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Adultery प्यास बुझाई नौकर से

राम- हाँ यह बात तो माननी पड़ेगी की मेरी जान की इजाजत के बिना कोई उसको छु भी नहीं सकता।

रूबी- हाँ।

रामू- कैसा लगा आज? मजा आया ना?

रूबी- हाँ।

रामू- आपने भी मुझे बहुत मजा दिया। आपके हाथों में तो जादू है।

रूबी शर्माते हुए- “ऐसा क्या जादू है?"

रामू- सच में मेरी जान। तुम्हारे हाथों में तो जादू है। कसम से मैंने इतनी लड़कियों को चोदा है पर मुझे कभी लण्ड इतना सख्त नहीं लगा जितना आपके हाथों में लगा।

रूबी- अच्छा जी।

रामू- हाँ। मेरी तो जान ही निकाल दी अपने। इतने मुलायम हाथ लण्ड को रगड़ रहे थे की मैं तो स्वर्ग में था मानो। अगर आप अपने होंठों का प्यार दे देती तो सोने पे सुहागे वाली बात हो जाती।

रूबी- नहीं जी, वो नहीं हो सकता।

रामू- क्यों?

रूबी- बड़ा है काफी।

रामू रूबी के मुँह से अपने लण्ड की तारीफ सुनकर खुश हो जाता है। रूबी भी आज ज्यादा खुलकर बातें कर रही थी। रामू ने कहा- “मैंने तो पहले ही बोला था की मेरा लण्ड बड़ा है आपके पति से.."

रूबी- तुम झड़े क्यों नहीं?

राम- झड़ तो गया था मेरी जान।

रूबी- नहीं, मेरा मतलब... जब मैं तुम्हारे उसको मसल रही थी तब?

*****

*****

राम शरारत के अंदाज में- “किसको?"

रूबी- तुम्हारे उसको ही।

राम- किसको यार, बताओ ना।

रूबी- तुम्हें पता है... फिर भी जानबूझ कर मेरे से कहलवाना चाहते हो।

रामू- तो बोल दो ना किसको?

रूबी- नहीं, हमें शर्म आती है।

राम- अरे मेरी रानी हाथ में भी पकड़ लिया। मसल भी दिया और नाम लेने से झिझक कैसी? अब बोलो ना... मेरे कान तरस गये हैं तुम्हारे होंठों से सुनने के लिए।

रूबी- तुम नहीं मनोगे। बड़े जिद्दी हो।

रामू- मेरी जान बोलो ना किसको?

रूबी- तुम्हारे ल-ण-ड को।

रामू- आए हाए मेरी रानी। तुम्हारे मुँह से यह शब्द सुनकर मेरा लण्ड टाइट हो गया है। मुआअहह... अब बताओ क्या पूछ रही थी?

रूबी- मैं यह पूछ रही थी की तुम्हारा वो झड़ा नहीं, जब मैं मसल रही थी?

रामू- प्लीज... उसका नाम लेकर बात करो ना?

रूबी- उफफ्फ.. तुम्हारा लण्ड क्यों नहीं झड़ा, जब मैं मसल रही थी? इतनी देर मसला था पर नहीं झड़ा।

रामू- तो क्या लखविंदर का झड़ जाता है इतनी जल्दी?

रूबी- नहीं। पर वो तो एक आधा मिनट ही करने देते हैं, और फिर हाथ से अलग कर देते हैं।

राम- अरे मेरी जान... मालिक अभी कच्चे है काम क्रीड़ा में।।

रूबी- मतलब?

राम- अरे मेरी परी। मर्द के सेक्स की ताकत उसके लण्ड में तो होती ही है, पर उससे ज्यादा उसके दिमाग में होती है।

रूबी- मतलब?

रामू- हमारे बुजुर्ग बोल गये हैं की जिस मर्द ने अपने दिमाग पे काबू रखा, वो औरत को जीत पाता है।

रूबी- मैं समझी नहीं।
 
राम- देखो। ज्यादातर औरत मर्द सोचते हैं की मर्दानगी लण्ड में होती है। पर असल में ऐसा नहीं होता।

रूबी की उत्सुकता बढ़ जाती है- “तो फिर क्या होता है?"

राम- चुदाई के समय मर्द चुदाई के टाइम को अपने दिमाग की ताकत से बढ़ा सकता है। अगर वो अपना दिमाग शांत और काबू में रखता है तो मनचाहा समय निकाल सकता है। अगर वो ऐसा नहीं कर सकता तो जल्दी झड़ जाता है। जिससे औरत चरमसुख नहीं ले पाती। अब जो मेरे गाँव में औरतें है उनको लगता है की मेरा लण्ड मोटा और तगड़ा है, इसलिए मैं उनको चरमसुख दे पाता हूँ। पर असल में मैं अपने दिमाग को शांत और काबू में रखता हूँ। इसलिए उनको यौन सुख दे पाता हूँ।

रूबी- ऐसा होता है क्या?

रामू- हाँ मेरी जान।

रूबी- तुम तो बड़े ज्ञानी प्रतीत होते हो।

राम- अभी तो आपको मेरी बातों से ही ज्ञान दिखाई दे रहा है। एक बार आप मेरे नीचे लेट जाओ और चूत में लण्ड डलवा लो, तब आप मेरी बातों का असली समझ पाओगी। तब आपको पता चलेगा की औरत होने का एहसास क्या होता है?

