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Adultery thriller खून की होली

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तूफ़ान के बाद की सुबह

वह एक पल था जब समय जैसे जम गया था।

राज और नैना, जो एक पल पहले एक-दूसरे की आत्मा में डूबे हुए थे, एक झटके में हक़ीक़त की पथरीली ज़मीन पर आ गिरे। सामने दरवाज़े की चौखट पर कविता खड़ी थी, किसी भूत की तरह। उसकी आँखों में नर्क की वहशत थी, और उस वहशत में अब एक नया भाव जुड़ गया था - घिन और धोखा।

"कविता..." राज ने फुसफुसाने की कोशिश की, लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।

नैना, एक प्रशिक्षित सैनिक की तरह, तुरंत हरकत में आई। उसने गलीचा खींचकर उन दोनों के नग्न शरीरों को ढका और उठ खड़ी हुई। "शांत रहो, लड़की। तुम सुरक्षित हो।"

लेकिन कविता के लिए शब्द अब कोई मायने नहीं रखते थे। उसने जो देखा था, वह उसके टूटे हुए मन के लिए आख़िरी चोट थी। वह चीख़ी, एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख़ जिसमें दर्द, डर और नफ़रत का सैलाब था। और फिर वह पलटकर वापस अपने कमरे में भाग गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।

अंदर से उसके रोने और चीज़ों के पटकने की आवाज़ आने लगी।

राज और नैना ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने। जो कमरा कुछ देर पहले जन्नत था, वह अब किसी जंग का मैदान लग रहा था।

"उसे पैनिक अटैक आया है," नैना ने कहा। "हमें दरवाज़ा तोड़ना होगा, वह खुद को नुक़सान पहुँचा सकती है।"

"नहीं, रुको," राज ने कहा, उसका दिमाग़ तेज़ी से चल रहा था। "उसे हम पर भरोसा नहीं है। इस वक़्त दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान है जिसे देखकर वह शांत हो सकती है।"

उसने अपना फ़ोन उठाया और अपनी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल कॉल लगाई।

"हैलो?" दूसरी तरफ़ से अमृता की बेचैन आवाज़ आई।

"अमृता," राज की आवाज़ सपाट थी।

"आपकी बेटी मिल गई है। वह ज़िंदा है।"

फ़ोन पर एक गहरी, काँपती हुई साँस की आवाज़ आई। "कहाँ... कहाँ है वो? क्या वो ठीक है?"

"वह मेरे साथ है, और वह सुरक्षित है। लेकिन... आपको फ़ौरन यहाँ आना होगा। मैं आपको पता भेज रहा हूँ। प्लीज़, कोई सवाल मत पूछिएगा। बस आ जाइए।"

अगला एक घंटा किसी नर्क से कम नहीं था। कविता अंदर से रोती और चिल्लाती रही, और राज और नैना बाहर बेबसी से दरवाज़े पर खड़े रहे।

जब दरवाज़े पर दस्तक हुई, तो राज ने दरवाज़ा खोला। सामने अमृता खड़ी थी। उसकी आँखों में उम्मीद, डर, और हज़ारों सवाल थे।

"किस कमरे में है वो?" उसने पूछा।

राज ने काँपते हुए हाथ से दरवाज़े की ओर इशारा किया।

अमृता दरवाज़े पर गई। "कविता... बेटा... दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ, तुम्हारी माँ।"

अंदर से एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। और फिर, दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई।

एक माँ और बेटी, जो महीनों बाद एक-दूसरे से मिल रही थीं, का वह मिलन किसी ख़ुशी के लम्हे जैसा नहीं था। वह दर्दनाक था। कविता अपनी माँ से किसी बेल की तरह लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

"माँ... ये लोग... ये लोग गंदे हैं... उस आदमी ने मुझे बचाया... और फिर... माँ..." वह टूटते हुए शब्दों में सब कुछ बताने की कोशिश कर रही थी, उसकी उँगली काँपते हुए राज की ओर इशारा कर रही थी।

अमृता ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसने राज और नैना की तरफ़ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें दर्द, भ्रम और एक गहरा सवाल था। उस एक नज़र ने राज को अपराधी बना दिया था। अमृता की आँखों में वह अपनापन नहीं था जो उसने उस रात राज के अपार्टमेंट में महसूस किया था। यहाँ सिर्फ़ एक माँ थी, और उसकी ज़ख़्मी बेटी।

नैना ने स्थिति को भाँप लिया। उसने राज के कंधे पर हाथ रखा। "यहाँ तुम्हारा काम खत्म हो गया, राज। अब यह एक माँ और बेटी के बीच की बात है।"

राज जानता था कि वह सही कह रही है। उसकी मौजूदगी कविता के लिए सिर्फ़ दर्द का सबब बन रही थी।

"अमृता जी," राज ने कहा, "कविता अब सुरक्षित है। राठौड़ जल्द ही पकड़ा जाएगा। मैं..."

"तुम जाओ यहाँ से, राज," अमृता ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक गहरी, ठंडी थकान थी। "तुमने मेरी बेटी को ढूँढ़ लिया, मैं तुम्हारी आभारी रहूँगी। लेकिन इस वक़्त, उसे तुम्हारी नहीं, मेरी ज़रूरत है।"

यह शब्द किसी थप्पड़ से ज़्यादा ज़ोरदार थे। राज को एहसास हुआ कि वह इस कहानी में सिर्फ़ एक किरदार था, एक जासूस, जिसका काम खत्म हो चुका था। उसने अपनी जान दाँव पर लगाई, लेकिन अंत में, वह फिर से अकेला ही रह गया था।

वह बिना कुछ कहे दरवाज़े की ओर मुड़ा। नैना भी उसके साथ बाहर आ गई।

बाहर रात की ठंडी हवा में, राज को पहली बार एहसास हुआ कि वह कितना ज़्यादा अकेला और थका हुआ है।

राज और नैना चुपचाप गाड़ी में बैठे थे। शहर की रोशनियाँ पीछे छूट रही थीं।

"अब कहाँ जाओगे?" नैना ने गाड़ी चलाते हुए पूछा।

"पता नहीं," राज ने कहा, उसकी आवाज़ में एक ख़ालीपन था। "शायद वापस अपने तथाकथित घर।"

नैना ने एक पल के लिए उसकी तरफ़ देखा। उसने राज के चेहरे पर एक ऐसी हताशा देखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने उसे लड़ाइयों में देखा था, ज़ख़्मी देखा था, लेकिन इतना टूटा हुआ कभी नहीं देखा था।

"नहीं," नैना ने अचानक कहा। "तुम वहाँ वापस नहीं जा रहे हो।"

उसने गाड़ी को एक अलग दिशा में मोड़ दिया।

"नैना, यह तुम क्या कर रही हो?"

"तुम्हें यहाँ से दूर ले जा रही हूँ," उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक फ़ौजी दृढ़ता थी। "मेरा मिशन कल सुबह खत्म हो रहा है। मैंने कुछ दिनों की छुट्टी ली है। मुंबई से बहुत दूर, गोवा में, मेरा एक छोटा सा बीच हाउस है। तुम मेरे साथ वहाँ चल रहे हो।"

"लेकिन क्यों?"

"क्योंकि एक सिपाही दूसरे ज़ख़्मी सिपाही को कभी अकेला नहीं छोड़ता," नैना ने कहा। "तुमने उस लड़की को बचा लिया, राज। तुमने अपना काम कर दिया। लेकिन इस पूरी लड़ाई में, तुम खुद को बचाना भूल गए। तुम्हें भी मरहम की ज़रूरत है।"

राज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप बैठा रहा। पहली बार, उसकी ज़िंदगी में कोई और उसके लिए फ़ैसले ले रहा था, और उसे यह एहसास अच्छा लग रहा था।

मुंबई से गोवा तक का सफ़र ख़ामोशी और कुछ अनकही बातों में बीता। वे एक छोटे से, शांत गाँव में पहुँचे, जहाँ नैना का बीच हाउस था। वह एक लकड़ी का बना छोटा सा कॉटेज था, जो सीधे समंदर के किनारे पर था। जैसे ही राज ने गाड़ी से उतरकर नमकीन हवा में साँस ली और लहरों की आवाज़ सुनी, उसे लगा जैसे उसके कंधों से सालों का बोझ उतर गया हो।

अंदर का माहौल बहुत सुकून भरा था। सफ़ेद पर्दे, लकड़ी का फ़र्नीचर, और बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ जिनसे समंदर का नज़ारा दिखता था।

"जाओ, नहा लो," नैना ने कहा। "तुम कई दिनों से सोए नहीं हो।"

राज ने उसकी बात मानी। गर्म पानी के नीचे खड़े होकर, उसे लगा जैसे वह सिर्फ़ मुंबई की धूल ही नहीं, बल्कि कविता की नफ़रत, अमृता की ख़ामोशी, और अपने अकेलेपन को भी धो रहा है।

जब वह बाहर आया, तो नैना ने उसके लिए खाने की मेज़ लगा दी थी। उन्होंने खामोशी में खाना खाया, लहरों की आवाज़ उनके साथ थी।

उस रात, वे अलग-अलग कमरों में सोए। लेकिन दोनों जानते थे कि यह दूरी सिर्फ़ एक रात की है। उन्हें इस नए रिश्ते को, इस नई शुरुआत को कोई जल्दबाज़ी का नाम नहीं देना था।

अगली सुबह, जब राज की आँख खुली, तो उसने नैना को बालकनी में खड़े होकर उगते हुए सूरज को देखते हुए पाया। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो राज ने पहले कभी नहीं देखी थी।

वह चुपचाप उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया।

"ख़ूबसूरत है, है ना?" नैना ने बिना मुड़े कहा।

"हाँ," राज ने कहा, लेकिन उसकी नज़रें सूरज पर नहीं, नैना पर थीं।
 
नैना उसकी ओर पलटी। उसकी आँखों में एक गहरी चमक थी, एक ऐसा निमंत्रण जिसे कोई भी मर्द नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था।

"आज कोई लड़ाई नहीं है, राज," वह फुसफुसाई। "आज कोई मिशन नहीं है। आज... सिर्फ़ हम हैं।"

यह कहकर वह अपनी एड़ियों पर उठी और उसने राज के होंठों पर एक बहुत ही नर्म, प्यार भरा चुंबन दिया। यह चुंबन एक शुरुआत थी - एक ऐसे दिन की, एक ऐसे प्यार की, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुशी के लिए बना था।

वह चुंबन किसी नदी के शांत प्रवाह की तरह था, जो धीरे-धीरे एक बड़े समंदर की ओर बढ़ रहा था। राज ने नैना को अपनी बाँहों में भर लिया, और इस बार कोई झिझक नहीं थी, कोई दर्द नहीं था, कोई बीता हुआ कल नहीं था। सिर्फ़ एक सुनहरा वर्तमान था।

वे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए बेडरूम में आए। सूरज की पहली किरणें कमरे को रोशन कर रही थीं, और सफ़ेद पर्दों से छनकर आती हुई रोशनी उनके नग्न शरीरों पर किसी जादू की तरह चमक रही थी।

इस बार कपड़े उतारने में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। यह एक धीमी, कामुक रस्म थी। राज ने नैना की टी-शर्ट उतारी, और उसके हर इंच को ऐसे चूमा जैसे वह कोई कीमती ख़ज़ाना हो। उसने उसकी मज़बूत पीठ को, उसके सपाट पेट को, और उसकी सुडौल जाँघों को अपने होंठों से पूजा।

