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Adultery हादसा

“ठीक है कोशिश करती हूँ...”

सुरभि कपड़े हाथ में लेकर अपने वाशरूम में चली गई. स्कर्ट और टॉप पहनकर वह आईने के पास गई और खुद को निहारने लगी. वो स्कर्ट बहुत ही छोटी थी. इतनी छोटी कि मुश्किल से उसके नितंबों को ढक पा रही थी. और इतना बड़ा गला था उस टॉप का कि उसके आधे से अधिक उभार उस टॉप से बाहर निकलने को हो रहे थे. खुद को ऐसे कपड़ों में देखकर उसका चेहरा लाल हो गया था.

‘मैं कितनी हॉट लग रही हूँ... पर क्या मैं विजय के साथ इन कपड़ों में लोकेश के सामने जा सकती हूं...? नहीं नहीं ऐसा करना बड़ा अजीब लगेगा...’ सुरभि मन ही मन सोच रही थी.

तभी विजय ने दरवाजा खटखटाया. "दरवाजा खोलो सुरभि… मुझे देखने तो दो कि तुम कैसी लग रही हो."

"मैं इन कपड़ों में तुम्हारे सामने नहीं आ सकती . ये बहुत छोटे हैं," सुरभि ने शरमाते हुए कहा.

"छोटे हैं तो क्या... मैं तुम्हारा पति हूँ... मैंने तुम्हें बहुत बार नंगा देखा है. तुम्हें मुझसे तो शर्माना नहीं चाहिए."

"तुम्हारे सामने तो आ भी जाउंगी पर उसके सामने नहीं जा पाऊँगी...”

"फिर वही बात... उसने भी तो तुम्हें बिना कपड़ों के देख रखा है..."

"हाँ ये तो है लेकिन अब हालात अलग है. अब तुम भी मेरे साथ होंगे..."

"हम्म… मैं समझ सकता हूँ … पर पहले तुम एक बार बाहर तो आओ. मुझे तुम्हें इन कपड़ो में देखने दो... फिर हम फैसला करेंगे कि क्या करना है.”

सुरभि ने धीरे से दरवाजा खोला और विजय के सामने खड़ी हो गई. उसकी नजरें फर्श पर गड़ी थी.

विजय का मुँह खुला रह गया उसे देख कर.

"ओ माई गॉड... तुम तो बहुत हॉट लग रही हो सुरभि. लोकेश को हार्ट अटैक आ जाएगा जब वो तुम्हें इन कपड़ों में देखेगा. और उसके बाद मैं तुम्हारे साथ आराम से मज़े करूँगा,” विजय ने कहा.

सुरभि का चेहरा लाल हो गया.

“विजय, मैं उसके सामने ये कपड़े नहीं पहन सकती.”

विजय आगे बढ़ा और उसके नितंबों को मसलते हुए उसे अपनी बाहों में कस कर पकड़ लिया.

“तुम ये क्या कर रहे हो?" सुरभि ने शरमाते हुए कहा.

"मैं अपनी सेक्सी बीवी के साथ एन्जॉय कर रहा हूँ..."

"मैंने ये कपड़े उसके लिए पहने हैं, तुम्हारे लिए नहीं..." सुरभि हँस पड़ी.

"तुम्हें इस रूप में देख कर मैं खुद को रोक नहीं पा रहा... सच में सुरभि तुम आज बहुत हॉट लग रही हो.” इतना कहते ही वो उसके होंठों पर टूट पड़ा और अपने दोनो हाथों से उसके उभारों को मसलने लगा.

"द-दरवाजा खुला है, विजय ... लोकेश अंदर आ सकता है," सुरभि ने कहा. उसकी सांसें तेज हो रही थी. उसकी बाहों में वो पिघलती जा रही थी.

विजय ने सुरभि की बात को अनसुना किया और फिर से उसे चूमने लगा.

"दरवाजा खुला है, विजय," सुरभि ने फिर से कहा.

विजय उसकी बात को अनसुना करके फिर से अपने होंठ उसके होठों के ऊपर रख कर उसे और भी गहराई से चूमने लगा. वो दोनो ही बहुत ज़्यादा एक्साइटिड महसूस कर रहे थे.
 
अचानक विजय पीछे हटा और उसने सुरभि को घुमा दिया. उसके सामने अब सुरभि की पीठ थी.

"त-तुम क्या कर रहे हो?" सुरभि ने सिसकी लेते हुए कहा.

"प्लीज़, थोड़ा झुक जाओ, सुरभि," विजय ने कहा और उसके कंधे पर दबाव डाला.

सुरभि गहरी सांस लेते हुए उसके सामने झुक गई.

वो दोनो इतने उत्तेजित हो गए थे कि उन्हें ये भी ध्यान नहीं रहा कि उनके बेडरूम का दरवाज़ा खुला पड़ा है.

विजय ने अब ज़्यादा देर ना करते हुए सुरभि की पैंटी नीचे खींच ली और अगले ही पल उसने उसकी योनि के प्रवेश द्वार पर अपना लिंग टिका दिया. विजय खुद को उसकी योनि में धकेलने ही वाला था कि तभी लोकेश नीचे से चिल्लाया, "विजय, और कितनी देर लगेगी तुम्हें नीचे आने में? जल्दी से अपनी बीवी को लेकर नीचे आ जाओ. मैं कब से वेट कर रहा हूँ.”

विजय एक झटके में सुरभि से दूर हट गया और कहा, "वो बुला रहा है. हमें अब नीचे चलना चाहिए.”

सुरभि धीरे से विजय की ओर मुड़ी, "क्या तुम मुझे सच में इन कपड़ों में उसके पास ले जाओगे?"

“तुम नहीं जाना चाहती क्या उसके पास?”

सुरभि ने विजय के सवाल का जवाब नहीं दिया और बात को घुमा दिया. “सोच लो... ये बड़ा ही अजीब है...”

“ज्यादा मत सोचो... हमें अपनी सेक्स लाइफ को रंगीन बनाने का सुनहरा मौका मिला है... चलो चलते हैं...”

"तुम उसके कारण मुझे प्यार करते करते रुक गए..."

"मैं तुम्हें बाद में भी प्यार कर लूँगा जानू पर अभी वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है. हमें जाना होगा,” विजय ने कहा.

सुरभि ने गहरी सांस ली और खिड़की की तरफ नजरें घुमा ली.
 
लोकेश लिविंग रूम में सोफ़े पर बैठा एक टक सीढ़ियों की तरफ देख रहा था.

“वो उसे मेरी दी हुई स्कर्ट टॉप पहनाकर ज़रूर लाएगा,” वो अपनी पेंट के सामने वाले हिस्से को सहलाते हुए धीरे से बोला. उसकी पेंट में एक विशाल उभार दिखाई दे रहा था.

