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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

***** 12 डेरा *****

आफ सीजन की वजह से उस छोटे सी जगह पर टूरिस्ट के नाम पर शायद एक हम ही थे।

सीजन के टाइम पर यहाँ टूरिस्ट वगैरह कैसे रहते हैं...” मैंने चाय रखने आए होटल के केयरटेकर से पूछा।

उस वक़्त तो ये पूरा भरा होता है साहब... वो चाय की ट्रे टेबल पर रखता हुआ बोला- “आप लोग अभी आफ सीजन में आए हैं इसलिए कोई खाली पड़ा है..."

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“आप रहने दीजिए, मैं बना लूंगी...” वो चाय कप्स में डालने लगा तो आगे बढ़कर मेरी बीवी ने उसे रोक दिया।

“कहाँ से आए हैं आप लोग?"

देल्ही से..." मेरे से पहले मुकेश ने जवाब दिया।

सीजन के टाइम पर आना चाहिए था आपको साहब। दिल लगता है यहाँ पर..” केयरटेकर ने जवाब दिया- “मेला सा लग जाता है...”

गर्मियों में...” मेरी बीवी संध्या ने चाय का एक कप मेरी तरफ बढ़ते हुए पूछा।

नहीं सर्दियों में..." हम बातें कर ही रहे थे तो वो बुड्ढा वहीं एक चेयर पर हमारे साथ ही बैठ गया- “वैसे तो गर्मियों में भी लोग आते हैं यहाँ पर, गर्मी से बचने के लिए, पर ज्यादा भीड़ दिसेंबर और जनवरी के महीने में होती है...”

उस वक़्त तो काफी सदी होती होगी यहाँ..” मैंने पूछा।

हाँ.. पूरी सर्दी होती है। जमके बरफ पड़ती है। 0° डिग्री से नीचे ही रहता है टेंपरेचर.." केयरटेकर ने जवाब दिया।

फिर भी लोग आते हैं?" संध्या बोली।

“स्की करने आते होंगे...” मैंने गेस किया।

जी हाँ...” केयरटेकर बोला- “दो महीने जमके स्की होती है। सब होटेल्स भरे रहते हैं। आने से पहले अड्वान्स में बुकिंग करनी पड़ती है वरना रुकने को जगह नहीं मिलती...”

और गर्मियों में?” मुकेश ने पूछा।

“गर्मी में भी खासी भीड़ रहती है पर आप लोग अभी बरसात के मौसम में आए हैं तो खाली पड़ा है। अभी यहाँ बारिश ही इतनी होती है। रोज पानी बरसता है तो ऐसे में कहीं घूम फिर भी नहीं सकते.”

सही बात है...” मैंने हामी भारी

वैसे आप लोग टीवी वाले हैं क्या?” केयरटेकर ने सवाल किया। मैं समझ गया की उसने हमारा बड़ा सा कैमरा देख लिया होगा इसलिए पूछ रहा था।

मैं और मुकेश दोनों ही नेशनल जियोग्राफिक के लिए काम करते थे। मैं हिन्दुस्तान में पाए जाने वाले अलग अलग किश्म के इन्सेक्ट्स और बग्स पर एक डाक्युमेंटरी बना रहा था और मुकेश मेरा कैमरा-मैन था।

 
तो आप लोग यहाँ कीड़े मकोड़े ढूँढ़ने आए हैं..” बुड्ढे ने पूछा तो संध्या हँस पड़ी।

जी हाँ..” मैंने जवाब दिया- “इधर बारिश ज्यादा पड़ने की वजह से जंगल काफी हरा भरा रहता है जिसकी वजह से इन्सेक्ट्स की कई प्रजातियां इस इलाके में पाई जाती हैं। और अभी बरसात के मौसम में सब कीड़े मकोड़े जमीन से बाहर आ जाते हैं तो इसलिए ढूँढने में भी आसानी रहती है..” मैंने उसे समझते हुए कहा।

चलिए अच्छा है.. वो खड़ा होते हुए बोला- “मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताईएगा...”

मैं ये डाक्युमेंटरी पिछले एक साल से बना रहा था और अब ये फाइनल स्टेज में थी। मेरा काम ऐसा था की ज्यादातर वक़्त मैं कैमरा उठाए यहाँ वहाँ घूमता रहता था। अब ऐसे में अगर संध्या को घर छोड़कर जाया करता तो साल के 10 महीने वो घर पर अकेली गुजारती इसलिए मैं उसको जहाँ जाता अपने साथ ही ले जाता। इस तरह से मेरा काम हो जाता था और उसका घूमना फिरना।

इस इलाके के पहाड़ी जंगल्स में रेपटाइल्स और इन्सेक्ट्स की कई ऐसी प्रजातियां मिलती थी जो दुनिया भर में कहीं और नहीं मिलती थी और ये सब सिर्फ बरसात के मौसम में जमीन से बाहर निकलते थे। मैं पिछले 6 महीने से इंतजार कर रहा था की बारिश शुरू हो और मैं यहाँ आकर अपनी डाक्युमेंटरी पूरी कर सकें। जहाँ हम रुके हुए थे वो एक बहुत छोटा सा गाँव था। घरों से ज्यादा होटेल्स बने हुए थे जिसकी वजह यहाँ के स्की स्लोप्स थे। 20-30 घरों के इस गाँव में इस वक्त हमारे सिवा टूरिस्ट के नाम पर और कोई नहीं था जो मेरे । काम करने के लिए बहुत मुनासिब था। अकेले में शांति से आराम कर सकते थे वरना अगर ज्यादा लोग भरे हों तो जानवर छूपे रहते हैं, बाहर नहीं आते।

उस वक़्त हम होटल के सामने आग जलाए बैठे चाय पी रहे हैं। सारा दिन हल्की हल्की बारिश होती रही थी जिसकी वजह से मौसम में ठंडक थी। केयरटेकर ने हमें बताया था की सीजन के टाइम पर होटल में पूरा स्टाफ होता है पर आफ सीजन में वो अकेला ही देख भाल करता है।

केयरटेकर जा ही रहा था की संध्या बोल पड़ी- “एक बात बताइए बाबा? वो उधर पहाड़ी के ऊपर छोटा सा मंदिर टाइप जो बना हुआ है, वो क्या है?”

उसके सवाल करते ही बुड्ढे के चेहरे के भाव बदल गये- “आप लोगों से मेरी विनती है के उस तरफ ना जाएं." उसने रुकते हुए कहा।

क्यों ऐसा क्या है?” मैंने पूछा।

डेरा है वो, भूतों का। बुरी आत्माएं बसती हैं वहाँ..”

