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Adultery शीला की वासना की आग

"आह्ह.. बापू.. आप तो कैसे चूस रहे है.. ऊईई.. ओह्ह" रूखी ने अपनी निप्पल को ससुर के मुंह में दबा दिया.. वो बूढ़ा भी ऐसे चूस रहा था जैसे दुनिया का सबसे बढ़िया हेल्थ ड्रिंक पी रहा हो.. थोड़ी देर तक चूसने के बाद वह बोला

"बेटा.. गाय के थन जैसी छाती है तेरी.. थोड़ा सा ही चूसने पर पूरा मुंह दूध से भर गया मेरा.. बेचारा लल्ला इतना सारा दूध कहाँ से पी पाएगा!! इतना दूध है की पूरे घर के लिए काफी है.. काश हमारे खेत भी तेरी इन छातियों जीतने उपजाऊ होते"

"ओह्ह बापू.. क्या कर दिया आपने!! मुझे तो कुछ कुछ हो रहा है.. आह्ह.. " रूखी का पूरा जिस्म हवस की आग में झुलसने लगा था। उसका एक हाथ ससुर के सिर पर था और दूसरे हाथ से उसने अपनी भोस सहलाना शुरू कर दिया..

"आह्ह बापू.. धीरे धीरे.. काटिए मत.. ऊईई माँ.. बस बस बहुत हो गया.. थोड़ा सा लल्ला के लिए भी छोड़ दीजिए.. अभी वो जाग गया तो उसे क्या पिलाऊँगी.. " रूखी और उसके ससुर का यह कामुक मिलन देखते हुए.. शीला ने अपने दोनों स्तन ब्लाउस से बाहर निकाल लिए थे और पागलों की तरह अपनी निप्पलों को मसल रही थी। शीला ने पास पड़े हँसिये को उठाकर उसके लकड़े से बने हेंडल को अपनी चुत पर रगड़ना शुरू कर दिया था। उन दोनों का खेल देखकर शीला का मन कर रहा था की वो भी उस खटिया में जाकर उस बूढ़े से लिपट पड़े.. पर फिलहाल ऐसा करना मुमकिन नहीं था

"तेरी छातियाँ तो रसिक की अम्मा से भी बड़ी बड़ी है.. " आखिर ससुर ने रूखी की निप्पलों को छोड़ दिया

"आपने तो सारा दूध खतम कर दिया बापू" उस बूढ़े के पीठ पर हाथ पसारते हुए रूखी ने कहा.. वह अपने ससुर को ऐसे सहला रही थी जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को सहलाता है..

ससुर ने रूखी की लचकदार चर्बी वाली कमर पर अपना खुरदरा हाथ फेरा.. रूखी के भोसड़े से कामरस की धारा बह रही थी.. बूढ़े ने रूखी के घाघरे में हाथ डालकर उसके गोल मटके जैसे दोनों कूल्हों को पकड़ लिया..

रूखी को बहोत गुस्सा आ रहा था.. ये बहनचोद हर जगह हाथ फेर रहा है पर मेरी चुत को क्यों नहीं छु रहा!! कैसे कहूँ.. शर्म आ रही है.. और अभी वो बुढ़िया भी आ टपकेगी..

रूखी ने बूढ़े को अपनी छातियों से दूर कर दिया..

"क्या हुआ बहु?" ससुर आश्चर्य से रूखी को देखने लगा

"अब दूसरे वाले की बारी.. दोनों तरफ एक सा वजन होना चाहिए ना.. " कहते हुए रूखी ने अनुभवी रंडी की अदा से अपना दूसरा भारी स्तन ससुर के हाथों में थमा दिया

"बहु.. इतनी भारी छातियों का वज़न नहीं लगता तुझे.. ?? कम से कम ३-४ किलो का होगा एक.. "

बिना जवाब दिए रूखी खटिया पर लेट गई.. और अपने ससुर को बगल में लिटा दिया.. अपना बाँया उरोज मुंह में देते हुए बोली

"बातें बाद में करेंगे.. पहले जो काम करने बैठे है उसे तो खतम कर लो.. कब से बस बोलें ही जा रहे हो..!!" रूखी ने अपने पैर को घुटने से मोड़ा और ऐसी स्थिति में लेकर आई की उसका घुटना सीधा बूढ़े के लंड से जा टकराए..

ससुर की लंगोट.. मधुमक्खी के छत्ते की तरह उभर गई थी.. रूखी के भोसड़े में आग लग गई थी.. उसने ससुर के लंड को अपने घुटने से छूते हुए उसे अपने पास खींचा

"ये क्या कर रही हो बेटा.. नहीं नहीं.. ये ठीक नहीं है"

रूखी ने अपने घुटनों से एक जोरदार धक्का लगा दिया ससुर के लंड पर.. बूढ़े की चीख निकल गई..

"अब चुपचाप जो कहती हूँ वो करो.. दूध तो पी लिया है मेरा.. अब वसूल भी तो करने दो मुझे.. खबरदार जो किसी को एक शब्द भी बताया है तो" अपने ससुर को बाहों में दबाते हुए रूखी ने कहा.. गुस्साई शेरनी जैसी रूखी उस बूढ़े पर टूट पड़ी.. ससुर को नीचे लिटाकर वह उसके ऊपर चढ़ गई.. दोनों के वज़न से खटिया का एक पैर टूट गया.. खटिया के टूटते ही दोनों फर्श पर आ गिरे.. ऐसे गिरे जैसे बुमराह के बाउन्सर के सामने झिम्बाब्वे का बेट्समेन गिर जाता है.. दोनों को मुंह से एक साथ चीख निकल गई.. ससुर इसलिए चीखा की उसकी पीठ नीचे फर्श पर टकराई और रूखी का पूरा वज़न उस पर गया.. रूखी इसलिए चिल्लाई क्योंकी नीचे गिरने के कारण उसकी निप्पलें बूढ़े के मुंह के साथ बड़े जोर से दब गई।

रूखी के वज़न तले लाचार ससुर ऐसे दबा था जैसे महंगाई के बोज तले प्रजा दबी हुई है.. दोनों के जिस्म एक दूसरे में उलझे हुए थे तभी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज आई.. मर गए.. जिसका डर था वही हुआ.. बुढ़िया आ गई!!

"अरे.. इतनी देर में रसिक की अम्मा वापिस भी आ गई.. !! उसे तो मंदिर में भी चैन नहीं है" कहते हुए ससुर रूखी को अपने शरीर के ऊपर से हटाते हुए खड़ा हुआ और भागकर अपने कमरे में चला गया

रूखी उठकर शीला के पास आई.. शीला हँसिये के हेंडल को अपनी चुत में घुसेड़कर खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी।

"कमिनी.. तूने तो अपने ससुर को ही सेट कर लिया" रूखी की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा

"भाभी.. मुझे शक है की मेरे ससुर ने मुझे जीवा के साथ देख लिया है.. जिस रात रघु और जीवा मुझे चोद कर गए थे.. तब से इस बूढ़े ने मुझे सताना शुरू कर दिया था.. मेरे साथ रोज अश्लील बातें करता है और छातियों को घूरता रहता है"

"अच्छा.. तो ये बात है!!" शीला ने कहा

रूखी: "हाँ भाभी.. पर बूढ़ा है बड़े काम की चीज.. छाती तो ऐसे चूस रहा था.. मेरे छेद में से नलके की तरह पानी बहने लगा था.. सब गीला गीला हो गया"

शीला: "साली, एक नंबर की हरामी है तू ..."

रूखी ने शीला के ब्लाउस के बटन बंद करते हुए कहा "इसीलिए तो मुझे हँसिये को अंदर डालने की जरूरत नहीं पड़ती है भाभी" कहते हुए उसने शीला की चुत से हँसिये को खींचकर बाहर निकाला..

तभी शीला के मोबाइल पर कविता का फोन आया.. शीला ने उसके साथ कुछ बात की और फोन रख दिया

रूखी की सास.. कमरे में अंदर आई.. और बोली "अरे रूखी.. शीला बहन को ताज़ा मक्खन जरूर देना"

"हाँ अम्मा.. बस निकालने ही जा रही थी.. "

"और बताइए शीला बहन.. हालचाल ठीक है सब? भैया कैसे है?" शीला के ब्लाउस के दो खुले बटनों को देखते हुए रूखी के सास ने बड़े विचित्र ढंग से पूछा
 
शीला: "सब ठीक ही है माजी.. विदेश में भला क्या तकलीफ़ होगी उन्हे!! सारी तकलीफ तो हमे यहाँ ही उठानी पड़ती है"

रूखी की सास भी आखिर एक स्त्री थी.. शीला की आवाज का दर्द और छुपा अर्थ वह समझ सकती थी.. इतने सालों का अनुभव जो था.. रूखी को भी वह बड़े अच्छे से रखती थी.. सास-बहु वाली कोई कड़वाहट नहीं थी। वैसे भी हर सास अपनी बहु का थोड़ा बहुत ऊपर नीचे चला ही लेती है। क्योंकी सास भी कभी बहु थी..

शीला और रूखी के सामने रहस्यमयी मुस्कान के साथ वह कमरे में चली गई। '

शीला: "तेरी सास भी बड़ी खिलाड़ी लगती है मुझे"

रूखी ने हँसकर कहा "सबकुछ आराम से बताऊँगी कभी.. मेरी सास का इतिहास भी बड़ा ही रसीला है"

"ठीक है रूखी, मैं चलती हूँ" रूखी के हाथ से मक्खन का डिब्बा लेते हुए शीला ने कहा

"मैं शाम को आऊँगी भाभी.. फिर आराम से बातें करेंगे"

जाते जाते शीला ने रूखी के ससुर के कमरे के दरवाजे को हल्का सा खोलकर एक नजर डाली.. अंदर का द्रश्य देखकर वह चोंक गई.. वह तुरंत भागकर वापिस आई.. और रूखी को खींचकर ससुर के कमरे के दरवाजे पर ले आई.. दोनों ने छुपकर देखा.. उसका ससुर धोती से लंड निकालकर हिंसक तरीके से हिला रहा था.. देखकर शीला और रूखी दोनों पानी पानी हो गए..

"मेरी सास कहाँ है ?" रूखी ने पूछा.. अर्धखुले दरवाजे से कमरे का पूरा द्रश्य नहीं दिख रहा था रूखी को

"तेरी सास भी अंदर ही है" शीला ने कहा

"तब तो आज पक्का चुदाई का प्रोग्राम होगा अंदर.. मेरा ससुर खिलाड़ी है.. मेरी सास को रंडी बनाकर पेलेगा.. रुको थोड़ी देर.. देखकर जाओ.. मज़ा आएगा" रूखी ने कहा

शीला उत्तेजित हो गई.. उसके लिए ये नया अनुभव था.. उसने पहले कभी किसी अन्य जोड़े को इस तरह चोदते हुए नहीं देखा था.. शीला की मुनिया कामरस से एकदम गीली हो गई.. रूखी के सास और ससुर बातें कर रहे थे.. अपना लंड ढीला न पड़ जाए इसलिए वह बूढ़ा उसे हिलाए जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद रूखी की सास अपने पति के बगल में लेट गई.. और रूखी के ससुर को अपने ऊपर खींच लिया..

"अरे वो दोनों बातें करने में लगी हुई है.. अभी कोई नहीं आएगा.. तुम शांति से करो.. काफी दिन हो गए है किए हुए.. पर आज दिन के समय ये तुम्हारा डंडा कैसे खड़ा हो गया आज?? कहीं वो शीला बहन को देखकर तो.. !!! अभी मैं उससे मिली तब उसके ब्लाउस के दो हुक खुले हुए थी.. तुमने कुछ छेड़खानी तो नहीं की ना उसके साथ.. !! वैसे भी वो दो सालों से बिना पति के तरस रही है.. कहीं तुमने तो उसे पानी पिलाने की कोशिश नहीं की है ना?? " रूखी के सास ने अपने पति से पूछा

"पागल हो गई है क्या तू?? मैंने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया.. " ससुर ने अपना बचाव करते हुए कहा

"कुछ भी कहो.. आज तुम्हारा लंड कुछ ज्यादा ही सख्त लग रहा था.. इतना सख्त तो हमारी सुहागरात पर भी नहीं हुआ था... " रूखी के सास ने अपने पति का लाई डिटेकटर टेस्ट जारी रखा

"हे ईश्वर.. इन औरतों को कभी भी अपने पति की बात का विश्वास क्यों नहीं होता!! जब देखो तब एक ही बात.. !! चल.. अब मुंह में लेकर चूस.. और इसे एकदम सख्त कर.. फिर से नरम होने लगा... " ससुर ने अपने पत्नी के बाउन्सर के सामने झुककर अपना सिर बचा लिया

"अब इतना कडक तो हो गया है.. और कितना सख्त करना है तुम्हें..!! चोदना है या दीवार में छेद करना है!! चलो.. अब जल्दी से डाल दो.. तुम्हारे ये देखकर मुझे भी कुछ कुछ हो रहा है.. "

रूखी का ससुर तुरंत ऊपर चढ़ गया.. और अपनी पत्नी के ढीले-ढाले भोसड़े को ठोंकने लगा..

