला, रास्ते को पहिचानता हुआ, तालाब के टूटे घाट से इस महाश्मशान के समीप आ उपस्थित हुआ, और किसके कदमों की वह आवाज... उस स्थान से बुलाती और इशारा करती हुई, इतनी ही देर में सामने विलीन हो गयी, इन सब प्रश्नों की मीमांसा करने जैसी बुद्धि मुझमें नहीं है। पाठकों के समीप अपने इस दैन्य को स्वीकार करने में मुझे जरा भी लज्जा नहीं है। यह रहस्य आज भी मेरे समीप उतने ही अन्धकार से ढँका हुआ है। परन्तु, इसीलिए, प्रेत-योनि को स्वीकार करना भी इस स्वीकारोक्ति का प्रच्छन्न तात्पर्य नहीं है। क्योंकि, अपनी ऑंखों मैंने देखा है- हमारे गाँव में एक पागल था। वह दिन को, घर-घर घूमकर, भीख माँगकर खाता था और रात को बाँस के ऊपर कपड़ा डालकर, और उसे सामने की ओर ऊँचा करके, रास्ते-रास्ते बगीचों के झाड़ों की छाया में, घूमता-फिरता था। उसके चेहरे को देखकर अंधेरे में न जाने कितने लोगों की दँतौरी बँध बँध गयी है। इसमें उसका कोई स्वार्थ नहीं था, फिर भी यह उसका अंधेरी रात का नित्य का काण्ड था। मनुष्य को व्यर्थ ही डर दिखाने के लिए और भी जितने प्रकार के अद्भुत ढंग वह करता था उनकी सीमा नहीं थी। सूखी लकड़ियों के गट्ठे को पेड़ की डाल से बाँधकर उसमें आग लगा देता, मुख पर काली स्याही पोत कर विशालाक्षी देवी के मंदिर में बहुत क्लेश सहते हुए खड़ा रहता और उठा-बैठा करता, गहरी रात के समय घर के पिछवाड़े बैठकर नाक के सुर से किसानों के नाम ले-लेकर पुकारा करता- परन्तु, फिर भी, कोई किसी दिन उसे पकड़ न पाया। दिन के समय उसका चाल-चलन, स्वभाव-चरित्र आदि देखकर उस पर जरा-सा सन्देह करने की बात किसी के भी मन में उदय नहीं हुई। और यह केवल हमारे ही गाँव में नहीं- पास के आठ-दस गाँवों में भी वह यही करता फिरता था। मरते समय वह अपनी बदजाती खुद ही स्वीकार कर गया और उसके मरने के बाद भूत का उपद्रव भी वहाँ बन्द हो गया। इस क्षेत्र में भी शायद वैसा ही कुछ था-शायद नहीं भी हो। परन्तु जाने दो इस बात को।

हाँ, कह रहा था कि, उस धूल और रेती से भरे हुए बाँध के ऊपर जब मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठ गया तब केवल दो लघु पद-ध्वंनियाँ भीतर जाकर धीरे-धीरे विलीन हो गयीं। खयाल आया, मानो उसने स्पष्ट करके बता दिया हो- ''राम-राम, तूने यह क्या किया? मुझे इतनी दूर तक रास्ता बताकर ले आया, सो क्या वहाँ बैठ जाने के लिए? आ, आ, एक दफा हम लोगों के भीतर चला आ। इस तरह अपवित्र अस्पृश्य के समान प्रांगण के एकान्त में मत बैठ- हम सबके बीच में आकर बैठ।'' यह बात मैंने कानों से सुनी थी या हृदय के भीतर अनुभव की थी, सो अब याद नहीं कर सकता। परन्तु, उस समय भी जो मुझे होश बना रहा, इसका कारण यह है कि चैतन्य को जबर्दस्ती पकड़ रखने से वह यों ही एक-प्रकार से बचा रहता है। बिल्कुधल ही नहीं चला जाता, यह मैंने अच्छी तरह देखा है। इसलिए यद्यपि दोनों ऑंखों को खोलकर मैं देखता रहा, परन्तु वह मानो तन्द्रा का देखना था। वह न तो नींद ही थी और न जागरण ही था। उसमें निद्रित का विश्राम भी नहीं रहता और जाग्रत का उद्यम भी नहीं आता।

फिर भी मैं इस बात को नहीं भूला कि बहुत रात बीत गयी है, मुझे तम्बू में लौटना है और उसके लिए कम-से-कम एक बार चेष्टा तो करनी चाहिए; किन्तु, मन में लगा कि यह सब व्यर्थ है। यहाँ पर मैं अपनी इच्छा से तो आया नहीं हूँ, आने की कल्पना भी नहीं की; इसलिए, जो मुझे इस दुर्गम रास्ते पर रास्ता दिखलाकर लाया है, उसका कुछ विशेष प्रयोजन है। वह मुझे यों ही न लौट जाने देगा। पहले मैंने सुना था कि अपनी इच्छा से इनके हाथों से छुटकारा नहीं मिलता। चाहे जिस रास्ते, चाहे जिस तरह, जोर करके क्यों न निकलो, सब रास्ते गोरख धन्धे की तरह घुमा-फिराकर पुरानी जगह पर ही लाकर हाजिर कर देते हैं!

इसलिए, चंचल होकर छटपटाना सम्पूर्ण तौर से अनावश्यक समझकर, मैं किसी तरह की हिलने-डुलने की भी चेष्टा किये बिना, जब स्थिर होकर बैठ गया तब जो वस्तु अकस्मात् देख पड़ी, वह मुझे किसी दिन भी विस्मृत नहीं हुई।

रात्रि का भी स्वतन्त्र रूप होता है और उसे, पृथ्वीन के झाड़-पाले, गिरिपर्वत आदि जितनी भी दृश्यमान वस्तुएँ हैं उनसे, अलग करके देखा जा सकता है, यह मानो आज पहले मेरी दृष्टि में आया। मैंने ऑंख उठाकर देखा कि अन्तहीन काले आकाश के नीचे, सारी पृथ्वील पर आसन जमाए, गम्भीर रात्रि ऑंखें मूँदे ध्या न लगाए बैठी है और सम्पूर्ण चराचर विश्व मुख बन्द किये, साँस रोके, अत्यन्त सावधानी से स्तब्ध होकर उस अटल शान्ति की रक्षा कर रहा है। एकाएक ऑंखों के ऊपर से मानो सौन्दर्य की एक लहर दौड़ गयी। मन में आया कि किस मिथ्यावादी ने यह बात फैलाई है कि केवल प्रकाश का ही रूप होता है, अन्धकार का नहीं? भला, इतना बड़ा झूठ मनुष्य ने किस तरह चुपचाप मान लिया होगा? यह तो आकाश और मर्त्य, सबको परिव्याप्त करके, दृष्टि से भीतर-बाहर अन्धकार का पूरा बढ़ा आ रहा है। वाह-वाह! ऐसा सुन्दर रूप का झरना और कब देखा है! इस ब्रह्माण्ड में जो जितना गम्भीर, जितना अचिन्त्य, जितना सीमाहीन है- वह उतना ही अन्धकारमय है। अगाध समुद्र स्याही जैसा काला है; अगम्य गहन अरण्यानी भीषण अन्धकारमय है। सर्व लोगों का आश्रय, प्रकाश का भी प्रकाश, गति की भी गति, जीवन का भी जीवन, सम्पूर्ण सौन्दर्य का प्राण-पुरुष भी, मनुष्य की दृष्टि में निबिड़ अन्धकारमय है। मृत्यु इसीलिए मनुष्य की दृष्टि में काली है, और इसीलिए उसका परलोक-पन्थ इतने दुस्तर अंधेरे में मग्न है! इसीलिए राधा के दोनों नेत्रों में समाकर जिस रूप ने प्रेम के पूर में जगत को बहा दिया, वह भी घनश्याम है। मैंने कभी ये सब बातें सोची नहीं, किसी दिन भी इस रास्ते चला नहीं; फिर भी न जाने किस तरह इस भय से भरे हुए महाश्मशान के समीप बैठकर, अपने इस निरुपाय नि:संग अकेलेपन को लाँघकर, आज सारे हृदय में एक अकारण रूप का आनन्द खेलने फिरने लगा और बिल्कुगल एकाएक यह बात मन में आई कि काले में इतना रूप है, सो पहले तो किसी दिन समझा नहीं! तब तो शायद मृत्यु भी काली होने के कारण कुत्सित नहीं है; एक दिन जब वह मुझे दर्शन देने आवेगी तब शायद उसके इस प्रकार के, कभी समाप्त न होने वाले, सुन्दर रूप से मेरी दोनों ऑंखें जुड़ा जाँयगी। और वह अगर दर्शन देने का दिन आज ही आ गया हो, तो है सुन्दर मेरे काले! ओ मेरी समीपस्थ पदध्व्नि! हे मेरे सर्व-दु:ख भय-व्यथाहारी अनन्त सुन्दर! तुम अपने अनादि अन्धकार से सर्वांग भरकर मेरी इन दोनों ऑंखों की दृष्टि में प्रत्यक्ष होओ, मैं तुम्हारे इस अन्धा-अन्धकार से घिरे हुए निर्जग मृत्यु-मन्दिर के द्वार पर, तुम्हें निर्भयता से वरण करके बड़े आनन्द से तुम्हारा अनुकरण करता हूँ। सहसा मेरे मन में आया- तब उसके इस निर्वाक् आह्नान की उपेक्षा करके अत्यन्त ही अन्त:वासी के समान, मैं यहाँ बाहर किसलिए बैठा हूँ? एक दफा भीतर बीच में क्यों न जा बैठूँ!

नीचे उतरकर मैं श्मशान के ठीक बीचों-बीच बिल्कु्ल जमकर बैठ गया। कितनी देर तक इस तरह स्थिर बैठा रहा, इसका मुझे उस समय होश नहीं था। होश आने पर देखा कि उतना अन्धकार अब नहीं रहा है- आकाश का एक प्रान्त मानो स्वच्छ हो गया है; और उसके पास ही शुक्र तारा चमक रहा है। कुछ दबी हुई-सी बातचीत का कोलाहल मेरे कानों में पहुँचा। अच्छी तरह निरीक्षण करके देखा, कि दूर पर सेमर के वृक्ष की आड़ में, बाँध के ऊपर से होकर कुछ लोग चले आ रहे हैं; और उनकी दो-चार लालटेनों का प्रकाश भी आसपास इधर-उधर हिल-डुल रहा है। फिर से, बाँध के ऊपर चढ़कर, उस प्रकाश में ही मैंने देखा कि दो बैलगाड़ियों के आगे-पीछे कुछ लोग इसी ओर बढ़े आ रहे हैं। समझ पड़ा कि कुछ लोग इस रास्ते होकर स्टेशन की ओर जा रहे हैं।

मुझे उस समय यह सुबुद्धि सूझ आई कि रास्ता छोड़कर मेरा दूर खिसक जाना आवश्यक है। क्योंकि, आगन्तुकों का दल चाहे कितना भी बुद्धिमान और साहसी क्यों न हो, एकाएक इस अंधेरी रात्रि में, इस तरह के स्थान में मुझे अकेला भूत की तरह खड़ा देखकर चाहे और कुछ न करे, परन्तु एक विकट चीख-पुकार अवश्य मचा देगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

मैं लौटकर अपनी पुरानी जगह पर जा खड़ा हुआ; और थोड़े समय बाद ही दो चटाई लगी हुई बैलगाड़ियाँ, पाँच-छह आदमियों के पहरे में, मेरे सामने आ पहुँचीं। एक बार खयाल आया कि आगे चलने वाले दो आदमी मेरी ओर देखकर, क्षण काल के लिए स्थिर हो, खड़े रहे और अत्यधिक धीमे स्वर में मानो कुछ कह-सुनकर आगे चले गये; और थोड़ी-सी ही देर में वह सारा दल, बाँध के किनारे की एक झाड़ी की ओट में, अदृश्य हो गया। यह अनुभव करके कि रात अब अधिक बाकी नहीं रही है, जब मैं लौटने की तैयारी कर रहा था, ठीक उसी समय उन वृक्षों की ओट में से आती हुई खूब ऊँचे कण्ठ की पुकार कानों में आई, ''श्रीकान्त बाबू-''

मैंने उत्तर दिया, ''कौन है रे, रतन?''

''हाँ बाबू, मैं ही हूँ। जरा आगे बढ़ आइए।''

जल्दी से बाँध के ऊपर चढ़कर पुकारा, ''रतन, तुम लोग क्या घर जा रहे हो?''

रतन ने उत्तर दिया, ''हाँ, घर जा रहे हैं- माँ गाड़ी में हैं।''

मेरे निकट पहुँचते ही प्यारी ने पर्दे में से मुँह बाहर निकालकर कहा, ''दरबान की बात सुनकर ही मैं समझ गयी थी कि तुम्हें छोड़ और कोई नहीं है, गाड़ी पर आओ, कुछ बात करनी है!''

मैंने निकट आकर पूछा, ''क्या बात है?''

''कहती हूँ, ऊपर आ जाओ।''

''नहीं, ऐसा नहीं कर सकता, समय नहीं है। सुबह होने के पहले ही मुझे तम्बू में पहुँचना है!'' प्यारी ने हाथ बढ़ाकर चट से मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया और तेज ज़िद के स्वर में कहा, ''नौकर-चाकरों के सामने छीना-झपटी, मत करो- तुम्हारे पैर पड़ती हूँ, चुपचाप ऊपर चढ़ आओ...''

उसकी अस्वाभाविक उत्तेजना से मानो कुछ हत-बुद्धि-सा होकर मैं गाड़ी पर चढ़ गया। प्यारी ने गाड़ी को हाँकने की आज्ञा देकर कहा, ''आज फिर इस जगह क्यों आए?''

मैंने सच-सच बात कह दी, ''नहीं मालूम, क्यों आया।''

प्यारी ने अब तक भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा था। बोली, ''तुम्हें नहीं मालूम? अच्छा, ठीक, परन्तु छिपकर क्यों आए थे?''

मैं बोला, ''यह ठीक है कि यहाँ आने की बात किसी को मालूम नहीं है, किन्तु छिपकर नहीं आया हूँ।''

''यह झूठ बात है!''

''नहीं।''

''इसका मतलब?''

''मतलब यदि खोलकर बता दूँगा तो विश्वास करोगी? न तो मैं छिपकर ही आया हूँ, और न मेरी इच्छा ही आने की थी।''

प्यारी ने व्यंग्य के स्वर में कहा, ''तो फिर तुम्हें तम्बू में से भूत उड़ा ले आया है- मालूम होता है, यही कहना चाहते हो क्यों?''

''नहीं, सो नहीं कहना चाहता। उड़ाकर कोई नहीं लाया, अपने ही पैरों चलकर आया हूँ, यह भी सच है किन्तु क्यों आया, कब आया, सो नहीं कह सकता।''

प्यारी चुप हो रही। मैं बोला, ''राजलक्ष्मी, नहीं जानता कि तुम विश्वास कर सकोगी या नहीं; परन्तु, वास्तव में जो कुछ हुआ है, सो एक अचरज-भरा व्यापार है।'' इतना कहकर मैंने सारी घटना अथ से इति पर्यन्त कह दी।

सुनते-सुनते मेरे हाथ में रक्खा हुआ उसका हाथ कई बार सिहर उठा; परन्तु उसने एक भी बात नहीं कही। पर्दा उठा हुआ था, पीछे की ओर नजर डालकर देखा, आकाश उज्ज्वल हो गया है। बोला, ''अब मैं जाऊँ?''

प्यारी ने स्वप्नविष्ट की तरह कहा, ''नहीं।''

''नहीं कैसे? इस तरह चले जाने का अर्थ क्या होगा, सो जानती हो?''

''जानती हूँ- सब जानती हूँ। परन्तु ये लोग तुम्हारे अभिभावक या संरक्षक तो हैं ही नहीं, जो तुम्हें अपने मान के लिए प्राण दे देने होंगे।'' इतना कहकर उसने हाथ छोड़कर पैर पकड़ लिये और रुद्ध स्वर में कहा, ''कान्त दादा, वहाँ लौटकर जाओगे तो जीते न बचोगे। तुम्हें मेरे साथ न चलना पड़ेगा, परन्तु वहाँ भी वापिस न लौटने दूँगी। तुम्हारा टिकट खरीदे देती हूँ, तुम घर लौट जाओ, वहाँ एक घड़ी-भर के लिए भी मत ठहरो।''

मैं बोला, ''मेरे कपड़े-बिस्तर आदि जो वहाँ पड़े हैं!''

प्यारी बोली, ''पड़े रहने दो। उनकी इच्छा होगी तो भेज देंगे; नहीं तो जाने दो। उनका मूल्य अधिक नहीं है!''

मैं बोला, ''उनका दाम अधिक नहीं है यह सच है; परन्तु, मेरी जो मिथ्या बदनामी होगी, उसका दाम तो कम नहीं है।''

प्यारी मेरे पैर छोड़कर चुप हो रही। गाड़ी इसी समय एक मोड़ पर फिरी, जिससे पीछे का दृश्य मेरे सामने आ गया। एकाएक याद आया कि सामने के उस पूर्व दिशा के आकाश के साथ यह पतिता के मुख की मानो एक गहरी समानता है। दोनों के ही बीच से मानो एक विराट अग्नि-पिण्ड अन्धकार को भेदता हुआ आ रहा है, उसी का आभास मुझे दिखाई दिया है। मैं बोला, ''चुप क्यों हो रही?''

प्यारी एक म्लान हँसी हँसकर बोलीं, ''तुम क्या जानो कान्त बाबू, कि जिस कलम से जीवन-भर केवल जाली खत लिखती रही हूँ, उसी कलम से आज दान-पत्र लिखने को हाथ नहीं चल रहा है। जाते हो? अच्छा जाओ। किन्तु वचन दो कि आज बारह बजने के पहले ही वहाँ से चल दोगे?''

''अच्छा, देता हूँ।''

''किसी के कितने ही अनुरोध से आज की रात वहाँ न काटोगे, बोलो?''

''नहीं, नहीं, काटूँगा।''

प्यारी ने अपनी अंगूठी उतारकर मेरे पैरों पर रख दी, गल-वस्त्र होकर प्रणाम किया और पैरों की धूल अपने सिर पर लेकर उस अंगूठी को मेरी जेब में डाल दिया। बोली, ''तब जाओ-मैं समझती हूँ कि डेढ़ेक कोस जगह तुम्हें अधिक चलना होगा।''

बैलगाड़ी से उतर पड़ा। उस समय प्रभात हो गया था।

प्यारी ने अनुनय करके कहा, ''मेरी और भी एक बात तुम्हें रखनी होगी। घर लौटते ही मुझे एक पत्र लिखना होगा।''

मैंने मंजूर करके प्रस्थान किया। एक दफा भी लौटकर पीछे की ओर नहीं देखा कि वे लोग खड़े हैं अथवा आगे चल दिए हैं। परन्तु बड़ी दूर तक अनुभव करता रहा कि उन दो चक्षुओं की सजल-करुण दृष्टि मेरी पीठ के ऊपर बार-बार पछाड़ खा-खाकर गिर रही है।

अड्डे पर पहुँचते प्राय: आठ बज गये। रास्ते के किनारे, प्यारी के उखड़े हुए तम्बू की, बिखरी हुई परित्यक्त वस्तुओं पर मेरी नजर पड़ते ही एक निष्फल क्षोभ छाती में मानो हाहाकार कर उठा। मुँह फेरकर जल्दी-जल्दी पैर रखते हुए मैंने अपने तम्बू में प्रवेश किया।

पुरुषोत्तम ने पूछा, ''आप बड़े भोर ही घूमने बाहर चले गये थे?''

हाँ-ना किसी तरह का जवाब दिए बगैर ही मैं बिस्तर पर ऑंखें बन्द करके लेट रहा।

000

प्यारी के निकट जो वादा किया था उसकी मैंने पूरी रक्षा की, घर लौटते ही मैंने यह खबर जताकर उसे एक चिट्ठी लिख दी। जवाब भी जल्द ही आ गया। मैं एक बात पर बराबर ध्या न दे रहा था कि किसी भी दिन प्यारी ने मुझे अपने पटने के मकान के लिए, जोर डालना तो दूर रहा, साधारण तौर से मौखिक निमन्त्रण भी नहीं दिया। इस पत्र में भी इसका कोई इशारा न था। सिर्फ नीचे की ओर एक निवेदन था, जिसे कि आज भी मैं नहीं भूला हूँ, ''सुख के दिनों में नहीं, तो दु:ख के दिनों में मुझे न भूलिए- यही मेरी प्रार्थना है।''

दिन कटने लगे। प्यारी की स्मृति धुँधली होकर प्राय: विलीन हो गयी। परन्तु एक अचरज-भरी बात बीच-बीच में मेरी दृष्टि में पड़ने लगी कि अबकी दफा शिकार से वापिस लौटने के बाद से मेरा मन मानो कुछ अनमना-सा रहने लगा है, जैसे मानो एक अभाव की वेदना, दबी हुई सर्दी के समान, शरीर के रोम-रोम में परिव्याप्त हो गयी है। बिस्तरों पर जाते ही वह चुभने लगती है।

याद आता है कि वह होली की रात थी। माथे पर से अबीर का चूर्ण साबुन से धोकर तब तक साफ नहीं किया था। क्लान्त विवश शरीर से बिस्तर पर पड़ा था। पास की खिड़की खुली हुई थी; उसी में से सामने के पीपल के पत्तों की फाँकों में से आकाशव्यापी ज्योत्स्ना की ओर ताक रहा था। इतना ही याद आ रहा है। परन्तु क्यों दरवाजा खोलकर स्टेशन की ओर चल दिया और पटने का टिकिट कटाकर ट्रेन पर चढ़ गया-वह याद नहीं आता। रात बीत गयी। परन्तु दिन को जैसे ही मैंने सुना कि 'बाढ़' स्टेशन है और पटना आने में अब अधिक बिलम्ब नहीं है, वैसे ही एकाएक वहीं उतर पड़ा। जेब में हाथ डालकर देखा तो घबड़ाने का कोई कारण नज़र नहीं आधा-एक दुअन्नी और दसेक पैसे उस समय भी मौजूद थे। खुश होकर दुकान की खोज में स्टेशन से बाहर हो गया। दुकान मिल गयी। चिउड़ा, दही और शक्कर के संयोग से अत्युत्कृष्ट भोजन सम्पन्न करने में करीब आधा खर्च हो गया। होने दो, जीवन में इस तरह कितना ही खर्च हुआ करता है- इसके लिए रंज करना कायरता है।

गाँव घूमने के लिए बाहर हुआ। घण्टे-भर भी न घूमा था कि अनुभव हुआ, इस गाँव का दही और चिउड़ा जिस परिमाण में उपादेय है उसी परिमाण में पीने का पानी निकृष्ट है। मेरे इतने प्रचुर भोजन को इतने से समय में इस तरह पचाकर उसने नष्ट कर दिया कि, ऐसा मालूम होने लगा कि, मानो दस-बीस दिन से अन्न का दाना भी मुँह में नहीं पड़ा है! ऐसे खराब स्थान में वास करना एक मुहूर्त-भर के लिए भी उचित नहीं है, ऐसा सोचकर स्थान त्याग करने की कल्पना कर ही रहा था कि- देखता हूँ, पास में ही एक आम के बगीचे के भीतर से धुऑं निकल रहा है।

मैंने न्यायशास्त्र सीखा था। धुएँ को देखकर अग्नि का निश्चय से अनुमान कर लिया; इतना ही नहीं, वरन् अग्नि के हेतु का अनुमान करते भी मुझे देर नहीं लगी। इसलिए सीधा उसी ओर चल दिया। पहले ही कह चुका हूँ कि पानी यहाँ का बहुत ही खराब है।

वाह, यही तो चाहिए था! सच्चे सन्यासी का आश्रम मिल गया! बड़ी भारी धूनी के ऊपर लोटे में चाय के लिए पानी चढ़ा है। बाबा आधी ऑंखें मूँदे सामने बैठे हैं, उनके आस-पास गाँजे की सामग्री रखी है। एक सन्यासी बच्चा बकरी दुह रहा है, सेवा के लिए 'चाय' चाहिए। दो ऊँट, दो टट्टू और एक बछड़ेवाली गाय, पास-पास वृक्षों की डालों से बँधे हुए हैं। पास ही में एक छोटा-सा तम्बू है। ढूँककर देखा, भीतर मेरी ही उम्र का एक चेला दोनों पैरों के बीच पत्थर का खल दबाए नीम के सोंटे से भंग तैयार कर रहा है। देखकर मैं भक्ति से सराबोर हो गया और पलक मारते ही बाबाजी के पद-तल में एकबारगी लोट गया। पद-धूलि मस्तक पर धारण कर हाथ जोड़ मन ही मन बोला, ''कैसी असीम करुणा है भगवान तुम्हारी! कैसे स्थान में मुझे ले आए। चूल्हे में जाय प्यारी-मुक्ति मार्ग के इस सिंह-द्वार को छोड़कर तिलार्ध भी यदि और कहीं जाऊँ तो, मेरे लिए, अनन्त नरक में भी और जगह न रहे।''

''साधुजी बोले, ''क्यों बेटा?''

मैंने निवेदन किया, ''मैं गृहत्यागी, मुक्तिपथान्वेषी हतभाग्य शिशु हूँ; मुझ पर दया करके अपनी चरण-सेवा का अधिकार दीजिए।''

साधुजी ने मृदु हँसी हँसकर दो दफा सिर हिलाकर संक्षेप में कहा, ''बेटा, घर लौट जा, यह पथ अति दुर्गम है।''

मैंने करुण कण्ठ से उसी क्षण उत्तर दिया, ''बाबा, महाभारत में लिखा है, महापापिष्ठ जगाई और माधाई वसिष्ठ मुनि के चरण पकड़कर स्वर्ग चले गये, तो क्या मैं आपके पैर पकड़कर मुक्ति भी नहीं पाऊँगा?।''

साधुजी प्रसन्न होकर बोले, ''बात तेरा सच्चा हय। अच्छा बेटा, रामजी की खुशी।'' जो दूध दुह रहा था उसने आकर चाय तैयार करके बाबाजी को दी। उसकी 'सेवा' हो गयी, हम लोगों ने प्रसाद पाया।

भाँग तैयार हो रही थी संध्यातकाल के लिए। परन्तु उस समय भी बेला बाकी थी इसलिए और तरह के आनन्द का उद्योग करते हुए 'बाबा ने अपने दूसरे चेले को गाँजे की चिलम इशारे से दिखा दी तथा उसे भरने में देर न हो इसके लिए विशेष 'उपदेश' दे दिया।

आधा घण्टा बीत गया। सर्वदर्शी बाबाजी मेरे प्रति परम सन्तुष्ट होकर बोले, ''हाँ बेटा, तुममें अनेक गुण हैं। तुम मेरे चेला होने के अति उपयुक्त पात्र हो।

मैंने, परम आनन्द के साथ, और एक दफा बाबा के चरणों की धूलि मस्तक पर धारण कर ली।

दूसरे दिन मैं प्रात:स्नान करके आया। देखा कि गुरुजी के आशीर्वाद से अभाव किसी चीज का नहीं है। प्रधन चेला जो थे उन्होंने, एक नया टटका गेरुए कपड़ों का सूट, दस जोड़ी छोटी बड़ी रुद्राक्ष की मालाएँ और एक जोड़ा पीतल के कड़े बाहर निकाल दिये। जहाँ जो वस्तु धारण करने की थी उसे उस स्थान पर सजाकर, थोड़ी-सी धूनी की राख मस्तक पर और मुँह पर मल ली। ऑंखें मींचकर मैंने कहा, ''बाबाजी, शीशा-वीसा कुछ है? एक दफा मुँह देखने की प्रबल इच्छा हो रही है।'' मैंने देखा कि उन्हें भी रस का ज्ञान है। फिर भी उन्होंने कुछ गम्भीर होकर उपेक्षा से कहा, ''है एक ठो।''

''तो फिर, छुपाकर ले न आइए एक दफा।''

दो मिनट के बाद आईना लेकर मैं एक वृक्ष की आड़ में चला गया। पश्चिम के नायी जिस तरह का आईना हाथ में देकर क्षौर-कर्म सम्पादित करते हैं, उसी तरह की वह छोटी सी टीन चढ़ी हुई आरसी थी। खैर जैसी भी हो, मैंने देखा कि वह विशेष तरद्दुद किये जाने और सदा व्यवहार में आने के कारण खूब साफ-सुथरी थी। चेहरा देखकर हँसे बिना न रहा गया। कौन कह सकता था कि मैं वही श्रीकान्त हूँ जो कुछ ही समय पूर्व राजे-राजवाड़ों की मजलिस में बैठकर बाईजी का गान सुना करता था? खैर, जाने दो।

मैं घण्टे-भर के बाद गुरुमहाराज के समीप दीक्षा के लिए लाया गया। महाराज चेहरा देखकर अतिशय प्रीति के साथ बोले, ''बेटा, एकाध महीना ठहर जाओ।''

मैं धीरे-से 'बहुत अच्छा', कहकर उनकी पदधूलि ग्रहण करके, हाथ जोड़कर भक्ति से भरकर एक तरफ बैठ गया।

आज बातों ही बातों में उन्होंने आध्यानत्मिकता के अनेक उपदेश दिये। इसकी दुरूहता के विषय में गम्भीर वैराग्य और कठोर साधाना के विषय में-आजकल के भण्ड पाखण्डी लोग इसे किस तरह कलंकित करते हैं उसका विशेष विवरण तथा भगवत् के पाद-पद्मों में मति को स्थिर करने के लिए क्या-क्या करना आवश्यक है- इस काम में वृक्षजातीय शुष्क वस्तु विशेष के धुएँ को बार-बार मुख-विवर के द्वारा शोषण करके नासा-रन्ध्रं पथ से शनै:-शनै: विनिर्गत करने से कितना आश्चर्यकारी उपकार होता है- आदि सब उन्होंने अच्छी तरह समझा दिया, और इस विषय में मेरी अवस्था अत्यन्त आशाप्रद है, यह इशारे से बताकर उन्होंने मेरे उत्साह को खूब बढ़ाया! इस तरह उस दिन मोक्ष-पद के अनेक निगूढ़ तात्पर्यों को जानकर मैं, गुरु महाराज के तीसरे चेले के रूप में बहाल हो गया।

गहरे वैराग्य और कठोर साधना के लिए, महाराज के आदेश में, हम लोगों की सेवा की व्यवस्था कुछ कठोर किस्म की थी। परिणाम में वह जैसी थी स्वाद में भी वैसी ही थी। चाय, रोटी, घी, दूध, दही, चिवड़ा, शक्कर इत्यादि कठोर सात्विक भोजन और उन्हें पचाने के अनुपान। भगवत्पादार्विदों से हमारा चित्त विक्षिप्त न हो, इस ओर भी हम लोगों की लेशमात्र लापरवाही नहीं थी। इसके फलस्वरूप मेरे सूखे काठ में फूल लग गये और कुछ तोंद बढ़ने के लक्षण भी दिखाई देने लगे।

एक काम था- भिक्षा के लिए बाहर जाना सन्यासी के लिए सर्वप्रधान कार्य न होने पर भी प्रधान कार्य था! क्योंकि सात्विक भोजन के साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध था। किन्तु महाराज स्वयं यह नहीं करते थे, उनके सेवक ही पारी-पारी से किया करते थे। सन्यासी के अन्य दूसरे कर्त्तव्यों में तो उनके दूसरे दो चेलों को मैं बहुत जल्द लाँघ गया; परन्तु केवल इस काम में बराबर लँगड़ाता रहा! इसे किसी दिन भी अपने लिए सहज और रुचिकर न बना सका। फिर भी, एक सुभीता यह था कि वह हिन्दुस्तानियों का देश था। मैं भले-बुरे की बात नहीं कहता- मैं सिर्फ यही कहता हूँ कि बंगाल देश की नाईं वहाँ की औरतें 'बाबा हाथ जोड़ती हूँ, और एक घर आगे जाकर देखो' कहकर उपदेश नहीं देतीं; और पुरुष भी 'नौकरी न करके तुम भिक्षा क्यों माँगते हो?' यह कैफियत तलब नहीं करते। धनी-निर्धन, बिना किसी भेदभाव के सब ही, प्रत्येक घर से, भिक्षा देते हैं- कोई विमुख नहीं जाता। इसी तरह दिन जाने लगे, पन्द्रह दिन तो उस आम के बाग में ही कट गये। दिन के समय तो कोई आपत-विपत नहीं थी, केवल रात्रि को मच्छरों के काटने की जलन के मारे मन ही मन लगता था कि, भाड़ में जाय मोक्ष-साधना। यदि शरीर के चमड़े को कुछ और मोटा न किया जायेगा, तो अब जान न बचेगी। अन्यान्य विषयों में बंगाली लोग चाहे जितने भी श्रेष्ठ क्यों न हों, परन्तु बंगाली चमड़े की अपेक्षा हिन्तुस्तानी चमड़ा, इस विषय में सन्यास के लिए बहुत अधिक अनुकूल है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। उस दिन प्रात:स्नान करके सात्विक भोजन प्राप्त करने के प्रयत्न में बाहर जा ही रहा था कि गुरु महाराज ने बुलाकर कहा,

''भारद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा! जिनहिं रामपद अति अनुरागा''

अर्थात् ''स्ट्राइक दि टेण्ट'' (तम्बू उखाड़ लो)- प्रयाग की यात्रा करनी होगी। परन्तु, यह कार्य कुछ सहज नहीं था, सन्यासी की यात्रा जो ठहरी! सधे हुए टट्टुओं को खोजते और उन पर सामान लादते, ऊँट पर महाराज की जीन कसते, गाय-बकरियों को साथ लेते, गट्ठे गठरियाँ बाँधते, सिलसिले से लगाते लगाते, एक पहर बीत गया। इसके बाद खाना खाकर दो कोस दूर संध्या् के पहले ही बिठौरा गाँव के गेंवडे एक विराट वटवृक्ष के नीचे डेरा जमाया गया। जगह बहुत ही सुन्दर थी, गुरु महाराज को खूब पसन्द आई। यह तो हुआ, परन्तु भारद्वाज मुनि के उस स्थान तक पहुँचते-पहुँचते कितने महीने लग जायेंगे, इसका मैं अनुमान नहीं कर सका।

इस बिठौरा गाँव का नाम अभी तक मुझे क्यों याद रहा है सो यहाँ कहता हूँ। उस दिन पूर्णिमा तिथि थी; इसलिए, गुरु के आदेश से हम तीनों जने तीन दिशाओं में भिक्षा के लिए बाहर निकल पड़े थे। अकेला होता तो उदर-पूर्ति के लिए कम कोशिश न करता। परन्तु, आज मेरी वह चाल नहीं थी, इसलिए बहुत कुछ निरर्थक यहाँ-वहाँ घूम रहा था। एकाएक एक मकान के खुले दरवाजे के भीतर से मुझे एक बंगाली लड़की का चेहरा दिखाई पड़ गया। उसके कपड़े यद्यपि देशी करघे पर बुने हुए टाट की तरह मोटे थे, किन्तु उन्हें पहिनने के विशेष ढंग ने ही मेरे कुतूहल को उत्तेजित कर दिया। मैंने सोचा, पाँच-छ: दिन से इस गाँव में हूँ, करीब-करीब सब घरों में हो आया हूँ, परन्तु बंगाली स्त्री तो दूर की बात, बंगाली पुरुष का चेहरा तक भी नज़र नहीं आया। साधु-सन्यासियों के लिए कहीं रोक-टोक नहीं। भीतर प्रवेश करते ही वह स्त्री मेरी ओर देखने लगी। उसका मुँह मैं आज भी याद कर सकता हूँ। इसका कारण यह है कि दस-ग्यारह वर्ष की लड़की की ऑंखों में इतनी करुण, इतनी मलिन-उदास दृष्टि और कहीं कभी देखी है, ऐसा मुझे याद नहीं आता। उसके मुँह से, उसके होठों से, उसकी ऑंखों से-उसके सर्वांग से मानो दु:ख और निराशा फूटी पड़ती थी। मैंने एकबारगी बँगला में कहा, ''कुछ भिक्षा देना, माँ।'' पहले तो वह कुछ न बोली। इसके बाद उसके होंठ एक-दो बार काँपकर फूल उठे और वह भर-भराकर रो उठी।

मैं मन ही मन कुछ लजाकर रह गया। क्योंकि, सामने कोई न था तो भी, पास के घर में से बिहारी औरतों की बातचीत सुनाई पड़ रही थी। उनमें से यदि कोई एकाएक बाहर आकर इस अवस्था में हम दोनों को देख ले, तो वह क्या सोचेगी, क्या कहेगी यह कुछ भी मैं न सोच सका। खड़ा रहूँ, या प्रस्थान कर जाऊँ, यह निश्चय कर सकने के पूर्व ही उस लड़की ने रोते-रोते एक साँस में ही हजार प्रश्न पूछ डाले, ''तुम कहाँ से आ रहे हो? कहाँ रहते हो? तुम्हारा घर क्या वर्ध्दमान जिले में है? तुम वहाँ कब जाओगे? तुम्हें क्या राजापुर मालूम है? वहाँ के गौरी तिवारी को चीन्हते हो?''

मैं बोला, ''तुम्हारा घर क्या वर्ध्दमान जिले के राजापुर में है?''

उस लड़की ने हाथों से ऑंखों का जल पोंछते हुए कहा, ''हाँ, मेरे पिता का नाम गौरी तिवारी है और भाई का नाम रामलाल तिवारी है। उन्हें क्या तुम चीन्हते हो? तीन महीने हुए मैं ससुराल आईं हूँ, अभी तक एक भी चिट्ठी मुझे नहीं मिली- पिता, भाई, माँ गिरिबाला और बाबू कैसे हैं, कुछ भी नहीं जानती। वह जो पीपल का वृक्ष है- उसके नीचे मेरी बहिन की ससुराल का मकान है। उस सोमवार को जीजी गले में फाँसी लगाकर मर गयी- पर वे लोग कहते हैं कि- नहीं, वे हैजे से मरी हैं।''

मैं विस्मय के मारे हतबुद्धि-सा हो गया। यह क्या बात है? ये लोग, देखता हूँ कि पूरे हिन्दुस्तानी हैं; परन्तु, लड़की एकबारगी शुद्ध बंगालिन है। इतनी दूर, इन घरों में, इन लड़कियों की ससुरालें क्योंकर हुई और इनके पति, सास-ससुर आदि यहाँ क्या करने आए!

वह बोली, ''जीजी राजापुर जाने के लिए रात-दिन रोती थीं, खाती नहीं थीं, सोती नहीं थीं। इसीलिए उनके बाल धन्नी से बाँधकर उन्हें सारे दिन और सारी रात खड़ा कर रक्खा था। इसीलिए गले में रस्सी डालकर मर गयी।''

मैंने पूछा, ''तुम्हारे भी सास-ससुर क्या हिन्दुस्तानी हैं?''

उस लड़की ने फिर एक बार रोकर कहा, ''हाँ। मैं उन लोगों की बातचीत कुछ भी नहीं समझ पाती, उन लोगों का खाना मैं मुँह में नहीं डाल सकती- मैं तो दिन-रात रोया करती हूँ। परन्तु, पिता न तो हमें चिट्ठी ही लिखते हैं और न लिवा ही ले जाते हैं।''

मैंने पूछा, ''अच्छा, तुम्हारे पिता ने तुम्हें इतनी दूर ब्याहा ही क्यों?''

लड़की बोली, ''हम लोग तिवारी जो हैं। हमारी जाति के ब्याह-योग्य लड़के उस देश में तो मिलते नहीं।''

''तुम्हें क्या वे मारते-पीटते भी हैं?''

''और नहीं तो क्या? यह देखो न!'' इतना कहकर उस लड़की ने भुजाओं में, पीठ के ऊपर, मार के निशान दिखाए और फफक-फफककर रोते हुए कहा, ''मैं जीजी की तरह गले में फाँसी लगाकर मर जाऊँगी।''

उसका रोना देखकर मेरे भी नेत्र सजल हो उठे और प्रश्नोत्तर या भीख की अपेक्षा किये बगैर ही मैं बाहर हो गया। किन्तु, वह लड़की मेरे पीछे-पीछे चली आई और कहने लगी, ''मेरे पिता के पास जाकर तुम कहोगे न? वे मुझे यहाँ से एक दफा ले जाँय, नहीं तो मैं-'' किसी तरह थोड़ा-सा सिर हिलाकर स्वीकार करके तेज चाल से अदृश्य हो गया। उस लड़की का हृदयभेदी आवेदन मेरे दोनों कानों में गूँजने लगा।

रास्ते के मोड़ के ऊपर ही एक बनिये की दुकान थी। प्रवेश करते ही दुकानदार ने आदर के साथ मेरी अभ्यर्थना की। खाद्य द्रव्य की भीख न माँगकर जब मैं एक चिट्ठी लिखने का कागज और कलम-दावात माँग बैठा, तब उसने आश्चर्य तो किया, परन्तु इन्कार नहीं किया। उसी जगह बैठकर मैंने गौरी तिवारी के नाम पर एक पत्र लिखकर डाल दिया। समस्त विवरण विवृत करने के बाद अन्त में यह बात लिखना भी मैं नहीं भूला कि लड़की की बहिन हाल में ही फाँसी लगाकर मर गयी है और वह खुद भी, मार-पीट, अत्याचार सहन न कर सकने के कारण उसी पथ पर जाने का संकल्प कर चुकी है। तुम खुद आकर कुछ उपाय न करोगे तो क्या हो जायेगा, सो कहा नहीं जा सकता। बहुत सम्भव है कि तुम्हारी चिट्ठी-पत्री ये लोग तुम्हारी लड़की को न देते हों। उस पर ठिकाना लिखा, वर्दवान जिले में राजापुर ग्राम। मालूम नहीं कि वह पत्र गौरी तिवारी को पहुँचा या नहीं; और पहुँचा भी, तो उसने कुछ किया या नहीं। परन्तु वह घटना मेरे मन पर इस तरह मुद्रित हो गयी है कि, इतने समय बाद भी, पूरी तरह याद बनी हुई है; तथा इस आदर्श हिन्दू समाज के सूक्ष्माति-सूक्ष्म जाति-भेद के विरुद्ध एक विद्रोह का भाव आज भी मेरे मन से नहीं जाता।

सम्भव है, यह जाति-भेद का सिद्धान्त बहुत ही अच्छा हो; जब कि इसी उपाय से सनातन हिन्दू जाति आज तक बची हुई है, तब इसकी प्रचण्ड उपकारिता के सम्बन्ध संशय करने के लिए या प्रश्न करने के लिए और कुछ शेष नहीं रहता। कहीं कोई दो बदनसीब लड़कियाँ दु:ख न सह सकने के कारण गले में फाँसी लगाकर मर जाँयगी, इस डर से इसका कठोर बन्धन बिन्दुमात्र शिथिल करने की कल्पना करना भी पागलपन है। किन्तु उस लड़की का रोना जो मनुष्य अपनी ऑंखों देख आया है उसके लिए यह साध्य् नहीं हो सकता कि वह इस प्रश्न को अपने पास में आने से रोक सके कि किसी तरह टिके रहना- अपना अस्तित्व मात्र बनाए रखना ही क्या जीवन की चरम सार्थकता है? इस तरह की तो बहुत-सी जातियाँ अपना अस्तित्व बनाए हुए मौजूद हैं। कोरकू हैं, कोल, भील-संथाल हैं, प्रशान्त महासागर के अनेक छोटे-मोटे द्वीपों की अनेक छोटी-मोटी जातियों की मनुष्य सृष्टि शुरू से अभी तक वैसी ही बनी हुई हैं। अफ्रीका में हैं, अमेरिका में हैं; उन जातियों में भी इस तरह के सब कठोर सामाजिक आईन-कानून मौजूद हैं जिन्हें सुनकर शरीर का रक्त पानी हो जाता है। उम्र के लिहाज से वे जातियाँ यूरोप की अनेक जातियों के अति वृद्ध पितामहों की अपेक्षा भी प्राचीन हैं, और हमसे भी अधिक पुरातन हैं। किन्तु इसलिए ये जातियाँ हमारी अपेक्षा सामाजिक आचार-व्यवहार में श्रेष्ठ हैं, ऐसा अद्भुत संशय, मैं समझता हूँ, किसी के मन में न उठता होगा। सामाजिक समस्याएँ झुण्ड बाँधकर सामने नहीं आतीं। यों ही एकाध क्वाचित् कदाचित् ही आविर्भूत होती है। अपनी दोनों बंगाली लड़कियों को हिन्दुस्तानियों के घर ब्याहते समय गौरी तिवारी के मन में शायद इस तरह का प्रश्न आया था। किन्तु, वह बेचारा इस दुरुह प्रश्न से छुटकारा पाने का कोई रास्ता न खोज सकने के कारण ही अन्त में, सामाजिक यूपकाठ के ऊपर दोनों कन्याओं का बलिदान देने के लिए बाध्यन हुआ था। जो समाज इन दोनों निरुपाय क्षुप्र बालिकाओं के लिए भी स्थान न दे सका, जो समाज अपने को इतना-सा भी उदार बनाने की शक्ति नहीं रखता, उस लँगड़े निर्जीव समाज के लिए अपने मन में मैं किंचित्-मात्र भी गौरव का अनुभव नहीं कर सका। कहीं किसी एक बड़े भारी लेखक के लेख में पढ़ा था कि हमारे समाज ने जिस एक बड़े सामाजिक प्रश्न का उत्तर जगत के सामने 'जाति-भेद' के रूप में उपस्थित किया है, उसका अन्तिम फैसला आज तक भी नहीं हुआ है। ऐसा ही कुछ उसमें कहा गया था। किन्तु उस समस्त युक्तिहीन उच्छ्वास का उत्तर देने की भी मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। 'हुआ नहीं है' और 'होगा नहीं' ऐसा प्रबल कण्ठ से घोषित करके जो लोग अपने ही प्रश्न के उत्तर को खुद ही दबा देते हैं उनको जवाब देने की भी प्रवृत्ति नहीं होती। खैर, जाने दो।

दुकान से उठकर और ढूँढ़-खोजकर डाक-बक्स में उस बैरंग पत्र को डालकर जब मैं अपने डेरे पर आ पहुँचा, तब मेरे अन्यान्य सहयोगी आटा, दाल आदि संग्रह करके लौटे न थे।

मैंने देखा कि 'साधु-बाबा' आज मानो कुछ खीझे हुए हैं। कारण भी उन्होंने स्वयं प्रकट कर दिया; बोले, ''यह गाँव साधु-सन्यासियों के प्रति उतना अनुरक्त नहीं है, सेवादि की व्यवस्था भी वैसी सन्तोषजनक नहीं करता; इसलिए कल ही इस स्थान का त्याग कर देना होगा!'' 'जो आज्ञा' कहकर मैंने उसी क्षण उसका अनुमोदन कर दिया। मन के भीतर पटना देखने का जो प्रबल कुतूहल छिपा था, अपने पास मैं उसे और अधिक ढँककर न रख सका।

सिवाय इसके, बिहार के गाँव में किसी तरह का आकर्षण भी ढूँढे नहीं मिलता था। उसके पहले मैं बंगाल के अनेक गाँवों में विचरण कर चुका हूँ, किन्तु, उनके साथ इनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। नर-नारी, पेड़-पत्ते, जलवायु- कोई भी चीज़ अपनी-सी नहीं मालूम होती थीं। सारा मन सुबह से लेकर रात्रिपर्यन्त केवल 'भागूँ-भागूँ' किया करता था।

संध्याक के समय मुहल्ले से उस तरह झाँझ-करताल के साथ कीर्तन का सुर कानों में नहीं आता। देव-मन्दिरों में आरती के काँसे के घण्टे आदि भी उस तरह का गम्भीर मधुर शब्द नहीं करते। इस देश की स्त्रियाँ शंखों को भी वैसी मीठी तरह से बजाना नहीं जानतीं, तब यहाँ मनुष्य किस सुख के लिए रहते हैं? और मन ही मन ऐसा लगने लगा कि यदि इन सब गाँवों में मैं न आ पड़ा होता तो अपने गाँवों का मूल्य किसी दिन भी इस तरह न जान पाता। हमारे यहाँ के पानी में काई भरी रहती है, हवा में मलेरिया है, प्राय: सभी मनुष्यों के पेट में पिलही बढ़ी हुई है, घर-घर मुकदमे-मामले हुआ करते हैं, महल्ले महल्ले में दलबन्दियाँ हैं; सो सब रहने दो, परन्तु फिर भी उसके बीच भी कितना रस, कितनी तृप्ति थी। इस समय मानो, उसके विषय में कुछ न जानते हुए भी मैं सब कुछ जानने लगा।

दूसरे दिन तम्बू उखाड़ कर यात्रा शुरू कर दी गयी; और साधु बाबा यथा शक्ति भारद्वाज मुनि के आश्रम की ओर दलबल-सहित अग्रसर होने लगे। किन्तु चाहे रास्ता सीधा पड़ेगा इस खयाल से हो, अथवा मुनि ने मेरे मन की बात जान ली- इस कारण से हो, पटना के दस कोस के भीतर उन्होंने और फिर कहीं तम्बू नहीं गाड़ा। मन में एक वासना थी। खैर उसे इस समय रहने दो। पाप-ताप मैंने बहुत से किये हैं; साधु-संग भी कुछ दिन करके पवित्र हो लूँ।

एक दिन संध्यात के कुछ पहले जिस जगह हमारा डेरा पड़ा, उसका नाम था छोटी बगिया। आरा स्टेशन से यह स्थान आठ कोस दूर है। इस गाँव के एक प्रसिद्ध बंगाली सज्जन से मेरा परिचय हो गया था। उनकी सदाशयता का यहाँ कुछ वर्णन करूँगा। उनके पैतृक नाम को गुप्त रखकर 'राम बाबू' कहना ही अच्छा है, क्योंकि अब तक वे जीवित हैं। और बाद में, अन्यत्र यद्यपि उनसे मेरा साक्षात्कार हुआ था, फिर भी वे मुझे पहिचान नहीं सके थे। इसमें कुछ अचरज भी नहीं है। परन्तु उनका स्वभाव मैं जानता हूँ। गुप्त रूप से उन्होंने जो सत्कार्य किये हैं उनका प्रकाश्य रूप में उल्लेख किये जाने पर वे विनय से संकुचित हो उठेंगे, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। इसलिए उनका नाम है 'राम बाबू'। किस तरह राम बाबू उस गाँव में आए थे और किस तरह उन्होंने जमा-जमीन संग्रह करके खेती-बारी की थी, सो मुझे नहीं मालूम। इतना ही मैं जानता हूँ कि उन्होंने दूसरी दफा विवाह किया था और तीन-चार पुत्र-कन्याओं के साथ वे वहाँ सुख से वास करते थे।

सुबह के समय सुना गया कि इन्हीं छोटी बगिया और बड़ी बगिया नामक गाँवों में उस समय शीतला ने महामारी के रूप में दर्शन दिए हैं। देखा गया है कि गाँव के दु:समय में ही साधु सन्यासियों की सेवा विशेष सन्तोषजनक होती है। इसीलिए साधु बाबा ने अविचलित चित्त से वहाँ पर अवस्थान करने का संकल्प कर लिया।

अच्छी बात है। सन्यासी जीवन के सम्बन्ध में यहाँ पर मैं एक बात कह देना चाहता हूँ। जीवन में इनमें से मैंने अनेकों को देखा है। चारेक दफा मैं उनके साथ ऐसे ही घनिष्ठ भाव से घुल-मिलकर भी रहा हूँ। दोष जो उनमें हैं सो हैं ही, मैं तो गुणों की बात ही कहूँगा। 'केवल पेट के लिए साधुजी' तो आप में से अनेक जानते होंगे, परन्तु इन लोगों में भी ये दो दोष मेरी नजर नहीं आए, और मेरी नजर भी कुछ बहुत स्थूल नहीं है। स्त्रियों के सम्बन्ध में इन लोगों का संयम कहो या उत्साह की स्वल्पता कहो- खूब अधिक है, और प्राणों का भय भी इन लोगों में बिल्कुिल ही कम होता है। 'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्' तो है, परन्तु क्या करने से 'बहुदिनं जीवेत्' यह खयाल नहीं होता। हमारे साधु बाबा भी ऐसे ही थे! पहली वस्तु के याने 'सुख' के लिए दूसरी अर्थात् 'जीवेत्' को उन्होंने तुच्छ कर दिया था!''