मैं उम्मीद कर रहा था की वो किसी जंगली जानवर के खतरे के बारे में कहेगा पर उसकी बात सुनकर मेरी हँसी छूट पड़ी।

क्या?” मैंने हँसते हुए पूछा।

जी हाँ... जान का खतरा है उधर जाने में..” उसका चेहरा देखने से लग रहा था की जो कह रहा था, उस बारे में बहुत सीरियस था।

“किससे खतरा है... भूत से?” मुकेश भी हँसी में मेरा साथ देता हुआ बोला।

हँसिए साहब..” बुड्ढा हमें देखकर मुश्कुराता हुआ बोला- “पर आपके मानने ना झुठलाने से सच तो बदल नहीं जाएगा..."

इस बार संध्या ने पूछा- “और सच ये है की वहाँ भूत बसते हैं?”

आज से नहीं बहुत पहले से गाँव वाले जाते तक नहीं उस तरफ और इसी वजह से उस पहाड़ी पर चढ़ने के सारे रास्ते भी बंद हैं..” वो फिर से कुसी लेकर बैठ गया।

“साउंड्स लाइक आन इंट्रेस्टिंग स्टोरी। और क्यों नहीं जाते लोग उस तरफ...” मैंने पूछा।

बताया तो, एक बुरी आत्मा का डेरा है वो...”

 
अभी तो आपने कहा था की भूतों और आत्माओं और अब आप कह रहे हैं सिर्फ एक आत्मा बसती है वहाँ..." मुकेश ने बात पकड़ी।

“छोड़िए ना साहब..” बुड्ढे ना कहा- “मैं कुछ बताऊँगा, आप लोग हँसेंगे और मेरी हँसी उड़ाएंगे.."

अरे बताइए ना। हँसेंगे नहीं वादा है...” संध्या ने कहा।

पर आप मानेंगे भी तो नहीं..” बुड्ढे ने कहा।

हमारे मान लेने या इनकार करने से क्या होता है बाबा। 4 दिन के मेहमान हैं हम यहाँ। एक कहानी समझ कर सुना दीजिए। बैठे बैठे वक्त ही गुजर जाएगा...”

अच्छी बात है...” जिस तरह से बुड्ढा बैठा हमसे बात कर रहा था उससे जाहिर था की उसके पास भी करने को कुछ और नहीं था और हमसे बात करके उसका भी टाइम पास हो रहा था- “बहुत पुरानी बात है। कई सौ साल पहले...”

कई सौ साल पहले.. इतना पुराना है वो मंदिर...” मैंने पूछा।

मंदिर नहीं है वो साहब..” बुड्ढे ने ने बताना शुरू किया- “अब तो खैर कुछ भी नहीं है पर पहले घर था..”

किसका?”



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कोई जादूगरनी थी कहते हैं या चुडैल कह लीजिए। वहाँ उस पहाड़ी पर उस घर में रहती थी, गाँव से अलग.."

“खुद से अलग रहती थी या गाँव वालों ने अलग कर दिया था..”

अब कौन जाने साहब। पुरानी बातें हैं, हकीकत में कैसा था कौन जाने.." बुड्ढे ने जवाब दिया- “पर जो भी था, गाँव वाले इधर इन पहाड़ियों में रहते थे और वो उधर उस परली पहाड़ी पर अकेली रहती थी...”

“हाँ..” मैंने कहा- “फिर?”

गाँव का कोई उससे बात नहीं करता था, सब इरते थे उससे। इतना डरते थे की उस पहाड़ी के आस पास कोई भी नहीं जाता था...”

ऐसा क्यों, इतना डर किसलिए?” संध्या बोली।

अब ये तो नहीं पता की उसने ऐसा क्या किया था की लोग डरने लगे पर कहते हैं की कोई दिन की रोशनी में भी उस तरफ नहीं जाता था। लोग मानते थे की वो कोई काला जादू कर देगी जिससे उनके मवेशी मर जाएंगे, या उनकी फसल सूख जाएगी वगेरह वगैरह..”

“हम्म्म्म

... फिर मैंने पूछा।

और फिर एक बार ऐसा हुआ की गाँव से लड़कियां गायब होनी शुरू हो गई। जवान लड़कियां, ज्यादातर कम उमर की बच्चियां...” बुड्ढा कहता रहा

गायब बोले तो?” मुकेश ने सवाल किया।

 
गायब मतलब सुबह घर से निकली तो फिर आई ही नहीं। या रात को घर में सबके साथ सोई पर सुबह गायब मिली। ऐसे एक एक करके कई लड़कियां गाँव से गायब हुई। पूरे गाँव में हल्ला मच गया। बहुत तलाश हुई पर किसी बच्ची का कोई नाम निशान नहीं मिला...”

)

इंट्रेस्टिंग.. फिर?”

फिर जैसा की होता है, जान पर बने तो चींटी भी पलट कर काटने को आती है। ऐसा ही गाँव वालों के साथ हुआ। जब बच्चियों का कोई पता नहीं चला तो जाहिर था की सबका शक किस तरफ जाता?”

उस जादूगरनी की तरफ?" संध्या ने कहा।

बिल्कुल...” केयरटेकर ने हामी भारी- “पूरे गाँव में बातें फैलने लगी की इन सबके पीछे उसका ही हाथ है। अब वो तो गाँव में आती नहीं थी इसलिए गाँव के सब लोग हिम्मत करके एक दिन उसके डेरे पे गये, पूछने के लिए...”

फिर?”

|

L

“वहाँ पहुँचे तो नजर कुछ और ही देखने को मिला जिससे सब हैरान रह गये।

क्या देखा?” मैंने पूछा।

“पूरे गाँव को पता था की वो दिखने में बहुत बदसूरत थी और काफी बुड्ढी भी थी। जिस किसी ने उसे देखा था, उसे देखकर डर ही गया था। पर उस दिन जब गाँव वाले वहाँ पहुँचे, तो जो सामने आई वो एक हसीन औरत

थी...”

“दैटस इंट्रेस्टिंग... फिर क्या हुआ?”

गाँव वाले हैरान रह गये। खैर, जो पूछने वहाँ गये थे वो पूछा पर उसने किसी भी लड़की की कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया। अब उसके मुँह पर उसे ललकारने की किसी की हिम्मत तो थी नहीं इसलिए उसका जवाब सुनकर वापिस आ गये पर दिल में शक बैठ गये थे। गाँव से जब बच्चियां गायब हो रही थी और डेरे वाली जादूगरनी बुड्ढी बदसूरत से जवान खूबसूरत हो रही थी। गाँव वालों ने दो और दो मिलाकर 4 बनाया और यहां के राजा के यहाँ शिकायत कर दी...”

