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भाग - 4
मनुष्य के भीतर की वस्तु को पहिचान कर उसके न्याय-विचार का भार अन्तर्यामी भगवान के ऊपर न छोड़कर मनुष्य जब स्वयं उसे अपने ही ऊपर लेकर कहता है 'मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, यह कार्य मेरे द्वारा कदापि न होता, वह काम तो मैं मर जाने पर भी न करता', आदि- तब ये बातें सुनकर मुझे शर्म आए बिना नहीं रहती। और फिर केवल अपने मन के ही सम्बन्ध में नहीं, दूसरों के सम्बन्ध में भी, मैं देखता हूँ, कि मनुष्य के अहंकार का मानो अन्त ही नहीं, है। एक दफे समालोचकों के लेखों को पढ़कर देखे, बिना हँसे रहा ही नहीं जाता। कवि को अतिक्रम करके वे काव्य के मनुष्य को चीन्ह लेते हैं और जोर के साथ कहते हैं, ''यह चरित्र किसी तरह भी वैसा नहीं हो सकता- वह चरित्र कभी वैसा नहीं कर सकता,'' ऐसी और कितनी ही बातें हैं। लोग वाहवाही देकर कहते हैं, ''वाह इसी को तो कहते हैं क्रिटिसिजम! इसी को तो कहते हैं चरित्र-समालोचना! सच, ही तो कहा! अमुक समालोचक के होते हुए चाहे जो कुछ लिख देने से कैसे चल सकता है! देखो, पुस्तक में जो अंटसंट भूलें और भ्रान्तियाँ थीं की सभी किस तरह छान-बीनकर रख दी गयी है!'' सो रख देने दो। भूल भला किससे नहीं होती? किन्तु, फिर भी तो मैं अपने जीवन की आलोचना करके- यह सब पढ़कर, उन लोगों की लज्जा के मारे अपना सिर ऊपर नहीं उठा सकता। मन ही मन कहता हूँ, ''हाय रे दुर्भाग्य! यह जो कहा जाता है कि मनुष्य की अन्तर की वस्तु अनन्त है सो क्या केवल कहने- भर की बात है! दम्भ प्रकट करने के समय क्या इसकी कानी कौड़ी की भी कीमत नहीं है? तुम्हारे कोटि जन्मों के न जाने कितने असंख्य कोटि अद्भुत व्यापार इस अनन्त में मग्न रह सकते हैं और एकाएक जागरित होकर तुम्हारी बहुज्ञता, तुम्हारा पढ़ना-लिखना, तुम्हारी विद्वता, और तुम्हारे मनुष्य की जाँच करने के क्षुद्र ज्ञान-भण्डार को एक मुहूर्त में चूर्ण कर सकते हैं, यह बात क्या एक दफा भी तुम्हारे मन में नहीं आती- यह भी क्या तुम नहीं समझ सकते कि, यह सीमाहीन आत्मा का आसन है?''
यही तो मैंने अन्ना जीजी में अपनी ऑंखों देखा है। उनकी उज्ज्वल दिव्य मूर्ति इस समय तक भी तो नहीं भूली; जीजी जब चली गयी तब न जाने कितनी गम्भीर स्तब्ध रात्रियों में ऑंखों के पानी से मेरा तकिया भीग गया है, और मन ही मन मैंने कहा है कि जीजी, मुझे अपने लिए अब और कुछ सोच नहीं है, तुम्हारे पारस-मणि के स्पर्श से मेरे अन्तर-बाहिर का समस्त लोहा सोना हो गया है। अब कहीं किसी भी तरह की आबोहवा की दुष्टता से जंग लगकर उसके क्षय होने का डर नहीं है; परन्तु कहाँ गयी तुम जीजी? जीजी, और किसी को भी मैं अपने इस सौभाग्य का हिस्सा नहीं दे सका, और कोई भी तुम्हें नहीं देख पाया! अन्यथा तुम्हारा दर्शन पाकर प्रत्येक उपस्थित व्यक्ति सच्चरित्र साधु हो जाता, इसमें मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं है। यह किस तरह सम्भव हो सकता है, इस बात को लेकर मैं उस समय बच्चों की-सी कल्पनाओं में सारी रात जागकर बिता देता था। कभी मन में आता, कि देवी चौधुरानी के समान यदि कहीं से मैं सात घड़े मुहरें पा जाऊँ तो अन्नदा जीजी को एक बड़े भारी सिंहासन पर बैठा दूँ, जंगल काटकर, जगह साफ करके, देश के लोगों को बुलाऊँ और उन्हें उनके सिंहासन के चारों ओर बसा दूँ। कभी सोचता, एक बड़े भारी बजरे में उन्हें विराजमान करके बैंड बजाता हुआ उन्हें देश-विदेश में लिये फिरूँ। इसी तरह न जाने कितने विलक्षण आकाश-कुसुमों की मैं मालाएँ गूँथता रहता, इस समय उन्हें याद करके भी मुझे हँसी आती है। साथ ही ऑंखों से ऑंसू भी कुछ कम नहीं गिरते।
उस समय मेरे मन के भीतर यह विश्वास हिमाचल के समान दृढ़ होकर बैठ गया था कि मुझे मुग्ध कर सके ऐसी नारी इस लोक में तो निश्चय से नहीं, है-परन्तु परलोक में भी है या नहीं इसकी भी मानो मैं कल्पना नहीं कर सकता था। सोचता था कि जीवन में जब कभी किसी के मुँह से ऐसी कोमल बोली, होठों में ऐसी मधुर हँसी, ललाट पर ऐसा अलौकिक तेज, ऑंखों में ऐसी सजल करुण दृष्टि पाऊँगा, तभी मैं ऑंख उठाकर उसकी ओर देखूँगा! जिसे मैं अपना मन दूँगा वह भी मानो ऐसी ही सती साध्वीं होगी; उसके भी प्रत्येक कदम पर मानो ऐसी ही अनिवर्चनीय महिमा फूट उठेगी, इसी तरह वह भी मानो संसार का समस्त सुख-दुख, समस्त अच्छा-बुरा, समस्त धर्म-अधर्म त्याग करके ही मुझे ग्रहण कर सकेगी।
¹ स्व. बंकिमचन्द्र चट्टोपाधयाय के प्रसिद्ध उपन्यास 'देवी चौधुरानी' की मुख्य नायिका।
मैं वही तो हूँ! तो भी आज सुबह नींद खुलते ही किसी के मुँह की वाणी ने, किसी के होठों की हँसी ने, किसी के चक्षुओं के जलने, याद आकर, हृदय में थोड़ी-सी पीड़ा उत्पन्न कर दी। मेरी संन्यासिनी जीजी के साथ कहीं किसी भी अंश में उसका बिन्दु मात्र भी सादृश्य था? फिर भी ऐसा ही मालूम हुआ। छ:-सात रोज पहले अन्तर्यामी भगवान भी आकर यदि यह कहते तो, मैं हसकर उड़ा देता और कहता, ''अन्तर्यामी इस शुभ कामना के लिए तुम्हें हजारों धन्यवाद! किन्तु तुम अपना काम देखो, मेरी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मेरे हृदय की कसौटी पर असल सोना कसा जा चुका है, वहाँ अब पीतल की दुकान खोलने से खरीददार नहीं जुटेंगे।''
परन्तु फिर भी खरीददार जुट गया। मेरे अन्तर में जहाँ कि अन्नदा जीजी के आशीर्वाद से खरा सोना भरा पड़ा था, एक अभागा, पीतल का लोभ नहीं सँभाल सका और उसे खरीद बैठा- यह क्या कुछ कम अचरज की बात है!
