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Adultery प्यास बुझाई नौकर से

रूबी और रामू घबरा जाते हैं और चुपचाप सुनने की कोशिश करने लगते है की बाहर कौन आया होगा? तभी उनको हरदयाल की आवाज सुनाई पड़ती है। दोनों घबरा जाते है और रामू जल्दी से काकरोच वाली स्प्रे करने लगता है। उधर रूबी अपना टाप पहनती है और अपने कपड़े ठीक करके सफाई में राम का हाथ बटाने लगती है

और मैं घर के आने के दरवाजे को चुपके से खोल देती है।

रूबी और रामू हैरान हैं की हरदयाल इतनी जल्दी कैसे वापिस आ गया? रामू उनकी बातें ध्यान से सुनने लगता

कमलजीत- इतनी जल्दी कैसे वापिस आ गये। ट्रैक्टर ठीक हो गया?

हरदयाल- नहीं अभी नहीं। तेल की टंकी में मिट्टी है। कल को मिलेगा। कल जाऊँगा इसी टाइम। तब मिलेगा।

कमलजीत- ठीक है जी।

हरदयाल- तुम बाहर बैठी हूँ। रूबी कहा है?

कमलजीत- वो तो काकरोच वाली स्प्रे कर रही है। आपको तो पता ही है की मुझे अलर्जी है स्प्रे से।

हरदयाल- "ठीक है मैं खुद ही पानी पी लेता हूँ अंदर जाकर..” कहकर हरदयाल अंदर आता है और रामू से बात करता है- "रामू स्प्रे हो गई क्या?"

रामू- बाबूजी, कर तो दी है। पर कल को एक बार फिर से करनी पड़ेगी।

रूबी उनकी बातें ध्यान से सुनती है। उसे समझ में नहीं आता की रामू कल दुबारा करने को क्यों बोल रहा है?

रामू यह सोचकर खुश है की कल भी हरदयाल को शहर जाना पड़ेगा और स्प्रे का बहाना तो उसने बना दिया है। तो कल भी उसे रूबी के जिश्म से खेलने का समय मिलेगा। राम घर की बाकी सफाई करने के बाद अपने रूम में चला जाता है।

इधर रूबी भी अपना काम खतम करने के बाद नहा धोकर कमलजीत के पास आकर बैठ जाती है। कमलजीत से बातें करते-करते उसे पता चलता है की हरदयाल को कल भी शहर जाना पड़ेगा ट्रैक्टर को लाने के लिए। रूबी समझ जाती है की राम ने स्प्रे का बहाना क्यों बनाया होगा? रात को खाना खाने के बाद सभी बैठे टीवी देख रहे होते हैं, और राम फिर से रूबी को मिस काल मार देता है। रूबी अपने कमरे में आ जाती है और बेड पे लेटकर रामू से बातें करने लगती है।

रूबी अंजान बनते हए- "तुमने स्प्रे का बहाना क्यों बनाया कल के लिये। तुम्हें लगता है की कल भी तुम कुछ कर पाओगे?"

रामू- जी रूबी जी।

रूबी- क्यों ऐसे क्यों लगता है?

राम- कल मालिक शहर जा रहे हैं ट्रैक्टर लाने। तो कल भी हमारे पास टाइम होगा।

रूबी- बड़े चालक हो तुम तो राम्। शकल से तो मासूम लगते हो।

रामू- “अपने शैतान बना दिया है मुझे..."

दोनों हँस पड़ते हैं।

राम- रूबी जी अपने तो आज मेरा दिल जीत लिया।

रूबी- वो कैसे?

रामू- आज वासना में डूबे हुए आपने मुझे जान कहकर पुकारा था।

रूबी को कुछ याद नहीं होता। एक उत्तेजना में वो क्या-क्या बोल गई होगी।

रामू- रूबी जी एक बात बोलूँ?

रूबी- हाँ।

राम- आज मुझे यकीन हो गया की संभोग के मामले में आप अभी भी अनाड़ी है।

रूबी- तुम्हें क्यों लगा ऐसे?

राम- अभी तो मैंने अपनी उंगली आपकी चूत में भी नहीं डाली थी और आप झड़ भी गई।
 
रूबी को सुबह राम के साथ बिताए पल याद आते हैं और अपनी झड़ने की बात सोचकर शर्मा जाती है। सच में राम की उंगलियों में तो जादू है। अभी तो वो उसकी चूत के रेशमी बालों और चूत की दीवार से ही खेला था और वो झड़ भी गई।

रामू- रूबी जी, एक बात पुडूं?

रूबी हँसते हुए- “हाँ जी राम जी पुछिये?"

रामू- आपको मजा आ रहा था ना?

रूबी- हाँ।

रामू- तो फिर आप लेगिंग क्यों नहीं उतारने दे रही थी?

रूबी- पता नहीं।

राम- और किसको पता होगा रूबी जी? बताइए ना?

रूबी- पता नहीं शायद डर लगता है।

रामू- किससे?

रूबी शर्माते हुए- “तुमसे और इस दुनियां से भी."

रामू- दुनियां का तो मैं समझ गया, पर मेरे से क्यों?

रूबी- पता नहीं।

रामू- बताओ ना मेरी कसम आपको।

रूबी- “क्या पता तुम अपने पे कंट्रोल ना कर पाओ और मुझे चो.....”