रूबी- हाँ।

रामू- बताओ ना हम कब मिलेंगे? अब तो कल के बाद से मौका भी नहीं मिलेगा।

रूबी- पता नहीं?

रामू- कुछ तो करना पड़ेगा।

रूबी- क्या कर सकते हैं?

रामू- कुछ भी। किसी तरीके से हम अकेले हों जब। सच में मेरे से नहीं रहा जा रहा। मेरा दिल आपको अपनी बाहों में लेकर बेहद प्रेम करने को कर रहा है। दिल करता है की आपको पूरी जिंदी चोदता रहूँ।

रूबी शर्माते हुए- “धत्..."

रामू- धत् क्या। क्या आपका नहीं करता क्या?

रूबी- नहीं।

राम- झूठ। आप हमसे प्यार नहीं करते क्या?

रूबी- नहीं तो।

रामू- रूबी जी झूठ बोलना तो कोई आपसे सीखे।

रूबी- मैं क्यों झूठ बोलूंगी?
 
रामू- आज आप जब चरमसुख की ओर बढ़ रहे थे तो खुद ही मुझे आई लोव यू बोला था।

रूबी- नहीं ऐसा नहीं बोला होगा।

रामू- मैं झूठ नहीं बोलता। आप तो होश में ही नहीं थे। बस अपनी कामवासना में तड़पते हुए बोल दिया। आपको पता है आपकी सिसकियों से पूरा कमरा गूंजने लगा था। मुझे तो डर था कही मालेकिन सुन ना लें।

रूबी चकित होते हुए- “मुझे सच में कोई खबर नहीं थी। ऐसा क्या?"

रामू- सच में। आपकी कसम। बताओ ना हमसे प्यार नहीं करते?

रूबी शर्मा जाती है और कुछ नहीं बोलती। रामू के बार-बार मिन्नत करने पे उसको हार माननी पड़ती है, और कहती है- “ठीक है बाबा करते हैं.."

रामू- क्या करते हैं?

रूबी- रामू, तुम बहुत शैतान हो। जिस चीज के पीछे पड़ जाते हो उसको मना के ही छोड़ते हो।

रामू- हाँ वो तो है। बताओ ना क्या करते हो?

रूबी- प्रेम।

राम- पूरा बोलो ना?

रूबी शर्माते हुए- "हम तुमसे प्रेम करते हैं। बस अब खुश?"

रामू हँसते हुए- “और हमारे लण्ड को?"

रूबी- उसको क्या?

राम- उसको नहीं करते प्रेम?

रूबी- "करते हैं बस..” और हँस पड़ती है।

रामू को यकीन हो जाता है की रूबी अब चुदवाने के लिए तैयार है। बस अब इंतेजार करना होगा की कब वो अकेली हो घर पे। नहीं तो कोई योजना बनानी पड़ेगी उसको अकेली करने लिए।

रामू- तो फिर इन दोनों प्रेम करने वालों का अपनी अंतिम मंजिल कब मिलेगी?

रूबी- पता नहीं राम्।

रामू- रूबी जी। सच में मेरा बहुत बुरा हाल हो रहा है। मैं आपको पाना चाहता हूँ। क्या मेरी यह हसरत इस जनम में आप पूरी नहीं करोगी?

रूबी- मैं क्या कर सकती हँ? घर पे मम्मीजी होते हैं।

रामू- तो क्या मैं आपको बिना पाए इस दुनियां से चला जाऊँगा?

रूबी- शट-अप रामू... जाने की बात मत करो।

रामू- मेरी कसम खाकर बताओ आपका दिल नहीं कर रहा मिलन के लिए?

रूबी- हाँ शायद।

रामू- शायद नहीं? सच में बताओ। दिल करता है ना?

रूबी- हाँ। राम- तो फिर कब तक हम तड़पेंगे ऐसे ही?

रूबी- पता नहीं। मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है राम्।

राम- आपको एक बात बताऊँ?

रूबी- हाँ।

रामू- मैंने अभी ताक आपको वो बात नहीं बताई थी?

रूबी- क्या?

रामू- मैंने आपको रात के टाइम अपनी चूत रगड़ते तकिये के साथ देखा है।

रूबी चकित होकर- “क्या? कैसे? कब?"

राम- बस कुछ दिन पहले देखा था। तब समझ गया था की आप अपनी वासना की आग में तड़प रहे हो।

रूबी- पर कैसे?

रामू- अरे मेरी जान तुम्हारी खिड़की का पर्दा पूरी तरह खिड़की को ढकता नहीं है, थोड़ा सा पीछे रह जाता है। मैंने उसी से ही देखा था।
 
रूबी पर्दे की तरफ देखती है तो सच में वो पूरी तरह खिड़की को ढक नहीं पा रहा था। उसकी बस थोड़ी सी अड्जस्टमेंट करनी पड़नी थी।

रामू- मैंने तुम्हारे नंगे चूतरों को धीमी सी रोशनी में देखा है। बस तब से तुम्हारे चूतरों को देखना चाहता हूँ वो बिल्कुल पास से।

रूबी शर्मा जाती है यह सोचकर की राम ने पास से ना सही, पर डिम लाइट में तो उसके नंगे चूतरों के दीदार कर लिए हैं।

रूबी हँस पड़ती है- "तुम बहुत गंदे हो रामू, जो मेरे कमरे में चोरी-चोरी देखते हो। तुमको शर्म नहीं आती क्या?"