फिर राजा आया?” मैंने पूछा।

"नहीं वो तो नहीं आया पर उसने अपने कुछ सिपाही भेजे। वो लोग उस जादूगरनी के डेरे पे गये पर कुछ भी नहीं मिला। खाली हाथ वापिस आ गये...”

वो बच गई?”

हाँ... उस वक़्त तो कुछ मिला नहीं इसलिए बच ही गई पर गाँव वालों का शक सही निकला और एक दिन उसे रंगे हाथ पकड़ लिया...”

“वो कैसे?” हम तीनों बड़े ध्यान से बैठे उसकी कहानी को कान लगाकर सुन रहे थे।

अब हुआ यूँ की उस चुडैल का सीधे पैर का अंगूठा नहीं था...” बुड्ढे ना कहा।

“मतलब?"

मतलब उसके दाएं पैर में सिर्फ 4 अंगुलियां थी, अंगूठा नहीं था...” केयरटेकर ने जवाब दिया।

“क्यों?” संध्या ने बेवकूफाना सा सवाल किया।

अब क्यों किसे पता... कट कटा गई होगी...” बुड्ढे ने हाथ हिलाते हुए कहा।

फिर?”

“याद है पुराने जमाने में घर की दीवारों पर या तो गीली मिट्टी फिराते थे या गोबर लेप दिया करते थे...”

हाँ... पुराने जमाने में क्यों अब भी देहात में बहुत गाँव हैं जहाँ ऐसा करते हैं..” मुकेश बीच में बोल पड़ा।

हाँ... तो हुआ यूँ के एक घर से फिर एक बच्ची एक रात गायब हो गई। रात सोई अपने बिस्तर पर, पर सुबह नहीं मिली। गाँव में हल्ला मच गया। पूरा गाँव जिसकी बच्ची खोई थी उसके यहाँ इकट्ठा हो गया। किश्मत से उसने सोने से पहले रात को अपने घर की दीवारों और जमीन पर गोबर या मिट्टी किसी एक चीज का लेप लगाया था..."

“ओके..” मैंने कहा- “उससे क्या हुआ?”

 
हआ ये की लेप करने बाद घर के लोग अपने अपने बिस्तर में घुस गये ताकि जब सुबह तक उठे तो लेप सुख जाए। चला फिर कोई नहीं। पर सुबह नीचे गीली मिट्टी में किसी के पैरों के निशान थे...” बुड्ढे ने समझाया।

“मुझे जरा अंदाजा लगाने दो...” मुकेश बीच में बोला- “उन पैरों के निशान में दाएं पैर के अंगूठे का निशान नहीं

था..."

बिल्कुल..” बुड्ढे ने कहा- “गाँव वाले समझ गये की रात में आकर डेरे वाली चुडैल बच्ची को ले गई..”

इंट्रेस्टिंग... फिर?”

फिर क्या था। जहाँ पहले लोग डरे सहमे रहते थे, वहीं जब अपने घर की बच्चियों पर बात आई तो सब भड़क गये। लाठियां और तलवारें उठाकर चढ़ गये पहाड़ी पर..."

मिली वो?” संध्या ने पूछा।

कौन बच्ची?” बुड्ढे ने पूछा।

“हाँ... और वो जादूगरनी?”

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हाँ... दोनों ही मिले। एक जिंदा और एक मुर्दा। वो डेरे वाली जादूगरनी जिंदा मिली और बच्ची मुर्दा...”

जादूगरनी को गाँव वालों ने मार दिया होगा?” मैंने कहा।

हाँ... गाँव में लाकर जला दिया जिंदा। बाद में जब एक बार फिर उसके डेरे पर जाकर तलाशी ली गई तो बाकी की लड़कियां भी उसके घर के पीछे नीचे जमीन में दफन मिली। और जानते हैं सबसे हैरत वाली बात क्या थी?”

“क्या?” संध्या ने पूछा

“हर बच्ची के शरीर से कोई ना कोई अंग गायब था। किसी की आँख, किसी के दाँत तो किसी का कुछ..” बुड्ढे ने बताया।

हाँ... तो बुढ़िया बच्चियों को मारकर खुद जवान होती जा रही थी...” मैंने पूछा।

हाँ... कहते हैं की वो हर लड़की के शरीर से कोई अंग निकालकर अपने शरीर में लगा लेती थी या उस अंग को आग में जलाकर काला जादू करती थी जिससे उसके अपने शरीर का वही अंग जवान हो जाता था। जो कुछ भी था, गाँव वालों ने उस रात उसको जिंदा जलाकर मार दिया...”

तो अब लोगों का मानना है का उसका भूत बसता है वहाँ?”

“जी हाँ... कहते हैं की वो मरने से पहले कह गई थी की वो हमेशा हमेशा यहीं रहेगी और उसको कोई नहीं मार सकता। और लोग मानते हैं की आज भी वो पहाड़ी पर बना घर उसकी आत्मा का डेरा है। वो अब भी रहती है। वहीं..." बुड्ढे ने बताया।

और आप मानते हैं ये सब?” संध्या ने सवाल किया।

बीबी जी। मैं अपने सामने सामने कम से कम 10 लोगों को मरते देख चुका हूँ और सबकी लाश उस पहाड़ी के आस पास ही मिली है..” बुड्ढा बोला।

और आपको लगता है की ये उस आत्मा का काम है...”

हाँ... बिल्कुल..” बुढहे ने हामी भरी- “जब वो चुडैल ज़िंदा थी तो लोगों के शरीर के अंग निकालती थी। जिसके शरीर का जो हिस्सा पसंद आ जाए वो अपने में लगा लेती थी। किसी के बाल पसंद आए तो बाल ले लिए, किसी की आँख पसंद आई तो आँख ले ली वगेरह वगैरह। और वो अब भी वैसा ही कर रही है। उस पहाड़ी पर

अगर कोई जाता है तो वो अब उस इंसान की आत्मा को निकालकर अपने पास कैद रखती है.”

और लेट मी गेस..” मुकेश ने कहा- “आप जो ये 10 मौत अपने सामने की बयान रहे हैं, इनके शरीर का भी कोई हिस्सा गायब था...”