“मैं उसके सामने उसकी खुबसूरत बीवी की लूँगा. उसे दिखाऊंगा कि उसकी बीवी की मस्त जवानी का असली मालिक कौन है. और मैं उसको ये भी दिखाऊंगा कि असली मर्द कैसा होता है….और मैं उसे दिखाऊंगा कि कैसे सुरभि जैसी खूबसूरत महिला की ली जाती है... हाहाहा,” लोकेश ने अपने पेनिस को सहलाते हुए मन ही मन कहा और गर्व से मुस्कुराया.

सुरभि खुले दरवाजे को घूर रही थी और सोच रही थी कि क्या किया जाए. अभी भी वो विजय के साथ नीचे चलने में झिझक रही थी.

“चलो ना सुरभि... क्या सोच रही हो... वो इंतज़ार कर रहा है...”

“तुम यहीं रुक जाओ और मुझे अकेले जाने दो...?" सुरभि ने कहा.

"नहीं-नहीं... मैं तुम्हारे साथ चलूँगा. उसने मुझे तुम्हें अपने साथ लाने को कहा था..."

"तुम उसकी इतनी बात क्यों मानते हो...? क्या तुम्हें भी मेरी तरह डॉमिनेटिंग लोग पसंद है?”

“इन बातों में पड़ने का वक्त नहीं है... वो नीचे हमारा इंतज़ार कर रहा है... इससे पहले कि वो फिर चिल्लाए, हमें चलना चाहिए."

सुरभि ने लंबी गहरी सांस ली और बोली, "ठीक है... चलो चलते हैं..."

दोनों कंधे से कंधा मिलाकर दरवाजे की ओर बढ़े और बाहर निकल गए. जब वे सीढ़ियों पर पहुंचे, तो सुरभि ने नीचे लिविंग रूम में झांक कर देखा. लोकेश सोफे पर बैठा था और अपनी पेंट के ऊपर से अपने मोटे हथियार को सहला रहा था.

“हे भगवान... क्या होने वाला है आज?” उसने मन ही मन सोचा और विजय के साथ सीढ़ियों से नीचे चलने लगी. उसके गाल शर्म से लाल हो गए थे.

लोकेश की नज़रें लगातार उन पर टिकी हुई थी पर वो उससे नज़रें नहीं मिलाना चाहती थी इसलिए नीचे देखते हुए चल रही थी.

उनके नीचे पहुँचते ही लोकेश उठ कर उनके पास आया और बोला, “ये कौन है?”

सुरभि ने नज़र उठा के देखा. लोकेश के सवाल ने उसे उलझन में डाल दिया.

"य-ये मेरी पत्नी है…सुरभि,” विजय ने हैरानी में उत्तर दिया.

"तुम्हारी पत्नी?" लोकेश ने चौंकने का नाटक करते हुए कहा.

"हाँ...वही तो है," विजय ने कहा.

"ओह, हाँ ... ये तो तुम्हारी सुंदर पत्नी ही है, हाहाहा ..." लोकेश ने कहा. “क्या करूँ भाई, इन कपड़ों में पहचान में नहीं आ रही तुम्हारी बीवी. एक बात तो माननी पड़ेगी तुम्हारी. तुमने इसे इन सेक्सी कपड़ों को पहनने के लिए मना ही लिया..."

“तुम्हारी बात तो माननी ही थी…”

“बहुत खूब...”

लोकेश ने कहा और सुरभि की तरफ़ मुड़ गया. “सुरभि, क्या तुमने खुद को आईने में देखा है?"

सुरभि ने असमंजस में लोकेश की आँखों में देखा और धीरे से बोली, “हाँ देखा है...”

"तुम्हें पता है ऐसे कपड़े कोई लड़की कब पहनती है? मैं बताता हूँ…ऐसे कपड़े या तो कोई लड़की अपने पति के लिए रात को अपने बेडरूम में पहनती है या फिर पैसे कमाने के लिए किसी अजनबी के लिए होटेल के रूम में.”

सुरभि कुछ नहीं बोली. बस सुनती रही.

“पर तुम्हारा केस तो सब से अलग है. आज तुमने जो किया वह कोई आम बात नहीं है. तुम अपने पति के दोस्त के सामने ये कपडे पहन कर आ गई हो ताकि उसे अपनी जवानी से रिझा सको...”

“मैंने ये कपडे तुम्हारे कहने पर पहने हैं... मेरा तुम्हें रिझाने का कोई इरादा नहीं था...”

“बहुत बहुत मेहरबानी भाभी जी... आपकी अच्छे से मार कर बंदा आपको खुश कर देगा आप चिंता ना करो...”

सुरभि को लोकेश की बातों पर गुस्सा आ रहा था. वो कैसे विजय के सामने ऐसी बात कर सकता था. इसमें गलती विजय की ही थी. वही तो उसे इन कपड़ों में लोकेश के सामने लाया था. पर गुस्से के साथ साथ सुरभि गर्म भी हो रही थी. चुपके चुपके वो लोकेश की पैंट में तने लिंग को देख रही थी और सोच रही थी कि कहीं अब लोकेश उसे विजय के सामने ही तो नहीं ठोक देगा. वो जैसे मूड में था वो कुछ भी कर सकता था.

लोकेश ने विजय की तरफ देखा और बोला, “थैंक यू दोस्त... अब तुम जाओ... आगे मैं संभाल लूँगा.”

"मैं तुम्हें परेशान नहीं करूंगा ..." विजय ने विरोध किया.

"मैंने कहा ना... जाओ यहाँ से. मैं तुम्हें यहाँ नहीं देखना चाहता. अपने कमरे में जाओ. मैं तुम्हारी पत्नी का ख्याल रखूंगा. यहां तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है."
 
विजय ने एक पल के लिए सुरभि की ओर देखा और फिर ऊपर चला गया. उसके जाने के बाद सुरभि ने राहत की सांस ली. उसकी मौजूदगी में उसे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. अब वह इस कामुक पल का खुल कर आनंद उठाएगी.

"मैंने सोचा कि तुम्हारा बेवकूफ पति हमें परेशान करेगा ... इसलिए मैंने उसे दूर भेज दिया," लोकेश ने कहा.

"ठीक किया..." उसने धीरे से कहा.

लोकेश सोफे पर जाकर बैठ गया और बोला, “यहाँ आओ ..."

ये रिक्वेस्ट नहीं आदेश था और सुरभि मजे में सिसक पड़ी. ‘हे भगवान ये अल्फ़ा आज मेरी खूब रगडेगा,’ सुरभि ने मन ही मन सोचा और गहरी साँस लेते हुए नज़रें घुमा कर सीढ़ियों की ओर देखा.

