• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date


गाँव में पहुँचा। गाँव का नाम है महमूदपुर। वृद्ध यादव चक्रवर्ती ने उसी का उल्लेख करके गर्व के साथ कहा, ''नाम सुन के चौंकियेगा नहीं साहब, गाँव के चारों तरफ कहीं मुसलमानों की छाया तक नहीं पाएँगे आप। जिधर देखिए उधर ब्राह्मण, कायस्थ और भली जात। ऐसी जात की यहाँ बस्ती ही नहीं जिसके हाथ का पानी न चल सके। क्यों नरेन, कोई है?''

नरेन ने बार-बार हाँ में हाँ मिलाते हुए सिर हिलाकर कहा- ''एक भी नहीं, एक भी नहीं। ऐसे गाँव में हम लोग रहते ही नहीं।''

हो सकता है कि यह सच हो, पर इसमें इतने खुश होने की कौन-सी बात है, मेरी समझ में नहीं आया।

चक्रवर्ती के घर वज्रानन्द से भेंट हुई। हाँ, वे ही हैं। मुझे देखकर उन्हें जितना आश्चर्य हुआ, उतना ही आनन्द।

''अहा भाई साहब! अचानक यहाँ कैसे?'' इतना कहकर आनन्द ने हाथ उठाकर नमस्कार किया। इस नर-देहधारी देवता को सम्मान के साथ मेरा अभिवादन करते देख चक्रवर्ती विगलित हो उठे। अगल-बगल और भी बहुत-से भक्त थे, वे भी उठ के खड़े हो गये। मैं कोई भी क्यों न होऊँ, इस विषय में तो किसी को सन्देह ही न रह गया कि मैं मामूली आदमी नहीं हूँ।

आनन्द ने कहा, ''आप पहले से कुछ लुटे-लुटे से दिखाई देते हैं, भाई साहब?''

इसका जवाब दिया चक्रवर्ती ने। दो दिन से मुझे आहार नहीं मिला, सोने का कोई ठिकाना नहीं रहा, और किसी बड़े पुण्य से मैं जिन्दा आ गया हूँ तथा कुलियों में महामारी आदि का ऐसा सुन्दर और सविस्तार वर्णन किया कि सुनकर मैं भी दंग रह गया।

आनन्द ने कोई खास व्याकुलता प्रकट नहीं की। जरा कुछ मुसकराकर औरों के कान बचाकर कहा, ''दो दिन में इतना नहीं होता भाई साहब, इसके लिए जरा कुछ समय चाहिए। क्या हुआ था? बुखार?''

मैंने कहा, ''ताज्जुब नहीं। मलेरिया तो है ही।''

चक्रवर्ती ने आतिथ्य में कोई त्रुटि नहीं की, खाना-पीना आज खूब अच्छी तरह ही हुआ।

भोजन के बाद चलने की तैयारी करने पर आनन्द ने पूछा, ''आप अचानक कुलियों में कैसे पहुँच गये?''

मैंने कहा, ''दैव के चक्कर से।''

आनन्द ने हँसते हुए कहा, ''चक्कर तो है ही। गुस्से में आकर घर पर खबर भी न दी होगी शायद?''

मैंने कहा, ''नहीं- मगर वह गुस्से में आकर नहीं। देना फिजूल है, समझकर ही नहीं दी। इसके सिवा आदमी ही कहाँ थे जो भेजता?''

आनन्द ने कहा, ''यह एक बात जरूर है। परन्तु आपकी भलाई-बुराई जीजी के लिए फिजूल कब से हो उठी? वे शायद डर और फिक्र से अधमरी हो गयी होंगी।''

बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं। इस प्रश्न का मैंने फिर कुछ उत्तर ही नहीं दिया। आनन्द ने ऐसा समझ लिया कि जिरह में उन्होंने मेरा एकदम मुँह बन्द कर दिया। इसी से, स्निग्ध मृदु मुसकराहट के साथ कुछ देर तक आत्म-गौरव अनुभव करके वे बोले, ''आपके लिए रथ तैयार है, मैं समझता हूँ शाम के पहले ही घर पहुँच जाँयगे। चलिए, आपको विदा कर आऊँ।''

मैंने कहा, ''पर घर जाने से पहले मुझे जरा कुलियों की खबर लेने जाना है।''

आनन्द ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ''इसके मानी- अभी गुस्सा उतरा नहीं है। पर मैं तो कहूँगा कि दैव के चक्कर से दुर्भोग जो भाग्य में बदा था वह तो फल चुका। आप डॉक्टर भी नहीं, साधु-बाबा भी नहीं, गृहस्थ आदमी हैं। अब, सचमुच ही अगर खबर लेने लायक कोई बात रह गयी हो, तो उसका भार मुझ पर सौंपकर आप निश्चिन्त मन से घर चले जाइए। पर जाते ही मेरा नमस्कार जताकर कहिएगा कि उनका आनन्द अच्छी तरह है।''

दरवाजे पर बैलगाड़ी तैयार थी। गृहस्वामी चक्रवर्ती महाशय ने हाथ जोड़कर अनुरोध किया कि फिर कभी इधर आना हो तो इस घर में पद-धूलि जरूर पड़नी चाहिए। उनके आन्तरिक आतिथ्य के लिए मैंने सहस्र धन्यवाद दिया; परन्तु दुर्लभ पद-धूलि की आशा न दे सका। मुझे बंगाल प्रान्त शीघ्र ही छोड़ जाना होगा, इस बात को मैं भीतर ही भीतर महसूस कर रहा था; लिहाजा किसी दिन किसी भी कारण से इस प्रान्त में वापस आने की सम्भावना मेरे लिए बहुत दूर चली गयी थी।

गाड़ी में बैठ जाने पर आनन्द ने भीतर को मुँह बढ़ाकर धीरे से कहा, ''भाई साहब, इधर की आब-हवा आपको माफिक नहीं आती। मेरी तरफ से आप जीजी से कहिएगा कि पछाँह के आदमी ठहरे आप, आपको वे वहीं ले जाँय।''

मैंने कहा, ''इस तरफ क्या आदमी जीते नहीं आनन्द?''

प्रत्युत्तर में आनन्द ने रंचमात्र इतस्तत: न करके फौरन ही कहा, ''नहीं। मगर इस विषय में तर्क करके क्या होगा भाई साहब? आप सिर्फ मेरा हाथ जोड़कर अनुरोध उनसे कह दीजिएगा। कहिएगा, आनन्द सन्यासी की ऑंखों से देखे बिना इसकी सत्यता समझ में नहीं आ सकती।''

मैं मौन रहा। कारण, राजलक्ष्मी को उनका यह अनुरोध जताना मेरे लिए कितना कठिन है, इसे आनन्द क्या जाने!

गाड़ी चल देने पर आनन्द ने फिर कहा, ''क्यों भाई साहब, मुझे तो आपने एक बार भी आने का निमन्त्रण नहीं दिया?''

मैंने मुँह से कहा, ''तुम्हारे कामों का क्या ठीक है, तुम्हें निमन्त्रण देना क्या आसान काम है भाई?''

मगर मन ही मन आशंका थी कि इसी बीच में कहीं वे स्वयं ही किसी दिन पहुँच न जाँय। फिर तो इस तीक्ष्ण-बुद्धि सन्यासी की दृष्टि से कुछ भी छुपाने का उपाय न रहेगा। एक दिन ऐसा था जब इससे कुछ भी बनता-बिगड़ता न था, तब मन ही मन हँसता हुआ कहा करता, ''आनन्द, इस जीवन का बहुत कुछ विसर्जन दे चुका हूँ, इस बात को अस्वीकार न करूँगा, परन्तु मेरे नुकसान के उस सहज हिसाब को ही तुम देख सके और तुम्हारे देखने के बाहर जो मेरे संचय का अंक एकबारगी संख्यातीत हो रहा है सो! मृत्यु-पार का वह पाथेय अगर मेरा जमा रहे, तो मैं इधर की किसी भी हानि की परवाह न करूँगा।'' लेकिन आज कहने के लिए बात ही क्या थी? इसी से चुपचाप सिर नीचा किये बैठा रहा। पल-भर में मालूम हुआ कि ऐश्वर्य का वह अपरिमेय गौरव अगर सचमुच ही आज मिथ्या मरीचिका में विलुप्त हो गया, तो इस गल-ग्रह, भग्न-स्वास्थ्य, अवांछित गृहस्वामी के भाग्य में अतिथि-आह्नान करने की विडम्बना अब न घटे।

मुझे नीरव देखकर आनन्द ने उसी तरह हँसते हुए कहा, ''अच्छी बात है, नये तौर से न कहिए तो भी कोई हर्ज नहीं, मेरे पास पुराने निमन्त्रण की पूँजी मौजूद है, मैं उसी के बल-बूते पर हाजिर हो सकूँगा।''

मैंने पूछा, ''मगर यह काम कब तक हो सकेगा?''

आनन्द ने हँसते हुए कहा, ''डरो मत भाई साहब, आप लोगों के गुस्सा उतरने के पहले ही पहुँचकर मैं आपको तंग न करूँगा- उसके बाद ही पहुँचूगा।''

सुनकर मैं चुप हो रहा। गुस्सा होकर नहीं आया, यह कहने की भी इच्छा न हुई।

रास्ता कम नहीं था, गाड़ीवान जल्दी कर रहा था। गाड़ी हाँकने से पहले फिर उन्होंने एक बार नमस्कार किया और मुँह हटा लिया।

इस तरफ गाड़ी वगैरह का चलन नहीं और इसीलिए उसके लिए किसी ने रास्ता बनाकर भी नहीं रक्खा। बैलगाड़ी, मैदान और खाली खेतों में होकर, ऊबड़-खाबड़ ऊसर को पार करती हुई अपना रास्ता तय करने लगी। भीतर अधलेटी हालत में पड़े-पड़े मेरे कानों में आनन्द सन्यासी की बातें ही गूँजने लगीं। गुस्सा होकर मैं नहीं आया- और यह कोई लाभ की चीज नहीं और लोभ की भी नहीं; परन्तु, बराबर खयाल होने लगा, कहीं यह भी अगर सच होता? किन्तु सच नहीं, और सच होने का कोई रास्ता ही नहीं। मन ही मन कहने लगा, गुस्सा मैं किस पर करूँगा? और किसलिए? उसने कुसूर क्या किया है? झरने की जलधारा के अधिकार के बारे में झगड़ा हो सकता है, किन्तु उत्स-मुख में ही अगर पानी खत्म हो गया हो, तो सूखे जल-मार्ग के विरुद्ध सिर धुन के जान दे दूँ किस बहाने?

इस तरह कितना समय बीत गया, मुझे होश नहीं। सहसा नाले में गाड़ी रुक जाने से उसके धक्कों-दचकों से मैं उठकर बैठ गया। सामने को टाट का परदा उठाकर देखा कि शाम हो आई है। गाड़ी चलाने वाला लड़का-सा ही है, उमर शायद चौदह-पन्द्रह साल से ज्यादा न होगी। मैंने कहा, ''और तू इतनी जगह रहते नाले में क्यों आ पड़ा?''

लड़के ने अपनी गँवई गाँव की बोली में उसी वक्त जवाब दिया, ''मैं क्यों पड़ने लगा, बैल अपने आप ही उतर पड़े हैं।''

''अपने आप ही कैसे उतर पड़े रे? तू बैल सँभालना भी नहीं जानता?''

'नहीं। बैल जो नये हैं।''

''बहुत ठीक! पर इधर तो अंधेरा हुआ जा रहा है, गंगामाटी है कितनी दूर यहाँ से?''

''सो मैं क्या जानूँ! गंगामाटी मैं कभी गया थोड़े ही हूँ!''

मैंने कहा, ''कभी अगर गया ही नहीं, तो मुझ पर ही इतना प्रसन्न क्यों हुआ भई? किसी से पूछ क्यों नहीं लेता रे- मालूम तो हो, कितनी दूर है।''

उसने जवाब में कहा, ''इधर आदमी हैं कहाँ? कोई नहीं है।''

लड़के में और चाहे जो दोष हो, पर जवाब उसके जैसे संक्षिप्त वैसे ही प्रांजल हैं, इसमें कोई शक नहीं।

मैंने पूछा, ''तू गंगामाटी का रास्ता तो जानता है?''

वैसा ही स्पष्ट जवाब दिया। बोला, ''नहीं!''

''तो तू आया क्यों रे?''

''मामा ने कहा कि बाबू को पहुँचा दे। ऐसे सीधा जाकर पूरब को मुड़ जाने से ही गंगामाटी में जा पड़ेगा। जायेगा और चला आयेगा।''

सामने अंधेरी रात है, और अब ज्यादा देर भी नहीं है। अब तक तो ऑंखें मींचकर अपनी चिन्ता में ही मग्न था। पर लड़के की बातों से अब मुझे डर-सा मालूम होने लगा। मैंने कहा, ''ऐसे सीधे दक्षिण की बजाय उत्तर को जाकर पश्चिम को तो नहीं मुड़ गया रे?''

लड़के ने कहा, ''सो मैं क्या जानूँ?''

मैंने कहा, ''नहीं जानता तो चल दोनों जने अंधेरे में मौत के घर चले चलें। अभागा कहीं का, रास्ता नहीं जानता था तो आया ही क्यों तू? तेरा बाप है?''

''नहीं।''

''माँ है?''

''नहीं, मर गयी।''

''आफत चुकी। चल, तो फिर आज रात को उन्हीं के पास चला चल। तेरे मामा में अकेली अकल ही ज्यादा नहीं, दया-माया भी काफी है।''

और कुछ आगे बढ़ने के बाद लड़का रोने लगा, उसने जता दिया कि अब वह आगे नहीं जा सकता।

मैंने पूछा, ''फिर ठहरेगा कहाँ?''

उसने जवाब दिया, ''घर लौट जाऊँगा।''

''पर ऐसे बेवक्त मेरे लिए क्या उपाय है?''

पहले ही कह चुका हूँ कि लड़का अत्यन्त स्पष्टवादी है। बोला, ''तुम बाबू उतर जाओ। मामा ने कह दिया है, किराया सवा रुपया ले लेना। कमती लेने से वे मुझे मारेंगे।''

मैंने कहा, ''मेरे लिए तुम मार खाओगे, यह कैसी बात!''

एक बार सोचा कि इसी गाड़ी से यथास्थान लौट जाऊँ। मगर न जाने कैसी तबीयत हुई, लौटने का मन नहीं हुआ। रात हो रही है, अपरिचित स्थान है, गाँव-बस्ती कहाँ और कितनी दूर है, सो भी जानने का कोई उपाय नहीं। सिर्फ सामने एक बड़ा-सा आम-कटहल का बाग देखकर अनुमान किया कि गाँव शायद बहुत ज्यादा दूर न होगा। कोई न कोई आश्रय तो मिल ही जायेगा और अगर नहीं मिला, तो उससे क्या? न हो तो इस बार की यात्रा ऐसे ही सही।

उतरकर किराया चुका दिया। देखा कि लड़के की कोरम-कोर बात ही नहीं, अपनी बात पर अमली कार्रवाई करने का भी बिल्कुल स्पष्ट है। पलक मारते ही उसने गाड़ी का मुँह फेर दिया, और बैल भी घर लौटने का इशारा पाते ही पल-भर में ऑंखों से ओझल हो गये।

संध्या तो हो आई, पर रात के अन्धकार के घोर होने में अब भी कुछ विलम्ब था। इसी थोड़े से समय के भीतर किसी भी तरह से हो, कोई न कोई ठौर-ठिकाना करना ही पड़ेगा। यह काम मेरे लिए कोई नया भी न था, और कठिन होने के कारण मैं इससे डरा भी नहीं हूँ। परन्तु, आज उस आम-बाग के बगल से पगडण्डी पकड़ के जब धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा तो न जाने कैसी एक उद्विग्न लज्जा से मेरा मन भीतर से भर आने लगा। भारत के अन्यान्य प्रान्तों के साथ किसी समय घनिष्ठ परिचय था; किन्तु, अभी जिस मार्ग से चल रहा हूँ, वह तो बंगाल के राढ़-देश का मार्ग है। इसके बारे में तो मेरी कुछ भी जानकारी नहीं है। मगर यह बात याद नहीं आई कि सभी देश-प्रदेशों के बारे में शुरू-शुरू में ऐसा ही अनभिज्ञ था, और ज्ञान जो कुछ प्राप्त किया है वह इसी तरह अपने आप अर्जन करना पड़ा है, दूसरे किसी ने नहीं करा दिया।

असल में, किसलिए उस दिन मेरे लिए सर्वत्र द्वार खुले हुए थे, और आज, संकोच और दुविधा से वे सब बन्द से हो गये, इस बात पर मैंने विचार ही नहीं किया। उस दिन के उस जाने में कृत्रिमता नहीं थी; मगर आज जो कुछ कर रहा हूँ, यह तो उस दिन की सिर्फ नकल है। उस दिन बाहर के अपरिचित ही थे मेरे परम आत्मीय-उन पर अपना भार डालने में तब किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं आई; पर वही भार आज व्यक्ति-विशेष पर एकान्त रूप से पड़ जाने से सारा का सारा भार-केन्द्र ही अन्यत्र हट गया है। इसी से आज अनजान अपरिचितों के बीच में से चलने में मेरे हर कदम पर उत्तरोत्तर भारी होते चले जा रहे हैं। उन दिनों की उन सब सुख-दु:ख की धारणाओं से आज की धारणा में कितना भेद है, कोई ठीक है! फिर भी चलने लगा। अब तो मेरे अन्दर इस जंगल में रात बिताने का न साहस ही रहा, और न शक्ति ही बाकी रही। आज के लिए कोई आश्रय तो ढूँढ़ निकालना ही होगा।

तकदीर अच्छी थी, ज्यादा दूर न चलना पड़ा। पेड़ के घने पत्तों में से कोई एक पक्का मकान-सा दिखाई दिया। थोड़ी दूर घूमकर मैं उस मकान के सामने पहुँच गया।

था तो पक्का मकान, पर मालूम हुआ कि अब उसमें कोई रहता नहीं। सामने लोहे का गेट था, पर टूटा हुआ- उसकी अधिकांश छड़ें लोग निकाल ले गये हैं। मैं भीतर घुस गया। खुला हुआ बरामदा है, बड़े-बड़े दो कमरे हैं, एक बन्द है, और दूसरा जो खुला है, उसके दरवाजे के पास पहुँचते ही उसमें से एक कंकाल-सा आदमी निकलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। देखा कि उस कमरे के चारों कोनों में चार लोहे के गेट हैं, किसी दिन उसमें गद्दे बिछे रहते थे, परन्तु कालक्रम से अब उनके ऊपर का टाट तक लुप्त हो गया है। बाकी बची हैं सिर्फ नारियल की जटाएँ, सो भी बहुत कम। एक तिपाई है, कुल टीन और कलई के बरतन हैं, जिनकी शोभा और मौजूदा हालत वर्णन के बाहर पहुँच चुकी है। जो अनुमान की थी वही बात है। यह मकान अस्पताल है। यह आदमी परदेशी है। नौकरी करने आया था सो बीमार पड़ गया है। पन्द्रह दिन से वह यहाँ का इन्डोर पेशेण्ट हैं। उस भले आदमी से जो बातचीत हुई उसका एक चित्र नीचे दिया जाता है-

''बाबू साहब, चारेक पैसा देंगे?''

''क्यों, किसलिए?''

''भूख के मारे मरा जाता हूँ बाबूजी, कुछ चबेना-अवेना खरीद के खाना चाहता हूँ।''

मैंने पूछा, ''तुम मरीज आदमी हो, अंट-संट खाने की तुम्हें मनाई नहीं है?''

''जी नहीं।''

''यहाँ से तुम्हें खाने को नहीं मिलता?''

उसने जो कुछ कहा, उसका सार यह है- सबेरे एक कटोरा साबू दिए गये थे, सो कभी के खा चुका। तब से वह गेट के पास बैठा रहता है- भीख में कुछ मिल जाता है तो शाम को पेट भर लेता है, नहीं तो उपास करके रात काट देता है। एक डॉक्टर भी हैं, शायद उन्हें बहुत ही थोड़ा हाथ-खर्च के लिए कुल मिला करता है। सबेरे एक बार मात्र उनके दर्शन होते हैं। और एक आदमी मुकर्रर है, उसे कम्पाउण्डरी से लेकर लालटेन में तेल भरने तक का सभी काम करना पड़ता है। पहले एक नौकर था, पर इधर छह-सात महीने से तनखा न मिलने के कारण वह भी चला गया है। अभी तक कोई नया आदमी भरती नहीं हुआ।

मैंने पूछा, ''झाड़ु-आड़ु कौन लगाता है?''

उसने कहा, ''आजकल तो मैं ही लगाता हूँ। मेरे चले जाने पर फिर जो नया रोगी आयेगा वह लगायगा- और कौन लगायगा?''

मैंने कहा, ''अच्छा इन्तजाम है! अस्पताल यह है किसका, जानते हो?''

वह भला आदमी मुझे उस तरफ के बरामदे में ले गया। छत की कड़ी में लगे हुए तार से एक टीन की लालटेन लटक रही थी। कम्पाउण्डर साहब उस सिदौसे ही जलाकर काम खत्म करके अपने घर चले गये हैं। दीवार में एक बड़ा भारी पत्थर जड़ा हुआ है, जिसपर सुनहरी अंगरेजी हरूफों में ऊपर से नीचे तक सन् अंगरेजी तारीख आदि खुदे हुए हैं- यानी पूरा शिलालेख है। जिले के जिन साहब मजिस्ट्रेट ने अपरिसीम दया से प्रेरित होकर इसका शिलारोपण या द्वारोद्धाटन सम्पन्न किया था, सबसे पहले उनका नाम-धाम है, और सबसे नीचे है प्रशस्ति-पाठ। किसी एक राव बहादुर ने अपनी रत्नगर्भा माता की स्मृति-रक्षार्थ जननी-जन्मभूमि पर इस अस्पताल की प्रतिष्ठा कराई है। इसमें सिर्फ माता-पुत्र का ही वर्णन नहीं बल्कि ऊधर्वतन तीन-चार पीढ़ियों का भी पूरा विवरण है। अगर इसे छोटी कुल-कारिका कहा जाय, तो शायद अत्युक्ति न होगी। इसके प्रतिष्ठाता महोदय राज-सरकार की रायबहादुरी के योग्य पुरुष थे, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं। कारण रुपये बरबाद करने की ओर से उन्होंने कोई त्रुटि नहीं की। ईंट और काठ तथा विलायती लोहे के बिल चुकाने के बाद अगर कुछ बाकी बचा होगा, तो वह साहब-शिल्पकारों के हाथ से वंग-गौरव लिखवाने में ही समाप्त हो गया होगा। डॉक्टर और मरीजों के औषधि‍-पथ्यादि की व्यवस्था करने के लिए शायद रुपये भी न बचे होंगे और फुरसत भी न हुई होगी।

मैंने पूछा, ''रायबहादुर रहते कहाँ हैं?''

उसने कहा, ''ज्यादा दूर नहीं, पास ही रहते हैं।''

''अभी जाने से मुलाकात होगी?''

''जी नहीं, घर पर ताला लगा होगा, घर के सबके सब कलकत्ते रहते हैं।''

मैंने पूछा, ''कब आया करते हैं, जानते हो?''

असल में वह परदेशी है, ठीक-ठीक हाल नहीं बता सका। फिर भी बोला कि तीनेक साल पहले एक बार आए थे- डॉक्टर के मुँह सुना था उसने। सर्वत्र एक ही दशा है, अतएव दु:खित होने की कोई खास बात नहीं थी।

इधर अपरिचित स्थान में संध्याी बीती जा रही थी और अंधेरा बढ़ रहा था; लिहाजा, रायबहादुर के कार्य-कलापों की पर्यालोचना करने की अपेक्षा और भी जरूरी काम करना बाकी था। उस आदमी को कुछ पैसे देकर मालूम किया कि पास ही चक्रवर्तियों का एक घर मौजूद है। वे अत्यन्त दयालु हैं, उनके यहाँ कम-से-कम रात भर के लिए आश्रय तो मिल ही जायेगा। वह खुद ही राजी होकर मुझे अपने साथ वहाँ ले चला; बोला, ''मुझे मोदी की दुकान पर तो जाना ही है, जरा-सा घूमकर आपको पहुँचा दूँगा, कोई बात नहीं।''

चलते-चलते बातचीत से समझ गया कि उक्त दयालु ब्राह्मण-परिवार से उसने भी कितनी ही शाम पथ्यापथ्य संग्रह करके गुप्तरूप से पेट भरा है।

दसेक मिनट पैदल चलकर चक्रवर्ती की बाहर वाली बैठक में पहुँच गया। मेरे पथ-प्रदर्शक ने आवाज दी, ''पण्डितजी घर पर हैं?''

कोई जवाब नहीं मिला। सोच रहा था, किसी सम्पन्न ब्राह्मण के घर आतिथ्य ग्रहण करने जा रहा हूँ; परन्तु, घर-द्वार की शोभा देखकर मेरा मन बैठ-सा गया। उधर से कोई जवाब नहीं, और इधर से मेरे साथी के अपराजेय अध्यरवसाय का कोई अन्त नहीं। अन्यथा यह गाँव और यह अस्पताल बहुत दिन पहले ही उसकी रुग्ण आत्मा को स्वर्गीय बनाकर छोड़ता। वह आवाज पर आवाज लगाता ही रहा।

सहसा जवाब आया, ''जा जा, आज जा। जा, कहता हूँ।''

मेरा साथी किसी भी तरह विचलित नहीं हुआ, बोला, ''कौन आये हैं, निकल के देखिए तो सही।''

परन्तु मैं विचलित हो उठा। मानो चक्रवर्ती का परम-पूज्य गुरुदेव घर पवित्र करने अकस्मात् आविर्भूत हुआ हो।

नेपथ्य का कण्ठ-स्वर क्षण में मुलायम हो उठा, ''कौन है रे भीमा?''

यह कहते हुए घर-मालिक दरवाजे के पास आये दिखाई दिये। मैली धोती पहने हुए थे, सो भी बहुत छोटी। अन्धकारप्राय संध्यां की छाया में उनकी उमर मैं न कूत सका, मगर बहुत ज्यादा तो नहीं मालूम हुई। फिर उन्होंने पूछा, ''कौन है रे भीमा?''

समझ गया कि मेरे संगी का नाम भीम है। भीम ने कहा, ''भले आदमी हैं, ब्राह्मण महाराज हैं। रास्ता भूलकर अस्पताल में पहुँच गये थे। मैंने कहा, ''डरते क्यों हैं, चलिए, मैं पण्डितजी के यहाँ पहुँचाए देता हूँ, गुरु की सी खातिरदारी में रहिएगा।''

वास्तव में भीम ने अतिशयोक्ति नहीं की, चक्रवर्ती महाशय ने मुझे परम समादर के साथ ग्रहण किया। अपने हाथ से चटाई बिछाकर बैठने के लिए कहा, और तमाखू पीता हूँ या नहीं, पूछकर भीतर जाकर वे खुद ही हुक्का भर लाये।

बोले, ''नौकर-चाकर सब बुखार में पड़े हैं- क्या किया जाय!''

सुनकर मैं अत्यन्त कुण्ठित हो उठा। सोचा, एक चक्रवर्ती के घर से निकलकर दूसरे चक्रवर्ती के घर आ फँसा। कौन जानें, यहाँ का आतिथ्य कैसा रूप धारण करेगा। फिर भी हुक्का हाथ में पाकर पीने की तैयारी कर ही रहा था कि इतने में सहसा भीतर से एक तीक्ष्ण कण्ठ का प्रश्न आया, ''क्यों जी, कौन आदमी आया है?''

अनुमान किया कि यही घर की गृहिणी हैं। जवाब देने में सिर्फ चक्रवर्ती का ही गला नहीं काँपा, मेरा हृदय भी काँप उठा।

उन्होंने झटपट कहा, ''बड़े भारी आदमी हैं जी, बड़े भारी आदमी। ब्राह्मण हैं- नारायण। रास्ता भूलकर आ पड़े हैं- सिर्फ रातभर रहेंगे- भोर होने के पहले, तड़के ही चले जाँयगे।''

भीतर से जवाब आया, ''हाँ हाँ, सभी कोई आते हैं रास्ता भूलकर। मुँहजले अतिथियों का तो नागा ही नहीं। घर में न तो एक मुट्ठी चावल है, न दाल-खिलाऊँगी क्या चूल्हे की भूभड़?''

मेरे हाथ का हुक्का हाथ में ही रह गया। चक्रवर्तीजी ने कहा, ''ओहो, तुम यह सब क्या बका करती हो! मेरे घर में दाल-चावल की कमी! चलो चलो, भीतर चलो, सब ठीक किये देता हूँ।''

चक्रवर्ती-गृहिणी भीतर चलने के लिए बाहर नहीं आई थीं। बोलीं, ''क्या ठीक कर दोगे, सुनूँ तो सही? सिर्फ मुट्ठीभर चावल है, सो बच्चों के पेट में भी तो राँधकर डालना है। उन बेचारों को उपास रखकर मैं उसे लीलने दूँगी? इसका खयाल भी न लाना।''

माता धारित्री, फट जा, फट जा! 'नहीं-नहीं' कहके न-जाने क्या कहना चाहता था परन्तु चक्रवर्ती जी के विपुल क्रोध में वह न जाने कहाँ बह गया। उन्होंने 'तुम' छोड़कर फिर 'तू' कहना शुरू किया। और अतिथि-सत्कार के विषय को लेकर पति-पत्नी में जो वार्तालाप शुरू हुआ, उसकी भाषा जैसी थी, गम्भीरता भी वैसी ही थी- उसकी उपमा नहीं मिल सकती। मैं रुपये लेकर नहीं निकला था- जेब में जो थोड़े-से पैसे पड़े थे, वे भी खर्च हो चुके थे। कुरते में सोने के बटन अलबत्ता थे। पर वहाँ कौन किसकी सुनता है! व्याकुल होकर एक बार उठके खड़े होने की कोशिश करने पर चक्रवर्तीजी ने जोर से मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा, ''आप अतिथि-नारायण हैं। विमुख होकर चले जाँयगे तो मैं गले में फाँसी लगा लूँगा।''

गृहिणी इससे रंचमात्र भी भयभीत नहीं हुई, उसी वक्त चैलेद्बज एक्सेप्ट करके बोलीं, ''तब तो जी जाऊँ। भीख माँग-मूँगकर अपने बच्चों का पेट भर सकूँगी।''

इधर मेरी लगभग हिताहित-ज्ञान-शून्य होने की नौबत आ पहुँची थी; मैं सहसा कह बैठा, ''चक्रवर्तीजी, से न हो तो और किसी दिन सोच-विचार कर धीरे सुस्ते लगाइएगा- लगाना ही अच्छा है- मगर, फिलहाल या तो मुझे छोड़ दीजिए, और न हो तो मुझे भी एक फाँसी की रस्सी दे दीजिए, उसमें लटककर आपको इस आतिथ्य-दाय से मुक्त कर दूँ।''

चक्रवर्तीजी ने अन्त:पुर की तरफ लक्ष्य करके जोर से चिल्लाकर कहा, ''अब कुछ शिक्षा हुई? पूछता हूँ, सीखा कुछ?''

जवाब आया, ''हाँ।''

और कुछ ही क्षण बाद भीतर से सिर्फ एक हाथ बाहर निकल आया। उसने धम्म से एक पीतल का कलसा जमीन पर धर दिया, और साथ-ही-साथ आदेश दिया, ''जाओ, श्रीमन्त की दुकान से, इसे रखकर, दाल-चावल-घी-नामक ले आओ। जाओ। देखना कहीं वह हाथ में पाकर सब पैसे न काट ले।''

चक्रवर्ती खुश हो उठे। बोले, ''अरे, नहीं, नहीं, यह क्या बच्चे के हाथ का लडुआ है?''

चट से हुक्का उठाकर दो-चार बार धुऑं खींचने के बाद वे बोले, ''आग बुझ गयी। सुनती हो जी, जरा चिलम तो बदल दो, एक बार पीकर ही जाऊँ। गया और आया, देर न होगी।''

यह कहते हुए उन्होंने चिलम हाथ में लेकर भीतर की ओर बढ़ा दी।

बस, पति-पत्नी में सन्धि हो गयी। गृहिणी ने चिलम भर दी, और पतिदेव ने जी भरके हुक्का पिया। फिर वे प्रसन्न चित्त से हुक्का मेरे हाथ में थमाकर कलसा लेकर बाहर चले गये।

चावल आयी, दाल आयी, घी आया, नमक आया, और यथासमय रसोईघर में मेरी पुकार हुई। भोजन में रंचमात्र भी रुचि नहीं थी, फिर भी चुपचाप उठकर उस ओर चल दिया। कारण, आपत्ति करना सिर्फ निष्फल ही नहीं बल्कि 'ना' कहने में खतरे की भी आशंका हुई। इस जीवन में बहुत बार बहुत जगह मुझे बिन-माँगे आतिथ्य स्वीकार करना पड़ा है। सर्वत्र ही मेरा समादर हुआ है यह कहना तो झूठ होगा; परन्तु, ऐसा स्वागत भी कभी मेरे भाग्य में नहीं जुटा था। मगर अभी तो बहुत सीखना बाकी था। जाकर देखा कि चूल्हा जल रहा है, और वहाँ भोजन के बदले केले के पत्तों पर चावल-दाल-आलू और एक पीतल की हँड़िया रक्खी है।

चक्रवर्ती ने बड़े उत्साह के साथ कहा, ''बस चढ़ा दीजिए हँड़िया, चटपट हो जायेगा सब। मसूर की खिचड़ी, आलू-भात है ही, मजे की होगी खाने में। घी है ही, गरम-गरम।''

चक्रवर्ती महाशय की रसना सरस हो उठी। परन्तु मेरे लिए यह घटना और भी जटिल हो गयी। मैंने, इस डर से कि मेरी किसी बात या काम से फिर कहीं कोई प्रलय-काण्ड न उठ खड़ा हो, तुरन्त ही उनके निर्देशानुसार हँड़िया चढ़ा दी। चक्रवर्ती-गृहिणी नेपथ्य में छिपी खड़ी थीं। स्त्री की ऑंखों से मेरे अपटु हाथों का परिचय छिपा न रहा। अब तो उन्होंने मुझे ही लक्ष्य करके कहना शुरू किया। उनमें और चाहे जो भी दोष हो, संकोच या ऑंखों का लिहाज आदि का अतिबाहुल्य-दोष नहीं था, इस बात को शायद बड़े से बड़ा निन्दाकारी भी स्वीकार किये बिना न रह सकेगा। उन्होंने कहा, ''तुम तो बेटा, राँधना जानते ही नहीं।''

मैंने उसी वक्त उनकी बात मान ली, और कहा, ''जी नहीं।''

उन्होंने कहा, ''वे कह रहे थे, परदेसी आदमी हैं, कौन जानेगा कि किसने राँधा और किसने खाया! मैंने कहा, सो नहीं हो सकता, एक रात के लिए मुट्ठीभर भात खिलाकर मैं आदमी की जात नहीं बिगाड़ सकती। मेरे बाप अग्रदानी ब्राह्मण हैं।''

मेरी हिम्मत ही न हुई कि कह दूँ कि मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं, बल्कि इससे भी बढ़कर बड़े-बड़े पाप मैं इसके पहले ही कर चुका हूँ- क्योंकि डर था कि इससे भी कहीं कोई उपद्रव न उठ खड़ा हो। मन में सिर्फ एक ही चिन्ता थी कि किस तरह रात बीतेगी और कैसे इस घर के नागपाश से छुटकारा मिलेगा। लिहाजा, उनके निर्देशानुसार खिचड़ी भी बनाई और उसका पिण्ड-सा बनाकर घी डालकर- उस तोहफे को लीलने की कोशिश भी की। इस असाध्यर को मैंने किस तरह साध्ये या सम्पन्न किया, सो आज भी मुझसे छिपा नहीं है। बार-बार यही मालूम होने लगा कि वह चावल-दाल का पिण्डाकार तोहफा पेट के भीतर जाकर पत्थर का पिण्ड बन गया है।

अध्यकवसाय से बहुत कुछ हो सकता है। परन्तु उसकी भी एक हद है। हाथ-मुँह धोने का भी अवसर न मिला, सब बाहर निकल गया! मारे डर के मेरी सिट्टी गुम हो गयी; क्योंकि, उसे मुझे ही साफ करना पड़ेगा, इसमें तो कोई शक नहीं। मगर उतनी ताकत भी अब न रह गयी। ऑंखों की दृष्टि धुँधली हो आयी। किसी तरह मैं इतना कह सका, ''चार-छह मिनट में अपने को सँभाले लेता हूँ, फिर सब साफ कर दूँगा।''

सोचा था कि जवाब में न जाने क्या-क्या सुनना पड़ेगा। मगर आश्चर्य है कि उस महिला का भयानक कण्ठ-स्वर अकस्मात् ही कोमल हो गया। वे अंधेरे में से निकलकर मेरे सामने आ गयीं। बोलीं, ''तुम क्यों साफ करोगे बेटा, मैं ही सब किये देती हूँ। बाहर के बिछौना तो अभी कर नहीं पाई, तब तक चलो तुम, मेरी ही कोठरी में चलकर लेट रहो।''

'ना' कहने का सामर्थ्य मुझमें न था। इसलिए, चुपचाप उनके पीछे पीछे जाकर, उन्हीं की शतछिन्न शय्या पर ऑंख मींचकर पड़ रहा।

बहुत अबेर में जब नींद खुली, तब ऐसे जोर से बुखार चढ़ रहा था कि मुझमें सिर उठाने की भी शक्ति न थी। सहज में मेरी ऑंखों से ऑंसू नहीं गिरते, पर आज, यह सोचकर कि इतने बड़े अपराध की अब किस तरह जवाबदेही करूँगा, खालिस और निरवछिन्न आतंक से ही मेरी ऑंखें भर आयीं। मालूम हुआ कि बहुत बार बहुत-सी निरुद्देश यात्राएँ मैंने की हैं, परन्तु इतनी बड़ी विडम्बना जगदीश्वर ने और कभी मेरे भाग्य में नहीं लिखी। और फिर एक बार मैंने जी-जान से उठने की कोशिश की, किन्तु किसी तरह सिर सीधा न कर सका और अन्त में ऑंख मींचकर पड़ रहा।

आज चक्रवर्ती-गृहिणी से रू-ब-रू बातचीत हुई। शायद अत्यन्त दु:ख में से ही नारियों का सच्चा और गहरा परिचय मिला करता है। उन्हें पहिचान लेने की ऐसी कसौटी भी और कुछ नहीं हो सकती, और पुरुष के पास उनका हृदय जीतने के लिए इतना बड़ा अस्त्र भी और कोई नहीं होगा।

मेरे बिछौने के पास आकर वे बोलीं, ''नींद खुली बेटा?''

मैंने ऑंखें खोलकर देखा। उनकी उमर शायद चालीस के लगभग होगी- कुछ ज्यादा भी हो सकती है। रंग काला है, पर नाक-ऑंख साधारण भद्र-गृहस्थ-घर की स्त्रियों के समान ही हैं, कहीं भी कुछ रूखापन नहीं, कुछ है तो सिर्फ सर्वांगव्यापी गम्भीर दारिद्य और अनशन के चिह्न-दृष्टि पड़ते ही यह बात मालूम हो जाती है।

उन्होंने फिर पूछा, ''अंधेरे में दिखाई नहीं देता बेटा, पर, मेरा बड़ा लड़का जीता रहता तो तुम-सा ही बड़ा होता।''

इसका क्या उत्तर दूँ? उन्होंने चट से मेरे माथे पर हाथ रखकर कहा, ''बुखार तो अब भी खूब है।''

मैंने ऑंखें मींच ली थीं। ऑंखें मींचे ही मींचे कहा, ''कोई जरा सहारा दे दे, तो शायद, अस्पताल तक पहुँच जाऊँगा- कोई ज्यादा दूर थोड़े ही है।''

मैं उनका चेहरा तो न देख सका, पर इतना तो समझ गया कि मेरी बात से उनका कण्ठस्वर मानो वेदना से भर आया। बोलीं, ''दु:ख की जलन से कल कई एक बातें मुँह से निकल गयी हैं, इसी से, बेटा, गुस्सा होकर उस जमपुरी में जाना चाहते हो? और तुम जाना भी चाहोगे तो मैं जाने कब दूँगी?'' इतना कहकर वे कुछ देर तक चुपचाप बैठी रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ''रोगी से नियम नहीं बनता बेटा, देखो न, जो लोग अस्पताल में जाकर रहते हैं, उन्हें वहाँ किस-किसका छुआ हुआ नहीं खाना पड़ता है, बताओ? पर उससे जात थोड़े ही जाती है। मैं साबू बार्ली बनाकर दूँ, तो तुम न खाओगे?''

मैंने गरदन हिलाकर जताया कि इसमें मुझे रंचमात्र भी आपत्ति नहीं और सिर्फ बीमार हूँ इसलिए नहीं, अत्यन्त निरोग अवस्था में भी मुझे इससे कोई परहेज नहीं।

अतएव, वहीं रह गया। कुल मिलाकर शायद चारेक दिन रहा। फिर भी उन चार दिनों की स्मृति सहज में भूलने की नहीं। बुखार एक ही दिन में उतर गया, पर बाकी दिनों में, कमजोर होने के कारण, उन्होंने मुझे वहाँ से हिलने भी न दिया। कैसे भयानक दारिद्रय में इस ब्राह्मण-परिवार के दिन कट रहे हैं, और उस दुर्गति को बिना किसी कुसूर के हजार-गुना कड़घआ कर रक्खा है समाज के अर्थहीन पीड़न ने। चक्रवर्ती-गृहिणी अपनी अविश्रान्त मेहनत के भीतर से भी जरा सी फुरसत पाने पर, मेरे पास आकर बैठ जाती थीं। सिर और माथे पर हाथ फेर देती थीं। तैयारियों के साथ रोग का पथ्य न जुटा सकती थीं, पर उस त्रुटि को अपने व्यवहार और जतन से पूरा कर देने के लिए कैसी एकाग्र चेष्टा उनमें पाता था।

पहले इनकी अवस्था कामचलाऊ अच्छी थी। जमीन-जायदाद भी ऐसी कुछ बुरी नहीं थी। परन्तु, उनके अल्पबुद्धि पति को लोगों ने धोखा दे-देकर आज उन्हें ऐसे दु:ख में डाल दिया है। वे आकर रुपये उधार माँगते थे; कहते थे- हैं तो यहाँ बहुत-से बड़े आदमी, पर कितनों की छाती पर इतने बाल हैं? लिहाजा छाती के उन बालों का परिचय देने के लिए कर्ज करके कर्ज दिया करते थे। पहले तो हाथ चिट्ठी लिखाकर और बाद में स्त्री से छिपाकर जमीन गहने रखकर कर्ज देने लगे। नतीजा अधिकांश स्थलों पर जैसा होता है, यहाँ भी वैसी ही हुआ।

यह कुकार्य चक्रवर्ती के लिए असाध्य् नहीं, इस बात पर मुझे, एक ही रात की अभिज्ञता से, पूरा विश्वास हो गया। बुद्धि के दोष से धन-सम्पत्ति बहुतों की नष्ट हो जाती है, उसका परिणाम भी अत्यन्त दु:खमय होता है, परन्तु यह दु:ख समाज की अनावश्यक और अन्धी निष्ठुरता से कितना ज्यादा बढ़ सकता है, इसका मुझे चक्रवर्ती-गृहिणी की प्रत्येक बात से, नस-नस में, अनुभव हो गया। उनके यहाँ सिर्फ दो सोने की कोठरियाँ हैं, एक में लड़के-बच्चे रहते हैं और दूसरी पर बिल्कुयल और बाहर का आदमी होते हुए भी मैंने दखल जमा लिया। इससे मेरे संकोच की सीमा न रही। मैंने कहा, ''आज तो मेरा बुखार उतर गया है और आप लोगों को भी बड़ी तकलीफ हो रही है। अगर बाहर वाली बैठक में मेरा बिस्तर कर दें, तो मुझे बहुत सन्तोष हो।''

गृहिणी ने गरदन हिलाकर जवाब दिया, ''सो कैसे हो सकता है बेटा! बादल घिर रहे हैं, अगर वर्षा हुई तो उस कमरे में ऐसी जगह ही न रहेगी जहाँ सिर भी रखा जा सके। तुम अभी कमजोर ठहरे, इतना साहस तो मुझसे न होगा।''

उनके ऑंगन में एक तरफ कुछ पुआल पड़ा था, उस पर मैंने गौर किया था। उसी की तरफ इशारा करके मैंने पूछा, ''पहले से मरम्मत क्यों नहीं करा ली? ऑंधी-मेह के दिन तो आ भी गये।''

इसके उत्तर में मालूम हुआ कि मरम्मत कराना कोई आसान बात नहीं। पतित ब्राह्मण होने से इधर का कोई किसान-मजूर उनका काम नहीं करता। आन गाँव में जो मुसलमान काम करने वाले हैं, वे ही घर छा जाते हैं। किसी भी कारण से हो, इस साल वे आ नहीं सके। इसी प्रसंग में वे सहसा रो पड़ीं, बोली, ''बेटा, हम लोगों के दु:ख का क्या कोई अन्त है? उस साल मेरी सात-आठ साल की लड़की अचानक हैजे में मर गयी; पूजा के दिन थे, मेरे भइया गये थे काशीजी घूमने, सो और कोई आदमी न मिलने से छोटे लड़के के साथ अकेले इन्हीं को मसान जाना पड़ा। सो भी क्या किरिया-करम ठीक से हो सका? लकड़ी तक किसी ने काटने न दी। बाप होकर गङ्ढा खोद के गाड़-गूड़कर इन्हें घर लौट आना पड़ा।'' कहते-कहते उनका दबा हुआ पुराना शोक एकबारगी नया होकर दिखाई दे गया। ऑंखें पोंछती हुई जो कुछ कहने लगीं, उसमें मुख्य शिकायत यह थी कि उनके पुरखों में किसी समय किसी ने श्राद्ध का दान ग्रहण किया था- बस यही कसूर हो गया- और श्राद्ध तो हिन्दू का अवश्य कर्त्तव्य है, कोई तो उसका दान लेगा ही, नहीं तो वह श्राद्ध ही असिद्ध और निष्फल हो जायेगा। फिर दोष इसमें कहाँ है? और दोष अगर हो ही, तो आदमी को लोभ में फँसाकर उस काम में प्रवृत्त ही क्यों किया जाता है?

 
इन प्रश्नों का उत्तर देना जितना कठिन है, इतने दिनों बाद इस बात का पता लगाना भी दु:साध्यन है कि उन पुरखों की किस दुष्कृति के दण्डस्वरूप उनके वंशधरों को ऐसी विडम्बना सहनी पड़ रही है। श्राद्ध का दान लेना अच्छा है या बुरा, सो मैं नहीं जानता। बुरा होने पर भी यह बात सच है कि व्यक्तिगत रूप से इस काम को वे नहीं करते, इसलिए वे निरपराध हैं। अफसोस तो इस बात का है कि मनुष्य, पड़ोसी होकर, अपने दूसरे पड़ोसी की जीवन-यात्रा का मार्ग, बिना किसी दोष के, इतना दुर्गम और दु:खमय बना दे सकता है, ऐसी हृदयहीन निर्दय बर्बरता का उदाहरण दुनिया में शायद सिर्फ हिन्दू समाज के सिवा और कहीं न मिलेगा।

उन्होंने फिर कहा, ''इस गाँव में आदमी ज्यादा नहीं हैं, मलेरिया बुखार और हैजे से आधे मर गये हैं। अब सिर्फ ब्राह्मण, कायस्थ और राजपूतों के घर बचे हैं। हम लोग तो लाचार हैं बेटा, नहीं तो जी चाहता है कि कहीं किसी मुसलमानों के गाँव में जा रहें।''

मैंने कहा, ''मगर वहाँ तो जात जा सकती है?''

उन्होंने इस प्रश्न का ठीक जवाब नहीं दिया, बोलीं, ''नाते में मेरे एक चचिया-ससुर लगते हैं, वे दुमका गये थे, नौकरी करने, सो ईसाई हो गये थे। उन्हें अब कोई तकलीफ नहीं है।''

मैं चुप रह गया। कोई हिन्दू-धर्म छोड़कर दूसरा धर्म ग्रहण करने को मन ही मन उत्सुक हो रहा है, यह सुनकर मुझे बड़ा दु:ख होता है। मगर उन्हें सान्त्वना भी देना चाहूँ तो दूँ क्या कहकर? अब तक मैं यही समझता था कि सिर्फ अस्पृश्य नीच जातियाँ ही हिन्दू-समाज में अत्याचार सहा करती हैं, मगर आज समझा कि बचा कोई भी नहीं है। अर्थहीन अविवेचन से परस्पर एक-दूसरे के जीवन को दूभर कर डालना ही मानो इस समाज का मज्जागत संस्कार है। बाद में बहुतों से मैंने पूछा है, और बहुतों ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा है, कि यह अन्याय है, यह गर्हित है, बुरी बात है; फिर भी इसके निराकरण का वे कोई भी मार्ग नहीं बतला पाते। वे इस अन्याय के बीच में से जन्म से लेकर मौत तक चलने के लिए राजी हैं, पर प्रतिकार की प्रवृत्ति या साहस- इन दोनों में से कोई भी बात उनमें नहीं। जानने-समझने के बाद भी अन्याय के प्रतिकार कर नेकी शक्ति जिनमें से इस तरह बिला गयी है, वह जाति अधिक दिनों तक कैसे जीवित रह सकती है, यह सोच-समझ सकना मुश्किल ही है।

तीन दिन के बाद, स्वस्थ होकर, मैं जब सबेरे ही जाने को तैयार हुआ, तो मैंने कहा, ''माँ, आज मुझे विदा दीजिए।''

चक्रवर्ती-गृहिणी की दोनों ऑंखों में ऑंसू भर आये। कहा, ''दु:खियों के घर बहुत दु:ख पाया बेटा, तुम्हें कड़घई बातें भी कम सुननी पड़ीं।''

इस बात का उत्तर ढूँढे न मिला। ''नहीं, नहीं सो कोई बात नहीं- मैं बड़े आराम से रहा, मैं बहुत कृतज्ञ हूँ।'' इत्यादि मामूली शराफत की बातें कहने में भी मुझे शरम होने लगी। वज्रानन्द की बात याद आयी। उसने एक दिन कहा था, ''घर त्याग आने से क्या होता है? इस देश में घर माँ-बहिनें मौजूद हैं, हमारी मजाल क्या है कि हम उनके आकर्षण से बचकर निकल जाँय।'' बात असल में कितनी सत्य है!

अत्यन्त गरीबी और कमअक्ल पति के अविचारित रम्य या ऊटपटाँग कार्यकलापों ने इस गृहस्थ-घर की गृहिणी को लगभग पागल बना दिया है, परन्तु जब उनको अनुभव हुआ कि मैं बीमार हूँ, लाचार हूँ- तब तो उनके लिए सोचने की कोई बात ही नहीं रह गयी। मातृत्व के सीमाहीन स्नेह से मेरे रोग तथा पराये घर ठहरने के सम्पूर्ण दु:ख को मानो उन्होंने अपने दोनों हाथों से एकबारगी पोंछकर अलग कर दिया।

चक्रवर्तीजी कोशिश करके कहीं से एक बैलगाड़ी जुटा लाये। गृहिणी की बड़ी भारी इच्छा थी कि मैं नहा-धो और खा-पीकर जाऊँ, परन्तु धूप और गरमी बढ़ जाने की आशंका से वे ज्यादा अनुरोध न कर सकीं। चलते समय सिर्फ देवी-देवताओं का नाम-स्मरण करके ऑंखें पोंछती हुई बोलीं, ''बेटा, यदि कभी इधर आओ, तो एक बार यहाँ जरूर हो आना ।''

उधर जाना भी कभी नहीं हुआ, और वहाँ जरूर हो आना भी मुझसे न बन सका। बहुत दिनों बाद सिर्फ इतना सुना कि राजलक्ष्मी ने कुशारी महाशय के हाथ से उन लोगों का बहुत-सा कर्जा अपने ऊपर ले लिया है।

000

करीब तीसरे पहर गंगामाटी, घर पर पहुँचा। द्वार के दोनों तरफ कदलीवृक्ष और मंगल-घट स्थापित थे। ऊपर आम्र-पल्लवों के बन्दनवार लटक रहे थे। बाहर बहुत से लोग इकट्ठे बैठे तमाखू पी रहे थे। बैलगाड़ी की आहट से उन लोगों ने मुँह उठाकर देखा। शायद इसी के मधुर शब्द से आकृष्ट होकर और एक साहब अकस्मात् सामने आ खड़े हुए- देखा तो वज्रानन्द हैं। उनका उल्लसित कलरव उद्दाम हो उठा, और तब कोई आदमी दौड़कर भीतर खबर देने भी चला गया। स्वामीजी कहने लगे कि ''मैंने आकर सब हाल सबसे कह सुनाया है। तबसे बराबर चारों तरफ आदमी भेजकर तुम्हें ढूँढ़ा जा रहा है- एक ओर जैसे कोशिश करने में कोई बात उठा न रखी गयी, वैसे ही दूसरी ओर दुश्चिन्ता की भी कोई हद नहीं रही। आखिर माजरा क्या था? अचानक कहाँ डुबकी लगा गये थे, बताइए तो? गाड़ीवान छोकरे ने तो जाकर कहा कि आपको वह गंगामाटी के रास्ते में उतारकर चला आया है।''

राजलक्ष्मी काम में व्यस्त थी, उसने आकर पैरों के आगे माथा टेककर प्रणाम किया और कहा, ''घर-भर को, सबको तुमने कैसी कड़ी सजा दी है, कुछ कहने की नहीं।'' फिर वज्रानन्द को लक्ष्य करके कहा, ''मेरा मन जान गया था कि आज ये आयेंगे ही।''

मैंने हँसकर कहा, ''द्वार पर केले के थम्भ और घट-स्थापना देखकर ही मैं समझ गया कि मेरे आने की खबर तुम्हें मिल गयी है।'' दरवाजे की ओट में रतन आकर खड़ा था। वह चट से बोल उठा, ''जी नहीं, इसलिए नहीं- आज घर पर ब्राह्मण-भोजन होगा न, इसीलिए। वक्रनाथ के दर्शन कर आने के बाद से माँ...''

राजलक्ष्मी ने डाँट लगाकर उसे जहाँ का तहाँ रोक दिया, ''अब व्याख्या करने की जरूरत नहीं, तू जा, अपना काम देख।''

उसके सुर्ख चेहरे की तरफ देखकर वज्रानन्द हँस दिया, बोला, ''समझे नहीं भाई साहब, किसी भी काम में लगे रहने से मन की उत्कण्ठा बहुत बढ़ जाती है। सही नहीं जाती। यह ब्राह्मण-भोजन का आयोजन सिर्फ इसीलिए है। क्यों जीजी, है न यही बात?''

राजलक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, ''वह गुस्सा होकर वहाँ से चल दी। वज्रानन्द ने पूछा, ''बड़े दुबले-से मालूम पड़ते हो भाई साहब, इस बीच में क्या बात हो गयी थी, बताइए तो? घर न आकर अचानक गायब क्यों हो गये थे?''

गायब होने का कारण विस्तार के साथ सुना दिया। सुनकर आनन्द ने कहा, ''भविष्य में अब कभी इस तरह न भागियेगा। किस तरह इनके दिन कटे हैं, सो ऑंख से देखे बगैर विश्वास नहीं किया जा सकता।''

यह मैं जानता था। लिहाजा, ऑंखों से बिना देखे ही मैंने विश्वास कर लिया। रतन चाय और हुक्का दे गया। आनन्द ने कहा, ''मैं भी बाहर जाता हूँ भाई साहब। इस वक्त आपके पास बैठे रहने से कोई एक जनी शायद इस जनम में मेरा मुँह न देखेंगी।'' यह कहकर हँसते हुए उन्होंने प्रस्थान किया।

कुछ देर बाद राजलक्ष्मी ने प्रवेश करके अत्यन्त स्वाभाविक भाव से कहा, ''उस कमरे में गरम पानी, अंगौछा, धोती, सब रख आई हूँ- सिर्फ सिर और देह अंगौछकर कपड़े बदल डालो जाकर। बुखार में, खबरदार, सिर पर पानी न डाल लेना, कहे देती हूँ।''

मैंने कहा, ''मगर स्वामीजी से तुमने गलत बात सुनी है; बुखार मुझे नहीं है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं है तो न सही, पर होने में देर कितनी लगती है?''

मैंने कहा, ''इसकी खबर तो तुम्हें ठीक दे नहीं सकता, पर मारे गर्मी के मेरा तो सारा शरीर जला जा रहा है, नहाना जरूरी है मेरे लिए।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''जरूरी है क्या? तो फिर अकेले तुमसे न बन पड़ेगा। चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ।'' इतना कहकर वह खुद ही हँस पड़ी और बोली, ''क्यों झगड़ा करके मुझे तकलीफ दे रहे हो और खुद भी परेशानी उठा रहे हो। इतनी अबेर में मत नहाओ, मान जाओ, तुम्हें मेरी कसम है।''

इस ढंग की बात करने में राजलक्ष्मी बेजोड़ है। अपनी इच्छा को ही जबर्दस्ती दूसरे के कन्धों पर लाद देने के कड़घएपन को वह स्नेह के मधुर रस से इस तरह भर दे सकती है कि उस जिद के विरुद्ध किसी का भी कोई संकल्प सिर नहीं उठा सकता। बात बिल्कुाल तुच्छ है, स्नान न करने से भी मेरा चल जायेगा; किन्तु जिन्हें किये बिना नहीं चल सकता ऐसे कामों में भी, बहुत बार देखा है कि, उसकी इच्छा-शक्ति को अतिक्रम करके चलने की शक्ति मुझमें नहीं। मुझमें ही क्यों, किसी में भी वह शक्ति मैंने नहीं देखी। मुझे उठाकर वह भोजन लाने चली गयी। मैंने कहा, ''पहले तुम्हारे ब्राह्मण-भोजन का काम निबट जाने दो न?''

राजलक्ष्मी ने आश्चर्य के साथ कहा, ''माफ करो तुम, वह काम निबटते-निबटते तो साँझ हो जायेगी।''

''सो हो जाने दो।''

राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''ठीक है। ब्राह्मण-भोजन को मेरे ही सिर रहने दो, उसके लिए तुम्हें भूखा रखने से मेरी स्वर्ग की सीढ़ी ऊपर के बदले बिल्कुकल पाताल की ओर चली जायेगी।'' यह कहकर वह भोजन लेने चल दी।

कुछ ही समय बाद जब वह मेरे पास भोजन कराने बैठी, तब देखा कि सामने रोगी का पथ्य है। ब्रह्मभोज की सारी गुरुपाक वस्तुओं के साथ उसका कोई सम्बन्ध न था। मालूम हुआ कि मेरे आने के बाद ही उसने उसे अपने हाथ से तैयार किया है। फिर भी, जबसे आया हूँ, उसके आचरण में- उसकी बातचीत के ढंग से, कुछ ऐसा अनुभव कर रहा था जो केवल अपरिचित ही नहीं था, अतिशय नूतन भी था। वही खिलाने के समय बिल्कुरल स्पष्ट हो गया, परन्तु वह कैसे और किस तरह सुस्पष्ट हो गया, कोई पूछता तो मैं उसे अस्पष्टता से भी न समझा सकता। शायद यही बात प्रत्युत्तर में कह देता कि जान पड़ता है मनुष्य की अत्यन्त व्यथा की अनुभूति को प्रकाश करने की भाषा अब भी आविष्कृत नहीं हुई। राजलक्ष्मी खिलाने बैठी, किन्तु खाने-न खाने के सम्बन्ध में उसकी पहले जैसी अभ्यस्त जबर्दसती नहीं थी, था सिर्फ व्याकुल अनुनय। जोर नहीं, भिक्षा। बाहर के नेत्रों से वह चीज नहीं पकड़ी जाती, केवल मनुष्य की निभृत हृदय की अपलक ऑंखें ही देख सकती हैं।

भोजन समाप्त हो गया। राजलक्ष्मी बोली, ''तो अब मैं जाऊँ?''

अतिथि सज्जन बाहर इकट्ठे हो रहे थे। मैंने कहा, ''जाओ।''

मेरे जूठे बर्तन हाथ में लेकर जब वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर हो गयी; तब बहुत देर तक मैं अन्यमनस्क होकर उस ओर चुपचाप देखता रहा। खयाल आने लगा कि राजलक्ष्मी को जैसा छोड़ गया था, इन थोड़े से दिनों में ठीक वैसा तो उसे नहीं पाया। आनन्द कहता था कि दीदी कल से ही एक तरह से उपवास कर रही हैं, आज भी जलस्पर्श नहीं किया है; और कल कब उनका उपवास टूटेगा इसका भी कोई निश्चय नहीं। यह असम्भव नहीं। हमेशा से ही देखता आ रहा हूँ कि उसका धर्मपिपासु चित्त कभी किसी भी कृच्छ साधना से पराङ्मुख नहीं रहा। यहाँ आने के बाद से तो सुनन्दा के साहचर्य से उसकी वह अविचलित निष्ठा बढ़ती ही जा रही थी। आज उसे थोड़ी ही देर देखने का अवकाश पाया है, किन्तु जिस दुर्जेय रहस्मय मार्ग पर वह अविश्रान्त द्रुतगति से पैर उठाती हुई चल रही है; उसे देखते हुए खयाल आया कि उसके निन्दित जीवन की संचित कालिमा चाहे जितनी अधिक हो वह उसके समीप तक नहीं पहुँच सकती। किन्तु मैं? उसके मार्ग के बीच उत्तुंग गिरिश्रेणी के समान सब कुछ रोककर खड़ा हूँ।

काम-काज समाप्त करके राजलक्ष्मी ने जब नि:शब्द पैर रखते हुए घर में प्रवेश किया तब शायद दस बज चुके थे। रोशनी कम करके, बहुत ही सावधानी से मेरी मशहरी खींचकर वह अपनी शय्या पर सोने जा रही थी कि मैंने कहा, ''तुम्हारा ब्रह्मभोज तो संध्याा के पहले ही समाप्त हो गया था; फिर इतनी रात कैसे हो गयी?''