जी हाँ... अब वो तो मर चुकी है, इसलिए दूसरों के शरीर के हिस्सों से अपने लिए शरीर बनाकर उसमें रहती है। मनहूस... ।

उसके बाद थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। बुड्ढा कहानी खतम करके शायद हमारे अगले सवाल का इंतजार

कर रहा था और हम इंतेजार कर रहे थे की वो जाए और हम उसकी हँसी उड़ा सकें।

“इसलिए अब हमने वो पहाड़ी बंद कर रखी है..." थोड़ी देर बाद बुड्ढा बोला- “वो खड़ी पहाड़ी है इसलिए कहीं और से तो उसपर कोई चढ़ ही नहीं सकता। ऊपर तक जाने के लिए पुरानी सी टूटी फूटी सीढ़ियां बनी हैं जिसपर 12 महीने हम पहरा लगाकर रखते हैं की कोई चढ़े नहीं। सीजन के टाइम पर टूरिस्ट लोगों को उधर जाने से रोकते हैं। सीढ़ियों से थोड़ा दूर एक आदमी हमेशा रहता है जो किसी को भी उधर जाने से रोकता है...”

पर आज हमें तो कोई दिखाई नहीं दिया...” मैंने कहा।

 
फिलहाल टूरिस्ट कोई है नहीं इसलिए आदमी नहीं होगा और गाँव वाले तो वैसे ही नहीं जाते उस तरफ...” बुड्ढे ने कहा और उठकर चल दिया।

एक बात बताइए साहब, आप उस पहाड़ी की तरफ तो नहीं गये ना आज..” जाते जाते उसने हमसे पूछा।

“नहीं...” मैंने साफ झूठ बोल दिया। सच तो ये था की हम उस पहाड़ क्या उसके ऊपर बने डेरे तक चढ़कर आए थे।

और मेहरबानी करके जाइएगा भी मत...” बुड्ढे ने हमसे विनती की और चला गया।

वाट दो यू थिंक आफ थे स्टोरी...” रात को सोते हुए संध्या ने मुझसे सवाल किया।

वाटस देयर टू थिंक आफ इट। बकवास बातें हैं...” मैंने जवाब दिया।

हाँ..” संध्या ने हामी भारी।

आई मीन कम ओन यार। सिंपल सा लाजिक है। हमारे शरीर में भी तो एक आत्मा है तो ऐसा कैसे हो सकता है की एक बाहर की आत्मा हमें मार दे या हमारे शरीर में घुस जाए... हमारी आत्मा उस वक्त क्या तेल लेने गई होती है... वाइ कॅट और ओन आत्मा डिफेंड इट्स बाडी...” मैं बोला।

“मैंने कहीं सुना था की आत्मा में भी स्ट्रांग वीक वाला फंडा होता है...” संध्या बोली- “की स्ट्रांग वाली आत्मा वीक वाली आत्मा को दबाती है...

कम ओन यार। आदमी को क्या मरते ही डरने और मारने या खून पीने की बीमारी हो जाती है की आत्मा बनते ही ही गोस ओन आ किल्लिंग रैमपेज...”

पाइंट..” संध्या बोली- “वैसे मैंने ये भी सुना है की बुरे लोगों की आत्मा ही होती हैं जो दूसरो को नुकसान पहुँचाती हैं...” वो अपने बालों में कंघा करती हुई बोली।

वाटेवर। सो जाओ अब और मुझे भी सोने दो। आई नीड तो गो आउट फार आ अल मार्निग शूट...”

ओके... गुड नाइट...” संध्या ने जवाब दिया।

थोड़ी ही देर बाद हम कमरे की लाइट्स आफ करके सो चुके थे। मुकेश बगल के ही कमरे में आलरेडी घोड़े बेचकर सो चुका था। मैं भी पूरे दिन का थका हुआ था इसलिए आँखें बंद करते ही नींद आ गई। मुझे वक्त का सही अंदाजा नहीं था पर किसी आवाज पर मेरी आँख खुली पर नींद पूरी नहीं टूटी। नींद का खुमार था और कमरे में घुप अंधेरा था।

मैंने पल भर के लिए आँख खोली और फिर करवट लेकर आँखें बंद कर ली। नींद के आगोश में जाने से ठीक पहले मुझे संध्या की तरफ से आवाज आती सुनाई दी। वो हिन्दी में गिनती गिन रही थी- “55, 56, 57, 58, 59, 60, 61, 62.."

“क्या हुआ, नींद नहीं आ रही... मैंने पूछा। वो शायद सो नहीं पा रही थी और सोने की कोशिश में गिनती गिन रही थी, पर मेरे सवाल का उसने कोई जवाब नहीं दिया और मैं भी जवाब का इंतेजार किए बिना फिर सो गया। एक बार फिर रात को किसी आहट पर मेरी आँख खुली। कमरे में अब भी घुप अंधेरा था। मैं आँखें मलता हुआ सीधा होकर लेटा और संध्या की तरफ हाथ बढ़ाया।

वो बिस्तर पर अपनी जगह नहीं थी। बेड पर सिर्फ मैं था।

संध्या... मैंने आवाज दी और जवाब भी एक बार मुझे फिर गिनती गिनने की आवाज सुनाई दी- “6786, 6787, 6788, 6789, 6790, 6791...”

क्या कर रही हो अब तक.. नींद नहीं आ रही है...” कहते हुए मैंने अपनी तरफ टेबल पर रखा लैंप ओन किया और मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। नाइट लैंप की रोशनी काफी हल्की थी और उसमें जितना और जो मुझे नजर आया वो मैं बता नहीं सकता। कमरे के एक कोने में कुछ था, क्या था मैं नहीं जानता। रोशनी उसके सिर्फ चेहरे पर पड़ी, अगर उसे सिर्फ चेहरा कहा जा सके तो।

जिस तरह से किसी फटे पुराने कपड़े को लेकर एक चेहरे जैसा मास्क बना दिया जाए वैसे ही चेहरा। बेढंगी नाक,

कहीं से टाइट तो कहीं से लटके हुए गाल, हद से ज्यादा लंबी ठोड़ी (चीन), और इन सबके बीच एक अजीब सी लाइन। जैसे इन सब चीजों को आपस में रखकर जोड़ा गया हो किसी चीज से, या सिल दिया गया हो और सिलाई का निशान साफ दिख रहा हो।

और तभी मेरा ध्यान उसकी आँखों की तरफ गया। उस हल्की सी रोशनी में भी उसकी आँखों में फरक बताया जा सकता था। एक आँख थोड़ी छोटी थी पर दूसरी बड़ी थी, बहुत बड़ी और हद से ज्यादा लाल। जैसे दो अलग अलग लोगों की आँखों को साथ में रख दिया गया हो।

मेरी नजर उस नजर से मिली। मैंने उन्हें और उन आँखों ने मुझे देखा। फिर जाने क्या हुआ पर मैं अपने होश खो बैठा और कुछ याद नहीं रहा। जब सुबह मुझे होश आया तो होटल में हड़कंप मचा हुआ था। चारों तरफ पोलीस ही पोलीस थी। मैं उठकर बैठा और चारों तरफ देखा। मुकेश मेरे बेड के पास ही सर पकड़े बैठा था।

मुकेश..” मैंने उठते हुए कहा- “संध्या कहाँ हैं?”