"तुम्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है... विजय जा चुका है. वो हमें परेशान नहीं करेगा..."

"क्यों ना हम तुम्हारे बेडरूम में चलें..." सुरभि ने धीरे से कहा.

"मैंने कहा ना यहाँ आओ!" लोकेश चिल्लाया.

जिस तरह से लोकेश उसे डोमिनेट करने की कोशिश कर रहा था अभी वो सुरभि को बड़ा अच्छा लग रहा था. उसकी योनी और ज्यादा गीली होती जा रही थी.

वो चुपचाप उसकी ओर चलने लगी. उसकी आँखें फर्श पर टिकी हुई थीं. जब वह उसके करीब पहुँची, तो लोकेश ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी गोद में खींच लिया. उसके कोमल नितंब उसके क्राच पर झट से टिक गए. बैठते ही उसे लोकेश के मोटे हथियार का कडापन महसूस हुआ. इससे उसके सारे शरीर में उत्तेजना की लहर सी उमड़ पड़ी.

“मेरी भाभी कितनी अच्छी है... देखो कैसे प्यार से मेरी गोद में बैठी हुई है...”

सुरभि उसकी बात पर शर्मा गई.

लोकेश दोनों हाथों से उसके गालों को सहलाने लगा. "कितने मुलायम- मुलायम गाल हैं तुम्हारे. इसका राज तो बताओ भाभी जी...?”

“कोई राज नहीं ही...”

“कुछ तो है...”

"हमें तुम्हारे कमरे में जाना चाहिए," सुरभि ने सीढ़ियों की ओर देखते हुए कहा.

"क्यों?"

"विजय हमें यहाँ देख सकता है..."

"तो देखने दो. वैसे भी वो हमारे बारे में पहले से ही जानता है. और वो खुद ही तो तुम्हें इन कपड़ों में यहां लाया है. उसे इस सब से कोई दिक्कत नहीं है... उसे तो ये अच्छा लगेगा..."

"प-पर मुझे यहाँ खुले में शर्म आएगी..."

"चिंता मत करो भाभी ... तुम्हें यहाँ और भी ज़्यादा मज़ा आएगा,” लोकेश ने अपना हाथ उसकी स्कर्ट में डालते हुए कहा. उसने उसकी पैंटी में भी हाथ डाल दिया और फिर उसकी गुदा तक पहुँचकर उसने उसे धीरे से सहलाया.

सुरभि की मजे में सिसकी निकल गई,"आह..."

"क्या विजय ने कभी इस छेद को ठोका है?"

"न-नहीं ..."

"बेवकूफ... कहीं का... कितनी प्यारी गां...ड है तुम्हारी... अब तक तो कई बार मार लेनी चाहिए थी... क्यों नहीं छोड़ दिया उसने इसे...”

सुरभि ने उसके अश्लील सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. जवाब देती भी कैसे. उसे शर्म जो आ रही थी इन बातों के कारण.

"कोई बात नहीं ...उसने नहीं मारी तो क्या हुआ... मैं हूँ ना... आज मैं मारूंगा...” लोकेश ने अपनी उंगली से उसकी गुदा को छेड़ते हुए कहा.

सुरभि कांप गई. "तुम्हारा वहाँ फिट नहीं होगा लोकेश....”

"बिना कोशिश किए ऐसा कैसे कह सकते हैं हम? मैं ये ज़रूर ट्राई करूँगा और तुम मुझे रोक नहीं सकती ..."

बात सही थी. वो उसे नहीं रोक सकती थी और ना ही रोकना चाहती थी.

लोकेश लगातार सुरभि की गुदा को अश्लील तरीके से सहला रहा था. सुरभि उसकी उंगली से अपना ध्यान हटाने की कोशिश कर तो रही थी लेकिन यह मुश्किल था. लोकेश की उंगली उसका पूरा ध्यान खींच रही थी. उसकी अश्लील हरकतों को नज़रअंदाज करना मुश्किल था. ऐसा लग रहा था जैसे वह कोई जादू कर रहा हो उसके ऊपर. वो और ज्यादा बहकती जा रही थी. और ज्यादा गर्म होती जा रही थी. ये सब उसे हैरानी में डाल रहा था. उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी गुदा में भी इतनी कामुकता भरी है.

अचानक सुरभि को महसूस हुआ कि वो उसकी गुदा में अपनी एक उंगली डालने की कोशिश कर रहा है.

"आह ... यह अंदर नहीं जाएगी. तुम्हारी तो उंगली भी मोटी है ..." सुरभि ने कहा.

"मुझे पता है कि मेरी उंगली तुम्हारे पति के पेनिस से मोटी है. लेकिन मैं आज रुकूंगा नहीं.” इतना कहते ही वो अपनी उँगली गुदा द्वार पर गोल गोल घुमाने लगा. “थोड़ा रिलैक्स करो बॉडी को तभी ऊँगली अंदर जाएगी. तुम बेवजह डर रही हो...”

"रहने दो ना, लोकेश. क्या ये करना ज़रूरी है?" सुरभि ने सिसकते हुए कहा.

"हाँ... ज़रूरी है. इसके बिना तुम मेरा यहाँ नहीं ले पाओगे."

सुरभि ने सीढ़ियों की ओर एक परेशानी भरी नज़र डाली, यह सोचकर कि विजय क्या सोचेगा यदि वो लोकेश को उसके साथ ये सब करते हुए देखेगा.

जैसे कि लोकेश ने उसके विचारों को पढ़ लिया हो, वो तुरंत बोला, "विजय के बारे में मत सोचो. अपनी बॉडी को रिलैक्स करो...”

"कैसे करूँ रिलैक्स?" सुरभि ने झिझकते हुए पूछा. "मैंने ऐसा पहले कभी नहीं किया है."

"अपने दिमाग से विजय का डर निकाल दो. सब ठीक हो जाएगा...”
 
सुरभि ने गहरी सांस ली और अपना पूरा ध्यान अपनी गुदा पर केन्द्रित किया. धीरे धीरे उसने उसे रिलैक्स कर दिया.

“शायद अब ठीक है... अब ट्राई करो,” सुरभि शरमाते हुए बोली.

"ये हुई ना बात…गुड गर्ल…”

जैसे ही लोकेश ने अपनी ऊँगली डालनी शुरू की सुरभि की गुदा में उसे थोड़ा दर्द हुआ. "आह ... धीरे से ..." सुरभि सुइसकते हुए बोली.

"धीरे ही तो डाल रहा हूँ...इतना ओवररिएक्ट मत करो. इस छेद को उंगली से खोलना जरूरी है नहीं तो तुम मेरा ले नहीं ले पाएंगी.”

