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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

“साले मेरी गाण्ड का मार मार कर भोसड़ा तूने बना दिया है और पूछ उस लौंधे से रहा..." शिखा ने अपने ऊपर चढ़े हुए आदमी से पूछा।

वो उल्टी पड़ी हुई थी और कोहनियों के बल अपना चेहरा उठाकर सिगरेट के कश लगा रही थी। एक आदमी उसके ऊपर चढ़ा हुआ उसकी गाण्ड मार रहा और दूसरा उसके सामने बैठा अपना लण्ड हिला रहा था। तीनों पूरी तरह से नंगे थे।

“क्या करूं जानेमन?” उसके ऊपर चढ़ा हुआ आदमी तेजी से धक्के लगाता हआ बोला- “तेरी गाण्ड है ही इतनी मस्त..."

वैसे एक बात बता... ये साले लौंधे तेरे इश्क़ में इतने बावले हो कैसे जाते हैं की अपना सब कुछ छोड़कर तेरे कहे पर चल देते हैं...” सामने बैठे आदमी ने पूछा

बिस्तर पर जन्नत दिखाती हूँ ना सालों को। और बस.. वहीं मेरे कदमों में बिछ जाते हैं..” शिखा हँसते हुए बोली।

मानना पड़ेगा। ये चौथा था जो तेरे इश्क़ में पागल हो रहा था। इससे पहले के तीन भी साले मरे जा रहे थे तुझे अपनाने को..."

वो दूसरे वाले के पास से पैसे आ गये...” शिखा बोली।

हाँ.. आ गये ना... जितने माँगे थे उतने ही आए। वो तीनों साले सोचते हैं की उनके हाथ से तुझे गोली लगी है। और बचने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं..” सामने बैठा आदमी बोला।

ये अजय नाम के लौंडे के पास भी टेप कल भिजवा दूंगा मैं। फिरौती कितनी मांगू इससे?” शिखा के ऊपर चढ़े हुए आदमी ने जोर से धक्का मारते हुए कहा।

आराम से बहनचोद..” शिखा चिल्लाई- “दर्द होता है। तेरी माँ की गाण्ड नहीं है ये, मेरी है। आराम से मार। और ये चौथा वाला इतना रईस नहीं है। इससे रकम ज्यादा मोटी मत माँगना नहीं तो सारा मामला खराब हो जाएगा। पहली माँग थोड़ी कम ही रखो, अगर साले की जेब से निकल आए तो बाद में देखेंगे...”

वैसे कमाल है तू...” शिखा ने सिगरेट बुझाई तो सामने बैठा आदमी आगे बढ़कर उसके करीब आ गया- “मरने का नाटक ऐसे करती है की अगर हमें पता ना हो के ये सारा बना बनाया खेल है तो हमें भी यही लगेगा की मर गई तू..” उसने आगे बढ़कर अपना लण्ड शिखा के मुँह की तरफ बढ़ाया।

और तू साले...” शिखा इशारा समझते हुए लण्ड मुँह में लेते हुए बोली- “वो रंग थोड़ा कम डालाकर पीछे से। मेरे जिश्म में भी आम इंसानो जितना खून है, कोई 4-5 लीटर ज्यादा नहीं है। इतना रंग बिखेर देता है की देखने। वाले को लगेगा की जैसे कोई भैंस मरी हो यहाँ..."

पहला वाला अब तेजी के साथ उसकी गाण्ड पर धक्के लगा रहा था।

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गाण्ड में मत झड़ना... बाहर निकालना...” शिखा ने एक पल के लिए लण्ड मुँह से निकालकर कहा।

वैसे एक बात बता...” जिसका लण्ड वो चूस रही थी उस आदमी ने कहा- “इन चारों लौंडों से चुदवाया तूने?”

“हाँ... और क्या यूँ ही मेरे इश्क़ में मरे जा रहे थे ये...” शिखा हँसकर बोली- “इन चारों के हिसाब से ये पहले मर्द थे जिन्होने एक सीधी साधी, पाक शरीफ लड़की के जिश्म को छुआ था..”

तीनों जोर से हँस पड़े।

और गाण्ड... वो भी मरवाई?” जो आदमी गाण्ड मार रहा था उसने पूछा।

नहीं मेरे राजा..” शिखा पीछे हाथ करके उसके चेहरे को थपथपाते हुए बोली- “ये तो सिर्फ तेरी है। बुक करा रखी है ना तूने। पेटेंट है तेरा। ये कोई कैसे मार सकता है...”

तीनों फिर जोर से हँसे।

गाण्ड नहीं मरवाई... वरना फिर सालों को शक हो सकता था की मैं बिस्तर पर खेली खाई हैं। उनके लिए मैं एक मासूम लड़की हूँ जिसकी ज़िंदगी में वो सब पहले मर्द थे।

थोड़ी देर के लिए तीनों चुप हो गये और चुदाई पूरे जोरों पे चल पड़ी। उसके ऊपर चढ़े हुए आदमी ने हाँफना शुरू कर दिया था और पूरी जान से गाण्ड पर धक्के मार रहा था। सामने वाला आदमी अपने घुटनों पर खड़ा शिखा के मुँह में लण्ड अंदर बाहर कर रहा था।

गाण्ड में निकाल दिया क्या साले...” धक्के पड़ने बंद हुए तो शिखा ने चौंक कर पूछा।

नहीं अभी निकाला नहीं है। जरा साँस तो पकड़ लँ...”

