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कमललता नीचे बरामदे में बैठकर गौहर का संवाद पूछ रही थी। राजलक्ष्मी चाय ले आयी, चेहरा बहुत भारी हो रहा है, सामने के स्टूल पर प्याली रखकर बोली, ''देखो, तुमसे हजार दफा कह चुकी कि वन-जंगलों में मत घूमा करो- आफत आते कितनी देर लगती है? गले में ऑंचल डाल और हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना करती हूँ कि मेरी बात मानो।''
अब तक चाय बनाते-बनाते राजलक्ष्मी ने शायद यही सोचकर स्थिर किया था। 'बहुत जल्दी' का दूसरा क्या अर्थ हो सकता है?
कमललता ने आश्चर्य के साथ कहा, ''वन-जंगलों में गुसाईं कब गये थे?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''कब गये, क्या यह मैं देखा करती हूँ दीदी? मुझे क्या दुनिया में और कोई काम नहीं है?''
मैंने कहा, ''देखा कभी नहीं है, सिर्फ अन्दाज है। ज्योतिषी बेटा अच्छी आफत में डाल गया!''
सुनकर रतन दूसरी ओर मुँह फेर जल्दी से चला गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''ज्योतिषी का क्या दोष है, वह जो देखेगा वही तो बतायेगा? संसार में विपत्ति-योग नाम की क्या कोई चीज ही नहीं है? आफत में क्या कभी कोई नहीं पड़ता?''
इन सब प्रश्नों का उत्तर देना फिजूल है। राजलक्ष्मी को कमललता ने भी पहिचान लिया है, वह भी चुप रही।
चाय की प्याली अपने हाथों में लेते ही राजलक्ष्मी ने कहा, ''दो-चार फल और थोड़ी-सी मिठाई ले आऊँ?''
कहा, ''नहीं।''
''नहीं क्यों?'' 'नहीं' छोड़कर 'हाँ' कहना क्या भगवान ने तुम्हें सिखाया ही नहीं?'' पर मेरे मुँह की ओर देखकर सहसा अधिकतर उद्विग्न कण्ठ से प्रश्न किया, ''तुम्हारी दोनों ऑंखें इतनी लाल क्यों दिखाई दे रही हैं? नदी के सड़े पानी में नहाकर तो नही आये हो?''
''नहीं, आज स्नान ही नहीं किया।''
''और वहाँ खाया क्या?''
''कुछ भी नहीं खाया। इच्छा भी नहीं हुई।''
जाने क्या सोचकर नजदीक आकर उसने मेरे सिर पर हाथ रक्खा, फिर वही हाथ कुर्ते के भीतर मेरी छाती के नजदीक डालकर कहा, ''जो सोचा था ठीक वही है। कमल दीदी, देखो तो इनका शरीर गरम मालूम नहीं पड़ रहा है?''
कमललता व्यस्त होकर उठी नहीं। बोली, ''जरा-सा गरम हो गया तो क्या हुआ राजू-डर क्या है?''
वह नामकरण करने में अत्यन्त पटु है। यह नया नाम मेरे कानों में भी पड़ा।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसके मानी ज्वर जो है दीदी!''
कमललता ने कहा, ''अगर ज्वर ही हो तो तुम लोग पानी में नहीं आ पड़ी हो? हमारे पास आई हो, हम ही इसकी व्यवस्था कर देंगे बहन- तुम्हें फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं।''
अपनी इस असंगत व्याकुलता में दूसरे के अविचलित शान्त कण्ठ ने राजलक्ष्मी को प्रकृतिस्थ कर दिया। शर्मिंदा होकर उसने कहा, ''अच्छी बात है दीदी, पर एक तो यहाँ डॉक्टर-वैद्य नहीं हैं, फिर हमेशा देखा है कि यदि इन्हें कुछ हो जाता है, तो जल्दी आराम नहीं होता- बहुत भोगना पड़ता है। फिर जलमुँहा ज्योतिषी ने जाने कहाँ से आकर डर दिला गया...''
''दिला जाने दो।''
''नहीं दीदी, मैंने देखा है कि इनकी अच्छी बातें तो नहीं फलतीं, पर अशुभ बातें ठीक निकल जाती हैं।''
कमललता ने स्मित हास्य से कहा, ''डरने की बात नहीं राजू, इस क्षेत्र में उसकी बात ठीक न होगी। सबेरे से ही गुसाईं धूप में घूमते रहे हैं, ठीक वक्त पर स्नान-आहार नहीं हुआ, शायद इसी कारण शरीर कुछ गर्म हो गया है- कल सुबह तक नहीं रहेगा।''
लालू की माँ ने आकर कहा, ''माँ, रसोईघर में ब्राह्मण-रसोइया तुम्हें बुला रहा है।''
''जाती हूँ,'' कहकर कमललता की तरफ कृतज्ञ दृष्टिपात करके वह चली गयी।
मेरे रोग के सम्बन्ध में कमललता की बात ही फली। ज्वर ठीक सुबह ही तो नहीं गया, पर एक-दो दिन में ही मैं स्वस्थ हो गया। किन्तु इस घटना से कमललता को हमारी भीतर की बातों का पता चल गया, शायद एक और व्यक्ति को भी पता चला- स्वयं बड़े गुसाईंजी को।
जाने के दिन कमललता ने हम लोगों को आड़ में बुलाकर पूछा, ''गुसाईं, तुम्हें अपनी शादी का साल याद है?'' निकट ही देखा कि एक थाली में देवता का प्रसाद, चन्दन और फूलों की माला रखी है।
प्रश्न का जवाब दिया राजलक्ष्मी ने, कहा, ''इन्हें क्या खाक मालूम होगा, मुझे याद है।''
कमललता ने हँसते हुए कहा, ''यह कैसी बात है कि एक को तो याद रहे और दूसरे को नहीं?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बहुत छोटी उम्र थी न, इसीलिए। इन्हें तब भी ठीक ज्ञान न था।''
''पर उम्र में तो यही बड़े हैं, राजू?''
''ओ: बहुत बड़े हैं! कुल पाँच-छह साल। मेरी उम्र तब आठ-नौ साल की थी। एक दिन गले में माला पहनाकर मैंने मन-ही-मन कहा, आज से तुम मेरे दूल्हा हुए! दूल्हा! दूल्हा!'' कहकर मुझे इशारे से दिखाते हुए कहा, ''पर ये देवता उसी वक्त मेरी माला को वहीं खड़े-खड़े खा गये!''
कमललता ने आश्चर्य से पूछा, ''फूलों की माला किस तरह खा गये?''