"वो तो ठीक है पर धीरे से करो..."

"अगर तुम्हें लगता है कि मैं बहुत तेज़ कर रहा हूँ, तो तुम अपने बेवकूफ पति के पास वापस जा सकती हो..." लोकेश ने गुस्से में कहा और अपनी उंगली बाहर खींच ली.

सुरभि उसकी गोद में बैठी रही. उसका विजय के पास जाने का कोई इरादा नहीं था.

"क्या हुआ? जाओ ना. तुम यहाँ क्यों बैठी हुई हो?" लोकेश ने बेरुख़ी से पूछा.

"ठीक है, जैसा तुम चाहो वैसा करो..." सुरभि ने प्यार से कहा.

"ठीक है…जैसी तुम्हारी मर्ज़ी…फिर मत कहना कि मैंने तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती की..." लोकेश ने कहा और अपनी उंगली फिर से सुरभि की गुदा में डाल दी.

"आह ..." सुरभि सिसक पड़ी. इस बार वहाँ सिर्फ़ दर्द नहीं था बल्कि उसमें खुशी का एक अहसास भी था.

"अब क्या हुआ?" लोकेश ने पूछा.

"क-कुछ नहीं ..."

धीरे-धीरे, लोकेश ने अपनी पूरी उंगली सुरभि की गुदा में धकेल दी. ये बिलकुल नया अहसास था सुरभि के लिए. दर्द तो हो रहा था उसे लोकेश की पूरी ऊँगली अपनी वर्जिन गुदा में लेकर पर उसे अलग सा मजा भी मिल रहा था.

"अरे यार ...तुम्हारा ये छेद तो बहुत टाईट है. पर कोई बात नहीं... मैं इसे अभी ढीला कर दूँगा...” लोकेश ने कहा और अपनी ऊँगली उसकी गुदा में अंदर बाहर करने लगा.

"आह ... लोकेश ..."

"क्या हुआ ...? आ रहा है ना ज़िंदगी का असली मज़ा?”

"ह-हाँ..."

अपना मुँह सुरभि के पास ले जाते हुए, लोकेश उसके कान में फुसफुसाया, "तुम एक हॉट स्लट हो. देखो तुम्हारी गां...ड मेरी उंगली को कैसे दबोच रही है.”

सुरभि लोकेश की बात पर शर्मा गई. सच में ऐसा हो रहा था. उसकी गुदा बार बार लोकेश की ऊँगली को दबोच रही थी.

“मुझे यकीन है कि तुम्हारी गां...ड मेरे शेरू को भी ऐसे ही दबोचेगी. बोलो दबोचेगी ना?”

"मैं-मैं कुछ नहीं कह सकती. मुझे इसके बारे में कोई अनुभव नहीं है," सुरभि ने पीछे मुड कर कहा.

लोकेश तुरंत बोला, "लेकिन मुझे पता है कि तुम मदहोश होकर मज़े में चिल्लाओगी जब मेरा शेरू यहाँ घुसेगा. मैं तुम्हारी गां...ड ज़बरदस्त तरीक़े से लेने वाला हूँ…”

सुरभि उसकी ऐसी अश्लील बात सुनकर शरमा गई और उसने अपना चेहरा आगे घुमा लिया.

लोकेश ने उसका चेहरा अपनी ओर पलटा और उसकी आँखों में देखा.

“क्या है?”

“तुम बड़ी हॉट हो...” लोकश ने कहा और सुरभि के होंठों पर टूट पड़ा और उन्हें बेतहाशा चूमने लगा.

"उम्म..." सुरभि लोकेश के मुंह में ही सिसक पड़ी पर उसकी आवाज वहीं दबी रह गई.

लोकेश ने उसके होंठों को जी भर के तरह-तरह से चूसा और फिर नीचे उसके उभारों की ओर बढ़ा.

टॉप का डीप गला होने के कारण पहले से ही उसके उभार आधे से ज़्यादा लगभग बाहर ही थे. इसलिए बहुत आसानी से उसने एक उभार को पूरा निकाला और उसे चूसना शुरू कर दिया. इस बीच, उसकी ऊँगली लगातार सुरभि की गुदा में अंदर बाहर हो रही थी.

अब उसके कामुक आनंद के दो केंद्र हो गए थे, उसके उभार और नितंब.

जो भी हो रहा था इस घर में वो बड़ा ही हैरान करने वाला और अजीब था. सुरभि का पति ऊपर मौजूद था, और वह इस अड़ियल मेहमान की गोद में बैठी उसे स्त्री सुख दे रही थी. गैर मर्द था वो. उसे उस से प्यार भी नहीं था. फिर भी वो उसे स्त्री सुख दे रही थी. कोई सुनेगा तो उसे इस पर विशवास नहीं होगा. पर ये सब हो रहा था और वो इस पल का खूब आनंद ले रही थी.

"थोड़ा ऊपर को हो," लोकेश ने उसकी स्कर्ट से अपना हाथ बाहर निकालते हुए कहा.

सुरभि ऊपर को हो गई.
 
लोकेश ने अपनी पेंट की ज़िप खोली और अपने मोटे हथियार को बाहर निकाल लिया. हालाँकि सुरभि उसे पहले भी देख चुकी थी, पर उसकी आँखें फटी रह गई इस बार भी उसकी मोटाई और लंबाई देखकर. उसका सच में बहुत बड़ा था. उसे देखकर वो डर गई . वो कैसे उसे अपनी वर्जिन गुदा में लेगी. नही नही वो उसे वहां नही ले सकती... नही बिल्कुल नहीं. बचने का कोई रास्ता नहीं था फिर भी उसने कोशिश की, "मैं इसे वहाँ नहीं ले सकती, लोकेश.”

"तो फिर जाओ अपने छोटे औजार वाले पति के पास वापस ," लोकेश फिर से वही बोला जो उसने पहले कहा था. जैसे कि उसके यहाँ होने या जाने से उसे कोई फ़र्क़ नही पड रहा. जो आनंद वो अभी महसूस कर रही थी उसे भी तो वैसा ही मज़ा आ रहा होगा उसके साथ. फिर भी बार बार उसे जाने को बोल रहा था. कितना रूड था वो.

“मैं सच में चली जाऊं...”

“और क्या... अगर गां...ड नहीं देनी तो चली जाओ...”

“तुम्हारा बहुत बड़ा है लोकेश... कैसे जाएगा वहां...”

"क्या तुमने इसे आगे से नहीं लिया था?"

"हाँ वो तो है… लेकिन..."

"लेकिन वेकिन कुछ नहीं... अपनी पैंटी नीचे खिसकाओ और अपना छेद मेरे लो...डे के ठीक ऊपर लाओ," लोकेश ने कहा.

