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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

प्लान उसने साफ साफ बना लिया था और प्लान का हिंट भी ईशिता उसको खुद दे गई थी। अगर उसका मर्डर किया जाए तो बेकार इन्वेस्टिगेशन हो जाएगी। सबको पता चल जाएगा की वो प्रेग्नेंट थी और फिर उसके खुद

के पकड़े जाने के चान्सेस भी थे।

पर अगर ईशिता आत्महत्या कर ले तो... उसने खुद ही कहा था की वो कुछ कर बैठेगी। नीरज को सिर्फ इतना करना था की उस बेवकूफ लड़की को इस हद तक उकसा देना था की वो सच में कुछ कर बैठे। नीरज को सिर्फ उसे आत्महत्या करने का रास्ता दिखना था। इस अंदाज में की ईशिता को यही लगे की उन दोनों के आस अब

कोई चारा नहीं है। जैसा की हिन्दी मूवीस में होता है।

हम जीकर नहीं मिल सकते, अपने प्यार को पाने के लिए हमें मरना पड़ेगा।

जीकर हम मिल नहीं पाए तो क्या, मरकर एक दूसरे के हो जाएंगे।

सिर्फ उस साली बेवकूफ को इस बात पर राजी कर लेना है और स्यूयिसाइड का सामान उसे दे देना है, नीरज ने

सोचा।

नीरज को अब दो काम करने थे और दोनों ही उसको बहुत आसान लग रहे थे। पहला था ईशिता को आत्महत्या के लिए उकसाना। इस बात पर राजी करना की वो दोनों एक साथ सुसाइड कर लें, यही आखिरी रास्ता उनके पास बचा था।

दूसरा, उसको जहर लाकर देना। बहुत आसान काम था। वो एक केमिस्ट्री प्रोफेसर था और ऐसे केमिकल्स की लंबी लिस्ट उसके पास थी जो जहर का काम करते थे।

तीसरा था आत्महत्या नोट, जो की इस अंदाज में लिखवाना था की ईशिता ने ये काम इसलिए किया की वो अपने किए पर शर्मिंदा है और अपने बाप से रिक्वेस्ट कर रही है की उसकी मौत के बाद उसकी प्रेग्नेन्सी की। बात को उछाला ना जाए क्योंकी इससे वो खुद भी मौत के बाद बदनाम होगी और अपने परिवार को भी बदनाम करेगी। अगर ऐसा हो गया तो उसका रसूख वाला बाप कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं होने देगा। आत्महत्या को नार्मल मौत बना दिया जाएगा और कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं होगी।

और नीरज की लाइफ फिर नार्मल हो जाएगी।

यही सब सोचता वो अपने आफिस से निकला और केमिस्ट्री लैब पहुँचा।

एक रैक पर बहुत सारी केमिकल्स की बाटल्स रखी हुई थी पर नीरज जानता था की उसको क्या चाहिए। उसने एक बोतल उठाई और लेबल पढ़ा।

वाइट आरसेनिक (एसओ) ** जहर

थोड़ा सा पाउडर उसने बोतल से निकालकर एक कागज में डालकर पूड़िया सी बना ली और अपनी जेब में रख लिया। वो जनता था की जितना जहर वो ले जा रहा है, इतना एक ईशिता को क्या, 20 लोगों की जान लेने के लिए काफी है। पर वो सारा का सारा ही ईशिता को खिलाने वाला था, जस्ट तो बे ओन द सेफर साइड।

जस्ट तो मेक शुवर की साली रांड जिंदा ना बच जाए, उसने दिल ही दिल में सोचा।

कहीं दिल के किसी कोने में उसको ईशिता पर तरस भी आ रहा था। आखिर वो बेचारी एक कालेज जाने वाली लड़की थी और हर वही अरमान था जो एक आम लड़की के दिल में होता है। कालेज में किसी हैंडसम लड़के से मिले और प्यार हो जाए, फिर उनकी शादी हो, बच्चे हों। उस बेचारी ने गलती ये की की प्यार गलत इंसान से

कर बैठी और उसकी बहुत भारी कीमत चुकाने वाली थी।

नहीं..” नीरज ने फौरन अपने ख्यालों का रुख बदला और अपने दिल को मजबूत किया- “ये सब उसकी गलती थी। पहले जबरदस्ती गले पड़ी और फिर अबार्षन नहीं कराया। गलती उसकी है, गलती की कीमत भी वो ही भरेगी...”

जहर उसके पास आ चुका था। अब ईशिता को आत्महत्या के लिए मनाना है।

बेवकूफ है साली...” उसने दिल में सोचा “बहुत आसानी से मान जाएगी..”

जैसे वो खुद अपने दिल को तसल्ली दे रहा था की ये काम भी आसानी से हो जाएगा। कालेज में काम निपटाकर वो अपने घर के लिए निकला। रास्ते में एक केमिस्ट की दुकान पर रुक कर कुछ खाली जेलेटिन कप्सूल्स ले । लिए जिनमें की जहर भरकर उसने ईशिता को देना था।

पर तकदीर को शायद कुछ और ही मंजूर था।

 
जब वो अपने घर पहुँचा तो शाम के 7:00 बज रहे थे। सर्दियों का मौसम था इसलिए भारी कोहरा हर तरफ फैल चुका था। हर तरफ अंधेरा था और लोग अपने अपने घरों में घुस चुके थे। उसके घर के ठीक सामने ईशिता की गाड़ी पाई थी।

नीरज को समझ नहीं आया की क्या करे। वो बेवकूफ लड़की खुद उसकी बीवी के पास पहुँच गई थी और अब तक तो सब बता दिया होगा। उसे सब कुछ खतम होता दिखाई दे रहा था। अपनी पूरी दुनिया खतम होती। दिखाई दे रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था की घर के अंदर जाए या फिर से अपनी गाड़ी में बैठकर

कहीं दूर भाग जाए।

नेहा से दूर।

ईशिता से दूर।

सबसे दूर।

सारी मुशीबतों से दूर।

यूँ ही खड़े सोचते हुए उसको 15 मिनट बीत गये। आम तौर पर जब वो घर आता था तो उसकी बेटी फौरन भाग कर बाहर आ जाती थी पर आज ऐसा हुआ नहीं।