मुझे बताया गया की मेरी बीवी की कल रात बहुत ही दर्दनाक तरीके से हत्या कर दी गई थी।

“मैंने आपको मना किया था ना साहब, कहा था की डेरे की तरफ मत जाना...” केयरटेकर पास ही खड़ा रो रहा

था- “उसने देख लिया आपकी बीवी को और ले गई जो उसे पसंद आया..."

मुझे ये भी बताया गया की पोलीस को मेरी बीवी के खून में कुछ पैरों के निशान मिले हैं और दाएं पैर का । अंगूठा गायब है, सिर्फ 4 उंगलियों के निशान हैं। शिनाख्त के लिए मुझे संध्या की लाश दिखाई गई तो मेरा रोना छूट पड़ा। उसके सर को काटकर शरीर से अलग कर दिया गया था। हैरत वाली बात थी की उसके सर पर एक भी बाल नहीं था। पूरे सर पर जख्म के निशान बने हुए थे, जैसे किसी ने बाल नोच नोच कर निकाले हों।

और तभी मुझे रात की सुनाई दी वो गिनती याद आई।

"6786, 6787, 6788, 6789, 6790, 6791...”

जैसे कोई बड़े ध्यान से धीरे-धीरे एक एक करके एक एक बाल नोच रहा हो और गिन रहा हो।

***** समाप्त *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
13 तेरे इश्क में

जीप मस्जिद के ठीक सामने आकर रुकी। लोग नमाज पढ़कर बाहर निकल रहे थे।

रुक थोड़ी देर यहीं...” आदित्य ने पसेंजर सीट पर बैठे निखिल से कहा और खुद जीप से बाहर निकला।

“तू कहाँ जा रहा है...” आदित्य ने पूछा।

“नमाज पढ़ने...” कहते हुए निखिल ने अपने सर पर एक सफेद रंग की टोपी रखी और मस्जिद में दाखिल हो गया। करीब 15 मिनट बाद जब वो निकलकर जीप की तरफ वापिस आया तो निखिल हैरत से उसकी तरफ देख रहा था।

“क्या चल रहा है?”

“नथिंग...” आदित्य ने सर से टोपी हटाई और जीप में आकर बैठ गया।

वेल डिड समवन मेन्षन दैट यू आर आ हिंदू... आप पूजा करते हैं, नमाज नहीं पढ़ते..." निखिल ने जवाब दिया।

क्या फरक पड़ता है यार..” आदित्य ने जीप स्टार्ट की- “ऊपर वाले के आगे सर झुकाना था, मंदिर जाता तब भी यही करता, आज मस्जिद गया तो फिर वही किया। मस्जिद की जगह चर्च या गुरुद्वारे जाता तब भी वही करता...”

दिस इस सो रांग मैन। अगर तेरे डैड को पता चल गया की तू मस्जिद में गया था तो खून कर देंगे तेरा...”

य..” जीप आगे बढ़ी- “उनके पास करने को और कुछ है भी नहीं। जिंदगी में कुछ और बने हों या नहीं, एक पक्के हिंदू जरूर बन गये वो..” आदित्य ने हँसते हुए कहा।

और यू आर नाट सपोज्ड टु बी आ हिंदू...” निखिल को जैसे अब तक अपने देखे हुए पर यकीन नहीं हो रहा था।

जवाब में आदित्य उसकी तरफ देखकर मुश्कुराया और बोला

इल्म वालों को इल्म दे मौला, अकल वालों को अकल दे मौला, धरम वालों को धरम दे मौला, और थोड़ी सी शर्म दे मौला..”

कुछ देर बाद उनकी जीप बीटी कांप्लेक्स के पास आकर रुकी।

और यहाँ हम क्या कर रहे हैं..." निखिल ने सवाल किया।

जस्ट वेट...” आदित्य ने कहा और उसकी नजर जैसे किसी को ढूंढने लगी। थोड़ी देर, दूर एक लड़की खड़ी हुई अपने आस पास रखे फूलों पर पानी डाल रही थी। उसके चारों तरफ छोटी छोटी टोकरियों में हर तरह के फूल रखे हुए थे, जिनपर वो बीच में बैठी हुई थोड़े थोड़े वक्त के बाद एक बोतल से पानी स्प्रे कर रही थी।

देखने में वो आम सी लड़की लग रही थी। बिखरे हुए बाल, आम सा नैन नक्श, साधारण से कपड़े पर जो एक चीज सबसे जुदा थी, वो थी उसके चेहरे पर बरसती मासूमियत। बनाने वाले ने जैसे दो जहाँ की मासूमियत को बस उस एक चेहरे में समेट दिया था। कोई उसपर एक नजर भी डालता तो बड़ी आसानी से बता सकता था की उस बेचारी ने अपनी जिंदगी में हर परेशानी झेली थी, वक्त की हर मार खाई थी, हर दर्द सहा था पर उस सबके बावजूद जो एक चीज उसके चेहरे से नहीं गई वो थी उसकी मासूमियत।

आदित्य जीप से उतरा और पैदल उस लड़की तक आया।

“जी साहब...” जब वो उसके सामने आ खड़ा हुआ तो लड़की ने चेहरा उठाकर उसकी तरफ देखा- “कौन सा फूल लेंगे?"

]

नजर से नजर मिली तो आदित्य के दिल में आया की उसपर अपना सब कुछ निसार कर दे।

“कितने के हैं?” उसने सवाल किया।

कोई भी फूल लीजिए, सब 10 रूपए के हैं."

सबके सब..” आदित्य ने मुश्कुराते हुए पूछा।

नहीं सब नहीं...” वो उसकी बात का मतलब समझ गई- “कोई भी एक लीजिए, 10 का पड़ेगा...”