"आह्ह.. जरा धीरे से.. दर्द होता है अंदर.. आहह आह्ह.. !!" सिसकारते हुए रूखी की सास भी ताव में आकर चुदने लगी और उसने भी इस काम-उत्सव में अपना नामांकन करवा दिया

"बाप रे भाभी.. !! देखो तो सही.. इस उम्र में भी ये बूढ़ा कितना जोर लगा रहा है... !! सच ही कहते है.. मर्द और घोडा कभी बूढ़ा नहीं होता!!" रूखी ने शीला से कहा

शीला रूखी के पीछे खड़ी थी.. उसने अपने दोनों हाथों से रूखी की गदराई कमर को सहलाना शुरू कर दिया.. और शीला के मुलायम तकिये जैसे स्तन रूखी की पीठ पर दब रहे थे। दोनों की आँखों के सामने रूखी के सास और ससुर की घमासान चुदाई चल रही थी।

शीला ने रूखी के चेहरे को पीछे की तरफ खींचा और उसके होंठों को एक गरमागरम चुंबन रसीद कर दिया.. रूखी भी घूमकर शीला के सामने आ गई और दोनों पागल प्रेमियों की तरह एक दूसरे से लिपट गए.. सास-ससुर का कामुक वृद्ध सेक्स देखकर दोनों सखियों की पूत्तियाँ कामरस टपकाने लगी.. शीला ने रूखी की चोली में हाथ डालकर उसके भरावदार स्तनों को मसलन शुरू किया जबकि उसके दूसरे हाथ ने रूखी के घाघरे में घुसकर उसकी चुत का हवाला संभाल लिया था..

अपने ससुर का मस्त खूंटा देखकर उकसाई हुई रूखी अपनी बेकाबू वासना को शांत करने के लिए शीला के होंठों को चूसने लगी.. कभी शीला रूखी के होंठ चूमती तो कभी रूखी शीला की जीभ को रसगुल्ले की तरह चूसती.. उनकी नज़रों के सामने ही रूखी के सास-ससुर कामक्रीड़ा में इतने मशरूफ़ थे की उन्हे आसपास का कोई ज्ञान न था.. वह दोनों केवल अपनी हवस शांत करने की कोशिश कर रहे थे

शीला और रूखी.. एक दूसरे के अंगों को सहलाकर.. मसलकर.. बिना लंड के अपनी चूतों की आग को शांत करने के निरर्थक प्रयत्न कर रहे थे। रूखी के भोंसड़े में चार उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए शीला ने कमरे में अंदर नजर डाली.. रूखी की सास.. अपने पति के लंड पर सवार होकर कूद रही थी.. ससुर ने उसकी कमर पकड़कर उसे संतुलित कर रखा था.. और सास गांड उछाल उछाल कर जबरदस्त धक्के लगा रही थी.. काफी जद्दोजहत के आड़ चारों झड़ने में कामयाब हो गए।

जैसे ही वह बूढ़ी सास अपना रस झड़वाकर लंड से नीचे उतरी.. शीला और रूखी दोनों को जबड़े आश्चर्य से लटक गए.. बाप रे!! ससुर का विकराल लोडा वीर्य से लसलसित होकर अपनी बीवी की चुत से निकलकर ऐसे झटके खा रहा था जैसे को योद्धा युद्ध लड़ने के बाद हांफ रहा हो!!

"चल रूखी.. मैं अब निकलती हूँ.. अभी तेरी सास बाहर आएगी.. "

"ठीक है भाभी.. आप जाइए.. मैं बाद में आती हूँ आपके घर.. "रूखी ने कहा

शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।

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शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।

शीला सोच रही थी.. क्या काम होगा कविता को? तभी कविता खुद उसके घर पर आ पहुंची.. बहोत खुश लग रही थी कविता.. शीला जानती थी की बिना लंड से झटके खाए.. किसी स्त्री के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिल ही नहीं सकती..

"सच सच बता कविता.. कल पीयूष ने बराबार चोदा है ना तुझे?" शीला ने पूछा

"पीयूष ने नहीं.. मेरे प्यारे पिंटू ने.. ये सब मेरे पिंटू का ही कमाल है" कहते हुए कविता शीला से लिपट पड़ी

"अच्छा.. !! ये भला कब हुआ?? वो तो कल चला गया था मेरे घर से.. तुम दोनों मिले कब??" शीला ने आश्चर्यसह पूछा

"कल रात पीयूष अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने गया था.. मैंने पिंटू को फोन करके बुला तो लिया.. पर सवाल ये था की हम दोनों मिले कैसे!! रात को दस बजे पीयूष हमारी सोसायटी में आ चुका था.. उसने मुझे पीछे वाली गली में मिलने के लिए बुलाया.. पर कमबख्त मेरी सास.. देर तक जागती रहती है.. टीवी पर बकवास सीरियलों ने दिमाग खराब कर रखा है उनका.. बुढ़िया बस टीवी से चिपकी रहती है.. कैसे निकलती बाहर!!"

कविता सारा घटनाक्रम बता रही थी उस दौरान शीला ने उसे बेड पर बिठाया और उसका स्कर्ट घुटनों तक ऊपर करते हुए.. हाथ डालकर उसकी पेन्टी खींच निकाली.. कविता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और वह बोलती ही रही.. शीला की हरकतों से उसके पतले गोरे बदन में सुरसुरी सी होने लगी.. शीला ने कविता को हल्के से धक्का दिया और उसकी पीठ दीवार के साथ सट गई.. और दीवार के सहारे वह आधी लेटी हुई पोजीशन में आ गई.. शीला ने उसके घुटने मोड़कर पैर चौड़े किए.. कविता की बिना झांटों वाली चिकनी पूत्ती देखकर शीला एक पल के लिए ईर्ष्या से जल उठी.. सफाचट नाजुक मोगरे की कली जैसी कविता की जवान चुत के दोनों होंठ फड़फड़ाने लगे..

शीला ने झुककर कविता की पुच्ची की चूम लिया..

"आह्हहह भाभी.. " कविता कराह उठी

"तू बोलना जारी रख.. फिर किस तरह निकली घर से और कैसे मिले तेरे पिंटू से.. ?"

"ओह्ह भाभी.. क्या कहूँ!! मुझे आपकी याद आ गई.. मैं आपके घर आने के बहाने, छाता लेकर बाहर निकली.. और आपके घर के पीछे जो सुमसान गली है ना.. वहाँ पिंटू को बुला लिया.. हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. और उस गली में घर के बाहर को नहीं था.. काफी अंधेरा भी था.. वहीं बिजली के खंभे के पास पिंटू ने मुझे खड़े खड़े पीछे से चोद दिया..पर भाभी.. पिंटू अब पहले के मुकाबले काफी कुछ सीख चुका है.. पहले तो उस अनाड़ी को मेरे छेद के अंदर घुसाना भी ठीक से नहीं आता था.. पर पता नहीं कैसे.. कल रात को उसने किसी अनुभवी मर्द की तरह मेरी ठुकाई की.. पहले पहले तो उसे चुत चाटना भी नहीं आता था..और चुदाई भी ठीक से नहीं कर पाता था.. पर कल रात को उसने मुझे जो चोदा है.. आहाहाहा.. मेरी चुत में दर्द होने लगा तब तक धक्के लगाए उसने.. और जमीन पर बैठकर मेरी चुत भी चाटी.. कुछ समझ में नहीं आ रहा.. मेरा अनाड़ी पिंटू ऑलराउंडर कैसे बन गया?? कहीं किसी बाजारू औरत के पास तो नहीं गया होगा ना!! कुछ तो गड़बड़ है!!"

शीला ने कविता की बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुसकुराते हुए कविता की टाइट चुत पर अपना मुंह चिपका दिया.. कविता ने "ओह्ह.. ओह्ह" सिसकते हुए अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए और शीला के सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया.. उसकी उत्तेजित चुत में शीला ने दो उँगलियाँ घुसेड़ कर अंदर बाहर करते हुए चाटना शुरू कर दिया.. इस दोहरे हमले के आगे कविता निसहाय थी.. उसे याद आया की पिंटू ने भी पिछली रात बिल्कुल इसी तरह किया था.. पर शीला ने कविता के दिमाग को ज्यादा सोचने की स्थिति में ही नहीं रहने दिया.. अद्भुत, कामुक और शृंगारिक तरीके से हो रही चुत चटाई ने कविता के दिमाग पर ताला लगा दिया..

अपने अमूल्य खजाने को शीला के हाथों में सौंपकर कविता अपने नागपुरी संतरों जैसे उरोजों को मसलकर अपनी आग को बुझाने के निरर्थक प्रयत्न करने लगी.. पर शीला की उंगलियों में असली लंड जैसा मज़ा कहाँ से मिलता !!! कल रात को पिंटू ने बिजली का खंभा पकड़ाकर जिस तरह उसे पीछे से धमाधम शॉट मारे थे उसके झटके कविता की चुत में अब तक लग रहे थे।

"आह्हह भाभी.. अब ओर नहीं रहा जाता मुझसे.. कुछ कीजिए प्लीज.. " शीला ने कविता की पूत्ती को चाटते हुए अपनी उंगलियों को तेजी से अंदर बाहर करना शुरू किया.. कविता के सुंदर स्तनों को देखकर शीला भी गरमा गई.. उसने कविता की चुत से अपनी उँगलियाँ निकाली.. और अपने सारे कपड़े उतार दिए.. कविता तो इस नग्न रूप के ताजमहल की सुंदरता देखकर चकाचौंध हो गई..

"हाय भाभी.. कितना गदराया शरीर है आपका !! ये गोरी गोरी चिकनी मांसल जांघें.. और मदमस्त मोटी गांड.. में लड़की होकर भी ललचा गई देखके.. तो मर्दों की क्या हालत होती होगी.. !!" कहते हुए कविता ने शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के साथ खेलना शुरू कर दिया..

शीला ने कविता का मुंह अपने बबलों पर दबा दिया.. गुलाबी रंग की निप्पल को थोड़ी देर चूसते रहने के बाद कविता ने कहा "अगर इसमें दूध आता होता तो कितना मज़ा आता!!! पीयूष कई बार मुझसे कहता है.. उसे दूध भरे मम्मे चूसने की बड़ी इच्छा है.. और हाँ भाभी.. आपसे एक और बात भी पुछनी है"

शीला: "हाँ पूछ ना"

कविता: "कैसे कहूँ.. अमममम.. मेरे पति पीयूष को एक बार आपके बॉल दबाने है.. उसे बहोत पसंद है आपके.. रोज रात को मेरी छाती दबाते हुए वो आपका ही नाम लेता है.. "

सुनते ही शीला के भोसड़े में दस्तक सी लगने लगी.. एक नए लंड की संभावना नजर आते ही उसकी चुत छटपटाने लगी..

"बेशरम.. कैसी गंदी गंदी बातें कर रही है तू कविता.. !! बोलने से पहले सोचती भी नहीं तू.. कुछ भी बोल रही है.. पीयूष को तो में कितने आदर की नजर से देखती हूँ.. वो कभी ऐसी बात नहीं कर सकता!!"

"सच बोल रही हूँ भाभी..मेरे तो छोटे छोटे है.. पीयूष को बड़े बबले पसंद है.. जब देखों तब बड़ी छातियों वाली औरतों की तारीफ करता रहता है.. और जब मौका मिले तब उन्हे ताड़ता रहता है.. "

सुनते ही शीला का भोसड़ा पानी पानी हो गया.. उसने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके रसभरे होंठों को एक लंबा चुंबान किया

"अगर तेरा पति मेरे बबले दबाएगा तो तुझे कोई एतराज नहीं होगा ना?? बोलने तक तो बात ठीक है पर कोई भी पत्नी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती.. पर तू ध्यान रखना कविता.. कहीं तेरा पति पीयूष किसी गदराई छाती वाली के साथ उलझ ना जाएँ.. नहीं तो तेरा सुखी संसार तहस नहस हो जाएगा.. इन मर्दों का और उनके लोडों का कोई भरोसा नहीं.." शीला ने कहा

ये सुनकर कविता बॉखला गई..

शीला की चुत में शकुनि का दिमाग था.. नई संभावना जागृत होते ही उसकी चुत और दिमाग दोनों पासे फेंकने लगे

कविता की क्लिटोरिस को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़कर शीला ने ऐसा दबाया की कविता अपनी कमर उठाते हुए उछल पड़ी.. और बिस्तर पर पटक गई..