मैंने कहा, ''फूलों की माला नहीं, पके हुए, करोदों की माला थी। जिसे दोगी वही खा जायेगा।''
कमललता हँसने लगी। राजलक्ष्मी ने कहा, ''पर वहीं से मेरी दुर्गति शुरू हो गयी। इन्हें खो बैठी। इसके बाद की बातें मत जानना चाहो दीदी- पर लोग जो कल्पना करते हैं सो बात भी नहीं है- वे तो न जाने क्या-क्या सोचते हैं। इसके बाद बहुत दिनों तक रोती-पीटती भटकती फिरी और तलाश करती रही। आखिर भगवान की दया हुई, और जैसे एक दिन खुद ही देकर एकाएक छीन लिया था, वैसे ही अकस्मात् एक दिन हाथोंहाथ लौटा भी दिया।'' कहकर उसने भगवान के उद्देश्य से प्रणाम कर लिया।
कमललता ने कहा, ''उन्हीं भगवान की माला बड़े गुसाईं ने भेजी है, आज जाने के दिन तुम दोनों एक-दूसरे को पहना दो।''
राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, ''इनकी इच्छा ये जानें, पर इसके लिए मुझे आदेश न करो। बचपन की मेरी वह लाल रंग की माला आज भी ऑंखें बन्द करने पर इनके उसी किशोर गले में झूलती हुई दिखाई देती है। भगवान की दी हुई मेरी वही माला हमेशा बनी रहे दीदी।''
मैंने कहा, ''पर वह माला तो खा डाली थी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ जी देवता, इस बार मुझे भी खा डालो।'' कहकर हँसते हुए उसने चन्दन की कटोरी में अंगुलियाँ डुबोकर मेरे मस्तक पर छाप लगा दी।
हम सब मिलने के लिए द्वारिकादास के कमरे में गये। वे न जाने किस ग्रन्थ का पाठ करने में लगे हुए थे, आदर से बोले, 'आओ भाई, बैठो।''
राजलक्ष्मी ने जमीन पर बैठकर कहा, ''बैठने का वक्त नहीं है गुसाईं। बहुत उपद्रव किया है, इसलिए जाने के पहले नमस्कार कर आपसे क्षमा की भिक्षा माँगने आई हूँ।''
गुसाईं बोले, ''हम बैरागी आदमी हैं, भिक्षा ले तो सकते हैं, दे नहीं सकते। लेकिन फिर कब उपद्रव करने आओगी बताओ दीदी? आश्रम में तो आज अन्धकार हो जायेगा।''
कमललता ने कहा, ''सच है गुसाईं- सचमुच में यही मालूम होगा कि आज कहीं भी बत्ती नहीं जली है, सब जगह अन्धकार हो रहा है।''
बड़े- गुसाईं ने कहा, ''गान, आनन्द और हास-परिहास के कारण इन कई दिनों से ऐसा लग रहा था कि मानो हमारे चारों ओर विद्युत के दीपक जल रहे हैं-यह और कभी नहीं देखा। मैंने सुना कमललता ने तुम्हारा नाम 'नये गुसाईं' रक्खा है, और मैंने इन्हें नाम दिया है आनन्दमयी...''
इस बार उनके उच्छ्वा स में मुझे बाधा देना पड़ी। कहा, ''बड़े गुसाईं, विद्युत का दीपक ही आप लोगों की ऑंखों ने देखा है, पर जिनके कर्ण-रन्धरों में उसकी कड़कड़ ध्व नि दिन-रात पहुँचती रहती है, उनसे तो जरा पूछिए। आनन्दमयी के सम्बन्ध में कम-से-कम रतन की राय...''
रतन पीछे खड़ा था, भाग गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इनकी बातें तुम न सुनो गुसाईं, मुझसे ये दिन-रात ईष्या करते हैं।'' फिर मेरी ओर देखकर कहा, ''इस बार जब आऊँगी तो इस रोगी और अरसिक आदमी को कमरे में ताला लगाकर बन्द कर आऊँगी, इसके मारे मुझे कहीं चैन नहीं मिलती!''
बड़े गुसाईं ने कहा, ''नहीं आनन्दमयी, नहीं बनेगा, छोड़कर नहीं आ सकोगी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अवश्य आ सकूँगी। बीच-बीच में मेरी ऐसी इच्छा होती है गुसाईं, कि मैं जल्दी मर जाऊँ।''
बड़े गुसाईं जी बोले, ''यह इच्छा तो वृन्दावन में एक दिन उनके मुँह से भी निकली थी बहिन, पर वैसा हो नहीं सका। हाँ आनन्दमयी, तुम्हें क्या वह बात याद नहीं?-
सखी, दे जाउँ मैं किसको कन्हैयालाल की सेवा।
वे जानें क्या बताओ तो...''
कहते-कहते वे मानो अन्यमनस्क हो गये। बोले, 'सच्चे प्रेम के बारे में हम लोग कितना-सा जानते हैं? केवल छलना में अपने को भुलाये रखते हैं। पर तुम जान सकी हो बहिन, इसीलिए कहता हूँ कि तुम जिस दिन यह प्रेम श्रीकृष्ण को अर्पण कर दोगी, आनन्दमयी...''
सुनकर राजलक्ष्मी मानो सिहर उठी, व्यस्त होकर बाधा देते हुए बोली, ''ऐसा आशीर्वाद मत दो गुसाईं, मेरे भाग्य में ऐसा न घटे। बल्कि यह आशीर्वाद दो कि इसी तरह हँसते-खेलते इनके समक्ष ही एक दिन मर जाऊँ।''
कमललता ने बात सँभालते हुए कहा, ''बड़े गुसाईं तुम्हारे प्रेम की बात ही कर रहे हैं राजू, और कुछ नहीं।''
मैंने भी समझ लिया कि अन्य भावों के भावुक द्वारिकादास की विचार-धारा सहसा एक और पथ पर चली गयी थी, बस।
राजलक्ष्मी ने शुष्क मुँह से कहा, ''एक तो यह शरीर और फिर एक न एक रोग साथ लगा ही रहता है- एकांगी आदमी, किसी की बात सुनना नहीं चाहते-मैं रात-दिन किस तरह डरी-सहमी रहती हूँ दीदी, किसे बताऊँ?''