राम- आपसे कैसी शर्म?

दोनों काफी देर तक बातें करते रहते हैं और फिर सो जाते हैं। रूबी जब भी आँख बंद करने की कोशिश करती है, उसके सामने रामू का टाइट लण्ड आ जाता है। हालांकी वो खुद चुदवाना चाहती थी, पर इतना मोटा लण्ड लेने के ख्याल से घबरा जाती है। बड़ी ही मुश्किल से उसको नींद आती है।

उस दिन से रूबी रामू के साथ फोन पे काफी खुल बातें करने लगी थी। अब उन दोनों की प्रेमी प्रेमिका की तरह बातें होती थी और रूबी की शर्म भी काफी हद तक खतम हो गई थी। इधर रामू बस इंतेजार करने लगा की कब उन दोनों को अकेले में टाइम मिल पाए। कुछ दिन गुजरते गये। रूबी और रामू दोनों मिलने के लिए तड़प रहे थे। रूबी के दिल दिमाग दोनों पे बस रामू ही छाया हुआ था। उधर रामू भी किसी तरह दिन काट रहा था। दोनों की नजरें एक दूसरे को ढूँढ़ती रहती थी। फोन पे दोनों रोज ही बात करते थे। लेकिन मिलने का कोई प्लान नहीं बन पा रहा था।

पर एक दिन कुछ ऐसा हआ मानो कदरत खद उन दोनों प्रेम करने वालों का साथ दे रही हो। पड़ोस के गाँव से हरदयाल के दोस्त की रिटायमेंट फंक्सन का इन्विटेशन आ जाता है। हरदयाल का दोस्त खुद पूरी परिवार को इन्वाइट करने घर पे आता है, और उन्हें अगले मंडे घर पे फंक्सन अटेंड करने को बोलता है।

हरदयाल उसके फंक्सन में आने का वादा करता है और रूबी और कमलजीत को फंक्सन के लिए तैयार रहने को कहता है। बातों बातों में रूबी को पता चलता है की वो आदमी हरदयाल का खास दोस्त है और पास के गाँव का है। रात को राम के साथ बातें करते-करते रूबी उसे बताती है की अगले मंडे वो सभी पास के गाँव में फंक्सन अटेंड करने के लिए जा रहे हैं।

राम- तो क्या आप भी जा रही हो?

रूबी- हाँ। पापा का खास दोस्त है, सभी को इन्वाइट किया है।

राम- रूबी जी आप मत जाओ ना।

रूबी- पर मैं कैसे मना करूं| मझे तो पापा ने खुद बोला है चलने को।

राम- इतने टाइम से मिले नहीं हैं हम। आप कोई बहाना बना दो उस दिन।

रूबी जो खुद राम से मिलने के लिए तड़प रही थी उसे समझ में नहीं आता की वो क्या बहाना बनाए।

रामू- फिर दुबारा पता नहीं कब टाइम मिलेगा? आपको कुछ करना होगा।

रूबी- पता नहीं, देखते हैं।

राम अपनी कसमें रूबी को देता है और उससे वादा लेता है की उस दिन वो कोई ना कोई बहाना बनाकर घर पे ही रुक जाएगी। दोनों कुछ देर और बातें करते हैं। इधर रामू डिसाइड करता है की वो अब अपने लण्ड का वीर्य नहीं निकालेगा और उसे रूबी के लिए संभाल के रखेगा, और उन दोनों के पहले मिलन पे रूबी की चूत में अपना गाढ़ा वीर्य डालेगा।
 
राम अपनी कसमें रूबी को देता है और उससे वादा लेता है की उस दिन वो कोई ना कोई बहाना बनाकर घर पे ही रुक जाएगी। दोनों कुछ देर और बातें करते हैं। इधर रामू डिसाइड करता है की वो अब अपने लण्ड का वीर्य नहीं निकालेगा और उसे रूबी के लिए संभाल के रखेगा, और उन दोनों के पहले मिलन पे रूबी की चूत में अपना गाढ़ा वीर्य डालेगा।

आखीरकार, फंक्सन का दिन आ जाता है। सभी खाना वगेरा खाते है सुबह का, और रूबी ऐसे शो करती है जैसे वो बीमार हो।

कमलजीत- क्या हुआ बहू, थकी-थकी सी लग रही हो?

रूबी- मम्मीजी पता नहीं सुबह से सेहत ठीक नहीं है। सिर भी दर्द कर रहा है। शायद सर्दी लग गई है।

कमलजीत- हाँ हो सकता है। तुम मेडिसिन वगैरा ले लो, फंक्सन में भी जाना है।

रूबी- पता नहीं मम्मीजी। दिल नहीं कर रहा है। रेस्ट करने को दिल कर रहा है।

कमलजीत- तो तुम नहीं जाना चाहती? अंकल इतने प्यार से सभी को इन्वाइट करके गये थे।

रूबी- हाँ वो तो है। जाना तो चाहती हूँ। पर सेहत ठीक नहीं लग रही।

हरदयाल- अरे बहू कोई बात नहीं। तुम आराम करो। हम दोनों चले जाएंगे। तुम्हारे अंकल को बोल देंगे की सेहत ठीक नहीं थी बहू की।

रूबी- ठीक है पापाजी। आप किस टाइम जा रहे हो?