अब अगला पड़ाव कहाँ..” सामने वाले आदमी ने पूछा।

फिलहाल तो उस अजय को टेप भिजवाओं और फिर इस शहर से निकलते हैं। देखते हैं अगला शिकार कहाँ मिलता है...” कहकर शिखा फिर लण्ड चूसने लगी।

आज सँडविच स्टाइल हो जाए... चूत और गाण्ड में लण्ड एक साथ..” मुश्कुराते हुए शिखा ने सामने वाले आदमी से कहा और आँख मार दी।

***** समाप्त *****

 
20 भीड़ में एक चेहरा

ये बात सच है की गरीब आदमी कभी अच्छा या बुरा नहीं होता, वो सिर्फ भूखा होता है, अपनी जरूरत का मारा होता है। जिंदगी उसे इतना वक़्त और मौका ही नहीं देती की वो अच्छाई या बुराई के बारे में सोच सके। वो बेचारा तो सारी जिंदगी दो वक्त की रोटी जोड़ने में लगा रहता है और एक दिन यही कोशिश करते करते दुनिया से फारिग हो जाता है।

उसके लिए अच्छे या बुरे का मतलब सिर्फ इतना होता है के जिस दिन वो और उसके बच्चे रात को खाना खाकर सोए, वो दिन अच्छा था और जिस दिन वो भूखे सोए, वो दिन बुरा था। जिस दिन उसने हँसकर अपने बच्चे की फरमाइश पूरी कर दी वो अच्छा था और जिस दिन उसे अपने बच्चे का मायूस चेहरा देखना पड़ा वो दिन बुरा था।

जिस दिन वो प्यार से अपनी बीवी के लिए कुछ ले आया वो दिन अच्छा था और जिस दिन पैसे की तंगी के चलते उसे अपनी बीवी को झिड़कना पड़ा, वो दिन बुरा था।

पास टेबल पर रखी पुरानी अलार्म क्लाक की घंटी ने उसे सुबह के आने का इशारा किया। आँखें मलता हुआ वो कुछ देर तक बिस्तर पर अपनी जगह ही बैठा रहा। बाहर अब भी अंधेरा था और मौसम में हल्की ठंडक। गली में लगे लैंप पोस्ट की हल्की हल्की रोशनी बंद खिड़की की दरार से अंदर आ रही थी।

उसने एक नजर अपनी बगल में सो रही बीवी पर डाली। अक्सर ऐसे ही सुबह के वक्त उसे इस बात का अंदाजा होता था की वो कितनी खूबसूरत है। वरना दिन भर तो वो कभी घर के काम में फँसी, कभी पड़ोस की औरत से बहस करती हुई, कभी बेटी पर चिल्लाती हुई, कभी खुद अपने पति पर किलसटी हुई एक आम सी औरत ही लगती थी।

पर ऐसे अक्सर सुबह के वक्त जब वो यूँ दुनियां से बेखबर, चेहरे पर सुकून लिए चैन के नींद में होती तो उसे अपनी किश्मत पर रश्क होता था। वो सचमुच बेहद खूबसूरत थी। उसने चादर को थोड़ा ऊपर खींचकर उसके नंगे जिश्म को ढका और बिस्तर से उठ बैठा। कल रात की मोहब्बत के असार अब भी उसके चेहरे पर बाकी थे। बाल बिखरे हुए और होंठो की लाली थोड़ी फैली हुई थी पर ये सब सिर्फ उसकी खूबसूरती में इजाफा ही कर रही थी।

बिस्तर से उठकर वो कमरे के बीच उनके बिस्तर के पास ही रखे पालने के पास पहुँचा। पालने में उसकी डेढ़ साल की बेटी अपने पैर का अंगूठा हाथ में पकड़े नींद की आगोश में गुम थी। प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते वो उसे देख ही रहा था की पीछे से बीवी की आवाज आई।

चूड़ियों का बड़ा शौक है तुम्हारी बेटी को। सारा दिन मेरी चूड़ियों को खींचती रहती है...”

उसने पलट कर देखा। वो बिस्तर पर बैठी अपने कपड़े पहन रही थी।

“अच्छा जी... अभी से चूड़ियों का शौक..”

हाँ... और नहीं तो क्या?” वो बिस्तर से उठकर उसके करीब आई- “मेरी क्या, पड़ोस की औरतें भी इसे उठाएं तो सीधा उनकी चूड़ियों पर हाथ डालती है...”

उसने झुक कर बेटी का माथा चूम लिया।

हम आज अपनी बेटी के लिए नयी चूड़ियां ले आएंगे। फिर किसी और की चूड़ी नहीं खींचनी पड़ेगी। है ना बेटा..."

“काँच वाली मत लाना। टूट जाएगी..." वो कमरे के एक कोने में रखे स्टोव की तरफ बढ़ी।

“ठीक है...”

दूध ला दो। चाय बना देती हूँ...”

ज़िंदगी बस इसी ढर्रे पर चल रही थी। उसको याद भी नहीं था की उसकी ज़िंदगी में आखिरी बार कब कुछ अलग हुआ था। वो सुबह उठता, दूध लेने जाता, चाय पीता और फिर काम पर निकल पड़ता। सारा दिन शहर की हजारों लाखों की भीड़ में वो भी धक्के खाता, शाम को थका हारा घर आता, नहा धोकर खाना खाता, थोड़ा टीवी को देखता, थोड़ा बीवी को देखता, थोड़ा बेटी के साथ खेलता और सो जाता। और अगले दिन फिर वही कहानी दोहराई जाती।

 
एक मार्लबरो का पैकेट..” सड़क के किनारे बने पनवाड़ी के पास एक काले रंग की महंगी और लंबी गाड़ी आकर रुकी और एक हाथ ने 500 का नोट बाहर निकाला। गोरा चिट्टा हाथ, हाथ पर महंगी घड़ी, हाथ में 500 का नोट, उंगली में सोने की अंगूठी। देखकर ही पता चलता था की किसी अमीर का हाथ है।

उसने एक नजर अपने हाथ पर डाली।

काले रंग का हाथ जो अब धोकर भी साफ नहीं होता था, हाथ की हर नस बाहर को निकली हुई, मजदूरी कर करके सख्त हो चुकी खाल। ये एक गरीब का हाथ था, एक मजदूर का।

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****

ये ले... और कोई गलती ना हो। भरोसा कर रहे हैं तुझ पर...” ।

उसने हाँ में हाँ मिलते हुए अपनी गर्दन हिलाई और काले रंग का बैग उठाया।

“शाम को खबर कर देना। अपने पैसे भी लेता जाना..”