"हाईईई भाभी.. मर गई.. आहहहह.. निकल गया मेरा.. !! क्या किया आपने.. कहाँ छु लिया था.. !! मुझे तो मज़ा आ गया भाभी.. ईशशश"

शीला दो घड़ी के लिए थम गई.. जब तक की कविता की सांसें नियंत्रित न हो गई फिर उसने कविता से पूछा

"वैसे पीयूष देखने में तो बड़ा हेंडसम है.. !!"

"हाँ, वो तो है.. " कविता ने जवाब दिया

शीला: "तो तुझे पिंटू से चुदवाना ज्यादा पसंद है या अपने पति पीयूष से??"

कविता: "सच कहूँ भाभी.. तो मुझे पिंटू से चुदना ज्यादा पसंद है.. पिंटू एकदम मस्त है.. और मेरा बचपन का प्रेमी है.. इसलिए उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है मुझे.. "

शीला: "ठीक है.. में तुझे एक रास्ता दिखाती हूँ.. तुझे बिल्कुल वैसे ही करना है.. देख.. वैसे मुझे पीयूष से अपने बबले दबवाने का कोई शौक नहीं है.. पर बड़ी छातियों के चक्कर में कहीं वो किसी रंडी से ना उलझ जाएँ ये भी हमें देखना पड़ेगा.. नहीं तो तेरा संसार तबाह हो जाएगा.. समझी!!"

कविता: "ठीक है भाभी.. आप जैसा कहेंगी वैसा ही में करूंगी.. "

शीला: "एक काम कर.. आज गुरुवार है.. कल शुक्रवार को कोई न कोई नया मूवी आएगा.. पीयूष को मूवी देखना पसंद है क्या?"

कविता: "अरे भाभी.. अभी दो दिन पहले ही वो कह रहा था.. की कोई नई मूवी देखने चलते है"

शीला: "वाह.. फिर तो हमारा काम आसान हो गया.. आज रात को तू पीयूष को बोलना की शीला भाभी को मूवी देखने जाना है पर किसी की कंपनी ढूंढ रही है.. तो क्या हम साथ चलें उनके साथ मूवी देखने के लिए..!! और कहना की मुझे शीला भाभी को जल्दी जवाब देना है" कविता को कुछ समझ में नहीं आया पर वह सुनती रही

शीला: "अगर वो आनाकानी करे तो उसे कहना की शायद भीड़ में उसे शीला भाभी के स्तनों को छूने का मौका मिल जाएँ.. ऐसे लालच देगी तो वो तुरंत तैयार हो जाएगा.. समझी..!! में मूवी की चार टिकट बुक करवा देती हूँ.. रात के शो की.. !!"

कविता: "चार टिकट क्यों भाभी??" हम तो सिर्फ तीन ही है ना!!"

शीला: "अरे पगली.. जब पीयूष मेरे मम्मे मसल रहा होगा तब तेरे इन संतरों का रस चुसनेवाला भी कोई चाहिए ना !! तू फोन करके पिंटू को बुलाया लेना.. वहाँ मल्टीप्लेक्स पर हम पीयूष की नजर बचाकर, पिंटू को टिकट थमा देंगे.. और बता देंगे की हॉल में जब पूरा अंधेरा हो तब वो चुपके से आकार तेरे बगल की सीट पर बैठ जाएँ.. तू अपने यार के संग मजे मारना तब तक में तेरे पति का खयाल रखूंगी.. "

शीला की यह योजना सुनकर कविता उछल पड़ी.. प्रेमी को मिलने के लिए वो अपने पति को शीला के पास गिरवी रखने को तैयार थी.. उसकी आँखों में ऐसी चमक आ गई जैसे अभी अभी पिंटू से चुदकर आई हो..

"पर भाभी.. पीयूष को पता चल गया तो?? वो पिंटू को मेरे बॉल मसलते देख लेगा तो क्या करेंगे??" कवर के ऊपर से शॉट खेलने का प्रयास करती शीला के सामने कविता ने एल.बी.डब्ल्यू की अपील की..

जवाब में शीला ने अपने दोनों मस्त स्तनों को आपस में दबा दिया.. और उन दोनों के बीच की दरार दिखाते हुए बोली

"कविता.. इस खाई में आजतक जो भी गिरा है ना.. वो कभी वापिस नहीं लौटा.. तेरे पीयूष को भी इस खाई में ऐसे धकेल दूँगी.. की मूवी के तीन घंटों के दौरान पीयूष ये भी भूल जाएगा की वो शादीशुदा है.. तू चिंता मत कर.. और देख.. प्रेमी के संग रंगरेलियाँ मनानी हो तो रिस्क लेना पड़ेगा.. हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो प्रेमी और पति, दोनों को गंवा बैठेगी.. "

कप्तान द्वारा टीम से निकाले जाने की धमकी मिलने के बाद प्लेयर की जो हालत होती है.. वही हालत कविता की हो गई..

कविता ने मन में ठान ली.. "कुछ भी हो जाए भाभी.. इस योजना को हम सफल बनाके ही रहेंगे.. आप बस टिकट का बंदोबस्त कीजिए.. बाकी काम काम मुझपर छोड़ दीजिए"

शीला: "तू टिकट की चिंता मत कर.. पहेले पीयूष को राजी कर.. और पिंटू को मेसेज पर पूरा प्लान बता देना.. और उस चोदू को बोलना की मोबाइल हाथ में ही रखे.. आज कल के लौंडे जीन्स की पिछली पॉकेट में फोन रखकर भूल जाते है.. मल्टीप्लेक्स पर ऐसा कुछ हुआ तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा.. उसे कहना की लेडिज टॉइलेट के पास हमारा इंतज़ार करें.. समझ गई ना तू??"

कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझ दूँगी.. और पीयूष को भी माना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..

शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था

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कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझा दूँगी.. और पीयूष को भी मना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..

शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था

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सुबह ४:४५ को रसिक दूध देने आया.. शीला ने दरवाजा खोला और आजूबाजू नजर डालकर देखा.. चारों तरफ घोर अंधकार था..

शीला ने रसिक की धोती के लंगोट के ऊपर से ही उसके लंड को सहलाते हुए पूछा

"मुझसे नाराज है क्या रसिक??"

"नहीं नहीं भाभी.. " कहते हुए रसिक ने अपनी लंगोट को हटाकर काले अजगर जैसा अर्ध जागृत लंड बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दिया

"बाप रे बाप.. कितना बड़ा है ये रसिक.. " कहते हुए शीला उसके काले लंड को ऐसे आगे पीछे करने लगी जैसे भेस के काले थन को दुह रही हो.. काफी भारी था रसिक का लंड!! दरवाजे पर खड़े खड़े ही शीला ने उसे बड़े ही उत्तेजक ढंग से सहलाया.. परीकथा के राजकुमार की तरह रसिक का लंड पलक झपकाते है बड़ा हो गया..

रसिक ने गाउन के ऊपर से ही शीला के थनों को मसलते हुए उसे अपनी ओर खींच लिया.. शीला रसिक से ऐसे चिपक गई जैसे चुंबक से लोहा चिपक जाता है.. अपने कोमल हाथों से रसिक के सम्पूर्ण उत्तेजित.. मर्दानगी से भरपूर लोड़े की चमड़ी को थोड़ा सा पीछे करते ही.. लाल एल.ई.डी बल्ब की तरह रसिक का टमाटर जैसा बड़ा सुपाड़ा टिमटिमा उठा..

"आह रसिक.. भोसड़ी के.. कितना मोटा है तेरा ये.. " कहते ही शीला घुटनों के बल बैठ गई.. और लावारस से भरपूर उस विकराल लंड को थोड़ा थोड़ा करके पूरा मुंह में ले लिया.. रसिक ऐसे स्थिर हो गया जैसे समाधि में खड़ा हो.. उसका पूरा शरीर तंबूरे के तार की तरह तंग हो गया.. शीला रसिक के लोड़े पर इस तरह टूट पड़ी जैसे वो उससे आखिरी बार मिल रही हो.. !! सबक-सबक की आवाज़ें करते हुए वह रसिक का लंड चूसने लगी.. पूरा लंड मुंह से बाहर निकालकर जब वापिस अपने मुंह मे अंदर लेती तब बेबस रसिक अपनी कमर से हल्का सा धक्का देकर शीला को जवाब देने की निरर्थक कोशिश करता..

लस्सेदार वीर्य से भरे हुए बड़े बड़े अंडकोशों को सहलाते हुए शीला ने मुख-मैथुन जारी रखा.. उसने अंदाजा लगाया की रसिक के टट्टों में कम से कम आधे कप जितना वीर्य भरा होगा.. रसिक के अमरूद जीतने बड़े आँड़ों को हथेली में भरते हुए शीला उनका वज़न नाप रही थी.. रसिक अब छटपटाने लगा था..

"ओह्ह भाभी.. !!" शीला ने एक पल के लिए उसका लंड मुंह से बाहर निकाला.. थोड़ी देर के लिए रुकी.. और एक गहरी सांस लेकर रसिक की बालों वाली जांघों को चाटने लगी.. अपनी लार से उसने रसिक की दायें ओर की जांघ को गीला कर दिया.. उस दौरान शीला की मुठ्ठी रसिक के लंड पर लगातार चल रही थी.. इस हलचल से शीला के दोनों अमृतकुंभ रसिक के घुटनों से ऐसे टकरा रहे थे जैसे समंदर की लहरें किनारे पर पड़े पत्थर से टकरा रही हो..

थोड़ा सा और झुककर शीला ने रसिक को अंडकोशों को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू किया.. शीला की इस हरकत ने रसिक को अचंभित कर दिया.. शीला उसके आँड ऐसे चूस रही थी जैसे बर्फ का गोला चूस रही हो.. शीला के मुख की गर्मी से रसिक का लंड और सख्त हो गया.. शीला अपनी जीभ से रसिक की पिंग-पोंग गेंदों को हल्के से दबा रही थी.. जैसे अंदर भरे वीर्य को बाहर आने के लिए उकसा रही हो.. शीला के हाथ रसिक के पीछे पहुँच गए और उसके मर्दाना कूल्हों को सहलाने लगी..

थोड़ी देर रसिक के गोटों को चूसने के बाद शीला ने उन्हे जमानत पर छोड़ दिया और उसके लंड को फिरसे अपने मुंह की हिरासत में ले लिया.. लंड की सख्ती का स्पर्श अपने मुंह में होते ही शीला ज्यादा उत्तेजित हो कर रसिक के कूल्हों से खेलने लगी.. जब स्त्री पुरुष के कूल्हों से खिलवाड़ करती है तब मर्द को बड़ा अच्छा लगता है.. और फिर वह उत्तेजित मर्द, उस स्त्री के सारे अरमान पूरे कर देता है!!

रसिक का लंड शीला के मुंह में ऐसे ठुमकने लगा जैसे मुजरा कर रहा हो.. दो तीन ऐसे ही ठुमके लगाकर उसके सुपाड़े के छेद से गरम गरम वीर्य की पिचकारी निकल गई.. शीला के लिए वीर्य का स्वाद नया नहीं था.. उसने काफी बार अपने पति मदन के लंड का रस चखा हुआ था.. बिना किसी हिचकिचाहट के शीला ने रसिक के उपजाऊ रस की आखिरी बूंद तक चूस ली.. इतना ही नहीं.. रसिक के आँड का सारा माल निगल लेने के बाद भी शीला उसके लंड के लाल सुपाड़े को मुंह में दबाकर ऐसे चूस रही थी जैसे स्ट्रॉ से लस्सी पी रही हो.. बड़ी ही धीरज से वो तब तक चूसती रही जब तक की रसिक के लंड का दिवाला नहीं निकल गया..

इस अद्भुत मुख-मैथुन के बाद अपने होंठों को पोंछते हुए शीला खड़ी हुई.. बिखरे हुए बालों में उत्तेजित शीला को देखकर एक पल के लिए रसिक डर सा गया.. कामातुर स्त्री कभी कभी शृंगारिक होने के साथ साथ आक्रामक भी बन जाती है.. शीला ने रसिक के बालों को मजबूती से पकड़कर नीचे बैठा दिया.. और अपना एक पैर रसिक के कंधे पर रख दिया.. हवस के कारण शीला ने अब थोड़ा सा हिंसक रूप धारण कर लिया था.. दूसरी तरफ बेचारे रसिक का तो काम तमाम हो चुका था इसलिए शीला की हरकतों का विरोध करने की उसमे ताकत ही नहीं बची थी.. पर फिर भी वो समझ गया की शीला उससे क्या करवाना चाहती थी..

शीला ने अपना गाउन ऊपर किया.. और उसके कामातुर शरीर में हो रहे भूकंप का केंद्र ढूंढ निकाला.. और भूकंप के कारणों का अभ्यास करने लगी..