नैना भी पीछे नहीं थी। उसने राज को बिस्तर पर लिटा दिया और उसके शरीर पर एक खोज यात्रा पर निकल पड़ी। वह उसके ज़ख़्मों को चूम रही थी, लेकिन इस बार दर्द मिटाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपनाने के लिए। वह उसे बता रही थी कि वह उसके हर हिस्से से, उसकी हर कहानी से प्यार करती है।

"आज तुम कुछ नहीं करोगे, राज," वह फुसफुसाई, जब वह उसके लिंग को सहला रही थी, जो अब पूरी तरह से खड़ा हो चुका था। "पिछली रात तुमने बहुत कुछ सहा है। आज तुम सिर्फ़ आराम करोगे, और मुझे तुम्हें प्यार करने दोगे।"

राज ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को पूरी तरह से उसके हवाले कर दिया। वह शांत था, स्थिर था, एक ऐसे समंदर की तरह जो अपनी लहरों को चाँद के हवाले कर देता है।

नैना ने उसे अपने होंठों से, अपनी जीभ से, अपने शरीर के हर हिस्से से प्यार किया। यह एक ऐसा लंबा, गहरा और विस्तृत फोरप्ले था जिसका अनुभव राज ने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। वह उसके शरीर के हर संवेदनशील हिस्से को जानती थी, जैसे उसने उसकी आत्मा का नक्शा पढ़ लिया हो। वह उसे सुख के उस शिखर पर ले जा रही थी जहाँ सिर्फ़ आनंद था, कोई तनाव नहीं, कोई चिंता नहीं।

जब उसे लगा कि राज का शरीर अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, तब वह मुस्कुराई।

"अब," उसने कहा, "असली सफ़र शुरू होता है।"

वह उसके ऊपर आई, और अपने दोनों हाथों को उसके सीने पर रखकर, बहुत धीरे-धीरे उसके लिंग पर बैठ गई।

यह मिलन किसी धमाके जैसा नहीं था। यह दो नदियों के संगम जैसा था - शांत, गहरा, और पूर्ण। नैना ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और अपनी कमर को एक बहुत ही धीमी, लयबद्ध गति में घुमाना शुरू कर दिया।

हर घुमाव के साथ, वे दोनों एक-दूसरे में और भी ज़्यादा घुलते जा रहे थे, और भी ज़्यादा एक होते जा रहे थे। कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसों की और बाहर समंदर की लहरों की आवाज़ थी। यह एक ऐसा संगीत था जो सीधे रूह में उतर रहा था।

समय जैसे रुक गया था। मिनट घंटों में और घंटे एक अनंत काल में बदल गए थे। नैना अब भी राज के ऊपर थी, और उनकी गति एक ध्यान की तरह हो गई थी। यह अब सिर्फ़ संभोग नहीं रहा था, यह एक संवाद था, जो उनके जिस्म एक-दूसरे से कर रहे थे।

राज, जो अब तक शांत था, ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उसने अपने हाथ ऊपर उठाकर नैना के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया।

"नैना," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक गहरी भावना थी।

नैना ने अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन यह ख़ुशी के आँसू थे।

"अब मेरी बारी," राज ने कहा और एक झटके में, लेकिन बहुत कोमलता से, उसने अपनी पोज़िशन बदल दी। अब वह ऊपर था।

उसने नैना के होंठों को चूमना शुरू किया, और साथ ही साथ, उसके अंदर एक नई, ज़्यादा ताक़तवर गति शुरू कर दी। यह गति अब सिर्फ़ धीमी नहीं थी। इसमें जुनून था, ख़ुशी थी, और एक ऐसा प्यार था जिसे अब और छिपाने की ज़रूरत नहीं थी।

"राज!" नैना की दबी हुई चीख़ निकली, जब राज ने उसके अंदर एक ऐसी गहरी जगह को छुआ जिसे उसने खुद कभी महसूस नहीं किया था।

"हाँ, नैना," राज ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। "आज मैं तुम्हें वो सारी ख़ुशियाँ दूँगा जिसकी तुम हक़दार हो।"

अब यह संभोग एक शांत नदी नहीं रहा, यह एक ख़ुशी का समंदर बन गया था, जिसमें वे दोनों गोते लगा रहे थे। वे हँस रहे थे, एक-दूसरे से बातें कर रहे थे, एक-दूसरे को छेड़ रहे थे।

यह इतना उन्मुक्त, इतना आनंदमय था कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा ख़तरों और अँधेरे में गुज़ारा था, और आज, वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में रोशनी मना रहे थे।

उन्होंने कई बार पोज़िशन बदली, हर बार एक नया सुख, एक नया आनंद खोजते हुए। उन्होंने ज़मीन पर, बालकनी में, और फिर शॉवर के नीचे भी प्यार किया। पानी की गर्म बूँदें उनके जुड़े हुए जिस्मों पर पड़ रही थीं, और उनका हर स्पर्श, हर चुंबन और भी ज़्यादा गहरा और कामुक होता जा रहा था।

जब आख़िरी बार, बेडरूम के बिस्तर पर, वे दोनों अपने चरम की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने एक-दूसरे को कसकर पकड़ लिया।

"मैं तुमसे प्यार करता हूँ, नैना," राज ने हाँफते हुए कहा, यह शब्द जैसे उसके दिल की गहराई से निकले हों।

"मैं हमेशा से तुमसे प्यार करती थी, राज," नैना ने रोते हुए कहा।

और इन्हीं शब्दों के साथ, वे दोनों एक साथ, एक ही पल में, सुख के उस सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँच गए। यह सिर्फ़ एक जिस्मानी चरमसुख नहीं था, यह दो आत्माओं का मिलन था, जिन्होंने आख़िरकार अपना घर ढूँढ़ लिया था।

वे बहुत देर तक एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे, पूरी तरह से शांत, पूरी तरह से तृप्त। बाहर सूरज डूब रहा था, और आसमान नारंगी और गुलाबी रंगों से भर गया था।

"हमें सनसेट देखना था," राज मुस्कुराया।

"हम देख तो रहे हैं," नैना ने कहा, और उसकी नज़रें सिर्फ़ राज पर थीं।

उस शाम, उन्हें किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं थी। उनके पास एक-दूसरे का साथ था, समंदर था, और एक ऐसा भविष्य था जो अब अकेला नहीं था। राज शर्मा, जासूस, ने अपनी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल केस को सुलझाते हुए, आख़िरकार अपनी सबसे बड़ी पहेली को भी सुलझा लिया था - अपने दिल की पहेली। और उसका जवाब हमेशा से मेजर नैना सिंह ही थी।

◆◆◆
 
आफ्टर 10 डेज़

दिन निकलते ही धूमिल अंधेरा चारों ओर फैल गया था । मूसलाधार वर्षा हो रही थी। मशहूर जासूस राज पीठ पीछे दोनों हाथ बाँधे बेचनी से अपने कमरे में टहल रहा था।

अर्चना एक पत्र टाइप कर रही थी ।

नरेन्द्र एक मेज़ के पीछे कुर्सी पर बैठा महीने-भर के हिसाब की पड़ताल कर रहा था। उसने रजिस्टर पर बॉल-पेन फेंकते हुए कहा, "कमाल हो गया ! इस महीने तो लड़की से उसकी जुल्फें बड़ी हो गई । आमदनी पन्द्रह सौ रुपए, खर्चा चौतीस सौ छत्तीस रुपए ! पन्द्रह सौ में से पांच सौ रुपए प्रवेश ले गया ताकि 'पिक्चर पोस्ट टेलीवीजन के प्रमुख वितरक मिस्टर शंकर जगतार के बेटे कृष्ण जगतार को ढूंढ़ने के लिए जा सके ।”

"मैं यही सोच रहा हूँ कि प्रवेश ने कृष्ण जगतार को ढूंढने में इतने दिन क्यों लगा दिये ? नरेन्द्र, क्या तुम बता सकते हो कि लड़के घर .से क्यों भाग जाते हैं ?" राज ने नरेन्द्र के पास आते हुए पूछा ।

"यह है महा-कलियुग, राज साहब ! पन्द्रह साल की लड़की दादी बन जाती है तो लड़का फिर लड़का है। घर से गायब होना तो मामूली बात है, सोने के बिस्कुटों की तरह लड़के एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक स्मगल हो जाते हैं—रातों-रात ! "

नरेन्द्र की बात पर अर्चना हंसने लगी ।

"खैर, अब सुनिए कि लड़के घरों से क्यों भागते हैं, बाप भी कंस की तरह जालिम हो सकता है; माँ भी सौतेली हो सकती है; जेब- खर्च कम मिलना भी एक वजह बन जाती है; सिनेमा देखकर भी ऐक्टर बनने को जी मचल सकता है।”

राज कुछ कहने ही को था कि दरवाजे में डाकिये को देखकर वह उसकी ओर बढ़ गया। डाक लेकर उसने अर्चना की मेज पर रख दी । अर्चना ने डाक में से एक लिफाफा उठाकर उसे खोल दिया । पत्र पढ़कर वह मुस्कराने लगी। उसने कहा, “प्रवेश ने 'देसाई स्टूडियो' के पास एक रेस्तरों में कृष्ण जगतार को ढूंढ लिया है और वह उसे लेकर शाम तक पहुँच रहा है।"

राज ने यह सुना तो वह अपने बेड रूम में चला पाया । उसने. खूंटी पर से बरसाती उतारकर पहन ली और प्रॉफिस से बाहर निकल गया ।

O ……………………………………………

'पिक्चर पोस्ट टॅलीवीजन डिस्ट्रीब्यूटर्स' नामक फर्म के स्वागत- कक्ष में आकर राज ने बरसाती उतारी। रिसेप्शनिस्ट लड़की ने उसे पहले तो आम नजरों से देखा, मगर जब बरसाती उतरने पर राज का मर्दाना हुस्न उसने देखा तो बड़ी प्रभावित हुई। लड़की ने जान- बूझकर सीने पर से साड़ी का पल्लू खिसक जाने दिया । लड़की जवान थी और वक्ष की गोलाइयों पर तीखी नोकों के अपने आकर्षण का उसे आभास था । यौवन उमड़कर पर्दे में भी बेपर्दा हुआ-सा लगने लगा ।

राज ने कहा, "मेरा नाम राज है और मैं मिस्टर शंकर जगतार से मिलना चाहता हूँ ।"

"क्या आपने मिलने के लिए उनसे पहले समय ले रखा है ?" रिसेप्शनिस्ट लड़की ने पूछा

"नहीं; लेकिन वह मुझसे ज़रूर मिलना चाहेंगे ।"

सुनकर लड़की ने अपने 'इण्टर कम सेट' का स्विच दवाया और रिसीवर कान से लगाकर राज का नाम लिया। एक पल के लिए वह शंकर जगतार की बात सुनती रही और फिर सेट का स्विच ग्रॉफ करके बोली, "वह बहुत व्यस्त हैं । आप फिर किसी समय आइये या इन्तजार कीजिये ! "

"मैं इन्तजार नहीं कर सकता। अगर मिस्टर जगतार व्यस्त हैं तो मैं उनसे भी ज्यादा व्यस्त आदमी हूँ ।" राज ने कहा ।

रिसेप्शनिस्ट लड़की को राज के स्वर की दृढ़ता से बड़ा सुख मिला। उसने अपनी बनाई आँखें राज की आँखों में डाल दीं और गहरी साँस खींची। इससे उसके स्तनों में ऐसा ज्वार उठा कि ब्लाउज़ तनकर फटने को हो आया। राज की नजरें छिछलती हुई उसके सीने से आँखों तक अंग-अंग ऊपर चढ़ गई। वह बोला, "मिस्टर जगतार से कहिये कि मैं केवल दो मिनट इन्तज़ार करूँगा। अगर वह मुझसे नहीं मिलेंगे तो उनसे कह दीजियेगा कि उन्हें बहुत जल्द मुझसे मिलने के लिए आना पड़ेगा।"

रिसेप्शनिस्ट लड़की ने दुबारा इंटरकॉम ' का स्विच दबाया और बड़ी शिष्टता के साथ अपने मालिक को राज का सन्देश दे 'दिया। दो पल वह मालिक की बात सुनती रही. फिर स्विच ऑफ करके बोली, "जाइए, वह आपका इंतजार कर रहे हैं ।"

राज ने सुना और लड़की की ओर मुस्कराकर देखते हुए जगतार के ऑफिस की ओर पग उठाया। लड़की भी मुस्करा रही थी जैसे कह रही हो- मिस्टर जगतार से मिल सकते हो, क्या मुझमे कभी नहीं मिलोगे ?