थोड़ी-सी धूनी की राख और दो बूँद कमण्डलु के जल के बदले में जो सब वस्तुएँ दनादन डेरे में आने लगीं वह, क्या तो सन्यासी और क्या गृहस्थ, किसी के लिए विरक्ति का कारण नहीं हो सकतीं!

राम बाबू स्त्री सहित रोते हुए आए। चार रोज के बुखार के बाद आज सुबह बड़े लड़के को शीतला दिखाई पड़ी हैं और छोटा बच्चा कल रात से ज्वर में बेहोश पड़ा है। यह जानकर कि वे बंगाली हैं मैंने स्वयं उनके निकट जाकर उनसे परिचय किया।

इसके बाद कथा के सिलसिले में मैं महीने-भर का विच्छेद कर देना चाहता हूँ। क्योंकि किस तरह यह परिचय घनिष्ठ होता गया, किस तरह दोनों बच्चे चंगे हुए- इसकी बहुत लम्बी कथा है। कहते-कहते मेरा भी धीरज छूट जायेगा, फिर पाठकों की बात तो दूर रही। फिर भी, बीच की एक बात कहे देता हूँ। करीब पन्द्रह दिन बाद, जब कि रोग का प्रकोप बहुत बढ़ा-चढ़ा था, साधुजी ने अपना डेरा उठाने का प्रस्ताव किया। राम बाबू की स्त्री रोकर बोल उठीं, ''सन्यासी भइया, तुम तो सचमुच के सन्यासी नहीं हो- तुम्हारे शरीर में तो दया-माया है। नवीन और जीवन को यदि तुम छोड़कर चले आओगे, तो वे कभी नहीं बचेंगे। कहाँ, जाओ देखूँ, कैसे जाते हो?'' इतना कहकर उसने मेरे पैर पकड़ लिये। मेरी ऑंखों से भी ऑंसू निकल पड़े। राम बाबू भी स्त्री की प्रार्थना में योग देकर अनुनय-विनय करने लगे। इसलिए मैं नहीं जा सका। साधु बाबा से मैं बोला; ''प्रभो, आप अग्रसर हूजिए, मैं रास्ते के बीच में, नहीं तो प्रयाग में पहुँचकर, आपकी पदधूलि अवश्य ही माथे चढ़ा सकूँगा, इसमें कोई सन्देह है।'' प्रभु कुछ क्षुण्ण हुए। अन्त में बार-बार अनुरोध करके, अकारण कहीं विलम्ब न लगा देना, इस सम्बन्ध में बार-बार सावधान करके, वे सदल-बल यात्रा कर गये। मैं राम बाबू के घर में ही रह गया। इन थोड़े से दिनों के बीच में ही मैं इस तरह प्रभु का सबसे अधिक स्नेह-पात्र हो गया था कि यदि और टिका रहता तो उनकी सन्यास-लीला के अवसान पर, उत्तराधिकार-सूत्र से मैं उस टट्टू और दोनों ऊँटों पर दखल प्राप्त कर सकता, इसमें कोई सन्देह नहीं रह गया था खैर जाने दो- हाथ की लक्ष्मी पैर से ठेलकर, गयी बात को लेकर, परिताप करने में अब कोई लाभ नहीं है।

दोनों लड़के चंगे हो गये। महामारी इस दफे सचमुच ही महामारी के रूप में दिखाई दी। वह कैसा व्यापार था जिसने अपनी ऑंखों नहीं देखा वह किसी का लिखा हुआ पढ़कर, कहानी सुनाकर या कल्पना करके हृदयंगम कर सके यह असम्भव है। अतएव इस असम्भव कार्य को सम्भव करने का प्रयास मैं नहीं करूँगा। लोगों ने भागना शुरू किया; इसमें और कोई विवेक विचार नहीं रहा! जिस घर में मनुष्य का चिह्न दिखाई देता था उसमें झाँककर देखने से नजर आता था कि केवल माँ अपनी पीड़ित सन्तान को आगे लिये बैठी है।

राम बाबू ने भी अपनी घरू बैलगाड़ी में माल-असबाब लाद दिया। वे तो कई दिन पहले ही ऐसा करना चाहते थे, किन्तु, बाध्यड़ होकर ही न कर सके। पाँच-छ: दिन पहले से ही मेरी सारी देह एक ऐसे बुरे आलस्य से मर गयी थी कि कुछ भी भला नहीं लगता था। मालूम होता था कि रात्रि-जागरण और परिश्रम के कारण ही ऐसा हो रहा है। उस दिन सुबह से ही सिर दुखने लगा। बिल्कुरल अरुचि होते हुए भी दोपहर के समय जो कुछ खाया शाम के वक्त उसे कै कर दिया। रात के 9-10 बजे मालूम हुआ कि बुखार चढ़ आया है। उस दिन सारी रात, उन लोगों का उद्योग आयोजन चल रहा था, सभी जाग रहे थे। बहुत रात बीते राम बाबू की स्त्री बाहर से मेरे कमरे के भीतर झाँककर बोली, ''सन्यासी भइया, तुम क्या हमारे साथ ही आरा तक नहीं चलोगे?''

मैं बोला, ''जरूर चलूँगा। किन्तु तुम्हारी गाड़ी में मुझे थोड़ी-सी जगह देनी होगी।''

बहिन ने उत्सुक होकर प्रश्न किया, ''सो कैसे सन्यासी भइया? गाड़ियाँ तो दो से अधिक नहीं मिल सकीं। उनमें तो हम लोगों भर के लिए भी जगह नहीं है।''

मैंने कहा, ''मुझमें तो चलने की ताकत नहीं है बहिन, सुबह से ही खूब बुखार चढ़ा है।''

''बुखार! कहते क्या हो?'' इतना कहकर उत्तर की भी अपेक्षा न करके मेरी नूतन बहिन अपना मुँह श्याम करके चली गयी।

कितनी देर तक मैं सोता रहा, सो नहीं कह सकता। जागकर देखा तो दिन चढ़ आया है। मकान के भीतर के सभी कमरों में ताला लगा हुआ है, मनुष्य प्राणी का नाम भी नहीं है।

बाहर के जिस कमरे में मैं था उसके सामने से ही इस गाँव का कच्चा रास्ता आरा स्टेशन तक गया है। इस रास्ते पर से प्रतिदिन कम से कम 5-6 बैलगाड़ियाँ, मृत्यु-भीत नर-नारियों का माल-असबाब लादकर, स्टेशन जाया करती थीं। दिन-भर अनेक प्रयत्न करने के बाद में शाम को इनमें से एक में स्थान पाकर जा बैठा। जिन वृद्ध बिहारी सज्जन ने दया करके मुझे अपने साथ ले लिया था उन्होंने बड़े तड़के ही मुझे स्टेशन के पास एक वृक्ष के नीचे उतार दिया। उस समय बैठने का भी मुझमें सामर्थ्य नहीं था। वहीं मैं लेट गया। पास में ही एक टीन का परित्यक्त शेड था। पहले वह मुसाफिरखाने के काम में आता था; किन्तु, वर्तमान समय में झड़-बादल के दिन गाय-बछड़ों के उपयोग में आने के सिवाय, और किसी काम में नहीं आता था। ये वृद्ध सज्जन स्टेशन से एक बंगाली युवक को बुला लाए। मैं उसी की दया से, कई एक कुलियों की सहायता से, उस शेड के नीचे लाया गया।

 
मेरा बड़ा दुर्भाग्य है कि मैं उस युवक का कोई परिचय नहीं दे सकता, क्योंकि, मैं उस समय उसकी कुछ भी पूछताछ नहीं कर सका था। पाँच-छ: महीने बाद, पूछने का जब सुयोग और शक्ति मिली तब, मालूम हुआ कि शीतला के रोग से पीड़ित होकर इस बीच में ही वह इस लोक से कूच कर गया है। उसके सम्बन्ध में पूछने पर इतना ही मालूम हो सका कि वह पूर्वीय बंगाल का था और पन्द्रह रुपये महीने वेतन पर स्टेशन में नौकरी करता था। कुछ देर ठहरकर अपना सैकड़ों जगह से फटा हुआ बिछौना लाकर उसने हाजिर किया और वह बार-बार कहने लगा कि मैं अपने हाथ से पकाकर खाता हूँ और दूसरे के घर रहता हूँ। दोपहर के समय एक कटोरा गरम दूध लाकर उसने जबरन पिलाकर कहा, ''डरने की बात नहीं है, आप अच्छे हो जाँयगे। परन्तु आत्मीय बन्धु-बान्धव आदि किसी को भी यदि खबर देनी हो तो, ठिकाना बताने पर, मैं तार दे सकता हूँ।''

उस समय मैं खूब होश में था। इसलिए यह भी अच्छी तरह समझा था कि ऐसी अवस्था बहुत देर तक नहीं रहेगी। इस तरह का ज्वर यदि और भी 5-6 घण्टे स्थायी बना रहा तो होश अवश्य गँवाना पड़ेगा। अतएव, जो कुछ करना है, वह इतने समय के भीतर न करने पर, फिर नहीं किया जायेगा।

सो तो ठीक, परन्तु खबर देने के प्रस्ताव पर मैं सोच-विचार में पड़ गया। क्यों, सो खोलकर बताने की जरूरत नहीं। परन्तु सोचा, गरीब का पैसा टेलीग्राम में अपव्यय करने से लाभ ही क्या है?

शाम के बाद वह भद्र पुरुष अपनी डयूटी से अवकाश लेकर एक घड़ा पानी और एक किरासिन की डिब्बी लेकर उपस्थित हुआ, उस समय ज्वर की यन्त्रणा से मस्तक क्रमश: बिगड़ रहा था। उसे पास में बुलाकर मैंने कहा, ''जब तक मुझे होश है तब तक बीच-बीच में आकर देख जाना; इसके बाद जो होना हो सो हो, आप और कोई कष्ट न करना।''

वह अत्यन्त मुँह-चोर प्रकृति का भद्र पुरुष था। बात बनाकर कहने की उसमें क्षमता नहीं थी। जवाब में केवल 'नहीं' कहकर ही वह चुप हो रहा। मैंने कहा, ''आपने चाहा था कि किसी को खबर करा दूँ। मैं सन्यासी आदमी हूँ, वास्तव में मेरा कोई भी नहीं। फिर भी पटने में प्यारी बाई के ठिकाने पर यदि एक पोस्ट कार्ड लिख दोगे कि श्रीकान्त आरा स्टेशन के बाहर एक टीनशेड के नीचे मरणापन्न होकर पड़ा है तो...''

वह युवक अत्यन्त व्यस्त होकर बोल उठा, ''मैं अभी दिए देता हूँ।'' चिट्ठी और टेलीग्राम दोनों ही भेजे देता हूँ'', इतना कहकर वह उठकर चला गया। मैंने मन ही मन कहा, 'भगवान, वह खबर पा जाय!'

' ' ' '

होश आने पर पहले तो मैं अपनी अवस्था अच्छी तरह समझ भी न सका। मस्तक पर हाथ ले जाकर अनुभव किया कि यह तो आईस-बेग है। ऑंखें मिलमिलाकर देखा कि मकान के भीतर एक खाट पर पड़ा हूँ। सामने स्टूल के ऊपर एक दीपक के पास दो-तीन दवा की शीशियाँ और उसके पास एक रस्सी की खाट पर कोई मनुष्य लाल चेक का रैपर शरीर पर लपेटे हुए सो रहा है। बहुत देर तक मैं कुछ भी याद न कर सका। इसके बाद, एक-एक करके, जान पड़ने लगा, मानो नींद में कितने ही स्वप्न देखे हैं। अनेक लोगों का आना-जाना उठाकर मुझे डोली में डालना, मस्तक उठाकर दवाई पिलाना, ऐसे कितने ही व्यापार दिखाई पड़े।

कुछ देर बाद, जब वह मनुष्य उठकर बैठ गया तब, देखा कि कोई बंगाली सज्जन हैं, उम्र; अठारह-उन्नीस से अधिक नहीं। उस समय सिरहाने के निकट से मृदु-स्वर में जिसने उसको सम्बोधन किया उसका स्वर मैंने पहिचान लिया।

प्यारी ने अति मृदु कण्ठ से पुकारा, ''बंकू, बरफ को एक बार और बदल क्यों नहीं दिया बेटा?''

लड़का बोला, ''बदले देता हूँ, तुम थोड़ा-सा सो लो न माँ। डॉक्टर बाबू जब कह गये हैं कि शीतला नहीं है, तब डरने की कोई बात नहीं है माँ।''

प्यारी बोली, ''अरे भइया, डॉक्टर के कहने से, कि डर की कोई बात नहीं हैं, औरतों का भय कहीं जाता है? तुझे चिन्ता करने की जरूरत नहीं है बंकू, तू तो बरफ बदल कर सो जा- फिर रात को मत जागना।''

बंकू ने आकर बरफ बदल दिया और लौटकर वह फिर उसी खटिया पर जा पड़ा। थोड़ी ही देर बाद जब उसकी नाक बजने लगी तब मैंने धीरे से पुकारा ''प्यारी!''

प्यारी ने मुँह के ऊपर झुक पड़कर सिर पर के जलबिन्दु ऑंचल से पोंछते हुए कहा, ''मुझे क्या तुम चीन्ह सकते हो? अब कैसे हो? कल...''

''अच्छा हूँ। कब आयीं? यह क्या आरा है?''

''हाँ आरा ही है। कल हम लोग घर चलेंगे।''

''कहाँ?''

''पटने। सिवाय अपने घर ले जाने के, अभी क्या और कहीं, मैं तुम्हें छोड़ जा सकती हँ?''

''यह लड़का कौन है, राजलक्ष्मी?''

''मेरी सौत का लड़का है। किन्तु, बंकू मेरे पेट का लड़का-सा ही है। मेरे पास रहकर ही पटना कॉलेज में पढ़ता है। आज अब और बात मत करो। सो जाओ- कल सब कहूँगी।'' इतना कहकर उसने मेरे मुँह पर हथेली रखकर मेरा मुँह बन्द कर दिया।

मैं हाथ बढ़ाकर राजलक्ष्मी के दाहिने हाथ को मुट्टी में लेकर करवट बदल कर सो रहा।

000

जिस ज्वर से पीड़ित होकर मैं बेहोश हो शय्यागत हो गया था वह शीतला का नहीं था, कुछ और ही था। डॉक्टरी शास्त्र में निश्चय से ही उसका कोई बड़ा भारी कठिन नाम था, परन्तु मुझे वह याद नहीं रहा। खबर पाकर प्यारी, अपने लड़के, दो नौकर और दासी को लेकर, आ उपस्थित हुई। उसी दिन एक ठहरने का स्थान किराये पर लेकर मुझे उसमें स्थानान्तरित कर दिया और शहर के भले-बुरे सब चिकित्सकों को बुलाकर वहाँ इकट्ठा कर लिया। अच्छा ही किया। नहीं तो, और कोई नुकसान चाहे भले ही न होता, परन्तु 'भारतवर्ष' के¹ पाठक-पाठिकाओं के धैर्य की महिमा तो संसार में अविदित ही रह जाती!

सुबह प्यारी ने कहा, ''बंकू, और देरी मत कर बेटा, इसी समय एक सेकण्ड क्लास का डब्बा रिझर्व करा आ। मैं एक क्षण भी इन्हें यहाँ रखने का साहस नहीं कर सकती।''

बंकू की अतृप्त निद्रा उस समय भी उसके दोनों नेत्रों में भर रही थी; उसने उन्हें मूँदे ही मूँदे अव्यक्त स्वर में जवाब दिया, ''तुम पगला गयी हो माँ ऐसी अवस्था में क्या रोगी को यहाँ से वहाँ ले जाया जा सकता है?''

प्यारी ने कुछ हँसकर कहा, ''पहले तू उठ, ऑंख-मुँह पर जल डाल, देखूँ इसके बाद यहाँ-वहाँ ले जाने की बात समझ ली जावेगी। राजा बेटा मेरे, उठ!''

बंकू और कोई उपाय न देख, शय्या त्याग, मुँह हाथ धो, कपड़े बदल स्टेशन चला गया। उस समय भी बहुत जल्दी थी- घर में और कोई नहीं था! धीरे-धीरे पुकारा, ''प्यारी!'' मेरे सिरहाने की ओर एक खटिया सटकर बिछी हुई थी। उसी पर थकावट के कारण, शायद इसी बीच, वह कुछ ऑंखें मूँदकर लेट गयी थी। चटपट उठ बैठी और मेरे मुँह पर झुक गयी। कोमल कण्ठ से उसने पूछा, ''नींद खुल गयी?''

''मैं तो जाग ही रहा हूँ।'' प्यारी ने उत्कण्ठित यत्न के साथ मेरे सिर और कपाल पर हाथ फेरते-फेरते कहा, ''ज्वर तो इस समय बहुत कम है। ऑंखें मूँद कर थोड़ा-सा सोने की चेष्टा क्यों नहीं करते?''

1 श्रीकान्त का यह भ्रमण-वृत्तान्त पहले बंगाल के प्रसिद्ध मासिक पत्र 'भारतवर्ष' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था।

''सो तो मैं बराबर ही करता हूँ प्यारी, आज ज्वर को कितने दिन हुए?''

''तेरह दिन'' कहकर उसने बड़ी बूढ़ी पुरखिन की तरह गम्भीर भाव से कहा, ''देखो, लड़के-बालों के सामने मुझे यह नाम लेकर मत पुकारा करो। बहुत दिनों तक 'लक्ष्मी' कहकर पुकारा किये हो, वही नाम लेकर क्यों नहीं पुकारते?''

दो दिन से मैं खूब होश में था। मुझे भी सब बातें याद आ गयी थीं। मैंने कहा, ''अच्छा।'' इसके बाद, जिस बात के कहने के लिए बुलाया था उसे मन ही मन अच्छी तरह सजाकर कहा, ''मुझे ले जाने की चेष्टा कर रही हो, किन्तु, मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिए हैं, अब और नहीं देना चाहता।''

''तो फिर क्या करना चाहते हो?''

''मैं सोचता हूँ, अब जैसा मैं हूँ, उससे जान पड़ता है कि तीन-चार दिन में ही, अच्छा हो जाऊँगा! तुम लोग चाहे तो इतने दिन और ठहर कर घर चले जाओ।''

''तब तुम क्या करोगे, सुनूँ तो?''

''जो कुछ होना होगा सो हो जायेगा।''

''सो हो जायेगा'' कहकर प्यारी कुछ हँस दी। इसके बाद सामने आकर खाट पर एक ओर बैठकर, मेरे मुँह की ओर देखकर, क्षण-भर चुप रहकर फिर कुछ हँसकर बोली, ''तीन-चार दिन में तो नहीं, दस-बारह दिन में यह रोग चला जायेगा, यह मैं जानती हूँ; परन्तु असली रोग कितने दिनों में दूर होगा- सो क्या मुझे बता सकते हो?''

''असली रोग और क्या?''

प्यारी ने कहा, ''सोचोगे कुछ, कहोगे कुछ, और-करोगे कुछ, हमेशा से तुम्हें यही एक रोग है। तुम जानते हो कि एक महीने के पहले मैं तुम्हें ऑंखों की ओट न कर सकूँगी- फिर भी कहोगे 'तुम्हें कष्ट दिया, तुम जाओ'; अरे ओ दयामय! मेरा यदि तुम्हें इतना अधिक दर्द है तो, और चाहे जो होओ पर- सन्यासी तो तुम नहीं हो- सन्यासी बनकर यह क्या हंगामा खड़ा किया है! आकर देखती हूँ, तो जमीन पर फटी कथरी पर घोर बेहोशी में पड़े हो, धूल-कीचड़ में जटाएँ सन गयी हैं, सारे अंग में रुद्राक्ष की माला है और दोनों हाथों में पीतल के कड़े हैं! मैया री मैया! चेहरा देखकर रोए बिना न रह सकी!'' इतना कहते-कहते उमड़ा हुआ अश्रुजल उसकी दोनों ऑंखों में झलक आया। चटपट उसे हाथ से पोंछकर वह बोली, ''बंकू बोला, ये कौन हैं माँ? मन ही मन बोली- तू बच्चा है, तेरे आगे वह बात क्या कहूँ भइया! ओह, वह दिन भी कैसी विपत्ति का था, भैया री, कैसी शुभ घड़ी पाठशाला में हमारी चार ऑंखें हुई थीं! जो दु:ख तुमने मुझे दिया है, उतना दु:ख दुनिया-भर में किसी ने कभी किसी को नहीं दिया होगा- और न देगा ही। शहर में शीतला दिखाई दी हैं-सबको लेकर अच्छी भली भाग जा सकूँ तो जान में जान आवे।'' इतना कहकर उसने एक दीर्घ श्वास छोड़ा।

उसी रात को आरा छोड़ दिया। एक कम उम्र का डॉक्टर अनेक तरह की औषधियाँ लेकर हम लोगों को पटना तक पहुँचाने के लिए साथ गया।

पटना पहुँचकर बारह-तेरह दिन के भीतर ही एक तरह से मैं चंगा हो गया। एक दिन सुबह अकेला प्यारी के मकान के प्रत्येक कमरे में घूम आया। उसका माल-असबाब देखकर मैं कुछ विस्मित हुआ। मैंने इसके पहले वैसा देखा न हो सो बात नहीं थी। चीजें सब अच्छी और कीमती थीं, यह ठीक है; परन्तु इस मारवाड़ी मुहल्ले के बीच, इन सब धनी और अल्पशिक्षित शौकीन मनुष्यों के संसर्ग में, इतनी साधारण चीजों से वह सन्तुष्ट कैसे रहती थी? इसके पहले मैंने इस तरह के जितने घर द्वार देखे थे इनके साथ कहीं किसी भी अंश में इसकी समानता नहीं थी। उनमें अन्दर घुसते ही विचार होता था कि इनमें मनुष्य क्षण-भर भी रहते कैसे होगा? उन मकानों के झाड़-फानूस, चित्र दिवालगीरी, आईना और ग्लास-केसों में आनन्द के बदले आशंका ही उत्पन्न होती थी- सहज श्वास-प्रश्वास तक के लिए भी, मालूम होता था कि अवकाश न मिलेगा। बहुत से लोगों की बहुविधा कामना-साधना की उपहार-राशि इस तरह ठसाठस एक के ऊपर एक भरी हुई नजर आती थी कि देखते ही ऐसा मालूम होता था कि इन अचेतन वस्तुओं के समान ही उनके अचेतन दाता भी मानो इस मकान के भीतर जरा-सी जगह के लिए ऐसी ही भीड़ करके परस्पर एक दूसरे के साथ ठेलमठेल संघर्ष कर रहे हैं। किन्तु, इस मकान के किसी भी कमरे में आवश्यकीय चीजों के अतिरिक्त एक भी फालतू चीज नज़र नहीं आई। और जो भी चीजें नजर आईं वे स्वयं गृहस्वामिनी के काम के लिए लाई गयी हैं, और उसकी निजी इच्छा और अभिरुचि को लाँघकर, और किसी की भी प्रलुब्ध अभिलाषा से अनधिकार-प्रवेश करके जगह छेके नहीं बैठी हैं। यह बात सहज में ही मालूम हो गयी। और भी एक बात ने मेरी दृष्टि को आकर्षित किया। इतनी सुप्रसिद्ध 'बाईजी' के घर में गाने-बजाने का कहीं कोई आयोजन भी नहीं है। इस कमरे, उस कमरे में घूमता हुआ दूसरी मंजिल के एक कोने के कमरे के सामने आकर मैं खड़ा हो गया। यह बाईजी का खुद का शयन-मन्दिर है, यह उसके भीतर झाँकते ही मालूम हो गया। परन्तु मेरी कल्पना के साथ इसका कितना अन्तर था। जो कुछ सोच रक्खा था, उसमें का कुछ भी नहीं था। मेज सफेद पत्थर की थी, दीवालें दूध की तरह सफेद चमचमा रही थीं। कमरे के एक किनारे एक छोटे से तख्त के ऊपर बिस्तर बिछे थे, एक लकड़ी की अरगनी पर कुछ वस्त्र टँके थे और उसके पीछे एक लोहे की आलमारी थी। और कहीं कुछ नहीं था। जूते पहिने हुए अन्दर प्रवेश करने में भी मानो मुझे एक तरह के संकोच का अनुभव हुआ, उन्हें चौखट के बाहर खोलकर मैंने भीतर प्रवेश किया। मालूम होता है, थकावट के कारण ही उसकी शय्या पर मैं जाकर बैठ गया था। यदि कमरे में और कोई वस्तु बैठने के लिए होती तो मैं उसी पर बैठता। सामने की ओर खुली हुई खिड़की को ढँके हुए एक बड़ा नीम का पेड़ था। उसी में से छन-छनकर हवा आ रही थी। उस ओर देखता हुआ मैं हठात् जैसे कुछ अन्यमनस्क-सा हो गया था। एक मीठी आवाज से चौंककर मैंने देखा, गुन-गुन गाना गाती-गाती प्यारी कमरे में घुस आई है। वह गंगाजी में स्नान करने गयी थी और अब वहाँ से लौटकर अपने कमरे में गीले कपड़े उतारने आई है। उसने इस ओर एक दफा भी नहीं देखा है। उसके सीधे अरगनी के पास जाकर सूखे वस्त्र पर हाथ डालते ही मैंने व्यक्त होकर आवाज दी, ''घाट पर कपड़े लेकर क्यों नहीं जातीं?''

प्यारी ने चौंककर हँस दिया। बोली, ''ऐं! चोर की तरह मेरे कमरे में घुसे बैठे हो? नहीं नहीं, बैठे रहो, बैठे रहो-अजाओ मत। मैं उस कमरे में से कपड़े बदल आती हूँ।'' इतना कहकर वह हलके पैरों गरद की धोती हाथ में लेकर बाहर चली गयी।

पाँचेक मिनट के बाद वह प्रसन्न मुख से लौट आई और हँसकर बोली, ''मेरे कमरे में तो कुछ भी नहीं है; तब क्या चुराने आए हो, बोलो तो? मुझे तो नहीं?'' मैं बोला, ''तुमने क्या मुझे ऐसा अकृतज्ञ समझ रक्खा है? तुमने मेरे लिए इतना किया, और अन्त में तुम्हारी ही चोरी करूँ, मैं इतना लोभी नहीं हूँ।''

प्यारी का मुँह मलीन हो गया। बोलते समय मैंने नहीं सोचा था कि इस बात से उसे व्यथा पहुँचेगी। उसे व्यथा पहुँचाने की न तो मेरी इच्छा ही थी, और न ऐसी इच्छा होना स्वाभाविक ही था। खास तौर से तब जब कि मैंने दो-एक दिन में वहाँ से प्रस्थान करने का संकल्प कर लिया था। बिगड़ी हुई बात को किसी तरह बना लेने की गरज से मैंने जबर्दस्ती हँसकर कहा, ''अपनी वस्तु की भी क्या कोई चोरी करने जाता है? तुममें इतनी भी बुद्धि नहीं है?''

किन्तु इतने सहज में उसे भुलाया न जा सका। उसने मलीन मुख से कहा, ''तुम्हें और अधिक कृतज्ञ होने की जरूरत नहीं; दया करके तुमने जो उस समय खबर लगा दी, मेरे लिए वही बहुत है।''

उसके शुद्ध स्नात, प्रसन्न हँसते चेहरे को इस धूप से उज्ज्वल प्रभात-काल में ही मैंने म्लान कर दिया, यह देखकर हृदय में एक वेदना सी जाग उठी। उस थोड़ी-सी हँसी के भीतर जो एक माधुर्य था उसके नष्ट होते ही हानि सुस्पष्ट हो उठी। उसे वापिस लौटाने की आशा से मैं उसी क्षण अनुतप्त स्वर में बोल उठा, ''लक्ष्मी, तुम्हारे निकट तो कुछ भी छिपा नहीं है- सब कुछ तो जानती हो। तुम वहाँ नहीं गयी होती तो मुझे उस धूल और रेती के ऊपर ही मर जाना पड़ता, कोई उतनी दूर जाकर एक दफा अस्पताल ले जाने की भी चेष्टा न करता। वह जो तुमने पत्र में लिखा था कि ''सुख के दिनों में न सही तो दु:ख के दिनों में ही मुझे याद कर लेना'' यह बात मुझे मेरी आयु बाकी थी इसीलिए याद आ गयी, यह मैं इस समय अच्छी तरह अनुभव कर रहा हूँ।''

''कर रहे हो?''

''निश्चय से।''

''तो फिर कहो कि मेरे ही लिए तुमने पुन: प्राण पाए हैं?''

''इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।''

''तो क्या मैं उन पर दावा कर सकती हूँ, बोलो?''

''कर सकती हो। परन्तु मेरे प्राण इतने तुच्छ हैं कि उन पर तुम्हारा लोभ होना ही उचित नहीं है।''

प्यारी ने इतनी देर बाद कुछ हँसकर कहा, ''फिर भी गनीमत है कि अपने मूल्य को इतने दिनों में तुमने समझ तो लिया।'' किन्तु दूसरे ही क्षण गम्भीर होकर कहा, ''दिल्लगी रहने दो, बीमारी तो एक तरह से अच्छी हो गयी, अब जाने की कब सोच रहे हो?''

उसके प्रश्न को अच्छी तरह न समझ सका। मैंने गम्भीर होकर कहा, ''कहीं जाने की तो मुझे जल्दी है नहीं। इसलिए यही सोचता हूँ, और भी कुछ दिन ठहर जाऊँ।''

प्यारी बोली, ''किन्तु मेरा लड़का आजकल अक्सर बाँकीपुर से आया करता है। बहुत दिन ठहारोगे तो शायद वह कुछ खयाल करने लगे।''

मैंने कहा, ''करने दो न। उससे डरकर तो कुछ तुम चलती नहीं? ऐसा आराम छोड़कर यहाँ से शीघ्र ही तो मैं कहीं जाता नहीं।''

प्यारी ने विषण्ण मुख से कहा, ''यह भी कहीं हो सकता है?'' इतना कहकर वह एकाएक वहाँ से उठकर चल दी।

दूसरे दिन शाम के वक्त मैं अपने कमरे में पश्चिम की तरफ से बरामदे में एक इजीचेअर पर लेटा हुआ सूर्यास्त देख रहा था। इसी समय बंकू आ उपस्थित हुआ। अभी तक उसके साथ अच्छी तरह बातचीत करने का सुयोग नहीं मिला था। एक चेअर पर बैठने का इशारा करके मैं बोला, ''बंकू, क्या पढ़ते हो तुम?''

लड़का अत्यन्त सीधा-सादा भलामानुस था। बोला, ''गये साल मैंने एन्टे्रन्स पास किया है।''

''तो अब बाँकीपुर कॉलेज में पढ़ते हो?''

''जी हाँ।''

''तुम कितने भाई-बहिन हो?''

''भाई और नहीं हैं। चार बहिनें हैं।''

''उनका ब्याह हो गया?''

''जी हाँ, मैंने ही उन्हें ब्याह दिया है।''

''तुम्हारी अपनी माँ जीती हैं?''

''जी हाँ, वे देश के ही मकान में रहती हैं।''

''तुम्हारी ये माँ, कभी तुम्हारे देश के मकान में गयी हैं?''

''बहुत बार, अभी तो पाँच-छ: ही महीने हुए, आई हैं।''

''इससे देश में कोई गड़बड़ नहीं मचती?''

बंकू कुछ देर चुप रहकर बोला, ''मचती रहे हम लोगों को 'जाति से अलग' कर रक्खा है, सो इससे कुछ हम अपनी माँ को छोड़ थोड़े ही सकते हैं? और ऐसी माँ भी कितने लोगों को नसीब होती है!''

मुँह में आया कि पूछूँ, ''माँ के ऊपर इतनी भक्ति कैसे हुई?'' किन्तु दबा गया।

बंकू कहने लगा, ''अच्छा आप ही कहिए, गाने-बजाने में क्या कोई दोष है? हमारी माँ केवल वही करती हैं। कुछ पराई निन्दा, पराई चर्चा तो करती नहीं? बल्कि, गाँव में जो लोग हमारे परम शत्रु हैं उन्हीं के आठ दस लड़कों को पढ़ाई-लिखाई का खर्च देती हैं; शीत काल में कितने ही लोगों को कपड़े देती हैं, कम्बल देती हैं, यह क्या बुरा करती हैं?''

मैंने कहा, ''नहीं, वह तो बहुत ही भला काम है।''

बंकू ने उत्साहित होकर कहा, ''तब कहिए, हमारे गाँव के समान पाजी गाँव क्या और कोई है? यही देखो न उस वर्ष ईंटें पकाकर हम लोगों ने मकान बनवाया। गाँव में पानी की भयानक तकलीफ देखकर माँ मेरी माँ से बोलीं, जीजी, और कुछ रुपये खर्च करके ईंटें पकाने के भट्ठे की जगह ही एक तालाब ही न बनवा दिया जाय? तीन-चार हजार रुपये खर्च करके तालाब बनवा दिया। घाट भी बँधवा दिया। किन्तु, गाँव के लोगों ने माँ को उस तालाब की प्रतिष्ठा न करने दी। ऐसा बढ़िया पानी- किन्तु कोई पीएगा नहीं, कोई छुएगा नहीं, ऐसे बदजात आदमी हैं। केवल इस ईष्या के मारे सब मरे जाते हैं कि हमारा मकान पक्का बन गया। आप समझे न?''

मैंने अचरज से कहा, ''कहते क्या हो जी, पानी का ऐसा दारुण कष्ट भोगा करेंगे, फिर भी ऐसे पानी का व्यवहार न करेंगे?''

बंकू ने जरा-सा हँसकर कहा, ''वही तो; किन्तु वह क्या अधिक समय चल सकता है? पहले साल तो डर के मारे किसी ने पानी छुआ नहीं, परन्तु अब छोटी जाति के सभी लोग लेते हैं और पीते हैं- ब्राह्मण और कायस्थ भी चैत्र-वैशाख के महीनों में लुक-छिपकर पानी ले जाते हैं- परन्तु फिर भी उन्होंने तालाब की प्रतिष्ठा नहीं करने दी। यह क्या माँ के लिए कम कष्ट की बात है?''

मैंने कहा, ''अपनी नाक काट के पराया अपशकुन करने की जो कहावत सुनी जाती है, वह यही है।''

बंकू जोर से बोल उठा, ''ठीक यही बात है। ऐसे गाँव में अलहदा एक घर से रहना शाप के रूप में भी वरदान के समान है। आपकी क्या राय है?'' जवाब में मैंने भी केवल हँसकर सिर हिला दिया। हाँ या नहीं, कुछ स्पष्ट नहीं कहा। परन्तु इससे बंकू के उत्साह में बाधा नहीं पड़ी। मैंने देखा कि लड़का अपनी विमाता को सचमुच ही प्यार करता है। अनुकूल श्रोता पाकर भक्ति के आवेग में वह देखते-देखते पागल हो उठा और उसे लगातार के स्तुति-वाद ने मुझे करीब-करीब व्याकुल कर दिया।

हठात् एकाएक उसे होश आया कि इतनी देर में मैंने उसकी एक भी बात में योग नहीं दिया। तब वह कुछ अप्रतिभ-सा होकर किसी तरह प्रसंग को दबा देने की गरज से बोला, ''आप यहाँ पर और कुछ दिन हैं न?''

मैंने हँसकर कहा, ''नहीं, कल सुबह ही चला जाऊँगा।''

''कल ही?''

''हाँ कल ही।''

''परन्तु आपका शरीर तो अभी तक सबल हुआ नहीं। क्या आप समझते हैं कि बीमारी एकबारगी चली गयी?''

मैंने कहा, ''सुबह तक तो मैं यही समझता था कि बीमारी गयी, परन्तु अब सोचता हूँ कि नहीं। आज दोपहर ही मेरा सिर दुख रहा है।''

''तो फिर क्यों इतने शीघ्र जाते हैं? यहाँ तो आपको किसी प्रकार का कष्ट है नहीं।'' इतना कहकर वह लड़का चिन्तित मुख से मेरी ओर देखने लगा। मैंने भी कुछ देर चुप हो, उसके चेहरे की ओर देखते हुए, उसके मुँह पर उसके भीतर के यथार्थ भाव पढ़ने की कोशिश की। जितना भी मैंने उसे पढ़ा उससे उसकी ओर से सत्य-गोपन की कोई भी चेष्टा होती हुई मैं अनुभव नहीं कर सकता। इस पर लड़का लजा अवश्य गया और उस लज्जा को ढँकने की भी उसने कोशिश की। वह बोला, ''आप यहाँ से मत जाइए।''

''क्यों न जाऊँ, बताओ?''

''आपके रहने से माँ बड़े आनन्द से रहती हैं।'' यह कह तो दिया- पर इससे उसका मुँह लाल हो गया। वह चट से उठकर चल दिया। मैंने देखा, लड़का अत्यन्त भोला और सरल प्रकृति का जरूर है, परन्तु बेवकूफ नहीं है। प्यारी ने कहा था कि ''और अधिक दिन रहोगे तो मेरा लड़का क्या खयाल करेगा?'' इस बात के साथ उस लड़के के व्यवहार की आलोचना का अर्थ भी मानो मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ ऐसा मुझे मालूम पड़ा; और मातृत्व की इस एक नयी तसवीर के दृष्टिगोचर होने से मानो मैंने एक नूतन ज्ञान सम्पादित किया। प्यारी के हृदय की एकाग्र वासना का अनुमान करना हमारे लिए कठिन नहीं है और वह संसार में सब ओर से सब तरह स्वाधीन है, यह कल्पना करना भी, मैं समझता हूँ कि, पाप नहीं है। फिर भी, उसने जिस मुहूर्त से एक दरिद्र बालक के मातृ-पद को स्वेच्छा से ग्रहण किया है तभी से मानो अपने दोनों पैरों को लोहे की साँकलों से जकड़ लिया है। वह स्वयं चाहे जो हो परन्तु उसे, अपने तईं माता का सम्मान तो अब देना ही होगा! उसकी असंयत कामना, उच्छृंखल प्रवृत्ति, उसे चाहे जितने अध:पतन की ओर क्यों न ठेलना चाहे, परन्तु यह बात भी तो उससे भूली नहीं जाती कि वह एक लड़के की माँ है! और उस सन्तान की भक्ति-नत दृष्टि के सामने तो वह उस माँ को किसी तरह भी अपमानित नहीं होने देगी! उसके विह्वल यौवन के लालसामत्त वसन्त के दिनों में प्यार के साथ किसने उसका नाम 'प्यारी' रक्खा था यह तो मैं नहीं जानता; किन्तु, यह नाम भी वह अपने लड़के के सामने छुपा रखना चाहती है, यह बात मुझे याद आ गयी।

देखते-देखते सूर्य अस्त हो गया। उस ओर ताकते-ताकते मेरा सारा अन्त:करण मानो पिघलकर लाल हो उठा। मन-ही-मन बोला कि राजलक्ष्मी को अब तो मैं नीची निगाह से देख नहीं सकता। हम दोनों का बाहरी बर्ताव इतने दिनों तक चाहे जितने बड़े स्वातन्त्रय की रक्षा करते हुए क्यों न चलता रहा हो, स्नेह चाहे जितना माधुर्य क्यों न ढाल दे, परन्तु इसमें तो कोई सन्देह नहीं है कि दोनों की कामनाएँ एकत्र सम्मिलित होने के लिए प्रत्येक क्षण दुर्निवार वेग के साथ एक-दूसरे की ओर दौड़ रही हैं। परन्तु आज मैंने देखा कि यह असम्भव है। एकाएक 'बंकू की माँ' आकाश मेदी हिमालय पर्वत की नाईं रास्ता रोककर राजलक्ष्मी और मेरे बीच आकर खड़ी है। मन-ही-मन मैंने कहा, कल सुबह ही तो मैं यहाँ से जा रहा हूँ- किन्तु तब कहीं ऐसा न हो कि मन में फायदे-नुकसान का हिसाब लगाने जाकर कुछ बचा रखने की चेष्टा करने लगूँ। मेरा यह जाना अन्तिम जाना ही हो। देख न पाने का बहाना करके एक अति सूक्ष्म वासना का बन्धन मैं यहाँ न रख जाऊँ जिसका सहारा लेकर फिर कभी मुझे यहाँ आकर उपस्थित होना पड़े!