उसी दौरान बगल के घर (बगल का घर मतलब.. अनुमौसी का घर) का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. शीला ने तुरंत अपना गाउन नीचे किया और रसिक को उसके अंदर छुपा दिया.. दरवाजे खुलते ही अनुमौसी बाहर निकली.. दोनों के बीच ४ फिट की दीवार थी और काफी अंधेरा भी था इसलिए शीला के नीचे का द्रश्य अनुमौसी को नजर नहीं आ रहा था.. पर ये अनुमौसी भी पक्की खिलाड़ी थी.. वह दरवाजे से चलते चलते शीला के घर की दीवार की ओर आई .. जिसकी दूसरी तरफ शीला अपने गाउन के अंदर रसिक को छुपाकर खड़ी थी..

"कैसी हो शीला?? " अनुमौसी की आवाज ने शीला को झकझोर दिया

"एकदम बढ़िया हूँ मौसी" शीला ने भी अपने झूठ का व्यापार चलने दिया

"अभी तक वो कमबख्त रसिक नहीं आया दूध लेकर.. दूध देर से आता है तो चाय भी देर से ही पीने मिलती है.. और चाय टाइम पर न मिले तो पूरा दिन खराब हो जाता है" अनुमौसी ने रसिक की शिकायत करते हुए कहा

"हाँ मौसी.. दिन ब दिन रसिक बिगड़ता ही जा रहा है.. अब तो दूध भी पहले जैसा नहीं देता.. मुझे तो लगता है की कमीना पानी मिलाता होगा.. " कहते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच रसिक को दबा दिया

अपने बारे में चल रही इस बातचीत को सुनकर रसिक को बड़ा गुस्सा आया.. उसने शीला की क्लिटोरिस पर हल्के से काट लिया

"ऊईई माँ.. "शीला चीख पड़ी..

अनुमौसी: "क्या हुआ तुझे शीला?? तू ठीक तो है ना?"

"कुछ नहीं मौसी.. कुछ दिन से पौधों में चींटियाँ बढ़ गई है.. लगता है चींटी ने ही काट लिया.. मौसी। में भी रसिक का इंतज़ार करते हुए खड़ी हूँ.. अब आता ही होगा.. " अनुमौसी का पीछा छुड़ाने के लिए शीला ने कहा

अनुमौसी और शीला की बातें चल रही थी उस दौरान रसिक ने शीला की चुत की फांक को फैलाकर उसमें जीभ फेरना शुरू कर दिया था। शीला ने अपने गाउन के अंदर रसिक को ऐसे छुपाकर रखा था मानों खुले में स्तनपान करवा रही कोई स्त्री पल्लू में अपनी गरिमा को छुपाये बैठी हो।

"ये कमबख्त मौसी जाएँ तो में रसिक को गाउन से बाहर निकालूँ.. " शीला फंस गई थी.. और रसिक चटखारे लगाते हुए उसके भोसड़े को चाट रहा था.. मौसी से बात करते हुए शीला गाउन के ऊपर से ही रसिक का सिर सहला रही थी..

"ओह.. मैंने पानी गरम करने के लिए रखा.. और गैस चालू करना तो भूल ही गई.. " कहते हुए अनुमौसी अपने दरवाजे के अंदर गई.. और तभी शीला ने रसिक के बालों को खींचकर अपने गाउन से बाहर निकाला.. और उसे बाहों में लेकर चूम लिया..

शीला रसिक के कानों में फुसफुसाई.. "जल्दी भाग रसिक.. कहीं वो बुढ़िया फिर से टपक पड़ी तो मेरी इज्जत की नीलामी कर देगी.. और तेरा भी सोसायटी में घुसना बंद करवा देगी" रसिक तुरंत अपना मुंह पूछकर धोती ठीक करने लगा.. और कंपाउंड का दरवाजा खोलकर चलते चलते गली के नुक्कड़ पर पहुँच गया जहां पर उसकी साइकल रखी हुई थी.. शीला भी घर के अंदर चली गई..

इस सारे द्रश्य को किचन की खिड़की से छुपकर देखकर अनुमौसी मुस्कुरा रही थी..

शीला ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर आकार बैठी ही थी की तभी उसे अनुमौसी की आवाज सुनाई दी.. "अरे शीला.. रसिक आ गया है दूध लेकर.. !!"

"अभी आई मौसी.. " शीला पतीली लेकर बाहर आई और दूध लेकर तुरंत अंदर चली गई.. उसने मस्त मसालेदार चाय बनाई और नाश्ते के साथ चाय की चुस्की लगाते हुए अपनी चुत को सहलाने लगी.. रसिक ने आज जबरदस्त चटाई करते हुए उसकी चुत को शांत कर दिया था.. शीला बहुत खुश थी आज..

नहाकर उसने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी अपने बरामदे में लगे झूले पर बैठकर सब्जी काटने लगी.. लगभग ११ बजे के आसपास कविता उसके घर के कंपाउंड में झाड़ू लगाने आई.. पतली सी कविता के शरीर में काफी चपलता थी,.. उसकी स्फूर्ति को देखकर शीला सोचने लगी... "कितनी नाजुक और छुईमुई सी है कविता.. " उकड़ूँ बैठकर झाड़ू लगा रही कविता का स्कर्ट घुटनों के ऊपर तक चढ़ गया था.. और उसकी दूध जैसी गोरी जांघें बेहद आकर्षक लग रही थी.. कविता की पतली कमर देखकर शीला की आहह निकल गई.. वाकई में पीयूष को कविता के रूप में जेकपोट मिल गया था.. वैसे पीयूष भी काफी हेंडसम था.. ज्यादा गोरा तो नहीं था अपर ठीकठाक दिखता था.. हाँ उसके कंधे थोड़े और चौड़े होते तो ज्यादा आकर्षक लगता.. मर्द के कंधे ऐसे चौड़े होने चाहिए की जब वो स्त्री को आगोश में भरे तब उस स्त्री को कंधों पर सिर रखकर जनम जनम तक उसी अवस्था में रहने की इच्छा हो .. जीवा और रसिक के कंधों जैसे..

रसिक की तो छाती भी एकदम चौड़ी थी.. गाँव के रहन-सहन और शुद्ध आहार के कारण वो दोनों ऐसे मजबूत थे.. इन शहरी जवानों में वो वाली बात नजर ही नहीं आती.. जीवा का तो जिस्म भी ऐसा भारी था की ऊपर चढ़कर जब शॉट लगाएं तो नीचे लेटी औरत को पूरे ब्रह्मांड के दर्शन एक ही पल में हो जाएँ.. गजब का था जीवा.. उस रात उसने जिस तरह चुदाई की थी वह बड़ी ही यादगार थी.. उसके विकराल लंड के भयानक धक्कों से शीला की बच्चेदानी तक हिल गई थी.. और फिर रघु ने जिस तरह उसकी गांड मारी थी.. आहहाहाहाहा.. मज़ा ही आ गया था.. शीला के दिमाग में ये सारे फितूर चल रहे थे

झुककर झाड़ू लगाती हुई कविता के टॉप से उसके दोनों संतरे नजर आ रहे थे शीला को.. सुबह का वक्त था इसलिए उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी.. कविता के गुलाबी चूचुक इतने प्यारे लग रहे थे की उन्हे देखने में शीला सब्जी काटना भी भूल गई.. झुकी हुई कविता के स्तन के बीच की दरार देखने में इतनी सुंदर लग रही थी की क्या कहें!!! कविता के बिखरे हुए बाल.. झुकने के कारण पीछे से ऊपर चढ़ जाते टॉप के कारण दिख रही उसकी गोरी खुली कमर.. अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर घर के अंदर चली गई कविता!! और इसी के साथ शीला की समाधि भी टूट गई..

शीला घर के अंदर आई और सब्जी को कढ़ाई में डालकर तड़का लगाया.. और रोटी के लिए आटा गूँदने लगी.. आटा गूँदते गूँदते उसे रूखी के दूधभरे खरबूजों की याद आ गई.. रूखी और उसके ससुर के बीच जो कुछ भी हुआ था.. शीला की आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगा.. अच्छा हुआ ये रसिक हाथ लग गया.. वरना अभी भी चुत खुजाते हुए तड़प रही होती!! एक मर्द के स्पर्श और उसके सख्त लंड के लिए वो कितना तड़प रही थी!! जिस तरह मैं अपने पति की गैरमौजूदगी में.. मर्द के स्पर्श, उसके लिंग और उसकी गर्माहट के लिए तड़प रही थी.. वैसे ही कई मर्द अपनी पत्नी की गैरहाजरी में चूचियाँ और चुत के लिए तड़प रहे होंगे.. शीला के दिमाग में ये सारे विचार अविरत चल रहे थे

आटा गूँदकर तैयार हो गया था.. शीला ने रोटी बनाई और प्लेट में खाना लेकर टीवी के सामने बैठ गई.. टीवी पर कोई बाबाजी प्रवचन दे रहे थे.. और सारी महिलायें उन्हे एकटक होकर सुन रही थी.. शीला को मज़ा नहीं आया.. उसने चैनल बदलकर देखा.. एक चैनल पर ठीकठाक अंग्रेजी पिक्चर चल रही थी.. देखते देखते उसने खाना खतम किया और बिस्तर पर लेट गई।

चुदाई के सुकून और काम की थकान के बाद हमेशा अच्छी नींद आती है.. यही सोचते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच तकिया दबाया.. और सोने का प्रयास करने लगी। जब तक तकिये को अपने भोसड़े से सटाकर ना रखे.. तब तक उसे नींद ही नहीं आती थी। जैसे छोटे बच्चों को अंगूठा चूसते हुए सोने की आदत होती है वैसे ही शीला को चुत के पास तकिये के दबाव से ही नींद आती थी।

सोते सोते कब शाम के पाँच बज गए.. पता ही नहीं चला.. कविता ने जब दरवाजा खटखटाया तब शीला की नींद खुली

कविता: "भाभी.. पाँच बज गए.. आप अब तक तैयार नहीं हुई? ६ बजे पहुंचना है.. पीयूष तो तैयार भी हो गया.. जल्दी कीजिए"

शीला: "मेरी चिंता मत कर.. मुझे तैयार होने में देर नहीं लगेगी.. और मेरी बात ध्यान से सुन" कविता का हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर खींच लिया शीला ने "देख.. आज तू ब्रा या पेन्टी मत पहनना.. और अपने ढीले इलास्टिक वाली स्कर्ट पहनना.. " कविता को ज्ञान देते हुए शीला ने कहा

"क्यों भाभी??" कविता को समझ में नहीं आया

शीला: "बिल्कुल अनाड़ी है तू कविता.. मूवी के दौरान पिंटू जब तेरे टॉप में हाथ डाले तब सीधे तेरी चुची हाथ में आनी चाहिए.. ब्रा के चक्कर में मज़ा किरकिरा हो जाएगा उसका.. और स्कर्ट में हाथ डालेगा तब पेन्टी बीच में आएगी तो कैसे मज़ा आएगा!! बेचारे को ऐसा लगेगा की किला फतेह कर लिया पर खजाने की चाबी नहीं मिली.. "

कविता: "वाह भाभी.. आपका दिमाग तो बड़ा ही तेज चलता है.." कविता ने ब्लाउस के ऊपर से ही शीला के खजाने को मसलते हुए कहा "मैं चलती हूँ भाभी.. और हाँ.. आप भी ब्रा-पेन्टी मत पहनना.. वरना पीयूष को मज़ा नहीं आएगा" आँख मारते हुए कविता ने कहा और चली गई

चंचल, खिलखिलाती, सुंदर झरने जैसी कविता जब जा रहे थे तब उसके मटकते कूल्हे तक लटक रही चोटी को देखती रही शीला!!!

शीला ने अलमारी खोली और सोचने लगी की क्या पहनूँ !! काफी सारे कपड़े रिजेक्ट करने के बाद उसने मदन की भिजवाई हुई सिल्क की साड़ी और ब्लाउस पहन लिया.. आईने में अपने स्तनों को थोड़ा सा एडजस्ट करते हुए सोचने लगी.. कुदरत ने क्या जादू छुपाया है उसके स्तनों में!! सारे मर्द देखते ही रहते है हमेशा.. ब्लाउस के हुक को ऊपर से बंद किया तो उसके स्तन नीचे से बाहर निकल गए.. बड़ी मुश्किल से उन दोनों लफंगों को ब्लाउस के अंदर दबाकर उसने हुक बंद किए.. सिल्क के ब्लाउस और साड़ी में शीला किसी अप्सरा जितनी सुंदर लग रही थी..
 
