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Adultery शीला की वासना की आग

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Guest
शीला की वासना की आग

५५ साल की शीला, रात को १० बजे रसोईघर की जूठन फेंकने के लिए बाहर निकली... थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी। चारों तरफ पानी के पोखर भरे हुए थे... भीनी मिट्टी की मदमस्त खुशबू से ठंडा वातावरण बेहद कामुक बना देने वाला था। दूर कोने मे एक कुत्तिया... अपनी पुत्ती खुद ही चाट रही थी... शीला देखती रह गई..!! वह सोचने लगी की काश..!! हम औरतें भी यह काम अगर खुद कर पाती तो कितना अच्छा होता... मेरी तरह लंड के बिना तड़पती, न जाने कितनी औरतों को, इस मदमस्त बारिश के मौसम में, तड़पना न पड़ता...

वह घर पर लौटी... और दरवाजा बंद किया... और बिस्तर पर लेट गई।

उसका पति दो साल के लिए, कंपनी के काम से विदेश गया था... और तब से शीला की हालत खराब हो गई थी। वैसे तो पचपन साल की उम्र मे औरतों को चुदाई की इतनी भूख नही होती... पर एकलौती बेटी की शादी हो जाने के बाद... दोनों पति पत्नी अकेले से पड़ गए थे.. पैसा तो काफी था... और उसका पति मदन, ५८ साल की उम्र मे भी.. काफी शौकीन मिजाज था.. रोज रात को वह शीला को नंगी करके अलग अलग आसनों मे भरपूर चोदता.. शीला की उम्र ५५ साल की थी... मेनोपोज़ भी हो चुका था.. फिर भी साली... कूद कूद कर लंड लेती.. शीला का पति मदन, ऐसे अलग अलग प्रयोग करता की शीला पागल हो जाती... उनके घर पर ब्लू-फिल्म की डीवीडी का ढेर पड़ा था.. शीला ने वह सब देख रखी थी.. उसे अपनी चुत चटवाने की बेहद इच्छा हो रही थी... और मदन की नामौजूदगी ने उसकी हालत और खराब कर दी थी।

ऊपर से उस कुत्तीया को अपनी पुत्ती चाटते देख... उसके पूरे बदन मे आग सी लग गई...

अपने नाइट ड्रेस के गाउन से... उसने अपने ४० इंच के साइज़ के दोनों बड़े बड़े गोरे बबले बाहर निकाले.. और अपनी हथेलियों से निप्पलों को मसलने लगी.. आहहहह..!! अभी मदन यहाँ होता तो... अभी मुझ पर टूट पड़ा होता... और अपने हाथ से मेरी चुत सहला रहा होता.. अभी तो उसे आने मे और चार महीने बाकी है.. पिछले २० महीनों से... शीला के भूखे भोसड़े को किसी पुरुष के स्पर्श की जरूरत थी.. पर हाय ये समाज और इज्जत के जूठे ढकोसले..!! जिनके डर के कारण वह अपनी प्यास बुझाने का कोई और जुगाड़ नही कर पा रही थी।

"ओह मदन... तू जल्दी आजा... अब बर्दाश्त नही होता मुझसे...!!" शीला के दिल से एक दबी हुई टीस निकली... और उसे मदन का मदमस्त लोडा याद आ गया.. आज कुछ करना पड़ेगा इस भोसड़े की आग का...

शीला उठकर खड़ी हुई और किचन मे गई... फ्रिज खोलकर उसने एक मोटा ताज़ा बैंगन निकाला.. और उसे ही मदन का लंड समझकर अपनी चुत पर घिसने लगी... बैंगन मदन के लंड से तो पतला था... पर मस्त लंबा था... शीला ने बैंगन को डंठल से पकड़ा और अपने होंठों पर रगड़ने लगी... आँखें बंद कर उसने मदन के सख्त लंड को याद किया और पूरा बैंगन मुंह मे डालकर चूसने लगी... जैसे अपने पति का लंड चूस रही हो... अपनी लार से पूरा बैंगन गीला कर दिया.. और अपने भोसड़े मे घुसा दिया... आहहहहहहह... तड़पती हुई चुत को थोड़ा अच्छा लगा...

आज शीला.. वासना से पागल हो चली थी... वह पूरी नंगी होकर किचन के पीछे बने छोटे से बगीचे मे आ गई... रात के अंधेरे मे अपने बंगले के बगीचे मे अपनी नंगी चुत मे बैंगन घुसेड़कर, स्तनों को मरोड़ते मसलते हुए घूमने लगी.. छिटपुट बारिश शुरू हुई और शीला खुश हो गई.. खड़े खड़े उसने बैंगन से मूठ मारते हुए भीगने का आनंद लिया... मदन के लंड की गैरमौजूदगी में बैंगन से अपने भोंसड़े को ठंडा करने का प्रयत्न करती शीला की नंगी जवानी पर बारिश का पानी... उसके मदमस्त स्तनों से होते हुए... उसकी चुत पर टपक रहा था। विकराल आग को भी ठंडा करने का माद्दा रखने वाले बारिश के पानी ने, शीला की आग को बुझाने के बजाए और भड़का दिया। वास्तविक आग पानी से बुझ जाती है पर वासना की आग तो ओर प्रज्वलित हो जाती है। शीला बागीचे के गीले घास में लेटी हुई थी। बेकाबू हो चुकी हवस को मामूली बैंगन से बुझाने की निरर्थक कोशिश कर रही थी वह। उसे जरूरत थी.. एक मदमस्त मोटे लंबे लंड की... जो उसके फड़फड़ाते हुए भोसड़े को बेहद अंदर तक... बच्चेदानी के मुख तक धक्के लगाकर, गरम गरम वीर्य से सराबोर कर दे। पक-पक पुच-पुच की आवाज के साथ शीला बैंगन को अपनी चुत के अंदर बाहर कर रही थी। आखिर लंड का काम बैंगन ने कर दिया। शीला की वासना की आग बुझ गई.. तड़पती हुई चुत शांत हो गई... और वह झड़कर वही खुले बगीचे में नंगी सो गई... रात के तीन बजे के करीब उसकी आँख खुली और वह उठकर घर के अंदर आई। अपने भोसड़े से उसने पिचका हुआ बैंगन बाहर निकाला.. गीले कपड़े से चुत को पोंछा और फिर नंगी ही सो गई।

सुबह जब वह नींद से जागी तब डोरबेल बज रही थी "दूध वाला रसिक होगा" शीला ने सोचा, इतनी सुबह, ६ बजे और कौन हो सकता है!! शीला ने उठकर दरवाजा खोला... बाहर तेज बारिश हो रही थी। दूधवाला रसिक पूरा भीगा हुआ था.. शीला उसे देखते ही रह गई... कामदेव के अवतार जैसा, बलिष्ठ शरीर, मजबूत कदकाठी, चौड़े कंधे और पेड़ के तने जैसी मोटी जांघें... बड़ी बड़ी मुछों वाला ३५ साल का रसिक.. शीला को देखकर बोला "कैसी हो भाभीजी?"

गाउन के अंदर बिना ब्रा के बोबलों को देखते हुए रसिक एक पल के लिए जैसे भूल ही गया की वह किस काम के लिए आया था!! उसके भीगे हुए पतले कॉटन के पतलून में से उसका लंड उभरने लगा जो शीला की पारखी नजर से छिप नही सका।

"अरे रसिक, तुम तो पूरे भीग चुके हो... यहीं खड़े रहो, में पोंछने के लिए रुमाल लेकर आती हूँ.. अच्छे से जिस्म पोंछ लो वरना झुकाम हो जाएगा" कहकर अपने कूल्हे मटकाती हुई शीला रुमाल लेने चली गई।

"अरे भाभी, रुमाल नही चाहिए,... बस एक बार अपनी बाहों में जकड़ लो मुझे... पूरा जिस्म गरम हो जाएगा" अपने लंड को ठीक करते हुए रसिक ने मन में सोचा.. बहेनचोद साली इस भाभी के एक बोबले में ५-५ लीटर दूध भरा होगा... इतने बड़े है... मेरी भेस से ज्यादा तो इस शीला भाभी के थन बड़े है... एक बार दुहने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाए...

रसिक घर के अंदर ड्रॉइंगरूम में आ गया और डोरक्लोज़र लगा दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

शीला ने आकर रसिक को रुमाल दिया। रसिक अपने कमीज के बटन खोलकर रुमाल से अपनी चौड़ी छाती को पोंछने लगा। शीला अपनी हथेलियाँ मसलते उसे देख रही थी। उसके मदमस्त चुचे गाउन के ऊपर से उभरकर दिख रहे थे। उन्हे देखकर रसिक का लंड पतलून में ही लंबा होता जा रहा था। रसिक के सख्त लंड की साइज़ देखकर... शीला की पुच्ची बेकाबू होने लगी। उसने रसिक को बातों में उलझाना शुरू किया ताकि वह ओर वक्त तक उसके लंड को तांक सके।

"इतनी सुबह जागकर घर घर दूध देने जाता है... थक जाता होगा.. है ना!!" शीला ने कहा

"थक तो जाता हूँ, पर क्या करूँ, काम है करना तो पड़ता ही है... आप जैसे कुछ अच्छे लोग को ही हमारी कदर है.. बाकी सब तो.. खैर जाने दो" रसिक ने कहा। रसिक की नजर शीला के बोबलों पर चिपकी हुई थी.. यह शीला भी जानती थी.. उसकी नजर रसिक के खूँटे जैसे लंड पर थी।

शीला ने पिछले २० महीनों से.. तड़प तड़प कर... मूठ मारकर अपनी इज्जत को संभाले रखा था.. पर आज रसिक के लंड को देखकर वह उत्तेजित हथनी की तरह गुर्राने लगी थी...

"तुझे ठंड लग रही है शायद... रुक में चाय बनाकर लाती हूँ" शीला ने कहा

"अरे रहने दीजिए भाभी, में आपकी चाय पीने रुका तो बाकी सारे घरों की चाय नही बनेगी.. अभी काफी घरों में दूध देने जाना है" रसिक ने कहा

फिर रसिक ने पूछा "भाभी, एक बात पूछूँ? आप दो साल से अकेले रह रही हो.. भैया तो है नही.. आपको डर नही लगता?" यह कहते हुए उस चूतिये ने अपने लंड पर हाथ फेर दिया

रसिक के कहने का मतलब समझ न पाए उतनी भोली तो थी नही शीला!!

"अकेले अकेले डर तो बहोत लगता है रसिक... पर मेरे लिए अपना घर-बार छोड़कर रोज रात को साथ सोने आएगा!!" उदास होकर शीला ने कहा

"चलिए भाभी, में अब चलता हूँ... देर हो गई... आप मेरे मोबाइल में अपना नंबर लिख दीजिए.. कभी अगर दूध देने में देर हो तो आप को फोन कर बता सकूँ"

तिरछी नजर से रसिक के लंड को घूरते हुए शीला ने चुपचाप रसिक के मोबाइल में अपना नंबर स्टोर कर दिया।

"आपके पास तो मेरा नंबर है ही.. कभी बिना काम के भी फोन करते रहना... मुझे अच्छा लगेगा" रसिक ने कहा

शीला को पता चल गया की वह उसे दाने डाल रहा था

"चलता हूँ भाभी" रसिक मुड़कर दरवाजा खोलते हुए बोला

उसके जाते ही दरवाजा बंद हो गया। शीला दरवाजे से लिपट पड़ी, और अपने स्तनों को दरवाजे पर रगड़ने लगी। जिस रुमाल से रसिक ने अपनी छाती पोंछी थी उसमे से आती मर्दाना गंध को सूंघकर उस रुमाल को अपने भोसड़े पर रगड़ते हुए शीला सिसकने लगी।

कवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतल और मेघदूत में जैसे वर्णन किया है बिल्कुल उसी प्रकार.. शीला इस बारिश के मौसम में कामातुर हो गई थी। दूध गरम करने के लिए वो किचन में आई और फिर उसने फ्रिज में से एक मोटा गाजर निकाला। दूध को गरम करने गेस पर चढ़ाया.. और फिर अपने तड़पते भोसड़े में गाजर घुसेड़कर अंदर बाहर करने लगी।

रूम के अंदर बहोत गर्मी हो रही थी.. शीला ने एक खिड़की खोल दी.. खिड़की से आती ठंडी हवा उसके बदन को शीतलता प्रदान कर रही थी और गाजर उसकी चुत को ठंडा कर रहा था। खिड़की में से उसने बाहर सड़क की ओर देखा... सामने ही एक कुत्तीया के पीछे १०-१२ कुत्ते, उसे चोदने की फिराक में पागल होकर आगे पीछे दौड़ रहे थे।

शीला मन में ही सोचने लगी "बहनचोद.. पूरी दुनिया चुत के पीछे भागती है... और यहाँ में एक लंड को तरस रही हूँ"

सांड के लंड जैसा मोटा गाजर उसने पूरा अंदर तक घुसा दिया... उसके मम्मे ऐसे दर्द कर रहे थे जैसे उनमे दूध भर गया हो.. भारी भारी से लगते थे। उस वक्त शीला इतनी गरम हो गई की उसका मन कर रहा था की गैस के लाइटर को अपनी पुच्ची में डालकर स्पार्क करें...

शीला ने अपने सख्त गोभी जैसे मम्मे गाउन के बाहर निकाले... और किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर उन्हे रगड़ने लगी.. रसिक की बालों वाली छाती उसकी नजर से हट ही नही रही थी। आखिर दूध की पतीली और शीला के भोसड़े में एक साथ उबाल आया। फरक सिर्फ इतना था की दूध गरम हो गया था और शीला की चुत ठंडी हो गई थी।

रोजमर्रा के कामों से निपटकर, शीला गुलाबी साड़ी में सजधज कर सब्जी लेने के लिए बाजार की ओर निकली। टाइट ब्लाउस में उसके बड़े बड़े स्तन, हर कदम के साथ उछलते थे। आते जाते लोग उन मादक चूचियों को देखकर अपना लंड ठीक करने लग जाते.. उसके मदमस्त कूल्हे, राजपुरी आम जैसे बबले.. और थिरकती चाल...

एक जवान सब्जी वाले के सामने उकड़ूँ बैठकर वह सब्जी देखने लगी। शीला के पैरों की गोरी गोरी पिंडियाँ देखकर सब्जीवाला स्तब्ध रह गया। घुटनों के दबाव के कारण शीला की बड़ी चूचियाँ ब्लाउस से उभरकर बाहर झाँकने लगी थी..

शीला का यह बेनमून हुस्न देखकर सब्जीवाला कुछ पलों के लिए, अपने आप को और अपने धंधे तक को भूल गया।

शीला के दो बबलों को बीच बनी खाई को देखकर सब्जीवाले का छिपकली जैसा लंड एक पल में शक्करकंद जैसा बन गया और एक मिनट बाद मोटी ककड़ी जैसा!!!

"मुली का क्या भाव है?" शीला ने पूछा

"एक किलो के ४० रूपीए"

"ठीक है.. मोटी मोटी मुली निकालकर दे मुझे... एक किलो" शीला ने कहा

"मोटी मुली क्यों? पतली वाली ज्यादा स्वादिष्ट होती है" सब्जीवाले ने ज्ञान दिया

"तुझे जितना कहा गया उतना कर... मुझे मोटी और लंबी मुली ही चाहिए" शीला ने कहा

"क्यों? खाना भी है या किसी ओर काम के लिए चाहिए?"

शीला ने जवाब नही दिया तो सब्जीवाले को ओर जोश चढ़ा

"मुली से तो जलन होगी... आप गाजर ले लो"

"नही चाहिए मुझे गाजर... ये ले पैसे" शीला ने थोड़े गुस्से के साथ उसे १०० का नोट दिया

बाकी खुले पैसे वापिस लौटाते वक्त उस सब्जीवाले ने शीला की कोमल हथेलियों पर हाथ फेर लिया और बोला "और क्या सेवा कर सकता हूँ भाभीजी?"

उसकी ओर गुस्से से घूरते हुए शीला वहाँ से चल दी। उसकी बात वह भलीभाँति समझ सकती थी। पर क्यों बेकार में ऐसे लोगों से उलझे... ऐसा सोचकर वह किराने की दुकान के ओर गई।

बाकी सामान खरीदकर वह रिक्शा में घर आने को निकली। रिक्शा वाला हरामी भी मिरर को शीला के स्तनों पर सेट कर देखते देखते... और मन ही मन में चूसते चूसते... ऑटो चला रहा था।

एक तरफ घर पर पति की गैरहाजरी, दूसरी तरफ बाहर के लोगों की हलकट नजरें.. तीसरी तरफ भोसड़े में हो रही खुजली तो चौथी तरफ समाज का डर... परेशान हो गई थी शीला!!

घर आकर वह लाश की तरह बिस्तर पर गिरी.. उसकी छाती से साड़ी का पल्लू सरक गया... यौवन के दो शिखरों जैसे उत्तुंग स्तन.. शीला की हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। लेटे लेटे वह सोच रही थी "बहनचोद, इन माँस के गोलों में भला कुदरत ने ऐसा क्या जादू किया है की जो भी देखता है बस देखता ही रह जाता है!!" फिर वह सोचने लगी की वैसे तो मर्द के लंड में भी ऐसा कौनसा चाँद लगा होता है, जो औरतें देखते ही पानी पानी हो जाती है!!