मैं खूब समझता हूँ कि जो लोग कठोर आलोचक हैं वे मेरी आत्मकथा में इस स्थान पर अधीर होकर बोल उठेंगे, ''इतना फुलाकर- अतिरंजित करके आखिर, बाबू, तुम कहना क्या चाहते हो? अच्छी तरह स्पष्ट करके ही कह दो न कि वह कौन है? आज सोकर उठते ही प्यारी का मुँह याद करके तुम व्यथित हो उठे थे- यही न? जिसे मन के दरवाजे पर से ही झाड़ू मारकर बिदा कर देते थे आज उसे ही बुलाकर घर में बसाना चाहते हो- यही न? तो ठीक है। यदि यह सत्य है, तो इसके बीच में तुम अपनी अन्नदा जीजी का नाम मत लो। क्योंकि, तुम चाहे जितनी बातें, चाहे जिस तरह बना-सजाकर क्यों न कहो, हम लोग मानव-चरित्र खूब समझते हैं। हम यह जोर देकर कह सकते हैं कि सती-साध्वीा का आदर्श तुम्हारे मन के भीतर स्थायी नहीं हुआ, उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर तुम कभी नहीं ग्रहण कर सके। यदि कर सके होते तो इस मिथ्या में अपने को न भुला सकते।''
यह ठीक है। किन्तु अब और तर्क नहीं करूँगा। मैंने समझ लिया है कि मनुष्य अन्त तक किसी तरह भी अपना पूरा-पूरा परिचय नहीं पाता। वह जो नहीं है, वही अपने को समझ बैठता है और बाहर प्रचार करके केवल विडम्बना की सृष्टि करता है और जो दण्ड इसका भोगना पड़ता है, वह भी बिल्कुेल हलका नहीं होता। किन्तु रहने दो, मैं तो खुद जानता हूँ कि किस नारी के आदर्श पर इतने दिन क्या बात 'प्रीच' (उपदेश) करता फिरा हूँ। इसलिए, मेरी इस दुर्गति के इतिहास पर लोग जब कहेंगे कि श्रीकान्त 'हम्बग-हिप्पोक्रेट' है, तब चुपचाप मुझे सुन ही लेना पड़ेगा। फिर भी मैं 'हिप्पोक्रेट' नहीं था; 'हम्बग' करने का मेरा स्वभाव नहीं है। मेरा स्वभाव सिर्फ इतना ही है कि मुझमें जो दुर्बलता अपने आपको छुपाए हुई थी उसकी खबर मैंने नहीं रक्खी। आज जब वह, समय पाकर, सिर उठाकर खड़ी हो गयी और जब उसने अपने ही समान और भी एक दुर्बलता को सादर आह्नान करके एकबारगी अपने भीतर बिठा लिया, तब असह्य विस्म।य से मेरी ऑंखों में से ऑंसू गिर पड़े; किन्तु 'जा' कहकर उसे बिदा करते भी मुझसे नहीं बन पड़ा। यह भी मैं जानता हूँ कि आज लज्जा के मारे अपना मुँह छिपाने के लिए मेरे पास कोई स्थान नहीं है; किन्तु हृदय का कोना-कोना पुलक से आज परिपूर्ण हो उठा है! नुकसान जो होना हो सो हो, हृदय तो इसका त्याग करना नहीं चाहता!
''बाबू साहब!'' राजा का नौकर आ पहुँचा। शय्या पर मैं सीधा होकर बैठ गया। उसने आदरपूर्वक कहा, ''कुमार साहब तथा और भी बहुत से लोग आपकी गत रात्रि की कहानी सुनने के लिए आपके आने की राह देख रहे हैं।''
मैंने पूछा, ''उन्हें मालूम कैसे हुआ?'' बैरा बोला, ''तम्बू के दरबान ने बतलाया है कि आप रात के अन्त में वापिस लौट आए हैं।''
हाथ-मुँह धो कपड़े बदल, जैसे ही मैं बड़े तम्बू के अन्दर गया कि सब लोगों ने एक साथ शोर मचा दिया। एक ही साथ मानो एक लाख प्रश्न हो गये। मैंने देखा कि कल के वे वृद्ध महाशय भी वहाँ हैं और एक तरफ प्यारी भी अपने दल-बल को लेकर चुपचाप बैठी है। रोज के समान आज उससे चार ऑंखें नहीं हुईं। मानो वह जान-बूझकर ही और किसी तरफ ऑंखें फिराए बैठी थी।
आकुल सवालों की लहर के शान्त होते ही मैंने जवाब देना शुरू किया। कुमारजी बोले, ''धन्य है तुम्हारा साहस, श्रीकान्त। कितनी रात को वहाँ पहुँचे थे?''
''बारह और एक के बीच।''
वृद्ध महाशय बोले, ''घोर अमावस्या! साढ़े ग्यारह बजे के बाद अमावस पड़ी थी।''
चारों तरफ से अचरज सूचक ध्ववनि उठकर क्रमश: शान्त होते ही कुमारजी ने फिर प्रश्न किया, ''उसके बाद क्या देखा?''
मैं बोला, ''दूर तक फैले हुए हाड़-पिंजर और खोपड़ियाँ।''
कुमारजी बोले, ''उफ, कैसा भयंकर साहस है! श्मशान के भीतर गये थे या बाहर खड़े रहे थे?''
मैं बोला, ''भीतर जाकर एक बालू के ढूह पर जाकर बैठ गया था।''
''उसके बाद- उसके बाद? बैठकर क्या देखा?''
''बालू के टीले साँय-साँय कर रहे हैं।''
''और?''
''काँस के झुरमुट और सेमर के वृक्ष।''
''और?''
''नदी का पानी।''
कुमारजी अधीर होकर बोले, ''यह सब तो जानता हूँ जी! पूछता हूँ कि वह सब कुछ...''
मैं हँस पड़ा और बोला, ''और दो-एक बड़े चमगीदड़ सिर के ऊपर से उड़कर जाते हुए देखे थे।''
वृद्ध महाशय ने स्वयं उस समय आगे बढ़कर पूछा, ''और कुछ नहीं देखा?'' मैं बोला, ''नहीं।''
उत्तर सुनकर तम्बू-भर के आदमी मानो निराश हो गये। उस समय वृद्ध महाशय एकाएक क्रूद्ध हो उठे, ''ऐसा कभी हो नहीं सकता। आप गये ही नहीं।'' उनके गुस्से को देखकर मैंने सिर्फ हँस दिया। क्योंकि बात ही गुस्से होने की थी। कुमारजी मेरा हाथ दबाकर मिन्नत भरे स्वर से बोले, ''तुम्हें कसम है श्रीकान्त, क्या-क्या देखा, सच-सच कह दो?''
''सच ही कहता हूँ, कुछ नहीं देखा।''
''कितनी देर ठहरे वहाँ पर?''
''तीनेक घण्टे।''
''अच्छा, देखा नहीं, कुछ सुना भी नहीं?''