घर में उसे कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही थी।

डरता हुआ वो धीमे कदमों से घर के दरवाजे तक पहुँचा और खोलकर अंदर दाखिल हुआ। ड्रॉयिंग रूम में इशिता बैठी हुई थी।

ईशिता तुम यहाँ..” नीरज ने कहा और एक नजर उसपर ऊपर से नीचे तक डाली। वो पूरी खून में सनी हुई थी।

“क्या हुआ..” उसके मुँह से अपने आप ही निकल पड़ा। जवाब में ईशिता ने उंगली से कमरे के कोने की तरफ इशारा किया।

नीरज की आँखें फटी की फटी रह गई। कलेजा मुँह को आ गया।

कोने में नेहा की लाश पड़ी हुई थी, लाइयिंग इन आ पूल आफ हेर ओन ब्लड आंड पिस।

थोड़ी ही दूर पर उसकी 5 साल की बेटी की लाश पड़ी थी। उसकी गर्दन आधी कटी हुई थी, जैसे किसी बकरे को हलाल किया जाता है।

उसकी आँखों के आगे जैसे अंधेरा सा छाने लगा।

“मैंने कहा था ना के मैं कुछ कर बैठेंगी। अब देखो ना नीरज, हमारे पास कोई चारा भी तो नहीं था। किसी ना किसी को तो मरना ही था तो हमारा बच्चा क्यों मरे... मैं ना अबार्षन क्यों कराऊँ... इसलिए मैंने सारे रास्ते हल कर दिए। तुम ही बताओ, क्या ये सही होता की हम अपने प्यार की निशानी मेरे बच्चे को मार दें... तुमने मुझे वो गोलियां खाने को कहा था पर मैंने खाई ही नहीं। क्यों मारूं मैं अपने बच्चे को... सिर्फ इसलिए की लोग उसे नाजायज कहते हैं..” ईशिता कह रही थी।

***** समाप्त *****

 
16 नौकरानी

“क्या मैं अंदर आ सकता हूँ..." रचना ने दरवाजा खोला तो मैं फूल आगे बढ़ता हुआ बोला।

बाहर मत खड़े रहो अंदर आओ, कोई देख लेगा..” उसने मेरी शर्ट पकड़कर मुझे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर लिया।

“अरें देखने दो, यहाँ तुम लोगों को जानता ही कौन है..” मैं अंदर आता हुआ बोला।

जानते फिलहाल नहीं हैं तो इसका मतलब ये नहीं की कभी नहीं जाँनेगे। बाद में मोम डैड से लोग बातें करेंगे। तो बताएंगे नहीं की आपके पीछे आपकी लड़की रात को घर पर लड़के बुलाती है."

रचना अपने माँ बाप की एकलौती लड़की थी और पिछले हफ्ते ही उन्होंने इस नये घर में शिफ्ट किया था। मैं पिछले 5 साल से उसे जानता था, उससे प्यार करता था और सही मौके की तलाश में था की बात को घरवालों की मर्जी से आगे बढ़ाया जाए। उस रात उसके मोम डैड किसी रिलेटिव के यहाँ रुके हुए थे तो उसने मुझे फोन करके बुला लिया।

मैं अपना कोट उतारता हुआ ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। रात के करीब 11:30 बज रहे थे। बाहर मौसम ठंडा था पर घर के अंदर हीटर ओन होने की वजह से कमरे का तापमान गरम था। ड्राइंग रूम में ही उनके घर में काम करने वाली लड़की जमीन पर बैठी टीवी देख रही थी।

आई थाट यू सेड यू वर अलोन..” मैंने रचना की तरफ देखते हुए कहा तो उसने मुझे आँख मारी और पलट कर फ्रिड्ज से कुछ खाने को निकालने लगी। मैं सोफे पर आकर बैठ गया और टीवी देखने लगा। उस लड़की ने एक बार मेरी तरफ देखा। मैं जवाब में मुश्कुराया पर वो अजीब नजरों से मुझे देखती वहाँ से उठी और एक कमरे के अंदर चली गई।

यू वान्ट टु ईट हियर ओर यू वान्ट टु गो टु द बेडरूम..” रचना ने मुझसे पूछा तो मैंने इशारे से कहा की बेडरूम में चलते हैं। हाथ में खाने की प्लेट्स उठाए हम उसके बेडरूम तक पहुँचे।

घर तो बहुत मस्त है.” मैंने खाने की प्लेट्स टेबल पर रखते हुए कहा।

और काफी सस्ते में मिला है डैड कह रहे थे। ही सेड इट वाज आ प्रेटी गुड डील..." रचना झुकी हुई खाना टेबल पर लगा रही थी।

उसने उस वक़्त एक स्कर्ट और टाप पहन रखा था। स्कर्ट घुटनों तक था और आगे को झुकी होने के कारण टाप खिंच कर ऊपर हो गया था।

आई थिंक प्रेटी गुड डील तो ये है जो मुझे मिली है...” मैंने आगे बढ़कर उसकी कमर को पकड़ते हुए अपना खड़ा लण्ड उसकी गाण्ड पर टिका दिया।

औचह...” वो फौरन ऐसे खड़ी हुई जैसे बिच्छू ने बँक मार दिया हो- “क्या करते हो?"

तुम्हें प्यार...” मैंने फौरन उसको अपनी तरफ घुमाया और होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

खाना तो खा लो...” वो किस के बीच में बोली।

“पूरी रात पड़ी है..”

ठंडा हो जाएगा...”

गरम कर लेंगे। खाने के साथ साथ जरा हम दोनों भी ठंडे हो लें..."