रामू- बोलो ना क्या बोलने वाले थे?

रूबी- कुछ नहीं।

रामू- तो क्या आप हमसे चुदवाना नहीं चाहती?

रूबी- पहले तो इस शब्द को मत बोला करो, मुझे शर्म आती है। गंदा शब्द है यह।

राम- आप भी तो बोलने वाली थी इसे अभी-अभी।

रूबी- तुम रोज इसे बोलते हो तो मेरे मुँह से भी निकलने वाला था।

राम- अच्छा ठीक है नहीं बोलते। तो बताओ ना आप हमसे मिलन नहीं करना चाहते?

रूबी- पता नहीं।

रामू- तो क्या हम दोनों ऐसे अधूरे ही रहेंगे।

रूबी- पता नहीं...शायद हाँ।

रामू- ऐसा क्या हो गया मेरी जान? मैं तो आपके ऊपर फिदा हूँ और प्रेम करना चाहता हूँ।
 
रूबी- “पर रामू मैं किसी और की हूँ.” रूबी अभी भी अच्छे से डिसाइड नहीं कर पा रही थी की वो क्या करे?

रामू- हम जानते हैं की आप किसी और की हैं, पर क्या हम आपको इस जनम में अपना नहीं बना सकते?

रूबी- पता नहीं।

रामू- रूबी जी। आप ज्यादा ही सोचती हो। आपको आज चरमसुख मिला था ना?

रूबी- हाँ।

राम- तो फिर अच्छी बात है ना... आपकी चूत भी तो देखो कैसे पानी छोड़ रही थी। वो तो मिलनाना चाहती है।

रूबी- पर मैं किसी और की हूँ राम्। मैं कैसे कर सकती हूँ ऐसे?

राम- तो क्या आप के ऊपर हमारा थोड़ा सा भी हक नहीं है क्या? क्या हमारा लण्ड आपकी चूत का जरा सा भी रस नहीं पी सकता?

रूबी रामू की बातों से फिसलती जा रही थी। रामू सच ही तो कह रहा था की उसकी चूत तो मिलने के लिए तैयार थी। पर उसके समाज के बंधन और लखविंदर को धोखा देना उसके लिए काफी मुश्किल लग रहा था। उधर रामू अपनी बातें जारी रखता है।

राम- देखिये ना आपसे बातें करते-करते हमारा लण्ड कितना सख्त हो गया है। इस बिचारे को आपकी चूत का अमृत पीने दो ना... सिर्फ एक बार..."

रूबी- मैं तुम्हारी भावनाए समझती हूँ पर मुझे समझ में नहीं आ रहा की मैं क्या करूं?

रामू काफी देर तक रूबी को चुदवाने के लिए मनाता रहा। पर रूबी डिसाइड नहीं कर पाती। उसे लगता है की वो ऐसा करके लखविंदर को धोखा देगी। इधर रामू को लगता है कल आखिरी दिन है उसके पास। कल कुछ ऐसा किया जाए जिससे रूबी चुदवाने के लिए तड़प उठे। वो डिसाइड करता है की कल वो जैसे-तैसे रूबी को अपने लण्ड के दीदार जरूर करवाएगा। मोटे तगड़े लण्ड को देखकर कोई भी लड़की ज्यादा देर तक उससे चदवाए वगैर नहीं रह सकती।

अगले दिन खाना खाने के बाद हरदयाल शहर ट्रैक्टर लेने चला जाता है, और राम काकरोच वाली स्प्रे वाला प्लान इंप्लिमेंट कर देता है। इससे यह होता है की कमलजीत को फिर से घर के बाहर बैठना पड़ता है। रूबी को तो आज उसको बताना भी नहीं पड़ता, जो कर रहा था रामू कर रहा था।

कमलजीत के बाहर बैठते ही रामू रूबी को उसके कमरे में आकर अपनी बाहों में भर लेता है, चूमने लगता है। रूबी पहले हिचकचाती है पर जल्दी ही उसका साथ देने लगती है। धीरे-धीरे रामू उसके कुर्ते और ब्रा को उतार के फेंक देता है, जिससे दोनों दशहरी आम उसके सामने आ जाते हैं। रामू दोनों उभारों पे टूट पड़ता है। रूबी की निपलें टाइट होने लगती है, और वो खुलकर अपने चूचियां चुसवाने लगती है।
 
कमलजीत के बाहर बैठते ही रामू रूबी को उसके कमरे में आकर अपनी बाहों में भर लेता है, चूमने लगता है। रूबी पहले हिचकचाती है पर जल्दी ही उसका साथ देने लगती है। धीरे-धीरे रामू उसके कुर्ते और ब्रा को उतार के फेंक देता है, जिससे दोनों दशहरी आम उसके सामने आ जाते हैं। रामू दोनों उभारों पे टूट पड़ता है। रूबी की निपलें टाइट होने लगती है, और वो खुलकर अपने चूचियां चुसवाने लगती है।

उत्तेजना बढ़ने से रूबी की हालत पतली होने लगती है, और वो रामू के सिर को पकड़कर अपनी छातियों पे दबाने लगती है। राम उसके उभार चूस-चूसकर लाल कर देता है। अब वो अपने एक हाथ से रूबी की लेगिंग को उतरने की कोशिश करने लगता है, तो रूबी फिर से उसका हाथ पकड़ लेती है।

रामू- क्या हुआ रूबी जी?