''सुना।''
क्षण-भर में ही सबका मुँह उत्साह से प्रदीप्त हो उठा। क्या सुना, उसे सुनने के लिए लोग कुछ और भी आगे सरक आए। तब मैंने कहना शुरू किया कि किस तरह रास्ते के ऊपर एक रात्रि-चर पक्षी 'बाप' कहकर उड़ गया, किस तरह बच्चे की सी आवाज में एक पक्षी के बच्चे ने सेमर के वृक्ष पर रिरिया-रिरिया कर रोना शुरू कर दिया, किस तरह एकाएक ऑंधी उठी और मृत मनुष्यों की खोपड़ियाँ दीर्घ श्वास छोड़ने लगीं और सबके अन्त में किस तरह मानो कोई मेरे पीछे खड़ा होकर लगातार बरफ सरीखी ठण्डी साँस दाहिने कान पर छोड़ने लगा। मेरा कथन समाप्त हो गया किन्तु देर तक किसी के मुँह से एक भी शब्द बाहर न निकला। सारा तम्बू मानो सन्न हो रहा। अन्त में वह वृद्ध व्यक्ति एक लम्बी उसास छोड़कर मेरे कन्धों पर एक हाथ रखकर, धीरे-धीरे बोला, ''बाबूजी, आप सचमुच ही ब्राह्मण के बच्चे हैं, इसीलिए कल अपनी जान लिये लौट आए। नहीं तो और कोई जिन्दा नहीं लौट सकता था। किन्तु, आज से इस बुङ्ढे की कसम है बाबूजी, फिर कभी ऐसा दु:साहस न कीजिएगा। आपके माँ-बाप के चरणों में मेरे कोटि-कोटि प्रणाम- केवल उन्हीं के पुण्य-प्रताप से आप बच गये हैं।'' इतना कहकर उसने झोंक में आकर चट से मेरे पैर छू लिये।
पहले कह चुका हूँ कि यह मनुष्य बात कहना खूब जानता था। इस दफा उसने बात कहना शुरू किया! ऑंखों की पुतलियाँ और भौहें, कभी सिकोड़कर और कभी फैलाकर, कभी बुझाकर और कभी प्रज्ज्वलित करके उसने पक्षी के रोने से शुरू करके कान पर ठण्डी उसास के छोड़ने पर्यन्त की ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म व्याख्या जुटाई कि दिन के समय, इतने लोगों के बीच बैठे हुए भी मेरे सिर के बाल तक काँटों की तरह खड़े हो गये। कल सुबह की तरह आज भी प्यारी गुप-चुप कब सरक कर समीप आ बैठी, इस पर मेरा ध्याहन ही नहीं गया। एकाएक एक उसास के शब्द से गर्दन घुमाकर मैंने देखा कि वह ठीक मेरी पीठ के पीछे बैठी हुई निर्निमेष दृष्टि से बोलने वाले के मुँह की ओर देख रही है और उसके दोनों चिकने उजले गालों पर झड़े हुए अश्रुओं की दो धाराएँ सूखकर फूट उठी हैं। कब और किसलिए वह ऑंखों का जल बह निकला था, शायद वह बिल्कुमल ही जान नहीं सकी; नहीं तो उन्हें पोंछ डालती। किन्तु, उसी अश्रु-कलुषित तल्लीन मुख का पल-भर का दृष्टिपात ही मेरे हृदय में एक अग्नि की रेखा अंकित कर गया। बात समाप्त होते ही वह उठकर खड़ी हो गयी और कुमारजी को सलाम करके, अनुमति माँगकर, धीरे-धीरे बाहर चली गयी।
आज सुबह ही मेरे बिदा होने की बात थी। परन्तु, शरीर स्वस्थ नहीं था, इसलिए कुमारजी का अनुरोध स्वीकार करके मैं उस समय, जाना स्थगित करके, अपने तम्बू में वापस लौट आया। इतने दिनों के बाद आज प्यारी के आचरण में पहले-पहल मैंने दूसरा भाव देखा। इतने दिन उसने परिहास किया है, व्यंग किया है, और कलह का आभास तक भी उसके दोनों नेत्रों की दृष्टि में कुछ दिन घनीभूत हो गया है- यह सब मैंने अनुभव किया है। परन्तु, इस तरह की उदासीनता पहले कभी नहीं देखी। फिर भी, व्यथित होने के बदले मैं खुश ही हुआ। क्यों, सो जानता हूँ। यद्यपि युवती स्त्रियों के मन की गतिविधि को लेकर माथापच्ची करना मेरा पेशा नहीं है, और न इसके पहले यह काम मैंने कभी किया ही है, पर मेरे मन के भीतर जो बहुत जन्मों की अखण्ड धारावाहिकता छिपी हुई मौजूद है, उसके बहुदर्शन की अभिज्ञता से रमणी-हृदय का गूढ तात्पर्य स्पष्ट प्रतिभासित हो उठा। वह उसे अपना अपमान समझकर क्षुब्ध नहीं हुआ वरन् उसे प्रणय अभिमान समझकर पुलकित हो उठा। शायद, इसी छिपी हुई धारावाहिकता के गुप्त इशारे से मैंने अपनी श्मशान यात्रा के लिए यहाँ तक के इतिहास में, इस बात का उल्लेख तक नहीं किया कि कल-रात को मुझे श्मशान से लौटा लाने के लिए आदमी भेजे थे और वह स्वयं भी बात पूरी होते ही उसी तरह गुप-चुप बाहर चली गयी थी। इसीलिए है यह अभिमान! कल रात को लौटकर उसे मुलाकात करके मैंने यह नहीं कहा कि वहाँ क्या हुआ था। उससे जिस बात को अकेले बैठकर सुनने का सबसे पहले अधिकार था उसी को आज वह सबसे पीछे बैठकर मानो दैवात् ही सुन सकी है। परन्तु, अभिमान भी इतना मीठा होता है! जीवन में उसके स्वाद को उस दिन सबसे पहले उपलब्ध करके मैं बच्चे की तरह एकान्त में बैठ गया और लगातार चख-चखकर उसका उपभोग करने लगा।
आज दोपहर को मैं सो जाना चाहता था। बिस्तर पर लेटे-लेटे बीच-बीच में तन्द्रा भी आने लगी; परन्तु रतन के आने की आशा बार-बार हिला-हिलाकर उसे तोड़ देने लगी। इस तरह समय तो निकल गया परन्तु रतन नहीं आया! वह आएगा अवश्य, यह विश्वास मेरे दिल में ऐसा दृढ़ हो रहा था कि, जब बिस्तर छोड़कर बाहर आकर मैंने देखा कि सूर्य पश्चिम की ओर ढल पड़ा है, तब मुझे मन ही मन यह निश्चय हो गया कि जब मैं तन्द्रा में पड़ा हुआ था तब रतन, मेरे यहाँ आया है और मुझे निद्रित समझकर लौट गया है। मूर्ख! एक दफे पुकार ही लेता तो क्या हो जाता! दोपहर का निर्जन समय यों ही निरर्थक चला गया, यह सोचकर मैं क्रुद्ध हो उठा; परन्तु संध्या के बाद वह फिर आएगा और एक छोटा-सा अनुरोध- नहीं तो लिखा हुआ एक पुर्जा- जो कुछ भी हो, गुप-चुप हाथ में थमा जायेगा; इसमें मुझे जरा भी संशय नहीं था; किन्तु यह समय कटे किस तरह? सामने की ओर देखते ही कुछ दूर पर विशाल जल-राशि एकदम मेरी ऑंखों के ऊपर झक्-झक् कर उठी। वह किसी विस्मृत जमींदार का विशाल यश था। वह तालाब करीब आधा कोस विस्तृत था। उत्तर की ओर से वह खिसक कर पुर गया था और घने जंगल से ढँक गया था। गाँव के बाहर होने के कारण गाँव की स्त्रियाँ उसके जल का उपयोग नहीं कर पाती थीं। बातों ही बातों में सुना था कि यह तालाब कितना पुराना है और किसने बनवाया था, इसका पता किसी को नहीं है। एक पुराना टूटा घाट था, उसी के एकान्त कोने में जाकर मैं बैठ गया। एक समय इसके चारों ओर बढ़ता हुआ गाँव था जो न जाने कब हैजे और महामारी के प्रकोप से ऊजाड़ होकर, फिर अपने वर्तमान स्थान में, सरक आया है। छोड़े हुए मकानों के बहुत-से निशान चारों ओर विद्यमान हैं। डूबते हुए सूर्य की तिरछी किरणों की छटने धीरे-धीरे झुककर तालाब के काले पानी में सोना मथ दिया, मैं एकटक होकर देखता रहा।
इसके बाद धीरे-धीरे सूर्य डूब गया। तालाब का काला पानी और भी काला हो गया। पास के ही जंगल में से दो-एक प्यासे सियार बाहर निकल कर डरते-डरते पानी पीकर चले गये। वहाँ से मेरे उठने का समय हो गया है- जिस समय को काटने के लिए मैं वहाँ गया था वह कट गया है, यह सब अनुभव करके भी मैं वहाँ से उठ न सका- मानों उस टूटे घाट ने मुझे जबरन बिठा रखा!