राज ने प्रॉफिस में कदम रखा और जरा-सा सिर हिलाया। यह एक खुला चौड़ा कमरा था और शीशे की तरह जगमगा रहा था। जगतार ने उसे इशारा किया कि वह कुर्सी पर बैठ जाय। राज कुर्मी पर जा बैठा। एक ही दृष्टि में उसने कमरे को जाँच लिया। जगतार के सिर पर बाल बहुत कम थे। चेहरा गोरा-लाल था। वह स्वस्थ शरीर का था ।

"मिस्टर राज ! आप मुझे कैसे मिलने आए हैं ?" जगतार ने पूछा।

राज उसके इस सवाल पर बहुत हैरान हुआ। उसने कहा, "क्या आपको अपने छोटे बेटे से कोई प्यार नहीं ? क्या आप उसके गायब हो जाने पर परेशान नहीं ?"

" आपको मेरे मुआमलात से क्या वास्ता ? मैंने तो अपने बेटे को ढूंढने के लिए आपकी सेवाएं नहीं चाहीं ?" जगतार के स्वर में आक्रोश था ।

"आपने नहीं, आपके एजेंट ने कृष्ण को ढूंढने के लिए मेरी सेवाएं ज़रूर चाही थीं। मैं आपके बेटे को ढूंढ चुका हूँ।" राज ने उत्तर में बताया । उसे मिस्टर जगतार का रवैया पसन्द नहीं आया था। वह बोला, "अगर आपको अपने बेटे की चिन्ता होती तो आप मेरा नाम सुनते ही दौड़ पड़ते । तब आप पूछते कि मैं उसे ढूंढ चुका हूँ या नहीं ? मगर, आप तो यहाँ बैठे रुपया बटोरने की चिन्ता में हैं। मैं जानता हूँ कि अपने बेटे के गुम होने की आपने पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी। आपको अपनी इस नुमाइशी इज्जत और दौलत की ज्यादा चिन्ता है । आप नहीं चाहते थे कि पुलिस आपके पास फटके, इसी कारण आपने अपने एजेंट की मार्फत अपने बेटे को ढूंढने के लिए मेरी सेवाएं हासिल कीं।"

सुनिए मिस्टर राज ! मैं इस तरह की बातें सुनने का अभ्यस्त नहीं हूँ। मेरा बेटा कहाँ है ? अगर आप उसे ढूंढ चुके हैं तो उसे अपने साथ क्यों नहीं लाए ?'

"आपका बेटा मेरे पास है। उसे खोज निकालने में एक सप्ताह लगा है । अभी वह आपके पास नहीं आना चाहता। वह मुझसे यह वचन लेना चाहता है कि आप उसे खिले माथे अपने घर में ले लेंगे क्या आप यह वचन देने को तैयार हैं ?"

"मिस्टर राज ! उसके साथ मैं क्या सलूक करूंगा, इससे आपका कोई सरोकार नहीं । आप शाम को उसे मेरे घर ले आइये ! आपको आपके बाकी दो हजार रुपये दे दिये जाएँगे ।"

"अच्छी बात है। मैं भी आपके मुआामले में नहीं आना चाहता । शाम को आपका बेटा आपके पास पहुँच जाएगा. ।”

"आप कृष्ण को यहां नहीं, मेरे घर पर लाइयेगा ।" शंकर जगतार ने कहा ।

राज ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया । वह कुर्सी पर से उठकर बाहर आ गया। रिसेप्शनिस्ट लड़की ने उसे आशा-भरी नज़रों से देखा । राज ने उसे बहलाने के लिए कहा, "शायद किसी दिन मैं केवल आपसे मिलने आऊँ ।”

लड़की के चेहरे पर जो मुस्कान उतरी, उसने उसके समूचे चेहरे को गुलाब की तरह महका दिया ।

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शाम को कृष्ण जगतार के साथ प्रवेश आ पहुंचा। उसने अपना सूटकेस दीवार के साथ टिका दिया । कृष्ण जगतार के पास केवल एक बैग था । कृष्ण सूरत- शक्ल से सुन्दर था— भरा-भरा शरीर, पुष्ट कंधे, चौड़ा सीना, कद खिलता हुआ। कपड़े उसके मैले थे- कुछ ज्यादा मैले । प्रवेश से वह राज की बड़ी प्रशंसा सुन चुका था। उसने एक प्रशंसक की तरह राज को नमस्ते कही। राज ने स्नेह से उसकी पीठ पर थपकी दी। उससे वह आधेक घण्टे तक बातें करता रहा। इस तरह उसने ऐसा वातावरण बना दिया कि कृष्ण जगतार उसी समय घर जाने को तैयार हो गया ।

जब वे रास्ते में थे तो लड़के ने राज से कहा, "क्या आप हमेशा मेरे दोस्त रहेंगे ? मैं बड़ा खुश हूँ कि आपने अपना आदमी मुझे लाने

के लिए भेजा, वरना मैं कमी न आता । आप सोच भी नहीं सकते कि आपसे मिलकर और आपसे बातें करके मुझे कितना मजा आया है । मुझे आप बहुत अच्छे लगे हैं—बहुत ही प्यारे !"

राज ने उसे प्यार से फिर थपथपाया ।

'समय तो अभी साढ़े छह का था, मगर शाम ढलकर रात बन रही थी। राज की कार शंकर जगतार के बंगले में प्रविष्ट हुई। उसने देखा कि बरामदे में जल रहे बल्ब की रौशनी पीली थी। इसी वजह से बंगले में परछाइयाँ-सी नाचती जान पडती थीं। लगता था कि परछाइयाँ बंगले के अन्दर समाए जा रही हैं और यह बंगला न हो, बल्कि परछाइयों का कुआँ हो ।

बरामदे में कार रुकी। कृष्ण जगतार कार से उतरा और दरवाजा पर जा दस्तक दी- "

आगे बढ़कर उसने बरामदे के दरवाजे पर अपने आदमियों को आवाज दीं।

खोलो ! "

तभी बँगले के अन्दर से दौड़ते कदमों की आवाज़ सुनाई दी

खट्-से दरवाज़ा खोल दिया गया। दरवाजे में लम्बे कद की नवयुवती दिखाई दी । आयु होगी बीस-इक्कीस साल की । हल्का पेटीकोट और ब्लाउज उसके शरीर को ढाँप नहीं पा रहे थे। तभी उसकी निगाहों ने राज की आँखों का पीछा किया, जो लड़की के वक्ष पर केन्द्रित थीं । उसने शरमाकर अपने ब्लाउज के बटन बन्द किये और दूधिया सुडौल - स्तन ढंक लिये । कमर पतली थी, मगर कूल्हे चौड़े दूधिया गोरा पेट पीठ से सटा हुआ नाभि ऐसी कली अभी चटकेगी.

नवयुवती ने अपनी बाँहों की माला कृष्ण के गले में पहना दी। वह बरबस उसका मुखड़ा चूमे जा रही थी। अलग हुई तो पूछा, "कहाँ रहे इतने दिन, बदमाश ? कौन लाया तुम्हें ?"

कृष्ण जगतार ने राज की ओर इशारा करते हुए कहा, “मनजीत ! यह हमारे देश के बहुत-बहुत मशहूर जासूस हैं—मिस्टर राज । यही मुझे लाए हैं।"

मनजीत जगतार क्षण-भर के लिए ठिठक गई। उसने अपना दाहिना हाथ नाभि पर रख लिया, फिर दोनों हाथ जोड़कर राज से कहा, "मैं अपने जीवन में पहली बार किसी जासूस को देख रही हूँ । मुआफ कीजियेगा, "मैं" कहकर उसने अपने शरीर पर कम कपड़े होने का कारण बताया, "कृष्ण की आवाज सुनते ही मैं दौड़ी चली आई । आज मेरा जन्म दिन है... मैं तैयार हो रही थी। मैं अभी आपसे मिलूंगी।" कहकर वह लगभग दौड़ती हुई एक कमरे में विलीन हो गई ।

राज को इस तरह जान पड़ा, जैसे सौन्दर्य की शिखा लहराकर छिप गई हो ।

कृष्ण जगतार के साथ वह कॉरीडोर में प्रविष्ट हुआ । कृष्ण एक कमरे में पहुंचा जिसका द्वार आधा खुला था। राज बाहर ही खड़ा रहा । उसने कृष्ण की आवाज सुनी, "माँ ! मैं आ गया।"

“जब तुम मुझे छोड़कर ही चले गए तो तुम्हारे लौटने की मुझे क्या खुशी हो सकती है ?"

यह आवाज़ शायद कृष्ण की माता की थी। लगा कि वह आवाज इतनी क्षीण थी जैसे कोसों दूर से आ रही हो। वैसे ही, जैसे कोई बादलों के पीछे से बोल रहा हो। एकदम ठण्डी आवाज़ थी— बर्फीली । बदन को काटने वाले सर्द झोंके की तरह उस आवाज ने असर किया और राज ठिठुरकर रह गया ।

कुछ सोचकर उसने खुले द्वार में से कमरे में झाँका । जो भी उसने देखा, उससे राज बरबस आँखें झपकाता रह गया। वह द्वार की ओर पीठ मोड़कर खड़ा हो गया। उसने कृष्ण को ऐसी नारी के चरणों में झुका पाया जो इस संसार की नारी नहीं जान पड़ती थी । वह ऐसी थी जैसे नारी की काया से निकलकर उसकी रूह खड़ी हो । काली साड़ी में उसका संगे-मंर्मर जैसा शरीर बहुत ही पतला और क्षीण था । नीली नीली रगें दिखाई दे रही थीं, जैसे वह शीशे की तरह पारदर्शी ढाँचा हो और शरीर के आर-पार देखा जा सकता हो ।

राज ने झुरझुरी ली - 'कैसा है यह परिवार ? कैसा है यह बंगला ?"