रूबी- नहीं रामू प्लीज... वो नहीं करना।

रामू- मेरी जान... मैं कुछ नहीं करूंगा सिर्फ देखना चाहता हूँ। इसके इलावा कुछ नहीं करूंगा।

रूबी- नहीं रामू उसपे लखविंदर का हक है।

रामू- हाँ ठीक है। पर वो हक तो चोदने का है। मैं तो सिर्फ देखना चाहता हूँ।

रूबी- नहीं प्लीज।

राम के समझाने पे भी रूबी तैयार नहीं होती। तो राम चूत को अपने हाथ की उंगलियों से रगड़ने लगता है। रूबी आहें भरने लगती है।

इधर रामू दुबारा से उसके उभारों को अपने होंठों में लेकर चूसना शुरू कर देता है। रूबी दोनों तरफ के हमले से आनंदित हो जाती है। अब राम धीरे-धीरे उसकी लेगिंग में हाथ डालता है और फिर पैंटी में हाथ डालकर चूत की दवार से खेलने लगता है। रूबी और इंतेजार नहीं कर पाती और मदहोशी के आलम में अपनी कमर हिलाने लगती है। उसकी चूत पूरी तरह गीली हो चुकी थी। रामू सही समय देखते हुए उसकी चूत में अपनी उंगली सरका देता है।

रूबी- “आह्ह... आराम से... बहुत मोटी है.."

रूबी की चूत जिसको अभी तक रूबी की पतली उंगलियां लेने की आदत थी, आज रामू की मोटी उंगली से ज्यादा खुल जाती है। रामू धीरे-धीरे अपनी पूरी उंगली उसकी चूत में पेल देता है। उसकी चूत की गर्मी रामू अपनी उंगली पे अच्छी तरह महसूस कर रहा था। रामू अपनी उंगली को ऐसे ही उसकी चूत में पेले रखता है और कोई मूव्मेंट नहीं करता। लेकिन रूबी के उभार लगातार चूसता रहता है।

रूबी अपने उभार चुसवाने का पूरा मजा ले रही थी। पर साथ ही रामू के अगले हमले का इंतेजार भी कर रही थी। धीरे-धीरे रूबी अपने चूतर ऊपर-नीचे करना शुरू कर देती है और सिसकियां लेनी लगती है। उसकी चूत लगातार पानी छोड़ने लगती है।

रामू की उंगली उसके रस में भीग जाती है। रामू उसके उभार चूसना बंद कर देता है और रूबी के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगता है। रूबी जो की अपने चूतरों को हिला रही थी अपनी आँखें खोलती है और राम की आँखों में देखती है, और चूतर हिलाना बंद कर देती है। दोनों एक दूसरे की नजरों को पढ़ने की कोशिश करते हैं। रूबी अपने चेहरे को हिलाती है और चूतरों हिलाकर रामू को आगे बढ़ने का न्योता देती है। रामू समझ जाता है

और अपनी उंगली को उसकी गीली चूत के अंदर-बाहर करना शुरू कर देता है। रूबी भी अपने चूतरों उठा-उठाकर उसका साथ देने लगती है। रूबी का रोम-रोम उत्तेजना से भर जाता है और वो सिसकियां लेने लगती है।

रूबी- “आss आहह... उईई माँ.."

रामू- कैसा लग रहा है मेरी जान?

रूबी- बहुत अच्छा जान।

रामू- तुम्हारी चूत बहुत टाइट है।

रूबी- “हाँ उह्ह... उफफ्फ... मेरी जान्न ई का कर रहे हो... उफफ्फ.."

राम अपनी उंगली की रफ़्तार तेज कर देता है। रूबी अपने कंट्रोल में नहीं रहती। राम तो काम क्रीड़ा में पूरा एक्स पर्ट था।
 
ऐसा अनुभव तो रूबी को लखविंदर के साथ भी नहीं हुआ था। उसका दिल करता है की रामू उसकी चूत का पानी निकाल दे और वो शांत पड़ जाए जल्दी से, वर्ना कहीं वो बहक ना जाए और राम से मिलना कर बैठे।

इधर रामू रूबी के चेहरे को पढ़ लेता है की वो थोड़ी देर ही टिक पाएगी। वो अपनी उंगली को चूत के अंदर-बाहर करना रोक देता है। रूबी जो की चरमसुख की ओर बढ़ रही थी उसकी इस हरकत से चकित रह जाती है, और रामू की तरफ देखने लगती है। रामू भी उसकी नजरों में देखता है और मुश्करा पड़ता है। रूबी की आँखों में देखते रामू धीरे-धीरे अपनी उंगली रूबी की चूत के अंदर-बाहर करता है। रूबी के चूतर भी ऊपर उठकर उसका साथ देते हैं। रामू फिर से रुक जाता है। रूबी दुबारा से उसकी तरफ सवालिया नजरों से देखती है। रामू चार पाँच बार ऐसे करता है और रूबी के चूतर उसकी उंगली की मूटमेंट के साथ ताल मिलाते हैं।

रूबी से और बर्दाश्त नहीं होता- "राम करो ना... मेरा पानी निकल दो प्लीज..."

