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तूफ़ान के बाद की सुबह
वह एक पल था जब समय जैसे जम गया था।
राज और नैना, जो एक पल पहले एक-दूसरे की आत्मा में डूबे हुए थे, एक झटके में हक़ीक़त की पथरीली ज़मीन पर आ गिरे। सामने दरवाज़े की चौखट पर कविता खड़ी थी, किसी भूत की तरह। उसकी आँखों में नर्क की वहशत थी, और उस वहशत में अब एक नया भाव जुड़ गया था - घिन और धोखा।
"कविता..." राज ने फुसफुसाने की कोशिश की, लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
नैना, एक प्रशिक्षित सैनिक की तरह, तुरंत हरकत में आई। उसने गलीचा खींचकर उन दोनों के नग्न शरीरों को ढका और उठ खड़ी हुई। "शांत रहो, लड़की। तुम सुरक्षित हो।"
लेकिन कविता के लिए शब्द अब कोई मायने नहीं रखते थे। उसने जो देखा था, वह उसके टूटे हुए मन के लिए आख़िरी चोट थी। वह चीख़ी, एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख़ जिसमें दर्द, डर और नफ़रत का सैलाब था। और फिर वह पलटकर वापस अपने कमरे में भाग गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
अंदर से उसके रोने और चीज़ों के पटकने की आवाज़ आने लगी।
राज और नैना ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने। जो कमरा कुछ देर पहले जन्नत था, वह अब किसी जंग का मैदान लग रहा था।
"उसे पैनिक अटैक आया है," नैना ने कहा। "हमें दरवाज़ा तोड़ना होगा, वह खुद को नुक़सान पहुँचा सकती है।"
"नहीं, रुको," राज ने कहा, उसका दिमाग़ तेज़ी से चल रहा था। "उसे हम पर भरोसा नहीं है। इस वक़्त दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान है जिसे देखकर वह शांत हो सकती है।"
उसने अपना फ़ोन उठाया और अपनी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल कॉल लगाई।
"हैलो?" दूसरी तरफ़ से अमृता की बेचैन आवाज़ आई।
"अमृता," राज की आवाज़ सपाट थी।
"आपकी बेटी मिल गई है। वह ज़िंदा है।"
फ़ोन पर एक गहरी, काँपती हुई साँस की आवाज़ आई। "कहाँ... कहाँ है वो? क्या वो ठीक है?"
"वह मेरे साथ है, और वह सुरक्षित है। लेकिन... आपको फ़ौरन यहाँ आना होगा। मैं आपको पता भेज रहा हूँ। प्लीज़, कोई सवाल मत पूछिएगा। बस आ जाइए।"
अगला एक घंटा किसी नर्क से कम नहीं था। कविता अंदर से रोती और चिल्लाती रही, और राज और नैना बाहर बेबसी से दरवाज़े पर खड़े रहे।
जब दरवाज़े पर दस्तक हुई, तो राज ने दरवाज़ा खोला। सामने अमृता खड़ी थी। उसकी आँखों में उम्मीद, डर, और हज़ारों सवाल थे।
"किस कमरे में है वो?" उसने पूछा।
राज ने काँपते हुए हाथ से दरवाज़े की ओर इशारा किया।
अमृता दरवाज़े पर गई। "कविता... बेटा... दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ, तुम्हारी माँ।"
अंदर से एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। और फिर, दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई।
एक माँ और बेटी, जो महीनों बाद एक-दूसरे से मिल रही थीं, का वह मिलन किसी ख़ुशी के लम्हे जैसा नहीं था। वह दर्दनाक था। कविता अपनी माँ से किसी बेल की तरह लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
"माँ... ये लोग... ये लोग गंदे हैं... उस आदमी ने मुझे बचाया... और फिर... माँ..." वह टूटते हुए शब्दों में सब कुछ बताने की कोशिश कर रही थी, उसकी उँगली काँपते हुए राज की ओर इशारा कर रही थी।
अमृता ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसने राज और नैना की तरफ़ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें दर्द, भ्रम और एक गहरा सवाल था। उस एक नज़र ने राज को अपराधी बना दिया था। अमृता की आँखों में वह अपनापन नहीं था जो उसने उस रात राज के अपार्टमेंट में महसूस किया था। यहाँ सिर्फ़ एक माँ थी, और उसकी ज़ख़्मी बेटी।
नैना ने स्थिति को भाँप लिया। उसने राज के कंधे पर हाथ रखा। "यहाँ तुम्हारा काम खत्म हो गया, राज। अब यह एक माँ और बेटी के बीच की बात है।"
राज जानता था कि वह सही कह रही है। उसकी मौजूदगी कविता के लिए सिर्फ़ दर्द का सबब बन रही थी।
"अमृता जी," राज ने कहा, "कविता अब सुरक्षित है। राठौड़ जल्द ही पकड़ा जाएगा। मैं..."