अब तो मैं मन-ही-मन उद्विग्न हो उठा। जाते वक्त बातों-ही-बातों में कहाँ का पानी कहाँ पहुँच गया, इसका ठिकाना ही नहीं। मैं जानता हूँ कि मुझे अवहेलना के साथ बिदा करने की मर्मान्तक आत्मग्लानि लेकर ही इस बार राजलक्ष्मी काशी से आई है और सर्व प्रकार के हास-परिहास के अन्तराल में न जाने किस अनजान कठिन दण्ड की आशंका उसके मन में बनी रहती है जो किसी तरह मिटना ही नहीं चाहती। इसी को शान्त करने के अभिप्राय से मैं हँसकर बोला, ''लोगों के आगे मेरे दुबले-पुतले शरीर की तुम चाहे जितनी निन्दा क्यों न करो लक्ष्मी, पर इस शरीर का विनाश नहीं है। तुम्हारे पहले मरे बिना मैं मरने का नहीं, यह निश्चित है।''
उसने बात खत्म भी न करने दी, धप से मेरा हाथ पकड़कर कहा, ''तब इन सबके सामने मुझे छूकर तीन बार कसम खाओ। कहो कि यह बात कभी झूठ न होगी!'' कहते-कहते उद्गत ऑंसू उसकी दोनों ऑंखों से बह पड़े।
सबके-सब अवाक् हो रहे। लज्जा के मारे उसने मेरा हाथ जल्दी-से छोड़ दिया और जबरदस्ती हँसकर कहा, ''इस जलमुँहे ज्योतिषी ने झूठमूठ ही मुझे इतना डरा दिया कि...''
यह बात भी वह खत्म न कर सकी, और चेहरे की हँसी तथा लज्जा की बाधा के होते हुए भी उसकी ऑंखों से ऑंसुओं की बूँदें दोनों गालों पर ढुलक पड़ीं।
एक बार फिर सबसे एक-एक करके विदा ली गयी। बड़े गुसाईं ने वचन दिया कि इस बार कलकत्ते जाने पर वह हमारे यहाँ भी पधारेंगे और पद्मा ने कभी शहर नहीं देखा है, इसलिए वे भी साथ में आयेगी।
स्टेशन पर पहुँचते ही सबसे पहले वही 'जुलमुँहा' ज्योतिषी नजर आया। प्लेटफार्म पर कम्बल बिछाकर बड़ी शान से बैठा है और उसके आसपास काफी लोग जमा हो गये हैं।
पूछा, ''यह भी साथ चलेगा क्या?''
राजलक्ष्मी ने दूसरी ओर देखकर अपनी सलज्ज हँसी छिपा ली। पर सिर हिलाकर बताया कि ''हाँ, जायेगा।''
कहा, ''नहीं, नहीं जायेगा।''
''लेकिन जाने से कुछ भला न होगा तो बुरा भी तो न होगा। साथ चलने दो न?''
''नहीं। भला-बुरा कुछ भी हो, वह साथ नहीं चलेगा। उसे जो कुछ देना हो दे- दिलाकर यहीं से बिदा कर दो। ग्रह शान्त करने की क्षमता और साधुता अगर उसमें हो भी, तो तुम्हारी ऑंखों की आड़ में ही वह करे।''
''तो यही कह देती हूँ,'' कहकर रतन को उसे बुलाने के लिए भेज दिया। नहीं जानता कि उसे क्या दिया, पर कई बार माथा हिलाकर और अनेक आशीर्वाद देकर हँसते हुए ही उसने बिदा ली।
थोड़ी देर बाद ही ट्रेन आकर हाजिर हुई और हम कलकत्ते को चल दिये।
12
राजलक्ष्मी के एक प्रश्न के उत्तर में रुपयों की प्राप्ति का किस्सा बताना पड़ा। ''हमारे बर्मा ऑफिस से एक ऊँचे दर्जे के साहब बने घुड़दौड़ में सर्वस्व गँवाकर मेरे इकट्ठे किये हुए रुपये उधार ले लिये थे और खुद ही उन्होंने यह शर्त की थी कि सिर्फ सूद ही नहीं, बल्कि अगर अच्छे दिन आए तो मुनाफे का भी आधा हिस्सा देंगे। इस बार कलकत्ते लौटकर रुपये माँगने पर उन्होंने कर्ज का चौगुना रुपया भेज दिया। बस यही मेरी पूँजी है।''
''वह कितनी है?''
''मेरे लिए तो बहुत है, पर तुम्हारे निकट अतिशय तुच्छ।''
''सुनूँ तो कितनी?''
''सात-आठ हजार!''
''वह मुझे देनी होगी।''
डर से कहा, ''यह कैसी बात है! लक्ष्मी तो दान ही करती हैं, वे हाथ भी फैलाती हैं क्या?''
राजलक्ष्मी ने सहास्य कहा, ''लक्ष्मी अपव्यय सहन नहीं करतीं और अयोग्य समझकर सन्यासी फकीरों का विश्वास नहीं करतीं। लाओ रुपये।''
''क्या करोगी?''
''अपने खाने-कपड़े की व्यवस्था करूँगी। अब से यही होगा मेरे जीवित रहने का मूलधन।''
''पर इतने-से मूलधन से काम कैसे चलेगा? तुम्हारे झुण्ड के झुण्ड नौकर-नौकरानियों की पन्द्रह दिन की तनख्वाह भी तो इससे पूरी नहीं होगी। इसके अलावा गुरु-पुरोहित हैं, तैंतीस करोड़ देवता हैं, बहुत-सी विधवाओं का भरण-पोषण है- उनका क्या उपाय होगा?''
''इनके लिए फिक्र मत करो, उनका मुँह बन्द न होगा। मैं अपने ही भरण-पोषण की बात सोच रही हूँ। समझे?''
कहा, ''समझ गया। अब से अपने को एक माया में भुलाये रखना चाहती हो- यही न?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं, सो नहीं। वह सब रुपया दूसरे कामों के लिए है। मेरे भविष्य की पूँजी वही होगा, जो अब से तुम्हारे सामने हाथ पसारने पर मिलेगा। उसी से भरपेट खाऊँगी, नहीं तो उपवास करूँगी।''
''तो तुम्हारे भाग्य से यही लिखा है!''
''क्या लिखा है- उपवास?'' यह कहकर उसने हँसते हुए कहा, ''तुम सोच रहे हो कि साधारण-सी पूँजी है, पर वह विद्या मैं जानती हूँ कि साधारण ही किस तरह बढ़ाया जाता है। एक दिन समझोगे कि मेरे धन के बारे में तुम जो सन्देह करते हो वह सच नहीं है।''
''यह बात तुमने इतने दिनों से क्यों नहीं कही?''
''इसीलिए नहीं कही कि विश्वास नहीं करोगे। मेरा रुपया तुम घृणा के मारे छूते तक नहीं, पर तुम्हारी घृणा से मेरी छाती फट जाती है।''
व्यथित होकर कहा, ''अचानक आज ये सब बातें क्यों कह रही हो लक्ष्मी?''