राम- पहले मेरी बात का जवाब दो मेरी जान।

रूबी- क्या रामू जल्दी पूछो और मुझे शांत करो।

रामू- हमारा मिलन कब होगा?

रूबी- रामू क्या है यह प्लीज... करो।

रामू आगे को झुकता है अपने होंठों से उसके होंठों का चुंबन लेता है और फिर रूबी की आँखों में देखकर बोलता है- "बताओ ना मेरी जान। कब तुम मेरी बनोगी?"

रूबी- प्लीज रामू, जो काम कर रहे हो वो कर दो बाद में देखेंगे। ऐसे ना तड़पाओ।

रामू अपनी उंगली को फिर से उसकी चूत में अंदर-बाहर करता है, और रूबी की कमर उसका पूरा साथ देती है।

रामू- कौन किसे तड़पा रहा है? आप खुद भी तड़प रही हैं और मुझे भी तड़पा रही हैं। बताओ कब मैं आपको भोग सकूँगा?

रूबी- पता नहीं। प्लीज्ज... रामू मुझे शांत कर दो।

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रामू- रूबी जी क्यों अपने आपको बंधन में जकड़े रहना चाहती हो। मुझे अपने प्रेम को इसकी आखिरी मंजिल तक पहुँचाना है।

रूबी से रहा नहीं जाता- “ठीक है पहुँचा लेना। पर अब तो मुझे अधूरा ना छोड़ो.."

रामू- “कब?" कहकर वो उंगली को पूरा बाहर निकालकर जोर से रूबी की चूत में डाल देता है।

जिससे रूबी की हल्की सी चीख निकल जाती है और वो हार मान लेती है। उसे लगता है की राम आज उससे मिलन का पक्का वादा लेकर रहेगा।

रूबी- जल्दी ही, टाइम आने पे।

राम- टाइम कब आएगा मेरी जान?

रूबी- पता नहीं रामू प्लीज... मेरी चूत की आग को शांत करो।

रामू- कर देता हूँ रूबी जी। पर बताओ कब टाइम आएगा?

रूबी- जब कोई घर पे नहीं होगा। बस अब चूत का रस निकाल दो मेरे राजा।

राम उसकी बात से खुश हो जाता है। उसे लगता है की आज भले ही वो रूबी को अपनी ना बना पाए। पर उनका मिलन ज्यादा दूर नहीं है। वो रूबी के होंठों को चूसता है और अपनी उंगली से उसे चोदने लगता है। रूबी की सिसकियां पूरे कमरे में भर जाती है।

रूबी- “उफफ्फ... राज्जा आss और तेज..."
 
रूबी की चूत के पानी से रामू की उंगली पूरी तरह भीग गई थी। जब उसकी उंगली अंदर-बाहर होती तो फच-फच की आवाज आती। रामू अपनी स्पीड तेज कर देता है। इधर रूबी चरमसुख की ओर बढ़ने लगती है। उसका जिश्म अकड़ जाता है। अपने चूतरों को हवा में उठा देती है, और तभी चरमसुख को प्राप्त कर लेती है। धीरे-धीरे रूबी की सांसें नार्मल होने लगती हैं, और वो उठकर राम को चूम लेती है। तभी वो बेड से उठने लगती है तो रामू उसे पकड़कर बैठा देता है। रूबी सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखती है।

रामू- आप बहुत खुदगर्ज हो रूबी जी।

रूबी रामू के चेहरे को हाथों में लेती है और उसे चूमती है- “क्या हुआ रामू..'

रामू- आप सिर्फ अपना ही सोचती हो रूबी जी। मेरा नहीं?

रूबी- ऐसा क्यों बोल रहे हो राम?

रामू- रूबी जी क्या आपने यह नहीं सोचा की अगर आपको चरमसुख प्राप्त हुआ है तो मेरा भी मन करता होगा?

रूबी को सच में महसूस होता है की वो तो सिर्फ अपने बारे में ही सोचती है। कितनी खुदगर्ज़ है वो। उसने राम के बारे में तो सोचा ही नहीं कभी।

रूबी- बोलो क्या चाहिए?

रामू- थोड़ा सा मजा हमें भी तो आने दो ना।

रूबी- अच्छा क्या चाहिए?

राम- मेरे लण्ड का भी पानी निकल दो ना।

रूबी- खुद कर लो ना बाथरूम में जाकर।

राम- “नहीं रूबी जी प्लीज... हम आपकी सारी बात मानते हैं। एक बार हमारी बात मान लो ना। बाथरूम में जाकर खुद करना होता तो आपको नहीं बोलते। पर आपके हाथ के स्पर्श को पाने के लिए बेचारा तड़प रहा है..."