"तुम्हारे पिता अभी आने वाले हैं। वही अब तुम्हारे भविष्य का निर्णय करेंगे ।” उस नारी की आवाज अब भी जैसे बहुत दूर से आती प्रतीत हुई।

तभी कॉरीडोर में महकता सा झोंका आया । मनजीत जगतार अपने कमरे से निकली । अब उसने लम्बा-सा गाउन पहन रखा था ! राज के पास आकर उसने कहा, "मैं चाहती हूँ कि मेरी बर्थ-डे की पार्टी में आप भी शामिल हों। कृष्ण के आ जाने से मेरी पार्टी की शोभा दुगुनी हो जाएगी।" फिर उसने रुककर कहा, "आप शायद पिताजी का इन्तजार कर रहे हैं ?"

"हाँ ।"

"तो उनसे मिलने के बाद मुझसे जरूर मिलियेगा ।" मनजीत ने . विनती-सी की।

"जरूर मिलूंगा।" राज ने वादा किया। उसने महसूस किया कि कृष्ण की तरह मनजीत जगतार भी उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हुई थी।

कृष्ण अपनी माँ के कमरे से बाहर आया तो ठीक इसी समय कॉरीडोर में खुलने वाले मुख्य द्वार में मिस्टर शंकर जगतार दिखाई दिये । वह बड़ी गम्भीरता से चलते हुए कृष्ण और राज के पास पहुँचे ।

कृष्णा ने कुछ झिझकते हुए हाथ जोड़े और पिता को बन्दना की ।

शंकर जगतार ने रोबीली आवाज में बेटे से कहा, "कृष्ण ! तुम अपने कमरे में जाओ।" फिर राज को अपने पीछे आने का इशारा किया।

दोनों स्टडी रूम में आ पहुंचे। मेज़ के सामने की कुर्सी पर शंकर जगतार ने राज को बैठने का इशारा किया। आप वह मेज के पीछे पड़ी कुर्सी में जा बैठे। ब्रीफकेस खोलकर उन्होंने चेक बुक निकाली और कोट की जेब से सुनहरी कैपवाला पेन उतारकर चेक लिखने लगे । दो हज़ार रुपये का चेक काटकर उन्होंने राज की ओर बढ़ा दिया- " आपका काम खत्म हो गया । अब हमें एक-दूसरे से मिलने की कोई ज़रूरत नहीं । गुड नाइट ! "

"आपकी बेटी ने मुझे अपने जन्म दिन की पार्टी में शामिल होने की दावत दी है। कुछ घण्टों के लिए मुझे आपके बंगले में रहना होगा ।" राज ने चेक जेब में डालते हुए कहा ।

शंकर बोले, "आप बहाना कर दीजिये कि आपको किसी जरूरी काम से कहीं जाना है ।"

"अब नहीं, मैं वादा कर चुका हूँ।" राज ने कहा ।

शंकर जगतार ने जरा खीझकर कहा, “एक बात में आपको स्पष्ट बता दूं कि सामाजिक रूप से आपका इस घर में आदर-स्वागत नहीं किया जा सकता ।"

"मिस्टर जगतार ! आप गुस्ताखी कर रहे हैं। यह ठीक है कि आपका सामाजिक रुतवा कुछ ऊँचा है, लेकिन आपको यह अधिकार नहीं है कि आप किसी की भी तौहीन कर दें।"

शंकर जगतार ने मेज पर पड़ी हुई घण्टी बजाई। जवाब में एक हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति दरवाजे में आ खड़ा हुआ । उसने बनियाननुमा कमीज, काली और तंग पैंट पहन रखी थी। उसकी सुडौल बाहें कन्धे तक नंगी थीं । बाँहओं पर उभरी मछलियाँ शरीर की दृढ़ता का परिचय दे रही थीं। आँखें उसकी तिरछी और सोई-सोई थीं। वह किसी अज्ञात टापू का निवासी जान पड़ता था ।

“भगतू ! इन्हें दरवाजे के बाहर छोड़ आओ !” शंकर जगतार ने हुक्म दिया।

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राज ने दहकती आँखों से शंकर को घूरा। उसे शंकर का यह व्यवहार समझ में नहीं आ रहा था। वह स्वयं कुर्सी पर से उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा ।
 
दरवाजे के बाहर उसे श्वेत गाउन में एक लड़की दिखाई दी । वह भगत के पीछे राज को देखकर किसी कमरे में जाते-जाते रुक गई । उसका रंग हल्दी की तरह पीला था। उसके हाथ कलाइयों पर से मुड़े हुए थे। उन हाथों को वह शायद उठाकर रखती थी । उसकी उँगलियों की हड्डी पर मांस नहीं था ।

राज उसे देखता रह गया। वह भगत से आगे बढ़ गया । वह जगतार के घर में ठहरना नहीं चाहता था। तभी उसने अपने पीछे तेज-तेज पदचाप सुनी- "क्या यह आपके लिए अच्छी बात है ? आप मेरी दावत ठुकराकर जा रहे हैं ?"

यह आवाज मनजीत की थी।

राज ने मुड़कर कहा, "आप अपने पिताजी से पूछिये ! उन्होंने ही मुझे अपने घर से निकाल बाहर करने का हुक्म फरमाया है। यह भगतू मुझे बाहर के दरवाजे तक छोड़ने जा रहा है।"

"यह नहीं हो सकता !" मनजीत ने फर्श पर पाँव पटकते हुए कहा, "यह मेरी पार्टी है ! मैं जिसे चाहूँ, दावत दे सकती हू। पिताजी को कोई अधिकार नहीं कि वह मेरे मेहमान से ऐसा व्यवहार करें। " यह कहकर उसने भगतू को हुक्म दिया, "भगतू, तुम जाओ !"

भगतू चुपके से सिर झुकाए चला गया ।

"आप मेरे साथ आइये !" मनजीत ने राज से कहा ।

"आप हठ न पकड़िये ! मेरी इस घर में मौजूदगी आपके पिताजी

को पसन्द नहीं है।" राज ने चेताया



“पिताजी के सिर पर तो कभी-कभी भूत सवार हो जाता है । आप मेरे साथ आइये।" यह कहकर मनजीत ने अपनी सुकोमल बाँह राज की मुडौल बाँह में पिरो दी। वह उसे खींचकर अपने कमरे में -ले गई। अपने पिता के कमरे में आकर वह जोर-जोर से बोलने लगी। फिर कुछ मिनट बाद बिफरी हुई अपने कमरे में लौट आई। सिर झटककर उसने कहा, "मानते कैसे नहीं ? पार्टी मेरी है, उनकी नहीं।"

राज मुस्कराया। वह अब यह फैसला कर चुका था कि मनजीत की बर्थ-डे की पार्टी में अवश्य बना रहेगा। इस निर्णय के दो कारण थे— एक तो वहाँ रुककर वह मिस्टर शंकर जगतार की घृष्टता का बदला लेना चाहता था; दूसरे, वह इस घर के अनोखे माहौल की छानबीन करना चाहता था।

रात के साढ़े आठ बजे मेहमान आने शुरू हो गए। मेहमानों को स्वागत-सत्कार के बाद डाइनिंग हॉल में ले जाया जाता। वहाँ उनकी इच्छानुसार शर्बत, जूस, बीयर, वाइन या ह्विस्की पेश की जाती ।

नौ बजे तक सभी मेहमान आ गए। अलग-अलग टोलियां बना कर मेहमान बातें करते रहे। उनमें नौजवान लड़के-लड़कियाँ अधिक थे। प्रौढ़ नारी-पुरुषों की संख्या कम थी ।

शंकर जगतार मेहमानों का इन्तजार करने के बाद सवा नौ बजे डाइनिंग हॉल में प्रविष्ट हुए। उन्होंने इस समय डिनर-सूट पहन रखा था। राज से उनकी आँखें चार हुई। अपनी आँखें चुराकर वह एक प्रौढ़ से बातों में लीन हो गए।

हॉल खचाखच भरा हुआ था। राज की आँखों ने मनजीत और उसकी पीली जर्द बहन को दृष्टि-सीमा में घेर रखा था। उसने देखा कि मेहमान उनसे संक्षिप्त-सी बातचीत करके हट जाते थे ।

जल्दी ही नाच शुरू हो गया।

राज अकेला खड़ा रहा। एक लड़की, जिसने नीला लिबास पहन रखा था और जिसके गले में सांप जैसा नेकलेस था, उसके पास आई और बोली, "आप अकेले क्यों हैं ? चलिये, मैं आपको अपना पार्टनर बनाए लेती हूँ ।'

“शुक्रिया !" वह उस लड़की का नाम पूछे बिना उसके साथ नाचने लगा ।

दो मिनट बाद उस लड़की ने पूछा, "आपकी जेब में क्या मेरे बदन में चुभ रहा है ।"

"रिवॉल्वर है ।" राज ने बताया ।

"रिवॉल्वर ? मुझे दिखाइये !" लड़की ने नाचते हुए कहा ।

राज ने जेब से रिवॉल्वर निकालकर उसके हाथ में दे दिया । लड़की ने रिवॉल्वर हाथ में लेकर बड़े ध्यान से देखा । फिर सहसा राज से अलग होकर नाचते हुए जोड़ों में से दौड़ती हुई हॉल के दरवाजे से निकलकर लॉन में चली गई। राज उसके पीछे ही था । लड़की अब चारदीवारी के साथ लगे पेड़ों की ओर भाग रही थी । पेड़ों के पास आकर राज के पाँव एक पत्थर से टकरा गये । वह औंधे मुंह गिर पड़ा। अगले ही क्षण उसके सिर पर भारी चोट पड़ी और उसे कुछ होश न रहा ।

जब राज को होश आया तो उसके कपड़े मिट्टी से अटे पड़े थे । उसके बदन पर नीली धारियों वाला कोट नहीं था। वह उठकर कपड़े झाडने लगा। पेड़ों के पीछे जाकर उसने इधर-उधर निगाहें दौड़ाई । वहाँ कोई नहीं था । उसका सिर भारी हो रहा था। वह सोच रहा था कि पत्थर से टकराकर गिरने पर जिस किसी ने भी उसके सिर पर वार किया था, वह उसे दिखाई क्यों नहीं दिया था ? हमलावर उसका कोट क्यों उतार ले गया था ?

आखिर वह बंगले की ओर चल पड़ा। वह उस लड़की को पाना चाहता था जो उसका रिवॉल्वर लेकर भाग खड़ी हुई थी। लड़की उसे सुन्दरता की प्रतिमा नजर आई थी। उसे खयाल आया क्या वह लड़की जान-बूझकर उसके साथ नाचने आई थी ? क्या वह मासूम कही जा सकती है ? रिवॉल्वर लेकर वह बाहर को क्यों उठ दौड़ी ? पेड़ों की ओर भाग जाने का क्या मतलब है ? क्या कोई पहले से खड़ा यहाँ उसका इन्तज़ार कर रहा था ?

यही सोचता हुआ राज डाइनिंग हॉल के पास आ पहुंचा। अभी वह बीसेक गज दूर था कि उसने एक-साथ बहुत-सी चीखें सुनीं। वह तेजी से डाइनिंग हॉल की ओर लपका। दरवाज़े में एक नौजवान उससे टकरा गया। उसने कहा, "आपने कुछ सुना? मिस्टर शंकर जगतार मर गए ! किसी ने उनकी हत्या कर दी। उन्हें दो गोलियाँ लगी हैं और हैरानी की बात यह है कि किसी ने भी गोली चलती नहीं सुनी।"

राज स्तब्ध रह गया ।

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डाइनिंग हॉल में भीड़ सहमी हुई थी। सहमी हुई लड़कियों से एक लड़के ने कहा, "फर्श पर खून-ही-खून वह रहा है ! खून का जोहड़ बन गया है।"

एक और नौजवान बोला, "गोलियों से बदन छिदा पड़ा है।" राज भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा। उसने एक से पूछा, "लाश कहाँ है ?”