शीला को अपने पति मदन के लंड की याद आ गई... ८ इंच का... मोटे गाजर जैसा... ओहहह... ईशशश... शीला ने इतनी गहरी सांस ली की उसकी चूचियों के दबाव से ब्लाउस का हुक ही टूट गया।

कुदरत ने मर्दों को लंड देकर, महिलाओं को उनका ग़ुलाम बना दिया... पूरा जीवन... उस लंड के धक्के खा खाकर अपने पति और परिवार को संभालती है.. पूरा दिन घर का काम कर थक के चूर हो चुकी स्त्री को जब उसका पति, मजबूत लंड से धमाधम चोदता है तो स्त्री के जनम जनम की थकान उतर जाती है... और दूसरे दिन की महेनत के लिए तैयार हो जाती है।

शीला ने ब्लाउस के बाकी के हुक भी खोल दिए... अपने मम्मों के बीच की कातिल चिकनी खाई को देखकर उसे याद आ गया की कैसे मदन उसके दो बबलों के बीच में लंड घुसाकर स्तन-चुदाई करता था। शीला से अब रहा नही गया... घाघरा ऊपर कर उसने अपनी भोस पर हाथ फेरा... रस से भीग चुकी थी उसकी चुत... अभी अगर कोई मिल जाए तो... एक ही झटके में पूरा लंड अंदर उतर जाए... इतना गीला था उसका भोसड़ा.. चुत के दोनों होंठ फूलकर कचौड़ी जैसे बन चुके थे।

शीला ने चुत के होंठों पर छोटी सी चिमटी काटी... दर्द तो हुआ पर मज़ा भी आया... इसी दर्द में तो स्वर्गिक आनंद छुपा था.. वह उन पंखुड़ियों को और मसलने लगी.. जितना मसलती उतनी ही उसकी आग और भड़कने लगी... "ऊईईई माँ... " शीला के मुंह से कराह निकल गई... हाय.. कहीं से अगर एक लंड का बंदोबस्त हो जाए तो कितना अच्छा होगा... एक सख्त लंड की चाह में वह तड़पने लगी.. थैली से उसने एक मस्त मोटी मुली निकाली और उस मुली से अपनी चुत को थपथपाया... एक हाथ से भगोष्ठ के संग खेलते हुए दूसरे हाथ में पकड़ी हुई मुली को वह अपने छेद पर रगड़ रही थी। भोसड़े की गर्मी और बर्दाश्त न होने पर, उसने अपनी गांड की नीचे तकिया सटाया और उस गधे के लंड जैसी मुली को अपनी चुत के अंदर घुसा दिया।

लगभग १० इंच लंबी मुली चुत के अंदर जा चुकी थी। अब वह पूरे जोश के साथ मुली को अपने योनिमार्ग में रगड़ने लगी.. ५ मिनट के भीषण मुली-मैथुन के बाद शीला का भोसड़ा ठंडा हुआ... शीला की छाती तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी। सांसें नॉर्मल होने के बाद उसने मुली बहार निकाली। उसके चुत रस से पूरी मुली सन चुकी थी.. उस प्यारी सी मुली को शीला ने अपनी छाती से लगा लिया... बड़ा मज़ा दिया था उस मुली ने! मुली की मोटाई ने आज तृप्त कर दिया शीला को!!

मुली पर लगे चिपचिपे चुत-रस को वह चाटने लगी.. थोड़ा सा रस लेकर अपनी निप्पल पर भी लगाया... और मुली को चाट चाट कर साफ कर दिया।

अब धीरे धीरे उसकी चुत में जलन होने शुरू हो गई.. शीला ने चूतड़ों के नीचे सटे तकिये को निकाल लिया और दोनों जांघें रगड़ती हुई तड़पने लगी... "मर गई!!! बाप रे!! बहुत जल रहा है अंदर..." जलन बढ़ती ही गई... उस मुली का तीखापन पूरी चुत में फैल चुका था.. वह तुरंत उठी और भागकर किचन में गई.. फ्रिज में से दूध की मलाई निकालकर अपनी चुत में अंदर तक मल दी शीला ने.. !! ठंडी ठंडी दूध की मलाई से उसकी चुत को थोड़ा सा आराम मिला.. और जलन धीरे धीरे कम होने लगी.. शीला अब दोबारा कभी मुली को अपनी चुत के इर्द गिर्द भी भटकने नही देगी... जान ही निकल गई आज तो!!

शाम तक चुत में हल्की हल्की जलन होती ही रही... बहनचोद... लंड नही मिल रहा तभी इन गाजर मूलियों का सहारा लेना पड़ रहा है..!! मादरचोद मदन... हरामी.. अपना लंड यहाँ छोड़कर गया होता तो अच्छा होता... शीला परेशान हो गई थी.. अब इस उम्र में कीसे पटाए??

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शाम के पाँच बज रहे थे... धोबी का लड़का कपड़े देने आया था.. उसे देखकर शीला का दिल किया की उसे पटाकर ठुकवा ले.. पर उसका सुककड़ शरीर देखकर शीला की सारी इच्छाएं मर गई। जाते जाते वह पापड़तोड़ पहलवान भी शीला के बबलों को घूर रहा था। शीला भी भूखी नागिन की तरह उसे देख रही थी... फिर उसने सोचा की यह २० साल का लौंडा भला कैसे बुझा पाएगी मेरी चुत की प्यास!!!

शीला को चाहिए था एक मजबूत मर्द.. ऐसा मर्द जिसके बोझ तले शीला पूरी दब जाए... जो बिना थके शीला के भोसड़े की सर्विस कर सके... पर ऐसा मर्द कहाँ मिलेगा.. यह शीला को पता नही था

दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता था... पर रात निकालनी बड़ी मुश्किल थी। इतने बड़े मकान में वह अकेली... पूरी रात करवटें बदल बदल कर बिताती थी।

५५ वर्ष की अधेड़ उम्र की शीला की कामेच्छा अति तीव्र थी। ऊपर से उसके पति मदन ने उसे ऐसे ऐसे अनोखे आसनों में चोदा था की अब उसे सीधे साधे सेक्स में मज़ा ही नही आता था। रोज रात को वह मादरजात नंगी होकर.. अलग अलग स्टाइल में मूठ मारकर सोने की कोशिश करती। पर जो मज़ा असली लोडे में है.. वह अगर गाजर, ककड़ी या शक्करकंद में होता तो लड़कियां शादी ही क्यों करती!!!

स्त्री का जन्म तभी सफल होता है जब मस्त लंड उसकी चुत में जाकर भरसक चुदाई करता है। मूठ मारना तो मिसकॉल लगाने जैसा है.. कोशिश तो होती है पर सही संपर्क नही होता...

सुबह ५ बजे, फिरसे डोरबेल बजी और शीला की आँख खुल गई। खुले स्तनों को गाउन के अंदर ठूंस कर, एक बटन बंद कर वह दूध लेने के लिए बाहर आई। दरवाजा खोलते ही उसका मूड खराब हो गया। आज रसिक की पत्नी दूध देने आई थी।

"क्यों री, आज दूध देने तू आ गई? तेरा मरद नही आया?" शीला ने पूछते तो पूछ लिया फिर उसे एहसास हुआ की इसका दूसरा अर्थ भी निकल सकता था। गनीमत थी की वह गंवार औरत को ज्यादा सूज नही थी वरना जरूर पूछती की आपको दूध से मतलब है या मेरे मरद से!!!

"वो तो पास के गाँव गया है.. नई भेस खरीदने.. ग्राहक बढ़ते जा रहे है और दूध कम पड़ रहा है... साले जानवर भी चालक बन गए है... जितना खाते है उस हिसाब से दूध नही देते है.. " दूधवाले की पत्नी ने कहा

शीला हंस पड़ी "क्या नाम है तेरा?"

"मेरा नाम रूखी है" उसने जवाब दिया

शीला ने सर से लेकर पैर तक रूखी का निरीक्षण किया... आहाहाहा इन गांवठी औरतों का रूप गजब का होता है..!! शहर की पतली लौंडियो का इसके रूप के आगे कोई मुकाबला ही नही है... ज़ीरो फिगर पाने के चक्कर में.. आजकल की लड़कियों के आम सुखकर गुटलियों जैसे बन जाते है। और नखरे फिर भी दुनिया भर के रहते है। असली रूप तो इस रूखी का था.. उसके बबले शीला से बड़े और भारी थे.. असली फेटवाला दूध पी पी कर रूखी पूर्णतः तंदूरस्त दिख रही थी। उसकी छाती पर लपेटी छोटी सी चुनरी उन बड़े स्तनों को ढंकने में असमर्थ थी। गेंहुआ रंग, ६ फिट का कद, चौड़े कंधे, लचकती कमर और घेरदार घाघरे के पीछे मदमस्त मोटी मोटी जांघें.. झुककर जब वह दूध निकालने गई तब उसकी चोली से आधे से ज्यादा चूचियाँ बाहर निकल गई..

शीला उस दूधवाली के स्तनों को देखती ही रह गई.. वह खुद भी एक स्त्री थी... इसलिए स्तन देखकर उत्तेजित होने का कोई प्रश्न नही था.. पर फिर भी इस गाँव की गोरी की सुंदरता शीला के मन को भा गई। ध्यान से देखने पर शीला ने देखा की रूखी की चोली की कटोरियों पर सूखा हुआ दूध लगा हुआ था.. शीला समज गई.. की उसके स्तनों में दूध आता है.. उसने थोड़े समय पहले ही बच्चे को जनम दिया होगा!! दूध के भराव के कारण उसके स्तन पत्थर जैसे सख्त हो गए थे... उन्हे देखते ही शीला को छूने का दिल किया. वैसे भी शीला १ नंबर की चुदैल तो थी ही..!!

लंड के लिए तरसती शीला.. रूखी का भरपूर जोबन देखकर सिहर गई.. उसका मन इस सौन्दर्य का रस लेने के लिए आतुर हो गया.. और योजना बनाने लगा..

कहते है ना... की प्रसव से उठी हुई और बारिश में भीगी हुई स्त्री के आगे तो इंद्रलोक की अप्सरा भी पानी कम चाय लगती है..!!

"रूखी.. मुझे तुझसे एक बात करनी है.. पर शर्म आ रही है... कैसे कहूँ?" शीला ने पत्ते बिछाना शुरू किया

"इसमें शर्माना क्या? बताइए ना भाभी" रूखी ने कहा

"तू अंदर आजा... बैठ के बात करते है.. "

"भाभी, अब सिर्फ दो चार घरों में ही दूध पहुंचना बाकी है.. वो निपटाकर आती हूँ फिर बैठती हूँ.. थकान भी उतार जाएगी और थोड़ी देर बातें भी हो जाएगी"

"हाँ.. हाँ.. तू दूध देकर आ फिर बात करते है... पर जल्दी आना" शीला ने कहा

"अभी खतम कर आई.. आप तब तक चाय बनाकर रखिए" रूखी यह कहती हुई निकल गई

चाय बनाते बनाते शीला सोच रही थी.. की अगर रूखी के साथ थोड़े संबंध बढ़ाए जाए तो उसके बहाने रसिक का आना जाना भी शुरू हो जाएगा... और फेर उससे ठुकवाने का बंदोबस्त भी हो पाएगा... एक बार हाथ में आए फिर रसिक को गरम करना शीला का बाये हाथ का खेल था.. एक चुची खोलकर दिखाते ही रसिक का लंड सलाम ठोकेगा..

रसिक के लंड का विचार आते ही शीला की जांघों के बीच उसकी मुनिया फिर से गीली होने लगी... खुजली शुरू हो गई.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म के कोने से अपनी चुत दबाकर वह बोली "थोड़े समय के लिए शांत हो जा तू.. तेरे लिए लंड का इंतेजाम कर ही रही हूँ.. कुछ न कुछ जुगाड़ तो करना ही पड़ेगा" रूखी को सीढी बनाकर रसिक के लंड तक पहुंचना ही पड़ेगा!!

क्या करूँ... क्या करूँ.. वह सोच रही थी... रूखी अभी आती ही होगी

उसका शैतानी दिमाग काम पर लग गया.. एक विचार मन में आते ही वह खुश हो गई... "हाँ बिल्कुल ऐसा ही करूंगी" मन ही मन में बात करते हुए शीला ने एक प्लेट में थोड़ा सा दूध निकाला और अलमारी के नीचे रख आई.. अब इंतज़ार था रूखी के आने का!!

थोड़ी ही देर में रूखी आ गई... शीला ने उसे अंदर बुलाया और मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।

"कहिए भाभी, क्या काम था?" रूखी ने पूछा

५-५ लीटर के कनस्तर जैसी भारी चूचियों को शीला देखती ही रही..

शीला ने संभालकर धीरे धीरे बाजी बिछाई

"रूखी, बात दरअसल ऐसी है की आँगन में रहती बिल्ली ने ३ बच्चे दिए है... बड़े ही प्यारे है.. छोटे छोटे... अब कल रात किसी कमीने ने गाड़ी की पहिये तले उस बिल्ली को कुचल दिया" शीला ने कहा

"हाय दइयाँ.. बेचारी... उसके बच्चे अनाथ हो गए.. " भारी सांस लेकर रूखी ने कहा

"अब में उस बिल्ली के बच्चों के लिए दूध रखती हूँ... पार वह पी ही नही रहे... भेस का दूध उन्हे कैसे हजम होगा? अभी दो दिन की उम्र है बेचारों की.. "

"माँ के दूध के मुकाबले और सारे दूध बेकार है भाभी.. बोतल का दूध पियेंगे तो मर जाएंगे बेचारे" रूखी ने करुणासभर आवाज में कहा

"इसीलिए आज भगवान ने तुझे भेज दिया... अब मुझे चिंता नही है.. वह बच्चे बच जाएंगे" शीला ने कहा

"वो कैसे?" रूखी को समझ नही आया

"देख रूखी... तेरी छाती से दूध आता है... अगर तो रोज अपना थोड़ा थोड़ा दूध निकालकर देगी... तो वह बिचारे बच जाएंगे.. नही तो १-२ दीं में ही मर जाएंगे... और पाप तुझे लगेगा.." शीला की योजना जबरदस्त थी

"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाने के बाद भी बच जाता है"

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"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाता है फिर भी बचता है। कभी कभी तो लल्ला पीते पीते सो जाता है... और छाती पूरी खाली न हो जाए तो इतना दर्द होता है की कपड़ा रखकर दबाकर दूध निकालना पड़ता है... लल्ला का बाप अगर जाग रहा हो तो वो भी थोड़ा बहुत चूस लेता है" इतने कहते ही रूखी शरमा गई

"आप चिंता मत करो भाभी, में वैसे भी दिन में कई दफा यहाँ से गुजरती हूँ.. आते जाते एक कटोरी में दूध निकाल दूँगी... बेचारे उन नन्हें पिल्लों को ओर चाहिए भी कितना!!! दो तीन घूंट में तो उनका छोटा सा पेट भर जाएगा.. लाइये कटोरी.. ये तो बड़े पुण्य का काम है... अब छाती में इतना दूध बनता ही है तो फिर इस्तेमाल करने में भला क्या हर्ज??"

इतना कहते ही रूखी ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए... शीला दो घड़ी देखती ही रह गई... बड़े बड़े पके हुए नारियल जैसे बोबलों में से एक स्तन रूखी ने बाहर खींचा... दूसरी तरफ का दूध से भरा हुआ थन भी आधा बाहर लटक गया... देखते ही शीला के भोसड़े में खुजली शुरू हो गई।

शीला भागकर किचन से कटोरी लेकर आई और कटोरी को रूखी के स्तन के नीचे रख दिया। रूखी ने निप्पल को दबाया पर दूध नही निकला

"अरे भाभी, पता नही आज क्यों दूध नही निकल रहा? वैसे तो रोज, दबाते ही फव्वारा छूट जाता है..."

"आएगा रूखी... थोड़ा इंतज़ार तो कर!!"

"भाभी, आप दबाकर देखो... शायद दूध निकले"

शीला जबरदस्त उत्तेजित हो गई.. पर उसने थोड़ा सा नाटक किया..

"मुझे तो शर्म आती है रूखी"

"क्या भाभी, इसमे भला कौनसी शर्म? आपने भी तो अपने बच्चों को दूध पिलाया ही होगा ना!!"

"हाँ, वो बात तो सही है तेरी... पर उसे भी बहोत वक्त हो गया न रूखी..."

"जल्दी निकालिए न भाभी" कहते हुए रूखी ने शीला का हाथ पकड़कर अपने दूध से भरे स्तन पर रख दिया।

आहह... पत्थर जैसा सख्त और कडा स्तन!! उसे छूते ही शीला की चुत का दूध टपकने लगा..कुछ देर के लिए तो शीला रूखी के स्तन को बस सहलाती ही रही..

"सहला क्यों रही हो भाभी? दबाओ ना!!" रूखी ने कहा

शीला रूखी की बगल में बैठ गई.. और धीरे धीरे रूखी के स्तन को दबाने लगी.. शीला ने ब्लू फिल्मों में कई बार लेस्बियन द्रश्य देखे थे... और दो साल से, अपनी पति की गैर-मौजूदगी में उसकी हालत खराब हो गई थी... जैसा आपने पहले पढ़ा ही है

बिना रूखी की अनुमति के शीला ने उसका दूसरा स्तन भी चोली से बाहर निकाल दिया... रूखी की निप्पल पर दूध की बूंद उभर आई...

"आया आया दूध... अब निकलेगा... और दबाइए भाभी पर जरा धीरे से.. दर्द हो रहा है... और ध्यान से... कहीं इसकी पिचकारी आपकी साड़ी पर ना गिरे.."

रूखी ने अपनी आँखें बंद कर ली। शीला अब स्तनों को दबाने के साथ साथ खेल भी रही थी। रूखी की बंद आँखें देखकर वह समझ गई की वह भी उत्तेजित हो गई थी।

शीला ने पूछा "क्या हुआ रूखी? आँखें क्यों बंद कर दी? बहोत दर्द हो रहा है क्या?"

"नही नही भाभी... अमम कुछ नही.. "

"नही, पहले तू बता... आँखें क्यों बंद कर दी?" शीला अड़ी रही

"वो तो.. ही ही ही.. जाने भी दीजिए न.. आप समझ रही है फिर भला क्यों पूछ रही हो?"

"सच बता... मजा आ रहा है.. अपने पति की याद आ रही है... है ना..!!"

"वो तो भाभी... काफी महीनों के बाद किसी के हाथ ने छातियों को छुआ.. तो थोड़ा बहोत तो होगा ही ना!"

"क्यों? तेरा मरद दबाता नही है क्या?"

"क्या बताऊँ भाभी!! वो तो पूरा दिन खेत में काम करके ऐसा थक जाता है की रात होते ही घोड़े बेचकर सो जाता है.. कभी कभी जब छाती में ज्यादा दूध भर जाएँ और में उन्हे जगाऊँ तो थोड़ा बहोत चूस लेते है... बस इतना ही"

"पर मरद जब दबाता है तब मजा तो बहोत आता है... है ना!!"

"वो तो है... आप भी कैसा सहला रही हो.. क्या क्या याद आ गया मुझे" रूखी ने शरमाते हुए कहा

"रूखी, मेरा पति दो सालों से देश के बाहर है.. मुझे याद नही आता होगा.. सोच जरा!!"

"याद तो आपको जरूर आता होगा भाभीजी"

"रूखी, में तेरा दूध चखकर देखूँ? मैंने कभी खुद का दूध भी कभी नही चखा था.. पता नही कैसा स्वाद होगा इसका?"

"थोड़ा सा मीठा मीठा लगता है भाभी"

शीला जानबूझकर यह सारी बातें कर रही थी ताकि रूखी को गरम कर सके... और फिर वह अपना दांव खेल पाएं

रूखी की आँखें फिर से लगभग बंद हो गई.. तभी शीला ने रूखी की सख्त निप्पल को अंगूठे और उंगली के बीच दबाकर मसल दिया..