वो अच्छी तरह जानती थी की फिलहाल मुझसे बहस करने का कोई फायदा नहीं था इसलिए बिना आगे कुछ बोले मेरा साथ देने लगी। हम दोनों उसके बेड के पास खड़े हुए थे। वो अपने पंजो पर खड़ी मेरे होंठों को चूस रही थी और मेरे हाथ उसके टाप के अंदर उसकी नंगी कमर को सहला रहे थे।

“क्या इरादा है...” अपने पेट पर कपड़ों के ऊपर से ही मेरे खड़े लण्ड को महसूस करते हुए वो बोली।

तुम्हें चोदने का...” मैंने आँख मारते हुए कहा और आगे को झुक कर उसके गले को चूमने लगा। मेरे हाथ अब उसकी कमर से नीचे सरक कर उसकी गाण्ड तक पहुँचे।

ओह लोव..” उसने मुझसे लिपटते हुए एक ठंडी आह भरी। मैंने धीरे-धीरे उसके स्कर्ट को ऊपर की ओर उठाना शुरू कर दिया।

“वेट। उतार ही दो..” वो बोली।

हम दोनों एक पल के लिए अलग हुए और वो मुश्कुराती हुई बेड पर चढ़कर खड़ी हो गई।

लेट्स स्ट्रिप टुगेदर..”

उसने कहा तो हम दोनों ने एक दूसरे को देखते हुए एक साथ कपड़े उतारने शुरू कर दिए। उसने टी-शर्ट और स्कर्ट के नीचे कुछ भी नहीं पहना हुआ था। अगले ही पल वो नंगी हो चुकी थी।

 
नो अंडरगार्मेंट्स...” मैंने मुश्कुराते हुए पूछा और पूरी तरह नंगा होकर बिस्तर पर चढ़ गया।

पता था की तुम आओगे तो वैसे ही उतारने पड़ेंगे तो सोचा के पहन के फायदा ही क्या?"

वो बिस्तर पर अपनी पीठ पर लेट गई और दोनों टांगे खोल दी। मैं इशारा समझ गया। पेट पर उल्टा लेट कर मैंने उसकी टाँगों को अपने कंधो पर रखा। उसकी चूत किसी फूल की तरह खुल चुकी थी और रस टपका रही

थी।

यू आर सोकिंग वेट...” मैंने कहा और आगे बढ़कर अपने होंठ उसकी जीभ पर टिका दिए।

लिक में..” उसने ऊँची आवाज में सरगोशी की और टाँग ऊपर हवा में उठा दी।

जैसे जैसे मेरी जीभ उसकी चूत की गहराइयों में उतरती रही, वैसे वैसे उसकी मेरे बालों पर पकड़ और मजबूत होती रही। नीचे से वो कभी बिस्तर पर अपनी गाण्ड को कभी रगड़ने लगती तो कभी एड़ियां नीचे रखकर अपनी चूत मेरे मुँह पर दबाने लगती।

सक में... लिक इट... जीभ घुसाओ अंदर.. उंगली डालो...”

जब वो इस तरह से बोलने लगती तो मैं समझ जाता था की वो गरम हो गई थी। “लण्ड चाहिए” मैंने चूत से मुँह हटाकर पूछा।

हाँ..."

चूत में या पहले मुँह में लोगी?”

पहले चोदो मुझर। मैं बाद में तुम्हें चूसूंगी। पूरी रात पड़ी है." वो बेसब्री होते हुए बोली और मुझे अपने ऊपर खींचने लगी।

कम ओन... जल्दी करो... मुझे चोदो पहले...”

मैं पूरा उसके ऊपर आ गया तो उसने खुद ही हाथ हम दोनों के बीच लेजाकर मेरा लण्ड पकड़ा और अपनी चूत के मुँह पर लगा दिया।

घुसाओ अंदर..”

मैंने हल्का सा धक्का मारा और लण्ड उसकी गीली चूत में ऐसे गया जैसे मक्खन में गरम छुरी।

ओह गाश...” मैंने धक्के मारने शुरू किए तो उसने फिर सरगोशी की- “यू आर फक्किंग मी सो वेल.. सो डीप... पूरा घुसाओ ना अंदर जान...”

“मजा आ रहा है?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

बहुत... यू आर फक्किंग माइ चूत सो वेल बेबी...”

उसकी दोनों टांगे मेरी कमर पर लिपटी हुई थी और मेरे हर धक्के के साथ उसकी बड़ी बड़ी छातियां ऐसे हिल रही थी जैसे अंदर पानी भरा हो। मैंने आगे झुक कर उसका एक निपल अपने मुँह में लिया।

सक देम माइ लोव। सक देम..”

मैं बारी बारी उसकी दोनों छातियां चूसता हुआ उसकी चूत पर धक्के मारता रहा। कमरा वासना के एक तूफान से भर गया था और रचना की चीखने चिल्लाने की आवाज से गूंज रहा था। वो ऐसी ही थी, जब उत्तेजित होती तो । जोर जोर से चिल्लाने लगती थी।

यू वान्ट टु चेंज पोज...” मैंने पूछा।

नहीं... डोंट टेक इट आउट, कीप फक्किंग, लण्ड अंदर ही रखो प्लीज़...” वो फौरन बोली।

अब मेरे हर धक्के के साथ वो अपनी गाण्ड बिस्तर पर पटक रही थी और कोशिश कर रही थी की मेरा लण्ड जितना अंदर हो सके ले ले। एक बार फिर उसे चोदते हुए मैं झुका और उसके सूजे हुए निपल्स को चूसने लगा,

अपनी जीभ से उसकी छातियों को चाटने लगा।

दाँत से काटो...” उसने खुद कहा तो मैंने एक निपल पर अपने दाँत गड़ाए।

“आह... इतनी जोर से नहीं। धीरे...”

मेरे हाथ उसके पूरे जिश्म पर घूमते हुए नीचे उसकी गाण्ड पर आ टीके। मैंने अपने दोनों हाथों से नीचे उसके कूल्हों को पकड़ा और ऊपर की ओर उठाया ताकि लण्ड और अंदर तक घुसा सकैं। जवाब में उसने भी अपनी टाँगें मेरी कमर से ऊपर सरका कर मेरे कंधो पर रख दी और चूत और ज्यादा हवा में उठा दी।

चोदो मुझे..” वो वासना से पागल होती जैसे रोने ही वाली थी- “जोर से चोदो ना। आई आम अबौट टु कम..”