"तुम जाओ यहाँ से, राज," अमृता ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक गहरी, ठंडी थकान थी। "तुमने मेरी बेटी को ढूँढ़ लिया, मैं तुम्हारी आभारी रहूँगी। लेकिन इस वक़्त, उसे तुम्हारी नहीं, मेरी ज़रूरत है।"
यह शब्द किसी थप्पड़ से ज़्यादा ज़ोरदार थे। राज को एहसास हुआ कि वह इस कहानी में सिर्फ़ एक किरदार था, एक जासूस, जिसका काम खत्म हो चुका था। उसने अपनी जान दाँव पर लगाई, लेकिन अंत में, वह फिर से अकेला ही रह गया था।
वह बिना कुछ कहे दरवाज़े की ओर मुड़ा। नैना भी उसके साथ बाहर आ गई।
बाहर रात की ठंडी हवा में, राज को पहली बार एहसास हुआ कि वह कितना ज़्यादा अकेला और थका हुआ है।
राज और नैना चुपचाप गाड़ी में बैठे थे। शहर की रोशनियाँ पीछे छूट रही थीं।
"अब कहाँ जाओगे?" नैना ने गाड़ी चलाते हुए पूछा।
"पता नहीं," राज ने कहा, उसकी आवाज़ में एक ख़ालीपन था। "शायद वापस अपने तथाकथित घर।"
नैना ने एक पल के लिए उसकी तरफ़ देखा। उसने राज के चेहरे पर एक ऐसी हताशा देखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने उसे लड़ाइयों में देखा था, ज़ख़्मी देखा था, लेकिन इतना टूटा हुआ कभी नहीं देखा था।
"नहीं," नैना ने अचानक कहा। "तुम वहाँ वापस नहीं जा रहे हो।"
उसने गाड़ी को एक अलग दिशा में मोड़ दिया।
"नैना, यह तुम क्या कर रही हो?"
"तुम्हें यहाँ से दूर ले जा रही हूँ," उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक फ़ौजी दृढ़ता थी। "मेरा मिशन कल सुबह खत्म हो रहा है। मैंने कुछ दिनों की छुट्टी ली है। मुंबई से बहुत दूर, गोवा में, मेरा एक छोटा सा बीच हाउस है। तुम मेरे साथ वहाँ चल रहे हो।"
"लेकिन क्यों?"