उसने फिर हाँ में हाँ मिलाई और हाथ में बैग उठाए बाहर आ गया। मौसम अब ठंडा हो चला था पर दोपहर के वक्त काफी तेज धूप होती थी। सुबह और शाम के वक्त मौसम काफी दिलकश रहता था पर दिन में गर्मी की तपिश अब भी काफी थी।

“गर्मी बहुत पड़ती है यहाँ। सदीं तो बस अब नाम को होती है दिसेंबर और जनवरी में। और दोपहर में गर्मी साली ऐसी की खड़े खड़े इंसान जल कर कोयला हो जाए.”

उसे अब भी याद था की जब वो पहली बार अपने गाँव से इस शहर में आया था तो उसके एक दोस्त ने उसे ये बात बताई थी और अगले कुछ दिनों में ही उसे इस बात का अंदाज भी हो गया था। शहर कितना अलग होता है। गाँव से। गाँव में उसके पास वक्त ही वक़्त होता था। सारा दिन वो अपने दोस्तों के साथ कभी यहाँ बैठा होता था तो कभी वहाँ। कभी वो खेतों में पड़े होते थे तो कभी नहर में डुबकी लगा रहे होते थे। वहाँ ना किसी का डर था और ना किसी की शर्म।

और कितना सुकून था वहाँ। सुबह शाम मंदिर की आरती पूरे गाँव में गूंजती और दिन में 5 बार अजान की आवाज। और यहाँ शहर में तो उसे अपने घर में कभी कभी खुद अपनी बीवी की आवाज सुनाई नहीं देती थी। गाँव में वो रात को दो रोटी खाकर नीचे जमीन पर ही चादर बिछाकर सो जाता था और क्या नींद आती थी। पर वो बातें अब पुरानी हो चली थी। 15 साल पुरानी।

पिछले 15 साल से वो भी इस शहर की भीड़ का एक हिस्सा बन चुका था। यहाँ के लाखों चेहरों में एक चेहरा उसका भी शामिल हो चुका था और जिस चेहरे को शायद उसकी अपनी बीवी के सिवा कोई नहीं पहचानता था। सारा दिन जाने कितनी निगाहें उसके इस चेहरे को छूती थी पर ना किसी निगाह में अपनापन, ना किसी में हमदर्दी और ना किसी निगाह में पहचान।

वो तो बस इस भीड़ के बेशुमार चेहरों में खुद भी एक चेहरा था। एक चेहरा जो अपनी पहचान कब की खो चुका था, या शायद कभी पहचान बना ही नहीं पाया था।

देख ये शहर है। गाँव से बहुत अलग है। दिल लगा के मेहनत कर, एक दिन साला लंबी गाड़ी में घूमेगा तू भी..."

कितना गलत साबित हुई थी उसके दोस्त की कही ये बात। पिछले 15 साल से दिन रात पिस रहा था, मेहनत कर रहा था पर सवाल अब भी बस दो वक़्त की रोटी का था। जब आया था तो ख्याल ये था की गाँव वापिस जाएगा लंबी सी गाड़ी में, यहाँ एक घर खरीदेगा और यहीं की किसी गोरी चिट्टी लड़की से शादी करेगा पर वक़्त ने एक एक करके सारे ख्याल गलत कर दिए।

वो आज भी किराए के मकान में था, आज भी सिटी बस में धक्के खा रहा था और शादी अपने गाँव में जाकर ही की थी। और वक़्त ने उसके ख्याल ही नहीं, कहीं जिंदगी की इस दौड़ भाग में खुद उसे भी गलत कर दिया था।

 
अब तो उसे याद भी नहीं था की वो कब आखिरी बार अपने गाँव गया था। बस यहीं का होकर रह गया था। गाँव में एक वक़्त था की वो हर किसी की मदद करने को तैयार रहता था। कभी किसी को इनकार नहीं किया और अब ये वक़्त था की खबर ही नहीं थी की आखिरी बार किसी की मदद कब की थी। अब तो आलम ये था के अपने लिए मदद ढूँढ़ने से वक़्त मिलता तो शायद किसी की मदद करता।

बचपन में पड़ोसी के घर पर हर सनडे शाम को पिक्चर देखता था और उन पिक्चर में निगेटिव करेक्टर्स, गुन्डो को देखकर हमेशा ये सोचता की वो बड़ा होकर एक अच्छा आदमी बनेगा।

“क्या होता क्या है अच्छा आदमी...” अब जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल ये बन गया था।

जो अपने परिवार का ख्याल रखे, उनी जरूरत को पूरा कर सके क्या वो अच्छा आदमी होता है?

या जो सोसाइटी समाज की उम्मीदों पर खरा उतरे वो अच्छा आदमी होता है?

या जो भगवान के रास्ते पर चले वो अच्छा आदमी होता है?

अगर भगवान में अच्छाई है तो क्या जो भगवान के नाम पर दूसरों को मारते हैं वो अच्छे आदमी हैं?

अगर समाज के साथ चलने में अच्छाई है तो क्या जो समाज के नाम पर अपने बच्चों को इसलिए मार देते हैं। के उन्होंने धरम जात के बाहर शादी की, क्या वो अच्छे आदमी हैं?

और अगर परिवार सबसे पहले है तो क्या अपनी और अपने परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए सारा दिन दूसरों का गला काटने वाले लोग, सरकारी दफ्तरों में रिश्वत लेते बाबू और ना जाने ऐसे कितने लोग, क्या वो अच्छे आदमी हैं?

क्या होता क्या है साला अच्छा आदमी?

देख काम सीधा है और आसान है और पैसा अच्छा है...” उसके दोस्त ने उसको बताया था।

मैं कर नहीं पाऊँगा यार...” उसने हिचकते हुए कहा था।

“अरें कौन सा राकेट उड़ाना है तूने जो कर नहीं पाएगा...”