उत्तर में एक-साथ तीन लोगों ने हॉल के पीछे एक लॉबी की ओर इशारा किया। राज उसी दिशा में लपका। वहां कई लोग मौजूद थे। उन्हें हटाता हुआ राज आगे बढ़ा। लॉबी की पिछली दीवार में एक कमरा था। लोग उस कमरे में झाँक-झांककर देख रहे थे और पीछे हटते जा रहे थे। उनकी जगह दूसरे लोग झांकने को आ पहुँचते थे । राज अपने बदन को समेटता सिकोड़ता हुआ कमरे में पहुँचा । पाँच नौजवान डिनर-सूट पहने उस मेज़ की ओर देख रहे थे जिस पर शंकर जगतार का सिर और कंधे थे ।

लाश के चेहरे से यह नहीं जान पड़ता था कि उसे बड़ी निर्दयता के साथ मारा गया है। शंकर जगतार गहरी नींद सोये हुए जान पड़ते थे ।

राज आगे बढ़ा। उसने शंकर जगतार के पैरों तले खून का जोहड़ देखा । थोड़ा-सा खून कालीन पर जम चुका था और बहुत-सा चमक रहा था। एक गोली लाश के सीने में और दूसरी सिर में लगी थी। उनके बाईं ओर कांसे से मढ़ा लकड़ी का बक्स खुला पड़ा था। मेज़ पर बहुत से कागज़ बिखरे पड़े थे ।

राज झुक गया । उसे शंकर जगतार की घूमने वाली कुर्सी के गोल चबूतरे के पास एक चीज गिरी हुई नजर आई थी। उसने दरवाजे की ओर मुंह फेरकर कहा, "क्या किसी ने पुलिस को सूचना दे दी है ?"

"हाँ, फोन कर दिया गया है।" कोई बोला ।

" पुलिस को आने से पहले आपको यह कमरा खाली कर देना चाहिये।"

"तुम हुक्म देने वाले कौन हो ?" एक नौजवान ने क्रोध से पूछा ।

राज ने उस नौजवान को घूरकर देखा । जब नौजवान ने राज की क्रोध-भरी आँखों से उसे तोला-जांचा तो पीछे हट गया। दूसरे लोग भी कमरे से बाहर निकल गए। राज दुबारा लपका और शंकर जगतार की मेज के पास पहुंचा। उसने पीछे को जाकर घूमने वाली कुर्सी के चबूतरे के पास से चमकती हुई चीज़ उठा ली। उस चीज को वह पहचानता था। यह वास्तव में बल खाए सांप के आकार का नेकलेस था । सांप कुण्डली मारे हुए था और उसकी दुम मुंह में थी ।

वह नेकलेस राज ने उस लड़की के गले में देखा था जो उसके साथ नाचने के लिए आई थी, फिर उसका रिवॉल्वर लेकर चम्पत हो गई थी। उसी लड़की का पीछा करने के दौरान राज पर किसी ने वार किया था। वह नेकलेस उसने गुच्छा-गुच्छा करके अपनी जेब में डाल लिया । उसे हैरानी हो रही थी कि उससे पहले किसी ने रिवॉल्विंग कुर्सी के चबूतरे के पास वह नेकलेस क्यों नहीं देखा था । शायद चबूतरे की ओट की वजह से किसी की नज़र न गई हो !

तभी कदमों की आहट हुई। फिर पैंतीस छत्तीस साल का एक नौजवान कमरे में प्रविष्ट हुआ। वह आग उगलती आँखों से राज को देखने लगा। नौजवान बीमार लगता था ओर डरा हुआ भी था । वह बहुत ज्यादा पिये हुए था । उसने उखड़े उखड़े लहजे में कहा, 'हमें आपकी सेवाओं की कोई जरूरत नहीं, मिस्टर राज ! यह मुआमला पुलिस से सम्बन्ध रखता है और पुलिस आ रही है।"

"मैं भी पुलिस का इन्तजार कर रहा हूँ।" राज ने सहजता से

"मैं कुछ नहीं जानता, आप यह कमरा खाली कर दीजिये !" नौजवान बोला ।

"पहले मुझे यह बताइए कि आप कौन हैं ?”

"मैं पद्म जगतार है...बड़ा बेटा ।"

" ओह...ह! अच्छी बात है। लीजिये, मैं यह कमरा खाली किये देता हूँ।" यह कहकर राज कमरे से बाहर आ गया और वह मनजीत के कमरे की ओर बढ़ा ।

ठीक उसी समय बंगले के बाहर पुलिस वैन रुकने की आवाज़ सुनाई दी। राज तेजी से मनजीत के कमरे में चला गया। उसने देखा कि मनजीत का चेहरा श्रीसुधों से तर था। उसका एक सूटकेस खुला पड़ा था। मनजीत बड़ी घबराहट के साथ सूटकेस में से कपड़े और अन्य वस्तुएं निकालकर फेंकती जा रही थी। उसने अपने कमरे में पदचाप सुनी तो कनखियों से राज को देखा ।

"क्या ढूंढ रही हैं आप ?" राज ने पूछा ।

"मेरा एक नेकलेस गुम है।" "मनजीत व्यग्रता से बोली ।

"नेकलेस ?" राज के मुंह से निकला । उसने अपनी जेब में हाथ डालकर वह नेकलेस निकाल लिया, जिसे एक रूप- सुंदरी पहनकर नाचने के लिए राज के पास आई थी और जो मनजीत के पिता की लाश के पैरों मैं कुर्सी के चबूतरे के पास पड़ा था। उसने पूछा, "कहीं यह आप ही का नेकलेस तो नहीं ?"

मनजीत देखते ही उस नेकलेस पर झपट पड़ी और बोली, “यही तो है मेरा नेकलेस ! आपके पास कहाँ से आ गया ?"

"मुझे यह आपके पिता की लाश के पैरों में पड़ा मिला।"

सुनते ही मनजीत के चेहरे का रंग उड़ गया। नेकलेस उसके हाथ से फिसलकर गिर गया। वह आवेश में उठी और राज के गले से लग गई— "नहीं-नहीं ! मैंने अपने पिता को नहीं मारा ! मैं ऐसा हर्गिज नहीं कर सकती थी।" वह सिसकियाँ भरने लगी, "कौन ले गया था मेरा हार ? यह पिताजी के पैरों के पास कैसे जा पहुंचा ? मैं तो समझ रही थी कि कृष्ण मेरा हार चुराकर ले गया ।"

"कृष्ण ? आपका छोटा भाई ? वह कहाँ है ?"

"वह जा चुका है पिताजी की कार में। वह पिताजी के केश- वॉक्स में से रुपया भी ले गया है। जब शोर मचा और लोग पिताजी के कमरे की ओर दौड़े तो मैंने कृष्ण को बाहर भागते हुए देखा। मैंने उसका पीछा किया था, लेकिन वह तेजी से कार का एंजिन स्टार्ट करके जा चुका था। मैं जब पिताजी के कमरे में गई और उनका कैश बॉक्स खुला पड़ा देखा तो समझ गई कि कृष्ण ने ही कंश बॉक्स में से रुपया निकाला होगा । कृष्ण ने बदला लिया जान पड़ता है। सच्चाई यह है कि पिताजा ने आज उसे बहुत खरी-खोटी सुनाई थीं।

राज बोला, "कृष्ण जगतार का इस तरह भाग निकलना हैरानी की बात जरूर है, मगर सवाल यह पैदा होता है कि आपका नेकलेस आपके पिताजी के कदमों में कैसे पहुंच गया ? मैं समझता हूँ कि आपके पिताजी की हत्या किसी औरत के हाथों हुई है। आपके पिता ने उस औरत के गले में हाथ डाला होगा... अपने बचाव के दौरान संघर्ष के दौरान तब नेकलेस उस औरत के गले से टूटकर आपके पिता के हाथ में आ गया और उसके पैरों में गिर पड़ा, क्योंकि, गोली उनके सीने के पार हो चुकी थी। मेरे अनुमान से आपका नेकलेस किसी औरत ने चुराया ।" इतना कहकर राज ने उस अज्ञात सुन्दरी का हुलिया बता दिया जो राज का रिवॉल्वर लेकर भाग खड़ी हुई थी ।

"उस औरत को मैं नहीं जानती । शायद कोई मेहमान उसे अपने दुनिया साथ लाया होगा !" मनजीत ने कहा ।

"वह औरत कहीं कृष्ण जगतार की परिचिता तो नहीं थी ?" इस शंका के साथ राज के मन में सवाल उभरा — जब वह सुन्दरी उसका रिवॉल्वर छीनकर बंगले के बाहर पेड़ों की ओर भागी थी, उस समय कृष्ण जगतार वहीं उसका इन्तजार तो नहीं कर रहा था ? कहीं वह हमलावर कृष्ण जगतार तो नहीं था ? क्या कृष्ण ने ही उसे अपने पिता के पास भेजा था ? — और भी ऐसे कई सवाल राज के दिमाग में उभर आए। तभी उसे अपने रिवॉल्वर की याद आई और वह बेचैन हो उठा। कहीं वह औरत ही तो दो गोलियां चलाकर उसका रिवॉल्वर अपने साथ नहीं ले गई ? शंकर जगतार की हत्या के लिए कहीं उसी कां रिवॉल्वर तो इस्तेमाल में नहीं लाया गया ?

राज का ध्यान मनजीत की ओर मुड़ा जो फर्श पर गिरा अपना नेकलेस उठाकर सूटकेस में रख रही थी। उसने कोई फैसला मन-ही- मन किया और तुरन्त बोला, "नहीं, यह नेकलेस आप मुझे दे दीजिये ! किसी से भी यह न कहियेगा कि आपका नेकलेस चोरी हो गया था ।" वास्तव में राज वह नेकलेस ले जाकर यह देखना चाहता था कि उस पर कितने लोगों की उँगलियों के निशान थे।

मनजीत ने नेकलेस राज की ओर बढ़ा दिया। उसे जेब के हवाले करके राज कमरे से निकला और उस कमरे में चला आया जहाँ पुलिस कर्मचारी अपनी कार्रवाही में संलग्न थे। उसने इन्स्पेक्टर दर्शन कुमार तनेजा को पहचान लिया। इन्स्पेक्टर भी उसे अच्छी तरह जानता था । उसे वहाँ राज को देखकर हैरानी भी हुई, फिर भी वह बड़ी गर्मजोशी के साथ उससे मिला । उसने पूछ ही लिया, "आप यहाँ कैसे ?"

राज ने इन्स्पेक्टर को अंधेरे में रखना उचित न जाना। उसने बता दिया कि वह कैसे उस बंगले में आया, कैसे उसे मनजीत के बर्थ-डे की दावत में शामिल होना पड़ा; बल्कि यह भी बता दिया कि कैसे एक सुन्दरी ने आकर उसके नाचने का प्रस्ताव रखा और किस चालाकी से वह उसका रिवॉल्वर लेकर भाग खड़ी हुई। अपने पर हमले की घटना भी उसने न छिपाई। होश आने पर उसने चीखें तो सुनीं, लेकिन गोलियों की आवाज न सुनी यह सब बताते हुए राज ने नेकलेस का रहस्य न बताया ।

"क्या वह हसीना आपको दुबारा यहाँ दिखाई नहीं दी ?"