वो जिस तरह से उस छोटी सी बात पर भी बौखला उठी थी, उसको देखकर आदित्य को समझ नहीं आया की किस तरह अपने आपको उसका माथा चूमने से रोके।

और सब कितने के हैं?" उसने सवाल किया।

जी?" उसने हैरत से पूछा

“सबके सब?” आदित्य ने सवाल दोहराया।

वो एक बार फिर बौखला उठी। कुछ देर तक आदित्य को देखती रही और फिर अपनी फूल की टोकरियों की तरफ देखने लगी। आदित्य समझ गया की वो शायद हिसाब नहीं लगा पा रही थी।

 
एक टोकरी में कितने फूल हैं?” वो उसके सामने ही नीचे अपने घुटनों के बल बैठ गया।

*100.” उसने जवाब दिया

और टोकरियां हैं 5, यानी 500 फूल और एक फूल 10 का, यानी सारे फूल हुए 5000 के.."

उसने फिर उसी मासूमियत से आदित्य की तरफ देखा और हाँ में अपनी गर्दन हिला दी।

“ओके देन हियर वी गो...” आदित्य ने अपनी जेब से पैसे निकलकर गिनने शुरू किये, 1000 कम थे।

एक मिनट..” कहकर वो उठा और फिर जीप की तरफ आया।

जेब में पैसे कितने हैं?” उसने निखिल से पूछा।

“1000...” निखिल ने पर्स निकलकर पैसे गिने और जवाब दिए।

“गुड...” आदित्य ने उससे सारे पैसे ले लिए।

करना क्या है...” पीछे से निखिल की आवाज आई पर वो उसको अनसुना करके फिर उस लड़की के पास पहुँचापूरे 5000..” कहते हुए उसने सारे पैसे गिनकर उस लड़की को दे दिए।

वो अपने हाथ में पैसे लिए कभी उसको देखती तो कभी पैसों की तरफ।

गिन लीजिए..” आदित्य ने कहा “पूरे हैं?”

उसने एक बारे सारे नोट गिने और हाँ में सर हिलाती चुपचाप एक ओर चल दी।

“सुनिए...” पीछे से आदित्य ने आवाज दी- “आपका नाम क्या है?”

तहजीब...” उसने जवाब दिया और फूलों की टोकरियां वहीं छोड़कर चली गई।

थोड़ी देर बाद आदित्य और निखिल टोकरियां उठाकर जीप में रख रहे थे।

“मुझे बताएगा की हो क्या रहा है?" निखिल ने पूछा।

कुछ नहीं...” आदित्य ने कहा- “हमने बहुत सारे फूल खरीदे हैं."

*और क्यों?”

“एक लड़की को देने के लिए..." आदित्य ने मुश्कुराते हुए जवाब दिया।

कौन है वो खुशनशीब लड़की?”

है कोई...”

ओके... निखिल ने अपने पर्स की तरफ देखते हुए कहा- “क्या आप मियां आशिक को इस बात का एहसास भी है की अब हमारे पास खाने तक को पैसे नहीं बचे...” ।

उस शाम जब तहजीब अपने घर पहुँची तो दरवाजे के बाहर फूलों की 5 टोकरियां रखी थी। वही फूल जो दिन में उसने खुद बेचे थे, उस जीप वाले लड़कों को।

टोकरी पर एक कागज का टुकड़ा रखा था जिसपर लिखा था- “फूल वापिस नहीं कर रहा हूँ, आपको दे रहा हूँ। ये

आपके लिए हैं, मेरी तरफ से...”

******

**

**

*

“कब से मेरा पीछा कर रहे थे?” तहजीब ने पूछा। वो और आदित्य दोनों एक पार्क में बैठे हुए थे।

अरें बहुत पहले से...” आदित्य ने जवाब दिया- “याद है दो साल पहले जब तुम वो टेलरिंग सीखने जाती थी...”

हाँ... याद है...” तहजीब ने कहा।

तब मैं रोजाना...” आदित्य ने कहना शुरू ही किया था की तहजीब ने बीच में उसकी बात काट दी।

हाँ... याद आया। जब भी मैं अपनी टेलरिंग क्लास से निकलती थी, तुम बाहर खड़े मिलते थे हमेशा...”

“ठीक... तुम्हें देखने के लिए ही वहाँ खड़ा रहता था..” आदित्य ने हँसते हुए जवाब दिया।

“और मैं हमेशा सोचती थी की पता नहीं किसके लिए खड़ा रहता है बेचारा, क्योंकी मैंने तुम्हें किसी के साथ देखा नहीं था, बस अकेले खड़े इंतेजार करते रहते थे...” तहजीब उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोली।

बेचारा..” आदित्य भी उसके नरम हाथ पर अपनी गिरफ़्त जमाता हुआ बोला।

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“हाँ... और नहीं तो क्या? तुम यार दिखने में इतने अच्छे भले थे और वहाँ टेलरिंग क्लास में एक भी लड़की ढंग की नहीं थी। मैं तुम्हें देखती थी तो लगता था की पता नहीं किसके साथ तुम्हारे नशीब फूट गये...” कहते हुए वो हँस पड़ी।

तुम्हारे साथ ही नशीब फोड़ने के चक्कर में था मैं.”

तो जब मैं रोज तुम्हारे सामने से होकर गुजरती थी तो बताना चाहिए था ना मिस्टर आदिल रहमान...”

आदित्य और तहजीब को साथ में दो महीने हो गये थे। एक साल पहले वो रोज कुछ दिन तक तहजीब के फूल उससे खरीदता और उसी के दरवाजे पर छोड़ आता जिससे चिढ़कर तहजीब ने उसे फूल बेचने से ही इनकार कर दिया था। नतीजा ये हुआ की आदित्य कहीं और से फूल खरीद कर उसके दरवाजे पर छोड़ने लगा। धीरे-धीरे रोज

यूँ फूल देने का कुछ तो असर हुआ। तहजीब एक आम लड़की थी और उसका बर्ताव भी एक आम लड़की की तरह धीरे-धीरे बदल गया।

पहले सख्त गुस्सा, फिर सिर्फ गुस्सा, फिर चिढ़ना, फिर नार्मल रिएक्सन, फिर रोज फूलों का इंतेजार और फिर उसको रोज यूँ शाम को अपने दरवाजे पर फूलों का मिलना पसंद आने लगा। वो खूबसूरत सा लड़का जिसको देखकर ही वो कुढ़ने लगती थी उसे पसंद आने लगा। और फिर जब एक दिन उस लड़के ने उसका हाथ पकड़कर

अपने दिल की बात कही, तो वो इनकार नहीं कर पाई। उस लड़के ने अपना नाम बताया था आदिल रहमान जिसके पापा एक बिजनेसमैन थे।

“मैंने तुम्हें बहुत तलाश किया था तहजीब। तुम अचानक ही गायब हो गई थी। बहुत भटका था तुम्हें ढूंढते हुए। तुम्हारे पड़ोसियों से पूछा, टेलरिंग क्लास की कुछ लड़कियों से पूछा, पर किसी को कुछ पता नहीं था तुम्हारा। शहर के हर कोने में ढूँढा था मैंने तुम्हें। कभी पोलीस फाइल्स में, कभी सोशियल सर्वीसज के आफिसेस में, हर जगह तुम्हारा नाम तलाश किया पर तुम नहीं मिली। और फिर जब मैं उम्मीद छोड़ चुका था, तब तुम मुझे एक दिन सड़क पर फूल बेचती हुई नजर आ गई। मैं बता नहीं सकता की क्या हाल हुआ था मेरा उस दिन। लगा था

की जैसे मेरी खोई दुनिया मुझे मिल गई। तुम वहाँ खड़ी फूल बेच रही थी और मैं अपनी जीप में बैठा तुम्हें देखकर बस खुशी के मारे रोता रहा..”