सुरभि ने एक पल के लिए इसके बारे में सोचा. ये बिलकुल नया अनुभव होगा उसके लिए. अभी कुछ देर पहले वो सिर्फ़ उसकी एक उँगली मात्र के वहाँ जाने से कितना आनंद उठा रही थी. जब उसकी ऊँगली से इतना मजा आ रहा था तो उसके शेरू से तो और ज्यादा मजा आएगा. उसे एक बार ट्राई तो करना ही चाहिए.

सुरभि ने एक गहरी सांस ली और कांपते हाथों से अपनी पैंटी नीचे खींची और अपने नितंबों को लोकेश के मोटे हथियार के ठीक ऊपर ले आई.

"थोड़ा ऊपर उठाओ," लोकेश उसके नितंबो पर थप्पड़ मारते हुए बोला.

शर्माते हुए सुरभि ने अपने नितंबों को हवा में और ऊपर उठा लिया.

"तुम्हारी गां...ड बहुत सुंदर है. आज इसे मारना ही पड़ेगा," लोकेश ने सुरभि के नितंबों को सहलाते हुए कहा.

अपनी उंगलियों पर थूक कर लोकेश ने लार को अपने मोटे हथियार पर लगायाउंग. उसने हथियार को अच्छे से चिकना कर लिया थूक से. उसने काफी सारा थूक सुरभि के गुदा द्वार पर भी लगा दिया.

अब वो पूरी तरह तैयार था सुरभि के वर्जिन नितंबों को ठोकने के लिए.

पर सुरभि को डर लग रहा था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि लोकेश का इतना मोटा हथियार उसके नितंब में कैसे जाएगा.

लोकेश ने अपने हथियार के सिरे को उसकी गुदा के छेद पर रखा और उसे कूल्हों से पकड़कर नीचे की तरफ़ खींचने लगा. उसका हथियार अंदर जाने की बजाये तुरंत छेद से दूर फिसल गया. बात साफ़ थी. वो बहुत बड़ा था छोटे से छेद के लिए.

"ये तो बहुत टाइट है ..." लोकेश बोलते हुए फिर से ट्राई करने लगा. लेकिन इस बार भी वो छेद में अपने हथियार को डाल नही पाया.

"हद हो गई" लोकेश हताशा में चिल्लाया.

"मैंने तुम्हें पहले ही बोला था कि ये अंदर नहीं जाएगा. तुम्हारा साइज़ बहुत बड़ा है."

"सभी लड़कियाँ मुझे यही बोलती हैं जब मैं उनकी पिछे से लेने लगता हूँ. लेकिन बाद में जीत मेरे शेरू की ही होती है.” इतना बोलते ही वो फिर से उसके पीछे डालने की कोशिश करने लगता है और इस बार वो थोड़ा सा अंदर धकेलने में सफल भी हो गया.

"आउच!" सुरभि जोर से चिल्लाई. दर्द उसकी बर्दाश्त से बाहर था इसलिए वो तड़प उठी, "प-प्लीज़ इसे बाहर निकाल लो, लोकेश.”

लोकेश ने अपना हथियार तुरंत बाहर निकाल लिया. "क्या हुआ?

"बहुत दर्द हो रहा था. मैं ये नहीं कर सकती..."

"तुम ये अच्छे से सोच लो कि तुम्हें ये करना है या नहीं…वरना मेरा टाइम बर्बाद मत करो..."

“करना तो है पर...”

"तो फिर मुझे करने दो," उसने कहा और अपना हथियार फिर से उसकी गुदा पर रख दिया और एक धक्का मारा

"आउच..!" सुरभि फिर से चिल्लाई.

लोकेश के हथियार का सिर्फ आधा इंच ही सुरभि के नितंब में गया था पर उसे अभी से ऐसा लग रहा था जैसे कि लोकेश ने पूरा डाल दिया हो.

"प्लीज़, लोकेश... इसे बाहर निकलो..." सुरभि बोली.

लोकेश ने तुरंत अपना बाहर निकाल लिया.
 
लोकेश ने तुरंत अपना बाहर निकाल लिया.

"थोडा रिलैक्स करो खुद को भाभी... तुम बेवजह डर रही हो..."

तभी विजय सीढ़ियों से उतरता हुआ बोला, "क्या हुआ?"

सुरभि का चेहरा शर्म से लाल हो गया. वो इस समय बहुत ही अश्लील स्थिति में थी. उसके नग्न नितंब लोकेश के मोटे हथियार के ठीक ऊपर हवा में लटके हुए थे और उसका पति सीढ़ियों से उतर रहा था.

‘ओह गॉड विजय नीचे क्यों आ रहा है...’ सुरभि ने मन ही मन सोचा.

"मैं तुम्हारी पत्नी की पीछे से मारने की कोशिश कर रहा हूँ ... कोई प्रॉब्लम है तुम्हें?” लोकेश ने अकड़ के कहा.

“म-मैंने उसकी आवाज सुनी... इसलिए पूछा..."

"अब आ ही गए हो तो यहाँ आओ और मेरी इसकी पीछे से लेने में मदद करो..." लोकेश ने कहा.

"तुम ये क्या कर रहे हो? उसे यहाँ मत बुलाओ. मैं शर्मिंदा महसूस करूंगी," सुरभि ने धीरे से कहा.

“उसके यहाँ आने से तुम्हारी ही भलाई है. मैंने तुम दोनों की बातें सुनी है. मेरे आगे नाटक मत करो. वो यहाँ होगा तभी तो तुम्हारी सेक्स लाइफ रंगीन बनेगी हेहेहे...”

विजय धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आ रहा था. सुरभि उससे नज़रें चुरा रही थी. वो बहुत शर्मिंदा महसूस कर रही थी. जैसे ही वो करीब आया उसने उसकी ओर एक नज़र डाली और फिर अपनी नज़र दूर कर ली. अपनी बीवी को गैर मर्द के साथ अश्लील हालत में देख कर उसके गाल शर्म से लाल हो गये थे.

‘इसे यहाँ नहीं आना चाहिए था’ सुरभि ने मन ही मन सोचा.

"मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ," विजय ने एक गुलाम की तरह पूछा.

"यार…तुम्हारी बीवी का पीछे का होल बहुत टाइट है. मैंने इसे उँगलियों से खोलने की कोशिश की थी लेकिन उससे बात नहीं बनी. क्या तुम इसे एक मिनट के लिए चाटोगे और इसे मेरे लिए गीला और चिकना करोगे...”

"क्या?" सुरभि और विजय दोनों ने एक साथ कहा.