अन्यमनस्यक होकर उसी जगह बैठा हुआ था। संध्याा के समय धूपदानी में धूप डालकर उसे अपने हाथों में लिये हुए राजलक्ष्मी उसी बरामदे में से और एक कमरे में जा रही थी कि चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, ''सिरदर्द कर रहा है, ओस में बैठे हुए हो? कमरे में जाओ।''

मुझे हँसी आ गयी। मैंने कहा, ''अवाक् कर दिया तुमने लक्ष्मी! ओस यहाँ कहाँ है?''

राजलक्ष्मी बोली, ''ओस न सही, ठण्डी हवा तो चल रही है। वही क्या अच्छी होती है?''

''नहीं, यह तुम्हारी भूल है। ठण्डी गरम कोई हवा नहीं चल रही है।'' राजलक्ष्मी बोली, ''मेरी तो सब भूल ही भूल है, परन्तु सिर दर्द कर रहा है यह तो मेरी भूल नहीं है- यह तो सत्य है न? कमरे में जाकर थोड़ी देर सो रहो न? रतन क्या करता है? वह क्या थोड़ा ओडिकोलन सिर में नहीं लगा सकता? इस घर के नौकर-चाकरों के समान नवाब नौकर पृथ्वी में और कहीं नहीं हैं।'' इनता कहकर राजलक्ष्मी अपने काम पर चली गयी।

रतन जब घबराकर और लज्जित हो ओडिकोलन, पानी आदि लेकर हाजिर हुआ और अपनी भूल के लिए बार-बार अनुताप प्रकट करने लगा तब मुझसे हँसे बिना न रहा गया।

रतन ने इससे साहस पाकर धीरे-धीरे कहा, ''इसमें मेरा दोष नहीं है बाबू, यह क्या मैं नहीं जानता? परन्तु माँ से यह कहने का उपाय ही नहीं कि जब तुम्हें गुस्सा आता है, वह झूठमूठ ही घर भर के लोगों के दोष देखने लगती हो।''

कुतूहल से मैंने पूछा, ''गुस्सा क्यों हैं?''

रतन बोला, ''यह जानने का क्या कोई उपाय है? बड़े लोगों को गुस्सा, बाबूजी, यों ही आ जाता है और यों ही चला जाता है। उस समय यदि अपना मुँह छिपाकर न रहा जा सके, तो नौकर-चाकरों के प्राण गये समझो।'' दरवाजे के समीप से एकाएक सवाल आया, ''तब तुम लोगों का मैं सिर काट लेती हूँ, क्यों रतन? और फिर बड़े लोगों के घर में यदि इतनी मुसीबत है तो और कहीं क्यों नहीं चला जाता?''

मालिक के सवाल से रतन कुण्ठित हो नीचा सिर किये चुपचाप बैठा रहा। राजलक्ष्मी ने कहा, ''तेरा काम क्या है? उनका सिर दर्द करता है, यह बंकू के मुँह से सुनकर मैंने तुझसे कहा। इसी से अब रात के आठ बजे यहाँ आकर मेरी बड़ाई कर रहा है। कल से कहीं और नौकरी खोज लेना, अब यहाँ काम नहीं है। समझा!''

राजलक्ष्मी के चले जाने पर रतन ओडिकोलन पानी मिलाकर मेरे सिर पर रखकर हवा करने लगा। राजलक्ष्मी उसी क्षण लौटकर पूछा, ''क्या कल सुबह ही घर आओगे?'' मेरा जाने का इरादा जरूर था, परन्तु घर लौट जाने का नहीं इसीलिए सवाल का जवाब मैंने और ही तरह से दिया, ''हाँ, कल सुबह ही जाऊँगा।''

''सुबह कितने बजे की गाड़ी से जाओगे?''

''सुबह ही निकल पड़ूँगा- फिर जो गाड़ी मिल जावे।''

''अच्छा। न हो तो टाइमटेबुल के लिए किसी को स्टेशन भेज देती हूँ।'' इतना कहकर वह चली गयी।

इसके बाद यथासमय रतन ने काम समाप्त करके प्रस्थान किया। नीचे से नौकर-चाकरों का शब्द आना बन्द हो गया। मैं समझ गया कि सभी ने इस समय निद्रा के लिए शय्या का आश्रय ग्रहण कर लिया है।

मुझे किन्तु किसी तरह नींद नहीं आई। घूम-फिरकर केवल एक ही बात बार-बार मन में आने लगी कि प्यारी नाराज क्यों हो गयी? ऐसा मैंने क्या किया है जिससे कि वह मुझे रवाना करने के लिए अधीर हो उठी है? रतन ने कहा था कि बड़े अदमियों को क्रोध यों ही आ जाया करता है। यह बात और बड़े आदमियों के सम्बन्ध में ठीक उतरती है या नहीं, सो नहीं मालूम, परन्तु प्यारी के सम्बन्ध में तो किसी तरह भी ठीक नहीं उतरती। वह अत्यन्त संयमी और बुद्धिमती है, इसका परिचय मुझे बहुत बार मिल चुका है; और मुझमें भी, और बुद्धि चाहे भले ही न हो, प्रवृत्ति के सम्बन्ध में संयम उससे कम नहीं है- मैं तो समझता हूँ किसी से भी कम नहीं है। मेरे हृदय में चाहे कुछ भी क्यों न हो, उसे मुँह से बाहर निकालना, अत्यन्त विकार की बेहोशी में मैं अपने लिए सम्भव नहीं मानता। व्यवहार में भी किसी दिन ऐसा किया हो, सो भी मुझे याद नहीं। खुद के उसके किसी कार्य के कारण लज्जा का कुछ कारण घटित हुआ हो, वह तो अलग बात है; परन्तु मेरे ऊपर गुस्सा होने का कोई कारण नहीं है। इसलिए बिदा के समय का उसका यह उदासीन भाव मुझे जो वेदना देने लगा वह अकिंचित्कर नहीं था।

बहुत रात बीते एकाएक तन्द्रा टूट गयी और मैंने ऑंखें खोलकर देखा कि राजलक्ष्मी गुपचुप कमरे में आई और उसने टेबल के ऊपर का लैम्प बुझाकर उसे दरवाजे के कोने की आड़ में रख दिया। खिड़की खुली हुई थी, उसे बन्द करके, मेरी शय्या के समीप आकर क्षण-भर चुप खड़ी रहकर उसने कुछ सोचा। इसके बाद मशहरी के भीतर हाथ डालकर उसने पहले मेरे सिर का उत्ताप अनुभव किया। इसके बाद कुरते के बटन खोलकर वह छाती के उत्ताप को बार-बार देखने लगी! एकान्त में आने वाली नारी के इस गुप्त कर स्पर्श से पहले तो मैं कुण्ठित और लज्जित हो उठा, परन्तु उसी समय मन में आया कि रोग की बेहोशी की हालत में सेवा करके जिसने चैतन्य को लौटकर ला दिया, उसके नजदीक मेरे लिए लाज करने की बात ही कौन-सी है! इसके बाद उसने बटन बन्द कर दिए, ओढ़ने का कपड़ा खिसक गया था उसे गले तक उढ़ा दिया, अन्त में मशहरी के किनारों को अच्छी तरह ठीक करके अत्यन्त सावधानी से किवाड़ बन्द करके वह बाहर चली गयी।

 
मैंने सब कुछ देखा और सब कुछ समझा। जो छिपे-छिपे आई थी उसे छिपे-छिपे ही जाने दिया। परन्तु इस निर्जन आधी रात को वह अपना कितना मेरे निकट छोड़ गयी। सो वह कुछ भी न जान सकी। सुबह जब नींद खुली तब बुखार चढ़ा हुआ था। ऑंखें और मुँह जल रहे थे, सिर इतना भारी था कि शय्या त्याग करते क्लेश मालूम हुआ। फिर भी जाना ही होगा। इस घर में मुझे अब अपने ऊपर जरा भी विश्वास नहीं था, न जाने वह किस क्षण धोखा दे जाय। फिर भी डर मुझे अपने लिए उतना नहीं था। परन्तु राजलक्ष्मी के लिए ही मुझे राजलक्ष्मी को छोड़ जाना होगा, इसमें अब जरा-भी आनाकानी करने से काम न चलेगा।

मन-ही-मन सोचकर देखा कि उसने अपने विगत जीवन की कालिमा को बहुत कुछ धोकर साफ कर डाला है। आज अनेक लड़के बच्चे माँ-माँ कहते हुए उसे चारों ओर से घेरे खड़े है। इस भक्ति और प्रीति के आनन्द-धाम से उसे अपमान के साथ छीनकर बाहर निकाल लाऊँ? इतने बड़े प्रेम की क्या यही सार्थकता अन्त में मेरे जीवन के अध्यााय में चिरकाल के लिए लिपिबद्ध हो रहेगी?

प्यारी ने कमरे में प्रवेश करके पूछा, ''इस समय तबीयत कैसी है?''

मैं बोला, ''ऐसी कुछ विशेष खराब नहीं है। जा सकूँगा।''

''आज न जाने से क्या न चलेगा?''

''नहीं, आज तो जाना ही चाहिए।''

''तो फिर घर पहुँचते ही खबर देना। नहीं तो हम लोगों को बहुत चिन्ता होगी।''

उसके अविचलित धैर्य को देखकर मैं मुग्ध हो गया। उसी क्षण सम्मत होकर बोला, ''अच्छा, मैं घर ही जाऊँगा और पहुँचते ही तुम्हें खबर दूँगा।''

प्यारी ने कहा, ''जरूर देना। मैं भी चिट्ठी लिखकर तुमसे दो-एक बातें पूछूँगी।''

जब मैं बाहर पालकी में बैठने जा रहा था तब देखा कि दूसरे मंजिल के बरामदे में प्यारी चुपचाप खड़ी है। उसकी छाती के भीतर क्या हो रहा है, सो उसका मुँह देखकर मैं न जान सका।

मुझे अपनी अन्नदा जीजी याद आ गयीं। बहुत समय पहले एक अन्तिम दिन वे भी मानो ठीक ऐसी ही गम्भीर, ऐसी ही स्तब्ध होकर खड़ी थीं। उस समय की उनकी दोनों करुण ऑंखों की दृष्टि को मैं आज भी नहीं भूला हूँ; परन्तु उस दृष्टि में निकवर्ती जुदाई की कितनी बड़ी व्यथा घनीभूत हो रही थी सो मैं उस समय नहीं पढ़ सका था। क्या जानूँ, आज भी उसी तरह का कुछ उन दोनों निबिड़ काली ऑंखों में है या नहीं।

उसाँस छोड़कर मैं पालकी में जा बैठा। देखा कि बड़ा प्रेम केवल पास ही नहीं खींचता, दूर भी ठेल देता है। छोटे-मोटे प्रेम के लिए यह साध्यै ही नहीं था कि वह इस सुखैश्वर्य से भरे-पूरे स्नेह-स्वर्ग से मुझे, मंगल के लिए, कल्याण के लिए, एक डग भी आगे बढ़ाने देता। कहार पालकी लेकर स्टेशन की ओर जल्दी से चल दिये। मन-ही-मन मैं बारम्बार कहने लगा कि लक्ष्मी दु:ख मत करना। यह अच्छा ही हुआ कि मैं यहाँ से चल दिया। तुम्हारा ऋण इस जीवन में चुकाने की शक्ति तो मुझमें नहीं है। परन्तु जिस जीवन को तुमने दिया है, उस जीवन का दुरुपयोग करके अब मैं तुम्हारा अपमान न करूँगा- तुम से दूर रहते हुए भी मैं यह संकल्प सदा अक्षुण्ण रखूँगा।

द्वितीय पर्व

शरतचन्द्र

भाग - 5

इस अभागे जीवन के जिस अध्याय को, उस दिन राजलक्ष्मी के निकट अन्तिम बिदा के समय ऑंखों के जल में समाप्त करके आया था- यह खयाल ही नहीं किया था कि उसके छिन्न सूत्र पुन: जोड़ने के लिए मेरी पुकार होगी। परन्तु पुकार जब सचमुच हुई, तब समझा कि विस्मय और संकोच चाहे जितना हो, पर इस आह्नान को शिरोधार्य किये बिना काम नहीं चल सकता।

इसीलिए, आज फिर मैं अपने इस भ्रष्ट जीवन की विशृंखलित घटनाओं की सैकड़ों जगह से छिन्न-भिन्न हुई ग्रन्थियों को फिर एक बार बाँधने के लिए प्रवृत्त हो रहा हूँ।

आज मुझे याद आता है कि घर पर लौट आने के बाद मेरे इस सुख-दु:ख-मिश्रित जीवन को किसी ने मानो एकाएक काटकर दो भागों में विभक्त कर दिया था। उस समय खयाल हुआ था कि मेरे इस जीवन के दु:खों का बोझा केवल मेरा ही नहीं है। इस बोझे को लादकर घूमे वह, जिसको कि इसकी नितान्त गरज हो। अर्थात् मैं जो दया करके जीता बच गया हूँ, सो तो राजलक्ष्मी का सौभाग्य है। आकाश का रंग कुछ और ही नजर आने लगा था, हवा का स्पर्श कुछ और ही किस्म का मालूम होने लगा था- मानो, कहीं भी अब घर-बार, अपना-पराया, नहीं रहा था। एक तरह के ऐसे अनिर्वचनीय उल्लास से अन्तर-बाहर एकाकार हो गया था, कि रोग रोग के रूप में, विपदा विपदा के रूप में, अभाव अभाव के रूप में, मन में स्थान ही नहीं पा सकता था। संसार में कहीं जाते हुए, कहीं कुछ करते हुए, दुविधा या बाधा का जरा भी सम्पर्क नहीं रह गया था।

यह सब बहुत दिन पहले की बातें हैं। वह आनन्द अब नहीं है; परन्तु उस दिन जीवन में इस एकान्त विश्वास की निश्चित निर्भरता का स्वाद एक दिन के लिए भी मैं उपभोग कर सका, यही मेरे लिए परम लाभ है। परन्तु, साथ ही, मैंने उसे खो दिया, इसका भी मुझे किसी दिन क्षोभ नहीं हुआ। केवल इस बात का ही बीच-बीच में खयाल आ जाता है कि जिस शक्ति ने उस दिन हृदय के भीतर जाग्रत होकर इतनी जल्दी संसार का समस्त निरानन्द हरण कर लिया था, वह कितनी विराट शक्ति है! और सोचता हूँ कि उस दिन अपने ही समान अन्य दो अक्षम दुर्बल हाथों के ऊपर इतना बड़ा गुरु-भार न डालकर यदि मैं समस्त जगद्-ब्रह्माण्ड के भारवाही उन हाथों पर ही अपनी उस दिन की उस अखण्ड विश्वास की समस्त निर्भरता को सौंप देना सीखता, तो फिर, आज चिन्ता ही क्या थी?-किन्तु, अब जाने दो उस बात को।

राजलक्ष्मी को मैंने पहुँच का पत्र लिखा था। उस पत्रका जवाब बहुत दिनों बाद आया। मेरे अस्वस्थ शरीर के लिए दु:ख प्रकाशित करके गृहस्थ बनने के लिए उसने मुझे कई तरह के बड़े-बड़े उपदेश दिए थे और अपने संक्षिप्त पत्र यह लिखकर खत्म किया था कि यदि वह कामों के झंझटों के मारे पत्रादि लिखने का समय न पा सके, तो भी, मैं बीच-बीच में अपनी खबर उसे देता रहूँ और उसे अपना ही समझूँ।

तथास्तु। इतने दिनों बाद उसी राजलक्ष्मी की यह चिट्ठी!

आकाश-कुसुम आकाश में ही सूख गये और जो दो-एक सूखी पंखुड़ियां हवा से झड़ पड़ीं उन्हें बीन करके घर ले जाने के लिए भी मैं जमीन टटोलता नहीं फिरा। ऑंखों में से दो-एक बूँद पानी शायद पड़ा भी हो, किन्तु, वह मुझे याद नहीं। फिर भी, यह याद है कि और अधिक दिन मैंने स्वप्न देखते हुए नहीं काटे। तब भी इस तरह और भी पाँच-छह महीने कट गये।

एक दिन सुबह बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। एकाएक एक अद्भुत पत्र आ पहुँचा। ऊपर औरतों के से कच्चे अक्षरों में नाम और ठिकाना लिखा था। खोलते ही पत्र के भीतर से एक छोटा-सा पत्र खट् से जमीन पर गिर पड़ा। उसे उठाकर तथा उसके अक्षर और नाम सही की ओर देखकर मैं मानो अपने दोनों नेत्रों पर भी विश्वास न कर सका। मेरी माँ, जो दस वर्ष पहले ही देह त्याग कर गयी थीं- उन्हीं के श्रीहस्त के ये दस्तखत थे, नाम और सही भी उन्हीं की थी। पढ़कर देखा, माँ ने उसमें अपनी 'गंगाजल¹' को जितना भी हो सकता है उतना अभय वचन दिया था। बात सम्भवत: यह थी, कि बारह-तेरह वर्ष पहले इस 'गंगाजल' के यहाँ जब अधिक उम्र में एक कन्या-रत्न ने जन्म ग्रहण किया, तब दु:ख, दैन्य और दुश्चिन्ता प्रकट करके शायद माँ को उसने एक पत्र लिखा होगा और उसी के प्रत्युत्तर में मेरी स्वर्गवासिनी जननी ने गंगाजल-दुहिता का विवाह का समस्त दायित्व ग्रहण करके जो पत्र लिखा था वही यह मूल्यवान दस्तावेज थी। तात्कालिक करुणा से पिघलकर माँ ने उपसंहार में लिखा था कि सुपात्र यदि कहीं न मिले, बिल्कुतल ही अभाव हो,

¹ बंगाल में स्त्रियाँ जिसे अपनी सखी-सहेली बनाती हैं उसे 'गंगाजल' इस प्यार के नाम से सम्बोधित करती हैं।

तो फिर मैं तो हूँ ही! सारी चिट्ठी को ऊपर से नीचे तक दो बार पढ़कर मैंने देखा कि वह मुंशियाना ढंग से लिखी गयी है। माँ को वकील होना चाहिए था क्योंकि जितनी भी कल्पनाएँ की जा सकतीं थीं उतनी तरह से वे अपने आपको और अपने वंशधरों को उस दायित्व में बाँध गयी हैं। उससे बचने के लिए दस्तावेज में कहीं जरा-सी भी जगह- जरा-सी भी त्रुटि, नहीं छोड़ी गयी है।

वह चाहे जो हो, पर ऐसा तो मुझे नहीं मालूम पड़ा कि 'गंगाजल' इन सुदीर्घ तेरह वर्षों तक इस पक्के दस्तावेज के ही भरोसे निर्भय हो चुपचाप बैठी रही है। परन्तु, उलटे मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि बहुत प्रयत्न करने पर भी जब रुपये और निजी मनुष्यों के अभाव से सुपात्र उसके लिए एकबारगी अप्राप्य हो गया, और कुमारी कन्या की शारीरिक उन्नति की ओर दृष्टिपात करने से हृदय का रक्त मस्तिष्क में चढ़ने की तैयारी करने लगा, तब कहीं जाकर इस हतभाग्य सुपात्र के ऊपर उन्होंने अपना एकमात्र ब्रह्मास्त्र फेंका है।

माँ यदि जीती होतीं तो इस चिट्ठी के लिए आज मैं उनका सिर खा जाता और उनके पैरों पर जोर से सिर पटककर अपनी ज्वाला को बुझाता, परन्तु यह रास्ता भी मेरे लिए बन्द है।

इसलिए, माँ का तो कुछ भी नहीं कर सका परन्तु, अब उनकी गंगाजल का भी कुछ कर सकता हूँ या नहीं, यह परखने के लिए मैं एक दिन रात्रि को स्टेशन पर जा पहुँचा। सारी रात ट्रेन में काटकर दूसरे दिन जब उनके गाँव के मकान पर पहुँचा तब दिन ढल गया था। गंगाजल-माँ पहले तो मुझे पहिचान न सकीं। अन्त में, परिचय पाकर इन तेरह वर्षों के बाद भी वे इस तरह रो पड़ीं जिस तरह कि माँ की मृत्यु के समय उनका कोई अपना आदमी भी ऑंखों के सामने उनकी मृत्यु होते देखकर, न रो सका होता।

वे बोलीं कि लोकदृष्टि से और धर्मदृष्टि से, दोनों ही तरह अब मैं तुम्हारी माता के समान हूँ और फिर दायित्व ग्रहण करने की प्रथम सीढ़ी के रूप में उन्होंने मेरी सांसारिक परिस्थिति का बारीकी से पर्यालोचन करना शुरू कर दिया। बाप कितना छोड़ गये हैं, माँ के कौन-कौन से गहने हैं और वे किसके पास हैं, मैं नौकरी क्यों नहीं करता और यदि करूँ तो अन्दाज से क्या महीना पा सकता हूँ, इत्यादि-इत्यादि। उनका मुँह देखकर खयाल हुआ कि इस आलोचना का फल उनके निकट कुछ वैसा सन्तोषजनक नहीं हुआ। वे बोलीं कि उनका एक रिश्तेदार बर्मा में नौकरी करके 'लाल' हो गया है, अर्थात् अतिशय-धनवान हो गया है। वहाँ तो राह-घाट में रुपये बिखरे पड़े हैं, केवल समेटने-भर की देर है! वहाँ पर जहाज से उतरते न उतरते ही बंगालियों को साहब लोग कन्धों पर उठा ले जाते हैं और नौकरी से लगा देते हैं। इस तरह की बहुत-सी बातें कहीं। बाद में मैंने देखा कि यह गलत धारणा केवल अकेली उन्हीं की नहीं थी। ऐसे बहुत-से लोग इस माया-मरीचिका से उन्मत्तप्राय होकर सहाय-सम्बलहीन अवस्था में वहाँ दौड़ गये हंु और मोह भंग होने के बाद उन्हें वापिस लौटाने में हम लोगों को कम क्लेश सहन नहीं करना पड़ा है। परन्तु वह बात इस समय रहने दो। गंगाजल-माँ का बर्मा-वर्णन मुझे तीर की तरह लगा। 'लाल' होने की आशा से नहीं-मेरे भीतर का जो घुमक्कड़पन कुछ दिनों से सोया हुआ था वह अपनी थकावट झाड़-पोंछकर मुहूर्त-भर में ही उठ खड़ा हुआ। जिस समुद्र को इसके पहले केवल दूर से खड़े-खड़े देखकर ही मुग्ध हो जाता था, अब उस अनन्त जलराशि को भी भेद करके मैं जा सकूँगा- इस इच्छा ने ही मुझे एकबारगी बेचैन कर दिया। तब किसी तरह एक बार छुटकारा पाना ही होगा।

मनुष्य मनुष्य से जितने प्रकार की भी जिरह कर सकता है, उनमें से किसी भी प्रकार की जिरह में गंगाजल-माँ ने मुझे नहीं छोड़ा। फिर भी, अपनी लड़की के योग्य पात्र की दृष्टि से उन्होंने मुझे रिहाई दे दी- इस विषय में मैं एक तरह से निश्चिन्त ही हो गया। परन्तु, रात्रि में भोजन के समय उनकी भूमिका का झुकाव देखकर मैं फिर उद्विग्न हो उठा। मैंने देखा, मुझे एकबारगी हाथ से जाने देने की उनकी इच्छा नहीं है। उन्होंने यह कहना शुरू किया कि यदि लड़की के भाग्य में न हो, तो धन, घर-बार, शिक्षा-दीक्षा आदि कितना ही क्यों न देखा जाय, सब कुछ निष्फल है। इस सम्बन्ध में नाम-धाम, विवरणादि के साथ बहुत-सी विश्वास योग्य नजीरें देकर उन्होंने इस बात को प्रमाणित भी कर दिखाया। इतना ही नहीं, इसके विरुद्ध ऐसे भी कितने ही लोगों का नामोल्लेख किया कि जो निराट मूर्ख होते हुए भी केवल स्त्री के ही सौभाग्य के जोर पर इस समय दिन-रात रुपयों के ढेर पर बैठे रहते हैं।

मैंने विनय सहित कह दिया कि रुपये-पैसे की तरफ मेरी आसक्ति तो है, फिर भी, चौबीसों घण्टे उन पर बैठा रहूँ, यह विवेचना मुझे प्रीतिकर नहीं मालूम होती और इसके लिए स्त्री का सौभाग्य देखने का कुतूहल भी मुझे नहीं है। किन्तु इसका कोई विशेष फल नहीं हुआ। उन्हें निरस्त न कर सका। क्योंकि, जो स्त्री तेरह वर्ष के इतने लम्बे समय के पश्चात् भी एक पत्र को दस्तावेज के रूप में पेश कर सकती है, उसे इतने सहज में नहीं भुलाया जा सकता। वे बार-बार कहने लगीं कि इसे माता के ऋण के ही रूप में ग्रहण करना उचित है, और जो सन्तान समर्थ होते हुए भी मातृ-ऋण का परिशोध नहीं करती वह... इत्यादि-इत्यादि।

जब मैं बहुत ही शंकित और विचलित हो उठा, तब बातों ही बातों में मुझे मालूम हुआ कि पास के गाँव में यद्यपि एक सुपात्र है, परन्तु, पाँच सौ रुपये से कम में उसका पाना असम्भव है।

एक क्षीण आशा की रश्मि नजर आई। महीने-भर के बाद जैसे भी हो कोई उपाय कर दूँगा- यह वचन देकर दूसरे दिन सुबह ही मैंने प्रस्थान कर दिया। परन्तु उपाय किस तरह करूँगा- किसी ओर भी उसका कोई कूल किनारा नजर नहीं आया।

मेरे ऊपर लादा गया यह भार मेरे लिए कोई सचमुच की वस्तु नहीं हो सकता, यह मैं अनेक तरह से अपने आपको समझाने लगा; परन्तु फिर भी, माँ को इस प्रतिज्ञा के पाश से मुक्ति न देकर चुपचाप खिसक जाने की बात भी किसी तरह मैं नहीं सोच सका।

शायद एक उपाय था- मैं यह बात प्यारी से कहूँ। किन्तु, कुछ दिनों तक इस सम्बन्ध में भी मैं अपने मन को स्थिर न कर सका। बहुत दिनों से मुझे उसकी खबर भी नहीं मिली थी। उस पहुँच की खबर को छोड़कर मैंने उसे और कोई चिट्ठी भी नहीं लिखी थी। उसने भी उसके जवाब के सिवाय, दूसरा पत्र नहीं लिखा। इस बात को वह शायद नहीं मानती थी कि चिट्ठी-पत्री के द्वारा ही दोनों के बीच मिलाप का एक सूत्र रहता है। कम से कम उसके उस पत्र से तो मैं समझा। फिर भी अचरज की बात है कि दूसरे की लड़की के लिए भिक्षा माँगने के बहाने एक दिन मैं सचमुच ही पटने जा पहुँचा।

मकान में प्रवेश करते ही नीचे बैठने के कमरे के बरामदे में मैंने देखा कि वर्दी पहने हुए दो दरबान बैठे हैं। वे एकाएक एक साधारण से अपरिचित आगन्तुक को देखकर कुछ इस तरह देखते रह गये कि मुझे सीधे ऊपर चढ़ जाने में संकोच मालूम हुआ। इन्हें मैंने पहले नहीं देखा था। प्यारी के पुराने बूढ़े दरबानजी के बदले इन दो और दरबानों की क्या आवश्यकता आ पड़ी, यह मैं न सोच सका। जो भी हो, इनकी परवाह किये बगैर ऊपर चला जाऊँ अथवा विनय के साथ इनकी अनुमति माँगूँ- यह स्थिर करते-करते ही मैंने देखा कि रतन व्यस्त हुआ-सा नीचे आ रहा है। अकस्मात् मुझे देखकर वह पहले तो अवाक् हो गया; बाद में पैरों की ओर झुककर प्रणाम करके बोला-

''आप कब आए? यहाँ कैसे खड़े हैं?''

''अभी ही आ रहा हूँ, रतन। सब कुशल तो है न?''

रतन सिर हिलाकर बोला, ''सब कुशल है, बाबू। ऊपर चलिए- मैं बरफ खरीदकर अभी आया।'' कहकर वह जाने लगा।

''तुम्हारी मालकिन ऊपर ही हैं?''

''हाँ हैं'', कहकर वह जल्दी से बाहर चला गया।

ऊपर चढ़ते ही जो पास का कमरा मिलता है वह बैठकखाना है। भीतर से एक ऊँची हँसी का शब्द और बहुत से लोगों की आवाज सुनाई दी। मैं जरा विस्मित हुआ। परन्तु, दूसरे ही क्षण, द्वार के नजदीक पहुँचकर मैं अवाक् हो गया। पिछली दफे इस कमरे को व्यवहार में आते नहीं देखा था। इसमें तरह-तरह के साज-सामान, टेबल, चेअर आदि अनेक चीजें एक कोने में ढेर होकर पड़ी रहती थीं। बहुधा कोई इस कमरे में आता भी न था। आज देखता हूँ, सम्पूर्ण कमरे में बिस्तर है, शुरू से अन्त तक कार्पेट बिछा हुआ है और उसके ऊपर सफेद जाजम झक-झककर रही है। तकियों के ऊपर गिलाफ चढ़े हुए हैं और उनके सहारे बैठे हुए कुछ सभ्य पुरुष अचरज से मेरी ओर देख रहे हैं। उनकी पोशाक में बंगालियों की तरह धोती होने पर भी सिर पर की बेल-बूटेदार मसलिन की टोपी से वे बिहारी से मालूम होते थे। तबले की जोड़ी के पास एक हिन्दुस्तानी तबलची था और उसके पास में भी स्वयं प्यारीबाई थीं। एक तरफ छोटा-सा हारमोनियम रखा था। प्यारी के शरीर पर यद्यपि मुजरे की पोशाक नहीं थी, फिर भी बनाव-सिंगार का अभाव नहीं था। समझ गया कि संगीत की बैठक जमी हुई है- थोड़ी देर विश्राम लिया जा रहा है।

मुझे देखते ही प्यारी के चेहरे का समस्त खून मानो कहीं अन्तर्हित हो गया। इसके बाद उसने जबर्दस्ती कुछ हँसकर कहा, ''यह क्या, श्रीकान्त बाबू हैं। कब आये?''

''आज ही।''

''आज ही? कब? कहाँ ठहरे हैं?''

क्षण-भर के लिए शायद मैं कुछ हतबुद्धि-सा हो गया; नहीं तो उत्तर देने में देर न होती। परन्तु, अपने आपको सम्हालने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। मैंने कहा, ''यहाँ के सब लोगों को तुम चीन्हती नहीं हो, इसलिए, नाम सुनकर भी न चीन्ह सकोगी।''

जो महाशय सबसे अधिक बने-ठने थे वही शायद इस यज्ञ के यजमान थे। बोले, ''आइए बाबूजी, बैठिए।'' इतना कहकर होठों को दबाकर जरा वे हँसे। भाव-भंगी से उन्होंने यह प्रकट किया कि हम दोनों का सम्बन्ध वे ठीक तौर से भाँप गये हैं! उनका आदर के साथ अभिवादन कर मैंने, जूते के फीते खोलने के बहाने, मुँह नीचा करके परिस्थिति को भाँप लेना चाहा। विचार करने के लिए अधिक समय नहीं था, यह ठीक है, परन्तु, इन थोड़े से क्षणों में मैंने यह स्थिर कर लिया कि हृदय के भीतर कुछ भी हो, बाहर के व्यवहार में वह किसी भी तरह प्रकाशित न होना चाहिए। मेरे मुँह की बातचीत से, ऑंखों की चितवन से, मेरे सारे आचरण के किसी भी छिद्र में से, अन्तर के क्षोभ अथवा अभिमान की एक बूँद भी बाहर आकर न गिरनी चाहिए। क्षण-भर बाद जब मैं सबके बीच में जाकर बैठा तब, यद्यपि यह सच है कि अपने मुख की सूरत अपनी ऑंखों न देख सका, किन्तु भीतर ही भीतर मैंने अनुभव किया कि अब उस पर अप्रसन्नता का लेशमात्र भी चिह्न नहीं रह गया है। राजलक्ष्मी की ओर देखकर मैं हँसते हुए बोला, ''बाईजी, यदि शुकदेव मुनिका पता पा जाता तो आज तुम्हारे सामने बिठाकर एक दफा उनके मन की शक्ति की जाँच कर लेता! अरे, यह किया क्या है! यह तो रूप का समुद्र ही बहा दिया है!''

प्रशंसा सुनकर प्रमुख बाबू साहब आह्लाद से गलकर सिर हिलाने लगे। वे पुर्निया जिले के रहने वाले थे; मैंने देखा कि बोल न सकने पर भी बंगला अच्छी तरह समझते हैं। परन्तु प्यारी के कान तक लाल हो उठे।-किन्तु, लाज के मारे नहीं- गुस्से के मारे, यह भी समझने में कुछ बाकी न रहा। परन्तु, उस ओर भ्रूक्षेप भी न करके बाबू साहब को उद्देश्य करके मैंने उसी तरह हँसते हुए कहा, ''मेरे आने के कारण यदि आप लोगों के आमोद-प्रमोद में थोड़ा-सा भी विघ्न होगा, तो मुझे बहुत दु:ख होगा। गाना-बजाना चलने दीजिए।''

बाबूजी इतने प्रसन्न हो उठे कि आवेश में आकार मेरी पीठ पर एक धौल जमाकर बोले, ''बहुत अच्छा बाबू। हाँ प्यारी बीबी, एक बढ़िया-सा गाना चलने दो।''

''संध्याए के बाद होगा- बस अब और नहीं।'' कह कर प्यारी हारमोनियम दूर खिसकाकर सहसा उठा खड़ी हुई।

इसी समय बाबू साहब मेरा परिचय पाने के उपलक्ष्य से अपना परिचय देने लगे- उनका नाम था रामचन्द्र सिंह। वे पुर्निया जिले के एक जमींदार हैं, दरभंगा- महाराजा उनके कुटुम्बी हैं, प्यारी बीबी को सात-आठ वर्ष से जानते हैं। वे उनके पुर्निया के मकान पर तीन-चार दफे मुजरा कर आई हैं। वे खुद भी अनेक दफे गाना सुनने यहाँ आए हैं। कभी-कभी दस-दस बारह-बारह दिन तक वे यहीं रहते हैं और तीनेक महीने पहले एक दफे आकर वे एक हफ्ते तक यहाँ रह गये हैं- वगैरह वगैरह। अब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। मेरे जवाब देने के पहले ही वहाँ प्यारी आ उपस्थित हुई। उसकी ओर देखकर मैंने कहा, ''बाईजी से ही पूछिए न, कि क्यों आया हूँ।''

प्यारी ने मेरे मुँह पर एक तीव्र कटाक्ष डाला, परन्तु, जवाब दिया सहज शान्त स्वर में ही, ''ये हमारे देश के आदमी हैं।''

मैंने हँसकर कहा, ''बाबूजी, मधु होने पर मधुमक्खियाँ आकर जुट जाती हैं, वे देश-विदेश का विचार नहीं करतीं।'' किन्तु इतना कहते ही मैंने देखा कि रहस्य को ग्रहण न कर सकने के कारण पुर्निया जिले के जमींदार ने अपने मुँह को गम्भीर बना लिया और उनके नौकर ने ज्यों ही आकर कहा कि संध्याी-पूजा के लिए तैयारी हो गयी है त्यों ही उन्होंने वहाँ से प्रस्थान कर दिया। तबलची तथा अन्य दो महाशय उनके साथ ही साथ बाहर चले गये। उनका मन अकस्मात् क्यों इतना व्याकुल हो गया, सो मैं बिन्दु-विसर्ग कुछ भी नहीं समझा।

रतन आकर बोला, ''माँ, बाबूजी के बिछौने कहाँ करूँ?''

प्यारी ने झुँझलाकर कहा, ''क्या और कोई कमरा नहीं है रतन? मुझसे पूछे बिना क्या इतनी-सी बुद्धि भी तू नहीं लगा सकता? चला जा यहाँ से!'' इतना कहकर रतन के साथ आप भी बाहर चली गयी। मैंने खूब अच्छी तरह से देखा कि मेरे आकस्मिक शुभागमन से इस मकान का भार-केन्द्र एक सांघातिक ढंग से विचलित हो गया है। प्यारी ने, किन्तु थोड़ी ही देर बाद लौट आकर और मेरे मुँह की ओर कुछ देर देखते रहकर कहा, ''ऐसे अचानक कैसे आना हो गया?''

मैंने कहा, ''देश का आदमी हूँ, तुम्हें बहुत दिन से न देख सकने के कारण व्याकुल हो उठा था, बाईजी!''

प्यारी का मुँह और भी भारी हो गया। मेरे परिहास में जरा भी योग न देकर उसने पूछा, ''आज रात को यहाँ ही रहोगे न?''

''रहने को कहोगी तो रह जाऊँगा।''

''मेरे कहने न कहने से क्या! तुम्हें यहाँ शायद कुछ असुविधा हो। जिस कमरे में तुम सोते थे उसमें तो...''

''बाबू सोते हैं? ठीक है, मैं नीचे सो जाऊँगा। तुम्हारा नीचे का कमरा तो बहुत उम्दा है।''

''नीचे सोओगे? कहते क्या हो! मन में तुम्हारे जरा भी विकार नहीं- दो ही दिन में इतने बड़े परमहंस किस तरह हो गये?''

मैंने मन ही मन कहा, ''प्यारी, तुमने मुझे अब तक भी नहीं पहचाना।'' फिर मुँह से कहा, ''इसमें मुझे मान-अपमान का खयाल बिन्दु-भर भी नहीं है। और, कष्ट की बात का यदि खयाल करो, तो वह तो एकबारगी ही फिजूल है। मैं घर से बाहर निकलने के समय खाने-सोने की चिन्ताओं को दूर रख आता हूँ, यह तो तुम भी जानती हो। बिस्तर यदि अधिक हों तो एक ले आने के लिए कह दो, नहीं हो, तो फिर उसकी भी दरकार नहीं है- मुझे अपने कम्बल का सम्बल है।''

प्यारी ने सिर हिलाकर कहा, ''सो तो मैं जानती हूँ; किन्तु, इससे मन में किसी तरह का दु:ख तो न होगा?''

मैंने हँसकर कहा, ''नहीं, क्योंकि स्टेशन पर पड़े रहने की अपेक्षा तो यह बहुत ही अच्छा है।''

प्यारी कुछ देर चुप खड़ी रही; फिर बोली, ''यदि मैं होती तो भले ही वृक्ष के नीचे सो रहती, परन्तु इतना अपमान कभी नहीं सहती।''

उसकी उत्तेजना को देखकर मुझसे हँसे बिना न रहा गया। वह मेरे मुँह से क्या सुनना चाहती है, सो मैं बड़ी देर से खूब समझ रहा था। किन्तु शान्त स्वाभाविक स्वरूप से मैंने जवाब दिया, ''मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि इस बात को मन में आने दूँ कि तुम, जानबूझकर मुझे नीचे सोने को कहकर, मेरा अपमान कर रही हो। यदि सम्भव होता तो तुम उस दफे के समान इस दफे भी मेरे सोने की व्यवस्था करतीं। जाने दो, इन तुच्छ बातों को लेकर वाग्वितण्डा करने की जरूरत नहीं, तुम रतन को भेज दो कि मुझे नीचे का कमरा दिखा आवे, मैं कम्बल बिछाकर सो रहूँगा। मैं बहुत ही थक गया हूँ।

प्यारी ने कहा, ''तुम ज्ञानी आदमी हो, तुम ही मेरी ठीक अवस्था को न जान सकोगे तो और जानेगा कौन? चलो, बच गयी।'' इतना कहकर उसने एक दीर्घ श्वास दबाकर पूछा, ''एकाएक आने का सच्चा कारण तो मैं जान ही न सकी कि क्या है?''

मैं बोला, ''पहला कारण तो तुम नहीं सुन पाओगी, किन्तु दूसरा सुन सकती हो!''

''पहला क्यों नहीं सुन सकूँगी?''

''अनावश्यक है, इसलिए।''

''अच्छा, दूसरा ही सुनाओ।''

''मैं बर्मा जा रहा हूँ। शायद और फिर कभी मिलना न हो सके। कम से कम यह तो निश्चित है कि बहुत दिनों तक मिलाप न होगा। जाने के पहले एक दफे तुम्हें देखने आया हूँ।''

रतन कमरे में आकर बोला, ''बाबू, आपके बिस्तर तैयार हैं, आइए।''

मैंने खुश होकर कहा, ''चलो।'' प्यारी से कहा, ''मुझे बड़ी नींद आ रही है। घण्टे भर बाद यदि समय मिले तो एक दफे नीचे आ जाना- मुझे और भी बहुत-सी बातें करनी हैं।'' इतना कहकर रतन को साथ लेकर मैं बाहर हो गया।

प्यारी के निज के सोने के कमरे में ले आकर रतन ने मुझे जब शय्या बताई तब मेरे अचरज की सीमा न रही। मैं बोला, ''मेरे बिस्तर नीचे के कमरे में न करके यहाँ क्यों किये?''

रतन ने अचरज के साथ कहा, ''नीचे के कमरे में?''

मैंने कहा, ''ऐसी ही बात तो हुई थी।''

वह अवाक् होकर कुछ देर मेरी ओर देखता रहा और अन्त में बोला, ''आपके बिस्तर होंगे नीचे के कमरे में? आप मजाक कर रहे हैं बाबू!'' इतना कहकर वह हँसता हुआ जा ही रहा था कि मैंने उसे बुलाकर पूछा, ''तुम्हारी मालकिन कहाँ सोवेंगी?''

रतन बोला, ''बंकू बाबू के कमरे में उनके बिस्तर लगा आया हूँ।'' मैंने निकट आकर देखा- यह राजलक्ष्मी के उस डेढ़ हाथ चौड़े तख्ते पर बिछाया हुआ बिस्तर नहीं है। एक पलंग पर एक खूब मोटा गद्दा बिछाकर शाही बिस्तर लगाए गये हैं। शीशे के नजदीक नजदीक एक छोटी-सी टेबल के ऊपर मेज के बीचोंबीच लैम्प जल रहा है। एक किनारे बंगला भाषा की किताबें हैं और दूसरे किनारे गुलदस्ते में कुछ बेला के फूल रक्खे हैं। ऑंखों से देखते ही मैंने अच्छी तरह जान लिया कि इनमें से कोई भी चीज नौकर के हाथ की तैयार की हुई नहीं हैं। जो बहुत प्यार करती है, ये सब चीजें उसी के हाथ की तैयार की हुई हैं। ऊपर की चादर भी राजलक्ष्मी खुद अपने हाथों बिछा गयी है, यह मानो अन्दर ही अन्दर मैंने खूब अनुभव किया।

आज उन लोगों के सामने अचानक आ जाने के सबब राजलक्ष्मी ने हतबुद्धि हो, पहले चाहे जैसा व्यवहार क्यों न किया हो, पर यह बात मुझसे अज्ञात नहीं रही कि मेरी निर्विकार उदासीनता से वह मन ही मन शंकित हो उठी थी और यह भी मुझे मालूम हो गया कि मेरे भीतर ईर्ष्या् का प्रकाश देखने के लिए उत्सुक हो वह इतनी देर से इतनी तरह से क्यों बार-बार आघात कर रही थी। किन्तु, सब कुछ जानते हुए भी, अपने निष्ठुर स्वभाव को ही मर्दानगी समझकर मैंने उसका जरा भी अभिमान नहीं रहने दिया- उसके प्रत्येक छोटे से छोटे आघात को सौ गुना करके वापिस लौटा दिया। उसके प्रति किया गया यह अन्याय मेरे मन के भीतर अब सुई की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर लेट गया किन्तु सो नहीं सका। मैं यह निश्चय जानता था कि एक बार वह आयेगी जरूर। इसलिए, उत्सुकता के साथ उस समय की राह देखने लगा।

थकावट के कारण शायद कुछ सो भी गया था, सहसा ऑंखें खोलकर देखा कि प्यारी मेरे शरीर पर एक हाथ रखे हुए बैठी है। मेरे उठकर बैठते ही वह बोली, ''बर्मा को गया हुआ मनुष्य फिर लौटकर वापिस नहीं आता, यह बात क्या तुम्हें मालूम है?''

''नहीं, मुझे नहीं मालूम।''

''फिर?''

''मुझे लौटना ही होगा, ऐसी तो किसी के सिर की कसम मुझ पर है नहीं।''

बात बहुत ही सामान्य थी। किन्तु, संसार में यह एक भारी अचरज की बात है कि मनुष्य की दुर्बलता कब किस झरोखे से अपने आपको प्रकट कर बैठेगी, इसका अनुमान नहीं किया जा सकता। इसके पहले कितने ही और इससे भी अधिक बड़े कारण घट गये हैं, परन्तु, मैंने कभी अपने आपको इस तरह नहीं पकड़ा जाने दिया। किन्तु, आज उसके मुँह से निकली हुई इस अत्यन्त साधारण बात को भी मैं सहन नहीं कर सका। मुँह से सहसा यह बात निकल ही गयी, ''सब लोगों के मन की बात तो जानता नहीं राजलक्ष्मी, परन्तु एक मनुष्य के मन की अवश्य जानता हूँ। यदि किसी दिन लौटकर आऊँगा तो केवल तुम्हारे ही लिए। तुम्हारे सिर की कसम मैं कभी अवहेलना नहीं करूँगा।''

प्यारी मेरे पैरों पर एकबारगी उलटी ही गिर पड़ी। मैंने इच्छा करके भी पैर पीछे न खींचे, परन्तु, दसेक मिनट बीत जाने पर भी जब उसने अपना सिर ऊपर नहीं उठाया तब उसके सिर पर मैंने अपना दाहिना हाथ रक्खा जिसके पड़ते ही वह एक बार सिहरकर काँप उठी। परन्तु फिर भी वह उसी तरह पड़ी रही। सिर भी नहीं उठाया, बोली भी नहीं। मैंने कहा, ''उठकर बैठो, इस अवस्था में हमें कोई देखेगा तो भारी अचम्भे में पड़ जायेगा।''

किन्तु, प्यारी ने जवाब तक नहीं दिया तब मैंने उसे जोर से उठाया। उठाते ही मैंने देखा कि उसके नीरव ऑंसुओं से वहाँ की सारी चादर बिल्कुनल भीग गयी है। खींच-तान करने पर वह रुद्ध कण्ठ से बोल उठी, ''पहले मेरी दो-तीन बातों का जवाब दो तब मैं उठूँगी।''

''कहो, कौन-सी बातें हैं।''

''पहले तो यह कहो कि उन लोगों के यहाँ रहने से तुमने मेरे सम्बन्ध में कोई बुरा खयाल तो नहीं किया?''