राजलक्ष्मी पहले चौंकी, फिर हँसकर बोली, ''मेरी तकदीर! मैं तो डरती-डरती आ रही हूँ कि तुम्हारी नींद न टूट जाय, परन्तु तुम तो अब तक जाग रहे हो, नींद नहीं आई?''

''तुम्हारी आशा से ही जाग रहा हूँ।''

''मेरी आशा से? तो बुलवा क्यों न लिया?'' यह कहकर वह पास आई और मसहरी का एक किनारा उठाकर मेरी शय्या के सिरहाने बैठ गयी। फिर हमेशा के अभ्यास के अनुसार मेरे बालों में उसने अपने दोनों हाथों की दसों अंगुलियाँ डालते हुए कहा, ''मुझे बुलवा क्यों न लिया?''

''बुलाने से क्या तुम आतीं? तुम्हें कितना काम रहता है!''

''रहे काम! तुम्हारे बुलाने पर 'ना' कह सकूँ यह मेरे वश की बात है?''

इसका कोई उत्तर न था। जानता हूँ, सचमुच ही मेरे आह्नान की परवा न करने की शक्ति उसमें नहीं है। किन्तु, आज इस सत्य को भी सत्य समझने की शक्ति मुझमें कहाँ है?

राजलक्ष्मी ने कहा, ''चुप क्यों हो रहे?''

''सोच रहा हूँ।''

''सोच रहे हो? क्या सोच रहे हो?'' यह कहकर उसने धीरे से मेरे कपाल पर अपना मस्तक झुकाकर आहिस्ते से कहा, ''मुझ पर गुस्सा होकर घर से चले गये थे?''

''तुमने यह कैसे जाना कि गुस्सा होकर चला गया था?''

राजलक्ष्मी ने मस्तक नहीं उठाया, आहिस्ते से कहा, ''यदि मैं गुस्सा होकर चली जाऊँ तो क्या तुम नहीं जान पाओगे?''

बोला, ''शायद जान लूँगा।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम 'शायद' जान पाओ, परन्तु मैं तो निश्चयपूर्वक जान सकती हूँ और तुम्हारे जानने की अपेक्षा बहुत ज्यादा जान सकती हूँ।''

मैंने हँसकर कहा, ''ऐसा ही होगा। इस विवाद में तुम्हें हराकर मैं विजयी नहीं होना चाहता लक्ष्मी, स्वयं हार जाने की अपेक्षा तुम्हारे हारने से मेरी बहुत अधिक हानि है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''यदि जानते हो तो फिर कहते क्यों हो?''

मैं बोला, ''कहाँ कहता हूँ! कहना तो बहुत दिनों से बन्द कर दिया है, यह बात शायद तुम्हें मालूम नहीं।''

राजलक्ष्मी चुप हो रही। पहले होता तो राजलक्ष्मी मुझे सहज में न छोड़ती- हजारों प्रश्न करके इसकी कैफियत तलब करके ही मानती, किन्तु इस समय वह मौन-मुख से स्तब्ध ही रही। कुछ समय बाद मुँह उठाकर उसने दूसरी बात छेड़ दी। पूछा, ''तुम्हें क्या इस बीच ज्वर आ गया था? घर पर मुझे खबर क्यों न भेजी?''

खबर न भेजने के कारण बतलाए। एक तो खबर लाने वाला आदमी नहीं था, दूसरे, जिनके पास खबर भेजनी थी वे कहाँ हैं यह भी मालूम न था। किन्तु मैं कहाँ और किस हालत में था, यह सविस्तार बतलाया। चक्रवर्ती-गृहिणी के पास से आज सवेरे ही विदा लेकर आया हूँ। उस दीन-हीन गृहस्थ परिवार में जिस हाल में मैं आश्रय लिया था और जिस प्रकार बेहद गरीबी में गृहिणी ने अज्ञात कुलशील रोगग्रस्त अतिथि की पुत्र से भी अधिक स्नेह-शुश्रूषा की थी वह कहने लगा तो कृतज्ञता और वेदना से मेरी ऑंखें ऑंसुओं से भर गयीं।

राजलक्ष्मी ने हाथ बढ़ाकर मेरे ऑंसू पोंछ दिये और कहा, ''तो वे ऋणमुक्त हो जाँय, इसके लिए उन्हें कुछ रुपये क्यों नहीं भेज देते?''

मैंने कहा, ''रुपये होते तो भेजता, पर मेरे पास रुपये तो हैं नहीं।''

मेरी इन बातों से राजलक्ष्मी को मर्मान्तक पीड़ा होती थी। आज भी वह मन ही मन उतनी ही दु:खित हुई, लेकिन, उसका सब पैसा-रुपया मेरा ही है, यह बात आज उसने उतने जोर से प्रकट नहीं की। पहले तो इस बात पर वह कलह करने के लिए तैयार हो जाया करती थी। वह चुप रही।

उसमें आज यह नयी बात देखी। मेरी इस बात पर उसका इस प्रकार शान्त चुपचाप बैठे रहना मुझे भी अखरा। थोड़ी देर बाद वह एक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर सीधे बैठ गयी। मानो इस दीर्घ नि:श्वास से उसने अपने चारों ओर छाये हुए वाष्पाच्छन्न आवरण को फाड़ देना चाहा। घर की धीमी रोशनी में उसका चेहरा अच्छी तरह नहीं देख सका; लेकिन, जिस समय उससे बात की उससे कण्ठ-स्वर में मैंने एक आश्चर्यजनक परिवर्तन पाया। राजलक्ष्मी बोली, बर्मा से तुम्हारी चिट्ठी का जवाब आया है। दफ्तर का बड़ा लिफाफा है, जरूरी समझकर आनन्द से पढ़वा लिया है।''

''उसके बाद?''

''बड़े साहब ने तुम्हारी दरखास्त मंजूर कर ली है और जतलाया है कि वापस जाने पर पहली नौकरी फिर मिल जायेगी।''

''अच्छा?''

''हाँ। लाऊँ वह चिट्ठी?''

''नहीं, ठहरो। कल सुबह देखूँगा।''

फिर हम दोनों चुप हो रहे। क्या कहूँ, किस तरह यह चुप्पी भंग करूँ, यह न सोच सकने के कारण मन ही मन उद्विग्न होने लगा। अकस्मात् मेरे सिर पर ऑंसू की एक बूँद टपक पड़ी। मैंने धीरे से पूछा, ''मेरी दरखास्त मंजूर हुई है, यह तो बुरी खबर नहीं है। लेकिन तुम रो क्यों पड़ीं?''

राजलक्ष्मी ऑंचल से ऑंसू पोंछकर बोली, ''तुम फिर अपनी नौकरी के लिए विदेश चले जाने की चेष्टा कर रहे हो, यह बात तुमने मुझे बतलाई क्यों नहीं? क्या तुमने समझा था कि मैं रोकूँगी?''

मैंने कहा, ''नहीं, बल्कि बतलाने पर तो तुम और उत्साहित करतीं। लेकिन, इसलिए नहीं- मालूम होता है कि मैंने सोचा था कि इन सब छोटी बातों के सुनने के लिए तुम्हारे पास समय न होगा।''

राजलक्ष्मी चुप हो रही। लेकिन उसने अपना उच्छ्वसित नि:श्वास रोकने के लिए प्राण-पण से जो कोशिश की, वह मुझसे छिपी न रही। पर यह हालत क्षण भर ही रही। उसके बाद उसने मीठे स्वर में कहा, ''इस बात का जवाब देकर अपने अपराध का बोझ और न बढ़ाऊँगी। तुम जाओ, मैं बिल्कुथल न रोकूँगी।''

यह कहकर वह थोड़ी ही देर चुप रहकर फिर बोली, ''तुम यहाँ न आते तो ऐसा मालूम होता है कि मैं कभी यह जान ही न पाती कि मैं तुम्हें कैसी दुर्गति मैं खींच लाई हूँ। यह गंगामाटी का अन्धकूप स्त्रियों के लिए गुजारे लायक हो सकता है, लेकिन पुरुषों के लिए नहीं। यहाँ का बेकार और उद्देश्यहीन जीवन तो तुम्हारे लिए आत्महत्या के समान है। यह मैंने तुम्हारी ऑंखों से स्पष्ट देखा है।''

मैंने पूछा, ''या तुम्हें किसी ने दिखा दिया है?''

राजलक्ष्मी बोली, ''नहीं। मैंने खुद ही देखा है। तीर्थयात्रा की थी, पर भगवान को नहीं देख पाई। उसके बदले केवल तुम्हारा लक्ष्य-भ्रष्ट नीरस चेहरा ही दिन-रात दिखाई देता रहा। मेरे लिए तुम्हें बहुत त्याग करना पड़ा है; किन्तु अब और नहीं।''

इतनी देर तक मेरे मन में एक जलन ही थी; किन्तु उसके कण्ठ-स्वर की अनिर्वचनीय करुणा से मैं विह्वल हो गया। बोला, ''तुम्हें क्या कम त्याग करना पड़ा है लक्ष्मी? गंगामाटी तुम्हारे लायक भी तो नहीं है?''

लेकिन, यह बात कहकर मैं संकोच से भर गया, क्योंकि, मेरे मुख से लापरवाही से भी जो गर्हित बात निकल गयी, वह इस तीक्ष्ण बुद्धिशालिनी रमणी से छिप न सकी। पर आज उसने मुझे माफ कर दिया। मालूम होता है, बात की अच्छाई बुराई पर मान अभिमान का जाल बुनकर नष्ट करने के लिए उसके पास समय ही नहीं था, बोली, ''बल्कि मैं ही गंगामाटी के योग्य नहीं हूँ- सभी यह बात नहीं समझ सकेंगे; पर तुम्हें यह समझना चाहिए कि मुझे सचमुच ही कुछ त्याग नहीं करना पड़ा। लोगों ने एक दिन पत्थर की तरह मेरी छाती पर जो भार रख दिया था क्या सिर्फ वही दूर हो गया है? नहीं। आजीवन तुम्हीं को चाहा था, इसलिए, तुम्हें पाकर जो मुझे त्याग से असंख्य गुना बदला मिल गया है, सो क्या तुम नहीं जानते?''

जवाब न दे सका। जैसे कोई अन्तरतम का वासी मुझसे यह बात कहने लगा, ''भूल हुई है, तुमसे भारी भूल हुई है। उसे न समझकर तुमने बड़ा अविचार किया है।''

राजलक्ष्मी ने ठीक इसी तार पर चोट की। कहा, ''सोचा था कि तुम्हारे ही लिए कभी यह बात तुम्हें न बतलाऊँगी; लेकिन, आज मैं अपने को और नहीं रोक सकी। मुझे सबसे अधिक दु:ख इसी बात का हो रहा है कि तुम अनायास ही यह कैसे सोच सके कि पुण्य के लोभ का मुझे ऐसा उन्माद हो गया है कि मैंने तुम्हारी उपेक्षा करनी शुरू कर दी है? क्रुद्ध होकर चले जाने के पहले यह बात तुम्हें एक बार भी याद न आई कि इस काल और पर काल में राजलक्ष्मी के लिए तुम्हारी अपेक्षा लाभ की चीज और कौन-सी है!''

यह कहते-कहते उसकी ऑंखों के ऑंसू झर-झर के मेरे मुँह पर आ पड़े।

बातों से तसल्ली देने की भाषा उस समय मन में न आ सकी, सिर्फ माथे के ऊपर रक्खा हुआ उसका दाहिना हाथ अपने हाथ में ले लिया। राजलक्ष्मी बायें हाथ से ऑंसू पोंछकर कुछ देर चुपचाप बैठी रही।

उसके बाद बोली, ''मैं देख आऊँ, लोगों का खाना-पीना हो चुका या नहीं। तुम सो जाओ।''

यह कहकर वह आहिस्ते से हाथ छुड़ाकर बाहर चली गयी। उसे पकड़ रखना चाहता तो रख सकता था; लेकिन चेष्टा नहीं की। वह भी फिर लौटकर नहीं आई। जब तक नींद नहीं आई तब तक यही बात सोचता रहा कि जबर्दस्ती रोक रखता तो लाभ क्या होता? मेरी ओर से तो कभी कोई जोर था ही नहीं; सारा जोर उसकी तरफ से था। आज अगर वही बन्धन खोलकर मुझे मुक्त करते हुए अपने आपको भी मुक्त करना चाहती है, तो मैं उसे किस तरह रोकूँ?

सुबह जागने पर पहले उसकी खाट की ओर नजर डाली तो मालूम हुआ कि राजलक्ष्मी कमरे में नहीं है। रात को वह आई ही नहीं, या बड़े तड़के ही उठकर बाहर चली गयी, यह भी मैं न समझ सका। बाहरी कमरे में जाकर देखा तो वहाँ कुछ कोलाहल-सा हो रहा है। रतन केटली से गरम चाय पात्र में डाल रहा है और उसके पास ही बैठी राजलक्ष्मी स्टोव पर सिंघाड़े और कचौरियाँ तल रही है। वज्रानन्द खाद्य-सामग्री की ओर अपनी निस्पृह निरासक्त दृष्टि से देख रहे हैं। मुझे आते देख राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर ऑंचल खींच लिया और वज्रानन्द कलरव कर उठे, ''आ गये भाई, आपको देरी होते देख समझा था कि कहीं सब कुछ ठण्डा न हो जाय।''

राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''हाँ, तुम्हारे पेट में जाकर सब ठण्डा हो जाता।''

आनन्द ने कहा, ''बहन, साधु-सन्यासी का आदर करना सीखिए। ऐसी कड़ी बात न कहिए।''

फिर मुझसे कहा, ''कहो, तबीयत तो ठीक नहीं दिखती, जरा हाथ तो देखूँ।''

राजलक्ष्मी ने घबराकर कहा, ''रहने दो आनन्द, तुम्हारी डॉक्टरी की जरूरत नहीं है; उनकी तबीयत ठीक है।''

''यही निश्चय करने के लिए तो एक बार हाथ...''

राजलक्ष्मी बोली, ''नहीं, तुम्हें हाथ देखने की जरूरत नहीं। तुम्हें क्या लगता है, अभी साबूदाने की व्यवस्था दे दोगे।''

मैंने कहा, ''साबूदाना मैंने बहुत खाया है, इसलिए, मैं उसकी व्यवस्था देने पर भी नहीं सुनूँगा।''

''तुम्हें सुनने की जरूरत भी नहीं है।'' कहकर राजलक्ष्मी ने थोड़े से गरम सिंघाड़ों और कचौरियों की प्लेट मेरी ओर बढ़ा दी और फिर रतन से कहा, ''अपने बाबू को चाय दे।''

वज्रानन्द ने सन्यासी होने के पहले डॉक्टरी पास की थी, अत: वे सहज ही हार मानने वाले नहीं थे; गर्दन हिलाते हुए बोलने लगे, ''लेकिन बहन, आप पर एक उत्तरदायित्व...''

राजलक्ष्मी ने बीच ही में उनकी बात काट दी, ''लो सुनो, इनका उत्तरदायित्व मुझ पर नहीं तो क्या तुम पर है? आज तक जितना उत्तरदायित्व कन्धों पर लेकर इन्हें खड़ा रखा गया है, उसे यदि सुनते तो बहिन के पास डॉक्टरी करने न आते।''

यह कहकर राजलक्ष्मी ने बाकी की सारी की सारी खाद्य-सामग्री एक थाल में रखकर उनकी ओर सरकाते हुए हँसकर कहा, ''अब खाओ यह सब, बातें बन्द करो।''

आनन्द 'हें हें' करते हुए बोला, ''अरे, क्या इतना खाया जा सकता है?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''न खाया जायेगा तो सन्यासी बनने क्यों गये थे? और पाँच भले-मानसों की तरह गृहस्थ बने रहते!''

आनन्द की दोनों ऑंखें सहसा भर आयीं। बोला, ''आप जैसी बहिनों का दल इस बंगाल में है तभी तो सन्यासी बना हूँ, नहीं तो, कसम खाकर कहता हूँ कि यह गेरुआ-एरुआ अजया के जल में बहाकर घर चला जाता। लेकिन, मेरा एक अनुरोध है बहिन। परसों से ही तुमने एक तरह से उपास कर रक्खा है, इसलिए आज पूजा-पाठ आदि से जरा जल्दी ही निबट लेना। इन चीजों में अब भी कोई स्पर्श-दोष नहीं लगा है। यदि आप कहें- न हो तो'' कहकर उन्होंने सामने की भोज्य सामग्री पर नजर डाली।

राजलक्ष्मी डरकर ऑंखें फाड़ती हुई बोली, ''यह कहते क्या हो आनन्द, कल तो हमारे सारे ब्राह्मण आ नहीं सके थे!''

मैंने कहा, ''तो वे पहले भोजन कर जावें, उसके बाद सही।''

आनन्द बोला, ''ऐसा है तो लो, मुझे ही उठना पड़ा। उनके नाम और पते दो-पाखण्डियों को गले में अंगोछा डालकर खींच लाऊँगा और भोजन कराकर छोड़ूँगा।''

यह कहकर वह उठने के बदले थाल खींचकर भोजन करने लगा!

राजलक्ष्मी हँसकर बोली, ''सन्यासी हैं न, देव-ब्राह्मणों में बड़ी भक्ति है!''

इस तरह हमारा सबेरे का चाय-नाश्ते का काम जब पूरा हुआ तो आठ बज चुके थे। आकर बाहर बैठ गया। शरीर में भी ग्लानि नहीं थी और हँसी-ठट्ठे से मन भी मानों स्वच्छ प्रसन्न हो गया था। राजलक्ष्मी की विगत रात्रि की बातों और आज की बातों तथा आचरण में कोई एकता नहीं थी। उसने अभिमान और वेदना से दु:खित होकर ही वैसी बातें की थीं, इसमें सन्देह नहीं रहा। वास्तव में रात के स्तब्ध अन्धकार के आवरण में तुच्छ और मामूली घटना को बड़ी और कठोर कल्पना करके जिस दु:ख और दुश्चिन्ता को भोगा था, आज दिन के प्रकाश में, उसे याद करके मैं मन ही मन लज्जित हुआ और कौतुक भी अनुभव किया।

कल की तरह आज उत्सव-समारोह नहीं था, तो भी, दिन-भर बीच-बीच में न्यौते और बिना न्यौते लोगों के भोजन का सिलसिला बराबर जारी रहा। फिर एक बार हम लोग चाय का सरो-सामान लेकर कमरे के फर्श पर आसन लगाकर बैठ गये। शाम का काम-काज समाप्त करके राजलक्ष्मी भी थोड़ी देर के लिए हम लोगों के कमरे में आयी।

वज्रानन्द बोले, ''स्वागत है, बहिन।''

राजलक्ष्मी ने उनकी ओर हँसते हुए देखकर कहा, ''मैं समझती हूँ कि अब सन्यासी की देव-सेवा आरम्भ हो गयी है, इसीलिए न इतना आनन्द है!''

आनन्द ने कहा, ''तुमने झूठा नहीं कहा बहिन, संसार में जितने आनन्द हैं उनमें भजनानन्द और भोजनानन्द ही श्रेष्ठ हैं, और शास्त्र का कथन है कि त्यागी के लिए तो दूसरा ही सर्वश्रेष्ठ है।''

राजलक्ष्मी बोली, ''हाँ, तुम जैसे सन्यासियों के लिए!''

आनन्द ने जवाब दिया, ''यह भी झूठ नहीं है, बहिन। आप गृहिणी हैं, इसीलिए इसका मर्म नहीं ग्रहण कर सकीं। तभी तो हम त्यागियों का दल इधर मौज कर रहा है और आप तीन दिन से सिर्फ दूसरों को खिलाने में लगी हैं और खुद उपवास करके मर रही हैं!''

राजलक्ष्मी बोली, ''मर कहाँ रही हूँ, भाई? दिन पर दिन तो देख रही हूँ, इस शरीर की श्रीवृद्धि ही हो रही है।''

आनन्द बोले, ''इसका कारण यही है कि वह होने के लिए बाध्यो है। उस बार भी आपको देख गया था, इस बार भी आकर देख रहा हूँ। आपकी ओर देखकर ऐसा नहीं मालूम होता कि कोई संसार की चीज देख रहा हूँ, यह जैसे दुनिया से अलग और ही कुछ है।''

राजलक्ष्मी का मुँह लज्जा से लाल हो उठा।

मैंने उससे हँसकर कहा, ''देखी तुमने अपने आनन्द की युक्ति-प्रणाली?''

यह सुनकर आनन्द भी हँसकर बोला, ''यह तो युक्ति नहीं,- स्तुति है। भैया, यदि यह दृष्टि होती तो क्यों नौकरी की दरखास्त देने बर्मा जाते? अच्छा बहिन, किस दुष्ट-बुद्धि देवता ने भला इस अन्धे आदमी को तुम्हारे मत्थे मढ़ दिया था? उसे क्या और कोई काम नहीं था?''

राजलक्ष्मी हँस पड़ी। फिर अपने माथे पर हाथ ठोककर बोली, ''देवता का दोष नहीं है भाई, दोष इस ललाट का है और इनको तो इनका बड़ा भारी दुश्मन भी दोष दे नहीं सकता।'' यह कहकर उसने मुझे दिखाते हुए कहा- ''पाठशाला में ये थे सबके सरदार। जितना पढ़ाते न थे उससे बहुत ज्यादा मारते थे। उस समय पढ़ती तो थी सिर्फ 'बोधोदय'। पर, पुस्तक का बोध तो क्या होना था, बोध हुआ और एक तरह का। बच्ची थी, फूल कहाँ पाती, जंगली करौंदों की माला गूँथकर इन्हें एक दिन वरमाला पहिना दी। सोचती हूँ उस समय अगर उन फलों के साथ काँटे भी गूँथ देती!''

बोलते-बोलते उसका कुपित कण्ठ-स्वर दबी हँसी की आभा से सुन्दर हो उठा।

आनन्द बोला, ''ओह! कैसा भयानक गुस्सा है!''

राजलक्ष्मी बोली, ''गुस्सा नहीं तो क्या है? काँटे लाकर देनेवाला कोई और होता तो जरूर गूँथ देती। अब भी पाऊँ तो गूँथ दूँ।''

यह कहकर वह तेजी से बाहर जा रही थी कि आनन्द ने पुकारकर कहा, ''भागती हो?''

''क्यों, क्या और कोई काम नहीं है? चाय की प्याली हाथ में लिये उन्हें कलह करने का समय है, मुझे नहीं है।''

आनन्द ने कहा, ''बहन, मैं तुम्हारा अनुगत हूँ। पर इस अभियोग में शह देने में तो मुझे भी लज्जा का अनुभव होता है। ये मुँह से एक भी बात निकालते, तो इन्हें इसमें घसीटने की चेष्टा भी की जाती; पर एकदम गूँगे आदमी को कैसे फन्दे में डाला जाए? और डाला भी जाए तो धर्म कैसे सहन करेगा?''

राजलक्ष्मी बोली, ''इसी की तो मुझे सबसे बड़ी जलन है। अच्छा, अब जो धर्म को सहन हो वही करो। चाय बिल्कुतल ठण्डी हो गयी। मैं तब तक एक बार रसोईघर का चक्कअर लगा आऊँ।''

यह कहकर राजलक्ष्मी कमरे के बाहर हो गयी।

वज्रानन्द ने पूछा, ''बर्मा जाने का विचार क्या अब भी है भाई साहब? लेकिन बहिन साथ हर्गिज नहीं जाँयगी, यह मुझसे कह चुकी हैं।''

''यह मैं जानता हूँ।''

''तो फिर?''

''तब अकेले ही जाना होगा।''

वज्रानन्द ने कहा, ''देखिए, यह आपका अन्याय है। आप लोगों को पैसा कमाने की जरूरत तो है नहीं, फिर क्यों जाँयगे दूसरे की गुलामी करने?''

''कम से कम उसका अभ्यास बनाये रखने के लिए!''

''यह तो गुस्से की बात हुई भाई।''

''पर गुस्से के सिवाय क्या मनुष्य के लिए और कोई कारण नहीं होता आनन्द?''

आनन्द बोला, ''हो भी, तो वह दूसरे के लिए समझना कठिन है।''

इच्छा तो हुई कि कहूँ, ''यह कठिन काम दूसरे करें ही क्यों'', पर वाद-विवाद से चीज पीछे कड़वी हो जाती है, इस आशंका से चुप हो गया।

इसी समय बाहर का काम निबटाकर राजलक्ष्मी ने कमरे में प्रवेश किया। इस बार वह खड़ी न रहकर भलमनसी के साथ आनन्द के पास स्थिरतापूर्वक बैठ गयी। आनन्द ने मुझे लक्ष्य करके कहा, ''बहिन, इन्होंने कहा है कि कम से कम गुलामी का अभ्यास बनाये रखने के लिए इन्हें विदेश जाना चाहिए। मैंने कहा कि यदि यही चाहिए तो आइए मेरे काम में योग दीजिए, विदेश न जाकर देश की गुलामी में ही दोनों भाई जिन्दगी बिता दें।''

राजलक्ष्मी बोली, ''लेकिन, यह तो डॉक्टरी नहीं जानते आनन्द।''

आनन्द बोला, ''क्या मैं सिर्फ डॉक्टरी ही करता हूँ? स्कूल पाठशालाएँ भी तो चलाता हूँ और उन लोगों की दुर्दशा आज कितनी ओर से और कितनी अधिक हो रही है, इसे बराबर समझाने की चेष्टा करता हूँ।''

''पर वे समझते हैं क्या?''

आनन्द ने कहा, ''आसानी से नहीं समझते। किन्तु, मनुष्य की शुभ इच्छा यदि हृदय से सत्य होकर बाहर निकलती है, तो चेष्टा व्यर्थ नहीं जाती, बहिन।''

राजलक्ष्मी ने मेरी ओर तिरछी नजर से देखकर धीरे से सिर हिला दिया। मालूम होता है कि उसने विश्वास नहीं किया और वह मेरे लिए मन ही मन सशंक हो उठी। पीछे कहीं मैं भी सम्मति न दे बैठूँ, कहीं मैं भी...

आनन्द ने पूछा, ''सर क्यों हिला दिया?''

राजलक्ष्मी ने पहले कुछ हँसने की चेष्टा की, फिर स्निग्ध मधुर कण्ठ से कहा, ''देश की दुर्दशा कितनी बड़ी है, यह मैं भी जानती हूँ आनन्द। पर तुम्हारे अकेले की चेष्टा से क्या होगा भाई?'' फिर मेरी ओर इशारा करके कहा, ''और ये सहायता करने जाँयगे? तब तो हो गया, फिर तो मेरी तरह तुम्हारे दिन भी इन्हीं की सेवा में कटेंगे; और कोई काम न करना होगा।''

यह कहकर वह हँस पड़ी।

उसको हँसते देख आनन्द भी हँसकर बोला, ''तो इनको ले जाने की जरूरत नहीं है बहिन, ये चिरकाल तक तुम्हारी ऑंखों के मणि होकर रहें। पर यह अकेले-दुकेले की बात नहीं है। अकेले मनुष्य की भी आन्तरिक इच्छा-शक्ति इतनी बड़ी होती है कि उसका परिमाण नहीं होता- बिल्कुलल वामनावतार के पाँव की तरह। बाहर से देखने पर छोटा है, पर वही छोटा-सा पाँव जब फैलता है सब सारे संसार को ढँक देता है।''

मैंने देखा कि वामनावतार की उपमा से राजलक्ष्मी का चित्त कोमल हो गया है; किन्तु जवाब में उसने कुछ नहीं कहा।

आनन्द कहने लगा, ''शायद आपकी ही बात ठीक है, मैं विशेष कुछ नहीं कर सकता। लेकिन, एक काम करता हूँ। जहाँ तक हो सकता है, दुखियों के दु:खों का अंश मैं बँटाता हूँ बहिन।''

राजलक्ष्मी और भी आर्द्र होकर बोली, ''यह मैं जानती हूँ आनन्द। यह तो मैंने उसी दिन समझ लिया था जिस दिन तुम्हें पहले-पहल देखा था।''

मालूम होता है कि आनन्द ने इस बात पर ध्याथन नहीं दिया और वह अपनी ही बात के सिलसिले में कहने लगा, ''आप लोगों की तरह मुझे भी किसी चीज का अभाव नहीं है। बाप का जो कुछ है वह आनन्द से जीवन बिताने के लिए जरूरत से ज्यादा है, पर मेरा उससे कुछ सरोकार नहीं है। इस दुखी देश में सुखभोग की लालसा भी यदि इस जीवन में रोककर रख सकूँ तो मेरे लिए यही बहुत है।''

रतन ने आकर बतलाया कि रसोइए ने भोजन तैयार कर लिया है।

राजलक्ष्मी ने उसे आसन तैयार करने का आदेश देकर कहा, ''आज तुम लोग भोजन से जल्दी ही निबट लो आनन्द, मैं बहुत थक गयी हूँ।''

वह थक गयी थी, इसमें सन्देह नहीं, लेकिन थकने की दुहाई देते उसे कभी नहीं देखा था। हम दोनों चुपचाप उठ बैठे। आज का प्रभात हम लोगों की एक बड़ी भारी प्रसन्नता में से होकर हँसी-दिल्लगी के साथ आरम्भ हुआ था और संध्याझ की मजलिस भी जमी थी। हास-परिहास से उज्ज्वल होकर, किन्तु समाप्त हुई मानो निरानन्द के मलिन अवसाद के साथ। जिस समय हम लोग भोजन करने के लिए रसाईघर की ओर चले उस समय किसी के मुँह से कोई बात नहीं निकली।

दूसरे दिन सबेरे वज्रानन्द ने प्रस्थान की तैयारी कर दी। और कभी यदि किसी के कहीं जाने की चर्चा उठती तो राजलक्ष्मी हमेशा आपत्ति किया करती। अच्छा दिन नहीं है, अच्छी घड़ी नहीं है, आदि कारण बतलाकर, आज नहीं कल, कल नहीं परसों, करके बहुत बाधा डालती थी। लेकिन, आज उसने मुँह से एक बात भी नहीं निकाली। विदा लेकर आनन्द जिस समय तैयार हुआ उस समय पास जाकर उससे मीठे स्वर से पूछा, ''आनन्द, अब क्या न आओगे भाई?''

मैं पास ही था, इसलिए, स्पष्ट देख सका, सन्यासी की ऑंखों की दीप्ति अस्पष्ट सी हो गयी है, किन्तु तत्काल ही आत्म-संवरण करके वह मुँह पर हँसी लाते हुए बोला, ''आऊँगा क्यों नहीं बहिन, अगर जीवित रहा तो बीच-बीच में उत्पात करने के लिए हाजिर होता रहूँगा।''

''सचमुच?''

''जरूर।''

''लेकिन, हम लोग तो जल्द ही चले जाँयगे। जहाँ हम रहेंगे वहाँ आओगे क्या?''

''हुक्म देने पर आऊँगा क्यों नहीं।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''आना। अपना पता मुझे लिख दो, मैं तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी।''

आनन्द ने जेब से कागज-पेन्सिल निकालकर पता लिखा और उसके हाथ में दे दिया। सन्यासी होकर भी दोनों हाथ जोड़कर मस्तक से लगाते हुए उसने हम दोनों को नमस्कार किया और रतन ने आकर उसकी पद-धूलि ग्रहण की। उसे आशीर्वाद दे वह धीरे-धीरे मकान के बाहर हो गया।

000

सन्यासी वज्रानन्द अपना औषधियों का बॉक्स और केनवास का बैग लेकर जिस दिन बाहर गया उस दिन से जैसे वह इस घर का आनन्द ही छीन-छानकर ले गया। यही नहीं, मुझे ऐसा लगा मानो वह उस शून्य स्थान को छिद्रहीन निरानन्द से भर गया। घने सिवार से भरे हुए जलाशय का जल, जो अपने अविश्रान्त चांचल्य के अभिघातों से निर्मल हो रहा था, मानो उसके अर्न्तध्याजन होने के साथ ही साथ लिपटकर एकाकार होने लगा। तो भी, छह-सात दिन कट गये।

राजलक्ष्मी प्राय: सारे दिन घर से बाहर रहती है। कहाँ जाती है, क्या करती है, नहीं जानता, उससे पूछता भी नहीं। शाम को जब एक बार उससे भेंट होती है तो उस वक्त वह या तो अन्यमनस्क दिखाई देती है या गुमाश्ताजी साथ होते हैं और काम-काज की बातें होती रहती हैं। अकेले घर में उस 'आनन्द' की बार-बार याद आती है जो मेरा कोई नहीं है। खयाल आता, यदि वह अकस्मात् आ जाय, तो सिर्फ मैं ही खुश होता यह बात नहीं है, बरामदे की दूसरी ओर चिराग की रोशनी में बैठी हुई राजलक्ष्मी भी, जो न जाने क्या करने की चेष्टा कर रही है, मैं समझता हूँ, उतनी ही खुश होती। ऐसा ही लगने लगा। एक दिन जिनके उन्मुख युग्म-हृदय जिस बाहर का सब प्रकार का संस्रव परिहार करके एकान्त सम्मिलन की आकांक्षा से व्याकुल रहते थे, आज टूटने-विच्छिन्न होने के दिन उसी बाहर की उन्हें कितनी बड़ी जरूरत है? ऐसा लगता है कि चाहे कोई भी हो यदि वह एक बार बीच में आकर खड़ा हो जाय, तो मानो जान बच जाय।

इस तरह जब दिन कटना मुश्किल हो गया, तब रतन एकाएक आकर उपस्थित हो गया। वह अपनी हँसी दबाने में असमर्थ था। राजलक्ष्मी घर पर थी नहीं, इसलिए उसे डरने की ज़रूरत नहीं थी, तो भी वह एक बार सावधानी से चारों ओर नज़र दौड़ाकर आहिस्ते से बोला, ''मालूम होता है आपने सुना नहीं।''

मैं बोला, ''नहीं, क्या बात है?''

रतन बोला, ''दुर्गा माता कृपा करें कि माँ की यही बुद्धि अन्त तक बनी रहे। हम सब दो-चार दिन में ही यहाँ से चल रहे हैं।''

''कहाँ चल रहे हैं?''

रतन ने एक बार और दरवाजे के बाहर देख लिया और कहा, ''यह तो ठीक-ठीक अब भी नहीं मालूम कर सका हूँ। या तो पटना या काशी और या- लेकिन, इनके अतिरिक्त तो और कहीं माँ का अपना मकान है नहीं।''

मैं चुप रहा। इतनी बड़ी बात पर भी मुझे चुप और उत्सुकता रहित देखकर उसे ऐसा मालूम हुआ कि मैं उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा हूँ, इसीलिए, वह अपने दबे गले की सारी ताकत लगाकर बोल उठा, ''मैं सच कह रहा हूँ। हमारा चलना निश्चित है। आ:, जान बचे तब तो, है न ठीक?''

मैंने कहा, ''हाँ।''

रतन बहुत खुश होकर बोला, ''दो-चार दिन और सबके साथ तकलीफ झेल लीजिए, बस। अधिक से अधिक एक हफ्ते की बात और है, इससे ज्यादा नहीं। माँ गंगामाटी की सारी व्यवस्था कुशारी महाशय के साथ ठीक कर चुकी है। अब सामान बाँध-बूँधकर एक बार 'दुर्गा दुर्गा' कहकर चल देना ही बाकी रहा है। हम सब ठहरे शहर के निवासी, क्या यहाँ हमारा मन कभी लग सकता है?'' यह कहकर वह प्रसन्नता के आवेग में उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही बाहर चला गया।

रतन को कोई बात अज्ञात नहीं थी। उसकी समझ में मैं भी राजलक्ष्मी के अनुचरों में से एक था, इससे अधिक और कुछ नहीं। वह जानता था कि किसी के भी मतामत का कोई मूल्य नहीं है, सबकी पसन्द और नापसन्द मालकिन की इच्छा और अभिरुचि पर ही निर्भर है।

जो आभास रतन दे गया उसका मर्म वह खुद नहीं समझता था, लेकिन, उसके वाक्य का वह गूढ़ अर्थ, देखते ही देखते, मेरे चित्त-पट में चारों ओर से परिस्फुट हो उठा। राजलक्ष्मी की शक्ति की सीमा नहीं है। उस विपुल शक्ति को लगाकर वह संसार में जैसे अपने आपको लेकर ही खेल खेल रही है। एक दिन इस खेल में मेरी ज़रूरत हुई थी, उसकी उस एकाग्र-वासना के प्रचण्ड आकर्षण को रोकने की क्षमता मुझमें नहीं थी। मैं झुककर आया था, मुझे वह बड़ा बनाकर नहीं लाई थी। सोचता था, मेरे लिए उसने अनेक स्वार्थ-त्याग किये हैं; पर आज दिखाई पड़ा कि ठीक यही बात नहीं है। राजलक्ष्मी के स्वार्थ का केन्द्र इतने समय तक देखा नहीं था, इसीलिए ऐसा सोचता आया हूँ। धन, अर्थ, ऐश्वर्य-बहुत कुछ उसने छोड़ा है, लेकिन क्या मेरे ही लिए? इन सबने कूड़े के ढेर की तरह क्या उसका निजी प्रयोजन का ही रास्ता नहीं रोका है? राजलक्ष्मी के निकट मेरे और मुझे प्राप्त करने के बीच कितना प्रभेद है यह सत्य मुझ पर आज प्रकट हुआ। आज उसका चित्त इस लोक के सब-कुछ पाये हुए को तुच्छ करके अग्रसर होने को तैयार हुआ है। उसके उस पथ के बीच खड़े होने के लिए मुझे स्थान नहीं है। इसलिए, अन्यान्य कूड़े-कचरे की तरह अब मुझे भी रास्ते के एक तरफ अनादर से पड़ा रहना पड़ेगा, चाहे वह कितना ही दु:ख दे। पर अस्वीकार करने के लिए मार्ग नहीं है। अस्वीकार किया भी नहीं कभी।

दूसरे दिन सबेरे ही जान पाया कि चालाक रतन ने जो तथ्य संग्रह किया था वह गलत नहीं है। गंगामाटी-सम्बन्धी सारी व्यवस्था स्थिर हो गयी है। राजलक्ष्मी के ही मुँह से मुझे इस बात का पता लगा है। प्रात:काल नियमित पूजा-पाठ करके वह और दिनों की तरह बाहर नहीं गयी। धीरे-धीरे आकर मेरे पास बैठ गयी और बोली, ''परसों इसी वक्त अगर खा-पीकर हम सब यहाँ से निकल सकें तो साँईथिया में पच्छिम की गाड़ी आसानी से मिल सकती है, न?''

मैं बोला, ''मिल सकती है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''यहाँ का सब बन्दोबस्त मैं एक तरह से पूरा कर चुकी हूँ। कुशारी महाशय जिस तरह देख-रेख रखते थे, उसी तरह रखेंगे।''

मैंने कहा, ''अच्छा ही हुआ।''

राजलक्ष्मी कुछ देर चुप रही। मालूम होता था कि प्रश्न को ठीक तौर से आरम्भ नहीं कर सकती थी, इसीलिए अन्त में बोली, ''बंकू को चिट्ठी लिख दी है कि वह गाड़ी रिजर्व करके स्टेशन पर हाजिर रहेगा। लेकिन रहे तब तो?''

मैंने कहा, ''जरूर रहेगा। वह तुम्हारा हुक्म नहीं टालेगा।''

राजलक्ष्मी बोली, ''नहीं, जहाँ तक हो सकेगा टालेगा नहीं, तो भी- अच्छा तुम क्या हमारे साथ नहीं चल सकोगे?''

कहाँ जाना होगा, यह प्रश्न नहीं कर सका। सिर्फ इतना ही मुँह से निकला, ''अगर मेरे चलने की जरूरत समझो तो चल सकता हूँ।''

इसके प्रत्युत्तर में राजलक्ष्मी कुछ न बोल सकी। कुछ देर चुप रहने के बाद सहसा घबराकर बोल उठी, ''अरे, तुम्हारे लिए चाय तो अब तक लाया ही नहीं।''

मैं बोला, ''मालूम होता है वह काम में व्यस्त है।''

वास्तव में चाय लाने का समय काफी गुजर चुका था। और दिन होता तो वह नौकरों का ऐसा अपराध कभी क्षमा न कर सकती, बक-झककर तूफान-वर्षा कर देती, लेकिन उस समय जैसे वह एक प्रकार की लज्जा से मर गयी और एक भी बात न कहकर तेजी से कमरे के बाहर हो गयी।

निश्चित दिन को प्रस्थान के पहले समस्त प्रजाजन आये और घेरकर खड़े हो गये। डोम की लड़की मालती को फिर एक बार देखने की इच्छा थी, लेकिन, उसने इस गाँव को छोड़कर किसी और ही गाँव में अपनी गृहस्थी जमा ली है, इसलिए नहीं देख सका। पता लगा कि उस जगह वह अपने पति के साथ सुखी है। दोनों कुशारी-बन्धु अपने परिवार सहित रात रहते ही आ गये। जुलाहे का सम्पत्ति-सम्बन्धी झगड़े का निबटारा हो जाने से वे फिर एक हो गये हैं। राजलक्ष्मी ने कैसे यह सब किया इसे विस्तारपूर्वक जानने का कौतूहल भी नहीं था, और न जाना ही। उनके मुँह की ओर देखकर केवल इतना ही जान सका कि झगड़े का अन्त हो गया है और पूर्व-संचित अनबन की ग्लानि अब किसी भी पक्ष के मन में मौजूद नहीं है।

सुनन्दा आई और उसने अपने बच्चे को लेकर मुझे प्रणाम किया। कहा, ''हम सबको आप जल्दी न भूल जाँयगे, यह मैं जानती हूँ। इसके लिए तो प्रार्थना करना व्यर्थ है।''

मैंने हँसकर कहा, ''तो मुझसे और किस बात के लिए प्रार्थना करोगी बहिन?''

''मेरे बच्चे को आप आशीर्वाद दें।''

मैं बोला, ''यही तो व्यर्थ प्रार्थना है, सुनन्दा। तुम जैसी माँ के बच्चे को क्या आशीर्वाद दिया जाय, यह तो मैं भी नहीं जानता, बहिन।''

राजलक्ष्मी किसी काम से पास ही से जा रही थी। यह बात ज्यों ही उसके कानों पड़ी, वह कमरे के अन्दर आ खड़ी हुई और सुनन्दा की ओर से बोली, ''इस बच्चे को यह आशीर्वाद दे चलो कि यह बड़ा होकर तुम्हारे ही जैसा मन पाये।''

मैंने हँसकर कहा, ''बड़ा अच्छा आशीर्वाद है! शायद तुम्हारे बच्चे से लक्ष्मी मजाक करना चाहती है, सुनन्दा।''

 
बात समाप्त होने के पहले ही राजलक्ष्मी बोल उठी, ''मजाक करना चाहूँगी अपने ही बच्चे के साथ, और वह भी चलने के समय?''

यह कहकर वह क्षण-भर स्तब्ध रहकर बोली, ''मैं भी इसकी माँ के समान हूँ। मैं भी भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि वे इसे यही दें। इससे बड़ा तो मैं कोई और वर जानती नहीं।''

सहसा मैंने देखा, उसकी दोनों ऑंखों में ऑंसू भर आये हैं। और कुछ भी न कहकर वह कमरे से बाहर चली गयी।

इसके बाद सबसे मिलकर, ऑंखों में ऑंसू भरे हुए, गंगामाटी से विदा ली। यहाँ तक कि रतन भी फिर-फिरकर ऑंखें पोंछने लगा। जो यहाँ रहने वाले थे उन्होंने हम सबसे फिर आने के लिए अत्यधिक अनुरोध किया और सबने उन्हें फिर आने का वचन भी दिया, केवल मैं ही न दे सका। मैंने ही निश्चित रूप से समझा था कि इस जीवन में अब मेरा यहाँ लौटना सम्भव नहीं है। इसलिए जाते समय इस छोटे-से गाँव को बार-बार फिर-फिरकर देखते समय मन में केवल यही विचार उत्पन्न होने लगा कि अपरिमेय माधुर्य और वेदना से परिपूर्ण एक वियोगान्त नाटक की यवनिका अभी ही गिरी है; नाट्यशाला के दीप बुझ गये हैं और अब मनुष्यों से परिपूर्ण संसार की सहस्र-विधा भीड़ में से मुझे रास्ते पर बाहर निकलना पड़ेगा। किन्तु, जिस मन को जनता के बीच बड़ी होशियारी से कदम रखने की जरूरत है, मेरा वही मन जैसे नशे की खुमारी से एकदम आच्छन्न हो रहा।

शाम के बाद हम सब साँईथिया आ पहुँचे। राजलक्ष्मी के किसी भी आदेश और उपदेश की बंकू ने अवहेलना नहीं की। सब इन्तजाम करके वह स्टेशन के प्लेटफार्म पर खुद उपस्थित था। यथासमय गाड़ी आई और वह सरो-सामान लादकर, रतन को नौकरों के डिब्बे में चढ़ा, विमाता को लेकर गाड़ी में बैठ गया। लेकिन, उसने मेरे साथ कोई घनिष्ठता दिखाने की चेष्टा नहीं की, क्योंकि, अब उसका मूल्य बढ़ गया है; घर-बार रुपये-पैसे लेकर अब संसार में वह विशेष आदमियों में गिना जाने लगा है। बंकू विलक्षण व्यक्ति है। सभी अवस्थाओं को मानकर चलना जानता है। यह विद्या जिसे आती है, संसार में उसे दु:ख-भोग नहीं करना पड़ता।

गाड़ी छूटने में अब भी पाँच मिनट की देरी है; लेकिन, मेरी कलकत्ते जानेवाली गाड़ी तो आयेगी प्राय: रात के पिछले पहर। एक ओर स्थिर होकर खड़ा था। राजलक्ष्मी ने गाड़ी की खिड़की से मुँह निकालकर हाथ के इशारे से मुझे बुलाया। पास पहुँचते ही कहा, ''जरा अन्दर आओ।'' अन्दर जाने पर उसने हाथ पकड़कर मुझे पास बिठा लिया और कहा, ''तुम क्या बहुत जल्दी ही बर्मा चले जाओगे? जाने के पहले क्या एक बार और नहीं मिल सकोगे?''

मैं बोला, ''अगर जरूरत हो तो मिल सकता हूँ।''

राजलक्ष्मी धीरे से बोली, ''संसार जिसे जरूरत कहता है वह नहीं। केवल एक बार और देखना चाहती हूँ। आओगे?''

''आऊँगा।''

''कलकत्ते पहुँचकर चिट्ठी भेजोगे?''

''भेजूँगा।''

बाहर गाड़ी छूटने का अन्तिम घण्टा बज उठा और गार्ड ने अपनी हरी रोशनी बार-बार हिलाकर गाड़ी छोड़ने का संकेत किया। राजलक्ष्मी ने झुककर मेरे पाँवों की धूल ली और मेरा हाथ छोड़ दिया। मैंने ज्यों ही नीचे उतरकर गाड़ी का दरवाजा बन्द किया, गाड़ी रवाना हो गयी। रात अंधेरी थी, अच्छी तरह कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था, सिर्फ प्लेटफार्म के मिट्टी के तेल के लैम्पों ने धीरे-धीरे सरकती हुई गाड़ी की उस खुली खिड़की की एक अस्पष्ट नारी-मूर्ति पर कुछ रोशनी डाली।

कलकत्ता आकर मैंने चिट्ठी भेजी और उसका जवाब भी पाया। यहाँ कोई अधिक काम तो था नहीं, जो कुछ था वह पन्द्रह दिन में समाप्त हो गया। अब विदेश जाने का आयोजन करना होगा। लेकिन, उसके पहले वादे के अनुसार एक बार फिर राजलक्ष्मी से मिल आना होगा। दो सप्ताह और भी यों ही बीत गये। मन में एक आशंका थी कि न जाने उसका क्या मतलब हो, शायद आसानी से छोड़ना नहीं चाहे, या इतनी दूर जाने के विरुद्ध तरह-तरह के उज्र और आपत्तियाँ खड़ी करके जिद करे- कुछ भी असम्भव नहीं है। इस समय वह काशी में है। उसके रहने का पता भी जानता हूँ; इधर उसके दो-तीन पत्र भी आ चुके हैं, और यह भी विशेष रूप से लक्ष्य कर चुका हूँ कि मेरे वादे को याद दिलाने के सम्बन्ध में कहीं भी उसने इशारा करने का प्रयत्न नहीं किया है। न करने की तो बात ही है। मन ही मन कहा, अपने को इतना छोटा बनाकर मैं भी शायद मुँह खोलकर यह नहीं लिख सकता कि तुम आकर एक बार मुझसे मिल जाओ। देखते-देखते अकस्मात् मैं जैसे अधीर हो उठा। और इस जीवन के साथ वह इतनी जकड़ी हुई है, यह बात इतने दिन कैसे भूला हुआ था, यह सोचकर अवाक् हो गया। घड़ी निकालकर देखी, अब भी समय है, गाड़ी पकड़ी जा सकती है। तब समान डेरे पर पड़ा रहा और मैं बाहर निकल पड़ा।

इधर-उधर फैली हुई चीजों को देखकर मन में आया, रहें ये सब पड़ी हुईं। मेरी जरूरतों को जो मुझसे भी अधिक अच्छी तरह जानती है, उसी के उद्देश्य से-उसी से मिलने के लिए, जब यात्रा करना है, तब यह जरूरतों का बोझा नहीं ढोऊँगा। रात को गाड़ी में किसी तरह नींद नहीं आई, अलस तन्द्रा के झोंकों से मुँदी हुई दोनों ऑंखों की पलकों पर कितने विचार और कितनी कल्पनाएँ खेलती हूई घूमने लगीं उनका आदि-अन्त नहीं। शायद, अधिकांश ही विशृंखल थीं, परन्तु, सभी जैसे मधु से भरी हुईं। धीरे-धीरे सुबह हुई, दिन चढ़ने लगा, लोगों के चढ़ने-उतरने, बोलने-पुकारने और दौड़-धूप करने की हद नहीं, तेज धूप के कारण चारों ओर कहीं भी कुहरे का चिह्न नहीं रहा; पर, मेरी ऑंखें बिल्कुईल वाष्पाछन्न हो रहीं।

रास्ते में गाड़ी लेट हो जाने के कारण राजलक्ष्मी के काशी के मकान पर जब मैं पहुँचा तो बहुत देरी हो गयी थी। बैठक के सामने एक बूढ़े से ब्राह्मण हुक्का पी रहे थे। उन्होंने मुँह उठाकर पूछा, ''क्या चाहते हैं?''

यह सहसा नहीं बतला सका कि क्या चाहता हूँ। उन्होंने फिर पूछा, ''किसे खोज रहे हैं?''

किसे खोज रहा हूँ, सहसा यह बतलाना भी कठिन हो गया। जरा रुककर बोला, ''रतन है क्या?''

''नहीं, वह बाजार गया है।''

ब्राह्मण सज्जन व्यक्ति थे। मेरे धूलि-भरे मलिन मुख की ओर देखकर शायद उन्होंने अनुमान कर लिया कि मैं दूर से आ रहा हूँ, इसलिए दयापूर्ण स्वर में बोले- ''आप बैठिए, वह जल्द आएगा। आपको क्या सिर्फ उसी की जरूरत है?''

पास ही एक चौकी पर बैठ गया। उनके प्रश्न का ठीक उत्तर न देकर पूछ बैठा, ''यहाँ बंकू बाबू हैं?''

''हैं क्यों नहीं।''

यह कहकर उन्होंने एक नये नौकर को कहा कि बंकू बाबू को बुला दे।

बंकू ने आकर देखा तो पहले वह बहुत विस्मित हुआ। बाद में मुझे अपनी बैठक में ले जाकर और बिठाकर बोला, ''हम लोग तो समझते थे कि आप बर्मा चले गये।''

इस 'हम लोग' का क्या मतलब है, यह मैं पूछ नहीं सका। बंकू ने कहा, ''आपका सामान अभी गाड़ी पर ही है क्या?''

''नहीं, मैं साथ में कोई सामान नहीं लाया।''

''नहीं लाये? तो क्या रात की ही गाड़ी से लौट जाना है?''

मैंने कहा, ''सम्भव हुआ तो ऐसा ही विचार करके आया हूँ।''

बंकू बोला, ''तब ठीक है, इतने थोड़े वक्त के लिए सामान की क्या जरूरत!''

नौकर आकर धोती, गमछा और हाथ-मुँह धोने को पानी आदि जरूरी चीजें दे गया; पर, और कोई मेरे पास नहीं आया।

भोजन के लिए बुलाहट हुई, जाकर देखा, चौके में मेरे और बंकू के बैठने की जगह पास पास ही की गयी है। दक्षिण का दरवाजा ठेलकर राजलक्ष्मी ने अन्दर प्रवेश करके मुझे प्रणाम किया। शुरू में तो शायद उसे पहिचान ही न सका। जब पहिचाना तो ऑंखों के सामने मानो अन्धकार छा गया। यहाँ कौन है और कौन नहीं, नहीं सूझ पड़ा। दूसरे ही क्षण खयाल आया कि मैं अपनी मर्यादा बनाये रखकर, कुछ ऐसा न करके जिसमें कि हँसी हो, इस घर से फिर सहज ही भले मानस की तरह किस तरह बाहर हो सकूँगा।

राजलक्ष्मी ने पूछा, ''गाड़ी में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई?''

इसके सिवा वह और क्या पूछ सकती थी? मैं धीरे से आसन पर बैठकर कुछ क्षण स्तब्ध रहा, शायद एक घड़ी से अधिक नहीं और फिर मुँह उठाकर बोला, ''नहीं, तकलीफ नहीं हुई।''

इस बार उसके मुँह की ओर अच्छी तरह देखा तो मालूम हुआ कि उसने न केवल सारे आभूषण ही उतार कर शरीर पर एक सादी किनारी की धोती धारण कर रक्खी है, बल्कि, उसकी पीठ पर लटकने वाली मेघवत् सुदीर्घ केशराशि भी गायब है। माथे के ऊपर, ललाट के नीचे तक, ऑंचल खिंचा हुआ है, तो भी उसमें से कटे बालों की दो-चार लटें गले के दोनों ओर निकलकर बिखर गयी हैं। उपवास और कठोर आत्म-निग्रह की एक ऐसी रूखी दुर्बलता चेहरे से टपक रही है कि अकस्मात् जान पड़ा कि इस एक ही महीने में वह उम्र में भी मानो मुझसे दस साल आगे बढ़ गयी है।

भात के ग्रास मेरे गले में पत्थर की तरह अटकते थे, तो भी, जबर्दस्ती निगलने लगा। बार-बार यही खयाल करने लगा कि इस नारी के जीवन से हमेशा के लिए पुँछकर विलुप्त हो जाऊँ और आज, सिर्फ एक दिन के लिए भी, यह मेरे कम खाने की आलोचना करने का अवसर न पावे।

भोजन समाप्त होने के बाद राजलक्ष्मी ने कहा, ''बंकू कहता था कि तुम आज रात की ही गाड़ी से वापस चले जाना चाहते हो?''

मैंने कहा, ''हाँ।''

''ऐसा भी कहीं होता है! लेकिन, तुम्हारा जहाज तो उस रविवार को छूटेगा।''

इस व्यक्त और अव्यक्त उच्छ्वास से विस्मित होकर उसके मुँह की ओर देखा। देखते ही वह हठात् जैसे लज्जा से मर गयी और दूसरे ही क्षण अपने को सँभालकर धीरे से बोली, ''उसमें तो अब भी तीन दिन की देरी है?''

मैंने कहा, ''हाँ पर और भी तो काम हैं।''

राजलक्ष्मी फिर कुछ कहना चाहती थी; पर चुप रही। शायद मेरी थकावट, और अस्वस्थ होने की सम्भावना के खयाल से उस बात को मुँह पर न ला सकी। कुछ देर और चुप रहकर बोली, ''मेरे गुरुदेव आये हैं।''

समझ गया कि बाहर जिस व्यक्ति से पहले-पहल मुलाकात हुई थी वही गुरुदेव हैं। उन्हीं को दिखाने के लिए ही वह एक बार मुझे इस काशी में खींच लाई थी। शाम को उनके साथ बातचीत हुई। मेरी गाड़ी रात को बारह बजे के बाद छूटेगी। अब भी बहुत समय है। आदमी सचमुच अच्छे हैं। स्वधर्म में अविचल निष्ठा है और उदारता का भी अभाव नहीं है। हमारी सभी बातें जानते हैं, क्योंकि, अपने गुरु से राजलक्ष्मी ने कोई बात छिपाई नहीं है। उन्होंने बहुत-सी बातें कहीं। कहानी के बहाने उपदेश भी कम न दिये; पर वे न उग्र थे और न चोट करने वाले। सब बातें याद नहीं हैं, शायद मन लगाकर सुनी भी नहीं थीं; तो भी, इतना याद है कि कभी न कभी राजलक्ष्मी का इस रूप में परिवर्तन होगा, यह वे जानते थे। दीक्षा के सम्बन्ध में भी वे प्रचलित रीति नहीं मानते हैं। उनका विश्वास है कि जिसका पाँव फिसला है, सद्गुरु की, औरों की अपेक्षा, उसी को अधिक आवश्यकता है।

इसके विरुद्ध मैं कहता ही क्या? उन्होंने फिर एक बार अपनी शिष्या की भक्ति, निष्ठा और धर्मभीरुता की भूरि-भूरि प्रशंसा करके कहा, ''ऐसी स्त्री दूसरी नहीं देखी।''

बात वास्तव में सच थी, पर मैं इसे खुद भी उनके कहने की अपेक्षा कम नहीं जानता था। किन्तु, चुप हो रहा।

समय होने लगा, घोड़ागाड़ी दरवाजे के सामने आकर खड़ी हो गयी। गुरुदेव से विदा लेकर मैं गाड़ी पर जा बैठा। राजलक्ष्मी ने सड़क पर आकर और गाड़ी के अन्दर हाथ बढ़ाकर बार-बार मेरे पाँवों की धूलि अपने माथे पर लगाई, पर मुँह से कुछ भी न कहा। शायद उसमें यह शक्ति ही नहीं थी। अच्छा ही हुआ जो अंधेरे में वह मेरा मुँह नहीं देख सकी। मैं भी स्तब्ध हो रहा, क्या कहूँ, नहीं खोज सका। अन्तिम विदा नि:शब्द ही पूरी हुई। गाड़ी चल पड़ी। मेरी दोनों ऑंखों से ऑंसू गिरने लगे। मैंने अपने सर्वान्त:करण से कहा, ''तुम सुखी होओ, शान्त होओ, तुम्हारा लक्ष्य ध्रुव हो, तुम्हारी ईष्या न करूँगा; लेकिन, जिस अभागे ने सब कुछ त्यागकर एक साथ एक दिन अपनी नौका छोड़ दी थी, इस जीवन में उसे अब किनारा नहीं मिलेगा।''

गाड़ी गड़गड़ाती हुई रवाना हो गयी। उस दिन की विदा के समय जो सब बातें मन में आई थीं, वही फिर जाग उठीं। मन में आया कि यह जो एक जीवन-नाटक का अत्यन्त स्थूल और साधु उपसंहार हुआ है इसकी ख्याति का अन्त नहीं है। इतिहास में लिखने पर इसकी अम्लान दीप्ति कभी धूमिल नहीं होगी। श्रद्धा और विस्मय के साथ मस्तक झुकाने वाले पाठकों का भी किसी दिन संसार में अभाव न होगा- लेकिन, मेरी आत्म-कहानी किसी को भी सुनाने की नहीं है। मैं चला अन्यत्र। मेरे ही समान जो पाप-पंक में डूबी है, जिसे अच्छे होने का कोई मार्ग नहीं रहा है, उसी अभया के आश्रय में। मन ही मन राजलक्ष्मी को लक्ष्य करके बोला, ''तुम्हारा पुण्य-जीवन उन्नत से भी उन्नततर हो, धर्म की महिमा तुम्हारे द्वारा उज्ज्वल से उज्ज्वलतर हो, मैं अब क्षोभ नहीं करूँगा।'' अभया की चिट्ठी मिली है। स्नेह, प्रेम और करुणा से अटल अभया ने, बहन से भी अधिक स्नेहमयी विद्रोहिणी अभया ने, मुझे सादर आमन्त्रित किया है। आने के समय छोटे से दरवाजे पर उसके जो सजल नेत्र दिखे थे, वे याद आ गये और याद आ गया उसका समस्त अतीत और वर्तमान इतिहास। चित्त की शुद्धता, बुद्धि की निर्भरता और आत्मा की स्वाधीनता से वह जैसे मेरे सारे दु:खों को एक क्षण में ढँककर उद्भासित हो उठी।

सहसा गाड़ी के रुकने पर चकित होकर देखा तो स्टेशन आ गया है। उतरकर खड़े होते ही एक और व्यक्ति कोच-बॉक्स से शीघ्रतापूर्वक उतरा और उसने मेरे पैरों पर पड़कर प्रणाम किया।

''कौन है रे, रतन?''

''बाबू, विदेश में चाकर की जरूरत हो तो मुझे खबर दीजिएगा। जब तक जीवित रहूँगा। आपकी सेवा में त्रुटि न होगी।''

गाड़ी की बत्ती की रोशनी उसके मुँह पर पड़ रही थी। मैं विस्मित होकर बोला, ''तू रोता क्यों है?''

रतन ने जवाब नहीं दिया, हाथ से ऑंखें पोंछकर पाँव के पास फिर झुककर प्रणाम किया और वह जल्दी से अन्धकार में अदृश्य हो गया।

आश्चर्य, यह वही रतन है!