"ओह्ह भाभी... पता नही आज क्या हो रहा है मुझे!!!" रूखी ने शीला की जांघों पर हाथ रखते हुए कहा

शीला के शरीर को किसी ने दो सालों से छुआ नही था... शीला की जिस्म की आग भड़क गई.. उसने रूखी की निप्पल को पकड़कर खींचा

"ऊई माँ... भाभी.. दुखता है मुझे" रूखी ने कहा

शीला की हथेली रूखी के दूध से भर गई.. उस दूध को शीला ने रूखी के गालों पर चुपड़ दिया... जैसे दोनों हाथों से रंग लगा रही हो.. गाल पर नाक पर होंठ पर... पूरे चेहरे पर उसने रूखी के दूध को मल दिया.।

पिछले चार महीनों से दबी हुई रूखी की चुत की खुजली की स्प्रिंग, इसके साथ ही उछल पड़ी

उसने शीला से कहा.. "भाभी, आप दूध चखना चाहती थी तो... चखिए ना..!!"

शीला समझ गई... की रूखी उसे अपने स्तन चूसने का खुला निमंत्रण दे रही थी.. पर शीला एक नंबर की मादरचोद है.. वह ऐसे अपने पत्ते खोलने वालों में से नही थी

शीला ने रूखी के गालों पर लगे दूध को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया... शीला की गरम जीभ का स्पर्श अपने गालों पर होती ही रूखी बेकाबू होने लगी। उसने शीला के सिर को पकड़ लिया और फिर "आहह आहहह ओह्ह ओह्ह" करते सिसकियाँ भरने लगी।

"रूखी, तू भी मेरे दबा दे" शीला ने फुसफुसाते हुए रूखी के कानों में कहा

"ओह भाभी... मन तो मेरा कर रहा था पर आपसे कहने में शर्म आ रही थी" कहते ही रूखी ने शीला के गाउन में हाथ घुसाकर उसके मम्मों को पकड़ लिया

कुछ महीनों पहले ही हुई डिलीवरी के कारण.. रूखी भी काफी महीनों से बिना चुदे तड़प रही थी... उसने शीला के दोनों बबलों को दबाते हुए अपने चूतड़ को.. नीचे सोफ़े पर रगड़ना शुरू कर दिया... इतनी तेज खुजली होने लगी थी उसे... शीला सब समझ गई.. और अब वह दोनों अपनी भूख और आग को शांत करने में मशरूफ़ हो गई।

शीला अब खड़ी हो गई... और उसने अपना गाउन उतार दिया... और मादरजात नंगी हो गई। शीला के गोरे गदराए बदन को रूखी देखती ही रह गई।

"रूखी, में दो साल से भूखी हूँ.. मुझसे अब ओर रहा नही जाता... आहहह" कहते ही शीला ने झुककर रूखी के होंठों को एक गाढ़ चुंबन दे दिया।

"भाभी, आहहह... मुझे भी... आहह.. कुछ कुछ हो रहा है.. हाये.. मर गई.."

शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपनी बिना झांटों वाली बुर पर रख दिया.. "ओह रूखी... इसके अंदर आग लगी हुई है.. ऐसा लग रहा है जैसे ज्वालाएं निकल रही है.. कुछ कर रूखी.. आहहह"

रूखी ने शीला की कामरस से गीली हो चुकी चुत पर हाथ फेरा.. दूसरे हाथ से उसने शीला के कूल्हों को चौड़ा कर उसकी गाँड़ के छेद पर उंगली फेर दी.. और शीला को अपनी ओर खींच लिया.. और बोली

"भाभी... मेरे भी कपड़े उतार दो न!!"

शीला को बस इसी पल का इंतज़ार था.. उसने तुरंत रूखी की चोली के बचे-कूचे हुक निकाल कर उतार दिया... और उसकी चुनरी घाघरा भी उतरवा दिया.. और रूखी को सम्पूर्ण नंगी कर दी..

शीला ने रूखी को अपनी बाहों में कसकर जकड़ लिया.. दोनों औरतें... हवस में इतनी लिप्त हो गई की शीला अपनी चुत पर रूखी की कडक निप्पल को रगड़ने लगी... और रूखी, शीला के स्तनों को चाटते हुए निप्पल को चूसने लगी।

"भाभी, अब और बर्दाश्त नही होगा.. बहोत दिन हो गए है.. अपनी उँगलियाँ डाल दीजिए अंदर.. ओह ओह्ह.. भ.. भाभी.. ऊई माँ... पता नही क्यों आज इतनी चूल मची हुई है अंदर!! रहा ही नही जाता.. हायय..." रूखी तीव्रता से अपनी चुत को शीला के स्तनों पर रगड़ते हुए उल-जुलूल बकवास कर रही थी।

शीला भी... रूखी की चुत में दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर कर रही थी... साथ ही वह रूखी की मांसल जांघों को अपनी मुठ्ठी से नोच रही थी। रूखी भी अब शीला के स्तनों पर टूट पड़ी.. इस हमले से शीला बेहद उत्तेजित हो गई.. कूदकर अपने दोनों पैर उसने रूखी के कंधों के इर्दगिर्द लगा दिए.. और वहीं लेट गई.. शीला का भोसड़ा रूखी के मुंह के करीब आ गया।

रूखी कुछ समझ सके उससे पहले शीला ने अपना तपता हुआ भोसड़ा रूखी के मुंह पर दबा दिया.. अब रूखी के पास उसे चाटने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। उसकी जीभ काम पर लग गई और शीला के गुलाबी भोसड़े को चाटने लगी। चाटते चाटते रूखी ने अपने चूतड़ों को एक फुट ऊपर कर दिया... शीला समझ गई की रूखी भी उसकी तरह झड़ने की कगार पर थी। शीला ने रूखी की चुत में एक साथ चार उँगलियाँ घोंप दी.. और रूखी का क्लिटोरिस मुंह में लेकर अपनी जीभ से ठेलने लगी..

"ऊई.. भाभी... हाँ बस वहीं पर... वैसे ही करते रहिए.. याईईई... मसल दो मेरे बेर को.. हाँ वहीं पर.. हाय.. बहोत खुजली हो रही है.. आज तो चबा चबा कर मेरे जामुन को चूस लो भाभी... ऐसा मजा तो पहले कभी भी नही आया... हाय भाभी... ऊई माँ.. में गई भाभीईईईईई... !!" कहते हुए रूखी थरथराने लगी और झड़ गई

शीला भी कहाँ पीछे रहने वाली थी!! उसने भी रूखी के मुंह पर चुत रखकर अपनी टंकी खाली कर दी..

दोनों औरतें काफी वक्त तक ऐसे ही पस्त पड़ी रही

"मज़ा या गया भाभी... कितने दिनों से कुछ करने का मन कर रहा था... पर क्या करती!! कीससे कहती!!" रूखी ने कहा

"रूखी, तेरा जोबन तो इतने कमाल का है... तेरा पति तुझे नंगी देखकर जबरदस्त गरम हो जाता होगा!!"

"भाभी, शुरू शुरू में तो वह दिन में तीन बार, मेरी टांगें चौड़ी कर गपागप चोदता था... पर जब में पेट से हो गई.. तब से उसने चोदना बंद कर दिया.. बच्चा हुए इतने महीने हो गए फिर भी अब तक हरामी ने नीचे एक बार ठीक से हाथ तक नही फेरा है"

ऐसे ही बातचीत करते रहने के बाद रूखी चली गई। उसके साथ हुए इस मजेदार संभोग को याद करते करते शीला ने रात का खाना खाया और सो गई। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करते ही उसे रूखी के मदमस्त गदराए मोटे मोटे स्तन नजर आने लगे... आहह.. कितने बड़े थे उसके स्तन... उसकी नंगी छातियों के उभार को देखकर ही मर्दों के कच्छे गीले हो जाएँ.. नीलगिरी के पेड़ के तने जैसी उसकी जांघें.. बड़े बड़े कूल्हें.. भारी कमर.. आहह.. सबकुछ अद्भुत था... !! हालांकि गंवार रूखी को ठीक से चुंबन करना नही आता था.. और वह चुत चाटने में भी अनाड़ी थी.. यह बात शीला को खटकी जरूर थी.. हो सकता है लंड चूसने में माहिर हो.. पर क्या रूखी ने कभी लेस्बियन अनुभव कीया होगा पहले? वैसे तो शीला के लिए भी यह प्रथम अनुभव था.. पर उसने ब्लू फिल्मों में ऐसे कई द्रश्य पहले देखे हुए थे.. तो उसे प्राथमिक अंदाजा तो था ही.. हो सकता है रूखी ने भी कभी ऐसी फिल्में देखी हो..उसके पति ने उसे इतनी बार ठोका है तो मोबाइल में बी.पी. भी दिखाया ही होगा..

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ऐसे ही बातचीत करते रहने के बाद रूखी चली गई।

उसके साथ हुए इस मजेदार संभोग को याद करते करते शीला ने रात का खाना खाया और सो गई। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करते ही उसे रूखी के मदमस्त गदराए मोटे मोटे स्तन नजर आने लगे... आहह.. कितने बड़े थे उसके स्तन... उसकी नंगी छातियों के उभार को देखकर ही मर्दों के कच्छे गीले हो जाएँ.. नीलगिरी के पेड़ के तने जैसी उसकी जांघें.. बड़े बड़े कूल्हें.. भारी कमर.. आहह.. सबकुछ अद्भुत था... !!

हालांकि गंवार रूखी को ठीक से चुंबन करना नही आता था.. और वह चुत चाटने में भी अनाड़ी थी.. यह बात शीला को खटकी जरूर थी.. हो सकता है लंड चूसने में माहिर हो.. पर क्या रूखी ने कभी लेस्बियन अनुभव कीया होगा पहले? वैसे तो शीला के लिए भी यह प्रथम अनुभव था.. पर उसने ब्लू फिल्मों में ऐसे कई द्रश्य पहले देखे हुए थे.. तो उसे प्राथमिक अंदाजा तो था ही.. हो सकता है रूखी ने भी कभी ऐसी फिल्में देखी हो..उसके पति ने उसे इतनी बार ठोका है तो मोबाइल में बी.पी. भी दिखाया ही होगा..

शीला के भोसड़े में नए सिरे से आग लग गई.. ऐसे ही विचारों में उसकी आँख लग गई.. और तब खुली जब डोरबेल बजने की आवाज सुनाई दी..

वह जाग गई.. "आज रसिक आया हो तो अच्छा.. " मन में सोचते हुए उसने दरवाजा खोला। सामने रसिक ही खड़ा था..

"कैसे हो रसिक?" पतीली में दूध डाल रहे रसिक को चौड़ी छाती को भूखी नज़रों से घूरते हुए शीला ने कहा। वह सोच रही थी की अभी यहीं रसिक उसे पकड़कर चोद दे तो कितना मज़ा आएगा!!

"आपने फिर फोन नही कीया मुझे, भाभी?" रसिक ने पूछा

"अरे में भूल ही गई मेरे काम में.. अंदर आ रसिक.. बैठ थोड़ी देर.. " शीला ने न्योता दिया

"नही भाभी.. अभी और बहोत घरों में दूध देने जाना है.. टाइम पर नही पहुंचता तो सब चिल्लाते है.. " रसिक ने कहा

शीला ने झुककर अपने गोरे गोरे मम्मों का जलवा दिखाकर रसिक को थोड़ी देर वहीं रुकने पर मजबूर कर दिया।

"भाभी अब में जाऊँ?" थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रसिक ने कहा

"सुबह जल्दी निकला करो तुम.. तो यहाँ पर थोड़ी देर बैठकर आराम कर सकेगा" शीला ने कहा

"वो तो ठीक है भाभी... पर कहाँ सुबह सुबह आपकी नींद खराब करूँ!! आप भी पूरा दिन काम कर के थक जाती होगी"

शीला सोच रही थी... की मेरी थकान उतारने के लिए ही तो तेरी जरूरत है!! क्या हकीकत में ये रसिक इतना नादान है!! तभी रूखी को चोदता नही है..

शीला के मदमस्त बबले देखकर रसिक का लंड मेंडक की तरह कूदने लगा था जो शीला ने देख लिया। वह सोच रही थी की कल तो ये रसिक जल्दी आए या न आयें.. पर अभी चुत के अंदर जो आग लगी है, उसका में क्या करूँ? कैसे बुझाऊँ??

उसने कहा.. "रसिक, तू जल्दी आ जाया कर.. नींद का क्या है.. वो तो में दोपहर में पूरी कर लूँगी.. और वैसे भी मुझे रात को ठीक से नींद आती नही है"

"क्यों भाभी, भैया की बहुत याद आती है?"

"याद तो आती ही है..." कहते हुए शीला ने मदहोश होकर अंगड़ाई ली.. स्लीवलेस गाउन में से नजर आती उसकी गोरी काँखों को देखकर रसिक के लंड ने बगावत कर दी।

"भाभी, थोड़ा पानी मिलेगा? सुबह सुबह साइकिल चला कर गला सुख गया है"

शीला तुरंत किचन से पानी का ग्लास भरकर ले आई.. और रसिक को देते वक्त उसके हाथ को अच्छे से छु लिया.. रसिक भी शीला के हाथों को छूकर मस्तराम बन गया..

रसिक का लोडा उसके पतलून में तंबू बनाकर फुँकार रहा था.. पानी पीकर ग्लास लौटाते हुए उसने फिर से शीला के हाथ को जानबूझकर छु लिया।

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शीला की चुत में सुरसुरी होने लगी थी। उसने बाहर दोनों तरफ देखा.. चारों तरफ घनघोर अंधेरा था.. उसने यह मौका हड़प लिया.. और रसिक का हाथ पकड़कर खींचते हुए घर के अंदर ले गई और उससे लिपट पड़ी।

"आहह रसिक.. ऐसे क्यों खड़ा है.. मुझे कुछ कर ना.. कब तक ऐसे अनाड़ी बना रहेगा? कुछ समझता ही नही है तू तो..!!"

रसिक भी आखिर मर्द था.. उसने शीला के न्योते का स्वीकार करते हुए उसे कमर से जकड़ लिया.. आगोश में भरकर दबा दिया.. दो जवान धड़कनें एक हो गई.. शीला के भूखे स्तन रसिक की छाती से दब कर चपटे हो गए.. उन कडक बबलों का गरम स्पर्श अपनी छाती पर महसूस होते ही, रसिक दूध बेचना भूल गया.. वह अपने हाथों से शीला के भूखी जिस्म की भूगोल का मुआयना करने लगा...

रसिक की पतलून के ऊपर से ही शीला ने उसका लंड पकड़ लिया और दबाते हुए बोली

"रसिक.. यह तो खूँटे जैसा मोटा बन चुका है.. इसे इस हालत मे लेकर कहाँ घूमेगा तू!!"

"ओह भाभी... आपको देखकर ही यह ऐसा मोटा बन गया है" रसिक ने कराहते हुए कहा

"फिर देर किस बात की है रसिक... टूट पड़ मुझ पर और रौंद दे मुझे, हाय... "

"भाभी, आपका ये जोबन...कितना जबरदस्त है"

शीला ने रसिक के पतलून में हाथ डाल दिया और उसके नंगे राक्षस जैसे लंड को पकड़ लिया। उसने रसिक के होंठ पर अपने होंठ रख दिए और मस्त कामुक तरीके से चूसने लगी। पतलून के अंदर लंड को आगे पीछे कर हिलाते हुए अपने स्तनों को रसिक की छाती पर रगड़ने लगी। रसिक भी शीला के नितंबों पर हट्ठ फेर रहा था।

शीला अब घुटनों के बल बैठ गई.. और पतलून की चैन खोलकर रसिक के लंड को बाहर निकाला। रसिक के विकराल लंड को देखकर शीला पानी पानी हो गई। सोच रही थी की ये लंड है या ओएनजीसी की पाइपलाइन!!!! इतना बड़ा... !!!! बबुल के तने जितना मोटा.. उसका सुपाड़ा एकदम लाल था.. टमाटर जैसा.. जैसे अभी शेर शिकार कर आया हो और उसका मुंह खून से लथपथ हो ऐसा डरावना लग रहा था.. पर शेर कितना भी खूंखार क्यों न हो.. शेरनी भला उससे थोड़े ही डरती है!!

शीला को अब डर के बदले रसिक के लंड पर बेशुमार प्यार आ रहा था.. उसने बड़े ही प्यार से उसके लंड को चूम लिया..

"आहहह भाभी" अपने लंड को थोड़ा सा धक्का देते हुए रसिक ने शीला के मुंह में डाल दिया.. लगभग ४ इंच जितना!! शीला रसिक का लंड चूसने लगी और उसके बोलबेरिंग जैसे अंडकोशों को अपने हाथ से सहलाने लगी। रसिक के लंड की सख्ती से शीला इतनी उत्तेजित हो गई की अपना मुंह फाड़कर जितना हो सकता था उतना लंड अंदर लेने लगी और आखिर लंड के मूल तक पूरा अंदर लेकर रही।

दो साल की प्यास को आज बुझाने के लिए शीला पूर्णतः तैयार थी। पति की गैरमौजूदगी में उसने बीपी में देखे हुए लंड चुसाई के सारे सीन का अनुभव काम पर लगा दिया था.. इसके परिणाम स्वरूप रसिक "आहह ओहह" करते हुए कराह रहा था। रसिक के लिए यह बिल्कुल ही नया अनुभव था। उसकी गंवार पत्नी रूखी ने कभी उसका लंड नही चूसा था। इस प्रथम अनुभव को रसिक और लंबा खींच नही सका.. सिर्फ दो ही मिनट में उसने शीला के मुंह में अपनी सारी मर्दानगी को उंडेल दिया।

शीला का पूरा मुंह रसिक के गरम लावारस जैसे वीर्य से भर गया। उसे यह जरा भी अंदाजा नही था की रसिक इतने जल्दी झड जाएगा। शीला की प्यास बुझती इससे पहले तो रसिक ठंडा हो गया!! रसिक ने तुरंत अपना लंड शीला के मुंह से निकाला और पेन्ट में रखकर चैन बंद कर दी और बोला

"आज तो मज़ा आ गया भाभी, कल और जल्दी आऊँगा.. आज देर हो गई है"

"रसिक, तेरा काम तो हो गया पर मेरा क्या? मेरी कश्ती तो किनारे पर आकर डूब गई!!" उदास शीला ने कहा "कुछ भी कर पर आज मुझे चोद कर ही जाने दूँगी.. भाड़ में गया तेरा दूध पर ऐसे मुझे तड़पती हुई छोड़कर मत जा" रोने जैसी शक्ल हो गई शीला की

रसिक दुविधा में आ गया.. अब क्या करें!!