राजलक्ष्मी क्षण-भर तक मेरे चेहरे की ओर देखती रही, फिर बोली, ''यह बात तुम्हें आज एकाएक खटकी है पर मेरी तो रात-दिन यही भावना रही है। तुम क्या यह समझते हो कि अधर्म की कमाई से ही मैं देवी-देवताओं की सेवा करती हूँ? उस धन का एक अणु भी अगर तुम्हारी चिकित्सा में मैं खर्च करती, तो तुम्हें बचा सकती? अवश्य ही मेरे पास से भगवान तुम्हें छीन लेते। इस बात को सत्य मानकर तुम कहाँ विश्वास करते हो कि मैं तुम्हारी ही हूँ।''
''विश्वास तो करता हूँ।''
''नहीं, नहीं करते।''
उसके प्रतिवाद का तात्पर्य नहीं समझा। वह कहने लगी, ''कमललता से तुम्हारा दो दिन का परिचय है, तो भी तुमने उसकी सारी कहानी मन लगाकर सुनी, उसकी सारी बाधाएँ मिट गयीं- वह मुक्त हो गयी। पर तुमने मुझसे कभी कोई बात नहीं पूछी, कभी तो नहीं कहा कि लक्ष्मी अपने जीवन की सारी घटनाएँ खोलकर बताओ। क्यों नहीं पूछा? तुम विश्वास नहीं करते मेरा और न विश्वास कर सकते हो अपने ऊपर!''
कहा, ''उससे भी नहीं पूछा, जानना भी नहीं चाहा। उसने खुद ही जबरदस्ती सुनाई है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो भी सुनी तो है। वह पराई है इसलिए उसकी कहानी नहीं सुनना चाहते थे, क्योंकि जरूरत नहीं थी। पर मुझसे भी क्या यही कहोगे?''
''नहीं, यह नहीं कहूँगा। पर क्या तुम कमललता की चेली हो? उसने जो कुछ किया है, तुम्हें भी वही करना होगा?''
''इन बातों में मैं भूलने वाली नहीं। मेरी सारी बातें तुम्हें सुननी ही पड़ेंगीं!''
''यह तो बड़ी मुश्किल है। मैं सुनना नहीं चाहता तो भी सुननी पड़ेगी?''
''हाँ, सुननी पड़ेंगीं। तुम्हारा खयाल है कि सुनने पर शायद मुझे प्यार नहीं कर सकोगे, या मुझे बिदा देनी पड़ेगी।''
''तब तुम्हारी विवेचना के अनुसार यह क्या तुच्छ बात है?''
राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, ''नहीं, यह नहीं होगा, तुम्हें सुनना ही पड़ेगा। तुम पुरुष हो, तुम्हारे मन में क्या इतनी भी शक्ति नहीं है कि उचित मालूम होने पर मुझे दूर कर सको?''
इस अक्षमता को अत्यन्त स्पष्टता से कबूल करते हुए कहा, ''तुम जिन शक्तिशाली पुरुषों का उल्लेख करके मुझे अपमानित कर रही हो लक्ष्मी, वे वीर पुरुष हैं- नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी पद-धूलि की योग्यता भी मुझमें नहीं। तुम्हें बिदा देकर मैं एक दिन भी नहीं रह सकूँगा, शायद उसी वक्त लौटा लाने के लिए दौड़ पडँगा और तुमने यदि 'ना' कह दिया तो मेरी दुर्गति की सीमा नहीं रहेगी! अतएव, सब भयावह विषयों की आलोचना बन्द करो।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हें मालूम है, बचपन में माँ ने मुझे एक मैथिल राजकुमार के हाथों बेच दिया था।''
''हाँ, और एक राजकुमार की ही जबानी यह खबर बहुत दिनों बाद सुनी थी। वह मेरा मित्र था।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ, वह तुम्हारे मित्र का मित्र था। एक दिन नाराज होकर मैंने माँ को बिदा कर दिया और उन्होंने घर लौटकर मेरी मृत्यु की अफवाह फैला दी। यह खबर तो सुनी थी?''
''हाँ, सुनी थी।''
''सुनकर तुमने क्या सोचा था?''
''सोचा था, आह, बेचारी लक्ष्मी मर गयी।''
''यही? और कुछ नहीं?''
''और यह भी सोचा था कि काशी में मरने के कारण और कुछ न भी हो, सद्गति तो हुई ही। आह!''
''राजलक्ष्मी ने नाराज होकर कहा, ''जाओ, झूठी आह-आह करके दुख प्रकट करने की जरूरत नहीं। मैं कसम खाकर कह सकती हूँ कि तुमने एक बार भी 'आह' न की थी। लो, मुझे छूकर कहो तो।''
कहा, ''इतने दिनों पहले की बातें क्या ठीक-ठीक याद रहती हैं? की थी, यही तो याद आता है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''खैर, कष्ट करके इतनी पुरानी बातें अब याद करने की जरूरत कहीं, मैं जानती हूँ।'' फिर थोड़ी देर ठहरकर उसने कहा, ''और मैं? रोज सुबह विश्वनाथ से रो-रोकर कहती थी, भगवान, मेरे, भाग्य में तुमने यह क्या लिख दिया? तुम्हें साक्षी बनाकर जिसके गले में माला डाली थी क्या इस जीवन में उससे फिर कभी मिलना नहीं होगा? चिरकाल तक क्या ऐसी अपवित्रता में ही दिन बिताने पड़ेंगे? उन दिनों की बातें याद आते ही आज भी आत्महत्या करके मर जाने की इच्छा होती है!''
उसके चेहरे की ओर देखकर क्लेश बोध हुआ, पर यह सोचकर चुप ही रहा कि मेरा निषेध नहीं मानेगी।
इन बातों को उसने कितने दिनों तक मन-ही-मन कितनी तरह से उलट-पलटकर सोचा-विचारा है, उसके अपराध-भाराक्रान्त मन ने नीरव की कितनी मर्मान्तिक वेदना सहन की है, फिर भी इस डर से कि कुछ करते कुछ न हो जाय कुछ जाहिर करने का साहस नहीं किया है, इतने दिनों के बाद अब वह यह शक्ति कमललता से अर्जन कर पाई है। अपनी प्रच्छन्न कलुषिता को अनावृत्त करके वैष्णवी ने मुक्ति पा ली है। राजलक्ष्मी भी आज भय और झूठी मर्यादा की जंजीरों को तोड़कर उसी की तरह सहज होकर खड़ी होना चाहती है, फिर उसके भाग्य में कुछ भी क्यों न हो। यह विद्या उसे कमललता ने दी है। संसार में इस एक व्यक्ति के आगे इस दर्पिता नारी ने सिर झुकाकर अपने दु:ख के समाधान की भिक्षा माँगी है, यह बिना किसी संशय के समझ लेने पर मुझे बहुत सन्तोष मिला।
अब तक चाय बनाते-बनाते राजलक्ष्मी ने शायद यही सोचकर स्थिर किया था। 'बहुत जल्दी' का दूसरा क्या अर्थ हो सकता है?