अब तक का मेरा जीवन एक उपग्रह की तरह ही बीता, जिसको केन्द्र बनाकर घूमता रहा हूँ उसके निकट तक न तो मिला पहुँचने का अधिकार और न मिली दूर जाने की अनुमति। अधीन नहीं हूँ, लेकिन अपने को स्वाधीन कहने की शक्ति भी मुझमें नहीं। काशी से लौटती हुई ट्रेन में बैठा हुआ बार-बार यही सोच रहा था। सोच रहा था कि मेरी ही किस्मत में बार-बार यह क्यों घटित होता है? मरते दम तक अपना कहने लायक क्या किसी को भी न पा सकूँगा? क्या इसी तरह जिन्दगी काट दूँगा? बचपन की याद आई। दूसरे की इच्छा से दूसरे के घर में वर्ष के बाद वर्ष रहकर इस शरीर को तो किशोर से यौवन की ओर आगे बढ़ाता रहा, लेकिन, मन को न जाने किस रसातल की ओर खदेड़ता रहा। आज बार-बार पुकारने पर भी उस बिदा हुए मन की कोई आहट नहीं मिलती, हालाँकि कभी-कभी क्षीण कण्ठ का अनुसरण कान में आ लगता है, फिर भी, बि‍‍ना संशय के नहीं पहिचान पाता कि वह अपना ही है,- विश्वास करते डर लगता है।

यह समझकर ही यहाँ आया हूँ कि आज मेरे जीवन में राजलक्ष्मी मृत है। नदी-किनारे खड़े होकर विसर्जित प्रतिमा के अन्तिम चिह्न तक को अपनी ऑंखों से देखकर लौटा हूँ- आशा करने का, कल्पना करने का, अपने को धोखा देने का कोई भी सूत्र शेष रखकर नहीं आया हूँ। उस तरफ सब शेष हो गया है, निश्चिन्त हो गया हूँ, पर यह शेष कितना शेष है, यह किससे कहूँ और कहूँ ही क्यों?

पर कुछ दिन का ही तो जिक्र है। कुमार साहब के साथ शिकार खेलने गया। दैवात् पियारी का गाना सुनने के लिए बैठा, बैठते ही भाग्य में कुछ ऐसा मिला जो जितना आकस्मिक था उतना ही अपरिसीम। न अपने गुण से पाया और न अपनी गलती से खोया ही, फिर भी आज स्वीकार करना पड़ा कि मैंने उससे खो दिया- मेरे संसार में सब मिलाकर क्षति ही शेष रही। जा रहा हूँ कलकत्ते, पर वासना फिर एक दिन बर्मा पहुँचायगी। लेकिन यह मानों जुआरी का घर लौटना है। घर का चित्र अस्पष्ट, अप्रकृत है, सिर्फ पथ ही सत्य है। ऐसा लगता है मानों इस पथ पर चलने का कोई अन्त नहीं।

''अरे, यह तो श्रीकान्त है!''

यह खयाल ही न था कि गाड़ी स्टेशन पर ठहरी है। देखता हूँ कि हमारे गाँव के बाबा, राँगा दीदी तथा सतरह-अठारह साल की एक लड़की-तीनों गर्दन, सिर और कन्धों पर गठरी-पोटली लादे प्लेटफॉर्म पर दौड़ लगाते आये और खिड़की के सामने आकर एकाएक थम गये। बाबा बोले, ''उफ, कैसी भीड़ है! जहाँ एक सुई के जाने की भी गुंजाइश नहीं वहाँ तीन-तीन आदमी हैं! तुम्हारा डब्बा तो काफी खाली है, चढ़ आवें?'' ''आइए, कहकर दरवाजा खोल दिया। वे तीनों जनें हाँफते-हाँफते ऊपर आये और जितना सामान था नीचे रख दिया। बाबा ने कहा, ''यह शायद ज्यादा किराये का डब्बा है, दण्ड तो नहीं देना पड़ेगा?''

मैंने कहा, ''नहीं, मैं गार्ड से कह आता हूँ।''

गार्ड को इत्तिला दे अपना कर्त्तव्य पूरा कर जब लौटा, तब वे लोग निश्चिन्त हो आराम से बैठे थे। गाड़ी के छूटने पर राँगा दीदी ने मेरी ओर नजर डाली, और चौंककर कहा, ''तुम्हारा यह कैसा शरीर हो गया है श्रीकान्त? सारा मुँह सूखकर एकदम रस्सी जैसा हो गया है, कहाँ थे इतने दिन? कुछ भी हो, तुम अच्छे तो हो? जब से गये एक चिट्ठी तक नहीं दी? घरवाले सब सोच-फिक्र में मरे जाते हैं!''

इस तरह के प्रश्नों के उत्तर की कोई आशा नहीं करता, जवाब न मिलने पर बुरा भी नहीं मानता।

बाबा ने बताया कि तीर्थ करने के लिए यह सपत्नीक गया-धाम आये थे और यह लड़की उनकी बड़ी साली की नातिनी है,- बाप हजार रुपये गिन देने को तैयार है, लेकिन फिर भी अब तक कोई योग्य पात्र नहीं जुटा। मानती ही न थी इसलिए साथ लाना पड़ा। पूँटू, पेड़े की हाँड़ी तो खोल बेटी- क्यों जी, पूछता हूँ कि दही का बर्तन भूल तो नहीं आयी। हाँ तो पत्तो पर रख दो-दो-चार पेड़े, थोड़ा दही- ऐसा दही तुमने कभी खाया न होगा भैया, कसम खाकर कह सकता हूँ। नहीं-नहीं, लुटिया के पहले हाथ धो डालो, पूँटू, ऐरे-गैरे को तो दे नहीं रही हो- ऐसे लोगों को कैसे देना चाहिए यह सीखो।''

पूँटू ने यथा आदेश कर्त्तव्य का सयत्न पालन किया। अतएव, ट्रेन में ही असमय में अयाचित दही-पेड़े मिल गये। खाते हुए सोचने लगा कि मेरे ही भाग्य में सारी अनहोनी हुआ करती है, सो इस बार कहीं पूँटू के लिए मैं ही हजार रुपये की कीमत का पात्र न चुन लिया जाऊँ! यह खबर उन्हें पहली बार ही मिल गयी थी कि मैं बर्मा में अच्छी नौकरी करने लगा हूँ।

राँगा दीदी बहुत ज्यादा स्नेह करने लगीं, और आत्मीय ज्ञान की वजह से पूँटू भी घण्टे भर में ही घनिष्ठ हो गयी, क्योंकि, मैं कोई दूसरा तो था नहीं!

लड़की अच्छी है। साधारण भद्र गृहस्थ घराने की, रंग गोरा तो नहीं था लेकिन देखने में सुन्दर थी। हालत यह हुई कि बाबा उसके गुणों का बखान खत्म ही न कर पा रहे थे। लिखने-पढ़ने के बारे में राँगा दीदी ने कहा, ''वह ऐसी सुन्दर चिट्टी लिख सकती है कि आजकल के तुम्हारे नाटक और नॉविल भी हार मान जाँय। उस घर की नन्दरानी को एक ऐसी चिट्ठी लिख दी थी कि जमाई महाशय सात दिन के बजाय पन्द्रह दिन की छुट्टी लेकर आ पहुँचे।''

राजलक्ष्मी का उल्लेख किसी ने इंगित से भी नहीं किया जैसे उस तरह की कभी कोई बात हुई थी, यह किसी को याद तक नहीं!

दूसरे दिन गाँव के स्टेशन पर गाड़ी ठहरी तो मुझे भी उतरना पड़ा। उस वक्त करीब दस बजे थे। ठीक वक्त पर स्नानाहार न होने पर पित्त भड़क जाने की आशंका से वे दोनों जनें चिन्तित हो उठे। मकान पहुँचने पर मेरी खातिरदारी की सीमा न रही। पाँच-सात दिन के अन्दर ही गाँव-भर में किसी को यह सन्देह न रहा कि पूँटू का वर मैं ही हूँ। यहाँ तक कि पूँटू को भी सन्देह न रहा।

बाबाजी ने चाहा कि यह शुभ कार्य आगामी वैशाख महीने में ही सम्पन्न हो जाय। पूँटू के रिश्तेदार जो जहाँ थे उन्हें बुला लेने की बात भी उठी। राँगा दीदी ने पुलकित हृदय से कहा, ''देखते हो, किसी के भाग्य में कौन बदा है, यह पहले से कोई भी नहीं बता सकता!''

मैं पहले उदासीन था, फिर चिन्तित हुआ, और उसके बाद डरा। क्रमश: अपने ऊपर ही सन्देह होने लगा कि कहीं मैंने मंजूरी तो नहीं दे दी! मामला ऐसा बेढब हो गया कि कहीं पीछे कोई बुरी घटना न घट जाय इसलिए ना कहने का साहस ही न रहा। पूँटू की माँ यहीं थी। एक दिन रविवार को एकाएक उसके पिता के भी दर्शन हो गये। मुझे कोई नहीं जाने देना चाहता, आमोद-प्रमोद और हँसी-मजाक भी होने लगा- पूँटू मेरे ही सिर पड़ेगी, सिर्फ थोड़े दिनों की देर है- शनै:-शनै: ऐसे लक्षण ही चारों ओर स्पष्ट नजर आने लगे। जाल में फँसा जा रहा हूँ, मन को शान्ति नहीं मिलती- जाल तोड़कर बाहर भी नहीं निकल पाता। ऐसे वक्त अचानक एक सुयोग मिला। बाबा ने पूछा, ''तुम्हारी कोई जन्मपत्री है या नहीं? उसकी तो जरूरत है।''

जोर लगाकर सारे संकोचों को दूर करके कह बैठा, ''आप लोगों ने पूँटू के साथ मेरा विवाह करना क्या सचमुच स्थिर कर लिया है?''

बाबा मुँह फाड़कर थोड़ी देर तक अचम्भे से देखते रहे, फिर बोले, ''वाकई? सुन लो इनकी बात!''

''पर मैं तो अभी तक स्थिर नहीं कर पाया हूँ।''

''नहीं कर पाये तो अब कर लो। लड़की की उम्र मैं चाहे बारह-तेरह वर्ष की बताऊँ या और कुछ, लेकिन असल में वह सतरह-अठारह साल की है। इसके बाद हम इस लड़की की शादी कैसे करेंगे?''

''पर वह मेरा दोष तो नहीं है?''

''तो फिर किसका है? शायद मेरा?''

इसके बाद लड़की की माँ और राँगा दीदी से शुरू करके पास पड़ौस की लड़कियाँ तक आ गयीं। रोना-धोना, अनुयोग अभियोगों का अन्त नहीं रहा। मुहल्ले के पुरुषों ने कहा, ''ऐसा शैतान आज तक नहीं देखा, इसे अच्छा सबक देना चाहिए।''

पर दण्ड देना और बात है और लड़की की शादी करना दूसरी बात है। फलत: बाबा चुप हो रहे। इसके बाद अनुनय-विनय की पारी आई। पूँटू को अब नहीं देखता हूँ। शायद वह गरीब शर्म से मुँह छिपाए कहीं पड़ी है। क्लेश होने लगा। कैसा दुर्भाग्य लेकर ये हमारे घरों में पैदा होती हैं। सुना कि ठीक यही बात उसकी माँ भी कह रही है- ओ अभागिन, हम सबको खाने के बाद जायेगी। इसकी ऐसी तकदीर है कि समुद्र पर दृष्टि डाले तो समुद्र तक सूख जाय और जली हुई शोल मछली भी पानी में भाग जाए। इसका ऐसा हाल न होगा तो किसका होगा!

कलकत्ते जाने के पहले बाबा को बुलाकर अपने घर का पता बता दिया। कहा, ''मेरे लिए एक व्यक्ति की राय लेना जरूरी है, उनके कहने पर मैं राजी हो जाऊँगा।'' बाबा मेरा हाथ पकड़कर गद्गद कण्ठ से बोले, ''देखो भाई, लड़की को मत मारो। उन्हें जरा समझा-बुझाकर कहना कि वे अपनी असम्मति न दें।'' मैं बोला, ''मेरा विश्वास है कि वे असम्मति प्रकट न करेंगे। बल्कि खुश होकर ही सम्मति देंगे।''

बाबा ने आशीर्वाद दिया, ''तुम्हारे मकान पर कब आऊँ, भैया?''

''पाँच-छ: दिन बाद ही आइए।''

पूँटू की माँ और राँगा दीदी ने रास्ते तक आकर ऑंसुओं के साथ मुझे बिदा किया।

मन ही मन कहा, तकदीर! किन्तु यह अच्छा ही हुआ कि एक प्रकार से वचन दे आया। मैंने इस बात पर नि:संशय विश्वास कर लिया कि इस विवाह में राजलक्ष्मी लेशमात्र भी आपत्ति न करेगी।

000

स्टेशन पर पहुँचते ही ट्रेन छूट गयी। दूसरी ट्रेन आने में दो घण्टे की देर थी। समय काटने का उपाय खोज रहा था कि एक मित्र मिल गये। एक मुसलमान युवक ने कुछ देर तक मेरी ओर देखते रहकर पूछा, ''आप श्रीकान्त हैं?''

''हाँ।''

''मुझे नहीं पहिचान सके? मैं गौहर हूँ।'' कहकर उसने मेरा हाथ जोर से दबा दिया, पीठ पर सशब्द चपत लगाई और जोर से गले लिपटकर कहा, ''चलो, हमारे घर चलो। कहाँ जा रहे थे- कलकत्ते? अब जाने की जरूरत नहीं- चलो।''

यह मेरा पाठशाला का मित्र है, उम्र में कोई चार साल बड़ा होगा, हमेशा से ही कुछ आधा पागल जैसा। ऐसा लगा कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसका वह पागलपन कम होने की बजाय बढ़ गया है। पहले भी उसकी जबरदस्ती से बचने का उपाय न था, अत: यह खयाल कर मेरी दुश्चिन्ता की सीमा न रही कि कम-से-कम आज रात को वह मुझे किसी तरह नहीं छोड़ेगा। यह कहना व्यर्थ है कि उसकी आत्मीयता और उल्लास में हिस्सा बाँटने की शक्ति आज मुझमें नहीं है। पर वह छोड़ने वाला जीव नहीं था। मेरा बैग उसने खुद उठा लिया और कुली बुलाकर उसके सिर पर बिछौना रख दिया। फिर जबरदस्ती खींचता हुआ बाहर लाया और गाड़ी का भाड़ा ठीक कर मुझसे बोला, ''चलो।''

बचने का कोई उपाय नहीं है, तर्क करना फिजूल है।

यह कह चुका हूँ कि गौहर मेरा पाठशाला का साथी है। हमारे गाँव से उसका मकान एक कोस दूर था, एक ही नदी के किनारे। बचपन में बन्दूक चलाना उसी से सीखा था। उसके पिता की एक पुरानी बन्दूक थी, उसी को लेकर नदी किनारे, आम के बगीचों में और झाड़-झंखाड़ों में घूमकर हम दोनों चिड़ियों का शिकार किया करते थे। बचपन में अनेक बार उसी के यहाँ रात काटी है- उसकी माँ चिवड़ा, गुड़, दूध और केला लाकर मुझे फलाहार करा देती थी। उनकी जमीन-जायदाद, खेती-बारी बहुत थी। गाड़ी में बैठकर गौहर ने प्रश्र किया, ''इतने दिनों तक कहाँ थे, श्रीकान्त?''

जहाँ जहाँ था, उसका एक संक्षिप्त विवरण दे दिया। पूछा, ''तुम अब क्या करते हो, गौहर?''

''कुछ भी नहीं।''

''तुम्हारी माँ अच्छी तरह हैं?''

''माँ-बाप दोनों की मृत्यु हो गयी- मकान में अकेला मैं ही हूँ।''

''शादी नहीं की?''

''वह भी मर गयी।''

मन ही मन सोचा कि शायद इसीलिए चाहे जिसे पकड़ ले जाने का इतना आग्रह है! जब कोई बात करने को नहीं मिला तो पूछा, ''तुम्हारी वह पुरानी बन्दूक है?''

गौहर ने हँसकर कहा, ''देखता हूँ कि तुम्हें उसकी याद है! वह है, और उसके सिवाय और भी एक अच्छी बन्दूक खरीदी थी। तुम शिकार खेलने जाना चाहो तो साथ चला चलूँगा। किन्तु अब मैं चिड़ियाँ नहीं मारता-बहुत दु:ख होताहै।''

''यह क्या गौहर, तब तो तुम दिन-रात इसी के पीछे पागल थे।''

''यह सच है। लेकिन अब बहुत दिनों से छोड़ दिया है।''

गौहर का एक परिचय और है कि वह कवि है। उन दिनों वह मुँह-जुबानी अनर्गल ग्राम-गीत बना सकता था- किसी भी वक्त और किसी भी विषय पर। छन्द, मात्रा और ध्वानि इत्यादि काव्य-शास्त्र के कानून-कायदों को मानता था या नहीं, इसका ज्ञान मुझे न तब था और न अब है। पर मुझे याद है कि मैं उन दिनों मणिपुर का युद्ध और टिकेन्द्र जीत सिंह के वीरत्व की कहानी उसके मुँह से सुनकर पुन:-पुन: उत्तेजित हो उठता था। पूछा, ''गौहर, उन दिनों तुम्हें कृत्तिवास से भी सुन्दर रामायण लिखने का शौक था, वह संकल्प अब भी है या गया है?'' गौहर क्षण-भर में गम्भीर हो गया। बोला, ''वह शौक क्या कभी जा सकता है रे? उसी के बल पर तो बचा हुआ हूँ। जब तक जिन्दा रहूँगा तब तक उसे लिये रहूँगा। कितना लिखा है, चलो न, आज सारी रात तुम्हें सुनाऊँगा तो भी खत्म न होगा।''

''कहते क्या हो गौहर?''

''नहीं तो क्या तुमसे झूठ कहता हूँ?''

प्रदीप्त कवि-प्रतिभा से उसकी ऑंखो और मुँह चमक उठे। सन्देह नहीं किया था, सिर्फ विस्मय जाहिर किया था। तथापि, कहीं केंचुआ खोजते हुए साँप न निकल आये- मुझे जबरदस्ती बैठाकर सारी रात काव्य-चर्चा ही न करता रहे- मेरे भय की सीमा नहीं रही।

खुश करने के लिए कहा, ''नहीं गौहर, यह थोड़े ही कहता हूँ। तुम्हारी अद्भुत शक्ति को सभी स्वीकार करते हैं, पर बचपन की बातें याद हैं या नहीं, यही जानने के लिए पूछा है। तो ठीक- वह बंगाल की एक कीर्ति होकर रहेगी।''

''कीर्ति? अपने मुँह से क्या कहूँ भाई, पहले सुन तो लो, फिर ये सब बातें होंगी।''

किसी भी तरह छुटकारा नहीं। कुछ देर स्थिर रहकर मानो कुछ-कुछ अपने आप ही कहा, ''सुबह से ही तबियत खराब हो रही है। ऐसा लगता है कि अगर नींद आ जाती...''

गौहर ने इस पर ध्या न ही न दिया। कहा, ''पुष्पक रथ पर बैठकर सीताजी जब रोते-रोते गहने फेंक रही हैं- इस अंश को जिन जिनने सुना है वे अपने ऑंसू नहीं रोक सके हैं श्रीकान्त।''

ऑंखों का जल मैं भी रोक सकूँगा, इसकी सम्भावना कम है। कहा,

''किन्तु...'' गौहर ने कहा, ''हमारे उस बूढ़े नयन चाँद चक्रवर्ती की तुम्हें याद है न? उसके मारे नाक में दम है। वक्त-बे-वक्त आकर कहता है, ''गौहर, जरा वह अंश पढ़ो न, सुनूँगा।'' कहता है, ''बेटा, तुम मुसलमान की सन्तान कभी नहीं हो। ऐसा लगता है कि तुम्हारे शरीर में असली ब्राह्मण-रक्त प्रवाहित है।'' 'नयनचाँद' नाम हर जगह नहीं होता, इसीलिए याद आ गया। मकान भी गौहर के गाँव में ही है। पूछा, ''वही बूढ़ा चक्रवर्ती? उसके साथ तो तुम्हारे पिताजी का बड़ा झगड़ा हुआ था- लाठियाँ चलीं थीं और मामला भी?''

गौहर ने कहा, ''हाँ। लेकिन पिताजी के सामने उसकी क्या चलती? उन्होंने उसकी जमीन, बगीचा, तालाब इत्यादि सबको कर्जमध्दे नीलाम करवा लिया था। लेकिन मैंने उसका तालाब और मकान लौटा दिया है। बहुत गरीब है। रात-दिन रोता था- यह क्या अच्छा होता श्रीकान्त?''

अच्छा तो नहीं होता, परन्तु चक्रवर्ती के काव्य-प्रेम से कुछ ऐसा ही अन्दाज लगा रहा था। कहा, ''अब तो रोना बन्द हो गया है?''

गौहर ने कहा, ''लेकिन आदमी वाकई अच्छा है। कर्जे के मारे उसने उस वक्त जो कुछ किया था, वैसा बहुत लोग करते हैं। उसके मकान के पास ही डेढ़ बीघे का आम का बगीचा है, उसके हरेक पेड़ को चक्रवर्ती ने अपने हाथों से लगाया है। नाती-पोते बहुत से हैं, खरीदकर खाने के लिए पैसे नहीं हैं। फिर, मेरा ही कौन है, कौन खाने वाला है?''

''यह ठीक है। उसे भी लौटा दो।''

''लौटा देना ही ठीक है, श्रीकान्त। ऑंखों के सामने ही आम पकते हैं, लड़के-बच्चे ठण्डी आहें भरते हैं- मुझे बहुत दु:ख होता है भाई! आम के दिनों में मेरे सब बगीचे व्यापारी लोग ले लेते हैं, सिर्फ वह बगीचा नहीं बेचता। कह दिया है, चक्रवर्ती, तुम्हारे नाती तोड़-तोड़कर खायें। क्या कहते हो ठीक किया न?''

'बिल्कुटल ठीक।'' मन-ही-मन कहा, बैंकुण्ठ के खाते की जय हो! उसकी बदौलत यदि गरीब नयन चाँद पत्किंचित् लाभ उठा सके तो नुकसान ही क्या है? इसके अलावा गौहर कवि है। कवि की इतनी सम्पत्ति किस मतलब की अगर रसग्राही रसिक सुजनों के काम में न आय?

लगभग चैत्र के बीचोंबीच की बात है। गाड़ी की खिड़की को एकाएक अन्त तक खोलकर गौहर ने बाहर सिर निकालते हुए कहा, ''दक्षिणी हवा का अनुभव हो रहा है श्रीकान्त?''

''हो रहा है।''

गौहर ने कहा, ''वसन्त को पुकारते हुए कवि ने कहा है- 'खोल दे आज दखिन का द्वार'।''

कच्ची मिट्टी का रास्ता है। मलय पवन के एक झोंके ने रास्ते की सूखी धूल को जमीन पर नहीं रहने दिया, उससे समस्त मुँह और सिर को भर दिया। मैं अप्रसन्न होकर बोला, ''कवि ने वसन्त को नहीं बुलाया। वह कहता है कि इस वक्त यम का दक्षिण द्वार खुला है- अत: गाड़ी को बन्द न करोगे, तो शायद वही आकर हाजिर हो जायेगा।''

गौहर ने हँसकर कहा, ''चलकर देखोगे एक बार। चकोतरे के दो पेड़ों पर फूल खिले हैं, कोई आधा कोस से उनकी गन्ध आती है। सामने वाला जामुन का पेड़ माधवी फूलों से भर गया है, उसकी एक डाल पर मालती की लता है। फूल अभी नहीं खिले हैं, कलियों के गुच्छे के गुच्छे लटक रहे हैं। हमारे चारों ही ओर आम के बगीचे हैं और अबकी बार बौर से आम के झाड़ छा गये हैं। कल सुबह मधुमक्खियों का मेला देखना। कितने नीलकण्ठ, कितनी बुलबुलें और कितनी कोयलों के गान! इस वक्त चाँदनी रात है, इस कारण रात को भी कोयल की कूक नहीं रुकती। बाहर के कमरे की दक्षिण वाली खिड़की यदि खुली रखोगे तो फिर तुम्हारी पलकें न झपेंगी। लेकिन इस बार यों ही नहीं छोड़ दूँगा भाई, यह पहले से यह देता हूँ। इसके अलावा खाने की भी कोई फिक्र नहीं, चक्रवर्ती महाशय को एक बार खबर मिलने-भर की देर है। तुम्हारा आदर गुरु की तरह करेंगे।''

 
आमन्त्रण की अकपट आन्तरिकता से मुग्ध हो गया। कितनी मुद्दतों बाद मुलाकात हुई है, लेकिन वह ठीक उस दिन जैसा ही गौहर है- जरा भी नहीं बदला है- वैसा ही बचपन है, मित्र-मिलने में वैसा ही अकृत्रिम उल्लास है।

गौहर मुसलमान फकीर-सम्प्रदाय का है। सुना गया है कि उसके पितामह बाउल थे। वे रामप्रसादी और दूसरे गीत गा-गाकर भिक्षा माँगते थे। उनकी पाली हुई सारिका की अलौकिक संगीत-पारदर्शिता की कहानी उन दिनों इधर बहुत प्रसिद्ध थी। लेकिन गौहर के पिता पैतृक-वृत्ति छोड़कर तिजारत और पाठ का कारबार करने लगे और अपने लड़के के लिए बहुत-सी जायदाद खरीदकर छोड़ गये। परन्तु लड़के में बाप जैसी व्यापारी बुद्धि नहीं है- बल्कि बाबा का काव्य और संगीत के प्रति अनुराग ही उसमें है। अत: पिता की जी-तोड़ मेहनत से संचित जमीन-जायदाद और खेती-बारी का अन्त में क्या परिणाम होगा, यह शंका और सन्देह का विषय है।

खैर, जो हो, उन लोगों का मकान बचपन में देखा था। ठीक से याद नहीं। अब वह शायद कवि की वाणी-साधना के तपोवन में रूपान्तरित हो गया हो। उसे एक बार ऑंखों से देखने की इच्छा हुई।

उसके ग्राम के पथ से मैं परिचित हूँ, उसकी दुर्गमता भी याद आती है। किन्तु थोड़ी ही देर बाद मालूम हो गया कि शैशव की उस याद के साथ आज की ऑंखों से देखने की कतई तुलना नहीं हो सकती। बादशाही जमाने की सड़क है अतिशय सनातन। मिट्टी पत्थरों की परिकल्पना यहाँ के लिए नहीं है! कोई करेगा, ऐसी दुराशा भी कोई नहीं करता। इतना ही नहीं, संस्कार या मरम्मत की सम्भावना भी लोगों के मन से बहुत समय पहले ही पुंछ गयी है। गाँव वाले जानते हैं कि शिकायत या अभियोग फिजूल है- उनके लिए किसी भी दिन राजकोष में रुपये नहीं होंगे। वे जानते हैं कि पुरुषानुक्रम से सड़क के लिए सिर्फ सड़क-टैक्स देना पड़ता है पर वह सड़क कहाँ है और किसके लिए है, यह सब सोचना भी उनके लिए ज्यादती है।

¹ बाउल-बंगाल में वैरागी सन्तों का एक सम्प्रदाय। कबीर, दादू आदि हिन्दी के सन्त-कवियों की वाणी गा-गाकर ये घर-घर भिक्षा माँगते हैं।

उस सड़क पर बहुकाल से संचित और स्तूपीकृत बालू और मिट्टी की रुकावट को हटाती हुई हमारी गाड़ी सिर्फ चाबुक के जोर से अग्रसर हो रही थी। ऐसे ही वक्त गौहर एकाएक बड़े जोर से चिल्ला उठा, ''गाड़ीवान! और नहीं- और नहीं, ठहरो-एकदम रोको!''

उसने यह इस तरह कहा जैसे पंजाब-मेल का मामला हो-जैसे पल-भर में ही सब वैक्युम ब्रेक अगर बन्द न किये जा सके तो सर्वनाश की सम्भावना हो।

गाड़ी रुक गयी। बाँयें हाथवाला रास्ता उनके गाँव जाने का है। उतरकर गौहर ने कहा, ''श्रीकान्त, उतर आओ। मैं बैग ले लेता हूँ, तुम बिछौना उठाओ, चलो।''

''शायद गाड़ी और आगे नहीं जायेगी?''

''नहीं। देखो न, रास्ता नहीं है।''

यह सही है। दक्षिण बाँयीं ओर काँटेदार पेड़ और बेत-कुंजकी घनी तथा सम्मिलित शाखा-प्रशाखाओं के कारण गाँव की वह गली अतिशय संकीर्ण हो गयी है। गाड़ी को अन्दर घुसाने का तो प्रश्न ही अवैध था, क्योंकि अगर आदमी भी होशियारी के साथ झुककर न घुसे तो काँटों में फँसकर उसके कपड़ों का फटना अनिवार्य है- अतएव, कवि के कथनानुसार वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अनिर्वचनीय था। उसने बैग को कन्धों पर रखा और मैंने बिछौने को बगल में दबाया। इस तरह हम लोग गोधूलि की बेला में गाड़ी से उतरे। कवि-गृह में जब पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। अन्दाज लगाया कि आकाश में वसन्त-रात्रि का चन्द्रमा भी निकल आया है। शायद पूर्णिमा के आस-पास की तिथि थी, अतएव इस आशा में था कि गम्भीर निशीथ में चन्द्रदेव सिर के ऊपर आ जाँय तो तिथि के बारे में नि:संशय हो जाऊँ। मकान के चारों ओर बाँसों का घना वन है। बहुत सम्भव है कि इसी जंगल में उसका कोयल नीलकण्ठ और बुलबुलों का झुण्ठ रहता हो और उन्हीं की अहर्निश पुकार तथा गाना कवि को व्याकुल बना देता हो। बाँस के पके सूखे हुए असंख्य पत्तों ने झड़झड़ कर ऑंगन और चबूतरे को चारों ओर से परिव्याप्त कर रखा है। इन पर नज़र पड़ते ही इस प्रेरणा से सारा मन क्षणभर में ही गर्जना कर उठता है कि झड़े हुए पत्तों का गीत गाया जाय। नौकर ने आकर बाहर की बैठक खोल दी और बत्ती जला दी। गौहर ने तख्त दिखाते हुए कहा, ''तुम इसी कमरे में रहो। देखना, कैसी सुन्दर हवा आती है।''

असम्भव नहीं है। देखा, कि दक्षिण की हवा की वजह से देशभर की सूखी हुई लताओं और पत्तों ने गवाक्ष-पथ से भीतर घुसकर कमरे को भर दिया है, तख्त को भी छा दिया है। फर्श पर पैर पड़ते ही शरीर सनसना उठा। खाट के पाये के पास चूहे ने अपना बिल बनाकर मिट्टी जमा कर रक्खी है। मैंने उसे दिखाकर कहा, ''गौहर, कमरे में तुम लोग क्या कभी झाँकते भी नहीं?''

गौहर ने जवाब दिया, ''नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ती। मैं अन्दर ही रहता हूँ। कल सब साफ करा दूँगा।''

''साफ तो हो जाएगा, लेकिन इस बिल में साँप भी तो रह सकते हैं?''

नौकर ने कहा, ''दो थे, लेकिन अब नहीं हैं। ऐसे दिनों में वे नहीं रहते, हवा खाने के लिए बाहर चले जाते हैं।''

पूछा, ''यह कैसे मालूम हुआ मियाँ?''

गौहर ने हँसते हुए कहा, ''यह मियाँ नहीं है, अपना नवीन है। पिताजी के जमाने का आदमी है। गाय-भैंस, खेती-बारी देखता है और मकान की हिफाजत भी करता है। हमारे यहाँ क्या है, और क्या नहीं है, इसे सब पता है।'' नवीन बंगाली हिन्दू है और है पिता के जमाने का आदमी। इस घर की गाय-भैसें, खेती-बारी से लेकर मकान तक का सारा हाल जानना उसके लिए असम्भव नहीं है। तथापि साँप के बारे में उसकी बातों से निश्चिन्त न हो सका। यहाँ तो मकान-भर को दक्षिणी हवा लग गयी है! सोचा, इसमें शक नहीं कि हवा के लोभ में सर्प-युग्ल बाहर जा सकते हैं, परन्तु, उन्हें लौटते भी कितनी देर लग सकती है?

गौहर ने ताड़ लिया कि मुझे तसल्ली नहीं हुई है। कहा, ''तुम तो खाट पर रहोगे, फिर तुम्हें डर किस बात का? इसके अलावा वे कहाँ नहीं रहते? भाग्य में लिखा था, इससे राजा परीक्षित को भी रिहाई नहीं मिली, फिर हम तो तुच्छ हैं। नवीन, कमरे में झाडू लगाकर एक ईंट से बिल को ढक देना, भूलना नहीं। पर श्रीकान्त, कहो तो, तुम खाओगे क्या?''

मैंने कहा, ''जो कुछ मिल जाए।''

नवीन बोला, ''दूध, चिवड़ा और अच्छी ईख का गुड़ है। आज के लायक-''

मैंने कहा, ''ठीक है, ठीक है। इस मकान में ये ही चीजें खाने की मुझे आदत है, और कुछ जुटाने की जरूरत नहीं, भाई। बल्कि, तुम कहीं से एक हल्की ईंट ले आओ। बिल को मजबूती से ढक दो, जिससे दक्षिण की हवा से पेट भरकर जब वे घर लौटें तो फिर एकाएक इसमें न घुस सकें।'' हाथ में रोशनी लेकर नवीन कुछ देर तक तख्त के नीचे झाँकता रहा। फिर बोला, ''नहीं, नहीं हो सकता।''

''क्या नहीं हो सकता जी?''

उसने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं, यह नहीं हो सकता। बिल का मुँह क्या अकेला है बाबू? पजाबा-भर ईंटें चाहिए। चूहों ने जमीन को एकबारगी पोला कर डाला है।''

गौहर विशेष विचलित न हुआ। उसने आदमी लगाकर कल अवश्य मरम्मत करा देने का हुक्म दे दिया।

नवीन हाथ पैर धोने के लिए पानी देकर फलाहार का आयोजन करने जब भीतर चला गया तो मैंने पूछा, ''और तुम क्या खाओगे गौहर?''

''मैं? मेरी एक बूढ़ी मौसी हैं, वे ही खाना बनाती हैं। खैर, यह खाना-पीना खत्म हो जाए तो अपनी रचनाएँ तुम्हें सुनाऊँ।'' वह अपने काव्य के ध्या न में ही मग्न था। अतिथि के आराम और सुविधा का खयाल शायद उसने किया ही नहीं। बोला, ''बिछौना बिछा दूँ, क्या कहते हो? रात को हम दोनों एक साथ ही रहेंगे-क्यों?''

यह एक और आफत आई। कहा, ''नहीं भाई गौहर, तुम अपने कमरे में जाकर सोओ। आज मैं बहुत थका हुआ हूँ, कल सुबह ही तुम्हारी रचना सुनूँगा।''

''कल सुबह? तब क्या वक्त रहेगा?''

''अवश्य रहेगा।''

गौहर चुप होकर कुछ सोचता रहा। बोला, ''अच्छा श्रीकान्त, एक काम किया जाए तो कैसा हो! मैं पढ़ता हूँ और तुम लेटे-लेटे सुनते रहना। नींद आने पर मैं चला जाऊँगा। क्या कहते हो? यह ठीक है न- क्यों?''

मैंने विनती करते हुए कहा, ''नहीं भाई गौहर, इससे तुम्हारी किताब की मर्यादा नष्ट होगी। कल मैं पूरा ध्या-न लगाकर सुनूँगा।''

गौहर ने क्षुब्ध चेहरे से बिदा ली, पर बिदा करके मेरा मन भी प्रसन्न नहीं हुआ।

यह एक ही पागल है। पहले इसके इशारों से तो मैंने यही समझा था कि अपने काव्य-ग्रन्थ को वह प्रकाशित करना चाहता है और उसे आशा है कि उससे संसार में एक धूम मच जायेगी। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है। पाठशाला और स्कूल में उसने सिर्फ थोड़ी-सी बंगला और अंगरेज़ी सीखी थी। इच्छा भी नहीं थी, और शायद समय भी नहीं मिला। शैशव में न जाने कब और कैसे वह कविता से प्रेम कर बैठा। सम्भव है कि वह प्रेम उसकी शिराओं के खून में ही बह रहा हो-इसके बाद संसार का सब कुछ उसकी नजरों में अर्थहीन हो गया है। अपनी अनेक रचनाएँ उसे याद हैं। गाड़ी में बैठा हुआ बीच-बीच में वह गुनगुनाकर आवृत्ति भी करता था। उस वक्त सुनकर यह नहीं सोचा था कि इस अक्षय भक्त को वाग्देवी अपने स्वर्ण-पद्म की एक पंखुड़ी देकर किसी दिन पुरस्कृत करेंगी। पर अक्लान्त आराधना के एकाग्र आत्म निवेदन में इस बेचारे को विराम नहीं, विश्राम नहीं। बिछौने पर लेटा हुआ सोचने लगा कि बारह साल बाद मुलाकात हुई है। इन बारह वर्षों से उसने सब पार्थिव स्वार्थों को जलांजलि देकर और एक रचना के बाद दूसरी गूँथ करके श्लोकों का पहाड़ जमा कर लिया है। पर यह सब किस काम में आयेगा? जानता हूँ कि काम में नहीं आएगा। गौहर आज नहीं है पर उसकी दुश्चर तपस्या की अकृतार्थता स्मरण कर आज भी मन दुखी होता है। सोचता हूँ कि न जाने कितने शोभाहीन, गन्धहीन फूल लोक-चक्षुओं के अन्तराल में खिलते हैं और फिर अपने आप ही मुरझा जाते हैं। परन्तु, विश्व-विधान में यदि उनकी कोई सार्थकता है, तो शायद गौहर की साधना भी व्यर्थ नहीं हुई होगी।

गौहर ने बहुत सबेरे ही पुकारकर मेरी नींद खोल दी। तब शायद सात बजे थे, या न भी बजे हों। उसकी इच्छा थी कि वसन्त के दिनों में बंगाल के निभृत गाँवों के लोकोत्तर शोभा-सौन्दर्य को अपनी ऑंखों से देखकर धन्य होऊँ। उसका भाव कुछ ऐसा था कि मानो मैं विलायत से लौटकर आया हूँ। उसका आग्रह पागलों जैसा था। अनुरोध टालने का उपाय नहीं था। अतएव हाथ-मुँह धोकर तैयार होना पड़ा। प्राचीर से सटे हुए एक अधमरे जामुन के पेड़ के अधिक हिस्से में माधवी और अधिक में मालती लता लिपटी थी। यह कवि की अपनी योजना है। अत्यन्त निर्जीव शकल-तथापि, एक में थोड़े से फूल खिले हैं और दूसरी में अभी कलियाँ फूटी हैं। उसकी इच्छा थी कि थोड़े से फूल मुझे उपहार दे, पर पेड़ में इतने लाल चींटे थे कि छूने का कोई उपाय नहीं सूझा। उसने मुझे यह कहकर सान्त्वना दी कि कुछ देर बाद उन्हें ऑंकड़ी से अनायास ही झड़ा दिया जायेगा। अच्छा, चलो।

प्रात:क्रिया ठीक तौर से निष्पन्न हो सके (अर्थात् कब्ज न रहे,) इसके उद्योग-पर्व में नवीन चिलम हाथ में लिये दम लगाकर बड़े जोर से खाँस रहा था। थूककर, खखारकर और बहुत कुछ सँभालकर हाथ हिलाकर उसने मना किया। कहा, ''जंगल में कहीं गायब मत हो जाइएगा, कहे देता हूँ।''

गौहर ने नाराजगी से कहा, ''क्यों रे?''

नवीन ने जवाब दिया, ''कोई दो-तीन सियार पागल हो गये हैं; ढोर-आदमियों को काटते डोल रहे हैं।''

मैं डर के मारे पीछे हट गया।

''कहाँ रे नवीन?''

''यह क्या मैंने देखा है कि कहाँ हैं? कहीं-न-कहीं झाड़ी-आड़ी में छिपे होंगे। अगर जाते हो तो ऑंखें खोलकर जाना।''

''तो भाई, जाने का काम नहीं गौहर।''

''वाह रे! इस वक्त कुत्ते और सियार जरा पागल हो ही जाते हैं- सिर्फ इसी वजह से क्या लोग रास्ता चलना बन्द कर देंगे? खूब कहा।''

यह भी दक्षिण की हवा का मामला है। अतएव, प्रकृति की शोभा देखने साथ में जाना ही पड़ा। रास्ते में दोनों ओर आम के बगीचे हैं। करीब पहुँचते ही असंख्य छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े चड़-चड़ पट-पट आवाज करते हुए आम्र-मुकलों को छोड़कर ऑंख, नाक, मुँह और कपड़ों के भीतर घुस गये। सूखे पत्तों पर आम का मधु गिरकर चिपकनी लेई की तरह हो गया था, वह जूते के तलों में चिपकने लगा। सँकरे रास्ते का बहुत-सा हिस्सा बेदखल कर विराजमान मुकलित-विकसित फूलों के भार से लदीं घनी करौंदे की झाड़ियाँ- इसी समय यदि आ गयीं नवीन की चेतावनी। गौहर के मतानुसार यह वक्त पागल होने लायक ही है, इसलिए करौदे के फूलों की शोभा और किसी दिन समय के अनुसार उपभोग की जायेगी। आज गौहर और मैं- यानी नवीन के 'ढोर आदमी' ने जरा तेज कदम से ही स्थान त्याग किया।

मैं कह चुका हूँ कि हमारे गाँव की नदी इस गाँव की सीमा में भी होकर बहती है। वर्षा की चौड़ी जलधारा वसन्त के समागम से पतली शीर्ण हो गयी है। उस समय धार के साथ बहकर आई अपरिमेय सिवार और काई शुष्क तट-भूमि पर फैल गयी है और शिशिर और धूप में सड़कर उसने सारी जगह को दुर्गेन्ध से नरक-कुण्ड बना दिया है। नदी के उस पार कुछ दूर से मरके पेड़ में सैकड़ों लाल फूल खिले हुए थे। उन पर पड़ी, लेकिन इस वक्त कवि को भी उस ओर दृष्टि आकर्षित करना ठीक नहीं लगा। उसने कहा, ''चलो, घर लौट चलें।''

''अच्छा, चलो।''

''मेरा खयाल था कि ये सब चीजें अच्छी लगेंगी।''

कहा, ''अच्छी लगेंगी भाई, लगेंगी। अच्छे-अच्छे शब्दों में तुम इनको कविता में लिखो, मैं पढ़कर खुश हूँगा।''

''शायद इसीलिए गाँव के आदमी एक बार भूलकर भी इन्हें नहीं देखते।''

''नहीं। देखते-देखते उन्हें अरुचि हो गयी है। भाई, ऑंखों की रुचि और कानों की रुचि एक नहीं है। जो यह सोचते हैं कि कवि के वर्णन को अपनी ऑंखों देखने पर लोग मोहित हो जाते हैं, वह नहीं जानते सत्य क्या है। दुनिया के हर काम में यह बात लागू है। ऑंखों के लिए जो एक साधारण घटना या बहुत मामूली-सी वस्तु है वही कवि की भाषा में 'नयी सृष्टि' हो जाती है। तुम जो देखते हो वह भी सत्य है, और जो मैं नहीं देख सका वह भी सत्य है। इसके लिए तुम दुखी मत होना गौहर।'

तो भी लौटते समय रास्ते में उसने न जाने कितनी और क्या-क्या वस्तुएँ दिखाने की चेष्टा की। पथ का प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक लता पौधा तक मानो उसका पहिचाना हुआ है। न जाने कब एक पेड़ की छाल औषधि के लिए कोई छीलकर ले गया था और उससे चिपकनेवाला पदार्थ अब भी झर रहा था। सहसा उसे देखकर गौहर सिहर-सा उठा। उसकी ऑंखें छलछला आयीं, मैं उसके मुँह की ओर देखकर यह स्पष्टतया समझ गया कि अन्तर में उसने कितनी वेदना का अनुभव किया है। चक्रवर्ती जो अपनी सब खोई हुई चीजें पुन: वापस प्राप्त कर रहा था, सो केवल अपनी होशियारी के कारण नहीं, इसका कारण तो गौहर के स्वभाव में ही है। ब्राह्मण के प्रति मेरा क्रोध बहुत कुछ अपने आप ही कम हो गया। चक्रवर्ती से मुलाकात नहीं हुई, क्योंकि सुना गया कि उसके घर में उसके दो नातियों पर शीतला-माता की कृपा हुई है। अब तक गाँव-गाँव में विसूचिका-माता के दर्शन नहीं हुए हैं- वे सड़ी हुए तलैयों के पानी के थोड़ा और सूख जाने की राह देख रही हैं।

खैर, घर पहुँचकर गौहर ने अपना पोथा मेरे सामने हाजिर कर दिया। ऐसा आदमी संसार में बिरला ही होगा जिसे उसका परिणाम देखकर भय न लगता। बोला, ''बिना पढ़े छुट्टी नहीं मिलेगी श्रीकान्त, और तुम्हें अपनी सच-सच राय देनी होगी।''

यह आशंका तो थी ही। साफ-साफ राजी हो सकूँ, इतना साहस नहीं था, तो भी कवि की वाटिका में इस यात्रा के, एक के बाद एक, मेरे सात दिन काव्यालोचना में ही कट गये। काव्य की बात जाने दो, किन्तु सघन साहचर्य में इस मनुष्य का जो परिचय मिला, व जितना सुन्दर था उतना ही विस्मयकारक।

एक दिन गौहर ने कहा, ''श्रीकान्त, तुम्हें बर्मा जाने की क्या जरूरत है? हम दोनों के ही अपना कहने लायक कोई नहीं है, तो आओ ने हम दोनों भाई यहीं एक साथ जीवन बिता दें!''

हँसकर कहा, ''मैं तो तुम्हारी तरह कवि नहीं हूँ भाई, न पेड़-पौधों की भाषा ही समझता हूँ, और न उनसे बातचीत कर सकता हूँ, फिर इस जंगल में कैसे रह सकूँगा? दो दिन में ही हाँफ जाऊँगा''

गौहर ने गम्भीर होकर कहा, ''किन्तु मैं उनकी भाषा वाकई समझता हूँ। वे सचमुच बोलते हैं- क्या तुम लोग विश्वास नहीं करते?''

मैंने कहा, ''यह तो तुम भी समझते हो कि विश्वास करना मुश्किल है?''

गौहर ने सरलता से स्वीकार कर लिया, कहा, ''हाँ, हाँ, यह तो समझता हूँ।''

एक दिन सुबह अपनी रामायण का अशोक-वन वाला अध्या य कुछ देर तक पढ़ने के बाद उसने हठात् किताब बन्द कर दी और मेरी ओर घूमकर प्रश्न किया, ''अच्छा श्रीकान्त, तुमने कभी किसी को प्यार किया है?''

कल बहुत रात तक जागकर राजलक्ष्मी को शायद अपनी अन्तिम चिट्टी- लिखी थी। उसमें बाबा की बातें, पूँटू की कथा और उसके दुर्भाग्य का समस्त विवरण था। उन लोगों को वचन दिया था कि एक आदमी की अनुमति माँग लूँगा- सो वह भिक्षा भी उसमें माँगी थी। चिट्ठी भेजी नहीं थी, उस वक्त पॉकेट में ही पड़ी हुई थी। गौहर के प्रश्न के उत्तर में हँसकर कहा, ''नहीं।''

गौहर ने कहा, ''यदि कभी प्यार करो, यदि कभी ऐसा दिन आये तो मुझे जताना श्रीकान्त।''

''जानकर क्या करोगे?''

''कुछ भी नहीं। तब सिर्फ तुम लोगों के बीच जाकर कुछ दिन काट आऊँगा।''

''अच्छा।''

''और अगर उस वक्त रुपयों की जरूरत हो तो मुझे खबर दे देना। बाबूजी बहुत रूपये छोड़ गये हैं, वह मेरे काम में तो लगा नहीं- किन्तु शायद तुम लोगों के काम में लग जाये।''

उसके कहने का तरीका कुछ ऐसा था कि सुनते ही ऑंखों से अश्रु निकल पड़े। कहा, ''अच्छा, यह भी खबर दूँगा। पर आशीर्वाद दो कि इसकी कभी जरूरत न पड़े।''

मेरे जाने के दिन गौहर फिर मेरा बैग उठाकर प्रस्तुत हो गया। इसकी जरूरत न थी, नवीन तो शर्म से प्राय: अधमरा हो गया, पर उसने एक न सुनी। ट्रेन में बैठाकर वह औरतों की तरह रो उठा, बोला, ''मेरे सिरकी कसम है श्रीकान्त, चले जाने के पहले एक दिन फिर आना ताकि फिर एक बार मुलाकात हो जाय।''

आवेदन की उपेक्षा नहीं कर सका, वचन दिया कि मिलने के लिए फिर एक बार आऊँगा।

''कलकत्ता पहुँचकर कुशल-संवाद दोगे न?''

यह वचन भी दिया। मानो न जाने कितनी दूर चला जा रहा हूँ!

कलकत्ते के मकान में जब पहुँचा, तब प्राय: संध्याल हो गयी थी। चौखट पर पैर रखते ही जिसके दर्शन हुए, वह और कोई नहीं स्वयं रतन था।

''यह क्या रे, तू है?''

''हाँ, मैं ही हूँ और कल से बैठा हूँ। एक चिट्ठी है।'' समझ गया कि उसी प्रार्थना का उत्तर है। कहा, ''डाक से भेजने पर भी तो चिट्ठी मिल जाती?''

रतन ने कहा, ''यह व्यवस्था किसान, मजदूर और साधारण गृहस्थ के लिए है। माँ की चिट्ठी अगर एक आदमी बिना खाये-पीये और सोये पाँच-सौ मील हाथ में लिए दौड़ता हुआ न लाये, तो खो न जायेगी? आप तो सब जानते हैं, क्यों झूठ-मूठ पूछ रहे हैं?''

बाद में सुना कि रतन का यह अभियोग झूठा है। क्योंकि खुद ही उद्यत होकर वह यह चिट्ठी अपने हाथ लाया है। मालूम हुआ कि ट्रेन की भीड़ और आहार वगैरह की अव्यवस्था के कारण उसका मिजाज बिगड़ गया है। हँसकर कहा, ''ऊपर आ। चिट्ठी पीछे पढ़ूँगा, चल, पहले तेरे खाने का इन्तजाम कर दूँ।''

रतन ने पैरों की धूल लेकर प्रणाम किया और कहा, ''चलिए।''

000

डकार से चौंकाता हुआ रतन दाखिल हुआ।

''कह रतन, पेट भर गया?''

''जी हाँ। आप चाहे कुछ भी कहें बाबू, लेकिन हमारे कलकत्ते के बंगाली ब्राह्मणों के अलावा और कोई रसोई बनाना नहीं जानता। उनके आगे तो इन मारवाड़ी महाराजों को जानवर ही कहा जा सकता है।''

मुझे याद नहीं कि दोनों प्रान्तों की रसोई की अच्छाई-बुराई या रसोइये की कला के बारे में रतन से कभी मैंने बहस की हो, पर रतन की जितना जानता हूँ उससे यही खयाल हुआ कि सुप्रचुर भोजन से वह खूब सन्तुष्ट हुआ है। अगर यह बात न होती तो वह पश्चिमी रसोइयों के बारे में ऐसी निरपेक्ष राय न दे सकता। उसने कहा, ''गाड़ी में धक्के तो कम नहीं लगे, हाथ-पैर फैलाकर लेटे बिना...''

''तो अच्छा है रतन, चाहे कमरे में चाहे बरामदे में बिछौना बिछाकर सो जा, कल सब बातें होंगी।''

न जाने क्यों चिट्ठी के लिए उत्कण्ठा न थी। ऐसा लग रहा था कि उसमें जो कुछ लिखा होगा वह तो मालूम ही है।

रतन ने फतूई की जेब से एक लिफाफा निकालकर मेरे हाथ में दे दिया। चपड़े से सील-मोहर किया हुआ था। बोला, ''बरामदे की इस दक्षिणवाली खिड़की के बगल में बिछौना बिछा लूँ? मसहरी लगाने की झंझट नहीं होगी। कलकत्ते के अलावा ऐसा सुख और कहाँ है। जाता हूँ...''

''किन्तु सब खबर अच्छी है न रतन?''

रतन ने मुँह गम्भीर कर कहा, ''ऐसा ही तो लगता है। गुरुदेव की कृपा से मकान का बाहरी हिस्सा गुलजार है। भीतर दास-दासियों, बंकू बाबू, और नयी बहू ने आकर घर-द्वार रोशन कर दिया है, और सबके ऊपर स्वयं माँ हैं जो मकान की मालकिन हैं। ऐसी गृहस्थी की बुराई कौन करेगा? लेकिन मैं बहुत पुराना नौकर हूँ, जाति का नाई हूँ- रतन को इतनी जल्दी भुलावा नहीं दिया जा सकता बाबू। इसीलिए तो उस दिन स्टेशन पर ऑंखों के अश्रु न रोक सका। यह निवेदन किया था कि परदेश में नौकरों की कमी होने पर रतन को एक बार खबर जरूर दे दें। जानता हूँ कि आपकी सेवा करने पर भी उसी माँ की सेवा होगी। धर्म का पतन नहीं होगा।''

मैं कुछ भी नहीं समझा, सिर्फ चुपचाप ताकता रहा। वह कहने लगा, ''बंकू बाबू की अब उम्र भी हो गयी, थोड़ा-बहुत पढ़-लिखकर आदमी भी बन गये हैं। शायद सोचते हैं कि दूसरे के अधीन किसलिए रहा जाय। दानपत्र के जोर से सब मार तो लिया ही है। मानता हूँ कि मोटे तौर पर उन्होंने काफी हाथ साफ किया है, पर वह कितने दिनों का है बाबू?''

बात अब भी साफ न हुई, पर एक धुँधली छाया ऑंखों के सामने तैर गयीं। वह फिर कहने लगा, ''आपने तो खुद अपनी ऑंखों से देखा है कि महीने में कम-से-कम दो दफा मेरी नौकरी छूट जाती है। हालत बुरी नहीं है, नाराज होकर जा भी सकता हूँ, लेकिन क्यों नहीं जाता? जा नहीं सकता। इतना जानता हूँ कि जिसकी दया से सब कुछ हुआ है, उसके एक नि:श्वास से ही आश्विन के मेघ की तरह सब लोप हो जायेगा, वह पलक मारने की भी फुर्सत नहीं देगा। यह माँ की नाराजगी नहीं है, यह तो मेरे देवता का आशीर्वाद है।''

यहाँ पाठकों को यह स्मरण करा देना आवश्यक है कि बचपन में रतन थोड़े दिनों तक प्राइमरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर चुका है।

कुछ रुककर कहा, ''माँ ने मना कर दिया है, इसीलिए कभी कहता नहीं। घर में जो कुछ था बाबा ने ले लिया, यजमानों का एक घर तक नहीं दिया। एक छोटा लड़का और लड़की, और उनकी माँ को छोड़कर पेट के लिए एक दिन गाँव छोड़कर बाहर निकल पड़ा। पर पहले जन्म की तपस्या थी, मेरी नौकरी इन माँ के ही घर लग गयी। सारा दुखड़ा उन्होंने सुना, लेकिन उस वक्त कुछ नहीं कहा। एक वर्ष के बाद मैंने निवेदन किया, ''माँ, बच्चों को देखने की इच्छा है, अगर कुछ दिनों की छुट्टी मिल जाती। हँसकर बोलीं, ''फिर आओगे न?'' जाने के दिन हाथ में एक पोटली देते हुए कहा, ''रतन, बाबा से लड़ाई-झगड़ा मत करना भैया, जो कुछ तुम्हारा चला गया है उसे इसके द्वारा फेर लेना।'' गठरी खोलकर देखता हूँ तो पाँच-सौ रुपये हैं! पहले तो अपनी ऑंखों पर विश्वास नहीं हुआ। ऐसा लगा, मानो मैं जागृत अवस्था में स्वप्न देख रहा हूँ। मेरी उसी माँ से बंकू बाबू अब उलटी-सीधी बातें कहते हैं, आड़ में खड़े होकर फुस-फुस करते हैं, सोचता हूँ कि अब इनके ज्यादा दिन नहीं हैं, क्योंकि अब माँ-लक्ष्मी जाने ही वाली हैं!''

मैंने यह आशंका नहीं की थी, चुपचाप सुनने लगा।

ऐसा लगा कि कुछ दिनों से क्रोध और क्षोभ से रतन फूल रहा है। बोला, ''माँ जब देती हैं तो दोनों हाथों से उड़ेल देती हैं। बंकू को भी दिया है, इसीलिए उसने यह सोच लिया है कि मधु निचोड़े हुए छत्ते की क्या कीमत?- इस वक्त तो ज्यादा-से-ज्यादा उसे जलाया ही जा सकता है। इसलिए उसको वे इतनी अप्रिय हो रही हैं। मूरख यह नहीं जानता कि आज भी माँ का एक गहना बेचने पर ऐसे पाँच मकान तैयार हो सकते हैं।''

मैं भी यह न जानता था। हँसकर कहा, ''ऐसी बात है? पर वह सब हैं कहाँ?''

रतन भी हँसा। बोला, ''उन्हीं के पास है। माँ ऐसी बेवकूफ नहीं। सिर्फ आप ही के चरणों पर सर्वस्व लुटाकर वे भिखारिणी हो सकती हैं, किन्तु और किसी के भी लिए नहीं। बंकू नहीं जानता है कि आपके जिन्दा रहते माँ को आश्रय की कमी न होगी, और जब तक रतन जीवित है तब तक उन्हें नौकर के लिए भी सोचने की जरूरत नहीं। उस दिन काशी से आपके इस तरह चले आने की वजह से माँ के हृदय में कैसा तीर चुभा है, इसकी खबर क्या बंकू बाबू रखते हैं? गुरु महाराज को भी उसकी खोज-खबर कहाँ से मिल सकती है?''

''पर मुझे तो उन्होंने ही खुद बिदा किया था, इसकी खबर तो रतन, तुम्हें है?''

जीभ निकालकर रतन शर्म से गड़ गया। उसमें इतनी विनय इसके पहले कभी न देखी थी। कहा, ''बाबू, हम तो नौकर-चाकर हैं, ये सब बातें हमारे कानों को नहीं सुननी चाहिए। यह झूठ है।''

रतन थकावट मिटाने के लिए चला गया। शायद कल आठ बजे के पहले उसके शरीर में स्फूर्ति नहीं आयेगी।

दो बड़ी खबरें मिलीं। एक तो यह कि बंकू अब बड़ा हो गया है। पटने में जब पहली बार मैंने उसे देखा था तो उस वक्त उसकी उम्र सोलह-सतरह थी। अब इक्कीस वर्ष का युवक है। बल्कि इन पाँच-छह वर्षों में पढ़-लिखकर वह आदमी बन गया है। अत: शैशव का वह सकृतज्ञ स्नेह यदि आज यौवन के आत्मसम्मान-बोध में सामंजस्य न रख पाता हो, तो इसमें विस्मय की कौन-सी बात है?

दूसरी खबर राजलक्ष्मी की गम्भीर वेदना का पता न तो बंकू को और न गुरुदेव को ही आज तक मिला है।

मेरे मन में ये ही दो बातें बहुत देर तक घूमती रहीं।

बड़े यत्न से अंकित चमड़े की सील-मोहर को देखकर चिट्ठी खोली। उसके हाथ की लिखावट ज्यादा देखने का मौका नहीं मिला है, पर, यह खयाल आया कि अक्षर ऐसे तो नहीं हैं कि पढ़ने में तकलीफ हो, लेकिन फिर भी अच्छे नहीं हैं। पर यह पत्र उसने बहुत सावधानी से लिखा है। शायद उसे डर था कि मैं चिढ़कर फेंक न दूँ, बल्कि शुरू से आखिर तक सब कुछ आसानी से पढ़ जा सकूँ।

आचार और आचरण में राजलक्ष्मी उस युग की प्राणी है। प्रणय-निवेदन की अधिकता तो दूर की बात है, बल्कि यह भी याद नहीं आता कि उसने मेरे सामने कभी कहा हो कि 'प्रेम करती हूँ।' उसने चिट्ठी लिखी है- मेरी प्रार्थना के अनुकूल अनुमति देकर। तो भी, न जाने क्या है, पढ़ने में जाने क्यों डर लगने लगा। उसके बाल्य-काल की याद आ गयी। उस दिन गुरुमहाशय की पाठशाला में उसका पढ़ना-लिखना बन्द हो गया था। बाद में शायद घर पर ही थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लिया होगा। अतएव, भाषा का इन्द्रजाल, शब्दों की झनकार, पद-विन्यास की मधुरता की उसके पत्र में आशा करना अन्याय है। कुछ मामूली प्रचलित बातों में ही मन के भाव व्यक्त करने के अलावा वह और क्या करेगी? अनुमति देकर मामूली शुभ-कामना की दो लाइनें होंगी- यही तो? पर लिफाफा खोलकर पढ़ना शुरू करते ही कुछ देर के लिए बाहर का और कुछ भी याद न रहा। पत्र लम्बा नहीं है, लेकिन भाषा और भंगी जितनी सरल और सहज समझी थी, उतनी नहीं है। मेरे आवेदन का उत्तर उसने इस तरह दिया है-

''काशीधाम

''प्रणाम के उपरान्त सेविका का निवेदन।

''इस बार मिलाकर कुल सौ दफा तुम्हारी चिट्ठी पढ़ी। तो भी यह समझ में नहीं आया कि तुम पागल हो गये हो या मैं। तुमने शायद यह खयाल किया है कि मैंने तुम्हें पड़ा हुआ पा लिया था। परन्तु तुम कहीं पड़े हुए नहीं थे, तुम बहुत तपस्या के बाद मिले थे, बहुत आराधाना के बाद। इसीलिए, बिदा देने के मालिक तुम नहीं। मुझे त्याग करने का मालिकाना स्वत्वाधिकार तुम्हारे हाथों में नहीं है।

''तुम्हें याद नहीं, फूलों के बदले वन से करौंदे तोड़, उनकी माला गूँथकर, किस शैशव में तुम्हें वरण किया था। हाथों में काँटे चुभ जाने की वजह से खून बहने लगता था, लाल माला का वह लाल रंग तुम नहीं पहिचान सके थे। बालिका की पूजा का अर्घ्य उस दिन तुम्हारे गले में था। परन्तु तुम्हारे हृदय पर रक्त-रेखा से जो लेखा अंकित कर देती थी, वह तुम्हारी नज़रों में नहीं पड़ी। पर जिसकी नजरों से संसार का कुछ भी छिपा नहीं रह सकता, उनके पाद-पद्मों में मेरा वह निवेदन पहुँच गया था।

''उसके बाद आई दुर्योग की रात। काले मेघों ने मेरे आकाश की ज्योत्स्ना ढँक दी। किन्तु वास्तव में वह मैं हूँ या और कोई, इस जीवन में यथार्थ रूप में वे सब बातें हुई थीं या सोते-सोते स्वप्न देख रही थी-यह सोचते ही बहुधा मुझे डर लगता है मैं पागल हो जाऊँगी। तब सब भूलकर जिसका ध्यादन लगाकर बैठती हूँ, उसका नाम नहीं लिया जाता। किसी से कहने की बात नहीं है। उनकी क्षमा ही मेरे जगदीश्वर की क्षमा है। इसमें गलती नहीं है, सन्देह नहीं। यहाँ मैं निर्भय हूँ।

''हाँ, कहा था कि इसके बाद मेरे बुरे दिनों की रात आयी, दोनों ऑंखों की सारी रोशनी को कलंक ने बुझा दिया। पर वही क्या मनुष्य का समस्त परिचय है? उस अखण्ड ग्लानि के घने आवरण के बाहर उसका क्या और कुछ भी बाकी नहीं है?