मैंने धक्कों की तेजी और बढ़ा दी।

 
लेट में राइड युवर काक..” कुछ देर बाद वो हाँफते हुए बोली तो मैं उसके ऊपर से हटकर नीचे आकर लेट गया। वो एक पल के लिए अपनी साँस संभालती हुई उठकर बैठ गई और फिर अपनी टाँगें मेरे दोनों तरफ रखकर बैठ गई।

ये सूखा है.. घुसेगा नहीं...” मैंने कहा तो वो रुकी और नीचे झुक कर लण्ड थोड़ा सा अपने मुँह में लिया, जीभ रगड़ कर थूक से गीला किया और फिर सीधी होकर अपनी चूत पर लगाया।

“आहहह...” लण्ड पकड़े वो नीचे को बैठी तो इस बार मेरे मुँह से भी आ छूट पड़ी।

अपने दोनों हाथ मेरी छाती पर रखकर वो अपनी गाण्ड ऊपर नीचे हिलाने लगी। उसके शरीर के साथ उसकी छातियां ऐसे हिल रही थी जैसे पपीते के पेड़ पर लटके दो पपीते हवा के झोंके से हिल रहे हों।

“आई डोंट थिंक आई कैन होल्ड एनी लांगर...” मैंने कहा और उसकी दोनों छातियों को अपने हाथ में जकड़ लिया।

दैटस ओके.. मेरा भी होने वाला है..” वो अपनी गाण्ड तेजी से हिलाते हुए बोली।

“जब मैं कहूँ तो उठ जाना। निकलने वाला होगा तो बता दूंगा.."

नहीं... चूत में ही निकालो। मुझे वो एक पिल ला देना..” उसने कहा और अपनी कमर को और तेजी से हिलाने लगी।

“खाना ठंडा हो गया..." जब वासना का तूफान उठा तो मैंने खाने की तरफ देखता हुआ बोला।

हाँ... हमारे साथ साथ खाने को भी ठंडा होना ही था..." वो हँसते हुए बोली- “रुको मैं गरम करके लाती हूँ.."

नहीं..” मैं उसका माथा चूमा और उठकर बैठ गया- “आप आराम कीजिए। गुलम है ना सेवा करने के लिए...” मैं खाने की प्लेट्स उठाए नीचे किचन में आया तो वो काम करने वाली लड़की अब भी वहीं बैठी टीवी देख रही थी और तब मुझे ध्यान आया की किस तरह मैं और रचना दोनों ही पूरी तरह उसको भूल चुके थे। जितनी जोर जोर से रचना थोड़ी देर पहले शोर मचा रही थी, मुझे पूरा यकीन था की उसने नीचे सुना जरूर होगा। ऊपर से मेरी हालत ऐसी थी की कोई एक नजर देखकर बता दे की मैं ऊपर क्या करके आ रहा हूँ।

जब उसने नजर भरके मुझे देखा तो जाने क्यों पर मैं शर्मिंदा हो गया। वो उमर में कोई 14-15 साल की थी। इसलिए मैं अंदाजा नहीं लगा पाया की वो सेक्स के बारे में जानती है की नहीं। क्या उसे समझ में आया की। ऊपर क्या हो रहा था या नहीं। मेरी नजर उससे मिली तो मैं खिसिया कर मुश्कुराया। जवाब में वो मुझे वैसे ही घूर कर देखती रही और फिर उठकर कमरे में चली गई।

 
शट मैन...” मैंने अपने आपसे कहा और खाना गरम करने लगा। कुछ देर बाद ही वो अपने हाथ में एक पिल्लो और चादर उठाए आई और बेसमेंट का दरवाजा खोलकर सीढ़ियां उतरकर नीचे चली गई।

चलो अच्छा है की ये नीचे बेसमेंट में रहती है। कम से कम रात भर हमारी आवाजें तो नहीं सुनेगी...” मैंने दिल ही दिल में सोचा और खाना गरम करके फिर रचना के रूम में पहुँचा।

“हम लोग बहुत जोर से बोल रहे थे यार..” मैंने उसे कहा।

जानती हूँ... बहुत चिल्लाने लगती हूँ ना मैं..." वो भी शर्मिंदा सी होती मेरी तरफ देखने लगी।

मैं उसे बताने ही वाला था की नीचे वो लड़की सब सुन रही थी की मुझसे पहले रचना बोल पड़ी- “यू दिदन्त गेट द सपून्स...”

तब मैंने देखा की मैं सपून्स नीचे ही छोड़ आया था।

होल्ड ओन... मैं ले आती हैं। हाथ भी धोने हैं मुझे...” कहकर वो बिस्तर से उठी और नीचे चली गई।

मैं बैठा उसका इंतेजार ही कर रहा था की कोई 10 मिनट बाद एक बर्तन गिरने और फिर रचना के चिल्लाने की आवाज आई। मैं फौरन बिस्तर से उतरा और नीचे की तरफ भगा।

यू ओके बेबी..” कहता हुआ मैं नीचे आया और ड्राइंग रूम में जो देखा, वो देखकर मेरी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई।

रचना नीचे जमीन पर उल्टी पड़ी थी और वो काम करने वाली लड़की उसकी कमर पर चढ़ी बैठी थी।

एक हाथ से उसने रचना के बाल पकड़ रखे थे और दूसरे हाथ से एक चाकू उसकी गर्दन पर चला रही थी, जैसे कोई बकरा हलाल कर रही हो।

मेरे मुँह से चीख निकल गई।

मेरे चिल्लाने की आवाज सुनकर वो मेरी तरफ पलटी और अपने हाथ को एक झटका दिया। अगले ही पल रचना की गर्दन कटकर धड़ से अलग होकर उसके हाथ में आ गई।

मेरे मुँह से फिर चीख निकल गई।

हीहीहीही.." इस बार मेरी चीख के जवाब में वो हँसती हुई कटा हुआ सर लिए फिर बेसमेंट का दरवाजा खोलकर नीचे भाग गई।

मैं कुछ देर वहाँ खड़ा रचना की सर कटी लाश देखता रहा। तभी बेसमेंट का दरवाजा फिर खुला और वो फिर । चाकू लिए बाहर निकली। इस बार मैंने भागकर अपने आपको बाथरूम में बंद कर लिया और तब तक वहीं रहा जब तक की पोलीस वालों ने दरवाजा तोड़ नहीं दिया।