“यार मगर?”

देख सोच ले। माँ के पेट से कोई कुछ सीख कर नहीं आता। सब यहीं आकर सीखते हैं। तू भी सीख जाएगा..."

और आज उसका काम पर पहला दिन था। अपने सारे उसूल, सारे इरादे तो वो जाने कब का खो चुका था, भूल चुका था मगर फिर भी काम पर पहला दिन हर किसी का मुश्किल होता है।

यार कभी कभी दिल करता है की मौका मिले तो अपने देश के लिए साला कुछ करें। कितना सरदर्दी है इधर। दिल करता है की हम भी कुछ ऐसा करें जिससे लोगों का भला हो, देश की तरक्की हो...” वो अक्सर कहा करता

था और जब कहता था तो ऐसा कुछ करने का इरादा भी रखता था पर ये सब वक़्त के साथ कब का बदल चुका था। अब अपने लिए करने से फुर्सत मिले तो देश का ख्याल आए।

वो कभी भी धार्मिक या मजहबी किश्म का नहीं था पर ऊपर वाले में उसका पूरा यकीन था। कभी कोई भी काम करने से पहले यही सोचता था की ऊपर वाले की नजरों में ये काम सही होगा या गलत। कोई भी काम शुरू। करता तो ऊपरवाले का नाम जरूर लेता पर आज सोच रहा था की ऊपरवाले का नाम ले या नहीं। इस भाग दौड़ में उस बनानेवाले को तो वो कब का भूल चुका था।

पर फिर भी वो आज वहाँ था जहाँ है। उसकी जरूरत उसे आज इस दरवाजे तक भी ले आई थी।

 
पसीने की बूंदें उसके माथे से होती उसके चेहरे को गीलाकर रही थी। चेहरा क्या वो पूरा ही पसीने में नहाया हुआ था। दोपहर सर पर थी और आज तो गर्मी ने जैसे हद ही कर दी थी।

चूड़ी लाल रंग की लाईएगा। वो ज्यादा पसंद है आपकी बेटी साहिबा को...” उसकी बीवी ने उसे घर से निकलते हुए कहा था।

चूड़ी बाजार कहने को तो एक लंबी सी गली ही था पर सारा दिन यहाँ इतनी भीड़ होती थी की इंसान का दम घुट जाए। कभी किसी जमाने में यहाँ सिर्फ चूड़ियां मिला करती थी पर गुजरते वक़्त के साथ धीरे-धीरे यहाँ बिकने वाली चीजों की वेराइटी में भी इजाफा हो गया था। हर तरह का सस्ता माल यहाँ मिल जाता था और इसी वजह से यहाँ पूरा दिन चहल पहल रहती थी।

पर अब भी यहाँ की खासियत यहाँ बिकने वाली चूड़ियां ही थी। चूड़ियों के साथ साथ एक और चीज थी जिसकी यहाँ फुल वेराइटी मौजूद थी और वो थी औरतें। अगर औरतों को क्लासीफाइ किया जाता तो शुरू करने के लिए ये एक अच्छी जगह थी क्योंकी यहाँ हर उमर की, हर साइज की, हर धरम की औरत मिल सकती थी। वो एक पल के लिए खड़ा सोचता रहा और फिर भीड़ में घुसता हुआ चूड़ियों की दुकान देखता हुआ आगे बढ़ने लगा।

वो शायद जिंदगी में इससे ज्यादा कभी कन्फ्यूज भी कभी नहीं हुआ था।

भीड़ बहुत ज्यादा थी और उससे कहीं ज्यादा थी गर्मी और उससे भी ज्यादा इंसान के शरीर से उठती गंध।। उसका दिल चाह रहा था की वो फौरन उस जगह से निकल जाए पर जिस काम के लिए आया था वो तो करना ही था। अब पलट कर जाना बेवकूफी थी और उसके लिए अब देर भी हो चुकी थी। बड़ी मुश्किल से और काफी देर बाद उसे एक दुकान में कुछ चूड़ियां पसंद आई।

चूड़ी लेकर कुछ देर बाद वो चूड़ी बाजार से बाहर निकला और बस स्टैंड पर आकर खड़ा हो गया। फिर कुछ सोचकर वो पैदल ही आगे को चल पड़ा। हाथों में लाल रंग की छोटी छोटी चूड़ियां थी। और वहाँ बाजार में जाने

और भी कितनी छोटी छोटी बच्चियां अपने लिए चूड़ियां पसंद कर रही थी।

कौन होता कौन है अच्छा आदमी?

क्या वो अच्छा आदमी है जो अपने बच्चे का पेट भरने के लिए दूसरे के बच्चे के मुँह से निवाला छीन ले... या वो अच्छा आदमी है जो दूसरे के बच्चे से निवाला ना छीने और अपने बच्चे को भूखा सुला दे। सड़क के किनारे खड़ी एक गाड़ी के बाहर लगे रियर व्यू मिरर में उसने अपनी शकल देखी पर फैसला नहीं कर सका की अब वो शकल एक अच्छे आदमी की थी या एक बुरे आदमी की। क्या आज वो शकल के आदमी की शकल भी थी।

 
शायद नहीं... आईने में जो नजर आ रहा था वो तो बस एक चेहरा था। हजारों की भीड़ में खोया एक चेहरा। ना अच्छा ना बुरा, थोड़ा अच्छा थोड़ा बुरा एक चेहरा। और ऐसे चेहरों की कोई कमी थोड़े ही है शहर में। जिंदगी और वक्त की मार पड़े तो हर चेहरा ऐसा ही दिखेगा जैसा आज उसका था। चलते हुए उसे कितनी देर हो चुकी थी इसका उसे अंदाजा ना होता अगर उसके फोन की घंटी ना बजती तो। जेब से उसने अपना पुराना सा मोबाइल फोन निकाला।

हेलो...” काल एक अंजान लैण्डलाइन नंबर से थी।

मैं बोल रही हूँ..” आवाज उसकी बीवी की थी।

हाँ... बोलो.."