''नहीं।''

प्यारी और कुछ देर चुप रहकर बोली, ''किन्तु, मैं भली औरत नहीं हूँ, यह तो तुम जानते हो? फिर भी, तुम्हें क्यों सन्देह नहीं हुआ?''

सवाल बड़ा ही कठिन था। वह भली स्त्री नहीं है, यह मैं जानता हूँ परन्तु वह खराब है, यह खयाल भी मैं मन में नहीं ला सका। मैं चुप हो रहा।

एकाएक वह अपनी ऑंखें पोंछकर झटपट उठ बैठी और बोली, ''अच्छा, तुमसे पूछती हूँ; पुरुष कितना ही बुरा क्यों न हो, यदि वह भला होना चाहता है तो उसे कोई रोकता नहीं; किन्तु, हम लोगों की पारी आने पर सब मार्ग क्यों बन्द हो जाते हैं? अज्ञान से, धनाभाव से, एक दिन जो कर बैठी- चिरकाल के लिए मुझे वही क्यों करना पड़ता रहे? हम लोगों को तुम लोग क्यों भला बनने नहीं देते?''

मैंने कहा, ''हम लोग तो कभी रोकते नहीं। और यदि हम रोकें, तो भी, संसार में भले बनने के मार्ग में कोई किसी को अटकाकर नहीं रख सकता।''

प्यारी बड़ी देर तक चुप रहकर मेरे मुँह की ओर देखकर अन्त में धीरे-धीरे बोली, ''बहुत ठीक, तो फिर, तुम भी मुझे नहीं रोक सकोगे।''

मेरे जवाब देने के पहले ही रतन की खाँसी का शब्द द्वार के निकट सुन पड़ा।

प्यारी ने पुकार कर कहा, ''क्या है रतन?''

रतन ने मुँह आगे निकाल कर कहा, ''माँ रात बहुत बीत गयी है- बाबूजी के खाने के लिए ले न आऊँ? रसोइया महाराज तो झोंके खाते-खाते रसोईघर में ही सो गये हैं।''

''अरे, तब तो तुममें से किसी ने भी अभी तक खाया न होगा!'' इतना कह कर प्यारी घबड़ाकर और लज्जित होकर उठ खड़ी हुई। मेरे लिए खाने को वह अपने ही हाथों हमेशा लाती थी; आज भी लाने के लिए जल्दी से पैर बढ़ाती हुई चली गयी।

खाना समाप्त करके जब मैं बिस्तर पर लेटा तब रात का एक बज गया था। प्यारी फिर आकर मेरे पैरों के पास बैठ गयी। बोली, ''तुम्हारे लिए अनेक रातें अकेले जागकर बिताई हैं- आज तुम्हें भी जागते रक्खूँगी। इतना कहकर मेरी सम्मति की राह देखे बगैर ही उसने मेरे पैर की तरफ का तकिया खींच लिया और बाएँ हाथ का सहारा लेकर वह लेट गयी तथा बोली, ''मैंने बहुत विचार कर देखा, तुम्हरा इतने दूर-देश जाना किसी तरह भी नहीं हो सकता।''

मैंने पूछा, ''तो फिर, क्या हो सकता है? इसी तरह यहाँ-वहाँ भटकते फिरना?''

प्यारी ने इसका जवाब न देकर कहा, ''इसके सिवाय किसलिए बर्मा जा रहे हो, कहो तो सही?''

''नौकरी करने, यहाँ-वहाँ भटकते फिरने के लिए नहीं।''

मेरी बात को सुनकर प्यारी उत्तेजना के वश सीधी होकर बैठ गयी और बोली, ''देखो, दूसरे से जो कहना हो कहना, किन्तु मुझे न ठगना। मुझे ठगोगे तो तुम्हारा इहकाल भी नहीं, पर काल भी नहीं बनेगा- सो जानते हो?''

''सो तो खूब जानता हूँ, अब क्या करना चाहिए, कहो तुम?''

मेरी स्वीकारोक्ति से प्यारी प्रसन्न हुई। हँसकर बोली, ''स्त्रियाँ चिरकाल से जो कहती आई हैं वही मैं कहती हूँ। विवाह करके संसारी बन जाओ- गृहस्थ-धर्म का पालन करो।''

मैंने प्रश्न किया, ''क्या सचमुच ही तुम खुशी होओगी?''

उसने सिर हिलाकर कानों के झूले हिलाते हुए उत्साह से कहा, ''निश्चय से, एक दफे नहीं, सौ दफे। इससे यदि मैं सुखी नहीं होऊँगी, तो फिर और कौन होगा, बताओ?''

मैंने कहा, ''सो तो मैं नहीं जानता; परन्तु, इससे मेरे मन की एक दुर्भावना चली गयी। वास्तव में, यही खबर देने मैं आया था कि ब्याह किये बगैर मेरी गुजर नहीं।''

प्यारी एक बार अपने कानों के स्वर्णालंकार झुलाती हुई महाआनन्द से बोल उठी, ''ऐसा होगा, तो मैं कालीघाट जाकर पूजा दे आऊँगी। किन्तु, लड़की को मैं ही देखकर पसन्द करूँगी, सो कहे देती हूँ।''

मैंने कहा, ''इसके लिए अब समय नहीं है, लड़की तो स्थिर हो चुकी है।''

मेरे गम्भीर स्वर पर शायद प्यारी ने ध्या,न दिया। एकाएक उसके हँसते मुख पर एक मैली-सी छाया पड़ गयी; बोली, ''ठीक तो है, अच्छा ही हुआ। स्थिर हो गयी है तो परम सुख की बात है।''

मैंने कहा, ''सुख-दु:ख तो मैं समझता नहीं राजलक्ष्मी, जो बात स्थिर हो चुकी है वही तुम्हें बताता हूँ।''

''प्यारी एकाएक गुस्से से बोल उठी, ''जाओ, चालाकी मत करो, सब बात झूठी है।''

''एक भी बात मिथ्या नहीं है। चिट्ठी देखते ही समझ जाओगी'', इतना कहकर खीसे में से मैंने दो पत्र बाहर निकाले।

''कहाँ हैं, देखूँ चिट्ठी'', इतना कह हाथ बढ़ाकर प्यारी ने दोनों हाथों में चिट्ठियाँ ले लीं। उन्हें हाथ में लेते ही मानों उसके सारे मुँह पर अंधेरा छा गया। दोनों पत्र हाथ में लिये ही लिये वह बोली, ''दूसरे का पत्र पढ़ने की मुझे जरूरत ही क्या है। बताओ, कहाँ स्थिर हुई है?''

''पढ़ देखो।''

''मैं दूसरे की चिट्ठी नहीं पढ़ती।''

''तो फिर दूसरे की खबर जानने की तुम्हें जरूरत भी नहीं है।''

''मैं नहीं जानना चाहती।'' इतना कहकर ऑंखें मींचकर वह लेट गयी। किन्तु दोनों चिट्ठियाँ उसकी मुट्ठी में ही रह गयीं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोली। इसके बाद वह धीरे से उठी, जाकर लैम्प तेज किया और मेज पर दोनों पत्र रखकर स्थिरता से बैठी। उनमें जो कुछ लिखा था सो शायद उसने दो-तीन दफे पढ़ा। इसके बाद वह उठ आई और उसी तरह फिर लेट गयी। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली, ''सो गये क्या?''

''नहीं।''

''इस स्थान पर मैं तुम्हें किसी तरह ब्याह न करने दूँगी; वह लड़की अच्छी नहीं है, उसे मैंने बचपन में देखा है।''

''माँ का पत्र पढ़ा?''

''हाँ, किन्तु काकी के पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि तुम्हें उसे गले में डालना ही पड़ेगा। और चाहे वह अच्छी हो, चाहे न हो, उस लड़की को मैं किसी तरह भी घर में नहीं लाऊँगी।''

''कैसी लड़की घर में लाना चाहती हो, बता सकती हो?''

''सो मैं इस समय कैसे बताऊँ? विचार करके देखना होगा।''

थोड़ी देर चुप रहने के बाद मैं हँसकर बोला, ''तुम्हारी पसन्दगी और विवेचना के ऊपर निर्भर रहा जाय तो मुझे अपना कुमारपन उतारने के लिए आगे और एक जन्म ग्रहण करना पड़े- शायद, उसमें भी पूरा न पड़े। जाने दो, यथासमय, न हो तो दूसरा जन्म ग्रहण कर लूँगा। मुझे जल्दी नहीं है। परन्तु, इस लड़की का तुम उद्धार कर दो। पाँच सौ रुपये हों तो काम हो जायेगा, मैं उन्हीं के मुँह से सुन आया हूँ।''

प्यारी उत्साह में आकर उठ बैठी और बोली, ''कल ही मैं रुपये भेज दूँगी। काकी की बात मिथ्या नहीं होने दूँगी।'' फिर कुछ देर ठहरकर बोली, ''सच कहती हूँ तुमसे, यह लड़की अच्छी नहीं है, इसीलिए मुझे आपत्ति है, नहीं तो...''

''नहीं तो...?''

''नहीं तो फिर क्या! तुम्हारे लायक लड़की जब ढूँढ़ दूँगी, उसी समय इस बात का उत्तर दूँगी, इस समय नहीं।''

सिर हिलाकर मैंने कहा, ''तुम फिजूल कोशिश मत करो राजलक्ष्मी, मेरे लायक लड़की तुम किसी दिन भी खोजकर न निकाल सकोगी।''

वह बहुत देर तक चुप बैठी रहकर एकाएक बोल उठी, ''अच्छा सो शायद न निकाल सकूँ, परन्तु तुम बर्मा जाओगे तो मुझे साथ ले चलोगे?''

उसके प्रस्ताव को सुनकर मैं हँसा। बोला, ''मेरे साथ चलने का तुम्हें साहस होगा?''

प्यारी मेरे मुँह के प्रति तीक्ष्ण दृष्टि पात करके बोली, ''साहस! इसे क्या तुम कोई बड़ा कठिन काम समझते हो?''

''मैं चाहे जो समझूँ, किन्तु तुम्हारे इस सारे घर-द्वार, माल-असबाब, जमीन-जायदाद आदि का क्या होगा?''

प्यारी बोली, ''चाहे जो हो। तुम्हें नौकरी करने के लिए जब इतनी दूर जाना पड़ा- यह सब रहते हुए भी जब तुम्हारे किसी काम न आया, तब इसे बंकू को दे जाऊँगी।''

इस बात का जवाब मैं नहीं दे सका। खुली हुई खिड़की के बाहर अंधेरे में देखता हुआ चुपचाप बैठा रहा।

उसने फिर कहा, ''इतनी दूर न जाओ तो न चले? यह सब क्या किसी भी दिन तुम्हारे किसी काम में नहीं आ सकता?''

मैं बोला, ''नहीं, कभी, किसी दिन भी नहीं।''

प्यारी ने गर्दन हिलाकर कहा, ''यह मैं जानती हूँ। परन्तु, ले चलोगे तुम मुझे अपने साथ?'' इतना कहकर उसने मेरे पैरों पर फिर अपने हाथ रख दिये। एक दिन जब प्यारी ने मकान से जबर्दस्ती बिदा कर दिया था तब उस दिन का उसका असाधारण धीरज और मन की ताकत देखकर मैं अवाक् हो गया था। आज उसी की इतनी बड़ी दुर्बलता-करुण कण्ठ की ऐसी कातर मिन्नत। यह सब एक साथ याद करके मेरी छाती फटने लगी। परन्तु, किसी तरह भी राजी न हो सका। बोला, ''मैं तुम्हें अपने साथ तो नहीं ले जा सकता, परन्तु, तुम जब बुलाओगी, तभी लौट आऊँगा। मैं कहीं भी रहूँ, हमेशा तुम्हारा ही रहूँगा राजलक्ष्मी।''

''क्या तुम चिरकाल तक इस पापिष्ठा के ही होकर रहोगे?''

''हाँ, चिरकाल तक।''

''तब तो फिर, यह कहो कि तुम्हारा कभी विवाह ही न होगा?''

''हाँ, नहीं होगा। इसका कारण यह है, कि तुम्हारी सम्मति के बिना, तुम्हें दु:ख देकर, इस काम में मेरी कभी प्रवृत्ति नहीं होगी।''

प्यारी अपलक दृष्टि से कुछ देर तक मेरे मुँह की ओर देखती रही। इसके बाद उसके दोनों नेत्र ऑंसुओं से परिपूर्ण होकर बड़ी-बड़ी बूँदों के रूप में टप-टप गिरने लगे। ऑंखें पोंछकर गाढ़े स्वर में वह बोली, ''इस हतभागिनी के लिए तुम जिन्दगी-भर सन्यासी बने रहोगे?''

मैंने कहा, ''हाँ, बना रहूँगा। तुम्हारे पास जो वस्तु मैंने पाई है, उसके बदले सन्यासी बनकर रहने में मेरा कोई नुकसान नहीं है। मैं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरी इस बात पर तुम कभी अविश्वास न करना।''

पल-भर के लिए दोनों की चार नजरें हुईं और दूसरे ही क्षण वह तकिये में मुँह छिपाकर उलटी लेट गयी। उच्छ्वसित क्रन्दन के आवेग से उसका सारा शरीर काँप-काँपकर और फूल-फूलकर उचकने लगा।

मैंने मुँह उठाकर देखा, सारा मकान गहरी नींद से ढका हुआ था। कहीं कोई जाग नहीं रहा था। केवल एक दफे खयाल आया, कि झरोखे के बाहर अंधियारी रात्रि अपने कितने ही उत्सवों की प्रिय सहचरी प्यारी के इस हृदय-विदारक अभिनय को मानो आज चुपचाप, ऑंखें खोलकर, अत्यन्त परितृप्ति के साथ देख रही है।

 
000

ऐसी-ऐसी अनेक बातें देखी हैं जिन्हें कि जीवन-भर भूला नहीं जा सकता। वे जब कभी याद आ जाती हैं तब उस समय के शब्द तक मानो कानों में गूँज उठते हैं। प्यारी के अन्तिम शब्द भी इसी तरह के थे। आज भी मैं मानो उनकी गूँज सुना करता हूँ। वह अपने स्वभाव से ही कितनी अधिक संयमी थी, इसका परिचय बचपन में ही उसने बहुत दफे दिया है। और फिर, उसके ऊपर अब कितने दिनों की सांसारिक अभिज्ञता है। उस दफे मेरे बिदा होने के समय किसी तरह भागकर उसने आत्म-रक्षा की थी। परन्तु इस दफे वह किसी तरह भी अपने आपको न सँम्हा्ल सकी, और नौकर-चाकरों के सामने ही रो पड़ी। रुँधे हुए कण्ठ से वह बोल उठीं, ''देखों, मैं नासमझ नहीं हूँ। अपने पापों का भारी दण्ड मुझे भोगना ही पड़ेगा, सो मैं जानती हूँ; किन्तु, फिर भी कहती हूँ, हमारा यह समाज बड़ा निष्ठुर-बड़ा निर्दय है। इसे भी इसका दण्ड एक न एक दिन भोगना ही पड़ेगा। भगवान इस पाप की सजा देंगे ही देंगे!''

समाज को उसने क्यों इतना बड़ा अभिशाप दिया सो वह जाने और उसके अन्तर्यामी जानें। मैं नहीं जानता, सो बात नहीं है; किन्तु मैं चुप ही रहा। बूढ़ा दरबान गाड़ी का दरवाजा खोलकर मेरे मुँह की ओर देखने लगा। मैं आगे पैर बढ़ा ही रहा था कि प्यारी ऑंखों के ऑंसुओं में से मेरे मुँह की ओर देखकर कुछ हँसी; बोली, ''कहाँ जा रहे जो? फिर तो शायद दर्शन होंगे नहीं, एक भिक्षा देते जाओगे?''

मैं बोला, ''दूँगा, कहो।''

प्यारी बोली, ''भगवान न करें- किन्तु, तुम्हारी जीवन-यात्रा जिस ढंग की है उससे-अच्छा, जहाँ भी रहो, ऐसे समय में खबर दोगे? शरमाओगे तो नहीं?''

''नहीं, शरमाऊँगा नहीं- खबर जरूर दूँगा'' इतना कहकर धीरे-धीरे मैं गाड़ी में जा बैठा । प्यारी पीछे-पीछे आई और उसने अपने ऑंचल में मेरे पैरों की धूल ले ली।

''अजी सुनते हो?'' मैंने मुँह उठाकर देखा कि वह अपने काँपते हुए होठों को प्राणपण से काबू में रखकर कहने की कोशिश कर रही है। दोनों की नजर एक होते ही फिर उसकी ऑंखों से झर-झर पानी झर पड़ा। वह अस्पष्ट रुँधे हुए कण्ठ से धीरे से बोली, ''न जाओ इतनी दूर तो? रहने दो, मत जाओ...''

चुपके से मैंने अपनी नजर उस ओर से फेर ली। गाड़ीवान ने गाड़ी हाँक दी। चाबुक और चार-चकोंके सम्मिलित सपासप और घर-घर शब्द से शाम का समय मुखरित हो उठा। किन्तु, इस सबको दबाकर केवल एक रुँधे हुए कण्ठ का दबा हुआ रुदन ही मेरे कानों में गूँजने लगा।

 
3

पाँच-छ: दिन बाद मैं एक दिन भोर के समय, सिर्फ एक लोहे का ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर कलकत्ते के कोयला-घाट पर जा पहुँचा। गाड़ी से उतरते न उतरते खाकी कुरती पहिने हुए एक कुली ने दोनों चीजों को झपट लिया, उन्हें लेकर पलक-भर में न जाने वह कहाँ अन्तधर्न हो गया और जब तक खोजते-खोजते दुश्चिन्ता के मारे मेरी ऑंखों में ऑंसू न आ गये तब तक उसका कोई पता ही नहीं चला।

गाड़ी पर से आते-आते ही मैंने देखा था कि जेटी¹ और बड़े रास्ते के बीच की भूमि नाना रंग के पदार्थों से लदी हुई है- लाल, काले, भूरे, गेरुए। थोड़ा-सा कुहरा भी छाया हुआ था। ऐसा मालूम हुआ कि बछड़ों का एक झुण्ड शायद चालान किये जाने के लिए बँधा हुआ है। निकट आकर ध्याहन से देखा तो मालूम हुआ कि चालान तो अवश्य होगा; किन्तु, बछडों का नहीं-मनुष्यों का। वे लोग बड़ी-बड़ी-सी गठरियाँ लिये, स्त्री-पुत्रों के हाथ पकड़, सारी रात इसलिए इसी तरह ओस में पड़े रहे हैं कि सुबह तड़के ही सबसे पहले जहाज में घुसकर एक अच्छी-सी जगह पर कब्जा कर लेंगे। अतएव, किसके लिए सम्भव था कि पीछे से आकर इन्हें पार करके जेटी के द्वार तक पहुँच सके? थोड़ी ही देर बाद यह दल जब जागकर खड़ा हो गया तब मैंने देखा कि काबुल के उत्तर से कन्याकुमारी के अन्त तक का कोई भी प्रदेश अपना प्रतिनिधि इस कोयला-घाट पर भेजना नहीं भूला है।

सभी हैं। काली-काली गंजियाँ पहिने हुए चीनियों का दल भी बाद नहीं गया है। मैं भी तो डेक का (जिससे नीचे और कोई दर्जा नहीं उसका) यात्री था : इसलिए, लोगों को परास्त करके अपने बैठने के लिए एक जगह मुझे भी प्राप्त करनी थी। किन्तु इसका खयाल करते ही मेरा सारा शरीर बरफ-सा ठण्डा हो गया। फिर भी, जब जाना ही है और जहाज को छोड़कर और कोई जाने का रास्ता नहीं है, तब जैसे भी हो इन्हीं लोगों का अनुकरण करना कर्त्तव्य है- ऐसा विचार कर मैं अपने मन को जितना ही साहस देने लगा मानो उतना ही वह हिम्मत हारने लगा। जहाज कब आकर किनारे से लगेगा सो जहाज ही जाने। इस बीच में ही ये चौदह-पन्द्रह सौ लोग भेड़ों के झुण्ड की तरह कतारें बाँधकर एकाएक ऑंख उठाकर देखा, खड़े हो गये हैं। एक हिन्दुस्तानी आदमी से मैंने पूछा, ''भैया, सब लोग अच्छी तरह से तो बैठे थे- अब एकाएक कतार बाँधकर क्यों खड़े हो गये?'*

¹ जहाँ जहाज ठहरते हैं वह स्थान।

वह बोला, ''डगदरी होगी।''

''डगदरी क्या चीज होती है, भाई?''

उस आदमी ने पीछे से आए हुए एक धक्के को सँभालते हुए कुछ झुँझलाहट से कहा, ''अरे पिलेग का डगदरी।''

बात को समझना और भी कठिन हो गया। पर, समझूँ चाहे न समझूँ- इतने आदमियों के लिए जो जरूरी है वह मेरे लिए भी होगी। किन्तु किस कौशल से अपने आपको इस झुण्ड में घुसेड़ दूँ, यह एक समस्या ही सामने आकर खड़ी हो गयी। कहीं से घुसने के लिए थोड़ी-सी साँसर है या नहीं, यह खोजते-खोजते देखा कि कुछ दूर पर खिदिरपुर के कितने ही मुसलमान संकुचित भाव से खड़े हुए हैं। यह मैंने स्वदेश-विदेश सभी जगह देखा है कि जो काम लज्जित होने जैसा है, उसमें बंगाली लोग अवश्य लज्जित होते हैं। वे भारत की अन्यान्य जातियों के समान बिना संकोच के धक्का-मुक्की मारा-मारी नहीं कर सकते। इस तरह खड़े होने में जो एक तरह की हीनता है, उसकी शरम के मारे मानो ये सब अपना सिर नीचा कर लेते हैं। ये लोग रंगून में दर्जी का काम करते हैं और अनेक दफे आए-गये हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह सब सावधानी, कहीं यहाँ से बर्मा में प्लेग न चली जाय, इसलिए है। डॉक्टर परीक्षा करके पास कर दे तभी जहाज पर चढ़ा जा सकता है। अर्थात् रंगून जाने के लिए जो लोग तैयार हुए हैं, इसके पहले ही जाँच हो जाना चाहिए कि वे प्लेग के रोगी हैं या नहीं। अंग्रेजी राज्य में डॉक्टरों का प्रबल प्रताप है। सुना है, कसाईखाने के यात्रियों को भी अन्दर जाकर जिबह होने का अधिकार प्राप्त करने के लिए इन लोगों का मुँह ताकना पड़ता है। किन्तु, परिस्थिति की दृष्टि से रंगून के यात्रियों के साथ उसकी जो इतनी अधिक समानता है सो उस समय किसने सोची थी।

क्रमश: पिलेग की डगदरी निकट आ पहुँची। पियादे-सहित डॉक्टर साहब दिखाई दिये। उस कतारबन्दी की अवस्था में गर्दन टेढ़ी करके देखने का मौका तो नहीं था; फिर भी, आगे-खड़े हुए साथियों के प्रति किया गया परीक्षा-पद्धति का जितना भी प्रयोग दृष्टिगोचर हुआ, उससे मेरी चिन्ता की सीमा नहीं रही। कायर बंगालियों को छोड़कर ऐसा वहाँ कोई नहीं था जो देह के निम्न भाग के उघाड़े जाने पर भयभीत हो, परन्तु, अपने सामने के साहसी वीर पुरुषों के भी परीक्षा के समय बार-बार चौंक उठते देखकर मैं बुरी तरह शंकित हो उठा। सभी जानते हैं कि प्लेग की बीमारी में शरीर का स्थान-विशेष सूज आया करता है डॉक्टर साहब जिस प्रकार लीला-मात्र से और निर्विकार चित्त से उस सन्देह मूलक स्थान में हाथ डालकर सोजिश टटोलने लगे, उससे काठ के पुतलों को भी आपत्ति होती। किन्तु, भारतवासियों की सभ्यता सनातन है, इसलिए, जैसे भी हो एक दफे चौंककर ये स्थिर हो जाते थे। अगर और कोई जाति होती तो डॉक्टर का हाथ मरोड़े-तोड़े बिना न रहती। सो, चाहे जो हो, 'पास' होना जब अवश्य कर्त्तव्य था, तो फिर, और उपाय ही क्या हो सकता था? यथासमय ऑंखें मींचकर, सारा अंग संकुचित कर- एक तरह से हताश ही होकर, डॉक्टर के हाथ आत्म-समर्पण कर दिया और 'पास' भी हो गया।

इसके बाद जहाज पर चढ़ने की पारी थी। किन्तु, डेक-पैसिंजरों की यह अधिरोहण-क्रिया किस तरह निष्पन्न होती है- बाहर के लोगों के लिए उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है। फिर भी, कल-कारखानों में जिन्होंने दाँतवाले चक्रों की प्रक्रिया देखी है, उनके लिए इसका समझाना कुछ-कुछ सम्भव हो सकता है। वे जिस तरह आगे के खिंचाव और पीछे के धक्के से अग्रसर होकर चलते हैं, उसी तरह हमारी यह काबुली- पंजाबी- मारवाड़ी- मद्रासी- मराठा- बंगाली-चीनी- उड़िया गठित सुविपुल सेना केवल पारस्पारिक आकर्षण-विकर्षण के वेग से नीचे जमीन से जहाज के डेक पर बिना जाने ही चढ़ गयी और वह गति वहाँ पर भी नहीं रुकी। सामने की ओर देखा, एक गङ्ढे के मुँह पर सीढ़ी लगी हुई है। जहाज के गर्म-देश में उतरने का यही रास्ता था। नाले के अवरुद्ध मुख को खोल देने पर वृष्टि का संचित जल जिस तरह तीव्र वेग से नीचे गिरता है, ठीक उसी तरह यह दल भी स्थान अधिकृत करने के लिए जीने-मरने के ज्ञान से शून्य होकर नीचे उतरने लगा।

मुझे जहाँ तक याद आता है, मेरी नीचे जाने की इच्छा नहीं थी। पैरों से चलकर भी नहीं उतरा। क्षण भर के लिए मैं बेहोश हो गया था, इसलिए, मेरे इस कथन में यदि कोई सन्देह प्रकट करे, तो शायद कसम खाकर मैं इसे अस्वीकार भी न कर सकूँगा। होश में आने पर देखा कि गर्भ-गृह के मध्यक बहुत दूर पर एक कोने में मैं अकेला खड़ा हूँ। पैरों की ओर निगाह दौड़ाई, तो देखता हूँ कि इसी बीच में, जादू के खेल की तरह पल-भर में ही कम्बल बिछाकर और बॉक्स-पिटारों आदि से घेरकर हर किसी ने अपने-अपने लिए निरापद-स्थान बना लिया है और शान्ति से बैठकर अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त करना शुरू कर दिया है। इतनी देर के बाद, अब कहीं मेरे उस नम्बर वाले कुली ने आकर दर्शन दिया और कहा, ''ट्रंक और बिस्तर ऊपर रख आया हूँ, यदि आप कहें तो नीचे ले आऊँ।''

मैंने कहा, ''नहीं, बल्कि, किसी तरह यहाँ से उद्धार करके मुझे ही ऊपर ले चल।'' क्योंकि वहाँ इतना-सा स्थान भी मुझे कहीं खाली दिखाई नहीं दिया कि दूसरों के बिस्तर खूँदे बगैर तथा उनके साथ हाथापाई की सम्भावना उत्पन्न किये बगैर, मैं कहीं अपना कदम रख सकूँ। वर्षा होने पर ऊपर पानी में भीग जाऊँ यह अच्छा, किन्तु यहाँ एक क्षण-भर भी ठहरना ठीक नहीं। अधिक पैसों के लोभ से कुली, काफी कोशिश और बहस-मुबाहिसे के बाद, कम्बलों और सतरंजियों के किनारों को उलटता-पुलटता हुआ मुझे अपने साथ लिये हुए ऊपर आया और मेरा माल-असबाब दिखाकर बख्शीीश लेकर चलता बना। यहाँ का भी वही हाल- बिस्तर बिछाने के लिए, निरुपाय हो अपने ट्रंक के ऊपर ही बैठने का इन्तजाम करके मैं एकाग्र चित्त से माता भागीरथी के दोनों किनारों की महिमा का निरीक्षण करने लगा।

स्टीमर ने तब तक चलना आरम्भ कर दिया था। बहुत देर से प्यास लग रही थी। इन दो घण्टों के भीतर जो तूफान सिर पर से गुजर गया उससे जिनकी छाती शुष्क न हो जाए, ऐसे कठिन-हृदय संसार में बहुत थोड़े ही लोग हैं। किन्तु आफत यह हुई कि साथ में न तो गिलास था और न लोटा। साथ के मुसाफिरों में यदि कहीं कोई बंगाली हो तो कुछ उपाय हो कुछ उपाय हो सकता है, यह सोचकर मैं फिर बाहर निकला। नीचे उतरने के उस गङ्ढे के निकट पहुँचते ही एक तरह का विकट कोलाहल सुन पड़ा। मेरी जानकारी इतनी विस्तृत नहीं है कि उस कोलाहल की उपयुक्त तुलना कर सकूँ। गोशाला में आग देने से एक प्रकार का कोलाहल होने की बात कही जाती है जरूर, किन्तु, इसके अनुरूप कोलाहल होने के लिए जितनी बड़ी गोशाला की आवश्यकता है उतनी बड़ी गोशाला महाभारत के युग में विराट राजा के यहाँ यदि रही तो जुदा बात है, किन्तु इस कलिकाल में किसी के यहाँ हो सकती है, इसकी तो कल्पना करना भी कठिन है।

भयपूर्ण हृदय से दो-एक सीढ़ियाँ उतरकर मैंने झाँका तो देखा कि यात्रियों ने अपना अपना 'नेशनल' (=जातीय) संगीत शुरू कर दिया है। काबुल से लेकर ब्रह्मपुत्र और कन्याकुमारी से लेकर चीन की सीमापर्यन्त जितने भी तरह के स्वर ब्रह्म हैं, जहाज के इस बन्द गर्भ के भीतर वाद्ययन्त्रों के सहयोग से, उनका ही समवेत रूप से अनुशीलन हो रहा है। ऐसे महासंगीत को सुनने का सौभाग्य कदाचित् ही संघटित होता है; और संगीत ही ललित कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है, यह बात उस जगह खड़े-खड़े ही मैंने सम्मान के साथ स्वीकार कर ली। किन्तु सबसे अधिक विस्मय की बात यह थी कि वहाँ इतने अधिक संगीत-विशारद एक साथ आ जुटे किस तरह?

मैं एकाएक यह स्थिर नहीं कर सका कि मेरा नीचे उतरना उचित है या नहीं। सुना है, अंगरेजी महाकवि शेक्सपियर ने कहा है कि संगीत के द्वारा जो मनुष्य मुग्ध नहीं होता वह खून तक कर सकता है। किन्तु केवल मिनट भर सुन लेने से ही जो मनुष्य के खून को जमा दे ऐसे संगीत की खबर शायद उन्हें भी नहीं थी। जहाज का गर्भ-गृह वीणापाणि का पीठ-स्थान है या नहीं, सो नहीं, सो नहीं जानता परन्तु, यदि न होता तो यह कौन सोच सकता कि काबुली लोग भी गाना गाते हैं!

एक तरफ यह अद्भुत काण्ड हो रहा था और मैं मुँह बाए देख रहा था कि एकाएक देखा- पास में ही खड़ा हुआ एक व्यक्ति प्राणपण से हाथ हिला-हिलाकर मेरी नजर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। बहुत कष्ट से अनेक लोगों की लाल-लाल ऑंखें सिर पर रखकर मैं उस मनुष्य के पास जा उपस्थित हुआ। उसने ब्राह्मण समझकर मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अपना परिचय दिया कि मैं रंगून का विख्यात नन्द मिस्री हूँ। पास ही एक विगत-यौवना स्थूल स्त्री बैठी हुई एकटक मेरी ओर देख रही थी। मैं उसके मुँह की ओर देखकर स्तम्भित हो गया। मनुष्य की इतनी बड़ी-बड़ी फुटबाल-सी ऑंखें और इतनी मोटी जुड़ी हुई भौहें पहले कभी न देखी थीं।

नन्द मिस्री उसका परिचय देते हुए बोला, ''बाबूजी, यह मेरी घरवा...''

बात पूरी भी न हो पाई थी कि वह फुँकार कर गर्ज उठी, ''घरवाली! ये मेरे सात भाँवरों के स्वामी कहते हैं घरवाली! खबरदार, कहे देती हूँ मिस्री, जिस-तिस के आगे झूठ बोलकर मुझे बदनाम मत किया करो! हाँ...!''

मैं तो विस्मय के मारे हतबुद्धि-सा हो गया।

नन्द मिस्री कुछ अप्रतिभ-सा होकर बोला, ''आहा, नाराज क्यों होती हो टगर? घरवाली और कहते किसे हैं? बीस साल...''

टगर विकट क्रोध से बोल उठी, ''बीस साल हो गये क्या हुआ। फूटे करम! जात-वैष्णव की लड़की होकर मैं कहलाऊँ केवट की घरवाली! कैसे, किस तरह? बीस बरस से तुम्हारे घर हूँ जरूर, किन्तु एक दिन भी तुम्हें चौके में घुसने दिया है, यह बात कोई भी नहीं कह सकता। टगर वैष्णवी मर जायेगी, पर अपनी जाति नहीं खोएगी, जानते हो?'' इतना कहकर वह जात-वैष्णव की लड़की अपनी जाति के गर्व से मेरे मुँह की ओर देखती हुई अपनी दोनों फुटबाल की सी ऑंखें घुमाने लगी।

नन्द मिस्री लज्जित होकर बारम्बार कहने लगा, ''देखा बाबूजी, देखा? अभी तक इसे जाति का गर्व है! देखा आपने! मैं हूँ, इसी से सह लेता हूँ, और कोई होता...'' बीस बरस की उस घरवाली की ओर देखकर बेचारा अपनी बात पूरी भी न कर सका।

मैं और कुछ न बोला और उससे एक गिलास लेकर वहाँ से चल दिया। ऊपर पहुँचकर उस वैष्णवी की बातें याद करके मेरी हँसी रोकी न रुकी। किन्तु क्षण-भर बाद ही सोचा, यह तो एक सामान्य अशिक्षिता स्त्री ठहरी; पर, गाँवों में और शहरों में भी क्या ऐसे अनेक शिक्षित पुरुष नहीं हैं, जिनके द्वारा ऐसे ही हास्यकार्य अब भी प्रतिदिन हुआ करते हैं, और जो पाप के सारे अन्यायों से केवल खाना-छूना बचाकर ही परित्राण पा लेते हैं। तब, यह हो सकता है कि इस देश के पुरुषों का हाल देखकर तो हँसी नहीं आती, आती है सिर्फ औरतों को देखकर।

आज शाम से ही आकाश में थोड़े बादल जमा हो रहे थे। रात को एक बजे के बाद मामूली-सा पानी और हवा भी चली जिससे कुछ देर के लिए जहाज खूब हिला-डुला। दूसरे दिन सुबह से ही वह शिष्ट शान्त भाव से चलने लगा। जिसे समुद्री बीमारी कहते हैं, मेरा वह उपसर्ग तो शायद छुटपन में ही नाव के ऊपर कट गया था, इसलिए वमन करने के संकट को मैं एकबारगी ही पार कर गया; किन्तु, सपरिवार नन्द मिस्री का क्या हाल हुआ- किस तरह रात कटी, यह जानने के लिए मैं नीचे जा पहुँचा। कल के गायकों में अधिकांश उस समय तक भी औंधे पड़े हुए थे। मैंने समझ लिया कि रात्रि के उत्पात के कारण ही ये लोग अभी तक महासंगीत के लिए तैयार नहीं हो सके हैं। नन्द मिस्री और उसकी बीस बरस की घरवाली दोनों गम्भीर भाव से बैठे हुए थे। मुझे देख उन्होंने प्रणाम किया। उनके चेहरे के भाव से जान पड़ा कि कुछ देर पहले ही दोनों में कुछ कलह-सी जरूर हो चुकी है। मैंने पूछा, ''रात को कैसा हाल रहा मिस्रीजी?''

नन्द बोला, ''अच्छा रहा।''

उसकी घरवाली गरज उठी, ''खाक रहा अच्छा! मैयारी मैया, कैसा अद्भुत काण्ड हो गया।''

कुछ उद्विग्न होकर मैंने पूछा, ''कैसा काण्ड?''

नन्द मिस्री ने मेरे मुँह की ओर देखा, फिर जम्हाई ली। चुटकियाँ बजाईं और अन्त में कहा, ''काण्ड ऐसा कुछ नहीं था बाबूजी। कलकत्ते की गलियों के मोड़ों पर साढ़े बत्तीस तरह का चबेना बेचते हुए आपने किसी को देखा है? यदि देखा हो तो हम लोगों की अवस्था को आप ठीक तौर से समझ सकेंगे। वह जिस तरह अंगूठे के नीचे दो-तीन अंगुलियों की चोट मारकर भुने हुए चावल, दाल, मटर, मसूर, चने, सेम के बीज आदि सबको एकाकार कर देता है, देवता की कृपा से हम सब भी ठीक उसी तरह गड्डमड्ड हो गये थे, अभी ही कुछ देर हुई सब कोई अपने-अपने कपड़े पहिचानकर फिर अपनी जगह आकर बैठे हैं।'' इसके बाद वह टगर की ओर देखकर बोला, ''बाबूजी, भाग्य से असल वैष्णव की जात नहीं जाती, नहीं तो मेरी टगर...''

टगर भड़के हुए भालू की तरह गरज उठी, ''अब फिर वही!''

''नहीं, तो जाने दो'', कहकर नन्द उदासीनता से दूसरी तरफ को देखता हुआ चुप हो गया।

एक काबुली दम्पति, जो कि मलिनता के अवतार थे, सिर से पैर तक पृथ्वी की सारी गन्दगी लादे हुए अत्यन्त तृप्ति के साथ रोटी खा रहे थे। क्रुद्ध टगर उन हतभागों के प्रति अपने बड़े-बड़े चक्षुओं से एकंटक होकर अग्नि वर्षण करने लगी। नन्द ने अपनी घरवाली को उद्देश्य करके प्रश्न किया, ''तो फिर आज खाना-पीना कुछ न होगा, क्यों?''

घरवाली ने कहा, ''मौत और किसे कहते हैं? होगा कैसे, सुनूँ तो?''

मामला न समझ सकने के कारण मैंने कहा, ''अभी तो बड़ी सकार है, कुछ बेला चढ़ जाने पर...''

नन्द मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, ''कलकत्ते से एक हाँड़ी में बढ़िया रसगुल्ले लाया था बाबूजी, जहाज पर सवार होने तक कहता रहा, ''आओ टगर, कुछ खा लेवें, आत्मा को कष्ट न दें'', परन्तु नहीं- ''मैं रंगून ले जाऊँगी।'' (टगर के प्रति) ले, अब ले जा रंगून, क्या ले जाती है?''

टगर ने, इस क्रुद्ध अभियोग का स्पष्ट प्रतिवाद न कर, क्षुब्ध अभिमान से एक दफे मेरी ओर देखा और फिर, वह उस हतभागे काबुली को अपनी नजर से पहले के समान ही दग्ध करने लगी।

मैंने धीरे से पूछा, ''क्या हुआ रसगुल्लों का?''

नन्द टगर को लक्ष्य करके कटाक्ष करता हुआ बोला, ''उनका क्या हुआ सो नहीं कह सकता। वह देखो न फूटी हाँड़ी, और वह देखो बिछौने में गिरा हुआ रस। इससे ज्यादा कुछ जानना चाहो तो पूछो उस हरामजादे से।'' इतना कहकर टगर की दृष्टि का अनुसरण कर वह भी कठोर दृष्टि से उनकी ओर ताकने लगा।

मैंने बड़ी मुश्किल से हँसी रोकते हुए मुँह नीचा करके कहा, ''तो जाने दो, साथ में चिउड़ा तो है!''

नन्द बोला, ''उस ओर से भी छुट्टी मिल गयी है। बाबूजी को एक दफे दिखा तो दो, टगर।''

टगर ने एक छोटी-सी पोटली को पैरों से ठुकराते हुए कहा, ''दिखा दो न तुम्हीं-''

नन्द बोला, ''जो भी कहो बाबू, काबुली जात नमकहराम नहीं कही जा सकती। ये लोग जिस तरह रसगुल्ले खा जाते हैं, उसी तरह अपने काबुलदेश की मोटी रोटियाँ भी तो बाँध देते हैं,- फेंकना नहीं टगर, रख छोड़, तेरे ठाकुरजी के भोग के काम में आ जायेंगीं।''

नन्द के इस परिहास से मैं जोर से हँस पड़ा, किन्तु दूसरे ही क्षण टगर के मुँह की ओर देखकर डर गया। क्रोध के मारे उसका सारा मुँह काला हो गया था। ऊँचे कण्ठ से वज्र-कर्कश शब्दों में जहाज के सब लोगों को चौंकाकर वह चिल्ला उठी, ''जात तक मत जाना भला मिस्री-कहे देती हूँ, अच्छा न होगा, हाँ...''

उसकी चिल्लाहट से जिन लोगों ने मुँह उठाकर उस ओर देखा, उनकी विस्मित दृष्टि के सामने, शरम के मारे, नन्द का मुँह जरा-सा रह गया। टगर को वह बखूबी जानता था। अपनी निरर्गल दिल्लगी के कारण पैदा हुए उसके क्रोध को किसी तरह शान्त करने में ही कुशल थी। शरमिन्दा होकर वह चट से बोल उठा, ''सिर की कसम टगर, गुस्सा मत हो, मैं तो केवल मजाक कर रहा था।''

टगर ने वह बात जैसे सुनी ही नहीं। पुतलियाँ और भौहें एक बार बाईं ओर और एक बार दाहिनी ओर घुमाकर और कण्ठ के स्वर को और एक पर्दा ऊपर चढ़ाकर वह बोली, ''मजाक कैसा! जात को लेकर भी क्या कोई मजाक किया जाता है। मुसलमानों की रोटियों से भोग लगाया जायेगा? केवट के मुँह में आग-जरूरत हो तो तू ही न रख छोड़-बाप को इनका पिण्डदान दे देना!''

डोरी छोड़े हुए धानुष्य की तरह नन्द चट से सीधा होकर खड़ा हो गया और उसने टगर का झोंटा पकड़ लिया, ''हरामजादी, तू बाप तक जाती है।''

टगर कमर का कपड़ा सँम्हालती हुई हाँफते-हाँफते बोली, और ''हरामजादे, तू जात तक जायेगा!'' इतना कहकर कानों तक मुँह फाड़कर उसने नन्द की भुजा के एक हिस्से में काट खाया। मुहूर्त-भर में ही नन्द मिस्री और टगर वैष्णवी का मल्ल-युद्ध गहरा हो उठा। देखते ही देखते सब लोग घेरकर खड़े हो गये। भीड़ हो गयी। समुद्री बीमारी की तकलीफ को भूलकर सारे 'हिन्दुस्तानी'¹ ऊँचे कण्ठ से वाहवाही देने लगे, पंजाबी छि:-छि: करने लगे, उड़िया चीं-चीं करने लगे। एक तरह से पूरा लंका काण्ड मच गया मैं सन्नाटे में आ गया। और मेरा मुँह विवर्ण हो गया। इतनी मामूली-सी बात पर निर्लज्जता का ऐसा नंगा नाच हो सकता है, इसकी मैं कल्पना भी न कर सका था। और वह भी एक बंगाली स्त्री-पुरुष के द्वारा जहाज-भर के लोगों के सामने हो रहा है, यह देखकर तो मैं लज्जा के मारे जमीन में गड़ा जाने लगा। पास में ही एक जौनपुरी दरबान अत्यन्त सन्तोष के साथ तमाशा देख रहा था। मेरी ओर लक्ष्य करके बोला, ''बाबूजी, बंगालिन तो बहुत अच्छी लड़ने वाली है, हटती ही नहीं।''

मैं उसकी ओर ऑंखें उठाकर देख भी न सका, चुपचाप गर्दन नीची किये किसी तरह भीड़ को चीरता हुआ ऊपर भाग गया।

उस दिन फिर मेरा जी न चाहा कि नीचे जाऊँ, इसलिए, नन्द और टगर के युद्ध का अन्त किस तरह हुआ- सन्धि-पत्र में कौन-कौन-सी शर्तें निश्चित हुईं, सो मैं कुछ नहीं जान पाया। परन्तु, बाद में देखा कि शर्तें चाहे जो हों, विपत्ति के समय वह 'स्कैप ऑफ पेपर' (कागज का रद्दी टुकड़ा) किसी काम नहीं आता। जब जिसे जरूरत होती है, खिलवाड़ की तरह उसे फाड़ फेंकता है और दूसरे का ब्यूह भेद कर डालता है। बीस बरस से ये दोनों यही करते आए हैं तथा और भी बीस बरस तक ऐसा न करते रहेंगे, इसकी शपथ स्वयं विधाता भी नहीं ले सकेंगे।

 
सारे दिन तो आकाश में बादलों के टुकड़े यहाँ से वहाँ घूमते रहे; परन्तु, अब शाम के लगभग एक गहरा काला बादल सारे क्षितिज को ढँककर धीरे-धीरे सिर उठाकर, ऊपर आने लगा। मालूम हुआ कि खलासियों के मुँह और ऑंखों पर मानो घबराहट की छाया आ पड़ी है। उनके चलने-फिरने में भी मानो एक प्रकार के घबराहट के चिह्न नजर आने लगे हैं जो इसके पहले नहीं थे।

एक बूढ़े-से खलासी को बुलाकर पूछा, ''अजी चौधरी, आज रात को भी क्या कल ही के समान ऑंधी आवेगी?''