“क्या हुआ... वाट हैपेंड हियर...” कुछ देर बाद एक पोलिसवाला मेरी आँखों में टार्च मारता हुआ चिल्लाकर मुझसे पूछ रहा था। मेरे सामने ही रचना के मोम डैड बैठे रो रहे थे और मुझे देख रहे थे।

योर मेड किल्ड हर। उस लड़की ने मार डाला उसे..." और वो दोनों हैरत से मेरी तरफ देखने लगे।

EL

वाट मेड.. हमने इस घर में फिलहाल कोई मेड रखी ही नहीं है। ढूँढ़ रहे हैं अब तक..” उसके बाप का जवाब आया।

क्या बकते हो...” मैं लगभग चिल्ला पड़ा- “तो वो कौन है जो नीचे बेसमेंट में रहती है..”

इस बार रचना के मोम डैड के साथ पोलिसवाले भी मुझे हैरत से देखने लगे।

कौन सा बेसमेंट..” एक पोलिसवाला बोला- “इस घर में तो कोई बेसमेंट है ही नहीं..”

***** समाप्त *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
17 नौ-लक्खा

किसी ने कहा है की औरतों में अमीर गरीब, धरम या समझ का कोई भी और फरक नहीं होता। औरतों को एक दूसरे से जुदा करती है तो सिर्फ एक चीज, सुंदरता, खूबसूरती। सिर्फ एक ही रैंकिंग सिस्टम होता है, सुंदर, आम

और बदसूरत।

एक लड़की भले एक झोपड़ी में पैदा हुई हो पर अगर वो बला की खूबसूरत है और अपनी खूबसूरती का सही इस्तेमाल जानती है तो झोपड़ी से महल तक का सफर उसके लिए कोई मुश्किल बात नहीं। पर ये बात शायद उसके लिए सही साबित नहीं हुई। वो बचपन से ही सबसे जुदा थी, बहुत खूबसूरत। इतनी खूबसूरत की प्यार से उसे हर कोई परी कहकर बुलाता था। और यही हाल जवानी में भी रहा। जब वो सड़क पर निकलती तो हर नजर जैसे बस उसपर ही आकर ठहर जाती।।

एक बड़ा सा बंगलो, बहुत सारे नौकर, महंगी गाड़ियां, आलीशान कमरे, मखमली चादरें और पर्दे, बेशकीमती कपड़े और जेवर और ना जाने इस तरह के उसके कितने और सपने उस दिन टूट कर बिखर गये जब उसकी शादी एक सरकारी दफ्तर में काम करने वाले बाबू से करा दी गई और बचपन से ही एक महल में जाकर रहने की तैयारी करने वाली लड़की एक सिंगल बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट हो गई।

उसकी आदतें और टेस्ट्स बहुत ही सिंपल थे पर इसकी वजह उसकी सादगी नहीं उसकी गरीबी थी। सिंपल और सादी लाइफस्टाइल से ज्यादा वो कभी एफ्फोर्ड कर ही नहीं पाई थी और यही ट्रेंड शादी के बाद भी कायम रहा। कभी कभी जब वो अपने पति की तरफ देखती तो ऐसा लगता जैसे उसने अपने स्टैंडर्ड से नीचे शादी कर ली हो। शादी के बाद उसकी मजबूरियां जैसे और बढ़ गई थी और जिंदगी की हर सहूलियत के लिए वो और भी ज्यादा तरसने लगी थी।

वो अपने घर की गरीबी से परेशान थी, बेरंग दीवारों से परेशान थी, बदरंग पर्यों से परेशान थी। ये सारी चीजें जो शायद जिनसे उसके क्लास यानी सुंदर क्लास की बाकी लड़कियां अंजान थी उसको दिन रात सताया करती थी, जैसे उसकी बेइज्जती करती थी। उसके घर में जो 18 साल की लड़की काम करने आती थी, उसको देख देखकर उसका दिल जैसे और बैठ जाता था।

उसके ख्वाबों में अब भी अक्सर वो बड़े बड़े बंगलो, आलीशान कमरे, बड़ी बड़ी गाड़ियां और बेशकीमती कपड़े

आते थे। अब भी कभी कभी वो सपनों में अपने महल-नुमा घर के आगे बड़े से हरे लान में कुर्सियां डाले अपने सहेलियों से बातें करती थी।

जब वो उस पुरानी सी टेबल पर जो एक पुराने से कपड़े से ढकी हुई थी अपने पति के साथ खाने बैठा करती

और जब उसका पति सामने पतीले में रखे खाने को देखकर खुश होता और कहता- “दाल चावल, वाह... खुश्बू तो बड़ी अच्छी आ रही है...” तो उसका दिल करता की टेबल को उठाकर उलट दे। उसकी टेबल पर दाल चावल नहीं बल्कि अच्छे स्वादिष्ट खाने होने चाहिए थे। सामने स्टील के बर्तन नहीं बल्कि महंगी चाँदी के प्लेट चम्मच होने चाहिए थे। कपड़ों और जेवरों का तो जैसे उसके पास अकाल सा पड़ गया था और बस यही वो चीजें थी जिनसे उसे बे-इंतेहा मोहब्बत थी। जिनकी उसे दिल-ओ-जान से हसरत थी। उसे लगता था की वो इन्हीं चीजों के लिए बनी है। हमेशा से उसकी यही ख्वाहिश थी की वो बन ठनकर जहाँ भी जाए, हर किसी के दिल में बस एक उसी की चाहत हो, उसी की तमन्ना हो।

दिन रात वो अपनी गरीबी और मजबूरी पर रोना जैसे उसकी जिंदगी बन चुका था। मायूसी और बेबसी में वो । इस कदर खो गई थी की अपनी बचपन की दोस्त पल्लवी से भी उसने मिलना जुलना बंद कर दिया था। वजह थी की पल्लवी एक अमीर घर से थी और वो उससे मिलकर उसे अपनी गरीबी का एहसास नहीं दिलाना चाहती थी।

फिर एक शाम उसके पति ने आफिस से आते ही उसके हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा थमा दिया।

क्या है ये...” उसने बेदिली से पूछा।

“खोलकर देखो...” मुश्कुराते हुए उसके पति ने जवाब दिया।

उसने लिफाफा फाड़ कर खोला और अंदर से एक इन्विटेशन कार्ड निकला। सवालिया नजर से उसने अपने पति

की तरफ देखा।

“आफिस की तरफ से एक पार्टी रखी जा रही है। हमारी आफिस के सब बड़े लोग पार्टी में आएंगे। उसी का इन्विटेशन है..”