हरदयाल- बस 11:00 बजे निकलेंगे और दोपहर का खाना खाने के बाद वापिस आ जाएंगे तकरीबन 3 बजे।

रूबी- ठीक है पापा। मैं रेस्ट कर लेती हूँ।

कमलजीत- ठीक है बहू। जाने के टाइम मैं तुम्हें बता दूंगी और तुम घर के दरवाजे अंदर से लाक कर लेना।

रूबी- “ठीक है मम्मीजी..."

यह कहकर रूबी अपने कमरे में आ जाती है। उसकी हिम्मत नहीं पड़ती की वो राम को इसके बारे में बताए। उसे शर्म आ रही थी की वो कैसे राम को यह बात बताकर इन्वाइट करे। इधर राम बेसब्री से रूबी के फोन का इंतेजार करता है। पर रूबी का फोन नहीं आता। वो काल भी करता है पर रूबी हिम्मत नहीं जुटा पाती फोन पिक करने की लिए। वो सोच रही थी क्या सचमुच आज वो रामू से समागम कर लेगी?

इधर रामू रूबी से बात नहीं होने पे निराश हो जाता है। उसका ध्यान काम पे नहीं लगता। 11:00 बजे के टाइम पे राम् देखता है की हरदयाल और कमलजीत गाड़ी की तरफ बढ़ते हैं पर रूबी उनके साथ नहीं है। इसका मतलब क्या रूबी ने बहाना बना दिया कोई? रामू के मन में खुशी के लहर दौड़ जाती है। वो दोनों के घर से निकलने का इंतेजार करता है और उसे यह समय गुजरता महसूस नहीं होता।
 
तभी हरदयाल और कमलजीत मेनगेट से होते हुए बाहर निकल जाते हैं। गाड़ी की आवाज धीरे-धीरे कम होने लगती है। रामू सारे काम छोड़कर अंदर रूबी के कमरे में प ता है, और रूबी को अपने बेड पे बैठा पाता है। दोनों की नजरें मिलती हैं। रूबी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है। क्या आज वो दिन है जब वो सचमुच अपने आपको राम को समर्पित कर देगी?

रामू उसके पास जाकर बैठ जाता है। रूबी थोड़ा सा सिकड़ जाती है। उसका दिल घबरा रहा था। ना जाने क्या होने वाला था? राम की नजरों में उसे अपने लिए वासना नजर आती है। दोनों में कोई बात नहीं होती, मानो दोनों जानते थे की क्या करना है या क्या होने वाला है। राम रूबी के हाथ को अपने हाथ में लेता है और उसको चूम लेता है। रूबी डर कर हाथ छुड़ा लेती है।

रामू- क्या हुआ रूबी जी?

रूबी कुछ नहीं बोलती और रामू दोबारा से उसका हाथ पकड़कर चूम लेता है। उसे लगता है की रूबी थोड़ा सा झिझक रही है, और उसे खुद ही कमान अपने हाथ में लेनी होगी। वो अब रूबी के चेहरे को अपने हाथों में लेता है और रूबी के आकर्षक चेहरे का जायजा लेता है।

राम- “रूबी जी आपकी आँखें कितनी खूबसूरत हैं। दिल करता है सिर्फ मुझे ही देखती रहें..." और वो आगे बढ़कर उसकी दोनों आँखों का बारी-बारी से चुंबन लेता है। उसके बाद वो रूबी के माथे का चुंबन लेता है और फिर धीरे धीरे रूबी के होंठों को चूम लेता है। कुछ देर वो अपने होंठों को बिना कोई हरकत किए रूबी के नरम गुलाबी होंठों से चिपकाए रहता है।

रूबी अपने हाथों से हल्का सा जोर लगाकर उसके हाथों को अपने चेहरे से अलग करने की कोशिश करती है। पर उसकी कोशिश में कोई जान नहीं थी। फिर कुछ देर बाद धीरे-धीरे रामू रूबी के रसीले होंठों को चूसने लगता है। रूबी अभी तक कोई जवाब नहीं देती। रामू सोचता है की शायद उसके होंठ चूसने से रूबी उसका साथ देना शुरू कर देगी, पर ऐसा कुछ नहीं होता। रामू को समझ नहीं लगती की रूबी जवाब क्यों नहीं दे रही। रामू कुछ देर रूबी के होंठ चूसने के बाद उसको अपने से अलग करता है और रूबी की तरफ देखने लगता है।

रामू- रूबी जी क्या?

रूबी नजरें झुकाए हुए- “कुछ नहीं..."

रामू- आप खुश नहीं हो क्या मुझे यहाँ पे देखकर?

रूबी- नहीं ऐसी बात नहीं है?