"नहीं।" राज बोला ।

"आप उसका हुलिया लिखवा दीजिये।"

राज ने उस सुन्दरी का हुलिया लिखवा दिया और बोला, “आप मेरा रिवॉल्वर तलाश कीजिए। वह पायंट बत्तीस का रिवॉल्वर है । लाश में से जो गोलियाँ बरामद हों तो यह देखियेगा कि वे पायंट बत्तीस के रिवॉल्वर की गोलियाँ हैं या किसी दूसरे रिवॉल्वर की । मैं आपको कल फोन करूंगा ।"

कुछ पल रुककर राज ने विदा ली। रात काफी जा चुकी थी और राज की आँखें नींद से भरी हुई थीं ।

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मुंह-अंधेरे ही किसी ने दरवाजे पर आ दस्तक दी ।

राज ने आँखें खोलीं। बेड-लैम्प की रोशनी में उसने दीवार घड़ी को देखा । सवेरे के सवा छह बजे रहे थे ।

हल्की-सी दस्तक दुबारा हुई। यह दस्तक रहस्यमयी थी ।

"कौन ?" राज ने पूछा ।

जवाब देने की बजाय आने वाले ने फिर दस्तक दी। राज हैरान हुआ कि दस्तक देने वाला बोल क्यों नहीं रहा ? उसने पलंग के पास रखे मेज़ पर से अपना दूसरा रिवॉल्वर उठाया और उठकर बड़ी चौकसी के साथ दरवाजा खोला । वह आँखें झपकाता रह गया। दरवाजे में मनजीत की बड़ी बहन कान्ता जगतार खड़ी थी- पीली-दुबली लड़की । उसके मुड़े हुए हाथों में कोई लम्बी-सी चीज थी, जो कपड़े में बंधी हुई थी ।

“आप ? इस समय ? आप तो जासूसों से घृणा करती हैं न ?" राज के मुंह से निकला ।

"मुझे आना पड़ा ।" कान्ता जगतार ने उदास स्वर में कहा ।

“आइये !" कहकर राज दरवाजे से एक ओर हट गया ।

कान्ता जगतार प्रॉफिस में प्रविष्ट हुई। राज ने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और आप वह मेज के पीछे कुर्सी पर जा बैठा पल-भर मौन रहा, फिर राज ने पूछा, "कहिये, मेरे पास आपको कैसे आना पड़ा।"

कान्ता ने जवाब देने से पहले कपड़े में बंधी हुई लम्बी चीज निकाली और राज के सामने मेज पर रख दी। यह भूरे पत्थर की एक मूर्ति थी। मूर्ति किसी भरपूर जवान औरत की थी और नग्न-रूप में बनाई गई थी। उसके हाथ-पाँव कँटीली शाखाओं से बंधे हुए थे । मूर्ति की आँखें बिल्लोर की थीं, जैसे वह देख भी सकती हो।

“यह क्या है ? मेरा मतलब है कि यह कैसी मूर्ति है ?" राज ने पूछा।

"यही तो मैं जानना चाहती हूँ ! कल पिताजी की हत्या के पहले या भाग-दौड़ के बीच कोई यह मूर्ति मेरे सूटकेस में रख गया। रात 1 को मैंने इसे सूटकेस में देखा तो डर गई। बिजली के प्रकाश में इसकी घाँखों से किरणें फूट रही थीं। तीन-चार मिनट तक मेरी निगाहें इसके चेहरे पर जमी रहीं । मैं सो गई तो मैंने एक भयानक सपना देखा।"

" कैसा सपना देखा आपने ? " राज ने पूछा ।

कान्ता ने बताया, “मैंने देखा कि मूर्ति वाली औरत मैं हूँ। मेरेँ हाथ-पाँव कंटीली शाखाओं से बंधे हुए हैं। मैं नंगी हूँ। मुझे हुक्म सुनाया गया है कि दो चर्खियों से बाँधकर मुझे चौक में ले जाया जाय । मेरा सिर एक चर्खी से और मेरी टाँगें दूसरी चर्खी से बंधी हुई हैं । चौक में ले जाकर मारी भीड़ के सामने दोनों चर्खियाँ विपरीत दिशाओं में चलाकर मेरे शरीर के दो टुकड़े कर देने का हुक्म हुआ। मैं चीखी- चिल्लाई। कोई भी मेरी करुण पुकार नहीं सुन रहा था। मेरा अपराध भयंकर था। मैंने एक प्रबोध लड़के को बहकाकर भ्रष्ट किया था। चौक में ले जाकर मेरे शरीर के दो टुकड़े कर दिये गए। तब मैं जोर से चिल्लाई ओर जाग उठी। थोड़ी देर मैंने दीवार पर निगाहें जमाई तो दीवार पर भी मेरे शरीर के दो टुकड़े बनने की तसवीर बनने लगी । आँखें मैंने बन्द कर लीं, लेकिन वह दृश्य तब भी वैसा ही दिखाई दिया। मैंने छत की ओर देखा तो मैंने अपना शरीर दो चर्खियों के बीच तना हुया पाया । सवेरे पाँच बजे तक वही दृश्य बार-बार मेरी आँखों के सामने आता रहा। इसीलिए मुझे आपके पास आना पड़ा। मुझे यह बताइये कि यह मूर्ति देखकर मुझे क्या हो गया है ? मैं डर से मरी जा रही हैं। इस मूर्ति की पीठ पर 'पाली' भाषा में इस औरत के अपराध और दण्ड का हाल लिखा हुआ है। मैं तनिक भी सोचने लगती है तो इस मूर्ति वाली औरत बन जाती हूँ। इस औरत पर जो गुजरना था, वही मुझ पर गुजरने लगता है। आप मेरी मदद कीजिये ! मुझे इस डर से छुटकारा दिलाइये !

राज ने वह मूर्ति उठा ली । वह एक ठोस प्रतिमा थी। उसकी पीठ पर सचमुच कुछ लिखा हुआ या । उसने पूछा, "क्या आप पाली भाषा जनिती हैं ?"

"मैं बहुत-सी भाषाएँ जानती हूँ ।" कान्ता ने बताया ।

राज फिर से मूर्ति को देखने लगा । कान्ता इस बीच छत की ओर देख रही थी । अचानक वह चीख उठी। कुर्सी से उठकर वह दुबारा कुर्सी पर गिर पड़ी। उसने अपनी जांघों पर कुहनियां रखकर हाथों से आँखें मींच लीं। राज ने मेज के पीछे से आकर उसके कन्धे पर हाथ रख दिया और बोला, "आप शायद फिर डर गई ! ऐसा कीजिये, आप घर जाकर कोई किताब पढ़िये । अपने विचारों को भटकने न दीजिये। मैं यह मालूम करने की कोशिश करता हूँ कि आप यह मूर्ति देखकर मूर्ति वाली औरत कैसे बन गई।"

कान्ता जगतार उठी और जाने से पहले फिर गिड़गिड़ाई, "मुझे इस डर से मुक्ति दिलाइये ! मैं सच कहती हैं, इस तरह तो मैं डर के मारे तड़पती ही मर जाऊंगी। मेरा यह डर दूर कीजिये और मेरे पिता के हत्यारे को खोजिये । आपको मुंह मांगा पारिश्रमिक मिल जाएगा ।"

"आप घबराइये नहीं ! "

कान्ता के जाने के बाद राज ने भूरे पत्थर की मूर्ति अलमारी में रख दी और बाथरूम में चला गया।

वह अभी बाथ -रूम में ही था कि दरवाजे पर फिर किसी ने दस्तक दी। राज ने बाथरूम में से ही आवाज दो, "कौन ?"

"इन्स्पेक्टर तनेजा ।"

"ओह, आप हैं ! विराजिये, मैं अभी आता हूँ ।"

इन्स्पेक्टर तनेजा को पांच मिनट तक इन्तजार करना पड़ा। राज बाथरूम से ही तैयार होकर निकला। उसने आकर इन्स्पेक्टर से हाथ मिलाया और कुर्सी पर बैठते हुए बोला, "कहिये, कैसे आना हुआ

"मैं आपके पास दो चीजें लाया हूँ —एक पत्र, और दो गोलियाँ । गोलियाँ पायंट-बत्तीस के रिवॉल्वर की हैं। शायद आपके ही रिवॉल्वर- की हैं, मगर आपका रिवॉल्वर कहीं नहीं मिला।" यह कहकर इन्स्पेक्टर तनेजा ने दो गोलियां राज के सामने रख दीं ।

राज ने एक गोली उठाकर देखी ओर कहा, "ये गोलियाँ मेरे ही रिवॉल्वर की हैं।"

"वह औरत सचमुच बड़ी चालाक निकली। हो सकता है कि उसके पास अपना भी रिवॉल्वर रहा हो, लेकिन चतुराई उसने यह की कि अपने मनोरथ के लिए उसने मशहूर जासूस का रिवॉल्वर इस्तेमाल किया और फिर रिवॉल्वर भी वहाँ छोड़कर नहीं गई ।" तनेजा बोला ।

"इन्स्पेक्टर साहब ! क्या आपने यह धारणा त्याग दी कि कृष्ण जगतार अपने पिता का हत्यारा है ?" राज ने पूछा ।

"हम सभी सम्भावनाओं को अपने सामने रख रहे हैं।" यह कह कर इन्स्पेक्टर ने अपने बैग में से एक पत्र निकाला।

उसे राज की ओर बढ़ाते हुए वह बोला, "यह पत्र मिस्टर शंकर जगतार के पर्स में से निकला है। समझ में नहीं आता कि यह किस भाषा में या किस संकेत लिपि में लिखा हुआ है। पुलिस विशेषज्ञ इसका कोई सिर-पैर नहीं पकड़ सके। मैं इसे आपके पास लाया हूँ कि शायद आप पत्र की बात मालूम कर सकें। आप ही पता लगा सकेंगे कि शंकर जगतार को यह पत्र किसने लिखा या शंकर जगतार ने ही किसी को क्या लिखा ।"

राज ने वह पत्र ले लिया। पहली दृष्टि में वह भी न समझ पाया कि पत्र किस भाषा में लिखा था । उसने इन्स्पेक्टर से कहा, "मुझे आशा है कि मैं इस पत्र का मजमून जान लूंगा। आप यह बताइये कि कृष्ण जगतार का कुछ पता लगा ?”

"वह कहाँ जाएगा ! आज नहीं तो कल पकड़ा जाएगा। मैं चलता हूँ। शाम को फोन पर पूछूंगा कि इस पत्र की इबारत में क्या कुछ है।"

इन्स्पेक्टर के जाने के बाद राज ने वह पत्र ध्यान से पढ़ा। वह कई गुप्त-लिपियों का ज्ञाता था। उसने अपनी एक 'कोड-बुक' बना रखी थी जिसकी मदद से वह ऐसे पत्र आदि पढ़ लिया करता था । राज को पत्र देखकर ऐसा जान पड़ा कि उसमें जो संकेत इस्तेमाल किया गया था, वह दो मिली-जुली भाषाओं का था। वे मात्राएँ 'उड़िया' और 'पाली' लगती थीं। 'पानी' माया का विचार आते ही राज को भूरी मूर्ति का ध्यान आया । उस मूर्ति की पीठ पर 'पानी' भाषा में कुछ अंकित था। वह सोचने लगा- यह 'पानी' माया का क्या चक्कर है ?