"एक काम करता हूँ भाभी.. में दूध देकर सिर्फ १० मिनिट में आता हूँ, ठीक है ना!!" रसिक ने अपना कनस्तर उठाते हुए कहा

"मुझसे अब एक सेकंड भी बर्दाश्त नही होगा.. अभी के अभी चोद मुझे" कहते हुए शीला ने रसिक का हाथ खींचा और उसे बिस्तर तक ले गई और धक्का देकर लेटा दिया। तुरंत उसने अपना गाउन उतारा और नंगी हो गई... फिर रसिक पर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी..

रसिक के शरीर के ऊपर सवार होकर उसने पागलों की तरह उसके शर्ट को नोच कर फाड़ दिया.. और उसकी खुली छाती पर यहाँ वहाँ चूमने लगी। उसने रसिक के दोनों हाथों को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया और उससे मसलवाने लगी। रसिक के मुरझाए लंड पर अपनी गरम चुत को घिसने लगी। चुत का स्पर्श होते ही रसिक का लंड थोड़ी थोड़ी हरकत करने लगा पर पूरी तरह से टाइट नही हुआ। फिर भी शीला ने उस आधे मुरझाए लंड को अपने गरम सुराख पर रख दिया और पागलों की तरह कूदने लगी।

शीला का यह रौद्र स्वरूप देखकर रसिक के होश उड़ गए.. क्या करना उसे पता ही नही चल रहा था.. शीला के नंगे मम्मे उसकी उछलकूद से ऊपर नीचे हो रहे थे.. स्तनों की उछलकूद से अंदाजा लग रहा था की शीला कितनी रफ्तार से उसे चोद रही थी। को स्त्री इतनी उत्तेजित भी हो सकती है यह रसिक ने कभी सोचा नही था।

शीला के ताजमहल जैसे सुंदर नंगे जिस्म को देखकर रसिक भी उत्तेजित होने लगा.. उसका लंड सख्त हो गया.. शीला के भोसड़े में लंड की साइज़ बढ़ते ही.. उसे भी दोगुना मज़ा आने लगा और वह और उत्तेजित होकर कूदने लगी..

आखिर शीला की नाव किनारे पर पहुँच ही गई.. उसके भोसड़े से कामरस का झरना बहने लगा.. ऑर्गजम होते ही उसने रसिक के लंड को अजगर की तरह चारों तरफ से गिरफ्त में ले लिया... अपनी चुत की मांसपेशियों से उसने लंड को ऐसा दबोचा जैसे उसे फांसी देने जा रही हो।

शीला अब रसिक की बालों वाली छाती पर ढल गई.. रसिक का लँड़, शीला की चुत की गर्मी को और बर्दाश्त नही कर सका और सिर्फ १५ मिनिट के अंतराल में दूसरी बार झड़ गया..

शीला की माहवारी कब की रुक चुकी थी इसलिए गर्भ ठहरने का कोई प्रश्न ही नही था। दो साल से प्यासी उसकी चुत की धरती पर अमृततुल्य वीर्य की बूंदें पड़ते ही उसका रोम रोम पुलकित हो गया। रसिक के लंड से चुदकर वह धन्य हो गई।

सांसें नियंत्रित होते ही शीला ने चूमकर रसिक को कहा "क्या करती रसिक? मुझसे बर्दाश्त ही नही हो रहा था इसलिए... "

"वो तो ठीक है भाभी पर आपने मेरा शर्ट फाड़ दिया.. अब में कैसे दूध देने जाऊँ??" रसिक ने कहा

रसिक की फटी हुई कमीज देखकर शीला शर्म से लाल हो गई.. "रुको में तुम्हारे भैया को कोई शर्ट लाकर देती हूँ.. " अलमारी से तुरंत एक शर्ट निकालकर उसने रसिक को दीया।

"बहोत देर हो गई आज" कहते हुए रसिक ने शर्ट पहन लिया और भागा

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रसिक की फटी हुई कमीज देखकर शीला शर्म से लाल हो गई.. "रुको में तुम्हारे भैया को कोई शर्ट लाकर देती हूँ.. " अलमारी से तुरंत एक शर्ट निकालकर उसने रसिक को दीया।

"बहोत देर हो गई आज" कहते हुए रसिक ने शर्ट पहन लिया और भागा

इस तरफ शीला सीधे बाथरूम में चली गई.. गीजर चालू कर वह नहाने बैठ गई। दो साल के बाद आज उसके भोसड़े की भरजोर चुदाई हुई थी इसलिए थोड़ा दर्द हो रहा था.. पर बहोत अच्छा लगा उसे.. साले का लंड क्या मस्त था.. बस थोड़ी सी ओर ट्रैनिंग देनी पड़ेगी.. फिर एक जबरदस्त चुदाई मशीन में तब्दील हो जाएगा रसिक!! मदन के लंड से दोगुना था रसिक का लंड!! शीला अपनी बुर पर साबुन मलते हुए रसिक के मूसल के विचारों में खो गई।

शीला का भोंसड़ा रसिक का लंड पाकर खिल सा गया था। पिछले दो सालों से लंड की गर्मी के बगैर, बेचारा उसका भोंसड़ा मुरझा सा गया था। पूरा दिन सुबह की चुदाई की यादों में ही गुजर गया... शाम के साढ़े पाँच बजे रूखी आई। शीला और रूखी दोनों बातें करने में व्यस्त हो गए।

बातों बातों में शीला ने रूखी का पल्लू हटा दिया... और उसकी चोली के बटन खोलकर एक चुचे को बाहर निकाला... और उसकी निप्पल को चूसते हुए दुग्धपान करने लगी... दूध पीना बीच में ही रोककर उसने रूखी की ओर देखा.. अपने होंठों से दूध की बूंदें पोंछते हुए शीला ने कहा

"रूखी, तेरा मरद आज सुबह मुझे चोदकर गया" छिनालों जैसी मुस्कान के साथ शीला ने कहा

एक पल के लिए चोंककर रूखी मुस्कुराई और बोली "कोई बात नही भाभी.. मैंने भी मेरे मरद के दोस्त जीवा से संपर्क बना लिया है.. वो न सही तो उसका दोस्त ही सही.. वैसे आपको चुदवाने में मज़ा तो आया न!!"

"बहोत मज़ा आया.. दो साल बाद असली लंड को हाथ में पकड़ने का मौका मिला... तेरे पति का लंड तो काफी तगड़ा है री" शीला ने शरमाते हुए कहा

"अरे भाभी, आपने मेरे यार जीवा का लंड नही देखा इसलिए मेरे मरद का लंड बड़ा लग रहा है.. जीवा का लंड तो... क्या बताऊँ आपको.. गधे के लंड जितना मोटा और तगड़ा.. अंदर घुसाकर मेरी मुनिया को ऐसे ठोकता है साला.. अंदर चुत में हंगामा मच जाता है" रूखी की आँखें बंद हो गई और वह जीवा के लंड के सपनों में खो गई।

रूखी शीला की चिकन जांघों पर हाथ फेरकर मजे लेते हुए बोली "भाभी आपका शरीर तो कितना गोरा और चिकना है.. सच कहूँ भाभी तो मुझे अभी जीवा से चुदवाने का बहुत मन कर रहा है "

"तो बुला ले उसे यहाँ.. तुम दोनों अंदर के रूम में अपना कार्यक्रम करते रहना... और में छुप कर देखूँगी.." शीला ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा

"क्या सच में उसे यहाँ बुलाया सकती हूँ भाभी? पर कहीं रसिक को पता चल गया तो.. वो तो मुझे जिंदा गाड देगा" रूखी को डर लगा

"उसकी चिंता तू मत कर... मुझ पर छोड़ दे.. तू बुला ले जीवा को यहाँ" शीला ने रूखी का होसला बढ़ाते हुए कहा। वास्तव में जिस तरह रूखी ने जीवा के लंड का ब्यौरा दिया था.. शीला भी उस मुश्टंडे लंड को देखना चाहती थी...

रूखी ने अपने मोबाइल से जीवा को फोन लगाया... जीवा से बात की और शीला के घर का पता और दूसरे दिन मिलने का समय उसे बता दिया। अब शीला जीवा का लँड देखने के लिए बेकरार हो चली थी।

"भाभी, आपको भी जीवा का लंड देखना है?" रूखी ने जैसे शीला के मन की बात पढ़ ली। बिना कुछ कहे शीला ने हाँ कहते हुए गर्दन हिलाई

"आप उस खिड़की के पीछे छुप जाना.. में कैसे भी करके जीवा को उस तरह घुमाऊँगी जिससे की आपको उसका लंड दिख जाए" रूखी ने कहा

"ठीक है रूखी... अभी मैं सोच रही हूँ की रसिक को फोन करूँ.. उसने मुझे फोन करने के लिए कहा था.. तू भी सुन की तेरा पति कैसे बात करता है" शीला ने शैतानी मुस्कान के साथ कहा

"हाँ हाँ भाभी.. लगाइए फोन" उत्सुकता वश रूखी ने कहा

शीला ने रसिक को फोन लगाया.. रसिक के फोन उठाने का इंतज़ार करती हुई शीला के स्तन रूखी मसल रही थी

"अभी रिंग जा रही है... और रूखी.. तू जरा धीरे धीरे दबा... रसिक से बात चल रही हो तब जोर से मत मसलना... वरना मेरी चीख निकल जाएगी और उसे पता चल जाएगा.. " तभी रसिक ने फोन उठाया " हैलो" शीला ने कहा

"अच्छा हुआ भाभी आपने फोन किया... मैं आपको ही याद कर रहा था" रसिक ने कहा

"अच्छा!! क्या याद कर रहे थे?" शीला ने शरारत करते हुए पूछा

"भाभी, आपने जिस तरह मेरा मुंह में लिया था.. मज़ा आ गया.. रूखी तो कभी मेरा चूसती ही नही है" स्पीकर फोन पर यह सुनकर रूखी को गुस्सा आ गया

"रसिक, मुझे अभी चुदवाने का मन कर रहा है.. आ जा घर पर अभी" शीला ने कहा

"नही आ सकता भाभी... अभी खेत पर हूँ.. " रसिक ने कहा

"पर रसिक.. मुझसे रहा ही नही जाता... क्या करूँ?"

"आप यहाँ खेर पर या जाओ भाभी.. यहाँ कोई नही है... खेत में छोटा स कमरा बना है और उसमे खटिया भी है"

"खेत में भला तूने खटिया क्यों रखी है तूने? रूखी को वहाँ ले जाकर चोदता है क्या?" शीला ने पूछा

"रूखी मिले तो रूखी... और ना मिले तो सूखी.. में तो यहाँ खेत में काम करने आती मज़दूरनों को भी चोद देता हूँ" रसिक ने ताव में आकर कहा "और वैसे उस रूखी को बच्चों से फुरसत ही कहाँ मिलती है कभी.. "

"गजब का खिलाड़ी है रे तू रसिक.. " शीला ने हंसकर कहा

"खिलाड़ी मैं नही.. मेरा लंड है भाभी। इसे रोज चुत चाहिए.. अब घर में नही मिलती तो बाहर से लाकर भी इसे खुश रखना पड़ता है"

"तुम्हें तो बाहर मिल जाती है.. मुझ जैसी का क्या? में कहाँ जाऊँ?"

"आपको कहीं जाने की जरूरत नही है.. दोपहर के समय मेरे खेत पर आ जाइए.. रसिक का लंड आपकी सेवा में हाजिर रहेगा"

शीला हंसने लगी और कुछ नही बोली

"एक बात पूछूँ भाभी.. क्या आप रूखी को आपके जैसा लंड चूसना सीखा देंगे?" रसिक ने पूछा

"वो तो मैं कैसे सिखाऊँ उसे.. उसके सामने अगर तेरा लंड चुसूँगी तो वो कैसे सह लेगी भला"

"वो तो मुझे भी पता है भाभी पर आप ही कुछ करो ना!! रूखी एक नंबर की गंवार अनपढ़ है... " रसिक ने शिकायती स्वर में कहा

"जैसे तुम मर्दों को लंड चुसवाना अच्छा लगता है वैसे ही हम औरतों को अपनी पुत्ती चटवाना बहुत पसंद होता है यह तो पता है ना तुझे!! तो क्या कभी तूने रूखी की चुत को चाटकर उसे खुश किया है?" शीला ने वेधक सवाल पूछा

"क्या भाभी आप भी... वहाँ भला कौन चाटता है!!" रसिक ने हँसते हुए कहा

"बहनचोद सुबह तो बड़ी मस्ती से चुसवाया था तब कितना मज़ा आया था तुझे... एक मिनट में ही मेरे मुंह में मलाई गिरा दी थी.. वैसे ही हम औरतों को अपनी चुत चटवाने में मज़ा आता है" शीला ने कहा

"अरे भाभी... क्या कहूँ.. आपने सुबह जिस तरह मेरा लंड चूसा था... उसे याद करते हुए मैंने सुबह से पाँच बार मूठ मार दी.. मेरा हाथ भी दर्द करने लगा है.. लगता है आज क्रोसिन लेनी पड़ेगी... इतनी बार पानी निकालने के बावजूद लंड फिर खड़ा हो गया है.. क्या करूँ बताइए" रसिक ने कहा

"आजा घर पर.. और मेरी गांड में डाल दे.. तेल लगाकर तैयार रखती हूँ" शीला ने चुटकी लेते हुए कहा

"क्या भाभी... गांड में भी कोई डालता है भला" अबुद्ध रसिक ने कहा

"क्यों नही डाल सकते.. घर पर आ तुझे सब सिखाती हूँ"

"आप तो जबरदस्त हो भाभी... रूखी अगर आपके जितनी माहिर होती तो मुझे इन मजदूरनों के गंदे भोसड़े चोदने नही पड़ते... कुछ सिखाओ आप उसे भाभी" रसिक ने कहा

"रसिक, मुझे तो एक साथ दो मर्द चोदे ऐसा भी बहुत पसंद है.. कभी तू अपने किसी दोस्त को लेकर घर आजा... सब साथ में मजे करेंगे."

"सच में भाभी!! मेरा एक दोस्त है रघु.. उसकी बीवी कुएं में गिरकर मर गई थी.. तब से बेचारा चुत के लिए तड़प रहा है.. अगर आप कहों तो कल हम दोनों सुबह दूध देने आपके घर आयें??" रसिक के मन में लड्डू फूटने लगे

"हाँ तो आ जा.. मैं तो सामने से बुला रही हूँ... पर जरा जल्दी आना ताकि पूरा वक्त मिलें.. मुझे आराम से चुदवाना है.. हड़बड़ी में मज़ा नही आता" शीला ने कहा

"भाभी हम सुबह ४ बजे आ जाएंगे.. चलेगा ना!!" उत्साहित रसिक ने कहा

"पर घर पर रूखी से क्या कहेगा की इतनी जल्दी कहाँ जा रहा है?

"उसकी चिंता आप मत करो.. उसे बता दूंगा की खेत में पानी देने जा रहा हूँ "

"फिर ठीक है.. कल सुबह ४ बजे... पक्का ना!!:

"एकदम पक्का भाभी... आप बस लगाने के लिए तेल तैयार रखना" रसिक ने हँसते हुए कहा

"तू एक बार आ जा.. सब तैयार ही है" शीला ने कहा

"ठीक है भाभी, रखता हूँ" रसिक ने फोन काट दिया

फोन रखकर शीला ने रूखी के विशाल गुंबज जैसे स्तनों को दबाया और कहा "तू जीवा को आज रात यहाँ बुला ले.. पूरी रात वो यहाँ रहेगा.. सुबह जैसे ही रसिक यहाँ आएगा.. में जीवा को तुरंत तेरे घर भेज दूँगी.. ठीक है!!"

"वाह भाभी... गजब तरकीब ढूंढ निकाली आपने.. बड़ी उस्ताद हो" रूखी ने तारीफ करते हुए कहा

"रूखी, मैं अपने दिमाग और चुत दोनों का उपयोग कर सोचती हूँ " अपने सर पर उंगली रखकर हँसते हुए शीला ने कहा

रसिक कल भाभी के घर चला जाएगा... उसके जाते ही जीवा अपने पास आ जाएगा इस सोच से ही रूखी की चुत से बूंदें टपक पड़ी। पर वह ये नही जानती थी की शीला ने एक ही रात में तीन तीन लंड से चुदवाने का प्रबंध कर लिया था!!

रूखी ने लगभग १ घंटे तक शीला के साथ मस्ती की.. और फिर अपने घर के लिए निकल गई। जीवा के साथ रात बिताने के खयाल से ही वह रोमांचित हो गई थी। अब तो रसिक भी उसका कुछ नही बिगाड़ पाएगा.. क्योंकी उसकी पोल भी खुल चुकी थी। अब तक वह जीवा के साथ रिक्शा में हाइवे पर जाती.. और वहीं जितना हो सकता था उसके मजे लेती.. वो भी डरते डरते की कहीं कोई आ न जाए... उसमे उसे जरा भी मज़ा नही आता था.. जीवा का मोटी लौकी जैसा भारी लंड को वह किसी भी डर के बिना अपनी चुदासी चुत में लेना चाहती थी.. और अब उसे अपना सपना सच होता दिखाई दे रहा था

जीवा की हरएक हरकत को याद करते करते रूखी अपने घर की ओर जा रही थी... जीवा का खयाल आते ही उसके दूध से भरे हुए उरोज ओर फूल गए.. और उसके हर कदम के साथ उछलने लगे..

इस तरफ शीला... अपने दिमाग को खुद ही शाबाशी दे रही थी.. काश ये रूखी पहले मिल गई होती..!! दो दो साल से भोसड़े में गाजर मुली और ककड़ी डालकर चुत को सब्जीमंडी ना बनाना पड़ता..!! उसे ताज्जुब यह हो रहा था की आज से पहले उसे रसिक के बारे में खयाल क्यों नही आया?? वो तो कलमुँहा रोज दूध देने आता ही था!!

शीला जब भी चौराहे से गुजरती तब सारे बूढ़े उसके स्तनों को टिकटिकी लगाकर देखते.. पूरा मोहल्ला उसे ठोंकने के लिए बेकरार था.. सब जानते थे की उसका पति २ सालों से विदेश था.. और तब से वह अपने बिस्तर में करवटें बदलती रही थी.. काफी लोगों ने कोशिश भी की थी.. जब भी वह कुछ सामान खरीदने जाती तब किराने की दुकान वाला हलकट उसके बोबलों को खुलेआम ताकता रहता.. मादरचोद साला!! और सबके सामने उसे देखते हुए अपने लंड को मसलने लगा था.. यह तो गनीमत थी की उसके साथ अनुमौसी भी थे वरना वह हरामज़ादा शीला पर टूट ही पड़ता.. और वो कॉर्पोरेटर का लड़का.. होली के दिन रंग लगाने के बहाने शीला के दोनों स्तनों को मसल गया था.. भड़वा साला!!