बजाय खुश होने के, जिसकी उसके पति को बहुत उम्मीद थी, उसने वो इन्विटेशन कार्ड कमरे में रखी टेबल पर पटक दिया- “तो मैं क्या करूं इसका?”

ऐसा क्यों कहती हो। मुझे लगा तुम्हें खुशी होगी। तुम कभी कहीं बाहर नहीं जाती और ये एक बहुत आलीशान पार्टी है। सब बड़े बड़े लोग शामिल होते हैं और ये इन्विटेशन भी सबको नहीं मिलता। मैंने बड़ी मुश्किल से हासिल किया है...”

उसने गुस्से भारी नजर से अपने पति को ऐसे घूरा जैसे अभी उसे खा जाएगी- “और तुम्हें क्या लगता है की इतनी बड़ी पार्टी में मैं क्या पहनकर जाऊंगी?”

उसके पति को एकदम जवाब नहीं सूझा। इस बात की तरफ उसका बिल्कुल ध्यान नहीं गया था- “पहन लो कुछ भी..." वो हकलाते हुए बोला- “काफी सारे कपड़े हैं तो तुम्हारे पास और उनमें से कुछ..” कहता कहता वो अचानक रुक गया।

सामने खड़ी उसकी बीवी अब रो रही थी। बड़ी बड़ी आँखों से मोटे मोटे आँसू बहकर उसके गाल पर लुढ़क रहे थे।

“क्या हुआ?” वो फौरन उसके करीब आता हुआ बोला।

जितनी अचानक से उसने रोना शुरू किया था वैसे ही वो अचानक चुप हो गई और अपने चेहरे से आँसू पोंछते हुई बोली- “कुछ नहीं.. मेरे पास पहनने के लिए ढंग का कुछ भी नहीं है इसलिये मैं इस पार्टी में नहीं जा । सकती। ये इन्विटेशन अपने किसी दोस्त को दे दो जिसकी बीवी के पास ढंग का एक जोड़ी कपड़ा तो हो..."

शकल देखकर ही मालूम होता था की उसकी बात से उसका पति को काफी दुखी हुआ था- “अच्छा दिल छोटा मत करो..." वो उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला- “कितने तक की आ जाएगी एक ड्रेस जो तुम ऐसी पार्टी में पहन सको..”

वो एक पल के लिए चुप होकर सोचने लगी। उसके दिमाग में अलग अलग ब्रांड के कपड़े दौड़ने लगे और वो एक ऐसी कीमत का अंदाजा लगाने लगी जो इतनी कम ना हो की वो अपनी पसंद का कपड़ा ना ले सके पर इतनी ज्यादा भी ना हो के उसका पति सुनते ही इनकार कर दे।

*4-5 हजार से क्या कम होगा?” कुछ देर सोचने के बाद वो बोली।

कीमत सुनते ही पातिदेव की आँखें हैरत से फैल गई और चेहरा सफेद हो चला। एक पल के लिए उसे लगा की वो ज्यादा कीमत बोल गई।

ठीक है... मैं 5 हजार देता हूँ। तुम अपने लिए एक अच्छी सी ड्रेस ले आओ...”

पार्टी का दिन धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा था और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वो अपने लिए अपनी पसंद की एक ईस ले आई थी मगर।

क्या बात है.." एक शाम उसके पति ने कहा- “देख रहा हूँ की पिछले कुछ दिन से काफी बेचैन सी हो..."

“मैं पार्टी में नहीं जा रही...” उसने जवाब दिया।

“क्यों ?”

एक ढंग की ज्यूयलरी नहीं है मेरे पास। जेवर के नाम पर पहनने को कुछ भी नहीं...”

तुम्हारी शादी के कुछ गहने हैं तो। वही डाल लो...”

उसने गुस्से में अपने पति को घूरा- “मैं पार्टी में जा रही हैं, फिर से शादी करने नहीं जा रही...”

तो ऐसे ही चल लो..” उसके पति ने धीरे से कहा।

“वहाँ कितनी अमीर अमीर औरतें होंगी। उनके । बीवी ऐसे बिना किसी जेवर के अच्छी लगेगी..."

कुछ देर के लिए कमरे में खामोशी हो गई।

तुम्हारी वो दोस्त है ना...” कुछ देर बाद उसका पति बोला- “पल्लवी जिसके बारे में तुम हमेशा बताती हो। उससे ले आओ एक रात के लिए कुछ..”

उसके चेहरे पर अचानक खुशी की लहर दौड़ गई- “हाँ... ये तो मैंने सोचा ही नहीं था...” पल्लवी उसकी काफी करीबी दोस्त थी और वो जानती थी की वो उसे मना नहीं करेगी। अगले दिन ही वो पल्लवी से मिलने पहुँच गई और अपना दुखड़ा उसके सामने रोया। उसकी बात सुनकर पल्लवी उसको अपने कमरे में ले गई और अपने सारे गहने उसके सामने रख दिए।

तुझे जो पसंद हो उठा ले..”
 


पहले उसने कुछ ब्रेस्लेट्स देखे, फिर कुछ सोने की चेन्स, फिर कुछ एअर रिंग्स। बारी बारी वो सब कुछ पहनकर अपने आपको शीशे में देखती और हर बार उसका दिल यही करता की जो उसने पहन रखा है उसे ना उतारे। पर फिर भारी दिल से वो उतार कर पल्लवी को वापिस दे देती और कुछ और पहनकर देखती। अचानक उसकी नजर एक काले रंग के ज्यूयलरी केस पर पड़ी। खोलकर देखा तो अंदर एक हीरों का हार था। उस हार पर एक नजर पड़ते ही उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। डिब्बे से उसने हार निकलकर अपने गले की तरफ बढ़ाया तो उसके हाथ काँप रहे थे। उसने हार पहनकर देखा तो वो उसकी ड्रेस के साथ बिल्कुल मैच कर गया। उस हार और ड्रेस में अपने आपको देखकर वो खुद ही इठलाने लगी।

मैं ये ले लँ..”