रामू- तो क्या बात है? इतने मुश्किल से हमें टाइम मिला है मिलने का, और लगता है कि आप खुश नहीं हो।

आपको मेरी कसम बताओ क्या बात है?

रूबी- रामू मुझे डर लग रहा है।

रामू- किससे? हमसे?

रूबी- इस समझ से। क्या जो हम कर रहे है वो ठीक है?
 
रामू- हम क्या कर रहे हाई रूबी जी? प्रेम करना जुर्म नहीं है। हम तो पूरी तरह आपके हो चुके हैं। दिन रात सिर्फ आपके बारे में ही सोचते हैं। आपके बिना दिल नहीं लगता। पागलों की तरह चाहते हैं हम आपको। आपके लिए तो हम जान भी दे सकते हैं।

रूबी उसके होंठों पे अपना हाथ रख देती है और राम की नजरों से अपनी नजरें मिलाती है। राम की बातों ने रूबी को एमोशनली ब्लैकमेल किया था। रूबी को राम की नजरों में अपने लिए बेतहाशा प्यार या बोल सकते हैं वासना नजर आ रही थी।

रामू- क्या आप हमसे प्यार नहीं करती?

रूबी- करती हूँ रामू। अपनी जान से भी ज्यादा।

रामू- तो फिर हमें हमारे प्यार का हक लेने दो।

राम फिर से आगे बढ़कर रूबी के होंठों को अपने होंठों में ले लेता है और चूसने लगता है। अब धीरे-धीरे रूबी भी उसका साथ देने लगती है और दोनों एक दूसरे के होंठों का रस पीने लगते हैं। धीरे-धीरे रामू अपने होंठों का दबाव रूबी के होंठों पे बढ़ा देता है। रामू उसके होंठों को अच्छी तरह चूस लेना चाहता था। धीरे-धीरे रामू अपने हाथ रूबी की पीठ की तरफ ले जाता है और अपने हाथ को पीठ पे फिराने लगता है। उसके ऐसे हाथ फिराने से रूबी के जिस्म में उत्तेजना भरने लगती है। उसके जिश्म में चींटियां रेंगने लगती हैं। रूबी अपनी बाहों से राम की गर्दन को घेरा बना लेती है। वो अब राम के नीचे वाले होंठों को अपने मुलायम होंठों में लेकर चूसने लगती है। रामू उसकी इस पहल से आनंदित हो जाता है।

रामू अपनी बाहों से रूबी को पूरी तरह जकड़ लेता है और अपने सीने से रूबी का सीना चिपका लेता है। रूबी की छातियां पूरी तरह रामू की चौड़ी छाती से चिपक जाती हैं। दोनों प्यार के आगोश में खोते जा रहे थे। रामू रूबी के सिर के रेशमी बाल खोल देता है तो रूबी के सिर के बाल खुलकर उसे और भी आकर्षित कर रहे थे। एक तो कमरे में हीटर भी चल रहा था और ऊपर से दोनों के जिश्म के गर्मी भी बढ़ रही थी। दोनों अब एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। राम् रूबी के चेहरे को अपने कठोर हाथों में लेता है। उसके बलिष्ड हाथों में रूबी का चेहरे एक बच्चे की तरह लग रहा था।

रामू- रूबी जी हम आपसे बहुत प्यार करते हैं। आज हम आपको पूरी तरह अपनी बना लेंगे।

रूबी उसके होंठों पे किस करती है और अपने चेहरे को उसकी छाती में छिपा लेती है। राम रूबी के रेशमी काले बालों में अपने हाथ फिराने लगता है। रूबी को राम का ऐसे उसके बालों के साथ खेलना अच्छा लगता है, और उसके मन में रामू के लिए और प्यार उमड़ आता है।

राम धीरे-धीरे उसकी पीठ पे फिर से हाथ फिराने लगता है और अपने होंठ फिर से उसके होंठों से चिपका देता है। रूबी उसका साथ देते हुए रामू के होंठों का रस पीने लगती है। राम धीरे से अपना एक हाथ रूबी की कमर पे लाता है और फिर रूबी के ऊपर अपना दबाव बढ़ाता जाता है, और आगे को झुकता जाता है। जिससे यह होता है की रूबी धीरे-धीरे बेड पे लेट जाती है। दोनों एक दूसरे के होंठों को अच्छे से निचोड़ रहे थे। राम अब उसके होंठ छोड़कर रूबी की गर्दन में चूमना शुरू कर देता है। जिससे रूबी के अंदर वासना की लहरें उठने लगती हैं।

राम जो भी कर रहा था बड़े ही प्यार और आराम से कर रहा था। वो रूबी को पूरा मजा देना चाहता था। उसे कोई जल्दी नहीं थी। रूबी अपने हाथ से उसके बालों में हाथ फेर रही थी और बीच-बीच में अपने होंठों को आपस में रगड़ रही थी। राम अपने एक हाथ से रूबी का दायां उभार अपने हाथ में लेकर मसलने लगता है और अपने होंठों से उसकी गर्दन पे वार करना जारी रखता है।