शीला को चुदने के लिए लंड का इंतेजाम करना कोई बड़ी बात नही थी.. उसके एक इशारे पर कई सारे मर मिटने को तैयार बैठे थे.. पर उसे डर था समाज का.. आज तक शीला ने बड़े ही विश्वास के साथ अपने आप को काबू में रखा था.. पर यह कमबख्त बारिश ने पूरा काम बिगाड़ दिया... इस मौसम में शीला का भोसड़ा बेकाबू हो गया.. और फिर रूखी और रसिक ने इस आग में पेट्रोल डालने का काम किया.. चलो, जो कुछ भी हुआ ठीक ही हुआ...!!

लंड को चुत की और चुत को लंड की जरूरत तब से पड़ती आई है जब से मानवजात का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ.. शीला बस यही खयालों में थी की कब रात हो और जीवा का मूसल जैसा लंड देखने को मिले!! शीला की पुत्ती में फिर से खाज होने लगी..

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लंड को चुत की और चुत को लंड की जरूरत तब से पड़ती आई है जब से मानवजात का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ.. शीला बस यही खयालों में थी की कब रात हो और जीवा का मूसल जैसा लंड देखने को मिले!!

शीला की पुत्ती में फिर से खाज होने लगी..

जैसे तैसे समय बिताते हुए शाम के ७:०० बज गए.. उसने फटाफट शाम का खाना निपटा लिया और बेडरूम में पानी का एक जग रख दिया। आने वाले मेहमान की खातिरदारी करने के लिए वह तैयार होने लगी... बाथरूम में जाकर उसने अपनी चुत के बाल रेज़र से साफ कर दिए और उसपर क्रीम लगाकर मक्खन जैसी कोमल बना दिया.. जीवा ने आज तक उस गंवार रूखी के झांटेदार भोसड़े को देखा है.. आज जब वो शीला की मुलायम रेशम जैसी चुत को देखेगा तो उसके होश उड़ जाएंगे...

जैसे जैसे समय बीतता गया.. शीला की धड़कनें तेज होने लगी.. शीला बेडरूम में गई और अपनी साड़ी और ब्लाउस को उतार फेंका.. मदन ने सिंगापोर से जो जाली वाली ब्रा भेजी थी... वह पहन ली.. उस ब्रा की छोटी सी कटोरियों में शीला के खरबूजे जैसे स्तन कैसे समाते भला!! जैसे तैसे दबा दबाकर उसने अपने स्तनों को ब्रा के अंदर ठूंस दिया.. जैसे रिक्शा वाले ३ के बदले ५ पेसेन्जर भरते है वैसे...

उस छोटी सी ब्रा से उसके स्तन उभर कर बाहर झांक रहे थे.. आहाहाहा क्या लग रही थी शीला!! इस मस्त महंगी वाली ब्रा से शीला का सौन्दर्य झलक रहा था.. आईने में खुद के सौन्दर्य को देखकर वह अपनी चुत खुजाने लगी.. और मन ही मन बोलने लगी

"जीवा, आज तो तू गया काम से.. आज तुझे रूखी को भुला न दिया तो मेरा नाम शीला नही.. आज की रात तुझे मरते दम तक याद रहेगी.. तुझे अगर तेरे खूँटे जैसे लंड पर गुमान है तो में भी तुझसे कम नही हूँ... आ जा रात को फिर देख इस शीला के जलवे..."

शीला ने अपने पति मदन का सफेद शर्ट निकाला.. बहोत टाइट था उसके लिए पर फिर भी पहन लिया... और नीचे मस्त काले रंग का बेलबॉटम पेन्ट पहनकर उलटी घूम गई और अपने आप को आईने में देखने लगी.. बाप रे बाप.. इस पेन्ट में उसके कूल्हे क्या कातिल नजर आ रहे थे!! वाह!! अपने कूल्हों को खुद ही थपकाकर फिर उसने मरून कलर की लिप्स्टिक से अपने होंठ पोत लिए.. "यह सारी लाली तेरे लंड पर चिपक जाने वाली है जीवा... जब में तेरा... अफ़ग़ानिस्तानी केले जैसे लंड को पूरा मुंह में लेकर चुसूँगी.. "

उसने कटोरी में थोड़ा सा तेल भी निकाल कर रख दिया.. कहीं गांड मरवाने का मौका मिल जाए तो... तैयारी पूरी होनी चाहिए.. जब आग लगे तब कुआं खोदने क्यों जाना!! अलमारी से उसने महंगी शराब की बोतल निकाली जो मदन ने अपने दोस्त के हाथों भिजवाई थी.. अभी जीवा आया नही था इसलिए उसने तुरंत किचन में जाकर थोड़े काजू फ्राई कर लिए.. और ५५५ सिगरेट का पैकेट भी सजाकर टेबल पर रख दिया।

आज के भव्य चुदाई प्रसंग को शीला चार चाँद लगा देना चाहती थी... आज रात को.. न कोई डर होगा.. और ना ही कोई शर्म.. सारी हिचकिचाहट को छोड़कर आज तो मन भरकर चुदवाना था बस्स.. !!!

घड़ी का कांटा ८ बजे का समय दिखा रहा था। जीवा तो १० बजे आने वाला था.. अब दो घंटे बैठे बैठे क्या करूँ?? चलो कोई मस्त बीपी की डीवीडी चला देती हूँ... मस्त मस्त.. नंगी चुदाई वाली इतनी सारी डीवीडी पड़ी हुई है.. वो तो में भूल ही गई..!! जीवा को भी दिखाऊँगी.. की चुत कैसे चाटते है!! साले ये बीपी वाले बड़ा मस्त चुत चाटते है.. काश किसी गोरे से पाला पड जाएँ.. तो मज़ा आ जाएँ चुदवाने का!!

शीला ने ८-१० डीवीडी निकाली.. और एक के बाद एक सब लगाकर देख ली.. उसमे से एक जबरदस्त वाली फिल्म को चुना.. हाँ, ये वाली बड़ी मस्त है.. यही दिखाऊँगी जीवा को.. चूतिया पागल हो जाएगा देखके..

जैसे साज-शृंगार में कमी रह गई हो, शीला वापस बेडरूम में गई और शर्ट के बटन खोलकर अपनी काँखों पर परफ्यूम छिड़क दिया.. और आईने में फिर से अपने आप को देखने लगी.. कुछ बाकी तो नही रह गया ना!!

घड़ी में अब दस बज चुके थे.. घड़ी के पेंडुलम को देखकर वह सोचने लगी की जीवा का लंड भी उसके पतलून में ऐसे ही झूलता होगा!! जीवा.. जीवा.. कब आएगा रे तू!! हमारे देश में किसी को समय की पड़ी ही नही है!! और किसी काम के लिए देर से पहुंचना तो फिर भी समझ में आता है.. पर चुत चोदने के मौके के लिए भी लोग समय पर नही पहुँच पाते!!

शीला की चुत अब व्याकुल हो चली थी। आखिर थककर उसने रूखी को फोन लगाया.. रूखी ने जीवा के बारे में पूछकर वापिस फोन करने के लिए कहा.. वह भी तनाव में आ गई.. क्योंकी सुबह ४ बजे के बाद उसे भी तो जीवा से चुदवाना था.. !!

थोड़ी देर में रूखी का फोन आया और उसने शीला को बताया की वह शीला के घर अकेले आने से डर रहा था.. जीवा ने रूखी से कहा था की आजकल ऐसी कई घटनाएं घटी थी जिसमे चोदने के बहाने बुलाते थे और फिर बलात्कार केस की धमकी देकर पैसे मांगते थे!! इसी कारण वह डर रहा था। उसने रूखी से कहा की अगर शीला को एतराज न हो तो वह अपने दोस्त रघु को लेकर आ सकता है.. वरना वो नही आएगा!!

बहनचोद, आखिरी मौके पर अब यह नई समस्या आ गई.. जीवा तुरंत जवाब मांग रहा था की क्या करें!! अगर शीला मना करे तो सारी तैयारियों की माँ चुद जाएगी.. रूखी ने फोन पर कहा "भाभी जल्दी जवाब दीजिए.. वो आपकी गली के नुक्कड़ पर इंतज़ार कर रहा है.. आप कहो तो वो रघु के साथ आए वरना वापिस लौट जाएगा"

शीला ने सोचा.. बाप रे.. दो दो लोडे.. !!! उसने रूखी को बोल दिया "तू हाँ कह दे जीवा को.. बोल उसे की आ जाएँ.. जो होगा देखा जाएगा"

रूखी ने कहा "आप दरवाजे पर खड़े रहना.. वह बाइक पर आएगा.. हरा शर्ट पहना है उसने.. जैसे ही वो आए.. उसकी बाइक अंदर कंपाउंड में रखवा देना ताकि किसीको शक न हो!!"

"हाँ भाई हाँ.. अब तू फोन रख.. और सुबह जब रसिक घर से निकले तब मुझे फोन करके बता देना.. ताकि में जीवा और रघु को तेरे घर भेज सकु"

फोन रखकर शीला तुरंत दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई.. २ मिनट के बाद एक बाइक आया.. शीला ने दौड़कर कंपाउंड का लोहे का दरवाजा खोल दिया.. बाइक अंदर आ गया.. चारों तरफ अंधेरा था.. और हल्की हल्की बारिश भी हो रही थी... इसलिए आजू बाजू के घरवाले सब घर बंद कर बैठे थे.. वह दोनों तुरंत घर के अंदर घुस गए और शीला ने भी अंदर आकर दरवाजा लॉक कर दिया..

शीला तुरंत किचन से दो ग्लास पानी लेकर आई.. ग्लास देखते वक्त वह इन दोनों को देख रही थी "इन दोनों में से जीवा कौन और रघु कौन? पतलून उतरे तो लंड का नाप देखकर ही पता चलेगा.. "

ग्लास से पानी पीते पीते दोनों शीला के गदराए जिस्म को घूर रहे थे। शीला को ग्लास वापिस देते वक्त जीवा ने उसे कलाई से पकड़ लिया और अपनी ओर खींच लिया.. शीला अपना संतुलन गँवाकर जीवा की गोद में आ गिरी..

शीला का जबरदस्त गदराया जिस्म.. जीवा उसे आग़ोश में भरकर चूमने लगा..

"अरे रघु.. बहनचोद कातिल माल है ये.. जबरदस्त सेक्सी है ये तो!!"

:हाँ जीवा.. ऐसे तो सीधे सीधे चोदने में मज़ा नही आएगा.. लेकर चलते है इस छिनाल को खेत पर कुएं के पास.. वही पर दारू पीकर इसे खुले में चोदेंगे.. इतने छोटे से कमरे में क्या ही मज़ा आएगा!!" रघु ने कहा

इनकी बातें सुनकर शीला घबरा गई.. उसने कहा

"दारू तो यहाँ तैयार है.. और वो भी इंग्लिश.. मैं तुम लोगों के साथ किसी खेत-वेत में नही आने वाली.. जो भी करना है वो यहाँ मेरे घर पर ही होगा.. मैं बाहर नही आने वाली"

इस दौरान जीवा ने शीला के शर्ट के ऊपर से ही उसके बड़े बड़े स्तनों को मसलना शुरू कर दिया था.. रघु भी नजदीक आ गया और वह शीला की जांघों को सहलाने लगा.. उफ्फ़.. एक साथ दो मर्दों का स्पर्श होते ही शीला को जैसे करंट सा लग गया.. सिसकियाँ भरते हुए शीला ने आँखें बंद कर ली

जीवा का लंड शीला के नितंबों तले दबा हुआ था.. रघु शीला की जांघों को सहलाते हुए उसकी चुत तक पहुँच गया.. दूसरी तरफ जीवा ने शीला के शर्ट के ऊपरी दो बटन खोल दिए और अंदर हाथ डालकर उसकी मम्मों को मसल के रख दिया।

"आहहह.. जरा धीरे से.. तोड़ दोगे क्या!!" शीला अपने दोनों हाथों को पीछे की ओर ले गई और जीवा की गर्दन और बालों को सहलाने लगी।

जीवा ने शीला की जालीदार ब्रा में से उसके दोनों स्तनों को बाहर खींच निकाला.. और उसकी निप्पलों को मरोड़ते हुए शीला के गाल पर हल्के से काट लिया..

"कमीने.. मुझे खा जाएगा क्या तू!!" कहते हुए शीला खड़ी हो गई.. "रुको एक मिनट" कहते हुए उसने डीवीडी प्लेयर को रिमोट से चालू कर दिया "मस्त ब्लू फिल्म है.. देखोगे तो मन खुश हो जाएगा" कहते हुए वह जीवा के पास आकर लेट गई..

रघु ने पास पड़ी शराब की बोतल का ढक्कन खोला और शीला के जिस्म पर शराब गिराने लगा.. पूरा कमरा शराब की गंध से भर गया.. शीला का शर्ट शराब से भीग गया था जिसे यह दोनों चाटने लगे.. उसके स्तनों को चाटकर शीला की चुत और जांघों पर हाथ फेरते हुए रघु ने शीला का हाथ अपने लंड पर रख दिया.. पेन्ट के ऊपर से ही रघु के गन्ने जैसे लंड को सहलाने लगी शीला.. टीवी के स्क्रीन पर "ओ यस.. ओह येह.. फक मी" जैसी आवाजों के साथ फिरंगी रंडियाँ चुदाई में व्यस्त थी.. उन आवाजों से पूरा कमरा गूंज रहा था..

दो साल से खाली पड़े शीला के घर में आज काम-उत्सव शुरू हो गया था.. एक ही झटके में खींचकर जीवा ने शीला के शर्ट के बाकी के बटनों को तोड़ दिया और उसकी विदेशी ब्रा भी फाड़ दी.. शराब से लथपथ शर्ट और ब्रा को कोने में फेंक कर रघु और जीवा, शीला पर टूट पड़े।

भादों के महीने में गरम कुत्तिया पर जब एक कुत्ता चढ़ा हुआ हो और दो-तीन और कुत्ते ऊपर चढ़ने के बेकार कोशिश कर रहे हो.. वैसा द्रश्य था।

दोनों ने आपस में शीला का एक एक स्तन बाँट लिया.. और उसे चूसने लगे.. उसकी गुलाबी निप्पलों पर दो दो जीभ एक साथ चल जाने पर शीला सिसकने लगी.. उसके एक हाथ से वह अपने बेलबॉटम पेन्ट के ऊपर से अपनी चुत खुजा रही थी और दूसरे हाथ से रघु के लंड को पतलून के ऊपर से सहला रही थी.. खेल खेल में उसने रघु के पेन्ट की चैन खोल दी.. शीला का जिस्म अब हवस की आग से झुलस रहा था।

अब शीला का पेन्ट भी उतर चुका था.. और पेन्टी तो कहाँ फट कर गिर गई उसका पता ही नही चला.. उसके भोसड़े पर जीवा का हाथ छूते ही शीला की भोस से कामरस टपकने लगा.. रघु ने थोड़ी सी शराब शीला की चुत पर गिराई और बोतल का मुंह शीला की चुत में डाल दिया..

"बहुत महंगी दारू है.. क्यों बर्बाद कर रहे हो? उससे अच्छा तो इसे आराम से पी लो तुम दोनों" शीला ने कहा

"पहले तुझे ठीक से गीली कर लेते है.. फिर पियेंगे" जीवा ने और थोड़ा दबाव बनाकर शीला की चुत में बोतल घुसाई

"ऊई माँ.. मुझे जल रहा है.. निकालो बाहर इसे.. मर गई मैं.. आहह.. मुझे पेशाब लगी है.. में बाथरूम में होकर आती हूँ "

टीवी की ओर इशारा करते हुए रघु बोला "वो देख.. कैसे चूस रही है.. ले तू भी इसी तरह मेरा लंड चूस"

"तुम पेन्ट से लोडा बाहर निकालोगे तभी तो चुसूँगी ना... " शीला ने अपनी समस्या बताई "और टीवी में जो भी देखोगे.. वो सब कुछ हम थोड़ी ही करेंगे?"

"और क्या!! आज तो जैसा हम कहेंगे वैसा तुम्हें करना पड़ेगा... ले अब.. मेरे लोडे को सिगार समझकर मुंह में ले ले.. " चैन खुलते ही रॉयल एनफील्ड के जम्पर जैसा सख्त लंबा लंड स्प्रिंग की तरह उछलकर बाहर निकला..

"ईशशश... " रघु का बरकती लंड देखकर शीला पागल सी हो गई.. उसने झुककर रघु के लंड को चूम लिया.. रघु अब पगलाये सांड जैसा हो गया था.. शीला ने उसके टट्टे कसकर पकड़े और बच बच आवाज के साथ चूसना चालू कर दिया..

जीवा ने भी शीला के भोंसड़े में आधी बोतल घुसा दी.. और फिर अपना पतलून और कच्छा उतार फेंका.. शीला के गूँदाज स्तनों को मसलते हुए अपना मुंह शीला के मुंह के करीब ले गया और फिर बोला "अब मूत बोतल के अंदर मादरचोद.. जितना दारू कम हुआ है.. उतना फिर से भर दे.."

बिस्तर तो पहले से ही शराब गिरने से गीला था.. जीवा ने शीला के होंठों पर अपने होंठ रख दिया और जबरदस्त उत्तेजित होकर चूसने लगा.. शीला भी इस चुंबन का प्रति-उत्तर देते हुए... जीवा के होंठ चूसने लगी.. शीला को चूमते हुए जीवा अब भी उसके भोसड़े में शराब की बोतल अंदर बाहर किए जा रहा था.. शीला भी उत्तेजित होकर अपनी गांड को गोलाकार में घुमाते हुए बोतल से चुदने का मज़ा ले रही थी...

"आहहह.. ऊँहह.. हाय जीवा... अब रहा नही जाता... घुसेड़ दे बोतल पूरी की पूरी अंदर...फाड़ दो इसे" शीला बेकाबू होकर बकवास किए जा रही थी।

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बिस्तर तो पहले से ही शराब गिरने से गीला था.. जीवा ने शीला के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और जबरदस्त उत्तेजित होकर चूसने लगा.. शीला भी इस चुंबन का प्रति-उत्तर देते हुए... जीवा के होंठ चूसने लगी.. शीला को चूमते हुए जीवा अब भी उसके भोसड़े में शराब की बोतल अंदर बाहर किए जा रहा था.. शीला भी उत्तेजित होकर अपनी गांड को गोलाकार में घुमाते हुए बोतल से चुदने का मज़ा ले रही थी...

"आहहह.. ऊँहह.. हाय जीवा... अब रहा नही जाता... घुसेड़ दे बोतल पूरी की पूरी अंदर...फाड़ दो इसे" शीला बेकाबू होकर बकवास किए जा रही थी।

बोतल से चुदवाते हुए शीला रघु का लोडा पूरी हवस के साथ चूसने लगी... अब वह अपने आप पर आपा खो रही थी..