खयाल आया कि जहाँ पैर रखकर मैं बैठा हुआ हूँ वहीं पर पैर रखकर न जाने कितने आदमी कितनी दफा आए हैं, गये हैं। इसी घाट पर वे स्नान करते, मुँह धोते, कपड़े छाँटते और जल भरते थे। इस समय वे कहाँ के किस जलाशय में ये समस्त नित्य-कर्म पूर्ण करते होंगे? यह गाँव जब जीवित था तब निश्चय से वे लोग इस समय यहाँ आकर बैठते थे। कितने ही गान गाकर और कितनी ही बातें करके दिन-भर की थकावट दूर करते थे। इसके बाद अकस्मात् एक दिन जब महाकाल महामारी का रूप धारण करके सारे गाँव को नोच ले गया तब न जाने कितने मरणोन्मुख व्यक्ति प्यास के मारे यहाँ दौड़े आए हैं और इसी घाट के ऊपर अपना अन्तिम श्वास छोड़कर उसके साथ चले गये हैं। शायद उनकी पिपासातुर आत्मा आज भी यहीं पर चक्कर काटती फिरती होगी। यह भी कौन जोर देकर कह सकता है कि जो ऑंखों से नहीं दिखाई देता वह है ही नहीं? आज सुबह ही उस वृद्ध ने कहा था, ''बाबूजी, मन में यह कभी मत सोचना कि मृत्यु के उपरान्त कुछ शेष नहीं रहता- असहाय प्रेतात्माएँ हमारे ही समान सुख-दु:ख, क्षुधा-तृषा लेकर विचरण नहीं करतीं।'' इतना कहकर उसने वीर विक्रमाजीत की कथा, और न जाने कितनी ही तान्त्रिक साधु-सन्यासियों की कहानियाँ विस्तार से कह सुनाई थीं। और कहा था कि ''यह भी मत सोचना कि समय और सुयोग मिलने पर वे दिखाई नहीं देती हैं या बात नहीं कर सकती हैं, अथवा नहीं करती हैं। तुम्हें उस स्थान पर और कभी जाने के लिए मैं नहीं कहता, परन्तु जो लोग यह काम कर सकते हैं उनके समस्त दु:ख किसी भी दिन सार्थक नहीं होते, इस बात पर स्वप्न में भी कभी अविश्वास मत करना।''
उस समय, सुबह के प्रकाश में, जिन कहानियों ने केवल निरर्थक हँसी का उपादान जुटा दिया था, इस समय वे ही कहानियाँ निर्जन गहरे अन्धकार के बीच कुछ दूसरे ही किस्म के चेहरे धारण करके दिखाई दीं। मन में आने लगा कि जगत में प्रत्यक्ष सत्य यदि कोई वस्तु है तो वह मृत्यु ही है। भली-बुरी सुख-दु:ख की ये जीवनव्यापी अवस्थाएँ मानो आतिशबाजी हैं, जो तरह-तरह के साज-सरंजाम के समान केवल किसी एक विशेष, दिन जलकर राख हो जाने के लिए ही इतने यत्न और कौशल्य के साथ बनकर तैयार हुई हैं। तब मृत्यु के उस पार का इतिहास यदि किसी तरह सुन लिया जा सके तो उसकी अपेक्षा बड़ा लाभ और क्या है? फिर उसे कोई भी कहे और कैसे भी कहे।
हठात् किसी के पैरों के शब्द से मेरा ध्यातन भंग हो गया। पलटकर देखा, केवल अन्धकार है, कहीं कोई नहीं है। मैं बदन झाड़कर उठ खड़ा हुआ। गत रात्रि की बात याद करके मन ही मन हँसकर बोला, नहीं, अब और यहाँ नहीं बैठ रहना चाहिए। कल दाहिने कान के ऊपर उसासा छोड़ गया था, आज आकर यदि बाएँ कान पर छोड़ना शुरू कर दे, तो यह कुछ अधिक सहज न होगा।
वहाँ बैठे-बैठे कितनी देर हो गयी और अब कितनी रात है, यह मैं ठीक तौर से निश्चित नहीं कर सका। मालूम होता है कि आधी रात के आस-पास का समय होगा। परन्तु अरे यह क्या? चला जा रहा हूँ तो चला ही जा रहा हूँ, उस सँकरी पगडण्डी का जैसे अन्त ही नहीं होना चाहता! इतने बहुत से तम्बुओं में से एक दीपक का भी प्रकाश नजर नहीं आता! बहुत देर से सामने एक बाँस का वृक्ष नजर रोके खड़ा था; एकाएक खयाल आया कि इसे तो आते समय देखा नहीं था! दिशा भूलकर, कहीं और किसी ओर तो नहीं चल दिया हूँ? कुछ और चलने पर मालूम हुआ कि वह बाँस का वृक्ष नहीं है, किन्तु, कुछ इमली के पेड़, एक दूसरे से सटे हुए, दिशाओं को ढके जमात बाँधकर खड़े हैं और उन्हीं के नीचे से रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा होकर अदृश्य हो गया है। स्थान इतना अन्धकारपूर्ण है कि अपना हाथ भी अपने को नहीं दिखाई देता। छाती धड़धड़ाने लगी। अरे मैं जा कहाँ रहा हूँ? ऑंख-कान बन्द करके किसी तरह उन इमली के वृक्षों के पार जाकर देखता हूँ कि सामने अनन्त काला आकाश, जितनी दूर नजर जाती है उतनी दूर तक, विस्तृत हो रहा है। किन्तु सामने वह ऊँची-सी जगह क्या है? नदी के किनारे का सरकारी बाँध तो नहीं है? दोनों पैर मानो टूटने से लगे, फिर भी उन्हें किसी तरह घसीटकर मैं उसके ऊपर चढ़ गया। जो सोचा था ठीक वही हुआ। उसके ठीक नीचे ही वह महाश्मशान था! फिर किसी के कदमों का शब्द सामने से होकर नीचे श्मशान में जाकर विलीन हो गया। इस बार मैं किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चला और उसी धूल-रेती के ऊपर बेहोश की तरह धप्प् से बैठ गया। अब मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं रहा कि कोई मुझे एक महाश्मशान से लेकर दूसरे महाश्मशान तक रास्ता दिखाता हुआ पहुँचा गया। जिसके पद-शब्द सुनकर, उस फूटे घाट पर, शरीर झाड़कर मैं उठ खड़ा हुआ था उसी के पद-शब्द, इतनी देर बाद, उस तरफ, सामने की ओर, विलीन हो गये।