''है। अव्याहत अपराध के बीच-बीच उसे मैंने बार-बार देखा है। अगर ऐसा न होता, विगत दिनों का राक्षस यदि मेरे समस्त अनागत मंगल को नि:शेष ग्रास कर लेता, तो तुम फिर मुझे कैसे मिलते? मेरे ही हाथों में लाकर फिर तुम्हें कौन सौंप जाता?

''मुझसे तुम चार-पाँच वर्ष बड़े हो, तो भी तुम्हें जो अच्छा लगता है वह मुझे शोभा नहीं देता। मैं बंगाली घर की लड़की हूँ, जीवन के सत्ताईस वर्ष पार कर चुकने के बाद यौवन का दावा और नहीं करती। मुझे तुम गलत मत समझना- चाहे जितनी ही अधम क्यों न होऊँ। अगर वह बात तुम्हारे मन में क्षणभर के लिए घुणाक्षर न्याय से भी आये, तो इससे बढ़कर शर्म की बात मेरे लिए और कोई नहीं है। बंकू जिन्दा रहे, वह बड़ा हो गया है। उसकी बहू आ गयी है- तुम्हारी शादी के बाद उन लोगों के सामने मैं किस मुँह से निकलूँगी? यह अपमान कैसे सहूँगी?

''यदि तुम कभी बीमार पड़ो तो सेवा कौन करेगा-पूँटू? और मैं तुम्हारे मकान

के बाहर से ही नौकर के मुँह से खबर पूँछकर लौट आऊँगी? इसके बाद भी जीवित रहने के लिए कहते हो?

''शायद प्रश्न करोगे, तो क्या हमेशा ही ऐसा नि:संग जीवन काटूँ? पर प्रश्न चाहे कुछ भी हो, उसका जवाब देने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर नहीं है, तुम्हारे ऊपर है। फिर भी अगर तुम बिल्कुनल ही कुछ न सोच सको- बुद्धि का इतना क्षय हो गया हो तो मैं उधार दे सकती हूँ, वह लौटानी नहीं पड़ेगी- लेकिन देखो, ऋण को कहीं अस्वीकार मत कर देना!

''तुम सोचते हो कि गुरुदेव ने मुझे मुक्ति का मन्त्र दिया है, शास्त्रों ने पथ का संधान दिया है, सुनन्दा ने धर्म की प्रवृत्ति दी है, और तुमने दिया है सिर्फ भार-बोझा। ऐसे ही अन्धे हो तुम लोग!

''पूछती हूँ, तुम्हें तो मैंने तेईस वर्ष की उम्र में पा लिया था, पर इसके पहले ये सब कहाँ थे? तुम इतना ज्यादा सोच सकते हो और यह नहीं सोच सकते?''

''मुझे आशा थी कि एक दिन मेरे सब पापों का अन्त हो जायेगा, मैं निष्पाप हो जाऊँगी। यह लोभ क्यों है, जानते हो? स्वर्ग के लिए नहीं- वह मुझे नहीं चाहिए। मेरी कामना है कि मरने के बाद फिर आकर जन्म ले सकूँ। इसके मानी समझ सकते हो?

''सोचा था कि पानी की धारा में कीचड़ मिल गयी है- मुझे उसे निर्मल करना ही पड़ेगा। पर आज अगर उसका मूल स्रोत ही सूख जाय, तो पड़ा रह जायेगा मेरा जप-तप, पूजा-अर्चना, रह जायेगी सुनन्दा, पड़े रहेंगे मेरे गुरुदेव।

स्वेच्छा से मैं मरना नहीं चाहती। पर मेरे अपमान करने का ही कूट कौशल अगर तुमने रचा हो तो इस विचार को छोड़ दो। अगर तुम विष दोगे तो मैं पी लूँगी, पर उसे न ले सकूँगी। मुझे जानते हो, इसलिए यह बता दिया कि जो सूर्य अस्त होगा उसके पुन: उदय की अपेक्षा में बैठे रहने का वक्त अब मेरे पास नहीं है। इति।

राजलक्ष्मी।''

छुटकारा मिला। सुनिश्चित कठोर अनुशासन की चरम-लिपि भेजकर उसने एक ओर से मुझे बिल्कुाल निश्चिन्त कर दिया। इस जीवन में उस विषय में सोचने के लिए अब और कुछ नहीं रहा। पर नि:संशयपूर्वक यह तो मालूम हुआ कि क्या नहीं कर सकूँगा। पर इसके बाद मुझे क्या करना होगा, इस बारे में राजलक्ष्मी बिल्कुाल चुप है। शायद उपदेशों से भरी हुई एक चिट्ठी और किसी दिन लिखेगी, अथवा सशरीर मुझे ही तलब करेगी। लेकिन इस वक्त जो व्यवस्था हो गयी है वह बहुत ही सुन्दर है। इधर बाबा-महोदय सम्भवत: कल सुबह ही आकर हाजिर होंगे। उन्हें भरोसा दे आया हूँ कि फिक्र करने की जरूरत नहीं, अनुमति मिलने में कोई विघ्न न होगा। पर जो कुछ आ पहुँचा, वह निर्विघ्न अनुमति ही तो है। रतन नाई के हाथ उसने कपड़े और मौर मुकुट नहीं भेजा, यही बहुत है।

दूसरी ओर देश के मकान में विवाह का आयोजन निश्चय ही अग्रसर हो रहा होगा। पूँटू के आत्मीय स्वजनों में से कोई कोई शायद आकर हाजिर हो रहे होंगे, तथा प्राप्त वयस्क अपराधी लड़की को इतने दिनों तक लांछना और भर्त्सना के बदले अब कुछ आदर मिल रहा होगा। यह जानता हूँ कि बाबा से क्या कहूँगा। पर वह बात कैसे कहूँगा, यही समझ में नहीं आता। उनके निर्मम तकाजों, लज्जाहीन युक्तियों और वकालत के बारे में मन ही मन सोचकर एक ओर हृदय जितना तिक्त हो उठा, दूसरी ओर व्यर्थ प्रत्यावर्तन की निराशा से चिढ़े हुए परिवार वालों के उस अभागी लड़की को और भी ज्यादा उत्पीड़ित करने की बात सोचते ही हृदय को उतनी ही व्यथा पहुँची। पर उपाय क्या है? बिछौने पर लेटा हुआ बहुत रात तक जागता रहा। पूँटू की बात भूलने में देर नहीं लगी, पर गंगामाटी की याद बराबर आने लगी। जन-विरल उस क्षुद्र गाँव की स्मृति कभी मिट नहीं सकती। इस जीवन की गंगा-जमुना की धारा एक दिन यहीं आकर मिली थी, और थोड़े अरसे तक पास-पास प्रवाहित हो एक दिन यहीं फिर अलग हो गयी थी। एक साथ रहने के वे क्षणस्थायी दिन श्रद्धा से गहरे, स्नेह से मधुर, आनन्द से उज्ज्वल और उनकी ही तरह नि:शब्द वेदना से अत्यधिक स्तब्ध हैं। विच्छेद के दिन भी हमने प्रवंचना की निन्दा से एक दूसरे को कलंक नहीं लगाया, नफे-नुकसान के फिजूल के वाद-विवाद से गंगामाटी के शान्त गृह को हम धूमाच्छन्न करके नहीं आया। वहाँ के सब लोग यही जानते हैं कि फिर एक दिन हम लौट आयँगे, फिर हँसी-खुशी शुरू होगी और फिर आरम्भ होगी भूस्वामिनी की दीन-दुखियों की सेवा और सत्कार। पर वह सम्भावना तो खत्म हो गयी है-प्रभात की विकसित मल्लिका दिन के अन्त का हुक्म मानकर चुप हो गयी है- यह बात वे स्वप्न में भी नहीं सोचेंगे।

ऑंखों में नींद नहीं है, निद्राहीन रजनी प्रात:काल की ओर जितनी आगे बढ़ने लगी, उतनी ही यह इच्छा होने लगी कि यह रात खत्म ही न हो! सिर्फ यही एक चिन्ता मानो मुझे मोहाच्छन्न करके रखे रही।

बीती हुई कहानी घूम-फिरकर मन में आ जाती है। वीरभूमि‍ जिले की वह तुच्छ कुटिया मन पर भूत की तरह चढ़ जाती है, हमेशा काम-काज में फँसी हुई राजलक्ष्मी के दोनों स्निग्ध हाथ ऑंखों के सामने साफ नजर आते हैं, इस जीवन में परितृप्ति का ऐसा आस्वादन कभी किया है, यह याद नहीं आता।

अभी तक पकड़ा ही गया हूँ, पकड़ नहीं पाया हूँ। पर राजलक्ष्मी की सबसे बड़ी कमजोरी कहाँ है, आज पकड़ ली। वह जानती है कि मैं नि‍रोग नहीं हूँ, किसी भी दिन बीमार पड़ सकता हूँ। तब न जाने कहाँ की एक पूँटू मुझे घेरकर बैठी है, राजलक्ष्मी का कोई प्रभुत्व ही नहीं है- इतनी बड़ी दुर्घटना को वह अपने मन में स्थान नहीं दे सकती। संसार की सब चीजों से वह अपने को वंचित कर सकती है पर यह वस्तु असम्भव है- यह उसके लिए असाध्यु है। मौत तुच्छ है, इसके निकट एक ओर रह गये गुरुदेव और एक ओर रह गये उसके जप-तप और व्रत-उपवास। चिट्ठी में उसने मुझे झूठा डर नहीं दिखाया है।

सुबह के वक्त शायद सो गया था। रतन की पुकार सुनकर जब उठा तो काफी वक्त हो गया था। उसने कहा, ''न जाने कौन एक बूढ़े महाशय घोड़ागाड़ी करके अभी आये हैं।''

वे बाबा हैं। पर गाड़ी किराये की करके? सन्देह हुआ।

रतन ने कहा, ''साथ में एक सतरह-अठारह साल की लड़की है।''

वह पूँटू है। यह बेशर्म आदमी उसे कलकत्ते के मकान तक घसीट लाया है। सुबह का प्रकाश तिक्तता से म्लान हो गया। कहा, ''उन्हें उस कमरे में लाकर बैठाओ रतन, मैं मुँह-हाथ धोकर आता हूँ।'' यह कहकर मैं नीचे के स्नान-घर में चला गया।

घण्टे-भर बाद लौटते ही बाबा ने मेरी सादर अभ्यर्थना की, मानो मैं ही उनका अतिथि हूँ, ''आओ बेटा, आओ। तबियत अच्छी है न?''

मैंने प्रणाम किया। बाबा ने पुकार मचाई ''पूँटू, कहाँ गयी?''

पूँटू खिड़की के किनारे खड़ी होकर रास्ता देख रही थी, उसने पास आकर मुझे नमस्कार किया।

बाबा ने कहा, ''इसकी बुआ शादी के पहले एक बार देखना चाहती थी। फूफा तो हाकिम हैं, पाँच सौ रुपया महीना पाते हैं। डायमण्ड हारबर में तबादला हुआ है- घर गृहस्थी छोड़कर बाहर जाने की फुर्सत बुआ को नहीं है। इसलिए साथ लेता आया। सोचा कि दूसरे के हाथों में सौंपने के पहले उन्हें एक बार दिखा लाऊँ। इसकी दादी-माँ ने आशीर्वाद देकर कहा, ''पूँटू, ऐसा ही भाग्य तेरा भी हो।''

मेरे कुछ कहने के पहले ही खुद बोले, ''मैं इतनी जल्दी नहीं छोड़ूँगा भैया। हाकिम हों चाहें और कुछ हों, हैं तो रिश्तेदार-खड़े होकर काम पूरा कराना होगा- तब उन्हें छुट्ठी मिलेगी। जानते तो हो बेटा, कि शुभ कार्य में बहुत विघ्न होते हैं- शास्त्रर में कहा ही है, 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि।' ऐसे एक आदमी के खड़े रहने पर किसी की चूँ तक करने की मजाल नहीं होगी। हमारे गाँव के लोगों का तो विश्वास है नहीं- वे सब कुछ कर सकते हैं। पर वे तो हाकिम हैं, उनकी तो राशि ही न्यारी है।

पूँटू के फूफा हैं। समाचार अवान्तर नहीं है- मतलब का है।

नया हुक्का खरीदकर रतन सयत्न चिलम सजाकर दे गया। थोड़ी देर तक गौर से देखने के बाद बाबा ने कहा, ''ऐसा लगता है कि इस आदमी को कहीं देखा है?''

रतन ने फौरन ही कहा, ''जी हाँ, देखा क्यों नहीं है। देश के मकान में जब बाबू बीमार थे...''

''ओ, तभी तो कहा कि पहिचाना हुआ चेहरा है।''

''जी हाँ।'' कहकर रतन चला गया।

बाबा का मुँह अत्यन्त गम्भीर हो गया। धूर्त्त आदमी ठहरे, शायद उन्हें सारी बातें याद आ गयीं। चुपचाप चिलम के दम लगाते हुए बोले, ''आने के लिए दिन देखकर आया था। बहुत अच्छा दिन है। मेरी इच्छा है कि आशीर्वाद का काम ऐसे ही खत्म कर जाऊँ। नूतन बाजार में तो सभी चीजें बिकती हैं। नौकर को एक बार भेज नहीं सकते? क्या कहते हो?''

जब कुछ भी कहने को न मिला तो किसी तरह सिर्फ कह दिया, ''नहीं।''

''नहीं? नहीं क्यों? बारह बजे तक दिन बहुत अच्छा है। पंचांग है?''

मैंने कहा, ''पंचांग की जरूरत नहीं। मैं विवाह नहीं कर सकता।''

 
बाबा ने हुक्के को दीवार से लगाकर रख दिया। चेहरा देखकर मैं ताड़ गया कि वह युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। गले को बहुत शान्त और गम्भीर बनाकर कहा, ''सारा आयोजन एक तरह से पूरा हो गया है। लड़की के ब्याह की बात है, हँसी-मजाक का मामला तो है नहीं। बचन दे आने पर अब ना करने पर कैसे काम चलेगा?''

पूँटू पीठ किये खिड़की के बाहर देख रही है और दरवाजे की आड़ में रतन कान लगाये खड़ा है, यह अच्छी तरह मालूम हो गया।

मैंने कहा, ''वचन देकर तो नहीं आया था, यह आप भी जानते हैं और मैं भी। कहा था कि एक व्यक्ति की अनुमति मिल जाने पर राजी हो सकता हूँ।''

''अनुमति नहीं मिली?''

''नहीं।''

बाबा एक क्षण ठहरकर बेले, ''पूँटू के पिता कहते हैं कि सब मिलाकर वह एक हजार रुपये देंगे। ज्यादा जोर लगाने पर और भी सौ-दो सौ दे सकते हैं; क्या कहते हो?''

रतन ने कमरे में घुसकर कहा, ''तम्बाकू क्या एक बार और बदल दूँ?''

''बदल दो। तुम्हारा नाम क्या है जी?''

''रतन।''

''रतन? बड़ा सुन्दर नाम है, कहाँ रहते हो?'

''काशी में।''

''काशी? देवी आजकल शायद काशी में रहती है? वहाँ क्या करती है।''

रतन ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, ''उस समाचार से आपको मतलब?''

बाबा जरा हँसकर बोले, ''नाराज क्यों होते हो बापू, क्रोध करने की तो कोई बात नहीं। गाँव की लड़की है न, इसीलिए खबर जानने की इच्छा होती है। शायद उसके पास भी कभी जा पड़ना पड़े। खैर, वह अच्छी तरह तो है?''

रतन बिना कोई जवाब दिये ही चला गया, और कोई दो मिनट बाद ही चिलम को फूँकता हुआ लौट आया और हुक्का हाथ में थमाकर चला जा रहा था कि बाबा बड़े जोर से कई दम लगाकर ही उठ खड़े हुए। बोले, ''ठहरो तो भई, जरा पाखाना दिखा दो। सुबह ही निकल पड़ा हूँ न! कहते-कहते वे रतन के आगे ही बहुत तेजी के साथ कमरे से बाहर निकल गये।''

पूँटू ने मुँह फिराकर देखा और कहा, ''बाबा की बातों पर आप एतबार मत कीजिए। पिताजी के पास हजार रुपये कहाँ हैं जो देंगे? किसी तरह दूसरों के गहने मँगनी माँगकर जीजी की शादी की थी- अब वे लोग जीजी को नहीं बुलाते। कहते हैं कि हम लड़के की दूसरी शादी करेंगे।''

इस लड़की ने इतनी बातें मुझसे पहले नहीं कही थीं। कुछ चकित होकर पूछा, ''तुम्हारे पिताजी वाकई हजार रुपये नहीं दे सकते?''

पूँटू ने सिर हिलाकर कहा, ''कभी नहीं। पिताजी को रेल में सिर्फ चालीस रुपये मिलते हैं। स्कूल की फीस की वजह से ही मेरे छोटे भाई की पढ़ाई बन्द हो गयी। वह कितना रोता है!'' कहते-कहते उसकी दोनों ऑंखें छलछला आयीं।

प्रश्न किया, ''सिर्फ रुपये के कारण ही तुम्हारी शादी नहीं हो रही है?''

पूँटू ने कहा, ''हाँ इसी वजह से। हमारे गाँव के अमूल्य बाबू के साथ पिताजी ने सम्बन्ध पक्का किया था। उनकी लड़कियाँ भी मुझसे बहुत बड़ी हैं। इस पर माँ पानी में डूब मरने को गयी, तो शादी रुक गयी। इस बार शायद पिताजी किसी की कुछ न सुनेंगे, वहीं मेरी शादी कर देंगे।''

पूछा, ''पूँटू, मैं तुम्हें पसन्द हूँ?''

पूँटू ने लज्जा से मुँह नीचा कर जरा सिर हिला दिया।

''पर मैं भी तो तुमसे चौदह-पन्द्रह साल बड़ा हूँ?''

पूँटू ने इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया।

पूछा, ''तुम्हारा क्या और कहीं कोई सम्बन्ध नहीं हुआ था?''

पूँटू ने खुश होकर मुँह ऊपर उठाते हुए कहा, ''हुआ तो था। आप अपने गाँव के कालिदास बाबू को जानते हैं? उनके छोटे लड़के ने बी.ए. पास किया है। उम्र भी मुझसे थोड़ी ही ज्यादा है। उसका नाम शशधर है।''

''वह तुम्हें पसन्द है?''

पूँटू हठात् हँस पड़ी।

मैंने कहा, ''पर शशधर अगर तुम्हें पसन्द न करे?''

पूँटू ने कहा, ''पसन्द क्यों न करेगा? हमारे मकान के सामने होकर बार-बार आता-जाता रहता है। राँगा दीदी हँसी में कहती थीं कि वह सिर्फ मेरे लिए ही चक्कर काटता है।''

''तो यह शादी क्यों नहीं हुई?''

पूँटू का चेहरा मलिन हो गया। कहा, ''उसके पिता हजार रुपये नकद और हजार रुपये के गहने माँगते थे। ऊपर से शादी में भी पाँच सौ रुपये खर्च न हो जाते? इतना तो जमींदार के घर की लड़की के लिए ही हो सकता है। सच है न? वे बड़े आदमी हैं, उनके पास बहुत रुपये हैं मेरी माँ उनके यहाँ गयी और बहुत हाथ-पैर जोड़े, पर उन्होंने एक नहीं सुनी।''

''शशधर ने कुछ नहीं कहा?''

''नहीं, कुछ नहीं। पर वह भी तो बहुत बड़ा नहीं है- उसके माँ-बाप जिन्दा हैं न?''

'यही सही है। शशधर की शादी हो गयी?''

पूँटू ने व्यग्र होकर कहा, ''नहीं, अभी नहीं हुई। सुना है कि जल्दी ही होगी।''

''अच्छा, वहाँ तुम्हारी शादी हो जाने पर अगर वे लोग तुमसे प्रेम न करें?''

''मुझसे? प्रेम क्यों नहीं करेंगे? मैं रसोई बनाना, सिलाई करना और गृहस्थी के सारे काम जानती हूँ? मैं अकेली ही उनका सारा काम कर दूँगी।''

इससे ज्यादा बंगाली घराने की लड़की और क्या जानती है? शारीरिक परिश्रम द्वारा ही वह सब कमियों की पूर्ति करना चाहती है। पूछा, ''उन लोगों का सब काम अवश्य करोगी न?''

''हाँ, निश्चय करूँगी।''

''तो तुम अपनी माँ से जाकर कह दो कि श्रीकान्त दादा ढाई हजार रुपये भेज देंगे।''

''आप भेज देंगे? तो फिर वायदा कीजिए कि शादी के दिन आयेंगे?''

''अच्छा, आऊँगा।''

दरवाजे की देहली पर बाबा की आवाज़ सुनाई दी।

उन्होंने लाँग से मुँह पोंछते-पोंछते प्रवेश किया और कहा, ''तुम्हारा पायखाना तो बहुत अच्छा है भैया! सो जाने की इच्छा होती है। गया कहाँ रतन, और एक चिलम तम्बाकू सजा दे न।''

इस संसार का सबसे बड़ा सत्य यह है कि मनुष्य को सदुपदेश देने से कोई फायदा नहीं होता- सत्-परामर्श पर कोई जरा भी ध्या न नहीं देता। लेकिन चूँकि यह सत्य है, इसलिए दैवात् इसका व्यतिक्रम भी होता है। इसकी एक घटना सुनाता हूँ।

बाबा ने दाँत निकालकर आशीर्वाद दिया और अत्यन्त प्रसन्नता के साथ प्रस्थान किया। पूँटू ने भी बहुत सारी पद-धूलि लेकर आदेश का पालन किया। पर उनके चले जाने के बाद मेरे परिताप की सीमा न रही। मन विद्रोही होकर सिर्फ तिरस्कार करने लगा कि ये कौन होते हैं जिन्हें विदेश में नौकरी कर अनेक कष्टों से संचित किया हुआ धन दे दोगे? सनकीपन में कुछ कह दिया तो क्या उसका यह मतलब है कि दाता कर्ण बनना ही पड़ेगा? न जाने कहाँ की इस लड़की ने बिना माँगे ही ट्रेन में पेड़े और दही खिलाकर मुझे तो अच्छा फन्दे में फाँसा! एक फन्दे को काटते हुए एक दूसरे फन्दे में फँस गया। बचने का उपाय सोचते हो दिमाग गर्म हो गया, और उस निरीह लड़की के प्रति क्रोध और विरक्ति की सीमा न रही। और यह शैतान बाबा! मनाने लगा कि वह अब घर न पहुँच सके, रास्ते में ही सर्दी-गर्मी से मर जाय। पर यह आशा भित्तिहीन है। अच्छी तरह जानता हूँ कि वह आदमी किसी तरह भी नहीं मरेगा और जब उसे मेरे मकान का पता एक बार चल गया है तो फिर आयेगा, तथा चाहे जैसे भी हो, रुपये वसूल करेगा। हो सकता है कि इस बार उन्हीं हाकिम फूफा महाशय को भी साथ लावे। एक ही उपाय है- य: पलायति स जीवति। टिकिट खरीदने गया, पर जहाज में स्थानाभाव- सब टिकिट पहले से ही बिक गये हैं। अत: दूसरी मेल का इनतजार करना होगा और उसमें अभी छह-सात दिन की देर है।

एक उपाय और है, कि मकान बदल दिया जाय, बाबा को खोजने पर भी न मिले। पर इतनी अच्छी जगह इतनी जल्दी कहाँ मिलेगी? किन्तु शिकारी के हाथों प्राण बचाने के सम्बन्ध में हालत ऐसी नाजुक हो गयी है कि अच्छे-बुरे का प्रश्न ही गौण है- यथारण्यं तथा गृहम्।

डर है कि मेरा गुप्त उद्वेग कहीं रतन की नज़रों में न आ जाय। पर मुश्किल तो यह है कि वह यहाँ से टलना ही नहीं चाहता। काशी की अपेक्षा उसे कलकत्ता ज्यादा पसन्द आ गया है। पूछा, ''चिट्ठी का जवाब लेकर क्या तुम कल ही जाना चाहते हो, रतन?''

रतन ने फौरन ही जवाब दिया, ''जी नहीं। आज दोपहर को मैंने माँ को एक पोस्ट कार्ड डाल दिया है कि लौटने में मुझे चार-पाँच दिन की देर होगी। मृत सोसायटी (=अजायबघर) और जीवित सोसायटी (=चिड़ियाखाना) बिना देखे नहीं जाऊँगा। अब फिर कब आना हो, इसका तो कोई ठिकाना नहीं।''

मैंने कहा, ''पर वे तो उद्विग्न हो सकती हैं?''

''जी नहीं। लिख दिया है कि गाड़ी में लगे हुए धक्कों की थकान अभी तक दूर नहीं हुई है।''

''पर चिट्ठी का जवाब...''

''जी, दीजिए न। कल ही रजिस्ट्री से भेज दूँगा। उस मकान में माँ की चिट्ठी खोलने का साहस यम भी नहीं करेगा।''

चुपचाप बैठा रहा। नाई-बेटे के सामने एक भी तरकीब नहीं चली। सब प्रस्तावों को रद्द कर दिया।

जाते वक्त बाबा रुपयों की बात प्रचार कर गये थे। परन्तु कोई इस बात का भ्रम न कर ले कि उन्होंने हृदय की उदारता या अधिक सरलता के कारण ऐसा किया हो। वे तो ऐसा करके गवाह बना गये हैं!

रतन ने ठीक इसी बात का अन्दाज लगाया। कहा, ''बाबू, अगर आप नाराज़ न हों तो एक बात कहूँ।''

''क्या बात रतन?''

रतन ने कुछ संकोच के साथ कहा, ''ढाई हजार रुपये तो कम रकम नहीं है बाबू, वे कौन होते हैं जिनकी शादी के लिए आपने इतना रुपया खामख्वाह देने को कहा है? इसके अलावा वह बूढ़ा बाबा हो या और कोई, लेकिन अच्छा आदमी नहीं है। उसे देने कहना अच्छा नहीं हुआ बाबू।''

उसका मन्तव्य सुनकर जैसे अनिर्वचनीय आनन्द मिला वैसे ही मन को जोर भी मिला और यही मैं चाहता था। तथापि, अपनी आवाज में किंचित् सन्देह का आभास देकर बोला, ''कहना ठीक नहीं हुआ- क्यों रतन?''

रतन बोला, ''हाँ बाबू, निश्चय ठीक नहीं हुआ। रुपये भी तो कम नहीं हैं, और फिर किसलिए, कहिए तो?''

''ठीक तो है।'' मैंने कहा, ''तो नहीं देंगे।''

आश्चर्य से थोड़ी देर तक देखने के बाद रतन ने कहा, ''वह छोड़ेगा क्यों?''

मैंने कहा, ''नहीं छोड़ेगा तो क्या करेगा? लिखकर तो दिया ही नहीं है और फिर, यही कौन जानता है कि उस वक्त मैं यहाँ रहूँगा या बर्मा चला जाऊँगा?''

रतन क्षणभर चुप रहकर हँसा। बोला, ''बाबू आप बूढ़े को पहिचान नहीं सके। उस आदमी को शर्म और मान-अपमान छू तक नहीं गया है। रो-धोकर, भीख माँगकर या डरा-धमकाकर वह रुपये किसी-न-किसी तरह लेगा ही। अगर यहाँ आपसे मुलाकात न होगी तो लड़की को साथ लेकर वह काशी जायेगा और माँ से रुपया वसूल करके छोड़ेगा! माँ को बहुत शर्म आयेगी बाबू, यह तरीका ठीक नहीं है।''

यह सुनकर निस्तब्ध हो बैठा रहा। रतन मुझसे बहुत ज्यादा बुद्धिमान है। अर्थहीन आकस्मिक करुणा की हठ का जुर्माना मुझे देना ही पड़ेगा, कोई निस्तार नहीं।

रतन ने गाँव के बाबा को पहचानने में गलती नहीं की, यह तब समझ में आया जबकि चौथे दिन वे फिर लौटकर आये। आशा थी कि इस बार हाकिम फूफा भी उनके साथ अवश्य आवेंगे- पर हाजिर हुए वे अकेले ही। बोले, ''बेटा, दस गाँवों में धन्य-धन्य हो रहा है। सब कहते हैं कि कलियुग में ऐसा कभी नहीं सुना। गरीब ब्राह्मण की कन्या का ऐसा उद्धार कभी किसी ने नहीं देखा। आशीर्वाद देता हूँ कि तुम चिरंजीवी होओ।''

पूछा, ''शादी कब है?''

''इसी महीने की पच्चीस तारीख ठीक हुई है, बीच में दस दिन बाकी हैं। कल 'देखना' पक्का हो जायेगा, आशीर्वाद-करीब तीन बजे के बाद मुहूर्त नहीं है, इसके भीतर ही सब शुभ कार्य पूरे कर लेने होंगे। पर बिना तुम्हारे गये सब बन्द रहेगा, कुछ भी नहीं हो सकेगा। यह लो अपनी पूँटू की चिट्ठी, उसने अपने हाथ से लिखकर भेजी है। पर यह भी कहे देता हूँ बेटा, कि जिस रत्न को तुमने अपनी इच्छा से खो दिया, उसका जोड़ नहीं है।'' यह कहकर उन्होंने एक पीले रंग का मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा मेरे हाथों में दे दिया।

कुतूहलवश चिट्ठी पढ़ने की कोशिश की। बाबा ने अचानक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर कहा, ''कालिदास रुपये वाला है तो क्या हुआ, बिल्कुाल नीच है- चमार। उसके लिए ऑंख की शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं। कल ही रुपया-पैसा सब नकद चुकाना होगा- गहने वगैरह अपने सुनार से बनवायेगा। वह किसी का विश्वास नहीं करता, यहाँ तक कि मेरा भी नहीं।''

उस आदमी में बड़ी खराबी है। बाबा तक का विश्वास नहीं करता- आश्चर्य।

पूँटू ने अपने हाथ से पत्र लिखा है। एक-दो पेज नहीं, बल्कि ठसाठस भरे हुए चार पेज। चारों पेजों में कातरता के साथ विनती है। ट्रेन में राँगा दीदी ने कहा था कि आजकल के नाटक-नॉविल भी हार मान लें। केवल आजकल के ही क्यों, सर्वकाल के नाटक-नॉविल हार मान लेंगे- यह अस्वीकार नहीं करूँगा। इस बात का विश्वास हो गया कि इस लिखने के प्रभाव से ही नन्दरानी का पति चौदह दिन की छुट्टी लेकर सातवें दिन ही आकर हाजिर हो गया था।

अतएव, दूसरे दिन सुबह मैं भी चल दिया और बाबा ने इसकी जाँच खुद अपनी ऑंखों से कर ली कि मैंने रुपये सचमुच ही अपने साथ ले लिये हैं, कोई प्रतारणा तो नहीं कर रहा हूँ। बोले-

''रास्ता चलना देखकर, रुपया लेना ठोक कर। अरे भाई, हम देवता तो हैं नहीं, आदमी हैं- भूल होते क्या देर लगती है?''

ठीक तो है! रतन कल रात को ही काशी चला गया है। उसके हाथों चिट्ठी का जवाब भेज दिया है। लिख दिया है- तथास्तु। पता इस वजह से न दे सका कि कोई ठीक नहीं है। इस त्रुटि के लिए अपने गुण से क्षमा कर नेकी भी प्रार्थना कर दी है।

यथासमय गाँव पहुँचा, मकान के सब आदमियों की दुश्चिन्ता दूर हुई। जो आदर और सम्मान मिला, उसे बताने के लिए कोश में शब्द नहीं हैं।

सम्बन्ध पक्का करने और आशीर्वाद देने के उपलक्ष्य में कालिदास बाबू से परिचय हुआ। वह जैसे सूखे मिजाज के हैं वैसे ही दम्भी भी। सबको यह स्मरण कराने के अलावा कि वे बहुत रुपये वाले हैं, ऐसा नहीं मालूम पड़ा कि संसार में और कोई दूसरा कर्त्तव्य उनका है। सारा धन खुद उन्हीं का कमाया हुआ है। बड़े घमण्ड से कहा, ''जनाब, किस्मत को मैं नहीं मानता, जो कुछ करूँगा वह सब अपने बाहुबल से। देवी-देवताओं के अनुग्रह की भिक्षा भी मैं नहीं माँगता। मैं कहता हूँ कि देवता की दुहाई कापुरुष देते हैं।''

बड़े आदमी और छोटे-मोटे ताल्लुकेदार होने के कारण उनके यहाँ गाँव के प्राय: सब आदमी उपस्थित थे, और शायद अधिकांश के वे महाजन थे और बहुत कड़े महाजन- अतएव सबने ही एक स्वर से उनकी बातें मान लीं। तर्करत्न महाशय ने एक संस्कृत का श्लोक सुनाया, और आसपास से उसके सम्बन्ध में दो-एक पुरानी कहानियों का भी सूत्रपात हुआ।

उन्होंने एक अपरिचित और साधारण व्यक्ति समझकर मेरी ओर असम्मान पूर्ण दृष्टि से देखा। उस वक्त रुपयों के दु:ख से मेरा हृदय जल रहा था। वह दृष्टि मुझे सहन नहीं हुई। मैं एकाएक बोल उठा, ''यह तो नहीं जानता किस परिमाण में आप में बाहुबल है, पर यह मैं स्वीकार करता हूँ कि रुपये कमाने का जहाँ तक सवाल है, आपका बाहुबल प्रबल है।''

''इसके मानी?''

मैंने कहा, ''मानी खुद मैं। न तो वर को पहचानता हूँ और न कन्या को, फिर भी रुपये मेरे खर्च हो रहे हैं और आपके सन्दूक में पहुँच रहे हैं। इसे तकदीर नहीं कहते तो और क्या कहते हैं? आपने अभी कहा कि आप देवी-देवताओं का अनुग्रह नहीं लेते, लेकिन आपके लड़के के हाथ की अंगूठी से लेकर बहु के गले का हार तक मेरे अनुग्रह के दान से बनेगा। हो सकता है कि बहू-भात की दावत तक का इन्तजाम मुझे ही करना पड़े।''

कमरे में वज्रपात होने पर भी शायद सब लोग इतने व्याकुल और विचलित न होते। बाबा ने न जाने क्या कहने की कोशिश की, पर कुछ भी सुस्पष्ट था, सुव्यक्त न हो सका। क्रोध में कालिदास बाबू ने भीषण मूर्त्ति धारण कर कहा, ''आप रुपये दे रहे हैं, यह मुझे कैसे मालूम हो? और दे ही क्यों रहे हैं?''

कहा, ''क्यों दे रहा हूँ यह आप नहीं समझ सकते, आपको समझाना भी नहीं चाहता। पर सारा गाँव सुन चुका है कि मैं रुपये दे रहा हूँ, सिर्फ आपने ही नहीं सुना? लड़की की माँ ने आपके सारे घरवालों के हाथ-पैर जोड़े, पर आप अपने बी.ए. पास लड़के का मूल्य ढाई हजार से एक पैसा भी कम करने को राजी नहीं हुए। लड़की का बाप चालीस रुपये महीने की नौकरी करता है, चालीस पैसे देने की भी उसमें शक्ति नहीं- तब आपने यह नहीं सोचा कि आपके लड़के को खरीदने के लिए अचानक उसके पास इतना रुपया कहाँ से आ गया? कुछ भी हो, लड़के बेचने के रुपये बहुत लोग लेते हैं, आप भी लें तो इसमें बुराई नहीं। पर इसके बाद गाँव वालों को अपने मकान में बुलाकर रूपयों का घमण्ड और न कीजिएगा। और यह भी याद रखिएगा कि आपने एक बाहर के आदमी के भिक्षा-दान से लड़के की शादी की है।''

उद्वेग और डर से सबका मुँह काला हो गया। शायद सबने यह सोचा कि अब कुछ भयंकर घटना होगी और कालिदास बाबू फाटक बन्द करवाकर लाठियों से पीटे बिना किसी को भी घर से वापस न जाने देंगे। पर, थोड़ी देर तक चुप बैठे रहने के बाद उन्होंने मुँह ऊपर उठाकर कहा, ''मैं रुपये नहीं लूँगा।''

मैंने कहा, ''इसके मानी यह कि आप लड़के की शादी यहाँ नहीं करेंगे।''

कालिदास बाबू ने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं, यह नहीं। मैंने वचन दिया है कि शादी करूँगा- इसमें जरा भी फर्क न होगा। कालिदास मुखर्जी कही हुई बात के खिलाफ काम नहीं करता। आपका नाम क्या है?''

बाबा ने व्यग्र कण्ठ से मेरा परिचय दिया। कालिदास बाबू ने पहिचानकर कहा, ''ओ:-ठीक है। इनके बाप के साथ एक बार मेरा बहुत जबरदस्त फौजदारी मामला चला था।''

बाबा ने कहा, ''जी हाँ आप कुछ भी नहीं भूलते। ये उन्हीं के लड़के हैं और रिश्ते में मेरे नाती होते हैं।''

कालिदास बाबू ने प्रसन्न कण्ठ से कहा, ''ठीक है। मेरा बड़ा लड़का अगर जिन्दा रहता तो इतना ही बड़ा होता। शशधर की शादी में आना, बेटा। हमारी ओर से उस दिन तुम्हारा निमन्त्रण रहा।''

शशधर उपस्थित था। उसने एक बार कृतज्ञ नेत्रों से मेरी ओर देखा और फौरन ही मुँह नीचा कर लिया।

मैंने उठकर प्रणाम किया। कहा, ''चाहे जहाँ भी रहूँ, लेकिन कम-से-कम बहू-भात के दिन आकर नववधू के हाथ का अन्न खा जाऊँगा। पर मैंने बहुत-सी अप्रिय बातें कही हैं, आप मुझे क्षमा करेंगे।''

कालिदास बाबू बोले, ''यह सच है कि अप्रिय बातें कही हैं, पर मैंने क्षमा भी कर दिया है। अभी जाने का काम नहीं श्रीकान्त, शुभ कार्य के उपलक्ष में मैंने थोड़ा-सा खाने का भी आयोजन किया है। तुम्हें खाकर जाना होगा।''

''जैसा कहेंगे वही होगा,'' कहकर फिर बैठ गया।

उस दिन पात्र को आशीर्वाद देने से लेकर उपस्थित अभ्यागतों के खाने-पीने तक के सारे काम निर्विघ्न सुसम्पन्न हो गये। इस अध्याञय के प्रारम्भ में सदुपदेशक के बारे में जिस नियम का उल्लेख किया था, उसके व्यतिक्रम का एक उदाहरण पूँटू का विवाह है। संसार में सिर्फ यही एक उदाहरण अपनी ऑंखों से देखा है। कारण, नि:सम्पर्कीय, अपरिचित, अभागी लड़की के बाप का कान ऐंठते ही जहाँ रुपये वसूल होते हों, वहाँ वैष्णव बनकर हाथ जोड़ने पर बाघ के ग्रास से निस्तार नहीं मिलता। निष्ठुर, निर्दय इत्यादि गाली-गलौज करके समाज और तकदीर को धिक्कारने पर किंचित् क्षोभ मिट सकता है, पर प्रतिकार नहीं होता, क्योंकि दूल्हे के बाप के हाथ में प्रतीकार नहीं है, वह तो लड़की के बाप के हाथों में ही है।

000

गौहर की खोज में आने पर नवीन से मुलाकात हुई। वह मुझे देखकर खुश हुआ। लेकिन उसका मिजाज बहुत रूखा था। बोला, ''जाकर वैष्णवियों के आश्रम में देखिए, कल से तो घर ही नहीं आये हैं।''

''यह क्या माजरा है नवीन! यह वैष्णवी कहाँ से आ गयी?''

''एक वैष्णवी नहीं, पूरा का पूरा एक दल आ जुटा है!''

''वे कहाँ रहती हैं?''

''यहीं मुरारीपुर के अखाड़े में।'' कहकर नवीन ने एक नि:श्वास छोड़ा, फिर कहा, ''हाय बाबू, अब न तो वे राम हैं और न वह अयोधया। बूढ़े मथुरादास बाबाजी के मरते ही उनकी जगह एक छोकरा वैरागी आ गया है, उसके कोई चार गण्डा सेवा-दासी हैं। द्वारिकादास वैरागी से हमारे बाबू की बड़ी मित्रता है- वहीं तो प्राय: रहते हैं।''

चकित होकर पूछा, ''पर तुम्हारे बाबू तो मुसलमान हैं। वैष्णव-वैरागी अपने आश्रम में उन्हें रहने कैसे देंगे?''

नवीन ने नाराज होकर कहा, ''इन सब बाउल सन्यासियों को क्या धर्माधर्म का ज्ञान है? ये जाति-जन्म कुछ भी नहीं मानते। जो भी कोई उन्हें मिलता है, वे उसे ही अपने दल में खींच लेते हैं, सोच-विचार कुछ नहीं करते।''

पूछा, ''पर उस बार जब मैं तुम्हारे यहाँ छह-सात दिन था, तब तो गौहर ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा?''

नवीन बोला, ''कहते तो कमललता के गुण-अवगुण जाहिर नहीं हो जाते? सिर्फ उन कई दिनों ही बाबू अखाड़े के पास नहीं गये। पर जैसे ही आप गये वैसे ही कॉपी और कलम लिए बाबू अखाड़े अखाड़ेगें में जा धामके।''

प्रश्न करने पर मालूम हुआ कि द्वारिका बाउल गाना गाने और दोहे बनाने में सिद्धहस्त है। गौहर इस प्रलोभन में फँस गया। उसको कविता सुनाता है, उससे अपनी गलतियों का संशोधन करा लेता है और कमललता एक युवती वैष्णवी है- उसी आश्रम में रहती है। वह देखने में अच्छी है, गाना अच्छा गाती है। उसकी बातें सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं। कभी-कभी वैष्णवों की सेवा के लिए गौहर रूपये-पैसे भी देता है। अखाड़े की पुरानी दीवार जीर्ण होकर गिर गयी थी, गौहर ने अपने खर्चे से उसकी मरम्मत करा दी है। यह काम उसने उस सम्प्रदाय के लोगों के अगोचर चुपचाप ही किया है।

मुझे याद आया कि बचपन में इस अखाड़े के बारे में बातें सुनी थीं। पुराने जमाने में महाप्रभु के एक भक्त शिष्य ने इस अखाड़े की प्रतिष्ठा की थी। तब से शिष्य-परम्परा के अनुसार वैष्णव इसमें वास करते आ रहे हैं। अत्यन्त कुतूहल पैदा हुआ। कहा, ''नवीन, मुझे एक बार अखाड़ा दिखा सकोगे?''

नवीन ने सिर हिलाकर इनकार किया। बोला, ''मुझे बहुत काम है और आप तो इसी देश के आदमी हैं, खुद ही न खोज सकेंगे? आधा कोस से ज्यादा दूर नहीं, इस सामने के रास्ते से उत्तर की ओर सीधे जाने पर ही आपको दिखाई दे जायेगा, किसी से पूछना नहीं पड़ेगा। सामने वाले तालाब के नीचे वृन्दावन-लीला हो रही होगी। दूर से ही कानों में आवाज पहुँच जायेगी-ढूँढ़ना नहीं पड़ेगा।''

मेरे जाने का प्रस्ताव नवीन ने शुरू से ही पसन्द नहीं किया। मैंने पूछा, ''वहाँ क्या होता है- कीर्तन?''

नवीन ने कहा, ''हाँ, दिन-रात ख्रजड़ी और करताल को चैन नहीं मिलती।''

मैंने हँसकर कहा, ''यह तो अच्छा ही है नवीन। जाऊँ, गौहर को पकड़ लाऊँ।''

इस बार नवीन भी हँसा, बोला, ''हाँ, जाइए। पर देखिएगा कि वहाँ कमललता का कीर्तन सुनकर कहीं आप खुद ही न अटक जाँय।''

''देखूँ, क्या होता है।'' कहकर हँसता हुआ तीसरे पहर कमललता वैष्णवी के अखाड़े में जाने के लिए चल दिया।

अखाड़े का पता जब चला तब शायद शाम हो चुकी थी। दूर से कीर्तन या खंजड़ी-करताल की ध्वंनि तो सुनाई नहीं दी, पर सुप्राचीन बकुल का वृक्ष फौरन ही नजर आ गया, जिसके नीचे टूटी हुई वेदी है। पर एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दिया। एक क्षीण पथ की रेखा टेढ़ी-मेढ़ी होकर परकोटे के किनारे-किनारे नदी की ओर चली गयी है। अनुमान किया कि उधर शायद किसी से कुछ खबर मिले, अतएव उधर ही पैर बढ़ाये। गलती नहीं की। शीर्ण-संकीर्ण शैवाल से ढकी हुई नदी के किनारे एक परिष्कृत और गोबर से पुती हुई कुछ उच्च भूमि पर गौहर और दूसरे एक व्यक्ति बैठे हैं। अन्दाज लगाया कि ये ही वैरागी द्वारिकादास हैं- अखाड़े के वर्तमान अधिकारी। नदी का किनारा होने की वजह से वहाँ उस वक्त तक संध्या् का अन्धकार घना नहीं हुआ था, बाबाजी को बहुत अच्छी तरह से देख सका। देखने में वह आदमी भद्र और ऊँची जाति का ही जान पड़ा। वर्ण श्याम, दुबला-पतला होने के कारण कुछ लम्बा मालूम होता है, माथे के बाल जटा की तरह सामने की ओर बँधे हुए हैं, मूँछ-दाढ़ी ज्यादा नहीं है-थोड़ी है। ऑंखों में और मुँह पर एक स्वाभाविक हँसी का भाव है। उम्र का ठीक अन्दाज नहीं लगा सका, तो भी पैंतीस-छत्तीस से ज्यादा नहीं जान पड़ी। दोनों में किसी ने भी मेरे आगमन और उपस्थिति पर लक्ष्य नहीं किया, दोनों ही नदी के उस पार पश्चिम दिगन्त में ऑंखें गड़ाये स्तब्ध बने रहे। वहाँ नाना रंग और नाना प्रकार के मेघों के टुकड़ों के बीच तृतीया का क्षीण पांडुरंग चन्द्रमा चमक रहा है। मानो उसके कपाल के बीच में अत्युज्वल सांध्यं-तारा उदित हो रहा है। बहुत नीचे दिखाई देते हैं दूर ग्रामों के नीले पेड़-पौधों-का मानों इनका कहीं अन्त नहीं, सीमा नहीं। काले, सफेद, पीले-नाना रंगों के टूटे-फटे बादलों पर उस वक्त भी अस्तंगत सूर्य की शेष दीप्ति खेल रही थी- ठीक वैसे ही जैसे कि किसी दुष्ट लड़के के हाथ में रंग की तूलिका पड़ जाने से तसवीर का पूरा श्राद्ध हो रहा हो। यह आनन्द क्षणभर ही रहा- क्योंकि इतने में ही चित्रकार ने आकर कान मल दिये और हाथ से तूलिका छीन ली।

उस स्वल्पतोया नदी का थोड़ा-सा हिस्सा शायद गाँव वालों ने साफ कर लिया है। सामने के उस स्वच्छ काले और थोड़े पानी पर छोटी-छोटी रेखाओं में चन्द्रमा और सांध्यी तारे का प्रकाश पास-पास ही पकड़कर झिलमिला रहा है- मानो सुनार कसौटी पर सोना घिसकर दाम जाँच रहा हो। पास ही कहीं वन में सैकड़ों वन-मल्लिकाएँ खिली हैं और मानो उनकी गन्ध से सारी वायु भारी हो उठी है। निकट के ही किसी पेड़ के असंख्य चिड़ियों के घोंसलों से उनके बच्चों की एक-सी चीं-चीं विचित्र मधुरता से कानों में अविराम आ रही है। यह सब ठीक है, और तद्गत-चित्त जो दो आदमी जड़-भरत की तरह बैठे हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं, वे भी कवि हैं। पर शाम के वक्त इस जंगल में मैं यह सब देखने नहीं आया हूँ। नवीन ने कहा था कि वैष्णवियों का एक दल का दल यहाँ है और उनमें कमललता वैष्णवी सबसे श्रेष्ठ हैं। वे कहाँ हैं? पुकारा, ''गौहर।'' ध्यातन भंगकर गौहर हतबुद्धि की तरह मेरी ओर ताकता रह गया।

बाबाजी ने उसे जरा हिलाकर कहा, ''गुसाईं, ये ही तुम्हारे श्रीकान्त हैं न?''

 
गौहर ने तेजी से उठकर मुझे बड़े जोर से बाहुपाश में आबद्ध कर लिया, इस तरह कि जैसे उसका वह आवेग रुकना ही नहीं चाहता हो। किसी तरह मैं अपने को मुक्त कर बैठ गया। बोला, ''गुसाईं जी ने मुझे एकाएक कैसे पहिचान लिया?''

बाबा जी ने हाथ हिलाया, ''यह नहीं होगा गुसाईं, इसमें से आदर-वाचक 'जी' बाद देना होगा। तब ही तो रस आयेगा।''

मैंने कहा, ''अच्छा, बाद दे दिया। लेकिन एकाएक मुझे कैसे पहिचाना?''

बाबाजी ने कहा, ''एकाएक कैसे पहचानूँगा? तुम तो वृन्दावन के हमारे पहचाने हुए हो गुसाईं, और तुम्हारी दोनों ऑंखें तो रस की समुद्र हैं जो देखते ही ऑंखों में भर जाती हैं। जिस दिन कमललता आई थी, उसकी दोनों ऑंखें भी ऐसी ही थीं, उसे देखते ही पहिचान गया और बोल उठा, 'कमललता, कमललता, इतने दिनों कहाँ थी?'' कमल आकर जो अपनी हो गयी तो उसका आदि-अन्त, विरह-विच्छेद नहीं रहा। यही तो साधना है गुसाईं, इसी को तो कहता हूँ रस की दीक्षा।''

मैंने कहा, ''कमललता देखने ही तो आया हूँ गुसाईं, वह कहाँ है?''

बाबाजी बहुत खुश हुए। बोले, ''उसे देखोगे? पर गुसाईं, तुम उससे अपरिचित नहीं हो, वृन्दावन में उसे अनेक बार देखा है। शायद भूल गये हो, पर देखते ही पहिचान जाओगे कि वह कमललता है। गुसाईं, उसे एक बार पुकारो न!'' कहकर बाबाजी ने गौहर को पुकारने का इशारा किया। इनके निकट सब 'गुसाईं' हैं। बोले, ''कहो कि श्रीकान्त तुम्हें देखने आया है।''

गौहर के चले जाने के बाद पूछा, ''गुसाईं, मेरे बारे में सारी बातें शायद गौहर ने तुम्हें बताई हैं?''

बाबाजी ने सिर हिलाकर कहा, ''हाँ, सब बताया है। जब उससे पूछा कि 'गुसाईं, तुम छह-सात दिन क्यों नहीं आये? तो उसने कहा कि श्रीकान्त आये थे।'' यह भी उसने कहा कि 'तुम फिर जल्दी ही आओगे।'' यह भी मालूम हुआ कि तुम बर्मा जाने वाले हो।''

सुनकर सन्तोष की साँस छोड़कर मन ही मन मैंने कहा, रक्षा हुई। डर था कि वास्तव में किसी अलौकिक आध्या त्मिक शक्ति-बल के कारण तो ये मुझे देखते ही नहीं पहिचान गये हैं। कुछ भी हो, यह मानना ही पड़ेगा कि मेरे बारे में इस क्षेत्र में उनका अन्दाज गलत नहीं है।

बाबाजी अच्छे ही जान पड़े। कम-से-कम असाधु प्रकृति के नहीं मालूम हुए। बहुत सरल। यह बाबाजी ने सरलता से स्वीकार कर लिया कि न जाने क्यों गौहर ने मेरी सब बातें- अर्थात् जितना वह जानता है, इन लोगों से कह दी हैं। कविता और वैष्णव-रस-चर्चा में वे कुछ-कुछ सनकी-से-कुछ विभ्रान्त से मालूम हुए।

थोड़ी देर बाद ही गौहर- गुसाईं के साथ कमललता आकर हाजिर हुई। उम्र तीस से ज्यादा नहीं होगी-श्यामवर्ण, इकहरा बदन, हाथ में कुछ चूड़ियाँ हैं पीतल की- सोने की भी हो सकती हैं। बाल छोटे-छोटे नहीं हैं, गिरह देकर पीठ पर झूल रही हैं। गले में तुलसी की माला और हाथ की थैली के भीतर भी तुलसी की जपमाला हैं। छापे-आपे का बहुत ज्यादा आडम्बर नहीं है, अथवा सुबह के वक्त तो था, पर इस वक्त कुछ मिट गया है। उसके मुँह की ओर देखकर मैं अत्यन्त आश्चर्यान्वित हो गया। सविस्मय यह खयाल होने लगा कि इन ऑंखों का और चेहरे का भाव तो जैसे परिचित है, और चलने का ढंग भी जैसे पहले कहीं देखा है।

वैष्णवी ने बात शुरू की। फौरन ही समझ गया कि वह नीचे के स्तर की प्राणी नहीं है। उसने किसी तरह की भूमिका नहीं बाँधी। मेरी ओर सीधे देखकर कहा, ?''कहो गुसाईं, पहिचान सकते हो?''

मैंने कहा, ''नहीं। लेकिन ऐसा लगता है कि जैसे कहीं देखा है।''

वैष्णवी ने कहा, ''वृन्दावन में देखा था। बड़े गुसाईं जी से नहीं सुना?''

मैंने कहा, ''सो सुना है। पर मैं तो जन्म-भर कभी वृन्दावन नहीं गया।''

वैष्णवी ने कहा, ''गये कैसे नहीं? बहुत पुरानी बात है, इसलिए अचानक याद नहीं आ रही है। वहाँ गायें चराते, फल तोड़कर लाते, वन-फूलों की माला गूँथकर हमारे गले में पहनाते-सब भूल गये?'' यह कहकर वह होठों को दबाकर धीरे-धीरे हँसने लगी।

मैंने यह तो समझा कि मजाक कर रही है। पर यह ठीक नहीं कर सका कि मेरा या बड़े गुसाईं जी का, बोली, ''रात हो रही है, अब जंगल में क्यों बैठे हो? भीतर चलो।''

मैंने कहा, ''जंगल के रास्ते हमें बहुत दूर जाना होगा। कल फिर आयेंगी।''

वैष्णवी ने पूछा, ''यहाँ का पता किसने बताया? नवीन ने?''

''हाँ, उसी ने।''

कमललता की बात नहीं बताई?''

''हाँ, बताई थी।''

इस बारे में तुम्हें सावधान नहीं किया कि वैष्णवी का जाल तोड़कर अचानक बाहर नहीं जाया जा सकता?''

हँसते हुए बोला, ''हाँ, यह भी कहा है।''

वैष्णवी हँस पड़ी। बोली, ''नवीन होशियार माँझी है। उसकी बातें न मानकर अच्छा नहीं किया।''

''क्यों भला?''

वैष्णवी ने इसका जवाब नहीं दिया। गौहर को दिखाते हुए कहा, ''गुसाईं ने कहा था कि नौकरी करने के लिए विदेश जा रहे हो। पर तुम्हारे तो कोई नहीं है, फिर नौकरी क्यों करोगे?''

''तब क्या करूँ?''

''हम जो करती हैं। गोविन्दजी का प्रसाद तो कोई छीन नहीं सकता!''

''यह जानता हूँ। पर वैरागगीरी मेरे लिए नयी नहीं है।''

वैष्णवी ने हँसकर कहा, ''समझती हूँ। शायद प्रकृति सहन नहीं करती?''

''नहीं, ज्यादा दिन सहन नहीं करती।''

वैष्णवी होठ दबाकर हँसी। बोली, ''तुम्हारा काम अच्छा है। भीतर आओ, उन लोगों से तुम्हारा परिचय करा दूँ। यहाँ कमलों का वन है।''

''सुना है, पर अंधेरे में लौटेंगे कैसे?''

वैष्णवी फिर हँसी, बोली, ''अंधेरे में हम लौटने ही क्यों देंगी? अन्धकार दूर तो होगा ही। तब जाना। आओ।''

'चलो।''

वैष्णवी ने कहा, ''गौर! गौर!''

''गौर-गौर'' कहते हुए मैंने भी अनुसरण किया।

000

हालाँकि धर्माचरण में मेरी रुचि और विश्वास नहीं है, किन्तु जिनका विश्वास है उनको बाधा नहीं पहुँचाता। मन में बिना संशय के जानता हूँ कि मैं इस गुरुतर विषय का ओर-छोर कभी न खोज पाऊँगा। तथापि, धार्मिकों की मैं भक्ति करता हूँ। विख्यात स्वामीजी और सुख्यात साधूजी- किसी की भी छोआ नहीं कहता, दोनों की ही वाणी मेरे कानों में समान मधु की वर्षा करती है।

विशेषज्ञों के मँह से सुना है कि बंगाल की आध्याखत्मिक साधना का निगूढ़ रहस्य वैष्णव सम्प्रदाय में ही सुगुप्त है, और यही बंगाल की खालिस अपनी चीज है। इसके पहले सन्यासी और साधुओं की थोड़ी-बहुत संगत की है। फल-लाभ का विवरण जाहिर करने की इच्छा नहीं है। पर इस दफा अगर दैवात् खालिस चीज नसीब होती हो तो संकल्प किया कि इस मौके को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। पूँटू के बहू-भात के निमन्त्रण में मुझे जाना ही होगा। कम-से-कम कलकत्ते के नि:संग मैस के बदले ये कई दिन अगर इस वैष्णवी-अखाड़े के आसपास कहीं काटने पड़ें तो और चाहे जो हो, जीवन के संचय में विशेष नुकसान न होगा।

अन्दर आकर देखा कि कमललता का कहना झूठ नहीं था। वहाँ वाकई कमलों का ही वन है, पर दलित-विदलित। मत्त हाथियों से साक्षात तो नहीं हुआ, पर उनके बहुत से पदचिह्न विद्यमान थे। नाना उम्र और तरह-तरह के चेहरों की वैष्णवियाँ नाना कामों में लगी हुई हैं- कोई लड्डू बना रही है, कोई मैदा गूँधा रही है, कोई फल-मूल तराश रही हैं- यह सब ठाकुरजी के रात के भोग की तैयारियाँ हैं। एक अपेक्षाकृत छोटी उम्र की वैष्णवी ध्यारनमग्न हो फूलों की माला गूँथ रही है और एक उसी के निकट बैठी हुई नाना रंग के छपे हुए छोटे-छोटे कपड़ों के टुकड़े सावधानी से कुंचित करके ढंग से रख रही है। सम्भवत: श्रीगोविन्दजी कल स्नान के बाद उन्हें पहनेंगे। कोई भी खाली नहीं है। उनका काम में आग्रह और एकाग्रता देखकर आश्चर्य होता है। सबने मेरी ओर ताका, पर निमेष-मात्र के लिए। कुतूहल का अवसर नहीं है। सबके होठ हिल रहे हैं, शायद मन ही मन जप हो रहा है। इधर समय खत्म हो गया है। एक-एक करके दिये जलने शुरू हो गये हैं। कमललता ने कहा, ''चलो भगवान को नमस्कार कर आयें। किन्तु, अच्छा, यह तो बताओ कि तुम्हें क्या कहकर पुकारूँ? 'नये गुसाईं' कहकर पुकारूँ तो कैसा?''

¹ 'गौर' का मतलब यहाँ गौरांग-महाप्रभु या चैतन्यदेव से है।

मैंने कहा, ''क्यों नहीं पुकारतीं? तुम्हारे यहाँ जब गौहर तक 'गौहर गुसाईं' हो गया है, तब मैं तो कम-से-कम ब्राह्मण का लड़का हूँ। पर मेरे अपने नाम ने क्या बुराई की है? उसी के साथ 'गुसाईं' जोड़ दो न।''

कमललता ने होठ दबाकर हँसते हुए कहा, ''यह नहीं होगा ठाकुर, नहीं होगा। वह नाम मैं नहीं ले सकती- अपराध होता है। आओ।''

''आता हूँ, पर अपराध किसका?''

''किसका-यह सुनकर तुम क्या करोगे; तुम तो खूब हो!''

जो वैष्णवी माला गूँथ रही थी वह हँस पड़ी और उसने मुँह नीचा कर लिया। ठाकुरजी के कमरे में काले पत्थर और पीतल की राधा-कृष्ण की युगल मूर्तियाँ हैं। एक नहीं, बहुत-सी। यहाँ भी पाँच-छह वैष्णवियाँ काम में लगी हुई हैं। आरती का वक्त हो रहा है, साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है।

भक्तिपूर्वक यथारीति प्रणाम कर बाहर आ गया। ठाकुरजी के कमरे के अलावा और सब कमरे मिट्टी के हैं, पर सँभाल-सफाई की सीमा नहीं है। बिना आसन के कहीं भी बैठते संकोच नहीं होता, तथापि कमललता ने सामने के बरामदे में एक ओर आसन बिछा दिया। कहा, ''बैठो, तुम्हारे रहने का कमरा जरा ठीक कर आऊँ।''

''मुझे क्या आज यहीं रहना पड़ेगा?''

''क्यों, डर क्या है? मेरे रहते तुम्हें तकलीफ नहीं होगी।''

मैंने कहा, ''तकलीफ के लिए नहीं कहता, पर गौहर जो नाराज होगा।''

वैष्णवी ने कहा, ''यह भार मेरे ऊपर है। मेरे रखने पर तुम्हारा मित्र जरा भी नाराज न होगा।'' कहकर वह हँसती हुई चली गयी।

मैं अकेला बैठा हुआ अन्यान्य वैष्णवियों का काम देखने लगा। सचमुच ही उनके पास नष्ट करने को जरा भी वक्त नहीं है। मेरी ओर किसी ने घूमकर भी नहीं देखा। करीब दस मिनट बाद जब कमललता लौटकर आयी तब काम खत्म कर सब उठ गयी थीं। पूछा, ''तुम इस मठ की अधिकारिणी हो क्या?''