"जल्दी मूत बोतल के अंदर बहनचोद.. तेरी माँ को चोदू" जीवा ने हिंसक होकर शीला के स्तनों पर थूक दिया और बड़ी ही आक्रामकता से उसका गला दबा दिया... शीला की आँखें फट गई.. एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसकी जान ही निकल जाएगी.. दूसरी तरफ रघु अपनी ओलिम्पिक की मशाल जैसा साढ़े दस इंच लंबा लंड, शीला के मुंह के अंदर तेजी से अंदर बाहर करते हुए चुसवा रहा था और साथ ही साथ उसकी निप्पलों को अपने नाखून से कुरेद भी रहा था

शीला से अपने मूत्राशय का दबाव और बर्दाश्त न हुआ.. वह अपनी चुत में घुसी बोतल में मूतने लगी.. ५५ साल की शीला की भोस से मूत ऐसे निकल रहा था जैसे ४ हॉर्सपावर के सबमर्सीबल पंप से पानी निकल रहा हो... भख भख मूत निकलने लगा और कुछ ही पल में बोतल भर गई..

"अब बस भी कर मादरजात... इतना सारा मूत!! यार रघु.. इसका भोसड़ा है या ९ इंच का बोर..!! कितना मूत रही है ये तो!! " पर शीला अपना मूत रोक ही नही पाई

जीवा का लंड अभी भी पतलून में ही था और शीला ने देखा नही था.. उसे रघु के लंड से फुरसत मिले तो जीवा का लंड देखें!! शराब की बोतल शीला की चुत से निकालकर जीवा ने कमरे में चारों ओर उस मूत्र-मदिरा के मिक्स्चर को छिड़क दिया.. अब जिस तरह की गंध कमरे से आ रही थी उसने इन तीनों की कामवासना को भड़का दिया.. आहहह... चुत से बोतल निकल जाने पर शीला को राहत मिली

पर यह कमीना रघु.. शीला के मुंह से लंड बाहर निकालने ही नही दे रहा था.. जीवा शीला की चुत पर उंगली फेरकर उसकी गांड के छेद तक ले गया और फिर गुर्राया "चल बे कुत्तिया... उलटी लेट जा.. तुझे तो आज मैं पीछे से ठोंकूँगा.. ओ रघु.. तू जा और अपनी वाली देसी दारू लेकर आ.. यह मूत जैसा दारू तो अंग्रेजों के लिये है.. अपुन को तो चाहिए असली देसी माल.."

शीला दो घड़ी जीवा को देखकर सोच रही थी "साले ये बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद!! माँ चुदाये ये दोनों.. मुझे क्या!! मुझे तो इनके लंड मिल गए बस... भला हो रूखी का.. की वो मेरे घर आई.. और यह दो लंड मिल गए.. वरना मूठ मार मारकर मेरी तो चुत ही छील जाती.. "

रघु तुरंत बाइक की डिकी से ५-६ प्लास्टिक की थैली में भरी देसी दारू लेकर आ गया.. और दोनों एक के बाद एक ३-४ थैलियाँ पी गए!!

"अब मज़ा आएगा जीवा.. " दारू लगा हुआ मुंह पोंछते हुए रघु ने कहा

"हाँ यार रघु... असली मज़ा तो देसी पीने में ही आता है" कहते हुए जीवा खड़ा हो गया और अपनी पतलून उतार दी..

अरी मोरी अम्मा...!! जीवा का लंड देखकर शीला के पसीने छूट गए.. क्रिकेट के स्टम्प जैसा जीवा का लंड देखकर वह सोच रही थी की रूखी ऐसे लंड से चुदवाकर गदरा गई थी... ऐसे लंड से चुदवाने की आदत लगने के बाद अगर चुदाई बंद हो जाए तो औरत पराए लंड ढूँढे वह लाजमी ही था..

"शीला, चल उलटी होकर कुत्तिया बन जा.." शीला के मस्त मखमली चूतड़ों पर थप्पड़ मारते हुए जीवा ने कहा

रघु ने ५०१ पताका बीड़ी सुलगाई.. और दम मारते हुए अपना लोडा शीला के हाथ में थमा दिया.. शीला को ऐसा लगा मानो लोहे का गरम सरिया हाथ में पकड़ लिया हो

"बाप रे.. इतना बड़ा मेरी चुत में कैसे जाएगा!!"

"सिर्फ चुत में ही नही.. गांड में भी जाएगा मेरी रानी.. एकाध देसी दारू की थैली पी ले.. तो ताकत आ जाएगी मरवाने की.. नहीं तो गांड फट जाएगी हमारा लेते लेते.. समझी!!"

"मैं शराब नही पीती.. " शीला ने कहा

"बहनचोद... ज़बान लड़ाती है.. आज तो जो हम कहेंगे वही तुझे करना पड़ेगा, समझी कुत्तिया.. " कहते हुए रघु ने शीला के गालों पर सटाक से एक तमाचा धर दिया.. रघु ने तुरंत देसी दारू की थैली खोली और जबरन शीला के मुंह को पकड़कर उसे पीला दिया...

आक थू.. इतना गंदा स्वाद.. !! शीला ने जीवन में पहली बार शराब चखी.. और वो भी देसी.. पूरा मुंह कड़वा हो गया... उसे उलटी आने लगी..

"वाह शीला वाह... ले अब इस बीड़ी के दो दम लगा.. " हँसते हुए रघु ने शीला को जबरदस्ती बीड़ी का दम खींचने पर मजबूर किया

खाँसती हुई शीला इस सदमे से उभरती उससे पहले जीवा ने शीला को धक्का देकर उल्टा सुला दिया और उसके कूल्हों को पकड़कर ऊंचा कर दिया.. शीला थरथर कांप रही थी.. अपने पूरे जीवन में उसने इतने लंबे और तगड़े लंड की कल्पना नही की थी.. कभी कभार बीपी फिल्मों में कल्लुओ के विकराल लंड से गोरी राँडों को ठुकवाते देखा जरूर था.. तब वह सोचती की कैसा लगता होगा ऐसे मूसल लंड से चुदवाकर!! और अब जब वैसे ही विकराल लंड उसे चोदने की तैयारी में थे तब उसकी गांड फट गई!!

शीला की कमर को कसकर पकड़कर जीवा ने अपना अजगर जैसा लंड शीला की चुत के सुराख पर रखा..

"ऊई माँ.. " शीला की क्लिटोरिस को जैसे अंगारे ने छु लिया.. उसके चूतड़ थरथराने लगे.. चुत में गजब की चूल मचनी शुरू हो गई.. जीवा उसे तड़पा रहा था.. शीला इंतज़ार में थी की कब एक दमदार धक्का लगे और उसकी चुत चौड़ी हो जाएँ!! पर जीवा भी जैसे शीला को अपने लंड की अहमियत समझाना चाहता हो वैसे शीला की पुत्ती और जामुन पर अपना देसी सुपाड़ा रगड़े जा रहा था.. उसके लोडे का यह घर्षण शीला की चुत को ओर दीवाना और गीला बना रहा था। शीला अब बेकाबू सी होने लगी थी

"जीवा... आहहह.. ऐसे तड़पा मत मुझे.. जल्दी डाल दे अंदर.. जीवा!!" जीवा ने अपनी जलती हुई बीड़ी शीला के चूतड़ पर लगा दी और जोर जोर से हंसने लगा.. शीला की आँख में आँसू आ गए.. पर भोसड़े की भूख इतनी तीव्र थी की बीड़ी की जलन को अनदेखा कर उसने अपनी गांड को और ऊपर कर लिया

"प्लीज.. जल्दी डाल.. क्यों तड़पा रहा है मुझे.. मुझसे नही रहा जाता.. जीवा कब तक अपने लंड को यूँ ही घिसता रहेगा!! मेरी चुत में हाहाकार मचा हुआ है... जल्दी कर भड़वे.. " झुमर की तरह लटक रही अपनी चूचियों को शीला खुद ही मसलते हुए दर्द भरी विनती की.. और अपनी उंगलियों से अपना भगोष्ठ रगड़ने लगी..

"आह्हहह... " चिल्लाते हुए जीवा ने एक जबरदस्त धक्का लगाया.. उस धक्के से शीला एक फुट जितनी आगे चली गई.. ये तो अच्छा हुआ की जीवा ने उसे कमर से पकड़कर रखा था.. वरना वो बिस्तर से नीचे गिर जाती.. एक धक्के में जीवा ने अपना पूरा लंड शीला के भोसड़े में दे मारा..!!

शीला की आँखों के सामने अंधेरा छा गया.। "ऊई माँ... जीवा मादरचोद... जरा धीरे से.. दीवार में कील ठोक रहा है क्या? ऐसे भला कौन डालता है!!"

"ऐसे ही मज़ा आता है... शीलू मेरी जान.. अब देख.. मैं तुझे कैसे कैसे चोदता हूँ... " कहते हुए जीवा ने अपने डीजल इंजन का पिस्टन चलाना शुरू किया। हरएक धक्के पर शीला का शरीर उत्तेजना से उछलने लगा.. "आहहह आहहह जीवा.. चोद मुझे.. बहोत भूखी हूँ.. ओह जीवा.. जबरदस्त है लंड तेरा... रूखी सच कहती थी.. बड़ा दमदार है तेरा लोडा.. भोसडा फाड़ दिया आज तो... तेरे बाप ने कीस चक्की का आटा खाकर तुझे पैदा किया था..!! हरामी साले!! क्या मस्त ठुकाई करता है रे तू!! माँ चुदाने गया मदन.. आज से तू ही मेरा पति है.. कुत्तिया बनाकर पूरी रात चोद मुझे.. आहहह आहहह आहहह...डाल जोर से... और जोर से घुसा.. " कमर को कसकर पकड़कर जीवा शीला के ईवीएम में धड़ाधड़ मतदान करने लगा.. शीला भी अनुभवी रांड की तरह अपनी हवस मिटाने के लिए इस बोगस मतदान में सहयोग देने लगी..

उनके सामने रघु शराब पीते हुए तले हुए काजू खा रहा था.. और ५५५ सिगरेट के कश लगा रहा था.. उसका लंड, मस्त कलंदर की तरह सख्त खड़ा हुआ था.. जिसे मुठ्ठी में पकड़कर संतुलित रख रहा था वोह..

शीला की चुत उस दौरान कई बार झड़ गई.. मदमस्त हथनी की तरह जीवा और रघु के बीच सेन्डविच बनकर मजे लेने लगी।

घड़ी में रात के २ बज चुके थे.. और अभी तो रसिक का आना बाकी था.. उसे आना में अभी दो घंटे थे.. इसलिए शीला निश्चिंत थी..

लगातार मूसल चुदाई के कारण शीला को पेट में थोड़ा दर्द होने लगा.. इन मर्दों को ये डॉगी स्टाइल क्यों इतनी पसंद है? पूरा लंड बच्चेदानी तक जाके टकरा रहा है.. लंड का सुपाड़ा ऐसे टकरा रहा है जैसे आरसीसी से बनी छत तोड़ रहा हो..

रघु खड़ा होकर शीला के पास आया.. और उसके मुंह के आगे अपना लंड धर दिया.. क्या मदमस्त काले नाग जैसा लंड था रघु का!! अद्भुत.. !! शीला की आँखों से बस ६ इंच की दूरी पर.. ठुमकते हुए ऊपर नीचे हो रहा था। शीला उस लंड को देखकर जैसे खो ही गई.. सोच रही थी.. क्या रघु का लंड मदन से बड़ा है?? नही.. लगभग उतना ही है.. क्या पता... मदन के लंड को देखे हुए दो साल हो गए थे.. कमीने के लंड की साइज़ भी भूल गई।

झूलते मिनारे जैसे रघु के लंड को देखकर वह रघु की हिंसक ठुकाई का दर्द भूल गई.. और धीरे से रघु के टमाटर जीतने बड़े सुपाड़े को चूम लिया.. रघु के लंड ने भी ठुमका लगाकर शीला के चुंबन का अभिवादन किया.. जिस तरह कुल्फी को देखकर छोटा बच्चा लार टपकाता है बिल्कुल वैसे ही रघु के लंड की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई..

रघु अपना लंड शीला के मुंह के ओर करीब ले गया.. और शीला के होंठों पर.. उस वीर्य की बूंद को पोंछ दिया.. कुत्ति बनकर जीवा के हथोड़ाछाप लंड से चुदती हुई शीला अब रघु के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी। जिस तरह उसने बीपी फिल्मों में देखा था उस तरह हर नए तरीके से उसने रघु के लंड को चूसते हुए... उसके पानी-पूरी की पूरी जैसे अंडकोशों के साथ खेलने लगी।

"आहाहाहा.. जीवा देख तो जरा.. क्या मस्त चूस रही है ये तो.. साली पूरा का पूरा निगल गई.. आहहह" रघु ने जीवा से कहा

शीला अपने मुंह और चुत दोनों को एक साथ बड़ी ही मस्ती से चुदवा रही थी। दो दो मस्ताने मर्द शीला को काबू में करने के लिए जैसे असमर्थ से दिख रहे थे.. उनके विकराल लंड को अब वह इतनी आसानी से झेल रही थी जैसे मलिंगा के यॉर्कर को सचिन एक झटके में बाउंड्री के पार फेंक देता है..

जीवा भी शीला की अदाओं से बेहद उत्तेजित हो रहा था.. इस गंवार अनपढ़ ने आजतक शहर की फैशनेबल स्त्री को चोदने के बारे में सपने में भी नही सोचा था.. रूखी को चोदते चोदते उसे शीला मिल गई थी.. अंधा मांगे एक आँख और मिल जाए दो..!! रघु ने तो बीवी की मौत के बाद चुदाई के सपने देखना तक छोड़ दिया था.. पर अब शीला ने उसका लंड चूसचूस कर उसे अपना गुलाम बना दिया था।

इस दुनिया में अगर किसी भी मर्द को गुलाम बनाना हो तो रोज उसका लंड अच्छे से चूसना चाहिए.. और अगर स्त्री को पूरा जीवन अपनी गिरफ्त में रखना हो तो उसकी चुत को रोज चाटकर उसे मस्त करना चाहिए

अधिकतर शादीशुदा जोड़े मुख-मैथुन से दूर रहते है.. मर्द कभी चुत नही चाटता.. ऐसी बेतुकी बातें करते है.. पर हकीकत तो यह है की रात के १० बजे के बाद यही सारे शूरवीर, अपनी बीवी के घाघरे में घुस जाते है और उसकी चुत चाटते है.. बीवी की चुत की गर्मी के आगे, अच्छे अच्छे मर्द ठंडे पड़ जाते है!!

अब जीवा ने शीला की चुत से लंड बाहर निकाला.. और उसके नितंबों को अपने लंड से ठोककर झटकाया.. अचानक चुत में से लंड निकल जाने से शीला बावरी हो गई.. और उसकी भूखी चुत के होंठ खुलना-बंद होना शुरू हो गए.. साथ ही साथ वह अपने कूल्हे भी थीरकाने लगी...

जीवा ने शीला के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों से चौड़ा किया.. जैसे किसी किले के मजबूत द्वार को खोल रहा हो.. मन ही मन खुश हो गया जीवा.. शीला की गांड के बादामी रंग के छेद को देखकर जीवा के अंदर का जानवर बाहर आने लगा.. उस टाइट छेद में अपनी छोटी उंगली डालकर उसने शीला को बेबस बना दिया.. एक तो चुत से लंड बाहर निकल गया था.. ऊपर से ये जीवा गांड के छेद पर नाखून मार रहा था..

शीला ने रघु का लंड अपने मुंह से निकाला और बोली

"जीवा.. इतनी ही देर में झड़ गया क्या तू?? भड़वे.. लंड क्यों निकाल लिया बाहर.. डाल दे अंदर.. घुसेड़ फिर से.. आहहह!!"

जीवा ने शीला की गांड में अपनी आधी उंगली घुसेड़ दी और उसके गोरे चूतड़ पर जोर से चपत लगाई... स..टा..कक!!

"चुप बे भोंसड़ीवाली.. " जीवा चिल्लाया

"ऊईईई माँ... मर गई.. साले जीवा, तुझे जो चाहिए वो करने तो दे रही हूँ तुझे.. मार क्यों रहा है साले भड़वे?" चपत के दर्द से शीला भी तप गई

जीवा ने जवाब नही दिया। शीला की गांड के छेद को उंगली से चौड़ा करते हुए उसने अपने मुंह से थूक निकाला और छेद पर लगा दिया। गरम थूक का अनुभव गांड पर होते ही शीला सहम गई.. उसने फिरसे रघु का लंड मुंह से निकाला और हाथों से हिलाते हुए बोली

"देख जीवा.. और जो भी करना है कर... पर गांड के साथ मस्ती नही। तेरा बहोत ही मोटा है... तू समझ यार.. नही जाएगा अंदर.. तू मेरे छेद की साइज़ तो देख!! और अपने गधे जैसे लंड को देख... " शीला ने घबराते हुए कहा

शीला की विनती को अनसुना कर जीवा ने अपने सुपाड़े को गांड के छेद पर टेक दिया.. और धीरे से दबाया.. उसका मोटा सुपाड़ा शीला की गांड के अंदर घुस गया... और शीला को तारे नजर आने लगे...

"जीवा प्लीज... ऐसा मत कर.. इतना बड़ा लंड किसी भी सूरत में अंदर नही जाएगा.. रघु.. तू जीवा को समझा जरा.. मेरी गांड फट जाएगी.. खुजली चुत में हो रही है तो वहाँ घुसा ना... !! गांड पर क्यों जुल्म कर रहा है!! तू समज जरा.. जियो के सिमकार्ड पर एयरटेल का रिचार्ज मत कर... ऊईईई माँ...मर गई !!!" बिलखते हुए शीला ने कहा

जीवा ने एक झटके में उसका ६ इंच जितना लंड गांड के छेद में घुसेड़ दिया.. शीला के मुंह से चीख निकल गई... उसकी चीख सुनकर रघु डर गया.. कहीं अगल बगल में किसी पड़ोसी ने शीला की चीख सुन ली तो!! उसने तुरंत अपना महाकाय लंड शीला के खुले मुंह में डालकर उसके मुंह का ढक्कन बंद कर दिया..

शीला की आवाज बंद होते ही जीवा ने दूसरा दमदार धक्का लगाया.. और शीला की गांड में अपना पूरा लोडा कील की तरह ठोक दिया..

"अममम... अघहगहह.. उम्ममम.. " शीला के लंड ठूँसे मुंह से ऐसी विचित्र आवाज़ें निकल रही थी। जीवा ने शीला की गांड में लगातार फटके लगाने शुरू कर दिए.. एक तरफ रघु का लंड मुंह में.. और जीवा का लंड गांड में.. दोनों ने शीला को दो हिस्सों में बाँट लिया था और अंधाधुन चोद रहे थे..