कमललता ने आश्चर्य के साथ कहा, ''वन-जंगलों में गुसाईं कब गये थे?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''कब गये, क्या यह मैं देखा करती हूँ दीदी? मुझे क्या दुनिया में और कोई काम नहीं है?''
मैंने कहा, ''देखा कभी नहीं है, सिर्फ अन्दाज है। ज्योतिषी बेटा अच्छी आफत में डाल गया!''
सुनकर रतन दूसरी ओर मुँह फेर जल्दी से चला गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''ज्योतिषी का क्या दोष है, वह जो देखेगा वही तो बतायेगा? संसार में विपत्ति-योग नाम की क्या कोई चीज ही नहीं है? आफत में क्या कभी कोई नहीं पड़ता?''
इन सब प्रश्नों का उत्तर देना फिजूल है। राजलक्ष्मी को कमललता ने भी पहिचान लिया है, वह भी चुप रही।
चाय की प्याली अपने हाथों में लेते ही राजलक्ष्मी ने कहा, ''दो-चार फल और थोड़ी-सी मिठाई ले आऊँ?''
कहा, ''नहीं।''
''नहीं क्यों?'' 'नहीं' छोड़कर 'हाँ' कहना क्या भगवान ने तुम्हें सिखाया ही नहीं?'' पर मेरे मुँह की ओर देखकर सहसा अधिकतर उद्विग्न कण्ठ से प्रश्न किया, ''तुम्हारी दोनों ऑंखें इतनी लाल क्यों दिखाई दे रही हैं? नदी के सड़े पानी में नहाकर तो नही आये हो?''
''नहीं, आज स्नान ही नहीं किया।''
''और वहाँ खाया क्या?''
''कुछ भी नहीं खाया। इच्छा भी नहीं हुई।''
जाने क्या सोचकर नजदीक आकर उसने मेरे सिर पर हाथ रक्खा, फिर वही हाथ कुर्ते के भीतर मेरी छाती के नजदीक डालकर कहा, ''जो सोचा था ठीक वही है। कमल दीदी, देखो तो इनका शरीर गरम मालूम नहीं पड़ रहा है?''
कमललता व्यस्त होकर उठी नहीं। बोली, ''जरा-सा गरम हो गया तो क्या हुआ राजू-डर क्या है?''
वह नामकरण करने में अत्यन्त पटु है। यह नया नाम मेरे कानों में भी पड़ा।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसके मानी ज्वर जो है दीदी!''
कमललता ने कहा, ''अगर ज्वर ही हो तो तुम लोग पानी में नहीं आ पड़ी हो? हमारे पास आई हो, हम ही इसकी व्यवस्था कर देंगे बहन- तुम्हें फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं।''
अपनी इस असंगत व्याकुलता में दूसरे के अविचलित शान्त कण्ठ ने राजलक्ष्मी को प्रकृतिस्थ कर दिया। शर्मिंदा होकर उसने कहा, ''अच्छी बात है दीदी, पर एक तो यहाँ डॉक्टर-वैद्य नहीं हैं, फिर हमेशा देखा है कि यदि इन्हें कुछ हो जाता है, तो जल्दी आराम नहीं होता- बहुत भोगना पड़ता है। फिर जलमुँहा ज्योतिषी ने जाने कहाँ से आकर डर दिला गया...''
''दिला जाने दो।''
''नहीं दीदी, मैंने देखा है कि इनकी अच्छी बातें तो नहीं फलतीं, पर अशुभ बातें ठीक निकल जाती हैं।''
कमललता ने स्मित हास्य से कहा, ''डरने की बात नहीं राजू, इस क्षेत्र में उसकी बात ठीक न होगी। सबेरे से ही गुसाईं धूप में घूमते रहे हैं, ठीक वक्त पर स्नान-आहार नहीं हुआ, शायद इसी कारण शरीर कुछ गर्म हो गया है- कल सुबह तक नहीं रहेगा।''
लालू की माँ ने आकर कहा, ''माँ, रसोईघर में ब्राह्मण-रसोइया तुम्हें बुला रहा है।''
''जाती हूँ,'' कहकर कमललता की तरफ कृतज्ञ दृष्टिपात करके वह चली गयी।
मेरे रोग के सम्बन्ध में कमललता की बात ही फली। ज्वर ठीक सुबह ही तो नहीं गया, पर एक-दो दिन में ही मैं स्वस्थ हो गया। किन्तु इस घटना से कमललता को हमारी भीतर की बातों का पता चल गया, शायद एक और व्यक्ति को भी पता चला- स्वयं बड़े गुसाईंजी को।
जाने के दिन कमललता ने हम लोगों को आड़ में बुलाकर पूछा, ''गुसाईं, तुम्हें अपनी शादी का साल याद है?'' निकट ही देखा कि एक थाली में देवता का प्रसाद, चन्दन और फूलों की माला रखी है।
प्रश्न का जवाब दिया राजलक्ष्मी ने, कहा, ''इन्हें क्या खाक मालूम होगा, मुझे याद है।''
कमललता ने हँसते हुए कहा, ''यह कैसी बात है कि एक को तो याद रहे और दूसरे को नहीं?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बहुत छोटी उम्र थी न, इसीलिए। इन्हें तब भी ठीक ज्ञान न था।''
''पर उम्र में तो यही बड़े हैं, राजू?''
''ओ: बहुत बड़े हैं! कुल पाँच-छह साल। मेरी उम्र तब आठ-नौ साल की थी। एक दिन गले में माला पहनाकर मैंने मन-ही-मन कहा, आज से तुम मेरे दूल्हा हुए! दूल्हा! दूल्हा!'' कहकर मुझे इशारे से दिखाते हुए कहा, ''पर ये देवता उसी वक्त मेरी माला को वहीं खड़े-खड़े खा गये!''
कमललता ने आश्चर्य से पूछा, ''फूलों की माला किस तरह खा गये?''