कमललता ने जीभ काटकर कहा, ''हम सब गोविन्दजी की दासी हैं- कोई छोटा-बड़ा नहीं है। एक-एक पर एक एक का भार है। मेरे ऊपर प्रभू ने यह भार दिया है।'' कहकर उसने मन्दिर के उद्देश्य से हाथ जोड़कर सिर से लगा लिये। कहा, ''अब कभी ऐसी बात जबान पर मत लाना।''

मैंने कहा, ''ऐसा ही होगा। अच्छा, बड़े गुसाईं और गौहर गुसाईं क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं?''

वैष्णवी ने कहा, ''वे अभी आते ही होंगे। नदी में स्नान करने गये हैं।''

''इतनी रात को? और इस नदी में?''

वैष्णवी ने कहा, ''हाँ।''

''गौहर भी?''

''हाँ, गौहर गुसाईं भी।''

''पर मुझे ही क्यों नहीं स्नान कराया?''

''वैष्णवी ने हँसकर कहा, ''हम किसी को स्नान नहीं करातीं। वे अपने आप करते हैं। भगवान की दया होने पर एक दिन तुम भी करोगे और उस दिन मना करने पर भी नहीं मानोगे।''

मैंने कहा, ''गौहर भाग्यवान है। पर मेरे पास तो रुपया नहीं है। मैं गरीब आदमी हूँ, इस कारण शायद मेरे प्रति परमात्मा की दया न हो।''

वैष्णवी शायद इशारा समझ गयी, और नाराज होकर कुछ कहने वाली ही थी पर कहा नहीं। फिर बोली, ''गौहर गुसाईं कुछ भी हों पर तुम भी गरीब नहीं हो। जो आदमी ढेर रुपया देकर दूसरे की लड़की का उद्धार करता है, भगवान उसे गरीब नहीं मानते। तुम्हारे ऊपर भी दया होना आश्चर्य नहीं है।''

मैंने कहा, ''तब तो वह डर की बात है। तो भी, किस्मत में जो लिखा है वह होगा ही, टाला नहीं जा सकता- पर पूछता हूँ कि कन्या के उद्धार की खबर तुम्हें कहाँ से मिली?''

वैष्णवी ने कह, ''हमें चार जगह से भीख माँगनी पड़ती है, इसलिए हमें सब खबरें मिल जाती हैं।''

''पर यह खबर शायद अभी तक नहीं मिली है कि मुझे रुपये देकर लड़की का उद्धार नहीं करना पड़ा?''

वैष्णवी कुछ विस्मित हुई। बोली, ''नहीं, यह खबर नहीं मिली। पर हुआ क्या, शादी टूट गयी?''

''शादी नहीं टूटी, लेकिन कालिदास बाबू टूट गये हैं- खुद दूल्हा के बाप ही। लड़के को बेचकर दूसरे की भिक्षा के दान से मिले हुए दहेज को हाथ पसारकर लेने में उन्हें शर्म आई। इससे मैं भी बच गया।'' कहकर मैंने सारा मामला संक्षेप में बता दिया। वैष्णवी ने सविस्मय कहा, ''कहते क्या हो जी, यह तो बिल्कुंल अनहोनी बात हुई!''

''ईश्वर की दया। सिर्फ गौहर गुसाईं ही क्या अंधेरे में गन्दी नदी के पानी में गोते लगायेगा, संसार में और कहीं भी कुछ अनहोनी बात नहीं होगी? उनकी लीला ही फिर किस तरह जाहिर होगी, बोलो?'' कहकर जैसे ही मैंने वैष्णवी का मुँह देखा वैसे ही समझ गया कि यह ठीक नहीं हुआ- सीमा लाँघ गया हूँ। वैष्णवी ने किन्तु प्रतिवाद नहीं किया, मन्दिर की ओर हाथ उठाकर उसने सिर्फ नि:शब्द नमस्कार कर लिया। मानो अनपराधा को क्षमा करने की भिक्षा माँगी।

एक वैष्णवी एक बड़े थाल में मैदा की पूरियाँ लिये हुए सामने से ठाकुरजी के कमरे की ओर निकल गयी। उसे देखकर कहा, ''आज तुम्हारे यहाँ समारोह है। शायद कोई खास त्यौहार है-नहीं?''

वैष्णवी ने कहा, ''नहीं, आज कोई त्यौहार नहीं है। यह हमारे यहाँ का रोज का हिस्सा है। ठाकुरजी की दया से कभी कमी नहीं होती।''

''खुशी की बात है। पर आयोजन शायद रात को ही ज्यादा होता है?''

वैष्णवी बोली, ''सो भी नहीं। सेवा में सुबह-शाम का कोई सवाल ही नहीं है। यदि दया करके दो दिन रह जाओ तो खुद ही सब देख लोगे। हम सब दासी की दासी हैं, उनकी सेवा करने के अलावा संसार में हमारा और कोई काम तो है ही नहीं।'' कहकर उसने मन्दिर की ओर हाथ जोड़कर फिर एक बार नमस्कार किया।

पूछा, ''दिनभर तुम लोगों को क्या-क्या करना होता है?''

वैष्णवी ने कहा, ''आकर जो देखा, वही।''

''आकर देखा मसाला कूटना, रसोई के लिए तरकारी बनाना, दूध दुहना माला गूँथना, कपड़े रंगना-ऐसे ही और बहुत से काम। तुम सब दिनभर क्या सिर्फ यही किया करती हो?''

वैष्णवी ने कहा, ''हाँ, दिनभर सिर्फ यही करती हैं।''

''पर यह सब तो केवल घर-गृहस्थी के काम हैं, सभी औरतें करती हैं। तुम भजन-साधन कब करती हो?'

वैष्णवी बोली, ''यही हमारी भजन-साधना है।''

''यह रसोई बनाना, पानी भरना, कूटना-फटकना, माला गूँथना, कपड़े रंगना- इसी को 'साधना' कहते हैं?''

वैष्णवी ने कहा, ''हाँ, इसी को साधना कहते हैं। दास-दासियों की इससे बढ़कर साधना हमें और कहाँ मिलेगी गुसाईं?'' कहते-कहते उसकी दोनों सजल ऑंखें मानो अनिर्वचनीय मधुरता से परिपूर्ण हो उठीं। एकाएक मुझे खयाल हुआ कि इस अपिरिचित वैष्णवी का मुँह जितना सुन्दर है, उतना सुन्दर मुँह मैंने संसार में कभी नहीं देखा। कहा, ''कमललता, तुम्हारा मकान कहाँ है?''

वैष्णवी ने ऑंचल से ऑंखें पोंछकर हँसते हुए कहा, ''पेड़ की छाया।''

''पर पेड़ की छाया तो हमेशा न थी?''

वैष्णवी ने कहा, ''तब था ईंट और काठ के बने हुए किसी मकान का एक छोटा-सा कमरा। पर कहानी सुनाने का वक्त तो अब नहीं है गुसाईं । मेरे साथ आओ, तुम्हारा नया कमरा दिखा दूँ।''

कमरा बढ़िया है। उसने बाँस की खूँटी पर टँगा हुआ एक साफ रेशम का कपड़ा दिखाते हुए कहा, ''यह पहनकर ठाकुरजी के कमरे में आना। देखो, देर न करना।'' कहकर वह तेजी से चली गयी।

एक ओर एक छोटे से तख्त पर बिछौना बिछा है। निकट ही एक चौकी पर कुछ किताबें और एक थाली में बकुल-फूल रखे हैं। अभी-अभी कोई प्रदीप जलाकर शायद धूप जला गया है, कमरा अब भी उसकी गन्ध और धुएँ से भरा हुआ था- बहुत अच्छा लगा। दिनभर की क्लान्ति तो थी ही- ठाकुर-देवताओं से हमेशा दूर-दूर रहता आया हूँ; उधर आकर्षण नहीं था- अत: कपड़े उतार कर धप से बिछौने पर लेट गया। जाने यह किसका कमरा है, एक रात के लिए वैष्णवी ने जाने किसकी शय्या मुझे उधार दे गयी है- अथवा शायद यह उसी की है- इन सब विचारों से मेरा मन स्वभावत: ही बहुत संकोच अनुभव करता है। पर आज कुछ भी खयाल न हुआ, मानो न जाने कब से परिचित अपने ही आदमियों के पास आ पहुँचा हूँ। शायद कुछ तन्द्रा आ गयी थी कि इतने में ही जैसे किसी ने दरवाजे के बाहर से आवाज दी, ''नये गुसाईं, मन्दिर नहीं जाओगे? वे तुम्हें बुला जो रहे हैं।''

चटपट उठ बैठा। मंजीरे के साथ-साथ कीर्तन के गाने की आवाज भी कानों में पहुँची। बहुत से आदमियों का समवेत कोलाहल ही नहीं था; गेय वस्तु भी जितनी मधुर थी उतनी ही स्पष्ट थी। स्त्री का कण्ठ था- बिना ऑंखों से देखे ही निस्सन्देह अनुमान किया कि कमललता है। नवीन का विश्वास है कि इस मीठे स्वर ने ही उसके मालिक को फाँस लिया है। सोचा कि यह असम्भव नहीं है और बहुत असंगत भी नहीं है।

मन्दिर में घुसकर एक ओर चुपचाप बैठ गया, किसी ने फिरकर नहीं देखा। सबकी दृष्टि राधा-कृष्ण की युगल-मूर्ति पर लगी थी। बीच में खड़ी हुई कमललता कीर्तन कर रही है-

मदन गोपाल जय जय यशोदा के लाल की,

यशोदा के लाल जय जय, जय नन्दलाल की।

नन्दलाल जय जय गिरिधारी लाल की,

गिरिधारी लाल जय जय गोविन्द-गोपाल की ॥

इन थोड़े-सहज और साधारण शब्दों के आलोड़न से भक्तों का गम्भीर वक्ष:स्थल मथित होकर कौन-सा अमृत तरंगित हो उठता है, यह मेरे लिए उपलब्ध करना कठिन है। पर देखा कि उपस्थित व्यक्तियों में से किसी की भी ऑंखें शुष्क नहीं हैं। गायिका की दोनों ऑंखों को प्लावित कर झर-झर अश्रु झर रहे हैं और भावों के गुरुभार से बीच-बीच में उसका कण्ठ-स्वर जैसे टूट जाता है। मैं इन राब रसों का रसिक नहीं हूँ, लेकिन मेरे मन के भीतर भी एकाएक न जाने कैसा होने लगा। द्वारिकादास बाबाजी ऑंखें मूँदे एक दीवार का सहारा लिये बैठे थे। यह पता नहीं चला कि वे सचेत हैं या अचेत। और सिर्फ थोड़ी देर पहले की स्निग्ध हास्य-परिहास-चंचल कमललता ही नहीं, बल्कि साधारण गृह-कर्म में नियुक्ता जो सब वैष्णवियाँ अभी तक साधारण, तुच्छ और कुरूप लगी थीं, वे भी मानो इस धूप के धुएँ से आच्छन्न गृह के अनुज्ज्वल दीप के प्रकाश में क्षणभर के लिए मेरी नजरों में अत्यन्त सुन्दर हो उठीं। मुझे भी मानो ऐसा लगा कि पत्थर की यह निकटवर्ती मूर्ति यथार्थ में ऑंखें मलकर देख रही है और कान लगाकर कीर्तन का समस्त माधुर्य उपभोग कर रही है।

भावों की इस विह्वल-मुग्धता से मैं बहुत डरता हूँ, व्यस्त होकर बाहर चला आया- किसी ने लक्ष्य भी नहीं किया। देखता हूँ कि प्रांगण के एक कोने में गौहर बैठा है और कहीं से प्रकाश की एक रेखा आकर उसके शरीर पर पड़ रही है। मेरे पैरों की आवाज से उसका ध्या न भंग नहीं हुआ, पर उस एकान्त समाहित मुँह की तरफ मैं भी न हिल सका, वहीं स्तब्ध हो खड़ा रहा। ऐसा लगा कि सिर्फ मुझको ही अकेला छोड़कर इस जगह के सब व्यक्ति और किसी दूसरे लोक में चले गये हैं- जहाँ का पथ मैं नहीं पहचानता। कमरे में जा, रोशनी बुझाकर लेट गया। यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि ज्ञान, विद्या और बुद्धि में मैं इन सबसे बड़ा हूँ, तथापि न जाने किसी की व्यथा से अन्दर ही अन्दर मन रोने लगा और वैसे ही अनजान कारण से ऑंखों के कोनों से पानी की बड़ी-बड़ी बूँदें गिरने लगीं।

पता नहीं कि कितनी देर से सो रहा था। कान में भनक पड़ी, ''अरे नये गुसाईं?''

जगकर उठ बैठा, ''कौन?''

''मैं हूँ तुम्हारी शाम की बन्धु- इतना सोते हो?''

अंधेरे कमरे में चौखट के पास कमललता वैष्णवी खड़ी थी। बोला, ''जागने से क्या फायदा होता? सोने में समय का कुछ सदुपयोग तो हुआ।''

''यह मालूम है। पर ठाकुर का प्रसाद नहीं लोगे?''

''लूँगा।''

''तो फिर, सो क्यों रहे हो?''

''जानता हूँ कि कोई दिक्कत नहीं होगी, प्रसाद तो मिलेगा ही। मेरा शाम का बन्धु रात को भी परित्याग नहीं करेगा।''

वैष्णवी ने सहास्य कहा, ''यह अधिकार वैष्णवों को है, तुम लोगों को नहीं।''

''आशा मिलने पर वैष्णव होते क्या देर लगती है? तुमने गौहर तक को गुसाईं बना डाला, तो मैं ही क्या इतनी अवहेलना का पात्र हूँ? आज्ञा होने पर वैष्णवों का दासानुदास होने को भी राजी हूँ।''

कमललता का कण्ठ स्वर कुछ गम्भीर हुआ। कहा, ''वैष्णवों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, गुसाईं, अपराध होता है। गौहर गुसाईं को भी तुमने गलत समझा है। उनके अपने आदमी उन्हें काफिर कहते हैं, पर नहीं जानते कि वे पक्के मुसलमान हैं, पिता-पितामह के धर्म-विश्वास को इन्होंने नहीं त्यागा है।''

''पर उसका भाव देखने पर तो यह मालूम नहीं होता।''

वैष्णवी ने कहा, ''यही तो आश्चर्य है। पर अब देरी मत करो, आओ।'' फिर कुछ सोचकर कहा, ''या प्रसाद ही तुम्हें यहीं दे जाऊँ- क्या कहते हो?''

''आपत्ति नहीं। पर गौहर कहाँ है? वह हो तो दोनों को एक साथ ही दो न।''

''उनके साथ बैठकर खाओगे?''

''हमेशा ही तो खाता हूँ। बचपन में उसकी माँ ने मुझको बहुत खिलाया है। और उस वक्त तुम्हारे प्रसाद की अपेक्षा वह कम मीठा नहीं होता था। इसके अलावा गौहर भक्त है, गौहर कवि है- कवि की जाति की खोज नहीं की जाती।''

उस अन्धकार में भी ऐसा लगा कि वैष्णवी ने एक साँस को दबा लिया। फिर कहा, 'गौहर गुसाईं नहीं है। वह कब चले गये, हमें पता नहीं।''

मैंने कहा, ''मैंने देखा था कि गौहर ऑंगन में बैठा है। उसे क्या तुम भीतर नहीं जाने देतीं?''

वैष्णवी ने कहा, ''नहीं।''

''गौहर को आज मैंने देखा था। कमललता, मेरे मजाक से तुम नाराज हो गयीं, किन्तु तुम भी अपने देवता के साथ कम हँसी नहीं कर रही हो। यह बात नहीं कि अपराध सिर्फ एक तरफ से ही होता हो।''

वैष्णवी ने इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप बाहर चली गयी। थोड़ी देर बाद ही उसने एक दूसरी वैष्णवी के हाथों रोशनी और आसन तथा खुद प्रसाद का पात्र लेकर प्रवेश किया। कहा, ''नये गुसाईं, अतिथि-सेवा में त्रुटि हो सकती है, पर यहाँ का सब कुछ ठाकुरजी का प्रसाद है।''

मैंने हँसकर कहा, ''ओ संध्याी की बन्धु, यह कोई डर की बात नहीं, वैष्णव न होते हुए भी तुम्हारे नये गुसाईं में रस-बोध है, आतिथ्य की त्रुटि के लिए वह रस-भंग नहीं करेगा। जो है रख दो- लौटकर देखोगी कि प्रसाद का एक कण भी बाकी नहीं है।''

''ठाकुरजी का प्रसाद ऐसे ही तो खाया जाता है,'' यह कह और सिर नीचा कर कमललता ने सारी खाद्य-सामग्री एक-एक कर सिलसिलेवार सजा दी।

दूसरे दिन बहुत सबेरे ही नींद टूट गयी। भारी नगाड़े की आवाज के साथ मंगल आरती शुरू हो गयी है। प्रभाती के सुर में कीर्तन का पद कान में पड़ा-

कान्ह-गले बनमाला बिराजे, राधा-गले मोती साजैं।

अरुण चरण दोउ नू पुरशोभित, चख लख खंजन लाजैं।

इसके बाद दिनभर ठाकुरजी की सेवा होती रही। पूजा-पाठ, कीर्तन, नहलाना, खाना-खिलाना, बदन पोंछना, चन्दन लगाना, माला पहनाना- इसमें जरा भी विराम और विच्छेद नहीं पड़ा। सब व्यस्त हैं, सब नियुक्त हैं। ऐसा लगा कि ये पत्थर के देवता ही यह अष्टप्रहरव्यापी अनन्त सेवा सह सकते हैं, और कोई होता तो ऐसे जबरदस्त उपद्रव के मारे कभी का क्षीण होकर नष्ट हो जाता।

कल वैष्णवी से पूछा था कि ''तुम भजन करती हो?'' उसने जवाब में कहा था, कि 'यही तो साधना और भजन है।'' सविस्मय प्रश्न किया था, ''यह रसोई बनाना, फूल चुनना, माला गूँथना, दूध ओंटाना- क्या इसी को साधना कहती हो?'' उसने उसी वक्त सिर हिलाकर जवाब देते हुए कहा था, ''हाँ, हम इसी को साधना कहती हैं- हमारी और कोई भजन-साधना नहीं है।''

आज पूरे दिन का हाल देखकर समझ गया कि उसकी बात का एक-एक अक्षर सच है। कहीं भी अतिरंजन या अत्युक्ति नहीं। दोपहर को जरा मौका पाकर बोला, ''मैं जानता हूँ कमललता, कि तुम और सब जैसी नहीं हो। सच तो कहो, भगवान की प्रतीक यह पत्थर की मूर्ति...''

वैष्णवी ने हाथ उठाकर मुझे रोक दिया और कहा, ''प्रतीक क्या जी- वे तो साक्षात् भगवान हैं- ऐसी बात कभी जबान पर भी न लाना नये गुसाईं- ''मेरी बातों से उसे जैसे बहुत शर्म आयी, न जाने मैं भी क्यों एक तरह से झेंप गया, फिर आहिस्ता-आहिस्ता बोल, ''मैं तो नहीं जानता, इसीलिए पूछा था कि क्या वाकई तुम सब यह सोचती हो कि इस पत्थर की मूर्ति में ही भगवान की शक्ति और चेतना है उसका...''

मेरी यह बात भी पूरी न हो सकी। वह बोल उठी, ''सोचने जाँयेंगी ही क्यों जी, यह तो हमारे लिए प्रत्यक्ष है। तुम लोग संस्कारों के मोह नहीं तोड़ सके हो, इसीलिए यह सोचते हो कि रक्त-मांस के शरीर को छोड़कर और कहीं चैतन्य के रहने के लिए जगह नहीं है। पर यह क्यों? और यह भी कहती हूँ कि शक्ति और चैतन्य का तत्व क्या तुम लोग ही सब हजम कर चुके हो, जो यह कहोगे कि पत्थर में उसके लिए जगह नहीं है? होती है जी, होती है, भगवान को कहीं भी रहने में रुकावट नहीं होती, नहीं तो बताओ उन्हें भगवान ही क्यों कहेंगे?''

तर्क की दृष्टि से ये बातें स्पष्ट भी नहीं और पूर्ण भी नहीं हैं। पर यह और कुछ तो है नहीं, यह तो उसका जीवन्त विश्वास है। उसके इस जोर और अकपट उक्ति के सामने मैं एकाएक न जाने कैसे सिटपिटा-सा गया, बहस करने- प्रतिवाद करने का साहस ही नहीं हुआ, इच्छा भी नहीं हुई। बल्कि सोचा, सच तो है, पत्थर हो या और कुछ लेकिन इतने परिपूर्ण विश्वास से वह अपने को अगर पूर्णत: समर्पित न कर पाती तो वर्ष के बाद वर्ष, और दिन के बाद दिन यह अविछिन्न सेवा करते रहने की शक्ति उसे मिलती कैसे? इस तरह सीधे, निश्चिन्त और निर्भय होकर खड़े होने का अवलम्बन कहाँ से मिलता? ये शिशु तो हैं नहीं, बच्चों के खेल के इस मिथ्या अभिनय से दुबिधाग्रस्त मन दो दिन में ही थककर गिन जाता? पर ऐसा तो नहीं हुआ बल्कि भक्ति और प्रेम की अखण्ड एकाग्रता में इनके आत्मनिवेदन का आनन्दोत्सव बढ़ता ही जा रहा है। इस जीवन में पाने की दृष्टि से वह क्या सब कुछ शून्य या सब कुछ भूल है- सब अपने को ठगना है?

वैष्णव ने कहा, ''क्यों गुसाईं, बात क्यों नहीं करते?''

मैंने कहा, ''सोच रहा हूँ।''

''किसका सोच कर रहे हो?''

''तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ।''

''यह तो मेरा बड़ा सौभाग्य है।'' कुछ देर बाद कहा, ''फिर भी यहाँ रहना नहीं चाहते, न जाने कहाँ किस बर्मा देश में नौकरी करने जाना चाहते हो। नौकरी क्यों करोगे?''

मैंने कहा, ''मेरे पास मठ की जमीन-जायदाद तो है नहीं- अन्धभक्तों का दल भी नहीं- खाऊँगा क्या?''

''भगवान देंगे।''

मैंने कहा, ''यह अत्यन्त दुराशा है। पर ऐसा तो नहीं लगता कि तुम सबका भी भगवान पर बहुत भरोसा है, नहीं तो भिक्षा के लिए क्यों जातीं।''

वैष्णवी ने कहा, ''जाती हूँ इसलिए कि देने के लिए वे हाथ बढ़ाये दरवाजे-दरवाजे खड़े हैं। नहीं तो हमारी गरज नहीं है। अगर होती तो नहीं जातीं। बिना खाये ही सूख-सूख मर जातीं, तो भी नहीं जातीं।''

''कमललता, तुम्हारा देश कहाँ है?''

''कल ही तो कहा था गुसाईं, मेरा घर पेड़ के नीचे है, मेरा देश गली-गली में है।''

''तो पेड़ के नीचे और गली-गली में न रहकर मठ में किस लिए रहती हो?''

''बहुत दिनों तक गली-गली में ही थी गुसाईं- अगर कोई संगी मिल जाय तो फिर एक बार गली को संबल बना लूँ।''

मैंने कहा, ''इस बात पर तो विश्वास नहीं होता। तुम्हें संगी-साथी की क्या कमी है कमललता? जिससे कहोगी वही राजी हो जायेगा।''

वैष्णवी ने हँसते हुए कहा, ''तुम्हीं से कहती हूँ नये गुसाईं- राजी होगे?''

मैं भी हँसा। कहा, ''हाँ, राजी हूँ। नाबालिग उम्र में जो यात्रा के दल से नहीं डरा, बालिग अवस्था में उसे वैष्णवी का क्या डर?''

''यात्रा के दल में भी रहे थे?''

''हाँ।''

''तो गाना भी गा सकते हो?''

''नहीं। मालिक ने इतनी दूर आगे बढ़ने ही नहीं दिया, इसके पहले ही जवाब दे दिया। यह नहीं कहा जा सकता कि तुम मालिक होती तो क्या करतीं।''

वैष्णवी हँसने लगी। बोली, ''मैं भी जवाब दे देती। इसे छोड़ो, अब हम में से एक के भी जाने पर काम चल जाएगा। इस देश में चाहे जैसे भी भगवान का नाम लेने पर भिक्षा का अभाव नहीं होता। चलो न गुसाईं, निकल पड़े। कह रहे थे कि वृन्दावन धाम कभी नहीं देखा है, चलो तुम्हें दिखला लाऊँ। बहुत दिन घर में बैठे-बैठे कटे, रास्ते का नशा जैसे फिर अपनी ओर खींचना चाहता है। सच, चलोगे नये गुसाईं?''

अचानक उसके मुँह की ओर देखकर बहुत विस्मय हुआ। कहा, ''हमारा परिचय हुए तो अभी चौबीस घण्टे भी नहीं हुए, मुझ पर इतना विश्वास कैसे हो गया?'' वैष्णवी ने कहा, ''ये चौबीस घण्टे सिर्फ एक पक्ष के लिए ही तो नहीं हैं गुसाईं, दोनों पक्षों के लिए हैं। मेरा विश्वास है कि रास्ते में प्रवास में भी तुम पर मेरा अविश्वास न होगा। कल पंचमी है, जाने का बड़ा अच्छा शुभ दिन है- चलो। और रास्ते के किनारे रेल का पथ तो है ही- अच्छा नहीं लगे तो लौट आना। मैं मना नहीं करूँगी।''

एक वैष्णवी ने आकर खबर दी, ''ठाकुरजी का प्रसाद कमरे में रख दिया गया है।'' कमललता ने कहा, ''चलो तुम्हारे कमरे में चलकर बैठें।''

''मेरे कमरे में? अच्छी बात है।''

और एक बार उसके मुँह की तरफ देखा। इस बार लेशमात्र भी सन्देह न रहा कि वह हँसी नहीं कर रही है। यह भी निश्चित है कि मैं उपलक्ष-मात्र हूँ, पर चाहे जिस कारण से हो, उसकी ऐसी हालत मालूम हुई कि वह चाहे जिस कारण से हो, यदि यहाँ के बन्धन तोड़कर भाग सके तो मानों उसकी जान में जान आ जाय- उसे एक क्षण का भी विलम्ब सहन नहीं हो रहा है।

कमरे में आकर खाने बैठा। बहुत बढ़िया प्रसाद है। भागने का षडयन्त्र अच्छी तरह जम जाता, पर एक बहुत जरूरी काम से कोई कमललता को बुला ले गया। अत: अकेले ही मुँह बन्द किये हुए सेवा समाप्त करनी पड़ी। बाहर निकलने पर कोई भी नज़र नहीं आया, द्वारिकादास बाबाजी भी न जाने कहाँ चले गये। दो-तीन पुरानी वैष्णवियाँ घूम-फिर रही हैं- कल शाम को ठाकुर जी के कमरे के धुएँ में शायद ये ही अप्सरा जैसी लगी थीं, किन्तु आज दिन की तेज रोशनी में कल का वह अध्याीत्म सौन्दर्य-बोध उतना अटूट नहीं रहा। मन न जाने कैसा हो गया, सीधा आश्रम के बाहर चला आया। वही शैवालाच्छन्न शीर्णकाया मन्दस्रोता सुपरिचित नदी और वही लता-गुल्म-कंटकाकीर्ण तटभूमि, वही सर्पसंकुल सुदृढ़ बेंतों का कुंज और सुविस्तृत बेणुवन।

बहुत दिनों के अनभ्यास के कारण शरीर सनसनाने लगा, कहीं दूसरी जगह जाने की सोच ही रहा था कि एक आदमी जो कहीं छिपा बैठा था, अब उठा और नजदीक आकर खड़ा हो गया। पहले तो आश्चर्य हुआ कि इस जगह भी आदमी हो सकता है। उसकी उम्र मेरे बराबर ही होगी, और दस वर्ष ज्यादा होना भी असम्भव नहीं है। ठिंगना, दुबला-पतला, शरीर का रंग बहुत ज्यादा काला नहीं है, पर मुँह का नीचे का हिस्सा जैसे बहुत ही छोटा है। ऑंखों की दोनों भौहें भी वैसी ही अस्वाभाविक रूप में विस्तीर्ण हैं। वस्तुत:, इतनी बड़ी, घनी और मोटी भौंहें भी मनुष्य की होती हैं, यह ज्ञान मुझे इसके पहले न था। दूर से ही सन्देह हुआ कि प्रकृति ने मजाक में होठों के बदले कपाल पर एक जोड़ी मोटी मूँछें तो नहीं चिपका दी हैं। गले में तुलसी की मोटी माला है, वेशभूषादि भी बहुत कुछ वैष्णवों जैसी है, पर जितनी मैली है उतनी ही जीर्ण।

''महाशयजी!''

''चौंककर खड़े होते हुए मैंने पूछा, ''क्या आज्ञा है?''

''क्या यह जान सकता हूँ कि आप यहाँ कब आये हैं?''

''जान सकते हैं। कल शाम को आया हूँ।''

''रात को अखाड़े में शायद थे?''

''हाँ, था।''

''ओ:!''

नीरवता में ही कुछ क्षण कटे। पैर बढ़ाने की कोशिश करते ही उस आदमी ने कहा, ''आप तो वैष्णव नहीं हैं, भले आदमी हैं- अखाड़े में आपको रहने दिया?''

मैंने कहा, ''यह तो वे ही जानें। उन्हीं से पूछिए।''

''ओ:, शायद कमललता ने रहने के लिए कहा होगा?''

''हाँ।''

''ओ:, जानते हैं उसकी असली नाम क्या है? उषांगिनी। मकान सिलहट में है किन्तु दिखती है कलकत्ते जैसी। मेरा घर भी सिलहट में है। गाँव का नाम है महमूदपुर। उसके स्वभाव-चरित्र के बारे में कुछ सुनेंगे?''

मैंने कहा, ''नहीं।'' पर उस आदमी के हाव-भाव देखकर इस बार सचमुच ही विस्मित हो उठा। प्रश्न किया, ''कमललता के साथ आपका कोई सम्बन्ध है?''

''है क्यों नहीं!''

''वह क्या?''

क्षणभर इधर-उधर कर वह आदमी एकाएक गरज उठा, ''क्यों, क्या झूठ है? वह मेरी घरवाली होती है। उसके बाप ने खुद हमारी कण्ठी-बदली की थी। इसके गवाह हैं।''

न जाने क्यों मुझे विश्वास नहीं हुआ। पूछा, ''आपकी जाति क्या है?''

''हम द्वादश तेली हैं।''

''और कमललता की?''

प्रत्युत्तर में वह अपनी वह मोटी भौंहों की जोड़ी घृणा से कुंचित कर बोला, ''वह कलवार है- उनके पानी से हम पैर भी नहीं धोते। एक बार उसे बुला सकते हैं?''

''नहीं। अखाड़े में सब जा सकते हैं, इच्छा हो तो आप भी जा सकते हैं।'' कुछ नाराज होकर वह बोला, ''जाऊँगा साहब, जाऊँगा। दरोगा को पैसे खिला दिये हैं, प्यादे साथ लेकर झोंटा पकड़कर बाहर खींच लाऊँगा। बाबाजी के बाबा भी नहीं बचा सकेंगे! साला, रास्कल कहीं का!''

मैं और वाक्य व्यय न करके आगे चलने लगा। वह पीछे से कर्कश कंठ से बोला, ''इसमें आपका क्या नुकसान था? जाकर अगर एक बार बुला देते तो क्या शरीर का कुछ क्षय हो जाता? ओह-भले आदमी!''

अब पीछे घूमकर देखने का साहस नहीं हुआ। पीछे कहीं गुस्से को न रोक पाऊँ और इस अति दुर्बल आदमी के शरीर पर हाथ न छोड़ बैठूँ, इस डर से कुछ तेजी के साथ ही मैंने प्रस्थान किया। ऐसा लगने लगा कि वैष्णवी के भाग जाने का हेतु शायद यहीं कहीं सम्बद्ध है।

मन खराब हो गया था। ठाकुरजी के कमरे में न तो खुद गया और न कोई बुलाने ही आया। कमरे के भीतर एक चौकी पर कई- एक वैष्णव ग्रंथावलियाँ बड़े यत्न से रक्खी थीं। उन्हीं में से एक को हाथ में लेकर और प्रदीप को सिरहाने रखकर बिछौने पर लेट गया। वैष्णव-धर्मशास्त्र के अध्यलयन के लिए नहीं, सिर्फ वक्त गुजारने के लिए। बार-बार क्षोभ के साथ सिर्फ एक ही बात का खयाल आने लगा, कमललता जो गयी सो फिर लौटकर नहीं आयी! ठाकुरजी की संध्याय-आरती यथारीति शुरू हुई, उसका मधुर कण्ठ बार-बार कानों में सुनाई पड़ने लगा और घूम-फिरकर यही खयाल मन में आने लगा कि उस वक्त से कमललता ने मेरी कोई खोज-खबर ही नहीं ली! और वह मोटी भौंहों वाला आदमी? क्या उसकी शिकायत में कुछ भी सत्य नहीं है?

और भी एक बात है। गौहर कहाँ है? उसने भी तो आज मेरी कोई खोज खबर नहीं ली। सोचा था कि कुछ दिन- पूँटू के विवाहवाले दिन तक, यहीं गुजार दूँगा, पर अब यह नहीं होगा। शायद कल ही कलकत्ते रवाना हो जाना पड़े।

शनै: शनै: आरती और कीर्तन समाप्त हो गया। कलवाली वही वैष्णवी आकर बड़े यत्न से प्रसाद रख गयी, पर जिसकी राह देख रहा था उसके दर्शन नहीं मिले। बाहर लोगों की बातचीत और आने-जाने की आवाज भी क्रमश: शान्त हो गयी। यह सोचकर कि अब उसके आने की सम्भावना नहीं है, भोजन किया और हाथ-मुँह धोकर दीप बुझा सो गया।

शायद उस वक्त बहुत रात थी, कानों में भनक पड़ी, ''नये गुसाईं!''

जागकर उठ बैठा। अन्धकार में खड़ी कमललता आहिस्ता-आहिस्ता बोली, ''आयी नहीं, इसलिए शायद मन-ही-मन बहुत दु:खी हो रहे हैं- क्यों नये गुसाईं?''

कहा, ''हाँ, दुखी हुआ हूँ।''

क्षणभर के लिए वैष्णवी चुप रही, फिर बोली, ''जंगल में वह आदमी तुमसे क्या कह रहा था?''

''तुमने देखा था क्या?''

''हाँ।''

''कह रहा था कि वह तुम्हारा पति है- अर्थात्, तुम्हारे सामाजिक आचारों के मुताबिक तुम्हारी उसकी कंठी-बदल हुई है।''

''तुमने विश्वास किया?''

''नहीं, नहीं किया।''

क्षणभर के लिए फिर मौन रहकर वैष्णवी ने कहा, ''उसने मेरे स्वभाव और चरित्र के बारे में कुछ इशारा नहीं किया?''

''किया था।''

''और मेरी जातिका?''

''हाँ, उसका भी।''

वैष्णवी ने कुछ ठहरकर कहा, ''सुनोगे मेरे बचपन का इतिहास? शायद तुम्हें घृणा हो जाय।''

''तो रहने दो, मैं नहीं सुनना चाहता।''

''क्यों?''

''उससे क्या फायदा कमललता? तुम मुझे बहुत भली लगी हो। यहाँ से कल चला जाऊँगा और शायद फिर कभी हम लोगों की मुलाकात ही न हो। तब मेरे इस भले लगने को निरर्थक ही नष्ट करने से क्या फायदा होगा, बताओ?''

इस बार वैष्णवी बहुत देर तक मौन रही। यह समझ में न आया कि अन्धकार में चुपचाप खड़ी वह क्या कर रही है। पूछा, ''क्या सोच रही हो?''

''सोच रही हूँ कि कल तुम्हें नहीं जाने दूँगी।''

''तो फिर कब जाने दोगी?''

''जाने कभी न दूँगी। पर अब बहुत रात हो गयी, सो जाओ। मसहरी अच्छी तरह से लगी हुई है न?''

''क्या पता, शायद लगी है।''

वैष्णवी ने हँसकर कहा, ''शायद लगी है? वाह, खूब हो।'' यह कह उसने करीब आकर अन्धकार में ही हाथ बढ़ाकर बिछौने के चारों छोरों की परीक्षा कर ली और कहा, ''सोओ गुसाईं, मैं जाती हूँ।'' यह कहकर वह दबे पैरों बाहर निकल गयी और बाहर से बहुत ही सावधानी के साथ दरवाजा भी बन्द कर गयी।

वैष्णवी ने आज मुझसे बार-बार शपथ करा ली कि उसका पूर्व विवरण सुनकर मैं घृणा नहीं करूँगा।

''सुनना मैं चाहता नहीं, पर अगर सुनूँ तो घृणा न

करूँगा।''

वैष्णवी ने सवाल किया, ''पर क्यों नहीं करोगे? सुनकर औरत-मर्द सब ही तो घृणा करते हैं।''

''मैं नहीं जानता कि तुम क्या कहोगी, तो भी अन्दाज लगा सकता हूँ। यह जानता हूँ कि उसे सुनकर औरतें ही औरतों से सबसे ज्यादा घृणा करती हैं, और इसका कारण भी जानता हूँ, पर तुम्हें वह नहीं बताना चाहता। पुरुष भी करते हैं, किन्तु बहुत बार वह छल होता है, और बहुत बार आत्मवंचना। तुम जो कुछ कहोगी उससे भी बहुत ज्यादा भद्दी बातें मैंने खुद तुम लोगों के मुँह से सुनी हैं, और अपनी ऑंखों भी देखी हैं। पर तो भी मुझे घृणा नहीं होती।''

''क्यों नहीं होती?''

''शायद यह मेरा स्वभाव है। पर कल ही तो तुमसे कहा है कि इसकी जरूरत नहीं। सुनने के लिए मैं जरा भी उत्सुक नहीं। इसके अलावा कौन कहाँ का है, यह सब कहानी मुझसे नहीं भी कही तो क्या हर्ज है?''

वैष्णवी काफी देर तक चुप हो कुछ सोचती रही। इसके बाद अचानक पूछ बैठी, ''अच्छा गुसाईं, तुम पूर्वजन्म और अगले जन्मपर विश्वास करते हो?''

''नहीं।''

''नहीं क्यों? क्या तुम सोचते हो कि ये सब बातें सचमुच नहीं हैं?''

''मेरे सोचने के लिए दूसरी बहुत बातें हैं, शायद ये सब सोचने के लिए मुझे समय ही नहीं मिलता।''

वैष्णवी फिर क्षणभर मौन रहकर बोली, ''एक घटना तुम्हें बताऊँगी, विश्वास करोगे? ठाकुरजी की ओर मुँह करके कहती हूँ कि तुमसे झूठ नहीं कहूँगी।''

मैंने हँसकर कहा, ''करूँगा।''

''तो कहती हूँ। एक दिन गौहर गुसाईं के मुँह से सुना कि उनकी पाठशाला का एक मित्र उनके घर आया है। सोचा कि जो आदमी एक दिन भी यहाँ आए बिना नहीं रह सकता, वह अपने बचपन के मित्र के साथ छह-सात दिन कैसे भूला रहा? फिर सोचा कि यह कैसा ब्राह्मण मित्र है जो अनायास ही मुसलमान के घर पड़ा रहा, किसी से भी नहीं डरा? उसका क्या कहीं भी कोई नहीं है? पूछने पर गौहर गुसाईं ने भी ठीक यही बात कही। कहा कि संसार में उसका अपना कहने लायक कोई नहीं है, इसीलिए उसे डर नहीं है, चिंता भी नहीं है। मन-ही-मन खयाल किया कि ऐसा ही होगा। पूछा, गुसाईं, तुम्हारे मित्र का क्या नाम है? नाम सुनकर जैसे चौंक गयी। जानते तो हो गुसाईं, यह नाम मुझे नहीं लेना चाहिए।''

हँसकर बोला, ''जानता हूँ। तुम्हारे मुँह से ही सुना है।''

वैष्णवी ने कहा, ''पूछा, तुम्हारा मित्र देखने में कैसा है? उम्र क्या है? गुसाईं ने जो कुछ कहा उसका कुछ हिस्सा तो कानों में गया, और कुछ नहीं। पर हृदय के भीतर धड़कन होने लगी। तुम खयाल करते होगे कि ऐसा आदमी तो नहीं देखा तो नाम सुनकर ही पागल हो जाए। पर यह सच है। सिर्फ नाम सुनकर ही औरतें पागल हो जाती हैं गुसाईं!''

''उसके बाद?''

वैष्णवी ने कहा, ''उसके बाद खुद भी हँसने लगी पर भूल न सकी। सब काम-काजों में मुझे केवल एक ही बात याद आने लगी कि तुम कब आओगे, तुम्हें अपनी ऑंखों से कब देख सकूँगी।''

सुनकर चुप रहा, पर उसके चेहरे की ओर देखकर हँस न सका।

वैष्णवी ने कहा, ''अभी तो कल शाम को ही तुम आये हो, पर आज इस संसार में मुझसे ज्यादा तुम्हें कोई प्रेम नहीं करता। पूर्वजन्म अगर सत्य न होता तो क्या एक दिन में यह असम्भव बात सम्भव हो सकती?''

कुछ ठहरकर उसने फिर कहा, ''मैं जानती हूँ कि तुम रहने नहीं आये हो और रहोगे भी नहीं। चाहे जितनी भी प्रार्थना क्यों न करूँ, तुम दो-एक दिन बाद चले ही जाओगे। पर मैं केवल वही सोचती हूँ कि इस व्यथा को मैं कब तक सँभाले रहूँगी।'' यह कहकर उसने सहसा ऑंचल से ऑंखें पोंछ डालीं।

 
मैं चुप हो रहा। इतने थोड़े-से समय में, इतनी स्पष्ट और प्रांजल भाषा में रमणी के प्रणय-निवेदन की कहानी इसके पहले न तो कभी किताब में पढ़ी थी और न लोगों की जुबानी ही सुनी थी। और अपनी ऑंखों से ही देख रहा हूँ कि यह अभिनय भी नहीं है। कमललता देखने में सुन्दर है, निरक्षर मूर्ख भी नहीं है, उसकी बात-चीत, उसका गाना, उसका आदर-प्यार और उसकी अतिथि-सेवा की आन्तरिकता के कारण वह मुझे अच्छी लगी है, और इस अच्छे लगने का प्रशंसा और रसिकता की अत्युक्ति से फैलाव करने में मैंने कंजूसी भी नहीं की है। पर देखते ही देखते यह परिणति इतनी गहरी हो जायेगी, वैष्णवी के आवेदन से, अश्रु-मोचन से और माधुर्य के उत्कंपठि‍त आत्मप्रकाश से सारा मन ऐसी तिक्तता से परिपूर्ण हो जायेगा- यह क्या क्षणभर भी पहले जानता था। मानो मैं हतबुद्धि हो गया। यही नहीं कि सिर्फ लज्जा से ही सारा शरीर रोमांचित हो गया हो, बल्कि एक प्रकार की अनजान विपद की आशंका से हृदय में अब कतई शान्ति और निराकुलता न रही। पता नहीं कि किस अशुभ मुहूर्त में काशी से चला था जो एक पूँटू का जाल तोड़कर दूसरी पूँटू के फन्दे में बुरी तरह फँस गया। इधर उम्र यौवन की सीमा लाँघ रही है, ऐसे असमय में अयाचित नारी-प्रेम की ऐसी बाढ़ आ गयी कि सोच ही न सका कि कहाँ भागकर आत्मरक्षा करूँ! कल्पना भी न की थी कि पुरुष के लिए युवती-रमणी की प्रणय-भिक्षा इतनी अरुचिकर हो सकती है। सोचा, एकाएक मेरा मूल्य इतना कैसे बढ़ गया? आज राजलक्ष्मी का प्रयोजन भी मुझमें शेष नहीं होना चाहता यही मीमांसा हुई है कि वह अपनी वज्रमुष्टि को जरा भी ढीला कर मुझे निष्कृति नहीं देगी। पर अब यहाँ और नहीं रहना चाहिए। साधु-संग सिर-माथे, यही स्थिर किया कि इस स्थान को कल ही छोड़ दूँगा।

एकाएक वैष्णवी चकित हो उठी, ''अरे वाह! तुम्हारे लिए चाय जो मँगाई है, गुसाईं ।''

''कहती क्या हो? कहाँ मिली?''

''आदमी को शहर भेजा था। जाऊँ, तैयार करके ले आऊँ, देखो, कहीं भाग न जाना।''

''नहीं, लेकिन बनाना जानती हो?''

वैष्णवी ने जवाब नहीं दिया, सिर्फ सिर हिलाकर हँसती हुई चली गयी। उसके चले जाने के बाद उस ओर देखने पर हृदय में न जाने कैसी एक चोट-सी लगी। चाय-पान आश्रम की व्यवस्था नहीं है, शायद मनाही है, तो भी उसे यह खबर लग गयी कि यह चीज मुझे अच्छी लगती है और शहर में आदमी भेजकर उसने मँगवा भी ली। उसके विगत जीवन का इतिहास नहीं जानता, और वर्तमान का भी नहीं। केवल यह आभास मिला है कि वह अच्छा नहीं है, वह निन्दा के योग्य है- सुनने पर लोगों को घृणा होती है। तथापि, वह उस कहानी को मुझसे छिपाना नहीं चाहती, सुनाने के लिए बार-बार जिद कर रही है, सिर्फ मैं ही सुनने को राजी नहीं हूँ। मुझे कुतूहल नहीं है, क्योंकि प्रयोजन नहीं है। प्रयोजन उसी का है। अकेले बैठे हुए इस प्रयोजन के सम्बन्ध में सोचते हुए स्पष्टत: देखा कि मुझे बताए वगैर उसके हृदय की ग्लानि नहीं मिटेगी- मन में वह किसी तरह भी बल नही पा रही है। सुना है कि मेरा 'श्रीकान्त' नाम कमललता उच्चारण नहीं कर सकती। पता नहीं कि कौन यह उसका परमपूज्य गुरुजन है और उसने कब इस लोक से बिदा ले ली है। हमारे नाम की इस दैवी एकता ने ही शायद इस विपत्ति की सृष्टि की है और उसने तब से ही कल्पना में गत जन्म के स्वप्न सागर में डुबकी लगाकर संसार की सब यथार्थताओं को तिलांजलि दे दी है।

तो भी ऐसा लगता है कि इसमें विस्मय की कोई बात नहीं। रस की आराधना में आकण्ठ-मग्न रहते हुए भी उसकी एकान्त नारी-प्रकृति आज भी शायद रस का तत्व नहीं पा सकी है, वह असहाय अपरितृप्त प्रवृत्ति इस निरवच्छिन्न भाव-विलास के उपकरणों को संग्रह करने में शायद आज क्लान्त है- दुवि‍‍धा से पीड़ित है। उसका वह पथभ्रष्ट विभ्रान्त मन अपने अनजान में ही न जाने कहाँ अवलम्ब खोजने में प्राणपण से जुटा हुआ है- वैष्णवी उसका पता नहीं जानती, इसीलिए आज वह बार-बार चौंककर अपने विगत-जन्म के रुद्ध द्वार पर हाथ फैलाकर अपराध की सान्त्वना माँग रही है। उसकी बातें सुनकर समझ सकता हूँ कि मेरे नाम 'श्रीकान्त' को ही पाथेय बनाकर आज वह अपनी नाव छोड़ देना चाहती है।

वैष्णवी चाय ले आयी। सब नयी व्यवस्था है, पीकर बहुत आनन्द मिला। मनुष्य का मन कितनी आसानी से परिवर्तित हो जाता है- अब मानो उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं!

पूछा, ''कमललता, तुम क्या कलवार हो?''

कमललता ने हँसकर कहा, ''नहीं, सुनार-बनियाँ। पर तुम्हारे निकट तो कोई प्रभेद नहीं है- दोनों ही एक हैं।''

''कम-से-कम मेरे निकट तो एक ही हैं। दोनों ही एक क्यों बल्कि सबके एक हो जाने पर भी कोई नुकसान नहीं।''

वैष्णवी ने कहा, ''ऐसा ही तो लगता है। तुमने तो गौहर की माँ के हाथ का भी खाया है।''

''उन्हें तुम नहीं जानतीं। गौहर बाप की तरह का नहीं है, उसे अपनी माँ का स्वभाव मिला है। इतना शान्त, अपने को भूला हुआ, ऐसा अच्छा मनुष्य कभी देखा है? उसकी माँ ऐसी ही थी। एक बार बचपन में गौहर के पिता के साथ उनके झगड़े की बात मुझे याद है। उन्होंने किसी को छिपाकर बहुत से रुपये दे दिये थे। इसी वजह से झगड़ा खड़ा हुआ। गौहर के पिता बदमिजाज आदमी थे। हम तो डर के मारे भाग गये। कुछ घण्टे बाद धीरे-धीरे आकर देखा कि गौहर की माँ चुपचाप बैठी हैं। गौहर के पिता के बारे में पूछने पर पहले तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। पर हमारे मुँह की ओर ताकते हुए वे एक बार खिलखिलाकर हँस पड़ीं। ऑंखों से पानी की कुछ बूँदें नीचे गिर पड़ीं। यह उनकी आदत थी।''

वैष्णवी ने प्रश्न किया, ''इसमें हँसने की कौन-सी बात हुई?''

''हमने भी तो यही सोचा। पर जब हँसी रुक गयी तो वे धोती से ऑंखें पोंछ कर बोलीं, ''मैं कैसी मूर्ख औरत हूँ बेटा! वे तो मजे से पेट भर कर खुर्राटे ले रहे हैं, और मैं बिना खाये उपवास कर गुस्से में जल-भुन रही हूँ, बताओ, इसकी क्या जरूरत है!'' और इस कहने के साथ ही उनका सारा अभिमान और क्रोध धुल-पुँछकर साफ हो गया। यह भुक्तभोगी के अलावा और कोई नहीं जानता कि औरतों का यह कितना बड़ा गुण है!''

वैष्णवी ने प्रश्न किया, ''तुम क्या भुक्तभोगी हो, गुसाईं?''

मैं कुछ सिटपिटा गया। यह नहीं सोचा था कि उसको छोड़कर यह प्रश्न मेरे ही सिर आ पड़ेगा। कहा, ''सब क्या खुद ही भोगना पड़ता है कमललता, दूसरों को देखकर भी तो सीखा जाता है। इस मोटी भौंहों वाले आदमी के निकट क्या तुमने कुछ नहीं सीखा?''

वैष्णवी ने कहा, ''पर वह तो मेरे लिए पराया नहीं है।''

और कोई प्रश्न अब मेरे मुँह से नहीं निकला-बिल्कुमल निस्तब्ध हो गया।

वैष्णवी खुद भी कुछ देर चुप रही। फिर हाथ जोड़कर बोली, ''तुमसे विनती करती हूँ गुसाईं, एक बार मेरी शुरू की बातें सुन लो...''

''अच्छी बात है, कहो।''

पर जब कहने चली तो देखा कि कहना उतना आसान नहीं है। मेरी तरह मुँह नीचा किये हुए उसे भी काफी देर तक चुप रहना पड़ा। पर उसने हार नहीं मानी। अन्तर्द्वन्द्व में विजयी होकर जब उसने एक बार मुँह ऊपर उठाकर देखा तो मुझे भी ऐसा लगा कि उसके स्वाभाविक सुश्री चेहरे पर मानो एक खास चमक आ गयी है। बोली, ''अहंकार मर कर भी नहीं मरता गुसाईं! हमारे बड़े गुसाईं कहते हैं कि यह मानो फूस की आग है जो बुझकर भी नहीं बुझती। राख हटाते ही नजर आता है कि धक-धक धधक रही है, पर इसीलिए इसे फूँक देकर बढ़ा तो नहीं सकती। फिर तो मेरा इस पथ पर आना ही मिथ्या हो जायेगा। सुनो। किन्तु औरत हूँ न, इसलिए शायद सब बातें खोलकर न भी कह सकूँ।''

मेरे संकोच की सीमा न रही। अन्तिम बार विनती कर कहा, ''औरतों के पैर फिसलने के विवरणों में मुझे दिलचस्पी नहीं है, उत्सुकता भी नहीं, और उन्हें सुनना मुझे कभी अच्छा भी नहीं लगा कमललता। मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारी वैष्णव-साधना में अहंकार के नाश के लिए कौन से मार्ग का निर्देश महाजनों ने किया है, पर अपने गुप्त पापों को अनावृत्त करने की स्पर्ध्दित विनय ही अगर तुम्हारे प्रायश्चित्त का विधान हो, तो तुम्हें अनेक-व्यक्ति मिल जाँयगे जिन्हें ऐसी सब कहानियाँ सुनना बहुत रुचिकर लगता है। मुझे माफ करो, कमललता, इसके अलावा मैं शायद कल ही चला जाऊँगा, शायद फिर जीवन में कभी हम लोगों की मुलाकात भी नहीं होगी।''

वैष्णवी ने कहा, ''तुमसे तो पहले ही कहा है गुसाईं, प्रयोजन तुम्हारा नहीं, मेरा है, पर यह क्या तुम सच कह रहे हो, कल के बाद हमारी मुलाकात नहीं होगी? नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता। मेरा मन कहता है कि फिर मुलाकात होगी- मैं यही आशा लेकर रहूँगी। पर क्या वास्तव में मेरे बारे में कुछ भी जानने की इच्छा तुम्हारी नहीं है? हमेशा क्या सिर्फ एक अनुमान और सन्देह को ही लिये रहोगे?''

प्रश्न किया, ''आज वन में जिस आदमी से मेरी मुलाकात हुई, जिसे तुम आश्रम में घुसने नहीं देतीं, जिसके उपद्रव से तुम भागना चाहती हो- वह क्या वास्तव में तुम्हारा कोई नहीं होता? बिल्कुनल पराया है?''

''किस के डर से भाग रही हूँ, यह तुम समझ गये गुसाईं?''

''हाँ, ऐसा ही तो लगता है। पर वह है कौन?''

''वह कौन है? वह मेरे इह और परलोक की नरक-यन्त्रणा है। इसीलिए तो निरन्तर रोकर भगवान से कहती हूँ, प्रभु, मैं तुम्हारी दासी हूँ- मनुष्य के प्रति इतनी जबरदस्त घृणा मेरे मन से निकाल दो, जिससे मैं फिर आसानी से साँस लेकर जी सकूँ। नहीं तो मेरी सारी साधना व्यर्थ हो जायेगी।''

उसकी ऑंखों से जैसे आत्मग्लानि फूट पड़ी, मैं चुप हो रहा।

वैष्णवी ने कहा, ''फिर भी, एक दिन उससे ज्यादा मेरा अपना कोई नहीं था- संसार में इतना प्यार किसी ने भी किसी को नहीं किया होगा।'' उसका कथन सुनकर विस्मय की सीमा नहीं रही और इस सुरूपा रमणी की तुलना में उस प्रेम के पात्र की कुत्सित और भद्दी शक्ल को स्मरण कर मेरा मन बहुत ही संकुचित हो गया।

बुद्धिमती वैष्णवी ने मेरा मुँह देखकर यह ताड़ लिया। कहा, '' गुसाईं, यह तो उसका सिर्फ बाहर का परिचय है- उसके भीतर का परिचय सुनो।''

''कहो।''

वैष्णवी ने कहना शुरू किया, ''मेरे और भी दो छोटे भाई हैं, पर माँ-बाप की मैं इकलौती बेटी थी। हम श्रीहट्ट के रहने वाले हैं, पर चूँकि पिताजी व्यापारी आदमी थे, उनका व्यापार कलकत्ते में था, इसलिए बचपन से ही मैं कलकत्ते में पली हूँ। गृहस्थी के साथ माँ गाँव के मकान में ही रहती थीं। मैं पूजा के दिनों में अगर कभी गाँव जाती तो महीने-भर से ज्यादा न रह पाती। वहाँ रहना मुझे अच्छा भी न लगता। कलकत्ते में ही मेरी शादी हुई और सत्रह वर्ष की उम्र में कलकत्ते में ही मैंने उन्हें खो दिया। उनके नाम की वजह से ही गुसाईं, तुम्हारा नाम गौहर गुसाईं के मुँह से सुनकर मैं चौंक पड़ी। इसलिए 'नये गुसाईं' के नाम से पुकारती हूँ, वह नाम जुबान पर नहीं ला सकती।''

''यह मैं समझ गया, उसके बाद?''

वैष्णवी ने कहा, ''आज जिसके साथ तुम्हारी मुलाकात हुई थी उसका नाम मन्मथ है, वह हमारा मुनीम था।'' कह कर वह क्षण भर के लिए मौन रही, फिर बोली, ''जब मेरी उम्र इक्कीस साल की थी तब मेरे संतान होने की सम्भावना हुई...''

वैष्णवी कहने लगी, ''मन्मथ का एक पितृहीन भतीजा हमारे ही मकान में रहता था। पिताजी उसे कॉलेज में पढ़ाते थे। उम्र में मुझसे जरा छोटा था। वह मुझे इतना प्यार करता था जिसकी सीमा नहीं। उसे बुलाकर कहा, 'यतीन, तुमसे और कभी तो कुछ माँगा नहीं है भाई, इस विपत्ति में अन्तिम बार मुझे थोड़ी-सी मदद करो। मुझे एक रुपये का जहर खरीदकर ला दो।'' पहले तो वह मेरी बात नहीं समझा, पर जब उसकी समझ में आया तो उसका चेहरा मुर्दे की तरह फीका पड़ गया। कहा, ''देरी मत करो भाई, तुम्हें अभी खरीदकर ला देना होगा। इसके अलावा मेरे लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।''

''यह सुनकर यतीन के रोने का तो क्या कहना। वह मुझे देवता समझता था और दीदी कहकर पुकारता था। उसे कितना आघात, कितनी व्यथा हुई, उसकी ऑंखों का पानी जैसे खत्म ही नहीं होना चाहता था। बोला, ''उषा दीदी, आत्मघात से बढ़कर और कोई महापाप नहीं है। एक पाप के कन्धों पर और एक जबरदस्त पाप लादकर तुम रास्ता खोजना चाहती हो? पर लज्जा से बचने का यह तरीका ही अगर तुमने स्थिर किया हो दीदी, तो मैं कभी मदद नहीं करूँगा। इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तुम आदेश दोगी, उसका मैं तत्काल पालन करूँगा।'' उसी के कारण मैं मर न सकी।

''क्रमश: पिताजी के कानों में बात पहुँची। वे जैसे निष्ठावान वैसे ही शान्त और निरीह प्रकृति के मनुष्य थे। मुझसे कुछ नहीं कहा, पर दु:ख से, शर्म से दो तीन दिन तक बिछौने से न उठ सके। फिर गुरुदेव के परामर्श से मुझे लेकर नवद्वीप आये। यह ठहरा कि मैं और मन्मथ दीक्षा लेकर वैष्णव हो जाँय और तब फूलों की माला और तुलसी की माला अदल-बदलकर नयी रीति से हमारी शादी हो। उससे पाप का प्रायश्चित होगा या नहीं, यह नहीं जानती थी, पर इस भरोसे पर कि जो शिशु गर्भ में आया है उसकी माँ होकर हत्या नहीं करनी पड़ेगी, मेरी आधी वेदना दूर हो गयी। उद्योग आयोजन होने लगा, दीक्षा कहो या भेष कहो, या और कुछ कहो, मेरा नया नामकरण हुआ- कमललता। किन्तु, तब भी यह मालूम नहीं था कि दस हजार रुपये देने का वचन देकर ही पिताजी ने मन्मथ को राजी किया है। पर एकाएक न जाने क्यों शादी का दिन आगे बढ़ा दिया गया- शायद एक सप्ताह। मन्मथ बहुत कम दिखाई पड़ता, नवद्वीप के मकान में मैं अकेली ही रहती थी। ऐसे ही कई दिन कट गये, इसके बाद फिर शुभ दिन आया। स्नान करके पवित्र होकर शान्त मन से ठाकुर की अर्पित माला हाथ में लिये प्रतीक्षा में बैठी रही। उदास चेहरे से पिताजी एक बार देख गये, पर मन्मथ को जब नवीन वैष्ण्व के वेष में देखा, तो अचानक सारे मन के भीतर बिजली दौड़ गयी। यह ठीक नहीं जानती कि वह आनन्द की थी या व्यथा की, शायद दोनों ही थी। पर इच्छा हुई कि उठकर उसके पैरों की धूल माथे पर लगा लूँ। पर शर्म के कारण ऐसा नहीं हो सका।

''हमारी कलकत्ते की पुरानी दासी बहुत-सी चीजें ले आयी। उसी ने मेरी परवरिश की थी, उसी के मुँह से दिन बढ़ जाने का कारण सुना।''

कितनी पुरानी बात है, तो भी गला भारी हो गया और उसकी ऑंखों में ऑंसू आ गये। मुँह फिराकर वैष्णवी ऑंसू पोंछने लगी।

पाँच-छह मिनट बाद पूछा, ''उसने क्या कारण बताया?''

वैष्णवी ने कहा, ''उसने बताया कि मन्मथ अचानक दस हजार के बदले बीस हजार रुपयों की माँग पेश कर बैठा। मुझे कुछ मालूम नहीं था, इसलिए चौंककर पूछा कि क्या मन्मथ रुपयों के बदले राजी हुआ है? और पिताजी भी बीस हजार रुपये देने को तैयार हैं? दासी ने कहा, उपाय क्या है दीदी रानी? मामला भी तो आसान नहीं है, जाहिर हो जाने पर जाति, कुल, मान-सब चला जायेगा। मन्मथ ने असली बात अन्त में जाहिर कर दी। कहा कि इसके लिए वह तो जिम्मेदार है नहीं, जिम्मेदार है उसका भतीजा यतीन। अत: यदि बिना दोष के उसे अपनी जाति छोड़नी ही है तो बीस हजार से कम में नहीं छोड़ सकता। फिर, दूसरे के लड़के का पितृत्व स्वीकार करना- यह भी तो कम मुश्किल नहीं है!