रूबी के जिश्म की खुशबू रामू को मदहोश कर रही थी। रूबी अपने एक हाथ को रामू के हाथ पे रख देती है और उसको अपने उभार दबाने में मदद करने लगती है। कुछ देर खेल ऐसे ही चलता है और तब रामू रूबी के होंठों का चुंबन लेता है और रूबी की कमर को पकड़कर उसे अपने ऊपर ले आता है। रूबी के खुले हुए रेशमी बाल नीचे को लटक कर रामू के चेहरे को ढकने लगते हैं। रेशमी बालों की सुगंध रामू की नाक से होते हुए पूरे जिश्म में फैल जाती है। रेशमी बालों से शायद शैम्पू की खुश्बू आ रही थी। जिससे रूबी ने कल नहाया होगा।

राम अपने हाथ से उसके रेशमी घने काले बालों को अपने चेहरे से अलग करता है। अब दृश्य यह है की रूबी के बाल नीचे को लटके हुए रामू के दोनों गालों के साइड से छूते हुए बेड से छू रहे थे। इन बालों ने रूबी और रामू दोनों का चेहरे मानो बाकी दुनियां से छुपा रखा था। रूबी रामू के होंठों की तरफ देखती है और उसे ऐसे प्रतीत होता है मानो रामू के होंठ उसे इन्वाइट कर रहे हों और वो बिना देरी किए फिर रामू के होंठों को किस करने लगती है।

रामू अपने हाथों से उसकी कमर के इर्द-गिर्द घररा बना लेता है, रूबी के होंठों का आनंद लेने लगता है। अब उसके हाथ धीरे-धीरे रूबी की पीठ पे चलने लगते हैं।
 
रूबी रामू के होंठों में ही खोई हुई थी की तभी उसे रामू के हाथों का स्पर्श अपने नंगे बदन पे महसूस होता है। रामू ने उसके कुर्ते के अंदर अपने हाथ डाल दिए थे, और उसकी पीठ से खेलने लगा था। उसके खुरदुरे हाथ रूबी को अपनी पीठ पे बहुत अच्छे लगते हैं। उधर रामू धीरे-धीरे कुर्ते को ऊपर उठाना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे कुर्ता ऊपर उठकर रूबी की बगल तक आ जाता है। राम अब अपने हाथ रूबी और अपने पेट के बीच में ले जाकर रूबी के उभारों को ब्रा के ऊपर से पकड़कर मसलने लगता है।

रूबी एकदम हुए अपने उभारों पे अटैक को सहन नहीं कर पाती और रामू की छाती पे अपना सिर रख देती है। रामू अब दुबारा से कुर्ते को उतारने की कोशिश करने लगता है। वो रूबी की पहले एक बाजू पकड़कर कुर्ते में से निकालता है और फिर दूसरी निकाल देता है। अब कुर्ता सिर्फ रूबी की गर्दन से ही लिपटा हुआ था। रामू अब रूबी को पकड़कर थोड़ा सा ऊपर करता है जिससे रूबी का चेहरा रामू के चेहरे के बराबर आ जाता है। अब राम कुर्ते को गर्दन से भी निकालकर फर्श पे फेंक देता है और रूबी को चूमने लगता है।

रूबी भी उसका साथ देने लगती है। राम कुछ देर हाथ से रूबी के उभारों के साथ खेलता है। जिससे रूबी उसके साथ काफी खुल जाती है। उभार दबाने से रूबी की उमंगें भड़क जाती हैं, और वो सिसकियां लेने लगती है। राम अब उसकी ब्रा सामने से पकड़कर नीचे कर देता है। जिससे रूबी के दोनों कबूतर उसकी आँखों के सामने आ जाते हैं। रूबी उसी पल अपने एक हाथ से उनको ढक लेती है। राम उसके हाथ उभारों से अलग करने की कोशिश करता है पर रूबी शर्मा जाती है और अपने हाथ अलग नहीं करने देती।

रामू- "अरे मेरी जान... क्यों शर्मा रही हो? तुम तो ऐसी कर रही हो जैसी पहली बार देख रहा हूँ। इन दशहरी आमों का रस मैं पहले भी तो पी चुका हूँ। अब क्यों शर्मा रही हो? इन खूबसूरत गोरे कबूतरों को आजाद कर दो। क्यों इन बेचारों पे जुल्म कर रही हो? आज इनका पूरा रस पीने दो मुझे। इन कबूतरों को मुझे दे दो..."

रूबी शर्मा जाती है और रामू के हाथों के चंगुल से छूटने की कोशिश करती है। पर रामू उसको और जकड़ लेता है और उसके होंठों पे अपने होंठ रख देता है। धीरे-धीरे रूबी के हाथों को उभारों से अलग कर देता है और उभारों को पकड़कर मसलने लगता है। रूबी मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लेती है। रामू अपने होंठों में उसके एक फड़फड़ाते कबूतर को पकड़ लेता है।

रूबी सिसक उठती है- “आह.."

रामू उसके उभार को होंठों में जकड़े हुए अपनी जुबान उसकी ब्राउन निपल पे फेरता है। कुछ देर ऐसा करने से रूबी की आग और बढ़ जाती है और उससे रहा नहीं जाता।

रूबी- “उफफ्फ... रामू क्यों तड़पा रहे हो? अब तो यह आजाद हो गये हैं... उफफ्फ... ऊहह... अब क्यों उफफ्फ... रहम कर उईई.. आह्ह..."