मैंने कहा, ''फूलों की माला नहीं, पके हुए, करोदों की माला थी। जिसे दोगी वही खा जायेगा।''
कमललता हँसने लगी। राजलक्ष्मी ने कहा, ''पर वहीं से मेरी दुर्गति शुरू हो गयी। इन्हें खो बैठी। इसके बाद की बातें मत जानना चाहो दीदी- पर लोग जो कल्पना करते हैं सो बात भी नहीं है- वे तो न जाने क्या-क्या सोचते हैं। इसके बाद बहुत दिनों तक रोती-पीटती भटकती फिरी और तलाश करती रही। आखिर भगवान की दया हुई, और जैसे एक दिन खुद ही देकर एकाएक छीन लिया था, वैसे ही अकस्मात् एक दिन हाथोंहाथ लौटा भी दिया।'' कहकर उसने भगवान के उद्देश्य से प्रणाम कर लिया।
कमललता ने कहा, ''उन्हीं भगवान की माला बड़े गुसाईं ने भेजी है, आज जाने के दिन तुम दोनों एक-दूसरे को पहना दो।''
राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, ''इनकी इच्छा ये जानें, पर इसके लिए मुझे आदेश न करो। बचपन की मेरी वह लाल रंग की माला आज भी ऑंखें बन्द करने पर इनके उसी किशोर गले में झूलती हुई दिखाई देती है। भगवान की दी हुई मेरी वही माला हमेशा बनी रहे दीदी।''
मैंने कहा, ''पर वह माला तो खा डाली थी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ जी देवता, इस बार मुझे भी खा डालो।'' कहकर हँसते हुए उसने चन्दन की कटोरी में अंगुलियाँ डुबोकर मेरे मस्तक पर छाप लगा दी।
हम सब मिलने के लिए द्वारिकादास के कमरे में गये। वे न जाने किस ग्रन्थ का पाठ करने में लगे हुए थे, आदर से बोले, 'आओ भाई, बैठो।''
राजलक्ष्मी ने जमीन पर बैठकर कहा, ''बैठने का वक्त नहीं है गुसाईं। बहुत उपद्रव किया है, इसलिए जाने के पहले नमस्कार कर आपसे क्षमा की भिक्षा माँगने आई हूँ।''
गुसाईं बोले, ''हम बैरागी आदमी हैं, भिक्षा ले तो सकते हैं, दे नहीं सकते। लेकिन फिर कब उपद्रव करने आओगी बताओ दीदी? आश्रम में तो आज अन्धकार हो जायेगा।''
कमललता ने कहा, ''सच है गुसाईं- सचमुच में यही मालूम होगा कि आज कहीं भी बत्ती नहीं जली है, सब जगह अन्धकार हो रहा है।''
बड़े- गुसाईं ने कहा, ''गान, आनन्द और हास-परिहास के कारण इन कई दिनों से ऐसा लग रहा था कि मानो हमारे चारों ओर विद्युत के दीपक जल रहे हैं-यह और कभी नहीं देखा। मैंने सुना कमललता ने तुम्हारा नाम 'नये गुसाईं' रक्खा है, और मैंने इन्हें नाम दिया है आनन्दमयी...''
इस बार उनके उच्छ्वा स में मुझे बाधा देना पड़ी। कहा, ''बड़े गुसाईं, विद्युत का दीपक ही आप लोगों की ऑंखों ने देखा है, पर जिनके कर्ण-रन्धरों में उसकी कड़कड़ ध्व नि दिन-रात पहुँचती रहती है, उनसे तो जरा पूछिए। आनन्दमयी के सम्बन्ध में कम-से-कम रतन की राय...''
रतन पीछे खड़ा था, भाग गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इनकी बातें तुम न सुनो गुसाईं, मुझसे ये दिन-रात ईष्या करते हैं।'' फिर मेरी ओर देखकर कहा, ''इस बार जब आऊँगी तो इस रोगी और अरसिक आदमी को कमरे में ताला लगाकर बन्द कर आऊँगी, इसके मारे मुझे कहीं चैन नहीं मिलती!''
बड़े गुसाईं ने कहा, ''नहीं आनन्दमयी, नहीं बनेगा, छोड़कर नहीं आ सकोगी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अवश्य आ सकूँगी। बीच-बीच में मेरी ऐसी इच्छा होती है गुसाईं, कि मैं जल्दी मर जाऊँ।''
बड़े गुसाईं जी बोले, ''यह इच्छा तो वृन्दावन में एक दिन उनके मुँह से भी निकली थी बहिन, पर वैसा हो नहीं सका। हाँ आनन्दमयी, तुम्हें क्या वह बात याद नहीं?-
सखी, दे जाउँ मैं किसको कन्हैयालाल की सेवा।
वे जानें क्या बताओ तो...''
कहते-कहते वे मानो अन्यमनस्क हो गये। बोले, 'सच्चे प्रेम के बारे में हम लोग कितना-सा जानते हैं? केवल छलना में अपने को भुलाये रखते हैं। पर तुम जान सकी हो बहिन, इसीलिए कहता हूँ कि तुम जिस दिन यह प्रेम श्रीकृष्ण को अर्पण कर दोगी, आनन्दमयी...''
सुनकर राजलक्ष्मी मानो सिहर उठी, व्यस्त होकर बाधा देते हुए बोली, ''ऐसा आशीर्वाद मत दो गुसाईं, मेरे भाग्य में ऐसा न घटे। बल्कि यह आशीर्वाद दो कि इसी तरह हँसते-खेलते इनके समक्ष ही एक दिन मर जाऊँ।''
कमललता ने बात सँभालते हुए कहा, ''बड़े गुसाईं तुम्हारे प्रेम की बात ही कर रहे हैं राजू, और कुछ नहीं।''
मैंने भी समझ लिया कि अन्य भावों के भावुक द्वारिकादास की विचार-धारा सहसा एक और पथ पर चली गयी थी, बस।
राजलक्ष्मी ने शुष्क मुँह से कहा, ''एक तो यह शरीर और फिर एक न एक रोग साथ लगा ही रहता है- एकांगी आदमी, किसी की बात सुनना नहीं चाहते-मैं रात-दिन किस तरह डरी-सहमी रहती हूँ दीदी, किसे बताऊँ?''