''यतीन अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, उसे बुलाकर बात सुनाई गयी। सुनकर पहले तो वह हक्का-बक्का-सा हुआ खड़ा रहा। फिर बोला, झूठी बात है। चाचा मन्मथ गरज उठा, ''पाजी, नीच, नमकहराम! जो व्यक्ति तुझे खाना-कपड़ा और कॉलेज में पढ़ा-लिखाकर आदमी बना रहा है, उसी का तूने सर्वनाश किया! कैसे काले साँप को मैं मालिक के घर में लाया! सोचा था कि माँ-बाप-हीन लड़का आदमी बनेगा। छी, छी, यह कहने के साथ-ही-साथ वह छाती और सिर पीटने लगा। बोला, यह बात उषा ने खुद अपने मुँह से कही है और तुम इनकार करते हो!

''यतीन चौंक उठा और बोला, ''उषा दीदी ने खुद मेरा नाम लिया है? वह तो कभी झूठ नहीं बोलती-इतना बड़ा झूठा अपवाद तो उनके मुँह से कभी बाहर नहीं निकल सकता!''

''मन्मथ और एक बार चिल्ला उठा, 'अब भी इनकार करता है पाजी, अभागा, शैतान, अपने मालिक से तो पूछ, वे क्या कहते हैं!'' '

मालिक ने अनुमोदन करते हुए कहा, ''हाँ।''

''यतीन ने पूछा, ''खुद दीदी ने मेरा नाम लिया है?''

''मालिक ने फिर सिर हिलाकर कहा, ''हाँ।''

''पिताजी को वह देवता-तुल्य मानता था। इसके बाद उसने और कोई प्रतिवाद नहीं किया। स्तब्ध हो कुछ देर तक खड़े रहने के बाद धीरे-धीरे चला गया। क्या सोचा, यह वही जाने।

''रात को किसी ने उसकी तलाश नहीं की। सुबह ही किसी ने आकर खबर दी। सब दौड़ पड़े और देखा कि हमारे टूटे अस्तबल के एक कोने में गले में रस्सी बाँधे यतीन झूल रहा है!''

वैष्णवी ने कहा, ''यह नहीं जानती कि भतीजे की आत्महत्या के लिए शास्त्रों में चाचा के लिए शौच की विधि है या नहीं गुसाईं। शायद न हो, या शायद डुबकी लगाने से ही शुद्धि हो जाती हो, सो कुछ भी हो, शुभ दिन सिर्फ कुछ दिनों के लिए और आगे टल गया। इसके बाद गंगा-स्नान से शुद्ध और पवित्र हो माला और तिल लगाए हुए मन्मथ गुसाईं पापिनी के पाप-विमोचन का शुभ संकल्प लिये हुए नवद्वीप में आकर हाजिर हो गये।''

एक मुहूर्त के लिए मौन रहकर वैष्णवी फिर कहने लगी, ''उस दिन ठाकुर की अर्पित माला ठाकुरजी के पाद-पद्मों में ही लौटा आयी। मन्मथ की अपवित्रता दूर हो गयी, पर पापिनी उषा की अपवित्रता इस जीवन में दूर न हुई नये गुसाईं।''

मैंने कहा, ''उसके बाद?''

वैष्णवी ने मुँह फेर लिया, कोई जवाब नहीं दिया। समझ गया कि अब उसे सँभलने में देर लगेगी। काफी देर तक हम दोनों ही चुप बैठे रहे।

उसका शेष अंश सुनने का आग्रह प्रबल हो उठा। पर सोच रहा था कि प्रश्न करना उचित है या नहीं। वैष्णवी ने आर्द्र मृदु कण्ठ से खुद ही कहा, ''गुसाईं, जानते हो, संसार में पाप नाम की चीज इतनी भयंकर क्यों है?''

''अपने खयालों के मुताबिक एक तरह से जानता हूँ, पर तुम्हारी धारणा के साथ शायद वह न मिले।''

उसने प्रत्तयुत्तर में कहा, ''नहीं जानती कि तुम्हारा क्या खयाल है। पर उस दिन से मैंने अकेले ही अपने खयाल के अनुसार समझ लिया है गुसाईं, कि गर्व के साथ तुम कितने ही लोगों को कहते हुए सुनोगे कि कुछ भी नहीं होता। वे अनेक आदमियों का उदाहरण देकर अपनी बात प्रमाणित करना चाहेंगे। पर इसकी तो कोई जरूरत नहीं। इसका प्रमाण है मन्मथ और प्रमाण हूँ मैं खुद। अब भी हम लोगों का कुछ नहीं हुआ। अगर कुछ होता तो मैं इसे इतना भयंकर न कहती, पर ऐसा तो नहीं है, इसका दण्ड भोगते हैं निरपराध और निर्दोष लोग। यतीन को आत्महत्या का बड़ा डर था, पर उसी से; वह अपनी दीदी के अपराध का प्रायश्चित कर गया। कहो गुसाईं, इससे और अधिक भयंकर तथा निष्ठुर संसार में क्या है? पर ऐसा ही होता है, इसी तरह भगवान शायद अपनी सृष्टि की रक्षा करते हैं।''

इस विषय में बहस करने से कोई फायदा नहीं। युक्ति और भाषा- कोई भी प्रांजल नहीं है, तथापि यही खयाल किया कि दुष्कृति की शोकाच्छन्न स्मृति ने शायद इसी पथ पर चलकर पाप-पुण्य की उपलब्धि अर्जन की है और उससे सांत्वना पाईहै।

''कमललता, उसके बाद क्या हुआ?''

यह सुनकर वह सहसा मानो व्याकुल होकर कह उठी, ''सच बताओ गुसाईं, इसके बाद भी मेरी बातें सुनने की इच्छा होती है?''

''सच ही कह रहा हूँ, होती है।''

वैष्णवी ने कहा, ''मेरा भाग्य है जो इस जन्म में तुम्हारे दर्शन फिर हुए।'' यह कह कुछ देर तक चुपचाप मेरी और देखते-देखते वह फिर कहने लगी, ''कोई चार दिन बाद एक मरा हुआ लड़का पैदा हुआ। उसे गंगा के किनारे विसर्जित कर गंगा में नहाकर घर लौट आई। पिता जी ने रोकर कहा, ''अब तो मैं नहीं रह सकता बेटी।''

''हाँ पिताजी, अब आप मत रहिए, आप घर लौट जाइए। बहुत दुख दिया, अब आप मेरी फिक्र न करें।''

पिताजी ने पूछा, ''बीच में खबर दोगी न बेटी?''

''नहीं पिताजी ,मेरी खबर लेने की आप अब चेष्टा न कीजिएगा।''

''पर उषा, तुम्हारी माँ अब भी जीवित है!''

''मैं मरूँगी नहीं पिताजी, पर मेरी सती-लक्ष्मी माँ से कह देना कि उषा मर गयी। माँ को दु:ख तो होगा, पर लड़की जिन्दा है, जानकर और भी ज्यादा दु:ख होगा। ऑंखों के अश्रु पोंछकर पिताजी कलकत्ते चले गये।''

मैं चुप बैठा रहा, कमललता कहने लगी, ''पास में रुपया था- मकान का किराया चुकाकर मैं भी निकल पड़ी। संगी-साथी मिल गये, सब श्रीवृंदावनधाम जा रहे थे, मैं भी साथ हो ली।''

वैष्णवी ने कुछ रुककर कहा, ''इसके बाद कितने तीर्थ, कितने पथ, और कितने पेड़ों के नीचे अनेक दिन कट गये...''

''यह जानता हूँ, पर सैकड़ों साधुओं की ऑंखों की दृष्टि का विवरण तो तुमने बताया ही नहीं, कमललता!''

''वैष्णवी हँस पड़ी। बोली, ''बाबाजी लोगों की दृष्टि अतिशय निर्मल है, उनके बारे में अश्रद्धा की बातें नहीं कहना चाहिए गुसाईं।''

''नहीं-नहीं, अश्रद्धा नहीं। अतिशय श्रद्धा के साथ ही उनकी कहानी सुनना चाहता हूँ कमललता।''

इस दफा वह नहीं हँसी, पर दबी हुई हँसी छिपा भी न सकी। बोली, ''जो बाबाजी प्रेम करते हैं उनसे सब बातें खोलकर नहीं कही जातीं, हमारे वैष्णव-शास्त्र में मनाही है।''

''तो रहने दो। सब बातों का काम नहीं, पर एक बात बताओ। गुसाईं जी द्वारिका दास कहाँ मिले?''

कमललता ने संकोच से जीभ काटकर और कपाल पर हाथ देकर कहा, ''मजाक नहीं करना चाहिए, वे मेरे गुरुदेव हैं गुसाईं।''

''गुरुदेव? तुमने उन्हीं से दीक्षा ली है?''

''नहीं, दीक्षा तो नहीं ली है, पर वे उतने ही पूजनीय हैं।''

''पर इतनी सारी वैष्णवियाँ-सेवादासियाँ क्या...''

कमललता ने फिर जीभ काटकर कहा, ''वे सब मेरी ही तरह उनकी शिष्या हैं। उनका भी उन्होंने ही उद्धार किया है।''

''निश्चय ही किया है पर 'परकीया साधना' या कुछ ऐसी ही जो एक साधना-पद्धति तुम लोगों की है- उसमें तो कोई दोष नहीं...''

वैष्णवी ने मुझे रोककर कहा, ''तुम लोगों ने दूर रहकर सिर्फ हमारा हँसी-मजाक ही उड़ाया है, नज़दीक आकर कभी कुछ देखा तो है नहीं, इसीलिए आसानी से व्यंग्य कर सकते हो। हमारे बड़े गुसाईं जी सन्यासी हैं, उनका उपहास करने से पाप होता है नूतन गुसाईं- ऐसी बातें फिर कभी ज़बान पर मत लाना।'' उसकी बातों से और गम्भीरता से कुछ हतप्रभ हो गया। वैष्णवी ने यह लक्ष्य कर जरा मुस्कुराते हुए कहा, ''दो दिन हम लोगों के पास यहीं रहो न गुसाईं। केवल बड़े गुसाईं जी के लिए ही नहीं कह रही हूँ, मुझे तो तुम प्यार करते हो, और कभी यदि मुलाकात न हो तो कम-से-कम यह तो देख जाओ कि संसार में कमललता

सचमुच में क्या लेकर संसार में रह रही है। यतीन को मैं आज भी नहीं भूली हूँ- दो दिन रहो, मैं कहती हूँ कि तुम यथार्थ में खुश होगे।''

चुप रहा। इन लोगों के बारे में एकदम ही कुछ न जानता होऊँ, सो बात नहीं है। असल वैष्णव की लड़की टगर की याद आ गयी। किन्तु मजाक करने की अब और प्रवृत्ति नहीं थी। यतीन के प्रायश्चित की घटना सारी अलोचना के बीच रह-रह कर जैसे मुझे भी उन्मना कर देती थी।

वैष्णवी ने अचानक प्रश्न किया, ''क्यों गुसाईं, इस उम्र तक भी सचमुच तुमने कभी किसी को प्यार नहीं किया?''

''तुम्हारा क्या खयाल होता है कमललता?''

''मेरा खयाल होता है, नहीं। तुम्हारा मन असली

वैरागी का मन है- उदासीन का- तितली की तरह। तुम कभी किसी बन्धन को नहीं मानोगे।''

मैंने हँसकर कहा, ''तितली की उपमा तो अच्छी नहीं है कमललता, यह तो सुनने में बहुत कुछ गाली जैसी है। मेरा प्रेमपात्र सचमुच में ही यदि कहीं कोई हो, तो उसके कानों में इसकी भनक पड़ने पर अनर्थ हो जायेगा।'' वैष्णवी हँसी, बोली, ''डर की कोई बात नहीं गुसाईं, वास्तव में यदि कोई होगी, तो मेरी बात का वह विश्वास नहीं करेगी, और तुम्हारी मधुमिश्रित चालाकी भी वह जीवन-भर नहीं पकड़ सकेगी।''

''तो फिर उसे दु:ख किस बात का? हो न चालाकी, परन्तु उसके निकट तो वही सही रहेगी।''

वैष्णणी ने सिर हिलाकर कहा, ''ऐसा नहीं होता गुसाईं। सत्य का स्थान झूठ कभी नहीं ले सकता। वे भले ही न समझें, कारण भले ही उनके लिए स्पष्ट न हो, तो भी उनका अन्तर निरन्तर अश्रुमुख ही रहेगा। मिथ्या का काण्ड तो देखते ही हो; इसी तरह इस रास्ते पर न जाने कितने लोग आये। यह पथ जिनके लिए सत्य नहीं है, उनकी सारी साधना जल की धारा के तल की सूखी बालू की तरह हमेशा ही अलग-अलग रही है, कभी एकत्रित नहीं हुई।''

कुछ ठहरकर वह मानो अचानक मन ही मन बोल उठी, ''वे रस के मर्म तक तो पहुँचते नहीं, इसीलिए प्राणहीन निर्जीव मूर्ति की निरर्थक सेवा करते-करते उनका जी दो दिन में ही हाँफ उठता है- सोचते हैं कि वह किस मोह के अन्धकार में अपने को दिन-रात ठगते हुए मरे जा रहे हैं। ऐसे लोगों को देखकर ही तुम लोग हमारा उपहास करना सीखते हो- पर मैं यह क्या फालतू बातें बक रही हूँ गुसाईं, इस सब असंलग्न प्रलाप की एक बात भी तुम नहीं समझोगे। पर यदि तुम्हारी कोई ऐसी है, तो तुम उसे भले ही भूल जाओ, पर वह तुम्हें नहीं भूल सकेगी, और न कभी उसकी ऑंखों का पानी ही सूखेगा।''

मैंने स्वीकार किया कि उसके वक्तव्य का प्रथम अंश मैंने समझा, पर अन्तिम अंश के प्रतिवाद में कहा, ''तुम क्या मुझसे यही कहना चाहती हो कमललता, कि मुझको प्यार करने का नाम ही है दु:ख पाना?''

''दु:ख की बात तो नहीं कही गुसाईं, कही है ऑंखों के पानी की बात।''

''पर कमललता, वे दोनों तो एक ही हैं, सिर्फ शब्दों का हेर-फेर है।''

वैष्णवी ने कहा, ''नहीं गुसाईं, वह दोनों एक नहीं हैं। न तो शब्दों का ही हेर-फेर है और न भाव का ही औरतें न इससे डरती ही हैं, और न उससे बचना ही चाहती हैं। पर तुम समझोगे कैसे?''

''जब कुछ नहीं समझूँगा तो फिर मुझसे यह सब कहती ही क्यों हो?''

''बिना कहे रहा भी नहीं जाता जी। प्रेम की वास्तविकता को लेकर मर्दों का दल जब अपनी बड़ाई किया करता है, तब सोचती हूँ कि हमारी जाति उनसे अलग है। तुम लोगों के और हम लोगों के प्यार की प्रकृति ही भिन्न है। तुम लोग चाहते हो विस्तार और हम चाहती हैं गम्भीरता, तुम लोग चाहते हो उल्लास और हम चाहती हैं शान्ति। जानते हो गुसाईं, कि प्रेम के नशे से हम भीतर ही भीतर कितना डरती हैं। उसके उन्माद से हमारे हृदय की धड़कन नहीं रुकती।''

मैं कुछ प्रश्न करना चाहता था, किन्तु उसने मेरी ओर ध्यासन ही नहीं दिया और भावों के आवेग में बोलना जारी रक्खा, ''वह हमारा सत्य भी नहीं है, हमारा अपना भी नहीं है। वह दौड़-धूप की चंचलता जिस दिन रुकती है, केवल उसी दिन हम नि:श्वास छोड़कर आराम पाती हैं। ओ जी नये गुसाईं, प्रेम की बड़ी से बड़ी प्राप्ति, स्त्रियों के लिए, निर्भयता की अपेक्षा और कुछ नहीं है। पर यही चीज तुम लोगों से कोई कभी नहीं पाती?''

''यह निश्चयपूर्वक जानती हो, कि नहीं पाती?''

वैष्णवी ने कहा, ''निश्चयपूर्वक जानती हूँ। इसलिए तो तुम्हारी बड़ाई मुझे सहन नहीं होती।''

आश्चर्य हुआ। कहा, ''तुम्हारे निकट बड़ाई तो कभी नहीं की कमललता?''

उसने कहा, ''जान बूझकर नहीं की, पर तुम्हारा यह उदासीन बैरागी-मन- जगत में इससे बढ़कर अहंकार से भरा हुआ और भी कुछ है क्या?''

''पर इन दो दिनों में ही तुमने मुझे इतना कैसे जान लिया?''

जान गयी, क्योंकि तुम्हें प्यार जो किया है।''

सुनकर मन-ही-मन कहा, तुम्हारे दु:ख और ऑंखों के अश्रुओं का प्रभेद इतनी देर बाद अब समझा हूँ कमललता! मालूम होता है, अविश्राम पूजा और रस की आराधना का परिणाम ऐसा ही होता है।

''प्यार किया है, यह क्या सच है कमललता?''

''हाँ, सच है।''

''पर तुम्हारा जप-तप, तुम्हारा कीर्तन, तुम्हारी रात-दिन की ठाकुर-सेवा- इन सबका क्या होगा, बताओ?''

वैष्णवी ने कहा, ''तब ये सब मेरे लिए और भी सत्य, और भी सार्थक हो उठेंगे। चलो न गुसाईं, सब कुछ छोड़-छाड़कर दोनों जनें रास्ते पर निकल पड़ें।''

मैंने सिर हिलाकर कहा, ''यह नहीं होगा कमललता, कल मैं चला जा रहा हूँ। पर जाने के पहले गौहर के बारे में जानने की इच्छा होती है।''

वैष्णवी ने सिर्फ नि:श्वास छोड़कर कहा, ''गौहर के बारे में? नहीं, उसे सुनने का तुम्हारा काम नहीं। सचमुच ही कल जाओगे?''

''हाँ, सच ही कल जाऊँगा।''

क्षणभर के लिए स्तब्ध रहकर वैष्णवी ने कहा, ''किन्तु इस आश्रम में यदि तुम फिर कभी आओगे साईं, तो कमललता को न खोज पाओगे।''

000

इस विषय में सन्देह न था कि अब यहाँ एक क्षण रहना भी उचित नहीं। पर उसी समय मानों कोई आड़ में खड़ा होकर ऑंख बन्द कर इशारे से निषेध करता है। कहता है, ''जाओगे क्यों? यही सोचकर तो आये थे कि छह-सात दिन रहेंगे,- रहो न। तकलीफ तो कुछ है नहीं।''

रात को बिछौने पर लेटा हुआ सोच रहा था कि ये कौन हैं जो एक ही शरीर में वास करके एक ही वक्त ठीक उलटी राय देते हैं। किसकी बात ज्यादा सच है? कौन ज्यादा अपना है? विवेक, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति- ऐसे ही जाने कितने नाम हैं, इनकी न जाने कितनी दार्शनिक व्याख्याएँ हैं, पर सत्य को आज भी कौन नि:संशय प्रतिष्ठित कर सका है? जिसको सोचता हूँ, कि अच्छा है, इच्छा कर वहीं पर पैर बढ़ाने में बाधा क्यों डालती है? अपने ही अन्दर के इस विरोध- द्वन्द्व का शेष क्यों नहीं होता? मन कहता है कि मेरा चला जाना ही श्रेयस्कर है, चला जाना ही कल्याणकारी है। तो फिर दूसरे ही क्षण उस मन की दोनों ऑंखों में ऑंसू क्यों भर आते हैं? बुद्धि, विवेक, प्रवृत्ति, मन, इन सब बातों की सृष्टि करके सच्ची सांत्वना कहाँ रह जाती है?

फिर भी जाना ही चाहिए, पीछे हटने से काम नहीं चलेगा। और सो भी कल ही। यही सोचने लगा कि इस जाने को कैसे सम्पन्न करूँ। बचपन का एक रास्ता जानता हूँ वह है गायब हो जाना। बिदा की वाणी नहीं, लौटकर आने की झूठी दिलासा नहीं, कारण का प्रदर्शन नहीं, प्रयोजन का- कर्त्तव्य का विस्तृत विवरण नहीं; सिर्फ मैं था और अब मैं नहीं हूँ, इस सत्य घटना के आविष्कार का भार उन लोगों पर छोड़ देना जो पीछे रह गये हैं, बस। निश्चय कर लिया कि अब सोना तो होगा नहीं, ठाकुरजी की मंगल आरती शुरू होने के पहले ही अन्धकार में शरीर ढंककर प्रस्थान कर दूँगा। पर दिक्कत है कि पूँटू के दहेज का रुपया छोटे बैग समेत कमललता के पास है। लेकिन उसे रहने दो। कलकत्ते से, और नहीं तो बर्मा से चिट्ठी भेज दूँगा, उससे एक काम यह भी होगा कि जब तक उन्हें लौटा न देगी तब तक कमललता को बाध्यै होकर यहीं रहना पड़ेगा, पथ-विपथ पर जाने का सुयोग नहीं मिलेगा।

जो कुछ रुपये मेरे कुरते की जेब में पड़े हैं, वे कलकत्ते तक पहुँचने के लिए काफी हैं।

बहुत रात इसी तरह कट गयी। चूँकि बार-बार संकल्प किया था कि सोऊँगा नहीं, शायद इसी कारण न जाने कब सो गया! पता नहीं कि कितनी देर-तक सोया, पर अचानक ऐसा लगा कि स्वप्न में गाना सुन रहा हूँ। एक बार खयाल किया कि रात का व्यापार शायद अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, फिर सोचा कि शायद प्रत्यूष की मंगल आरती शुरू हो गयी है, पर काँसे के घण्टे का सुपरिचित दु:सह निनाद नहीं है। असम्पूर्ण अपरितृप्त निद्रा टूटकर भी नहीं टूटती, ऑंखें खोलकर देखा भी नहीं जा सकता। किन्तु, कानों में प्रभाती के सुर में मीठे कण्ठ का सादा धीमा आह्नान पहुँचा-

जागिये गोपाल लाल, पंछी बन बोले।

रजनी कौ अन्त मयौ, दिनने पट खोले॥

''गुसाईं जी, और कितनी देर तक सोओगे? उठो।''

बिछौने पर उठ बैठा। मसहरी उठाई, पूर्व की खिड़की खुली हुई है- सामने की आम्र-शाखाओं में पुष्पित लवंग-मंजरी के कई बड़े-बड़े गुच्छ नीचे तक झूल रहे हैं। उनकी सैंधों में से दिखाई दिया कि आकाश में कई जगह हल्के लाल रंग का आभास है, जैसे अंधेरी रात में सुदूर ग्राम के अन्त में आग लग गयी हो। मन में कहीं कुछ व्यथा-सी होने लगी। कुछ चमगीदड़ उड़ करके अपने आवासों को लौट रहे हैं। उनकी पंखों की फड़फड़ाहट बार-बार कानों में आने लगी। ऐसा लगने लगा कि रात्रि खत्म हो रही है। यह नीलकण्ठों, बुलबुलों और श्यामा पक्षियों का देश है। मानो, यह उनकी राजधानी 'कलकत्ता शहर' है और यह विशाल बकुल-वृक्ष (मौलसिरी) उनके लेन-देन और काम-काज का 'बड़ा बाजार' है जहाँ दिन के वक्ती की भीड़ देखकर अवाक् हो जाना पड़ता है। तरह-तरह की शकलें, तरह-तरह की भाषा और रंग-बिरंगी पोशाक का बहुत ही विचित्र समावेश है। रात को अखाड़े के चारों ओर के वन में डाल-डाल कर उनके अगणित अड्डे हैं। नींद खुल जाने की आहट कुछ-कुछ पाई गयी। उससे मालूम हुआ कि मानो हाथ-मुँह धोकर वे तैयारी कर रहे हैं। अब सारे दिन चलने वाले नाच-गान का महोत्सव शुरू होगा। ये सब लखनऊ के उस्ताद हैं जो थकते भी नहीं और कसरत भी बन्द नहीं करते। भीतर वैष्णवों का कीर्तन शायद कभी बन्द भी हो जाय, परन्तु बाहर इस बला के बन्द दोने की सम्भावना नहीं है। यहाँ पर छोटे-बड़े, भले-बुरे का विचार नहीं है। इच्छा और समय चाहे हो या न हो, गाना तुम्हें सुनना ही पड़ेगा। इस देश की, मालूम होता है, यही व्यवस्था है, यही नियम है। याद आया, कल सारी दोपहरी-भर पीछे के बाँस के बन में दो पपीहों के उच्च गले की 'पिया पिया' पुकार की अविश्रान्त होड़ से मेरी दिवा-निन्द्रा में काफी विघ्न हुआ था; इस पर मेरी ही तरह क्षुब्ध हुआ कोई जल-काक नदी किनारे के वृक्ष पर और भी कठोर कण्ठ से बार-बार उनका तिरस्कार करके भी उन्हें चुप नहीं कर सका था। भाग्य अच्छा था कि इस देश में मोर नहीं है, नहीं तो उनके इस उत्सव के अखाड़े में आ पहुँचने पर तो मनुष्य टिक ही नहीं पाता। सो जो भी हो, दिन का उपद्रव अब भी शुरू नहीं हुआ था। शायद और भी थोड़ा-सा निर्विघ्न सो सकता किन्तु इसी समय गत रात्रि का संकल्प याद आ गया। परन्तु, अब चुपचाप खिसक चलने का भी मौका नहीं रहा, प्रहरियों की सतर्कता से काम बिगड़ चुका था। नाराज होकर बोला, ''मैं 'गोपाल' भी नहीं हूँ और मेरे बिछौने में लाल भी नहीं हैं। इस समय आधी रात को सोते से जगाने की भला कहो तो क्या जरूरत थी?''

वैष्णवी ने कहा, ''रात कहाँ है गुसाईं, तुम्हारी तो आज सुबह की गाड़ी से कलकत्ते जाने की बात थी! मुँह-हाथ धो लो, मैं चाय तैयार कर लाती हूँ। नहाना नहीं। आदत नहीं है, बीमार पड़ सकते हो।''

''हाँ, बीमार पड़ सकता हूँ। सुबह की गाड़ी से जब मेरी इच्छा होगी चला जाऊँगा, पर यह तो बताओ कि तुम्हें इस विषय में इतना उत्साह क्यों है?''

उसने कहा, ''और किसी के उठने के पहले मैं तुम्हें बड़े रास्ते तक पहुँचा जो आना चाहती हूँ गुसाईं।'' उसका चेहरा स्पष्टत: नहीं दिखाई दिया, पर बिखरे हुए बालों की ओर देखकर कमरे की इतनी कम रोशनी में भी यह जान गया कि वे गीले हैं, स्नान से निबटकर वैष्णवी तैयार हो गयी है।''

''मुझे पहुँचाकर फिर आश्रम में ही लौट आओगी न?''

वैष्णवी ने कहा, ''हाँ।''

रुपयों की उस छोटी-सी थैली को बिछौने पर रख उसने कहा, ''यह रहा तुम्हारा बैग। रास्ते में होशयारी रखना- रुपये एक बार देख लो।''

एकाएक कुछ कहने के लिए शब्द न सूझे। फिर कहा, ''कमललता, तुम्हारा इस रास्ते पर आना मिथ्या है। एक दिन तुम्हारा नाम था उषा, आज भी वही उषा हो- जरा भी नहीं बदल सकी हो।''

''क्यों, बताओ?''

''तुम भी कहो कि मुझसे रुपये गिनने के लिए क्यों कहा? गिन सकता हूँ यह क्या तुम सच समझती हो? जो सोचते कुछ और हैं और कहते कुछ और हैं उन्हें कपटी कहते हैं। जाने के पहले मैं बड़े गुसाईंजी से शिकायत कर जाऊँगा कि आश्रम के खाते से तुम्हारा नाम काट दें। तुम वैष्णव-दल के लिए कलंक हो।''

वह चुप रही। मैं भी क्षणभर मौन रहकर बोला, ''आज सुबह मेरी जाने की इच्छा नहीं है।'

''नहीं है? तो थोड़ी देर और सो लो। उठने पर मुझे खबर देना- क्यों?''

''पर तुम अभी क्या करोगी?''

''मुझे काम है। फूल चुनने जाऊँगी।''

''इस अन्धकार में? डर नहीं लगता?''

''नहीं, डर किसका? सुबह की पूजा के फूल मैं ही चुनकर लाती हूँ। नहीं तो उन लोगों की बड़ी तकलीफ होती है।''

'उन लोगों' के माने अन्यान्य वैष्णवियाँ। यहाँ दो दिन रहकर यह गौर कर रहा था कि सबकी आड़ में रहकर मठ का। समस्त गुरु-भार कमललता अकेली वहन करती है। सब व्यवस्थाओं में उसका कर्तृत्व है सबके ऊपर, किन्तु स्नेह से, सौजन्य से और सर्वोपरि सविनय कर्मकुशलता से यह कर्तृत्व इतनी सहज श्रृंखला में प्रवहमान है कि कहीं भी ईष्या-विद्वेष का जरा-सा भी मैल नहीं जमने पाता। यह सोचकर मुझे भी क्लेश हुआ कि यही आश्रम-लक्ष्मी आज उत्कण्ठ व्याकुलता के साथ जाऊँ-जाऊँ कर रही है। यह कितनी बड़ी दुर्घटना है, कितनी बड़ी निरुपाय दुर्गति में इतने निश्चिन्त नर-नारी गिर पड़ेंगे। इस मठ में सिर्फ दो दिन से हूँ, पर न जाने कैसा एक आकर्षण अनुभव कर रहा हूँ- ऐसा मनोभाव हो गया है कि मानो इसकी आन्तरिक शुभाकांक्षा चाहे बिना रह ही नहीं सकता। सोचा, लोग यह गलत कहते हैं कि सबको मिला कर आश्रम है और यहाँ सभी समान हैं। पर यह मानो ऑंखों के सामने ही देखने लगा कि इस एक के अभाव में केन्द्र भ्रष्ट उपग्रह की तरह समस्त आयतन ही दिशा-विदिशाओं में विच्छिन्न-विक्षित होकर टूट सकता है। कहा, ''और नहीं सोऊँगा कमललता, चलो तुम्हारे साथ चलकर फूल चुन लाऊँ।''

वैष्णवी ने कहा, ''तुमने स्नान नहीं किया है, कपड़े भी नहीं बदले हैं- तुम्हारे छुए हुए फूलों से पूजा होगी?''

मैंने कहा, ''फूल मत तोड़ने देना, पर डाल को नीचा कर पकड़ने तो दोगी? यह भी तुम्हारी सहायता होगी।''

वैष्णवी ने कहा, ''डाल नीची करने की जरूरत नहीं होती, छोटे-छोटे पेड़ हैं- मैं खुद ही कर लेती हूँ।''

कहा, ''कम-से-कम साथ रहकर सुख-दु:ख की दो-चार बातें तो कर सकूँगा?'' इसमें भी तुम्हारी मेहनत कम होगी।''

इस बार वैष्णवी हँसी। बोली, ''एकाएक इतना दर्द हो आया गुसाईं। अच्छा, चलो। मैं डलिया ले आऊँ, इतने में तुम हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लो।''

आश्रम के बाहर थोड़ी दूर पर फूलों का बगीचा है। घने छायादार आम्र-वन के भीतर से रास्ता है। सिर्फ अन्धकार के कारण ही नहीं बल्कि सूखे पत्तों के ढेरों के कारण पथ की रेखा विलुप्त हो गयी है। वैष्णवी आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे चला, तो डर लगने लगा कि कहीं साँप पर पैर न पड़ जाय।

कहा, ''कमललता, रास्ता तो नहीं भूलोगी?''

''नहीं, कम-से-कम आज तो तुम्हारे लिए रास्ता पहचानकर चलना पड़ेगा।''

''कमललता, एक अनुरोध रखोगी?''

''कौन-सा अनुरोध?''

''यहाँ से तुम और कहीं नहीं जाओगी।''

''जाने से तुम्हारा क्या नुकसान है?''

जवाब नहीं दे सका, चुप हो रहा।

''मुरारी ठाकुर ने कहा है कि ''हे सखी, अपने घर लौट जाओ, जिसने जीते हुए भी मर कर अपने को खो दिया है, उसे तुम अब क्या समझती हो?'' गुसाईं, शाम को तुम कलकत्ते चले जाओगे, और अब यहाँ शायद एक प्रहर से ज्यादा ठहर न सकोगे- क्यों?''

''क्या पता, पहले सुबह तो होने दो।''

वैष्णवी ने जवाब नहीं दिया, कुछ देर बाद गुनगुनाकर गाने लगी-

चण्डिदास कहे सुन विनोदिनी, सुख-दुख दोनों भाई।

सुख के कारण प्रीति करे जो, दुख भी ता ढिग आई

रुकने पर कहा, ''इसके बाद?''

''इसके बाद और नहीं याद।''

कहा, ''तो कुछ और गाओ-''

वैष्णवी ने वैसे ही मृदु स्वर में गाया...

चण्डिदास कहे सुन विनोदिनी, प्रीति को बात न भावै।

प्रीति के कारन प्रान गँवावै, आखिर प्रीति ही पावै

इस बार उसके रुकने पर बोला, ''इसके बाद?''

वैष्णवी ने जवाब दिया, ''इसके बाद और नहीं है, यहीं शेष है।''

इसमें शक नहीं कि शेष ही है। दोनों ही चुप हो रहे। बहुत इच्छा होने लगी कि द्रुतपदों से नज़दीक जाकर और कुछ कहकर इस अन्धकार-पथ पर उसका हाथ पकड़कर चलूँ। जानता हूँ कि वह नाराज नहीं होगी, बाधा नहीं देगी, पर किसी भी तरह पैर नहीं चले, मुँह से भी एक शब्द नहीं निकला। जैसे चल रहा था वैसे ही धीरे-धीरे चुपचाप जंगल के बाहर आ पहुँचा।

रास्ते के किनारे बाँसों के घेर से घिरा हुआ आश्रम का फूलों का एक बगीचा है। ठाकुरजी की दैनिक पूजा के लिए यहीं से फूल आते हैं। खुली हुई जगह में अन्धकार नहीं है पर उजाला भी उतना नहीं हुआ है। फिर भी देखा कि अगणित खिले हुए चमेली के फूलों से सारा बगीचा मानो सफेद हो रहा है। सामने के पत्तों झड़े हुए मुण्डे चम्पे के झाड़ में तो फूल नहीं हैं, परन्तु, उसके पास ही कहीं कुछ रजनीगन्धा के फूल असमय में फूल रहे हैं जिनकी मधुर गन्ध से उस त्रुटि की पूर्ति हो गयी है। और सबसे अधिक मन को लुभा लेनेवाला था बीच का हिस्सा। रात्रि के अन्त में इस धुँधले आलोक में पहचाने जाते थे एक दूसरे से भिड़े हुए झुण्ड के झुण्ड गुलाब के झाड़- जिनमें बेशुमार फूल थे और जो सहस्रों फैली हुई लाल ऑंखों से बगीचे की दिशाओं की ओर मानो ताक रहे थे। पहले कभी इतने सबेरे शय्या छोड़कर नहीं उठा था, यह समय हमेशा निद्राच्छन्न जड़ता की अचेतनता में कट जाता है। बता नहीं सकता कि आज कितना अच्छा लगा। पूर्व के रक्तिम दिगन्त में ज्योतिर्मय का आभास मिल रहा है, और उसकी नि:शब्द महिमा से सारा आकाश शान्त हो रहा है। यह लतिकाओं और पत्तों से, शोभा और सौरभ से और अगणित फूलों से परिव्याप्त सम्मुख का उपवन- सभी मिलकर ऐसा लगा कि जैसे यह रात्रि की समाप्तप्राय वाक्यहीन बिदा की अश्रुरुद्ध भाषा हो। करुणा, ममता और अयाचित दाक्षिण्य से मेरा समस्त अन्तर पलक मारते ही परिपूर्ण हो उठा, सहसा कह उठा, ''कमललता, जीवन में तुमने अनेक दु:ख-दर्द पाये हैं, प्रार्थना करता हूँ कि इस बार तुम सुखी होओ।''

वैष्णवी फूलों की डलिया को चम्पे की डाल पर लटका कर सामने की बाढ़ का दरवाजा खोल रही थी कि उसने आश्चर्य से लौटकर देखा और कहा, ''अचानक तुम्हें हो क्या गया गुसाईं?'' अपनी बातें अपने ही कानों में न जाने कैसी बेढंगी लग रही थीं, उस पर उसके सविस्मय प्रश्न से मन ही मन बहुत अप्रतिभ हो गया। कोई जवाब नहीं सूझा, लज्जा को ढकने के लिए एक अर्थहीन हँसी की चेष्टा भी ठीक तरह सफल नहीं हुई, अन्त में चुप हो रहा।

वैष्णवी ने भीतर प्रवेश किया, साथ ही मैंने भी। फूल तोड़ते हुए उसने खुद ही कहा, ''मैं सुख में ही हूँ गुसाईं। जिनके पाद-पद्मों में अपने को निवेदन कर दिया है वे दासी का कभी परित्याग नहीं करेंगे।''

सन्देह हुआ कि अर्थ काफी साफ नहीं है, पर यह कहने का साहस भी नहीं हुआ कि स्पष्ट करके कहो। वह मृदु स्वर से गुनगुनाने लगी-

गले में श्याम माणिकों की मंजु मालाएँ डालूँगी,

और कानों में नवकुण्डल, श्याम-गुण-यश के धारूँगी।

श्याम के ही अनुराग-रँगे, पीत पट सुन्दर पहनूँगी,

योगिनी बन करके बन बन, और पथ पथ पर भटकूँगी

कहे यदुनाथदास-

गीत रोकना पड़ा। कहा, ''यदुनाथदास को रहने दो, उधर झल्लीरी की आवाज सुन रही हो, लौटोगी नहीं?'' उसने मेरी ओर देखकर मृदु हास्य से फिर शुरू कर दिया-

धर्म औ कर्म सभी जावें, नहीं डरती हूँ मैं इससे।

कहीं इस चक्कर में पड़कर, हाथ धो बैठूँ प्रीतमसे

''अच्छा, नये गुसाईं, जानते हो कि बहुत से भले आदमी औरतों का गाना नहीं सुनना चाहते, उन्हें बहुत बुरा लगता है?''

मैंने कहा, ''जानता हूँ। किन्तु मैं उन 'भले बर्बरों' में नहीं हूँ।''

''तो बाधा डालकर मुझे रोका क्यों?''

''उधर तो शायद आरती शुरू हो गयी है- तुम्हारे न रहने से उसमें कमी रह जायेगी।''

''यह मिथ्या छलना है गुसाईं।''

''छलना क्यों है?''

''क्यों, सो तुम भी जानते हो। पर यह बात तुमसे कही किसने कि मेरे न रहने पर ठाकुरजी की सेवा में सचमुच ही कमी हो सकती है? इस पर क्या तुम विश्वास करते हो?''

''करता हूँ। मुझे किसी ने कहा नहीं कमललता, मैंने खुद अपनी ऑंखों से देखा है।''

उसने और कुछ नहीं कहा, न जाने कैसे अन्यमनस्क भाव से क्षणकाल तक वह मेरे मुँह की ओर ताकती रही और उसके बाद फूल तोड़ने लगी।

डलिया भर जाने पर बोली, ''बस, अब और नहीं।''

''गुलाब नहीं चुने?''

''नहीं, उन्हें हम नहीं तोड़तीं, यहीं से भगवान को निवेदन कर देती हैं। चलो, अब चलें।''

उजाला हो गया है। पर यह मठ ग्राम के एकान्त में है- इधर कोई ज्यादा आता-जाता नहीं, इसलिए तब भी वह पथ जन-हीन था और अब भी है। चलते-चलते एक बार फिर वही प्रश्न किया, ''तुम क्या सचमुच यहाँ से चली जाओगी?''

''बार-बार यह बात पूछने से तुम्हें क्या लाभ होगा गुसाईं?''

इस बार भी जवाब न दे सका, सिर्फ अपने आपसे पूछा, सच तो है, बार-बार यह बात क्यों पूछता हूँ? इससे मेरा लाभ?

मठ में लौटकर देखा कि इस बीच सभी लोग जाकर दैनिक कामों में लग गये हैं। उस वक्त झल्लरी की आवाज से व्यस्त होकर वृथा ही जल्दी मचाई थी। मालूम हुआ कि वह मंगल-आरती नहीं थी सिर्फ ठाकुरजी की निद्रा भंग करने का बाजा था। यह उन्हें ही सुहाता है।

 
हम दोनों को अनेकों ने देखा, पर किसी के भी देखने में कुतूहल नहीं था। कम-उम्र होने के कारण सिर्फ पद्मा एक बार मुस्कराई और फिर मुँह नीचा कर लिया। वह ठाकुरजी की माला गूँथती है। उसके पास डलिया रखकर कमललता ने सस्नेह कौतुक से तर्जन करके कहा, ''हँसी क्यों जलमुँही?''

किन्तु उसने मुँह ऊपर नहीं उठाया। कमललता ने ठाकुरजी के कमरे में प्रवेश किया, और मैं भी अपने कमरे में दाखिल हुआ।

स्नान और आहार यथारीति और यथासमय सम्पन्न हुआ। शाम की गाड़ी से मेरे जाने की बात थी। वैष्णवी को खोजने गया तो देखा कि वह ठाकुरजी के कमरे में है और उन्हें सजा रही है। मुझे देखते ही बोली, ''नये गुसाईं, यदि आए हो तो कुछ मेरी सहायता भी करो। पद्मा सिरदर्द लेकर पड़ी है और लक्ष्मी-सरस्वती दोनों बहिनों को एकाएक बुखार आ गया है, क्या होगा कुछ समझ में नहीं आता। वासन्ती रंग के इन दो कपड़ों में चुन्नट डाल दो न गुसाईं।''

अतएव ठाकुर के कपड़ों में चुन्नट डालने बैठ गया। उस दिन जाना न हो सका। दूसरे दिन भी नहीं और उसके बाद वाले दिन भी नहीं। मैं बड़े सबेरे वैष्णवी के फूल तोड़ने का साथी बन गया। प्रभात में, मधयाह्न में, संध्यान को-कुछ-कुछ काम वह मुझसे करा ही लेती है। इसी प्रकार स्वप्न की तरह दिन कटने लगे। सेवा में, सहृदयता में, आनन्द में, आराधना में, फूलों में, गन्ध में, कीर्तन में, पक्षियों के गान में- कहीं भी कोई छिद्र नहीं, फिर भी सन्दिन्ध मन बीच-बीच में सजग हो भर्त्सना कर उठता है कि यह क्या खिलावाड़ कर रहे हो? बाहर के सारे सम्बन्ध तोड़कर इन थोड़े से निर्जीव खिलौनों के पीछे यह कैसा पागलपन कर रहे हो? इतनी बड़ी आत्मवंचना में मनुष्य जीवित कैसे रहता है? फिर भी यह अच्छा लगता है, जाऊँ-जाऊँ करके भी पैर नहीं बढ़ा पाता। इस तरफ मलेरिया कम है, फिर भी इस समय अनेक लोग ज्वरग्रस्त हो रहे हैं। गौहर सिर्फ एक दिन आया था, फिर नहीं आया। उसकी खोज-खबर लेने का समय भी नहीं निकाल पाता! यह मेरी दशा अच्छी हुई!

सहसा मन भय और धिक्कार से भर गया- यह मैं कर क्या रहा हूँ? संगति-दोष से क्या एक दिन यह सब सत्य मान बैठूँगा? स्थिर किया, अब नहीं, चाहे कुछ भी क्यों न हो, कल यह जगह छोड़कर मुझे भागना ही पड़ेगा।

हर रोज रात के अन्त में वैष्णवी आकर जगा देती है। प्रभाती के स्वर में वैष्णव कवियों का नींद उड़ा देने वाला वह गीत भक्ति और प्रेम का कितना सकरुण आवेदन होता है! हठात् उत्तर नहीं देता, कान लगाकर सुनता रहता हूँ। ऑंखों के कोनों में ऑंसू आ जाना चाहते हैं। मसहरी उठाकर जब वह खिड़की और दरवाजा खोल देती है तब नाराज होकर उठ बैठता हूँ, और मुँह धो कपड़े बदलकर साथ चल देता हूँ।

कई दिनों की आदत की वजह से आज अपने आप ही नींद खुल गयी। कमरे में अन्धकार है। एक बार ऐसा लगा कि रात अभी खत्म नहीं हुई है, परन्तु फिर सन्देह हुआ। बिछौना छोड़कर बाहर आया- देखता हूँ कि रात कहाँ है, सबेरा हो गया है। किसी के खबर देते ही कमललता आकर खड़ी हो गयी। उसका ऐसा अस्नात प्रस्तुत चेहरा इसके पहले नहीं देखा था।

डर से पूछा, ''तुम्हारी तबियत क्या अच्छी नहीं है?''

उसने म्लान हँसी हँसकर कहा, ''गुसाईं, आज तुम जीत गये।''

''बताओ, कैसे?''

''तबियत आज वैसी अच्छी नहीं, वक्त पर नहीं उठ सकी।''

''तो आज फूल तोड़ने कौन गया?''

ऑंगन के एक ओर एक अधमरे तगर के पेड़ में कुछ थोड़े से फूल लगे थे, उन्हीं को दिखाकर बोली, ''इस वक्त तो किसी तरह इन्हीं से काम चला जायेगा।''

''पर ठाकुर के गले की माला?''

''माला आज न पहना सकूँगी।''

सुनकर मन न जाने कैसा हो गया- उन्हीं निर्जीव खिलौनों के लिए! कहा, ''नहाकर मैं तोड़ लाता हूँ।''

''तो जाओ, पर इतने सबेरे नहा नहीं सकोगे। बीमार पड़ जाओगे।''

''बड़े गुसाईंजी नहीं दिखाई देते?''

वैष्णवी ने कहा, ''वे तो यहाँ हैं नहीं, परसों अपने गुरुदेव से मिलने नवद्वीप गये हैं।''

''कब लौटेंगे?''

''यह तो पता नहीं गुसाईं।''

इतने दिनों से मठ में रहते हुए भी बैरागी द्वारिकादास के साथ घनिष्ठता नहीं हुई, कुछ तो मेरे अपने दोष से और कुछ उनके निर्लिप्त स्वभाव के कारण। वैष्णवी के मुँह से सुनकर और अपनी ऑंखों से देखकर जान गया हूँ कि इस आदमी में न कपट है, न अनाचार और न मास्टरी करने का चाव। उनका अधिकांश समय अपने निर्जन कमरे में वैष्णव धर्म-ग्रन्थों के साथ व्यतीत होता है। इन लोगों के धर्म-मत पर न मेरी आस्था है, न विश्वास। पर इस व्यक्ति की बातें इतनी नम्र, देखने की भंगी इतनी स्वच्छ, गम्भीर तथा विश्वास और निष्ठा से अहर्निश ऐसी भरपूर रहती है कि उनके मत और पथ के विरुद्ध आलोचना करने में सिर्फ संकोच ही नहीं बल्कि दु:ख होता है। अपने आप ही यह समझ में आ जाता हैं कि यहाँ तर्क करना। बिल्कुसल निष्फल है। एक दिन एक मामूली-सी दलील करने पर वे मुस्कुराते हुए इस तरह चुपचाप देखते रह गये कि कुंठा के मारे मेरे मुँह से और शब्द ही न निकले। उसके बाद से ही मैं यथासाध्यै उनसे बचकर चला हूँ। फिर भी एक कुतूहल बना रहा। इच्छा थी कि जाने के पहले इतनी नारियों से घिरे रहने पर भी, निरविच्छिन्न रस के अनुशीलना में निमग्न रहने पर भी, चित्त की शान्ति और देह की निर्मलता को अक्षुण्ण बनाए रखने का रहस्य उनसे पूछ जाऊँगा। पर वह सुयोग इस यात्रा में अब शायद नहीं मिलेगा। मन ही मन सोचा कि फिर कभी यदि आना हुआ, तो देखा जायेगा।

वैष्णवों के मठों में भी ठाकुरजी की मूर्ति को आमतौर ब्राह्मण के अलावा और कोई स्पर्श नहीं कर सकता, पर हम आश्रम में यह रीति नहीं है। ठाकुर का एक वैष्णव पुजारी बाहर रहता है, आज भी वह आकर यथारीति पूजा कर गया। पर ठाकुर की सेवा का भार आज बहुत कुछ मुझ पर आ पड़ा। वैष्णवी बतलाती जाती है और मैं सब काम करता जाता हूँ, पर रह-रहकर सारा हृदय तिक्त हो उठता है। मुझ पर यह क्या पागलपन सवार हो रहा है! आज भी जाना बन्द रहा। अपने को शायद यह कहकर समझाया कि जब इतने दिनों से यहाँ हूँ, तब इस विपत्ति के समय इन लोगों को कैसे छोड़ जाऊँ? संसार में कृतज्ञता नाम की भी तो कोई चीज है।

और भी दो दिन कट गये, किन्तु अब और नहीं। कमललता स्वस्थ हो गयी है, पद्मा और लक्ष्मी-सरस्वती दोनों बहिनों की तबीयत भी ठीक हो गयी है। द्वारिका दास कल शाम को लौट आये हैं, उनसे बिदा माँगने गया। गुसाईंजी ने कहा, ''आज जाओगे गुसाईं? अब कब आओगे?''

''यह तो नहीं जानता गुसाईंजी।''

''लेकिन कमललता तो रो-रोकर अधमरी हो जायेगी।''

यह जानकर मन ही मन बहुत बिगड़ा कि इनके कानों में भी हमारी बात पहुँच गयी है। कहा, ''वह क्यों रोने लगी?''

गुसाईंजी ने जरा हँसकर कहा, ''शायद तुम नहीं जानते?''

''नहीं।''

''उसका स्वभाव ही ऐसा है। किसी के चले जाने पर वह शोक में अधमरी हो जाती है।''

यह बात और भी बुरी लगी। कहा, ''जिसकी आदत ही शोक करने की है वह तो करेगा ही। मैं उसे रोक कैसे सकता हूँ?'' पर यह कहा और उनकी ऑंखों की तरफ देखकर मुँह फेरा ही था कि देखा, मेरे पीछे कमललता खड़ी है।

द्वारिकादास ने कुण्ठित स्वर में कहा, ''उस पर नाराज होना गुसाईं, सुना है कि ये सब तुम्हारी सेवा नहीं कर सकीं और बीमार पड़कर तुमसे बहुत काम लिया, अनेक कष्ट भी दिये। यह कल मुझसे इसके लिए स्वयं ही दु:ख प्रकट कर रही थी। और फिर वैष्णव-बैरागियों के पास सेवा-सत्कार करने लायक है ही क्या। किन्तु अगर कभी तुम्हारा यहाँ आना हो तो भिखारियों को दर्शन दे जाना। दे जाओगे न गुसाईं?''

सिर हिलाकर बाहर निकला आया, कमललता वहीं पर वैसी ही खड़ी रही। पर अकस्मात् यह क्या हो गया! बिदा लेने के वक्त न जाने कितना क्या कहने और सुनने की कल्पना कर रक्खी थी!- सब नष्ट कर दी। अनुभव कर रहा था कि चित्त की दुर्बलता की ग्लानि अन्तर में धीरे-धीरे संचित हो रही है, किन्तु स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि झुँझलाया हुआ असहिष्णु मन ऐसी अशोभन रुक्षता से अपनी मर्यादा नष्ट कर बैठेगा!

नवीन आ पहुँचा। वह गौहर की तलाश में आया है, क्योंकि, वह कल से अब तक घर नहीं लौटा है। बड़ा अचरज हुआ, ''यह क्या नवीन, वह तो यहाँ भी अब नहीं आता?''

नवीन विशेष विचलित न हुआ। बोला, ''तो किसी बन-जंगल में घूम रहे होंगे, नहाना-खाना बन्द कर दिया है, अब कहीं साँप के काटने की खबर मिलेगी तो निश्चिन्त हुआ जायेगा।''

''पर नवीन, उसकी तलाश करना तो जरूरी है।''

''मालूम है कि जरूरी है, पर तलाश कहाँ करूँ? बाबू, जंगल में घूम घूमकर मैं अपनी जान तो दे नहीं सकता! पर वे कहाँ हैं? एक बार उनसे और पूँछ लूँ।''

'' 'वे' कौन?''

''वही कमललता।''

''पर उसे क्या मालूम होगा नवीन?''

''वे नहीं जानती? सब जानती हैं।''

और ज्यादा बहस न करके मैं उत्तेजित नवीन को मठ के बाहर ले आया। कहा, ''वास्तव में नवीन, कमललता कुछ नहीं जानती। खुद बीमार होने के कारण वह तीन चार दिन से अखाड़े के बाहर भी नहीं निकली।''

नवीन ने विश्वास नहीं किया। नाराज होकर कहा, ''नहीं जानती? वह सब जानती है। वैष्णवी कौन-सा मन्तर नहीं जानती? वह क्या नहीं कर सकती? यदि कहीं वह नवीन के पल्ले पड़ी होती तो उसका ऑंख-मुँह मटकाना और कीर्तन करना सब बाहर निकाल देता। लौंडे ने बाप के इतने रुपये पैसे मानो जादू से उड़ा दिये!''

उसे शान्त करने के लिए कहा, ''कमललता रुपये लेकर क्या करेगी, नवीन? वैष्णवी है; मठ में रहती है, गाना गाकर, भीख माँगकर ठाकुर-देवता की सेवा करती है। दो दफे दो मुट्ठी खाती ही तो है और क्या! इसलिए मुझे तो ऐसा नहीं लगा कि वह रुपयों की भिखारिनी है नवीन!''

नवीन कुछ ठण्डा होकर बोला, ''अपने लिए नहीं-यह तो हम भी जानते हैं। देखने में भी वह भले घर की लड़की जैसी लगती है। वैसा ही चेहरा और वैसी ही बातचीत। बड़े बाबाजी भी लोभी नहीं हैं, पर उन्होंने वैष्ण्वियों का पूरा एक झुण्ड का झुण्ड जो पाल रक्खा है! ठाकुर-सेवा के नाम पर उन लोगों को हुलुआ-पूड़ी और दूध-घी रोज जो चाहिए! नयन चाँद चक्रवर्ती के मुँह पर घुसफुस सुनी है कि अखाड़े के नाम बीस बीघा ज़मीन खरीदी गयी है! कुछ भी नहीं रहेगा बाबू, जो कुछ है सब एक दिन बैरागियों के पेट में चला जायेगा।''

कहा, ''पर यह अफवाह शायद सच नहीं है। और तुम्हारा वह नयन चक्रवर्ती भी तो कम नहीं है!''

नवीन ने फौरन स्वीकार कर कहा, ''यह ठीक है। वह धूर्त ब्राह्मण बड़ा झाँसेबाज है। पर कहिए, विश्वास कैसे न करूँ? उस दिन खामख्वाह मेरे ही लड़के के नाम दस बीघा ज़मीन दान कर दी। बहुत मना किया पर नहीं सुना। मानता हूँ कि बाप बहुत रख गया है, पर बाबू, इस तरह बाँटने से कितने दिन चलेगा? एक दिन क्या कहा, जानते हैं? कहा, हम फकीर के वंश के हैं, फकीरी तो हमसे कोई छीन नहीं लेगा? लीजिए, सुनिए इनकी बातें!''

नवीन चला गया। एक बात पर ध्यानन गया। यह उसने एक बार भी न पूछा कि मैं किसलिए इतने दिनों से मठ में पड़ा हुआ हूँ। नहीं जानता कि पूछता तो मैं क्या कहता, पर मन ही मन शर्मिन्दा हुआ। उससे ही और एक खबर मिली कि कालिदास बाबू के लड़के का ब्याह कल धूमधाम से हो गया। सत्ताईस तारीख का मुझे खयाल ही न रहा।

नवीन की बातों पर मन ही मन विचार करते-करते अकस्मात विद्युत-वेग से एक सन्देह उठ खड़ा हुआ- वैष्णवी किसलिए चली जाना चाहती है? कहीं उस मोटी भौंहों वाले कुरूप आदमी के डर से तो नहीं, जो कण्ठी बदलकर पाये हुए पतित्व का दावा करता है? और यह गौहर? मेरे यहाँ रहने के सम्बन्ध में ही शायद इसीलिए वैष्णवी ने इस दिन सकौतुक कहा था कि गुसाईं, मैं अगर तुम्हें पकड़कर रखे रहूँ तो वे नाराज़ नहीं होंगे। नाराज होनेवाले आदमी वे नहीं हैं। पर अब वह क्यों नहीं आता? उसने अपने मन ही मन न जाने क्या सोच लिया है। संसार में गौहर की आसक्ति नहीं है, अपना कहने को भी कोई नहीं है। रुपया-पैसा, धन-दौलत तो उसके लिए ऐसे हैं मानो उन्हें लुटा देने पर ही उसे चैन मिलेगी। प्रेम अगर उसने किया भी हो तो इस डर से वह मुँह खोलकर शायद किसी दिन कहेगा भी नहीं कि कहीं पीछे किसी अपराध का स्पर्श न हो जाए। वैष्णवी यह जानती है। उस अनतिक्रम्य बाधा से चिर-निरुद्ध प्रणय के निष्फल चित्त-दाह से इस शान्त और स्वयं को भूले हुए मनुष्य को बचाने के लिए ही शायद वह यहाँ से भाग जाना चाहती है। नवीन चला गया है और मैं बकुल के नीचे बैठकर उस टूटी वेदी के ऊपर अकेला बैठा हुआ सोच रहा हूँ। घड़ी खोलकर देखी। यदि पाँच बजे की ट्रेन पकड़ना है तो अब और देर नहीं की जा सकती। पर हर रोज न जाना ही इस तरह आदत में दाखिल हो गया था कि जल्दी से उठकर चल देने के लिए आज भी मन पीछे हटने लगा।

चाहे जहाँ भी रहूँ, पूँटू के बहू-भात के समय पहुँचकर अन्न ग्रहण करने का वादा किया था और भागे हुए गौहर को खोज लाना मेरा कर्त्तव्य है। इतने दिनों तक अनावश्यक अनुरोध बहुत माने हैं, पर आज जब सच्चा कारण विद्यमान है तब मान्य करने को कोई नहीं। देखा, पद्मा आ रही है। करीब आकर बोली, ''तुम्हें एक बार दीदी बुला रही हैं, गुसाईं।''

फिर लौट आया। ऑंगन में खड़े होकर वैष्णवी ने कहा, ''कलकत्ते पहुँचने में तुम्हें रात हो जायेगी, नये गुसाईं। ठाकुरजी का थोड़ा-सा प्रसाद सजा रक्खा है, कमरे में आओ।''

रोज की तरह सावधानी से तैयारी की गयी थी। बैठ गया। यहाँ खाने के लिए मनाने और जोर डालने की प्रथा नहीं है, आवश्यक होने पर माँग लेना होता है। बाकी नहीं छोड़ा जाता।

जाने के वक्त वैष्णवी ने कहा, ''नये गुसाईं, फिर आओ न?''

''तुम रहोगी न?''

''तुम बताओ, मुझे कितने दिन तक रहना होगा?''

''तुम ही बताओ कि कितने दिनों बाद मुझे यहाँ आना होगा?''

''नहीं, यह मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।''

''न बताओ, पर एक दूसरी बात का जवाब दोगी, बोली?''

इस बार वैष्णवी ने जरा हँसकर कहा, ''नहीं, वह भी मैं न दूँगी। इस समय तुम्हारी जो इच्छा हो सोच लो गुसाईं, एक दिन अपने आप ही उसका जवाब मिल जाएगा।''

कई बार इन शब्दों ने जबान पर आना चाहा, कि अब तो वक्त नहीं है कमललता, कल जाऊँगा- पर किसी भी तरह कह नहीं पाया। यही कहा कि ''जाता हूँ।''

पद्मा निकट आकर खड़ी हो गयी। कमललता की देखा देखी उसने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया। वैष्णवी ने उससे नाराज होकर कहा, ''हाथ जोड़कर नमस्कार क्या करती है जलमुँही, पैरों की धूल लेकर प्रणाम कर।''

इस बात से मानो मैं चौंक पड़ा। उसके मुँह की ओर नजर करते ही देखा कि उसने दूसरी ओर मुँह फेर लिया है। तब और कुछ न कहकर मैं उनका आश्रम छोड़कर बाहर चल दिया।

आज बे-वक्त कलकत्ते पहुँचने के लिए निकल पड़ा। उसके बाद इससे भी ज्यादा दुखमय है बर्मा का निर्वासन। वहाँ से लौटकर आने का शायद समय भी न होगा और प्रयोजन भी न होगा। शायद यह जाना ही अन्तिम जाना हो। गिनकर देखा, दस दिन बाकी हैं। दस दिन जीवन के लिहाज कितने से हैं! तथापि, मन में संदेह नहीं रहा कि दस दिन पहले जो यहाँ आया था और आज जो बिदा लेकर जा रहा है, दोनों एक नहीं हैं।

बहुतों को खेद के साथ कहते हुए सुना है कि यह किसने सोचा था अमुक व्यक्ति ऐसा हो जायेगा- अर्थात्, अमुक का जीवन मानो सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण की तरह उसके अनुमान के पंचांग में ठीक-ठीक गिनकर लिखा हुआ है, उसका ठीक न मिलना सिर्फ अचिन्त्य ही नहीं, अयुक्त भी है- मानो उनकी बुद्धि के हिसाब-किताब के बाहर दुनिया में और कुछ है ही नहीं। वे नहीं जानते कि संसार में केवल विभिन्न मनुष्य ही नहीं हैं, बल्कि इसका पता लगाना भी कठिन है कि एक-एक मनुष्य भी कितने विभिन्न मनुष्यों के रूप में रूपान्तरित हो जाता है- यहाँ पर एक क्षण भी तीक्ष्णता और तीव्रता में समस्त जीवन को अतिक्रम कर सकता है।

× × × ×

सीधा रास्ता छोड़कर वन-जंगलों में से इस उस रास्ते चक्कर लगाता हुआ स्टेशन जा रहा था- बहुत कुछ उसी तरह जिस तरह बचपन में पाठशाला को जाया करता था। ट्रेन का वक्त नहीं जानता, उसकी जल्दी भी नहीं है,- सिर्फ यह जानता हूँ कि वहाँ पहुँचने पर कोई न कोई ट्रेन, जब भी मिले, मिल ही जायेगी। चलते-चलते एकाएक ऐसा लगा कि सब रास्ते जैसे पहचाने हुए हैं, मानो कितने दिनों तक कितनी बार इन रास्तों से आया गया हूँ! पहले वे बड़े थे, अब न जाने क्यों संकीर्ण और छोटे हो गये हैं। अरे यह क्या, यह तो खाँ- लोगों का हत्यारा बाग है! अरे, वही तो है! और यह तो मैं अपने ही गाँव के दक्षिण के मुहल्ले के किनारे से जा रहा हूँ। उसने न जाने कब शूल की व्यथा के मारे इस इमली के पेड़ की ऊपर की डाल में रस्सी बाँधकर आत्महत्या कर ली थी। की थी या नहीं, नहीं जानता, पर प्राय: और सब गाँवों की तरह यहाँ भी यह जनश्रुति है। पेड़ रास्ते के किनारे है, बचपन में इस पर नज़र पड़ते ही शरीर में काँटे उठ आते थे, ऑंखें बन्द करके एक ही दौड़ में इस स्थान को पास कर जाना पड़ता था।

पेड़ वैसा ही है। उस वक्त ऐसा लगता था कि इस हत्यारे पेड़ का धड़ मानो पहाड़ की तरह है और माथा आकाश से जाकर टकरा रहा है। परन्तु आज देखा कि उस बेचारे में गर्व करने लायक कुछ नहीं है, और जैसे अन्य इमली के पेड़ होते हैं वैसा ही है। जनहीन ग्राम के एक ओर एकाकी नि:शब्द खड़ा है। शैशव में जिसने काफी डराया है, आज बहुत वर्षों बाद के प्रथम साक्षात् में उसी ने मानों बन्धु की तरह ऑंख मिचकाकर मजाक किया, कहो मेरे बन्धु, कैसे हो, डर तो नहीं लगता?