“मैं ये कह रही थी की आप चूड़ियां मत खरीदना..”

क्यों?” उसने पूछा- “मैंने तो ले ली...”

अच्छा ले ली आपने... वो मैं पड़ोस की कुछ औरतों के साथ चूड़ी बाजार आई थी तो मैं सोच रही थी की आपको मना कर दें। मैं खुद ही ले लेती चूड़ियां। और यहाँ आपकी बिटिया रानी को पहना कर साइज का भी सही पता चल जाता...'

तुम चूड़ी बाजार में हो...” उसके पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई। एक साथ 3 चीजें नजर के सामने घूम गई। उसकी बीवी का चेहरा। उसकी बेटी का चेहरा। और वो काले रंग का बैग जो वो चूड़ी बाजार में छोड़कर

आया था।

इससे पहले की उसकी बीवी का जवाब आता, फोन पर एक ऊँची धमाके जैसी आवाज सुनाई दी और लाइन कट गई।

***** समाप्त *****

* * * * * * * * * *

 
21 मासूम

वो सर पर अपना पल्लू डाले घर से निकली। बाहर गम बहुत ज्यादा थी और धूप काफी तेज जबकि ये सिर्फ एप्रिल का महीना था। उसने टी.वी. पर भी सुना था की ये साल पिछले 50 सालों में सबसे गरम होगा। दोपहर के वक़्त गाव की सड़कें अक्सर सुनसान ही रहती थी। एक बजने तक लोग अपने अपने घर में घुस जाते थे और शाम 4 या 5 बजे से पहले नहीं निकलते थे।

खाली सड़कों पर तेज कदम बढ़ाती वो गाव से थोड़ा बाहर बने चर्च की तरफ बढ़ी। पीछे से एक कार के आने की आवाज सुनकर वो सड़क के किनारे हो गई। वो जानती थी के कार किसकी है। रोजाना ये कार इसी वक़्त यहाँ । से गुजरती थी। पर आज पीछे से आती कार तेजी के साथ गुजरी नहीं बल्कि उसके पास पहुँच कर धीमी हो गई।

कैसी हो सिरिशा?” मेरसेडीज का शीशा नीचे हुआ।

उसने रुक कर कार की तरफ देखा और दिल की धड़कन जैसे अपने आप तेज होने लगी। विट्ठल पर गाव की हर लड़की फिदा थी, उसकी अपनी दोनों बड़ी बहनें भी। वो देखने में था ही ऐसा, लंबा, चौड़ा। वो क्या कहते हैं। अंग्रेजी में। हाँ, टाल डार्क और हैंडसम। वो हमेशा महंगे कपड़े पहनता था, महंगी गाड़ियां चलाता था। उसने तो ये भी सुना था की विठ्ठल के पापा का इंडिया के हर बड़े शहर में एक घर था।

आपको मेरा नाम कैसे पता विठ्ठल साहब...” वो खिड़की के थोड़ा करीब होते हुए बोली।

तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?” विट्ठल ने मुश्कुराते हुए सवाल के बदले सवाल किया।

कैसी बात करते हैं। आपको तो हर कोई जानता है..” वो थोड़ा शर्माते हुए बोली।

“हम्म्म्म..” विठ्ठल मुश्कुराया- “कहाँ जा रही हो?"

“चर्च तक...”

चर्च... सिरिशा पर तुम तो एक ब्राहिमन हो..."

मुझे वहाँ जाके अकेले बैठना अच्छा लगता है, इसलिए इस वक्त जाती हैं। कोई नहीं होता चर्च में, एकदम शांति, आराम से बैठके भगवान को याद किया जा सकता है...” सिरिशा एक साँस में बोल गई।

आराम से, शांति से मंदिर में भी बैठा जा सकता है। या मंदिर के पुजारी तुम्हें पसंद नहीं आते उस गोरे फादर के सामने...”

फादर पीटर का नाम इस तरह सुनकर सिरिशा और भी शर्मा उठी। वो बाहर किसी देश के थे, कौन से पता नहीं पर यहाँ इंडिया में वो क्रिस्चियन धरम फैलाने के लिए आए थे। वो अपने आपको एक मिशनरी कहते थे। जब वो चर्च में खड़े होकर बोलते थे तो सिरिशा के दिल को एक अजीब सा सुकून मिलता था। कितना ठहराव था उनकी बातों में, उनकी आवाज में।।

जो भी बात कभी सिरिशा को परेशान करती, वो अक्सर कन्फेशन बाक्स में बैठकर फादर पीटर से कह देती थी। यूँ चर्च में उनके सामने सब कुछ कन्फेस कर लेना उसे बहुत पसंद था।

तुम्हें पता है ये लोग यहाँ गरीब लोगों को पैसा देकर क्रिस्चियन बनाते हैं.” वो अभी अपनी सोच में ही गुम थी की विठ्ठल बोला।

उसकी बात सुनकर एक अजीब तरह का गुस्सा सिरिशा के दिल में भर गया। उसने विठ्ठल की बात का जवाब देना जरूरी नहीं समझा और कार से हटकर आगे की तरफ चल पड़ी।

अरें इतनी गर्मी में कहाँ जा रही हो.. आओ मैं छोड़ देता हूँ..” पीछे से विठ्ठल चिल्लाया उसकी बात सुनकर सिरिशा एक पल के लिए सोचने पर मजबूर हो गई।

चर्च अभी थोड़ा दूर था और आज गर्मी कुछ ज्यादा ही थी। वो चर्च तक पहुँचते पहुँचते पसीना पसीना हो जाएगी और इस हालत में चर्च जाना उसे अच्छा नहीं लगता था।

“गाड़ी में एसी चल रहा है। मैं छोड़ दूंगा तुम्हें..” कहते हुए विठ्ठल ने गाड़ी का दरवाजा खोला।