नौ बजे से पहले प्रचंना, प्रवेश और नरेन्द्र भी पहुँच गए। सभी ने राज को 'नमस्ते' की, राज ने इन्स्पेक्टर तनेजा का दिया हुषा पत्र नरेन्द्र को सौंपते हुए कहा, "बड़े वकील बने फिरते हो, यह पत्र पढ़कर बताओ तो जानें ! "

नरेन्द्र ने वह पत्र ले लिया और उस पर एक दृष्टि डालकर बोला- "आप गँवार से पण्डित का और चूहे से शेर का काम लेना चाहें तो आपकी बुद्धि को क्या कहूँ ।'

राज खीझकर बोला, "लोग अगर एक नम्बरी कामचोर हैं तो तुम दस नम्बरी कामचोर हो। जाओ, मेरी 'कोड-बुक' की मदद से इस पत्र को पढ़ो और आकर बताओ कि इस पत्र में लिखा क्या है ?"

पत्र लेकर नरेन्द्र दूसरे कमरे में चला गया। इस बीच राज ने अपने साथियों को रात की घटनाओं से परिचित कराया ।

अर्चना ने अँगड़ाई लेते हुए कहा, "इसका मतलब तो यह हुआ कि हमें जुट पड़ने के अवसर आ पहुंचे।"

थोड़ी देर तक सभी ताजा घटनाम्रों पर विचार-विमर्श करते रहे। इतने में नरेन्द्र ने आकर कहा, "माता के पेट से महा-पण्डित बना- बनाया कोई नहीं आता । इस रुतबे के लिए मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत ने ही मुझे महा-पण्डित बना दिया है। यह पत्र मैंने पढ़ लिया है और इस दूसरे कागज पर साफ-साफ लिख लिया है कि पत्र में क्या है ?'

पढ़कर सुनानो।" राज बोला ।

नरेन्द्र अपने हाथ का लिखा हुआ कागज पढ़ने लगा-

'मेरे मूर्ख दोस्त, चित्तरंजन !

तुमने मेरी बात नहीं मानी और अब तुम यह कह रहे हो कि तुम्हें सख्त खतरा है। न तुम्हारी पत्नी है, न तुम्हारे बच्चे हैं। हांगकांग का लाखों रुपया बर्बाद करने के बाद भी तुम खतरा महसूस कर रहे हो? तुमसे किसने कहा था कि तुम अपने बंगले पर पन्द्रह लाख रुपया लगा दो ? आखिर तुम्हें यह पागलपन कैसा सूझा कि तुम 'काले जादू' का रहस्य पाकर रहोगे ? अब 'काले जादू' ने तुम्हें अपनी लपेट में लें लिया है तो इसमें दोष किसका ?

खैर, तुम मेरे गहरे दोस्त हो। मैंने डॉक्टर हेमचन्द्र जैन से बात की। उन्होंने वचन दिया है कि वह तुम्हारी सहायता करेंगे। मैं आज या कल उन्हें तुम्हारे पास लाऊंगा ।

- शंकर ।'

"यह महाशय कौन है जिन्हें 'मूर्ख चित्तरंजन' के तौर पर शंकर ने पत्र लिखा ?" राज के मुंह से निकला, “डॉक्टर हेमचन्द्र जैन को तो मैं जानता हूँ। वह सम्मोहन और तन्त्र-विद्या के विशेषज्ञ हैं । आाओ, हम सब उनके पास चलें। उन्हीं से पता चलेगा कि 'मूर्ख चित्तरंजन' महोदय कौन हैं और उन्हें कैसा खतरा है । यह भी जानकारी मिल जाएगी कि उन्होंने शंकर जगतार से कैसी सहायता मांगी थी । सम्भव है कि शंकर जगतार की हत्या का सम्बन्ध चित्तरंजन से हो, जो 'काले जादू' का प्रयोग कर रहा है। स्पष्ट है कि शंकर जगतार अपने दोस्त को इन प्रयोगों से रोकते रहे हैं। सम्भव है कि शंकर का चित्तरंजन को इस बारे में रोकना किसी को पसन्द न आया हो। कौन जाने, उसी ने शंकर को मरवा डाला हो या स्वयं ठिकाने लगा दिया हो ! आओ चलें ।"

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डॉक्टर जैन यह जानकर चहक उठे कि मशहूर जासूस राज उनसे मिलने आया है। वह शंकर जगतार की हत्या का समाचार सुबह के अखबार में पढ़ चुके थे। उन्हें इससे गहरा धक्का लगा था। शंकर आज डॉक्टर को अपने साथ चित्तरंजन के पास ले जाना चाहते थे और आज ही वह संसार से चल बसे ।

"डॉक्टर साहब ! " राज ने पूछा, "क्या आप मिस्टर चित्तरंजन के बारे में कुछ जानते हैं ?"

"उतना ही कुछ जानता हूँ जितना शंकर जगतार ने बताया था । मिस्टर चित्तरंजन 'काले जादू' का अभ्यास करते-करते आप उस जादू की लपेट में था चुके थे। मिस्टर जगतार आज मुझे उनके पास ले चलने का प्रोग्राम बनाये हुए थे ताकि मैं लक्षण देखकर इतना बता सकूं कि उन पर किस तरह का असर है।"

"क्या आप मेरी आर्थना पर मिस्टर चित्तरंजन को देखने के लिए जा सकेंगे ?" राज ने कहा ।

"ज़रूर, राज बाबू ! मुझे तो बड़ा सुख मिलेगा कि मैं स्वर्गीय शंकर जगतार से किया हुआ वचन पूरा कर रहा हूँ ।

"रहते कहाँ हैं, मिस्टर चित्तरंजन ?

"शंकर जी ने बताया था कि 'गॉफ लिक' का बंगला उन्हीं का है और उसका नाम है 'तीसरी दुनिया'. ।

"बल्ले-बल्ले !" नरेन्द्र पंजाबी अदा में चहका, "तो यार लोग अब 'तीसरी दुनिया' में जा रहे हैं ?"

डॉक्टर जैन खिलखिलाकर हंस पड़े ।

पौन घण्टे बाद ये सब लोग एक विशाल आँगन में आ पहुंचे और 'तीसरी दुनिया' उनके सामने थी। बँगले का बहुत बड़ा गुम्बद था और बंगला चारों ओर पेड़ों से घिरा हुआ था। सामने का हिस्सा बहुत ही नयनाभिराम था। सभी पत्थर चित्रित थे । बरामदे में चीनी- लैम्प लटक रहे थे ।

सबसे आगे राज था। उसने मुख्य द्वार पर हाथ रखना चाहा था कि वह अपने आप खुल गया। राज स्तब्ध रह गया कि यह कैसा चमत्कार है ? दरवाज़े में नौकरों की वेष-भूषा में एक गोल-मटील व्यक्ति खड़ा था । उसके सिर पर रखी पगड़ी का गोटा चमक रहा था। चेहरा उसका बहुत अनोखा था। उसने मुंह से कुछ कहने की बजाय अँगूठे से इशारा किया कि भीतर आ जाओ ।

डॉक्टर जैन बॉल उठे, "यह नौकर गूंगा-बहरा जान पड़ता है। इसकी इन शारीरिक त्रुटियों का पता इसके चेहरे में मिल रहा है

सभी दरवाजे के पीछे कॉरीडोर में प्रविष्ट हुए। कॉरीडोर वन- मोल वस्तुओं से सुसज्जित था ।

आगे बढ़ने पर कॉरीडोर की नुक्कड़ पर एक औरत नजर माई । वह लम्बे कद की थी और दीवार में जड़े दर्पण को निहार रही थी। उसके भारी पपोटे आँखो पर झुके हुए थे। कमर उसकी बहुत पतली थी और वक्ष का उभार सन्तुलित था। उसने रेशमी गाउन पहन रखा था। वाल उसके खुले थे और कूल्हों तक लहरा रहे थे। उसने कॉरीडोर में पदचाप सुनी तो उनकी ओर देखा ।

राज ने उसे हाथ जोड़कर 'नमस्ते' की और बोला, “हम मिस्टर चित्तरंजन से मिलने आए हैं।"

उस नारी ने दूसरे कॉरीडोर में झाँकते हुए बहुत ही सुरीली आवाज़ में पुकारा, "चित्तरंजन बाबू !" आवाज ऐसी थी, उसकी जैसे बहता हुआ झरना गा रहा हो ।

इसके बाद कोई आवाज न आई। इस सन्नाटे में सभी की नजरें उस नारी के लावण्य का लुत्फ उठाती रहीं ।

दो मिनट बाद गलियारी की नुक्कड़ पर एक अधेड़ आयु का एक मजबूत व्यक्ति दिखाई दिया। उसने ढीले-ढाले कपड़े पहन रखे थे । ऑंखें उसकी चढ़ी हुई थीं। हाँ, गाल दहक रहें थे। गालों पर पसीने की हल्की-सी परत थी। वह भूल रहा था। वह शायद अपने पैरों पर ठीक तरह से खड़ा नहीं हो पा रहा था। वह एक टांग पर से बोझ उठाकर दूसरी टांग पर डालता, फिर पहली टाँग पर लगता था कि वह खड़ा खड़ा नाच रहा है।

डॉक्टर जैन ने आगे बढ़कर उसकी बाँह थाम ली। इस बीच लम्बी छरहरी नारी अपनी जगह से कहीं जा चुकी थी। डॉक्टर जैन ने, कहा, "मिस्टर चित्तरंजन ?" "

अधेड़ आयु के व्यक्ति ने जैसे चौंकते हुए कहा, “हाँ। कोन... आप कौन हैं ?"

"मैं डॉक्टर हेमचन्द्र जैन हूँ । ये हैं मशहूर जासूस मिस्टर राज औरये इनके सहयोगी हैं।'

"क्या क्या मेरे दोस्त शंकर जगतार ने आपको मेरे पास भेजा है ?"

राज ने तेजी से सोचा । चित्तरंजन को शायद यह मालूम नहीं था कि उसके दोस्त शंकर की हत्या कर दी गई है । उसने अभी इस दुःखद समाचार को छिपाना ही उचित समझा। वह झट से बोला, "जी हाँ, उन्होंने ही हमें आपके पास भेजा है ।"

"आइये. मेरे साथ आइये ! मैंने अपने कुछ दोस्तों को भी बुला रखा है। खैर, कोई बात नहीं, आइये !" यह कहकर चित्तरंजन दूसरी गलियारी की ओर मुड़ गया।

जब ये सब उस गलियारी में पहुँचे तो उन्हें वही गूंगा-बहरा नोकर सामने दिखाई दिया। उसने दरवाजा खोला और एक ओर हट कर खड़ा हो गया ।

उसी गलियारी के सामने से दो व्यक्ति अन्दर आए। उनमें से एक चीनी था और एक मंगोल । चित्तरंजन ने उन्हें देखा तो बांहें फैला कर उनकी ओर बढ़ा―"स्वागत है ! आज सितारों को देखने का लुत्फ आ जाएगा ! मेरी नई दूरबीन का उद्घाटन ! मेरे बंगले के गुम्बद में दूसरी दूरबीन !"

डॉक्टर जैन ने दबी जबान में राज से कहा, "क्या आज ग्रहों के विशेषज्ञ जमा हो रहे हैं ?"