अब तो मैं मन-ही-मन उद्विग्न हो उठा। जाते वक्त बातों-ही-बातों में कहाँ का पानी कहाँ पहुँच गया, इसका ठिकाना ही नहीं। मैं जानता हूँ कि मुझे अवहेलना के साथ बिदा करने की मर्मान्तक आत्मग्लानि लेकर ही इस बार राजलक्ष्मी काशी से आई है और सर्व प्रकार के हास-परिहास के अन्तराल में न जाने किस अनजान कठिन दण्ड की आशंका उसके मन में बनी रहती है जो किसी तरह मिटना ही नहीं चाहती। इसी को शान्त करने के अभिप्राय से मैं हँसकर बोला, ''लोगों के आगे मेरे दुबले-पुतले शरीर की तुम चाहे जितनी निन्दा क्यों न करो लक्ष्मी, पर इस शरीर का विनाश नहीं है। तुम्हारे पहले मरे बिना मैं मरने का नहीं, यह निश्चित है।''
उसने बात खत्म भी न करने दी, धप से मेरा हाथ पकड़कर कहा, ''तब इन सबके सामने मुझे छूकर तीन बार कसम खाओ। कहो कि यह बात कभी झूठ न होगी!'' कहते-कहते उद्गत ऑंसू उसकी दोनों ऑंखों से बह पड़े।
सबके-सब अवाक् हो रहे। लज्जा के मारे उसने मेरा हाथ जल्दी-से छोड़ दिया और जबरदस्ती हँसकर कहा, ''इस जलमुँहे ज्योतिषी ने झूठमूठ ही मुझे इतना डरा दिया कि...''
यह बात भी वह खत्म न कर सकी, और चेहरे की हँसी तथा लज्जा की बाधा के होते हुए भी उसकी ऑंखों से ऑंसुओं की बूँदें दोनों गालों पर ढुलक पड़ीं।
एक बार फिर सबसे एक-एक करके विदा ली गयी। बड़े गुसाईं ने वचन दिया कि इस बार कलकत्ते जाने पर वह हमारे यहाँ भी पधारेंगे और पद्मा ने कभी शहर नहीं देखा है, इसलिए वे भी साथ में आयेगी।
स्टेशन पर पहुँचते ही सबसे पहले वही 'जुलमुँहा' ज्योतिषी नजर आया। प्लेटफार्म पर कम्बल बिछाकर बड़ी शान से बैठा है और उसके आसपास काफी लोग जमा हो गये हैं।
पूछा, ''यह भी साथ चलेगा क्या?''
राजलक्ष्मी ने दूसरी ओर देखकर अपनी सलज्ज हँसी छिपा ली। पर सिर हिलाकर बताया कि ''हाँ, जायेगा।''
कहा, ''नहीं, नहीं जायेगा।''
''लेकिन जाने से कुछ भला न होगा तो बुरा भी तो न होगा। साथ चलने दो न?''
''नहीं। भला-बुरा कुछ भी हो, वह साथ नहीं चलेगा। उसे जो कुछ देना हो दे- दिलाकर यहीं से बिदा कर दो। ग्रह शान्त करने की क्षमता और साधुता अगर उसमें हो भी, तो तुम्हारी ऑंखों की आड़ में ही वह करे।''
''तो यही कह देती हूँ,'' कहकर रतन को उसे बुलाने के लिए भेज दिया। नहीं जानता कि उसे क्या दिया, पर कई बार माथा हिलाकर और अनेक आशीर्वाद देकर हँसते हुए ही उसने बिदा ली।
थोड़ी देर बाद ही ट्रेन आकर हाजिर हुई और हम कलकत्ते को चल दिये।
12
राजलक्ष्मी के एक प्रश्न के उत्तर में रुपयों की प्राप्ति का किस्सा बताना पड़ा। ''हमारे बर्मा ऑफिस से एक ऊँचे दर्जे के साहब बने घुड़दौड़ में सर्वस्व गँवाकर मेरे इकट्ठे किये हुए रुपये उधार ले लिये थे और खुद ही उन्होंने यह शर्त की थी कि सिर्फ सूद ही नहीं, बल्कि अगर अच्छे दिन आए तो मुनाफे का भी आधा हिस्सा देंगे। इस बार कलकत्ते लौटकर रुपये माँगने पर उन्होंने कर्ज का चौगुना रुपया भेज दिया। बस यही मेरी पूँजी है।''
''वह कितनी है?''
''मेरे लिए तो बहुत है, पर तुम्हारे निकट अतिशय तुच्छ।''
''सुनूँ तो कितनी?''
''सात-आठ हजार!''
''वह मुझे देनी होगी।''
डर से कहा, ''यह कैसी बात है! लक्ष्मी तो दान ही करती हैं, वे हाथ भी फैलाती हैं क्या?''
राजलक्ष्मी ने सहास्य कहा, ''लक्ष्मी अपव्यय सहन नहीं करतीं और अयोग्य समझकर सन्यासी फकीरों का विश्वास नहीं करतीं। लाओ रुपये।''
''क्या करोगी?''
''अपने खाने-कपड़े की व्यवस्था करूँगी। अब से यही होगा मेरे जीवित रहने का मूलधन।''
''पर इतने-से मूलधन से काम कैसे चलेगा? तुम्हारे झुण्ड के झुण्ड नौकर-नौकरानियों की पन्द्रह दिन की तनख्वाह भी तो इससे पूरी नहीं होगी। इसके अलावा गुरु-पुरोहित हैं, तैंतीस करोड़ देवता हैं, बहुत-सी विधवाओं का भरण-पोषण है- उनका क्या उपाय होगा?''
''इनके लिए फिक्र मत करो, उनका मुँह बन्द न होगा। मैं अपने ही भरण-पोषण की बात सोच रही हूँ। समझे?''
कहा, ''समझ गया। अब से अपने को एक माया में भुलाये रखना चाहती हो- यही न?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं, सो नहीं। वह सब रुपया दूसरे कामों के लिए है। मेरे भविष्य की पूँजी वही होगा, जो अब से तुम्हारे सामने हाथ पसारने पर मिलेगा। उसी से भरपेट खाऊँगी, नहीं तो उपवास करूँगी।''
''तो तुम्हारे भाग्य से यही लिखा है!''
''क्या लिखा है- उपवास?'' यह कहकर उसने हँसते हुए कहा, ''तुम सोच रहे हो कि साधारण-सी पूँजी है, पर वह विद्या मैं जानती हूँ कि साधारण ही किस तरह बढ़ाया जाता है। एक दिन समझोगे कि मेरे धन के बारे में तुम जो सन्देह करते हो वह सच नहीं है।''
''यह बात तुमने इतने दिनों से क्यों नहीं कही?''
''इसीलिए नहीं कही कि विश्वास नहीं करोगे। मेरा रुपया तुम घृणा के मारे छूते तक नहीं, पर तुम्हारी घृणा से मेरी छाती फट जाती है।''
व्यथित होकर कहा, ''अचानक आज ये सब बातें क्यों कह रही हो लक्ष्मी?''