कविता का फिरसे फोन आ गया था। शीला घर को ताला लगा रही थी तभी उसे पीयूष की आवाज सुनाई दी "क्या लग रही है??" शीला समझ गई की पीयूष कविता से उसके बारे में ही कह रहा था

पीयूष नुक्कड़ से ऑटो ले आया.. और तीनों रिक्शा में बैठ गए.. ट्राफिक को चीरते हुए, गड्ढों पर कूदते फाँदते रिक्शा आगे बढ़ने लगी.. शीला और पीयूष के बीच में कविता बैठी हुई थी। कविता की जांघ से अपनी जांघ दबते ही शीला रोमांचित हो गई.. कविता को एक तरफ शीला और दूसरी तरफ पीयूष का स्पर्श मिलते ही वह भी सिहर उठी.. मरून कलर के टॉप और काले स्कर्ट में कविता बेहद सुंदर लग रही थी। शीला तिरछी निगाहों से पीयूष को देखती रही और आगे की योजना बनाने में जुट गई।

लगभग २० मिनट के सफर के बाद वह तीनों मल्टीप्लेक्स पर पहुँच गए.. पीयूष ऑटो वाले को पैसे दे रहा था तब तक शीला ने बुकिंग काउन्टर से एडवांस बुकिंग करवाई हुई चार टिकट ले ली.. शीला ने कविता को वहीं काउन्टर पर रुकने को कहा और खुद लेडिज टॉइलेट की ओर चली गई.. पिंटू कहीं नजार नहीं आ रहा था.. शीला को गुस्सा आया.. वह समय की बड़ी पाबंद थी.. कोई देर से आए और उससे इंतज़ार करवाए वह उसे बिल्कुल पसंद नहीं था..

"कहाँ मर गया ये हरामखोर!! में यहाँ कितने सेटिंग कर रही हूँ और इसे तो कुछ पड़ी ही नहीं है!! साला चोदने और मजे मारने भी जो वक्त पर ना पहुँच पाएं उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है!!" शीला का पारा चढ़ता जा रहा था

"कैसी हो शीला भाभी?" पीछे से पिंटू की आवाज आई

"कब से तेरा इंतज़ार कर रही हूँ.. कहाँ मरवा रहा था तू? " शीला बरस पड़ी

"मैं तो टाइम पर ही आया हूँ.. आप ही जल्दी आ गए तो मैं क्या करू!!.." पिंटू ने सफाई देते हुए कहा

"ठीक है.. ठीक है.. ज्यादा होशियारी मत कर.. ये पकड़ टिकट.. और मूवी शुरू हो जाए उसके बाद अंधेरा होने पर ही अंदर आना... समझा..!!"

"भाभी.. आज तो आप बड़ी कातिल लग रही हो.. लगे हाथों आपके भी दबा दूँ तो दिक्कत तो नहीं होगी ना!!"

"मैं सेटिंग करती हूँ उसका भी.. मैं चलती हु अब.. वो दोनों मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे"

"ठीक है भाभी"

शीला तेजी से चलते हुए कविता और पीयूष के पास जा पहुंची।

"चलो कुछ खाते है" कविता ने कहा

"हाँ.. अभी कुछ खा लेते है.. बाद में भीड़ हो जाएगी" तीनों मल्टीप्लेक्स के अंदर बने रेस्टोरेंट में पहुँच गए। शो शुरू होने में अभी देर थी..

पीयूष तो शीला के गुंबज जैसे स्तन देखकर पागल सो हो गया था.. पीयूष को यूं घूरते हुए देखकर शीला ने मुस्कुराकर अपने पल्लू को इस तरह एडजस्ट किया की जिससे उनके उभार आसानी से नजर आ सके.. पीयूष गरम गरम सांसें छोड़ रहा था

रेस्टोरेंट में खाने का ऑर्डर देने के बाद तीनों बातें करने लगे..

शीला: "पीयूष, कैसा चल रहा है तेरा काम?"

पीयूष: "ठीक ही चल रहा है भाभी.. वैसे कविता आपसे काफी घुलमिल गई है.. बहोत तारीफ करती है आपकी"

कविता: "मैं नहीं भाभी.. ये पीयूष ही हर वक्त आपकी तारीफ करता रहता है.." कहते हुए कविता पीयूष के सामने देखकर हंसने लगी

पीयूष बेचारा शर्म से लाल हो गया

शीला: "मेरी तारीफ?? किस बात की तारीफ करते हो पीयूष.. जरा मुझे भी तो कहो"

पीयूष: "वो.. कुछ नहीं भाभी.. ये कविता भी ऐसे ही मज़ाक कर रही है"

कविता: "अच्छा बच्चू.. उस दिन तो बोल रहे थे की शीला भाभी बहोत सुंदर है.. कितने मस्त लगते है.. झूठ क्यों बोल रहे हो!!"

पीयूष ने जवाब नहीं दिया और अपनी नजरें झुका ली

शीला: "पीयूष.. ऐसा तो क्या पसंद आ गया मुझ में??"

कविता के सामने कुछ भी बोलने से शर्मा रहा था पीयूष..

पीयूष: "अरे भाभी.. आप हो ही ऐसी.. आप भला किसे पसंद नहीं आएगी.. !!!"

इसी तरह की शरारती बातों में तीनों उलझे रहे.. खाना आ गया और तीनों ने खा भी लिया.. पीयूष बिल देने के लिए रुक तब तक शीला और कविता रेस्टोरेंट के बाहर निकल गए.. शीला कविता को और एक-दो बातें समझा रही थी तभी पीयूष उनके पास आया.. और तीनों चलते हुए हॉल के बाहर बेंच पर बैठ गए।

नया मूवी था इसलिए काफी भीड़ थी.. एक १९-२० साल की लड़की, ब्लू जीन्स और सफेद टाइट टीशर्ट में घूम रही थी.. स्किन टाइट टीशर्ट से नजर आ रहे उसके मध्यम कद के गोल मटोल स्तनों को पीयूष घूर रहा था.. हाईहिल के सेंडल पहन वह लड़की मटकते हुए.. अपने स्तनों को उछलते हुए वहाँ से चली गई

शीला ने धीमी आवाज में कहा "मस्त लग रही है ना.. !!"

पीयूष: "हाँ भाभी.. एकदम धांसू लड़की थी"

शीला: "कविता, तू टीशर्ट क्यों नहीं पहनती?? कितनी सुंदर लगेगी तू टीशर्ट में?"

कविता: "मेरी सास को पसंद नहीं है भाभी.. इसलिए नहीं पहनती.. मेरे मायके में तो मैं रोज टीशर्ट ही पहनती थी.. पर शादी के बाद सब छूट गया"

पीयूष: "फिगर भरा भरा हो तो ही टाइट टीशर्ट जचती है..!!" इशारा उसके छोटे कद के स्तनों पर था ये समझ गई कविता

कविता: "अब कुदरत ने जिसे जैसा फिगर दिया उसमें थोड़े ही कोई बदलाव किया जा सकता है!!" पीयूष की कही बात से कविता अपमानित महसूस करने लगी।

शीला ने बात को घुमाने के इरादे से कहा "पीयूष, फिगर बड़ा हो या पतला.. सुंदरता तो देखने वाले की आँखों में होनी चाहिए"

शीला के अति-विकसित स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष ने कहा "फिर भी भाभी.. फरक तो पड़ता ही है" पीयूष की आँखों में शीला के स्तनों को दबाने की इच्छा साफ झलक रही थी। जिस लाचारी से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में पड़े गुलाबजामुन को देखता है.. बिल्कुल वही दशा पीयूष की भी थी..

शीला: "जैसे जैसे स्त्री की उम्र बढ़ती है.. वैसे वैसे ही जिस्मानी बदलाव होते रहते है.. मैं जब कविता की उम्र की थी तब मेरा फिगर भी कविता जैसा ही था" पीयूष को दिलासा देते हुए शीला ने कहा

आग बुझाने के बजाए उसमें पेट्रोल डाल रही थी शीला.. !!

शीला: "कविता, तू एक बार टीशर्ट पहन कर तो देख.. बहोत जाचेगा तुझ पर.. और तेरा फिगर इतना छोटा भी नहीं है.. ३६ की साइज़ तो होगी ही तेरी.. !!"

कविता: "३४ की साइज़ है मेरी, भाभी"

कविता का मन अब पिंटू को मिलने व्याकुल हो रहा था इसलिए पीयूष का ध्यान शीला की ओर आकर्षित करने के लिए उसने कहा "आपकी साइज़ क्या है भाभी??"

शीला: "४२ की साइज़ है मेरी"

ये सुनते ही पीयूष ने गहरी सांस ली.. शीला झुककर अपना सेंडल ठीक करने लगी.. और उसके ब्लाउस के ऊपर से दिख रहे नज़ारे से पीयूष को पसीना आने लगा..

शीला: "पीयूष, तुझे कैसा फिगर पसंद है? पतला या मोटा?"

पीयूष शरमाते हुए नीचे देखने लगा.. शीला और कविता हंस पड़े..

कविता: "पीयूष को तो सब बड़ा बड़ा ही अच्छा लगता है भाभी.. इसे तो मेरी फिगर पसंद ही नहीं है" रूठने का अभिनय करते हुए कविता ने कहा

अभिनय का गुण स्त्रीओं में जन्मजात होता है.. पर पीयूष इसे परख नहीं पाया.. और सकपका गया

पीयूष: "अरे कविता.. किसने कहा तू मुझे पसंद नहीं है!! बहोत पसंद है तू मुझे"

कविता: "लेकिन अगर मेरा फिगर शीला भाभी जैसा होता तो ज्यादा पसंद आता.. हैं ना!!"

शीला के सिखाने के अनुसार कविता बहुत बढ़िया तरीके से आगे बढ़ रही थी.. शीला भी बड़ी शांति से पति-पत्नी की इस मीठी नोक-झोंक को सुन रही थी

कविता: "आप से एक बात करनी थी.. आप बुरा मत मानना"

शीला: "बोल ना.. क्या बात है?"

कविता: "ऐसे नहीं.. पहले आप मुझे वचन दीजिए की आप बुरा नहीं मानोगी.. और मेरे बारे में बुरा नहीं सोचोगी"

शीला: "प्रोमिस.. अब बता मुझे.. "

कविता: "कैसे कहूँ.. मुझे तो शर्म आती है"

पीयूष: "अब पूछ भी ले.. एकता कपूर की तरह सस्पेंस खड़ा मत कर!!"

शीला हंस पड़ी..

कविता: "अभी नहीं भाभी.. अंदर हॉल में मूवी शुरू होने के बाद में कहूँगी"

पीयूष: "क्यों? पिक्चर शुरू हो जाने के बाद पूछने में शर्म नहीं आएगी तुझे?"

कविता: "ऐसा नहीं है पीयूष.. हॉल में अंधेरा होगा तो पूछने में शर्म नहीं आएगी.. चेहरा ही नहीं दिखेगा फिर शर्म कैसी!!"

शीला: "अंधेरे में तो बहोत कुछ हो सकता है.. जो कुछ भी उजाले में नहीं हो सकता वो सब कुछ अंधेरे में हो सकता है"

ये सुनते ही पीयूष की आँखों में चमक आ गई

कविता: "पीयूष, अभी वो सफेद टीशर्ट वाली लड़की की सीट, गलती से तेरी बगल में आ गई तो तू उसका फिगर दबाने में.. बड़े फिगर का मज़ा लेना मत भूल जाना"

पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"

शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "

कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..

पीयूष: "चलिए भाभी.. चलते है अंदर"

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पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"

शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "

कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..

पीयूष: "चलिए भाभी.. चलते है अंदर"

तीनों अंदर जाने के लाइन में खड़े हो गए.. सब से आगे कविता.. पीछे पीयूष.. और उसके पीछे शीला.. भीड़ की धक्कामुक्की की आड़ में शीला ने जान बूझकर अपने बम्पर पीयूष के पीठ पर दबा दिए..

शीला भाभी के इस प्रथम हमले से ही पीयूष पिघल गया..

टिकट का नंबर देखकर अपनी लाइन में घुसते हुए पहले शीला भाभी, फिर उसकी बगल में कविता और अंत में पीयूष.. इस तरह बैठ गए। शीला और कविता के पसीने छूट गए.. अब पिंटू को कैसे कविता के साथ सेट करेंगे!! अब पिंटू के साथ पिक्चर देखने की और मजे करने की इच्छा मन में ही रह जाएगी, ये सोचकर कविता का दिल बैठ गया..

शीला का दिमाग काम पर लग गया.. अब क्या करू?? कविता ने शीला की कमर पर अपनी कुहनी मारकर इशारे से पूछा.. अब क्या करेंगे?

पीयूष तो मस्ती से स्क्रीन पर चल रही ऐड्वर्टाइज़्मन्ट की मॉडलों को ताड़ रहा था

शीला को यकीन था की इतना उत्तेजित करने के बाद पीयूष उसके बगल में ही बैठेगा.. और मौका मिलते ही पिंटू और कविता साथ में अपना कार्यक्रम कर पाएंगे.. पर ये तो सब उलटा हो गया!! कविता बार बार कुहनी मारकर शीला से पूछ रही थी की अब क्या किया जाएँ!!