मनुष्य के भीतर की वस्तु को पहिचान कर उसके न्याय-विचार का भार अन्तर्यामी भगवान के ऊपर न छोड़कर मनुष्य जब स्वयं उसे अपने ही ऊपर लेकर कहता है 'मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, यह कार्य मेरे द्वारा कदापि न होता, वह काम तो मैं मर जाने पर भी न करता', आदि- तब ये बातें सुनकर मुझे शर्म आए बिना नहीं रहती। और फिर केवल अपने मन के ही सम्बन्ध में नहीं, दूसरों के सम्बन्ध में भी, मैं देखता हूँ, कि मनुष्य के अहंकार का मानो अन्त ही नहीं, है। एक दफे समालोचकों के लेखों को पढ़कर देखे, बिना हँसे रहा ही नहीं जाता। कवि को अतिक्रम करके वे काव्य के मनुष्य को चीन्ह लेते हैं और जोर के साथ कहते हैं, ''यह चरित्र किसी तरह भी वैसा नहीं हो सकता- वह चरित्र कभी वैसा नहीं कर सकता,'' ऐसी और कितनी ही बातें हैं। लोग वाहवाही देकर कहते हैं, ''वाह इसी को तो कहते हैं क्रिटिसिजम! इसी को तो कहते हैं चरित्र-समालोचना! सच, ही तो कहा! अमुक समालोचक के होते हुए चाहे जो कुछ लिख देने से कैसे चल सकता है! देखो, पुस्तक में जो अंटसंट भूलें और भ्रान्तियाँ थीं की सभी किस तरह छान-बीनकर रख दी गयी है!'' सो रख देने दो। भूल भला किससे नहीं होती? किन्तु, फिर भी तो मैं अपने जीवन की आलोचना करके- यह सब पढ़कर, उन लोगों की लज्जा के मारे अपना सिर ऊपर नहीं उठा सकता। मन ही मन कहता हूँ, ''हाय रे दुर्भाग्य! यह जो कहा जाता है कि मनुष्य की अन्तर की वस्तु अनन्त है सो क्या केवल कहने- भर की बात है! दम्भ प्रकट करने के समय क्या इसकी कानी कौड़ी की भी कीमत नहीं है? तुम्हारे कोटि जन्मों के न जाने कितने असंख्य कोटि अद्भुत व्यापार इस अनन्त में मग्न रह सकते हैं और एकाएक जागरित होकर तुम्हारी बहुज्ञता, तुम्हारा पढ़ना-लिखना, तुम्हारी विद्वता, और तुम्हारे मनुष्य की जाँच करने के क्षुद्र ज्ञान-भण्डार को एक मुहूर्त में चूर्ण कर सकते हैं, यह बात क्या एक दफा भी तुम्हारे मन में नहीं आती- यह भी क्या तुम नहीं समझ सकते कि, यह सीमाहीन आत्मा का आसन है?''
यही तो मैंने अन्ना जीजी में अपनी ऑंखों देखा है। उनकी उज्ज्वल दिव्य मूर्ति इस समय तक भी तो नहीं भूली; जीजी जब चली गयी तब न जाने कितनी गम्भीर स्तब्ध रात्रियों में ऑंखों के पानी से मेरा तकिया भीग गया है, और मन ही मन मैंने कहा है कि जीजी, मुझे अपने लिए अब और कुछ सोच नहीं है, तुम्हारे पारस-मणि के स्पर्श से मेरे अन्तर-बाहिर का समस्त लोहा सोना हो गया है। अब कहीं किसी भी तरह की आबोहवा की दुष्टता से जंग लगकर उसके क्षय होने का डर नहीं है; परन्तु कहाँ गयी तुम जीजी? जीजी, और किसी को भी मैं अपने इस सौभाग्य का हिस्सा नहीं दे सका, और कोई भी तुम्हें नहीं देख पाया! अन्यथा तुम्हारा दर्शन पाकर प्रत्येक उपस्थित व्यक्ति सच्चरित्र साधु हो जाता, इसमें मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं है। यह किस तरह सम्भव हो सकता है, इस बात को लेकर मैं उस समय बच्चों की-सी कल्पनाओं में सारी रात जागकर बिता देता था। कभी मन में आता, कि देवी चौधुरानी के समान यदि कहीं से मैं सात घड़े मुहरें पा जाऊँ तो अन्नदा जीजी को एक बड़े भारी सिंहासन पर बैठा दूँ, जंगल काटकर, जगह साफ करके, देश के लोगों को बुलाऊँ और उन्हें उनके सिंहासन के चारों ओर बसा दूँ। कभी सोचता, एक बड़े भारी बजरे में उन्हें विराजमान करके बैंड बजाता हुआ उन्हें देश-विदेश में लिये फिरूँ। इसी तरह न जाने कितने विलक्षण आकाश-कुसुमों की मैं मालाएँ गूँथता रहता, इस समय उन्हें याद करके भी मुझे हँसी आती है। साथ ही ऑंखों से ऑंसू भी कुछ कम नहीं गिरते।
उस समय मेरे मन के भीतर यह विश्वास हिमाचल के समान दृढ़ होकर बैठ गया था कि मुझे मुग्ध कर सके ऐसी नारी इस लोक में तो निश्चय से नहीं, है-परन्तु परलोक में भी है या नहीं इसकी भी मानो मैं कल्पना नहीं कर सकता था। सोचता था कि जीवन में जब कभी किसी के मुँह से ऐसी कोमल बोली, होठों में ऐसी मधुर हँसी, ललाट पर ऐसा अलौकिक तेज, ऑंखों में ऐसी सजल करुण दृष्टि पाऊँगा, तभी मैं ऑंख उठाकर उसकी ओर देखूँगा! जिसे मैं अपना मन दूँगा वह भी मानो ऐसी ही सती साध्वीं होगी; उसके भी प्रत्येक कदम पर मानो ऐसी ही अनिवर्चनीय महिमा फूट उठेगी, इसी तरह वह भी मानो संसार का समस्त सुख-दुख, समस्त अच्छा-बुरा, समस्त धर्म-अधर्म त्याग करके ही मुझे ग्रहण कर सकेगी।
¹ स्व. बंकिमचन्द्र चट्टोपाधयाय के प्रसिद्ध उपन्यास 'देवी चौधुरानी' की मुख्य नायिका।
मैं वही तो हूँ! तो भी आज सुबह नींद खुलते ही किसी के मुँह की वाणी ने, किसी के होठों की हँसी ने, किसी के चक्षुओं के जलने, याद आकर, हृदय में थोड़ी-सी पीड़ा उत्पन्न कर दी। मेरी संन्यासिनी जीजी के साथ कहीं किसी भी अंश में उसका बिन्दु मात्र भी सादृश्य था? फिर भी ऐसा ही मालूम हुआ। छ:-सात रोज पहले अन्तर्यामी भगवान भी आकर यदि यह कहते तो, मैं हसकर उड़ा देता और कहता, ''अन्तर्यामी इस शुभ कामना के लिए तुम्हें हजारों धन्यवाद! किन्तु तुम अपना काम देखो, मेरी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मेरे हृदय की कसौटी पर असल सोना कसा जा चुका है, वहाँ अब पीतल की दुकान खोलने से खरीददार नहीं जुटेंगे।''
परन्तु फिर भी खरीददार जुट गया। मेरे अन्तर में जहाँ कि अन्नदा जीजी के आशीर्वाद से खरा सोना भरा पड़ा था, एक अभागा, पीतल का लोभ नहीं सँभाल सका और उसे खरीद बैठा- यह क्या कुछ कम अचरज की बात है!