शीला के भोसड़े में जबरदस्त खुली हो रही थी.. जीवा ने शीला की गांड में अंदर बाहर करते हुए.. उसके लटकते हुए खरबूजों जैसे स्तनों को पकड़ लिया.. और उसकी निप्पलों को मसलते हुए... धक्कों की गति बढ़ा दी.. हर धक्के के साथ जीवा के आँड शीला की चुत को जाकर टकराने लगे.. और इसी कारण शीला को थोड़ा बहुत आनंद मिल रहा था..

जीवा की मर्दानगी पर शीला फिदा हो गई.. उसकी गाँड़ अचानक जीवा के गरमागरम वीर्य से भर गई.. और गांड के छेद से छलक कर वीर्य की धाराए, चुत के होंठों के बीच से गुजरते हुए नीचे बिस्तर पर नीचे टपकने लगी.. जीवा थककर शीला की पीठ के ऊपर ढह गया.. और हांफने लगा.. पर रघु अब भी शीला के मुंह से लंड निकालने को तैयार न था.. अब शीला ने अपना सारा ध्यान रघु के लंड को चूसने पर केंद्रित किया..

जैसे ही शीला ने अपनी जीभ का जादू शुरू किया, रघु के लंड ने भी अपना त्यागपत्र दे दिया.. शीला के मुंह से लेकर कंठ तक वीर्य का सैलाब सा फैला हुआ था.. रघु ने लंड बाहर निकाला और वही फर्श पर बैठ गया.. जीवा ने शीला की गांड से लंड बाहर निकाल लिया.. दो दो योद्धाओं को पराजित कर विजयी मुस्कान के साथ शीला नंगे बदन बिस्तर पर लेटी रही.. और अपना हाथ पीछे ले जाकर गांड के छेद को हुए नुकसान का जायजा लेने लगी..

घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"

पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..

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घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"

पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..

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शीला के गले से हल्की सी चीख निकल गई.. "आह्हहहह... !!" पर रघु ने जरा सा भी दयाभाव नही दिखाया.. और एक जोरदार धक्के के साथ अपना पूरा लंड शीला की गांड में घुसा दिया.. शीला की सेन्डविच बन गई.. और वह तीनों बड़ी ही मस्ती से चोदने लगे.. शीला के मुंह से सिसकियाँ निकल रही थी... और अपने दोनों सुराखों में चुदवाते वक्त उसका सारा ध्यान घड़ी के काँटों पर ही था..

दो दो विकराल लंड के भीषण धक्के खा खा कर शीला की गांड और भोस दोनों ही थक चुके थे.. शीला पसीने से तरबतर हो गई थी.. फिर भी उछल उछल कर चुदवा रही थी.. उसकी उछलने की गति बढ़ने के साथ ही जीवा समझ गया की शीला झड़ने की कगार पर थी.. इसलिए.. जिस तरह धोनी ने २०११ की वर्ल्डकप फाइनल की मेच में सिक्सर लगाई थी... वैसे ही जीवा ने अपने लंड से एक जोरदार शॉट लगाया..

शीला को कमर से कसकर पकड़कर जीवा ने अपने ताकतवर हाथों से शीला को हवा में उठा लिया.. लगभग एक फुट ऊपर.. और वैसे ही उसे हवा में पकड़े रख.. नीचे से जबरदस्त धक्का लगाया शीला की भोसड़े में.. "ओह.. ह.. ह.. ह.. ले मेरी शीला रानी.. आहहहहहह..!!" कहते हुए जीवा ने पिचकारी मार दी.. शीला की चुत में गरम गरम वीर्य गिरते ही वह ठंडी होने लगी.. शीला ने अपनी गांड की मांसपेशियों को बेहद कस लिया और उसी के साथ रघु का लंड भी उसकी गांड के अंदर बर्बाद होते हुए झड़ गया...

तीनों ऐसे हांफ रहे थे जैसे मेरेथॉन दौड़कर आयें हों.. शीला की गांड और चुत दोनों में से वीर्य टपक रहा था.. गांड में अभी भी दर्द हो रहा था फिर भी शीला बहुत खुश थी.. आखिरकार उसका दो मर्दों से चुदने का सपना सच हो गया था..

चार बजने में सिर्फ पाँच मिनट की देरी थी.. और तभी शीला के घर की डोरबेल बजी..

"इसकी माँ का.. रसिक ही होगा, जीवा.. अब क्या करेंगे?" शीला डर गई.. पूरे घर की हालत उसके भोसड़े जैसी ही थी.. सब तहस नहस हो रखा था... अब क्या होगा?

शीला ने तुरंत रघु और जीवा को कहा " तुम दोनों किचन में छुप जाओ.. में रसिक को लेकर बेडरूम में जाऊँगी तब तुम लोग धीरे से निकल जाना.. और हाँ.. बाइक को बिना चालू किए थोड़े दूर ले जाना.. और फिर स्टार्ट करना.. नही तो उस रंडवे को पता चल जाएगा.. जाओ जल्दी से.. "

शीला ने बेडरूम से जीवा और रघु को भगाया.. वह दोनों अपने कपड़े काँख में दबाकर किचन की ओर भागे.. उन दोनों के मुरझाए लटकते लंड देखकर शीला की हंसी निकल गई..

कपड़े पहनने का समय नही था.. और वैसे भी रसिक के अंदर आते ही फिर से उतारने थे.. ऐसा सोचकर शीला ने बिना ब्लाउस और घाघरे के.. अपने नंगे जिस्म पर सिर्फ साड़ी लपेट ली.. और अपने बबलों को साड़ी के नीचे दबाते हुए दरवाजा खोला...

"अरे, कविता तू... ??" शीला बोखला गई.. कपड़ों को ठीक करते हुए उसने पूछा

कविता पड़ोस में रहते अनु मौसी के बेटे पीयूष की पत्नी थी.. ४ महीनों पहले ही उनकी शादी हुई थी। अच्छा हुआ की बहुत अंधेरा था.. नही तो शीला को इस तरह देखकर, पता नही कविता क्या सोचती!!

"शीला भाभी, मेरे मामाजी ससुर को हार्ट-अटेक आया है.. और पीयूष मेरे सास ससुर के साथ उनके शहर गए है.. मम्मीजी ने मुझ से कहा था की अगर अकेले में डर लगे तो आपके घर आकर सो जाऊँ.. २ घंटों की ही बात है.. आपको अगर एतराज न हो तो क्या में आपके घर सो जाऊँ??" निर्दोष भाव से कविता ने इजाजत मांगी

शीला मन ही मन कांप उठी.. आज तो इज्जत का जनाज़ा निकल जाएगा.. माँ चुद जाने वाली थी..

"हाँ हाँ.. क्यों नही.. मैं हूँ ना तेरे साथ.. चिंता मत कर!!" शीला का शैतानी दिमाग काम पर लग गया... अब इस समस्या का कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा.. वह सोचने लगी... क्या करूँ!!!!

"कविता, एक काम करते है.. " शीला ने अपने पत्ते बिछाना शुरू किया

"हाँ कहिए ना भाभी!!"

"मेरा बिस्तर हम दोनों के लिए छोटा पड़ेगा.. एक साथ सो नही पाएंगे... ऐसा करते है की तेरे ही घर हम दोनों सो जाते है"

"मैं आपको वही कहने वाली थी पर संकोच हो रहा था की कैसे कहूँ... वैसे भी मुझे अपने बिस्तर के बगैर नींद नही आती.. " कविता ने कहा

"तू अपने घर जा... मैं बाथरूम होकर अभी आती हूँ.. "

"जल्दी आना भाभी... मुझे अकेले में बहोत डर लगता है.. " कविता बोली

"हाँ.. हाँ.. तू जा.. मैं तुरंत पहुँचती हूँ.. "

बच गए!! शीला ने राहत की सांस ली.. वह तुरंत किचन में गई.. जीव और रघु को कहा "जल्दी निकलो तुम दोनों... रसिक नही था.. मेरी पड़ोसन थी.. "

"हाँ... वो तो हमने आप दोनों की बातें सुनी.. हम जा रहे है.. फिर किसी दिन.. बुलाते रहना.. भूल मत जाना" जीवा ने कहा

"कैसे भूल सकती हूँ!! जरूर बुलाऊँगी.. आप दोनों निकलों.. और वह देसी दारू की थैलियाँ लेते जाना.."

रघु वो थैलियाँ लेने अंदर गया तब जीवा ने शीला को बाहों में भरकर चूम लिया.. उसके आगोश में शीला दबकर रह गई.. उसने पतलून के ऊपर से जीवा लंड पकड़ लिया... "गजब का लंड है रे तेरा जीवा.. " जीवा ने शीला के साड़ी में लिपटे स्तनों को मसल दिया और उसके गाल पर हल्के से काटते हुए अपने प्रेम से उसे सराबोर कर दिया.. वापिस आए रघु भी शीला को पीछे से लिपट पड़ा.. शीला ने उसके लंड को भी प्यार से सहलाया..

दोनों गए.. शीला की धड़कनें शांत हो गई.. अब दूसरी समस्या यह थी की रसिक का क्या करें!!

तभी रसिक की साइकिल की घंटी बजने की आवाज आई.. हाथ के इशारे से उसे घर के अंदर आने के लिए कहते हुए शीला अंदर आई.. जैसे ही रसिक घर के अंदर आया.. शीला उससे लिपट पड़ी.. और अपने स्तनों को रसिक की छाती पर रगड़ने लगी..

रसिक का लंड तुरंत ही सख्त हो गया. शीला ने घुटनों पर बैठकर उसका लंड पतलून से निकाला और चूसने लग गई.. काले डंडे जैसा उसका पूरा लंड शीला की लार से लसलसित होकर चमकने लगा..

"रसिक, मुझे आज बहोत ही जल्दी है.. बगल वाले अनु मौसी के घर उसके बेटे की बीवी अकेली है.. उन्हे अचानक शहर के बाहर जाना पड़ा.. तू फटाफट मुझे चोदे दे.. और निकल.. फिर में घर बंद कर भागूँ.. वहाँ कविता मेरा इंतज़ार कर रही है"

"ठीक है भाभी, पर बिस्तर पर चलते है ना!! यहाँ कोई देख लेगा!!" रसिक ने कहा

रसिक का लंड मुठ्ठी में भरकर आगे पीछे करते हुए शीला ने कहा "उतना टाइम नही है रसिक.. जल्दी कर.. पेल दे फटाफट" कहते हुए शीला ने दीवार पर अपने हाथ टेक दिए और साड़ी को ऊपर उठा लिया.. रसिक उसके पीछे आ गया और शीला की जांघों को थोड़ा सा चौड़ा कर अपने लंड को उसकी चुत में घुसाकर धक्के लगाने लगा.. उसे मज़ा तो नही आ रहा था पर क्या करता!!

"देख रसिक.. जल्दी कर.. और हाँ.. तुरंत घर मत पहुँच जाना वरना रूखी को शक हो जाएगा" शीला का गणित रसिक समझ नही पाया और वह बिना समझे हाँ हाँ करता जा रहा था.. उसके घर पर उसकी बीवी जीवा और रघु से चुदवा रही होगी.. और यहाँ वह शीला की हाँ में हाँ मिलाते चोदे जा रहा था

अपने कूल्हों को ऊपर उठाते हुए शीला ने कहा "अरे जल्दी कर न रसिक!! कितनी देर लगा रहा है तू? क्या टेस्ट मेच की तरह खेल रहा है!! देख आज तो में फंसी हुई हूँ.. इसलिए जल्दी करना पड़ रहा है.. पर कल तू जल्दी आ जाना.. फिर इत्मीनान से मजे करेंगे.. ठीक है.. कल चार बजे आ जाना"

"ठीक है भाभी.. " शीला की चुत में लंड अंदर बाहर करते हुए रसिक ने कहा

रसिक ने धक्के लगाने की गति बढ़ा दी.. "वाहह... आह्हह.. मज़ा आ रहा है.. घुसा अंदर तक.. ईशश.. " शीला की सिसकियाँ सुनकर रसिक झड़ गया.. शीला ने तुरंत उसका लंड अपनी चुत से बाहर निकाला.. और रसिक के सामने ही ब्लाउस और घाघरा पहनने लगी..

"भाभी आपने कपड़े नही पहने थे?" रसिक के मन में सवाल उठा

"कितनी गर्मी है.. और वैसे भी तू आने वाला था इसलिए कपड़े उतारकर तैयार बैठी थी.. तू बेकार की बातें बंद कर और निकल यहाँ से!!" शीला ने अपने जूठ को छिपाते हुए कहा

रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. और अपने घर में वापिस आकर अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..

घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...

शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा

कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

शीला ने करीब आकर कविता के होंठों पर अपने गरम होंठ रखकर एक जबरदस्त चुंबन रसीद कर दिया.. और फिर कविता का मुंह अपने दोनों स्तनों के बीच दबा दिया

शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई

"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा

"कविता, तेरे स्तन भी मेरी तरह बड़े बड़े हो जाएंगे.. तू रोज मेरे घर आकर तिल के तेल से मालिश करवा लेना.. फिर देखना तेरे बॉल कितने बड़े बन जाते है"

कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी

कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..

कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..

शीला भी पूरी रात की भीषण चुदाईयों से बहोत थक चुकी थी.. कविता के नाजुक स्तनों को मसलते हुए वह भी सो गई।

सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे

"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी

कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी

"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई

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"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी

"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई

पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था.. अभी भी देसी दारू की बदबू आ रही थी.. शीला ने तुरंत ही अगरबत्ती जलाई.. जन्नत-ए-फ़िरदौस का इत्र छिड़का.. पूरा कमरा सुगंधित हो गया..

किचन में जीवा और रघु के कारनामों की निशानी हर जगह दिख रही थी.. शीला ने सफाई करके सब ठीक-ठाक कर दिया.. मेहमानों के लिए नाश्ता भी तैयार कर दिया.. और सब कुछ फिर से चेक कर लिया.. कल रात की कोई निशानी कहीं छूट न गई हो!!

अब तक कविता का फोन क्यों नही आया? शीला सोच रही थी.. काफी देर लगा दी पिंटू ने आने में.. पता नही वो चूतिया कहाँ गांड मरवा रहा होगा? ऐसा मौका जब हाथ लगने वाला हो तब कौन बेवकूफ देर करता है!! लोग कब समय का महत्व समझेंगे!! शीला मन ही मन पिंटू को गालियां दे रही थी..

तभी फोन बजा.. कविता का ही फोन था..

"भाभी, पिंटू आ गया.. में उसे सीधे आपके घर ही भेज रही हूँ" कविता की आवाज में घबराहट थी

"तू चिंता मत कर.. भेज दे उसे.. मैं हूँ ना.. कुछ नही होगा" शीला ने ढाढ़स बांधते हुए कविता से कहा

थोड़ी ही देर में.. एक अठारह उन्नीस साल का.. हल्की हल्की मुछ वाला जवान लड़का, शीला के घर की डोरबेल बजाकर खड़ा रहा.. शीला ने अपने बड़े बोबलों को साड़ी से ठीक से ढंका और दरवाजा खोला.. उसे डर था की कहीं पिंटू ने उसकी शॉपिंग मॉल जैसी उन्नत चूचियाँ देख ली तो कविता के छोटे स्तन उसे रास्ते की रेहड़ी जैसे लगेंगे..

"आ जाओ.. तुम ही हो ना पिंटू?" जानते हुए भी अनजान बन रही थी शीला

"जी हाँ.. मैं ही हूँ पिंटू" शरमाते हुए उस लड़के ने कहा.. वह अंदर आकर सोफ़े के कोने पर बैठ गया

शीला उसके लिए पानी लेकर आई.. थोड़ा सा पानी पीकर उसने ग्लास वापिस दिया.. शरारती शीला ने ग्लास लेटे वक्त पिंटू का हाथ पकड़कर दबा दिया..

"इतना शरमा क्यों रहा है? जरा आराम से बैठ.. मैंने बिस्तर भी सजा दिया है.. तुम दोनों के लिए" अनुभवी रंडी की अदा से साड़ी के पल्लू को छाती में दबाते हुए शीला ने कहा.. सफेद रंग के ब्लाउस के अंदर उसने ब्रा नही पहनी थी.. अरवल्ली की पर्वत शृंखला के दो पहाड़ों जैसे स्तनों को पिंटू हतप्रभ होकर देखता ही रह गया.. उसका गला सूखने लगा

"तू आराम से बैठ.. अपना ही घर समझ इसे.. " कातिल मुस्कान के साथ, भारी कूल्हे मटकाती हुई शीला किचन की ओर चली गई। उसके नितंबों की लचक देखकर पिंटू के होश उड़ गए

किचन में ग्लास रखकर शीला वापिस आई और सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. उसने अपने हाथों को इस तरह जोड़ रखा था की उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर झांक रहे थे..

"आज से पहले तूने कभी ये किया है पिंटू?" शीला ने पूछा

गर्दन घुमाकर पिंटू ने "नही" का इशारा किया

तभी कविता आ गई.. शीला को बात अधूरी छोड़नी पड़ी यह उसे अच्छा नही लगा.. कविता अगर थोड़ी देर से आती तो वह इस शर्मीले लड़के के साथ कुछ गरमागरम बातें कर पाती

कविता और पिंटू को एकांत देने के हेतु से शीला घर के बाहर निकल गई। दूध या सब्जी कुछ लेना तो था नही.. सिर्फ कुछ लेने के बहाने वह घर से बाहर निकल गई.. अब क्या करूँ?? कहाँ जाऊँ? कैसे टाइम पास करूँ?? शीला सोच रही थी... तभी उसके करीब से कोई गुजरा और शीला की कमर पर चिमटी काटते हुए कहा

"किसके खयालों में यहाँ रास्ते के बीच खड़ी हुई है!! मदन भैया के बारे में ज्यादा मत सोच.. वो तो विदेश में किसी गोरी के साथ मजे कर रहे होंगे"

शीला ने चोंककर पीछे देखा.. वह चेतना थी.. उसकी पुरानी पड़ोसन

"अरे चेतना तू ?? कितने साल हो गए तुझे देखे हुए.. कितनी मोटी हो गई है तू.. लगता है तेरा पति बड़ा अच्छे से रोज इंजेक्शन दे रहा है"

चेतन ने हँसते हुए कहा "हाँ.. इंजेक्शन का ही कमाल है ... पर तू बिना इंजेक्शन की इतनी खुश कैसे लग रही है!! कहीं किसी पराये इंजेक्शन का सहारा तो नही ले रही हो ना!! कमीनी हरामखोर.. मैं सालों से जानती हूँ तुझे.. तू इतने लंबे समय तक बिना कुछ किए रह ही नही सकती.. सच सच बता मुझे"

चेतना और शीला पुरानी सहेलियाँ थी.. दोनों बहुत अच्छी मित्रता थी.. उन दोनों के पति भी दोस्त थे.. शीला और चेतन एक दूसरे के साथ बीपी की सी.डी. की लेन-देन भी चलती रहती थी.. और जब दोनों के पति ऑफिस जाते थे तब दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती भी किया करती थी। कुछ समय बाद चेतना और उसका पति, नए घर में शिफ्ट हो गए.. फिर मिलना बहुत काम हो गया.. आज काफी सालों के बाद दोनों मिलकर खुश हो गए

चेतना: "अब मुझे यहीं बीच रास्ते खड़ा ही रखेगी या घर ले जाकर चाय भी पिलाएगी!!"