"क्योंकि एक सिपाही दूसरे ज़ख़्मी सिपाही को कभी अकेला नहीं छोड़ता," नैना ने कहा। "तुमने उस लड़की को बचा लिया, राज। तुमने अपना काम कर दिया। लेकिन इस पूरी लड़ाई में, तुम खुद को बचाना भूल गए। तुम्हें भी मरहम की ज़रूरत है।"
राज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप बैठा रहा। पहली बार, उसकी ज़िंदगी में कोई और उसके लिए फ़ैसले ले रहा था, और उसे यह एहसास अच्छा लग रहा था।
मुंबई से गोवा तक का सफ़र ख़ामोशी और कुछ अनकही बातों में बीता। वे एक छोटे से, शांत गाँव में पहुँचे, जहाँ नैना का बीच हाउस था। वह एक लकड़ी का बना छोटा सा कॉटेज था, जो सीधे समंदर के किनारे पर था। जैसे ही राज ने गाड़ी से उतरकर नमकीन हवा में साँस ली और लहरों की आवाज़ सुनी, उसे लगा जैसे उसके कंधों से सालों का बोझ उतर गया हो।
अंदर का माहौल बहुत सुकून भरा था। सफ़ेद पर्दे, लकड़ी का फ़र्नीचर, और बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ जिनसे समंदर का नज़ारा दिखता था।
"जाओ, नहा लो," नैना ने कहा। "तुम कई दिनों से सोए नहीं हो।"
राज ने उसकी बात मानी। गर्म पानी के नीचे खड़े होकर, उसे लगा जैसे वह सिर्फ़ मुंबई की धूल ही नहीं, बल्कि कविता की नफ़रत, अमृता की ख़ामोशी, और अपने अकेलेपन को भी धो रहा है।
जब वह बाहर आया, तो नैना ने उसके लिए खाने की मेज़ लगा दी थी। उन्होंने खामोशी में खाना खाया, लहरों की आवाज़ उनके साथ थी।
उस रात, वे अलग-अलग कमरों में सोए। लेकिन दोनों जानते थे कि यह दूरी सिर्फ़ एक रात की है। उन्हें इस नए रिश्ते को, इस नई शुरुआत को कोई जल्दबाज़ी का नाम नहीं देना था।
अगली सुबह, जब राज की आँख खुली, तो उसने नैना को बालकनी में खड़े होकर उगते हुए सूरज को देखते हुए पाया। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो राज ने पहले कभी नहीं देखी थी।
वह चुपचाप उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया।
"ख़ूबसूरत है, है ना?" नैना ने बिना मुड़े कहा।
"हाँ," राज ने कहा, लेकिन उसकी नज़रें सूरज पर नहीं, नैना पर थीं।
वह एक पल था जब समय जैसे जम गया था।
राज और नैना, जो एक पल पहले एक-दूसरे की आत्मा में डूबे हुए थे, एक झटके में हक़ीक़त की पथरीली ज़मीन पर आ गिरे। सामने दरवाज़े की चौखट पर कविता खड़ी थी, किसी भूत की तरह। उसकी आँखों में नर्क की वहशत थी, और उस वहशत में अब एक नया भाव जुड़ गया था - घिन और धोखा।
"कविता..." राज ने फुसफुसाने की कोशिश की, लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
नैना, एक प्रशिक्षित सैनिक की तरह, तुरंत हरकत में आई। उसने गलीचा खींचकर उन दोनों के नग्न शरीरों को ढका और उठ खड़ी हुई। "शांत रहो, लड़की। तुम सुरक्षित हो।"
लेकिन कविता के लिए शब्द अब कोई मायने नहीं रखते थे। उसने जो देखा था, वह उसके टूटे हुए मन के लिए आख़िरी चोट थी। वह चीख़ी, एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख़ जिसमें दर्द, डर और नफ़रत का सैलाब था। और फिर वह पलटकर वापस अपने कमरे में भाग गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
अंदर से उसके रोने और चीज़ों के पटकने की आवाज़ आने लगी।
राज और नैना ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने। जो कमरा कुछ देर पहले जन्नत था, वह अब किसी जंग का मैदान लग रहा था।
"उसे पैनिक अटैक आया है," नैना ने कहा। "हमें दरवाज़ा तोड़ना होगा, वह खुद को नुक़सान पहुँचा सकती है।"
"नहीं, रुको," राज ने कहा, उसका दिमाग़ तेज़ी से चल रहा था। "उसे हम पर भरोसा नहीं है। इस वक़्त दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान है जिसे देखकर वह शांत हो सकती है।"
उसने अपना फ़ोन उठाया और अपनी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल कॉल लगाई।
"हैलो?" दूसरी तरफ़ से अमृता की बेचैन आवाज़ आई।
"अमृता," राज की आवाज़ सपाट थी।
"आपकी बेटी मिल गई है। वह ज़िंदा है।"
फ़ोन पर एक गहरी, काँपती हुई साँस की आवाज़ आई। "कहाँ... कहाँ है वो? क्या वो ठीक है?"