मैं खूब समझता हूँ कि जो लोग कठोर आलोचक हैं वे मेरी आत्मकथा में इस स्थान पर अधीर होकर बोल उठेंगे, ''इतना फुलाकर- अतिरंजित करके आखिर, बाबू, तुम कहना क्या चाहते हो? अच्छी तरह स्पष्ट करके ही कह दो न कि वह कौन है? आज सोकर उठते ही प्यारी का मुँह याद करके तुम व्यथित हो उठे थे- यही न? जिसे मन के दरवाजे पर से ही झाड़ू मारकर बिदा कर देते थे आज उसे ही बुलाकर घर में बसाना चाहते हो- यही न? तो ठीक है। यदि यह सत्य है, तो इसके बीच में तुम अपनी अन्नदा जीजी का नाम मत लो। क्योंकि, तुम चाहे जितनी बातें, चाहे जिस तरह बना-सजाकर क्यों न कहो, हम लोग मानव-चरित्र खूब समझते हैं। हम यह जोर देकर कह सकते हैं कि सती-साध्वीा का आदर्श तुम्हारे मन के भीतर स्थायी नहीं हुआ, उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर तुम कभी नहीं ग्रहण कर सके। यदि कर सके होते तो इस मिथ्या में अपने को न भुला सकते।''
यह ठीक है। किन्तु अब और तर्क नहीं करूँगा। मैंने समझ लिया है कि मनुष्य अन्त तक किसी तरह भी अपना पूरा-पूरा परिचय नहीं पाता। वह जो नहीं है, वही अपने को समझ बैठता है और बाहर प्रचार करके केवल विडम्बना की सृष्टि करता है और जो दण्ड इसका भोगना पड़ता है, वह भी बिल्कुेल हलका नहीं होता। किन्तु रहने दो, मैं तो खुद जानता हूँ कि किस नारी के आदर्श पर इतने दिन क्या बात 'प्रीच' (उपदेश) करता फिरा हूँ। इसलिए, मेरी इस दुर्गति के इतिहास पर लोग जब कहेंगे कि श्रीकान्त 'हम्बग-हिप्पोक्रेट' है, तब चुपचाप मुझे सुन ही लेना पड़ेगा। फिर भी मैं 'हिप्पोक्रेट' नहीं था; 'हम्बग' करने का मेरा स्वभाव नहीं है। मेरा स्वभाव सिर्फ इतना ही है कि मुझमें जो दुर्बलता अपने आपको छुपाए हुई थी उसकी खबर मैंने नहीं रक्खी। आज जब वह, समय पाकर, सिर उठाकर खड़ी हो गयी और जब उसने अपने ही समान और भी एक दुर्बलता को सादर आह्नान करके एकबारगी अपने भीतर बिठा लिया, तब असह्य विस्म।य से मेरी ऑंखों में से ऑंसू गिर पड़े; किन्तु 'जा' कहकर उसे बिदा करते भी मुझसे नहीं बन पड़ा। यह भी मैं जानता हूँ कि आज लज्जा के मारे अपना मुँह छिपाने के लिए मेरे पास कोई स्थान नहीं है; किन्तु हृदय का कोना-कोना पुलक से आज परिपूर्ण हो उठा है! नुकसान जो होना हो सो हो, हृदय तो इसका त्याग करना नहीं चाहता!
''बाबू साहब!'' राजा का नौकर आ पहुँचा। शय्या पर मैं सीधा होकर बैठ गया। उसने आदरपूर्वक कहा, ''कुमार साहब तथा और भी बहुत से लोग आपकी गत रात्रि की कहानी सुनने के लिए आपके आने की राह देख रहे हैं।''
मैंने पूछा, ''उन्हें मालूम कैसे हुआ?'' बैरा बोला, ''तम्बू के दरबान ने बतलाया है कि आप रात के अन्त में वापिस लौट आए हैं।''
हाथ-मुँह धो कपड़े बदल, जैसे ही मैं बड़े तम्बू के अन्दर गया कि सब लोगों ने एक साथ शोर मचा दिया। एक ही साथ मानो एक लाख प्रश्न हो गये। मैंने देखा कि कल के वे वृद्ध महाशय भी वहाँ हैं और एक तरफ प्यारी भी अपने दल-बल को लेकर चुपचाप बैठी है। रोज के समान आज उससे चार ऑंखें नहीं हुईं। मानो वह जान-बूझकर ही और किसी तरफ ऑंखें फिराए बैठी थी।
आकुल सवालों की लहर के शान्त होते ही मैंने जवाब देना शुरू किया। कुमारजी बोले, ''धन्य है तुम्हारा साहस, श्रीकान्त। कितनी रात को वहाँ पहुँचे थे?''
''बारह और एक के बीच।''
वृद्ध महाशय बोले, ''घोर अमावस्या! साढ़े ग्यारह बजे के बाद अमावस पड़ी थी।''
चारों तरफ से अचरज सूचक ध्ववनि उठकर क्रमश: शान्त होते ही कुमारजी ने फिर प्रश्न किया, ''उसके बाद क्या देखा?''
मैं बोला, ''दूर तक फैले हुए हाड़-पिंजर और खोपड़ियाँ।''
कुमारजी बोले, ''उफ, कैसा भयंकर साहस है! श्मशान के भीतर गये थे या बाहर खड़े रहे थे?''
मैं बोला, ''भीतर जाकर एक बालू के ढूह पर जाकर बैठ गया था।''
''उसके बाद- उसके बाद? बैठकर क्या देखा?''
''बालू के टीले साँय-साँय कर रहे हैं।''
''और?''
''काँस के झुरमुट और सेमर के वृक्ष।''
''और?''
''नदी का पानी।''
कुमारजी अधीर होकर बोले, ''यह सब तो जानता हूँ जी! पूछता हूँ कि वह सब कुछ...''
मैं हँस पड़ा और बोला, ''और दो-एक बड़े चमगीदड़ सिर के ऊपर से उड़कर जाते हुए देखे थे।''
वृद्ध महाशय ने स्वयं उस समय आगे बढ़कर पूछा, ''और कुछ नहीं देखा?'' मैं बोला, ''नहीं।''
उत्तर सुनकर तम्बू-भर के आदमी मानो निराश हो गये। उस समय वृद्ध महाशय एकाएक क्रूद्ध हो उठे, ''ऐसा कभी हो नहीं सकता। आप गये ही नहीं।'' उनके गुस्से को देखकर मैंने सिर्फ हँस दिया। क्योंकि बात ही गुस्से होने की थी। कुमारजी मेरा हाथ दबाकर मिन्नत भरे स्वर से बोले, ''तुम्हें कसम है श्रीकान्त, क्या-क्या देखा, सच-सच कह दो?''
''सच ही कहता हूँ, कुछ नहीं देखा।''
''कितनी देर ठहरे वहाँ पर?''
''तीनेक घण्टे।''
''अच्छा, देखा नहीं, कुछ सुना भी नहीं?''