" तुमने सही सुना, विजय, अपनी अपनी बीवी के पीछे वाले होल को चाटो और उसे मेरे लिए गीला और चिकना बना दो ताकि मैं आराम से अपने शेरू को उसमें डाल पाऊं...”

विजय ने सुरभि की तरफ देखा. सुरभि ने तुरंत अपनी नज़रे शर्मा कर दूसरी तरफ फेर ली.

“जल्दी करो विजय... अपनी बीवी की गां...ड जल्दी से तैयार करो मेरे लिए..." लोकेश ने बड़ी बेशर्मी से कहा.

"थोडा तेल लगा लेते हैं ना वहां, लोकेश ... " सुरभि ने धीरे से सुझाव दिया.

"नहीं ... तुम्हारा बेवकूफ पति ही तुम्हें मेरे लिए तैयार करेगा. मैं तेल-वेल नहीं लगाने वाला. चलो, विजय, जल्दी करो ..." लोकेश अपनी बात पे अड़ा रहा.

"मैं ये कैसे करूँगा? ये तो तुम्हारी गोद में बैठी है..." विजय ने कहा.

सुरभि के मन में भी यही सवाल था.

“चलो उतरो मेरी गोदी से भाभी...” लोकेश ने सुरभि की नितंबों पर थप्पड़ मारते हुए कहा.

सुरभि शरमाते हुए लोकेश की गोद से उतर गई और उतर कर अपनी पैंटी ऊपर सरका ली.

“चलो ऊपर चलते हैं तुम्हारे बेडरूम में... वहीं चाटना तुम इसकी और फिर तुम्हारे बेडरूम में ही लूँगा मैं आराम से इसकी...”

“जैसा तुम कहो...” विजय ने कहा.
 
लोकेश ने सुरभि को गोद में उठा लिया और सीढ़ियों की तरफ चल दिया. चलते हुए उसका लिंग अश्लील तरीके से हवा में झूल रहा था. सुरभि उसे देख कर सोच रही थी कि लोकेश ने उसे अंदर क्यों नहीं डाला.

“चल मेरी रानी मैं खुद तुझे तेरे बेडरूम में ले चलता हूँ... हाहाहा...” लोकेश सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बोला. विजय ठीक पीछे था उनके और धीरे धीरे उन्हें फॉलो कर रहा था.

ऊपर बेडरूम में आकर लोकेश ने सुरभि को बेड पर लेता दिया और बोला, “तुम बिस्तर पर हाथ और पैर के बल झुक जाओ... डॉगी स्टाइल में...”

तभी लोकेश ने उसके गाल पर थप्पड़ मारा और कहा, "अरे तुम ... फर्श पर नीचे उतरो और चारों पैरों पर कुतिया की तरह बैठ जाओ ..."

"मैं अपने मुंह की लार से भी गीला कर सकती हूं ..." सुरभि ने इस अजीब से स्थिति से खुद को निकालने के लिए कहा.

"नहीं ... तुम नहीं, तुम्हारा पति ही मेरे लिए तुम्हें तैयार करेगा.”

“डोंट वर्री सुरभि... मैं कर लूँगा...”

‘तुम तो कर लोगे पर मुझे शर्म आएगी,’ सुरभि ने मन ही मन कहा.

“चलो भाभी ज्यादा देर मत करो... देखो मेरा लो...डा कैसे मचल रहा है तुम्हारी गां...ड लेने के लिए...”

सुरभि शरमाते हुए बेड पर डॉगी स्टाइल में आ गई. ऐसी हालत में पैंटी में कैद उसके नितंब बिलकुल साफ़ दिख रहे थे और उसके बूब्स उसके टॉप से बाहर निकलने को हो रहे थे.

विजय अपनी बीवी को ऐसी हालत में देख कर ज़रा भी असहज नहीं दिख रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे कि वह इस स्थिति का मज़ा ले रहा हो.

“चलो विजय शुरू कर काम...”

विजय बिस्तर पर चढ़ कर सुरभि के पीछे बैठ गया. बैठ कर उसने आराम से सुरभि की पैंटी को नीचे सरकाया. इस दौरान सुरभि यही सोच रहा थी कि देखो कितना अजीब हो रहा है. उसका पति उसे गैर मर्द के सामने नंगा कर रहा है. और अब वो उसे उसके लिए तैयार भी करेगा.

"शुरू करूँ?" विजय ने पूछा.

"और नहीं तो क्या... इसके लिए कोई मुहूर्त निकलवाना पड़ेगा क्या.... समय बर्बाद मत करो. कब से मेरा शेरू इसकी गां...ड में जाने के लिए तरस रहा है…” लोकेश ने कहा. वो खुद एक राजा की तरह कोने में रखे छोटे सोफे पर बैठ गया था. उसका विशाल औज़ार पूरा तना हुआ था और बार बार हवा में हिल रहा था.

जैसे ही विजय ने सुरभि के नितंबो पर हाथ रखा, वो कांप उठी. हालाँकि, उसका पति होने के नाते, उसने उन्हें कई बार छुआ था, लेकिन अभी उसका स्पर्श एकदम अलग महसूस हो रहा था. शायद ऐसा लोकेश की मौजूदगी के कारण हो रहा था.

विजय ने सुरभि के नितंबों को अपने दोनो हाथों से खोला और नीचे झुककर अपनी जीभ उसके गुदा द्वार पर रख दी.

सुरभि उत्तेजना से काँप उठी. जिंदगी में पहली बार विजय ने अपनी जीभ सुरभि के गुदा द्वार पर राखी थी. ये बड़ा अनोखा अहसास था. उसकी गीली-गीली जीभ एक अजीब सा मजा... एक अजीब सा आनंद दे रही थी उसे. ‘हे भगवान, ये अहसास बड़ा अद्भुत है’ सुरभि ने मन ही मन सोचा.

विजय ने सुरभि के पिछले होल को चाटना शुरू कर दिया.अजीब था ये सब बहुत. वो ऐसा क्यों कर रहा था? क्या उसे शर्म नहीं आ रही थी? वो ये गंदा काम दूसरे आदमी के लिए कर रहा था, जाने क्यों?

पर जो भी हो. सुरभि को बड़ा मजा आ रहा था. जिस तरह से विजय उसके वहाँ पर चाट रहा था, उसे उसमें बड़ा अलग सा अहसास हो रहा था. वो कुछ ही देर बाद मजे में सिसकने लगी.

‘अजीब पति है. कैसे चाट रहा है अपने दोस्त के लिए मुझे तैयार करने के लिए... क्या इसे शर्म नहीं आ रही...’ सुरभि ने मन ही मन सोचा. “और जो काम ये आज कर रहा है इसे पहले भी तो करना चाहिए था... कितना मजा आ रहा है...’