हाँ... हाँ ले जा..” पल्लवी ने फौरन जवाब दिया।

वो खुशी के मारे आगे बढ़कर पल्लवी से लिपट गई और थोड़ी देर बाद हार लेकर अपने घर आ गई।

पार्टी वाले दिन वो जैसे महफिल की जान थी। वो वहाँ मौजूद सब औरतों में सबसे ज्यादा खूबसूरत थी। उसका रंग रूप, उसके अंदाज, उसकी हँसी वहाँ हर किसी से अलग था। पार्टी में मौजूद हर मर्द की नजर उसपर थी। हर कोई उससे बात करना चाहता था, उसका नाम पूछना चाहता था, उसके साथ डान्स करना चाहता था। हर किसी। की जुबान पर उस शाम बस उसी का नाम था। उस रात वो बहुत देर तक नाचती रही। कुछ पार्टी में मौजूद लोग बार बार उसे डान्स के लिए पूछते रहे और कुछ खुद उसका भी रुकने का दिल नहीं किया।

उस शाम वो एक अलग ही दुनिया में थी जहाँ उसकी गरीबी और उसकी मजबूरी उससे कोसों दूर थी। सुबह के 3:00 बजे वो लोग पार्टी से निकले। पूरी पार्टी में उसका पति अपने बास के साथ शराब पीता रहा और वो नाचती रही थी। इसलिए दोनों ही काफी थके हुए थे। बाहर से उन्होंने एक टैक्सी की जिसने थोड़ी देर बाद उन्हें उनके घर के आगे लाकर छोड़ दिया।

घर पहुँच कर उसने लाइट्स ओन की और सीधी अपने कमरे में लगे फूल साइज मिरर के आगे आ खड़ी हुई ताकि अपने आपको निहार सके। सामने जो नजर आया वो देखकर उसके मुँह से चीख निकल गई।

हीरों का वो हार जो पूरी रात उसके गले की शान बना हुआ था अब उसके गले से गायब था।

“चिल्ला क्यों रही हो?" नशे में उसका पति बड़बड़ाया।

वो अपने मुँह पर हाथ रखे उसकी तरफ पलटी- “हार खो गया...”

“क्या?"

पल्लवी का हीरों वाला हार...” वो हकलाते हुए बोली- “खो गया...”

एक झटके में उसके पति का सार नशा गुल हो गया।

“खो गया मतलब... ऐसे कैसे खो गया?”

उन्हें मिलकर अपना पूरा घर छान मारा। उसकी ड्रेस को उतार कर झाड़ा, कोट में चेक किया, उसके बैग को उलट कर देखा पर हार का कहीं कोई निशान नहीं था।

तुम्हें यकीन है की जब तुम पार्टी में से निकली थी तो हार गले में था...”

हाँ... मुझे पता है की हार था। मिसेज मल्होत्रा ने बाहर जाते जाते भी हार को देखकर उसकी तारीफ की थी...”

पर अगर बाहर कहीं सड़क पर गिरा होता तो तुम्हें आवाज तो आती...”

हाँ.. बात तो सही है। एक मिनट, वो टैक्सी। उसका नंबर याद है..." वो अचानक बोली।

नहीं मैंने ध्यान नहीं दिया। तुमने देखा...”

नहीं..” उसने भी इनकार में गर्दन हिला दी।

कुछ देर तक वो दोनों ऐसे ही बैठे एक दूसरे को देखते रहे। कुछ देर बाद उसके पति ने उठकर फिर से कपड़े पहने।

मैं देखकर आता हूँ। शायद कहीं गिरा मिल जाए.."

पर ऐसा हुआ नहीं। वो जाकर हर उस जगह पर देख आया जहाँ वो दोनों एक सेकेंड के लिए भी खड़े हुए थे पर हार नहीं मिला।

अब मैं पल्लवी को क्या जवाब देंगी...” वो रोते हुए बोली।

उसे फोन करके बोलो की हार को हुक टूट गया है और तुम ठीक करवाके वापिस दोगी। थोड़ा सोचने का टाइम मिल जाएगा...”

और अपने पति के कहने पर उसने ऐसा ही किया।

अगले कुछ दिन तक वो दोनों कई बार पार्टी वाली जगह पर गये, पार्टी में आए लोगों से पूछा पर हार का कुछ पता नहीं चला।

नया लेकर देना पड़ेगा, वैसा ही जैसा की वो हार था...” उसके पति ने थक हार कर कहा।

 
अगले दिन वो हार के डिब्बे पर लिखा अड्रेस देखकर ज्यूलरी शोरूम पहुँचे।

जी हाँ हमारे यहाँ से ही बिका है...” शोरूम में डिब्बा देखकर जोहरी ने कहा- “ये नौ-लक्खा हमारी स्पेशलिटी है..”

ऐसा ही एक बनवाना है..."

जी बन जाएगा... 9 लाख में से आधे आपको अड्वान्स देने होंगे और बाकी आधे डेलिवरी पर.."

कीमत सुनकर दोनों की आँखें हैरत से खुली की खुली रह गई पर और कोई रास्ता था भी नहीं। उनके अगले कुछ दिन यही सोचने में निकले के 9 लाख का इंतेजाम कहाँ से करें। उसकी शादी के गहने, पति का प्रोविडेंट फंड, मोटरसाइकल सब चीजों को जोड़कर देखा गया पर फिर आखिर में उन्हें अपना घर ही गिरवी रखना पड़ा। 44 लाख अड्वान्स देते वक़्त उसने हार में लगने वाले हीरों और बाकी चीजों को खुद देखकर ये तसल्ली की थी की हार बिल्कुल वैसा ही दिखे जैसा की पल्लवी के पास था।

एक महीने बाद जब वो हार लौटाने गई तो पहली बार पल्लवी ने उसे देखकर मुँह बनाया।

“मुझे बीच में जरूरत पड़ी थी हार की। टाइम पे वापिस करती यार...”