विनय से चौधरीजी वश में हो गये। खड़े होकर बोले, ''मालिक, नीचे चले जाइए; कप्तान ने कहा है, साइक्लोन (= बण्ण्डर) उठ सकता है।''

पन्द्रह मिनट बाद ही देखा कि उसका कथन निर्मल नहीं है। ऊपर जितने भी यात्री थे उन सबको खलासी लोग एक तरह से जबरन 'होल्डर' में उतारने लगे। दो-चार लोगों के आपत्ति करने पर सेकण्ड ऑफिसर ने खुद आकर उन्हें धक्के मारकर उठा दिया और उनके बिस्तर वगैरह लातों से हटाना शुरू कर दिया। मेरा ट्रंक, बिस्तर आदि तो खलासी लोग झटपट नीचे उठा ले गये; किन्तु, मैं खुद एक तरफ खिसक गया। मैंने सुना कि सबको- अर्थात् जो हतभागे दस रुपये से अधिक किराया नहीं दे सकते थे उन्हें- उस जहाज के गर्भ-गृह में भर के उसका मुँह बन्द कर दिया जायेगा। उनकी खैरियत के लिए यही एक उपाय था।

किन्तु, मुझे खुद अपने लिए खैरियत की यह व्यवस्था किसी तरह पसन्द नहीं आई। इसके पहले साइक्लोन नामक वस्तु को समुद्र में तो क्या, जमीन पर भी नहीं देखा था। कैसा इसका उपद्रव होता है, कैसा इसका स्वरूप है और अमंगल करने की कितनी इसकी शक्ति है, मैं बिल्कुहल नहीं जानता था। मन ही मन सोचने लगा कि मेरे भाग्य से यदि ऐसी वस्तु का आविर्भाव होना सन्निकट ही है, तो फिर उसे बगैर अच्छी तरह देखे नहीं छोडूँगा। भाग्य में जो बदा हो सो हो। और तूफान में यदि जहाज डूबना ही है, तो इस तरह प्लेग के चूहे की तरह पिंजरे में कैद होकर और सिर पटक-पटककर खारे पानी में क्यों मरूँ? इसकी अपेक्षा जब तक बने, हाथ-पाँव हिलाकर, लहरों के हिंडोले पर झूलते-उतराते हुए एक गोता लगाकर पाताल के राजमहल का अतिथि होना अच्छा। किन्तु, यह उस समय मुझे मालूम न था कि राजा का जहाज आगे-पीछे लाखों-करोड़ों हिंस्र अनुचरों के बगैर काले पानी में एक डग भी नहीं चलता और उन्हें लोगों का कलेवा कर डालने में घड़ी-भर की देर नहीं लगती।

बहुत समय से थोड़ी-थोड़ी वृष्टि हो रही थी। शाम के लगभग हवा और वृष्टि दोनों का ही वेग बढ़ गया। यह हालत हो गयी कि भाग निकलने की भी कोई जुगत न रही। जहाँ भी मिले सुविधानुसार एक आश्रय-स्थान खोजे बगैरे काम नहीं चल सकता। शाम के अंधेरे में जब मैं अपने स्थान पर वापिस आया तब ऊपर का डेक निर्जन हो गया था। मस्तूल के पास उचककर देखा कि ठीक सामने ही बूढ़ा कप्तान हाथ में दूरबीन लिये ब्रिज के ऊपर यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। इस डर से कि एकाएक उसकी शुभ दृष्टि में पड़कर फिर से, इतने कष्ट के बाद भी, दुबारा उसी गव् में न घुसना पड़े, एक ऐसी जगह खोजने लगा जहाँ सुभीते से बैठ सकूँ। खोजते-खोजते आखिर एक जगह मिल गयी जिसकी कि मैंने पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक किनारे बहुत-सी भेड़ों, मुर्गियों और बत्तखों के पिंजड़े एक के ऊपर एक गँजे हुए थे। उछलकर मंब उन्हीं के ऊपर बैठ गया। जान पड़ा, ऐसी निरापद जगह शायद जहाज भर में और कहीं नहीं है। किन्तु, तब भी बहुत-सी बातें जानना बाकी थीं।

वृष्टि, हवा अन्धकार और जहाज का झूलना- ये सभी धीरे-धीरे अधिकाधिक बढ़ने लगे। समुद्र की लहरों का आकार देखकर मैंने मन ही मन सोचा, यही है शायद वह साइक्लोन; किन्तु वह सागर के समीप सिर्फ गौ के खुर के गढ़े के समान ही था, इस बात को अच्छी तरह हृदयंगम करने के लिए मुझे और भी थोड़ी देर ठहरना पड़ा।

एकाएक छाती के भीतर तक कँपकँपी पैदा करता हुआ जहाज का भोंपू बज उठा। ऊपर की ओर ताका तो जान पड़ा, मानो किसी मन्त्र के बल से आकाश का चेहरा ही बदल गया है। वे बादल अब नहीं रहे- मालूम हुआ कि सब तरफ से छिन्न-भिन्न होकर जैसे सम्पूर्ण आकाश हलका होकर कहीं ऊपर की ओर उड़ा जा रहा है। दूसरे ही क्षण समुद्र के एक प्रान्त से एक ऐसा विकट शब्द तेजी से आकर कानों में पैठ गया कि मैं नहीं जानता, उसकी किसके साथ तुलना करूँ।

लकड़पन में अंधेरी रातों में दादी की छाती से लगकर एक कहानी सुना करता था। किसी राजपुत्र ने डुबकी लगाकर तालाब के भीतर से एक चाँदी की डिबिया निकाली थी और उसमें बन्द सात सौ राक्षसियों के प्राणरूप एक सोने के भौंरे को चुटकी से मसलकर मार डाला था। फिर वे सात-सौ राक्षसियाँ मृत्यु यन्त्रणा से चीखती चिल्लाती हुईं सारी पृथ्वी को पैरों के बोझ-से कुचलतीं चूर्ण-विचूर्ण करतीं दौड़ आई थीं। वैसा ही यह भी कहीं कोई विप्ल्व-सा हो रहा है, ऐसा जान पड़ा; परन्तु, इस दफे सात सौ करोड़ राक्षसियाँ हैं- वे उन्मत्त भाव से कोलाहल करती हुई इसी ओर दौड़ी आ रही हैं। आ भी पड़ीं- राक्षसियाँ नहीं, परन्तु, तूफानी हवाएँ। तब मैंने सोचा कि इनकी अपेक्षा तो उन राक्षसियों का आना ही कहीं अच्छा था।

इस दुर्जेय वायु की शक्ति का वर्णन करना तो बहुत दूर की बात है, समग्र चेतना से अनुभव करना भी मानो मनुष्य के सामर्थ्य के बाहर है। सम्पूर्ण ज्ञान-बुद्धि को लुप्त करके केवल एक ही धारणा मेरे मन के भीतर अस्पष्ट और निस्संदिग्ध रूप से जागती रह गयी, कि दुनिया की मियाद एकबारगी खत्म होने में अब और कितनी-सी देर है। पास में ही जो एक लोहे का खूँटा था, गले की चादर से मैंने अपने आपको उसी से बाँध रक्खा था। प्रत्येक क्षण मेरे मन में यही खयाल उठने लगा कि बस मुझे यह हवा इस दफे ही खूँटे से छुड़ा देगी और उड़ा ले जाकर समुद्र में जा पटकेगी।

एकाएक जान बड़ा कि काला पानी मानो भीतर के धक्कों से घरघराता हुआ क्रम-क्रम से जहाज के ऊपर चढ़ रहा है। दूर को ऑंख उठाई तो उस तरफ से दृष्टि को पुन: वापस न लौटा सका। एक दफे जान पड़ा वह तो कोई पड़ाव है, किन्तु दूसरे ही क्षण जब भ्रम भंग हुआ तब हाथ जोड़कर मैंने कहा, ''भगवान, जैसे तुमने ये दोनों नेत्र दिए थे, वैसे ही आज इन्हें सार्थक भी कर दिया। इतने दिनों तक तो संसार में सर्वत्र ही ऑंखें खोले घूमता फिरा हूँ। किन्तु, तुम्हारी इस सृष्टि की तुलना तो कहीं भी नहीं देखी थी। जहाँ तक दृष्टि पहुँचती है एक अचिन्तनीय विराट्काय महातरंग सिर पर चाँदी-सा शुभ्र किरीट धारण किये तेज चाल से आगे बढ़ती हुई आ रही है। जगत में और भी क्या कोई इतना बड़ा विस्मय है?''

समुद्र में न जाने कितने लोग आया-जाया करते हैं; मैं खुद भी तो कितनी ही दफे इस रास्ते गया-आया हूँ; किन्तु ऐसा दृश्य तो पहले कभी कहीं नहीं देखा था। इसके सिवाय, जिस मनुष्य ने ऑंखों नहीं देखा, उसे समझाकर यह बताना कल्पना के बाप के लिए भी सम्भव नहीं कि पानी की लहर किसी तरह इतनी बड़ी हो सकती है!

मन ही मन बोला, हे तरंग-सम्राट! तुम्हारी टक्कर से हमारा जो कुछ होगा, उसे तो हम जानते ही हैं, किन्तु, अब भी तो तुम्हें यहाँ तक आ पहुँचने में आखिर आधा मिनट की देर है, तब कम से कम उतने समय तक तो मैं अच्छी तरह जी-भरकर तुम्हारे कलेवर को देख लूँ।

यह भाव किसी वस्तु की सुविपुल ऊँचाई और उससे भी अधिक विस्तार देखकर ही इस तरह मन में उत्पन्न नहीं हुआ करता, क्योंकि यदि ऐसा हो तो इसके लिए हिमालय का कोई भी अंग-प्रत्यंग यथेष्ट है। किन्तु, जो यह विराट व्यापार सजीव के समान दौड़ा आ रहा है, उसकी अपरिमेय शक्ति की अनुभूति ने ही मुझे अभिभूत कर डाला।

किन्तु, समुद्र-जल के टकराने से जो एक तरह की ज्वाला सी बार-बार चमक उठती है वह ज्वाला विचित्र रेखाओं में यदि इसके सिर पर न खेलती होती तो गम्भीर कृष्ण जल-राशि की विपुलता को मैं इस अन्धकार में शायद उस तरह न देख पाता। इस समय जितनी भी दूर तक मेरी दृष्टि जाती है उतनी ही दूर तक इस आलोक-माला ने मानो छोटे-छोटे प्रदीपों को जलाकर इस भयंकर सौन्दर्य का चेहरा मेरी ऑंखों के सामने खोल दिया है।

जहाज का भोंपू असीम वायु-वेग से थरथर काँपता हुआ लगातार बजने लगा और भयार्त्त खलासियों का दल अल्लाह के कानों तक अपना आकुल आवेदन पहुँचा देने के लिए गला फाड़-फाड़कर एक साथ चिल्लाने लगा।

जिसके शुभागमन के निमित्त इतना भय, इतनी चीख-पुकार- इतना उद्योग-आयोजन हो रहा था, वह महातरंग आखिर आ पहुँची। एक प्रकाण्ड प्रकार की उलट-पलट के बीच हरवल्लभ के समान मुझे भी पहले जान पड़ा कि निश्चय से ही हम डूब गये हैं; इसलिए, दुर्गा का नाम जपने से अब और क्या हो सकता है। आस-पास ऊपर-नीचे, चारों ओर काला जल ही जल है! जहाज समेत सब लोग पाताल के राजमहल में निमन्त्रण खाने जा रहे हैं, इसमें अब कोई सन्देह नहीं रहा। इस समय चिन्ता केवल यही है कि खाना-पीना आदि वहाँ न जाने किस किस्म का होगा।

किन्तु, करीब मिनट-भर बाद ही दिखाई दिया-नहीं, डूबे नहीं हैं, जहाज समेत हम सब केवल जल के ऊपर उतरा रहे हैं। इसके सिवाय लहर के ऊपर लहर आना भी खत्म नहीं हुआ है, इसलिए हम लोगों का हिंडोला झूलना भी समाप्त नहीं हुआ है। इतनी देर के बाद अब पता लगा कि क्यों कप्तान-साहब ने लोगों को जानवरों के समान गढ़े मंे डालकर ताला लगवा दिया है। डेक के ऊपर से बीच-बीच में मानो जल की धारा बह जाने लगी। मेरे नीचे की बत्तखें और मुर्गियाँ कितनी ही दफे फड़फड़ाकर और भेड़ें कई बार 'मैं-मैं' करके भव-लीला समाप्त कर गयीं। सिर्फ मैं ही उनके ऊपर आश्रय ग्रहण किये, लोहे के ख्रुंटे को जोर से पकड़े हुए, अपनी भव-लीला सुरक्षित बनाए रहा।

किन्तु, इसी समय एक और प्रकार की आफत आ जुटी। केवल जल के छींटे ही मेरे शरीर में सुई की तरह छिद रहे हों सो बात नहीं- समस्त कपड़े और धोती के भीग जाने से और प्रचण्ड वायु से इतनी ठण्ड लगने लगी कि दाँत कटकट बजने लगे। खयाल आया, कि हाल जल में डूबने से तो किसी तरह बच भी सकता हूँ, किन्तु निमोनिया के हाथ से किस तरह परित्राण पाऊँगा? और, यह तो मैंने नि:संशय अनुभव किया कि इसी तरह यदि और भी कुछ देर बैठा रहूँगा तो परित्राण पाना सचमुच ही असम्भव हो जायेगा। इसलिए जिस तरह भी हो, इस स्थान का परित्याग करके किसी ऐसी जगह आश्रय लेना चाहिए जहाँ कि जल के छींटे बर्छी के फल की तरह शरीर में न चुभें। एक बार सोचा कि भेड़ों के पिंजरे में घुस जाऊँ तो कैसा हो! किन्तु वह भी कितना सुरक्षित है? उसके भीतर यदि खारे जल की धारा प्रवेश कर जाय तो ठीक 'मैं-मैं' करके न सही, पर 'माँ-माँ' करके अन्त में अवश्य ही इह-लीला समाप्त करनी पड़ेगी।

सिर्फ एक उपाय है। जहाज जब पार्श्व-परिवर्तन करता है तब भागने का कुछ मौका मिल जाता है; इसलिए, उस समय यदि कहीं जाकर घुस सकूँ तो शायद जान बच जाय। जो सोचा, वही किया। किन्तु पिंजरों पर से नीचे उतरकर, तीन बार दौड़कर, और तीन बार बैठकर, किसी तरह जब मैं सेकण्ड क्लास के केबिन के द्वार पर पहुँचा, तब देखा, द्वार बन्द है। लोहे के किवाड़ों ने हजार धक्का-मुक्की करने पर भी रास्ता नहीं दिया। इसलिए, वही रास्ता फिर उसी तरह तय करके मैं फर्स्ट क्लास के दरवाजे पर आ उपस्थित हुआ। इस दफे भाग्य देवता ने सुप्रसन्न होकर एक निराले कमरे में आश्रय दे दिया; और जरा भी दुविधा न करके मैं किवाड़ बन्द करके पलंग पर जा सोया।

रात के बारह बजे के भीतर तूफान तो थम गया, किन्तु समुद्र का गुस्सा दूसरे दिन भोर तक भी शान्त न हुआ।

मेरे सामान का और साथी मुसाफिरों का क्या हाल हुआ, और, खास तौर से सपत्नीक मिस्रीजी ने किस तरह रात बितई, यह जानने के लिए सुबह मैं नीचे उतर गया। कल नन्द मिस्री ने जरा दिल्लगी करते हुए कहा था कि ''बाबूजी, साढ़े बत्तीस प्रकार के चबेने के समान हम लोग आपस में गड्डमड्ड हो गये थे और अभी ही कुछ देर हुई, सब कोई अपनी-अपनी जगह आकर बैठे हैं।'' आज का गड्डमड्ड साढ़े बत्तीस प्रकार में गिना जा सकता है या नहीं, सो मुझे नहीं मालूम; किन्तु, इस समय तक कोई भी अपने निजी स्थान पर लौटकर न आने पाया था यह मैंने अपनी ऑंखों देखा।

उन लोगों की व्यवस्था देखने पर सचमुच ही रुलाई आने लगी। इन तीन-चार-सौ यात्रियों में से किसी के समर्थ रहने की बात तो दूर-शायद, अक्षत भी कोई नहीं बचा था।

औरतें सिल पर जिस तहर लोढ़े से मसाला बाँटती हैं, कल का साइक्लोन इन तीन-चार सौ लोगों का ठीक उसी तरह सारी रात मसाला बाँटता रहा। सारे माल-असबाब के सहित-बक्स-पेटियों आदि के सहित ये सब लोग रात-भर जहाज के इस किनारे से उस किनारे तक लुढ़कते फिरे हैं। वमन तथा अन्य दो क्रियाएँ इतनी अधिक की गयी हैं कि दुर्गन्ध के मारे खड़ा होना भी भारी हो रहा है और इस समय डॉक्टर बाबू जहाज के मेहतर और खलासियों को साथ लिये इन लोगों का 'पंकोद्धार' करने की व्यवस्था कर रहे हैं।

डॉक्टर बाबू ऊपर से नीचे तक मेरा बार-बार निरीक्षण करके शायद मुझे सेकण्ड क्लास का मुसाफिर समझ बैठे थे, फिर भी, अत्यन्त आश्चर्य के साथ बोले, ''महाशय तो खूब ताजे दिख रहे हैं; जान पड़ता है कि आराम करने के लिए कोई हैमॉक (भ्उउवबा= जहाज पर रहनेवाला एक तरह का एक झुलन-खटोला) पा गये थे, क्यों न?''

''हैमॉक कहाँ से पाता महाशय, पाया था एक भेड़ों का पिंजरा। इसीलिए तरो-ताजा दीख रहा हूँ।''

डॉक्टर बाबू मुँह फाड़कर मेरी ओर ताकते रह गये। मैं बोला, ''डॉक्टर बाबू, यह अधम भी इसी नरक-कुण्ड का यात्री है। किन्तु, कमजोर होने के सबब यहाँ घुस न सका- शुरु से ही डेक के ऊपर रहा आया। कल साइक्लोन की खबर पाकर कुछ देर भेड़ों के पिंजरों के ऊपर बैठकर, और रात को फर्स्ट क्लास के एक कमरे में अनधिकार प्रवेश करके आत्मरक्षा कर सका हूँ। क्या कहते हैं आप, मैंने कुछ अनुचित तो नहीं किया?''

सारा इतिहास सुनकर डॉक्टर बाबू इतने प्रसन्न हुए कि उसी क्षण उन्होंने मुझे अपने निजी कमरे में बाकी दो दिन काटने के लिए सादर निमन्त्रण दे दिया। अवश्य ही उस निमन्त्रण को मैं स्वीकार नहीं कर सका- केवल एक चेयर मैंने उनसे ले ली।

दोपहर को भूख की मार से मुर्दे की तरह चेयर पर पड़ा हुआ ब्रह्माण्ड की समस्त खाद्य-वस्तुओं का ध्या न कर रहा था- कहाँ जाकर क्या कौशल करूँ कि कुछ खाने को मिल जाय। इसी समय, जब कि मैं इस दुश्चिन्ता में डूबा हुआ था, खिदिरपुर के मुसलमान दर्जियों में से एक ने आकर कहा, ''बाबू साहब, एक बंगाली औरत आपको बुला रही है।''

''औरत?'' समझा कि टगर होगी। क्यों बुला रही है सो भी अनुमान कर लेना मेरे लिए कठिन नहीं था। निश्चय ही मिस्री के साथ स्वामी और स्त्री के स्वत्व सिद्ध करने के व्यापार में फिर मतभेद उपस्थित हो गया है। किन्तु, मेरी जरूरत क्यों आ पड़ी? ज्तपंस इल वतकमंस (अग्नि-परीक्षा के) सिवाय बाहर के किसी आदमी ने आकर किसी दिन इसकी मीमाँसा कर दी हो, यह सोचना भी कठिन है।

मैंने कहा, ''घण्टे-भर बाद आऊँगा, कह देना।''

उस मनुष्य ने कुण्ठित होकर कहा, ''नहीं बाबू साहब, बड़ी मिन्नत करके बुला रही है...''

''मिन्नत करके?'' किन्तु टगर तो मिन्नत करने वाली औरत नहीं है। पूछा ''उसके साथ का मर्द क्या कर रहा है?''

वह बोला, ''उसी की बीमारी के कारण तो आपको बुला रही है।''

बीमारी होना बिल्कु'ल ही अचरज की बात नहीं थी, इसलिए मैं उठ खड़ा हुआ। वह मुझे अपने साथ नीचे ले गया। काफी दूर पर एक कोने में कुण्डली किये हुए मोटे-मोटे रस्से रखे हुए थे। उन्हीं की आड़ में एक बाईस-तेईस वर्ष की बंगाली स्त्री बैठी थी। पहले कभी उस पर मेरी नजर नहीं पड़ी थी। पास में ही एक मैली शतरंजी के ऊपर करीब-करीब इसी उम्र का एक अत्यन्त क्षीणकाय युवक मुर्दे की तरह ऑंखों मूँदकर पड़ा हुआ है- वही बीमार है।

मेरे निकट आते ही उस औरत ने धीरे-धीरे अपने सिर का वस्त्र आगे खींच लिया, किन्तु मैं उसका मुँह देख चुका था।

वह मुख सन्दर कहा जाय तो बहस उठ सकती है, किन्तु फिर भी उपेक्षा करने योग्य नहीं था। ऊँचा कपाल स्त्रियों की सौन्दर्य-तालिका में कोई स्थान नहीं रखता, यह मुझे मालूम है; फिर भी, इस तरुणी के चौड़े मस्तक पर बुद्धि और विचार-शक्ति की एक ऐसी छाप लगी हुई देखी जिसे मैंने कदाचित् ही देखा है। मेरी अन्नदा जीजी का कपाल भी प्रशस्त था। इसका भी बहुत कुछ उसी तरह का था। माँग में सिन्दूर झलक रहा था, हाथ में लोहे की चूड़ियाँ¹ और शंख के वलयों को छोड़कर और कोई अलंकार नहीं था। ऑंग में एक सीधी-सादी रंगीन साड़ी थी।

परिचय न होने पर भी इतने स्वाभाविक ढंग से उसने बात की कि मैं विस्मित हो गया। वह बोली, ''आपके साथ डॉक्टर बाबू का तो परिचय है, क्या एक दफे आप बुला सकते हैं?''

मैंने कहा, ''आज ही उनसे परिचय हुआ है। फिर भी, जान पड़ता है, डॉक्टर बाबू भले आदमी हैं। किन्तु, उन्हें क्यों बुलाती हो?''

वह बोली, ''यदि बुलाने पर विजिट देनी पड़ती हो, तो फिर जरूरत नहीं है; न होगा, ये ही थोड़ा कष्ट करके ऊपर चले चलेंगे।'' इतना कहकर उसने उस रोगी आदमी को दिखा दिया।

मैंने सोचकर कहा, ''जहाज के डॉक्टर को शायद कुछ भी देना नहीं होता। किन्तु, इन्हें हो क्या गया है?''

मैंने सोचा था कि रोगी इनका पति है; किन्तु, बातचीत से कुछ सन्देह हुआ। उस मनुष्य के मुँह के ऊपर कुछ झुककर उसने पूछा, ''घर से चलते समय से ही तुम्हें पेट की बीमारी थी न?''

उस मनुष्य ने सिर हिला दिया, तब इसने सिर ऊपर उठाकर कहा, ''हाँ, इन्हें पेट की बीमारी देश में ही हुई थी, किन्तु कल से बुखार आ गया। इस समय देखती हूँ कि बुखार तेज हो आया है, कुछ दवाई दिए बिना काम न चलेगा।''

मैंने भी स्वयं हाथ डालकर उसके शरीर का ताप देखा, वास्तव में बुखार खूब तेज था। डॉक्टर को बुलाने मैं ऊपर चला गया।

डॉक्टर बाबू नीचे आए, रोग-परीक्षा करके और दवाई का पुरजा देकर बोले, ''चलो श्रीकान्त बाबू, कमरे में चलकर गप-शप करें।''

डॉक्टर बाबू खूब रंगीले थे। अपने कमरे में ले जाकर बोले, ''चाय पीते हैं?'' मैंने कहा, ''हाँ, पीता हूँ।''

''और बिस्कुट?''

''सो भी खाता हूँ?''

''अच्छा।''

खाना-पीना समाप्त होने के बाद दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गये। डॉक्टर बाबू बोले, ''आज कैसे जा भिड़े उस औरत से?''

मैंने कहा, ''उसने ही मुझे बुला भेजा था।''

डॉक्टर बाबू इस तरह सिर हिलाकर कि मानो सब कुछ जानते हों, बोले, ''बुलाना ही चाहिए- शादी-वादी की है या नहीं?''

मैंने कहा, ''नहीं।''

डॉक्टर बाबू बोले, ''तो बस, भिड़ जाओ। ऐसी कुछ बुरी नहीं है। उस आदमी का चेहरा देखा, उस पर टाईफाइड के लक्षण नजर आते हैं। कुछ भी हो, वह अधिक दिन न टिकेगा, यह निश्चित है। इस बीच उस पर नजर बनाए रखना। कहीं और कोई साला न भिड़ जाय।''

मैं अवाक् होकर बोला, ''आप यह सब कह क्या रहे हैं, डॉक्टर बाबू?''

डॉक्टर बाबू जरा भी अप्रतिभ हुए बिना बोले, ''अच्छा, वह छोकरा ही उसे घर से निकाल लाया है या उसी को वह बाहर निकाल लाई है- तुम्हें क्या मालूम होता है, श्रीकान्त बाबू? खूब फारवर्ड है। बातचीत तो बहुत अच्छी करती है।''

मैंने कहा, ''इस तरह का खयाल आपके मन में क्यों आया?''

डॉक्टर बाबू बोले, ''हर एक ट्रीप में तो देखता हूँ कि एक न एक है ही। पिछली दफे भी बेलघर की एक ऐसी ही जोड़ी थी। एक बार बर्मा में जाकर कदम तो रक्खो, तब देखोगे कि मेरी बात सच है या नहीं।''

उनकी बर्मा की बात बहुत कुछ सच है, यह मैंने बाद में अवश्य देखा; किन्तु उस समय तो ऊपर से नीचे तक मेरा सारा मन अरुचि से तीखा हो उठा। डॉक्टर बाबू से बिदा लेकर नन्द मिस्री की खबर लेने नीचे गया। घरवाली सहित मिस्री उस समय फलाहार की तैयारी कर रहा था। नमस्कार करने के बाद सबसे पहले उसने यह प्रश्न किया, ''यह औरत कौन है, बाबू?...''

टगर सिर दर्द के कारण अपने सिर पर एक कपड़ा पगड़ी की तरह बाँध रही थी। एकदम फुसकारकर बोल उठी, ''यह जानने की तुम्हें क्या गरज पड़ी है, बताओ तो सही?''

मिस्री ने मुझे मध्ययस्थ मानकर कहा, ''देखी महाशय, इस औरत की ओछी तबियत? कौन बंगाली औरत रंगून जा रही है, यह पूछना भी जैसे पाप हो!''

टगर अपना सिर-दर्द भूल गयी और पगड़ी को फेंककर मेरी ओर ताकने लगी। उसने अपनी दोनों गोल-गोल ऑंखें फाड़कर कहा, ''महाशय, टगर वैष्णवी के हाथ के नीचे से इन सरीखे से न जाने कितने मिस्री आदमी बनकर निकल गये हैं- अब भी क्या यह मेरी ऑंखों में धूल झोंक सकते हैं? अरे, तुम डॉक्टर हो कि वैद्य, जो मैं जरा-सा पानी लेने गयी, कि इतनी ही देर में, चट से दौड़कर वहाँ देखने जा पहुँचे? क्यों, कौन है वह? यह अच्छा नहीं होगा, सो कहे देती हूँ, मिस्री। यदि दुबारा फिर कभी वहाँ जाते देखूँगी तो फिर एक दिन या तो तुम ही हो या मैं ही।''

नन्द मिस्री ने गर्म होकर कहा, ''तेरा क्या मैं पालतू बन्दर हूँ जो तू जिस तरफ साँकल पकड़कर ले जायेगी उसी तरह जाऊँगा? मेरी इच्छा होगी तो फिर जाकर उस बेचारे को देखने जाऊँगा। तेरे मन में आवे सो कर।'' इतना कहकर उसने फलाहार में चित्त लगाया।

टगर ने भी सिर्फ 'अच्छा' कहकर अपनी पगड़ी बाँधना शुरू कर दिया। मैं भी वहाँ से चल दिया। चलते-चलते मैं सोचता गया- इसी तरह इन दोनों ने बीस बरस काट दिए हैं। अनेक दफे हाथ जलाकर टगर इतना सीखी है कि जहाँ पर सत्य का बन्धन नहीं है वहाँ रास को जरा भी ढीला करना अच्छा नहीं होता। ठगाना ही पड़ता है। या तो रात-दिन सतर्क बने रहकर जोर-जबरदस्ती से अपना दखल जमाए रखना पड़ेगा, नहीं तो, जवानी की तरह नन्द मिस्री भी एक दिन अनजान में खिसक जायेगा।

किन्तु, जिसको लक्ष्य करके टगर के मन में यह विद्वेष उत्पन्न हुआ और डॉक्टर बाबू ने कुत्सित तीव्र कटाक्ष किया, वह है कौन? टगर ने कहा था- यही कार्य करते हुए मैंने अपने बाल पकाए हैं। ऐसी औरत है कहाँ जो मेरी ऑंखों में धूल झोंक सके? डॉक्टर बाबू ने अपना मन्तव्य जाहिर किया था कि ऐसी घटनाएँ नित्य ही देखते रहने के कारण उनकी ऑंखों में दिव्यदृष्टि उत्पन्न हो गयी है। इसमें यदि भूल हो, तो वे ऐसी ऑंखों को निकाल फेंकने के लिए तैयार हैं।

ऐसा ही होता है। दूसरे का विचार करते समय किसी मनुष्य को कभी यह कहते नहीं सुना कि वह अन्तर्यामी नहीं हैं, अथवा कहीं भी उसका कोई भ्रम या प्रमाद हो सकता है। सभी कहते हैं कि मनुष्य को चीन्हने में हम बेजोड़ हैं और इस विषय में हम एक पक्के जौहरी हैं। फिर भी, संसार में मैं नहीं जानता कि कभी किसी ने अपने खुद के भी मन को ठीक तरह से पहिचाना हो। मगर हाँ, मेरे समान जिसने भी कहीं कोई कठिन चोट खाई है, उसे अवश्य ही सावधान होना पड़ा है। यह बात उसे मन ही मन मंजूर करनी ही पड़ती है कि संसार में जब अन्नदा जीजी सरीखी स्त्रियाँ भी हैं, तब बुद्धि के अहंकार से दूसरे को हीन और नासमझ समझकर खुद बुद्धिमान बनने की अपेक्षा, सब-कुछ अच्छी तरह जानते हुए भी, नासमझ बनने में ही एक तरह से अधिक बुद्धिमानी है। इसलिए, इन दो परम विज्ञ स्त्री-पुरुषों के उपदेश की मैं अभ्रान्त न मान सका। किन्तु डॉक्टर बाबू ने जो कहा था कि अत्यन्त 'फॉरवर्ड' है, सो ठीक मालूम हुआ। और, केवल यही बात मुझे रह-रहकर चुभने लगी।

बहुत रात गये मैं फिर बुलाया गया। इस दफे इस औरत का मुझे परिचय प्राप्त हुआ। नाम था अभया। उत्तरराढ़ी कायस्थ है, घर है बालूचर के निकट। जो व्यक्ति बीमार पड़ा है वह गाँव के रिश्ते से भाई होता है, नाम है उसका रोहिणी सिंह। ''दवा से रोहिणी बाबू को काफी लाभ पहुँचा है'', इस तरह कहना आरम्भ करके थोड़े ही समय में अभया ने मुझे अपना आत्मीय बना लिया। किन्तु मुझे यह तो स्वीकार करना ही चाहिए कि मेरे मन में, अनिच्छा होते हुए भी, एक कठोर समालोचना का भाव बराबर जाग्रत हो गया था। फिर भी, इस स्त्री की सारी बातचीत और आलोचना के दरम्यायन कहीं भी मैं जरा-सी भी असंगति या अनुचित प्रगल्भता नहीं पकड़ पाया।

अभया में मनुष्य को वश करने की अद्भुत शक्ति है। इस बीच में ही उसने मेरा केवल नाम-धाम ही नहीं जान लिया, वरन् 'मैं उसके लापता पति को, जिस तरह हो सके, खोज दूँगा', यह वचन भी उसने मेरे मुँह से निकलवा लिया। उसका पति आठ वर्ष पहले बर्मा में नौकरी के लिए आया था। दो वर्ष तक उसकी चिट्ठी-पत्री आती रही थी; किन्तु इन छह वर्षों से उसका कोई पता नहीं है। देश में कुटुम्ब-कबीले का और कोई नहीं है। माँ थीं; परन्तु वे भी करीब महीने-भर पहले गुजर गयीं। बाप के घर अभिभावकहीन होकर रहना असम्भव हो जाने से रोहिणी भाई को राजी कर बर्मा आई है।

कुछ देर चुप रहकर एकाएक वह बोल उठी, ''अच्छा, इतनी-सी भी कोशिश न करके यदि किसी तरह देश में ही पड़ी रहती तो क्या यह मेरे हक में अच्छा होता? इसके सिवाय इस उम्र में बदनामी मोल लेते कितनी-सी देर लगती है?''

मैंने पूछा, ''क्या आप जानती हैं कि इतने दिन तक क्यों आपकी उन्होंने कुछ खबर नहीं ली?''

''नहीं, कुछ नहीं जानती।''

''इसके पहले वे कहाँ थे, सो मालूम है?''

''जानती हूँ। रंगून में ही थे, बर्मा रेलवे में काम करते थे; किन्तु, कितनी ही चिट्ठियाँ दीं, कोई उत्तर नहीं मिला। और, कभी कोई चिट्ठी लौटकर वापिस भी नहीं आई।''

प्रत्येक पत्र अभया के पति को मिला है, यह तो निश्चित था। किन्तु, क्यों उसने जवाब नहीं दिया, इसका सम्भाव्य कारण हाल ही मैंने डॉक्टर बाबू के निकट सुना था। बहुत-से बंगाली वहाँ जाकर किसी ब्रह्मदेश की सुन्दरी को घर बिठाकर नयी गिरस्ती बसा लेते हैं और उनमें ऐसे अनेक हैं जो सारी जिन्दगी फिर लौटकर देश नहीं गये।

मुझे चुप देखकर अभया ने पूछा, ''वे जीवित नहीं हैं, यही क्या आपको जान पड़ता है?''

मैंने सिर हिलाकर कहा, ''बल्कि, ठीक इससे उल्टा। वे जीवित हैं, यह तो मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ।''

चट से अभया ने मेरे पैरे छूकर प्रणाम किया और कहा, ''आपके मुँह में फूल-चन्दन पड़ें। श्रीकान्त बाबू, मैं और कुछ नहीं चाहती। वे जीवित हैं, बस इतना ही मेरे लिए काफी है।''

मैं फिर मौन हो रहा। अभया खुद भी कुछ देर मौन रहकर बोली, ''आप क्या सोच रहे हैं, सो मैं जानती हूँ।''

''जानती हो?''

''जानती नहीं तो? आप पुरुष होकर जिसका खयाल कर रहे हैं, स्त्री होकर भी क्या मुझे वह भय नहीं होगा? सो होने दो, मुझे उसका डर नहीं है- मैं अपनी सौत के साथ मजे से गिरस्ती चला सकती हूँ।''

फिर भी मैं चुप ही बना रहा। किन्तु, मेरे मन की बात का अनुमान करने में इस बुद्धिमती स्त्री को जरा-सा भी विलम्ब नहीं हुआ। बोली, ''आप सोच रहे हैं कि मेरे गिरिस्ती चलाने के लिए राजी होने से ही तो काम नहीं चलेगा; मेरी सौत को भी तो राजी होना चाहिए?-यही न सोच रहे हैं?''

दरअसल मैं अवाक् हो गया और बोला, ''ठीक यदि ऐसा ही हो तो क्या करेंगी?''

इस दफे अभया की दोनों ऑंखें छलछला उठीं। वह मेरे मुँह की ओर अपनी सजल दृष्टि निबद्ध करके बोली, ''उस विपत्ति में आप मेरी थोड़ी-सी सहायता कर सकेंगे, श्रीकान्त बाबू, मेरे रोहिणी भइया बड़े सीधे-सादे भोले आदमी हैं, इसलिए उस समय तो इनके द्वारा मेरा कोई उपकार न होगा।''

राजी होकर मैंने कहा, ''बन पड़ेगा तो जरूर सहायता करूँगा; किन्तु इन सब कामों में बाहर के लोगों के द्वारा प्राय: काम होता तो कुछ नहीं, उलटा बिगड़ ही जाता है।''

''यह बात सच है'' कहकर अभया चुपचाप कुछ सोचने लगी।

दूसरे दिन ग्यारह-बारह बजे के बीच जहाज रंगून पहुँचने वाला था; किन्तु भोर होने के पहले से ही सब लोगों की ऑंखों और चेहरों पर भय और चंचलता के चिह्न नजर आने लगे। चारों ओर से एक अस्फुट शब्द कानों में आने लगा, 'केरेंटिन, केरेंठिन।' पता लगाने से मालूम हुआ कि ठीक शब्द 'कारेंटाइन' ;फनंतंदपजपदमद्ध है। उस समय बर्मा की सरकार प्लेग के डर से अत्यन्त सावधान थी। शहर से आठ-दस मील दूर पर रेत में काँटेदार तारों से थोड़ा-सा स्थान घेरकर उसमें बहुत-सी झोपड़ियाँ खड़ी कर दी गयी थीं- इसमें ही डेक के समस्त यात्रियों को बिना कुछ विचार किये उतार दिया जाता था। यहाँ पर दस दिन ठहरने के बाद उन्हें शहर में जाने दिया जाता था। हाँ, यदि किसी का कोई आत्मीय शहर में होता और वह पोर्ट हेल्थ ऑफिसर के पास जाकर किसी कौशल से 'छोड़पत्र' जुटा सकता तो बात जुदी थी।

डॉक्टर बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर बोले, ''श्रीकान्त बाबू, एक 'छोड़पत्र' जुटाए बगैर आपका यहाँ आना उचित नहीं हुआ; कारेंटाइन में ले जाकर वे लोग मनुष्य को इतना कष्ट देते हैं कि कसाईखाने के गाय-बैल-भेड़ आदि जानवरों को भी उतना कष्ट नहीं सहना पड़ता। साधारण आदमी तो उसे किसी तरह सह लेते हैं, मर्मांन्तिक कष्ट तो केवल भले आदमियों को ही सहना पड़ता है। एक तो यहाँ कोई मजूर नहीं मिलता-अपना सब माल-असबाब अपने ही कन्धों पर लादकर एक सीधी जर्जर सीढ़ी पर से चढ़ना-उतरना होता है, और उतनी दूर ले जाना पड़ता है। इसके बाद, सारा माल-असबाब वहाँ खोलकर बिखेर दिया जाता है और स्टीम में उबालकर बर्बाद किया जाता है। और महाशय, ऐसी कड़ी धूप में तो कष्ट का कोई पार ही नहीं रहता।''

अत्यन्त भयभीत होकर मैंने कहा, ''इसका कोई प्रतिकार नहीं है क्या डॉक्टर बाबू?''

उन्होंने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं-हाँ, जब डॉक्टर साहब जहाज के ऊपर चढ़ आवेंगे तब मैं उनसे कह देखूँगा। उनका क्लर्क यदि आपकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को राजी होगा तो...''

किन्तु, उनकी बात अच्छी तरह पूरी न होने पाई थी कि बाहर एक ऐसा काण्ड घटित हुआ जिसकी याद करके मैं खुद भी लाज के मारे मर जाता हूँ। कुछ गोलमाल सुनकर दोनों जनें कमरे से बाहर निकले। देखा कि जहाज का सेकण्ड ऑफिसर छह-सात खलासियों को बेधड़क चाहे जिस तरह लातें मार रहा है, और, उसके बूट की ठोकरें खाकर वे जहाँ बन पड़ता है वहाँ भाग रहे हैं। यह अंगरेज युवक अत्यन्त उद्धत था, इसलिए डॉक्टर बाबू के साथ इसकी पहले भी कहा-सुनी हो चुकी थी, और आज फिर एक झपट हो गयी।

डॉक्टर गुस्सा होकर बोले, ''तुम्हारा इस तरह का काम अत्यन्त निन्दनीय है, किसी दिन इसके लिए तुम्हें दु:ख उठाना पड़ेगा, यह मैं कहे देता हूँ।''

वह पलटकर खड़ा हो गया और बोला, ''क्यों?''

डॉक्टर बाबू बोले, ''इस तरह लातें मारना बड़ा भारी अन्याय है।''

उसने जवाब दिया, ''मार खाए बिना क्या ढोर सीधे होते हैं?''

डॉक्टर बाबू कुछ 'स्वदेशी खयाल' के आदमी थे; वे उत्तेजित होकर कहने लगे, ''ये लोग जानवर नहीं हैं, गरीब मनुष्य हैं! हमारे देशी आदमी नम्र और शान्त होने के कारण कप्तान साहब के पास जाकर तुम्हारी शिकायत नहीं करते; और इसीलिए, तुम अत्याचार करने का साहस करते हो!''

एकाएक साहब का मुँह अकृत्रिम हँसी से भर गया। डॉक्टर का हाथ खींचकर उसने अंगुली से दिखाते हुए कहा, Look, Doctor, theres your country-men, you ought to be proud of them? (देखो डॉक्टर, वह देखो तुम्हारे देश के आदमी, तुम्हें अवश्य ही इन पर फक्र होना चाहिए।)

मैंने नजर उठाकर देखा, कुछ ऊँचे पीपों की आड़ में खड़े होकर वे खींसे बाहर निकाल कर हँस रहे हैं और शरीर की धूल झाड़ रहे हैं। साहब थोड़ा-सा हँसकर, डॉक्टर बाबू के मुँह पर दोनों हाथों के अंगूठे हिलाकर दाएँ-बाएँ झूमता सीटी देता हुआ चल दिया। विजय का गर्व जैसे उसके सारे शरीर से फूट पड़ने लगा।

डॉक्टर बाबू का मुँह लज्जा से, क्षोभ से और अपमान से काला हो गया। तेजी से कदम आगे रखते हुए क्रुद्ध स्वर से वे बोल उठे, ''बेहया सालो, खींसे बाहर निकालकर हँस रहे हो!''

इस दफे, इतनी देर बाद, देशी लोगों का आत्म सम्मान शायद लौट आया। सब लोगों ने एक साथ हँसना बन्द करके तेजी से जवाब दिया, ''तुम डॉक्टर बाबू, 'साला' कहने वाले कौन होते हो? किसी का कर्ज खाकर तो हम लोग नहीं हँसते?''

''जबर्दस्ती से डॉक्टर बाबू को खींचकर उनके कमरे में वापिस ले आया। कुर्सी पर धम्म से गिरते हुए उनके मुँह से सिर्फ 'ऊ:-!' निकला।

और कोई दूसरी बात उनके मुँह से बाहर निकलना भी असम्भव थी। ग्यारह बजे के लगभग कॉरेण्टाइन के पास एक छोटा-सा स्टीमर आकर जहाज से सटकर खड़ा हो गया। समस्त डेक के यात्रियों को यही उस भयानक स्थान में ले जाएगा। माल-असबाब बाँधने-छोरने की धूम मच गयी। मुझे जल्दी नहीं थी; क्योंकि, डॉक्टर बाबू का आदमी अभी ही कह गया था कि मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। निश्चिंत होकर यात्रियों और खलासियों की चिल्लाहट और दौड़-धूप कुछ अन्यमनस्क-सा होकर देख रहा था। हठात् पीछे से एक शब्द सुन पड़ा, पलटकर देखा कि अभया खड़ी है। आश्चर्य के साथ पूछा, ''आप यहाँ कैसे?''

अभया बोली, ''क्यों, क्या आप अपनी चीज-बस्त बाँधोगे नहीं?''

मैंने कहा, ''नहीं, मुझे अभी काफी देर है, मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। एकदम शहर में जाकर उतरूँगा।''

अभया बोली, ''नहीं, शीघ्र सामान ठीक कर लीजिए।''

मैंने कहा, ''मुझे अब भी बहुत समय है।...''

अभया ने प्रबल वेग से सिर हिलाकर कहा, ''नहीं, सो नहीं हो सकता, मुझे छोड़कर आप किसी तरह नहीं जाने पाएँगे।''

मैं अवाक् होकर बोला, ''यह क्या? मेरा तो वहाँ जाना नहीं हो सकेगा।''

अभया बोली, ''तो फिर, मेरा भी नहीं हो सकेगा। मैं पानी में भले ही फाँद पूड़ूँ, परन्तु, निराश्रय होकर इस जगह किसी तरह नहीं जाऊँगी। वहाँ की सब बातें सुन चुकी हूँ।'' यह कहते-कहते उसकी ऑंखें छलछला आईं। मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठा रहा। ''यह कौन है जो मुझे इस तरह धीरे-धीरे जोर डालकर अपने जीवन के साथ जकड़ रही है?

वह ऑंचल से ऑंखें पोंछकर बोली, ''मुझे अकेली छोड़कर चले जावेंगे? मैं नहीं सोच सकती कि आप इतने निष्ठुर हो सकते हैं। उठिए, नीचे चलिए। आप न होंगे तो उस बीमार आदमी को साथ लेकर मैं अकेली औरत-जात क्या करूँगी, आप ही बताइए?''

अपना माल-असबाब लेकर जब मैं छोटे स्टीमर पर चढ़ा तब डॉक्टर बाबू ऊपर के डेक पर खड़े थे। हठात् मुझे इस अवस्था में देखकर वे हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहने लगे, ''नहीं नहीं, आपको न जाना होगा। लौट आइए, लौट आइए- आपके लिए हुक्म हो गया है, आप...''

मैंने भी हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहा, ''असंख्य धन्यवाद, किन्तु एक और हुक्म से मुझे जाना पड़ रहा है।''

सहसा उनकी दृष्टि अभया और रोहिणी पर जा पड़ी। वे मुसकराते हुए बोले, ''तब मुझे बेकार ही कष्ट दिया?''

''उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।''

''नहीं नहीं, उसकी जरूरत नहीं, मैं पहले से ही जानता था, गुड बाई।'' यह कहकर डॉक्टर बाबू हँसते चेहरे से चले गये।

 
000

'कॉरंटाइन' नामक जेलखाने में भेजने का कानून केवल 'कुलियों' के लिए है- शरीफों के लिए नहीं; और जो जहाज का किराया दस रुपये से अधिक नहीं देता वही 'कुली' है। चाय के बगीचों का कायदा क्या कहता है सो नहीं मालूम; पर जहाजी कानून तो यही है। और अधिकारी या अफसर प्रत्यक्ष ज्ञान से क्या जानते हैं, यह तो वे ही जानें; किन्तु ऑफिशियल इससे अधिक जानने की रीति नहीं है। इसलिए, इस यात्रा में हम सब 'कुली' थे। और, साहब लोग यह भी समझते हैं कि कुली की जीवन-यात्रा के लिए माल-असबाब ऐसा कुछ अधिक नहीं हो सकता- और न होना उचित ही है, कि जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कन्धों पर रखकर वह न ले जा सकता हो। इसलिए, उतरने के घाट पर केरिण्टिन-यात्रियों का माल-असबाब ले जाने के लिए यदि कोई व्यवस्था नहीं है तो इसके लिए क्षुब्ध होने का कोई कारण नहीं। यह सब सच है; फिर भी, यह केवल हमारे ही भाग्य का दोष समझिए कि हम तीन प्राणी, सिर के ऊपर प्रचण्ड सूर्य और पैरों के नीचे उससे भी अधिक उग्र बालुका-राशि से जलते हुए, एक अपरिचित नदी के किनारे बड़े-बड़े गट्ठर सामने रखकर किंकर्तव्यवि‍‍मूढ़ भाव से एक दूसरे का मुँह देखते खड़े हुए हैं। साथ के यात्रियों का परिचय पहले ही दे चुका हूँ। वे लोग अपने लोटे-कम्बल पीठ पर रखकर, और अपेक्षाकृत अधिक बोझ अपनी गृहलक्ष्मियों के सिर पर लादकर, मजे से गन्तव्य स्थान पर चले गये।

देखते-देखते रोहिणी भइया बिस्तरों के एक बण्डल पर काँपते-काँपते धम से बैठ गये। बुखार, पेट का दर्द और भारी थकावट- इन सब कारणों के एकत्र होने से उनकी अवस्था ऐसी थी कि उनके लिए, चलना बहुत दूर की बात है; बैठना भी असम्भव हो गया। लेट जाने में ही उनकी रक्षा थी। अभया ठहरी औरत-जात। बचा सिर्फ मैं और मेरी तथा पराई छोटी-मोटी गठरियाँ। मेरी दशा एकबारगी सोचकर देखने योग्य थी। एक तो अकारण ही एक अज्ञात अप्रीतिकर स्थान में जा रहा था; दूसरे, एक कन्धों पर तो एक अज्ञात निरुपाय स्त्री का बोझ था और दूसरे कन्धों पर झूल रहा था उतना ही अपरिचित एक बीमार पुरुष और ऊपर से घाते में थीं गठरियाँ। इन सबके बीच में मैं अत्यन्त उग्र प्यास को लिये, जो कि सारे गले को सुखाए देती थी, एक अज्ञात जगह में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़ा था। मेरे इस चित्र की कल्पना करके बतौर पाठ के लोगों को खूब आनन्द आ सकता है- कुछ सहृदय पाठक, शायद, मेरी इस नि:स्वार्थ परोपकार-वृत्ति की प्रशंसा भी कर सकते हैं; किन्तु, मुझे यह कहते जरा भी शर्म नहीं कि उस उस समय इस हतभागी का मन झुँझलाहट और पश्चात्ताप से एकबारगी परिपूर्ण हो गया था। अपने आपको सैकड़ों धिक्कार देता हुआ मन ही मन कह रहा था, कि इतना बड़ा गधा त्रिलोक में क्या और भी कोई होगा! किन्तु, बड़े अचरज की बात है, कि यद्यपि यह परिचय मेरे शरीर पर लिखा हुआ नहीं था, फिर भी, जहाज-भर के इतने लोगों के बीच में भार-वहन करने के लिए अभया ने मुझे ही क्यों और किस तरह एकदम से पहिचानकर छाँट लिया?

किन्तु, मेरा विस्मय दूर हुआ उसकी हँसी से। उसने मुँह उठाकर जरा-सा हँस दिया। उसके हँसी भरे चेहरे को देखकर मुझे केवल विस्मय ही नहीं हुआ-उसके भयानक दु:ख की छाया भी इस दफे मुझे दिख गयी। किन्तु सबसे अधिक अचरज तो मुझे उस ग्रामीण स्त्री की बात सुनकर हुआ। कहाँ तो लज्जा और कृतज्ञता से धरती में गड़कर उसे भिक्षा माँगना चाहिए था, और कहाँ उसने हँसकर कहा, ''कहीं यह खयाल न कर बैठना, कि खूब ठगाए गये! अनायास ही जा सकते थे फिर भी गये नहीं, इसी का नाम है दान। पर, मैं यह कहे रखती हूँ कि इतना बड़ा दान करने का सुयोग जीवन में, शायद, कम ही मिलेगा। किन्तु, जाने दो इन बातों को। माल-असबाब इसी जगह पड़ा रहने दो, और चलो, देखें, इन्हें कहीं छाया में सुलाया जा सकता है या नहीं।''

आखिर, गट्ठर-गठरियों की ममता छोड़कर मैं रोहिणी भइया को पीठ पर लादकर केरिण्टिन की ओर रवाना हुआ। अभया ने केवल एक छोटा-सा हाथ-बॉक्स लेकर मेरा अनुसरण किया और समान वहाँ ही पड़ा रहा। अवश्य ही वह सब खोया नहीं गया- कोई दो घण्टे बाद उसे ले आने का प्रबन्ध हो गया।

अधिकांश स्थानों में देखा जाता है कि सचमुच की विपत्ति काल्पनिक विपत्ति की अपेक्षा अधिक सहज और सह्य होती है। पहिले से ही इस बात का खयाल रखने से अनेक दुश्चिन्ताओं के हाथ से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए, यद्यपि कुछ-कुछ क्लेश और असुविधाएँ निश्चय से मुझे भोगनी पड़ीं, फिर भी, यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ती है कि हम लोगों के केरिण्टिन की मियाद के दिन एक तरह से आराम से ही कट गये। इसके सिवाय, पैसा खर्च कर सकने पर यमराज के घर भी जब ससुराल जैसा आदर प्राप्त किया जा सकता है, तब तो यह केरिण्टिन ही थी!

जहाज के डॉक्टर बाबू ने कहा था कि स्त्री खूब 'फारवर्ड' है, किन्तु, जरूरत के समय यह स्त्री कहाँ तक 'फारवर्ड' हो सकती है, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। रोहिणी बाबू को जब पीठ पर से मैंने उतार दिया तब अभया बोली, ''बस, अब आपको और कुछ भी नहीं करना होगा श्रीकान्त बाबू, आप विश्राम करें, और जो कुछ करने का है मैं कर लूँगी।''

विश्राम की मुझे वास्तव में जरूरत थी- दोनों पैर थकावट के कारण टूटे जाते थे; फिर भी मैंने अचरज के साथ पूछा, ''आप क्या करेंगी?''

अभया ने जवाब दिया, ''काम क्या कुछ कम है? चीजें-बस्तें लानी होंगी एक अच्छा-सा कमरा तलाश करके आप दोनों के लिए बिस्तर तैयार कर देने होंगे, रसोई करके जो कुछ हो दोनों को खिला देना होगा- तब जाकर मुझे छुट्टी मिलेगी, और तब ही तो थोड़ा-सा बैठकर मैं आराम कर सकूँगी। नहीं-नहीं, मेरे सिर की कसम, उठिएगा नहीं, मैं अभी-अभी सब ठीक-ठाक किये देती हूँ।'' फिर थोड़ा-सा हँसकर कहा, ''सोचते होओगे कि औरत होकर यह अकेली सब प्रबन्ध किस तरह करेगी, यही न? पर क्यों न कर सकूँगी? अच्छा, आपको ही खोज निकालने वाला कौन था? मैं ही थी न, कि और कोई?'' इतना कहकर उसने छोटे बॉक्स को खोला और उसमें से कुछ रुपये निकालकर ऑंचल में बाँध लिये तथा केरेण्टिन के ऑफिस की ओर चल दी।

वह कुछ कर सके चाहे न कर सके, किसी तरह बैठने को मिल जाने से मेरी तो जान बच गयी। आधे घण्टे के भीतर ही एक चपरासी मुझे बुलाने आया। रोहिणी को साथ लेकर उसके पीछे-पीछे गया। देखा, रहने का कमरा तो अच्छा ही है। मेम डॉक्टरिन साहिबा खुद खड़े होकर नौकर से सब साफ करा रही हैं, जरूरी चीजें आ पहुँची हैं और दो खाटों पर दो आदमियों के लिए बिस्तर तक बिछा दिए गये हैं। एक ओर नयी हाँड़ियाँ, चावल, दाल, आलू, घी, मैदा, लकड़ी आदि सब मौजूद हैं। मद्रासी डॉक्टरिन के साथ अभया टूटी-फूटी हिन्दी में बातचीत कर रही है। मुझे देखते ही बोली, ''तब तक आप थोड़ी नींद न ले लो, मैं सिर पर दो घड़ा जल डालकर इस वक्त के लिए चावल-दाल मिलाकर थोड़ी-सी खिचड़ी राँध देती हूँ। उस वक्त के लिए फिर देखा जायेगा।'' इतना कहकर गमछा-कपड़ा लेकर मेम साहिबा को सलाम कर, एक खलासी को साथ लेकर वह नहाने चली गयी। इस तरह, उसके संरक्षण में हम लोगों के दिन अच्छी तरह से कट गये, यह कहने में मैं निश्चय से जरा भी अत्युक्ति नहीं कर रहा हूँ।

इस अभया में मैं दो बातें अन्त तक लक्ष्य कर रहा था। ऐसी अवस्था में ऐसे स्त्री-पुरुषों में जिनमें परस्पर कोई रिश्ता नहीं होता है, घनिष्ठता स्वत: ही बड़ी तेजी से बढ़ने लगती है। किन्तु इसका उसने कभी मौका ही नहीं दिया। उसके व्यवहार में ऐसा कुछ था जो प्रत्येक क्षण याद दिला दिया करता था कि हम लोग केवल यात्री हैं जो एक जगह ठहर गये हैं- किसी के साथ किसी का सचमुच का कोई सम्बन्ध नहीं है; दो दिन बाद शायद जीवन-भर फिर कहीं किसी की किसी से मुलाकात ही न हो। दूसरी बात यह थी कि ऐसा आनन्दयुक्त परिश्रम भी मैंने कहीं नहीं देखा। दिन-भर वह हम लोगों की सेवा में लगी रहती और काम खुद ही करना चाहती। सहायता करने की कोशिश करते ही वह हँसकर कहती, ''यह तो सब मेरा खुद का कार्य है। नहीं तो, रोहिणी भइया को ही क्या जरूरत थी कि वे इतना कष्ट उठाते, और आपको ही क्या पड़ी थी इस जेलखाने में आने की? मेरे लिए ही तो आप लोगों को इतनी सब तकलीफें उठानी पड़ती हैं।''

अक्सर ऐसा होता कि खाने-पीने के बाद थोड़ी-सी गपशप चल रही होती और ऑफिस की घड़ी में दो बज जाते। बस, वह एकदम खड़ी हो जाती और कहने लगती, ''जाती हूँ आप लोगों के लिए चाय तैयार कर लाऊँ- दो बज गये।'' मन ही मन मैं कहता, ''तुम्हारा पति चाहे कितना ही पापी क्यों न हो, मनुष्य तो जरूर होगा। यदि कभी उसे पा लोगी, तो वह तुम्हारा मूल्य अवश्य समझेगा।

इसके बाद एक दिन मियाद खत्म हुई। रोहिणी भी अच्छा हो गया। हम लोग भी सरकारी 'छोड़-पत्र' पाकर गट्ठर-गठरियाँ बाँध रंगून को चल पड़े। निश्चय किया था कि शहर के मुसाफिरखाने में दो-एक दिन के लिए ठहर कर, और इन लोगों के लिए ठहरने का कोई स्थान ठीक करके, मैं अपने स्थान पर चला जाऊँगा; और फिर जहाँ-कहीं भी रहूँगा वहाँ से उसके पति का पता मालूम करके उसे समाचार भेजने की भरसक कोशिश करूँगा।

शहर में जिस दिन हम लोगों ने कदम रखे वह बर्मावासियों का एक त्योहार का दिन था। और, त्योहार तो उनके लगे ही रहते हैं। दल के दल स्त्री-पुरुष रेशमी पोशाक पहने अपने मन्दिरों को जा रहे हैं। स्त्री-स्वातन्त्रय का देश है; इसलिए, वहाँ के आनन्द-उत्सव में स्त्रियों की संख्या भी अधिक होती है। बूढ़ी, युवती, बालिका- सब उम्र की स्त्रियाँ अपूर्व पोशाक-परिच्छद में सज्जित होकर हँसती-बोलती-गाती सारे रास्ते को मुखरित करती हुई चली जा रही हैं। उनमें अधिकांश का रंग खूब गोरा है। मेघ की तरह घने बालों का बोझा सौ में से नब्बे स्त्रियों का घुटनों के नीचे तक लटकता है। जूड़े में फूल, कानों मे फूल और गले में फूलों की माला। घूँघट की झंझट नहीं, पुरुषों को देखकर तेजी से जाने की व्यग्रता से ठोकर खाकर गिरने का अन्देशा नहीं, दुविधा या लाज का लेश नहीं- मानो झरने के मुक्त प्रवाह के समान स्वच्छन्द बेरोक गति से बही जा रही हैं। पहली ही दृष्टि से एकदम मुग्ध हो गया। अपने यहाँ की तुलना में मन ही मन उनकी अशेष प्रशंसा करके बोला, यही तो होना चाहिए! इसके बिना जीवन ही क्या है! उनका सौभाग्य सहसा मानो ईर्ष्याि के समान मेरे हृदय में छिद गया। मैंने कहा, चारों दिशाओं में ये जिस आनन्द की सृष्टि करती जा रही हैं, वह क्या अवहेलना की वस्तु है? रमणियों को इतनी स्वाधीनता देकर इस देश के पुरुष क्या ठगे गये हैं? और, हम लोग क्या उनको नीचे से ऊपर तक जकड़ रखकर और उनके जीवन को लँगड़ा बनाकर लाभ में रहे हैं? हमारी स्त्रियाँ भी यदि किसी ऐसे ही दिन- एकाएक गोलमाल सुनकर मैंने लौटकर जो कुछ देखा वह आज भी मेरे मन पर साफ-साफ अंकित है। झगड़ा हो रहा था घोड़ा-गाड़ी के किराए के सम्बन्ध में। गाड़ीवान हमारे यहाँ का हिन्दुस्तानी मुसलमान था। वह कह रहा था कि आठ आने किराया तय हुआ है और तीन भले घर की बर्मी स्त्रियाँ गाड़ी पर से उतरकर एक साथ चिल्लामकर कह रही थीं कि नहीं, पाँच आना हुआ है। दो-तीन मिनट कहा-सुनी होने के बाद ही बस, 'बलं बलं बाहुबलं।' रास्ते के किनारे एक आदमी मोटे-मोटे गन्नों के टुकड़े करके बेच रहा था। अकस्मात् तीनों ने झपटकर उसके तीन टुकड़े उठा लिये और एक साथ गाड़ीवान पर आक्रमण कर दिया। ओह! वह कैसी बेधड़क मार थी। बेचारा स्त्रियों के शरीर पर हाथ भी नहीं लगा सकता था, आत्मरक्षा करने के लिए यदि एक को अटकाता था तो दूसरी की चोट सिर पर पड़ती, उसको अटकाता तो तीसरी की चोट आ पड़ती। चारों और लोग जमा हो गये- किन्तु केवल तमाशा देखने। उस अभागे का कहाँ गया टोपी-साफा और कहाँ गया हाथ का चाबुक! और अधिक न सह सकने के कारण आखिर वह मैदान छोड़कर 'पुलिस! पुलिस! सिपाही! सिपाही!' चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ।

मैं हाल ही बंगाल से आ रहा था और सो भी देहात से। कलकत्ते में स्त्री-स्वाधीनता है- कानों से अवश्य सुनी है, पर ऑंखों नहीं देखी। किन्तु, क्या स्वाधीनता प्राप्त करके भले घर की 'अबलाएँ' भी एक जवान मर्द पर खुले आम सड़क पर आक्रमण करके लट्ठबाजी कर सकती हैं! क्रमश: उनके इतनी अधिक 'सबला' हो उठने की सम्भावना मेरी कल्पना के भी परे की वस्तु थी। बहुत देर तक हतबुद्धि की तरह खड़े रहने के बाद मैंने अपने कार्य के लिए प्रस्थान किया। मन ही मन कहने लगा कि स्त्री-स्वाधीनता भली है या बुरी, समाज के आनन्द की मात्रा इससे घटेगी या बढ़ेगी- यह विचार तो किसी और दिन करूँगा; किन्तु, आज अपनी ऑंखों जो कुछ देखा उससे तो मेरा सारा चित्त एकदम उद्भ्रान्त हो गया।

000

अभया और रोहिणी को उनके नये वास-स्थान में- नयी घर-गिरिस्ती में प्रतिष्ठित करके जिस दिन मैं अपने जिन के लिए आश्रय खोजने रंगून के राज-मार्ग पर निकल पड़ा, उस दिन यह मैं नहीं कहना चाहता कि उन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में मेरे मन में बिल्कुाल किसी तरह की ग्लानि छू भी नहीं गयी थी। किन्तु, इस अपवित्र विचार को दूर करने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। क्योंकि, दो खास उम्र के स्त्री-पुरुषों को किसी खास अवस्था में देखने-मात्र से ही उनके बीच में किसी सम्बन्ध-विशेष की कल्पना कर लेना कितनी भारी भ्रान्ति है, यह शिक्षा मुझे पहले ही मिल चुकी थी। और भविष्यत् की जटिल समस्या को भी भविष्यत् के ही हाथ सौंप देने में मुझे किसी तरह की हिचक नहीं होती, इसलिए, केवल अपना ही भार अपने कन्धों पर लादकर उस दिन प्रभात के समय उनके नये वास-स्थान से बाहर निकला।

आजकल की तरह उस समय किसी भी नये बंगाली के बर्मा में कदम रखते ही पुलिस के प्रकट और अप्रकट कर्मचारियों का दल उनसे सवाल पर सवाल करके, उन पर व्यंग्य कसके और अपमान करके तथा बिना कसूर थाने में खींच ले जाकर और डर दिखाकर हद दर्जे की तकलीफ नहीं देता था। मन में किसी तरह का पाप न हो, तो उन दिनों प्रत्येक परिचित-अपरिचित को निर्भयता से घूमने-फिरने का अधिकार था और आजकल की तरह अपने आपको निर्दोष प्रमाणित करने का अत्यन्त गुरु भार भी नवागत बंगवासी के कन्धों पर नहीं लादा गया था। इसलिए, मुझे खूब याद है कि स्वच्छन्द चित्त से किसी आश्रय-स्थान की खोज में उस दिन सुबह से दोपहर तक राह-राह खूब घूमता फिरा। राह में एक बंगाली से भेंट हुई। वह मजदूर के सिर पर तरकारी का बोझा लिये हुए पसीना पोंछते-पोंछते तेज़ी से चला जा रहा था; मैंने पूछा, ''महाशय, नन्द मिस्री का घर कहाँ है, क्या आप बतला सकते हैं?''

वह आदमी रुककर खड़ा हो गया, ''कौन नन्द? क्या आप रिबिट-घर के नन्द पागडी को खोज रहे हैं?''

मैंने कहा, ''सो तो जानता नहीं महाशय, कि वे किस घर के हैं। उन्होंने केवल यही परिचय दिया था कि वे रंगून के विख्यात नन्द मिस्री हैं।''

उस आदमी ने एक प्रकार का असम्मान-सूचक मुँह का भाव बनाकर कहा, ''ओ:-मिस्तरी! ऐसे तो सभी अपने को मिस्तरी कहलवाते हैं महाशय, पर मिस्तरी होना सहज नहीं है। मर्कट साहब ने जब मुझसे कहा था कि हरिपद, तुमको छोड़कर मिस्तरी होने लायक आदमी मुझे और कोई नहीं दीख पड़ता, तब क्या आप जानते हैं कि बड़े साहब के समीप कितनी अनिश्चित अर्जियाँ पड़ी हुई थीं? करीब एक सौ के। आरी और बसूले का जोर हो, तो अर्जियों की जरूरत ही क्या है? काटकर जो जोड़ दे सकता हूँ! किन्तु महाशय, आप जानते हैं...''

मैंने देखा, अनजान में ही मैंने इस आदमी के ऐसी जगह पर चोट पहुँचा दी है जिसकी मीमांसा होना कठिन है। इसलिए, चट से मैंने रुकावट डालकर कहा, ''फिर, नन्द नाम के किसी भी आदमी को आप नहीं जानते?''

''यह आपने खूब कहा! चालीस वर्ष से रंगून में रह रहा हूँ, मैं जानता किसे नहीं? नन्द क्या एक है? तीन-तीन नन्द हैं! आपने नन्द मिस्तरी कहा न? कहाँ से आ रहे हैं आप? शायद बंगाल से, न? ओह, तब कहो न कि टगर के मर्द को पूछ रहे हैं?''

मैंने सिर हिलाकर कहा, ''हाँ, हाँ, जरूर वही!''

वह बोला, ''तो फिर यह कहिए। परिचय पाए बगैर पहिचानूँ कैसे? आइए मेरे साथ तकदीर के जोर से नन्द कमा खा रहा है महाशय, नहीं तो नन्द पागड़ी भी क्या कोई मिस्तरी है? महाशय, आप कौन हैं?''

यह सुनकर कि मैं ब्राह्मण हूँ, उस आदमी ने रास्ते पर ही झुककर मुझे प्रणाम किया। बोला, ''वह आपकी नौकरी लगा देगा? साहब से कहकर आपकी तजबीज लगवा सकता है जरूर; किन्तु, दो महीने की तनख्वाह उसे पहले ही घूँस में देनी होगी। दे सकेंगे क्या? दे सकें तो अठारह-बीस आने रोज की नौकरी लगा सकता है। इससे अधिक की नहीं।''

मैंने उसे बताया कि फिलहाल तो मैं नौकरी की उम्मेदवारी में नहीं जा रहा हूँ- थोड़े से आश्रय की तजवीज की गरज से ही बाहर निकला हूँ, और, इसकी आशा नन्द मिस्री ने जहाज पर दिलाई थी।

यह सुनकर हरिपद मिस्री ने आश्चर्य से पूछा, ''महाशय, आप भले आदमी हैं, तो फिर, भले आदमियों के 'मेस' में क्यों नहीं जाते?''

मैंने कहा, ''मेस कहाँ है, सो तो जानता ही नहीं।''

उसे भी नहीं मालूम, यह उसने स्वीकार किया। किन्तु, उस जून खोज करके बताने की आशा देकर वह बोला, ''किन्तु, इस समय तो नन्द से मुलाकात हो न सकेगी; वह काम पर गया है, टगर साँकल दिए सो रही है और पुकार कर उसकी नींद भंग करने में खैर नहीं!''

यह तो खूब जानता था। इसलिए रास्ते के बीच मुझे वहाँ करते देखकर उसने हिम्मत देकर कहा, ''न गये वहाँ तो क्या! दादा ठाकुर का बढ़िया होटल सामने ही है। वहाँ स्नान-भोजन करके नींद ले लीजिए, उस बेला फिर देखा जायेगा।''

हरिपद के साथ बातें करते-करते जब मैं दादा ठाकुर के होटल में पहुँचा तब होटल के डायनिंग रूम में (=भोजन के कमरे में) करीब पन्द्रह आदमी भोजन करने बैठे थे।

अंगरेजी में दरो शब्द हैं 'इन्स्टिक्ट' और ''प्रेज्युडिस', किन्तु, हमारे यहाँ, केवल एक ही शब्द है 'संस्कार'। यह समझना कठिन नहीं है कि एक जो है सो दूसरा नहीं। अर्थात् दोनों शब्द अंगरेजी में भिन्न-भिन्न भाववाची हैं। किन्तु दादा ठाकुर के उक्त होटल के सम्पर्क में आकर यह बात आज पहले ही पहल मुझे मालूम हुई कि हम लोगों का जाति-भेद, खान-पान आदि वस्तुएँ 'इन्स्टिक्ट' के हिसाब से 'संस्कार' नहीं है, और यदि ये 'संस्कार' हों भी तो कितने तुच्छ हैं- इनके बन्धन से मुक्त होना कितना सहज है, यह सब प्रत्यक्ष देखकर मैं आश्चर्य से चकित हो गया। हमारे देश में यह जो असंख्य जाति-भेद की श्रृंखला है, इसे दोनों पैरों में पहिनकर झनझनाते हुए विचरण करने में कितना गौरव और मंगल है, इसकी आलोचना तो इस समय रहने दूँगा; किन्तु यह बात मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ कि जो लोग इसे अपने छोटे-छोटे-से गाँवों में बिल्कुनल बेखटके जमे हुए पुरखों से चला आता हुआ संस्कार बताकर स्थिर रखे हुए हैं, और इसके शासन-जाल को तोड़ने की दुरूहता के सम्बन्ध में जिन्हें लेशमात्र भी अविश्वास नहीं है, उन लोगों ने इस बड़े भारी भ्रम को जान-बूझकर ही पाल रक्खा है। वास्तव में जिस देश में खाने-पीने में छुआछूत का विचार प्रचलित नहीं है उस देश में कदम रखते ही यह अच्छी तरह देखा जाता है कि यह छप्पन पुश्तों की खाने-पीने में छुआछूत रखने की सांकल न जाने कैसे रातों-रात खुलकर अलग हो जाती है। विलायत जाने से जाति चली जाती है इसका एक मुख्य कारण यह बतलाया जाता है कि वहाँ निषिद्ध माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस नहीं खाते, उनकी भी चली जाती है; कारण, जिन्होंने जाति मारने का इजारा ले रखा है वे पंच लोग कहते हैं कि वहाँ मांस न खाने पर भी समझ लेना चाहिए कि 'खाया ही है'।

और उनका यह कहना निहायत गलत भी नहीं है। बर्मा तो तीन-चार दिन का ही रास्ता है; फिर भी मैंने देखा है कि पन्द्रह आने बंगाली भले आदमी जिनमें शायद ब्राह्मण ही अधिक होंगे- क्योंकि इस युग में उन्हीं के लोभ ने सबको मात कर दिया है- जहाज के होटल में ही सस्ते दामों में पेट भर लेते हैं तब कहीं सूखी जमीन पर पदार्पण करते हैं। उस होटल में मुसलमान और गोआनीज बावर्ची क्या राँधकर 'सर्व' करते हैं, यह सवाल अप्रिय हो सकता है; किन्तु, वे लोग हविष्यान्न पकाकर केले के पत्तों में नहीं परोसते होंगे, यह अनुमान करना तो भाटपाड़े के भट्टाचार्यों के लिए भी शायद कठिन नहीं है- फिर मैं तो ठहरा साथ का मुसाफिर। जो लोग कम से कम यह सब नहीं खाना चाहते वे भी हार मानकर अन्त में चाह-रोटी, फल फूलादि तो खाते ही हैं! मैंने देखा है कि एकदम निषिद्ध मांस से लेकर मत्तमान और रम्भा (केले की दो जातियाँ) तक सब कुछ एक में ही गड्डमड्ड करके जहाज के कोल्ड-रूम में रक्खा जाता है और यह काम किसी की नजर से छुपाकर करने की पद्धति भी मैंने जहाज के नियम-कानूनों में नहीं देखी। हाँ, फिर भी, आराम की बात यह है कि बर्मा- जाने वाले यात्री की जाति जाने का कानून, शायद, किसी तरह शास्त्रकारों की 'सिविल कोड' की नजर बचा गया है। नहीं तो शायद फिर एक छोटी-मोटी ब्राह्मण-सभा की जरूरत होती! जाने दो, भले लोगों की बात आज यहीं तक रहे।

होटल में जो लोग पंक्तिबद्ध होकर भोजन करने बैठे थे वे भले आदमी नहीं थे- कम से कम हम लोग उन्हें 'भला' नहीं मानते। सब लोग कारीगर थे, साढ़े दस बजे की छुट्टी में भोजन करने आए थे। शहर के इस हिस्से में एक बड़ा मैदान है जिसके तीन तरफ नाना आकार और प्रकार के कारखाने हैं, और इस बस्ती के बीच एक तरफ को दादा ठाकुर का यह होटल है। एक विचित्र बस्ती है। एक कतार में, एक से एक सटी हुई, जीर्ण काठ की छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी हुई हैं। इनमें चीनी, बर्मी, मद्रासी, उड़िया, तैलंगी, चटगाँव के हिन्दू और मुसलमान आदि सभी रहते हैं; और, रहते हैं हमारी जाति के बंगाली भी। इनके समीप मैंने पहले ही पहल यह सीखा है कि किसी को भी छोटी जाति का कहकर घृणा करके उसे दूर रखने की बुरी आदत का परित्याग करना कोई बड़ा कठिन काम नहीं है। जो नहीं करते वे अशक्यता के कारण न करते हों सो बात नहीं है; किन्तु, जिस कारण वे नहीं करते उसे प्रकाशित कर देने से झगड़ा बढ़ खड़ा होगा।

दादा ठाकुर ने आकर यत्नपूर्वक मेरा स्वागत किया और एक छोटा-सा कमरा दिखाकर कहा, ''जितने दिन आपकी इच्छा हो इस कमरे में रहें और हमारे यहाँ भोजन करें। नौकरी-चाकरी लगने की बाद दाम चुका देना।''

मैंने कहा, ''मुझे तो आप पहिचानते नहीं हैं, एक महीने रहकर और खा-पीकर बिना दाम दिये भी तो चला जा सकता हूँ।''

दादा ठाकुर ने अपना कपाल दिखाते हुए हँसकर कहा, ''इसे तो आप साथ में ले नहीं जा सकते महाशय!''

मैंने कहा, ''जी नहीं, उस पर मुझे जरा भी लोभ नहीं है।''

दादा ठाकुर सिर हिलाते-हिलाते इस दफे परम गम्भीर भाव बनाकर बोले, ''देखिए, तकदीर भी है महाशय! इसके सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं, यही मैं सब लोगों से कहा करता हूँ।''

वास्तव में केवल उनका जबानी जमाखर्च नहीं था। इस सत्य पर वे स्वयं किस कदर अकपट रूप से विश्वास करते थे यह हाथों-हाथ प्रमाणित करने के लिए चार-पाँच महीने के बाद, एक दिन वे प्रात:काल बहुतों की धरोहर-रुपये-पैसे अंगूठी, घड़ी इत्यादि साथ लेकर केवल उनके निराट कपालों को बर्मा में उस शून्य होटल के भेज पर जोर से पटकने के लिए छोड़कर अपने देश चले गये।

जो भी हो, उस समय दादा ठाकुर की बात सुनने में बुरी नहीं लगी और मैं भी उनका एक नया मुवक्किल बनकर एक टूटा-सा कमरा दखल करके बैठ गया। रात को एक कच्ची उम्र की बंगालिन दासी मेरे कमरे में आसन बिछाकर भोजन के लिए जगह करने आई; पास में ही डायनिंग रूम में से लोगों के भोजन का शोर सुनाई दे रहा था। मैंने पूछा, ''मुझे भी वहाँ ही न कराके यहाँ भोजन कराने क्यों लाई?''

वह बोली, ''वे लोग तो हल के दर्जे के लोहा काटने-पीटनेवाले मजदूर हैं बाबू, उनके साथ आपको कैसे खिलाया जा सकता है?''

अर्थात् वे थे 'वर्कमेन' और मैं था 'भला आदमी'। मैंने हँसकर कहा, ''मुझे भी यहाँ क्या-क्या काटना-पीटना पड़ेगा सो तो अब भी निश्चित नहीं हुआ है। जो भी हो, आज खिलाती हो तो खिला जाओ, किन्तु, कल से मुझे भी उन्हीं के साथ उसी कमरे में खिलाना।''

दासी बोली, ''आप बाम्हन हैं, आपको वहाँ खाने की जरूरत नहीं।''

''क्यों? वे सब बंगाली तो हैं?''

दासी ने गले को जरा धीमा करके कहा, ''बंगाली जरूर हैं, किन्तु उनमें एक डोम भी है।''

डोम! देश में यह जाति अस्पृश्य-अछूत है। छू जाने पर स्नान करना 'कम्पलसरी' (=अनिवार्य) है या नहीं सो तो नहीं मालूम; किन्तु यह जानता हूँ कि कपड़े बदलकर गंगाजल सिर पर छिड़कना पड़ता है। अत्यन्त अचरज से मैंने पूछा, ''और सब?''

दासी बोली, ''और सब अच्छी जाति के हैं। कायथ हैं, कैवर्त (=केवट) हैं, अहीर हैं, लुहार...''

''ये लोग कोई आपत्ति नहीं करते?''

दासी अब कुछ हँसकर बोली, ''इस पर देश में सात समुन्दर पार आकर क्या इतनी बमहनयी चल सकती है बाबू? वे कहते हैं, देश लौटकर गंगा-स्नान करके एक अंग-प्रायश्चित कर लेंगे।

भले ही कर लें किन्तु, मुझे मालूम है कि जो दो-चार आदमी बीच-बीच में देश जाते हैं वे चलते-चलाते कलकत्ते की गंगा में एकाध दफे गंगा-स्नान तो शायद कर लेते हों; किन्तु, अंग-प्रायश्चित कभी कोई नहीं करता। परदेश की आब-हवा के प्रभाव से ये लोग उस पर विश्वास नहीं रखते।

देखा कि होटल में सिर्फ दो हुक्के हैं। एक तो ब्राह्मणों के लिए, दूसरा जो ब्राह्मण नहीं हैं उनके लिए। भोजनादि के बाद कैवर्त के हाथ से डोम और डोम के हाथ से लुहार महाशय ने हाथ बढ़ाकर हुक्का ग्रहण किया और स्वच्छन्दता से पिया। दुविधा का लेश भी नहीं। दो दिन बाद उस लुहार के साथ बातचीत करते हुए मैंने पूछा, ''अच्छा, इस तरह तुम्हारी जाति नहीं जाती?''

लुहार बोला, ''जाती क्यों नहीं महाशय, जाती तो है ही!''

''तब?''

''उसने पहिले डोम कहकर अपना परिचय थोड़े ही दिया था; कहा था कि मैं कैवर्त हूँ। इसके बाद ही सब मालूम पड़ा।''

''तब तुम लोगों ने कुछ नहीं कहा?''

''कहते और क्या महाशय, काम तो बहुत ही बुरा हुआ, यह तो मंजूर करना ही पड़ता है। लेकिन कहीं उसे शर्मिन्दगी न उठानी पड़े, यह सोचकर सबने जान-बूझकर मामले को दबा दिया।''

''किन्तु देश में होते तो क्या होता?''

वह आदमी जैसे सिहर उठा। बोला, ''तो, क्या फिर किसी की रक्षा हो सकती थी?'' इसके बाद जरा-सा चुप रहकर वह खुद ही बोलने लगा, ''किन्तु आप जानते हैं बाबू मैं ब्राह्मनों की बात नहीं कहता- वे ठहरे वर्णों के गुरु, उनकी बात ही अलहदा है। नहीं तो, बाकी और सब जात समान हैं। चाहे तेली, माली, तमोली, अहीर, नाई, बढ़ई, लुहार, कुम्हार और गंधी इन नौ शाखाओं के हिन्दू हों, चाहे हाड़ी-डोम आदि हों- किसी के शरीर पर कुछ लिखा तो है नहीं; सभी भगवान के बनाए हैं, सब एक हैं, सभी पेट की ज्वाला से जलकर परदेश में आए हैं और लोहा पीट रहे हैं। और सोचिए तो बाबू, हरि मोडल डोम है तो क्या हुआ? शराब पीता नहीं, गाँजा छूता नहीं- आचार-विचार को देखकर कौन कह सकता है कि वह अच्छी जात का नहीं है- डोम का लड़का है! और लक्ष्मण- वह तो भले कायथ का लड़का है, पर उसके आचार-विचार को देखो न एक बार, बच्चू दो-दो बार जेल जाते-जाते बचे हैं। हम सब नहीं होते तो अब तक जेल में पड़े-पड़े मेहतर के हाथ की रोटियाँ खाते होते।''

न तो मुझे लक्ष्मण के सम्बन्ध में ही किसी तरह का कुतूहल हुआ और न हरि मोडल ने अपने डोमत्व को छिपाकर कितना बड़ा अन्याय किया इसकी मीमांसा करने की ही मेरी प्रवृत्ति हुई। मैं सिर्फ यही सोचने लगा कि जिस देश में भले आदमी तक जासूस लगाकर अपने जन्म के पड़ोसी के छिद्र ढूँढ़कर और उसके पितृ-श्राद्ध को बिगाड़कर आत्म-तुष्टि लाभ करते हैं, उसी देश के अक्षिक्षित, नीच जातीय होने पर भी इन लोगों ने एक अपरिचित बंगाली का इतना बड़ा भयंकर अपराध भी माफ कर दिया! और- केवल इतना ही नहीं, पीछे से इस परदेश में कहीं उसे लज्जित और दीन होकर न रहना पड़े, इस आशंका से उस प्रसंग को उठाया तक नहीं! यह सब असम्भव कार्य किस तरह सम्भव हुआ, विदेशी आदमी भले ही न समझ सकें, परन्तु, हम तो समझ सकते हैं कि हृदय की कितनी विशालता और मन की कितनी बड़ी उदारता इसके लिए आवश्यक है! यह केवल उनके देश छोड़कर विदेश आने का फल है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। खयाल हुआ कि इसी शिक्षा की हमारे देश को इस समय सबसे अधिक जरूरत है। सारी जिन्दगी अपने छोटे से गाँव में ही बैठकर बिता देने से बढ़कर मनुष्यों को सब विषयों में छोटा, संकुचित कर देने वाला बड़ा शत्रु और कोई नहीं है। खैर, जाने दो इस बात को।

इन लोगों के साथ मैं बहुत दिनों तक रहा। किन्तु जब तक उन्हें यह न मालूम हुआ कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, केवल तब तक ही मुझे इनके साथ घनिष्ठता से मिलने-जुलने का सुयोग मिलता रहा- उनके सब तरह के सुख-दु:खों में मैं भी हिस्सेदार बनता रहा, किन्तु जिस क्षण ही उन्हें मालूम हुआ कि मैं भला आदमी हूँ और मुझे अंगरेजी आती है, उसी क्षण से उन्होंने मुझे गैर समझना शुरू कर दिया। अंगरेजी जानने वाले शिक्षित भले आदमियों के समीप ये लोग आपद्-विपद् के समय जाते जरूर हैं, उनसे सलाह-मशविरा भी करते हैं- यह भी सच है, परन्तु, ये लोग न तो उन पर विश्वास ही करते हैं और न उन्हें अपना आदमी ही समझते हैं। देश के इस कुसंस्कार को वे आज भी दूर नहीं कर पाए हैं कि मैं उन्हें छोटा समझकर मन ही मन घृणा नहीं करता हैं,- पीछे-पीछे उनका उपहास नहीं करता हूँ। केवल इसी कारण मेरे कितने सत्संकल्प इन लोगों के बीच विफल हो गये हैं। मैं समझता हूँ, उनकी कोई सीमा नहीं। किन्तु खैर, आज इस बात को जाने दो।

मैंने देखा कि बंगाली स्त्रियों की संख्या भी इस ओर कुछ कम नहीं है। यद्यपि उनके कुलों का परिचय न देना ही अच्छा है; किन्तु, आज वे किसी और दूसरे ही रूप में परिवर्तित होकर एकदम शुद्ध गृहस्थों की धर्मपत्नियाँ बन गयी हैं। पुरुषों के मनों में तो शायद आज भी 'जाति' की पुरानी स्मृति बाकी बनी हुई है। किन्तु, स्त्रियाँ तो न कभी देश आती हैं और न देश के साथ कोई सम्पर्क ही रखती हैं। उनके बच्चे-बच्चियों से पूछा जाय तो वे यही कहते हैं कि ''हम बंगाली हैं'- अर्थात् मुसलमान, क्रिस्तान, बर्मी आदि नहीं हैं- बंगाली हिन्दू हैं। आपस में विवाहादि, आदान-प्रदान, स्वच्छन्दता से होता है- केवल 'बंगाली' होना ही यथेष्ट है, और चटगाँव के किसी बंगाली ब्राह्मण द्वारा मन्त्र पढ़ाकर दोनों के हाथ मिलाकर एक कर दिया जाना ही बस है। विधवा हो जाने पर विधवा-विवाह का रिवाज नहीं है- सो शायद इसलिए कि पुरोहित मन्त्र पढ़ने को राजी नहीं होता। परन्तु वैधव्य भी ये पसन्द नहीं करतीं और फिर एक नयी गृहस्थी बना लेती हैं। उनके लड़के-बच्चे होते हैं और वे भी कहते हैं कि 'हम बंगाली हैं', तथा उनके विवाह में वही पुरोहित आकर वैदिक मन्त्र पढ़ाकर विवाह करा जाते हैं- इस दफे उन्हें तिल-भर भी आपत्ति नहीं होती। पति के द्वारा अत्यन्त दु:ख-यन्त्रणा पाने पर ये दूसरे का आश्रय भी ग्रहण करती हैं जरूर, किन्तु, यह अत्यन्त लज्जा की बात समझी जाती है और इसके लिए दु:ख-यन्त्रणा का परिमाण भी अत्यधिक होना चाहिए। परन्तु फिर भी, ये वास्तव में हिन्दू हैं और दुर्गा-पूजा से शुरू करके षष्टी महाकाली आदि कोई भी पूजा नहीं छोड़तीं।

रास्ते में जिन लोगों के सुख-दु:ख में हिस्सा बँटाता हुआ मैं इस परदेश में आकर उपस्थित हुआ था, घटना-चक्र से वे तो रह गये शहर के एक छोर पर और मुझे आश्रय मिला शहर के दूसरे छोर पर। इसलिए, इन पन्द्रह-सोलह दिनों के बीच उस ओर जा न सका। इसके सिवाय, सारे दिन नौकरी की उम्मीदवारी में घूमते इतना थक जाता था कि शाम के कुछ पहले वास-स्थान पर लौटने पर इतनी शक्ति ही नहीं बचती थी कि मैं कहीं भी बाहर जाऊँ। क्रम-से-क्रम जैसे-जैसे दिन बीतने लगे मेरे मन में यह धारणा होने लगी कि इस सुदूर परदेश में आने पर भी नौकरी प्राप्त करना मेरे लिए ठीक उतना ही कठिन है जितना कि देश में था।

अभया की बात याद आई। जिस आदमी पर भरोसा करके वह घर छोड़कर अपना पति खोजने आई है, पता न लगने पर उस आदमी का क्या हाल होगा। घर छोड़कर बाहर आने का मार्ग काफी खुला होने पर भी लौटने का मार्ग ठीक उतना ही प्रशस्त बना रहेगा, इतनी बड़ी आशा की कल्पना करने का साहस बंगाल देश की आबो-हवा में पले होने के कारण मुझमें नहीं है। उन्होंने अधिक दिनों तक अपना निर्वाह कर सकने लायक धन-बल संग्रह करके पैर नहीं बढ़ाया है, इसका अनुमान करना भी मेरे लिए कठिन नहीं है। बाकी बचा केवल एक रास्ता जो कि पन्द्रह आने बंगालियों का एकमात्र सहारा है-अर्थात् महीने-पन्द्रह दिन के बाद पराई नौकरी करके मरण-पर्यन्त किसी तरह शरीर में हाड़-मांस बनाए रहकर जीते रहना। यह कहने की जरूरत नहीं कि रोहिणी बाबू के लिए भी इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं था, किन्तु, रंगून के इस बाजार में केवल अपना ही पेट भरने लायक नौकरी जुटाने में जब मेरा यह हाल है तब एक स्त्री को अपने कन्धों पर लादे हुए अभया के उस बेचारे बिना ढंग-ढौल के गुमसुम 'भइया' का क्या हाल होगा इसकी कल्पना करके मैं भयभीत हो उठा। मैंने स्थिर किया कि जैसे बने, कल एक दफे जाकर उनकी खबर जरूर लूँगा।

दूसरे दिन शाम के समय करीब दो कोस जमीन खोदकर उनके वास-स्थान पर पहुँचा और देखा कि बाहर के बरामदे में एक छोटे-से मोढ़े पर रोहिणी भइया बैठे हुए हैं। उनका मुख-मण्डल बादल छाए हुए 'आषाढस्य प्रथम दिवसे' की तरह गुरु-गम्भीर हो रहा है। बोले, ''ओह श्रीकान्त बाबू! आप अच्छे तो हैं?''

मैं बोला, ''जी, अच्छा ही हूँ।''

''जाइए, भीतर जाकर बैठिए।''

मैंने डरते हुए पूछा, ''आप लोग तो सब अच्छे हैं?''

''हूँ- भीतर जाइए न, वे घर में ही हैं।''

''अच्छा जाता हूँ- आप भी आइए न?''

''नहीं, मैं यहीं पर कुछ देर आराम करूँगा। परिश्रम करते-करते एक तरह से मेरी हत्या ही हुई जाती है- दो घड़ी पैर फैलाकर कुछ बैठ ही लूँ।'' वे परिश्रम की अधिकता से मरे हुए से हो गये हैं उनके चेहरे पर से यह प्रकाशित न होते हुए भी मैं मन ही मन कुछ उद्विग्न हो उठा। रोहिणी भइया के भीतर भी इतनी गम्भीरता इतने दिन से प्रच्छन्न रूप में वास कर रही है, अपनी ऑंखों देखे बिना यह विश्वास करना कठिन था। किन्तु मामला क्या है? मैं खुद भी तो रास्ते-रास्ते की धूल छानकर ऊब उठा हूँ। मेरे यह रोहिणी भइया भी क्या-

किवाड़ों की आड़ में से अभया ने अपना हँसता हुआ चेहरा बाहर निकालकर गुपचुप इशारा करके मुझे भीतर बुलाया। दुविधा में पड़कर मैंने कहा, ''चलिए न रोहिणी भइया, भीतर चलकर गप-शप करें।''

रोहिणी भइया ने जवाब दिया, ''गप-शप! इस समय मर जाऊँ तो जान बचे, यह जानते हो श्रीकान्त बाबू?''