मैंने पास जाकर परम स्नेह के साथ उसके शरीर पर हाथ फेरा। मन ही मन कहा, अच्छा ही हूँ भाई। डर क्यों लगेगा, तुम तो मेरे बचपन के पड़ौसी हो- मेरे आत्मीय!

संध्याप का प्रकाश बुझता जा रहा था। मैंने बिदा लेते हुए कहा, भाग्य अच्छा था जो अचानक मुलाकात हो गयी, अब जाता हूँ बन्धु!

श्रेणीबद्ध बहुत से बगीचों के बाद जरा खुली जगह है। अन्यमनस्क होता तो इसे भी पार कर जाता, किन्तु सहसा अनेक दिनों की भूली हुई-सी परन्तु परिचित एक बहुत ही सुन्दर मीठी गन्ध से चौंक पड़ा-इधर-उधर निहारते ही नजर पड़ गयी- वाह! यह तो हमारी उसी यशोदा वैष्णवी के आऊस फूलों की गन्ध है! बचपन में इनके लिए यशोदा की कितनी आरजू-मिन्नत नहीं की थी? इस जाति का पेड़ इधर नहीं होता, क्या मालूम कहाँ से लाकर उसने इसको अपने ऑंगन के एक कोने में लगाया था। टेढ़ी-मेढ़ी और गाँठोंवाली, बूढ़े आदमी जैसी उसकी शकल थी। उस दिन की तरह आज भी उसकी वही एकमात्र सजीव शाखा है और ऊपर के कुछ थोड़े से हरे पत्तों के बीच वैसे ही थोड़े से कुछ सफेद फूल हैं। इसके नीचे यशोदा के स्वामी की समाधि थी। वैष्णव ठाकुर को हमने नहीं देखा था, हमारे जन्म के पहले वे स्वर्गधाम सिधार चुके थे। उनकी छोटी-मनिहारी की दुकान तब उनकी विधवा ही चलाती थी। दुकान तो नहीं थी, पर एक डलिया में यशोदा छोटी-छोटी आरसियाँ, कंघियाँ, नारे, महावर, तेल के मसाले, काँच के खिलौने, टीन की वंशी इत्यादि भरकर घर-घर घूमकर बेचा करती थी। इसके सिवाय उसके पास मछली पकड़ने का सामान भी रहता था- अधिक नहीं, एक-एक दो-दो पैसे की डोरियाँ और काँटे। इन्हें खरीदने जब हम उसके घर जाते, तो बहुत धूम मचाते। इस आऊस के पेड़ की एक सूखी डाल पर बनाए हुए मिट्टी के आले पर यशोदा संध्याम के समय दीपक जलाती थी और फूलों के लिए उपद्रव करने पर वह हमें समाधि दिखाकर कहती, ''नहीं बच्चों, ये मेरे देवता के फूल हैं, तोड़ने पर नाराज होंगे।''

वैष्णवी अब नहीं है, पता नहीं कि वह कब मर गयी, शायद बहुत दिन नहीं हुए। पेड़ के एक किनारे और एक छोटे चबूतरे पर नज़र पड़ी, शायद यह यशोदा की समाधि होगी। बहुत सम्भव है कि सुदीर्घ प्रतीक्षा के बाद उसने भी पति के पास ही अपने लिए थोड़ा-सा स्थान कर लिया हो। स्तूप की खुदी हुई मिट्टी ज्यादा उर्ब्वर हो जाने के कारण बिच्छू खूब हो गये हैं और पेड़ को चमगीदड़ों ने छा दिया है- सँभालने वाला कोई नहीं है।

रास्ता छोड़कर शैशव के उस परिचित बूढ़े पेड़ के पास जाकर खड़ा हो गया। देखा कि शाम को जलने वाला वह दीपक नीचे पड़ा है और उसके ऊपर की वह सूखी डाल आज भी वैसी ही तेल से काली हो रही है।

यशोदा का छोटा-सा घर अभी तक पूरी तरह ढहा नहीं है- सहस्र-छिद्रमय और जीर्ण-शीर्ण फूस का छप्पर दरवाजे को ढककर औंधा पड़ा हुआ आज भी प्राणपण से रक्षा कर रहा है।

बीस-पच्चीस वर्ष पहले की न जाने कितनी बातें याद आ गयीं- बाँसों के घेर से घिरा हुआ लिपा-पुता यशोदा का ऑंगन, और वही छोटा-सा कमरा। उसकी आज यह दशा है! पर इससे भी बहुत ज्यादा एक करुण वस्तु अब भी देखने को बाकी थी। अकस्मात् देखा कि उसी घर के टूटे छप्पर के नीचे से एक कंकाल-शेष कुत्ता बाहर निकला। मेरे पैरों की आवाज से चकित होकर शायद उसने मेरे अनधिकार-प्रवेश का प्रतिवाद करना चाहा। पर उसकी आवाज इतनी क्षीण थी कि उसके मुँह में ही रह गयी।

कहा, ''क्यों रे, मैंने अपराध तो नहीं किया?''

उसने मेरे मुँह की ओर देखकर न जाने क्या सोचा और फिर पूँछ हिलाना शुरू कर दिया। मैंने कहा, ''अब भी तू यहीं है?''

उसने प्रत्युत्तर में सिर्फ दोनों मलिन ऑंखें खोलकर अत्यन्त निरुपाय की तरह मेरे मुँह की तरफ देखा।

इसमें शक नहीं कि यह यशोदा का कुत्ता है। फूलदार रंगीन किनारी का गल-पट्टा अब भी उसके गले में है। मैं समझ ही न सका कि उस नि:सन्तान रमणी के एकान्त स्नेह का धन यह कुत्ता आज भी इस परित्यक्त कुटी में क्या खाकर जीवित है। मुहल्लों में जाकर छीन झपट कर खाने का जोर तो उसमें है नहीं, आदत भी नहीं है, और स्वजाति के साथ मेल रखने की शिक्षा भी उसे नहीं मिली। लिहाजा भूखा और अधभूखा रहकर यहीं पड़ा पड़ा बेचारा शायद उसी की राह देख रहा है, जो उसको एक दिन प्यार करती थी। सोचता होगा कि कहीं न कहीं गयी है, एक न एक दिन लौटकर आयेगी ही। मन ही मन कहा, यही क्या ऐसा है? इस प्रत्याशा को बिल्कुदल ही पोंछ डालना संसार में क्या इतना आसान है?

जाने के पहले छप्पर की सैंध में से एक बार भीतर की ओर दृष्टि डाली। अन्धकार में और तो कुछ भी दिखाई न पड़ा, दीवार पर चिपकी हुई कुछ तसवीरें नजर आ गयी। राजा रानी से लेकर नाना जाति के देवी-देवताओं तक की तसवीरें हैं। कपड़े के नये थानों में से निहाल निकाल कर यशोदा इन्हें संग्रह करती थी और इस तरह वह अपना तस्वीरों का शौक मिटाती थी। याद आया कि बचपन में इनको अनेक बार मुग्ध दृष्टि से देखा है। बारिश से भीगकर, दीवार की मिट्टी से बिगड़ कर, ये आज भी किसी तरह टिकी हुई हैं।

और पड़ी हुई पास के ही छींके पर वैसी ही दुर्दशा में वह रंगीन हँड़िय जिसे देखते ही मुझे यह बात याद आ गयी कि इसमें उसके आलते के बंडल रहते थे। और भी इधर-उधर क्या-क्या पड़ा था, अन्धकार में पता नहीं पड़ा। वे सब चीजें मिलकर प्राणपण से मुझे न जाने किस बात का इंगित करने लगीं, पर उस भाषा से मैं अनजान था। कुछ ऐसा लगा कि मकान के एक कोने में मानो किसी मृत शिशु का खिलौना-घर है। घर-गृहस्थी की नाना टूटी-फूटी चीजों से यत्नपूर्वक सजाए हुए इस क्षुद्र संसार को वह छोड़ नया है। आज उन चीजों का आदर नहीं है, प्रयोजन भी नहीं, ऑंचल से बार-बार झाड़ने-पोंछने की जरूरत भी नहीं-पड़ा हुआ है सिर्फ जंजाल, इसलिए कि किसी ने उसे मुक्त नहीं किया है।

वह कुत्ता कुछ देर तक साथ-साथ आया और ठहर गया। जब तक दिखाई पड़ा तब तक बेचारा इस ओर टकटकी लगाये खड़ा देखता रहा है। उसके साथ का यह परिचय प्रथम भी है, और अन्तिम भी। फिर भी वह कुछ आगे बढ़कर बिदा देने आया है। मैं जा रहा हूँ किसी बन्धुहीन, लक्ष्यहीन प्रवास के लिए, और वह लौट जायेगा अपने अन्धकारपूर्ण निराले टूटे हुए मकान में! दोनों के ही संसार में ऐसा कोई नहीं है जो राह देखते हुए प्रतीक्षा कर रहा हो!

बगीचे के पार ही जाने पर वह ऑंखों से ओझल हो गया, परन्तु पाँच ही मिनट के इस अभागे साथी के लिए हृदय भीतर ही भीतर रो उठा, ऐसी दशा हो गयी कि ऑंखों के ऑंसू न रोक सका।

चलते-चलते सोच रहा था कि ऐसा क्यों होता है? और किसी दिन यह सब देखता तो शायद कुछ विशेष खयाल न आता, पर आज मेरा हृदयाकाश मेघों के भार से भारातुर हो रहा है- जो उन लोगों के दु:ख की हवा से सैकड़ों धाराओं में बरस पड़ना चाहते हैं।

स्टेशन पहुँच गया। भाग्य अच्छा था, उसी वक्त गाड़ी मिल गयी, कलकत्ते के निवास-स्थान पर पहुँचने तक ज्यादा रात न होगी। टिकट खरीद कर बैठ गया और उसने सीटी देकर यात्रा शुरू कर दी। स्टेशन के प्रति उसे मोह नहीं, सजल ऑंखों से बार-बार घूमकर देखने की उसे जरूरत नहीं।

फिर वही याद आयी- मनुष्य के जीवन में दस दिन कितने-से हैं; फिर भी कितने बड़े हैं!

कल सुबह कमललता अकेली ही फूल तोड़ने जावेगी और उसके बाद उसकी सारे दिन चलने वाली देव-सेवा शुरू हो जायेगी! क्या मालूम, दस दिन के साथी नये गुसाईं को भूलने में उसे कितने दिन लगे।

उस दिन उसने कहा था, ''सुख से ही तो हूँ गुसाईं। जिनके पाद-पद्मों पर अपने-आपको निवेदन कर दिया है वे दासी का कभी परित्याग नहीं करेंगे।'' सो, यही हो। ऐसी ही हो।

बचपन से ही मेरे जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, बलपूर्वक किसी भी चीज की कामना करना मैं नहीं जानता- सुख-दु:ख सम्बन्धी मेरी धारणा भी अलग है। तथापि इतनी उम्र कट गयी सिर्फ दूसरों का अनुकरण करने में-दूसरों के विश्वास पर और दूसरों का हुक्म तामील करने में। इसलिए कोई भी काम मेरे द्वारा अच्छी तरह निर्वाहित नहीं होता। दुबिधा से दुर्बल मेरे सारे संकल्प और सारे उद्योग थोड़ी ही दूर चलते हैं और ठोकर खाकर रास्ते में ही चूर-चूर हो जाते हैं; तब सभी कहने लगते हैं, ''आलसी है, किसी काम का नहीं।'' शायद इसीलिए उन निकम्मे बैरागियों के अखाड़े में ही मेरा अन्तरवासी अपरिचित बन्धु अस्फुट छाया-रूप में मुझे दर्शन दे गया, मैंने बार-बार नाराज होकर मुँह फिरा लिया और उसने बार-बार स्मित हास्य से हाथ हिला-हिलाकर न जाने क्या इशारा किया।

और वह वैष्णवी कमललता! उसका जीवन मानों प्राचीन वैष्णव कवि चित्तों के ऑंसुओं का गीत है। छन्दों में मेल नहीं, व्याकरण में भूलें हैं, भाषा में भी अनेक त्रुटियाँ हैं, पर उसका विचार तो उस ओर से नहीं किया जा सकता। मानो उसी का दिया हुआ कीर्तन का सुर है- जिसके मर्म में पैठता है, उसे ही उसका पता चलता है। वह मानो गोधूलि के आकाश की रंगबिरंगी तसवीर है। उसका नाम नहीं, संज्ञा नहीं-कलाशास्त्र के सूत्रों के अनुसार उसका परिचय देना भी विडम्बना है।

मुझसे कहा था, ''चलो न गुसाईं, यहाँ से चल दें, गीत गाते गाते पथ ही पथ पर दोनों के दिन कट जायेंगे।''

उसे कहने में तो कुछ नहीं लगा, पर वह मुझे खटका। मेरा नाम रक्खा है उसने 'नये गुसाईं।'' कहा, ''असल नाम तो मैं मुँह से निकाल नहीं सकती गुसाईं।'' उसका विश्वास है कि मैं उसके विगत-जीवन का बन्धु हूँ। मुझसे उसे डर नहीं, मेरे पास रहते हुए उसकी साधना में विघ्न नहीं आ सकता। वैरागी द्वारिकादास की वह शिष्या है, मालूम नहीं उन्होंने उसे किस साधना से सिद्धि-लाभ करने का मन्त्र दिया है।

एकाएक राजलक्ष्मी की याद आ गयी और उसकी उस कठोर चिट्ठी का खयाल आ गया जो स्नेह और स्वार्थ के मिश्रण से भरी हुई थी। तो भी जानता हूँ कि इस जीवन के पूर्व विराम पर वह मेरे लिए शेष हो गयी है। शायद यह अच्छा ही हुआ है। किन्तु उस शून्यता को भरने के लिए क्या कहीं भी कोई है? खिड़की के बाहर अन्धकार को ताकता हुआ चुपचाप बैठा रहा। एक-एक करके न जाने कितनी बातें और कितनी घटनाएँ याद आ गयीं। शिकार के आयोजन के लिए खड़ा किया हुआ कुमार साहब का वह तम्बू, वह दल-बल और अनेक वर्षों के बाद प्रवास में उस प्रथम साक्षात् के दिन की दीप्त काली ऑंखों में उसकी वह विस्मय-विमुग्ध दृष्टि! जिसे जानता था कि मर गयी है, जिसे पहिचान नहीं सका- उस दिन श्मशान के पथ पर उसी ने कितनी व्यग्र-व्याकुल विनती की थी और अन्त में क्रुद्ध निराशा का वह कैसा तीव्र अभिमान था! रास्ता रोककर कहा था, ''जाना चाहते हो इसीलिए क्या मैं तुम्हें जाने दूँगी? देखूँ, कैसे जाते हो! इस विदेश में यदि कोई विपत्ति आ पड़ी, तो कौन देख-भाल करेगा? वे या मैं?''

इस दफा उसे पहिचाना। यह जोर ही उसका हमेशा का सच्चा परिचय है। जीवन में यह उससे फिर कभी न छूटा- इससे उसके निकट कभी किसी को अव्याहति नहीं मिली।

रास्ते के एक किनारे मरने को पड़ा था कि नींद टूटने पर ऑंखें खोलकर देखता हूँ कि वह सिरहाने बैठी है। तब सारी चिन्ताएँ उसे सौंपकर ऑंखें बन्द कर सो गया। यह भार उसका है, मेरा नहीं!

गाँव के मकान में आकर बीमार पड़ गया। यहाँ वह नहीं आ सकती थी-यहाँ वह मृत है-इससे बढ़कर और कोई लज्जा उसके लिए नहीं थी, फिर भी जिसे अपने निकट पाया वह वही राजलक्ष्मी थी।

चिट्ठी में लिखा है, ''तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा? पूँटू? और मैं सिर्फ नौकर की जुबानी खबर सुनकर लौट जाऊँगी? इसके बाद भी जीवित रहने के लिए कहते हो?''

इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया। इसलिए नहीं कि जानता नहीं, बल्कि इसलिए कि साहस नहीं हुआ।

मन ही मन कहा, क्या केवल रूप में ही? संयम में, शासन में, सुकठोर आत्मनियन्त्रण में उस प्रखर बुद्धिमती के निकट यह स्निग्धा सुकोमल आश्रमवासिनी कमललता कितनी-सी है! पर उस इतनी-सी में ही इस बार मानो मैंने अपने स्वभाव की प्रतिच्छवि देखी। ऐसा लगा कि उसके निकट ही है मेरी मुक्ति, मर्यादा और नि:श्वास छोड़ने का अवकाश। वह कभी मेरी सारी चिन्ताएँ, सारी भलाई-बुराइयाँ अपने हाथों में लेकर राजलक्ष्मी की तरह मुझे आच्छन्न नहीं कर डालेगी।

सोच रहा था कि विदेश जाकर क्या करूँगा? क्या होगा इस नौकरी से? कोई नहीं बात तो है नहीं- उस दिन भी ऐसा क्या पाया था जिसको फिर से पाने के लिए आज लोभ करना होगा? सिर्फ कमललता ने ही तो नहीं कहा, द्वार का गुसाईं ने भी आश्रम में रहने के लिए एकान्त समादर से आह्वान किया है। यह क्या सब वंचना है, मनुष्य को धोखा देने के अलावा क्या इस आमन्त्रण में कुछ भी सत्य नहीं है? अब तक जीवन जिस तरह कटा है, क्या यही उसका शेष है? क्या अब कुछ भी जाने को बाकी नहीं रहा, क्या मेरे लिए सब जानना समाप्त हो गया? हमेशा इसकी अश्रद्धा और उपेक्षा ही की है, कहा है, सब असार है, सब भूल है, पर सिर्फ अविश्वास और उपहास को ही मूल-धन मान लेने से ही संसार में कभी कोई बड़ी वस्तु किसी को मिली है?

गाड़ी आकर हावड़ा स्टेशन पर रुक गयी। स्थिर किया कि रात को घर रहकर जो कुछ चीजें हैं, जो कुछ लेना-देना है, वह सब चुका पटा कर कल फिर आश्रम को लौट जाऊँगा। गयी मेरी नौकरी, और रह गया मेरा बर्मा जाना। जब घर पहुँचा तब रात के दस बजे थे। आहार का प्रयोजन तो था, पर उपाय न था। हाथ-मुँह धोकर और कपड़े बदलकर बिछौना झाड़ रहा था कि पीछे से एक सुपरिचित कण्ठ की आवाज आयी, ''बाबूजी, आ गये?''

सविस्मय घूमकर देखा, रतन, ''कब आया रे?''

''शाम को ही आया हूँ। बरामदे में बड़ी अच्छी हवा थी, आलस्य में जरा सो गया था।''

''बहुत अच्छा किया। खाया नहीं है न?''

''जी नहीं।''

''तब तो रतन, तूने बड़ी मुश्किल में डाल दिया।''

रतन ने पूछा, ''और आपने?''

स्वीकार करना पड़ा, ''मैंने भी नहीं खाया है।''

रतन ने खुश होकर कहा, ''तब तो अच्छा ही हुआ। आपका प्रसाद पाकर रात काट दूँगा।''

मन ही मन कहा कि यह नाई-बेटा विनय का अवतार है, किसी भी तरह हतप्रभ नहीं होता। कहा, ''तो किसी पास की दुकान में खोज यदि कुछ प्रसाद जुटा सके। पर शुभागमन किसलिए हुआ? फिर भी कोई चिट्ठी है?''

रतन ने कहा, ''जी नहीं, चिट्ठी लिखने में बड़ी झंझट है। जो कुछ कहना होगा वे खुद मुँह से ही कहेंगी।''

''इसका मतलब? मुझे फिर जाना होगा क्या?''

''जी नहीं। माँ खुद आई हैं।''

सुनकर घबड़ा गया। उसे इस रात में कहाँ ठहराऊँ? क्या बन्दोबस्त करूँ? कुछ समझ में न आया। पर कुछ तो करना ही चाहिए, पूछा, ''जब से आई हैं तब से क्या घोड़ागाड़ी में ही बैठी हैं?''

रतन ने हँसकर कहा, ''नहीं बाबू, हमें आये चार दिन हो गये, इन चार दिनों से आपके लिए दिन-रात पहरा दे रहा हूँ। चलिए।''

''कहाँ? कितनी दूर?''

''कुछ दूर तो जरूर है, पर मैंने गाड़ी किराये कर रक्खी है, कष्ट नहीं होगा।''

अतएव, दुबारा कपड़े पहनकर दरवाजे में ताला बन्द कर फिर यात्रा करनी पड़ी। श्यामबाजार की एक गली में एक दोमंजिला मकान है, सामने दीवार से घिरा हुआ एक फूलों का बगीचा है, राजलक्ष्मी के बूढ़े दरबान ने द्वार खोलते ही मुझे देखा, आनन्द की सीमा न रही, सिर हिलाकर लम्बा-चौड़ा नमस्कार कर पूछा, ''अच्छे हैं बाबूजी?''

''हाँ तुलसीदास, अच्छा हूँ। तुम अच्छे हो?''

प्रत्युत्तर में फिर उसने वैसा ही नमस्कार किया। तुलसी मुंगेर जिले का है जात का कुर्मी, ब्राह्मण होने के नाते वह बराबर बंगाली रीति से मेरे पैर छूकर प्रणाम करता है।

हमारी बातचीत की वजह से शायद और भी एक हिन्दुस्तानी नौकर की नींद खुल गयी, रतन के जोर से धमकाने के कारण वह बेचारा हक्का-बक्का हो गया। बिना कारण दूसरों को डरा-धमका कर ही रतन इस मकान में अपनी मर्यादा कायम रखता है। बोला, ''जब से आये हो, खाली सोते हो और रोटी खाते हो, तम्बाकू तक चिलम में सजाकर नहीं रख सकते? जाओ जल्दी...'' यह आदमी नया है, डर से चिलम सजाने दौड़ गया। ऊपर सीढ़ी के सामने वाला बरामदा पार करने पर एक बहुत बड़ा कमरा मिला गैस के उज्ज्वल प्रकाश से आलोकित। चारों ओर कार्पेट बिछा हुआ है, उसके ऊपर फूलदार जाजम और दो-चार तकिये पड़े हैं। पास ही मेरा बहुव्यवहृत अत्यन्त प्रिय हुक्का और उससे थोड़ी ही दूर पर मेरे जरी के काम वाले मखमली स्लीपर सावधानी से रक्खे हुए हैं। ये राजलक्ष्मी ने अपने हाथ से बुने थे और परिहास में मेरे एक जन्मदिन के अवसर पर उपहार दिये थे। पास का कमरा भी खुला हुआ है, पर उसमें कोई नहीं है। खुले दरवाजे से एक बार झाँककर देखा कि एक ओर नयी खरीदी हुई खाट पर बिछौना बिछा हुआ है और दूसरी ओर वैसी ही नयी खूँटी पर सिर्फ मेरे ही कपड़े टँगे हैं। गंगामाटी जाने से पहले ये सब तैयार हुए थे। याद भी न थे, और कभी काम में भी नहीं आये।

रतन ने पुकारा, ''माँ?''

''आती हूँ,'' कहकर राजलक्ष्मी सामने आकर खड़ी हो गयी और पैरों की धूल लेकर प्रणाम करके बोली, ''रतन, चिलम तो भर ला, तुझे भी इधर कई दिनों से बड़ी तकलीफ दी।''

''तकलीफ कुछ भी नहीं हुई माँ। राजी-खुशी इन्हें घर लौटा लाया, यही मेरे लिए बहुत है।'' कहकर वह नीचे चला गया।

 
राजलक्ष्मी को नयी ऑंखों से देखा। शरीर में रूप नहीं समाता। उस दिन की पियारी याद आ गयी। इन कई वर्षों के दु:ख-शोक के ऑंधी-तूफान में नहाकर मानो उसने नया रूप धारण कर लिया है। इन चार दिनों के इस नये मकान की व्यवस्था से चकित नहीं हुआ, क्योंकि उसकी सुव्यवस्था से पेड़-तले का वास-स्थान भी सुन्दर हो उठता है। किन्तु राजलक्ष्मी ने मानो अपने आपको भी इन कई दिनों में मिटाकर फिर से बनाया है। पहले वह बहुत गहने पहिनती थी, बीच में सब खोल दिये थे- मानो संन्यासिनी हो। लेकिन आज फिर पहने हैं- कुछ थोड़े से ही- पर देखने पर ऐसा लगा कि मानो वे अतिशय कीमती हैं। फिर भी धोती ज्यादा कीमती नहीं है- मिल की साड़ी- आठों पहर घर में पहनने की। माथे के ऑंचल की किनारी के नीचे से निकलकर छोटे-छोटे बाल गालों के इर्द-गिर्द झूल रहे हैं। छोटे होने के कारण ही शायद वे उसकी आज्ञा नहीं मानते! देखकर अवाक्! हो रहा।

राजलक्ष्मी ने कहा, ''इतना क्या देख रहे हो?''

''तुमको देख रहा हूँ।''

''नयी हूँ?''

''ऐसा ही तो लग रहा है।''

''और मुझे क्या लग रहा है, जानते हो?''

''नहीं।''

''इच्छा हो रही है कि रतन के चिलम तैयार कर लाने के पहले ही अपने दोनों हाथ तुम्हारे गले में डाल दूँ। डाल देने पर क्या करोगे बताओ?'' कहकर हँस पड़ी। बोली, ''उठाकर बाहर तो नहीं फेंक दोगे?''

मैं भी हँसी न रोक सका। कहा, ''डालकर देख ही लो न! पर इतनी हँसी- कहीं भाँग तो नहीं खा ली है?''

सीढ़ियों पर पैरों की आवाज सुनाई दी। बुद्धिमान रतन जरा जोर से पैर पटकता हुआ चढ़ रहा था। राजलक्ष्मी ने हँसी दबाकर धीरे से कहा, ''पहले रतन को चले जाने दो, फिर तुम्हें बताऊँगी कि भाँग खाई है या और कुछ खाया है।'' पर कहते-कहते अचानक उसका गला भारी हो गया। कहा, ''इस अनजान जगह में चार-पाँच दिन को मुझे अकेला छोड़कर तुम पूँटू की शादी कराने गये थे? मालूम है, ये रात-दिन मेरे किस तरह कटे हैं?''

''मुझे क्या मालूम कि तुम अचानक आ जाओगी?''

''हाँ जी हाँ, अचानक तो कहोगे ही। तुम सब जानते थे। सिर्फ मुझे तंग करने के लिए ही चले गये थे।''

रतन ने आकर हुक्का दिया, बोला, ''बात तय हुई है माँ, बाबू का प्रसाद पाऊँगा। रसोइए से खाना लाने के लिए कह दूँ? रात के बारह बज गये हैं।''

बारह सुनकर राजलक्ष्मी व्यस्त हो गयी, ''रसोइए से नहीं होगा, मैं खुद जाती हूँ। तुम मेरे सोने के कमरे में थोड़ी-सी जगह कर दो।''

खाने के लिए बैठते वक्त मुझे गंगामाटी के अन्तिम दिनों की बात याद आ गयी। तब यही रसोइया और यही रतन मेरे खाने की देख-रेख करते थे। राजलक्ष्मी को मेरी खबर लेने को वक्त नहीं मिलता था। पर आज इन लोगों से नहीं होगा- रसोई घर में खुद जाना होगा! पर यह उसकी प्रकृति है, वह थी विकृति। समझ गया कि कारण कुछ भी हो, किन्तु उसने अपने को फिर पा लिया है।

खाना खत्म होने पर राजलक्ष्मी ने पूछा, ''पूँटू की शादी कैसी हुई?''

''ऑंखों से नहीं देखी पर कानों से सुनी है, अच्छी तरह हुई।''

''ऑंखों से नहीं देखी? इतने दिनों फिर कहाँ थे?''

विवाह की सारी घटना खोलकर सुनायी। सुनकर क्षणभर के लिए गाल पर हाथ रक्खे हुए उसने कहा, ''तुमने तो अवाक् कर दिया! आने के पहले पूँटू को कुछ उपहार देकर नहीं आये?''

''मेरी तरफ से वह तुम दे देना।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हारी तरफ से क्यों, अपनी तरफ से ही लड़की को कुछ भेज दूँगी। पर थे कहाँ, यह तो बताया ही नहीं?''

कहा, ''मुरारीपुर के बाबाओं के आश्रम की याद है?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''है क्यों नहीं। वैष्णवियाँ वहीं से तो मुहल्ले-मुहल्ले में भीख माँगने आती थीं। बचपन की बातें मुझे खूब याद हैं।''

''वहीं था।''

सुनकर जैसे राजलक्ष्मी के शरीर में काँटे उठ आये, ''उन्हीं वैष्णवियों के अखाड़े में? अरे मेरी माँ!- क्या कहते हो जी? उनके विषय में तो भयंकर गन्दी बातें सुनी हैं!'' कहकर वह सहसा उच्च कण्ठ से हँस पड़ी। अन्त में मुँह में ऑंचल दबाकर बोली, ''तो तुम्हारे लिए असाध्य' काम कोई नहीं है। आरा में जो तुम्हारी मूर्ति देखी है- माथे में जटा, सारे शरीर में रुद्राक्ष की माला, हाथों में पीतल के- वह अद्भुत...''

बात खत्म न कर सकी, हँसते-हँसते लोट-पोट हो गयी। नाराज होकर उसे बैठा दिया। अन्त में हिचकी लेकर मुँह में कपड़ा ठूँसने पर जब बड़ी मुश्किल से हँसी रुकी तो बोली, 'वैष्णवियों ने तुमसे क्या कहा? चपटी नाकोंवाली और गोदनों वालीं वहाँ बहुत-सी रहती हैं न जी...''

फिर वैसा ही हँसी का फौवारा छूटने वाला था, पर सतर्क कर दिया, ''इस बार हँसने पर ऐसा कड़ा दण्ड दूँगा कि कल नौकरों को मुँह न दिखा सकोगी।''

राजलक्ष्मी डर से दूर हट गयी, और मुँह से बोली, ''यह तुम सरीखे वीर पुरुषों का काम नहीं है। खुद ही शर्म के मारे बाहर नहीं निकल सकोगे। संसार में तुमसे ज्यादा भीरु पुरुष और कोई है?''

कहा, ''तुम कुछ भी नहीं जानतीं लक्ष्मी। तुमने भीरु कहकर अवज्ञा की, पर वहाँ एक वैष्णवी मुझसे कहती थी अहंकारी- दम्भी!''

''क्यों, उसका क्या किया था?''

''कुछ भी नहीं। उसने मेरा नाम रक्खा था 'नये गुसाईं'। कहती थी, ''गुसाईं तुम्हारे उदासीन वैरागी मन की अपेक्षा अधिक दम्भी मन पृथ्वी में और दूसरा नहीं है।''

राजलक्ष्मी की हँसी रुक गयी ''क्या कहा उसने?''

''कहा कि इस तरह के उदासी, वैरागी-मन के मनुष्य की अपेक्षा अधिक दम्भी व्यक्ति दुनिया में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। अर्थात् मैं दुर्धर्ष वीर हूँ, भीरु कतई नहीं।''

राजलक्ष्मी का चेहरा गम्भीर हो गया। परिहास की ओर उसने ध्यावन ही न दिया। बोली, ''तुम्हारे उदासीन मन की खबर उस हरामजादी ने कैसे पा ली?''

''वैष्णवियों के प्रति ऐसी अशिष्ट भाषा बहुत आपत्तिजनक है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''यह जानती हूँ। पर उसने तुम्हारा नाम तो रक्खा नये गुसाईं', और उसका अपना नाम क्या है?''

''कमललता। कोई-कोई प्रेम से कमलीलता भी कहता है। लोग कहते हैं कि वह जादू जानती है, उसका कीर्तन सुनकर मनुष्य पागल हो जाता है और वह जो चाहती है वही दे देता।''

''तुमने सुना है?''

''सुना है। चमत्कार!''

''उसकी उम्र क्या है?''

''जान पड़ता है तुम्हारे ही बराबर होगी। कुछ ज्यादा भी हो सकती है।''

''देखने में कैसी है?''

''अच्छी। कम-से-कम खराब तो नहीं कही जा सकती। जिन चपटी नाकों और गोदनावालियों को तुमने देखा है, उनके दल की वह नहीं है। वह भले घर की लड़की है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''मैं उसकी बात सुनकर ही समझ गयी। जब तक तुम रहे, तब तक तुम्हारी सेवा करती थी न?''

''हाँ। मेरी कोई शिकायत नहीं है।''

राजलक्ष्मी ने एकाएक नि:श्वास छोड़कर कहा, ''सो करने दो। जिस साधना से तुमको पाया जाता है उससे तो भगवान भी मिल सकते हैं। यह वैष्णव बैरागियों का काम नहीं है। मैं डरने जाऊँगी न जाने कहाँ की इस कमललता से? छी:!'' कहकर वह उठी और बाहर चली गयी।

मेरे मुँह से भी एक दीर्घ नि:श्वास निकल गयी। शायद कुछ बेमन हो गया था, इस आवाज से होश में आया। मोटे तकिये को खींच चित लेटकर हुक्का पीने लगा।

ऊपर एक छोटा-सा मकड़ा घूम-घूम कर जाल बुन रहा था। गैस के उज्ज्वल प्रकाश में उसकी छाया बहुत बड़े बीभत्स जन्तु की तरह मकान की कड़ियों पर पड़ रही थी। आलोक के व्यवघान से छाया भी कई गुनी काया को अतिक्रम कर जाती है।

राजलक्ष्मी लौटकर मेरे ही तकिये के एक कोने में कोहनियों के बल झुककर बैठ गयी। हाथ लगाकर देखा कि उसके कपाल के बाल भीगे हुए हैं। शायद अभी-अभी ऑंख-मुँह धोकर आई है।

प्रश्न किया, ''लक्ष्मी, एकाएक इस तरह कलकत्ते क्यों चली आयी?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''एकाएक कतई नहीं। उस दिन के बाद रात-दिन चौबीस घण्टे मन न जाने कैसा होने लगा कि किसी भी तरह रहा न गया, डर लगा कि कहीं हार्ट-फेल न हो जाय- इस जन्म में फिर कभी ऑंखों से नहीं देख सकूँ'' कहकर उसने हुक्के की नली मेरे मुँह से निकालकर दूर फेंक दी। कहा, ''जरा ठहरो। धुएँ के मारे मुँह तक दिखाई नहीं देता, ऐसा अन्धकार कर रक्खा है।''

हुक्के की नली तो गयी पर बदले में मेरी मुट्ठी में उसका हाथ आ गया।

पूछा, ''बंकू आजकल क्या कहता है?''

राजलक्ष्मी ने जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, ''बहुओं के आने पर सब लड़के जो कहते हैं, वही।''

''उससे ज्यादा कुछ नहीं?''

''कुछ नहीं तो नहीं कहती, पर वह मुझे दु:ख क्या देगा? दु:ख तो सिर्फ तुम्हीं दे सकते हो। तुम लोगों के अलावा औरतों को सचमुच का दु:ख और कोई भी नहीं दे सकता।''

''पर मैंने क्या कभी कोई दु:ख दिया है लक्ष्मी?''

राजलक्ष्मी ने अनावश्यक ही मेरे कपाल में हाथ लगाया और उसे पोंछकर कहा, ''कभी नहीं। बल्कि, मैंने ही आज तक तुमको न जाने कितने दु:ख दिए हैं। अपने सुख के लिए लोगों की नजरों में तुम्हें हेय बनाया, प्रवृत्तिवश तुम्हारा असम्मान होने दिया- उसका ही दण्ड है कि अब दोनों किनारे डूबे जा रहे हैं! देख तो रहे हो न?''

हँसकर कहा, ''कहाँ, नहीं तो?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो किसी ने मन्तर पढ़कर तुम्हारी दोनों ऑंखों पर पर्दा डाल दिया है।'' फिर कुछ चुप रहकर कहा, ''इतने पाप करके भी संसार में मेरे जैसा भाग्य किसी का कभी देखा है? पर मेरी आशा उससे भी नहीं मिटी। न जाने कहाँ से आ जुटा धर्म का पागलपन और हाथ आई लक्ष्मी अपने पैरों से ठुकरा दी। गंगामाटी से आकर भी चैतन्य नहीं हुआ, काशी से तुम्हें अनादर के साथ बिदा कर दिया।''

उसकी दोनों ऑंखों से टप-टप ऑंसू गिरने लगे, मेरे उन्हें हाथ से पोंछ देने पर बोली, ''अपने ही हाथ से विष का पौधा लगाया था, अब उसमें फल लग गये हैं। खा नहीं सकती, सो नहीं सकती, ऑंखों की नींद हराम हो गयी, न जाने कैसे-कैसे असम्बद्ध डर होने लगे जिनका न सिर न पैर। गुरुदेव तब मकान में थे, उन्होंने कोई कवच जैसा हाथ में बाँध दिया, कहा, बेटी, सुबह एक ही आसन पर बैठकर तुमको दस हजार बार इष्ट नाम का जप करना होगा। पर कहाँ कर सकी? मन में तो आग जल रही थी, पूजा पर बैठते ही दोनों ऑंखों से ऑंसुओं की धार बह चलती- उसी समय आई तुम्हारी चिट्ठी और तब इतने दिनों बाद रोग पकड़ा गया।''

''किसी ने पकड़ा- गुरुदेव ने? इस बार शायद उन्होंने फिर एक कवच लिख दिया?''

''हाँजी, लिख दिया है और उसे तुम्हारे गले में बाँधने के लिए कहा है!''

ऐसा ही करना, बाँध देना, अगर तुम्हारा रोग अच्छा हो जाय।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''उस चिट्ठी को लेकर मेरे दो दिन कटे। कैसे कटे यह नहीं जानती। रतन को बुलाकर उसके हाथों चिट्ठी का जवाब भेज दिया। गंगास्नान कर अन्नपूर्णा के मन्दिर में खड़े होकर कहा, ''माँ, ऐसा करो कि समय रहते उनके हाथों चिट्ठी पहुँच जाय, मुझे आत्महत्या न करनी पड़े'।'' मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, ''मुझे इस तरह क्यों बाँधा था बोलो?''

सहसा इस जिज्ञासा का उत्तर न दे सका। इसके बाद कहा, ''तुम औरतों के द्वारा ही यह सम्भव है। हम यह सोच भी नहीं सकते, समझ भी नहीं सकते।''

''स्वीकार करते हो?''

''हाँ।''

राजलक्ष्मी ने फिर एक बार क्षण-भर के लिए मेरी ओर देखकर कहा, ''वाकई विश्वास करते हो कि यह हम लोगों के लिए ही सम्भव है, पुरुष यथार्थ में ऐसा नहीं कर सकते?''

कुछ देर तक दोनों स्तब्ध रहे। राजलक्ष्मी ने कहा, ''मन्दिर से बाहर निकल कर देखा कि हमारा पटने का लछमन साहू खड़ा है। मेरे हाथ वह बनारसी कपड़े बेचा करता था। बूढ़ा मुझे बहुत चाहता था और मुझे बेटी कहकर पुकारता था। आश्चर्यान्वित हो बोला, ''बेटी, आप यहाँ?'' मुझे मालूम था कि कलकत्ते में उसकी दुकान है। कहा, ''साहूजी, मैं कलकत्ते जाऊँगी, मेरे लिए एक मकान ठीक कर सकते हो?''

उसने कहा, '' कर सकता हूँ। बंगाली मुहल्ले में मेरा अपना एक मकान है, सस्ते में खरीदा था। चाहो तो उतने ही रुपयों में वह मकान दे सकता हूँ।'' साहू धर्म-भीरु व्यक्ति है, उस पर मेरा विश्वास था, राजी हो गयी। घर पर बुलाकर रुपये दे दिए और उसने रसीद लिखकर दे दी। उसी के आदमियों ने यह सब चीजें खरीद दी हैं। छह-सात दिन बाद ही रतन को साथ लेकर यहाँ चली आयी। मन ही मन कहा, ''माँ अन्नपूर्णा, तुमने मुझ पर दया की है, नहीं तो यह सुयोग कभी न मिलता। मुझे उनके दर्शन होंगे ही' और आखिर दर्शन हो गये।''

कहा, ''पर मुझे तो जल्दी ही बर्मा जाना होगा लक्ष्मी।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''ठीक है, तो चलो न। वहाँ अभया है, सारे देश में बुद्ध देव के बड़े-बड़े मन्दिर हैं-उन सबको देख आऊँगी।''

कहा, ''पर वह बड़ा गन्दा देश है लक्ष्मी, शुचि-वायुग्रस्त लोगों के आचार-विचार वहाँ नहीं चलते। उस देश में तुम कैसे जाओगी?''

राजलक्ष्मी ने मेरे कान पर मुँह रखकर धीरे-धीरे न जाने क्या कहा, अच्छी तरह से समझ में नहीं आया। कहा, ''जरा जोर से कहो तो सुनाई दे।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं।''

इसके बाद वह अवश भाव से उसी तरह पड़ी रही। सिर्फ उसके उष्ण धन नि:श्वास मेरे गले पर और मेरे गालों पर आकर पड़ने लगे।

0000

''अजी, उठो। कपड़े बदलकर हाथ-मुँह धो लो। रतन चाय लिये खड़ा है।''

मेरा उत्तर न पाने पर राजलक्ष्मी ने फिर पुकारा, ''कितनी देर हो गयी है- अब कब तक सोओगे?''

करवट बदलकर मैंने अवश कण्ठ से कहा, ''तुमने सोने ही कब दिया? अभी अभी तो सोया हूँ।''

इतने में कानों में चाय की कटोरी की आवाज पहुँची जिसे रतन मेज पर रखकर शायद लज्जा के मारे भाग गया था।

राजलक्ष्मी ने कहा, ''छी छी, तुम कितने बेहया हो। आदमी को झूठमूठ ही अप्रतिभ कर सकते हो! खुद रातभर कुम्भकर्ण की तरह सोये, बल्कि मैं ही जागकर पंखा करती रही कि गर्मी से कहीं तुम्हारी नींद न खुल जाय और मुझसे ही अब ऐसा कहते हो! जल्दी उठो, नहीं तो ऊपर पानी डाल दूँगी।''

उठ बैठा। यद्यपि देर नहीं हुई थी तो भी सबेरा हो गया था, खिड़कियाँ खुली हुई थीं। प्रात:काल के उस स्निग्ध प्रकाश में राजलक्ष्मी की अद्भुत मूर्ति दिखाई दी। उसका स्नान और पूजा-पाठ समाप्त हो चुका है, गंगा-घाट के उड़िया पण्डे का लगाया हुआ सफेद और लाल चन्दन का टीका उसके मस्तक पर है, शरीर पर नयी लाल बनारसी साड़ी है, पूर्व की खिड़की से आई हुई थोड़ी-सी सुनहरी धूप तिरछी होकर उसके मुँह के एक तरफ पड़ रही है, उसके होठों के कोने में सलज्ज कौतुक की दबी हुई हँसी है, फिर भी कृत्रिम क्रोध से सिकुड़ी हुई भौंहों के नीचे चंचल ऑंखों की दृष्टि मानो उछलते हुए आवेग से जगमगा रही है- देखकर आज भी आश्चर्य की सीमा न रही। एकाएक उसने कुछ हँसकर कहा, ''अच्छा बताओ तो कि कल से इतने गौर से क्या देख रहे हो?''

''तुम्हीं बताओ न कि क्या देख रहा हूँ?''

राजलक्ष्मी ने फिर कुछ हँसकर कहा, ''शायद यह देख रहे हो कि पूँटू मुझसे अधिक सुन्दर है या नहीं, या कमललता देखने में ज्यादा अच्छी लगती है कि नहीं- क्यों है न यही बात?''

''नहीं। यह बात आसानी से कही जा सकती है कि रूप के लिहाज से तो कोई तुम्हारे पास तक नहीं फटक सकता। इसके लिए इतने गौर से देखने की आवश्यकता नहीं।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''अच्छा, रूप की बात जाने दो। पर गुण में?''

''गुण में? हाँ, यह मानना ही होगा कि इस विषय में मतभेद की सम्भावना है।''

''गुणों के बारे में तो सुना है कि वह कीर्तन कर सकती है।''

''हाँ, बहुत बढ़िया।''

''यह तुमने कैसे समझा कि बढ़िया है।''

''वाह,- यह भी नहीं समझ सकता? विशुद्ध ताल, लय, सुर...''

राजलक्ष्मी ने बाधा देकर पूछा, ''हाँ जी, ताल किसे कहते हैं?''

''ताल उसे कहते हैं जो बचपन में तुम्हारी पीठ पर पड़ती थी। याद नहीं है?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''क्या कहा-याद नहीं? खूब याद है। कल खामख्वाह भीरु कहकर तुम्हारी निंदा कर डाली। कमललता ने सिर्फ तुम्हारे उदासीन मन का ही पता पाया है, शायद तुम्हारी वीरता की कहानी नहीं सुनी?''

''नहीं, क्योंकि आत्मप्रशंसा खुद नहीं करनी चाहिए। वह तुम सुना देना। पर उसका गला मीठा है, इसमें सन्देह नहीं।''

''मुझे भी सन्देह नहीं है।'' कहने के साथ ही एकाएक प्रच्छन्न कौतुक से उसके ऑंखें चमक उठीं। बोली, ''हाँ जी, तुम्हें वह गाना याद है? वही जिसे पाठशाला की छुट्टी होने पर तुम गाते थे और हम सब मुग्ध होकर सुनते थे- वही, ''कहाँ गये प्राणों के प्राण हे दुर्योधन रे-ए-ए-ए-ए-''

हँसी दबाने के लिए उसने ऑंचल से मुँह को छिपा लिया, मैं भी हँस पड़ा। राजलक्ष्मी ने कहा, ''पर गाना बहुत भावमय है। तुम्हारे मुँह से सुनकर मनुष्यों की तो कौन कहे, गाय-बछड़ों तक की ऑंखों में पानी आ जाता था।''

रतन के पैरों की आहट सुनाई दी। अविलम्ब ही दरवाजे के पास खड़े होकर उसने कहा-''चाय का पानी फिर चढ़ा दिया है माँ, तैयार होने में देर नहीं लगेगी।'' यह कह कमरे के अन्दर दाखिल हो उसने चाय की कटोरी उठा ली।

राजलक्ष्मी ने मुझसे कहा, ''अब देरी मत करो, उठो। इस बार फिर चाय फेंके जाने पर रतन चिढ़ जायेगा। वह अपव्यय सहन नहीं कर सकता, क्यों ठीक है न रतन?''

रतन भी जवाब देना जानता है। बोला, ''माँ, आपका बर्दाश्त नहीं कर सकता। पर बाबू के लिए मैं सब कुछ सहन कर सकता हूँ।'' कहकर वह चाय की कटोरी लेकर चला गया। क्रोध में वह राजलक्ष्मी को 'आप' कहता था, अन्यथा 'तुम' कहकर ही पुकारता था।

राजलक्ष्मी ने कहा- ''रतन सचमुच तुमको बहुत प्यार करता है।''

''मेरा भी यही खयाल है।''

''हाँ। जब तुम काशी से चले आये तो उसने झगड़ा करके मेरा काम छोड़ दिया। मैंने नाराज होकर कहा, ''रतन मैंने तेरे साथ जो सलूक किया, उसका क्या यही प्रतिफल है?'' उसने कहा, ''माँ, रतन नमकहराम नहीं है। मैं भी बर्मा जा रहा हूँ, बाबू की सेवा करके तुम्हारा ऋण चुका दूँगा।'' तब उसका हाथ पकड़ लिया और अपना अपराध स्वीकार कर उसे शान्त किया।''

कुछ ठहरकर कहा, ''इसके बाद तुम्हायरे विवाह का निमन्त्रण-पत्र आया।''

बाधा देकर कहा, ''झूठ न बोलो। तुम्हारी राय जानने के लिए...''

इस बार उसने भी बाधा देकर कहा, ''हाँ जी हाँ, मालूम है। नाराज होकर यदि विवाह करने को लिख देती तो कर लेते न?''

''नहीं।''

''नहीं क्या। तुम लोग सब कुछ कर सकते हो।''

राजलक्ष्मी कहने लगी- ''रतन न जाने क्या समझा, केवल यह देखा कि मेरे मुँह की ओर देखकर उसकी ऑंखें छलछला आई हैं। उसके बाद जब उसके चिट्ठी का जवाब डाक में डालने के लिए दिया, तो बोला, ''माँ, इस चिट्ठी को डाक में न डाल सकूँगा, इसे मैं खुद ले जाकर उनके हाथ में दूँगा।'' मैंने कहा, ''व्यर्थ में रुपये खर्च करने से क्या फायदा होगा भइया?'' रतन ने हठात् ऑंखें पोंछकर कहा, ''माँ, मैं नहीं जानता कि क्या हुआ है, पर तुम्हें देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि मानो पद्मा का किनारा कमजोर हो गया है- इसका कोई ठीक नहीं कि पेड़-पत्तों और मकानों को लेकर वह कब पानी में ढह जाय। तुम्हारी दया से मेरे अब कोई कमी नहीं है- यह रुपया तुम दोगी तो भी मैं न ले सकूँगा। अगर विश्वनाथ बाबा ने सिर उठाकर देख लिया, तो मेरे गाँव की झोंपड़ी में अपनी दासी को थोड़ा-सा प्रसाद भेज देना, वह कृतार्थ हो जायेगी।''

''नाई-बेटा कितना सयाना है!''

सुनकर राजलक्ष्मी ने होठ दबाकर सिर्फ हँस दिया और कहा- ''अच्छा, अब देरी मत करो, जाओ।''

दोपहर को जब वह भोजन कराने बैठी तो मैंने कहा, ''कल तो मामूली साड़ी पहने हुई थीं, पर आज सबेरे से ही यह बनारसी साड़ी का ठाठ क्यों है, बताओ भला?''

''तुम्हीं बताओ न?''

''मैं नहीं जानता।''

''जरूर जानते हो। इस साड़ी को पहिचान सकते हो?''

''हाँ, पहचान सकता हूँ। मैंने बर्मा से खरीदकर भेजी थी।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''उसी दिन मैंने विचार कर लिया था कि अपने जीवन के सबसे महान दिन पर इसे पहनूँगी- और कभी नहीं।''

''इसलिए आज पहनी है?''

''हाँ, इसीलिए आज पहनी है।''

हँसकर कहा, ''किन्तु वह तो हो गया। अब उतार दो।'' वह चुप हो रही। कहा, ''सुना है कि तुम अभी-अभी कालीघाट जाओगी?''

''राजलक्ष्मी ने आश्चर्य के साथ कहा, ''अभी? यह कैसे हो सकता है? तुम्हें खिला-पिलाकर सुलाने के बाद ही तो छुट्टी मिलेगी।''

''नहीं, तब भी नहीं मिलेगी। रतन कह रहा था कि तुम्हारा खाना-पीना प्राय: बन्द-सा हो गया है। सिर्फ कल जरा-सा खाया था और आज से फिर उपवास शुरू हो गया है। मालूम है, मैंने क्या स्थिर किया है? अब से तुम्हें कड़े शासन में रखूँगा। अब तुम्हारी जो खुशी होगी, न कर सकोगी।''

राजलक्ष्मी ने प्रसन्न मुख से कहा- ''ऐसा हो तो जी जाऊँ महाशयजी, तब खूब खाऊँगी-पीऊँगी, किसी झंझट में न पड़ना होगा।''

''इसीलिए आज तुम कालीघाट भी न जा सकोगी।''

राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, ''तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, सिर्फ आज-भर के लिए माफ कर दो, आयन्दा पुराने जमाने के नवाब-बादशाहों की खरीदी हुई लौंडी की तरह रहूँगी- इससे अधिक तुमसे और कुछ भी न चाहूँगी।''

''अच्छा, यह तो बताओ कि इतना विनय क्यों?''

''विनय नहीं, यह सत्य है। अपनी औकात समझकर नहीं चली, और न तुम्हें मानकर ही चली, इसलिए अपराध के बाद अपराध करते-करते साहस बढ़ गया है। तुम्हारे ऊपर अब उस पहले वाली लक्ष्मी का अधिकार नहीं है- अपने ही दोष से उसे खो बैठी हूँ।''

देखा कि उसकी ऑंखों में ऑंसू आ गये हैं। कहा, ''केवल आज-भर के लिए जाने की आज्ञा दे दो मेरे राजा, मैं माँ की आरती देख आऊँ।''

कहा, ''ऐसा ही है तो कल चली जाना। तुम्हीं ने तो कहा, कि कल सारी रात जागकर मेरी सेवा करती रहीं। आज तुम बहुत थकी हुई हो।''

''नहीं, मुझे कतई थकावट नहीं है। केवल आज ही नहीं, कितनी ही बार बीमारी के मौकों पर देखा है कि लगातार रातों के बाद रात जागने पर भी तुम्हारी सेवा में मुझे कोई कष्ट प्रतीत नहीं हुआ। न मालूम मेरी समस्त थकावट को कौन मिटा देता है। कितने दिन से देवी-देवताओं को भूल गयी थी, किसी में भी मन न लगा सकी। मेरे राजा, आज मुझे न रोको, जाने की आज्ञा दे दो।''

''तो चलो, दोनों एक साथ चलें।''

राजलक्ष्मी की दोनों ऑंखें आनन्द से चमक उठीं। बोली, ''तो चलो, पर मन ही मन देवता की अवज्ञा तो नहीं करोगे?''

जवाब दिया, ''शपथ तो नहीं ले सकता, परन्तु तुम्हारा रास्ता देखते हुए मैं मन्दिर के द्वार पर ही खड़ा रहूँगा। मेरी तरफ से तुम देवता से वर माँग लेना।''

''बताओ, क्या वर माँगूँ?''

अन्न का ग्रास मुँह में डालकर सोचने लगा, पर कोई भी कामना न सूझी।

''तुम्हीं बताओ न लक्ष्मी, मेरे लिए तुम क्या माँगोगी?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''आयु माँगूँगी, स्वास्थ्य माँगूँगी, और यह माँगूँगी कि तुम मेरे प्रति कठिन हो सको जिससे मुझे अधिक प्रश्रय देकर अब फिर मेरा सर्वनाश न करो। करने को ही तो बैठे थे!''

''लक्ष्मी, देखो यह तुम्हारे रूठने की बात है।''

''रूठना तो है ही। तुम्हारी वह चिट्ठी क्या कभी भूल सकूँगी?''

मुँह लटकाकर मैं चुप हो रहा।

उसने अपने हाथ से मेरा मुँह ऊपर उठाकर कहा, ''पर इसलिए यह भी मै। नहीं सह सकती। किन्तु तुम कठोर तो हो नहीं सकोगे, तुम्हारा ऐसा स्वभाव ही नहीं है। लेकिन यह काम अब से मुझे ही करना पड़ेगा, अवहेला करने से काम नहीं चलेगा।''

पूछा, ''कौन सा काम? और भी निर्जल उपवास?''

राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''उपवास से राजा नहीं मिलती वरन् अहंकार बढ़ जाता है। अब मेरा पथ वह नहीं है।''

''तब तुमने कौन सा पथ ठहराया है?''

''ठीक नहीं कर सकी हूँ, खोज में घूम रही हूँ।''

''अच्छा, सचमुच तुम्हें यह विश्वास होता है कि मैं कभी कठोर हो सकता हूँ?''

''होता है जी, और खूब होता है।''

''नहीं, कभी नहीं होता, तुम झूठ कहती हो।''

राजलक्ष्मी सिर हिलाकर हँसते हुए बोली, ''अच्छा, झूठ ही सही। किन्तु गुसाईंजी, यही तो मेरे लिए विपद की बात हैं तुम्हारी कमललता ने भी क्या खूब नाम रक्खा है! दिनभर ''हाँ जी,'' ''ओ जी,'' ''सुनो जी,'' करते-करते जान जाती थी, अब से मैं पुकारूँगी ''नये गुसाईं'' कहकर।''

''मजे से।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तब तो शायद कभी गलती से मुझे कमललता ही समझ लोगे- पर इससे भी शान्ति ही मिलेगी। कहो, ठीक है न?''

हँसकर कहा, ''लक्ष्मी, मरने पर भी स्वभाव नहीं बदलता। ये ही बादशाही जमाने की लौंडी की-सी बातें हैं, अब तक तो वे तुम्हें जल्लाद के हाथ सौंप देते!''

सुनकर राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी। कहा, ''जल्लाद के हाथों में खुद ही अपने आप को सौंप दिया है।''

''पर तुम सदा से इतनी दुष्ट रही हो कि तुम पर शासन करने की शक्ति किसी भी जल्लाद में नहीं है।''

राजलक्ष्मी प्रत्युत्तर में कुछ कहने जा ही रही थी कि एकाएक विद्युत वेग से उठ बैठी, ''अरे, यह क्या! दूध कहाँ है? मेरे सिर की कसम, देखो, उठ न जाना।'' और यह कहती हुई वह द्रुत गति से बाहर चली गयी।

नि:श्वास छोड़कर कहा, ''कहाँ यह, और कहाँ कमललता!''

दो मिनट बाद ही हाथ में दूध की कटोरी लिये आ गयी और पत्तल के पास रखकर पंखे से हवा करने बैठ गयी। कहने लगी, ''अब तक मालूम होता था, मेरे मन में कहीं पाप है। इसी कारण गंगामाटी में मन नहीं लगा, और काशी धाम लौट आयी। गुरुदेव को बुलाकर अपने बाल कटवा दिये, गहने उतार डाले और तपस्या में पूर्णत: तल्लीन हो गयी। सोचा, अब कोई चिन्ता नहीं, स्वर्ग की सोने की सीढ़ी तैयार होती ही है!- एक आफत तुम थे, सो भी बिदा हो गये। किन्तु उस दिन से नेत्रों के पानी ने किसी तरह रुकना ही न चाहा। इष्ट मन्त्र सब भूल गयी, देवता अर्न्तध्यारन हो गये, हृदय बिल्कु्ल शुष्क हो गया। भय हुआ कि यदि यही धर्म की साधना है, तो फिर यह सब क्या हो रहा है! अन्त में कहीं पागल तो न हो जाऊँगी!''

मैंने सिर उठाकर उसके मुँह की ओर देखा और कहा, ''तपस्या के आरम्भ में देवता भय दिखाया करते हैं। उनके सामने टिके रहने पर ही सिद्धि प्राप्त होती है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''सिद्धि की मुझे आवश्यकता नहीं, वह मुझे मिल गयी है।''

''कहाँ मिली?''

''यहीं। इसी मकान में।''

''विश्वास नहीं होता, प्रमाण दो।''

''प्रमाण दूँगी तुम्हें? मुझे क्या गरज पड़ी है?''

''किन्तु क्रीत दासियाँ ऐसी बातें नहीं किया करतीं।''

''देखो, क्रोध न दिलाओ। इस तरह बार-बार 'क्रीत दासी' कहकर पुकारोगे, तो अच्छा न होगा।''

''अच्छा जाओ, तुम्हें मुक्त कर दिया, अब से तुम स्वाधीन हुईं।''

राजलक्ष्मी फिर हँसी। बोली, ''मैं कितनी स्वाधीन हूँ, सो इस दफा नस-नस में अनुभव कर रही हूँ। कल बातें करते-करते जब तुम सो गये, तब अपने गले पर से तुम्हारा हाथ हटाकर मैं उठ बैठी। हाथ लगाकर देखा, तुम्हारा माथा पसीने से तर हो रहा है, ऑंचल से पसीना पोंछकर मैं पंखा लेकर बैठ गयी। मन्द प्रकाश को तीव्र कर दिया; उस समय तुम्हारे निद्राभिभूत चेहरे की ओर देखकर ऑंखें हटा ही न सकी। इसके पहले क्यों नजर नहीं आया कि यह इतना सुन्दर है! अब तक क्या अन्धी थी? फिर सोचा, यदि यह पाप है तो फिर पुण्य की मुझे आवश्यकता नहीं; और यदि यह अधर्म है तो चूल्हे में जाय मेरी धर्म्मचर्चा; जीवन में यदि यह मिथ्या है तो ज्ञान होने के पूर्व ही किसके कहने से मैंने इन्हें वरण किया था?- अरे यह क्या, पीते क्यों नहीं? सारा दूध वैसा ही पड़ा है!''

''अब नहीं पिया जाता।''

''तो कुछ फल ले आऊँ?''

''नहीं, वह भी नहीं।''

''किन्तु कितने दुबले हो गये हो!''