"वह मेरे साथ है, और वह सुरक्षित है। लेकिन... आपको फ़ौरन यहाँ आना होगा। मैं आपको पता भेज रहा हूँ। प्लीज़, कोई सवाल मत पूछिएगा। बस आ जाइए।"
अगला एक घंटा किसी नर्क से कम नहीं था। कविता अंदर से रोती और चिल्लाती रही, और राज और नैना बाहर बेबसी से दरवाज़े पर खड़े रहे।
जब दरवाज़े पर दस्तक हुई, तो राज ने दरवाज़ा खोला। सामने अमृता खड़ी थी। उसकी आँखों में उम्मीद, डर, और हज़ारों सवाल थे।
"किस कमरे में है वो?" उसने पूछा।
राज ने काँपते हुए हाथ से दरवाज़े की ओर इशारा किया।
अमृता दरवाज़े पर गई। "कविता... बेटा... दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ, तुम्हारी माँ।"
अंदर से एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। और फिर, दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई।
एक माँ और बेटी, जो महीनों बाद एक-दूसरे से मिल रही थीं, का वह मिलन किसी ख़ुशी के लम्हे जैसा नहीं था। वह दर्दनाक था। कविता अपनी माँ से किसी बेल की तरह लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
"माँ... ये लोग... ये लोग गंदे हैं... उस आदमी ने मुझे बचाया... और फिर... माँ..." वह टूटते हुए शब्दों में सब कुछ बताने की कोशिश कर रही थी, उसकी उँगली काँपते हुए राज की ओर इशारा कर रही थी।
अमृता ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसने राज और नैना की तरफ़ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें दर्द, भ्रम और एक गहरा सवाल था। उस एक नज़र ने राज को अपराधी बना दिया था। अमृता की आँखों में वह अपनापन नहीं था जो उसने उस रात राज के अपार्टमेंट में महसूस किया था। यहाँ सिर्फ़ एक माँ थी, और उसकी ज़ख़्मी बेटी।
नैना ने स्थिति को भाँप लिया। उसने राज के कंधे पर हाथ रखा। "यहाँ तुम्हारा काम खत्म हो गया, राज। अब यह एक माँ और बेटी के बीच की बात है।"
राज जानता था कि वह सही कह रही है। उसकी मौजूदगी कविता के लिए सिर्फ़ दर्द का सबब बन रही थी।
"अमृता जी," राज ने कहा, "कविता अब सुरक्षित है। राठौड़ जल्द ही पकड़ा जाएगा। मैं..."
"तुम जाओ यहाँ से, राज," अमृता ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, बस एक गहरी, ठंडी थकान थी। "तुमने मेरी बेटी को ढूँढ़ लिया, मैं तुम्हारी आभारी रहूँगी। लेकिन इस वक़्त, उसे तुम्हारी नहीं, मेरी ज़रूरत है।"
यह शब्द किसी थप्पड़ से ज़्यादा ज़ोरदार थे। राज को एहसास हुआ कि वह इस कहानी में सिर्फ़ एक किरदार था, एक जासूस, जिसका काम खत्म हो चुका था। उसने अपनी जान दाँव पर लगाई, लेकिन अंत में, वह फिर से अकेला ही रह गया था।
वह बिना कुछ कहे दरवाज़े की ओर मुड़ा। नैना भी उसके साथ बाहर आ गई।
बाहर रात की ठंडी हवा में, राज को पहली बार एहसास हुआ कि वह कितना ज़्यादा अकेला और थका हुआ है।
राज और नैना चुपचाप गाड़ी में बैठे थे। शहर की रोशनियाँ पीछे छूट रही थीं।
"अब कहाँ जाओगे?" नैना ने गाड़ी चलाते हुए पूछा।
"पता नहीं," राज ने कहा, उसकी आवाज़ में एक ख़ालीपन था। "शायद वापस अपने तथाकथित घर।"
नैना ने एक पल के लिए उसकी तरफ़ देखा। उसने राज के चेहरे पर एक ऐसी हताशा देखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने उसे लड़ाइयों में देखा था, ज़ख़्मी देखा था, लेकिन इतना टूटा हुआ कभी नहीं देखा था।
"नहीं," नैना ने अचानक कहा। "तुम वहाँ वापस नहीं जा रहे हो।"
उसने गाड़ी को एक अलग दिशा में मोड़ दिया।
"नैना, यह तुम क्या कर रही हो?"