शीला ने फुसफुसाकर कविता के कान में कहा "अब सिर्फ पिक्चर ही देखेंगे.. और तो कुछ हो नहीं सकता"

"भाभी प्लीज.. कुछ कीजिए ना!!" कविता की शक्ल रोने जैसी हो गई.. उसने देखा की पिंटू कब से उनकी सीटों की लाइन के इर्दगिर्द चक्कर काट रहा था

शीला और कविता दोनों निराश होकर अपनी सीट पर बैठे रहे.. कविता की नजर, कोने में खड़े पिंटू पर थी.. वो भी इशारे के इंतज़ार में था। शीला का दिमाग और भोसड़ा, इस समस्या का निराकरण ढूँढने के काम पर लगे हुए थे.. तभी शीला के दिमाग में चिंगारी हुई और उसकी चुत में ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. वो एकदम से खड़ी हो गई..

"बाप रे.. कितनी गर्मी लग रही है.. मैं यहाँ कोने में नहीं बैठूँगी.. पीयूष, तू इस तरफ बैठ जा.. "

पीयूष: "कोई बात नहीं भाभी.. आप यहाँ आ जाइए.. मैं वहाँ चला जाता हूँ" कहते ही पीयूष खड़ा हो गया और शीला की सीट पर बैठ गया..

कविता की जान में जान आई। पीयूष अब शीला और कविता के बीच में बैठ गया.. शीला का इशारा मिलते ही, पिंटू कविता की बगल वाली सीट पर चुपके से बैठ गया

जल बिन मछली की तरह तड़प रही कविता को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे वापिस पानी में डाल दिया गया हो.. उसका चेहरा खिल उठा

स्क्रीन पर पिक्चर शुरू हो गया.. पूरे हॉल में अंधेरा छा गया.. शीला ने धीर से अपने पैर से पीयूष के पैरों का स्पर्श किया.. पर पीयूष ने तुरंत अपना पैर हटा लिया.. पीयूष की इस सज्जनता पर शीला को बड़ा गुस्सा आया..

दोनों सीटों के बीच के हेंडल पर जहां पीयूष ने अपना हाथ रखा था.. वहीं पर शीला ने अपना हाथ रख दिया.. लेकिन पीयूष ने अपना हाथ दूर ले लिया।

पिक्चर शुरू हुए आधा घंटा बीत चुका था.. कविता और पिंटू की छेड़खानियाँ शुरू हो गई थी.. पर शीला और पीयूष के बीच कुछ नहीं हो पा रहा था.. शीला के क्रोध का पारा चढ़ रहा था.. बहेनचोद समझता क्या है ये अपने आप को!! बड़ा आया सीधा साहूकार.. !! लगता है अब मुझे अपने ब्रह्मास्त्र का उपयोग करना ही पड़ेगा.. शीला ने घुटने मोड़कर अपने दोनों पैर सीट के ऊपर ले लिए.. अब पीयूष की जांघ पर शीला का घुटना छु रहा था.. और पीयूष इस स्पर्श से अपने आप को दूर कर पाने की स्थिति में नहीं थी। समस्या ये हुई की शीला के दूसरी तरफ बैठे पुरुष की जांघ पर भी शीला का दूसरा घुटना छुने लगा.. वो आदमी अपनी उँगलियाँ शीला के घुटने पर फेरने लग गया.. हालांकि शीला का सर ध्यान पीयूष पर ही था.. वो देखना चाहती थी की पीयूष के लंड पर उसके स्पर्श का कोई असर हो रहा था या नहीं!! वो तो शीला नहीं जान पाई.. पर शीला के बगल में बैठे आदमी का टावर खड़ा हो गया..

शीला का लक्ष्य था पीयूष का लंड.. और पाँच मिनट बीत गई.. पर पीयूष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. शीला की जांघों पर वो बगल में बैठा हरामी हाथ फेरने लगा.. पर शीला को इस बात की परवाह नहीं थी.. और वो आदमी इस बात का पूरा फायदा उठा रहा था.. करीब ४५-४६ की उम्र के उस आदमी को तिरछी नजर से एक बार देख लिया..

शीला ने देखा की पीयूष तो कविता के बबलों पर हाथ फेर रहा था.. शीला को अपने स्तनों का अपमान होता दिखा.. रत्नागिरी आम मिल रहे है और ये बेवकूफ कच्चे आम के पीछे पड़ा था.. कुछ करना पड़ेगा

शीला ने अपने घाघरे के अंदर हाथ डाला और तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर अंदर बाहर करते ही अंदर से पानी का झरना फुट पड़ा.. अपनी गीली उंगलियों को उसने अपने खुले घुटने पर रगड़ दी.. गरम भोसड़े की खुशबू पूरे वातावरण में फैलने लगी..

चुत चाटने के अनुभवी पुरुष.. इस खुशबू को बखूबी पहचानते है.. पानी पी रहे चीते को शिकार की खुशबू आते ही जिस तरह वो गर्दन उठाकर आजू बाजू देखने लगता है वैसे ही.. आगे पीछे की सीट पर बैठे मर्द.. चारों तरफ देखते हुए इस खुशबू के स्त्रोत को ढूँढने लगे.. साथ ही साथ सोचने लगे की कही हॉल के अंदर ही किसी ने चुदाई तो शुरू नहीं कर दी!! थोड़ी देर यहाँ वहाँ देखने के बाद वापिस वो सारे मूवी देखने में व्यस्त हो गए।

दूसरी तरफ शीला की इस हरकत का असर.. तीन सीट छोड़कर बैठे पिंटू के लंड पर तुरंत होने लगी.. चुत की गंध परखने के लिए वो यहाँ वहाँ देखने लगा.. पीयूष कविता के अपने तरफ वाले स्तन को मसल रहा था.. शीला को अपनी चुत की गंध का थोड़ा सा असर होता दिखा.. अब उसने फिर से अपनी चुत में तीन उँगलियाँ डाली और गीली उंगलियों को अपनी काँखों के नीचे रगड़ दिया.. और वहीं हाथ उसने पीयूष के कंधे पर इस तरह रख दिया जैसे दो दोस्त रखते है.. इस तरह शीला की चुत-रस लगी काँख, पीयूष के चेहरे के बिल्कुल करीब आ गई.. और शीला का एक स्तन की गोलाई पीयूष की कोहनी से रगड़ खाने लगी..

इस दोहरे हमले के आगे पीयूष ने घुटने टेक दिए.. अपने पसंदीदा बड़े बड़े स्तनों का स्पर्श मिलते ही वो जैसे स्वर्ग की सैर पर निकल गया.. उसे शीला भाभी के कहे शब्द याद आ गए "जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है".. पीयूष को अपनी मूर्खता का अब एहसास हुआ.. शीला भाभी का इशारा वो तब समझ नहीं पाया था.. अपने स्तन दबाने के लिए वो उसे परोक्ष आमंत्रण दे रही थी..

पीयूष ने अपना हाथ कविता के स्तन से हटा लिया और अपना रुख शीला की ओर किया.. अपने हाथ मोड़कर वो चुपके से शीला के स्तनों को छुने लगा.. और तिरछी नजर से शीला भाभी की प्रतिक्रिया देखने लगा..

शीला से अब रहा नहीं गया.. अपना चेहरा पीयूष कान के पास ले जाकर वो धीरे से बोली "आधा पिक्चर खतम हो गया.. थोड़ी देर में इन्टरवल हो जाएगा.. और तू अभी तक ट्रैलर पर ही अटका पड़ा है!! अगर मन कर रहा है तो दबा ले.. शरमाता क्यों है?? इतना अंधेरा है, किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा"

पीयूष की सांसें तेज हो गई.. आज अगर कविता साथ नहीं होती.. तो दोनों हाथों से भाभी के चुचे रगड़ लेता..
 
दूसरी तरफ पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड हिला रही कविता सोच रही थी की आज पीयूष साथ नहीं होता तो झुककर पिंटू का लंड चूस लेती..

शीला ने ब्लाउस के तीन हुक खोल दिए और अपना दायाँ उरोज बाहर निकाल दिया.. जैसे तकिये को कवर से निकाल रही हो बिल्कुल वैसे ही!! और पीयूष के हाथों में ही थमा दिया.. और बोली "कविता को पता नहीं चलेगा.. अंधेरे में तुझे जो करना है कर ले.. जितना मज़ा करना हो मेरी तरफ से पूरी छूट है"

शीला की बात सुनकर पीयूष में हिम्मत आ गई.. इतना मूर्ख तो वो था नहीं की हाथ में नंगा स्तन हो और वो दबाए ना!! शीला के ढाई किलो वज़न वाला चुचा हाथ में पड़ते ही पीयूष के तनबदन में आग लग गई.

"ओहह भाभी.. गजब के है ये तो.. माय गॉड!! इन स्तनों को छुने के लिए मैं कितना बेचैन था.. आज तो किस्मत खुल गई मेरी" अपने नसीब को शाबाशी देने लगा पीयूष.. और उसके बगल में उसकी पत्नी अपने प्रेमी से स्तन दबवा रही थी

"मज़ा आ रहा है ना तुझे? दबा ले जितना मन करे.. "बड़े ही कामुक अंदाज से शीला ने कहा और पीयूष की जांघ पर हाथ फेरते फेरते उसके लंड तक पहुँच गई और पतलून के ऊपर से ही दबाने लगी। शीला का स्पर्श अपने लंड पर होते ही पीयूष अधिक उत्तेजित हो गया.. और उसने जोर से शीला के स्तन को मसल दिया..

"आह्ह.. जरा धीरे से कर पीयूष.. दर्द हो रहा है" शीला कराह उठी

"रहा नहीं जाता भाभी.. क्या करू!!"

"नहीं रहा जाता तो बाहर निकाल.. पत्थर जैसा सख्त हो गया है"

"भाभी मुझे कविता का टेंशन है.. कहीं उसने देख लिया तो मुसीबत आ जाएगी" डरते हुए पीयूष ने कहा

पर उतनी देर में तो शीला के अनुभवी हाथों ने पीयूष के पेंट की चैन उतारकर अपना हाथ अंदर सरका दिया और कच्छे के ऊपर से ही लंड को पकड़ लिया।

"ओहह भाभी.. पर.. पर.. कविता.... " पीयूष के शब्द बाहर ही निकले क्योंकी शीला ने उसका कच्छा सरकाकर उसका लंड बाहर निकाल लिया था। फॉलो-ओन होने के बाद दूसरी इनिंगस में भी जब ज़ीरो पर तीन विकेट गिर जाए.. और बेट्समेन निसहाय अवस्था में देखते ही रह जाए.. बिल्कुल वैसे ही पीयूष भी शीला के बाउन्सर के सामने निसहाय था.. शीला ने झुककर पीयूष के कडक लोड़े के टोपे पर किस किया.. जितना हो सकता था अपने मुंह में ले लिया.. और चूसने लगी..

शीला के मुंह की गर्मी और लार का स्पर्श.. पीयूष को उसका गुलाम बनाने के लिए काफी था... तिरछी नज़रों से अपने पति का लंड चूस रही शीला को कविता देख रही थी.. और ये देखकर ज्यादा उत्तेजित होकर वह पिंटू का लंड मसल रही थी। शीला भाभी की सलाह अनुसार उसने ब्रा-पेन्टी नहीं पहनी थी.. और पिंटू इस सुवर्ण अवसर को गंवाना नहीं चाहता था.. उसने कविता के स्कर्ट में हाथ डाल दिया और अपनी दो उंगली चुत में डालकर दस पंद्रह बार फक-फक की आवाज के साथ फुल स्पीड के साथ अंदर बाहर करते ही कविता की चुत झड़ गई.. और साथ में ही पिंटू की पिचकारी से गरम वीर्य रिसकर कविता के हाथों के सौन्दर्य को ओर बढ़ाने लगा..

शीला की बायीं ओर बैठा वो अनजान आदमी शीला के मादक जिस्म के साथ छेड़खानी कर रहा था और उसके कामुक स्पर्श से शीला के भोसड़े का रस झरना फिर से शुरू हो गया था.. पीयूष शीला के स्तनों को अपने हिसाब से मसलते हुए पूरे मजे ले रहा था तो दूसरी तरफ शीला ने उस आदमी के लंड को सहला सहलाकर उसे पिक्चर से ज्यादा मज़ा देने लगी थी। शीला जैसी अनुभवी स्त्री के हाथों में लंड आने के बाद कोई कसर कैसे रह जाती भला.. !!

पीयूष से ओर रहा नहीं गया.. उसने शीला के कान में कहा.. "भाभी, कविता को भी सीखा दो ना आपकी तरह चूसना??"

शीला ने पीयूष के अहंकारी मुर्गे जैसे लंड के साथ अपनी जांघ रगड़ते हुए कहा "चिंता मत कर पीयूष.. कविता को में लंड चुसाई में एम.बी.ए करवा दूँगी.. मैं भी मदन के बगैर बहोत तकलीफ महसूस कर रही हूँ"

पीयूष: "आप कहें तो मैं कविता को कुछ दिनों के लिए मायके भेज दूँ??"

शीला: "और फिर??"

पीयूष: "फिर.. फिर मैं आपको..........!!"