"अपनी जीभ अंदर डाल, बेवकूफ. इसकी गांड को अंदर से भी गीला कर," लोकेश बोला.

"ओके-ओके…करता हूँ," विजय ने कहा और अपनी जीभ को सुरभि के टाइट छेद के अंदर धकेल दिया.

जैसे ही सुरभि को विजय की जीभ अपनी गुदा के अंदर महसूस हुई वो काम उत्तेजना में सिसक पड़ी. तीव्र आनंद की प्राप्ति हुई थी उसे.

‘हे भगवान, ये तो बहुत अच्छा लग रहा है. बर्दाश्त से बाहर है इतना मज़ा…’

"थोड़ा और गहरा जाओ...ताकि गहराई तक चिकना हो जाए. इस तंग छेद को चारों ओर से गीला कर दो ताकि मेरा शेरू आसानी से अंदर चला जाए ..." लोकेश ने फिर से कहा.
 
विजय ने अपनी जीभ को और गहरा उतार दिया और सुरभि और भी ज़्यादा आनंद से सिसक उठी. वो इस पल का भरपूर आनंद ले रही थी.

विजय ने अपनी जीभ को सुरभि की गुदा में अंदर बाहर घुमाना शुरू कर दिया. इमानदारी से वो अपनी तरफ से हर कोशिश कर रहा था सुरभि के छेद को गिला करने की. और सुरभि उसकी कोशिश पर मजे से कराह रही थी.

"बस रुक जाओ और इसे नंगा करके मेरी गोद में वापस भेजो..." लोकेश ने अचानक आदेश दिया.

विजय ने अपनी जीभ निकाली और सुरभि के कपडे उतारने लगा. क्योंकि कपडे बहुत छोटे थे वो जल्दी निकल गए. अब सुरभि पूरी तरह नग्न थी बिस्तर पर.

सुरभि को नंगा करके विजय बिस्तर से उतर गया. "सुरभि... वापस उसकी गोद में जाओ," उसने कहा.

सुरभि ने चुपके से लोकेश की तरफ देखा. लोकेश भी पूरा नंगा बैठा था सोफे पर. उसकी टांगों के बीच उसका मोटा हथियार खतरनाक तरीके से हिल रहा था हवा में. पता नहीं उसने अपने कपडे कब उतारे.

सुरभि मदहोशी में डूबी धीरे से खड़ी हुई और विजय की आँखों में देखा. उनमें कोई शर्म नहीं थी. हालांकि उसके गाल थोड़े लाल थे. ‘अब जो शुरू किया है, उसे ख़त्म तो करना ही होगा’ ये सोच कर सुरभि लोकेश के पास गई पर उसकी हिम्मत नहीं हुई उसकी गोद में बैठने की.

“सोच क्या रही हो भाभी ... जल्दी आओ और मेरे लो...ड़े की सवारी करो.” लोकेश ने बेशर्मी से अपनी नग्न जाँघ पर हाथ मारते हुए कहा.

सुरभि शरम से मरी जा रही थी. उसने धीरे से कहा, “पहले विजय को बाहर भेज दो लोकेश…”

"उसे यहीं रहने दो और देखने दो कि मैं तुम्हारी गां...ड कैसे लेता हूँ," लोकेश ने कहा और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया. अगले ही पल वो उसकी गोद में थी और उसका मोटा हथियार उसके नितंबों में चुभ रहा था.

“विजय मार लूँ क्या तुम्हारी बीवी की गां...ड?” लोकेश

“म-मार लो...”

“वैसे तुमने अब तक क्यों नहीं मारी?”

“ध्यान ही नहीं गया इस बात पर...”

“बेवकूफ हो तुम एक नंबर के...” लोकेश बोला और सुरभि को कूल्हों से पाकग कर थोडा ऊपर उठाया.

कुछ देर उसने अपने मोटे हथियार को रगडा उसकी गुदा पर और फिर उसे नीचे की और दबाते हुए नीचे से जोर का धक्का मारा. उसका हथियार, करीब दो इंच, तुरंत सरक गया सुरभि के नितंब में.

"आह ..." सुरभि आनंद और दर्द के मिश्रण से कराह उठी.

"क्या हुआ भाभी जी ... तुम ठीक तो हो ..." लोकेश ने पूछा.

"हाँ-हाँ... मैं ठीक हूँ" उसने नज़रें झुका के कहा.

"लो फिर और लो मेरे शेरू को," लोकेश ने उसे नीचे की ओर धकेलते हुए कहा.

सुरभि की वर्जिन गुदा को चीरते हुए लोकेश का हथियार और अंदर घुस गया.

सुरभि को दर्द और मजा साथ साथ आ रहा था इसलिए वो लोकेश को नहीं रोक रही थी. हाँ उसे इस बात से शर्म और झिझक जरुर महसूस हो रही थी कि उसका पति नजदीक खड़ा सब देख रहा था. काश वो वहां से चला जाता.

धीरे-धीरे लोकेश ने अपने मोटे हथियार को पूरा सुरभि के नितंब में उतार दिया. अपनी इस उपलब्धि पर वो बड़ा खुश हुआ और हँसते हुए बोला, "देखो विजय... मेरा शेरू पूरी तरह से तुम्हारी पत्नी की गां...ड के अंदर है."

"इतना बड़ा कैसे ले लिया इसने ..." विजय ने कहा.

"मैं झूठ नहीं बोल रहा विजय ...अपनी पत्नी से पूछो ..." लोकेश ने कहा.

"सुरभि ... क्या तुमने सच में पूरा ले लिया है इसका पीछे?" विजय ने कहा.

"हाँ..." सुरभि ने शरमाते हुए जवाब दिया.

"देखा, मैं झूठ नहीं बोल रहा था. अब बिस्तर पर बैठ जाओ आराम से और देखो मैं कैसे ठोकता हूँ तुम्हारी बीवी की मस्त गां...ड,” लोकेश ने कहा.

विजय बिस्तर पर बैठ गया चुपचाप.

लोकेश धीरे धीरे सुरभि के साथ गुदा मैथुन करने लगा. वो उसके कुल्हे पकड़ कर बार बार अपने मोटे हथियार को उसकी गुदा में धकेल रहा था. बिस्तर पर बैठा विजय सब देख रहा था. देख रहा था कि कैसे उसका दोस्त उसकी बीवी को ठोक रहा था. वो भी पीछे से.

"आआआह्ह्ह्ह ऊऊऊह्ह्ह ," सुरभि मजे में सिसकने लगी. उसे पता था कि विजय सब देख रहा है फिर भी वो अपनी सिसकियों को नहीं रोक पा रही थी. बड़ा मजा आ रहा था उसे गुदा मैथुन में.