और रामू अपनी पैंट उतार देता है।

रूबी की नजरों के सामने रामू का टाइट लण्ड अंडरवेर के अंदर से साफ-साफ दिखाई देता है। इतने बड़े लण्ड को देखकर रूबी की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।
 
रूबी की नजरों के सामने रामू का टाइट लण्ड अंडरवेर के अंदर से साफ-साफ दिखाई देता है। इतने बड़े लण्ड को देखकर रूबी की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।

राम समझ जाता है की रूबी उसके लण्ड की आउटलाइन देखकर थोड़ी सी घबरा गई है। उसे लगता है की रूबी ऐसी ही उसके लण्ड को अपने हाथ में नहीं लेगी। वो उसके साथ बेड पे बैठ जाता है और उसकी आँखों को चूम लेता है। रूबी का गला सूखने लगता है। रामू अब उसके होंठों पे अपने होंठ रख देता है। दोनों प्रेमी एक दूसरे के होंठों का रसपान करने लगते हैं। धीरे-धीरे रामू उसका हाथ अपने हाथ में लेकर अपने लण्ड पे ले जाता है। रूबी के कोमल हाथ का स्पर्श पाकर राम का लण्ड झटका मारता है। रूबी घबरा के अपना हाथ पीछे खींच लेती है। राम थोड़ी देर उसके होंठों का रसपान करने के बाद फिर से उसके हाथ को लण्ड पे रख देता है और अपने हाथ से उसके हाथ पर जकड़ बनाए रखता है।

रूबी वापिस हाथ खींचने की कोशिश करती है। पर रामू ऐसा नहीं होने देता। रामू उसके हाथ को पकड़कर अपने लण्ड पे घिसने लगता है। रूबी अपनी तरफ से कोई भी कोशिश नहीं करती उसके लण्ड को हाथ में पकड़ने की। पर कुछ टाइम के बाद उसके हाथ में लण्ड का स्पर्श उसे मदहोश करने लगता है। अपने पति के अलावा तो उसने कभी किसी लण्ड को छुआ नहीं था। राम के लण्ड के स्पर्श से उसके अंदर की औरत जाग उठी और वो अपने हाथ की उंगलियां उसके लण्ड पे टाइट कर लेती है।

रामू उसकी इस हरकत पे खुश हो जाता है और उसका हाथ पकड़कर लण्ड पे रगड़ने लगता है। धीरे-धीरे रूबी उससे खुलने लगती है। राम ठीक समय समझकर बेड से उठकर खड़ा हो जाता है। रामू आँखों-आँखों में रूबी को आगे बढ़ने का इशारा करता है। रूबी थोड़ा सा शर्माती है और राम उसका हाथ पकड़कर लण्ड पे रख देता है। धीरे-धीरे रूबी लण्ड को सहलाने लगती है और रामू उसका हाथ छोड़ देता है।

कुछ देर रूबी लण्ड को अंडरवेर के ऊपर से ही रगड़ती रहती है। रामू का लण्ड पूरी तरह से टाइट हो गया होता है, और वो रूबी को लण्ड अंडरवेर से बाहर निकालने को बोलता है। लेकिन रूबी जो की अभी भी शर्मा रही थी हिम्मत नहीं जुटा पाती।

रामू उसकी मानसिकता समझ जाता है। आखीरकार, अच्छे घर की औरत ऐसे कैसे इतनी जल्दी उसके साथ खुल सकती है। तो राम रूबी के हाथ को लण्ड से अलग करता है और अपनी अंडरवेर को धीरे-धीरे नीचे करता है। उसका लण्ड धीरे-धीरे रूबी के सामने आने लगता है।

लण्ड को देखकर रूबी की सांसें थम जाती हैं। उसका मुँह खुला का खुला रह जाता है। बाप रे इतना बड़ा? राम तो सच बोल रहा था की उसका g" इंच का है। इसकी मोटाई रूबी की कलाई के बराबर होगी। राम लखविंदर के अलावा दूसरा मर्द था जिसका नंगा लण्ड रूबी अपनी आँखों से इतने करीब से देख रही थी। वो शर्मा जाती है और अपने चेहरे को हाथों में छिपा के बेड पे लेट जाती है।

राम धीरे-धीरे उसके पास जाकर बेड पे लेट जाता है। रूबी को राम के अपने पास आने का एहसास होता है और उसकी सांसें अटक जाती हैं। उसे यकीन नहीं हो रहा था की इतना बड़ा लण्ड भी हो सकता है। राम रूबी के कान के पास आ जाता है और बोलता है।

रामू- क्या हुआ रूबी जी अच्छा नहीं लगा क्या?

रूबी कुछ नहीं बोलती और अपने हाथों से चेहरे को और जोर से ढक लेती है।

राम- बताओ ना अच्छा नहीं लगा क्या? बेचारा आपका प्यार पाने के लिए तड़प रहा है।

जवाब नहीं देती और राम उसके एक हाथ को अपने हाथ में लेकर चूम लेता है। रूबी अपने चेहरे को दूसरी तरफ कर लेती है। रामू एक हाथ से उसके उभार के साथ खेलने लगता है और दूसरे हाथ से उसके । हाथ को थामे रखता है। राम के उभार से खेलने से रूबी को भी अच्छा लगना शुरू हो जाता है, और हल्की-हल्की सिसकियां लेनी शुरू कर देती है।
 
राम अच्छा मौका देखकर उसके हाथ को अपने टाइट लण्ड पे रख देता है और उसका हाथ थामे रहता है। नंगे लण्ड का स्पर्श पाते ही रूबी के जिश्म में करेंट सा दौड़ने लगता है और वो घबराहट में अपना हाथ पीछे खींचने की कोशिश करती है। पर राम उसके हाथ को थामे रहता है। जिससे रूबी अपने हाथ को छुड़ा नहीं पाती। राम रूबी के हाथ को अपने लण्ड के ऊपर-नीचे करता रहता है। धीरे-धीरे रूबी नार्मल होने लगती है और अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश बंद कर देती है।

कुछ देर बाद।

राम- रूबी जी कैसा लगा मेरा लण्ड?