शीला अब फंस गई.. घर में तो कविता और पिंटू.. ना जाने क्या कर रहे होंगे.. पर शीला और चेतना के संबंध काफी घनिष्ठ थे.. शीला उसे कोने में ले गई और कहा

"यार चेतना.. अभी मेरे घर नहीं जा सकते"

चेतना: "क्यों? कीसे घुसाकर रखा है घर पर?"

शीला ने हँसते हँसते कहा "घुसाकर तो रखा है.. पर मेरे लिए नही.. मेरे पड़ोस में एक नवविवाहित लड़की रहती है.. कविता.. उसका प्रेमी उसे मिलने आया है.. वो दोनों बैठकर बातें कर रहे है मेरे घर पर"

चेतना: "साली बहनचोद.. तू अब दल्ली भी बन गई?"

शीला: "नही यार.. अब हालात ही ऐसे थे की मुझे मदद करनी पड़ी"

चेतना: "हम्म.. तब तो जरूर तेरा कोई राज जान लिया होगा उस लड़की ने.. सच सच बता !!"

शीला: "तू थोड़ा इत्मीनान रख.. सब बताती हूँ तुझे"

शीला ने शुरुआत से लेकर अंत तक.. रूखी, जीवा, रघु औ रसिक की सारी कहानी चेतना को विस्तारपूर्वक बताई..

बातें करते करते अचानक शीला की नजर उनकी गली के नाके पर गई.. और उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई

"बाप रे.. ये लोग अभी कहाँ से टपक पड़े??!!" सामने से कविता का पति पीयूष और उसके सास ससुर आते दिखाई दिए..

"मुझे अभी के अभी उस कविता को खबर करनी पड़ेगी..वरना लोड़े लग जाएंगे.. चेतना, तू घर चल.. फिर आराम से बाकी की बातें करते है.. "

दोनों सहेलियाँ दौड़कर शीला के घर पहुंची.. अपनी चाबी से लेच-लोक खोलकर शीला ने दरवाजा खोल दिया..

इन दोनों को देखकर, कविता और पीयूष चोंक पड़े.. कविता नंग-धड़ंग पिंटू की गोद में बैठकर ऊपर नीचे करते हुए सोफ़े पर ही चुदवा रही थी। पिंटू की पतलून घुटनों तक उतरी हुई थी.. और कविता के ब्लाउस से उसके सफेद कबूतर जैसे गोरे स्तन बाहर निकले हुए थे।

कविता को शीला भाभी के सामने नग्न होने में कोई शर्म नही थी.. पर पिंटू की हालत खराब हो गई.. वह बिचारा दो अनजान औरतों के सामने नंगे चुदाई करते हुए देख लिया गया था। एक ही पल में उसका लंड मुरझाकर पिचक गया..

शीला ने कविता की तरफ देखकर कहा "तेरे सास ससुर और पीयूष घर पहुँच रहे है.. तू भाग यहाँ से.. जल्दी घर जा"

"अरे बाप रे!! इतनी देर में वापिस भी आ गए!!" कविता ने अपने कपड़े ठीक किए और पीछे के रास्ते बाहर भागी.. पिंटू उल्टा घूम गया और अपनी पतलून पहनने लगा..

शर्मसार होते हुए पिंटू ने कहा "सॉरी भाभी.. आप लोग ऐसे अचानक आ जाएंगे इसका मुझे अंदाजा नही था"

"हम नही.. वो लोग अचानक आ टपके.. इसमें कोई क्या कर सकता है?? कोई बात नही.. तू आराम से बैठ और ये बता.. मज़ा आया की नही?"

"अरे भाभी.. क्या कहूँ आप से!! मेरे लिए तो ये पहली बार था.. और कविता मुझे कुछ सिखाती ही नहीं की कैसे करना है..!! मैं कुंवारा हूँ.. पर वो तो शादीशुदा है ना!! उसे तो मुझे सिखाना चाहिए ना!!"

शीला: "मतलब? तुम लोगों ने ज्यादा कुछ नही किया??"

चेतना: "शीला, बेचारा नादान है.. अभी तो.. उसका छोटा सा है.. नून्नी जैसा.." अपनी उंगली से पिंटू के लंड की साइज़ का इशारा करते हुए चेतन ने कहा

शीला: "तूने देख भी लिया इतनी देर में? मैं ही देख नही पाई.. पिंटू.. तू चिंता मत कर.. मैं तुझे सब सीखा दूँगी.. बता.. सीखेगा मुझसे??"

चेतना: "मैं भी मदद करूंगी सिखाने में.. "

चेतना के स्तन देखकर पिंटू ललचा गया..

शीला: "देख पिंटू.. कविता तुझसे चुदवाने आई.. तो क्या वह अपने पति को बता कर आई थी क्या!! नहीं ना!! बस वैसे ही तू भी कविता को मत बताना.. की तू हमसे सिख रहा है"

पिंटू के चेहरे पर अब भी झिझक थी..

चेतना: "अबे चूतिये.. इतनी दूर से आया है.. और बिना चोदे वापिस लौट जाएगा?? ना तुझे चोदना आता है.. और ना ही तेरी छोटी सी पूपली में कोई दम.. बेटा.. इतनी छोटी नून्नी से किसी लड़की को कैसे खुश कर पाएगा!!"

पिंटू शर्म से लाल लाल हो गया.. उस बेचारे नादान लड़के को ऐसी अभद्र भाषा सुनकर बुरा लग गया.. आँख से आँसू टपकने लगे..

शीला: "चेतना बेवकूफ.. तुझे बात करने का तरीका नही आता क्या!! पिंटू का लंड छोटा है तो क्या हुआ??"

शीला पिंटू के पास आकर बैठ गई.. उसकी जांघ पर हाथ फेरते हुए उसने पिंटू का हाथ अपने गुंबज जैसे स्तनों पर रख दिया और बोली

"चिंता मत कर पिंटू.. चेतना तो पागल है.. देख.. छोटी उम्र में सब के अंग छोटे छोटे ही होते है.. तू कविता के स्तन के मुकाबले मेरे स्तन देख.. कितना फरक है!! ये तो होता ही है.. इसमे चिंता करने लायक कोई बात नही है"

सुनकर पिंटू को थोड़ा अच्छा लगा.. उसने शीला की छातियों से अपना हाथ हटा लिया..

"भाभी, मैं आपसे ये सब सीखूँगा तो कविता बुरा मान जाएगी.. "

पिंटू की दूसरी तरफ चेतना आकर बैठ गई.. और शीला का अनुकरण करते हुए वह भी पिंटू की दूसरी जांघ को सहलाने लगी.. धीरे से उसने अपने ब्लाउस की एक तरफ की कटोरी खोल दी.. पिंटू बेचारा हक्का बक्का रह गया.. !!

शीला: "अरे पिंटू, तुझे कहाँ कुछ गलत करना है.. तुझे तो बस सीखना है.. है ना!! और तू यहाँ कविता की लेने आया है.. तो क्या ये कविता के पति को पसंद आएगा!! नहीं ना!!"

पिंटू: "पर भाभी, कविता के पति को ये कहाँ पता चलने वाला है??"

शीला: "वही तो कह रही हूँ.. तू हम दोनों के पास ट्यूशन ले रहा है.. ये बात कविता को कहाँ पता चलने वाली है!! देख बेटा.. हर कोई ऐसे ही सीखता है.. अगर तुझे भी सीखना हो तो बताया.. हमारी कोई जबरदस्ती नहीं है तुझ पर.."

शीला और पिंटू के बीच इस संवाद के दौरान चेतना ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए.. और अपने स्तनों को बाहर निकाल दिया.. पिंटू तो चेतना के बड़ी निप्पलों वाले स्तन देखकर उत्तेजित हो गया.. और उसके अंदर का किशोर विद्यार्थी जाग उठा..उसकी छोटी सी नुन्नी में जान आने लगी।

चेतना ने पिंटू के लंड पर हाथ सहलाते हुए शीला से कहा "ये तो मस्त हो गया शीला.. देख तो जरा.. पतला है तो क्या हुआ!!"

शीला ने भी पिंटू का लंड हाथ में लेकर दबाकर देखा

"आह आहह भाभी.." कहते हुए पिंटू चेतना के नग्न स्तनों को पकड़कर मसलने लगा.. शीला ने पिंटू की आधी उतरी पतलून को पूरी उतार दी.. और पिंटू का लंड पकड़कर हिलाने लगी.. पिंटू सिसकियाँ भरता गया और चेतना के स्तनों को दबाता गया.. शीला ने भी अपने ब्लाउस के बटन खोल दिए और अपनी गुलाबी निप्पल को पिंटू के मुंह में देते हुए कहा

"थोड़ा चूस ले बेटा.. तो चोदने की ताकत आ जाएगी"

पिंटू छोटे बच्चे की तरह शीला की निप्पल चूसने लगा.. "बच बच" की आवाज करते हुए कभी वह शीला की निप्पल चूसता तो कभी चेतना की.. चेतना ने अपनी निप्पल छुड़वाई.. और उसका लंड चूसना शुरू कर दिया

शीला: "अबे चूतिये.. तुझे चोदना तो नहीं आता.. लेकिन चूसना भी नहीं आता क्या!! चूसते हुए ऐसे काट रहा है जैसे पपीता खा रहा हो.. ठीक से चूस"

पिंटू बेचारा.. नादान था.. ज्यादा देर अखाड़े में इन दोनों पहलवानों के सामने टीक पाने की उसकी हैसियत नहीं थी.. चेतना के मुंह में ही उसका लंड वीर्य-स्त्राव कर बैठा.. चेतना बड़ी मस्ती से.. अनुभवी रांड की तरह.. पिंटू के लंड को चाट चाट कर साफ करने लगी। पिंटू तो शीला के मदमस्त खरबूजे जैसे स्तनों में खो सा गया था.. कविता के छोटे छोटे कबूतर जैसे स्तनों के मुकाबले शीला के उभारों ने उसका दिल जीत लिया था।

चेतना: "छोकरा नादान है.. पर तैयार हो जाएगा.. थोड़ा सा ट्रेन करना पड़ेगा"

शीला: "कितना माल निकला उसके लंड से?"

चेतना: "एक चम्मच जितना.. पर मेरे पति के वीर्य के मुकाबले स्वाद में बड़ा ही रसीला था" अपनी उँगलियाँ चाटते हुए चेतना ने कहा

शीला: "हम्म.. बच्चा बोर्नवीटा पीता होगा तभी उसका माल इतना स्वादिष्ट है!!" कहते हुए शीला हंस दी.. "लंड पतला जरूर है.. पर है मजबूत.. अंबुजा सीमेंट जैसा.. देख देख.. झड़ने के बाद भी पूरी तरह से नरम भी नहीं हुआ"

चेतन ने झुककर पिंटू के अर्ध जागृत लंड की पप्पी ले ली..

"अरे पिंटू, तूने कविता की चुत चाटी है कभी?" अपना घाघरा उतारते हुए शीला ने पिंटू से पूछा.. शीला की गोरी गोरी मदमस्त जांघों को देखकर पिंटू का लंड उछलने लगा..

पिंटू: "एकाध बार किस किया है.. पर अंदर से चाटकर नहीं देखा कभी"

शीला: "देख पिंटू, अगर औरत को खुश करना है तो सब से पहला पाठ यह सिख ले.. चुत को चौड़ी करके अंदर तक जीभ डालते हुए चाटना सीखना पड़ेगा.. "

पिंटू बड़े ही अहोभाव से इन दोनों मादरजात नंगी स्त्रीओं को देखता रहा.. जैसे स्कूल के मैडम से अभ्यास की बातें सिख रहा हो.. शीला और चेतना पिंटू को प्रेम, कामवासना, चुदाई, मुख मैथुन वगैरह के पाठ पढ़ाने लगे.. तीनों एक दूसरे के सामने पूरी तरह नंगी अवस्था में थे.. उत्तेजित होकर शीला और चेतना, पिंटू के जिस्म को जगह जगह पर चूमते हुए उसके शरीर से खेलने लगे। पिंटू का लंड अब सख्त होकर झूलने लगा..

शीला: "देख ले ठीक से पिंटू.. इस तरह चुत को चाटते है" कहते हुए शीला ने चेतना को लिटा दिया और उसकी चुत पर अपनी जीभ फेरने लगी

चेतना: "ओह्ह शीला.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. "

चेतना की निप्पल उत्तेजना के मारे सख्त कंकर जैसी हो गई थी। पिंटू एकटक शीला और चेतना की इन हरकतों को देख रहा था।

चेतना: "ठीक से देख ले पिंटू.. आह्ह.. बिल्कुल इसी तरह कविता की पुच्ची को चाटना.. नहीं तो तेरी कविता किसी और से सेटिंग करके अपनी चटवा लेगी"

काफी देर तक शीला ने चेतना के भोसड़े के हर हिस्से को चाटा.. अब उसने एक साथ चार उँगलियाँ अंदर घुसेड़ दी और चाटती रही

चेतना ने थोड़े गुस्से से कहा "बहनचोद.. क्या देख रहा है!! कम से कम मेरी चूचियाँ तो मसल दे.. ऐसे ही निठल्ले की तरह बैठा रहेगा तो कुछ नहीं होगा तेरा.. !!"

सुनते ही पिंटू ने तुरंत चेतना के स्तनों को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया.. शीला की चुत चटाई से आनंदित होते हुए.. अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर चेतना झड गई.. पिंटू सब कुछ बड़े ही ध्यान से देख रहा था।

चेतना की चुत से मुंह हटाते हुए शीला ने कहा "देखा पिंटू!! लंड छोटा हो या बड़ा.. पतला हो या मोटा.. कुछ फरक नहीं पड़ता.. अगर अच्छे से चुत चाटने की कला सिख ली..तो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को खुश रख पाएगा"

पिंटू: "पर भाभी.. लड़की को असली मज़ा तो तब ही आता है ना अगर लंड लंबा और मोटा हो!!" बड़ी ही निर्दोषता से पिंटू ने पूछा

चेतना: "बात तो तेरी सही है बेटा.. मुझे यह बता.. की तुझे ५ रुपये वाली कुल्फी पसंद है या १० रुपये वाली?"

पिंटू: "जाहीर सी बात है.. १० रुपये वाली"

शीला: "बिल्कुल वैसे ही.. हम औरतों को भी १० रुपये वाली कुल्फी ज्यादा पसंद है.. पर उसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है की हमें ५ रुपये वाली कुल्फी से मज़ा नहीं आता.. कुल्फी छोटी हो तो उसे धीरे धीरे चूसकर मज़ा लेना भी आता है.. और कई बिनअनुभवी औरतों को १० रुपये वाली कुल्फी भी ठीक से खाना नहीं आता.. पिघलाकर नीचे गिरा देती है"

पिंटू: "पर भाभी.. अगर मुझे अपना लंड मोटा और तगड़ा बनाना हो तो क्या करू?"

इतना समझाने के बावजूद पिंटू घूम फिर कर वहीं आ गया.. शीला ने अपना सिर पीट लिया..

शीला: "अबे लोडुचंद.. जैसे जैसे तू बड़ा होगा वैसे वैसे तेरा वो भी बड़ा हो जाएगा.. चिंता मत कर.. देख.. अब जिस तरह मैंने चेतना की चुत चाटी थी वैसे ही तू मेरी चाटकर दिखा.. देखूँ तो सही तूने कितना सिख लिया.. समज ले की यह तेरी परीक्षा है.. अगर ठीक से नहीं चाटी तो मैं कविता को सबकुछ बताया दूँगी"

कविता का नाम सुनते ही पिंटू भड़क गया.. और शीला की जांघें चौड़ी करके बीच में बैठ गया.. शीला का फैला हुआ भोसड़ा देखकर पिंटू सोच रहा था.. कहाँ मेरी कविता की मोगरे के फूल जैसी नाजुक चुत.. और कहाँ ये धतूरे के फूल जैसा शीला भाभी का भोसड़ा !!

शीला: "यही सोच रहा है ना की कविता के मुकाबले कितनी बड़ी है मेरी!! जब मैं कविता की उम्र की थी तब मेरी भी कविता की तरह मस्त संकरी सी थी.. पर मेरे पति ने ठोक ठोक कर ऐसे रानीबाई की बावरी जैसा बना दिया.. वो तो कविता की चुत भी उसका पति चोद चोद कर चौड़ी कर ही देगा.. तू चाटना शुरू कर.. जल्दी कर बहनचोद.. इतना गुस्सा आ रहा है की तेरी गांड पर एक लात मारकर तुझे गली के नुक्कड़ पर फेंक दूँ.. " कहते हुए शीला ने अपने गुफा जैसे भोसड़े पर पिंटू को मुंह दबा दिया..

पिंटू भी शीला को खुश करने के इरादे से.. चुत चटाई की नेट-प्रेक्टिस करते हुए.. चब चब चाटने लगा.. शीला के तानों ने अपना काम कर दिया.. पिंटू कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता था.. अपनी जीभ को अंदर तक घुसेड़कर उसने शीला के भोसड़े को धन्य कर दिया.. कराहते हुए शीला अपनी गदराई जांघों को आपस में घिसने लगी..

बगल में बैठी चेतना अपने स्तनों को शीला के बबलों से रगड़ने लगी.. और शीला ने उसे खींचकर अपने होंठ चेतना के होंठों पर रखते हुए चूम लिया..

शीला ने अपनी दोनों विशाल जांघों के बीच पिंटू को दबोच लिया.. अपना स्खलन हासिल करने के बाद ही उसने पिंटू को जांघों की मजबूत पकड़ से मुक्त किया.. शीला की पकड़ से छूटते ही पिंटू दूर खड़ा होकर हांफने लगा.. बाप रे!! ये तो औरत है या फांसी का फंदा.. जान निकल जाती अभी.. पिंटू कोने में जाकर बैठ गया..

उसे बैठा हुआ देखकर चेतना उसके पास आई.. और उसे कंधे से पकड़कर खड़ा किया

चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"
 
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