सिरिशा ने पल्लू अपने सर से हटाया और गाड़ी में पीछे की सीट पर जाकर बैठ गई। पर उस वक़्त चर्च जाने का विठ्ठल का शायद कोई इरादा नहीं था।

“कहाँ जा रहे हैं हम?” गाड़ी जब एक चर्च जाने के बजाय एक दूसरे ही रास्ते पर मुड़ी तो सिरिशा ने पूछा।

“कहीं नहीं। चिंता मत करो तुम्हें चर्च छोड़ दूंगा मैं” विठ्ठल पीछे देखकर मुश्कुराया।

 
उसके बाद जो हुआ वो सिरिशा के लिए एक सपने जैसा ही था, एक ऐसा बुरा सपना जिसे सोचकर ही उसका दिल घबरा जाता था और गुस्से से वो लाल हो जाती थी। विठ्ठल ने गाड़ी रोकी और उसके साथ बैकसीट पर आ गया था।

छोड़ दो मुझे, जाने दो..” वो जबरदस्ती करने लगा तो सिरिशा रोते हुए बोली।

बस एक बार। कुछ नहीं होगा। मजा आएगा तुझे भी..” विठ्ठल ने उसकी साड़ी कमर तक उठा दी थी।

ये पाप है, तुम ऐसा नहीं कर सकते मेरे साथ...”

अरे कोई पाप वाप नहीं है..” उसने अपनी पैंट की जिप खोली और नीचे को खिसकाई।

उसके बाद सिरिशा जैसे एक जिंदा लाश बन गई थी। वो कार की पिछली सीट पर पड़ी बाहर चिड़ियों के । चहचाहने की आवाजें सुनती रही। उसको मालूम था की जहाँ वो लोग रुके हुए हैं, वहाँ इस वक़्त दूर दूर तक कोई नहीं होता इसलिए रोने चिल्लाने का कोई फायदा नहीं था।

जितनी मस्त तू ऊपर से दिखती है, उससे कहीं ज्यादा मस्त तू अंदर से है...” विठ्ठल ने एक पल के लिए अपना सर ऊपर उठाकर बोला और फिर से झुक कर उसकी छातियां चूसने लगा।

सिरिशा का ब्लाउज खुला था और ब्रा को विट्ठल ने खींचकर ऊपर कर दिया था ताकि उसकी दोनों छातियों के साथ खेल सके। नीचे से उसने साड़ी को सिरिशा की कमर तक चढ़ा दिया था और अपनी नंगी टाँगों के बीच विठ्ठल को महसूस कर रही थी।

ये टाँग थोड़ी ऊपर कर ना प्लीज...” विठ्ठल अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था पर अंदर जा नहीं पा रहा था।

सिरिशा ने बिना कुछ कहे उसकी बात मानती हुए अपनी एक टाँग को थोड़ा सा हवा में उठा दिया। विठ्ठल ने एक बार फिर उसके शरीर में दाखिल होने की कोशिश की। सिरिशा पूरी तरह से बंद थी और जरा भी गीली नहीं हुई थी इसलिए अंदर जाने की ये कोशिश विठ्ठल के लिए काफी तकलीफ से भरी महसूस हुई।

एक काम कर। थोड़ी देर मुँह में लेके चूस दे ना। गीला हो जाएगा..” विठ्ठल ने कहा तो सिरिशा ने गुस्से में उसकी तरफ देखा और बिना कुछ कहे अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया।

अरें नाराज क्यों होती है, मैं तो बस पूछ ही रहा था...” विठ्ठल ने नीचे को झुक कर उसका गाल चूमा और फिर अपने हाथ पर थोड़ा सा थूक लिया और लगाकर फिर से कोशिश की। थोड़ी तकलीफ हुई पर इस बार लण्ड बिना रुके सिरिशा के अंदर तक दाखिल हो गया।

“आआअहहह.. कितनी टाइट है तू। आज तक चुदी नहीं क्या कभी?”

इस बार भी सिरिशा ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। दर्द के मारे उसकी चीख निकलते-निकलते रह गई थी और आँखों में आँसू भर आए।

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“मजा आ गया। श मेरी जान। बहुत गरम है तू। बहुत टाइट.. और भी जाने क्या क्या बकता हुआ विठ्ठल अकेला ही मंजिल की तरफ बढ़ चला। सिरिशा की दोनों छातियां उसके हाथों में थी और उसके गले को चूमता। हुआ वो धक्के पर धक्के लगा रहा था। उसके नीचे दबी सिरिशा बड़ी मुश्किल से अपने आपको कार की सीट पर रोक पा रही थी। एक तो इतनी छोटी सी जगह और उसपर विठ्ठल के धीरे-धीरे तेज होते धक्के, हर पल उसको लगता था के वो खिसक कर नीचे गिर जाएगी।

आहह..” अचानक विठ्ठल ने उसकी एक छाती पर अपने दाँत गड़ाए तो उसकी चीख निकल गई।

 
सारी...” वो दाँत दिखाता हुआ बोला- “कंट्रोल नहीं होता, तेरी है ही ऐसी, इतनी बड़ी और इतनी साफ्ट..”

सिरिशा का दिल किया की मुक्का मारकर उसके दोनों दाँत तोड़ दे।

जल्दी करो...” वो पहली बार बोली।

“जल्दी क्या है। अच्छी तरह से मजा तो लेने दो...” विठ्ठल फिर धक्के लगाने लगा- “तुझे मजा नहीं आ रहा?”

सिरिशा कुछ नहीं बोली।

अरें बोल ना। मजा नहीं आ रहा। कैसा लग रहा है मेरा तेरे अंदर?”

वो फिर भी कुछ नहीं बोली।

पूरी गीली हो चुकी है तू और कहती है की मजा नहीं आ रहा...”