''नहीं जानता'', यह मुझे स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने जवाब में केवल एक प्रचण्ड उसास छोड़ी और कहा, ''दो दिन बाद ही मालूम हो जायेगा।''

अभया के दुबारा गुप-चुप बुलाने पर बाहर अधिक देर बहस न करके मैंने अन्दर प्रवेश किया। भीतर रसोई-घर के सिवाय दो और कमरे सोने के हैं। सामने का कमरा ही बड़ा है और उसी में रोहिणी बाबू सोते हैं। एक ओर रस्सी की खाट पर उनके बिस्तर हैं। अन्दर घुसते ही देखा फर्श के ऊपर आसन बिछा है, एक ओर रकाबी में पूरी-तरकारी, थोड़ा-सा हलुआ और एक गिलास जल रखा हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि ज्योतिष से पता लगाकर यह आयोजन दोपहर से ही कुछ मेरे लिए तैयार नहीं किया गया है, इसलिए क्षणभर में ही मैं समझ गया कि कुछ लड़ाई-झगड़ा चल रहा था। इसीलिए रोहिणी भइया का मुँह बादलों से ढँका हुआ है, इसीलिए वे मर जाऊँ तो जान बचने की बात कर रहे हैं। मैं चुपचाप खाट पर जाकर बैठ गया। अभया ने थोड़ी-सी दूर खड़े होकर पूछा, ''आप अच्छे तो हैं? इतने दिनों बाद शायद गरीबों का खयाल आया है?''

भोजन के थाल को दिखाकर मैंने कहा, ''मेरी बात पीछे होगी। किन्तु यह क्या है?''

अभया हँसी और कुछ देर चुप रहकर बोली, ''यह कुछ नहीं है, आप कैसे हैं सो कहिए।''

''कैसा हूँ सो मैं खुद नहीं जानता, दूसरे को किस तरह बताऊँ?'' फिर कुछ सोचकर बोला, ''जब तक कोई नौकरी न मिल जाय तब तक इस प्रश्न का जवाब देना कठिन है। रोहिणी बाबू कहते थे-'' मेरे मुँह की बात मुँह में ही रह गयी। रोहिणी भइया अपनी फटी चिट्ठियों से अस्वाभाविक फटर-फटर शब्द करते हुए भीतर घुस आए और किसी की ओर भी दृष्टिपात किये बगैर उन्होंने पानी का गिलास उठा लिया। एक ही साँस में उन्होंने उसे आधा खाली कर दिया। बाकी दो-तीन घूँट में जबर्दस्ती पीकर शून्य गिलास काठ की मेज पर रख दिया, और वे यह कहते-कहते बाहर चल दिए, ''जाने दो खाली पानी पीकर ही पेट भर लूँ। मेरा यहाँ पर और कौन बैठा है जो भूख लगने पर खाने को देगा!''

मैंने अवाक् होकर अभया की ओर ताका। पल-भर के लिए उसका मुँह सुर्ख हो गया; किन्तु, उसी क्षण उसने अपने आपको सँभाल लिया और पहले दीखता है!''

रोहिणी ने यह बात कानों पर ही नहीं दी, और वे बाहर चल दिए, किन्तु, आधा मिनट खत्म होने के पहले ही वापिस लौट आए और किवाड़ें के सामने खड़े होकर मुझे सम्बोधन कर बोले, ''सारे दिन ऑफिस में मेहनत करने के बाद भूख के मारे सिर चक्कर खा रहा था श्रीकान्त बाबू, इसीलिए उस समय आपसे बात न कर सका, कुछ खयाल न करिएगा।''

मैंने कहा, ''नहीं।''

''उन्होंने फिर कहा, ''आप जहाँ ठहरे हैं वहाँ मेरे लिए भी जरा-सा बन्दोबस्त कर सकते हैं?''

उनके मुँह की भाव-भंगी को देखकर मैं हँस पड़ा! बोला, किन्तु वहाँ पर पूडियों और मोहन-भोग का डौल नहीं है।''

रोहिणी भइया बोले, ''जरूरत ही क्या है! भूख के समय कोई यदि जरा-सा गुड़ और जल देवे तो वह अमृत है। यहाँ तो वह भी कौन देता है?''

मैंने जानने की इच्छा से अभया की ओर दृष्टि डाली। तुरन्त ही वह धीरे से बोली, ''सिर दर्द करता था। इसलिए बेवक्त सो गयी थी, और इसी कारण भोजन बनाने में आज जरा-सी देर हो गयी श्रीकान्त बाबू।''

मैंने आश्चर्य के साथ कहा, ''बस, यही अपराध है?''

अभया ने उसी तरह शान्त-भाव से कहा, ''यह क्या कोई तुच्छ अपराध है श्रीकान्त बाबू?''

''तुच्छ नहीं तो और क्या है?''

अभया बोली, ''आपके समीप तुच्छ हो सकता है, किन्तु जो महाशय अपनी इस फिजूल की गले-पडूको खाने देते हैं वे कैसे माफ करेंगे? मेरा सिर दर्द करे तो उनका काम कैसे चल सकता है?''

रोहिणी बाबू एकदम तड़क कर गर्ज उठे और बोले, ''तुम गले-पड़ू हो, मैंने यह कब कहा?''

अभया बोली, ''कहोगे क्यों, हजार तरह से दिखा तो रहे हो?''

रोहिणी भइया बोले, ''दिखा रहा हूँ! ओह, तुम्हारे मन में जलेबी जैसा पेंच है! यह तुमने मुझसे कब कहा था कि सिर दर्द कर रहा है?''

अभया ने कहा, ''कहने से लाभ ही क्या था? क्या तुम विश्वास करते?''

रोहिणी भइया मेरी ओर पलटकर ऊँचे कण्ठ से बोल उठे, ''सुनिये श्रीकान्त बाबू, ये सब बातें सुन रखिए। इन्हीं के लिए मैंने देश का त्याग किया- घर लौटने का रास्ता बन्द हो गया- अब इनके मुँह की बात सुनिये। ओह-''

अभया ने भी इस दफे गुस्स् से जवाब दिया, ''मेरा जो होना होगा हो जाएगा, तुम्हारी जब इच्छा हो देश लौट आओ! मेरे लिए तुम क्यों इतना कष्ट सहोगे? तुम्हारी कौन होती हूँ मैं? इस तरह ताना कसने की अपेक्षा...''

उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि रोहिणी भइया करीब-करीब चीत्कार कर उठे, ''सुनिए श्रीकान्त बाबू, दो रोटी पका देने के लिए- ये बातें आप जरा सुन रखिए। अच्छा, आज से कभी तुमने यदि मेरे लिए रसोईघर में पैर रखा तो तुम्हें बहुत ही बड़ी- बल्कि मैं होटल में-'' कहते-कहते उनका गला रुलाई से भर आया, वे धोती का छोर मुँह पर लगाकर तेजी से कदम रखते हुए मकान के बाहर हो गये। अभया ने अपना उतरा हुआ चेहरा नीचे झुका लिया- न जाने ऑंखों के ऑंसू छिपाने के लिए या यों ही; किन्तु मैं तो एकदम काठ हो गया। कुछ दिनों से दोनों के बीच अनबन हो रही है, यह तो ऑंखों से ही देख लिया; किन्तु, इसका गहरा हेतु दृष्टि से बिल्कु'ल परे होने पर भी वह क्षुधा और भोजन बनाने की त्रुटि से बहुत-बहुत दूर है, यह समझने में मुझे जरा-सा भी विलम्ब नहीं लगा। तो फिर, क्या पति खोजने की बात भी-

मैं उठकर खड़ा हो गया। इस नीरवता को भंग करने में मुझे खुद भी जैसे संकोच होने लगा। कुछ इधर-उधर करके अन्त में मैंने कहा, ''मुझे बहुत दूर जाना है- इस समय तो अब चलता हूँ।''

अभया ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, ''अब कब आइएगा?''

''बहुत दूर!''

''तो फिर जरा ठहर जाइए'' कहकर अभया बाहर चली गयी। पाँच-छह मिनट बाद लौटकर आई और मेरे हाथ में एक टुकड़ा कागज देकर बोली, ''जिस काम के लिए मैं आई हूँ वह सब इसमें लिख दिया है। पढ़कर जो नीक जँचे सो कीजिएगा। मैं आपसे कुछ अधिक कहना नहीं चाहती।'' इतना कहकर गले में ऑंचल डालकर आज उसने मुझे प्रणाम किया और फिर उठकर पूछा, ''आपका ठिकाना क्या है?''

सवाल का जवाब देकर मैं उस छोटे से कागज को मुट्ठी में छिपाकर धीरे-धीरे निकल आया। बरामदे के बाहर का वह मोढ़ा इस समय शून्य था। रोहिणी भइया को भी मैं आसपास कहीं न देख सका। डेरे पर पहुँचने तक मैं अपना कुतूहल दमन न कर सका! पास में ही रास्ते के बगल में एक छोटी-सी चाय की दुकान देखकर उसमें घुस गया और लैम्प के उजाले में मैंने उस पत्र को अपनी ऑंखों के सम्मुख खोलकर रख लिया। पेंन्सिल की लिखावट थी किन्तु ठीक पुरुष के से हस्ताक्षर थे। सबसे पहले उसने अपने पति का नाम और उसका पुराना ठिकाना देकर नीचे लिखा था, ''आज आप जो अपने मन में धारणा लिये जा रहे हैं सो मैं जानती हूँ; और विपत्ति के समय मुझे आपका कितना भरोसा है सो भी आप जानते हैं। इसीलिए मैंने आपका ठिकाना पूछ लिया है।''

अभया के इस लेख को मैंने बार-बार पढ़ा परन्तु उसमें इन कुछ थोड़ी-सी बातों के सिवाय और किसी भी अतिरिक्त बात का अन्दाजा नहीं लग सका। आज इन लोगों का परस्पर व्यवहार अपनी नजर से देखकर कोई बाहरी आदमी जो भी सोच सकता है उसका अनुमान करना अभया सरीखी बुद्धिमती रमणी के लिए बिल्कुाल ही कठिन नहीं है। किन्तु फिर भी वह अन्दाज सही है या गलत, इस सम्बन्ध में बिन्दु-मात्र भी उसने इशारा नहीं किया। उसके पति का नाम और ठिकाना तो मैंने पहले ही सुना है, पर विपत्ति के समय वह उसकी खोज करना चाहती है या नहीं, अथवा और कौन-सी विपत्ति अवश्यम्भावी समझकर उसने मेरा पता ले लिया है- आदि किसी बात का आभास तक भी मैं उस लेख में खोजकर बाहर न निकाल सका। बातचीत से अनुमान होता है कि रोहिणी किसी दफ्तर में नौकरी पा गया है। किस तरह पा गया है सो भी मुझे मालूम नहीं हुआ। पर हाँ खाने-पीने की दुश्चिन्ता कम से कम मेरी तरह उन्हें नहीं है- पूड़ियाँ भी खाने को मिल जाती हैं। फिर भी, अभया ने किस किस्म की विपत्ति की सम्भावना के लिए मुझे तैयार कर रक्खा है और ऐसा करने से उसने क्या लाभ सोच रक्खा है, सो अभया ही जाने।

 
बाहर निकलकर रास्ते-भर मैं केवल इन्हीं लोगों के विषय में सोचता सोचता डेरे पर पहुँचा। कुछ भी स्थिर नहीं कर सका। लेकिन यही निश्चय किया कि अभया का पति कोई भी क्यों न हो और चाहे जहाँ, चाहे जिस तरह क्यों न हो, स्त्री की विशेष अनुमति बगैर उसे खोज निकालने का कुतूहल मुझे रोक ही रखना होगा।

दूसरे दिन से मैं फिर अपनी नौकरी की उम्मीदवारी में लग गया; किन्तु हजारों चिन्ताओं में भी अभया की चिन्ता को मन के भीतर से झाड़कर नहीं फेंक सका।

किन्तु, चिन्ता चाहे जितनी ही क्यों न करूँ, दिन के बाद दिन समान-भाव से लुढ़कने लगे। इधर भाग्यवादी दादा ठाकुर का प्रफुल्ल चेहरा धीरे-धीरे मेघाच्छन्न होने लगा। भोजन में तरकारियाँ भी पहले परिमाण में और फिर संख्या में धीरे-धीरे विरल होने लगीं। किन्तु, नौकरी ने मेरे सम्बन्ध में जरा भी अपना मत-परिवर्तन नहीं किया। जैसी नजर से उसने पहिले दिन देखा था महीने भर से अधिक बीतने के बाद भी ठीक उसी नजर से वह देखती रही। तब न जाने किसके ऊपर मैं क्रमश: उत्कण्ठित और विरक्त होने लगा। किन्तु, उस समय तक मैं यह नहीं जानता था कि जब तक नौकरी करने की पूरी जरूरत न हो तब तक वह दर्शन नहीं देती। यह ज्ञान एक दिन एकाएक रास्ते में रोहिणी बाबू को देखकर प्राप्त हुआ। वे बाजार में रास्ते के किनारे शाक-सब्जी खरीद रहे थे। मैं चुपचाप उनके निकट खड़ा होकर देखता रहा। यद्यपि उनके शरीर पर के कपड़े, जूते आदि जीर्णता की प्राय: चरम सीमा को पहुँच चुके हैं- भयंकर कड़ी धूप में सिर पर एक छतरी तक नहीं है, किन्तु, खाद्य पदार्थ वे बड़े आदमियों की तरह खरीद रहे हैं। इस कार्य में ढूँढ़-खोज और जाँच-परख की भी कोई हद नहीं है। झंझट और जहमत चाहे जितनी क्यों न उठानी पड़े अच्छी चीज खरीदने की ओर उनके प्राण लगे हुए हैं। पलक मारते सारा व्यापार मेरी नजर के सामने तैर आया। इस खरीद-बिक्री के भीतर से उनका व्यग्र व्याकुल प्रेम कहाँ जाकर पहुँच रहा है, यह मानो मैं सूर्य के प्रकाश के समान सुस्पष्ट देख सका। क्यों यह सब लेकर उन्हें अपने मकान पर पहुँचना ही चाहिए और क्यों उन्हें इन सब चीजों का मूल्य देने के लिए नौकरी खोजनी ही पड़ी, इस समस्या की मीमांसा करने में जरा-सी देर न लगी। आज मैं साफ-साफ समझ गया कि क्यों इन मनुष्यों के जंगल में उन्होंने अपना रास्ता पा लिया है और क्यों में अभी तक असफल रहा हूँ।

यह दुबला-पतला आदमी रंगून के राजमार्ग पर एक बड़ी-सी गठरी हाथ में लिये हुए सैकड़ों जगह फटे हुए मैले कपड़े पहने घर की ओर जा रहा है, आड़ में से मैंने उसके परितृप्त मुख की ओर नजर की। अपनी ओर नजर करने का मानो उसे अवकाश ही नहीं है। जिस वस्तु से उसका हृदय परिपूर्ण हो रहा है उससे उसके निकट कपड़े-लत्तों का दैन्य मानो एक बारगी अकिंचित्कर हो गया है। और मैं अपने कपड़ों के साधारण से मैलेपन के ही कारण मानो प्रत्येक कदम पर शर्म के मारे सिकुड़कर जड़ हुआ जाता हूँ। रास्ते पर से चलने वाले बिल्कुखल अपरिचित व्यक्ति की भी अपने ऊपर नजर पड़ते देख शर्म के मारे मरा जाता हूँ!

रोहिणी भइया चले गये। मैंने उन्हें नहीं पुकारा और दूसरे क्षण ही वे लोगों के बीच अदृश्य हो गये। क्यों, सो मुझे मालूम नहीं, पर इस बार ऑंसुओं के मारे मेरी दोनों ऑंखें धुँधली हो गयीं। चादर के छोर से उन्हें पोंछते हुए रास्ते के किनारे धीरे-धीरे मैं अपने डेरे पर लौट आया और बार-बार मन ही मन कहने लगा, इस प्रेम से बढ़कर शक्ति, इस प्रेम से बढ़कर शिक्षक संसार में शायद और कोई नहीं। ऐसी कोई बड़ी बात नहीं जिसे यह न कर सके।

फिर भी, बहुत युगों का संचित अन्ध संस्कार मेरे कानों में चुपचाप कहने लगा- यह शुभ नहीं है, यह पवित्र नहीं है- अन्त तक इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

डेरे पर पहुँचते ही एक बड़ा लिफाफा मिला। खोलकर देखा, नौकरी की दरख्वास्त मंजूर हो गयी है। सागौन की लकड़ी का एक बड़ा भारी व्यापारी अनेक लोगों के आवेदन-पत्र होते हुए भी मुझ गरीब पर ही प्रसन्न हुआ है। भगवान उसका भला करें।

नौकरी नामक वस्तु से पुराना परिचय न था इसलिए, उसे पाकर भी मन में सन्देह बना रहा कि बहुत दिनों तक बनी रहेगी या नहीं। मेरे जो साहब हुए थे वे सच्चे साहब (अंगरेज) होकर भी, देखा कि बंगला भाषा खूब जानते हैं, क्योंकि, कलकत्ते के ऑफिस से बदलकर बर्मा आए थे।

दो हफ्ते की नौकरी के उपरान्त ही उन्होंने बुलाकर कहा, ''श्रीकान्त बाबू, तुम इस टेबल पर आकर काम करो, तनख्वाह भी इससे करीब ढाई गुनी पाओगे।''

मैंने प्रकट रूप से तथा मन ही मन भी साहब को लाखों आशीर्वाद देते हुए उस हड्डी-पसली निकली हुई टेबल को छोड़कर एकदम हरी बनात मढ़ी हुई टेबल पर दखल जमा लिया। मनुष्य का जब भला होना होता है तब इसी तरह होता है- हम लोगों के होटल के दादा ठाकुर ने बिल्कुयल ही मिथ्या नहीं कहा है।

किराये की गाड़ी पर चढ़कर यह खुशखबरी अभया को देने गया। रोहिणी भइया ऑफिस से लौटकर जलपान करने बैठे थे; किन्तु, आज उन्हें केवल पानी पीकर अपनी भूख मिटाते हुए नहीं देखा। बल्कि, आज जिस तरह वे अपनी भूख पूरी कर रहे थे, उस तरह पूरी करते संसार में और चाहे जिसे आपत्ति हो, मुझे तो नहीं थी। अतएव यह कहना फिजूल है कि अभया के भोजन के प्रस्ताव पर मैंने अपनी असम्मति नहीं प्रकट की। खाना-पीना शेष होते ही रोहिणी भइया कोट पहिरने लगे। अभया ने खिन्न कण्ठ से कहा, ''तुमसे मैं बराबर कहती आती हूँ रोहिणी भइया, कि यह शरीर लेकर इतना परिश्रम मत किया करो, क्या तुम किसी तरह भी न सुनोगे? अच्छा हम लोग क्या करेंगे अधिक रुपयों का? दिन तो हमारे अच्छी तरह कट ही रहे हैं।''

रोहिणी भइया के चक्षुओं से मानो स्नेह झरने लगा। वे हँसकर बोले, ''अच्छा, अच्छा, सो ठीक। एक रसोइया तक तो रख नहीं सकता, चूल्हे के नजदीक दोनों वेला पचते-पचते तुम्हारी तो देह सूख गयी है।'' वे इतना कहकर पान खाकर, जल्दी-जल्दी कदम रखते हुए बाहर चल दिए।

अभया एक छोटी साँस दबाकर, जबरन जरा हँसकर बोली, ''देखिए तो श्रीकान्त बाबू, इनका अन्याय! सारे दिन जी-तोड़ मेहनत करने के बाद घर आकर कुछ आराम करें, सो तो नहीं, अब रात को भी नौ बजे तक लड़कों को पढ़ाने बाहर चले गये हैं। मैं इतना कहती हूँ, पर किसी तरह सुनते ही नहीं। दो आदमियों की रसोई के लिए रसोइया रखने की, कहो तो, जरूरत ही क्या है? है न यह सब इनकी ज्यादती?'' इतना कहकर उसने एक ओर को ऑंखें फेर लीं।

मैं धीरे से कुछ हँस दिया। 'ना' या 'हाँ' जवाब देना मेरे लिए सम्भव नहीं था- मेरे विधाता के लिए भी सम्भव था या नहीं, इसमें भी सन्देह है।

अभया उठकर गयी और एक पत्र लाकर उसने मेरे हाथ पर रख दिया। कुछ दिन हुए वह बर्मा रेलवे कम्पनी के ऑफिस से आया था। बड़े साहब ने दु:ख प्रकाशित करते हुए लिखा था कि अभया का पति करीब दो वर्ष पहले किसी बहुत बड़े अपराध के कारण कम्पनी की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है, तब से वह कहाँ चला गया सो वे नहीं जानते।

हम दोनों ही बहुत देर तक सन्न होकर बैठे रहे। अन्त में अभया ने ही मौन तोड़ा, ''अब आप क्या सलाह देते हैं?''

मैंने धीरे से कहा, ''मैं क्या सलाह दूँ?''

अभया सिर हिलाकर बोली, ''नहीं, सो नहीं हो सकता। ऐसी परिस्थिति में आपको ही कर्तव्य स्थिर कर देना होगा। इस पत्र के मिलने के बाद से ही मैं बड़ी आशा से आपकी राह देख रही हूँ।''

मैंने मन ही मन कहा, बहुत खूब! मेरी राय लेकर ही घर से बाहर निकली थीं न, जो मेरी सलाह के लिए राह जोह रही हो!

बहुत देर तक चुप रहकर पूछा, ''घर लौट जाने के सम्बन्ध में आपका क्या मत है?''

अभया बोली, ''कुछ भी नहीं। आप कहें तो जा सकती हूँ, किन्तु मेरे तो वहाँ कोई है नहीं।''

''रोहिणी बाबू क्या कहते हैं?''

''वे कहते हैं कि नहीं लौटेंगे। कम से कम दस बरस तक तो वे उस ओर मुँह भी नहीं फिराएँगे।''

बहुत देर तक चुप रहकर मैंने कहा, ''वे क्या आपका बोझा बराबर सँभाले रह सकेंगे?''

अभया बोली, ''पराये मन की बात, कहिए किस तरह जानूँ? इसके सिवाय वे खुद भी किस तरह जान सकते हैं?'' इतना कहकर क्षण-भर वह चुप रही, फिर बोली, ''एक बात और है। मेरे लिए वे जरा भी जिम्मेदार नहीं हैं। दोष कहो, भूल कहो, जो कुछ है सो मेरी है।''

गाड़ीवान ने बाहर से पुकारा, ''बाबू, और कितनी देर लगेगी?''

जैसे मेरी जान बच गयी। इस अवस्था-संकट के भीतर से सहसा परित्राण पाने का कोई उपाय मुझे खोजे नहीं मिल रहा था। यह सच है कि विश्वास करने को मेरा दिल नहीं चाहता था कि अभया वास्तव में ही अपार सागर में गिरकर गोते खा रही है, किन्तु मैंने स्त्रियों की इतने तरह की उलटी-सुलटी अवस्थाएँ देखी हैं कि बाहर से इन ऑंखों पर विश्वास कर लेना कितना बड़ा अन्याय है, सो मैं नि:संशय रूप से समझता था।

गाड़ीवान का एक दफे और बुलाना था कि मैं क्षण-भर भी विलम्ब किये बगैर उठ खड़ा हुआ और बोला, ''मैं शीघ्र ही और एक दिन आऊँगा।'' इतना कहकर मैं तेजी से बाहर हो गया। अभया और कुछ न बोली। निश्चल मूर्ति की तरह जमीन की ओर देखती रह गयी।

000

गाड़ी में बैठते ही गाड़ी चल दी; दस हाथ भी नहीं गया था कि याद आया, छड़ी तो कहीं भूल आया हूँ। तुरन्त गाड़ी खड़ी की और मकान में प्रवेश करते ही देखा कि ठीक दरवाजे के सामने अभया उलटी पड़ी है और बाण से विधे हुए पशु की तरह अव्यक्त वेदना से पछाड़ खाकर मानो प्राण विसर्जन कर रही है।

क्या कहकर उसे सांत्वना दूँ, सो मेरी बुद्धि के परे की वस्तु थी। वज्राहत की तरह कुछ देर सन्न रहकर उसी तरह चुपचाप लौट आया! अभया जिस तरह रो रही थी उसी तरह रोती रही। उसे यह मालूम ही न हो सका कि उसकी इस निगूढ़ असीम वेदना का एक मौन साक्षी भी इस जगत में विद्यमान है।

राजलक्ष्मी का अनुरोध मैं भूला नहीं था। पटने को पत्र लिखने की बात, जब आया था तभी से, मेरे मन में थी। किन्तु, पहली बात तो यह कि संसार में जितने भी कठिन काम हैं, उनमें चिट्ठी लिखने को मैं किसी से भी कम नहीं समझता। इसके सिवाय, फिर लिखूँ भी क्या? किन्तु, अभया का रोना मेरे दिल में इस तरह भारी हो उठा कि उसमें का कुछ अंश बाहर निकाल दिये बगैर मेरी गति ही नहीं है, ऐसा मालूम होने लगा। इसीलिए, डेरे पर पहुँचते ही कागज-कलम जुटाकर बाईजी को पत्र लिखने बैठ गया। और उसको छोड़कर मेरे दु:ख का अंश बँटाने वाला था ही कौन? दो-तीन घण्टे बाद इस 'साहित्य-चर्चा' को समाप्त करके जब मैंने कलम रखी तब रात के बारह बज गये थे। किन्तु, कहीं सुबह दिन के उजालें में उस चिट्ठी को भेजने में लज्जा न आने लगे, इसलिए, मिजाज गर्म रहते-रहते ही मैं उसे उसी समय डाक-बॉक्स में छोड़ आया।

मुझे सन्देह था कि एक भले घर की स्त्री की निदारुण वेदना का गुप्त इतिहास और किसी दूसरी स्त्री पर प्रकट करना चाहिए या नहीं; किन्तु अभया के इस परम और चरम संकट के समय वह राजलक्ष्मी, जिसने कि एक दिन प्यारी बाई की मर्मान्तिक तृष्णा दमन की थी, उसके लिए क्या नेक सलाह देती है, यह जानने की आकांक्षा ने मुझे एकदम बेकाबू कर दिया। किन्तु अचरज की बात यह है कि इस सवाल को उलट-पलटकर मैंने एक बार भी नहीं सोचा। अभया के पति का पता न लगने की समस्या भी बार-बार मन में आ रही थी, किन्तु पता लगने पर यह समस्या और भी अधिक जटिल हो सकती है, यह चिन्ता एक दफे भी उदित नहीं हुई। और इस गोरखधन्धे को सुलझाने का भार भी विधाता ने मेरे ही ऊपर निर्दिष्ट कर रक्खा है सो भी किसने सोचा था?

तीन-चार दिन के बाद मेरा एक बर्मी क्लर्क टेबल पर एक फाइल रख गया। उस पर नीली पेन्सिल से लिखा हुआ बड़े साहब का मन्तव्य था। उन्होंने मुझे 'केस' का फैसला करने का हुक्म दिया था। मामले को शुरू से आखीर तक पढ़कर कुछ मिनट के लिए मैं सन्न होकर रह गया। घटना संक्षेप में यह थी कि हमारे प्रोम ऑफिस के एक क्लर्क को वहाँ के अंगरेज मनेजर ने लकड़ी चुराने के सन्देह में सस्पेण्ड करके रिपोर्ट की है। क्लर्क का नाम देखकर ही मुझे मालूम हो गया कि यही हमारी अभया का पति है। इसकी भी चार-पाँच पेज की कैफियत थी। बर्मा रेलवे में भी किसी गम्भीर अपराध के कारण यह नौकरी से बरखास्ते हुआ होगा, यह अनुमान करने में भी मुझे देर नहीं लगी।

थोड़ी ही देर बाद उस क्लर्क ने आकर कहा कि एक भले आदमी आपसे मिलना चाहते हैं। इसके लिए मैं तैयार ही था और मैं निश्चय से जानता था कि प्रोम से वह स्वयं केस की पैरवी करने आवेगा। इसलिए, जब कुछ ही मिनट बाद उसने सशरीर आकर दर्शन दिए तब अनायास ही मैंने पहिचान लिया कि यही अभया का पति है। उसकी ओर देखते ही सारा शरीर मानो घृणा से कण्टकित हो गया। पहिने था वह हैट-कोट, किन्तु जितने ही पुराने उतने ही गन्दे। काला मुँह सारा बड़ी-बड़ी मूँछों और दाढ़ी से ढँका हुआ था। नीचे का होठ शायद डेढ़ इंच मोटा था। और पान उसने इतने अधिक खाए थे कि उनका रस दोनों ओर जम गया था- उसके बात करते समय डर लगता था कि कहीं छिटककर अंग पर न आ पड़े।

यह मैं जानता हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है-वही उसका इहलोक और परलोक है, किन्तु, इस मूर्तिमान नीचता के निकट अभया की कल्पना करते हुए मेरा शरीर और मन संकुचित हो उठा। अभया और चाहे जो हो फिर भी सुन्दर देह वाली सुरुचि सम्पन्न कुलीन महिला है, किन्तु, यह भैंसा बर्मा के किस घने जंगल में से एकाएक बाहर निकल आया है सो जिन ब्रह्मदेव ने इसे बनाया है वे ही बता सकते हैं।

बैठने का इशारा करके मैंने पूछा कि तुम्हारे विरुद्ध जो इलजाम लगाया गया है वह क्या सत्य है? इसके जवाब में वह दस मिनट तक अनर्गल बकता रहा। भावार्थ यह था कि मैं बिल्कुदल ही निर्दोष हूँ; और मेरे रहते प्रोम ऑफिस का साहब दोनों हाथों लूट नहीं कर सकता था, यही उसके क्रोध का कारण है। जिस तरह भी हो, मुझे अलग करके एक अपने ही आदमी को भरती कर लेने के लिए उसकी यह चाल है। मुझे उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ। मैंने कहा, ''यह नौकरी चली जाय तो भी आपके समान होशियार व्यक्ति के लिए बर्मा में चिन्ता ही किस बात की है? रेलवे की नौकरी छूट जाने पर कितने-से दिन आपको खाली बैठना पड़ा था?''

वह मनुष्य पहले तो अकचकाया, फिर बोला, ''आप कहते हैं सो बिल्कुतल झूठ नहीं है। किन्तु आप जानते हैं महाशय, फैमिली-मैन हूँ, बहुत-से बच्चे कच्चे...''

''आपने क्या किसी बर्मी स्त्री से विवाह कर लिया है?''

वह एकाएक बोल उठा, ''साहब-साले ने रिपोर्ट में लिख दिया दिखता है। इसी से आपको उसकी नाराजगी मालूम हो सकती है!'' यह कहकर वह मेरे मुँह की ओर ताककर और कुछ नरम होकर बोला, ''आप क्या इस पर विश्वास करते हैं?''

मैंने गर्दन हिलाकर कहा, ''इसमें बुराई ही क्या है?''

वह उत्साहित होकर बोला, ''ठीक कहते हैं महाशय, मैं तो यह सबसे कहता हूँ कि जो करूँगा सो 'बोल्डली' स्वीकार करूँगा। मैं ऐसा नहीं हूँ कि अन्दर कुछ और बाहर कुछ। और फिर मैं ठहरा मर्द- आप जानते ही हैं। जो कहूँगा सो साफ-साफ कहूँगा महाशय, लुकाने-छुपाने की बात नहीं। और फिर देश में तो मेरा कहीं कोई है नहीं- और जब यहाँ ही रहकर चिरकाल तक नौकरी करके पेट भरना है तब- आप समझते ही हैं महाशय।' मैंने सिर हिलाकर बताया कि मैं सब समझता हूँ। फिर पूछा, ''आपका देश में क्या कोई भी नहीं है?''

वह मनुष्य चेहरे पर जरा भी मैल लाए बगैर बोला, ''जी नहीं, कहीं कोई नहीं है- काकस्य परिवेदना।' यदि कोई होता तो फिर मैं इस सूर्य मामा के देश में आ पाता! महाशय, आप विश्वास न करेंगे, मैं ऐसे-वैसे घर का लड़का नहीं हूँ, कभी हम लोग भी जमींदार थे! आज भी यदि आप देश के हमारे मकान को देखें तो आपकी ऑंखें चकरा जाँय। किन्तु, छोटी उम्र में ही सब मर-खप गये। मैंने कहा, जाने भी दो; घर-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद यह सब है किसके लिए? सब कुछ जात-बिरादरी वालों को बाँटकर मैं बर्मा चला आया।''

जरा स्थिर होकर पूछा, ''आप अभया को जानते हैं?''

वह चौंक उठा। कुछ देर मौन रहकर बोला, ''आपने उसे कैसे जाना?''

मैंने कहा, ''ऐसा भी तो हो सकता है कि आपका पता लगाकर उसने अपने भरण-पोषण के लिए इस ऑफिस में दरख्वास्त दी हो?'' वह कुछ अधिक प्रसन्न स्वर से बोला, ''ओ:, यही कहिए न! सो मैं स्वीकार करताहूँ, एक समय वह मेरी स्त्री थी...''

''और अब?''

''कोई नहीं। मैं उसे त्यागकर चला आया हूँ।''

''उसका अपराध?''

वह मनुष्य चेहरे पर बनावटी दु:ख लाकर बोला, ''आप जानते हैं महाशय, फैमिली सिक्रेट' कहना उचित नहीं। किन्तु, इस समय आप मेरे आत्मीयों की तरह हैं, इसलिए कहने में कुछ लज्जा नहीं है कि वह एक दुश्चरित्र औरत है। इसी मानसिक घृणा के कारण ही तो मुझे देश छोड़ना पड़ा। नहीं तो क्या कोई शौक से इस देश में कदम रख सकता है? आप ही कहिए न, कि यह क्या कोई ऐसी-वैसी घृणा की बात है।''

जवाब क्या दूँ? लाज के मारे मेरा मुँह नीचा हो गया। शुरू से ही मैंने इस घोर मिथ्यावादी की एक बात पर भी विश्वास नहीं किया था; किन्तु अब मुझे नि:सन्दिग्ध रूप से मालूम हो गया कि यह जितना नीच है उतना ही क्रूर भी है।

अभया के सम्बन्ध में मैं कुछ अधिक नहीं जानता हूँ, किन्तु फिर भी शपथ खाकर कह सकता हूँ कि जो अपवाद पति होकर इस पाखण्डी ने उसके सिर बिना किसी संकोच के लगा दिया, गैर होकर भी मैं उसे मुँह से नहीं निकाल सकता। कुछ देर बाद मुँह उठाकर मैंने कहा, ''उसके इस अपराध की बात आपने आते समय तो उससे कही नहीं थी। और जब यहाँ आकर भी कुछ दिनों तक आप चिट्ठी पत्री और रुपया-पैसा भेजते रहे, तब भी पत्र के द्वारा उस पर यह बात प्रकट नहीं की।''

वह महापापी स्वच्छन्दता से अपने विराट स्थूल होठों को फाड़कर हँसता हुआ बोला, ''यही तो बात है। आप जानते ही हैं महाशय, कि हम शरीफ आदमी हैं। हम लोग चुपचाप सब कुछ सहन कर लेते हैं, परन्तु हलके लोगों की तरह अपनी स्त्री के कलंक का नगाड़ा नहीं पीट सकते। खैर, ये सब दु:ख की बातें छोड़ दीजिए महाशय, ऐसी स्त्रियों का नाम मुँह पर लाने से भी पाप होता है। तो फिर, 'केस' तो आप ही 'डिस्पोज' (निर्णय) करेंगे न? मेरी जान बची, खैरियत हुई; किन्तु फिर भी कहे देता हूँ कि साहब बच्चू को यों ही न छोड़ दिया जाय। अच्छी तरह ऐसा सबक दिया जाय कि जिससे फिर कभी मेरे पीछे न लगें। वे भी समझ जाय कि मेरे भी मुरब्बी का कुछ जोर है। समझे न आप? अच्छा, मैं कहता हूँ क्या हरामजादे को हेड ऑफिस में नहीं खींचा जा सकता?''

मैंने कहा, ''नहीं।''

उसने हँसी की छटा से फाइल को कुछ आगे सरकाते हुए कहा, ''लीजिए, मजाक छोड़िए। क्या यह खबर लिये बगैर ही मैं आपके पास आया हूँ कि बड़े साहब बिल्कुेल आपकी मुट्ठी में है? खैर मरने दीजिए इसे, और भी एक दफे वह मेरे पीछे लगकर देख ले। अच्छा, क्या बड़े साहब का 'ऑर्डर' निकालकर आज ही मेरे हाथ नहीं दिया जा सकता? रात के नौ बजे ही मैं चला जाता, रात को कष्ट न उठाना पड़ता। क्या कहते हैं आप?''

मैं एकाएक जवाब न दे सका। क्योंकि, खुशामद चीज ही ऐसी है कि सारी दुरभिसन्धि जान-बूझकर भी क्षुण्ण करते श्लेश का अनुभव होता है। विरुद्ध बात मुँह पर लाते संकोच-सा होने लगा; किन्तु इस बाधा को मैंने नहीं माना। अपने आपको कठोर करके कह ही दिया, ''बड़े साहब का हुक्म हाथ में कर लेने से आपको लाभ नहीं होगा। आप और कहीं नौकरी की तलाश कीजिए।''

एक मुहूर्त में ही वह जैसे काठ हो गया और कुछ देर बाद बोला, ''इसके मानी?''

''इसके मानी यह कि आपको 'डिसमिस' करने का 'नोट', ही मैं दूँगा। मेरे द्वारा आपको किसी तरह सुविधा न होगी।''

वह उठकर खड़ा हो गया था- एकदम बैठ गया। उसकी दोनों ऑंखें छलछला आईं। हाथ जोड़कर बोला, ''बंगाली होकर बंगाली को मत मारिए बाबू, मैं बच्चों कच्चों वाला आदमी मर जाऊँगा।''

''यह देखने का भार मेरे ऊपर नहीं है। इसके सिवाय, मैं आपको जानता नहीं, आपके साहब के विरुद्ध भी मैं नहीं जा सकता।''

उसने एक नजर मेरे मुँह पर डालकर शायद समझ लिया कि मैं दिल्लगी नहीं कर रहा हूँ। और कुछ देर वह चुपचाप बैठा रहा। इसके बाद ही अकस्मात् वह जोर से रो पड़ा। क्लर्क, दरबान, पियून जो जहाँ थे सब इस अचिन्तनीय घटना से दंग हो गये। मैं भी मानो लज्जित-सा हो गया। उसे रोकने के इरादे से मैंने कहा, ''अभया आपके लिए बर्मा आई है, अवश्य ही दुश्चरित्रा स्त्री को ग्रहण करने के लिए मैं नहीं कहता। किन्तु, आपकी सब बातें सुनकर भी यदि वह माफ कर सके-आप उसके पास से चिट्ठी ला सकें तो आपकी नौकरी बजा रखने की मैं कोशिश कर देखूँगा। नहीं तो दुबारा मिलकर मुझे लज्जित न करना- मैं मिथ्या बात नहीं कहता।''

मैं जानता था कि ये नीच प्रकृति के लोग अत्यन्त डरपोक होते हैं, उसने ऑंखें पोंछकर कहा, ''वह कहाँ पर है?''

''कल इसी समय आओगे तो उसका ठिकाना बता दूँगा।''

वह और कुछ न कहकर लम्बी सलाम करके चला गया।

संध्याि के समय अभया मेरे मुँह से चुपचाप नीचा मुँह किये सारा हाल सुनती रही। उसने ऑंचल से केवल अपनी ऑंखें पोंछ डाली- कुछ कहा नहीं। मेरे क्रोध का भी उसने कुछ जवाब नहीं दिया। बहुत देर बाद मैंने ही पूछा, ''आप उसे माफ कर सकेंगी?''

अभया ने केवल गर्दन हिलाकर अपनी सम्मति जाहिर की।

''तुम्हें वह अपने साथ ले जाना चाहे, तो जाओगी?''

उसने उसी तरह सिर हिलाकर जवाब दिया।

''बर्मा की स्त्रियों का स्वभाव कैसा होता है, सो तो तुमने पहले ही दिन खूब जान लिया है, फिर भी वहाँ जाने का तुम्हारा साहस होगा?''

इस दफे अभया ने अपना मुँह ऊपर उठाया, मैंने देखा कि उसकी दोनों ऑंखों से ऑंसुओं की धारा बह रही है। उसने कुछ कहने की कोशिश की परन्तु कह न सकी। इसके बाद बार-बार ऑंचल से अपनी ऑंखों को पोंछती हुई रुद्ध कण्ठ से बोली, ''नहीं जाऊँ तो मेरे लिए और उपाय ही क्या है, बताइए?''

उसकी बात सुनकर मैं यह न सोच सका कि मैं खुश होऊँ या ऑंखों से नीर बहाऊँ; किन्तु मुझसे कुछ उत्तर देते नहीं बन पड़ा।

उस दिन और कोई बात नहीं हुई। डेरे को लौटते हुए रास्ते-भर यही एक बात मैं बार-बार अपने आपसे पूछता रहा, किन्तु, इस प्रश्न का किसी ओर से कोई भी उत्तर नहीं मिल सका। केवल हृदय के भीतर का 'वह' न जाने किस पर एक ओर जिस तरह निष्फल क्रोध से जल-जल उठने लगा, उसी तरह दूसरी ओर एक निराश्रया रमणी के उससे भी अधिक निरुपाय प्रश्न से व्यथित और भाराकान्त हो उठा। दूसरे दिन, अभया का ठिकाना पूछने के लिए जब वह मनुष्य सामने आकर खड़ा हो गया तब, मारे घृणा के, मैं उसकी ओर देख भी नहीं सका। मेरे मन का भाव समझकर आज वह अधिक बात किये बगैर ही केवल ठिकाना लेकर नम्रता के साथ चला गया, किन्तु, उसके बाद के दिन जब वह मिलने आया तब उसकी ऑं:खों और मुँह का भाव पूरी तरह बदल गया था। प्रणाम करके उसने अभया के हाथ की एक सतर लिखी हुई मेरी टेबल पर रख दी और कहा, आपने मेरा जो उपकार किया है उसे मुँह से क्या कहूँ- जितने दिन जीऊँगा आपका गुलाम होकर रहूँगा।''
 
अभया की लिखी पंक्ति पर दृष्टि जमाए हुए ही मैंने कहा, ''जाइए, आप अपना काम कीजिए, बड़े साहब ने इस बार माफ कर दिया है।''

उसने हँसकर कहा, ''बड़े साहब की चिन्ता मैं नहीं करता, केवल आप क्षमा कर दें तो मैं जी जाऊँ। आपके श्रीचरणों में मैंने बहुत से अपराध किये हैं।'' इतना कहकर उसने फिर बकना शुरू कर दिया, उसी किस्म की वैसी ही कोरी मिथ्या खुशामद की बातें। और बीच-बीच में वह रूमाल से ऑंखें भी पोंछने लगा। इतनी बातें सुनने का धीरज और किसी को नहीं हो सकता, इसलिए यह दण्ड मैं आपको नहीं दूँगा। मैं केवल उसका विस्तृत वक्तव्य संक्षेप में कहे देता हूँ। वह यह है कि उसने अपनी स्त्री के ऊपर जो अपवाद लगाया था सो बिल्कुरल ही झूठ है। उसने लज्जा के फेर में पड़कर ही वैसा किया था, नहीं तो ऐसी सती लक्ष्मी क्या कहीं और है! और मन ही मन चिरकाल से वह अभया को प्राणों से भी अधिक चाहता रहा है। तब, यहाँ जो एक और उपसर्ग आ जुटा है उसे जुटाने की उसकी जरा भी इच्छा नहीं थी, केवल बर्मियों के हाथ से अपने प्राण बचाने के लिए ही उसने यह किया है। (कुछ सत्य हो भी सकता है।) किन्तु, आज रात को जब वह अपने घर की लक्ष्मी को ले जा रहा है तब उस बर्मी- बच्ची को दूर करते कितनी देर लगती है? रहे लड़के-बच्चे-ओहो! सालों की जैसी सूरत है वैसा ही स्वभाव है- हैं वे किस काम के? बुढ़ापे में न तो उनसे खाने-पहिनने को ही मिलेगा और न मरने पर एक चुल्लू पानी की ही उनसे आशा है! जाते ही सबको एक साथ झाड़ू मारकर बिदा कर देगा तब उसका नाम- इत्यादि-इत्यादि।

मैंने पूछा, ''अभया को क्या आज ही रात को ले जाँयगे आप?'' वह विस्मय से अवाक् होकर बोला, ''खूब! जितने दिन ऑंखों नहीं देखा था उतने दिन खैर किसी तरह रहा आया; किन्तु, ऑंखों देखकर फिर क्या उसे ऑंखों की ओट कर सकता हूँ? अकेली, इतनी दूर, इतना कष्ट उठाकर, केवल मेरे लिए ही तो आई है! एक दफे सोच तो देखिए जरा इस बात को!''

मैंने पूछा, ''क्या उसे एक साथ ही घर में रक्खेंगे?''