रूबी कुछ नहीं बोलती।

राम- बताओ ना मेरी जान अच्छा लगा क्या?

रूबी- हाँ।

राम- “तो इसे प्यार करो ना.... और यह कहते ही राम उसकी उंगलियों का घेरा अपने लण्ड पे बना देता है और उसको लण्ड के ऊपर-नीचे करने लगता है।

इतने मोटा लण्ड पे बड़ी मुश्किल से ही रूबी की उंगलियां घेरा बना पा रही थी। रूबी चकित थी की लखविंदर के लण्ड को तो वो आसानी से पकड़ लेती थी। पर राम का बड़ी ही मुश्किल से पकड़ पा रही थी। लखविंदर के लण्ड से इसकी डबल साइज की मोटाई थी। धीरे-धीरे राम के लण्ड का जादू रूबी पे चढ़ने लगा था। अब रूबी खुद ही लण्ड को पकड़े ऊपर-नीचे करने लगी थी।

रामू ने उसका हाथ भी छोड़ दिया था और मजे से लण्ड रगड़वा रहा था। अब रामू खुद नीचे लेट जाता है और रूबी को अपने ऊपर कर लेता है। रूबी अपना सिर रामू की छाती पे रख देती है और टेढ़ी सी बेड पे लेट जाती है। अब वो रामू के लण्ड को देखते हुए उसे रगड़ने लगती है।

रूबी के गोरे नरम हाथों में गरम लण्ड पूरी तरह सखत हो चुका था। रामू के जिश्म में अकड़न सी आनी शुरू हो जाती है। वो रूबी को थोड़ा ऊपर करता है और उसके होंठों का रसपान करने लगता है। इधर रूबी की शर्म पूरी तरह खतम हो जाती है और वो अपने नरम मुलायम हाथों से रामू के लण्ड को अपना पूरा प्यार देती है। रूबी का मन पूरी तरह लण्ड पे आ चुका था। लण्ड को मसलते-मसलते वो सोचती है की इतना बड़ा लण्ड उसकी छोटी सी चूत कैसे झेल पाएगी? रूबी अब अपनी आँखें लण्ड से बिल्कुल भी नहीं हटा पा रही थी, मानो लण्ड ने उसे अपने वश में कर रखा हो। रूबी के अंदर दुबारा से उत्तेजना बढ़ने लगती है।

रामू अपना एक हाथ उसकी कमर के पीछे ले जाता है और लेगिंग के अंदर उसकी पैंटी के ऊपर से उसके चूतरों से खेलने लगता है। रूबी का ध्यान पूरा लण्ड की तरफ था। जब वो लण्ड को दबाए अपना हाथ नीचे करती है तो लण्ड का सुपाड़ा पूरा बाहर आ जाता है।

इधर रामू एक हाथ उसकी पैंटी के अंदर लेजाकर उसके नंगे चूतरों पे फिराने लगता है, और दूसरे हाथ से उसके उभारों को मसलने लगता है।

रूबी स्वर्ग की सैर पे दुबारा निकल जाती है। रूबी की चूत दुबारा से गीली हो जाती है, और रामू अपनी उंगली को रूबी के चूतरों की दरारर के बीच में घुसा देता है और उंगली को आगे-पीछे करने लगता है, मानो जैसे कुछ ढूँढ़ रहा हो। तभी उसकी उंगली रूबी की गाण्ड के छेद पे टिक जाती है और राम थोड़ा सा दबाव बनाकर उंगली को गाण्ड के छेद में डाल देता है।

रूबी- “राम्मू उम्म... आहह.."

रामू- कैसा लग रहा है मेरी जान?

रूबी- “आह्ह.. बहुत अच्छा मेरे राजा..."

पहली बार रूबी की गाण्ड के अंदर कोई चीज बाहर से प्रवेश कर रही थी। ऐसा अनुभव तो रूबी को पहले कभी था। वो अपने आपको रोक नहीं पाती और अपने होश में नहीं रहती और मदहोशी के आलम में अपनी कमर को आगे-पीछे करने लगती है। उसके आगे-पीछे करने से राम की उंगली उसकी गाण्ड के छेद में और भीतर तक घुस जाती है। इस मदहोशी में रूबी रामू के लण्ड को और जोर से हाथ में पकड़ लेती है और तेजी से मसलने लगती है।
 
रूबी स्वर्ग की सैर पे दुबारा निकल जाती है। रूबी की चूत दुबारा से गीली हो जाती है, और रामू अपनी उंगली को रूबी के चूतरों की दरारर के बीच में घुसा देता है और उंगली को आगे-पीछे करने लगता है, मानो जैसे कुछ ढूँढ़ रहा हो। तभी उसकी उंगली रूबी की गाण्ड के छेद पे टिक जाती है और राम थोड़ा सा दबाव बनाकर उंगली को गाण्ड के छेद में डाल देता है।

रूबी- “राम्मू उम्म... आहह.."