विठ्ठल ने कहा तो सिरिशा का ध्यान पहली बार इस तरफ गया। उसकी टाँगों के बीच की जगह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और अब विठ्ठल बड़ी आसानी के साथ उसके अंदर बाहर हो रहा था।

मेरी कार की सीट तक गीली कर दी है तूने...”

वो सही कह रहा था। खुद अपनी कमर और कूल्हों के नीचे सिरिशा को कार की सीट गीली महसूस हो रही थी। खुद उसका अपना शरीर उसे छोड़कर विठ्ठल के साथ हो चला था और उसे पता भी नहीं चला था। वो पूरी तरह से खुल चुकी थी और उसका शरीर जैसे विट्ठल के हर धक्के का स्वागत कर रहा था।

निकलने वाला है मेरा..” विठ्ठल ने कहा और किसी पागल कुत्ते की तरह हांफता हुआ धक्के लगाने लगा। थोड़ी देर बाद उसको चर्च के सामने छोड़कर विट्ठल चलता बना।

सिरिशा ने एक पल के लिए सामने चर्च के दरवाजे पर नजर डाली और फिर अंदर जाने के बजाय पलट कर वापिस घर की तरफ चल पड़ी। वो इस हालत में चर्च कैसे जा सकती थी... विठ्ठल ने जो भी उसके शरीर के अंदर छोड़ा था, अब वो बाहर निकलकर उसकी टाँगों पर बहता महसूस हो रहा था। उस दिन जो हुआ था, उसका जिक्र सिरिशा ने कभी किसी से नहीं किया। फादर पीटर से भी नहीं।

दो हफ्ते बाद ही उसे वो खबर सुनने को मिल गई थी। गाव में हर कोई इसी बारे में बात कर रहा था। विठ्ठल की शादी राजलक्ष्मी से होने जा रही थी। विट्ठल की तरह ही राजलक्ष्मी का परिवार भी आस पास के इलाके में काफी जाना माना था। पर जहाँ विठ्ठल के घरवाले सिर्फ व्यापारी थी और सिर्फ कपड़ों और जूतों का धंधा करना जानते थे, वहीं राजलक्ष्मी के घरवाले पैसे के कारोबार में थे। कर्जे पर पैसा देना और ब्याज कमाना, यही उनका काम था और पालिटीशियन और बड़े बड़े लोगों के साथ उनका बहुत उठना बैठना था। ये कहना गलत नहीं होगा की वो ताकत और प्रतिष्ठा में विट्ठल के परिवार से 100 गुना ज्यादा थे। दो रईस और अच्छे परिवार के बीच हो रहा ये रिश्ता जैसे उस वक्त हर किसी की जुबान पर था।

जब सिरिशा को विट्ठल की शादी के बारे में पता चला तो वो खुद जैसे नफरत के एक अंधे कुएं में गिर गई। धीरे-धीरे नफरत बदला लेने की एक भारी इच्छा में तब्दील होने लगी। उसे ऐसा लगने लगा जैसे वो विट्ठल से बदला लेने के लिए, उससे तड़पता देखने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी।

पर ऐसा कुछ ना तो वो कर पाई और ना ही उसे करने को मौका मिला। जिंदगी यूँ ही धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही।

और वो अपने आप में कुढ़ती रही, जलती रही। कई बार दिल में ख्याल आया की सबको बता दे की विठ्ठल ने। उसके साथ क्या किया था पर वो बखूबी जानती थी की ऐसा करना सिर्फ खुद उसे ही बदनाम करता। उसकी जिंदगी अपनी स्कूल की किताबों और चर्च के बीच सिमट कर रह गई थी।

तू इतनी बड़ी भक्त कैसे बन गई. अपनी उमर की लड़कियों को देखा है... सजने सवंरने से फुर्सत नहीं मिलती उन्हें और तू है की बस पुजारिन बन बैठी है...” उसके मन ने एक दिन उससे कहा था।

 
“मुझे अच्छा लगता है चर्च जाना। वहाँ भगवान के सामने बैठती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे मेरा कुछ नहीं छुपा उनसे, सब देख रहे हैं वो...” जवाब में सिरिशा बस इतना ही कह पाई थी।

दो महीने गुजर गये और उसने फिर कभी विठ्ठल को नहीं देखा। फादर पीटर भी अब अपने देश वापिस जा चुके थे। अब कन्फेशन बाक्स में बैठकर उसके दिल का हाल सुनने वाला और उसे समझने वाला कोई नहीं था। और फिर बरसात का मौसम भी आ गया। पूरे अगस्त के महीने भी बारिश ने रुकने का नाम नहीं लिया। बादल हर वक्त आसमान में छाए रहते और कभी भी अचानक बरसने लगते। गाव की सड़कों पर हर तरफ कीचड़ जमा हो गया था और छत पर हर वक़्त पड़ती बारिश की बूंदों की आवाज जैसे कभी कभी पागल ही कर देती थी। और अगर बारिश रुकती भी थी तो हवा में इतनी नमी होती की इंसान बैठे बैठे ही पसीने से नहा जाए और फिर बारिश की दुआ करने लगे।

और एक दिन, जबकी उसका पूरा परिवार उसके छोटे भाई का बर्थडे मनाने के लिए इकट्ठा हुआ था, कुछ ऐसा हुआ जिसका इर सिरिशा को हफ़्तों से सता रहा था। वो अपने छोटे कजिन के साथ बैठी बाल्कनी में खेल रही थी की अचानक वो अंजान बच्चा सबके सामने बोल पड़ा।

दीदी आप कितनी मोटी हो गई हो। देखो आपका पेट कैसे बाहर को निकल आया है..."