राजलक्ष्मी क्षण-भर तक मेरे चेहरे की ओर देखती रही, फिर बोली, ''यह बात तुम्हें आज एकाएक खटकी है पर मेरी तो रात-दिन यही भावना रही है। तुम क्या यह समझते हो कि अधर्म की कमाई से ही मैं देवी-देवताओं की सेवा करती हूँ? उस धन का एक अणु भी अगर तुम्हारी चिकित्सा में मैं खर्च करती, तो तुम्हें बचा सकती? अवश्य ही मेरे पास से भगवान तुम्हें छीन लेते। इस बात को सत्य मानकर तुम कहाँ विश्वास करते हो कि मैं तुम्हारी ही हूँ।''
''विश्वास तो करता हूँ।''
''नहीं, नहीं करते।''
उसके प्रतिवाद का तात्पर्य नहीं समझा। वह कहने लगी, ''कमललता से तुम्हारा दो दिन का परिचय है, तो भी तुमने उसकी सारी कहानी मन लगाकर सुनी, उसकी सारी बाधाएँ मिट गयीं- वह मुक्त हो गयी। पर तुमने मुझसे कभी कोई बात नहीं पूछी, कभी तो नहीं कहा कि लक्ष्मी अपने जीवन की सारी घटनाएँ खोलकर बताओ। क्यों नहीं पूछा? तुम विश्वास नहीं करते मेरा और न विश्वास कर सकते हो अपने ऊपर!''
कहा, ''उससे भी नहीं पूछा, जानना भी नहीं चाहा। उसने खुद ही जबरदस्ती सुनाई है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो भी सुनी तो है। वह पराई है इसलिए उसकी कहानी नहीं सुनना चाहते थे, क्योंकि जरूरत नहीं थी। पर मुझसे भी क्या यही कहोगे?''
''नहीं, यह नहीं कहूँगा। पर क्या तुम कमललता की चेली हो? उसने जो कुछ किया है, तुम्हें भी वही करना होगा?''
''इन बातों में मैं भूलने वाली नहीं। मेरी सारी बातें तुम्हें सुननी ही पड़ेंगीं!''
''यह तो बड़ी मुश्किल है। मैं सुनना नहीं चाहता तो भी सुननी पड़ेगी?''
''हाँ, सुननी पड़ेंगीं। तुम्हारा खयाल है कि सुनने पर शायद मुझे प्यार नहीं कर सकोगे, या मुझे बिदा देनी पड़ेगी।''
''तब तुम्हारी विवेचना के अनुसार यह क्या तुच्छ बात है?''
राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, ''नहीं, यह नहीं होगा, तुम्हें सुनना ही पड़ेगा। तुम पुरुष हो, तुम्हारे मन में क्या इतनी भी शक्ति नहीं है कि उचित मालूम होने पर मुझे दूर कर सको?''
इस अक्षमता को अत्यन्त स्पष्टता से कबूल करते हुए कहा, ''तुम जिन शक्तिशाली पुरुषों का उल्लेख करके मुझे अपमानित कर रही हो लक्ष्मी, वे वीर पुरुष हैं- नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी पद-धूलि की योग्यता भी मुझमें नहीं। तुम्हें बिदा देकर मैं एक दिन भी नहीं रह सकूँगा, शायद उसी वक्त लौटा लाने के लिए दौड़ पडँगा और तुमने यदि 'ना' कह दिया तो मेरी दुर्गति की सीमा नहीं रहेगी! अतएव, सब भयावह विषयों की आलोचना बन्द करो।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हें मालूम है, बचपन में माँ ने मुझे एक मैथिल राजकुमार के हाथों बेच दिया था।''
''हाँ, और एक राजकुमार की ही जबानी यह खबर बहुत दिनों बाद सुनी थी। वह मेरा मित्र था।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ, वह तुम्हारे मित्र का मित्र था। एक दिन नाराज होकर मैंने माँ को बिदा कर दिया और उन्होंने घर लौटकर मेरी मृत्यु की अफवाह फैला दी। यह खबर तो सुनी थी?''
''हाँ, सुनी थी।''
''सुनकर तुमने क्या सोचा था?''
''सोचा था, आह, बेचारी लक्ष्मी मर गयी।''
''यही? और कुछ नहीं?''
''और यह भी सोचा था कि काशी में मरने के कारण और कुछ न भी हो, सद्गति तो हुई ही। आह!''
''राजलक्ष्मी ने नाराज होकर कहा, ''जाओ, झूठी आह-आह करके दुख प्रकट करने की जरूरत नहीं। मैं कसम खाकर कह सकती हूँ कि तुमने एक बार भी 'आह' न की थी। लो, मुझे छूकर कहो तो।''
कहा, ''इतने दिनों पहले की बातें क्या ठीक-ठीक याद रहती हैं? की थी, यही तो याद आता है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''खैर, कष्ट करके इतनी पुरानी बातें अब याद करने की जरूरत कहीं, मैं जानती हूँ।'' फिर थोड़ी देर ठहरकर उसने कहा, ''और मैं? रोज सुबह विश्वनाथ से रो-रोकर कहती थी, भगवान, मेरे, भाग्य में तुमने यह क्या लिख दिया? तुम्हें साक्षी बनाकर जिसके गले में माला डाली थी क्या इस जीवन में उससे फिर कभी मिलना नहीं होगा? चिरकाल तक क्या ऐसी अपवित्रता में ही दिन बिताने पड़ेंगे? उन दिनों की बातें याद आते ही आज भी आत्महत्या करके मर जाने की इच्छा होती है!''
उसके चेहरे की ओर देखकर क्लेश बोध हुआ, पर यह सोचकर चुप ही रहा कि मेरा निषेध नहीं मानेगी।
इन बातों को उसने कितने दिनों तक मन-ही-मन कितनी तरह से उलट-पलटकर सोचा-विचारा है, उसके अपराध-भाराक्रान्त मन ने नीरव की कितनी मर्मान्तिक वेदना सहन की है, फिर भी इस डर से कि कुछ करते कुछ न हो जाय कुछ जाहिर करने का साहस नहीं किया है, इतने दिनों के बाद अब वह यह शक्ति कमललता से अर्जन कर पाई है। अपनी प्रच्छन्न कलुषिता को अनावृत्त करके वैष्णवी ने मुक्ति पा ली है। राजलक्ष्मी भी आज भय और झूठी मर्यादा की जंजीरों को तोड़कर उसी की तरह सहज होकर खड़ी होना चाहती है, फिर उसके भाग्य में कुछ भी क्यों न हो। यह विद्या उसे कमललता ने दी है। संसार में इस एक व्यक्ति के आगे इस दर्पिता नारी ने सिर झुकाकर अपने दु:ख के समाधान की भिक्षा माँगी है, यह बिना किसी संशय के समझ लेने पर मुझे बहुत सन्तोष मिला।