रामू- कैसा लग रहा है मेरी जान?

रूबी- “आह्ह.. बहुत अच्छा मेरे राजा..."

पहली बार रूबी की गाण्ड के अंदर कोई चीज बाहर से प्रवेश कर रही थी। ऐसा अनुभव तो रूबी को पहले कभी था। वो अपने आपको रोक नहीं पाती और अपने होश में नहीं रहती और मदहोशी के आलम में अपनी कमर को आगे-पीछे करने लगती है। उसके आगे-पीछे करने से राम की उंगली उसकी गाण्ड के छेद में और भीतर तक घुस जाती है। इस मदहोशी में रूबी रामू के लण्ड को और जोर से हाथ में पकड़ लेती है और तेजी से मसलने लगती है।

रामू की हालत भी इधर बुरी थी। बड़ी मुश्किल से वो अपने ऊपर कंट्रोल कर पाता है। रूबी अपनी गाण्ड को और तेजी से आगे-पीछे करने लगती है और जोर-जोर से आहें भरने लगती है।

रूबी- “आहह... आऽऽ उफफ्फ... मर जाऊँगी राजा उफफ्फ... मेरी जान... मर गई मैं तो... ले लो मेरी राम उफफ्फ... ओहह..."

उसकी आंहों से पूरा कमरा भर जाता है, और जल्दी ही उसकी चूत का रस उसका साथ छोड़ देता है। आज वो पहली बार एक दिन में इतने कम टाइम में दो बार झड़ी थी। थक कर चूर हुई रूबी रामू के लण्ड को मसलना भी भूल जाती है। वो बस रामू के चेहरे को देखती रहती है।

रामू नीचे झुक कर उसके होंठों पे किस करता है और पूछता है- “कैसा लग रहा है मेरी जान?”

रूबी- “आई लोव यू राम..” और रामू के होंठों पे अपने होंठ रख देती है।

राम- "आपकी सिसकियों से तो पूरा कमरा भर गया था। मुझे तो डर था की कही मालेकिन बाहर बैठी ना सुन लें.." और रामू रूबी की गाण्ड में पेली हुई उंगली को अपने होंठों में लेकर चूसता है।

रूबी शर्म से अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लेती है।

रामू उसके पास आता है और कहता है- “मेरी जान मुझे तो पूरा कर दो..."

रूबी को तब याद आता है की राम तो अभी तक झड़ा ही नहीं है। कोई और होता तो अभी तक झड़कर थक गया होता। पर रामू का लण्ड अभी तक सख्त था। उसे लगता है की अब उसे शर्म छोड़ देनी चाहिए। रामू ने आज उसे दो बार चरमसुख दिया था। अब तो रामू का साथ देना चाहिए और उसे भी शांत करना चाहिए। वो रामू का लण्ड पकड़ती है और उसे मसलने लगती है। कुछ देर बाद।

रामू- मेरी जान मुँह में लो ना?

रूबी शर्माकर मना कर देती है।

रामू- प्लीज करो ना... तुम्हारे रसीले होंठों का प्यार पाने को तड़प रहा है।

रूबी फिर से मना कर देती है और अपने हाथों की रफ्तार बनाए रखती है। राम के बार-बार फोर्स करने पे भी भी नहीं मानती।

इधर रामू का बुरा हाल हो रहा था। वो झड़ने की कगार पे पहुँच चुका था। वो रूबी को पकड़कर नीचे लेटाता है

और खुद उसके ऊपर आकर उसके उभारों के बीच में लण्ड रखकर रगड़ने लगता है। रूबी के हाथों को पकड़कर उसके उभारों पे रखकर दबाता है, जिससे उसके लण्ड को ज्यादा घर्षण मिल सके। रूबी आँखें बंद किए उसका पूरा साथ देती है और खुद ही अपने हाथों से अपने उभारों को आपस में चिपका देती है। रामू चरमसुख की ओर बढ़ रहा था और और अपनी कमर हिला-हिलाकर रूबी के उभारों को चोदने लगता है।

तभी रूबी के फोन की रिंग होने लगती है। दोनों चौंक पड़ते हैं। रूबी आँखें खोलकर रामू की तरफ देखती है और पाती है की रामू तो अपनी ही दुनियां में खोया हुआ है। उसे तो बस अपना वीर्य निकालने से मतलब था। रूबी का दिल भी रामू को बीच में छोड़कर फोन उठाने को नहीं करता। रामू आँखें बंद किए हुये रूबी को चोदने की कल्पना करता है। उसके चेहरे पे टाइटनेस आ जाती है और तभी उसका वीर्य निकलने लगता है।
 
रामू धीरे-धीरे अपनी सांसें कंट्रोल में करता है। उसके वीर्य से रूबी की गर्दन और बेडशीट दोनों भीग गये थे। रामू के पूरी तरह शांत होने के बाद रूबी उठती है और अपने को बाथरूम में बंद कर लेती है और गरम पानी से नहाने लगती है।

इधर रामू अपने कपड़े पहनता है और सफाई वगैरा करने लगता है। उनपे कोई शक ना करे इसलिए वो काकरोच स्प्रे भी कर देता है। कुछ देर बाद रूबी बाथरूम से बाहर आती है और फोन चेक करती है और देखती है की लखविंदर का फोन आया था।