रामू समझ जाता है की रूबी पे उसका जादू चढ़ने लगा है। वो अब उभार को अच्छे से चूसना शुरू कर देता है। रूबी भी अब उसका साथ देने लगती है और उभारों को बारी-बारी से चुसवाने लगती है। रूबी धीरे-धीरे अपने काबू से बाहर हो रही थी। नीचे उसकी चूत में भी खुजली होनी शुरू हो गई थी। वो अपने के हाथ से रामू का सिर पकड़ लेती है और उभारों को चूसने में उसकी मदद करने लगती है।।

रामू पूरी कोशिश कर रहा था कि वो रूबी पूरे उभार को मुँह में भर ले। पर रूबी के उभार इतने बड़े थे की पूरे उसके मुँह में नहीं जा रहे थे। कुछ देर बाद रामू उसकी पीठ पे हाथ लेजाकर उसकी ब्रा के हुक खोल देता है और ब्रा भी रूबी के कुर्ते के साथ फर्श पे आ जाती है। अब रामू रूबी को नीचे लेटा देता है और अपनी टी-शर्ट उतारकर उसके ऊपर आकर उसके उभारों का रस पीने लगता है। रूबी उसे अपने उभार चूसता देखती है। रामू उभारों पे ऐसे टूट पड़ा था, मानो जैसे आज के बाद उसे दुबारा इनका रस पीने को नहीं मिलेगा।
 
रामू पूरी कोशिश कर रहा था कि वो रूबी पूरे उभार को मुँह में भर ले। पर रूबी के उभार इतने बड़े थे की पूरे उसके मुँह में नहीं जा रहे थे। कुछ देर बाद रामू उसकी पीठ पे हाथ लेजाकर उसकी ब्रा के हुक खोल देता है और ब्रा भी रूबी के कुर्ते के साथ फर्श पे आ जाती है। अब रामू रूबी को नीचे लेटा देता है और अपनी टी-शर्ट उतारकर उसके ऊपर आकर उसके उभारों का रस पीने लगता है। रूबी उसे अपने उभार चूसता देखती है। रामू उभारों पे ऐसे टूट पड़ा था, मानो जैसे आज के बाद उसे दुबारा इनका रस पीने को नहीं मिलेगा।

रूबी के उभारों की निपल पूरी तरह सख्त हो चुकी थी। रामू के थूक से दोनों उभार पूरी तरह गीले हो चुके थे और कमरे की लाइट में चमक रहे थे। उभारों को चूसते-चूसते रामू अपना एक हाथ रूबी की सुडौल मोटी जांघों पे फिराने लगता है। रूबी को दोगुना मजा आने लगता है। उसकी चूत गीली हो जाती है। रामू हाथों को कभी उसके चूतरों पे और कभी दोनों जांघों के बीच रगड़ता है। जिससे रूबी वासना की लहरों पे और आगे बढ़ जाती है और राम के हाथ को अपनी जांघों के बीच रास्ता दे देती है।

उधर रामू पूरे जोश से रूबी के गोरे आमों का रस पीने में खोया हुआ था, और नीचे उसके हाथ अपना काम बखूवी से कर रहे थे। रूबी की जांघे खुलने से रामू उसकी चूत को सलवार के ऊपर से सहलाने लगता है। रूबी उसके ऐसा करने से बहक जाती है और अपनी जांघों को थोड़ा और खोल देती है। राम को उसकी सलवार के ऊपर से ही गीलापन महसूस होता है। लोहा गरम था, हथोड़ा मारने का सही टाइम था।

रामू अपना हाथ अपने और रूबी के पेट के बीच में लेकर आता है और रूबी की सलवार के नाड़े खोल देता है। नाड़ा खुलने से सलवार ढीली हो जाती है और रामू रूबी की कमर पकड़कर उसे अपने साथ चिपका लेता है और अपने हाथ से उसके चूतरों को सहलाने लगता है। नाड़ा खुलने से रामू को लगता है जैसे खजाने का ताला खोल दिया गया हो। लेकिन वो जल्दबाजी में नहीं था। वो आराम से रूबी को भोगना चाहता था। जल्दबाजी में हो सकता है की बनी बनाई बात बिगड़ जाए।

हालांकी रूबी समागम करने के लिए पूरी तरह तैयार थी। पर हो सकता है की उसके अंदर की पतिव्रता नारी उसे आगे बढ़ने से रोक दे। इसलिए रूबी को पूरा मजा देते हए ही आराम-आराम से आगे बढ़ना ठीक था। राम् रूबी को अपने ऊपर लेटाता है और खुद उसके नीचे हो जाता है। रूबी की छातियां रामू की चौड़ी छाती से चिपकी पड़ी थी। रामू अपने हाथ को उसकी पीठ पे फेरता हुआ धीरे-धीरे रूबी की सलवार में दोनों हाथ डाल देता है और नितंबों को पकड़कर मसलने लगता है।