''सुना।''
क्षण-भर में ही सबका मुँह उत्साह से प्रदीप्त हो उठा। क्या सुना, उसे सुनने के लिए लोग कुछ और भी आगे सरक आए। तब मैंने कहना शुरू किया कि किस तरह रास्ते के ऊपर एक रात्रि-चर पक्षी 'बाप' कहकर उड़ गया, किस तरह बच्चे की सी आवाज में एक पक्षी के बच्चे ने सेमर के वृक्ष पर रिरिया-रिरिया कर रोना शुरू कर दिया, किस तरह एकाएक ऑंधी उठी और मृत मनुष्यों की खोपड़ियाँ दीर्घ श्वास छोड़ने लगीं और सबके अन्त में किस तरह मानो कोई मेरे पीछे खड़ा होकर लगातार बरफ सरीखी ठण्डी साँस दाहिने कान पर छोड़ने लगा। मेरा कथन समाप्त हो गया किन्तु देर तक किसी के मुँह से एक भी शब्द बाहर न निकला। सारा तम्बू मानो सन्न हो रहा। अन्त में वह वृद्ध व्यक्ति एक लम्बी उसास छोड़कर मेरे कन्धों पर एक हाथ रखकर, धीरे-धीरे बोला, ''बाबूजी, आप सचमुच ही ब्राह्मण के बच्चे हैं, इसीलिए कल अपनी जान लिये लौट आए। नहीं तो और कोई जिन्दा नहीं लौट सकता था। किन्तु, आज से इस बुङ्ढे की कसम है बाबूजी, फिर कभी ऐसा दु:साहस न कीजिएगा। आपके माँ-बाप के चरणों में मेरे कोटि-कोटि प्रणाम- केवल उन्हीं के पुण्य-प्रताप से आप बच गये हैं।'' इतना कहकर उसने झोंक में आकर चट से मेरे पैर छू लिये।
पहले कह चुका हूँ कि यह मनुष्य बात कहना खूब जानता था। इस दफा उसने बात कहना शुरू किया! ऑंखों की पुतलियाँ और भौहें, कभी सिकोड़कर और कभी फैलाकर, कभी बुझाकर और कभी प्रज्ज्वलित करके उसने पक्षी के रोने से शुरू करके कान पर ठण्डी उसास के छोड़ने पर्यन्त की ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म व्याख्या जुटाई कि दिन के समय, इतने लोगों के बीच बैठे हुए भी मेरे सिर के बाल तक काँटों की तरह खड़े हो गये। कल सुबह की तरह आज भी प्यारी गुप-चुप कब सरक कर समीप आ बैठी, इस पर मेरा ध्याहन ही नहीं गया। एकाएक एक उसास के शब्द से गर्दन घुमाकर मैंने देखा कि वह ठीक मेरी पीठ के पीछे बैठी हुई निर्निमेष दृष्टि से बोलने वाले के मुँह की ओर देख रही है और उसके दोनों चिकने उजले गालों पर झड़े हुए अश्रुओं की दो धाराएँ सूखकर फूट उठी हैं। कब और किसलिए वह ऑंखों का जल बह निकला था, शायद वह बिल्कुमल ही जान नहीं सकी; नहीं तो उन्हें पोंछ डालती। किन्तु, उसी अश्रु-कलुषित तल्लीन मुख का पल-भर का दृष्टिपात ही मेरे हृदय में एक अग्नि की रेखा अंकित कर गया। बात समाप्त होते ही वह उठकर खड़ी हो गयी और कुमारजी को सलाम करके, अनुमति माँगकर, धीरे-धीरे बाहर चली गयी।
आज सुबह ही मेरे बिदा होने की बात थी। परन्तु, शरीर स्वस्थ नहीं था, इसलिए कुमारजी का अनुरोध स्वीकार करके मैं उस समय, जाना स्थगित करके, अपने तम्बू में वापस लौट आया। इतने दिनों के बाद आज प्यारी के आचरण में पहले-पहल मैंने दूसरा भाव देखा। इतने दिन उसने परिहास किया है, व्यंग किया है, और कलह का आभास तक भी उसके दोनों नेत्रों की दृष्टि में कुछ दिन घनीभूत हो गया है- यह सब मैंने अनुभव किया है। परन्तु, इस तरह की उदासीनता पहले कभी नहीं देखी। फिर भी, व्यथित होने के बदले मैं खुश ही हुआ। क्यों, सो जानता हूँ। यद्यपि युवती स्त्रियों के मन की गतिविधि को लेकर माथापच्ची करना मेरा पेशा नहीं है, और न इसके पहले यह काम मैंने कभी किया ही है, पर मेरे मन के भीतर जो बहुत जन्मों की अखण्ड धारावाहिकता छिपी हुई मौजूद है, उसके बहुदर्शन की अभिज्ञता से रमणी-हृदय का गूढ तात्पर्य स्पष्ट प्रतिभासित हो उठा। वह उसे अपना अपमान समझकर क्षुब्ध नहीं हुआ वरन् उसे प्रणय अभिमान समझकर पुलकित हो उठा। शायद, इसी छिपी हुई धारावाहिकता के गुप्त इशारे से मैंने अपनी श्मशान यात्रा के लिए यहाँ तक के इतिहास में, इस बात का उल्लेख तक नहीं किया कि कल-रात को मुझे श्मशान से लौटा लाने के लिए आदमी भेजे थे और वह स्वयं भी बात पूरी होते ही उसी तरह गुप-चुप बाहर चली गयी थी। इसीलिए है यह अभिमान! कल रात को लौटकर उसे मुलाकात करके मैंने यह नहीं कहा कि वहाँ क्या हुआ था। उससे जिस बात को अकेले बैठकर सुनने का सबसे पहले अधिकार था उसी को आज वह सबसे पीछे बैठकर मानो दैवात् ही सुन सकी है। परन्तु, अभिमान भी इतना मीठा होता है! जीवन में उसके स्वाद को उस दिन सबसे पहले उपलब्ध करके मैं बच्चे की तरह एकान्त में बैठ गया और लगातार चख-चखकर उसका उपभोग करने लगा।
आज दोपहर को मैं सो जाना चाहता था। बिस्तर पर लेटे-लेटे बीच-बीच में तन्द्रा भी आने लगी; परन्तु रतन के आने की आशा बार-बार हिला-हिलाकर उसे तोड़ देने लगी। इस तरह समय तो निकल गया परन्तु रतन नहीं आया! वह आएगा अवश्य, यह विश्वास मेरे दिल में ऐसा दृढ़ हो रहा था कि, जब बिस्तर छोड़कर बाहर आकर मैंने देखा कि सूर्य पश्चिम की ओर ढल पड़ा है, तब मुझे मन ही मन यह निश्चय हो गया कि जब मैं तन्द्रा में पड़ा हुआ था तब रतन, मेरे यहाँ आया है और मुझे निद्रित समझकर लौट गया है। मूर्ख! एक दफे पुकार ही लेता तो क्या हो जाता! दोपहर का निर्जन समय यों ही निरर्थक चला गया, यह सोचकर मैं क्रुद्ध हो उठा; परन्तु संध्या के बाद वह फिर आएगा और एक छोटा-सा अनुरोध- नहीं तो लिखा हुआ एक पुर्जा- जो कुछ भी हो, गुप-चुप हाथ में थमा जायेगा; इसमें मुझे जरा भी संशय नहीं था; किन्तु यह समय कटे किस तरह? सामने की ओर देखते ही कुछ दूर पर विशाल जल-राशि एकदम मेरी ऑंखों के ऊपर झक्-झक् कर उठी। वह किसी विस्मृत जमींदार का विशाल यश था। वह तालाब करीब आधा कोस विस्तृत था। उत्तर की ओर से वह खिसक कर पुर गया था और घने जंगल से ढँक गया था। गाँव के बाहर होने के कारण गाँव की स्त्रियाँ उसके जल का उपयोग नहीं कर पाती थीं। बातों ही बातों में सुना था कि यह तालाब कितना पुराना है और किसने बनवाया था, इसका पता किसी को नहीं है। एक पुराना टूटा घाट था, उसी के एकान्त कोने में जाकर मैं बैठ गया। एक समय इसके चारों ओर बढ़ता हुआ गाँव था जो न जाने कब हैजे और महामारी के प्रकोप से ऊजाड़ होकर, फिर अपने वर्तमान स्थान में, सरक आया है। छोड़े हुए मकानों के बहुत-से निशान चारों ओर विद्यमान हैं। डूबते हुए सूर्य की तिरछी किरणों की छटने धीरे-धीरे झुककर तालाब के काले पानी में सोना मथ दिया, मैं एकटक होकर देखता रहा।
इसके बाद धीरे-धीरे सूर्य डूब गया। तालाब का काला पानी और भी काला हो गया। पास के ही जंगल में से दो-एक प्यासे सियार बाहर निकल कर डरते-डरते पानी पीकर चले गये। वहाँ से मेरे उठने का समय हो गया है- जिस समय को काटने के लिए मैं वहाँ गया था वह कट गया है, यह सब अनुभव करके भी मैं वहाँ से उठ न सका- मानों उस टूटे घाट ने मुझे जबरन बिठा रखा!