रूबी काल बैक करती है और लखविंदर से बातें करने लगती है।

इधर हरदयाल भी वापिस आ जाता है ट्रैक्टर लेकर। राम को मजबूरन काम खतम करने के बाद अपने रूम में जाना पड़ता है। उसे लगता है की आज जिस हिसाब से रूबी गरम हो गई थी और जैसे उसके लण्ड को प्यार दे रही थी, अगर कमलजीत ना होती तो चुदवा ही लेती।

रामू की किश्मत फूटी थी जो लखविंदर का फोन आ गया बीच में, और रूबी वापिस अपने होशो-हवास में वापिस आ गई और उधर से हरदयाल भी तो वापिस आ ही गया था। पर राम इस बात से खुश था की रूबी ने आज उसके लण्ड के दीदार कर लिए थे। इतना तो पक्का था की रूबी अपने दिल से उसके लण्ड को नहीं निकाल पाएगी। उसकी चूत उसका तगड़ा मोटा लण्ड लेने के लिए तड़पेगी जरूर। बस एक मौका मिल जाए जब रूबी अकेली हो घर पे। उसे चाहे जोर जबरदस्ती करनी पड़े वो उसे भोग के ही रहेगा। वैसे भी अब तो रूबी भी खुल चुकी थी उसके साथ, और उसे भोगने में ज्यादा परेशानी नहीं होने वाली थी। बस जैसे तैसे करके उन दोनों को अकेलापन मिल जाए घर में।

इधर रूबी भी पूरा दिन रामू के बारे में सोचती रही। बार-बार उसकी आँखों के सामने रामू का मोटा लंबा लण्ड आ जाता था। जब भी वो राम के लण्ड के बारे में सोचती तो उसके शरीर में कंपकंपी सी छट जाती थी। राम के लण्ड ने उसपे जादू कर दिया था। क्या वो इतना मोटा और लंबा लण्ड झेल भी पाएगी? जब उसने पहली बार लखविंदर का लिया था तो उसे बहुत दर्द हुई थी। पर रामू का तो लखविंदर से तकरीबन दोगुना बड़ा और मोटाई में उसकी कलाई के बराबर था।

रूबी की चूत तो लण्ड लेने के लिए तड़प रही थी पर लण्ड का साइज सोचकर रूबी का दिल बैठा जा रहा था। ऊपर से रूबी यह सोचकर चकित थी की राम का लण्ड वो कितनी देर मसलती रही, पर फिर भी उसे शांत नहीं कर पाई। रामू को खुद कंट्रोल लेना पड़ा अपने हाथ में तब जाकर शांत हुआ। लखविंदर के लण्ड को जब भी । उसने मसला था तो एक मिनट के बाद ही लखविंदर उसके हाथ से लण्ड को छुड़ा लेता था की कही वो झड़ ना जाए। पर राम तो जैसे पक्का खिलाड़ी हो। रूबी चाह कर भी राम के लण्ड से अपना ध्यान हटा नहीं पा रही थी। इसी कशमकश में आज रूबी ने खुद ही रात को खाना खाने के बाद रामू को फोन लगा दिया।

उसे पता था की रूबी आज के बाद खुद को रोक नहीं पाएगी। उसके लण्ड की तो औरतें दीवानी थीं तो रूबी भी कहां रोक सकती थी अपने आपको।

रामू फोन उठकर कहता है- "हाय मेरी जान। आज खुद ही फोन कर लिया."

रूबी- बड़े मूड में हो।

रामू- अरे तुम्हारी आवाज सुनकर मूड खुद ही बन जाता है। और सुनाओ कैसे याद किया?

रूबी- बस वैसे ही। क्यों कर नहीं सकती?

राम- अरे क्यों नहीं मेरी परी। मैं भी तो तुम्हें ही याद कर रहा था की कब फोन आए और बात करें।

रूबी- तुम्हें क्यों लगा मैं फोन करूंगी?

रामू- बस आज दिल ने कहा के आप फोन करोगे।

रूबी- हाँ।

रामू- और सुनाओ दिन कैसा गुजरा?

रूबी- बस ठीक था... और तुम्हारा?

रामू- मेरा तो बहुत बुरा।

रूबी- क्यों?

राम- बस आपके बारे में हो सोचता रहा सारा दिन।

रूबी- अच्छा जी। क्या सोचते रहे?

राम- बस आपकी आँखें, आपका चेहरा, आपके होंठ और आपकी चूत।

रूबी- धत्... बेशर्म।

रामू- अरे मेरी जान अभी भी शर्मा रही हो। चूत में उंगली डलवाकर पानी भी निकाल दिया, अब काहे की शर्म?

वो तो तुम जबरदस्ती करते हो। वर्ना ऐसी थोड़ी कोई हमें वहां पे छू सकता है।

राम- हाँ यह बात तो माननी पड़ेगी की मेरी जान की इजाजत के बिना कोई उसको छु भी नहीं सकता।

रूबी- हाँ।

रामू- कैसा लगा आज? मजा आया ना?

रूबी- हाँ।

रामू- आपने भी मुझे बहुत मजा दिया। आपके हाथों में तो जादू है।
 
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