शीला ने पीयूष के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर उत्तेजनावश मसल दिया.. सिसकियाँ भरते हुए वो बोली.. "मुझसे तो अभी ही इसके बगैर रहा नहीं जा रहा.. आज रात का कुछ सेटिंग कर ना तू!!"

पीयूष: "आज रात का सेटिंग कैसे करू!! कविता को पता चल गया तो वो मेरी जान ले लेगी.. "

शीला: "कल तो मुझे तेरी माँ के साथ यात्रा पर जाना है.. आज का ही कुछ प्लान बना.. कुछ भी कर तू.. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा"

शीला वास्तव में पीयूष के पतले लंड को सहलाते हुए उत्तेजित हो गई थी.. और शीला जब उत्तेजित हो जाती है तब वह सारे नियम और बंधन तोड़कर अपनी हवस बुजाने के काम में लग जाती है.. अच्छे बुरे का भेद भूल जाती है और अनाब-शनाब हरकतें करने लगती है..

शीला ने अपनी दोनों जांघों को भींचकर अपनी चुत की जलती आग को शांत करने की कोशिश की पर मामूली आग हो तो बुझेगी ना.. ये तो जंगल में लगी आग जैसी भीषण आग थी.. कैसे बुझती भला!!!

शीला और पीयूष एक दूसरे के जिस्मों से खेलने में मशरूफ़ थे तभी इंटरवल हुआ और हॉल में अचानक लाइट चालू हो गई.. घबराई हुई शीला ने फटाफट अपने स्तन को ब्लाउस के अंदर डाल और पीयूष ने तुरंत अपने लंड को पेंट में ठूस दिया.. चैन बंद करने का भी समय नहीं मिला.. उसने अपने शर्ट से पेंट के लंड वाले हिस्से को ढँक लिया.. और एकदम सामान्य होकर बैठ गया.. शीला ने देखा तो उसके बगल वाला पुरुष समय रहते अपने लंड को अंदर नहीं डाल पाया था.. उसने अपने लंड को रुमाल से ढँक लिया था.. शीला को ये देखकर हंसी आ गई.. लंड के ठुमके.. ऊपर रखे रुमाल से भी दिखाई दे रहे थे..

लंड ढीला होते ही पीयूष उठकर बाथरूम की तरफ गया.. पिंटू तो इन्टरवल के पहले ही छु-मंतर हो गया था.. कविता और शीला अब अकेली थी.. कविता उठकर शीला की बगल वाली सीट पर आकार बैठ गई.. ताकि उससे बात कर सकें

कविता: "भाभी.. आपने मेरी बरसों की तमन्ना पूरी कर दी.. आपका ये एहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी.. "

शीला: "कौन सी इच्छा??"

कविता: "पिंटू के साथ मूवी देखते हुए मजे करने की.. "

शीला: "हम्म.. तो फिर मजे किए की नहीं!! क्या क्या किया.. बता मुझे.. अच्छा हुआ ना जो तूने ब्रा और पेन्टी नहीं पहनी.. पहनी होती तो कितनी तकलीफ होती तुम दोनों को.. !! "

कविता: "हाँ भाभी.. आपकी सलाह मुझे बड़े काम आई.. पिंटू ने अंदर तक उंगली डाल दी थी.. इतना मज़ा आया की क्या बताऊँ!! और दोनों बॉल मसलते हुए मेरी निप्पलों को ऐसा कुरेद दिया है की अब तक जलन हो रही है!!"

शीला: "घर जाकर पीयूष से अपनी निप्पल चुसवा लेना.. जलन कम हो जाएगी.. तूने पिंटू का पकड़ा था क्या?"

कविता: "पकड़ा तो था.. पर चूस नहीं पाई.. मेरा बहोत दिल कर रहा था उसका चूसने का.. "

शीला: "तुझे पसंद है लंड चूसना?? पीयूष तो कह रहा था की मैं तुझे लंड चूसना सिखाऊँ.. और तू उसका मुंह में ही नहीं लेती..."

कविता: "आप तो जानती हो ना भाभी.. घर की मुर्गी दाल बराबर.. प्रेमी का लंड चूसना मुझे पसंद है.. पति का लंड मुंह में लेने में वो मज़ा कहाँ.. !! और इन पतियों का एक बार चूस लो तो हररोज लंड निकालकर मुंह के सामने रख देंगे.. "

शीला और कविता बातें कर रहे थे उतने में पीयूष पॉपकॉर्न ले कर आ गया.. कविता वापिस अपनी सीट पर जाकर बैठ गई और पीयूष उन दोनों के बीच में बैठ गया

शीला ने धीमे से पीयूष के कान में कहा "पॉपकॉर्न वाली उंगली कविता की चुत में मत घुसाना.. वरना जलने लगेगा उसे"

पीयूष: " कुछ भी कहो भाभी.. आप बड़ा मस्त चूसती हो!!"

शीला: "अरे मेरे राजा.. तू एक रात के लिए मुझे मिल.. दो घंटे तक तेरा लंड मुंह से नहीं निकालूँगी"

पीयूष: "आप तो जबरदस्त हो भाभी.. "

कविता: "ये तुम दोनों कब से क्या गुसपुस कर रहे हो? पीयूष तू मेरे साथ मूवी देखने आया है या भाभी के साथ? कब से उनके साथ चिपका हुआ है!"

पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी बोल रही है तू.. भाभी अकेले है तो वो बोर न हो जाएँ इसलिए कंपनी दे रहा था उन्हे"

कविता: "हाँ तो सिर्फ कंपनी ही देना.. कुछ और नहीं.. समझा!!"

हॉल में फिर से अंधेरा छा गया.. और उस अनजान शख्स ने अपने लंड से रुमाल हटा दिया.. जैसे चमकती बिजली में सांप नजर आता है वैसे ही पिक्चर की रोशनी में उसका लंड चमक रहा था.. लाल लाल सुपाड़े की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई थी.. शीला भूखी नज़रों से उसे तांक रही थी.. काफी तगड़ा मोटा लंड था.. पर उस अनजान शख्स का साथ उलझने में उसे डर लग रहा था.. इसलिए शीला ने अपने आप को रोक रखा.. पर दो घड़ी के लिए उसका भोसड़ा लालच में तो आ ही गया था.. शीला के चुपचाप बैठने के बावजूद उस आदमी ने अपना लंड उसके दर्शन के लिए खुला ही छोड़ दिया.. उसे आशा थी की लंड को देखकर कहीं शीला का मन कर जाएँ..

दो तीन मिनट के बाद, पिंटू वापिस कविता के पास आकार बैठ गया.. दूसरी तरफ पीयूष अपने हाथों से शीला के गदराए जोबन पर नेट-प्रेक्टिस कर रहा था.. पिंटू ने भी वही हरकत कविता के स्तनों के साथ शुरू कर दी
 
शीला ने अब अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. एक स्तन को पीयूष मसल रहा था और दूसरे स्तन पर उसने उस अनजान आदमी का हाथ पकड़कर रख दिया.. उस आदमी को दौड़ना था और स्लोप मिल गया.. वह बेरहमी से शीला के एक स्तन को मरोड़ने मसलने लग गया..

दो स्तन.. दो अलग अलग आदमी से एक साथ मसलवा रही साहसी शीला ने हिम्मत करके उस अनजान आदमी का लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और हिलाने लग गई.. उसके दूसरे हाथ में पीयूष का लंड था.. दो हाथ में दो लंड.. और फिर भी उसकी भोस खाली.. ये कैसी विडंबना!!! शीला को अपने भोसड़े के लिए सहानुभूति हो रही थी.. उस शख्स के लंड की साइज़ देखकर शीला फिदा हो गई.. और उसे जीवा और रघु के दमदार लंड की याद भी आ गई।

शीला की निप्पल से खेलते हुए पीयूष ने उनके कान में कहा "भाभी ये क्या कर रही हो आप? कौन है ये आदमी?"

शीला: "किसकी बात कर रहा है तू?"

पीयूष: "उस आदमी की.. जिसका आपने पकड़ रखा है और जो आपके दूसरे स्तन को मसल रहा है.. अभी मेरा हाथ उसके हाथ से टकरा गया"

शीला: "पीयूष.. तुझे मेरे साथ छेड़खानी करते देख.. इन्टरवल में वो मुझे ब्लेकमेल करने लगा.. की अगर मैं उसे नहीं दबाने दूँगी तो वो कविता को जाकर सबकुछ बता देगा.. अब तेरे भले के लिए मुझे एक अनजान आदमी को मेरे शरीर के साथ खेलने की छूट देनी पड़ी.. क्या करती!!"

सुनकर पीयूष चुप हो गया..

पिक्चर खतम होने की थी.. और हर कोई आखिरी पड़ाव पर था.. आखिरी ओवर में २० रन बनाने हो और जिस तरह बेट्समेन चारों तरफ अंधाधुन शॉट लगाता है.. बिल्कुल उसी तरह.. उस पूरी लाइन में धड़ल्ले से स्तन मर्दन पूरे जोश के साथ चल रहा था..

दो दो पुरुषों के साथ एक साथ बबले दबवाते हुए शीला ने एक विचित्र हरकत कर दी

पीयूष के कान में उसने कहा "ये आदमी मुझे मुंह में लेने के लिए कह रहा है.. पर मैं नहीं लेने वाली.. कुछ भी हो जाएँ.. मुझे ये सब नहीं पसंद.. ये तो तेरे भले के लिए मैं अपने बॉल दबवाने के लिए राजी हुई.. अब कंधा दिया तो वो कान में मूतने की बात कर रहा है"

पीयूष: "मत लेना मुंह में भाभी.. पिक्चर अब १० मिनट में खतम हो जाएगा.. तब तक कैसे भी कर के उसे टाल दो.. "

एक दो मिनट के लिए शांत रहकर शीला ने अपना घातक यॉर्कर फेंका..

"पीयूष.. वो मुझे धमकी दे रहा है की अभी के अभी वो कविता को सब बताया देगा.. क्या करू मैं? वो बता देगा तो गजब हो जाएगा"

पीयूष की गांड फट कर फ्लावर हो गई..

"अच्छा.. ब्लैकमेल कर रहा है आपको??"

"हाँ.. अब जल्दी बोल.. क्या करू मैं? अगर ये बता देगा तो कविता तेरी माँ चोद देगी" शीला अब रोहित शर्मा की तरह फटके लगा रही थी

"अब चूस लो भाभी.. और क्या कर सकते है" पीयूष अपनी गांड बचाने में लग गया..

पीयूष का लंड हिलाते हिलाते शीला दूसरी तरफ झुक गई और उस शख्स के फुँकारते लंड को एक पल में मुंह में भर लिया.. वो आदमी तो भोंचक्का रह गया.. और शीला के सिर पर हाथ फेरता रहा.. शीला ने अपने मुंह में उसके लंड को इतना टाइट पकड़ रखा था जैसे मदारी के चिमटे में जहरीला सांप फंसा हो..

सात आठ बार शीला ने लंड को पूरा बाहर निकालकर अपने कंठ तक अंदर घुसा दिया.. और ऐसा चूसा.. ऐसा चूसा की उसके लंड का सारा जहर शीला के मुंह में ही निकल गया.. और उसी के साथ हॉल में रोशनी चालू हो गई.. शीला ने तुरंत उसका लंड मुंह से निकाला और खड़ी हो गई.. अपने बाल ठीक करने लगी.. मुंह में भरे हुए वीर्य को थूकने का मौका नहीं मिल इसलिए वो उस अनजान पुरुष का सारा माल निगल गई.. पीयूष स्तब्ध होकर इस कामुक देवी और उसकी हरकतों को देखता ही रह गया.. शीला को अपने ब्लाउस के हुक बंद करने का समय नहीं मिल इसलिए उसने अपने स्तनों को पल्लू से ढँक दिया था.. शीला ने देखा की पीछे की लाइन में बैठी हुई स्त्री अपने ब्लाउस के हुक बंद कर रही थी.. उसकी नजर शीला से मिली और शीला ने मुस्कुरा दिया.. जैसे उसके राज को पकड़ लिया हो.. उस स्त्री ने अपने होंठ पर उंगली रखकर शीला को इशारा किया.. शीला ने तुरंत अपने होंठ पर चिपके वीर्य को पोंछ लिया.. और उस शरमाते हुए उस स्त्री की तरफ आभार प्रकट करते हुए आगे निकल गई..

रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?

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रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?

शीला अपने घर के बरामदे में पहुंचकर बोली "पीयूष, मेरे घर की चाबी तेरे घर पर रखी हुई है.. जरा आकर मुझे दे जाना.. "

कविता और पीयूष अपने घर के अंदर दाखिल हुए.. और पीयूष शीला भाभी के घर की चाबी ढूँढने लगा..

कविता मन में सोच रही थी.. आज शीला भाभी पीयूष को पूरा निचोड़ लेगी.. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचने वाला..