खयाल आया कि जहाँ पैर रखकर मैं बैठा हुआ हूँ वहीं पर पैर रखकर न जाने कितने आदमी कितनी दफा आए हैं, गये हैं। इसी घाट पर वे स्नान करते, मुँह धोते, कपड़े छाँटते और जल भरते थे। इस समय वे कहाँ के किस जलाशय में ये समस्त नित्य-कर्म पूर्ण करते होंगे? यह गाँव जब जीवित था तब निश्चय से वे लोग इस समय यहाँ आकर बैठते थे। कितने ही गान गाकर और कितनी ही बातें करके दिन-भर की थकावट दूर करते थे। इसके बाद अकस्मात् एक दिन जब महाकाल महामारी का रूप धारण करके सारे गाँव को नोच ले गया तब न जाने कितने मरणोन्मुख व्यक्ति प्यास के मारे यहाँ दौड़े आए हैं और इसी घाट के ऊपर अपना अन्तिम श्वास छोड़कर उसके साथ चले गये हैं। शायद उनकी पिपासातुर आत्मा आज भी यहीं पर चक्कर काटती फिरती होगी। यह भी कौन जोर देकर कह सकता है कि जो ऑंखों से नहीं दिखाई देता वह है ही नहीं? आज सुबह ही उस वृद्ध ने कहा था, ''बाबूजी, मन में यह कभी मत सोचना कि मृत्यु के उपरान्त कुछ शेष नहीं रहता- असहाय प्रेतात्माएँ हमारे ही समान सुख-दु:ख, क्षुधा-तृषा लेकर विचरण नहीं करतीं।'' इतना कहकर उसने वीर विक्रमाजीत की कथा, और न जाने कितनी ही तान्त्रिक साधु-सन्यासियों की कहानियाँ विस्तार से कह सुनाई थीं। और कहा था कि ''यह भी मत सोचना कि समय और सुयोग मिलने पर वे दिखाई नहीं देती हैं या बात नहीं कर सकती हैं, अथवा नहीं करती हैं। तुम्हें उस स्थान पर और कभी जाने के लिए मैं नहीं कहता, परन्तु जो लोग यह काम कर सकते हैं उनके समस्त दु:ख किसी भी दिन सार्थक नहीं होते, इस बात पर स्वप्न में भी कभी अविश्वास मत करना।''
उस समय, सुबह के प्रकाश में, जिन कहानियों ने केवल निरर्थक हँसी का उपादान जुटा दिया था, इस समय वे ही कहानियाँ निर्जन गहरे अन्धकार के बीच कुछ दूसरे ही किस्म के चेहरे धारण करके दिखाई दीं। मन में आने लगा कि जगत में प्रत्यक्ष सत्य यदि कोई वस्तु है तो वह मृत्यु ही है। भली-बुरी सुख-दु:ख की ये जीवनव्यापी अवस्थाएँ मानो आतिशबाजी हैं, जो तरह-तरह के साज-सरंजाम के समान केवल किसी एक विशेष, दिन जलकर राख हो जाने के लिए ही इतने यत्न और कौशल्य के साथ बनकर तैयार हुई हैं। तब मृत्यु के उस पार का इतिहास यदि किसी तरह सुन लिया जा सके तो उसकी अपेक्षा बड़ा लाभ और क्या है? फिर उसे कोई भी कहे और कैसे भी कहे।
हठात् किसी के पैरों के शब्द से मेरा ध्यातन भंग हो गया। पलटकर देखा, केवल अन्धकार है, कहीं कोई नहीं है। मैं बदन झाड़कर उठ खड़ा हुआ। गत रात्रि की बात याद करके मन ही मन हँसकर बोला, नहीं, अब और यहाँ नहीं बैठ रहना चाहिए। कल दाहिने कान के ऊपर उसासा छोड़ गया था, आज आकर यदि बाएँ कान पर छोड़ना शुरू कर दे, तो यह कुछ अधिक सहज न होगा।
वहाँ बैठे-बैठे कितनी देर हो गयी और अब कितनी रात है, यह मैं ठीक तौर से निश्चित नहीं कर सका। मालूम होता है कि आधी रात के आस-पास का समय होगा। परन्तु अरे यह क्या? चला जा रहा हूँ तो चला ही जा रहा हूँ, उस सँकरी पगडण्डी का जैसे अन्त ही नहीं होना चाहता! इतने बहुत से तम्बुओं में से एक दीपक का भी प्रकाश नजर नहीं आता! बहुत देर से सामने एक बाँस का वृक्ष नजर रोके खड़ा था; एकाएक खयाल आया कि इसे तो आते समय देखा नहीं था! दिशा भूलकर, कहीं और किसी ओर तो नहीं चल दिया हूँ? कुछ और चलने पर मालूम हुआ कि वह बाँस का वृक्ष नहीं है, किन्तु, कुछ इमली के पेड़, एक दूसरे से सटे हुए, दिशाओं को ढके जमात बाँधकर खड़े हैं और उन्हीं के नीचे से रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा होकर अदृश्य हो गया है। स्थान इतना अन्धकारपूर्ण है कि अपना हाथ भी अपने को नहीं दिखाई देता। छाती धड़धड़ाने लगी। अरे मैं जा कहाँ रहा हूँ? ऑंख-कान बन्द करके किसी तरह उन इमली के वृक्षों के पार जाकर देखता हूँ कि सामने अनन्त काला आकाश, जितनी दूर नजर जाती है उतनी दूर तक, विस्तृत हो रहा है। किन्तु सामने वह ऊँची-सी जगह क्या है? नदी के किनारे का सरकारी बाँध तो नहीं है? दोनों पैर मानो टूटने से लगे, फिर भी उन्हें किसी तरह घसीटकर मैं उसके ऊपर चढ़ गया। जो सोचा था ठीक वही हुआ। उसके ठीक नीचे ही वह महाश्मशान था! फिर किसी के कदमों का शब्द सामने से होकर नीचे श्मशान में जाकर विलीन हो गया। इस बार मैं किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चला और उसी धूल-रेती के ऊपर बेहोश की तरह धप्प् से बैठ गया। अब मुझे लेश-भर भी सन्देह नहीं रहा कि कोई मुझे एक महाश्मशान से लेकर दूसरे महाश्मशान तक रास्ता दिखाता हुआ पहुँचा गया। जिसके पद-शब्द सुनकर, उस फूटे घाट पर, शरीर झाड़कर मैं उठ खड़ा हुआ था उसी के पद-शब्द, इतनी देर बाद, उस तरफ, सामने की ओर, विलीन हो गये।