''जी नहीं, इस समय तो प्रोम के पोस्ट मास्टर महाशय के यहाँ ही रखूँगा। उनकी स्त्री के साथ मजे में रहेगी। किन्तु, दो-एक दिन में ही- अधिक नहीं- उसके लिए मकान का प्रबन्ध करूँगा और फिर घर की लक्ष्मी को घर ले आऊँगा।''

अभया के स्वामी ने प्रस्थान किया। मैंने भी दैनिक कार्य में मन लगाने के लिए सामने की फाइल को खींच लिया।

उसके नीचे अभया की उस लिखावट पर फिर मेरी नजर जा पड़ी। इसके बाद कितनी दफे उन दो सतरों को मैंने पढ़ा और न जाने कितनी दफे और पढ़ता सो कह नहीं सकता। इतने में ही 'पियून' ने कहा, ''बाबूजी, आपके घर क्या कुछ कागज-पत्र पहुँचाने होंगे?'' चौंककर मैंने सिर उठाया तो देखा, उस समय सामने की घड़ी में साढ़े चार बज गये हैं, और क्लर्क लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अपने घर चले गये हैं।

000

अब मुझे अभया के पति का एक पत्र मिला। पहले के ही समान कृतज्ञता सारी चिट्ठी में बिखेर देकर इस बात का बड़े ही अदब और विस्तार के साथ निवेदन करके कि इस समय वह कैसे संकट में पड़ा है, उसने मुझसे उपदेश चाहा है। बात संक्षेप में यह थी कि उसने अपनी शक्ति से अधिक खर्च करके भी एक बड़ा मकान किराये पर ले लिया है; और उसमें एक ओर अपने बर्मी स्त्री-पुत्रादि को रखकर दूसरी ओर अभया को लाकर रखने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु किसी तरह भी उसे सम्मत नहीं कर पाता है। सहधर्मिणी की इस तरह की हठ से वह अतिशय मर्म-पीड़ा अनुभव कर रहा है। यह केवल 'कलि-काल' का फल है, 'सतजुग' में ऐसा नहीं हो सकता था- बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तक भी। अनेक दृष्टान्तों समेत उनका बार-बार उल्लेख करके उसने लिखा है कि हाय! कहाँ है वे आर्यललनाएँ? वे सीता-सावित्री कहाँ गईं? जो आर्य-नारियाँ पति की चरण-युगलों को हृदय में धारण करके हँसती-हँसती चिता में प्राण विसर्जन कर देती थीं और पति सहित अक्षय स्वर्ग-लाभ करती थीं वे अब कहाँ है? जो हिन्दू महिला हँसते हुए चेहरे से अपने कुष्ठग्रसित पति-देवता को कन्धों पर लादकर वेश्या के घर तक पहुँचा आई थीं, कहाँ है उस जैसी पतिव्रता रमणी? कहाँ है वह पति-भक्ति? हाय भारतवर्ष! क्या एकदम ही तेरा अध:पतन हो गया। वह सब क्या अब हम लोग एक दफे भी अपनी ऑंखों न देखेंगे। और क्या हम लोग-इत्यादि इत्यादि, करीब दो पन्ने विलाप से भर दिए हैं। किन्तु अभया पति-देवता को यहाँ तक ही मानसिक कष्ट देकर शान्त नहीं हुई। और भी सुनिए। उसने लिखा है कि इतना ही नहीं कि उसकी अध्र्दांगिनी अब भी दूसरे के घर में रह रही है, बल्कि उसे आज अपने परम मित्र पोस्ट मास्टर से मालूम हुआ कि रोहिणी नामक किसी व्यक्ति ने उसकी स्त्री को पत्र लिखा है और कुछ पैसे भेजे हैं। इससे इस हतभागे की इज्जत को कितना धक्का लगा है सो लिखकर बताया नहीं जा सकता।

चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते मैं अपनी हँसी न रोक सका। फिर भी रोहिणी के व्यवहार पर भी कुछ कम क्रोध नहीं आया। अब उसे चिट्ठी लिखने और रुपये भेजने की जरूरत ही क्या थी? जिसने पति के घर को प्राप्त करने के लिए इतना कष्ट सहन करना स्वीकार किया, उसके चित्त को, जान-बूझकर या बिना जाने-बूझे, उचाट करने की जरूरत ही क्या थी? और अभया ने भी इस तरह का व्यवहार किसलिए शुरू किया? वह क्या चाहती है? उसके पति ने जिसे स्त्री की तरह ग्रहण किया है, लड़के-बच्चे पैदा किये हैं- उन सबको त्याग कर क्या केवल उसी को लेकर वह गृहस्थी चलावे? क्यों, बर्मी स्त्रियाँ क्या स्त्रियाँ नहीं हैं? उन्हें क्या सुख-दु:ख, मान-अपमान का बोध नहीं है? न्याय-अन्याय का कानून क्या उनके लिए ताक पर रख देना चाहिए? और यदि ऐसा ही है तो वहाँ उसे जाने की जरूरत ही क्या थी? सब झंझट यहाँ से ही स्पष्ट करके निबटा देने से ही तो हो जाता।

तब तक मैं रोहिणी से मिलने नहीं गया था। वह झूठमूठ ही क्लेश पा रहा है, यह मन ही मन समझकर ही शायद मेरी उस तरफ पैर बढ़ाने की प्रवृत्ति नहीं हुई थी। आज छुट्टी होने के पहले ही गाड़ी बुलाने के लिए आदमी भेजकर मैं उठने की तैयारी कर रहा था कि उसी समय अभया का पत्र आ पड़ा। खोलकर देखा कि सारा पत्र आदि से अन्त तक रोहिणी के ही सम्बन्ध की बातों से भरा हुआ है। मैं सदा ही उसके ऊपर नजर रक्खूँ- वह कितना दुर्बल, कितना अपटु, कितना असहाय है- यही एक बात पंक्ति-पंक्ति अक्षर-अक्षर में से ऐसी मर्मान्तिक व्यथा के साथ फूटी पड़ती थी कि कोई अत्यन्त सरल-चित्त मनुष्य भी इस आवेदन के तात्पर्य को समझने में भूल करेगा, ऐसा नहीं जान पड़ा। अपने सुख-दुख की बात उसमें प्राय: कुछ भी नहीं थी! फिर पत्र के अन्त में उसने बताया था कि अनेक कारणों से अब भी वह उसी जगह रह रही है जहाँ कि पहले पहल आकर ठहरी थी।

पति सती स्त्री का एकमात्र देवता हो सकता है कि नहीं, इस विषय में अपना मतामत छापे के अक्षरों में प्रकट करने का दु:साहस मुझमें नहीं है और न मुझे इसकी कोई जरूरत ही दिखती है। किन्तु सर्वांगीण सती-धर्म की एक अपूर्वता-दु:सह-दु:ख और सर्वथा अन्याय के बीच में भी उसकी आकाशभेदी विराट महिमा जो मेरी अन्नदा जीजी की स्मृति के साथ चिरकाल के लिए मन की गहराई में खुदकर अंकित हो गयी है, जिसका असह्य सौन्दर्य ऑंखों से देखे बिना अवधारण भी नहीं किया जा सकता, और जिसने एक ही साथ नारी को अति क्षुद्र और अति बृहत् बना दिया है- मेरी वह अव्यक्त उपलब्धि, आज अभया की इस चिट्ठी से आन्दोलित हो उठी।

जानता हूँ कि सब अन्नदा जीजी नहीं है- उस कल्पनातीत निष्ठुरता को छाती फैलाकर धीरज से ग्रहण करने जैसी बड़ी छाती भी सब स्त्रियों की नहीं होती; और जो नहीं है उसके लिए रोज शोक करना ग्रन्थकार मात्र का एकान्त कर्तव्य है या नहीं, सो मैंने विचार कर स्थिर नहीं कर रक्खा है, किन्तु फिर भी सारा चित्त वेदना से भर गया। गुस्से में भरा हुआ मैं गाड़ी पर जा बैठा और उस निकम्मे पर स्त्री-आसक्त रोहिणी को जो कड़ी-कड़ी बातें अच्छी तरह सुनाने जा रहा था उन्हें मन ही मन दुहराता हुआ उसके घर की ओर रवाना हो गया। गाड़ी से उतरकर, किवाड़ खोलकर जब मैंने उसके मकान में प्रवेश किया तब दिया-बत्ती की बेला हो गयी थी, अर्थात् दिन का प्रकाश खत्म होकर रात का अंधेरा अभी-अभी उतर रहा था।

वह भर भादों भी नहीं था और न उस समय भरे बादल ही थे; किन्तु, शून्य घर-बार की भी यदि कोई सूरत-शक्ल होती है तो उस दिन उस प्रकाश और अन्धकार के बीच जो मेरी नजर में पड़ी, उसे छोड़कर और क्या हो सकती है, सो तो मैं आज भी नहीं जानता। घर के सभी दरवाजे भाँय-भाँय कर रहे थे, केवल रसोईघर की एक खिड़की में से धुऑं निकल रहा था। दाहिनी तरफ कुछ आगे बढ़कर झाँककर देखा कि चूल्हा जलकर प्राय: बुझ रहा है और पास में ही जमीन पर रोहिणी बाबू हँसिये से एक बैंगन के दो टुकड़े करके गुमसुम बैठे हुए हैं। मेरे पैरों की आहट उनके कानों तक नहीं गयी, क्योंकि कर्णेन्द्रिय का जो मालिक था वह उस समय और चाहे जहाँ हो किन्तु बैंगन के ऊपर एकाग्र नहीं था, यह मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ। किन्तु चुपचाप लौटकर जब उन दो कमरों के बीच आ खड़ा हुआ तब मुझे साफ-साफ दिखाई दिया कि एक उत्कट वेदना से भरा हुआ रोदन सारे घर को भरकर दँतौरी बाँधे हुए अडिग रूप से वहाँ स्थिर हो रहा है और वह सम्पूर्ण समाज धर्माधर्म और समस्त पाप-पुण्य से भी परे की, अतीत की, वस्तु है।

बाहर आकर मैं बरामदे में एक मोढ़े पर बैठ गया। कितनी ही देर बाद, शायद, दीपक जलाने के लिए रोहिणी बाबू बाहर आए और भयभीत हो उन्होंने पूछा, ''कौन है?''

मैंने आवाज देकर कहा, ''मैं हूँ श्रीकान्त।''

''श्रीकान्त बाबू? ओह...'' इतना कहकर वह तेज चाल से नजदीक आए, भीतर जाकर उन्होंने दीया-बत्ती की और फिर मुझे भीतर ले जाकर बिठाया। इसके बाद किसी के भी मुँह से कोई बात न निकली- दोनों ही चुपचाप बैठे रहे। सबसे पहले मैंने ही मुँह खोला। कहा, ''रोहिणी भइया, यहाँ अब क्यों रहते हो? चलो मेरे साथ।''

रोहिणी ने पूछा, ''क्यों?''

मैंने कहा, ''यहाँ आपको कष्ट होता है इसलिए।''

रोहिणी कुछ देर ठहरकर बोला, ''कष्ट अब मुझे क्या है!''

ठीक है! किन्तु, ऐसी अवस्था में तो आलोचना की नहीं जा सकती मैं उसका किस प्रकार तिरस्कार करूँगा, क्या सत्परामर्श दूँगा आदि सब सोचता-सोचता घर से चला था, किन्तु, यहाँ वे सब विचार बह गये। नीतिशास्त्र की पोथी इतनी अधिक नहीं पढ़ी थी कि इतने बड़े प्रेम का अपमान कर सकूँ। कहाँ गया मेरा क्रोध, कहाँ गया मेरा विद्वेष! समस्त साधु-संकल्प अपना सिर नीचा करके कहाँ छिप रहे, पता भी न चला।

रोहिणी बोला कि उसने वह प्राइवेट टयूशन छोड़ दी है क्योंकि उससे तन्दुरुस्ती बिगड़ती है। उसका दफ्तर भी अच्छा नहीं है, बड़ी कड़ी मेहनत पड़ती है। नहीं तो अब कष्ट क्या है।

मैं चुप हो रहा। क्योंकि इसी रोहिणी के मुँह से कुछ दिन पहिले इससे ठीक उलटी बात सुनी थी। वह कुछ देर चुप रहकर फिर कहने लगा, ''ऑफिस से थके-माँदे लौटने पर यह राँधना-रूँधना तो बड़ी झुँझलाहट पैदा करता है, क्यों न श्रीकान्त बाबू?''

मैं और क्या कहता? आग बुझ जाने पर केवल जल से ही तो इंजन चलता नहीं, यह तो जानी हुई बात है।

फिर भी, वह यह स्थान छोड़कर दूसरी जगह जाने को राजी नहीं हुआ। कल्पना की तो कोई सीमा निर्दिष्ट कर नहीं सकता, इसलिए उस बात को नहीं छोड़ता, किन्तु, किसी असम्भव आशा ने उसके मन के भीतर भी किसी तरह आश्रय नहीं पाया था सो मैं उसकी कुछ बातों से ही जान गया था। फिर भी क्यों वह इस दु:ख के आगार को छोड़ना नहीं चाहता, यह अवश्य ही मैं नहीं सोच सका। किन्तु, उसके अन्तर्यामी के अगोचर नहीं था कि जिस हतभागी के घर का रास्ता रुद्ध हो गया है, उसे इस शून्य घर की पूँजीभूत वेदना यदि खड़ा न रख सके तो उसे मिट्टी में मिलने से रोकना इस दुनिया में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।

अपने डेरे पर पहुँचते-पहुँचते कुछ रात हो गयी। घर में घुसकर देखा कि एक कोने में बिस्तर लगाकर एक आदमी सिर से पैर तक कपड़ा ओढ़े सो रहा है। नौकरानी से पूछने पर उसने कहा, ''शरीफ आदमी हैं।''

''इसलिए मेरे कमरे में!''

भोजनादि के उपरान्त उन महाशय से बातचीत हुई। उनका मकान चटगाँव जिले में है। करीब चार वर्ष के बाद उनके लापता छोटे भाई का पता मिला है और उसे वापिस घर ले जाने के लिए वे आए हैं। वे बोले, ''महाशय, कहानियों में सुना था कि पुराने समय में कामरूप की स्त्रियाँ विदेशी पुरुषों को- भेड़ बनाकर बाँध रखती थीं। न जाने उस समय वे क्या करती होंगी; किन्तु इस जमाने में बर्मा की स्त्रियों की क्षमता उनसे तिल-भर भी कम नहीं है, सो मैं नस नस से अनुभव कर रहा हूँ।''

और भी बहुत-सी बातें करने के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई के उद्धार करने के लिए मेरी सहायता की भिक्षा माँगी। मैंने बचन दिया कि उनके इस साधु उद्देश्य को सफल करने में मैं कमर बाँधकर लग जाऊँगा। क्यों, सो कहने की जरूरत नहीं है। दूसरे दिन सुबह ढूँढ़-खोज करके उनके छोटे भाई की बर्मी ससुराल में जा पहुँचा। बड़े भाई आड़ में रास्ते के ऊपर चहल कदमी करने लगे।

छोटे भाई उपस्थित नहीं थे, साइकिल लेकर सुबह घूमने के लिए बाहर गये थे। मकान में सास-ससुर नहीं थे, केवल स्त्री अपनी एक छोटी बहिन को लेकर एक-दो दासियों सहित वहाँ रहती है। इन लोगों की जीविका बर्मा-चुरुट बनाना था। उस समय सब इसी काम में लगे हुए थे। मुझे बंगाली देखकर और सम्भवत: अपने पति का मित्र समझकर, उन्होंने मेरा आदर के साथ स्वागत किया। बर्मी स्त्रियाँ अत्यन्त परिश्रमी होती हैं, परन्तु पुरुष बहुत ही आलसी होते हैं। वहाँ घर के छोटे-मोटे काम-काज से लेकर व्यवसाय वाणिज्य तक सब कुछ प्राय: स्त्रियों के हाथ में है। इसलिए, लिखना-पढ़ना सीखे बिना उनका काम नहीं चलता, परन्तु पुरुषों की बात अलहदा है। पढ़ना-लिखना सीखा हो तो भला, न सीखा हो तो लज्जा के मारे मरना नहीं होता। निष्कर्मा पुरुष स्त्री का उपार्जित अन्न नष्ट करके बाहर उसी पैसे से बाबूगीरी करता फिरता है और उससे लोगों को कोई अचरज नहीं होता। स्त्रियों भी छि:-छि:, मिनमिन, पिनपिन करके उसकी नाकोंदम कर देना आवश्यक नहीं समझतीं। बल्कि, यही किसी परिणाम में उनके समाज को स्वाभाविक आचार में शामिल हो गया है।

दस-पन्द्रह मिनट के बीच ही बाबू साहब 'द्वि-वक्र-यान' में लौट आए। सारी देह पर अंगरेजी पोशाक, हाथ में दो-तीन अंगूठियाँ, घड़ी, चैन आदि। काम-काज कुछ भी नहीं करना पड़ता, फिर भी देखा, हालत खूब अच्छी है। उनकी बर्मी पत्नी अपने हाथ का काम छोड़कर उठ खड़ी हुई और उनके हाथ से टोपी तथा छड़ी लेकर उसने रख दी। छोटी बहिन ने चुरुट दियासलाई आदि ला दिये, एक दासी ने चाय का सरंजाम और दूसरी ने पान का डब्बा ला दिया। वाह, इस मनुष्य को तो सबने मिलकर एकदम राजा की तरह रख छोड़ा है! नाम मैं भूल गया हूँ। शायद चारु-वारु ऐसा ही कुछ होगा। जाने दो, हम लोग न होगा तो केवल 'बाबू' कहकर पुकार लेंगे।

बाबू ने प्रश्न किया कि आप कौन हैं? मैंने कहा, मैं आपके भाई का मित्र हूँ। उन्होंने विश्वास नहीं किया। बोले, ''आप तो कलकतिया हैं; मेरे भाई तो कभी वहाँ गये भी नहीं, मित्रता किस तरह हुई?''

किस तरह मित्रता हुई, कहाँ हुई, इस समय वे कहाँ हैं, इत्यादि संक्षेप से वर्णन करके उनके आने का उद्देश्य भी मैंने बता दिया और यह भी निवेदन कर दिया कि वे अपने भ्रातृ-रत्न के दर्शनों की अभिलाषा से उत्कण्ठित हैं।

दूसरे दिन सुबह ही हमारी होटल में बाबू की चरण-धूलि आ पड़ी और दोनों भाइयों की बड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने बिदा ग्रहण की। तब से दोनों भाइयों का कुछ ऐसा हेल-मेल हों गया, कि-सुबह नहीं, संध्याट, नहीं-बाबू साहब 'भइया, भइया' कहकर पुकारते हुए लगे जब तब आ उपस्थित होने और फुसफुस खुसखुस सलाह-संलाप करने और खाने-पीने की तो कोई सीमा ही नहीं रही। एक दिन संध्यास को वे अपने भइया को और मुझे भी चाय-बिस्कुट का निमन्त्रण दे गये।

उसी दिन उनकी बर्मी स्त्री से मेरी अच्छी तरह बातचीत हुई। वह अतिशय सरल, विनयी और भली है। प्यार करके स्वेच्छा से ही उसने विवाह किया है और तब से शायद एक दिन के लिए भी इन्हें कोई दु:ख नहीं दिया। कोई चार-पाँच दिन बाद बड़े भइया ने मुसकराते हुए कान में कहा, कि परसों सवेरे के जहाज से हम लोग घर जा रहे हैं। सुनकर मुझे कुछ डर-सा लगा; पूछा, ''आपके भाई यहाँ फिर लौटकर तो आयँगे?

बड़े भइया बोले, ''अब? राम-राम करके किसी तरह एक दफे जहाज पर चढ़ तो पावें!''

मैंने पूछा, ''यह स्त्री को जता दिया है?''

बड़े भइया बोले, ''बाप रे! तब क्या हम बच सकेंगे? साली जो जहाँ होंगी रक्त-बीज की तरह आकर घेर लेंगी।'' यह कहकर और फिर दोनों ऑंखें मिचकाकर हँसते हुए बोले, ''फ्रेंच लीव्ह महाशय, फ्रेच लीव्ह- आप समझे या नहीं?''

मुझे अत्यन्त क्लेश मालूम हुआ, बोला ''ऐसा हुआ तब तो स्त्री को अत्यन्त कष्ट होगा।''

मेरी बात सुनकर बड़े भइया तो हँसी से लोट-पोट हो गये। किसी तरह हँसना बन्द करके बोले, ''वाह, आपने भी खूब कहा! इन बर्मी औरतों को कष्ट? इन सालियों की जात के लोग खाकर कुल्ला तक नहीं करते, न इनके यहाँ जूठे-मीठे का विचार है, और न जात-पाँत का। साली सब नेप्पी (एक तरह की सड़ाई हुई मछलियाँ) खाती हैं महाशय, जिसकी दुर्गन्ध के मारे भूतनी-पिशाचियाँ तक भाग जावें। इन सालियों को और कष्ट! एक चला जायेगा तो दूसरे को पकड़ लेंगी-छोटी जात की हैं सालीं-

''ठहरिए महाशय, ठहरिए। आपके भाई को उसने जो इन चार वर्षों तक राजा की तरह खिलाया-पिलाया है, और कुछ न हो, इसके लिए भी तो उसका कुछ कृतज्ञ होना चाहिए।''

बड़े भाई का मुँह गम्भीर हो गया। वे कुछ देर चुप रहकर बोले, ''आपने तो मुझे अवाक् कर दिया महाशय। मर्द-बच्चे हैं, विदेश की धारती पर आकर यदि उम्र के दोष से कुछ शौक कर ही डाला तो क्या हुआ? और फिर कौन है जो ऐसा नहीं करता, कहिए न? मुझसे तो कुछ छुपा है नहीं- इसका कुछ खुल पड़ा है- सब लोग जान गये हैं, बस-सो इसीलिए क्या चिरकाल तक इसे इसी तरह फिरते रहना होगा? भला बनकर, गृहस्थ-धर्म चलाकर, फिर से पाँच पंचों में अपना स्थान ग्रहण न करना होगा? महाशय, यह तो कुछ बात ही नहीं है, कच्ची उम्र में तो कितने ही लोग होटल में जाकर मुर्गी तक खा आते हैं। किन्तु उम्र पकने पर क्या ऐसा करते हैं? आप ही विचार कीजिए न, मैं कहता हूँ सो सच है कि झूठ?''

वास्तव में यह विचार करने जैसी बुद्धि भगवान ने मुझे नहीं दी, इसलिए मैं चुप रह गया और ऑफिस का समय हो रहा था इसलिए, नहा-खाकर चल दिया।

किन्तु, ऑफिस से लौटते ही वे फिर एकाएक बोल उठे, ''मैंने सोच देखा, आपकी सलाह ही ठीक है महाशय! इस जात का कुछ भरोसा नहीं, क्या जाने जाते-जाते अन्त में क्या फसाद खड़ा कर दे। कहकर जाना ही ठीक है। साली जो न करें सो थोड़ा। न लाज है न शरम, और न कुछ धर्म का ज्ञान। इन्हें यदि जानवर कहा जाय तो भी कुछ बेजा नहीं है।''

मैंने कहा, ''हाँ, यही ठीक है।''

किन्तु, उसकी बात पर मैं विश्वास न ला सका। मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि इसके भीतर कोई षडयन्त्र है। किन्तु, वह इतना नीच, इतना निष्ठुर होगा-ऑंखों से देखे बगैर कोई उसकी कल्पना भी कर सकेगा, यह मैं नहीं सोच सका।

चटगाँव का जहाज रविवार को जाता है। ऑफिस बन्द था। सुबह के समय और करता ही क्या; उन्हें 'सी ऑफ' (=बिदा) करने के लिए जहाज-घाट पर जा पहुँचा। जहाज उस समय जेटी से लगा हुआ था। जाने वाले दोनों श्रेणियों के लोगों की दौड़-धूप, चीख-पुकार में कोई किसी की बात नहीं सुन सकता था।

यहाँ वहाँ देखते ही उस बर्मी स्त्री पर नजर पड़ गयी। एक किनारे वह अपनी छोटी बहिन का हाथ पकड़े खड़ी है। सारी रात रोते रहने के कारण उसकी दोनों ऑंखें ठीक जबा के फूलों की तरह हो रही हैं। छोटे बाबू बहुत ही व्यस्त हैं। वे अपनी दो चक्रों की गाड़ी (साइकिल), ट्रंक, बिस्तर तथा और भी न जाने क्या-क्या लिये कुलियों के साथ दौड़-धूप कर रहे हैं-उन्हें क्षण-भर का भी अवसर नहीं है।

धीरे-धीरे सारी चीजें जहाज पर चढ़ गयीं, यात्री लोग भी सब ठेल-ठालकर ऊपर चढ़ गये। जो यात्री नहीं थे वे नीचे उतर आए, सामने की ओर से लंगर उठने लगा। इसी समय छोटे बाबू अपने सामान को हिफाजत से रखकर और जगह ठीक करके अपनी बर्मी-स्त्री से बिदा लेने के छल से संसार के निष्ठुरतम अंक का अभिनय करने के लिए जहाज पर से नीचे उतरे। द्वितीय दर्जे के यात्री थे, इसलिए उन्हें यह अधिकार प्राप्त था।

मैंने अनेक दफे सोचा है कि इसकी भला क्या जरूरत थी? मनुष्य जबर्दस्ती अपनी मानव-आत्मा को इस तरह क्यों अपमानित करता है? मन्त्रदीक्षित पत्नी न हुई तो क्या हुआ, किन्तु वह स्त्री तो है! वह कन्या भगिनी जननी की जाति की तो है। उसी के आश्रय से वह इतने सुदीर्घ समय तक पति के समस्त अधिकारों का उपयोग करता हुआ वहीं रहा है। उसने तो अपने विश्वस्त हृदय की सारी मधुरता, सारा अमृत, सम्पूर्ण शरीर और मन उस पर समर्पित कर दिया है। फिर किस लोभ से वह इन अगणित लोगों की ऑंखों में उसे इतने बड़ें निर्दय परिहास और तमाशे की चीज बनाकर चलता बना। वह एक हाथ से रूमाल के द्वारा अपनी दोनों ऑंखें ढंके हुए है और दूसरा हाथ अपनी बर्मी स्त्री के गले में डाले हुए रोने के स्वर में बहुत कुछ कह रहा है। स्त्री ऑंचल में मुँह छिपाये रो रही है।

¹ यह बंगला मुहाविरा है, अर्थ-अंगूठा दिखाकर।

आसपास बहुत से बंगाली खड़े हैं। उनमें से कुछ मुँह फिराकर हँस रहे हैं, और कुछ मुँह में कपड़ा देकर हँसी रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मैं कुछ दूरी पर था, इसलिए पहले कुछ समझ न सका, किन्तु नजदीक आते ही सब बातें साफ-साफ सुन पड़ने लगीं। वह रोने के स्वर में बर्मी और देहाती बंगाली मिलाकर विलाप कर रहा है। यदि बंगाली में कुछ मार्जित करके लिखा जाय तो उस विलाप का यह रूप हो- ''एक महीने बाद रंगपुर से तमाखू खरीद कर कैसे आ जाऊँगा, यह मैं ही जानता हूँ! जो री मेरी रत्नमणि! तुझे केला दिखाकर चला रे, ¹ केला दिखाकर चला!''

वह यह सब केवल हमारे समान कुछ अपरिचित बंगाली दर्शकों के हँसाने के लिए ही कह रहा था। पर, उसकी स्त्री बंगला नहीं समझती है, केवल रोने की आवाज से ही उस बेचारी की छाती फट रही है और किसी तरह वह हाथ उठाकर उसकी ऑंखें पोंछकर सांत्वना देने की चेष्टा कर रही है।

वह आदमी जोर-जोर से बिसूर-बिसूर कर रोता हुआ कहने लगा, ''बड़ी मुश्किल से तूने पाँच सौ रुपये तमाखू खरीदने को दिए हैं- अब कुछ तेरे पास नहीं है-पेट तो भरा ही नहीं- इसी तरह यदि तेरा मकान भी बेच-बाचकर भले घर के लड़के की तरह घर जा सकता, तो समझता कि हाँ एक दाँव मारा! हाय, यह सब कुछ नहीं हुआ रे। कुछ नहीं हुआ!

आसपास के लोग हँसी को रोक रखने के कारण फूल-फूल उठने लगे; किन्तु जिसको लेकर इतनी हँसाई हो रही थी उसकी ऑंखें और कान दु:ख के ऑंसुओं से एकदम आच्छादित हो रहे थे। ऐसा जान पड़ने लगा कि कहीं वेदना के मारे मर न जाय!

खलासियों ने ऊपर से पुकार कर कहा, ''बाबू, सीढ़ी उठाई जा रही है।''

वह आदमी गला छोड़कर सीढ़ी तक गया और फिर लौट आया। स्त्री के हाथ में एक पुराने समय के अच्छे नगवाली अंगूठी थी। इसी पर हाथ रखकर रोता हुआ बोला, ''अरी, दे दे री, यह अंगूठी ही ले जाऊँ। इसके कम से कम दो-ढाई सौ रुपये दाम तो होंगे ही- इन्हीं को क्यों छोड़ूँ?''

स्त्री ने उसे चटपट खोलकर अपने प्रियतम की अंगुली में पहिना दिया। ''जो मिला वही लाभ है।'' कहकर वह आदमी रोता-रोता ही सीढ़ी पर चढ़ गया। जहाज जेटी छेड़कर धीरे-धीरे दूर सरकता जाने लगा और स्त्री मुख पर ऑंचल डालकर घुटने टेककर वहीं बैठ गयी। बहुत से लोग दाँत काढ़कर हँसते-हँसते चले गये। किसी ने कहा, ''बाह रे लड़के!'' किसी ने कहा, ''बाह रे बहादुर छोकरे!' बहुत-से लोग यह कहते-कहते चले गये, 'कैसा तमाशा किया! हँसते-हँसते पेट दुखने लगा!' ऐसे-ऐसे न जाने कितने मन्तव्य प्रकट किये गये। केवल मैं ही अकेला सबके हँसी-तमाशे की चीज उस भोली स्त्री के अपरिसीम दु:ख का साक्षी बनकर गुमसुम खड़ा रह गया।

छोटी बहिन ऑंखें पोंछती हुई पास में खड़ी अपनी बहिन का हाथ खींच रही थी। मेरे पास में जाकर खड़े होते ही वह धीरे से बोली, ''बाबूजी आए हैं बहिन, उठो।''

मुँह उठाकर उसने मेरी ओर देखा और साथ ही साथ उसका रुदन मानो बाँध तोड़कर फट पड़ा। मेरे पास सान्त्वना देने के लिए और था ही क्या! फिर भी, उस दिन मैं उसका साथ नहीं छोड़ सका। उसके पीछे-पीछे उसकी गाड़ी में जा बैठा। रास्ते-भर वह रो-रो करके यही बात कहती रही कि, ''बाबूजी, आज मेरा मकान सूना हो गया। किस तरह मैं उसके भीतर पैर रक्खूँगी; एक माह के लिए तमाखू खरीदने गये हैं- यह एक मास मैं कैसे काटूँगी! विदेश में उन्हें न जाने कितनी तकलीफ उठानी होगी! मैंने उन्हें वहाँ क्यों जाने दिया! रंगून के बाजार की तमाखू से हमारा काम तो मजे से चल रहा था; तब फिर क्यों अधिक लाभ की आशा से मैंने उन्हें इतनी दूर भेजा! दु:ख के मारे छाती फटी जाती है। बाबूजी, अगली मेल से ही मैं उनके पास चली जाऊँगी।'' इस तरह वह न जाने कितना और क्या-क्या कहती रही।

मैं एक बात का भी जवाब न दे सका, केवल अपना मुँह फिराकर खिड़की के बाहर देखता हुआ अपनी ऑंखों के ऑंसुओं को छुपाता रहा।

वह कहने लगी, ''बाबूजी, तुम्हारी जात के लोग जितना प्यार-प्रेम कर सकते हैं, उतना हमारी जात के लोग नहीं कर सकते; तुम लोगों में जितनी दया माया है उतनी और किसी देश के लोगों में नहीं है।''

कुछ देर ठहरकर और दो-तीन दफे ऑंखें पोंछकर वह कहने लगी, ''बाबू के प्यार में पड़कर जब मैं उनके साथ रहने लगी तब कितने ही लोगों ने मुझे भय दिखाकर रोका था; किन्तु, मैंने किसी की भी बात न सुनी। इस समय न जाने कितनी स्त्रियाँ मेरे सौभाग्य पर मन ही मन जलती हैं।''

चौरस्ते के नजदीक मैंने चाहा कि उतरकर अपने डेरे पर चला जाऊँ, किन्तु, वह व्याकुल होकर दोनों हाथों से गाड़ी का दरवाजा रोककर बोली, ''ना बाबूजी, सो नहीं होगा। तुम्हें हमारे साथ चलकर एक प्याला चाय पीकर आना होगा; चलिए।''

मैं इनकार न कर सका। गाड़ी चलने लगी। उसने एकाएक पूछा, ''अच्छा बाबूजी, रंगपुर कितनी दूर है? आप कभी वहां गये हैं? कैसी जगह है? बीमार होने पर वहाँ डॉक्टर तो मिल सकते हैं न?

बाहर की ओर देखते हुए मैंने उत्तर दिया, ''हाँ, मिलते क्यों नहीं।''

एक उसास छोड़कर वह बोली, ''फया (=ईश्वर) उन्हें भला रक्खें। उनके भाई भी साथ में है। वे बड़े सज्जन आदमी हैं, छोटे भाई को तो वे प्राणों से ज्यादा रक्खेंगे। तुम लोगों का शरीर तो जैसे प्रेमहीन बना है। मुझे कुछ सोच नहीं करना है, क्यों न बाबूजी?''

मैं चुपचाप बाहर की ओर देखता हुआ केवल यही सोचने लगा कि इस महापाप में मेरा खुद का हिस्सा कितना है? चाहे आलस्यवश हो- चाहे ऑंखों की शरम के मारे हो, और चाहे अक्ल मारी जाने के कारण हो, यह जो मैंने अपना मुँह बन्द किये रहकर इतना बड़ा अन्याय अनुष्ठित होते देखा और कुछ कहा नहीं, इसके अपराध से क्या मैं छुटकारा पाऊँगा? और यदि ऐसा ही है, तो फिर सिर ऊँचा करके मैं सीधा क्यों नहीं बैठ सकता? उसकी ऑंखों की ओर देखने का साहस क्यों नहीं कर सकता?

चाय-बिस्कुट लेकर और उनके विवाहित जीवन की लाखों घटनाओं का विस्तृत इतिहास सुनकर जब मैं मकान से बाहर हुआ तब दिन अधिक बाकी नहीं था घर लौट जाने की इच्छा नहीं हुई। दिन के अन्त में सब लोग अपना-अपना काम-काज खत्म करके डेरे में लौट आते हैं- दादा ठाकुर का होटल उस समय तरह-तरह के सुन्दर हास-परिहास से मुखरित हो रही है। पर, सब हो-हल्ला मुझे जहर जैसा लगने लगा।

अकेला रास्ते-रास्ते घूमते हुए मैं यही सोचने लगा कि इस समस्या की मीमांसा होगी किस तरह? बर्मी लोगों में विवाह के सम्बन्ध में कोई बँधा हुआ नियम नहीं है। विवाह की कुलीन विधि भी है और पति-पत्नी की तरह जो स्त्री-पुरुष तीन दिन एक साथ रहकर एक बर्तन में भोजन कर लेते हैं, उनका भी विवाह हो गया समझा जाता है। न तो समाज ही इसे नामंजूर करती है और न वह स्त्री ही इस कारण किसी तरह हलकी नजर से देखी जाती है। परन्तु, 'बाबू' के लिए हिन्दू कानून में यह सब कुछ भी नहीं है। इस स्त्री को यह अपने देश में ले जाकर नहीं रख सकता। हिन्दू समाज उन्हें न हो तो न अपनावे, किन्तु, यह भी जीवन-भर सहन करते रहना कठिन है कि नीच से नीच आदमी भी उन्हें नीची निगाह से देखे! या तो चिरकाल के लिए निर्वासित की तरह प्रवास में रहा करे; या फिर, बड़े भइया ने अपने छोटे भाई की जो व्यवस्था की, वही ठीक है। इतना होते हुए भी 'धर्म' नामक शब्द का यदि कोई अर्थ हो सकता है- चाहे वह धर्म हिन्दू जाति का हो या और किसी जाति का, तो इतना बड़ा नृशंस व्यापार किस तरह ठीक हो सकता है सो समझना मेरी बुद्धि से परे की बात है। यह सब बातें तो समयानुसार और कभी सोचकर देखूँगा; किन्तु, इस गुस्से के मारे तो मैं जलकर खाक होने लगा, कि यह कापुरुष आज बिना किसी अपराध के इस अनन्य-निर्भर नारी के परम स्नेह के ऊपर वेदना का बोझा लादकर और चकमा देकर भाग गया।

रास्ते के किनारे-किनारे जो चलना शुरू किया तो चलता ही गया। बहुत दिन पहले, एक दिन अभया का पत्र पढ़ने जिस चाह की दुकान में गया था उसी दुकान के मालिक ने शायद पहिचान कर मुझे हाँक दी, ''बाबू साहब, आइए।''

एकाएक जैसे नींद टूटते ही मैंने देखा, यह वही दुकान है और वह रोहिणी भइया का घर है। बिना कुछ कहे उसके बुलाने का मान रखकर मैं अन्दर चला गया और एक प्याला चाय पीकर बाहर निकला। रोहिणी के दरवाजे पर धक्का देकर देखा कि भीतर से बन्द है। बाहर की साँकल को पकड़कर दो-चार दफे हिलाते ही किवाड़ खुल गये। ऑंखें उठाकर देखा कि सामने अभया है।

''अरे तुम?''

अभया की ऑंखें और चेहरा लाल हो उठा; कोई भी जवाब दिए बगैर वह पलक मारते न मारते अपने कमरे में चली गयी और उसने अन्दर से कुण्डी बन्द कर ली। किन्तु, लज्जा की जो मूर्ति शाम के उस धुँधले प्रकाश में उसके चेहरे पर फूट उठते देखी, उससे जानने-पूछने के लिए और कुछ बाकी ही नहीं रहा। अभिभूत की तरह कुछ देर खड़ा रहकर चुपचाप लौटकर जा रहा था कि अकस्मात् मेरे दोनों कानों में मानो दो तरह के विभिन्न रोने के स्वर एक ही साथ गूँज उठे; एक था उस महापापी का और दूसरा उस बर्मी युवती का। मैं जाना ही चाहता था, किन्तु, फिर लौटकर ऑंगन में खड़ा हो गया। मन ही मन कहा, नहीं, मुझे इस तरह नहीं जाना चाहिए। नहीं-नहीं- ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह उचित नहीं है, यह अच्छा नहीं है- यह सब अनेक दफे सुनने की आदत रही है, अनेक दफे दूसरों को सुनाया भी है-किन्तु बस, अब और नहीं। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्यों अच्छा है, कहाँ किस तरह बुरा है- ये सब प्रश्न यदि हो सकेगा तो स्वयं उसी के मुँह से सुनूँगा और यदि ऐसा न कर सकूँ, तो केवल पोथी के अक्षरों पर दृष्टि रखकर मीमांसा करने का अधिकार न मुझे है, न तुम्हें है और न शायद विधाता को ही है।

एकाएक अभया दरवाजा खोलकर आ खड़ी हुई; बोली, ''जन्म-जन्मान्तर के अन्ध संस्कार के धक्के से पहले पहल अपने आपको सँम्हाल न सकी, इसीलिए मैं भाग खड़ी हुई थी श्रीकान्त बाबू, उसे आप मेरी सचमुच की लज्जा मत समझना।''

उसके साहस को देखकर मैं अवाक् हो गया। वह बोली, ''आपको अपने डेरे को लौटने में आज कुछ देरी हो जायेगी, क्योंकि रोहिणी बाबू आते ही होंगे। आज हम दोनों ही आपके आसामी हैं। आपके विचार में यदि हम लोग अपराधी सुबूत हों, तो जो दण्ड आप देंगे उसे हम मंजूर करेंगे।''

रोहिणी को 'बाबू' कहते यह पहली बार ही सुना। मैंने पूछा, ''आप वापस कब लौट आईं?''

अभया बोली, ''परसों। वहाँ क्या हुआ, यह जानने का आपको निश्चय ही कुतूहल हो रहा है।'' यह कहकर उसने अपना दाहिना हाथ उघाड़कर दिखाया। बेंत के निशान चमड़े पर जगह-जगह उभड़ रहे थे। बोली, और बहुत-से ऐसे निशान भी हैं जिन्हें आपको दिखा नहीं सकती।''

जिन दृश्यों को देखकर मनुष्य का पुरुषत्व हिताहित का ज्ञान खो बैठता है, यह भी उन्हीं में से एक था। अभया ने मेरे स्तब्ध कठोर मुख की ओर देखकर पल-भर में ही सब कुछ समझ लिया और कुछ हँसकर कहा, ''किन्तु मेरे वापस लौट आने का यही एक कारण नहीं है श्रीकान्त बाबू, यह तो मेरे सतीधर्म का एक छोटा-सा पुरस्कार है। वे मेरे पति हैं और मैं उनकी विवाहिता स्त्री- यह इसी की जरा-सी बानगी है।''

क्षण-भर चुप रहकर उसने फिर कहना शुरू किया, ''मैंने स्त्री होकर पति की अनुमति के बगैर ही इतनी दूर आकर उनकी शान्ति भंग कर दी- स्त्री-जाति की इतनी बड़ी हिमाकत पुरुष-जाति बरदाश्त नहीं कर सकती। यह उसी का दण्ड है। अनेक तरह से भुलावा देकर वे मुझे अपने घर ले गये और वहाँ मुझसे कैफियत तलब की कि क्यों मैं रोहिणी के साथ यहाँ तक आई? मैंने कहा कि पति का घर होता है सो तो मैंने आज तक जाना नहीं। मेरे बाप है नहीं, माँ भी मर गयी- ऐसा कोई नहीं है जो मुझे वहाँ खाने-पीने को दे। तुम्हें बार-बार चिट्ठी लिखने पर भी जवाब नहीं पाया। उन्होंने एक बेंत उठाकर कहा, ''आज उसका जवाब देता हूँ।'' इतना कहकर अभया ने अपने उस चोट खाए हुए दाहिने हाथ को एक बार सहला लिया।

उस अत्यन्त हीन, अमानुष, बर्ब्बर के विरोध में मेरे सारे अन्त:करण में फिर हलचल मच गयी, किन्तु, जिस अन्ध-संस्कार के फलस्वरूप अभया मुझे देखते ही भागकर छिप गयी थी, वह संस्कार मेरे भी तो था! मैं भी तो उसकी सीमा के बाहर नहीं था! इसलिए मैं यह भी नहीं कह सका कि 'तुमने अच्छा किया।' साथ ही यह भी मुँह से न निकला कि 'अपराध किया है।' दूसरे के अत्यन्त संकट के समय जब अपने निज के विवेक और संस्कार के- स्वाधीन विचार और पराधीन ज्ञान के बीच संघर्ष छिड़ता है तब दूसरे को उपदेश देने जाने जैसी विडम्ब ना संसार में शायद ही कोई हो। कुछ देर चुप रहकर बोला, ''तुम्हारा वहाँ से चला आना अन्याय हुआ सो तो मैं नहीं कह सकता, किन्तु...''

अभया बोली, ''इस 'किन्तु' का विचार ही तो मैं आपके समीप चाहती हूँ, श्रीकान्त बाबू। वे अपनी बर्मी स्त्री को लेकर सुख से रहें, मुझे इसकी कोई शिकायत नहीं; किन्तु, मैं आपसे यह बात जानना चाहती हूँ कि पति जब एकमात्र बेंत के जोर से स्त्री के समस्त अधिकारों को छीन लेता है और उसे अंधेरी रात में अकेली घर के बाहर निकाल देता है, तब इसके बाद भी विवाह के वैदिक मन्त्रों के जोर से उस पर पत्नी के कर्तव्यों की जिम्मेदारी बनी रहती है या नहीं?''

किन्तु मैं चुपकी लगाए रहा। उसने मेरे मुँह पर दृष्टि ठहरा कर फिर कहा, ''यह तो खूब मोटी बात है कि जहाँ अधिकार नहीं वहाँ कर्तव्य भी नहीं। उन्होंने भी तो मेरे ही साथ उन्हीं मन्त्रों का उच्चारण किया था, किन्तु, वह एक निरर्थक बकवाद ही रहा जो उनकी प्रवृत्ति पर- उनकी इच्छा पर तो जरा-सी भी रोक नहीं लगा सका। मन्त्रों की वह अर्थहीन आवृत्ति मुँह से बाहर निकलने के साथ ही मिथ्या में मिल गयी- किन्तु, क्या वह सारा बन्धन-सारा उत्तरदायित्तव मैं स्त्री हूँ इसीलिए केवल मेरे ही ऊपर रह गया? श्रीकान्त बाबू, आप तो 'किन्तु' तक कह के ही रुक गये। अर्थात् मेरा वहाँ से चला आना अन्याय नहीं हुआ, किन्तु- इस 'किन्तु' का अर्थ क्या केवल यही है कि जिसके पति ने इतना बड़ा अपराध किया है उसकी स्त्री के नारी-जन्म की यही चरम सार्थकता है कि वह उसका प्रायश्चित करती हुई जीवन-भर जीती हुई भी मृतक के समान बनी रहे? एक दिन मेरे द्वारा जो विवाह के मन्त्र बुलवा लिये गये थे- उन्हीं का बुलवा लिया जाना ही क्या मेरे जीवन का एकमात्र सत्य है, बाकी सब-बिल्कु्ल ही मिथ्या है? इतना बड़ा अन्याय, इतना बड़ा निष्ठुर अत्याचार, मेरे पक्ष में कुछ भी- कुछ भी नहीं है और क्या मेरे पतित्व का कुछ भी अधिकार नहीं है, माता होने का अधिकार नहीं है; समाज, संसार, आनन्द, किसी पर भी मेरा कुछ अधिकार नहीं हैं? यदि कोई निर्दय, मिथ्यावादी बदचलन पति बिना अपराध के अपनी स्त्री को घर से निकाल दे, तो क्या इसीलिए उसका समस्त नारीत्व व्यर्थ, लँगड़ा, पंगु हो जाना चाहिए? क्या इसीलिए भगवान ने स्त्रियों को बनाकर पृथ्वी पर भेजा था? सभी जातियों में- सभी धर्मों में इस तरह के अन्याय का प्रति‍कार है- पर मैं हिन्दू के घर पैदा हुई हूँ, क्या इसीलिए मेरे लिए सब द्वार बन्द हो गये हैं श्रीकान्त बाबू?''

मुझे मौन देखकर अभया बोली, ''जवाब नहीं दिया श्रीकान्त बाबू?''

मैंने कहा, ''मेरे जवाब से क्या बनता-बिगड़ता है, मेरे मतामत के लिए तो आप राह देख नहीं रही थीं?''

अभया बोली, ''किन्तु इसके लिए तो समय नहीं था!''

मैंने कहा, ''सो हो सकता है। आप जब मुझे देखकर भाग गयीं तब मैं भी चला जा रहा था। किन्तु फिर लौट आया सो क्यों, आप जानती हैं?''

''नहीं।''

''लौट आने का कारण यह है कि आज मेरा मन बहुत ही उद्विग्न हो रहा है। आपसे भी अधिक निष्ठुर अत्याचार मैंने एक स्त्री पर होते हुए आज सुबह देखा है।'' यह कहकर जहाज-घाट की उस बर्मी स्त्री की सारी कथा मैंने विस्तार से कह सुनाई और पूछा, ''वह स्त्री अब क्या करे, आप बता सकती हैं?''

अभया सिहर उठी, इसके बाद गर्दन हिलाकर बोली, ''नहीं, मैं नहीं बता सकती।''

मैंने कहा, ''आज आपको और भी दो स्त्रियों का इतिहास सुनाता हूँ। एक तो मेरी अन्नदा जीजी का और दूसरा प्यारी बाई का। दु:ख के इतिहास में इनमें से किसी का भी स्थान आपसे नीचे नहीं है।''

 
Back
Top