"देखो अब कैसे सिसक रही हो... तुम बेवजह डर रही थी... ले लिया ना तुमने मेरा पूरा... हाहाहा," लोकेश ने कहा और हंसने लगा.

"प्लीज विजय को बाहर भेज दो... मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही है..." सुरभि ने सिसकते हुए अनुरोध किया.

"वो यहीं रहेगा, भाभी जी. यहीं रहेगा और देखेगा कि मैं तुम्हारी गां...ड को कैसे पेल रहा हूँ ..." लोकेश ने कहा और उसे अपने हथियार पर नीचे खींच लिया.

सुरभि को अहसास हुआ कि उसका हथियार और गहरा चला गया था और वो इस अहसास के कारण मजे से कराह उठी. "मम्म ... आह ..."

"तुमने अपनी बीवी की गां...ड को ठीक से चिकना नहीं किया, विजय. मुझे अपना शेरू स्लाइड करने में मुश्किल हो रही है..."

"मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी, लोकेश. मुझे दुख है कि मैं तुम्हारी उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाया..." विजय ने कहा.

लोकेश ने अपने मोटे हथियार को बाहर निकाला और उस पर थोडा थूक लगा कर वापस सुरभि की गुदा में डाल दिया. इस बार सुरभि को अहसास हुआ कि उसका हथियार बहुत आसानी से अंदर घुस गया.
 
लोकेश ने सुरभि के कूल्हों को पकड़ा और उसे अपनी हथियार पर ऊपर नीचे धकेलने लगा. बड़ा मजा आ रहा था सुरभि को. जब वो चरम आनंद के करीब थी तब लोकेश ने अपने हाथ उसके कूल्हों से हटा लिया. मरती क्या ना करती चरम को छूने के लिए सुरभि ने गुदा मैथुन को जारी रखा और खुद ऊपर नीचे होती रही लोकेश की गोद में.

“ये हुई ना बात भाभी... लो मेरा अंदर जितना ले सकती हो और दिखा दो अपने पति को कि मर्द के साथ संभोग कैसे किया जाता है...”

सुरभि ने विजय की तरफ देखा. वो उसे ही देख रहा था. शरमाते हुए सुरभि ने आँखे बंद कर ली और बार बार लोकेश के हथियार को अपनी गुदा में लेती रही उछल उछल कर.

जब उसने चरम आनंद को छुआ वो जोर से चीखी ,“आह्ह...” और दो बार ऊपर नीचे होकर रुक गई. उसकी साँसे फूली हुई थी और चेहरा शर्म से लाल था.

"देखा, विजय तुमने... कितने अच्छे से राइड किया तुम्हारी बीवी ने... मस्त है तुम्हारी बीवी और मैं इसे संतुष्ट कर रहा हूँ. तुम्हें इसके लिए मेरा आभारी होना चाहिए...”

"मैं आभारी हूं, लोकेश. मैं बहुत आभारी हूँ..." विजय ने कहा.

"तुमने अब तक इसकी गां...ड क्यों नहीं मारी? देखो ये कितना मजा ले रही है."

"मुझे नहीं पता था कि एनल पसंद करेगी ..." विजय ने कहा.

"तुम एक नंबर के बेवकूफ हो. तुम बिलकुल लायक नहीं हो इसके..."

"मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता हूं, लोकेश. मैं भी अब से इसे यह सुख दूंगा..." विजय ने कहा.

"जरुर देना वरना तुम्हारी खैर नहीं...”

लोकेश नीचे से धक्के मारने शुरू कर दिए. "यहाँ आओ और इसके स्तनों को चूसो..." लोकेश ने कहा.

“इसकी क्या जरुरत है...” सुरभि बोली.

“जरुरत है... देखना तुम्हें मजा आएगा...” लोकेश बोला.

एक आज्ञाकारी दास की तरह, विजय सुरभि के पास आया और झुक कर उसके बाएँ स्तन को चूसने लगा.

सुरभि मजे में और शर्म से सिसक पड़ी. अब उसका पति उसके स्तन चूस रहा था और एक गैर मर्द उसकी गुदा ठोक रहा था. दोहरा मजा मिल रहा था सुरभि को और वो खुद को संभाल नहीं पा रही थी.

लोकेश अपने हाथों के सहारे सुरभि को आराम से ऊपर रख रहा था, ताकि वो नीचे से आराम से अपने हथियार को उसकी गुदा में रगड़ सके.

वह बहुत जोश और गर्मी के साथ बारी-बारी से सुरभि के दोनों स्तनों को चूस रहा था. वह इसका आनंद ले रहा था. उसे मजा आ रहा था इस बात से कि एक तरफ वो अपनी पत्नी के स्तन चूस रहा है और दूसरी तरफ एक गैर मर्द उसकी गां...ड ठोक रहा है. विजय के मुँह की हर हरकत इस बात का खुलासा कर रही थी.

सुरभि के लिए ऐसे कामुक पल से मिल रहे आनंद को संभालना मुश्किल हो रहा था. कुछ ही देर में वो जोर से चिल्ला कर झड़ गई.

सुरभि के झड़ने के बावजूद दोनों नहीं रुके. लोकेश उसके नितंब ठोकता रहा और विजय उसके स्तनों को चूसता रहा.

फिर अचानक, दो मिनट के बाद, लोकेश ने अपना हथियार सुरभि के नितंब से निकाल लिया और बोला, "अब तुम बिस्तर पर घोड़ी बन जाओ मैं तुम्हारी पीछे से सवारी करूंगा..."

विजय तुरंत दूर चला गया. सुरभि ने देखा कि उसके गाल लाल थे.

सुरभि शरमाते हुए लोकेश की गोद से उतरी और बिस्तर पर चढ़ कर घोड़ी बन गई लोकेश के लिए. उसके नग्न नितंब हवा में ऊपर उठे हुए बड़े कामुक लग रहे थे और उसके स्तन पके फलों की तरह उसकी छाती पर स्वतंत्र रूप से लटक रहे थे.

अपने कपड़े हटाकर, लोकेश सुरभि के पीछे गया और उसके नितंब पर थप्पड़ मारा.

"आउच!" सुरभि ने कहा.

"क्या हुआ भाभी जी?" लोकेश ने पूछा.

"क-कुछ नहीं..."

"तुम क्यों कपडे पहने हुए हो यार... तुम भी उतार फेंको अपने कपडे,” लोकेश ने विजय से कहा.

विजय ने जल्दी से अपने कपड़े उतार दिए.

"भाभी, अपने पति के पेनिस को देखो," लोकेश ने उसके नितंबो को सहलाते हुए कहा.

सुरभि ने विजय के लिंग की ओर देखा. वो पूरी तरह से तना हुआ था.
 
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