पूरे घर में हर किसी की नजर सिरिशा के पेट की तरफ हो गई थी। जैसे सिरिशा के पेट का वो उठान देखा तो सबने था पर इंतेजार कर रहे थे के पहले कौन बोलेगा।

उस दिन सिरिशा को ना स्कूल जाने दिया गया और ना चर्च।

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हमें यूँ शर्मिंदा करके तुझे क्या मिला..” उसकी माँ ने रोते हुए उससे पूछा था- “क्या कमी रह गई थी हमारी तरफ से जो तूने हमें ये दिन दिखाया... कौन करेगा अब तुझसे शादी... इस उमर में अपने बाप का नाम इस तरह उछाल के तुझे क्या हासिल हुआ... वो तो अच्छा हुआ की वो ये दिन देखने से पहले ही चल बसे... आज अगर वो जिंदा होते तो खड़े खड़े ही मर जाते.."

सुबह शाम इस तरह की बातों का जैसे एक सिलसिला ही चल निकला, कभी उसकी मन तो कभी रिश्तेदार। हर कोई उसे यही बातें सुनाता रहता और हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था- “बच्चे का बाप कौन है?"

और जब सिरिशा से और बर्दाश्त ना हुआ तो उसने हारकर उस दोपहर के बारे में सबको बता दिया जब उसे राह चलते विट्ठल मिल गया था।

“अगर बदनाम होना ही था तो मेरी मासूम बच्ची अकेली बदनाम नहीं होगी। अपने हिस्से की बदनामी विठ्ठल भी उठाएगा...” बात खतम होने पर उसकी माँ ने कहा था और हर कोई हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा था।

इसको दाई के पास ले चले... वो जानती है की बच्चा कैसे गिराते हैं...” उसकी बड़ी बहन इंद्रा बोली।

तेरा दिमाग खराब हुआ है... उस औरत को बच्चा जनवाना तो आता नहीं, गिराएगी क्या खाक?” सिरिशा की माँ ने कहा।

अगले दिन ही सिरिशा अपनी माँ के साथ शहर के एक हास्पिटल में गई थी। टेस्ट्स से साबित हो गया था के वो प्रेग्नेंट थी।

कुछ किया जा सकता है?” उसकी माँ ने डाक्टर से पूछा।

जितनी जल्दी हो सके, इसकी शादी करा दीजिए.." डाक्टर ने जवाब दिया। वो उसके पिता के एक पुराने दोस्त थे और अक्सर उनके घर आते जाते थे।

अब आप ही बताइए की इस मनहूस से शादी कौन करेगा... इस बच्चे का कुछ नहीं हो सकता क्या?”

बाहर अब भी बारिश का मौसम था। आसमान में बदल इस कदर फैले हुए थे की दिन में भी रात का एहसास होता था। कमरे में जल रहे बलब के चारों तरह अजीब अजीब तरह के कीट पतंग उड़ रहे थे।

“बच्चे का इंतेजाम मैं कर तो सकता हूँ...” डाक्टर बहुत धीमी आवाज में बोला- “पर पैदा होने के बाद। बच्चा इस वक़्त गिराया नहीं जा सकता। आपकी बेटी वैसे ही बहुत दुबली पतली है और ऊपर से 3 महीने की प्रेग्नेंट है। अगर जो डेट्स ये हमें बता रही है वो सही हैं तो और 3 महीने में ये फुल टर्म हो जाएगी। इस वक्त कुछ भी किया तो मामला बिगड़ सकता है। बच्चे के साथ साथ इसकी जान को भी खतरा हो सकता है...”

और अगर बच्चा पैदा किया..” उसकी माँ ने मुँह बनाते हुए कहा- “अगर पैदा किया तो उसके बाद क्या?"

मैं बच्चा रखना चाहती हूँ माँ...” सिरिशा अचानक बोल पड़ी।

बेवकूफ मत बन...”

ये बच्चा मेरा है। मैं इसे पैदा करना चाहती हैं। अपने पास रखना चाहती हूँ.”

और खर्चे कौन उठाएगा.. कौन देखभाल करेगा तुम दोनों की...”

मेरा होने वाला पति..” सिरिशा ने अपनी माँ की आँख से पहली बार आँख मिलाई।

और कौन करेगा तुझसे शादी?”

विठ्ठल.. मुझसे शादी वही करेगा जो मेरी इस हालत के लिए जिम्मेदार है."

आपकी बेटी इतनी बेवकूफ है नहीं..." डाक्टर जो अब तक माँ बेटी की बातें सुन रहा था बीच में बोल पड़ा।

वैसे भी आपको इसकी शादी तो करनी है ही तो विठ्ठल से ही एक बार बात चलाकर देखिए। कोशिश करने में क्या हर्ज है?"

और फिर जैसा की सिरिशा चाहती थी, उसकी माँ उसे लेकर विठ्ठल के घर जा पहुँची। हैरानी सबको तब हुई। जब विठ्ठल ने बिना कोई ना नुकुर किए इस बात की हामी भारी की उसने सिरिशा के साथ जबरदस्ती की थी।

और उससे भी बड़ी हैरानी तब हुई जब वो सिरिशा से शादी करने के लिए भी फौरन तैयार हो गया।

“शायद इतना बरा ये है नहीं जितना मैं सोच रही थी..." पहली बार सिरिशा के दिल में विटठल के लिए एक

नाजुक जगह बनी थी।

बात उड़ चुकी थी और साथ में उड़ चुका था विठ्ठल के परिवार का नाम। हर तरफ हो रही बदनामी से बचने का उनके पास अब एक ही रास्ता था और वो ये के जिस गरीब लड़की का उनके बेटे ने फायदा उठाया, वो उसे अपने घर की बहू बनाए और इसके लिए सबसे पहला कदम था राजलक्ष्मी के साथ तय हो चुकी विट्ठल की शादी को तोड़ना।

किसी ने कहा की विठ्ठल एक कायर था इसलिए शादी के लिए मान गया था। किसी ने कहा की उसके घरवाले पोलीस के मामले में पड़ना नहीं चाहते थे इसलिए शादी का जोर डाला गया था। किसी ने कहा था की सिरिशा ने विठ्ठल पर रेप केस कर दिया था इसलिए शादी की बात चला दी गई थी। किसी ने कहा,

 
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