''यदि दुबला हो भी गया हूँ, तो बहुत दिनों की अवहेलना से। एक दिन में ही सुधारना चाहोगी, तो व्यर्थ मारा जाऊँगा।''

वेदना से उसका चेहरा पीला पड़ गया, कहा, ''अब गलती न होगी जो दण्ड मिला है उसे अब नहीं भूलूँगी। यही मेरा सबसे बड़ा लाभ है।'' फिर कुछ देर मौन रहकर धीरे-धीरे कहने लगी, ''प्रात:काल होने पर उठ आयी। भाग्य से कुम्भकर्ण की निद्रा जल्दी नहीं टूटती वरना लोभवश जगा ही तो डाला था! तब दरबान को भी साथ लेकर गंगा नहाने गयी, मालूम पड़ा, मानो माता ने समस्त ताप धो डाला है। घर आकर जब पूजा करने बैठी तब जाना कि केवल तुम अकेले ही नहीं लौट आये हो, साथ ही आ गया है मेरी पूजा का मन्त्र, आ गये हैं मेरे इष्ट देवता और गुरुदेव, और आ गये हैं मेरे श्रावण के मेघ। आज भी मेरी ऑंखों से जल बहने लगा, किन्तु वे अश्रु हृदय को मसोसकर निचोड़े हुए नहीं थे, बल्कि वह तो आनन्द से उमड़े हुए झरने की धारा थी जिसने मुझे सब ओर से विभोर कर दिया। जाऊँ, कुछ फल ले आऊँ? पास बैठकर अपने हाथ से तराशकर तुम्हें फल खिलाये हुए बहुत दिन हो गये। जाऊँ, क्यों?''

''अच्छा जाओ।''

राजलक्ष्मी वैसी ही द्रुत गति से चली गयी। मैंने एक बार फिर साँस छोड़कर कहा, ''कहाँ यह और कहाँ कमललता!''

न जाने किसने जन्म के समय हजारों नामों में से चुनकर इसका राजलक्ष्मी नाम रक्खा था!

दोनों जिस समय कालीघाट से लौटे उस समय रात के नौ बज गये थे। राजलक्ष्मी स्नान कर और कपड़े बदलकर सहज भाव से पास आ बैठी। मैंने कहा, ''राजसी पोशाक उतर गयी। चलो, जान बची।''

राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, ''हाँ, वह मेरे लिए राजसी पोशाक ही है, क्योंकि मेरे राजा ने जो दी है। जब मरूँ तब वही मुझे पहना देने के लिए कहना।''

''ऐसा ही होगा। पर तुम क्या आज सारा दिन स्वप्न देखने में ही बिता दोगी? अब कुछ खा लो।''

''खाती हूँ।''

''मैं रतन से कह देता हूँ कि तुम्हारा खाना रसोइए के हाथ यहीं भिजवा दे।''

''यहीं? जैसी तुम्हारी इच्छा। लेकिन मैं तुम्हारे सामने बैठकर कैसे खाऊँगी? कभी खाते देखा है?''

''देखा तो नहीं है, पर देखने में बुराई क्या है?''

''भला ऐसा भी कहीं होता है! स्त्रियों का राक्षसी खाना तुम लोगों को हम देखने ही क्यों देंगी?''

''देखो लक्ष्मी, तुम्हारी यह चाल आज नहीं चलेगी। तुम्हें अकारण ही उपवास नहीं करने दूँगा। खाओगी नहीं तो मं तुमसे नहीं बोलूँगा।''

''न बोलना।''

''मैं भी नहीं खाऊँगा।''

राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, ''इस बार जीत गये, क्योंकि यह मैं न सह सकूँगी।''

रसोइया भोजन दे गया। फल, फूल, मिष्टान्न। नाम-मात्र भोजन कर वह बोली, ''रतन ने शिकायत की है कि मैं खाती नहीं हूँ, परन्तु तुम ही बताओ, मैं खाती क्योंकर? हारे हुए मुकद्दमे की अपील करने कलकत्ते आई थी। रतन नित्य तुम्हारे यहाँ से वापिस आता था पर भय के मारे कुछ पूछने का साहस ही मेरा न होता था, क्योंकि, वह कहीं यह न कह दे कि मुलाकात हुई थी पर बाबू आये नहीं। जो दुर्व्यवहार किया है, उसके कारण मेरे पास तो कहने के लिए कुछ है नहीं।''

''कहने की आवश्यकता भी नहीं है। उस समय स्वयं घर आकर, जिस प्रकार काँचपोका* तिलचट्टे को पकड़ ले जाता है, तुम भी ले जातीं।''

''तिलचट्टा कौन-तुम?''

''यही तो समझता हूँ, ऐसा निरीह जीव संसार में और कौन है?''

एक क्षण चुप रहकर राजलक्ष्मी बोली, ''किन्तु तो भी, मन ही मन मैं जितना तुमसे डरती हूँ उतना और किसी से नहीं।''

''यह परिहास है। पर इसका कारण पूछ सकता हूँ?''

राजलक्ष्मी फिर कुछ क्षण तक मेरी ओर देखती रही। बोली, ''कारण यह है कि मैं तुम्हें भलीभाँति पहचानती हूँ। मैं जानती हूँ कि स्त्रियों के प्रति तुम्हारी सचमुच की आसक्ति जरा भी नहीं है, जो कुछ है वह केवल दिखाने का शिष्टाचार है। संसार में किसी के प्रति भी तुम्हें मोह नहीं है। यथार्थ प्रयोजन भी तुम्हें उसका नहीं है। तुम्हारे 'ना' कह देने पर किस प्रकार तुम्हें लौटाऊँगी?''

''लक्ष्मी, इसमें थोड़ी-सी भूल हो गयी है। पृथ्वी की एक वस्तु में आज भी मेरा मोह है, और वह हो तुम। केवल यहीं पर 'ना' नहीं कहा जाता। तुमने अब तक श्रीकान्त की यही बात न जानी कि केवल इसके लिए वह दुनिया की सब वस्तुओं को त्याग सकता है।''

''हाथ धो आऊँ,'' कहकर राजलक्ष्मी जल्दी से उठकर चली गयी।

दूसरे दिन, और दिनान्त के सब काम निबटाकर, राजलक्ष्मी मेरे पास आ बैठी। कहने लगी, ''कमललता की कहानी सुनूँगी, सुनाओ।'' जो कुछ जानता था, सब सुना दिया, केवल अपने सम्बन्ध में कुछ कुछ छोड़ दिया, क्यों कि उससे गलतफहमी होने की सम्भावना थी।

 
मन लगाकर आद्योपान्त सारी बातें सुनकर उसने धीरे से कहा, ''यतीन की मृत्यु ही उसे सबसे अधिक चुभी है, उसी के दोष से वह मारा गया।''

''उसका क्या दोष?''

''दोष कैसे नहीं है? अपना कलंक छुपाने के लिए उसी से आत्महत्या करने में सहायता माँगी थी। उस दिन तो यतीन स्वीकार नहीं कर सका, किन्तु एक दिन अपना कलंक छिपाने के लिए उसे भी वही मार्ग सबसे पहले नजर आया। ऐसा ही होता है, इसीलिए पाप में सहायता के लिए किसी मित्र को नहीं बुलाना चाहिए। इससे एक का प्रायश्चित दूसरे के गले पड़ जाता है। वह स्वयं तो बच गयी, किन्तु उसके स्नेह का धन मर गया।''

''युक्ति कुछ समय में नहीं आई, लक्ष्मी।''

''तुम कैसे समझोगे? समझा है कमललता ने और तुम्हारी राजलक्ष्मी ने।''

''ओ:-ऐसा है!''

''नहीं तो क्या। भला कहो तो हमारा जीवन कितना-सा है, उसका क्या मूल्य है, जब हम देखती हैं तुम्हारी तरफ...।''

''किन्तु कल तुमने ही तो कहा था कि मेरे मन की सब कालिख साफ हो गयी और अब कोई ग्लानि नहीं है, तो वह क्या झूठ था?''

''झूठ ही तो था। कालिख तो मरने पर ही पुछेगी, उससे पहले नहीं। मरना भी चाहा था, केवल तुम्हारे ही कारण न मर सकी।''

× हरे रंग का एक पतिंगा

''सब मालूम है, पर तुम यदि इसे लेकर बारम्बार दु:ख दोगी तो मैं इस तरह भाग जाऊँगा कि फिर ढूँढ़ने पर भी न पाओगी।''

राजलक्ष्मी ने भयभीत होकर मेरा हाथ पकड़ लिया और बिल्कुरल छाती के पास खिसक आयी। बोली, ''अब ऐसी बात कभी मुँह पर भी नहीं लाना। तुम सब कुछ कर सकते हो, तुम्हारी निष्ठुरता कहीं भी बाधा नहीं मानती।''

''तब कहो कि अब ऐसी बात न कहोगी?''

''नहीं कहूँगी।''

''बोलो, सोचूँगी भी नहीं।''

''तुम भी कहो कि अब मुझे छोड़कर कभी नहीं जाओगे।''

''मैं तो कभी गया नहीं लक्ष्मी, और जब कभी गया हूँ तब केवल इसीलिए कि तुमने मुझे नहीं चाहा।''

''वह तुम्हारी लक्ष्मी नहीं, कोई और होगी।''

''उस किसी और से ही तो आज भय लगता है।''

''नहीं, अब उससे मत डरो, वह राक्षसी मर चुकी है।''

यह कहकर उसने मेरे उसी हाथ को जोर से पकड़ लिया और चुपचाप बैठी रही।

पाँच-छह मिनट तक इसी प्रकार बैठे रहने के पश्चात उसने दूसरी चर्चा छेड़ दी, कहा, ''तुम क्या सचमुच बर्मा जाओगे?''

''हाँ, सचमुच ही जाऊँगा।''

''जाकर क्या करोगे- नौकरी? पर हम लोग तो सिर्फ दो ही प्राणी हैं- हम लोगों की आवश्यकताएँ ही कितनी हैं?''

''किन्तु उन कितनी का भी तो प्रबन्ध करना होगा?''

''वह भगवान दे देंगे। पर तुम नौकरी नहीं करने पाओगे, यह तुम्हारे स्वभाव के अनुकूल नहीं है।''

''नहीं कर सकूँगा तो वापिस चला आऊँगा।''

''जानती हूँ, वापिस तो आना ही पड़ेगा, केवल मुझको कष्ट देने के लिए हठपूर्वक इतनी दूर ले जाना चाहते हो।''

''चाहो तो कष्ट नहीं भी करो।''

राजलक्ष्मी ने एक क्रुद्ध कटाक्ष फेंककर कहा, ''देखो, चालाकी मत करो!''

मैंने कहा, ''चालाकी नहीं करता, चलने से तुम्हें वास्तव में कष्ट होगा। भोजन पकाना, बर्तन माँजना, घर-बार साफ करना, बिछौने बिछाना...।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तब दाई-नौकर क्या करेंगे?''

''दाई-नौकर कहाँ? उनके लिए रुपये कहाँ हैं?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''अच्छा न सही। तुम चाहे कितना ही भय दिखाओ, लेकिन मैं तो चलूँगी ही।''

''तो चलो। केवल मैं और तुम, काम के मारे न मिलेगा झगड़ा करने का अवसर और न मिलेगी पूजा तथा उपवास करने की फुर्सत।''

''न मिलने दो। मैं क्या काम से डरती हूँ?''

''सच है; डरती नहीं हो, पर तुम कर न सकोगी। दो दिन बाद ही वापिस आने के लिए आफत मचाना शुरू कर दोगी।''

''इसमें भी क्या कोई डर है? साथ लेकर जाऊँगी तथा साथ ही वापिस ले आऊँगी। कम से कम तुम्हें छोड़कर तो न आना होगा।'' कहकर वह एक क्षण के लिए कुछ सोचने लगी, फिर बोली, ''हाँ, यह ठीक रहेगा। एक छोटे से घर में केवल हम और तुम रहेंगे, न कोई दास होगा न दासी। जो खाने को दूँगी वही खाओगे, जो पहनने को दूँगी वही पहनोगे। नहीं? तुम देखना, मेरी आने की शायद इच्छा ही न होगी।''

सहसा वह मेरी गोदी में अपना सिर रखकर लेट गयी और बहुत देर तक ऑंखें बन्द कर निस्तब्ध पड़ी रही।

''क्या सोच रही हो?''

राजलक्ष्मी नेत्र खोलकर किंचित् मुस्कराई और बोली, ''हम लोग कब चलेंगे?''

''इस मकान की कुछ व्यवस्था कर दो, फिर जिस दिन चाहो प्रस्थान कर दो।''

उसने सिर हिलाकर स्वीकृति जताई और फिर नेत्र मूँद लिये।

''फिर क्या सोच रही हो?''

राजलक्ष्मी ने ताकते हुए कहा, ''सोच रही हूँ कि एक बार मुरारीपुर नहीं जाओगे?''

''हाँ, विदेश जाने से पूर्व एक बार उन्हें मिल आने का वचन तो दिया था।''

''तो चलो, कल ही दोनों चलें।''

''तुम भी चलोगी?''

''क्यों, इसमें डर क्या है? तुम्हें चाहती है कमललता और उसे चाहते हैं हमारे गौहर दादा। यह हुआ खूब है!''

''यह सब तुमसे किसने कहा?''

''तुम्हीं ने।''

''न, मैंने नहीं कहा।''

''हाँ, तुम्हीं ने कहा है, केवल तुम्हें यह खयाल नहीं है कि कब कहा है।'' सुनकर संकोच से व्याकुल हो उठा। कहा, ''खैर, जो कुछ भी हो, तुम्हारा वहाँ जाना उचित नहीं है।''

''क्यों नहीं है?''

''उस बेचारी का मजाक करके तुम उसे तंग कर डालोगी।''

राजलक्ष्मी की भृकुटी तन गयी, उसने क्रोधित स्वर में कहा, ''अब तक तुम्हें यही परिचय मिला है? मैं क्या उसे इसीलिए लज्जित करूँगी कि वह तुमसे प्रेम करती है? तुमसे प्रेम करना क्या अपराध है? मैं भी तो स्त्री हूँ। यह भी तो हो सकता है कि जाने पर मैं भी उसे चाहने लग जाऊँ!''

''तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है लक्ष्मी। चलो, तुम भी चलो।''

''हाँ, चलो, कल सवेरे की गाड़ी से ही हम दोनों चल दें। तुम कोई चिन्ता न करो, इस जीवन में मैं तुम्हें कभी दु:खी न करूँगी।''

इतना कहकर वह एक तरह विमना-सी हो गयी। ऑंखें बन्द हो गयीं, साँस रुकने लगा, सहसा न जाने वह कितनी दूर चली गयी।

भयभीत होकर उसे हिलाकर पूछा, ''यह क्या?''

राजलक्ष्मी ऑंखें खोलकर किंचित् मुस्कराई और बोली, ''कहाँ, कुछ भी तो नहीं!''

आज उसकी यह हँसी भी न जाने मुझे कैसी लगी!

दूसरे दिन मेरी अनिच्छा के कारण जाना न हुआ किन्तु उसके अगले दिन किसी प्रकार भी न अटका सका और मुरारीपुर के अखाड़े के लिए रवाना होना पड़ा। जिसके बिना एक कदम भी चलना मुश्किल है वह राजलक्ष्मी का वाहन रतन तो साथ चला ही, पर रसोईघर की दाई लालू की माँ भी साथ चली। कुछ जरुरी चीजें लेकर रतन सबेरे की गाड़ी से रवाना हो गया है। वहाँ पहुँचकर वह स्टेशन पर पहले ही से दो घोड़ागाड़ियाँ ठीक कर रक्खेगा। हम लोगों के साथ जो सामान बाँध गया है वह भी तो कम नहीं है।

मैंने प्रश्न किया, ''वहाँ क्या घर-बार बसाने जा रही हो?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''वहाँ क्या दो-एक दिन भी न रहेंगे? देश के वन-जंगल, नदी-नाले, घाट-मैदान क्या तुम अकेले ही देख आओगे? मैं क्या उस देश की लड़की नहीं हूँ? मेरी क्या देखने की इच्छा नहीं होती?''

''मानता हूँ कि होती है, पर इतनी चीजें, इतने तरह का खाने-पीने का आयोजन।''

''तो तुम क्या यह कहते हो कि देवस्थान में खाली हाथ चला जाय? और तुम्हें तो कुछ सब ढोना नहीं है, फिर इतनी चिन्ता क्यों?''

चिन्ता तो बहुत थी, पर कहता किससे? सबसे अधिक भय इसी बात का था कि यह वैष्णवी-वैरागियों का छुआ हुआ देवता का प्रसाद माथे पर तो मजे से चढ़ा लेगी किन्तु मुँह में न डालेगी। और कौन जानता है कि वहाँ जाकर किस बहाने उपवास प्रारम्भ कर देगी या भोजन पकाने बैठ जायेगी। केवल एक भरोसा है। राजलक्ष्मी का मन सचमुच ही भद्र है। अकारण गले पड़कर वह किसी को चोट नहीं पहुँचा सकती। यदि उसे कुछ ऐसा करना भी हुआ तो प्रसन्न-मुख हास-परिहास के साथ इस प्रकार करेगी कि मुझे और रतन को छोड़ कोई समझ भी नहीं पायेगा।

राजलक्ष्मी के शारीरिक गठन में बाहुल्य-भार कभी नहीं हुआ और फिर संयम तथा उपवास ने उसे मानो लघुता की एक दीप्ति दान दी है। विशेषकर आज उसकी साज-सज्जा कुछ विचित्र ही है। भोर होने के पहले ही वह स्नान कर आई है, गंगाघाट के उड़िया पण्डे का यत्नपूर्वक लगाया हुआ तिलक उसके मस्तक पर है, कत्थई रंग की फूल-फल तथा बेल-बूटों से चित्रित वृन्दावनी साड़ी पहन रक्खी है, शरीर पर वे ही कुछ थोड़े-से गहने हैं, मुख पर स्निग्धा प्रसन्नता है, और अपने काम में तल्लीन है। कल लम्बे आईने लगीं दो आलमारियाँ खरीद लाई थी, आज जाने से पूर्व उनमें जल्दी-जल्दी न जाने क्या रख रही है। काम करते-करते उसके हाथों के कड़ों की शार्क मछली की ऑंखें बीच-बीच में चमक उठती हैं, गले में पड़े हुए हीरे-पन्ने की जड़ाऊ हार की विभिन्न वर्णच्छटा किनारी के व्यवधान में से झलक उठती है। उसके कानों के पास से भी एक नीली आभा निकल रही है। मेज पर चाय पीने बैठकर मैं एकटक उसी ओर देख रहा था। उसमें एक दोष था, घर में वह जाकेट ब्लाउज नहीं पहिनती थी, अतएव जरा असावधन होने पर उसकी गर्दन तथा बाहु का बहुत-सा अंश अनावृत हो पड़ता था। यदि इसके लिए कहा जाता तो वह हँसकर कहती- बाबा, मुझसे यह सब नहीं हो सकता। मैं ठहरी गाँव की औरत, मुझे दिन-रात बीबियाना ठाठ नहीं सुहाता। अर्थात्, हम शुचि-वायुग्रस्त जीवों के लिए कपड़ों का ज्यादा पहिनना परेशानी का काम है। आलमारी का पलड़ा बन्द करते हुए एकाएक आईने में उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ गयी। शीघ्रता से साड़ी सँभालकर वह मेरी ओर घूमकर खड़ी हो गयी और नाराज होकर बोली, ''फिर भी ताक रहे हो? अबकी बार-बार मुझे इतना क्यों ताक रहे हो, कहो तो?'' और कहकर ही वह हँस पड़ी।

मैं भी हँसा, बोला, ''सोच रहा था कि विधाता को फरमाइश देकर न जाने किसने तुम्हें गढ़वाया था।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुमने। नहीं तो दुनिया से ऐसी निराली पसन्दगी और किसकी हो सकती है? मेरे आने के पाँच-छह वर्ष पूर्व तुम आये थे, और आते समय उन्हें बयाना दे आये थे। याद नहीं है क्या?''

''नहीं, किन्तु तुमने कैसे जाना?''

''चालान करते समय विधाता ने ही कान में कह दिया था। पर तुम चाय पी चुके? देर करोगे तो आज भी जाना नहीं होगा।''

''न सही।''

''पर बतलाओ, क्यों?''

''वहाँ भीड़ में शायद तुम्हें ढूँढ़ न पाऊँगा।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''मुझे तो तुम पा लोगे, पर मैं तुम्हें खोजकर पा जाऊँ तो गनीमत है।''

मैंने कहा, ''यह भी तो ठीक नहीं है।''

उसने हँसकर कहा, ''नहीं, ऐसा नहीं होगा। तुम्हें चलना ही पड़ेगा। सुना है कि 'नये गुसाईं' का वहाँ एक अलग कमरा है, मैं जाते ही उसका कुण्डा तोड़कर रख दूँगी। कोई भय नहीं, ढूँढ़ना नहीं होगा- दासी तुम्हें यों ही मिल जायेगी।''

''तो चलो।''

जिस समय हम लोग मठ में पहुँचे उस समय देवता की मधयाह्नकालीन पूजा समाप्त ही हुई थी। बिना बुलाए बिना सूचना के अकस्मात् इतने प्राणी हाजिर हो गये, किन्तु फिर भी, उन लोगों की इतनी खुशी हुई कि कह नहीं सकता। बड़े गुसाईं आश्रम में नहीं हैं, गुरुदेव से मिलने फिर नवद्वीप गये हैं, किन्तु इस बीच ही दो वैरागियों ने आकर मेरे कमरे में अड्डा जमा लिया है।

कमललता, पद्मा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा और भी कई ने आकर हम लोगों की सादर अभ्यर्थना की। कमललता ने भरे गले से कहा, ''नये गुसाईं, तुम इतनी जल्दी फिर हम लोगों को दिखाई दोगे, ऐसी आशा नहीं की थी।''

राजलक्ष्मी ने इस प्रकार बातचीत की, मानो न जाने कब का परिचय है। कहा, ''कमललता जीजी, इन कई दिनों से इनकी जबान पर केवल तुम्हारी ही चर्चा थी। इससे पहले ही आना चाहते थे, पर मेरे कारण ही ऐसा न हो सका। इसमें मेरा ही दोष है।''

कमललता का मुख कुछ क्षण के लिए लाल हो गया, पद्मा हँस पड़ी और उसने ऑंखें फिरा लीं।

राजलक्ष्मी की वेश-भूषा तथा चेहरे से सभी ने उसे भद्र परिवार का समझा, केवल मेरे साथ उसका क्या सम्बन्ध है, यह निस्सन्देह कोई न जान सका। परिचय के लिए सभी उत्सुक हो रहे। राजलक्ष्मी की ऑंखों से कुछ भी नहीं छिपता। उसने कहा, ''कमललता दीदी, मुझे पहिचान नहीं सकीं?''

कमललता ने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं।''

''वृन्दावन में कभी नहीं देखा?''

कमललता भी निर्बोध नहीं है, उसने परिहास समझ लिया और हँसकर कहा, ''याद तो नहीं पड़ रहा बहन।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''याद न पड़ना ही अच्छा है जीजी। मैं इसी देश की लड़की हूँ, वृन्दावन को कभी नहीं गयी।'' कहकर वह हँस पड़ी। फिर लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्य सबके चले जाने के बाद मुझे दिखाकर कहा, ''हम लोग एक ही गाँव में एक ही गुरु की पाठशाला में पढ़ते थे, दोनों में ऐसा प्रेम था जैसे भाई-बहन हों। मैं मुहल्ले के रिश्ते से 'दादा' कहकर पुकारती थी और ये मुझे बहन की तरह प्यार करते। शरीर पर कभी हाथ तक नहीं लगाया।'' फिर मेरी ओर देखकर कहा, ''क्यों जी, जो कुछ कह रही हूँ सच है न?''

पद्मा खुश होकर बोली, ''इसी से तुम दोनों देखने में एक से लगते हो। दोनों ही ऊँचे और पतले, केवल तुम गोरी हो और नये गुसाईं साँवले।''

राजलक्ष्मी ने गम्भीर होकर कहा, ''हम लोगों के ठीक एक से हुए बिना काम कैसे चल सकता पद्मा?''

''अरी मैया! तुम्हें तो मेरा नाम भी मालूम है। नये गुसाईं ने बता दिया है शायद?''

''बताया है, तभी तो तुम लोगों को देखने आयीं। मैंने कहा, ''अकेले क्यों जाओगे? मुझे भी साथ ले चलो। तुमसे तो मुझे कोई डर नहीं, एक साथ देखकर कोई कलंक भी न लगायेगा और यदि लगाया भी तो हर्ज क्या है, विष नीलकण्ठ के गले में ही रह जायेगा, पेट में नहीं उतरेगा।''

मैं अब चुप न रह सका। औरतों का यह किस प्रकार का मजाक है, यह वे ही जानें। क्रोधित होकर कहा, ''बताओ, लड़कियों के साथ क्यों झूठा मजाक कर रही हो?''

राजलक्ष्मी ने भले मानुस की तरह कहा, ''सच्चा मजाक न हो तुम्हीं बता दो। जो कुछ जानती हूँ, सरल मन से कह रही हूँ, इससे तुम नाराज क्यों होते हो?''

उसका गाम्भीर्य देखकर गुस्से होकर भी मैं हँस पड़ा, ''हाँ, सरल मन से कह रही हो! कमललता, संसार में इतनी बड़ी शैतान और वाचाल तुम्हें तलाश करने पर भी दूसरी नहीं मिलेगी। इसका कुछ न कुछ मतलब है, इसकी सब बातों पर सहज ही विश्वास न कर लेना।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''निन्दा क्यों करते हो गुसाईं? तब तो मेरे सम्बन्ध में तुम्हारे मन में ही कोई मतलब है।''

''हाँ, है तो।''

''पर मेरे मन में नहीं है। मैं निष्पाप निष्कलंक हूँ।''

''हाँ, युधिष्ठिर!''

कमललता भी हँसी, किन्तु उसके बोलने की भंगिमा पर। वह शायद ठीक-ठीक कुछ समझ न सकी, सिर्फ उलझन में पड़ गयी। कारण, उस दिन भी तो किसी रमणी से अपने सम्बन्ध का मैंने कोई आभास नहीं दिया था। और देता भी किस तरह? देने के लिए उस दिन था ही क्या?

कमललता ने पूछा, ''तुम्हारा नाम क्या है बहिन?''

''मेरा नाम राजलक्ष्मी है, और ये पहले का अंश छोड़कर कहते हैं, केवल 'लक्ष्मी'। मैं इन्हें 'ए जी', 'ओ जी', 'सुनो' कहकर पुकारती थी। किन्तु अब 'नये गुसाईं' कहकर पुकारने के लिए कहा है। कहते हैं इससे तृप्ति होगी।''

पद्मा ने सहसा ताली बजाकर कहा, ''मैं समझ गयी।''

कमललता ने उसे धमकाकर कहा, ''जलमुँही के भारी बुद्धि है न। बता तो, क्या समझी?''

''निश्चय समझ गयी। बताऊँ?''

''बताना नहीं होगा, जा।'' कहकर उसने स्नेह के साथ राजलक्ष्मी का हाथ पकड़कर कहा, ''बातों ही बातों में देर हो रही है बहन, धूप में मुँह सूख गया है। जानती हूँ, कुछ खाकर भी नहीं आयी। चलो, हाथ-मुँह धोकर देवता को प्रणाम करो, फिर सभी मिलकर प्रसाद पाएं। तुम भी चलो गुसाईं- कहकर वह उसका हाथ पकड़कर मन्दिर की ओर खींच ले गयी।

अबकी बार मन ही मन मुझे विपत्ति दिखाई दी, क्योंकि अब आयेगा प्रसाद ग्रहण करने का आह्नान। खाने-पीने और छुआछूत का विचार राजलक्ष्मी के जीवन के साथ इस प्रकार ग्रंथित है कि इस विषय में सत्यासत्य का प्रश्न अवैध है। यह केवल विश्वास नहीं है, उसका स्वभाव है। इसे छोड़कर वह जी नहीं सकती। यह कोई नहीं जान सकता कि जीवन के इस एकान्त प्रयोजन की सहज और सक्रिय सजीवता ने कितनी बार कितने संकटों से उसकी रक्षा की है- अपने आप वह बतायेगी नहीं और जानने से कोई लाभ नहीं। केवल मैं ही जानता हूँ कि एक दिन राजलक्ष्मी को बिना चाहे ही दैवात् पाया है और आज वह सभी प्राप्त वस्तुओं से बढ़कर है। किन्तु इस समय उस बात को जाने दो।

उसकी जो कुछ कठोरता है वह केवल अपने लिए, उसमें दूसरे पर कोई अत्याचार नहीं है। वह हँसकर कहती है, ''बाबा, जरूरत क्या है इतना कष्ट करने की? आजकल के समय में इतना बचकर चलने से प्राण नहीं बच सकते।'' वह जानती है कि मैं कुछ नहीं मानता। वह इसी में खुश है कि उसकी ऑंखों के सामने कुछ भयंकर घटना न हो। मेरी परोक्ष अनाचार की कहानी से कभी तो वह अपने दोनों कानों को बन्द करके अपनी रक्षा करती है, या कभी गाल पर हाथ देकर अवाक् होकर कहती है, मेरे दुर्भाग्य से तुम ऐसे क्यों हुए? तुम्हारे कारण मेरा सब कुछ गया।

किन्तु आज का मामला ठीक वैसा नहीं है। इस निर्जन मठ में जो कई प्राणी शान्ति से रहते हैं वे सब दीक्षित वैष्णव-धार्मावलम्बी हैं। ये लोग जाति-भेद नहीं मानते और पूर्वाश्रम की बातें कभी मन में भी नहीं लाते। इसी से किसी अतिथि के आने पर ये लोग नि:संकोच श्रद्धापूर्वक प्रसाद वितरण करते हैं और आज तक किसी ने भी प्रसाद को अस्वीकार कर इन लोगों का अपमान नहीं किया। किन्तु यह अप्रीतिकार कार्य यदि आज, बिना बुलाये आकर, हमारे ही द्वारा घटित हो तो दु:ख की सीमा न रहेगी- और विशेषकर मेरे दु:ख की। यह मैं जानता था कि कमललता मुँह से कुछ न कहेगी, किसी को कुछ कहने भी न देगी- और शायद केवल एक बार मेरी ओर देखकर ही फिर सिर नीचा कर अन्यत्र खिसक जायेगी। तब उस मूक अभियोग का क्या उत्तर होगा- खड़ा-खड़ा मैं यही सोच रहा था कि। इसी समय पद्मा ने आकर कहा, ''चलो नये गुसाईं, दीदी तुम्हें बुला रही हैं। हाथ-मुँह धो लिया है?''

''नहीं।''

''तो आओ, मैं पानी देती हूँ। प्रसाद दिया जा रहा है।''

''आज क्या प्रसाद बना है?''

''आज देवता को अन्न-भोग लगा है।''

मैंने मन ही मन कहा कि तब तो और भी खुशी की खबर है। पूछा, ''प्रसाद किस जगह दिया जा रहा है?''

पद्मा ने कहा, ''देवगृह के बरामदे में। तुम बाबाजी लोगों के साथ बैठोगे और हम औरतें बाद में खायेंगीं। आज हम लोगों को स्वयं राजलक्ष्मी दीदी परोसेंगी।''

''वे खायेंगी नहीं?''

''नहीं, वह तो हम लोगों की तरह वैष्णव नहीं हैं, ब्राह्मण की लड़की हैं। हम लोगों का छुआ खाने से उन्हें पाप लगता है।''

''तुम्हारी कमललता दीदी नाराज नहीं हुईं?''

''नाराज क्यों होंगी, वरन् हँसने लगीं। राजलक्ष्मी ने दीदी से कहा, अगले जन्म में हम दोनों बहिनें एक ही माँ के पेट से जन्म लेंगी। पहले मैं पैदा होऊँगी और तुम बाद में। तब दोनों बहिनें माँ के हाथ से एक ही पत्तल भर खायेंगी। उस समय यदि जात नष्ट होने की बात कहोगी तो माँ कान मल देंगी।''

सुनकर खुश होकर सोचा, अब ठीक हुआ। राजलक्ष्मी को बात करने में अभी तक कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं मिला था। पूछा, ''क्या जवाब दिया?''

पद्मा ने कहा, ''राजलक्ष्मी दीदी भी सुनकर हँसने लगीं। कहने लगीं, माँ क्यों दीदी, तुम तो बड़ी बहन होगी ही, स्वयं कान मल देना। छोटी की इतनी हिमाकत किसी तरह बर्दाश्त न करना।''

प्रत्युत्तर सुनकर चुप हो गया। मन ही मन प्रार्थना करता रहा कि कमललता इसके भीतरी अर्थ को न समझ सके।

जाकर देखा कि मेरी प्रार्थना मंजूर हो गयी है। कमललता ने उस बात पर कोई ध्या न नहीं दिया, बल्कि इस अमल को न मानकर ही इस बीच दोनों में खूब मेल हो गया है।

शाम की गाड़ी से बड़े गुसाईं द्वारिकाप्रसाद आ गये और उनके साथ और भी कई बाबाजी आये। सर्वांग में छापों का परिमाण और वैचित्रय देखकर सन्देह न रहा कि ये भी अवहेलना के पात्र नहीं हैं। बड़े गुसाईं मुझे देखकर बहुत खुश हुए किन्तु उनके साथियों ने मेरी कोई परवाह न की। परवाह करनी भी न चाहिए, क्योंकि, सुना गया, उनमें से तो एक तो ख्यातिप्राप्त कीर्त्तन-कर्त्ता हैं और दूसरे मृदंग बजाने में उस्ताद।

प्रसाद पाना समाप्त होने पर मैं बाहर निकल पड़ा। वही सूखी नदी और वही वन-जंगल। चारों ओर वेणु और बेंत के कुंज हैं- शरीर बचाकर चलना मुश्किल है। आसन्न सूर्यास्त के समय किनारे पर बैठकर प्रकृति की लीला निरीक्षण करने का संकल्प किया, किन्तु बोध हुआ कि पास ही कहीं अरबी जाति के 'अंधेरे के माणिक' (फूल) खिले हैं। उनकी सड़े हुए मांस जैसी बीभत्स दुर्गन्ध ने बैठने नहीं दिया। मन ही मन सोचा कि कवियों को यह फूल बहुत पसन्द है। कोई इन फूलों को ले जाकर उन्हें उपहार क्यों नहीं देता? संध्याक होने के पूर्व ही लौट आया। जाकर देखा कि वहाँ समारोह की धूम है। ठाकुर- घर सजाया जा रहा है और आरती के बाद कीर्तन की बैठक होगी।

पद्मा ने कहा, ''नये गुसाईं, कीर्तन सुनना तुम्हें अच्छा लगता है, आज मनोहरदास बाबाजी का गाना सुनने पर तुम अवाक् हो जाओगे। कैसा बढ़िया गाते हैं!''

वस्तुत: मेरे लिए वैष्णव कवियों की पदावली जैसी अन्य कोई मधुर वस्तु नहीं है। कहा, ''सच, मुझे बहुत अच्छा लगता है पद्मा। बचपन में दो-चार कोस के भीतर कहीं भी कीर्तन होने की खबर सुनता था तो तत्काल दौड़ जाता था, किसी भी तरह घर में नहीं रह सकता था। समझ में आये चाहे न आये, लेकिन अन्त तक बैठा रहता था। कमललता, आज तुम नहीं गाओगी?''

कमललता ने कहा, ''नहीं गुसाईं, आज नहीं। मेरी तो वैसी शिक्षा नहीं है, इसीलिए उनके सामने गाते हुए शर्म आती है। इसके अलावा उस बीमारी से गला इतना खराब हो गया है कि अभी तक ठीक नहीं हुआ।''

''पर लक्ष्मी तो तुम्हारा गाना सुनने ही आई है। उसका खयाल है कि मैंने तुम्हारे विषय में बढ़ा-चढ़ाकर कहा है।''

कमललता ने लज्जा से कहा, ''बढ़ा-चढ़ाकर तो जरूर कहा होगा गुसाईं।'' इसके बाद स्मित हास्य के साथ राजलक्ष्मी से कहा, ''तुम कुछ खयाल न करना बहन, जो कुछ थोड़ा-बहुत आता है, वह किसी और दिन सुनाऊँगी।''

राजलक्ष्मी ने प्रसन्न होकर कहा, ''अच्छा दीदी, तुम्हारी जिस दिन इच्छा हो बुला भेजना, मैं खुद आकर तुम्हारा गाना सुन जाऊँगी।'' मुझसे कहा, ''तुम्हें कीर्तन सुनना इतना अच्छा लगता है, यह तो तुमने कभी नहीं कहा?''

उत्तर दिया, ''तुमसे क्यों कहता? गंगामाटी में बीमार पड़कर जब शय्या पर पड़ा था, तब सूखे और सूने मैदानों की ओर देखते-देखते दोपहर का वक्त कटता था, और दुर्भर संध्या किसी तरह अकेले कटना ही न चाहती थीं...।''

राजलक्ष्मी ने चट से मेरे मुँह को अपने हाथ से दबा दिया। कहा, ''अगर और कुछ ज्यादा कहा, तो पैरों में सिर पटककर मर जाऊँगी।'' फिर खुद ही अप्रतिम हो हाथ हटाकर बोली, ''कमललता दीदी, अपने बड़े गुसाईंजी से कह आओ बहन, आज बाबाजी महाशय के कीर्तन के बाद ही मैं देवता को गाना सुनाऊँगी।''

कमललता ने संदिग्ध कण्ठ से कहा, ''लेकिन बहिन, बाबाजी बड़े टीका-टिप्पणी करने वाले हैं।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''भले ही हों, भगवान का नाम तो होगा।'' विग्रह मूर्तियों को हाथ से दिखाते हुए कहा, ''ये शायद खुश हों। और बाबाजीओं का तो मैं उतना खयाल नहीं करती बहिन, पर मेरे ये दुर्वासा-देवता प्रसन्न हो जाँय तो जान में जान आये!''

''प्रसन्न होने पर लेकिन बखशीश मिलेगी!''

राजलक्ष्मी ने सभय कहा, ''रक्षा करो, गुसाईं, कहीं सबके सामने बखशीश देने मत आ जाना। तुम्हारे लिए असम्भव कुछ भी नहीं है।''

सुनकर वैष्णवियाँ हँसने लगीं, पद्मा खुश होने पर ताली बजाने लगती है। बोली, ''मैं स-म-झ-ग-ई।''

कमललता ने उसकी तरफ सस्नेह देखकर हँसते हुए कहा, ''दूर हटकलमुँही-चुप रह।'' राजलक्ष्मी से बोली, ''इसे ले जाओ बहन, क्या मालूम अचानक क्या कह बैठे।''

देवता की संध्यात-आरती के बाद कीर्तन की बैठक जमी। आज बहुत-से दीपक जल रहे थे। वैष्णव-समाज में मुरारीपुर का आश्रम नितान्त अप्रसिद्ध नहीं है, नाना स्थानों से कीर्तन करने वाले वैरागियों के दल आने पर इस तरह का आयोजन अक्सर हुआ करता है। मठ में सब तरह के वाद्ययन्त्र मौजूद रहते हैं, देखा कि वे सब हाजिर कर दिये गये हैं। एक ओर वैष्णवियाँ बैठी हैं, सब परिचित हैं, दूसरी ओर अज्ञात-कुलशील अनेक वैरागी-मूर्तियाँ हैं, नाना उम्र और तरह-तरह के चेहरों की। बीच में विख्यात मनोहरदास और उनके मृदंगवादक आसीन हैं। मेरे कमरे पर हाल में ही दखल करने वाले नवयुवक बाबाजी हारमोनियम में सुर दे रहे हैं। यह प्रचार हो गया है कि कलकत्ते से एक सम्भ्रान्त घर की महिला आई हैं- वे ही गाना गायेंगी। वे युवती हैं और धनवती, उनके साथ आये हैं, दास-दासी, आयें हैं अनेक प्रकार के खाद्य-समूह और कोई एक नया गुसाईं भी आया है- वह है यहीं का एक घुमक्कड़।

मनोहरदास की कीर्तन की भूमिका और गौर-चन्द्रिका के* बीच राजलक्ष्मी कमललता के पास आकर बैठ गयी। हठात् बाबाजी महोदय का गला कुछ काँपकर सँभल गया, मृदंग पर थपकी नहीं पड़ी। यह एक नितान्त दैव की ही लीला थी। सिर्फ द्वारिकादास दीवार के सहारे जैसे ऑंखें बन्द किये बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। क्या मालूम, शायद वे जान ही न पाये कि कौन आया और कौन नहीं।

राजलक्ष्मी एक नीलाम्बरी साड़ी पहनकर आई है, और उसकी महीन जरी की किनारी के साथ नीले रंग का ब्लाउज मिलकर एक हो गया है। बाकी सब वैसा ही है, सिर्फ सुबह की उड़िया पण्डे की लगाई हुई छापें इस वक्त बहुत कुछ मिट गयी हैं- जो छापें बाकी बची हैं वे मानो आश्विन के छिन्न-भिन्न मेघ हैं जो न जाने कब नील आकाश में बिला जाँयगे। वह अति शिष्ट शान्त है, उसने मेरी ओर कटाक्ष से भी न ताका- मानो पहिचानती ही नहीं, तो भी क्यों उसने अपनी जरा-सी हँसी दबा दी, यह वही जाने। अथवा मेरी भी भूल हो सकती है; असम्भव तो है नहीं।

आज बाबाजी महाराज का गाना जमा नहीं, पर यह उनके अपने दोष से नहीं, लोगों की अधीरता के कारण। द्वारिकादास ने ऑंखें खोल राजलक्ष्मी का आह्नान कर कहा, ''दीदी, हमारे देवता को अब तुम कुछ निवेदन करके सुनाओ, सुनकर हम भी धन्य हों।''

राजलक्ष्मी उसी ओर मुँह करके बैठ गयी। द्वारिकादास ने मृदंग की ओर अंगुली से इशारा कर पूछा, ''इससे कोई बाधा तो पैदा न होगी?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं।''

यह सुनकर सिर्फ वे ही नहीं, बल्कि मनोहरदास भी मन ही मन कुछ विस्मित हुए, क्योंकि, एक साधारण स्त्री से शायद उन्होंने इतनी आशा नहीं की थी।

गाना शुरू हुआ। संकोच की जड़ता-अज्ञता की दुविधा कहीं भी नहीं है- नि:संशय कण्ठ अबाध जलस्रोत की तरह प्रवाहित होने लगा। जानता हूँ, इस विद्या में वह सुशिक्षिता है- यह उसकी जीविका थी, पर खयाल नहीं था कि बंगाल के अपने संगीत की इस धारा पर भी उसने इतने यत्न के साथ अधिकार कर रक्खा है। किसे मालूम था कि प्राचीन और आधुनिक वैष्णव कवियों की इतनी विभिन्न पदावलियों को उसने कण्ठस्थ कर रक्खा होगा। सिर्फ सुर, ताल और लय में नहीं, बल्कि वाक्य की विशुद्धता,

उच्चारण की स्पष्टता और प्रकाश-भंगी की मधुरता से उसने इस शाम को जिस विस्मय की सृष्टि की वह कल्पनातीत थी। पत्थर के देवता उसके सामने हैं और दुर्वासा देवता पीछे- कहना मुश्किल है कि उसकी यह आराधना किसको ज्यादा प्रसन्न करने के लिए थी। क्या जाने, यह बात आज उसके मन में थी या नहीं कि गंगामाटी के अपराध का थोड़ा-सा क्षालन भी इससे हो जाय।

* गाने के पहले चैतन्य देव की वन्दना।

वह गा रही थी-

एके पद-पंकज पंके विभूषित, कंटक जर जर मेल,

तुया दरसन आशे कछु नाहिं, जानलु, चिरदुख अब दूर गेल।

तोहारि मुरली जब श्रवणे प्रवेराल, छोड़नु गृहसुखआस,

पंथक दुख तृणहुं करि न गणनु कहतँ ह गोविन्ददास॥

बड़े गुसाईंजी की ऑंखों से अश्रुधारा बह रही थी, वे आवेग और आनन्द की प्रेरणा से उठ खड़े हुए। मूर्ति से कण्ठ से मल्लिका की माला उतारकर उन्होंने राजलक्ष्मी के गले में पहना दी और कहा, ''प्रार्थना करता हूँ, तुम्हारे सब अकल्याण दूर हो जाँय।''

राजलक्ष्मी ने झुककर नमस्कार किया, फिर उठकर मेरे पास आयीं, सबके सामने पैरों की धूल माथे पर लगाई और आहिस्ते से कहा, ''यह माला रक्खी है, बख्शीश का डर न दिखाया होता तो यहीं तुम्हारे गले में पहना देती।'' कहकर तुरन्त ही वह चली गयी।

गाने की बैठक खत्म हुई। ऐसा लगा मानो आज जीवन सार्थक हो गया।

क्रमश: प्रसाद-वितरण का आयोजन शुरू हुआ। अन्धकार में उसे जरा ओट में बुलाकर कहा, ''वह माला रख दो। यहाँ नहीं, घर लौटकर तुम्हारे हाथों से ही पहिनूँगा।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''यहाँ ठाकुर-घर में पहिन लोगे तो फिर उतार नहीं सकोगे- शायद इसी बात का डर है?''

''ओह, कैसे दानी हो! पर वह तो तुम्हारी ही रहती जी।''

''तुम्हें आज असंख्य धन्यवाद।''

''क्यों, बताओ तो सही?''

आज खयाल हो रहा है, मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ। रूप, गुण, रस, विद्या, स्नेह और सौजन्य से परिपूर्ण जो धन मुझे बिना याचना के ही मिला है, उसकी संसार में तुलना नहीं है। अपनी अयोग्यता के मारे शर्म आती है लक्ष्मी- तुम्हारे निकट मैं सचमुच बहुत कृतज्ञ हूँ।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''इस बार मैं सचमुच नाराज हो जाऊँगी।''

''सो हो जाओ। सोचता हूँ कि इस ऐश्वर्य को मैं कहाँ रक्खूँगा?''

''क्यों, चोरी जाने का डर है?''

''नहीं, ऐसा आदमी तो कोई नजर नहीं आता लक्ष्मी। चोरी करके तुम्हें रख छोड़ने लायक बड़ी जगह वह बेचारा कहाँ पावेगा?''

राजलक्ष्मी ने उत्तर नहीं दिया, मेरा हाथ खींचकर थोड़ी देर तक हृदय के समीप रख छोड़ा। फिर कहा, ''अंधकार में ऐसे आमने-सामने खड़े रहेंगे तो लोग हँसेंगे नहीं? पर सोच रही हूँ कि रात को तुम्हें कहाँ सुलाऊँगी- जगह तो है ही नहीं।''

''रहने दो, कहीं भी सोकर रात काट दूँगा।''

''सो तो काट दोगे, पर तबियत तो तुम्हारी अच्छी है नहीं, बीमार पड़ सकते हो।''

''तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं, ये लोग कुछ न कुछ करेंगे ही।''

राजलक्ष्मी ने चिन्ता के स्वर में कहा, ''सब कुछ देख तो रही हूँ, पता नहीं क्या व्यवस्था करेंगे! पर मैं फिक्र न करूँ और वे करें? चलो, थोड़ा-सा खाकर सो जाना।

लोगों की भीड़ के कारण सोने को सचमुच ही जगह न थी। उस रात को किसी तरह एक खुले बरामदे में मसहरी लगाकर मेरे सोने की व्यवस्था की गयी। त्रुटियों के कारण राजलक्ष्मी अशान्ति बोध करने लगी, शायद रात को बीच-बीच में आकर देख भी गयी, पर मेरी नींद में कोई बाधा नहीं पड़ी।

दूसरे दिन बिछौने से उठने पर देखा कि दोनों बहुत सारे फूल तोड़कर लौट आयी हैं। कमललता ने आज मेरे बदले राजलक्ष्मी को ही साथी बना लिया था। यह नहीं जानता था कि वहाँ अकेले में उनमें क्या-क्या बातें हुईं, पर आज उन दोनों का चेहरा देखकर मुझे बहुत सन्तोष हुआ। मानो दोनों बहुत पुरानी सखियाँ हैं, न जाने कितने समय की आत्मीय। कल दोनों एक साथ एक ही शय्या पर सोई थीं- जाति के विचार ने वहाँ किसी तरह का रोड़ा नहीं अटकाया। इस बारे में कि एक-दूसरे के हाथ का नहीं खातीं, कमललता ने मुझसे हँसकर कहा, ''तुम कुछ खयाल न करना गुसाईं, इसका प्रबन्ध हमारा हो गया है। अगली बार, मैं बड़ी बहिन होकर पैदा होऊँगी और इसके दोनों कान अच्छी तरह से मल दूँगी।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसके बदले मैंने भी एक शर्त करा ली है गुसाईं, कि अगर मैं मर जाऊँ तो इसे वैष्णवीपन से इस्तीफा देकर तुम्हारी सेवा में नियुक्त होना पड़ेगा। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम्हारे बिना मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी और तब भूत बनकर दीदी के सिर पर चढ़ी फिरूँगी- उसी सिन्दबाद जहाजी के कन्धों पर बूढ़े दैत्य की तरह-कन्धों पर बैठे-बैठे इसके द्वारा सब काम करा लूँगी, तब छोड़ूंगी।''

कमललता ने सहास्य कहा, ''तुम्हें मरने की जरूरत नहीं बहन, तुम्हें कन्धों पर लिये मैं हर वक्त नहीं घूम सकूँगी।''

सवेरे चाय पीकर गौहर की तलाश में बाहर निकला। कमललता ने आकर कहा, ''ज्यादा देर न करना गुसाईं, और उन्हें भी साथ लेते आना। इधर देवता का भोग तैयार करने के लिए आज एक ब्राह्मण पकड़ लाई हूँ। जैसा गन्दा है वैसा ही आलसी। उसे सहायता देने राजलक्ष्मी साथ में गयी हैं।''

''यह अच्छा नहीं किया। राजलक्ष्मी का खाना तो हो जायेगा, पर तुम्हारे देवता उपासे रहेंगे।''

कमललता ने डर से जीभ काटते हुए कहा, ''ऐसी बात न कहो गुसाईं, उसके कानों में भनक पड़ जायेगी तो फिर यहाँ जल भी ग्रहण नहीं करेगी।''

हँसकर कहा, ''चौबीस घण्टे भी नहीं बीते कमललता, पर तुमने उसको पहिचान लिया है।'' उसने भी हँसकर कहा, ''हाँ गुसाईं, पहिचान लिया है। करोड़ों में खोजने पर भी तुम्हें ऐसा एक भी मनुष्य नहीं मिलेगा भाई। तुम भाग्यवान् हो।''

गौहर से मुलाकात नहीं हुई, वह घर पर नहीं था। उसकी एक विधवा बहन सुनाम ग्राम में रहती है। नवीन ने बताया कि वहाँ न जाने कौन-सा एक नया रोग फैला है, बहुत आदमी मर रहे हैं। दरिद्र बहिन लड़के-बच्चों को लेकर आफत में पड़ गयी है, इसीलिए दवा-दारू कराने वह गया है। आज दस-बारह दिनों से कोई खबर नहीं है, नवीन डर के मारे मरा जा रहा है, पर कोई भी रास्ता उसे नहीं सूझता। एकाएक बड़े जोर से चीख मारकर वह रोने लगा। बोला, ''शायद मेरे बाबू अब जिन्दा नहीं हैं। मैं एक मूरख किसान हूँ, कभी गाँव से बाहर नहीं गया, नहीं जानता कि कहाँ वह देश है और कहाँ से जाना होता है, नहीं तो सारी घर-गृहस्थी डूब जाती तो भी नवीन अब तक घर न बैठा रहता। चक्रवर्ती की दिन-रात खुशामद करता हूँ कि महाराज, दया करो, जमीन बेचकर तुम्हें सौ रुपये देता हूँ, एक बार मुझे ले चलो, पर वह धूर्त ब्राह्मण जरा भी नहीं हिलता। पर यह भी कहे देता हूँ बाबू, कि अगर मेरे मालिक मर गये तो चक्रवर्ती के मकान को आग लगाकर जला दूँगा और फिर उसी आग में आत्महत्या करके मर जाऊँगा। इतने बड़े नमकहराम को मैं जिन्दा नहीं रहने दूँगा।''

उसको सान्त्वना देकर पूछा, ''जिले का नाम जानते हो नवीन?''

नवीन ने कहा, ''केवल यह सुना है कि वह गाँव नदिया जिले के किसी कोने में है। स्टेशन से बैलगाड़ी में काफी दूर जाना होता है।'' फिर बोला, ''चक्रवर्ती जानता है, पर ब्राह्मण यह भी नहीं बतलाना चाहता।''

नवीन पुरानी चिट्ठियाँ वगैरह संग्रह कर लाया, पर उनसे कोई पता नहीं चला। सिर्फ यह पता लगा कि दो महीने पहले विधवा बेटी की लड़की की शादी के लिए चक्रवर्ती ने गौहर से दो सौ रुपये वसूल किये थे!

मूर्ख गौहर के पास बहुत रुपया है, फलत: अक्षम्य दरिद्र उसे ठगेंगे ही- इसके लिए क्षोभ करना वृथा है, फिर भी इतनी बड़ी शैतानी बहुत कम नजर आती है।

नवीन ने कहा, ''उसके लिए तो बाबू का मरना ही अच्छा है, झंझटों से बच जायेगा न! उधर का एक पैसा भी नहीं चुकाना पड़ेगा।'' यह असम्भव नहीं है।

दोनों आदमी चक्रवर्ती के घर गये। इतना विनयी, ऐसी मीठी बातें करने वाला और ऐसा पर-दु:खकातर भद्र व्यक्ति संसार में दुर्लभ है! पर वृद्ध हो जाने के कारण स्मृति-शक्ति इतनी क्षीण हो गयी है कि उसे किसी भी तरह याद नहीं आया, यहाँ तक कि जिले का नाम भी खयाल न आया! बड़ी कोशिशों के बाद एक टाइम-टेबल लाकर उत्तर और पूर्व बंगाल के रेलवे स्टेशनों के सबके सब नाम पढ़ गया, फिर भी वह स्मरण न कर सका। दु:ख प्रकट करते हुए बोला, ''लोग न जाने कितनी चीजें और रुपया-पैसा उधर ले जाते हैं। बाबा, याद नहीं रहता और फिर कोई लौटाने भी नहीं आता। मन ही मन कहता हूँ कि सिर पर भगवान हैं, वे ही इसका विचार करेंगे।''

नवीन अब और बर्दाश्त न कर सका, गरज उठा, ''हाँ, वे ही तुम्हारा विचार करेंगे। अगर न करेंगे तो फिर मैं करूँगा!''

चक्रवर्ती ने स्नेहार्द्र मधुर कण्ठ से कहा, ''नवीन, झूठ-मूठ के लिए क्यों नाराज होते हो भैया, तीन पन बीत गये, एक पन बाकी रहा है। यदि जानता तो क्या इतना भी न करता? गौहर क्या मेरे लिए पराया है? वह तो मेरे लड़के की तरह है रे!''

नवीन ने कहा, ''यह सब मैं नहीं जानता। तुमसे अन्तिम बार कहता हूँ कि बाबू के पास ले चलना है तो ले चलो, नहीं तो जिस दिन उनकी कोई बुरी खबर मिलेगी, उस दिन रहे तुम और रहा मैं।''

चक्रवर्ती ने प्रत्युत्तर में कपाल पर हाथ मारकर सिर्फ इतना कहा, ''तकदीर नवीन, तकदीर! नहीं तो तुम मुझसे ऐसी बात कहते!''

अतएव, फिर दोनों आदमी लौट आये। मकान के बाहर खड़े होकर मैंने आशा की कि अनुतप्त चक्रवर्ती शायद अब भी बुला ले। पर कोई उत्तर नहीं मिला, दरवाजे की आड़ से झाँककर देखा कि चक्रवर्ती जली हुई चिलम फेंककर बड़े सन्तोष के साथ हुक्का तैयार कर रहा है।

गौहर का संवाद पाने का उपाय सोचते-सोचते जब मैं अखाड़े में पहुँचा, तब करीब तीन बजे थे। देवता के कमरे के बरामदे में औरतों की भीड़ लगी हुई थी। बाबाजियों में से कोई नहीं है, सम्भवत: सुप्रचुर प्रसाद-सेवा के परिश्रम से निर्जीव हो कहीं विश्राम कर रहे हैं-चूँकि रात के वक्त फिर एक बार प्रसाद से लड़ना होगा, अतएव उसके लिए भी बल-संचय करना जरूरी है!

झाँककर देखा कि भीड़ के बीच एक हाथ देखने वाला पण्डित बैठा हुआ है- पंचांग, पोथी, खड़िया, स्लेट, पेन्सिल इत्यादि गणना के विविध उपकरण उसके पास हैं। सबसे पहले पद्मा की नजर ही मुझ पर पड़ी, वह चिल्ला उठी, ''नये गुसाईं आ गये!''

कमललता ने कहा, ''तब ही जान गयी थी कि गौहर गुसाईं तुम्हें यों ही नहीं छोड़ देंगे, उन्होंने क्या खिलाया?''

राजलक्ष्मी ने उसका मुँह दबा दिया, ''रहने दो दीदी, यह मत पूछा।''

कमललता ने उसका हाथ हटाते हुए कहा, ''धूप में मुँह सूख गया है, रास्ते की धूल-मिट्टी सिर पर जम गयी है- नहाना-धोना हो गया क्या?''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''तेल तो छूते नहीं, इसलिए नहा-धो लेने पर भी पता नहीं चलेगा दीदी।''

''इसमें शक नहीं कि नवीन ने हर प्रकार की कोशिश की, पर मैंने स्वीकार नहीं किया, बिना नहाये खाये ही वापस लौट आया हूँ।''

राजलक्ष्मी ने बड़े आनन्द के साथ कहा, ''ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर कहा है कि मैं राजरानी होऊँगी।''

''क्या दिया?'

पद्मा ने कह दिया, ''पाँच रुपया। राजलक्ष्मी दीदी के ऑंचल में बँधे थे।''

मैंने हँसकर कहा, ''मुझे देतीं तो मैं उससे भी अच्छा बता सकता था।''

ज्योतिषी उड़िया ब्राह्मण था, बहुत अच्छी बंगला बोलता था- बंगाली कहा जा सकता है। उसने भी हँसकर कहा, ''नहीं महाशय, रुपये के लिए नहीं, रुपये तो मैं बहुत कमाता हूँ। सच कहता हूँ कि ऐसा अच्छा हाथ मैंने दूसरा नहीं देखा। देखिएगा, मेरा हाथ देखना कभी झूठ नहीं होता।''

कहा, ''ज्योतिषीजी, बिना हाथ देखे कुछ बता सकते हो?''

''बता सकता हूँ। एक फूल का नाम लीजिए।''

''सेमर का फूल।''

ज्योतिषी ने हँसकर कहा, ''सेमर का फूल ही सही। मैं बता दूँगा कि आप क्या चाहते हैं।'' कहकर उसने खड़िया से दो मिनट तक हिसाब लगाकर कहा, ''आप एक खबर जानना चाहते हैं।''

''कौन-सी खबर?''

वह मेरी ओर देखकर कहने लगा, ''नहीं, मामले-मुकदमे की नहीं, आप किसी आदमी की खबर जानना चाहते हैं।''

''कैसी खबर है, बता सकते हैं?''

''बता सकता हूँ। खबर अच्छी है, दो-एक दिन में ही मिल जायेगी।'' सुनकर मन ही मन विस्मित हुआ, मेरा चेहरा देखकर सबने ही यह अनुमान किया।

राजलक्ष्मी ने खुश होकर कहा, ''देखा न? मैं कहती हूँ कि ये बड़ी अच्छी गणना करते हैं, पर तुम लोग तो किसी बात पर विश्वास ही, करना चाहते-हँसकर उड़ा देते हो।''

कमललता ने कहा, ''अविश्वास किसका? नये गुसाईं, जरा अपना हाथ भी तो एक बार ज्योतिषीजी को दिखाओ।''

मेरे हाथ फैलाते ही ज्योतिषीजी ने अपने हाथ में मेरा हाथ ले लिया, दो-तीन मिनट तक पर्यवेक्षण किया, हिसाब लगाया, फिर कहा, ''महाशय, देखता हूँ कि आपके लिए एक बड़ी बहुत विपत्ति...

''विपत्ति? कब?''

''बहुत जल्दी। मरने-जीने की बात है।''

राजलक्ष्मी की ओर ताककर देखा कि उसके चेहरे पर खून नहीं है- वह डर से सफेद पड़ गया है।

ज्योतिषी ने मेरा हाथ छोड़कर राजलक्ष्मी से कहा, ''माँ, तुम्हारा हाथ एक बार और...''

''नहीं, मेरा हाथ अब नहीं देखना होगा, देख चुके।''

उसका तीव्र भावान्तर अत्यन्त स्पष्ट था। चतुर ज्योतिषी फौरन समझ गया कि हिसाब करने में उसने गलती नहीं की है। बोला, ''मैं तो माँ दर्पण-मात्र हूँ, जो छाया पड़ेगी वही कहूँगा- पर रुष्ट ग्रह को भी शान्त किया जा सकता है, इसकी विधि है- सिर्फ दस-बीस रुपये खर्च करने की बात है।''

''तुम हमारे कलकत्ते के मकान पर आ सकते हो?''

'क्यों न आ सकूँगा माँ, ले जाने पर चला चलूँगा।''

''अच्छा।''

देखा कि ग्रह के कोप के प्रति तो उसको पूरा विश्वास है, पर उसे प्रसन्न कर लेने के बारे में काफी सन्देह है।

कमललता ने कहा, ''चलो गुसाईं, तुम्हारी चाय तैयार कर दूँ, वक्त हो गया है।''

राजलक्ष्मी ने कहा, ''मैं बना लाती हूँ दीदी, तुम जरा इनके बैठने की जगह ठीक कर दो और रतन से हुक्का तैयार करने के लिए कह दो। कल से तो उसकी छाया भी नजर नहीं आयी।''

ज्योतिषी को लेकर सब कलरव करने लगीं, हम चले आये।

दक्षिण के खुले बरामदे में मेरी रस्सी की खाट पड़ी है, रतन ने झाड़-पोंछ दी, हुक्का दिया, मुँह-हाथ धोने को पानी ला दिया। कल सबेरे ही बेचारे को काम से फुर्सत नहीं मिली, फिर भी मालकिन कहती हैं कि उसकी छाया तक नहीं दीखी! मेरी विपत्ति-योग आसन्न है, पर रतन से पूछने पर वह अवश्य कहता, ''जी नहीं, विपत्ति-योग आपका नहीं- मेरा है।''

 
Back
Top