पर पल्लवी ने डिब्बा खोलकर हार देखा नहीं जिसका उसे बहुत डर था। हार हूबहू पल्लवी के हार जैसा ही दिखता था पर वो कहते हैं ना का चोर की दाढ़ी में तिनका। उसे लग रहा था की पल्लवी डिब्बा खोलकर देखेगी और पहचान जाएगी की ये हार उसका नहीं है पर ऐसा हुआ नहीं।

और फिर जिंदगी ने एक अजीब सा मोड़ ले लिए। जिस चीज से उसको सख्त नफरत थी वो अब और ज्यादा बढ़ गई थी यानी की मजबूरी।

घर में काम करने वाली लड़की को हटा दिया गया, उसके शादी के गहने बेच दिए गये, पतिदेव मोटरसाइकल बेच कर बस में सफर करने लगे। दोनों के दिमाग में बस एक ही ख्याल था की सर से किसी भी तरह कर्ज उतार कर अपना घर छुड़ा लें इससे पहले की सड़क पर आने की नौबत आए। और फिर उसने भी अपनी ख्याली दुनिया छोड़कर घर संभालना सीख लिया। बर्तन धोना, झाडू पोछा लगाना, कपड़े धोना, खाना पकाना ये सारे वो काम थे जो एक गरीब घर में पैदा होने की वजह से उसे बहुत पहले कर लेने चाहिए थे पर उसने अब किए। इन सबसे अलग उसने भी एक आफिस में सेक्रेटरी की नौकरी कर ली।

ज्यादा पढ़ी लिखी वो थी नहीं इसलिए उस छोटी सी नौकरी से जो भी पैसे मिलते, सब बैंक का कर्ज चुकाने में चले जाते।

उसके पति ने ओवरटाइम करना शुरू कर दिया था। रात को देर से घर आना और सुबह होते ही आफिस चले। जाना अब एक आदत सी बन गई थी। अक्सर कमीशन लेकर वो कुछ बड़े बड़े अकाउंट्स का काम घर ले आता और पूरा सनडे उसी में गुजार देता।

और अगले 10 साल तक उनका यही लाइफस्टाइल रहा।

10 साल पूरे होने तक उन्होंने पूरा लोन चुका दिया था और उनका घर एक बार फिर उनका अपना था।

वो अब उमर में काफी बड़ी लगने लगी थी। अब वो एक ख्याली दुनिया में रहने वाली खूबसूरत लड़की नहीं थी। अब वो एक घरेलू औरत थी जो जिंदगी के मुश्किल अंदाज काफी करीब से देख चुकी थी और उनसे लड़ना भी सीख गई थी। वो अब मिड्ल क्लास घरों की उन औरतों की तरह हो चुकी थी जो गरीबी में भी घर चलाना बखूबी जानती हैं। घर पर उसके बाल अब बिखरे रहते थे। बनना सवरना उसने बहुत पहले छोड़ दिया था। पहले जो वक़्त घर पर टी.वी. देखने और ख्याली पुलाव बनाने में निकलता था अब वही वक़्त झाडू लगाने या खाना बनाने में गुजरता था। पर अब कभी कभी जब उसका पति घर पर नहीं होता था तो वो अकेली बैठ कर उस शाम के बारे में सोचा करती थी जबकि वो महफिल की जान थी।

अगर उसने वो हार खोया ही नहीं होता तो क्या होता.. पिछले 10 साल कैसे गुजरते... आज उनकी जिंदगी किस तरह होती... वो अक्सर ये बैठ कर सोचती पर जवाब कभी मिलता नहीं था।

एक शाम जब वो पैदल अपने घर की तरफ आ रही थी तो उसको एक छोटे बच्चे के साथ सड़क के किनारे खड़ी पल्लवी दिखी। पल्लवी को उसने आखिरी बार तभी देखा था जब वो हार लौटने गई थी। उसके बाद वो आज उसे देख रही थी। अचानक उसे समझ नहीं आया की क्या करे पर फिर कुछ सोचकर उसने आवाज लगाई।

जब वो करीब पहुँची तो पल्लवी ने उसे एक नजर ऊपर से नीचे तक देखा।

“आप... माफ कीजिएगा मैंने पहचाना नहीं..."

अरे मैं हूँ, पूजा। भूल गई?”

पल्लवी के मुँह से जैसे चीख सी निकल गई।

पूजा...” वो अपने मुँह पर हाथ रखते हुए बोली- “तुझे ये क्या हो गया?"

हाँ... जिंदगी बदल गई और साथ में बदल दिया मुझे भी। सब तेरी ही मेहरबानी है...”

मेरी मेहरबानी... मतलब?”

वो हीरों का हार याद है जो मैं तुझसे ले गई थी..”

हाँ,

वो खो दिया था मैंने...”

“खो दिया था मतलब.. तू तो मुझे हार वापिस देकर गई थी.”

नहीं वो मैंने नया खरीद कर दिया था...” उसने मुश्कुराते हुए जवाब दिया- “9 लाख का कर्ज लेकर नया हार खरीदना पड़ा क्यों इतनी हमारी औकात थी नहीं। और पिछले 10 साल से अपने आपको घिस घिस कर वो 9 लाख का कर्ज उतारा है...”

पल्लवी उसे ऐसे देख रही थी जैसे कोई भूत देख लिया हो।

“तूने मेरे हार खो दिया था?”

ii



हाँ.”

और उसके बदले एक नया हार लेकर दिया था.”

हाँ... तुझे फरक पता नहीं चला कभी.. बिल्कुल तेरे नौलखे जैसा ही था। कीमत भी उतनी ही थी, 9 लाख...”

पल्लवी ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया- “पूजा मेरा हार असली नौलक्खा नहीं था। वो तो नकल था।

आर्टिफिशियल ज्यूयलरी। एक हजार का लिया था मैंने...”

***** समाप्त *****
 
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