पीयूष के लंड पर हाथ सहलाते हुए कविता ने पीयूष को कहा "जा.. भाभी को चाबी देकर आ.. ताला भी खोल देना उनका.. लगता है शीला भाभी को तेरी चाबी पसंद आ गई है"

पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी.... !!" कहते हुए पीयूष खुशी खुशी कंपाउंड की दीवार फांद कर शीला के बरामदे में पहुँच गया।

कविता घर के अंदर चली गई थी इसलिए पीयूष ने राहत की सांस ली.. और शीला को चाबी देते हुए कहा "भाभी.. खोल दूँ??"

शीला ने अपना पल्लू हटा दिया.. और अपने पपीते जैसे मदमस्त स्तनों के दर्शन करवाती हुई कामुक आवाज में बोली "हाँ खोल दे पीयूष.. "

कविता अंदर थी पर पीयूष को यह डर था की कहीं वो बाहर न आ जाए.. इसलिए वो अपने दरवाजे पर नजर रखे हुए शीला के घर का ताला खोलने लगा.. उसी वक्त शीला घुटनों के बल झुक गई और पीयूष के लंड को उसके पतलून से बाहर निकाल दिया.. और उसके टोप्पे पर चूमकर बोली

"क्या हुआ पीयूष? इतना वक्त क्यों लग रहा है तुझे खोलने में? छेद नहीं मिल रहा क्या तुझे?"

"अरे भाभी.. आप मुझे मरवा दोगी.. वो कविता अभी बाहर निकलेगी तो अभी के अभी मुझे तलाक दे देगी.. "

कविता किचन की खिड़की से और अनुमौसी बेडरूम से.. शीला और पीयूष के इस मिलन को देख रहे थे.. अनुमौसी ने अपने बेटे के लंड को देखने की बहोत कोशिश की.. पर अंधेरे के कारण नहीं दिखा... सख्त कड़े उत्तेजित लंड को देखे अरसा बीत गया था.. मौसी ने एक निराशा भरी नजर अपने पति चिमनलाल पर डाली.. मोटी तोंद और कमजोर लंड वाला चिमनलाल खर्राटे लेकर सो रहा था.. उसके पूपली जैसे लंड को मौसी ने हाथ से हिलाकर देखा.. मरी हुई छिपकली जैसे लंड ने कोई हरकत नहीं की.. अनुमौसी ने एक गहरी सांस छोड़ी.. और कमर हिला रहे अपने बेटे को देखकर उत्तेजित होकर.. चिमनलाल के मोबाइल को अपने भोसड़े में घुसेड़ दिया.. कविता भी खिड़की से अपने पति का लंड चूस रही शीला को देखते हुए.. और पिंटू को याद करते हुए.. अपनी नेलपोलिश लगी उंगलियों से क्लिटोरिस को कुरेदने लगी..

सास और बहु खिड़की से कमर हिला रहे पीयूष को देखते हुए सोच रहे थे.. ये चोद रहा है या मुंह में दिया हुआ है!!??

शीला ने पीयूष का पूरा लंड मुंह में लेकर इतना चूसा की पीयूष के होश उड़ गए.. पीयूष ताला खोल रहा था उतनी देर में तो शीला ने उसके लंड को झड़वा दिया.. कविता पिंटू के याद में अपनी चुत खुजाते हुए सो गई.. उसे मालूम था की शीला भाभी की पकड़ से छूटने के बाद.. पीयूष के पास उसे देने लायक सख्त लंड बचा ही नहीं होगा.. और फिलहाल उसे जरूरत भी नहीं थी। अनुमौसी भी अपने पति के मोबाइल से मूठ लगाकर.. अपनी बूढ़ी चुत को सहलाते हुए.. उल्टा लेटकर सो गई।

शीला ने मस्ती से पीयूष के लंड को चूस चूस कर खाली कर दिया....

अपने लंड को पेंट के अंदर रखकर चैन बंद करते हुए पीयूष ने कहा "मैं अब चलता हूँ भाभी... ऐसे ही मौके देते रहना.. भूल मत जाना"

शीला: "तेरी जब मर्जी करे चले आना.. मना नहीं करूंगी.. "

पीयूष जाते जाते शीला के दोनों स्तनों को मसलकर गया.. शीला के होंठों पर चमक रही वीर्य की बूंद को देखकर वो मुसकुराते हुए निकल गया।

काश मेरी कविता भी इसी तरह लंड मुंह में लेकर मेरा वीर्य चूसती तो कितना अच्छा होता!! शीला भाभी को अब हाथ में रखना पड़ेगा.. एक बार धड़ल्ले से टांगें फैलाकर चोदना है भाभी को.. भोसड़ा भी मस्त होगा साली का.. और छातियाँ उसकी ये बड़ी बड़ी.. चौबीसों घंटे गरमाई हुई रहती है... बस एक मौका मिल जाएँ.. पीयूष ये सब सोचते सोचते घर में घुस गया.. शीला भी बिस्तर पर गिरते ही सो गई.. और तब उठी जब अनुमौसी का फोन आया..

"अरे बाप रे.. देर हो गई.. आज तो महिला मण्डल के साथ यात्रा पर जाना है" बड़बड़ाते हुए वो झटपट बाथरूम में घुसी और फटाफट जैसे तैसे नहाकर तैयार हो गई.. बाहर निकली तो अनुमौसी के घर के पास एक मिनीबस खड़ी थी.. और अंदर करीब २५ औरतों का झुंड था.. अनुमौसी बस के बाहर शीला का इंतज़ार करते हुए खड़ी थी.. शीला तुरंत अंदर चढ़ गई.. और अनुमौसी को हाथ पकड़कर अंदर चढ़ने में मदद की

अनुमौसी: "तेरे अंदर तो बहोत जोर है शीला.. हम तो अब बूढ़े हो गए!!"

तभी आगे की रो में बैठी एक जवान औरत ने कहा "अरे मौसी, वो तो उनका पति घर पर नहीं है इसलिए सारा जोर बचाकर रखा हुआ है.. अगर पति साथ होते तो उनका सारा जोर निचोड़ लिया होता अब तक.. क्यों ठीक कहा ना भाभी??" शीला उस उँजान औरत के सामने देखकर मुस्कुराई पर कुछ बोली नहीं.. सब अनजान थे इसलिए शीला थोड़ा सा शरमा रही थी

थोड़ी देर बाद.. अनुमौसी शीला की बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई.. और उस तरह बैठी की उनके स्तन शीला के कंधों से रगड़कर जाए

अब शीला ये सब हथकंडों से कहाँ अनजान थी!! उसने मौसी से कहा "मौसी, आपकी कविता तो बड़ी ही होशियार है..!!"

अनुमौसी: "अच्छा.. !! ऐसा क्यों लगा तुझे शीला? वैसे तो मेरा पीयूष भी कम होशियार नहीं है.. "

अनुमौसी ने पीयूष का नाम लेकर बड़े ही विचित्र ढंग से शीला की आँखों में देखा.. शीला को एक पल के लिए शक हुआ.. कहीं ये बुढ़िया ने रात को मेरे और पीयूष के बीच के खेल को देख तो नहीं लिया.. !! चलो.. जो भी होगा देखा जाएगा.. चिंता करके कोई फायदा नहीं है

अनुमौसी भजन गाने लगी.. और सारी औरतें उनका साथ देने लगी.. थोड़ी ही देर में वो मिनीबस नजदीक के एक छोटे से शहर पहुंची.. वहाँ के मंदिर में दर्शन करने के बाद सारी औरतें बाजार में शॉपिंग करने निकल पड़ी..

शीला और अनुमौसी साथ में घूम रहे थे.. चलते चलते वो एक दुकान पर पहुंचे जहां बेलन और चकला मिलता था

अनुमौसी ने एक पतला बेलन हाथ में लिया.. और चेक कर वापिस रख दिया.. "ये वाला ठीक नहीं लगता.. मुझे तो मोटा बेलन ही पसंद है"

दुकान वाला शीला के उन्नत स्तनों के बीच की दरार को देखते हुए मुस्कुराकर बोला " हाँ मौसी.. मेरी पत्नी को भी मोटा बेलन ही भाता है.. मेरे घर तो पतला बेलन भी है.. पर वो हमेशा मोटे वाले से ही रोटियाँ बेलती है.. "

इन द्विअर्थी संवाद को सुनते ही शीला की चुत का वो हाल हुआ.. जो गरम तेल में पानी डालने पर होता है.. छम्म छम्म छम्म होने लगा.. अपने आप दोनों जांघें एक दूसरे सट गई.. अपनी चुत को खुजाते हुए शीला ने अनु मौसी से कहा "मुझे भी मोटा बेलन ही पसंद है मौसी.. आप ये मोटा वाला खरीद लीजिए.. ये बढ़िया है.. मोटा और चिकना.. "

अनुमौसी ने बेलन लेकर थैली में रख दिया.. और अपने ब्लाउस में हाथ डालकर पर्स निकाला और ५० का नोट दुकानवाले को देते हुए बोली "आप बड़ा महंगा बेचते हो.. बेलन मोटा है तो इतना भाव थोड़ी होता है!!"

दुकानदार: "मौसी.. बेलन पतला हो या मोटा.. तैयार करने में मेहनत तो लगती है ना!! और मैं बिल्कुल वाजिब दाम में बेचता हूँ.. आप एक बार मेरा बेलन इस्तेमाल करके तो देखिए.. मुझे रोज याद करोगी.. जीतने भी ग्राहक बेलन लेकर जाते है वो फिर से मेरी दुकान जरूर आते है.. मेरा बेलन है ही कमाल का!!"

शीला: "भैया हमे तो जो भी बेलन मिल जाता है उसी से काम चला लेते है" शीला ने मोटे बेलन की नोक पर ऐसे उँगलियाँ फेरी जैसे लंड पकड़ कर मूठ मार रही हो.. दुकानवाले के पसीने छूट गए ये देखकर.. शीला के इस कातिल यॉर्कर से दुकानवाले के स्टम्प उखड़ गए.. अनुमौसी शीला की इस हरकत को देखकर शर्मा गई और हँसते हँसते शीला का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोली "अब चल भी.. यहीं रोटियाँ बेलने बैठेगी क्या तू? बड़ी नालायक है तू शीला.. !!"
 
शीला हँसते हुए दुकान से बाहर निकली और दोनों चलते हुए बस तक पहुंचे.. सब अंदर बैठ गए पर ड्राइवर कहीं नजर नहीं आ रहा था.. सब औरतों को शीला बेलन दिखाते हुए उसपर ऐसे हाथ घुमा रही थी जैसे लंड को सहला रही हो.. शीला का पल्लू हटकर नीचे गिर गया और उसकी उत्तुंग पहाड़ियों को सारी महिलायें देखती ही रह गई.. सारी औरतें ही थी इसलिए शर्म की कोई बात नहीं थी.. शीला भी बेफिक्र होकर जीव के मूसल लंड को याद करते हुए बेलन से खेल रही थी..

एक बूढ़ी औरत ने शीला और अनुमौसी से पूछा " अच्छा.. तो तुम दोनों ऐसा मोटा बेलन ढूँढने गई थी बाजार में.. "

अनुमौसी: "क्या चम्पा बहन आप भी!! मोटे बेलन की जरूरत तो सब को पड़ती है.. आप तो ऐसे बोल रही है जैसे आपको मोटा पसंद ही नहीं है"

चम्पा मौसी: "मेरे घर तो कपड़े धोने की बढ़िया सी मोटी थप्पी है इसलिए मुझे तो बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शरारती मुस्कान के साथ उस बुढ़िया ने कहा

तभी एक जवान औरत ने कहा "हमारे घर तो हमारे पतिदेव ही काफी है.. इसलिए थप्पी या बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शीला ने तुरंत उस औरत का नाम पूछ लिया

उस औरत ने शीला के स्तनों को तांकते हुए बड़े कामुक स्वर में अपना नाम बताया "रेणुका.. "

वापिस आते हुए रास्ते में शीला ने रेणुका के साथ दोस्ती कर ली और उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया.. रेणुका करीब ३२ की उम्र की गोरी चीट्टी दो बच्चों की माँ थी.. शीला ने बाकी औरतों पर नजर घुमाई.. पर एक भी उसे अपने लायक नहीं लगी..

शहर से बाहर बस पहुंची.. एक पीपल के पेड़ की छाँव के नीचे ड्राइवर ने बस रोक दी.. सारी महिलायें नीचे उतरी.. और चटाई बिछाकर खाना खाने बैठ गई.. सब ने मिलकर घर से लाए भोजन को बाँट के खाया.. और तृप्त होकर वहीं चटाई पर लेट गई.. औरतों को दोपहर की नींद, रात के सेक्स जितनी ही पसंद होती है.. कुछ औरतें तो दोपहर को इसलिए सो जाती है ताकि रात को देर तक जागकर चुदवा सकें..

एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..

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