रूई जैसे नितंबों पर राम के कठोर हाथ रूबी को उसकी ताकत का एहसास करा रहे थे। रामू अब अपने एक हाथ को रूबी की पैंटी के अंदर डाल देता है और रूबी के चूतरों की दरार से खेलने लगता है। रूबी चुपचाप रामू की छाती पे अपना सिर रखे उसके मर्दाने सख्त हाथों को अपने मुलायम चूतरों पे खेलता महसूस करके आनंदित हो रही थी। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे रामू का हाथ उसके चूतरों की दरार में कुछ ढूँढ रहा हो। रूबी से रामू के हाथों का स्पर्श अपने चूतड़ों पे सहना काफी मुश्किल हो रहा था। रामू ने अपनी एक उंगली उसकी गाण्ड के छेद में डाल दी।

रूबी- “आअहह...” कर दी।

कुछ देर तक रामू ने उंगली को गाण्ड में डाले रखा। उसे रूबी की गाण्ड के छेद का फैलना सिकुड़ना अपनी उंगली पे महसूस हो रहा था। एक मिनट बाद उंगली बाहर निकाला और फिर अपनी नाक के पास लेजाकर उसकी गाण्ड की गंध ली। रूबी की गाण्ड की गंध पाकर रामू का लण्ड पूरी तरह तन गया। अब रामू ने रूबी को नीचे लेटा दिया और खुद उसकी बगल में होकर एक हाथ से रूबी के चूतरों से उसकी सलवार उतरने की कोशिश करने लगा।

रूबी समझ जाती है की रामू अब उसकी चूत के दर्शन करना चाहता है, और वो शर्माकर उसका हाथ पकड़ लेती है। रामू को आज उससे ऐसा करने की उम्मीद नहीं थी।

रामू- क्या हुआ मेरी जान?

रूबी- मुझे शर्म आ रही है।

रामू- मुझसे क्यों शर्माना मेरी प्यारी?

रूबी- पता नहीं। लाइट बंद कर दो। मुझे शर्म आ रही है।
 
रामू- नहीं मेरी जान ऐसा मत बोलो। बिना लाइट के मैं तुम्हें कैसे देख पाऊँगा। मैं इन लम्हों को यादगार बनाना चाहता हूँ। मेरे लिए तो यह सुहागरात है जब एक पति अपनी पत्नी को पहली बार भोगता है। आज के दिन के लिए मैं तुम्हारा पति हूँ और तुम मेरी पत्नी। इस उजाले में मैं तुम्हारे साथ समागम करके तुम्हें हमेशा के लिए अपनी बनाना चाहता हूँ।

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रूबी उसकी बात पे शर्मा जाती आई है और अपना चेहरे दूसरी तरफ कर लेती है।

इधर रामू रूबी की सलवार में हाथ डालकर उसकी पैंटी के ऊपर से चूत के मुहाने को रगड़ने लगता है। रूबी उसके हाथ के स्पर्श से कमजोर पड़ जाती है और कमर को हिलाने लगती है। रूबी की सांसें उखड़ने लगती हैं। राम अच्छा टाइम समझ कर रूबी की पैंटी के एक साइड से अपनी उंगली को चूत के छेद में सरका देता है।

रूबी- “आहह... धीरे..."

रामू उंगली को अंदर रखते हुए ही इसे चूत में चारों तरफ घुमाने लगता है। रूबी तो मानो सातवें आसमान में सैर पे निकल गई थी। रूबी ने अब अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को पकड़ लिया और दबाने लगी। अब राम धीरे-धीरे उंगली को चूत के अंदर-बाहर करने लगा। रूबी की चूत के रस में भीगी उंगली आसानी से अंदर-बाहर हो रही थी। वासना की लहरों में तैरती रूबी की कमर उंगली के साथ ताल मिलने लगी।

रामू- मेरी रानी। बोलो मजा आ रहा है ना?

रूबी- हाँ। बहुत मजा आ रहा है।

रामू अब उंगली की रफ़्तार थोड़ी सी बढ़ा देता है। रूबी भी अपने चूतरों को उसके साथ ही हिलाने लगती है। कुछ देर चूत के साथ खेलने के बाद रामू से रहा नहीं जाता। उसे अब रूबी की चूत के दर्शन करने थे। वो चूतड़ों से सलवार को नीचे कर देता है और फिर आगे से भी। रामू अब उठकर बैठ जाता है और रूबी के घुटनों से नीचे सलवार को ले जाने की कोशिश करता है।

रूबी अपनी जांघे आपस में चिपका लेती है और नखरे दिखाते हुए सलवार उतारने में आनाकानी करती है। लेकिन रामू ने तो तय कर लिया था के आज तो रूबी पे विजय पानी है। वो थोड़ा सा जोर लगाकर जांघों को खोल देता है और सलवार को पकड़कर रूबी के बदन से अलग कर देता है। अब रूबी सिर्फ पैंटी में ही रह गई थी। वो शर्माकर अपने हाथ जांघों के बीच पैंटी के ऊपर से चूत पे राख देती है। राम उसके हाथों को अलग करने की कोशिश करता है पर रूबी अपनी पूरी ताकत से हाथ वही पे रखे रहती है।

रामू- मेरी जान ऐसा मत करो, और मत तड़पाओ। उतरने दो ना।

रूबी- नहीं मुझे शर्म आ रही है।

रामू- मेरे से शर्म कैसी मेरी जान?

रूबी- नहीं शर्म आ रही है।
 
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