ओह आदिल...” तहजीब उसके कंधे पर अपना सर रखते हुए बोली।।

फिर तुम फूल बेचकर अपने घर चली और मैं तुम्हारा पीछा करता हुआ तुम्हारा घर देख आया..."

और अगले दिन मेरे फूल मुझसे ही खरीद लिए...” तहजीब ने मुश्कुराते हुए बात पूरी की।

कुछ देर तक दोनों खामोश रहे।

 
उस एक रात ने सब कुछ बदल दिया था आदिल...” थोड़ी देर बाद तहजीब बोली- “हिंदू-मुस्लिम के बीच लगी। आग ने उन दिनों जाने कितने घर फेंके थे और उन्हीं में एक घर मेरा भी था। मेरे माँ बाप और मेरे छोटे भाई, तीनों को जिंदा जला दिया गया था। बच गई थी बस एक मैं। बहुत दिन तक यूँ ही भटकती रही रिश्तेदारों के यहाँ, कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर पर एक जवान लड़की को यूँ कोई नहीं छोड़ता। जिसके यहाँ भी रही, वहाँ पर यही कोशिश की गई की क्योंकी मैं उनके यहाँ एक बोझ बनकर रह रही हूँ तो मेरा फर्ज बनता है। की मैं ये कर्ज़ किसी का बिस्तर गरम करके उतारूं। किसी ने खुद अपने जिश्म की प्यास मुझसे बुझानी चाही तो

किसी ने कोशिश की की मैं कही कोठे पर जाकर बैठ जाऊं। थक हारकर मैं फिर इसी शहर में लौट आई जहाँ मैं पैदा हुई थी और जहाँ मैंने अपना सब कुछ खोया था और यहाँ मिल गये मुझे तुम...”

तो ये है वो लड़की..” निखिल और आदित्य दोनों बैठे चाय पी रहे थे।

हाँ..." आदित्य ने निखिल की बात का जवाब दिया- “याद है मैं कैसे रोज शाम को जीप लेकर गायब हो जाता था..."

“हाँ... याद है। सारे काम एक तरफ करके मिस्टर आशिक रोज शाम बिना किसी को कुछ बताए जाने कहाँ निकल

जाते थे...” इसके चक्कर में ही जाता था। उस वक्त एक टेलरिंग स्कूल में जाती थी वो और मैं शाम को उसे देखने वहीं पहुँचता था...”

बढ़िया है, पुराना प्यार मिल गया। वैसे नाम क्या है होने वाली भाभी जी का...” निखिल ने पूछा तो आदित्य चुप हो गया।

तहजीब खान...” कुछ देर बाद उसने जवाब दिया।

निखिल के हाथ से चाय का कप गिरते गिरते बचा।

तेरा दिमाग खराब हो गया है...” निखिल जैसे चिल्ला ही पड़ा- “जो तू कह रहा है उस बात का मतलब समझता

“हाँ.. समझता हूँ यार पर...”

नहीं तू नहीं समझता...” निखिल ने बात काट दी- “बिल्कुल नहीं समझता। तहजीन खान... एक मुस्लिम... साले तेरे बाप को पता चल गया तो गला काट देगा तेरा... और लोग क्या कहेंगे..."

“मुझे लोगों का फरक नहीं पड़ता...” आदित्य ने जवाब दिया।

पड़ना चाहिए। तेरा बाप हिंदू संगठन का प्रेसीडेंट है, बल्कि ये यूप शुरू ही उन्होंने किया है। क्या कहेंगे लोग जब सबको ये पता चलेगा की जो आदमी हिंदुत्व की बड़ी बड़ी बातें करता है उसका अपना बेटा एक मुसलमान लड़की के चक्कर में पड़ा हुआ है...”

“मैंने कहा ना निखिल..” आदित्य ने फिर आराम से जवाब दिया- “मुझे लोगों का कोई फरक नहीं पड़ता.."

अपने बाप का तो पड़ता है ना या उन्हें भी भूल गया तू चूत के चक्कर में..." निखिल गुस्से में बोला।

निखिल..” आदित्य इतनी जोर से चिल्लाया की निखिल दो कदम पीछे को हो गया- “दोस्ती में भी एक हद होती है। मैं उस लड़की से प्यार करता हूँ। तमीज से बात कर."

कुछ देर तक दोनों फिर चुप हो गये।

“आई आम सारी यार..” आदित्य थोड़ी देर बाद बोला।।

“अब समझा...” निखिल ने अपना सर पकड़ते हुए कहा- “साला वो मस्जिद में जाके नमाज पढ़ना, धरम को छोड़कर इंसानियत की बातें करना। संगठन की मीटिंग्स में तेरा ना आना। ये सब उस लड़की के चक्कर में कर रहा है ना तू...”

उसके साथ जो हुआ उसका जिम्मेदार मैं हूँ निखिल। और बराबर का जिम्मेदार है तू साले। वो मुस्लिम कालोनी जहाँ वो रहती थी, उस कालोनी पर उस रात हमला तूने और मैंने लीड किया था। मैं और तू वहाँ आदमी लेकर गये थे। उस रात जितने घर जले, जितने भी लोग मरे, सब तेरे और मेरे इशारे पर हुआ था। उसका घर मेरे कहने पर जला था। मेरे कहने पर उसके घरवालों को जिंदा जला दिया गया था...”

उनके बारे में सोच रहा है तू... और उन्होंने हमारे घर नहीं जलाए... उन्होंने हमारे हिंदू भाइयों की जान नहीं ली...” निखिल बोला।

“उसने नहीं ली..” आदित्य चेहरा सख्त करते हुए बोला- “वो बेचारी एक मासूम लड़की थी जो टेलरिंग सीख रही थी, अपनी एक टेलरिंग शाप खोलना चाहती थी। उसने किसी की जान नहीं ली, किसी का घर नहीं जलाया...”

कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

सोच निखिल..." थोड़ी देर बाद आदित्य बोला- “हम दोनों के कहने पर उस रात कितने लोग मरे थे। कितनी औरतें मरी थी। कितने मासूम बच्चों को हलाल किया गया था...”

ऐसा ही कुछ हमारी औरतों और बच्चों के साथ भी हुआ था..” निखिल बोला।

नहीं...” आदित्य ने कहा- “उन दंगो में ना कोई तेरे घर से मरा था और ना ही मेरे घर से। दोनों तरफ से मरे थे आम लोग जिनको हिंदू-मुस्लिम से ज्यादा दो वक्त की रोटी से मतलब था। और इस देश में 100 करोड़ हिंदू रहते हैं, सब तेरे अपने हैं क्या? अगर ऐसा है तो जाकर लड़ उन सबके लिए। उन सबको दो वक़्त की रोटी दे, रोजगार दिला, नौकरियां दिला, किसी के साथ नाइंसाफी मत होने दे। सब तेरे अपने हैं ना..."

उसको पता है की तू हिंदू है..” निखिल ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं थी।

“नहीं... मैंने उसको बताया है की मैं एक मुस्लिम हूँ। आदिल रहमान...”

वाह..” निखिल ने जोर से ताली बजाई- “हिंदू संगठन के प्रेसीडेंट का बेटा एक मुस्लिम... आदिल रहमान... शाबाश मेरे यार। अब आगे क्या प्लान है... अपना लण्ड भी कटवाओगे क्योंकी लण्ड तो तुम उसको दिखाओगे ही किसी ना किसी दिन..."

निखिल...” आदित्य फिर गुस्से में बोला।

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“और कितना टाइम लगेगा." आदित्य ने रिसेप्शनिस्ट से पूछा।

बस थोड़ी देर और सर." रिसेप्शन पर खड़ी लड़की ने जवाब दिया। वो और तहजीब दोनों एक क्लिनिक में बैठे हुए थे।

बार बार रिसेप्शन पर पहुँच जाते हो...” आदित्य वापिस आकर बैठा तो तहजीब बोली- “वो लड़की बहुत पसंद आ रही है क्या?”

शट उप...” आदित्य ने हँसते हुए जवाब दिया।

कुछ दिन पहले दोनों साथ में थे जब तहजीब को अचानक चक्कर आए और वो बेहोश होकर गिर पड़ी। उस वक्त दोनों ने सोचा की शायद गर्मी की वजह से ऐसा हुआ, पर फिर ये बार बार होने लगा। तहजीब अचानक कुछ करते करते चक्कर खाकर गिर पड़ती और बेहोश हो जाती और फिर उसके सर में दर्द रहने लगा जो धीरे धीरा बढ़ता जा रहा था। सेहत रोजाना गिरती जा रही थी। आँखों के नीचे काले धब्बे बनने शुरू हो गये क्योंकी सर में दर्द की वजह से वो सो नहीं पाती थी। आदित्य उसको लेकर एक डाक्टर के यहाँ पहुँचा। कुछ टेस्ट्स कराए गये और आज उनको रिजल्ट्स लेने के लिए आना था। दोनों लाबी में बैठे डाक्टर के साथ अपने अपायंटमेंट का इंतेजार कर रहे थे।

आदिल तुमने कभी कोई सपना देखा है..” अचानक तहजीब ने पूछा।

हाँ... देखा है। रोज रात को आते हैं अजीब अजीब से ख्वाब..”

अरें वो नहीं...” वो खिसक कर उसके करीब होते हुए बोली- “मेरा मतलब के जिंदगी का ख्वाब। जो तुम अपनी जिंदगी में हासिल करना चाहते हो...”

हाँ... है ना... तुम...” आदित्य ने मुश्कुरा कर कहा।

ओफहो... मौका मिलते ही फिल्मी हीरो की तरह डाइलाग मारना शुरू कर देते हो। अरें फँस गई मैं आलरेडी तुमसे, हो चुकी इंप्रेस, पटा लिया तुमने मुझे आलरेडी, तुम्ही से करूँगी मैं शादी, अब तो चैन से जीने दो। मेरे कहने का मतलब की कोई ऐसा ख्वाब जो तुमने बचपन से देखा हो। जैसे मेरा ख्वाब है की कहीं समुंदर के किनारे मेरा अपना एक बड़ा सा घर हो जहाँ से मैं रोज शाम सूरज को समुंदर में डूबते हुए देखू..”

“वाउ... बीच हाउस हन...” आदित्य ने कहा

हाँ... मैं चाहती हूँ की रोज शाम को मैं बाल्कनी में तुम्हारी बाहों में बैठू और सामने सूरज धीरे-धीरे समुंदर में समा रहा हो। मेरा ख्वाब है की मेरा अपना एक घर हो, बड़ा सा, सुंदर सा। मैं हमेशा एक किराए के मकान में रही हैं। समुंदर किनारे एक बड़ा सा घर और हमारा अपना प्राइवेट बीच, बचपन से हर रात मैं यही सोचती हुई सोई हूँ.."

प्राइवेट बीच भी...” आदित्य बोला तो तहजीब ने खुश होते हुए हाँ में सर हिला दिया।

सर..” अचानक रिसेप्शन पर खड़ी लड़की ने आदित्य को पुकारा।

“वाउ.. अब तो ये भी तुम्हें बुला रही है। शायद इंप्रेस हो गई.” तहजीब चहकते हुए बोली।

शट उप..” आदित्य ने घूर कर उसकी तरफ देखा और रिसेप्शन पर पहुँचा।

ये आपकी रिश्तेदार हैं..” रिसेप्शन पर खड़ी लड़की ने पूछा।

आदित्य ने एक पल के लिए पलटकर तहजीब को देखा। वो अपने बालों से खेलती किसी बच्ची की तरह जाने क्या सोच रही थी।

मेरी बीवी है..” पलटकर आदित्य ने जवाब दिया।

ओके तो आप प्लीज अंदर जाकर डाक्टर से मिल लीजिए। उन्होंने कहा है की आप अकेले आएं, मेडम को साथ अंदर ना ले जाएं। बल्कि डाक्टर साहब चाहते हैं की आप कोई बहाना बनाकर अंदर जाएं, बिना आपकी वाइफ को ये बताया की आप डाक्टर से मिलने अंदर जा रहे हैं."

“क्यों?” आदित्य ने पूछा।

आई डोंट नो..” उस लड़की ने मुश्कुराते हुए कहा।

 
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