"तुम्हें यहाँ से दूर ले जा रही हूँ," उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक फ़ौजी दृढ़ता थी। "मेरा मिशन कल सुबह खत्म हो रहा है। मैंने कुछ दिनों की छुट्टी ली है। मुंबई से बहुत दूर, गोवा में, मेरा एक छोटा सा बीच हाउस है। तुम मेरे साथ वहाँ चल रहे हो।"
"लेकिन क्यों?"
"क्योंकि एक सिपाही दूसरे ज़ख़्मी सिपाही को कभी अकेला नहीं छोड़ता," नैना ने कहा। "तुमने उस लड़की को बचा लिया, राज। तुमने अपना काम कर दिया। लेकिन इस पूरी लड़ाई में, तुम खुद को बचाना भूल गए। तुम्हें भी मरहम की ज़रूरत है।"
राज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप बैठा रहा। पहली बार, उसकी ज़िंदगी में कोई और उसके लिए फ़ैसले ले रहा था, और उसे यह एहसास अच्छा लग रहा था।
मुंबई से गोवा तक का सफ़र ख़ामोशी और कुछ अनकही बातों में बीता। वे एक छोटे से, शांत गाँव में पहुँचे, जहाँ नैना का बीच हाउस था। वह एक लकड़ी का बना छोटा सा कॉटेज था, जो सीधे समंदर के किनारे पर था। जैसे ही राज ने गाड़ी से उतरकर नमकीन हवा में साँस ली और लहरों की आवाज़ सुनी, उसे लगा जैसे उसके कंधों से सालों का बोझ उतर गया हो।
अंदर का माहौल बहुत सुकून भरा था। सफ़ेद पर्दे, लकड़ी का फ़र्नीचर, और बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ जिनसे समंदर का नज़ारा दिखता था।
"जाओ, नहा लो," नैना ने कहा। "तुम कई दिनों से सोए नहीं हो।"
राज ने उसकी बात मानी। गर्म पानी के नीचे खड़े होकर, उसे लगा जैसे वह सिर्फ़ मुंबई की धूल ही नहीं, बल्कि कविता की नफ़रत, अमृता की ख़ामोशी, और अपने अकेलेपन को भी धो रहा है।
जब वह बाहर आया, तो नैना ने उसके लिए खाने की मेज़ लगा दी थी। उन्होंने खामोशी में खाना खाया, लहरों की आवाज़ उनके साथ थी।
उस रात, वे अलग-अलग कमरों में सोए। लेकिन दोनों जानते थे कि यह दूरी सिर्फ़ एक रात की है। उन्हें इस नए रिश्ते को, इस नई शुरुआत को कोई जल्दबाज़ी का नाम नहीं देना था।
अगली सुबह, जब राज की आँख खुली, तो उसने नैना को बालकनी में खड़े होकर उगते हुए सूरज को देखते हुए पाया। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो राज ने पहले कभी नहीं देखी थी।
वह चुपचाप उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया।
"ख़ूबसूरत है, है ना?" नैना ने बिना मुड़े कहा।
"हाँ," राज ने कहा, लेकिन उसकी नज़रें सूरज पर नहीं, नैना पर थीं।