"मालूम तो कुछ ऐसा ही होता है अजीव बंगला है ! लगता है, जैसे हम किसी सजे-सजाए पुराने मकबरे में आ पहुंचे हैं।'

इतने में भारी पपोटों वाली औरत एक कमरे से बाहर आई । वह भी चीनी और मंगोल व्यक्तियों को देखकर उनकी ओर बढ़ी । उसने चित्तरंजन की आंखों में आँखें डाल दीं ।

राज ने देखा कि चित्तरंजन की आँखें दुबारा चढ़ गई थीं और उसके गाल दहकने लगे थे। उसने थोड़ा-सा फूलना शुरू कर दिया था। डॉक्टर जैन भी चित्तरंजन को ध्यान से देख रहा था । उसके राज का हाथ पकड़ लिया और फुसफुसाया, “मैं एक अनोखी बात देख रहा हूँ और यह कोई शुभ बात नहीं है। मिस्टर जगतार ने ठीक ही कहा था कि उसका दोस्त चित्तरंजन खतरे में है। काश, हम चित्तरंजन को थोड़ी देर के लिए यहाँ से ले जा सकते !”

"मैं उनसे कहूँगा । लेकिन अगर वह जाने के लिए तैयार न हुए, तो ?" राज ने आशंका व्यक्त की । "

"इन्हें हर कीमत पर ले चलना चाहिये ।"

राज सोच में पड़ गया और फिर बोला, "मैं इन्हें ले जा सकता हूँ । मगर आप मेरे काम करने के ढंग का विरोध मत कीजियेगा ।

"नहीं करूंगा।" डॉक्टर जैन ने स्वीकारा ।

राज ने जल्दी से अपने साथियों के साथ तय किया ।

चित्तरंजन इस समय भारी पपोटों वाली नारी से कह रहा था, अलका ! इन्हें अतिथि भवन में ले जाओ ! मैं नए मेहमानों से मिलकर कुछ ही देर में पहुँचता हूँ ।"

अलका ने चीनी और मंगोल मेहमान को साथ लिया और चल दी । इधर चित्तरंजन ने राज पार्टी को साथ लिया और विशिष्ट कमरे में चला आया। उसने सभी को बैठने का इशारा किया, लेकिन राज बोला, "मिस्टर चित्तरंजन ! यहाँ बैठने से बेहतर यह है कि अब थोड़ी देर के लिए हमारे साथ चलें ! "

"नहीं- नहीं ! चित्तरंजन ने चीखते हुए कहा, "मैं यहां से नहीं जा सकता । मैं अपने मेहमानों को छोड़कर नहीं जा सकता। मैं यहाँ से हर्गिज नहीं जाऊँगा ।"

राज एक पल के लिए रुका और फिर उसने आगे बढ़कर चित्तरंजन के जबड़े पर मुक्का मारा। वह चोट सहन न कर सका और पीछे को गिर पड़ा। उसे कोई होश न रहा । राज ने प्रवेश और नरेन्द्र को इशारा किया। दोनों ने चित्तरंजन को उठा लिया । अर्चना ने दौड़कर कॉरीडोर का द्वार खोल दिया। डॉक्टर जैन और राज पीछे-पीछे थे: आगे आगे प्रवेश और नरेन्द्र कार की ओर बढ़ रहे थे। राज ने लपककर अपनी कार का दरवाजा खोल दिया। चित्तरंजन को जल्दी से पिछली सीट पर लिटा दिया गया। प्रवेश उसके पास जा बैठा । नरेन्द्र जाकर डाक्टर जैन की कार में टिक गया । अर्चना आगे बढ़कर राज के साथ बैठ गई। दोनों कारों के इंजन तेज़ी से स्टार्ट हुए। गूंगा -बहरा इस दृश्य को देखते ही बंगले के अन्दर की ओर दौड़ा ।

चित्तरंजन को जैन अपने क्लीनिक में ले आया । लॅबॉरेटरी में उसे नरेन्द्र और प्रवेश ने सोफे पर लिटा दिया। डॉक्टर ने शीशे की अलमारी में से एक शीशी निकाली और उसका कॉर्क खोलकर वह शीशी चित्तरंजन की नाक से लगा दी।
 
दो-एक पल में ही चित्तरंजन कराहने लगा। डाक्टर ने अपने मेज की दराज में से तेजी के साथ एक छोटा-सा गोल दर्पण निकाला और राज के हाथ में देते हुए बोला, "इसे चित्तरंजन की आँखों से दो फीट दूर रखियेगा ! यह कहकर उसने कमरे की बत्ती जला दी और दरवाज़े का पर्दा गिरा दिया ।

चिनरंजन ने दुबारा कराहने के बाद अपनी आँखे खोल दीं । उसकी घखें गोल दर्पण पर लगकर रह गई ।

डॉक्टर जैन ने कहा, "मिस्टर चित्तरंजन ! मैं आपको गहरी नींद में सुलाने वाला हूँ । आपको आराम की जरूरत है। आप जब जाऐंगे तो कहीं भी दर्द महसूस नहीं करेंगे । पल-भर में आपकी आँखें मुँद जाएंगी और आपका सिर भारी नहीं रहेगा ।"

तब डॉक्टर ने राज के हाथ से गोल दर्पण ले लिया । उसे दाएँ हाथ में पकड़ लिया। एक मिनट बाद वह अपना बाँया हाय दर्पण पर रखकर उठाने लगे । वह बड़ी मधुर आवाज में बोले, "मिस्टर चित्तरंजन ! अब आप सो जाएँगे। तब आप कल सवेरे दम बजे तक नहीं उठेंगे। उठते ही आप सीधे मेरे पास आएँगे। आप और किसी से भी बात नहीं करेंगे। मुझसे मिले बिना आप कहीं नहीं जाएंगे।"

और चित्तरंजन की आँखें मूंद चुकी थीं। डॉक्टर जैन ने दर्पण मेज़ पर रख दिया। वह मेज से हटकर चित्तरंजन के पास आए । उन्होंने उसका बायां बाजू ऊपर उठाया। आश्चर्य या कि चितरंजन की वह बाँह छोड़ देने पर भी गिरी नहीं, बल्कि अकड़ी और उठी रही डॉक्टर बोला, "बिल्कुल ठीक! मैंने चित्तरंजन पर तन्मयता और बेखुदी की दूसरी स्टेज ला दी है। अब मैं जो कुछ कहूंगा, यह वही करेगा ।"

दो मिनट वहाँ सन्नाटा और कौतूहल बरसता रहा।

फिर डॉक्टर जैन बोला, “मिस्टर चित्तरंजन ! अपनी आँखें खोल दो और सोफे पर उठकर बैठ जाओ।"

चित्तरंजन ने तत्काल डॉक्टर के आदेश का पालन किया ।

"उठो ! क्लीनिक से गुजरकर कमरा नम्बर तीन में चले जाओ । वहाँ आपको शानदार पलंग पर आरामदेह विस्तर मिलेगा। किस चीज़ की ज़रूरत पड़े तो नर्स जैनेट को आवाज देना ।"

डॉक्टर के आदेश पर चित्तरंजन सोफे पर से उठ खड़ा हुआ।

"ठहरो!" डाक्टर जैन ने टोका, "मुझे एक बात याद आ गई । बैठ जाओ ! "

चित्तरंजन दुबारा सोफे पर आ बैठा ।

डॉक्टर ने अपनी मेज़ की दराज से एक लॉकेट निकाला, जिसमें पीतल का 'स्वास्तिक' था। डाक्टर ने वह लॉकेट चित्तरंजन के गले में डालते हुए कहा, “मिस्टर चित्तरंजन ! यह लॉकेट पहनकर तुम सुरक्षित हो गए हो। अब रोशनी की शक्ति तुम्हारी सुरक्षा करेगी । हवा, पानी, आग, इस धरती की कोई भी शक्ति तुम्हें किसी तरह का नुक्सान नहीं पहुंचा सकेगी। अब जाओ !"

चित्तरंजन उठकर चला गया ।

डॉक्टर जैन ने राज से कहा, "तन्त्र-विद्या अच्छे हाथों में हो तो सैकड़ों रोगों का उपचार कर सकती है। अगर यही विद्या बुरे हाथों में हो तो तबाही ला देगी । अब आप कल सुबह दस बजे पधारियेगा ! चित्तरंजन उसी समय उठेगा। मुझे पूरी आशा है कि हम उससे बहुत- सी बातें मालूम कर सकेंगे। उसे यहाँ लाना बहुत जरूरी था । आप देखते रहे हैं कि उनके बंगले में दो बार उन पर आत्मविस्मृति की हालत बनी थी, मेरा मतलब है कि अपने को वह जैसे पराए हाथों में बेच चुके थे।"

"जी हां ! " राज बोला, "अच्छा, घव में कल सवेरे दस बजे आऊँगा । इस सारे कष्ट के लिए मैं आपका आभारी हूँ ।"

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शाम चार बजे इन्स्पेक्टर तनेजा फिर राज के प्रॉफिस में प्रविष्ट हुआ । वह कुछ परेशान और बेचैन था । उसने आते ही कहा, "हमने भगोड़े कृष्ण जगतार को पकड़ लिया है। उसे 'यमुना नगर' से पकड़ कर लाया गया है। उसके पास से साढ़े चार हजार रुपये बरामद हुए हैं ।"

"इस समय कृष्ण जगतार कहाँ है ?" राज ने पूछा ।

विलिंगडन अस्पताल में..।"

"क्यों ?"

"आप एक भगोड़े की मानसिक दशा का तो अन्दाजा लगा ही सकते हैं । उसे निकल भागने के सिवा कुछ नहीं सूझता। वह पूरी स्पीड से कार उड़ाता न जाने किस मंजिल को उड़ा जा रहा थी । उसकी कार एक छकड़े से जा टकराई। वह आप तो बच गया, मगर कार बेकार हो गई । उसकी कार के नम्बर का चूंकि वायरलेस से ऐलान कर दिया गया था, इसलिए यमुना नगर की पुलिस ने उसे दबोच लिया। जब वहाँ की पुलिस उसे दिल्ली ला रही थी, रास्ते में वह जीप से कूद गया। चोटें आना ज़रूरी था। चोटें भी गहरी आईं। हाँ, बेसुध होने से पहले वह आपका नाम पुकारता रहा ""

"मेरा नाम पुकारता रहा ?" राज के मुंह से हैरानी में निकला ।

"जी हाँ ! फिर होश में आने पर उसने आपका नाम पुकारना बन्द कर दिया। अब वह एक बुत की तरह चुप है । वह कोई बात बताने को तैयार नहीं ।"

"खूब !" राज बोला, 'आप चाहते होंगे कि मैं आपके साथ चलूं और उसे बोलने पर मजबूर करूं।"

"आया तो मैं इसी इच्छा के साथ था।" इन्स्पेक्टर बोला, "अरे हाँ! यह तो बताइये, उस पत्र में क्या लिखा था जो शंकर जगतार के पर्स से निकला था ?"

"कुछ भी नहीं। वहलो मधुमेह रोग का कोई नुस्खा था।" राज ने बात बनाते हुए कहा। वह अभी इन्स्पेक्टर की पत्र की इबारत से परिचित नहीं कराना चाहता था। उसने उक्त हुए कहा, "मैं एक शर्त पर आपके साथ जीने के लिए तैयार है कि मैं अकेला ही कृष्ण जगतार से मिलूँगा ।"

"तो फिर आपको हमें स्क्रीन के पीछे बातचीत सुनने की इजाजत देनी होगी ।" इन्स्पेक्टर ने भी अपनी बात रख दी।

"बड़े शौक से !" राज ने बात मान ली ।

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